रोमन सभ्यता
प्राचीन रोमन सभ्यता और साम्राज्य का उदय इटली प्रायद्वीप में हुआ, जो भूमध्यसागर के मध्य भाग में स्थित है। भूमध्यसागरीय क्षेत्र में यूरोप के तीन प्रमुख प्रायद्वीप—बाल्कन (यूनानी), इटली और आइबेरियाई (स्पेन) प्रायद्वीप स्थित हैं। इनमें इटली का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि यह पूर्वी और पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के मध्य संपर्क का सेतु था। इसकी लंबाई लगभग 1,140 किलोमीटर तथा अधिकतम चौड़ाई लगभग 320 किलोमीटर है। इसके पूर्व में एड्रियाटिक सागर के पार बाल्कन प्रायद्वीप तथा पश्चिम में टाइरेनियन सागर के पार भूमध्यसागर का पश्चिमी क्षेत्र स्थित है। उत्तर-पश्चिम दिशा में फ्रांस तथा उससे आगे आइबेरियाई (स्पेन) प्रायद्वीप स्थित है। इटली के मध्य भाग में उत्तर से दक्षिण तक एपेनाइन पर्वतमाला फैली हुई है, जो इसकी रीढ़ के समान प्रतीत होती है। उत्तर में आल्प्स पर्वतमाला इटली को मध्य एवं पश्चिमी यूरोप से पृथक् करती है। यद्यपि आल्प्स एक प्राकृतिक सुरक्षा-दीवार का कार्य करती थी, फिर भी उसमें स्थित अनेक दर्रों के कारण बाहरी जातियों और आक्रमणकारियों के लिए प्रवेश के मार्ग खुले रहते थे।

प्राकृतिक संपदा और जलवायु
इटली की भौगोलिक संरचना उसके लिए वरदान और चुनौती दोनों सिद्ध हुई। एक ओर भूकंपों और ज्वालामुखीय गतिविधियों के कारण समय-समय पर जन-धन की हानि होती रही, तो दूसरी ओर ज्वालामुखीय राख और लावा ने भूमि को अत्यंत उपजाऊ बना दिया। रोमन लेखक प्लिनी द एल्डर ने इटली को पृथ्वी का सर्वाधिक समृद्ध और सुंदर प्रदेश बताया है। प्रसिद्ध कवि वर्जिल ने भी इसकी उर्वरता की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि यहाँ की भूमि अत्यंत उपजाऊ थी तथा कृषि और पशुपालन दोनों का पर्याप्त विकास हुआ था। यद्यपि उसके वर्णनों में साहित्यिक अतिशयोक्ति भी विद्यमान है, फिर भी वे इटली की प्राकृतिक समृद्धि का परिचय देते हैं।
इटली की जलवायु भी अत्यंत अनुकूल थी। यहाँ भूमध्यसागरीय जलवायु पाई जाती है, जिसमें ग्रीष्म ऋतु अपेक्षाकृत शुष्क तथा शीत ऋतु सामान्यतः वर्षायुक्त होती है। न तो अत्यधिक गर्मी पड़ती थी और न ही अत्यधिक शीत। पर्याप्त वर्षा, विस्तृत मैदान तथा हरित पर्वतीय ढालों ने इसे कृषि के लिए अत्यंत उपयुक्त बना दिया। यद्यपि यहाँ खनिज संसाधन बहुत अधिक नहीं थे, फिर भी संगमरमर, ताँबा, लोहा तथा अन्य उपयोगी खनिजों की उपलब्धता ने आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
कृषि और व्यापार की उन्नति
इटली का पश्चिमी तटीय क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ था तथा वहाँ अनेक प्राकृतिक बंदरगाह स्थित थे। इसके विपरीत पूर्वी तटीय क्षेत्र अपेक्षाकृत कम उपजाऊ था और वहाँ प्राकृतिक बंदरगाह भी कम थे। उत्तरी इटली में स्थित पो नदी की घाटी यूरोप के सर्वाधिक उपजाऊ मैदानों में गिनी जाती है। यहाँ कृषि का उल्लेखनीय विकास हुआ था। यूनानी इतिहासकार पॉलिबियस ने इस क्षेत्र में अनाज की प्रचुरता और उसकी सस्ती कीमत का उल्लेख करते हुए इसकी कृषि-संपन्नता की प्रशंसा की है।
मध्य और दक्षिणी इटली में भी अनेक नदी-घाटियाँ थीं, किंतु वे सामूहिक रूप से पो घाटी जितनी उपजाऊ नहीं थीं। दक्षिणी इटली के कुछ भाग अपेक्षाकृत शुष्क थे। व्यापार और समुद्री गतिविधियों का प्रमुख केंद्र पश्चिमी तट था, जहाँ रोम, ओस्टिया, नेपल्स तथा अन्य महत्त्वपूर्ण नगर और बंदरगाह स्थित थे। इन बंदरगाहों के माध्यम से रोम का भूमध्यसागरीय विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क स्थापित हुआ।
रोमन सभ्यता का उद्भव
रोमन सभ्यता का उद्भव आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में मध्य इटली की टाइबर नदी के तट पर हुआ। प्रारंभ में रोम एक छोटा-सा ग्राम था, जो कालांतर में एक शक्तिशाली नगर-राज्य तथा विशाल साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ। इसकी भौगोलिक स्थिति अत्यंत अनुकूल थी। टाइबर नदी ने व्यापार, परिवहन और समुद्री संपर्क को सुगम बनाया, जबकि समुद्र से कुछ दूरी पर स्थित होने के कारण रोम को बाहरी आक्रमणों से आंशिक सुरक्षा भी प्राप्त हुई। उपजाऊ मैदानों, भूमध्यसागरीय जलवायु तथा प्राकृतिक संसाधनों ने कृषि और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा दिया। साथ ही, विकसित व्यापारिक मार्गों, अनुशासित सेना, सुदृढ़ प्रशासन और संगठित राजनीतिक व्यवस्था ने रोम की शक्ति को निरंतर सुदृढ़ किया। रोम ने पहले संपूर्ण इटली पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया, तत्पश्चात कार्थेज को पराजित कर भूमध्यसागरीय क्षेत्र की प्रमुख शक्ति बन गया। कालांतर में रोमन साम्राज्य यूरोप के विशाल भाग, उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के अनेक प्रदेशों तक फैल गया। रोमन सभ्यता ने प्रशासन, विधि, सैन्य संगठन, स्थापत्य, भाषा तथा संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया, जिसका प्रभाव आधुनिक यूरोपीय सभ्यता पर आज भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
प्राचीन रोम के इतिहास के स्रोत
प्राचीन रोम के प्रारंभिक इतिहास की जानकारी सीमित है, क्योंकि रोम में प्रारंभिक काल में यूनान के होमर, हेरोडोटस और थ्यूसीडिडीज जैसे महान इतिहासकार नहीं हुए। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से पूर्व की अधिकांश घटनाओं का विवरण लोककथाओं, परंपराओं और अनुश्रुतियों पर आधारित है। समय के साथ इनमें अनेक काल्पनिक तत्त्व जुड़ गए, जिससे उनकी ऐतिहासिक विश्वसनीयता कम हो गई। इसलिए रोम के प्रारंभिक इतिहास के अध्ययन में साहित्यिक परंपराओं के साथ-साथ पुरातात्त्विक एवं अभिलेखीय साक्ष्यों का भी उपयोग किया जाता है। सामान्यतः रोमन इतिहास का अपेक्षाकृत प्रामाणिक और क्रमबद्ध अध्ययन चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद से संभव होता है। रोमन इतिहास के प्रमुख स्रोतों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—(1) प्रारंभिक अभिलेख (2) रोमन साहित्य (3) रोमन इतिहासकार तथा (4) यूनानी ऐतिहासिक ग्रंथ।
प्रारंभिक अभिलेख
प्रारंभिक अभिलेखों में द्वादश पट्ट (ट्वेल्व टेबल्स), एनालेस पॉन्टिफिकुम तथा एनालेस मैक्सिमी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। द्वादश पट्ट रोमन विधि का सबसे प्राचीन लिखित संहिता-संग्रह था। इसमें शासन, न्याय, सामाजिक व्यवस्था तथा आर्थिक जीवन से संबंधित नियमों का उल्लेख मिलता है। यह रोमन समाज की प्रारंभिक संरचना और विधि-व्यवस्था की जानकारी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। एनालेस पॉन्टिफिकुम में रोम की प्रमुख वार्षिक घटनाओं का अभिलेखन किया जाता था। इन्हें रोम के प्रधान पुरोहित (पॉन्टिफेक्स मैक्सिमस) द्वारा श्वेत पट्टिकाओं पर लिखकर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाता था। बाद में इन अभिलेखों का संकलन एनालेस मैक्सिमी के रूप में किया गया। यद्यपि इसका मूल स्वरूप संप्रति उपलब्ध नहीं है, फिर भी इसके अनेक उद्धरण बाद के इतिहासकारों की रचनाओं में मिलते हैं। इसके अतिरिक्त, रोम से प्राप्त अभिलेखों, शिलालेखों तथा अधिकारियों की सूचियों से भी प्रशासन, उच्च पदाधिकारियों और राज्य-व्यवस्था संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
रोमन साहित्य
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध से रोम में इतिहास-लेखन का व्यवस्थित विकास प्रारंभ हुआ। इस क्षेत्र में क्विंटस फेबियस पिक्टर का नाम सर्वप्रमुख है। उसने लगभग 200 ईसा पूर्व यूनानी भाषा में ‘हिस्ट्री ऑफ रोम’ (रोम का इतिहास) की रचना की। उसे रोमन इतिहास-लेखन का प्रथम इतिहासकार माना जाता है। इसके पश्चात क्विंटस एनियस ने लैटिन भाषा में पद्य शैली में ‘एनालेस’ की रचना की। वह यूनानी एवं इतालवी सांस्कृतिक परंपराओं से प्रभावित था तथा द्वितीय प्यूनिक युद्ध में सैनिक के रूप में भी भाग ले चुका था। एनियस के बाद कैटो द एल्डर (मार्कस पोर्शियस कैटो) ने लैटिन भाषा में ‘ओरिजिनेस’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो रोमन इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण एवं विश्वसनीय स्रोत है। द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में कुछ ऐसे इतिहासकार भी हुए जिन्होंने आकर्षक एवं अलंकारपूर्ण शैली में इतिहास लिखा, किंतु उनके विवरणों में तथ्यात्मक शुद्धता अपेक्षाकृत कम थी। इन्हें सामान्यतः अलंकारिक इतिहासकार कहा जाता है। इनमें वलेरियस एंटियस तथा मार्कस टेरेंटियस वरो प्रमुख थे। वरो की कृति ‘दे वीटा पोपुली रोमानी’ (लाइफ ऑफ द रोमन पीपुल) रोमन समाज, संस्कृति तथा सभ्यता के अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व तथा उसके बाद का काल रोमन इतिहास-लेखन का स्वर्णयुग माना जाता है। इस युग के प्रमुख इतिहासकारों में जूलियस सीज़र (100–44 ई. पू.), सालुस्ट (86–35/34 ई. पू.), लिवी (59 ई. पू.–17 ई.) तथा टैसिटस (लगभग 56–120 ई.) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जूलियस सीज़र महान सेनानायक, राजनीतिज्ञ तथा कुशल इतिहासकार था। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘कॉमेंट्रीज़ ऑन द गैलिक वॉर’ से गॉल में रोमन सैन्य अभियानों, वहाँ की जनजातियों तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप की राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है। उसकी दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति ‘कॉमेंट्रीज़ ऑन द सिविल वॉर’ रोमन गृहयुद्धों, पॉम्पी के साथ संघर्ष तथा तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। रोमन इतिहासकारों में लिवी (टाइटस लिवियस) को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उनकी महान कृति ‘अब ऊर्बे कॉन्डिटा’, जिसका अर्थ है ‘रोम की स्थापना से’, रोमन इतिहास की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचनाओं में गिनी जाती है। इसमें रोम की स्थापना से लेकर ऑगस्टस के काल तक की घटनाओं का विस्तृत एवं क्रमबद्ध वर्णन मिलता है।
टैसिटस रोमन साम्राज्य का एक प्रमुख इतिहासकार था। उसकी प्रमुख कृतियाँ ‘एनल्स’, ‘हिस्ट्रीज़’ तथा ‘जर्मेनिया’ हैं। ‘जर्मेनिया’ प्रारंभिक जर्मनिक जनजातियों के इतिहास, समाज, संस्कृति तथा जीवन-पद्धति का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जबकि ‘एनल्स’ और ‘हिस्ट्रीज़’ रोमन साम्राज्य के राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक इतिहास के अध्ययन के लिए प्रामाणिक और विश्वसनीय स्रोत हैं।
यूनानी ऐतिहासिक ग्रंथ
रोमन इतिहास के अध्ययन में यूनानी लेखकों की रचनाएँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें पॉलिबियस (लगभग 200–118 ई. पू.) का विशेष स्थान है, जिसने कार्थेज और रोम के मध्य हुए प्यूनिक युद्धों, रोम और यूनान के संबंधों तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रोमन प्रभुत्व के उदय का विस्तृत एवं विश्लेषणात्मक वर्णन किया है। उसकी रचनाएँ रोमन राजनीतिक व्यवस्था, सैन्य संगठन और विस्तारवादी नीति को समझने में अत्यंत सहायक हैं। यद्यपि उसकी शैली हेरोडोटस और थ्यूसीडिडीज जितनी साहित्यिक नहीं थी, फिर भी उसके विवरण तथ्यात्मक दृष्टि से अत्यंत विश्वसनीय हैं। सिसिली के निवासी डायोडोरस सिक्युलस ने भी विश्व इतिहास पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘बिब्लियोथेका हिस्टोरिका’ की रचना की, जिसमें रोम के इतिहास से संबंधित बहुमूल्य सामग्री मिलती है। यद्यपि इसके कुछ भाग ही आज सुरक्षित हैं, फिर भी उपलब्ध अंश रोमन इतिहास के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी हैं।
रोम के प्रारंभिक निवासी
रोम के प्राररंभिक निवासी मुख्यतः लैटिन, सबाइन तथा एट्रसकन समुदायों से संबंधित थे। आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में टाइबर नदी के तट पर बसे इन समुदायों के पारस्परिक संपर्क, संघर्ष और समन्वय से रोम नगर का विकास हुआ। लैटिन समुदाय लाटियम क्षेत्र का प्रमुख निवासी था और उसी ने रोम की प्रारंभिक राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था की आधारशिला रखी। सबाइन मध्य इटली की पर्वतीय जनजाति थी, जो प्रारंभ में लैटिनों की प्रतिद्वंद्वी रही, परंतु बाद में दोनों समुदाय एकीकृत होकर रोमन समाज का अंग बन गए। एट्रसकन उत्तरी एवं मध्य इटली की अत्यंत विकसित सभ्यता के प्रतिनिधि थे। लगभग सातवीं–छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में उनका रोम पर प्रभाव स्थापित हुआ। उन्होंने रोम को एक साधारण ग्राम से सुव्यवस्थित नगर में विकसित किया तथा सड़कों, पुलों, जल-निकासी व्यवस्था, मंदिरों और सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया। साथ ही उन्होंने रोमनों को स्थापत्य कला, धातुकर्म, सैन्य संगठन और धार्मिक परंपराओं का ज्ञान दिया। यद्यपि यूनानी रोम के मूल निवासी नहीं थे, फिर भी दक्षिणी इटली और सिसिली में स्थापित अपने उपनिवेशों के माध्यम से उन्होंने रोमन सभ्यता को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार लैटिन, सबाइन, एट्रसकन और यूनानी परंपराओं के समन्वय से रोमन सभ्यता का निर्माण हुआ, जिसने आगे चलकर प्राचीन विश्व की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक सभ्यताओं में स्थान प्राप्त किया।
रोम का राजनीतिक इतिहास
पुरातात्त्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि इटली में इटैलिक जातियों के आगमन से पूर्व पुरापाषाण, नवपाषाण, कांस्य तथा लौह युगीन संस्कृतियाँ विकसित हो चुकी थीं। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में लैटिन, सबाइन, सैम्नाइट तथा अन्य इटैलिक जनजातियाँ इटली में आकर बसने लगी थीं। इसी काल में मध्य इटली में एट्रसकन सभ्यता का उत्कर्ष हुआ, जिसने प्रारंभिक रोमन संस्कृति, धर्म, स्थापत्य तथा शासन-व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। एट्रसकनों के प्रभाव से लेकर पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन (476 ई.) तक का इतिहास अनेक राजनीतिक परिवर्तनों से परिपूर्ण है, जिसे सामान्यतः निम्नलिखित कालों में विभाजित किया जाता है—(1) प्राक्-एट्रसकन काल (2) एट्रसकन अथवा राजतंत्रीय काल (753–509 ई. पू.), (3) गणतंत्र काल (509–27 ई. पू.), (4) प्रारंभिक साम्राज्य या प्रिंसिपेट (27 ई.पू.–284 ई.) तथा (5) उत्तरकालीन साम्राज्य या डोमिनेट (284–476 ई.)।

प्राक्-एट्रसकन काल : रोम नगर की स्थापना
रोम की स्थापना का प्रश्न इतिहास और परंपरा दोनों से जुड़ा हुआ है। रोमन परंपरा के अनुसार रोम की स्थापना रोमुलस ने 753 ईसा पूर्व में की थी। उसका जुड़वाँ भाई रीमुस (रेमुस) था। किंवदंती के अनुसार दोनों भाइयों का पालन-पोषण एक मादा भेड़िए ने किया था। बाद में दोनों के बीच हुए विवाद में रीमुस की मृत्यु हो गई और रोमुलस रोम का प्रथम शासक बना। उसी के नाम पर नगर का नाम रोम पड़ा।
परंपरा के अनुसार रोमुलस ने शरणार्थियों और पराजित लोगों को आश्रय देकर नगर की जनसंख्या बढ़ाई तथा प्रशासन, सेना और सामाजिक संगठन की नींव रखी। उसके बाद नूमा पोंपिलियस (715–673 ई. पू.), टुल्लुस होस्टिलियस (673–642 ई. पू.) तथा एंकस मार्सियस (642–617 ई. पू.) ने शासन किया। नूमा पोंपिलियस को रोमन धार्मिक संस्थाओं एवं धार्मिक परंपराओं का प्रवर्तक माना जाता है। टुल्लुस होस्टिलियस ने रोम की सैन्य शक्ति का विस्तार किया, जबकि एंकस मार्सियस ने व्यापार, सार्वजनिक निर्माण तथा टाइबर नदी के मुहाने पर स्थित ओस्टिया बंदरगाह के विकास को प्रोत्साहित किया।
यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इन कथाओं को पूर्णतः ऐतिहासिक नहीं मानते, फिर भी वे प्रारंभिक रोमन समाज की राजनीतिक मान्यताओं, सांस्कृतिक स्मृतियों और सामाजिक परंपराओं को समझने के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक टाइबर नदी के तट पर स्थित अनेक छोटी बस्तियाँ क्रमशः संगठित होकर एक नगर के रूप में विकसित हो चुकी थीं। परंपरा के अनुसार सात पहाड़ियों पर बसे इन निवास-स्थलों के संघ ने आगे चलकर रोम के प्रारंभिक राजनीतिक संगठन की आधारशिला रखी, जिसे ‘सात पहाड़ियों का नगर’ कहा गया।
एट्रूस्कन काल या राजतंत्रीय काल (लगभग 616–509 ई. पू.)
सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में एट्रूस्कनों का रोम पर प्रभाव स्थापित हुआ। एट्रूस्कनों की उत्पत्ति के संबंध में विवाद है। प्राचीन इतिहासकार हेरोडोटस उन्हें एशिया माइनर (अनातोलिया) से आया हुआ मानते हैं, जबकि डायोनिसियस ऑफ हैलिकार्नासस उन्हें इटली का मूल निवासी मानते हैं। आधुनिक विद्वानों के अनुसार एट्रूस्कन सभ्यता का विकास मुख्यतः मध्य इटली में ही हुआ, यद्यपि उस पर पूर्वी भूमध्यसागरीय संस्कृतियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
एट्रूस्कनों ने रोम के राजनीतिक, धार्मिक, स्थापत्य तथा नगरीय विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। परंपरा के अनुसार इस काल के तीन प्रमुख शासक टार्क्विनियस प्रिस्कस (616–578 ई. पू.), सर्वियस टुलियस (578–534 ई. पू.) तथा टार्क्विनियस सुपरबस (534–509 ई. पू.) थे। टार्क्विनियस प्रिस्कस के शासनकाल में रोम का विस्तार हुआ तथा सड़कों, मंदिरों, जल-निकासी व्यवस्था और अन्य सार्वजनिक निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन मिला। उसके उत्तराधिकारी सर्वियस टुलियस ने प्रशासनिक एवं सैन्य सुधार किए। उसने जनगणना के आधार पर नागरिकों का वर्गीकरण किया, सेना का पुनर्गठन किया तथा परंपरा के अनुसार रोम की सुरक्षा के लिए विशाल परकोटे (सर्वियन प्राचीर) के निर्माण की आधारशिला रखी। उसके शासनकाल में रोम एक सुव्यवस्थित नगर-राज्य के रूप में विकसित हुआ।
गणतंत्र की स्थापना
अंतिम एट्रूस्कन शासक टार्क्विनियस सुपरबस अत्यंत निरंकुश और दमनकारी माना जाता है। उसके अत्याचारों तथा राजपरिवार के दुर्व्यवहार, विशेषकर लुक्रेशिया की घटना के कारण व्यापक जनाक्रोश उत्पन्न हुआ, जिसके फलस्वरूप 509 ईसा पूर्व में लूसियस जूनियस ब्रूटस के नेतृत्व में विद्रोह हुआ और टार्क्विनियस सुपरबस को पदच्युत कर दिया गया। इसके साथ ही रोम में एट्रूस्कन शासन तथा राजतंत्र का अंत हुआ और रोमन गणतंत्र की स्थापना हुई। इसके पश्चात राज्य का सर्वोच्च कार्यकारी अधिकार प्रतिवर्ष निर्वाचित होने वाले दो कौंसलों को सौंपा गया, जिससे रोम में गणतांत्रिक शासन व्यवस्था का प्रारंभ हुआ।
गणतंत्रकालीन रोम का विस्तार
संपूर्ण इटली पर अधिकार
गणतंत्र की स्थापना के बाद रोम ने अपने राज्य के विस्तार की नीति अपनाई। उस समय इटली में अनेक जातियाँ और नगर-राज्य विद्यमान थे। उत्तर में गॉल और सेबाइन, दक्षिण में लैटिन, वोल्स्की तथा साम्नाइट जातियाँ रहती थीं। इसके अतिरिक्त दक्षिणी इटली में यूनानियों के अनेक समृद्ध उपनिवेश भी स्थापित थे।
रोम की भौगोलिक स्थिति अत्यंत अनुकूल थी। वह इटली के मध्य में स्थित था, जिससे उसे सभी दिशाओं में विस्तार करने का अवसर मिला। रोमन सेना के अनुशासन, संगठन और दृढ़ संकल्प के कारण रोम ने क्रमशः अपने प्रतिद्वंद्वियों को पराजित किया। 272 ईसा पूर्व तक रोम ने संपूर्ण इटली पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और वह प्रायद्वीप की सबसे शक्तिशाली शक्ति बन गया।
प्रथम प्यूनिक युद्ध (264–241 ई. पू.)
मुख्य लेख : प्यूनिक युद्ध
इटली पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के बाद रोम की महत्त्वाकांक्षाएँ भूमध्यसागर की ओर बढ़ने लगीं। इसी समय उसका सामना कार्थेज से हुआ। कार्थेज उत्तरी अफ्रीका के तट पर स्थित एक समृद्ध फिनीशियन उपनिवेश था, जिसने व्यापार और नौसैनिक शक्ति के बल पर पश्चिमी भूमध्यसागर में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था।
रोम और कार्थेज दोनों ही एक-दूसरे की बढ़ती शक्ति से चिंतित थे। संघर्ष का तात्कालिक कारण मेसिना का प्रश्न था। मेसिना पर अधिकार को लेकर विभिन्न पक्षों ने पहले कार्थेज और फिर रोम से सहायता माँगी। परिणामस्वरूप दोनों शक्तियाँ आमने-सामने आ गईं और 264 ईसा पूर्व में प्रथम प्यूनिक युद्ध आरंभ हुआ।
प्रथम प्यूनिक युद्ध लगभग तेईस वर्षों तक चला। युद्ध का मुख्य क्षेत्र समुद्र था, जहाँ रोम को प्रारंभ में कुछ विशेष सफलता नहीं मिली। इसके बाद उसने एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण कर 256 ईसा पूर्व में एक्नोमस के युद्ध में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। युद्ध के दौरान रोमन सेनाएँ अफ्रीका तक पहुँच गईं। यद्यपि उन्हें प्रारंभिक चरण में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी अंततः रोम विजयी रहा। युद्ध की समाप्ति पर हुई संधि के अनुसार कार्थेज को रोम को भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति अदा करनी पड़ी तथा सिसिली और उसके निकटवर्ती द्वीप रोम को सौंपने पड़े। इस विजय के साथ ही रोम ने पहली बार इटली के बाहर अपने प्रभुत्व का विस्तार किया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में एक उभरती हुई साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ की। इस युद्ध से संबंधित रोमन सेनानायक मार्कस एटिलियस रेगुलस की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। कार्थेजवासियों ने उन्हें बंदी बना लिया था। परंपरा के अनुसार, उन्हें रोम भेजा गया ताकि वे शांति-वार्ता या बंदियों के आदान-प्रदान का प्रस्ताव रखें, इस शर्त पर कि असफल होने पर वे पुनः कार्थेज लौट आएँगे। रेगुलस ने रोम पहुँचकर रोमन सीनेट को कार्थेज की शर्तें अस्वीकार करने की सलाह दी और अपने वचन का पालन करते हुए स्वेच्छा से कार्थेज लौट गए, जहाँ उन्होंने मृत्यु का सामना किया। यद्यपि इस घटना के कुछ विवरणों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता विवादास्पद मानी जाती है, फिर भी रोमन परंपरा में रेगुलस को कर्तव्यनिष्ठा, सत्यनिष्ठा और देशभक्ति के आदर्श के रूप में स्मरण किया जाता है।
द्वितीय प्यूनिक युद्ध (218–201 ई. पू.)
मुख्य लेख : प्यूनिक युद्ध
प्रथम प्यूनिक युद्ध में पराजय के बाद कार्थेज को भारी क्षति उठानी पड़ी थी। उसे सिसिली, सार्डिनिया और कोर्सिका जैसे महत्त्वपूर्ण द्वीपों से हाथ धोना पड़ा, जिससे उसके व्यापार और समुद्री प्रभुत्व को गहरा आघात पहुँचा। यद्यपि रोम इस युद्ध के परिणामों से संतुष्ट था, किंतु कार्थेज के मन में पराजय का दर्द और प्रतिशोध की भावना बनी रही। इसी परिस्थिति में महान कार्थेजीय सेनानायक हैमिलकार बार्का ने स्पेन में अपने राज्य का विस्तार करने और सैन्य शक्ति को पुनर्गठित करने की योजना बनाई।कार्थेज के कुलीन वर्ग ने पुनः युद्ध की आशंका से हैमिलकार का विरोध किया, किंतु व्यापारी वर्ग ने उसका समर्थन किया। अंततः हैमिलकार समझौता कर स्पेन पहुँचा और वहाँ कार्थेज की शक्ति को पुनः संगठित किया। उसने कई खोए हुए प्रदेशों पर अधिकार कर लिया तथा भविष्य के संघर्ष के लिए एक सुदृढ़ सेना तैयार की। किंतु एक युद्ध के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसके दामाद हसड्रूबल ने सेना का नेतृत्व संभाला। हस्ड्रूबल की हत्या के बाद सेना ने हैमिलकार के प्रतिभाशाली पुत्र हैनिबल को अपना सेनापति नियुक्त किया।

हैनिबल का उदय
हैनिबल की गणना प्राचीन विश्व के महानतम् सेनानायकों में की जाति है। उसमें असाधारण संगठन क्षमता, अद्वितीय युद्धकौशल और अटूट साहस था। इतिहासकार एच. जी. वेल्स ने उसे विश्व इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सैन्य नेताओं में स्थान दिया है। इस बीच रोम अपने आंतरिक संघर्षों, गॉलों के विरुद्ध युद्धों तथा एड्रियाटिक क्षेत्र में विस्तार में व्यस्त था। इसलिए वह स्पेन में कार्थेज की बढ़ती शक्ति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सका। दोनों राज्यों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार कार्थेज को एब्रो नदी के उत्तर में विस्तार न करने का वचन देना पड़ा। किंतु हैनिबल ने इस समझौते की उपेक्षा करते हुए सैगुंटम नगर पर आक्रमण कर दिया, जो रोम का मित्र राज्य था। यही घटना द्वितीय प्यूनिक युद्ध का तात्कालिक कारण बनी।
आल्प्स पार करने का अभियान
सैगुंटम पर अधिकार करने के बाद हैनिबल ने रोम पर सीधे आक्रमण करने का निश्चय किया। 218 ईसा पूर्व में वह लगभग 50,000 पैदल सैनिकों और 9,000 घुड़सवारों की विशाल सेना लेकर स्पेन से इटली की ओर बढ़ा। उसने स्थल मार्ग से आल्प्स पर्वतमाला को पार करने का साहसिक निर्णय लिया। आल्प्स की यात्रा अत्यंत कठिन थी। ऊँचे बर्फीले पर्वत, दुर्गम मार्ग और प्रतिकूल मौसम के कारण अनेक सैनिक तथा पशु मार्ग में ही मारे गए। फिर भी हैनिबल ने अपने सैनिकों का उत्साह बनाए रखा। लगभग सत्रह दिनों की कठिन यात्रा के बाद उसकी सेना इटली के मैदानों में उतर गई। यद्यपि उसकी सेना का बड़ा भाग नष्ट हो चुका था, फिर भी इस उपलब्धि ने रोम को भयभीत कर दिया।
रोम की प्रारंभिक पराजय
इटली पहुँचने के बाद हैनिबल ने रोमन सेनाओं को कई युद्धों में पराजित किया। टिसिनस नदी के युद्ध में रोमन सेनापति स्किपियो घायल हो गया। इसके बाद ट्रासिमीन झील के युद्ध में भी रोम को पराजय का सामना करना पड़ा और उसका सेनापति गायस फ्लेमिनियस मारा गया। हैनिबल की सफलताओं ने रोम को गहरे संकट में डाल दिया। ऐसा प्रतीत होने लगा कि रोम की शक्ति समाप्त हो जाएगी। किंतु रोमन जनता ने धैर्य नहीं खोया। उसने अपनी सैन्य शक्ति का पुनर्गठन किया और संघर्ष जारी रखा।
स्किपियो की विजय और युद्ध का अंत
रोम की ओर से युवा सेनानायक पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो ने युद्ध का नेतृत्व संभाला। उसने पहले स्पेन में कार्थेज की शक्ति को समाप्त किया और फिर उत्तरी अफ्रीका पर आक्रमण कर दिया। इससे हैनिबल को इटली छोड़कर अपने देश लौटना पड़ा। 202 ईसा पूर्व में जामा के युद्ध में स्किपियो ने हैनिबल को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इसके बाद कार्थेज को रोम की कठोर शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं। उसे अपने अधिकांश युद्धपोत सौंपने पड़े, रोम की अनुमति के बिना किसी बाहरी युद्ध में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा भारी क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य किया गया।
द्वितीय प्यूनिक युद्ध का महत्त्व
द्वितीय प्यूनिक युद्ध रोम और कार्थेज दोनों के इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ। इस युद्ध के परिणामस्वरूप स्पेन की विशाल संपदा रोम के हाथ लगी और पश्चिमी भूमध्यसागर में उसका प्रभुत्व स्थापित हो गया। अब रोम संपूर्ण इटली का निर्विवाद स्वामी बन गया। किंतु यह विजय महँगी सिद्ध हुई। युद्ध के कारण इटली की आधी कृषि भूमि नष्ट हो गई, सैकड़ों नगर उजड़ गए और लाखों लोग मारे गए। इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने इसे रोमन इतिहास की निर्णायक घटना बताया है। कार्थेज के लिए यह युद्ध उसके पतन की शुरुआत था क्योंकि आर्थिक संकट और राजनीतिक संघर्षों ने उसकी शक्ति को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। स्वयं हैनिबल को भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए निर्वासन का जीवन बिताना पड़ा। अंततः रोमनों से बचने के लिए उसने विषपान कर आत्महत्या कर ली।
रोम और मेसीडोन के युद्ध
प्रथम मेसीडोनियन युद्ध (215–205 ई. पू.)
मुख्य लेख : मेसीडोनियन युद्ध
द्वितीय प्यूनिक युद्ध के दौरान मेसीडोन के शासक फिलिप पंचम (220–179 ई. पू.) ने 214 ईसा पूर्व में हैनिबल के साथ मित्रता स्थापित कर रोम का विरोध किया था। उसका उद्देश्य यूनानी राज्यों को संगठित करके रोम की बढ़ती शक्ति का सामना करना था। जब रोम कार्थेज से युद्ध कर रहा था, तब फिलिप ने उसकी कठिनाइयों का लाभ उठाने का प्रयास किया। किंतु रोम ने एटोलियन संघ, स्पार्टा और अन्य यूनानी राज्यों की सहायता से मेसीडोन की योजनाओं को विफल कर दिया। इस युद्ध में कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला, परंतु रोम ने यूनानी राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया।

द्वितीय मेसीडोन युद्ध (200–197 ई. पू.)
मुख्य लेख : मेसीडोनियन युद्ध
कार्थेज पर विजय प्राप्त करने के बाद रोम ने अपना ध्यान मेसीडोन की ओर केंद्रित किया। 200 ईसा पूर्व में युवा रोमन सेनानायक टाइटस क्विंक्टियस फ्लामिनिनस ने मेसीडोन के विरुद्ध अभियान चलाया। उसने 197 ईसा पूर्व में साइनोसेफाले के युद्ध में फिलिप पंचम को पराजित कर दिया। किंतु फ्लेमिनिनस ने पराजित फिलिप पंचम को मेसीडोन का राजा बना दिया और यूनानी राज्यों को स्वतंत्र घोषित कर दिया। फ्लेमिनिनस की इस घोषणा का यूनानियों ने स्वागत किया और रोम को यूनानी जगत में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
सीरिया युद्ध (192–188 ई. पू.)
रोम की बढ़ती शक्ति से असंतुष्ट एटोलियन संघ ने सेल्यूसिड साम्राज्य के शासक एंटिओकस तृतीय (223–187 ई. पू.) को यूनान में हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित किया। एंटिओकस तृतीय पश्चिमी एशिया और यूनान में अपना प्रभाव तथा प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। दूसरी ओर, परगेमम के शासक ने एंटिओकस तृतीय की विस्तारवादी नीति से चिंतित होकर रोम से सहायता की अपील की। रोम ने स्किपियो और उसके भाई लूसियस के नेतृत्व में सेना भेजी, जिन्होंने 190 ईसा पूर्व में मैग्नीशिया के युद्ध में एंटिओकस को पराजित कर दिया। इस विजय के बाद रोम का प्रभाव एशिया माइनर तक फैल गया और हेलेनिस्टिक राज्यों पर उसका प्रभुत्व स्थापित होने लगा।
तृतीय मेसीडोन युद्ध (171–168 ई. पू.)
मुख्य लेख : मेसीडोनियन युद्ध
फिलिप पंचम की मृत्यु (179 ई. पू.) के बाद उसका पुत्र पर्सियस मेसीडोन का शासक बना। उसने रोम के विरुद्ध यूनानी राज्यों को संगठित करने का प्रयास किया, जिससे रोम और मेसीडोन के बीच पुनः संघर्ष आरंभ हो गया। 168 ईसा पूर्व में पाइडना के युद्ध में रोमन सेनापति लूसियस एमिलियस पाउलस ने मेसीडोनिया के राजा पर्सियस को पराजित कर दिया। इसके बाद मेसीडोन को चार अलग-अलग गणराज्यों में विभाजित कर उन्हें रोम के नियंत्रण में रखा गया। पर्सियस को बंदी बनाकर रोम ले जाया गया, जहाँ बाद में उसने विषपान कर आत्महत्या कर ली। इस विजय के बाद रोम पूर्वी भूमध्यसागर की सबसे शक्तिशाली शक्ति बन गया।
चतुर्थ और अंतिम मेसीडोन युद्ध (146 ई. पू.)
मुख्य लेख : मेसीडोनियन युद्ध
मेसीडोन की पराजय के बाद भी यूनान में रोम-विरोधी भावना समाप्त नहीं हुई। एकियन संघ के अनेक नगरों ने रोम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। 146 ईसा पूर्व में रोम ने सेनानायक मुम्मियस के नेतृत्व में सेना भेजी। रोमन सेना ने यूनानी प्रतिरोध को कुचल दिया और कोरिंथ नगर को नष्ट कर दिया। पुरुषों की हत्या कर दी गई तथा स्त्रियों और बच्चों को दास बना लिया गया। इसके बाद यूनान और मेसीडोन को रोम का प्रांत बना दिया गया। इस विजय के साथ यूनान की राजनीतिक स्वतंत्रता समाप्त हो गई और वह रोमन साम्राज्य का अंग बन गया। अगले लगभग दो हजार वर्षों तक यूनान का विश्व राजनीति में स्वतंत्र शक्ति के रूप में पुनः उदय नहीं हो सका।
तृतीय प्यूनिक युद्ध (149–146 ई. पू.)
मुख्य लेख : प्यूनिक युद्ध
द्वितीय प्यूनिक युद्ध में पराजय के बाद कार्थेज की राजनीतिक और सैन्य शक्ति गंभीर रूप से कमजोर हो गई थी। यद्यपि उसने धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार कर लिया था, फिर भी वह रोम के समान शक्तिशाली नहीं था। इसी समय रोमन राजनेता मार्कस पोर्सियस कैटो (कैटो द एल्डर) ने कार्थेज के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक राजनयिक मिशन के अंतर्गत जब वह कार्थेज गया, तो वहाँ की पुनः विकसित होती समृद्धि देखकर चिंतित हो उठा। रोम लौटकर उसने सीनेट को चेतावनी दी कि यदि कार्थेज को समय रहते नष्ट नहीं किया गया, तो वह भविष्य में फिर रोम के लिए चुनौती बन सकता है। कैटो अपने लगभग प्रत्येक भाषण का समापन इस प्रसिद्ध वाक्य से करता था : ‘इसके अतिरिक्त, मेरा मानना है कि कार्थेज का विनाश कर दिया जाना चाहिए।’ उसके इस प्रचार का रोमन जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा और रोम में कार्थेज के विरुद्ध कठोर नीति अपनाने की भावना प्रबल होती गई।
युद्ध का तात्कालिक कारण
इसी बीच उत्तरी अफ्रीका में नूमीडिया का शासक मसीनिस्सा कार्थेज की दुर्बलता का लाभ उठाकर उसके क्षेत्रों पर लगातार आक्रमण कर रहा था। उसने ग्रेट लेप्टिस सहित कई महत्त्वपूर्ण नगरों पर अधिकार कर लिया। कार्थेज ने रोम से हस्तक्षेप की माँग की, क्योंकि पूर्व की संधि के अनुसार वह रोम की अनुमति के बिना युद्ध नहीं कर सकता था। किंतु रोम ने उसकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब कार्थेज पर लगाए गए पचास वर्षीय हर्जाने की अवधि समाप्त हो गई, तब उसने अपनी सुरक्षा के लिए नूमीडिया के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। रोम ने इसे संधि का उल्लंघन मानते हुए 149 ईसा पूर्व में कार्थेज के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
रोम की युद्ध-घोषणा और उसके विशाल नौसैनिक बेड़े के अफ्रीका की ओर प्रस्थान की सूचना लगभग एक साथ कार्थेज पहुँची। कार्थेज आर्थिक रूप से संपन्न तो था, परंतु इतने बड़े युद्ध के लिए तैयार नहीं था। उसने रोम के साथ समझौता करने का प्रयास किया और उसकी शर्तें स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की, किंतु रोम ने ऐसी कठोर शर्तें रखी, जिन्हें स्वीकार करना कार्थेज के लिए असंभव था। अंततः कार्थेज की सीनेट ने युद्ध का निर्णय लिया। नगर के सभी युवा पुरुषों और स्त्रियों को युद्ध-कार्य में लगा दिया गया। हथियारों के निर्माण के लिए सार्वजनिक भवनों को तोड़ा गया, धातुओं को पिघलाया गया और रस्सियाँ बनाने हेतु स्त्रियों के बाल तक काट दिए गए। अल्प समय में हजारों ढालें, तलवारें, भाले, प्रक्षेपास्त्र तथा युद्धपोत तैयार कर लिए गए। इस प्रकार कार्थेज ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अभूतपूर्व प्रयास किया।
कार्थेज का घेराव और विनाश
रोमन सेना ने कार्थेज को चारों ओर से घेर लिया। लगभग तीन वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। कार्थेजवासियों ने अत्यंत साहस और दृढ़ता के साथ प्रतिरोध किया, जिसके कारण प्रारंभ में रोमनों को सफलता नहीं मिली। अंततः 147 ईसा पूर्व में रोमन सैनिक नगर की दीवारों पर चढ़ने में सफल हो गए और नगर के भीतर भीषण युद्ध आरंभ हो गया। रोमन सैनिकों ने कार्थेज की गलियों में आग लगा दी, जिसमें अनेक भवन जलकर राख हो गए और हजारों नागरिक मारे गए। नगर की जनसंख्या, जो पहले लगभग 2,75,000 बताई जाती है, घटकर लगभग 50,000 रह गई। कार्थेज के सेनानायक हसड्रूबल ने अंततः आत्मसमर्पण कर दिया, किंतु उसकी पत्नी ने इसे कायरता मानते हुए अपने बच्चों सहित अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए। युद्ध समाप्त होने पर बचे हुए निवासियों को दास बनाकर बेच दिया गया। रोमन सीनेट के आदेश पर कार्थेज और उसके अधीनस्थ नगरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। नगर के अवशेषों को समतल कर दिया गया, ताकि वह भविष्य में फिर कभी शक्ति के रूप में उभर न सके।
तृतीय प्यूनिक युद्ध रोम की पूर्ण विजय के साथ समाप्त हुआ। इसके परिणामस्वरूप कार्थेज का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया और उसके शेष प्रदेश रोम के अधीन आ गए। उत्तरी अफ्रीका में रोम की शक्ति दृढ़ हो गई तथा पश्चिमी भूमध्यसागर पर उसका पूर्ण प्रभुत्व स्थापित हो गया। इतिहासकारों के अनुसार 146 ईसा पूर्व में कोरिंथ नगर का विनाश प्राचीन इतिहास की सबसे कठोर और रक्तरंजित घटनाओं में से एक था। नैतिक दृष्टि से यह विजय अत्यंत विवादास्पद थी, किंतु सामरिक और आर्थिक दृष्टि से इसने रोम को भूमध्यसागर का निर्विवाद स्वामी बना दिया।
रोम का विशाल साम्राज्य
तृतीय प्यूनिक युद्ध के बाद रोम की शक्ति अपने चरम की ओर बढ़ने लगी। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक रोम के अधिकार में स्पेन, उत्तरी अफ्रीका, कोर्सिका, सार्डिनिया, सिसिली, माल्टा, इटली, मेसीडोन, यूनान, एशिया माइनर तथा पर्गामन जैसे विस्तृत प्रदेश आ चुके थे। भूमध्यसागर के अधिकांश क्षेत्र पर उसका प्रभुत्व स्थापित हो गया था। इस प्रकार 146 ईसा पूर्व तक रोम केवल इटली का एक शक्तिशाली राज्य नहीं रहा, बल्कि वह पश्चिमी विश्व का सबसे प्रभावशाली और विशाल साम्राज्य बन चुका था।
रोमन साम्राज्य-विस्तार के प्रभाव
रोम के गणतंत्रकालीन साम्राज्य-विस्तार ने उसके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन को अत्यंत गहराई से प्रभावित किया। प्रारंभ में रोम एक साधारण कृषक-प्रधान गणराज्य था, किंतु निरंतर विजयों और विशाल साम्राज्य की स्थापना ने उसके स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया। साम्राज्य-विस्तार ने रोम को अपार धन, शक्ति और प्रतिष्ठा प्रदान की, परंतु इसके साथ ही अनेक नई समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं। इस परिवर्तन की प्रक्रिया में रोम को अपनी पुरानी परंपराओं, सामाजिक आदर्शों और राजनीतिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा। यही कारण है कि रोमन इतिहास केवल विजयों का इतिहास नहीं, बल्कि परिवर्तन, संघर्ष और अनुकूलन की भी गाथा है। इतिहासकार ई. एम. बर्न्स के अनुसार प्यूनिक युद्धों के बाद रोम के आर्थिक और सामाजिक जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। विजित प्रदेशों से बड़ी संख्या में दास लाए गए, जिससे दास-प्रथा का तीव्र विस्तार हुआ। विदेशों से सस्ते अनाज के आयात के कारण छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई और अनेक किसान अपनी भूमि से वंचित हो गए। दूसरी ओर, व्यापारियों, साहूकारों, ठेकेदारों तथा कर-संग्रहकर्ताओं का एक नया संपन्न वर्ग उभरकर सामने आया। परिणामस्वरूप रोमन समाज में आर्थिक विषमता बढ़ी, विलासिता का प्रसार हुआ तथा पारंपरिक नैतिक मूल्यों का धीरे-धीरे ह्रास होने लगा। साम्राज्य-विस्तार के दौरान रोम का संपर्क अनेक विकसित सभ्यताओं से हुआ। विभिन्न देशों की संस्कृति, कला, साहित्य और धार्मिक विचारों ने रोमन जीवन को प्रभावित किया। इनमें सबसे अधिक प्रभाव यूनान का था। कहा जाता है कि रोम ने यूनान को राजनीतिक रूप से पराजित किया, किंतु सांस्कृतिक रूप से यूनान ने रोम को जीत लिया। यूनानी भाषा, साहित्य, दर्शन और कला का रोम में व्यापक प्रचार हुआ। रोमन कलाकारों और विद्वानों ने यूनानी आदर्शों को अपनाया। यूनानी स्वतंत्रता-प्रेम और बौद्धिक चेतना ने रोमन युवाओं को प्रभावित किया। इससे रोमन समाज में नए विचारों का प्रवेश हुआ, किंतु परंपरागत अनुशासन और आज्ञाकारिता की भावना कमजोर पड़ने लगी। यद्यपि कैटो जैसे रूढ़िवादी नेताओं ने पुराने रोमन आदर्शों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, फिर भी वे इस परिवर्तन की धारा को रोक नहीं सके। परिणामस्वरूप रोमन संस्कृति निरंतर विकसित होती रही और उसमें विदेशी तत्त्वों का समावेश होता गया।
आर्थिक प्रभाव
कृषि पर प्रभाव
रोमन साम्राज्य-विस्तार का सबसे अधिक प्रभाव कृषि व्यवस्था पर पड़ा। प्रारंभिक रोम की अर्थव्यवस्था मुख्यतः छोटे किसानों पर आधारित थी। किसान छोटे-छोटे खेतों में स्वयं श्रम करके उत्पादन करते थे। किंतु लगातार युद्धों के कारण बड़ी संख्या में किसान सैनिकों के रूप में युद्धभूमि में मारे गए। जो जीवित लौटे, वे आर्थिक कठिनाइयों के कारण अपनी भूमि बेचने को विवश हो गए। फलस्वरूप छोटे कृषकों की भूमि धनी लोगों के हाथों में जाने लगी और विशाल कृषि-भू-संपदाओं (लेटीफुंडिया) का विकास हुआ। इन बड़े खेतों में दासों से काम कराया जाता था। विशेषकर हैनिबल के युद्धों के बाद दक्षिणी इटली के अनेक गाँव उजड़ गए, जिससे ग्रामीण जीवन कमजोर हुआ और कृषि उत्पादन का स्वरूप बदल गया। दूसरी ओर, विजित प्रदेशों से सस्ता अनाज रोम आने लगा, जिससे नगरों की खाद्य समस्या तो कुछ हद तक हल हुई, किंतु स्थानीय किसानों की आय घट गई। धीरे-धीरे कृषि का महत्त्व कम होता गया और ग्रामीण समाज आर्थिक संकट का शिकार बनने लगा।
व्यापार और मुद्रा का विकास
साम्राज्य-विस्तार से रोम में अपार धन-संपत्ति का प्रवाह हुआ। युद्धों से प्राप्त लूट, कर और खनिज संपदा के कारण सोने-चाँदी की मुद्राओं का प्रचलन तेजी से बढ़ा। स्पेन की चाँदी की खदानों तथा एशिया माइनर की संपदा ने रोमन अर्थव्यवस्था को समृद्ध बना दिया। मुद्रा-प्रचलन के बढ़ने से बैंकिंग व्यवस्था का विकास हुआ। अब ऋण दिए जाने लगे, धन जमा किया जाने लगा और व्यापारिक लेन-देन अधिक संगठित हो गया। व्यापारियों, साहूकारों और ठेकेदारों का एक नया संपन्न वर्ग उभरकर सामने आया। सड़कें, पुल, राजमार्ग और सार्वजनिक भवनों के निर्माण कार्य बड़े ठेकेदारों को दिए जाने लगे। यद्यपि व्यापार की उन्नति से आर्थिक समृद्धि बढ़ी, परंतु विदेशी विलासिता की वस्तुओं के आयात से स्थानीय उद्योगों को क्षति पहुँची। रोम धीरे-धीरे उत्पादन की अपेक्षा उपभोग का केंद्र बनता गया। संपन्न वर्ग का जीवन अत्यंत विलासितापूर्ण हो गया और आर्थिक विषमता बढ़ने लगी।
सामाजिक प्रभाव
पैट्रिशियन और प्लेबियन वर्ग
प्रारंभिक रोमन समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित था— पैट्रिशियन (कुलीन वर्ग) और प्लेबियन (सामान्य जन)। पैट्रिशियन वर्ग के पास राजनीतिक अधिकार, भूमि और सामाजिक प्रतिष्ठा थी। राज्य के प्रमुख पदों, जैसे- कौंसल, मजिस्ट्रेट और पुरोहित पर उनका ही अधिकार था। इसके विपरीत, प्लेबियन वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वे सेना में सेवा करते थे, कर देते थे और राज्य के लिए संघर्ष करते थे, किंतु राजनीतिक अधिकारों तथा भूमि के वितरण में उन्हें कोई भाग नहीं मिलता था। आर्थिक कठिनाइयों और ऋणग्रस्तता के कारण उनकी स्थिति लगातार खराब होती गई। अनेक लोग दासता की ओर धकेल दिए गए। इन असमानताओं के कारण पैट्रिशियन और प्लेबियन वर्गों के बीच दीर्घकालीन संघर्ष आरंभ हुआ। धीरे-धीरे प्लेबियनों में राजनीतिक चेतना विकसित हुई और उन्होंने अपने अधिकारों के लिए संगठित आंदोलन शुरू किए।
द्वादश पट्टिकाएँ (ट्वेल्व टेबल्स)
द्वादश पट्टिकाएँ रोमन विधि-इतिहास की एक महान उपलब्धि थी। प्लेबियनों के संघर्ष के परिणामस्वरूप रोमन कानूनों को लिखित रूप देने की माँग उठी। इसी उद्देश्य से 454 ईसा पूर्व में एक प्रतिनिधिमंडल यूनान भेजा गया ताकि वहाँ की विधि-व्यवस्था का अध्ययन किया जा सके। इसके बाद दस सदस्यों की एक समिति गठित की गई, जिसने द्वादश पट्टिकाओं के रूप में रोमन कानूनों का संकलन किया। लगभग नौ सौ वर्षों तक यही कानून रोमन न्याय-व्यवस्था का आधार बने रहे। यद्यपि इन कानूनों ने न्यायिक प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाया, फिर भी इनमें कई कठोर प्रावधान थे। उदाहरण के लिए पिता को अपनी संतान पर अत्यधिक अधिकार प्राप्त थे। चोरी, आगजनी, राजद्रोह और कुछ अन्य अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान था।
प्लेबियनों के अधिकारों का विस्तार
समय के साथ प्लेबियनों की स्थिति में सुधार हुआ। 445 ईसा पूर्व में ‘लेक्स कैनुलेया’ नामक कानून द्वारा पैट्रिशियनों और प्लेबियनों के बीच विवाह की अनुमति दी गई। 367 ईसा पूर्व के ‘लिसिनियन-सेक्स्टियन’ कानूनों के अनुसार दो कौंसलों में से एक पद प्लेबियन के लिए सुरक्षित कर दिया गया। अंततः 287 ईसा पूर्व में ‘लेक्स हॉर्टेंसिया’ के माध्यम से प्लेबियन सभा के निर्णयों को समस्त राज्य के लिए बाध्यकारी मान लिया गया। इससे राजनीतिक समानता की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई।
नए सामाजिक वर्गों का उदय
पुराने पैट्रिशियन और प्लेबियन विभाजन के समाप्त होने के बाद समाज में एक नया वर्ग-विभाजन उभरकर सामने आया। अब समाज मुख्यतः दो वर्गों में बँट गया— ऑप्टिमेट (धनी और प्रभावशाली वर्ग) और पोपुलारेस (सामान्य और निर्धन जनता)। ऑप्टिमेट वर्ग में पुराने कुलीनों के साथ-साथ संपन्न प्लेबियन भी शामिल थे। विशाल भूमि, व्यापार, प्रशासनिक पदों और युद्धों से प्राप्त धन के कारण वे अत्यंत समृद्ध हो गए थे। सीनेट पर भी इसी वर्ग का प्रभुत्व था। दूसरी ओर, पोपुलारेस वर्ग में निर्धन किसान, मजदूर और बेरोजगार नागरिक शामिल थे। भूमि से वंचित होकर वे नगरों में जीविका की तलाश में भटकते थे। उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय थी और वे संपन्न वर्ग पर निर्भर रहते थे। इस सामाजिक और आर्थिक असंतोष ने आगे चलकर रोमन गणतंत्र को गहरे राजनीतिक संकटों में धकेल दिया।
दास-प्रथा का विस्तार
रोमन साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ दास-प्रथा भी बढ़ती गई। सामाजिक विषमता, विशाल भू-स्वामियों के उदय तथा निरंतर युद्धों के कारण रोम में दासों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। प्रत्येक विजय के बाद हजारों युद्धबंदी रोम लाए जाते थे और उन्हें दास बना लिया जाता था। प्रथम प्यूनिक युद्ध में लगभग 75,000 युद्धबंदी बनाए गए, जबकि द्वितीय प्यूनिक युद्ध में इनकी संख्या इससे कहीं अधिक थी। इसी प्रकार इपिरस प्रदेश से लगभग 1,50,000 बंदियों को पकड़कर दास बनाया गया। रोमन कानून के अनुसार दास किसी व्यक्ति की संपत्ति माने जाते थे। उनके पास कोई नागरिक अधिकार नहीं था और उनके स्वामी को उन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त था। दासों से कृषि फार्मों, उद्योग-धंधों, खदानों, कार्यशालाओं तथा घरों में कठोर श्रम कराया जाता था। उनकी खरीद-फरोख्त खुले बाजारों में होती थी। एक कृषि-दास की कीमत लगभग 500 स्वर्ण मुद्राएँ होती थी, जबकि सुंदर एवं प्रशिक्षित दासियों की कीमत कई गुना अधिक हो सकती थी।
दासों का जीवन अत्यंत कष्टपूर्ण था। उन्हें प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक कठिन परिश्रम करना पड़ता था। पर्व और उत्सव के अवसरों पर भी उन्हें विश्राम नहीं मिलता था। अनेक दासों को जंजीरों में बाँधकर रखा जाता था और कार्य में थोड़ी-सी लापरवाही पर उन्हें कोड़े लगाए जाते थे। कभी-कभी उन्हें मृत्युदंड तक दे दिया जाता था। खदानों में काम करने वाले दास अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में जीवन बिताते थे और अधिकांश वहीं अपने प्राण त्याग देते थे। फिर भी, सभी दासों की स्थिति समान नहीं थी। कुछ शिक्षित यूनानी दास शिक्षक, लेखक, चिकित्सक, कलाकार, शिल्पकार और व्यापारी के रूप में भी कार्य करते थे। ऐसे दास अपने स्वामियों के लिए धन अर्जित करते थे और कभी-कभी अपनी कमाई से स्वतंत्रता भी प्राप्त कर लेते थे। स्वतंत्र होने के बाद वे रोमन समाज के सामान्य नागरिक वर्ग में सम्मिलित हो जाते थे।
सामान्य जन-जीवन पर प्रभाव
रोमन साम्राज्य के निरंतर विस्तार का प्रभाव सामान्य नागरिकों के जीवन पर भी गहराई से पड़ा। लंबे समय तक युद्धों में संलग्न रहने के कारण रोमनों के स्वभाव में कठोरता और युद्धप्रियता बढ़ गई। विजय अभियानों से प्राप्त धन, विलासिता की वस्तुओं और दासों की अधिकता ने उनके जीवन को पहले की अपेक्षा अधिक भौतिकवादी बना दिया। युद्धों और लूट से प्राप्त अपार संपत्ति ने समाज में विलासिता तथा ऐश्वर्य की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। अनेक लोग परिश्रम और सादगी के पुराने आदर्शों को भूलने लगे। धन-संपत्ति के प्रदर्शन, भव्य भवनों, महंगे वस्त्रों और मनोरंजन के साधनों की ओर उनका आकर्षण बढ़ गया। परिणामस्वरूप रोमन समाज का नैतिक स्तर धीरे-धीरे गिरने लगा। लगातार सैनिक अभियानों के कारण पुरुषों को लंबे समय तक अपने परिवारों से दूर रहना पड़ता था, जिससे पारिवारिक जीवन कमजोर होने लगा। पारंपरिक अनुशासन और सामाजिक मर्यादाएँ शिथिल पड़ गईं। लोगों में स्वार्थ, लालच और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की प्रवृत्ति बढ़ने लगी।
महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन
साम्राज्य-विस्तार के साथ रोमन महिलाओं की स्थिति में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। प्रारंभिक काल में महिलाओं का जीवन मुख्यतः परिवार तक सीमित था, किंतु धीरे-धीरे वे सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने लगीं। वे बाजारों में जाने लगीं, सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने लगीं तथा राजनीतिक गतिविधियों में भी रुचि लेने लगीं। यद्यपि महिलाओं की स्वतंत्रता में वृद्धि हुई, किंतु समकालीन लेखकों के अनुसार इसके साथ सामाजिक मर्यादाओं में भी शिथिलता आई। विवाह संबंधों में स्थायित्व कम होने लगा और आर्थिक तथा राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर विवाह किए जाने लगे। तलाक की घटनाएँ बढ़ीं और पारिवारिक जीवन पहले की अपेक्षा अधिक अस्थिर हो गया। रोमन समाज में मनोरंजन और विलासिता का प्रसार हुआ। रंगमंच, भोज, उत्सव और अन्य मनोरंजक गतिविधियाँ लोकप्रिय हो गईं। इसी काल में वेश्यावृत्ति और वेश्यालयों की संख्या में भी वृद्धि हुई, जिनका प्रशासनिक अभिलेखों में उल्लेख मिलता है। शासकों ने सामाजिक नैतिकता बनाए रखने के लिए अनेक कानून बनाए, किंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
सांस्कृतिक प्रभाव
यूनानी संस्कृति का प्रभाव
रोमन संस्कृति पर सबसे गहरा प्रभाव यूनानी संस्कृति का पड़ा। प्रसिद्ध रोमन कवि होरेस ने रोमन संस्कृति पर यूनानी प्रभाव के संबंध में कहा था कि ‘विजित यूनान ने अपने विजेता रोम को ही जीत लिया।’ रोम द्वारा यूनान और हेलेनिस्टिक राज्यों की विजय के बाद बड़ी संख्या में यूनानी विद्वान, शिक्षक, कलाकार, दार्शनिक और चिकित्सक रोम पहुँचे। उन्होंने रोमन समाज को शिक्षा, दर्शन, विज्ञान, कला और साहित्य के नए आयामों से परिचित कराया, जिसके परिणामस्वरूप रोमन संस्कृति का व्यापक यूनानीकरण हुआ।
साहित्य पर प्रभाव
साहित्य के क्षेत्र में यूनानी प्रभाव सबसे अधिक स्पष्ट है। रोमन लेखकों ने यूनानी ग्रंथों का लैटिन भाषा में अनुवाद किया और उनसे प्रेरणा लेकर स्वतंत्र साहित्य की भी रचना की। लिवियस एंड्रोनिकस को रोमन साहित्य का अग्रदूत माना जाता है। उसने होमर के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘ओडिसी’ का लैटिन अनुवाद किया तथा यूनानी नाटकों को रोमन जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद क्नेयस नेवियस ने प्रथम प्यूनिक युद्ध पर एक महाकाव्य लिखा तथा अनेक यूनानी नाटकों का रूपांतरण किया। रोमन नाटककार टाइटस मैक्कियस प्लॉटस ने यूनानी लेखक मेनांदर की शैली का अनुसरण करते हुए अनेक हास्य नाटकों की रचना की। टेरेंस भी यूनानी साहित्य से प्रभावित था। उसकी रचनाओं में ‘हेसिरा’, ‘यूनूक’, ‘फोर्मियो’ और ‘एडेल्फी’ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन कृतियों में यूनानी साहित्यिक परंपरा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
यूनानी साहित्य से प्रभावित रोमन लेखकों में क्विंटस एन्नियस भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिसे ‘रोमन काव्य का जनक’ कहा जाता है। यद्यपि एन्नियस इटली का निवासी था, किंतु उसकी शिक्षा-दीक्षा यूनानी वातावरण में हुई थी। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘एनालेस’ है, जिसमें रोम के प्रारंभिक काल से लेकर उसके समय तक की घटनाओं का काव्यात्मक वर्णन मिलता है। यह कृति अठारह खंडों में विभाजित थी और लंबे समय तक रोमन राष्ट्रीय साहित्य की आधारशिला मानी जाती रही है।
इतिहास और दर्शन पर प्रभाव
रोमन इतिहास-लेखन पर भी यूनानी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। फेबियस पिक्टर ने यूनानी भाषा में रोम का इतिहास लिखा, जबकि कैटो ने लैटिन भाषा में ऐतिहासिक लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाया। दर्शन के क्षेत्र में यूनानी स्टोइक दर्शन का रोमन चिंतकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्किपियो एमिलियनस तथा गायस लेलियस जैसे विद्वानों ने स्टोइक विचारधारा को अपनाया। बाद में प्रसिद्ध रोमन चिंतक सिसरो भी इससे प्रभावित हुआ। यूनानी दर्शन ने रोमन समाज को नैतिकता, कर्तव्य और मानवता संबंधी नए विचार प्रदान किए।
कला पर यूनानी प्रभाव
रोमन साम्राज्य के विस्तार का प्रभाव केवल राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि कला के क्षेत्र में भी इसके दूरगामी परिणाम दिखाई दिए। विशेष रूप से यूनान की विजय के बाद रोमन कला पर यूनानी कला का गहरा प्रभाव पड़ा। रोमन कलाकारों, वास्तुकारों और मूर्तिकारों ने यूनानी कला की श्रेष्ठ परंपराओं को अपनाया और उन्हें अपने अनुरूप विकसित किया, जिसके परिणामस्वरूप रोमन कला अधिक परिष्कृत, भव्य और आकर्षक बन गई। रोमन मंदिरों के निर्माण में यूनानी स्थापत्य शैली का व्यापक उपयोग किया गया। गणतंत्र काल में निर्मित अनेक देवालय यूनानी मंदिरों के आदर्शों पर आधारित थे। उनके स्तंभ, प्रवेशद्वार, अनुपात और सजावट में यूनानी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अनेक मंदिरों में स्थापित मूर्तियाँ भी यूनानी नगरों से लाई गई थीं अथवा यूनानी कलाकारों द्वारा निर्मित की गई थीं।
समृद्ध रोमन नागरिकों ने यूनानी परंपरा का अनुसरण करते हुए अपने भवनों में चित्रशालाएँ, उद्यान और कलादीर्घाएँ बनवानी प्रारंभ कर दीं। घरों की दीवारों पर चित्रांकन तथा सजावटी कलाकृतियों का प्रचलन बढ़ा। इस काल के आभूषणों, धातु-पात्रों, मिट्टी के बर्तनों और अन्य कलात्मक वस्तुओं में यूनानी शैली की स्पष्ट छाप दृष्टिगत होती है। यूनानी मूर्तिकारों ने रोमन देवी-देवताओं की संगमरमर, काँस्य और मिट्टी की अनेक उत्कृष्ट प्रतिमाएँ निर्मित कीं। इन मूर्तियों में सौंदर्य, संतुलन और यथार्थता का अद्भुत समन्वय दिखता है। कहा जाता है कि यूनानी कलाकारों द्वारा निर्मित देवता जूपिटर की एक विशाल काँस्य प्रतिमा इतनी ऊँची थी कि उसे कई किलोमीटर दूर से देखा जा सकता था। ऐसी भव्य कलाकृतियाँ रोमन समाज की समृद्धि और कला-प्रेम की प्रतीक थीं।
रोम का यूनानीकरण
गणतंत्र काल में साम्राज्य-विस्तार के परिणामस्वरूप रोम का व्यापक रूप से यूनानीकरण हुआ। शासन-व्यवस्था, धर्म, साहित्य, दर्शन, शिक्षा और कला सभी क्षेत्रों में यूनानी तत्त्वों का प्रभाव दिखाई देने लगा। रोम ने यूनान को राजनीतिक रूप से पराजित अवश्य किया, किंतु सांस्कृतिक क्षेत्र में स्वयं यूनान से प्रभावित हो गया। प्रसिद्ध रोमन वक्ता सिसरो ने लिखा है कि यूनान से रोम में केवल कुछ विचार नहीं आए, बल्कि ज्ञान और संस्कृति की एक विशाल धारा प्रवाहित हुई। रोमन बौद्धिक जीवन धीरे-धीरे हेलेनिस्टिक संसार का अभिन्न अंग बन गया। इसी तथ्य को कवि होरेस ने इन शब्दों में व्यक्त किया कि ‘विजित यूनान ने अपने विजेता रोम को ही जीत लिया।’ यूनानी संस्कृति का प्रभाव केवल प्राचीन रोम तक सीमित नहीं रहा। बाद में यही सांस्कृतिक परंपरा पूर्वी रोमन साम्राज्य और यूरोप के पुनर्जागरण काल की प्रेरणा बनी। इस प्रकार यूनानी और रोमन संस्कृतियों का समन्वय आगे चलकर यूरोपीय सभ्यता की प्रमुख आधारशिला सिद्ध हुआ।
रोम की क्रांति और एकतंत्र की स्थापना
रोमन गणराज्य ने निरंतर युद्धों और विजयों के माध्यम से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी, किंतु यह विस्तार उसके लिए अनेक आंतरिक समस्याएँ भी लेकर आया। विजित प्रदेशों से अपार धन रोम में आने लगा, जिससे संपन्न वर्ग और अधिक समृद्ध होता गया। दूसरी ओर, छोटे किसान और सामान्य नागरिक आर्थिक कठिनाइयों से जूझने लगे। कुलीन वर्ग ने विशाल भू-भागों पर अधिकार कर लिया और उन पर दासों से खेती करानी शुरू कर दी। परिणामस्वरूप छोटे किसानों की भूमि उनसे छिनती गई। विजित प्रदेशों से सस्ता अनाज आने के कारण स्थानीय कृषि को भी नुकसान पहुँचा। किसान निर्धन होते गए और अनेक लोग अपनी भूमि बेचकर नगरों में बसने को विवश हो गए। रोमन सेना में भर्ती होने के लिए भूमि का स्वामी होना आवश्यक था। जैसे-जैसे भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे सेना के लिए योग्य सैनिकों की संख्या घटने लगी। इससे राज्य की सैन्य शक्ति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा। इन परिस्थितियों ने रोमन समाज को दो स्पष्ट वर्गों में बाँट दिया—पहला, संपन्न कुलीन वर्ग, जिसके पास भूमि, धन और राजनीतिक शक्ति थी तथा दूसरा निर्धन एवं भूमिहीन वर्ग, जो आर्थिक संकट और शोषण का शिकार था। इन दोनों वर्गों के बीच संघर्ष धीरे-धीरे तीव्र होता गया और अंततः व्यापक सुधारों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी।
ग्रैक्की बंधुओं के सुधार
रोम में सुधारवादी आंदोलन का नेतृत्व ग्रैक्की बंधुओं—टाइबेरियस ग्रैक्कस और गायस ग्रैक्कस ने किया। इन दोनों भाइयों ने समाज में बढ़ती असमानता को दूर करने और किसानों तथा गरीबों की स्थिति सुधारने का प्रयास किया। 133 ईसा पूर्व में टाइबेरियस ग्रैक्कस ट्रिब्यून चुना गया। यद्यपि वह स्वयं कुलीन परिवार से था, फिर भी उसकी सहानुभूति किसानों और गरीबों के साथ थी। उसने भूमि-सुधार की योजना प्रस्तुत की, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति के पास सीमित मात्रा से अधिक भूमि नहीं होनी चाहिए। अतिरिक्त भूमि राज्य द्वारा लेकर भूमिहीन किसानों में बाँटी जानी थी। इस योजना का उद्देश्य छोटे किसानों को पुनः भूमि उपलब्ध कराना और सामाजिक असमानता को कम करना था। किंतु कुलीन वर्ग ने इसे अपने हितों पर आघात माना और इसका तीव्र विरोध किया। अंततः राजनीतिक संघर्ष इतना बढ़ गया कि टाइबेरियस और उसके अनेक समर्थकों की हत्या कर दी गई।
अपने भाई की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद गायस ग्रैक्कस ट्रिब्यून चुना गया। वह प्रतिभाशाली, दूरदर्शी और कुशल वक्ता था। उसने टाइबेरियस के अधूरे सुधारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। गायस ने भूमि-सुधार कार्यक्रम को पुनर्जीवित किया तथा किसानों को भूमि उपलब्ध कराने की योजना लागू की। उसने अनेक नए उपनिवेश स्थापित किए, जिससे रोजगार के अवसर बढ़े। गरीबों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए सरकारी अन्न-भंडार स्थापित किए गए। उसने सड़कों के निर्माण, व्यापार के विकास और प्रशासनिक सुधारों पर भी बल दिया। साथ ही, इटली के अनेक निवासियों को नागरिक अधिकार प्रदान करने का प्रयास किया। इन उपायों से सामान्य जनता को लाभ पहुँचा, किंतु कुलीन वर्ग उसके विरुद्ध हो गया। अंततः सीनेट ने गायस ग्रैक्कस को राज्य का शत्रु घोषित कर दिया। राजनीतिक संघर्ष और हिंसा के बीच उसने आत्महत्या कर ली। उसके हजारों समर्थकों को भी मृत्युदंड दे दिया गया।
यद्यपि ग्रैक्की बंधुओं के सुधार स्थायी रूप से सफल नहीं हो सके, फिर भी उनका ऐतिहासिक महत्त्व अत्यंत बड़ा है। उन्होंने पहली बार रोमन समाज की वास्तविक समस्याओं—भूमि की असमानता, निर्धनता और राजनीतिक भ्रष्टाचार को खुलकर सामने रखा। उनके प्रयासों ने यह स्पष्ट कर दिया कि रोमन गणराज्य की पारंपरिक व्यवस्था अब बदलती परिस्थितियों के अनुकूल नहीं रह गई थी। ग्रैक्की बंधुओं की असफलता के बाद वर्ग-संघर्ष और अधिक तीव्र हुआ, जिसने आगे चलकर गृहयुद्धों और एकतंत्रीय शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
महान सेनापतियों का आविर्भाव
मुख्य लेख : रोमन साम्राज्य के महान और प्रसिद्ध सेनानायक
ग्रैक्की बंधुओं के सुधारवादी प्रयासों की असफलता के बाद रोम की राजनीति में एक नए युग का श्रीगणेश हुआ। अब राजनीतिक नेतृत्व धीरे-धीरे जनप्रतिनिधियों और सीनेट के हाथों से निकलकर शक्तिशाली सेनानायकों के हाथों में जाने लगा। विशाल साम्राज्य, निरंतर युद्धों और सामाजिक संघर्षों ने ऐसे नेताओं को जन्म दिया, जिन्होंने अपनी सैनिक सफलताओं के बल पर सत्ता प्राप्त की। इस काल में गायस मारियस, लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला और क्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (पॉम्पे महान) जैसे सेनानायकों का रोमन राजनीति में उदय हुआ। इनके उदय ने रोमन गणराज्य को धीरे-धीरे एकतंत्रीय शासन की ओर अग्रसर किया।
गायस मारियस (लगभग 157 ई. पू.–86 ई. पू.)
मुख्य लेख : गायस मारियस
गायस मारियस का जन्म इटली के अर्पिनम नगर में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। अपनी साधारण पृष्ठभूमि के बावजूद उसने अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर सेना में उच्च स्थान प्राप्त किया। युवावस्था में ही उसने सैनिक जीवन अपना लिया और युद्धभूमि में असाधारण साहस तथा नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। सैनिक सफलताओं के कारण गायस मारियस की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। 107 ईसा पूर्व में वह कौंसल निर्वाचित हुआ और बाद में लगातार कई बार इस पद पर चुना गया। उस समय रोम को बाहरी आक्रमणों का खतरा था, इसलिए जनता ने उसकी सैनिक क्षमता पर विश्वास किया।

गायस मारियस का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान सैन्य-सुधार था। पहले केवल वही व्यक्ति सेना में भर्ती हो सकता था, जिसके पास भूमि हो। किंतु भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ जाने से सैनिकों की कमी हो रही थी। गायस मारियस ने इस व्यवस्था को बदलते हुए निर्धन और भूमिहीन नागरिकों को भी सेना में भर्ती होने की अनुमति दे दी, जिससे सैनिकों की संख्या बढ़ गई और रोम की सैन्य-शक्ति बढ़ गई। किंतु इस सुधार का एक नकारात्मक परिणाम भी हुआ। अब सैनिकों की निष्ठा राज्य की अपेक्षा अपने सेनापति के प्रति अधिक होने लगी। वे वेतन, पुरस्कार और युद्ध-लाभ की आशा में लड़ते थे। इस प्रकार रोमन सेना का चरित्र बदल गया और भविष्य में यही प्रवृत्ति गृहयुद्धों का कारण बनी।गायस मारियस एक कुशल सेनापति अवश्य था, किंतु राजनीति में वह उतना सफल नहीं रहा। सीनेट के साथ उसके संबंध अच्छे नहीं थे। सातवीं बार कौंसल पद ग्रहण करने के कुछ ही सप्ताह बाद मारियस का निधन हो गया। प्लूटार्क ने लिखा है कि जीवन भर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी रहे मारियस ने अंत समय में यह खेद व्यक्त किया कि अपनी असाधारण सफलताओं, अपार धन और सात बार कौंसल चुने जाने के बावजूद वे अपनी सभी महत्त्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं कर सके।
मार्कस लिवियस ड्रूसस (122 ई. पू.–91 ई. पू.)
मुख्य लेख : मार्कस लिवियस ड्रूसस
गायस मारियस के बाद रोम में सुधारवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने का प्रयास मार्कस लिवियस ड्रूसस ने किया। 91 ईसा पूर्व में ट्रिब्यून निर्वाचित होने के बाद उसने अनेक महत्त्वपूर्ण सुधारों का प्रस्ताव रखा। उसने सुझाव दिया कि राज्य की भूमि का कुछ भाग गरीब नागरिकों में बाँट दिया जाए। साथ ही उसने सीनेट में व्यापारिक वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल करने और उसके न्यायिक अधिकारों का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा। यही नहीं, उसने इटली के सभी स्वतंत्र निवासियों को रोमन नागरिकता प्रदान करने की भी योजना बनाई। किंतु इन प्रस्तावों का सीनेट ने कड़ा विरोध किया। कुछ प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया गया और कुछ पर विचार ही नहीं हुआ। परिणामस्वरूप ड्रूसस की सुधार योजना असफल हो गई। अंततः सितंबर 91 ईसा पूर्व में राजनीतिक शत्रुओं ने उसकी हत्या कर दी। कुछ लेखकों ने इस हत्या के लिए फिलिपस और सर्विलियस कैपियो को उत्तरदायी ठहराया है, जबकि कुछ ने 90 ईसा पूर्व के ट्रिब्यून क्विंटस वैरियस हाइब्रिडा पर भी संदेह व्यक्त किया है, जिसने बाद में ड्रूसस के समर्थकों पर मुकदमा चलाने के लिए एक विशेष न्यायालय की स्थापना की थी।
लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला (138 ई. पू.–78 ई. पू.)
मुख्य लेख : सुल्ला
ड्रूसस की मृत्यु के बाद रोम की राजनीति में लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला (138–78 ईसा पूर्व) का उदय हुआ। वह रोमन इतिहास के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद नेताओं में से एक था। यद्यपि उसका प्रारंभिक जीवन साधारण था, फिर भी उसने अपनी प्रतिभा, शिक्षा और सैन्य योग्यता के बल पर उच्च स्थान प्राप्त किया। सुल्ला यूनानी और रोमन साहित्य का अच्छा ज्ञाता था। उसे कला और साहित्य से विशेष प्रेम था। साथ ही वह एक कुशल सैनिक और महत्त्वाकांक्षी राजनीतिज्ञ भी था। उसकी सफलता का मुख्य आधार उसकी सैन्य शक्ति थी। 88 ईसा पूर्व में उसे पोंटस के शक्तिशाली शासक मिथ्रिडेट्स षष्ठ के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व सौंपा गया। युद्धों में सफलता प्राप्त करने के बाद उसकी प्रतिष्ठा अत्यधिक बढ़ गई। अंततः 82 ईसा पूर्व में उसने रोम पर अधिकार कर स्वयं को अधिनायक (डिक्टेटर) घोषित कर दिया।

सुल्ला के सुधार
कॉर्नेलियस सुल्ला का उद्देश्य सीनेट की शक्ति को पुनर्स्थापित करना और जनवादी नेताओं के प्रभाव को समाप्त करना था। उसने अनेक संवैधानिक सुधार किए। सबसे पहले उसने सीनेट के सदस्यों की संख्या बढ़ाई तथा उसके अधिकारों का विस्तार किया। प्रेटरों और अन्य अधिकारियों की संख्या में वृद्धि की गई। न्यायालयों का पुनर्गठन किया गया और अपराधों की स्पष्ट परिभाषा निर्धारित की गई। प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया गया। सुल्ला का विश्वास था कि विशाल साम्राज्य का सफल शासन केवल एक सशक्त अभिजात वर्ग ही कर सकता है। इसलिए उसने सीनेट को पुनः राजनीतिक जीवन का केंद्र बनाने का प्रयास किया। उसकी एक विशेषता यह थी कि सुधारों को लागू करने के बाद उसने स्वेच्छा से सत्ता छोड़ दी। लगभग दो वर्षों तक अधिनायक बने रहने के बाद उसने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और सार्वजनिक जीवन से अलग हो गया। 78 ईसा पूर्व में बीमारी के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसकी सफलताओं और आत्मविश्वास के कारण लोग उसे ‘सुल्ला फेलिक्स’ (भाग्यशाली सुल्ला) कहकर पुकारते थे।
क्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (106 ई.पू.–48 ई.पू.)
मुख्य लेख : पॉम्पे महान
सुल्ला के बाद रोम में जिस सेनानायक का उदय हुआ, वह था क्नेयस पॉम्पियस मैग्नस, जिसे इतिहास में ‘पॉम्पे महान’ के नाम से जाना जाता है। उसका जन्म 106 ईसा पूर्व में एक संपन्न परिवार में हुआ था। युवावस्था में उसने असाधारण सैनिक क्षमता का परिचय दिया और शीघ्र ही रोमन राजनीति का प्रमुख नेता बन गया। 70 ईसा पूर्व में पॉम्पे कौंसल निर्वाचित हुआ। उसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण उसकी सैन्य सफलताएँ थीं। उसने स्पेन, सिसिली और उत्तरी अफ्रीका में विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन किया। इन अभियानों ने उसे रोम का सबसे प्रतिष्ठित सेनानायक बना दिया। इसी काल में इटली में दासों का प्रसिद्ध विद्रोह हुआ, जिसका नेतृत्व स्पार्टाकस ने किया था। यद्यपि इस विद्रोह को दबाने का मुख्य श्रेय क्रेसस को जाता है, फिर भी अंतिम चरण में पॉम्पे ने विद्रोहियों के शेष दलों का दमन करके अपनी प्रतिष्ठा और बढ़ा ली।
पॉम्पे की उपलब्धियाँ
पॉम्पे महान ने प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया। उसके प्रयासों से रोम की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उसने साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में शांति और सुव्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। 58 ईसा पूर्व में उसके संरक्षण में रोम की पहली विशाल पत्थर-निर्मित रंगशाला (थिएटर) का निर्माण हुआ, जिसमें हजारों दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। यह उसकी समृद्धि और कला-प्रेम का प्रतीक थी। संवैधानिक क्षेत्र में उसने न्यायिक संस्थाओं में सीनेट के एकाधिकार को सीमित करने का प्रयास किया और अन्य वर्गों को भी प्रतिनिधित्व प्रदान किया। इससे प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षाकृत संतुलित बनी।
सिसरो (106 ई.पू.–43 ई. पू.)
मुख्य लेख : सिसरो
मार्कस टुलियस सिसरो (106–43 ई. पू.) रोमन गणराज्य के उत्तरकाल का एक महान वक्ता, विधिवेत्ता, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक था। वह कुलीन परिवार से नहीं था, फिर भी अपनी प्रतिभा, शिक्षा और वाक्पटुता के बल पर रोम के सर्वोच्च राजनीतिक पदों तक पहुँचा। रोमन इतिहास में उसे गणतांत्रिक आदर्शों का समर्थक तथा लैटिन गद्य साहित्य का महान निर्माता माना जाता है। सिसरो का जन्म 106 ईसा पूर्व में इटली के अर्पिनम नगर के निकट एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उसके पिता शिक्षित और संपन्न व्यक्ति थे, जिन्होंने उसके लिए उत्कृष्ट शिक्षा की व्यवस्था की। बाल्यकाल से ही सिसरो की रुचि साहित्य, दर्शन और कानून के अध्ययन में थी। उसने प्रसिद्ध कवि आर्कियास से साहित्य और यूनानी भाषा की शिक्षा प्राप्त की तथा प्रसिद्ध विधिवेत्ता क्विंटस म्यूसियस स्कीवोला से विधि का ज्ञान अर्जित किया। इससे उसमें तर्कशक्ति, विद्वत्ता और भाषण-कला का अद्भुत विकास हुआ।
युवावस्था में सिसरो नियमित रूप से रोमन न्यायालयों और जनसभाओं में उपस्थित होकर प्रसिद्ध वक्ताओं के भाषण सुना करता था। इसी अभ्यास ने उसे एक असाधारण वक्ता बना दिया। बाद में वह उच्च शिक्षा के लिए यूनान गया, जहाँ उसने एथेंस में लगभग तीन वर्षों तक दर्शन और वक्तृत्व-कला का अध्ययन किया। वहाँ उसने प्रसिद्ध विद्वानों अपोलोनियस और पोसिडोनियस से शिक्षा प्राप्त की। यूनानी ज्ञान और रोमन व्यावहारिकता का यह समन्वय उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता बन गया। रोम लौटने के बाद सिसरो ने टेरेंटिया नामक महिला से विवाह किया। इसके बाद उसने सक्रिय राजनीतिक जीवन में प्रवेश किया। 75 ईसा पूर्व में वह क्वेस्टर नियुक्त हुआ। प्रशासनिक कार्यों में उसने ईमानदारी और दक्षता का परिचय दिया। इसी समय उसने प्रांतीय शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ किया।
सिसरो की ख्याति विशेष रूप से गायस वेरेस नामक भ्रष्ट प्रशासक के विरुद्ध चलाए गए अभियोग के कारण बढ़ी। गायस वेरेस सिसिली का गवर्नर था और उसने अपने पद का दुरुपयोग करके भारी धन-संपत्ति अर्जित कर ली थी। उसने कर-वसूली में अनियमितताएँ की थीं तथा प्रशासन को भ्रष्टाचार का केंद्र बना दिया था। सिसरो ने उसके अपराधों को उजागर करने के लिए प्रसिद्ध भाषणों और लेखों का सहारा लिया, जिसके कारण वेरेस को अपने पद से त्यागपत्र देकर रोम छोड़ना पड़ा।
वेरेस प्रकरण में सफलता के बाद सिसरो की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। 63 ईसा पूर्व में वह रोम का कौंसल निर्वाचित हुआ, जो उसके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उस समय रोम अनेक राजनीतिक संकटों से घिरा हुआ था और सिसरो ने स्वयं को गणराज्य का रक्षक सिद्ध करने का प्रयास किया। इसी काल में लूसियस सेर्गियस कैटिलाइन नामक महत्त्वाकांक्षी नेता ने सत्ता प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र रचा। चुनावों में पराजित होने के बाद उसने विद्रोह और हिंसा के माध्यम से शासन पर अधिकार करने की योजना बनाई। सिसरो को इस षड्यंत्र की जानकारी मिल गई। उसने सीनेट में अपने भाषणों के माध्यम से कैटिलाइन और उसके साथियों के षड्यंत्र का पर्दाफाश किया। इतिहास में ये भाषण ‘कैटिलाइन के विरुद्ध भाषण’ (कैटिलाइनरियन ओरेशन्स) के नाम से प्रसिद्ध हैं। सिसरो के प्रयासों से कैटिलाइन का विद्रोह विफल हो गया। उसके अनेक सहयोगियों को गिरफ्तार कर मृत्युदंड दिया गया। इस सफलता के कारण धनी और कुलीन वर्ग ने सिसरो को गणराज्य का उद्धारक माना। उसे सम्मानित किया गया और उसकी प्रशंसा में अनेक समारोह आयोजित किए गए। कई लोगों ने उसे रोम का रक्षक और राष्ट्र का हितैषी घोषित किया।
किंतु सिसरो की इस कार्रवाई की आलोचना भी हुई। उसके विरोधियों का तर्क था कि उसने अभियुक्तों को उचित न्यायिक प्रक्रिया का अवसर दिए बिना मृत्युदंड दिलवाया, जो रोमन कानून और नागरिक अधिकारों के विरुद्ध था। विशेष रूप से सामान्य जनता और जनवादी नेताओं का एक वर्ग उससे असंतुष्ट हो गया। उनका मानना था कि सिसरो ने केवल षड्यंत्र को दबाया, किंतु उन सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को दूर करने का प्रयास नहीं किया जिनके कारण असंतोष और विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई थी। सिसरो मूलतः विचारों और आदर्शों का व्यक्ति था। वह रोमन गणराज्य, कानून की सर्वोच्चता और संवैधानिक शासन का समर्थक था। उसका विश्वास था कि राज्य का संचालन कानून, न्याय और नैतिकता के आधार पर होना चाहिए। उसने अपने भाषणों, पत्रों और दार्शनिक ग्रंथों के माध्यम से इन आदर्शों का प्रचार किया।
इस प्रकार सिसरो रोमन इतिहास का एक बहुआयामी व्यक्तित्व था। वह केवल एक महान वक्ता ही नहीं, बल्कि एक कुशल विधिवेत्ता, दार्शनिक और गणतांत्रिक मूल्यों का समर्थक भी था। यद्यपि वह रोम की राजनीतिक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं कर सका, फिर भी उसके विचारों और साहित्यिक कृतियों ने रोमन तथा यूरोपीय बौद्धिक परंपरा को गहराई से प्रभावित किया।
गायस जूलियस सीजर (100 ई. पू.–44 ई. पू.)
मुख्य लेख : जूलियस सीज़र
गायस जूलियस सीज़र प्राचीन रोम के इतिहास का एक महान सेनानायक, राजनीतिज्ञ, प्रशासक और सुधारक था। वह रोमन गणराज्य के अंतिम चरण का सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व माना जाता है। उसके सैन्य अभियानों, राजनीतिक सुधारों तथा प्रशासनिक नीतियों ने न केवल रोमन गणराज्य के इतिहास की दिशा बदल दी, बल्कि रोमन साम्राज्य की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त किया। उसने 49 ईसा पूर्व से लेकर 44 ईसा पूर्व में अपनी हत्या तक रोमन गणराज्य के अधिनायक (तानाशाह) के रूप में शासन किया। अपने असाधारण व्यक्तित्व तथा सैन्य प्रतिभा के बल पर उसने रोम को विश्व की प्रमुख शक्ति बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इतिहासकारों ने उसकी गणना प्राचीन विश्व के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में की है।

जूलियस सीज़र का जन्म 12 जुलाई 100 ईसा पूर्व को रोम के एक पैट्रिशियन (कुलीन) परिवार जेंस जूलिया में हुआ था, जो स्वयं को देवी वीनस तथा उनके पुत्र ऐनीयस का वंशज मानता था। यद्यपि उसका परिवार प्राचीन अभिजात वर्ग से संबंधित था, फिर भी उसके जन्म के समय उसकी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। सीजर के पिता का नाम गायस जूलियस सीजर (ज्येष्ठ) और माता का नाम औरेलिया था। बचपन से ही उसे लैटिन और यूनानी भाषा, साहित्य, इतिहास तथा वक्तृत्व-कला की उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त हुई। इस शिक्षा ने सीजर के व्यक्तित्व में नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और महत्त्वाकांक्षा का विकास किया।
जूलियस सीज़र का संबंध प्रसिद्ध जनवादी नेता गायस मारियस के परिवार से था। इसी कारण उसमें प्रारंभ से ही सुधारवादी और जनपक्षीय राजनीतिक विचार विकसित हुए। युवावस्था में उसने कोर्नेलिया, जो लोकप्रिय नेता लूसियस कॉर्नेलियस चिन्ना की पुत्री थीं, से विवाह किया। जब तानाशाह लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला सत्ता में आया, तब उसने सीजर को कोर्नेलिया का परित्याग करने का आदेश दिया, किंतु सीजर ने यह आदेश मानने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी संपत्ति जब्त कर ली गई और उसके जीवन पर भी संकट आ गया। अपनी जान बचाने के लिए उसे कुछ समय तक रोम से दूर रहना पड़ा।
आरंभिक राजनीतिक संघर्ष
युवावस्था में सीज़र को फ्लामेन डियालिस (जुपिटर का प्रधान पुरोहित) नियुक्त किया गया, जिसके कारण उनका विवाह सिन्ना की पुत्री कॉर्नेलिया से हुआ। उस समय रोमन राजनीति दो प्रमुख गुटों— सेनेट विरोधी जनसमर्थक दल (पोपुलारेस) तथा सीनेट समर्थक अभिजात दल (ऑप्टिमेट्स) में विभाजित थी। सीज़र का संबंध जनसमर्थक दल से था, जबकि तानाशाह सुल्ला सीनेट समर्थक अभिजात दल का नेता था। 83–82 ईसा पूर्व के गृहयुद्ध में अनुदारवादी (ऑप्टिमेट) दल के नेता सुल्ला की विजय (82 ईसा पूर्व) के पश्चात् सीजर को राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। सुल्ला ने सीजर को अपनी पत्नी कॉर्नेलिया को तलाक देने का आदेश दिया, किंतु सीजर ने इसे अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप उसकी संपत्ति जब्त कर ली गई और उसका जीवन संकट में पड़ गया। अंततः प्रभावशाली व्यक्तियों तथा वेस्टल कुंवारियों के हस्तक्षेप से वह मृत्यु और निर्वासन से बच सका।
इसके बाद वह कई वर्षों तक रोम से बाहर रहा और पश्चिमी एशिया माइनर में सैनिक सेवाओं द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त की। 78 ईसा पूर्व में सुल्ला की मृत्यु का समाचार मिलते ही वह रोम लौट आया। उसने न्यायालय में सुल्ला के समर्थक कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के विरुद्ध मुकदमे चलाए। इसके बाद वह रोम छोड़कर रोड्स चला गया, जहाँ उसने प्रसिद्ध वक्तृत्वाचार्य अपोलोनियस मोलोन से वक्तृत्व कला का प्रशिक्षण लिया। यात्रा के दौरान उसे समुद्री लुटेरों ने पकड़ लिया और फिरौती माँगी। प्लूटार्क और सुएटोनियस के अनुसार पचास टैलेंट की फिरौती मिलने के बाद उसे मुक्त कर दिया गया। इसके बाद उसने एक बेड़ा संगठित किया, समुद्री लुटेरों को पकड़ लिया और उन्हें दंडित किया। 75–74 ईसा पूर्व की सर्दियों में तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध प्रारंभ होने से उसकी पढ़ाई बाधित हो गई।
राजनीतिक जीवन का प्रारंभ
73 ईसा पूर्व में रोम से अनुपस्थित रहने के दौरान जूलियस सीज़र को अपने दिवंगत संबंधी गायस ऑरेलियस कोटा के स्थान पर पोंटिफ़ों के महाविद्यालय का सदस्य चुना गया। इसके तुरंत बाद 74 ईसा पूर्व में वह रोम लौट आया और सीनेट के अभिजात अल्पतंत्र के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेने लगा। उसकी वाक्पटुता, उदारता तथा जनसाधारण के प्रति सहानुभूति ने शीघ्र ही उसे लोकप्रिय बना दिया और 71 ईसा पूर्व के लिए सैन्य ट्रिब्यून चुना गया। अगले वर्ष, 70 ईसा पूर्व में पॉम्पे और क्रैसस के कौंसल बनने के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल गईं। 69 ईसा पूर्व के लिए क्वेस्टर चुने जाने पर सीज़र को हिस्पानिया उल्तेरियोर में गायस एंटिस्टियस वेटुस के अधीन नियुक्त किया गया। इस पद पर उसके निर्वाचन के साथ ही उसे आजीवन सीनेट की सदस्यता भी प्राप्त हो गई। इसके कुछ समय बाद उसकी पत्नी कॉर्नेलिया का भी निधन हो गया, जिसने उसकी एकमात्र वैध संतान जूलिया को जन्म दिया था। बाद में, सीजर ने सुल्ला की पौत्री पॉम्पेया से दूसरा विवाह किया।
68 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र क्वेस्टर नियुक्त हुआ और उसे स्पेन में प्रशासनिक कार्यों का दायित्व मिला। वहाँ उसने सफल सैन्य अभियानों का संचालन किया तथा स्थानीय विद्रोहों का दमन किया। साथ ही, उसने प्रशासनिक सुधारों और आर्थिक उपायों के माध्यम से जनता का विश्वास अर्जित किया। 65 ईसा पूर्व में सीज़र ‘क्यूरूल एडाइल’ के पद पर नियुक्त हुआ। इस पद पर रहते हुए उसने भव्य सार्वजनिक खेलों और समारोहों का आयोजन किया, जिससे उसकी लोकप्रियता और बढ़ गई।
63 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र प्रेटर तथा पोंटिफ़ेक्स मैक्सिमस (प्रधान पुरोहित) निर्वाचित हुआ, जो उसकी राजनीतिक सफलता का महत्त्वपूर्ण चरण था। इस पद ने उसे न केवल धार्मिक प्रतिष्ठा प्रदान की, बल्कि रोमन राजनीति में भी उसका प्रभाव बढ़ा दिया। 62 ईसा पूर्व में वह प्रो-प्रेटर के रूप में पुनः स्पेन भेजा गया। वहाँ उसने अनेक सैन्य अभियान चलाकर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की और पर्याप्त धन-संपत्ति अर्जित की। इन सफलताओं ने उसे रोम के प्रमुख नेताओं की श्रेणी में खड़ा कर दिया। 61 ईसा पूर्व में उसे दूरवर्ती हिस्पानिया (दक्षिणी स्पेन) का गवर्नर नियुक्त किया गया। उसने कैलाइसी और लुसितानी जनजातियों के विरुद्ध अभियान चलाए। उत्तर-पश्चिमी स्पेन में कैलाइसी की राजधानी पर अधिकार कर उसने रोमन सेना को अटलांटिक महासागर के तट तक पहुँचा दिया। प्रायद्वीप में अपनी विजयों के पश्चात् उसे ‘इम्पेरेटर’ की उपाधि प्रदान की गई और इसके बाद वह रोम लौट आया।
प्रथम त्रिगुट (फर्स्ट ट्रायम्विरेट) की स्थापना
रोमन गणराज्य के उत्तरकाल में राजनीतिक संघर्ष, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं और सीनेट के बढ़ते विरोध के कारण सत्ता-संतुलन तेजी से बदल रहा था। लगभग 62 ईसा पूर्व के बाद पॉम्पे पुनः रोम की राजनीति में सक्रिय हुआ। उसने एशिया माइनर, सीरिया और फिलिस्तीन में अनेक सफल सैन्य अभियान चलाकर रोम की प्रतिष्ठा और संपत्ति में वृद्धि की। फिलिस्तीन को उसने रोम का अधीनस्थ राज्य बनाया तथा अनेक नगरों की स्थापना करके वहाँ शांति और व्यवस्था स्थापित की। उसकी विजयों से रोम के कोष में भारी मात्रा में धन आया और सैनिकों को भी पर्याप्त पुरस्कार मिले।
पॉम्पे की बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव से रोमन सीनेट चिंतित हो गई। जब उसने अपने सैनिकों को भूमि प्रदान करने का प्रस्ताव रखा, तो सीनेट ने उसे अस्वीकार कर दिया। इससे पॉम्पे और सीनेट के बीच मतभेद बढ़ गए। इसी पृष्ठभूमि में जूलियस सीज़र ने ग्नियस पोंपेयस (पॉम्पे) तथा रोम के सबसे धनी व्यक्ति मार्कस लिसिनियस क्रैसस के साथ प्रथम त्रिगुट (फ़र्स्ट ट्रायम्विरेट) की स्थापना की, जो रोमन इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक गठबंधन के रूप में प्रसिद्ध है। इस गठबंधन का उद्देश्य रोमन सीनेट के अभिजात वर्ग के प्रभाव को सीमित करना तथा प्रशासनिक एवं राजनीतिक निर्णयों पर अपना प्रभाव स्थापित करना था। तीनों नेताओं ने यह निश्चय किया कि वे सीनेट के विरोध के बावजूद अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करेंगे। पॉम्पे ने सीजर को कौंसुल निर्वाचित कराने में सहायता देने का वचन दिया और इसके बदले में सीजर ने पॉम्पे की उन योजनाओं को लागू करने का आश्वासन दिया, जिन्हें सीनेट ने अस्वीकार कर दिया था। इस गठबंधन के तीनों नेताओं की अपनी-अपनी विशेषताएँ थीं। पॉम्पे एक महान सेनानायक था, क्रेसस अपार धन-संपत्ति का स्वामी था और सीजर एक कुशल राजनीतिज्ञ, वक्ता तथा प्रशासक था। इस गठबंधन को सुदृढ़ करने के लिए पॉम्पे ने सीज़र की पुत्री जूलिया से विवाह किया। इस प्रकार राजनीतिक और पारिवारिक संबंधों के माध्यम से त्रिगुट को सुदृढ़ किया गया।
सीजर का कौंसल पद और सुधार
59 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र रोम का कौंसल निर्वाचित हुआ और अपने पदाधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी संयुक्त योजनाओं को कार्यान्वित करने लगा। सत्ता में आते ही उसने सीनेट में एक भूमि विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार राज्य की भूमि उन गरीब नागरिकों में बाँटी जानी थी, जिनके तीन या अधिक बच्चे थे। जनसभा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार भूमि-वितरण की वह नीति सफल हुई, जिसके लिए ग्रैक्की बंधुओं ने एक शताब्दी पूर्व संघर्ष किया था। सीजर ने जनता को शासन की गतिविधियों से अवगत कराने के लिए एक दैनिक समाचार-पत्र ‘एक्टा डिउर्ना’ का प्रकाशन भी आरंभ कराया, जिसमें सरकारी निर्णयों और सार्वजनिक घटनाओं का विवरण प्रकाशित होता था। इसकी प्रतियाँ रोम सहित साम्राज्य के विभिन्न भागों में भेजी जाती थीं। इसे विश्व के प्रारंभिक सरकारी समाचार-पत्रों में गिना जाता है।
कौंसल पद पर रहते हुए जूलियस सीज़र को इलीरिकम और सिसाल्पाइन गॉल के प्रांत पाँच वर्षों के लिए सौंप दिए गए। संभवतः जूलियस सीज़र को इटली की उत्तरी सीमा की रक्षा के उद्देश्य से सिसाल्पाइन गॉल दिया गया था। इसके बाद सीनेट ने वार्षिक नवीकरण की शर्त पर ट्रांसाल्पाइन गॉल भी उसके अधिकार में दे दिया, संभवतः इसलिए कि आल्प्स के पार उसके सैन्य अभियानों पर कुछ नियंत्रण रखा जा सके। इस प्रकार सीज़र के हाथों में विशाल सैन्य शक्ति आ गई, जिससे आगे चलकर उसके राजनीतिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त हुआ।
गॉल के विरुद्ध अभियान (58–50 ईसा पूर्व)
गॉल का क्षेत्र वर्तमान फ्रांस, बेल्जियम तथा आसपास के कुछ अन्य प्रदेशों तक फैला हुआ था। यहाँ अनेक जनजातियाँ निवास करती थीं, जो प्रायः आपस में संघर्ष करती रहती थीं। 58 ईसा पूर्व में गॉल राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था और जर्मन सेनानायक अरियोविस्टस गॉल के पूर्वी भाग में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। इससे गॉल की कुछ जनजातियाँ भयभीत हो गईं और उन्होंने रोम से सहायता की माँग की। इसके बाद सीजर ने गॉल में अनेक सफल सैन्य अभियान चलाए और वहाँ की कई जनजातियों को पराजित कर रोमन प्रभाव का विस्तार किया।
सीज़र ने 55 और 54 ईसा पूर्व में दक्षिणी ब्रिटेन पर दो अभियान चलाए। इन अभियानों का उद्देश्य संभवतः गैलिक जनजातियों को मिलने वाली ब्रिटिश सहायता रोकना, नई विजय प्राप्त करना तथा रोम में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना था। इस अभियान में वह टेम्स नदी तक पहुँच गया और अधिकांश कबीलों के सरदारों ने औपचारिक रूप से उसकी अधीनता स्वीकार कर ली, किंतु गॉल में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो जाने के कारण वह वहाँ स्थायी रोमन शासन स्थापित नहीं कर सका।
यद्यपि अधिकांश गॉल जनजातियाँ पराजित हो चुकी थीं, फिर भी उनके भीतर स्वतंत्रता की भावना जीवित थी। 54 ईसा पूर्व के अंत में गॉल लौटने पर उसे एबुरोंस और बेल्गे के नेतृत्व में व्यापक विद्रोह का सामना करना पड़ा। सीज़र ने विद्रोहियों को कठिन भूभाग से बाहर निकालकर निर्णायक युद्ध में पराजित कर दिया। इसके बाद 52 ईसा पूर्व में वेरसिंगेटोरिक्स के नेतृत्व में गॉल की विभिन्न जनजातियों ने एकजुट होकर रोमन शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह छेड़ दिया। प्रारंभ में सीज़र गेर्गोविया में पराजित हुआ, किंतु बाद में उसने अलेसिया के युद्ध में निर्णायक विजय प्राप्त की और वेरसिंगेटोरिक्स को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके बाद 51 ईसा पूर्व तक जूलियस सीज़र ने गॉल में शेष सभी प्रतिरोधों का दमन कर रोमन शासन स्थापित कर दिया। अलेसिया में उसकी विजय के बाद पॉम्पे के समर्थन से सीनेट ने उसके सम्मान में बीस दिनों का धन्यवाद-उत्सव घोषित किया तथा दस ट्रिब्यूनों के कानून के अनुसार उसे अनुपस्थिति में ही कौंसल पद के लिए उम्मीदवार बनने का अधिकार प्रदान किया।
रोमन गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि
मुख्य लेख : रोमन गृहयुद्ध
गॉल विजय के दौरान जूलियस सीज़र कई वर्षों तक रोम से दूर रहा। उसकी अनुपस्थिति में रोम की राजनीति में व्यापक परिवर्तन हो चुके थे। भ्रष्टाचार, षड्यंत्र और सत्ता-संघर्ष बढ़ गए थे। प्रथम त्रिगुट के सदस्य जूलियस सीज़र, पॉम्पे और क्रेसस अपने-अपने प्रभाव को बढ़ाने में लगे थे। पॉम्पे को स्पेन के दो प्रांतों का गवर्नर नियुक्त किया गया, क्रेसस को पूर्वी सीमांत प्रांत सीरिया का गवर्नर बनाया गया। गॉल सीज़र के ही कमान में रखा गया। पॉम्पे ने अपने प्रांत स्पेन की कमान का संचालन अपने प्रतिनिधियों द्वारा किया और स्वयं रोम के निकट रहा। इसी बीच क्रेसस ने पूर्व में पार्थिया के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया, किंतु 53 ई.पू. में कर्रहे के युद्ध में उसकी पराजय हुई और वह अपने पुत्र सहित मारा गया। क्रेसस की मृत्यु के साथ ही प्रथम त्रिगुट का संतुलन समाप्त हो गया और अब रोम की राजनीति में केवल सीज़र और पॉम्पे दो प्रमुख शक्ति रह गए।

सीज़र और पॉम्पे का संघर्ष
गॉल के अभियानों से सीज़र को अपार धन, अनुभवी सेना तथा असाधारण राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। किंतु इसी बीच रोम की राजनीतिक स्थिति तेजी से बदलने लगी। 53 ईसा पूर्व में क्रैसस के मारे जाने से पॉम्पे की शक्ति और प्रतिष्ठा में बढ़ गई थी। उसने विशाल सेना संगठित कर सीनेट के अभिजात वर्ग से समझौता कर लिया। इसी समय सीज़र और पॉम्पे के बीच पारिवारिक संबंध भी समाप्त हो गए, क्योंकि सीज़र की पुत्री जूलिया की, जो पॉम्पे की पत्नी थी, प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद पॉम्पे और सीज़र के बीच का राजनीतिक समझौता टूट गया। पॉम्पे ने सीज़र के साथ नए वैवाहिक संबंध स्थापित करने से भी इनकार कर दिया और सीनेट के समर्थन से रोम की सत्ता पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया।
जूलियस सीज़र की निरंतर सफलताओं से सीनेट भयभीत थी। इसलिए 50 ईसा पूर्व में सीनेट ने आदेश दिया कि सीज़र अपनी सेना भंग करके गॉल का शासन छोड़ दे और रोम लौट आए, अन्यथा उसे राज्य का शत्रु माना जाएगा। दूसरी ओर पॉम्पे को अपनी सेनाएँ अपने अधिकार में रखने की अनुमति दे दी गई। सीज़र ने इस आदेश को अन्यायपूर्ण बताकर स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच संघर्ष अनिवार्य हो गया और रोम एक बार फिर गृहयुद्ध की ओर जाने लगा।
रोमन गृहयुद्ध
लगभग 10 या 11 जनवरी 49 ईसा पूर्व को सीनेट के ‘अंतिम आदेश’ (सेनातुस कोंसुल्तुम उल्तिमुम) के उत्तर में जूलियस सीज़र ने रूबिकॉन नदी को पार किया, जिसे रोमन गृहयुद्ध का आरंभ माना जाता है। उसने घोषणा की कि वह अपने सम्मान, अधिकारों तथा रोमन जनता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह कदम उठा रहा है। चूंकि पॉम्पे और रोमन सरकार के पास इटली में बहुत थोड़े से ही अनुभवी सैनिक थे, इसलिए उन्होंने रोम खाली कर दिया और सीज़र ने बिना किसी प्रतिरोध के राजधानी पर अधिकार कर लिया।
जूलियस सीज़र ने शासन सत्ता पूर्ण रूप से अपने हाथ में ले ली, परंतु पॉम्पे से उसे अब भी खतरा था। सीज़र ने पर्वतों को पार करके थेसाली में प्रवेश किया और 9 अगस्त 48 ईसा पूर्व को यूनान के फार्सलस नामक स्थान पर सीज़र और पॉम्पे की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। पॉम्पे की सेना संख्या में अधिक थी, फिर भी वह बुरी तरह पराजित हुआ और मिस्र भाग गया। किंतु एलेक्जेंड्रिया पहुँचते ही मिस्र के युवा शासक टॉलेमी तेरहवें ने उसकी हत्या करवा दी।
मिस्र अभियान एवं क्लियोपेट्रा
जूलियस सीज़र एक छोटी सी सेना लेकर पॉम्पे का पीछा करते हुए 2 अक्टूबर 48 ईसा पूर्व को मिस्र पहुँचा। उस समय मिस्र के सम्राट टॉलेमी दसवें की मृत्यु के बाद उसकी संतानों- क्लियोपेट्रा और टॉलेमी तेरहवें के बीच सत्ता-संघर्ष चल रहा था। सीज़र ने दोनों के बीच मध्यस्थता करने का प्रयास किया, किंतु परिस्थितियाँ शीघ्र ही गृहयुद्ध में बदल गईं। अंततः सीज़र ने नील नदी के युद्ध में टॉलेमी को पराजित कर क्लियोपेट्रा को मिस्र की शासिका बना दिया। मिस्र में रहते हुए सीज़र और क्लियोपेट्रा के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गए। क्लियोपेट्रा ने जून 47 ईसा पूर्व के अंत के आसपास एक पुत्र को जन्म दिया, जिसे टॉलेमी पंद्रहवाँ सीज़ेरियन कहा गया। यद्यपि रोम में उसकी वैधानिक स्थिति विवादास्पद रही, फिर भी क्लियोपेट्रा उसे सीज़र का पुत्र मानती थी। सीज़र लगभग नौ महीनों तक मिस्र में रहा और इस अवधि में दोनों का संबंध रोम तथा मिस्र की राजनीति का महत्त्वपूर्ण विषय बन गया।
जब जूलियस सीज़र एंटिओक पहुँचा, तब उसे ज्ञात हुआ कि उसके मिस्र में रहने के दौरान पोंटस के शासक फार्नाकेस द्वितीय ने उत्तरी अनातोलिया में अपने पिता के राज्य को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया था। सीज़र तत्काल एशिया माइनर पहुँचा और 47 ईसा पूर्व में ज़ेला के युद्ध में फार्नाकेस को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इसी विजय के उपरांत उसने अपना प्रसिद्ध संदेश भेजा था— ‘वेनी, वीदी, वीची’ (मैं आया, मैंने देखा, मैंने विजय प्राप्त की)। इसके बाद वह शीघ्र ही इटली लौट गया।
रोमन गृहयुद्ध का अंत
रोम लौटने पर सीज़र ने देखा कि लंबे गृहयुद्ध के कारण राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था अत्यंत अस्थिर हो चुकी थी। उसने कठोर कदम उठाकर कानून-व्यवस्था बहाल की तथा अपने विरोधियों का दमन किया। 46 ईसा पूर्व में थैप्सस के युद्ध में उसने मेटेलस स्किपियो, कैटो तथा नूमिडिया के राजा जुबा प्रथम की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। इस विजय के साथ उसके अधिकांश प्रमुख विरोधियों की शक्ति समाप्त हो गई। इसके बाद 45 ईसा पूर्व में उसने स्पेन में अभियान चलाया और 17 मार्च 45 ईसा पूर्व को मुंडा के युद्ध में पॉम्पे के समर्थकों को अंतिम एवं निर्णायक रूप से हरा दिया। इस विजय के साथ रोमन गृहयुद्ध का अंत हो गया।
थैप्सस और मुंडा की विजयों के बाद सीज़र रोमन राज्य का निर्विवाद नेता बन गया। उसने रोम लौटकर अपनी विजयों का भव्य उत्सव (ट्रायम्फ) मनाया। इसके साथ ही उसने रोमन गणराज्य के प्रशासन के व्यापक पुनर्गठन और भावी शासन-व्यवस्था की योजनाओं को कार्यान्वित करना प्रारंभ किया।
जूलियस सीज़र का शासन
जूलियस सीज़र केवल महान विजेता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक और कुशल संगठनकर्ता भी था। गृहयुद्ध में निर्णायक विजय के बाद उसने रोमन शासन-व्यवस्था का व्यापक पुनर्गठन किया। उसने सीनेट की राजनीतिक शक्ति सीमित कर उसे मुख्यतः परामर्शदात्री संस्था बना दिया तथा उसकी सदस्य संख्या 600 से बढ़ाकर लगभग 900 कर दी। नए सदस्यों में प्रांतीय अभिजातों, व्यापारियों, सैनिक अधिकारियों और सामान्य वर्ग के प्रतिनिधियों को भी स्थान दिया गया, जिससे शासन का आधार अधिक व्यापक हुआ। नगर प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था को अधिक संगठित बनाया गया, क्वेस्टरों तथा प्रेटरों की संख्या बढ़ाई गई और प्रांतीय गवर्नरों एवं उच्च अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार अपने हाथ में लेकर उसने प्रशासन पर केंद्रीय नियंत्रण स्थापित किया। चुनावों में भ्रष्टाचार पर कठोर दंड, न्यायिक सुधार तथा प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के उपायों ने रोमन राज्य को अधिक प्रभावी बना दिया। यही परिवर्तन रोमन गणराज्य की पारंपरिक व्यवस्था के क्षय और एक केंद्रीकृत शासन की स्थापना की दिशा में निर्णायक सिद्ध हुए।
आजीवन अधिनायक (डिक्तातोर पेर्पेतुओ)
46 ईसा पूर्व में सीज़र को दस वर्षों के लिए अधिनायक (डिक्टेटर) नियुक्त किया गया और 44 ईसा पूर्व में उसे आजीवन अधिनायक घोषित कर दिया गया। वह अनेक बार कौंसल चुना गया और पोंटिफेक्स मैक्सिमस (प्रधान पुरोहित) का पद भी उसके पास था। यद्यपि उसने औपचारिक रूप से राजपद स्वीकार नहीं किया, फिर भी ‘इम्पेरेटर’ की उपाधि को अपने नाम का स्थायी अंग बनाकर सेना, विदेश नीति, प्रांतों के प्रशासन, वित्त, विधायी कार्यों तथा उच्च अधिकारियों की नियुक्तियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया। सीनेट और जनसभाएँ औपचारिक रूप से अस्तित्व में बनी रहीं, किंतु उनकी वास्तविक शक्ति निरंतर सीमित होती गई। इसके साथ ही उसने रोमन पंचांग के क्विंटिलिस महीने, जिसमें उसका जन्म हुआ था, का नाम बदलकर जूलियस (जुलाई) कर दिया और जूलियन पंचांग लागू किया। राज्य के सामान्य कार्य—न्याय, कानून, प्रशासन तथा सार्वजनिक निर्माण के निर्णय अब मुख्यतः सीज़र के हाथों में केंद्रित हो गए। इस प्रकार वह रोमन गणराज्य की पारंपरिक संस्थाओं की परवाह किए बिना अथवा उन्हें सीमित करते हुए शासन करने लगा। सार्वजनिक मामलों पर उसका बढ़ता नियंत्रण और अन्य नेताओं की भूमिका को सीमित करने की प्रवृत्ति ने राजनीतिक अभिजात वर्ग को उससे दूर कर दिया, जो अंततः उसके विरुद्ध षड्यंत्र का का कारण बना।
षड्यंत्र और सीज़र की हत्या (15 मार्च 44 ई. पू.)
सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण ही अंततः जूलियस सीज़र की हत्या का प्रमुख कारण बना। उसके हाथों में समस्त राजनीतिक और सैन्य शक्तियों के संकेंद्रण तथा आजीवन अधिनायक (डिक्टेटर पेर्पेतुओ) की उपाधि धारण करने से अनेक रोमन गणतंत्रवादियों को विश्वास हो गया कि सीज़र का स्वतंत्र गणराज्य को पुनर्स्थापित करने का कोई इरादा नहीं है। उनके लिए यह केवल रोमन गणराज्य के अंत का संकेत नहीं था, बल्कि गणतंत्रीय अभिजात वर्ग के पारंपरिक राजनीतिक प्रभुत्व के समाप्त होने का भी प्रतीक था।
जूलियस सीज़र की हत्या की योजना 45 ईसा पूर्व की गर्मियों में बननी प्रारंभ हुई। फ़रवरी 44 ईसा पूर्व तक गायस ट्रेबोनियस, डेसीमस ब्रूटस, मार्कस जूनियस ब्रूटस, गायस कैसियस लोंगिनस, सर्वियस सुल्पिसियस गाल्बा, लुसियस मिनुसियस बेसिलुस, लुसियस टिलियस सिम्बर तथा गायस सर्विलियस कास्का सहित लगभग साठ षड्यंत्रकारी इस योजना में शामिल हो चुके थे। उन्होंने सीज़र की बढ़ती निरंकुश शक्तियों को समाप्त करने और गणराज्य की पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से उसकी हत्या का निर्णय लिया।
15 मार्च 44 ईसा पूर्व (आइड्स ऑफ़ मार्च) को, जब जूलियस सीज़र पॉम्पे के रंगमंच परिसर में स्थित सीनेट भवन में सीनेट की बैठक में उपस्थित था, तब षड्यंत्रकारियों ने उस पर हमला कर उसकी हत्या कर दी। सीज़र की हत्या का उद्देश्य रोमन गणराज्य की पुरानी व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना था, किंतु इसके परिणामस्वरूप गणराज्य को स्थिरता नहीं मिली, बल्कि एक नए गृहयुद्ध का आरंभ हुआ। अंततः इसी राजनीतिक उथल-पुथल ने ऑक्टेवियन (ऑगस्टस) के उदय का मार्ग प्रशस्त किया और रोमन गणराज्य के स्थान पर रोमन साम्राज्य की स्थापना हुई।
सीज़र के संवैधानिक और प्रशासनिक सुधार
साम्राज्य का एकीकरण
जूलियस सीज़र का मानना था कि रोमन साम्राज्य के विभिन्न भाग केवल विजित प्रदेश नहीं, बल्कि रोम के अभिन्न अंग हैं। इसी विचार से प्रेरित होकर उसने गॉल (फ्रांस) और स्पेन के अनेक निवासियों को रोमन नागरिकता प्रदान की। इससे प्रांतीय जनता का रोम के प्रति लगाव बढ़ा और साम्राज्य की एकता मजबूत हुई। उसने उपनिवेशों के निवासियों तथा सामान्य वर्ग के लोगों को भी राजनीतिक अवसर प्रदान किए। इससे रोमन शासन पहले की अपेक्षा अधिक समावेशी बन गया और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को शासन में भागीदारी का अवसर मिला।
आर्थिक सुधार
आर्थिक क्षेत्र में सीज़र ने अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। उसने ग्रैक्की बंधुओं की भूमि-सुधार नीति को आगे बढ़ाते हुए सेवानिवृत्त सैनिकों और भूमिहीन गरीबों में भूमि का वितरण कराया। भूमि के पुनः कुछ बड़े भूस्वामियों के हाथों में केंद्रित होने से रोकने के लिए यह व्यवस्था की गई कि नई प्राप्त भूमि को बीस वर्षों तक बेचा नहीं जा सकेगा। ग्रामीण दासता को सीमित करने के लिए उसने नियम बनाया कि बड़े कृषि फार्मों में कम-से-कम एक-तिहाई श्रमिक स्वतंत्र नागरिक होने चाहिए। बेरोजगार नागरिकों को रोजगार देने के लिए उसने बड़े निर्माण कार्य प्रारंभ किए तथा अनेक उपनिवेशों में लोगों को बसाया। इस नीति से रोम की बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक कम हुई। सीज़र ने ऋणग्रस्त लोगों को राहत देने के लिए ब्याज दरों में कमी की और दिवालियापन संबंधी कानूनों में सुधार किए। उसने सुवर्ण-आधारित मुद्रा प्रणाली को पुनः व्यवस्थित किया, जिससे व्यापार और वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा मिला। उसके शासनकाल में रोमन कोषागार की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और आर्थिक व्यवस्था अधिक सुदृढ़ बन गई।
सामाजिक सुधार
जूलियस सीज़र रोम की घटती जनसंख्या को लेकर चिंतित था। इसलिए उसने बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई। तीन या अधिक बच्चों वाले परिवारों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की गईं। चिकित्सकों, शिक्षकों तथा अन्य उपयोगी वर्गों को रोमन नागरिकता देकर उसने समाज के विकास में योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित किया। किंतु जनसंख्या वृद्धि के लिए बनाए गए कुछ नियम अत्यधिक कठोर और विवादास्पद भी थे। निःसंतान महिलाओं पर कुछ सामाजिक प्रतिबंध लगाए गए। इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने इन सामाजिक कानूनों को सीज़र की कमजोर नीति बताया है।
धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान
जूलियस सीज़र स्वयं धार्मिक मामलों में उदार था, किंतु वह रोमन धार्मिक परंपराओं का सम्मान करता था। उसने अनेक मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया तथा धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान किया। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में जूलियन कैलेंडर का निर्माण था। मिस्र के खगोलज्ञान पर आधारित इस कैलेंडर का निर्माण यूनानी विद्वान सोसिजीनिस की सहायता से कराया गया। इसमें वर्ष की अवधि 365 दिन निर्धारित की गई तथा प्रत्येक चौथे वर्ष एक अतिरिक्त दिन जोड़ने की व्यवस्था की गई। यह कैलेंडर इतने वैज्ञानिक आधार पर बनाया गया था कि यूरोप में कई शताब्दियों तक प्रचलित रहा और बाद में ग्रेगोरियन कैलेंडर का आधार बना।
साहित्यिक रचनाएँ
जूलियस सीज़र अपने समय का श्रेष्ठ लैटिन गद्य-लेखक और वक्ता माना जाता था। सिसरो ने भी उसकी भाषण-कला और लेखन-शैली की प्रशंसा की थी। उसकी केवल युद्ध-वृत्तांत ही पूर्ण रूप से सुरक्षित है, जबकि उसकी अन्य रचनाएँ केवल प्राचीन लेखकों के उद्धरणों के माध्यम से ज्ञात होती हैं। उसकी लुप्त कृतियों में अपनी मौसी जूलिया के अंतिम संस्कार पर दिया गया भाषण तथा एंटीकाटो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिसमें उसने सिसरो द्वारा कैटो की प्रशंसा के उत्तर में उसकी आलोचना की थी। उसकी कविताओं का भी प्राचीन स्रोतों में उल्लेख मिलता है। उसकी सबसे प्रसिद्ध कृति ‘कॉमेंटारी दे बेलो गैलिको’ (गैलिक युद्ध पर टिप्पणियाँ) है, जिसे सामान्यतः ‘द गैलिक वॉर्स’ कहा जाता है। वह रोम में अलेक्जेंड्रिया के समान एक विशाल पुस्तकालय स्थापित करना चाहता था, किंतु उसकी असामयिक मृत्यु के कारण यह योजना पूरी न हो सकी।
जूलियस सीज़र का मूल्यांकन
जूलियस सीज़र कई गणना रोमन इतिहास ही नहीं, बल्कि विश्व इतिहास के महानतम व्यक्तियों में की जाती है। वह एक असाधारण सेनानायक, कुशल प्रशासक, प्रभावशाली वक्ता, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और प्रतिभाशाली लेखक था। उसकी सैन्य सफलताओं ने रोम की सीमाओं का अभूतपूर्व विस्तार किया तथा गॉल जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेशों को रोमन साम्राज्य का अंग बनाया। उसके प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों ने रोमन राज्य को नई दिशा प्रदान की। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों को एकीकृत करने का प्रयास किया और प्रांतीय जनता को भी रोमन व्यवस्था में सम्मिलित किया। इतिहासकार ई. एम. बर्न्स के अनुसार पश्चिमी यूरोप की भावी सभ्यता के विकास में सीज़र की विजयों का महत्त्वपूर्ण योगदान था।
फिर भी, जूलियस सीज़र पूर्णतः दोषरहित नहीं था। उसमें अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा और आत्मविश्वास था। वह अपने विरोधियों के इरादों को सही समय पर नहीं समझ सका और जिन लोगों पर उसने विश्वास किया, उन्हीं में से कुछ उसकी हत्या के षड्यंत्र में शामिल हो गए। इसके बावजूद उसकी उपलब्धियाँ इतनी महान थीं कि वह आज भी विश्व इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सेनानायकों और राष्ट्रनिर्माताओं में गिना जाता है।
राजनीतिक क्रांति तथा द्वितीय त्रिगुट की स्थापना
44 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र की हत्या रोमन इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण और दुखद घटनाओं में से एक थी। यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, बल्कि रोम की राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा झटका था। सीज़र ने गृहयुद्धों और अराजकता से ग्रस्त रोमन गणराज्य को स्थिर करने का प्रयास किया था। उसकी मृत्यु के बाद रोम पुनः संघर्ष, षड्यंत्र और गृहयुद्धों की आग में जलने लगा। अगले लगभग पंद्रह वर्षों तक राजनीतिक अस्थिरता बनी रही और अंततः सीज़र के अधूरे कार्यों को उसके उत्तराधिकारी ऑक्टेवियन (आगस्टस) ने पूरा किया।
जूलियस सीज़र की हत्या के पश्चात उसके प्रमुख सहयोगी मार्क एंटनी ने स्वयं को उसका राजनीतिक उत्तराधिकारी सिद्ध करने का प्रयास किया। सीज़र के अंतिम संस्कार के अवसर पर उसने अत्यंत भावनात्मक और प्रभावशाली भाषण दिया, जिससे रोमन जनता षड्यंत्रकारियों के विरुद्ध भड़क उठी। इसके बाद उसने सीज़र के निजी अभिलेखों तथा राजकोष पर अधिकार कर लिया और अपने समर्थकों को संगठित करना प्रारंभ किया।
ऑक्टेवियन का उदय
इसी समय रोम की राजनीति में एक नए व्यक्तित्व का उदय हुआ, जिसका नाम गायस ऑक्टेवियस थुरिनस (ऑगस्टस) था। उसका जन्म 23 सितंबर 63 ईसा पूर्व को रोम के एक प्रतिष्ठित अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन) परिवार में हुआ था। उसका पिता गायस ऑक्टेवियस एक सम्मानित रोमन अधिकारी था, जबकि उसकी माता एटिया जूलियस सीज़र की भतीजी थी। सीज़र ने उसकी प्रतिभा और राजनीतिक क्षमता से प्रभावित होकर उसे अपना दत्तक पुत्र तथा उत्तराधिकारी घोषित किया था। ऑक्टेवियन का पालन-पोषण सादगीपूर्ण वातावरण में हुआ था। उसे यूनानी और रोमन साहित्य, दर्शन तथा प्रशासन की उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त हुई थी। सीज़र स्वयं उसे अपने साथ स्पेन के अभियानों में ले जाता था और उसने शासन तथा युद्धकला का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया था।
44 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र की मृत्यु के समय ऑक्टेवियन इलीरिया के अपोलोनिया नगर में था। समाचार मिलते ही वह तुरंत रोम की ओर रवाना हुआ। प्रारंभ में उसने सीनेट और महान वक्ता सिसरो के सहयोग से मार्क एंटनी का विरोध किया। अप्रैल 43 ईसा पूर्व में फोरम गैलोरम और मुटिना के युद्ध में एंटनी को पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद ऑक्टेवियन ने रोम में अपनी स्थिति मजबूत की और 19 अगस्त 43 ईसा पूर्व को मात्र 19 वर्ष की आयु में कौंसल निर्वाचित हुआ। उसने सीज़र के हत्यारों के लिए घोषित क्षमादान समाप्त कर उन्हें राज्यद्रोही घोषित कर निर्वासन का दंड दिया।
द्वितीय त्रिगुट (सेकंड ट्रायम्विरेट)
कुछ समय बाद ऑक्टेवियन को यह अनुभव हुआ कि सीनेट और सिसरो उसे केवल एंटनी के विरुद्ध एक राजनीतिक साधन के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। इसलिए उसने अपनी नीति बदल दी और एंटनी से समझौता कर लिया। अक्टूबर 43 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन, मार्क एंटनी और लेपिडस ने मिलकर ‘द्वितीय त्रिगुट’ (सेकंड ट्रायम्विरेट) की स्थापना की। अपने राजनीतिक गठबंधन को स्थायी और मजबूत बनाने के लिए तीनों नेताओं ने पारिवारिक संबंधों का भी सहारा लिया। ऑक्टेवियन ने अपनी पूर्व सगाई समाप्त कर मार्क एंटनी की सौतेली पुत्री क्लाउडिया से सगाई की। इसी नीति के अंतर्गत ऑक्टेवियन ने अपने कौंसल पद से त्यागपत्र देकर यह पद एंटनी के विश्वस्त सहयोगी पब्लियस वेंटिडियस को सौंप दिया। तीनों नेताओं ने मिलकर रोम की सत्ता पर अधिकार कर लिया और अपने प्रोस्क्रिप्शन नामक कठोर राजनीतिक अभियान चलाकर विरोधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई प्रारंभ की। अनेक सीनेटरों और गणतंत्र समर्थकों की संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं तथा उन्हें मृत्युदंड दिया गया। इसी अभियान में महान वक्ता और राजनेता सिसरो भी मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ रोमन गणराज्य की पुरानी राजनीतिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।

फिलिप्पी का युद्ध
सीज़र की हत्या के प्रमुख षड्यंत्रकारी मार्कस जूनियस ब्रूटस और गायस कैसियस लोंगिनस पूर्वी प्रांतों में अपनी शक्ति संगठित कर रहे थे। उन्हें पराजित करने के लिए त्रिगुट की सेनाएँ 42 ईसा पूर्व में मैसिडोनिया पहुँचीं और फिलिप्पी के मैदान में हुए दो निर्णायक युद्धों में ट्रायम्विरों की सेनाओं ने निर्णायक विजय प्राप्त की। पराजय के बाद ब्रूटस और कैसियस ने आत्महत्या कर ली, जिससे सीज़र के हत्यारों का संगठित प्रतिरोध समाप्त हो गया और रोमन गणराज्य की पुनर्स्थापना की अंतिम आशा भी समाप्त हो गई।
रोमन प्रांतों का पुनर्विभाजन
फिलिप्पी की विजय के बाद त्रिगुट के सदस्यों ने रोमन साम्राज्य का विभाजन कर लिया। लेपिडस को अफ्रीका का शासन मिला, ऑक्टेवियन ने पश्चिमी प्रांतों का नियंत्रण संभाला और मार्क एंटनी ने मिस्र, यूनान तथा पूर्वी प्रांतों का शासन अपने हाथ में लिया। पूर्व में रहते हुए एंटनी की भेंट मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा सप्तम से हुई। शीघ्र ही दोनों के बीच प्रेम संबंध स्थापित हो गए। उसने क्लियोपेट्रा को अनेक प्रदेश उपहारस्वरूप प्रदान किए और लंबे समय तक सिकंदरिया में उसके साथ रहा।
लेपिडस का पतन
36 ईसा पूर्व में सेक्स्टस पॉम्पियस की पराजय के बाद रोमन राजनीति में शक्ति-संतुलन निर्णायक रूप से बदल गया। इस अवसर का लाभ उठाकर ट्रायम्विर मार्कस एमिलियस लेपिडस ने सिसिली पर अपना अधिकार स्थापित करने और स्वयं को उसका शासक घोषित करने का प्रयास किया। ऑक्टेवियन ने प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर राजनीतिक और कूटनीतिक उपाय का सहारा लिया तथा लेपिडस की सेना के अधिकारियों और सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया। परिणामस्वरूप अधिकांश सैनिकों ने लेपिडस का साथ छोड़ दिया और उसकी सैन्य तथा राजनीतिक शक्ति बिना किसी बड़े संघर्ष के समाप्त हो गई।
लेपिडस की शक्ति समाप्त होने के बाद ऑक्टेवियन ने उसे सक्रिय राजनीति से हटाकर आजीवन सार्वजनिक जीवन से दूर रहने के लिए विवश कर दिया। यद्यपि उससे सभी राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार छीन लिए गए, फिर भी उसे सम्मानपूर्वक ‘पोंटिफेक्स मैक्सिमस’ (सर्वोच्च धर्माध्यक्ष) के पद पर बने रहने दिया गया। इस प्रकार लेपिडस के पतन के साथ ही द्वितीय ट्रायम्विरेट व्यावहारिक रूप से दो शक्तिशाली नेताओं—ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के बीच सीमित होकर रह गया।
ऑक्टेवियन और एंटनी के बीच संघर्ष
प्रारंभ में ऑक्टेवियन और एंटनी के बीच संबंध सामान्य थे और ऑक्टेवियन ने अपनी बहन ऑक्टेविया माइनर का विवाह एंटनी से करा दिया था। किंतु जब एंटनी ने ऑक्टेविया को त्यागकर क्लियोपेट्रा से विवाह कर लिया और अपने बच्चों को पूर्वी प्रदेशों का उत्तराधिकारी घोषित किया, तब रोम में उसके प्रति विरोध बढ़ गया। रोमन जनता को लगा कि एंटनी रोम के हितों की अपेक्षा मिस्र और क्लियोपेट्रा के हितों को अधिक महत्त्व दे रहा है। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर ऑक्टेवियन ने स्वयं को रोमन परंपराओं का रक्षक और एंटनी को विदेशी प्रभाव का समर्थक सिद्ध किया। इतिहासकारों के अनुसार यह संघर्ष केवल दो व्यक्तियों का नहीं था, बल्कि पश्चिमी रोमन परंपराओं और पूर्वी राजतंत्रीय प्रभावों के बीच भी एक प्रकार का संघर्ष था।
अंततः 32 ईसा पूर्व में सीनेट ने क्लियोपेट्रा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यद्यपि औपचारिक रूप से यह युद्ध मिस्र की रानी के विरुद्ध था, जबकि वास्तव में यह ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के बीच निर्णायक संघर्ष की शुरुआत थी, जिसके परिणामस्वरूप 2 सितंबर 31 ईसा पूर्व को पश्चिमी यूनान के एक्टियम के निकट ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के बीच नौसैनिक युद्ध हुआ। एंटनी और क्लियोपेट्रा की संयुक्त सेना के पास विशाल नौसेना थी, किंतु ऑक्टेवियन के सेनापति एग्रीप्पा की कुशल रणनीति के सामने वे टिक नहीं सके। युद्ध में एंटनी की सेना पराजित हो गई और वह क्लियोपेट्रा के साथ मिस्र भाग गया। उसकी अधिकांश सेना ने ऑक्टेवियन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। एक्टियम की विजय के बाद ऑक्टेवियन ने युद्धस्थल के निकट ‘निकोपोलिस’ (विजय का नगर) नगर की स्थापना की, जो उसकी सैन्य सफलता और रोमन प्रभुत्व का स्थायी प्रतीक बन गया।
एंटनी और क्लियोपेट्रा का अंत
एक्टियम की पराजय के बाद एंटनी और क्लियोपेट्रा की स्थिति निराशाजनक हो गई थी। 30 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन ने अलेक्जेंड्रिया पर अधिकार कर लिया। पराजय के बाद मार्क एंटनी ने आत्महत्या कर ली और कुछ समय बाद क्लियोपेट्रा ने भी अपमान से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। ऑक्टेवियन के आदेश पर दोनों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया गया।
ऑक्टेवियन की विजय और नए युग का आरंभ
मिस्र पर अधिकार करने के बाद ऑक्टेवियन को अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई, जिससे उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ गई। उसने मिस्र को सीनेट के अधीन सामान्य प्रांत न बनाकर सीधे अपने नियंत्रण में रखा तथा अश्वारोही वर्ग के अधिकारी कॉर्नेलियस गैलस को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। मिस्र पर अधिकार के साथ ही हेलेनिस्टिक युग का अंत हो गया और संपूर्ण भूमध्यसागरीय विश्व पर रोम का प्रभुत्व स्थापित हो गया। 29 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन विजयी होकर रोम लौटा और इलिरिकम, यूनान तथा मिस्र की विजयों के उपलक्ष्य में तीन भव्य विजय-समारोह (ट्रायम्फ) मनाया। उसे इम्पेरेटर, प्रिंसेप्स (प्रथम नागरिक) तथा बाद में आगस्टस जैसी सम्मानसूचक उपाधियाँ प्रदान की गईं।
इस प्रकार लगभग पाँच शताब्दियों तक चले रोमन गणराज्य का अंत हो गया और रोमन साम्राज्य की औपचारिक स्थापना हुई। आगस्टस के नेतृत्व में रोम ने राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक संगठन और सांस्कृतिक उत्कर्ष के एक नए स्वर्णिम युग में प्रवेश किया।
साम्राज्य काल (27 ई.पू.–476 ई.
ऑगस्टस (63 ईसा पूर्व–14 ई.)
मुख्य लेख : सम्राट ऑगस्टस
रोमन इतिहास में ऑगस्टस (ऑक्टेवियन) का शासनकाल शांति, समृद्धि और राजनीतिक स्थिरता के युग के रूप में प्रसिद्ध है। वह रोमन साम्राज्य का संस्थापक और उसका प्रथम सम्राट था, जिसने 27 ईसा पूर्व से 14 ईस्वी तक रोमन सम्राट के रूप में शासन किया। उसका उदय आकस्मिक घटना नहीं था, बल्कि असाधारण राजनीतिक कौशल, सैन्य नेतृत्व, कूटनीतिक दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता का परिणाम था। 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र की हत्या के बाद रोम लंबे समय तक गृहयुद्ध और राजनीतिक संघर्ष में फँसा रहा। इसी परिस्थितियों में ऑक्टेवियन सीज़र के वैधानिक दत्तक पुत्र और उत्तराधिकारी के रूप में उभरा। उसने क्रमशः अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को पराजित कर गृहयुद्धों का अंत किया और रोम में एक स्थायी शासन-व्यवस्था की स्थापना की।
ऑक्टेवियन ने जूलियस सीज़र के अनुभव से यह समझ लिया था कि केवल प्रत्यक्ष निरंकुश शासन के आधार पर सत्ता को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। इसलिए उसने स्वयं को राजा घोषित करने के बजाय गणतांत्रिक संस्थाओं को औपचारिक रूप से बनाए रखा और वास्तविक सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली। 29 ईसा पूर्व में अपनी विजयों के बाद आयोजित विजय-समारोहों से उसकी सर्वोच्चता स्थापित हुई। 28 ईसा पूर्व में उसने अपने सहयोगी मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा के साथ सीनेट का पुनर्गठन किया। इसके बाद 27 ईसा पूर्व के प्रथम संवैधानिक समझौते में उसने प्रांतों और सेनाओं के एक बड़े हिस्से का अधिकार सीनेट को लौटाने का दिखावा किया। इसी अवसर पर सीनेट ने उसे ‘ऑगस्टस’ की सम्मानसूचक उपाधि प्रदान की। इस प्रकार प्रिंसिपेट की स्थापना हुई, जिसमें गणराज्य की संस्थाएँ बनी रहीं, किंतु वास्तविक राजनीतिक शक्ति ऑगस्टस के हाथों में केंद्रित हो गई।
प्रारंभिक वर्षों में ऑगस्टस नियमित रूप से कौंसल पद पर बना रहा। 23 ईसा पूर्व में उसने नियमित रूप से कौंसल बनने की परंपरा समाप्त कर दी, किंतु उसकी शक्ति कम नहीं हुई। उसे इम्पेरियम प्रोकॉन्सुलारे मायुस अर्थात् सर्वोच्च प्रांतीय सैन्य-प्रशासनिक अधिकार तथा आजीवन ट्रिब्यूनिशिया पोटेस्टास अर्थात् ट्रिब्यून की शक्ति प्राप्त हुई। इन अधिकारों के माध्यम से वह प्रांतों, सेनाओं और प्रशासन पर व्यापक नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहा। इस प्रकार उसने बिना राजा की उपाधि धारण किए ऐसी शासन-व्यवस्था स्थापित की, जिसमें सर्वोच्च सत्ता उसके हाथों में केंद्रित थी।
साम्राज्य-विस्तार और सीमाओं का सुदृढ़ीकरण
31 ईसा पूर्व में एक्टियम के युद्ध में विजय के बाद ऑगस्टस का प्रमुख उद्देश्य निरंतर विजय के बजाय साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित और सुव्यवस्थित करना था। उसके शासन में हिस्पानिया के शेष स्वतंत्र क्षेत्रों को रोमन सत्ता के अधीन किया गया तथा रेटिया, नोरिकम, पैनोनिया, इलीरिकम और मोएसिया जैसे क्षेत्रों में रोमन प्रभुत्व सुदृढ़ हुआ। पूर्व में उसने पार्थिया के साथ युद्ध के स्थान पर कूटनीति को प्राथमिकता दी। 20 ईसा पूर्व में पार्थिया से समझौते के माध्यम से कैरहे के युद्ध में खोए रोमन सैन्य ध्वज वापस प्राप्त किए गए। अर्मेनिया में भी रोमन प्रभाव स्थापित किया गया।
मध्य यूरोप में ऑगस्टस के सौतेले पुत्र ड्रूसस और टाइबेरियस ने जर्मनिक जनजातियों के विरुद्ध अभियान चलाए। ड्रूसस एल्बे नदी तक पहुँचने में सफल रहा, जबकि उसकी मृत्यु के बाद टाइबेरियस ने अभियानों को आगे बढ़ाया। कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत हुआ कि जर्मेनिया का बड़ा भाग रोमन नियंत्रण में आ जाएगा। किंतु 9 ईस्वी में ट्यूटोबर्ग वन के युद्ध में चेरुस्की नेता अर्मिनियस ने पब्लियस क्विंक्टिलियस वेरस के नेतृत्व वाली तीन रोमन लीजनों को पराजित कर नष्ट कर दिया। इस विनाशकारी पराजय के बाद ऑगस्टस ने जर्मेनिया में आगे विस्तार की नीति छोड़कर राइन नदी के पार स्थायी विजय के बजाय साम्राज्य की मौजूदा सीमाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
ऑगस्टस की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल साम्राज्य का विस्तार नहीं, बल्कि उसकी स्थिरता और प्रशासनिक सुदृढ़ता थी। उसके शासन में भूमध्यसागरीय विश्व का अधिकांश भाग रोमन प्रभुत्व के अधीन आ गया और लंबे गृहयुद्धों के बाद रोम में शांति स्थापित हुई। इसी स्थिरता को आगे चलकर पैक्स रोमाना के आधार के रूप में देखा गया। उत्तराधिकार की समस्या को भी ऑगस्टस ने सावधानीपूर्वक सुलझाया। एग्रीप्पा की मृत्यु के बाद उसने टाइबेरियस को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उसे व्यापक प्रशासनिक तथा सैन्य अधिकार प्रदान किए। इस प्रकार उसकी मृत्यु के बाद सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित हुआ। ऑगस्टस की शासन-व्यवस्था ने रोमन गणराज्य की पुरानी संस्थाओं को औपचारिक रूप से बनाए रखते हुए एक नई साम्राज्यवादी राजनीतिक व्यवस्था को जन्म दिया। इसी कारण उसका शासन रोमन इतिहास में गणराज्य से साम्राज्य में संक्रमण का निर्णायक चरण माना जाता है।
पैक्स रोमाना
ऑगस्टस की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल विशाल साम्राज्य का निर्माण नहीं थी, बल्कि उस साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करना भी थी। उसने गणराज्य की राजनीतिक परंपराओं और साम्राज्यवादी शासन के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया, जिसने रोम को दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता प्रदान की। प्रशासनिक सुधार, स्थायी सेना, सुव्यवस्थित कर व्यवस्था, प्रांतीय प्रशासन का पुनर्गठन तथा सीमाओं की सुरक्षा उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ थीं। ‘पैक्स रोमाना’ की स्थापना तथा अपनी प्रसिद्ध कृति ‘रेस गेस्टे डिवी ऑगस्टी’ के माध्यम से ऑगस्टस ने रोमन साम्राज्य की स्थायी राजनीतिक संरचना की नींव रखी। यही कारण है कि उसे रोमन साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक और इतिहास के महानतम सम्राटों में स्थान दिया जाता है। लगभग 41 वर्षों तक शासन करने के बाद 19 अगस्त 14 ईस्वी को दक्षिणी इटली के नोला नगर में 75 वर्ष की आयु में ऑगस्टस की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व उसने अपने जीवन की तुलना एक रंगमंच से करते हुए कहा था : ‘यदि मैंने अपना अभिनय अच्छी तरह किया है, तो जाते समय मेरे लिए तालियाँ बजाइए।’ उसकी मृत्यु के बाद सीनेट ने उसे देवता घोषित किया और उसका उत्तराधिकारी टाइबेरियस रोमन सम्राट की गद्दी पर बैठा।
ऑगस्टस के सुधार
ऑगस्टस का शासनकाल केवल सैन्य विजयों और साम्राज्य-विस्तार के कारण ही महत्त्वपूर्ण नहीं था, बल्कि उसके व्यापक प्रशासनिक, संवैधानिक, न्यायिक, आर्थिक और सैनिक सुधारों के कारण भी रोमन इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 27 ईसा पूर्व से 14 ईस्वी तक उसने ऐसी शासन-व्यवस्था विकसित की, जिसने दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता प्रदान की। गृहयुद्धों की समाप्ति के बाद उसका प्रमुख उद्देश्य रोमन राज्य को स्थायी शांति, सुव्यवस्था और प्रभावी प्रशासन देना था। उसके शासन में स्थापित स्थिरता ने आगे चलकर पैक्स रोमाना अर्थात् रोमन शांति के व्यापक युग की नींव रखी, जिसे सामान्यतः ऑगस्टस के शासन से लेकर दूसरी शताब्दी ईस्वी तक रोमन साम्राज्य की अपेक्षाकृत स्थिर अवस्था के रूप में देखा जाता है।
प्रशासनिक और नागरिक सुधार
ऑगस्टस द्वारा स्थापित शासन-व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप राजतंत्रीय था, किंतु उसका बाहरी ढाँचा गणतांत्रिक बना रहा। वह जानता था कि रोमन समाज, विशेषकर सीनेटर वर्ग, गणतांत्रिक परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान रखता था। इसलिए उसने स्वयं को राजा घोषित करने अथवा गणतंत्र की संस्थाओं को समाप्त करने के बजाय उन्हें औपचारिक रूप से बनाए रखा। इसी व्यवस्था को आगे चलकर प्रिंसिपेट कहा गया। ऑगस्टस स्वयं को प्रिंसेप्स अर्थात् ‘प्रथम नागरिक’ के रूप में प्रस्तुत करता था, जबकि वास्तविक राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक शक्ति उसके हाथों में केंद्रित थी। उसने सीनेट का प्रत्यक्ष उन्मूलन करने के बजाय उसके संगठन और प्रतिष्ठा में सुधार किया। उसने सीनेट की सदस्य-संख्या और संरचना की समीक्षा की तथा अयोग्य सदस्यों को हटाकर योग्य और प्रभावशाली व्यक्तियों को सम्मिलित किया। सीनेट को प्रशासन तथा प्रांतीय शासन में कुछ महत्त्वपूर्ण अधिकार प्राप्त रहे, किंतु सेना, विदेश नीति और साम्राज्य के प्रमुख राजनीतिक निर्णयों पर अंतिम प्रभाव ऑगस्टस का ही था।
प्रांतीय प्रशासन में भी व्यापक पुनर्गठन किया गया। प्रांतों को मुख्यतः सीनेटीय प्रांतों और सम्राटीय प्रांतों में विभाजित किया गया। शांत और अपेक्षाकृत सुरक्षित प्रांत सीनेट के अधीन रखे गए, जिनका प्रशासन सीनेट द्वारा नियुक्त प्रोकौंसल करते थे। इसके विपरीत, सीमावर्ती और सैन्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्रांतों को सम्राट के नियंत्रण में रखा गया। वहाँ सम्राट के प्रतिनिधि, सामान्यतः ‘लेगेटी ऑगुस्ती’ प्रशासन तथा सेना का संचालन करते थे। इस व्यवस्था से सैन्य शक्ति पर सम्राट का प्रत्यक्ष नियंत्रण सुनिश्चित हुआ और सीमाओं की सुरक्षा अधिक प्रभावी बनी।
ऑगस्टस ने प्रांतीय अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले शोषण और भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का भी प्रयास किया। अधिकारियों की नियुक्ति, उनके कार्यों की निगरानी तथा प्रांतीय प्रशासन में उत्तरदायित्व की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित किया गया। साथ ही, उसने सम्राट को प्रशासनिक विषयों पर सलाह देने के लिए कौंसिलियम प्रिंसिपिस जैसी परामर्शदात्री व्यवस्था विकसित की। इसमें प्रमुख सीनेटरों और अनुभवी अधिकारियों को सम्मिलित किया जाता था। धीरे-धीरे सम्राट के अधीन एक अधिक व्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र विकसित हुआ, जिसमें अश्वारोही वर्ग, मुक्तदासों और प्रशिक्षित कर्मचारियों का भी उपयोग किया गया।
रोम नगर के प्रशासन में भी ऑगस्टस ने महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। नगर को चौदह प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया तथा कानून-व्यवस्था, खाद्यान्न आपूर्ति, अग्निशमन और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए विशिष्ट अधिकारियों और संस्थाओं की व्यवस्था की गई। प्रीफेक्टस उरबी नगर की शांति और कानून-व्यवस्था के लिए उत्तरदायी था, जबकि प्रीफेक्टस अन्नोने खाद्यान्न आपूर्ति का निरीक्षण करता था। विजिलेस अग्निशमन और रात्रिकालीन सुरक्षा का कार्य करते थे। इसके अतिरिक्त, प्रेटोरियन गार्ड सम्राट की सुरक्षा तथा राजधानी की सैन्य सुरक्षा का प्रमुख अंग बन गया। इन व्यवस्थाओं से रोम का शहरी प्रशासन पहले की अपेक्षा अधिक संगठित हुआ।
न्यायिक सुधार
ऑगस्टस ने न्यायिक व्यवस्था को भी अधिक सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया। उसने न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार किया तथा न्यायालयों के कार्यों और अधिकार-क्षेत्र को अधिक स्पष्ट बनाया। विभिन्न प्रकार के दीवानी और फौजदारी मामलों के लिए न्यायिक संस्थाओं को व्यवस्थित किया गया और न्यायाधीशों तथा जूरी सदस्यों के चयन में नियमों को अधिक स्पष्ट किया गया। सम्राट के पास सर्वोच्च न्यायिक अधिकार भी विकसित हुआ, जिसके कारण कुछ महत्त्वपूर्ण मामलों में अंतिम अपील उसके समक्ष की जा सकती थी।
इन सुधारों का उद्देश्य केवल न्यायिक व्यवस्था को केंद्रीकृत करना नहीं था, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में अनुशासन और प्रशासनिक उत्तरदायित्व स्थापित करना भी था। प्रांतीय अधिकारियों द्वारा अत्याचार या भ्रष्टाचार किए जाने की स्थिति में उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती थी। इस प्रकार न्यायिक व्यवस्था पर सम्राट का प्रभाव बढ़ा और साम्राज्य में विधि तथा प्रशासन के बीच अधिक समन्वय स्थापित हुआ।
सैनिक सुधार
ऑगस्टस के सुधारों में सैनिक पुनर्गठन का विशेष महत्त्व था। गणराज्य के अंतिम चरण में सेनाएँ प्रायः अपने सेनापतियों के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा रखती थीं, जिसके कारण सेना राजनीतिक संघर्षों में हस्तक्षेप करने लगी थी। ऑगस्टस ने इस समस्या को समाप्त कर सेना को एक स्थायी और नियमित संस्था में बदलने का प्रयास किया। उसने गृहयुद्धों के बाद सेना का पुनर्गठन किया और लगभग 28 लीजनों को स्थायी सैन्य ढाँचे में संगठित किया। लीजनरी सैनिक रोमन नागरिक होते थे और उन्हें नियमित वेतन तथा निश्चित सेवा-शर्तें प्रदान की जाती थीं। सेवा पूर्ण होने पर सैनिकों को आर्थिक पुरस्कार अथवा भूमि प्रदान करने की व्यवस्था विकसित की गई। इसके अतिरिक्त, प्रांतीय क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ऑक्सिलिया अर्थात् सहायक सैनिकों की भर्ती की जाती थी। ये सैनिक सेना की विभिन्न शाखाओं में सेवा करते थे और निर्धारित सेवा अवधि पूरी करने के बाद उन्हें रोमन नागरिकता प्राप्त हो सकती थी।
सम्राट की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए प्रेटोरियन गार्ड को व्यवस्थित किया गया। रोम की आंतरिक सुरक्षा के लिए अर्बन कोहोर्ट्स तथा अग्निशमन और रात्रिकालीन सुरक्षा के लिए विजिलेस नियुक्त किए गए। इस प्रकार सैन्य व्यवस्था केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजधानी और सम्राट की सुरक्षा का भी महत्त्वपूर्ण साधन बन गई। सैनिकों के वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों को व्यवस्थित करने के लिए 6 ईस्वी में एरारियम मिलिटारे अर्थात् सैन्य कोष की स्थापना की गई। इससे सैनिकों की सेवा-समाप्ति पर मिलने वाले लाभों के लिए स्थायी वित्तीय आधार उपलब्ध हुआ। परिणामस्वरूप सेना अधिक नियमित, अनुशासित और सम्राट के प्रति निष्ठावान बनी।
इस प्रकार ऑगस्टस के प्रशासनिक, न्यायिक और सैनिक सुधारों ने रोमन राज्य को गृहयुद्धों से उबरकर एक संगठित साम्राज्य में परिवर्तित किया। उसने गणतांत्रिक संस्थाओं को समाप्त किए बिना उनके ऊपर सम्राट की सर्वोच्च सत्ता स्थापित की, प्रांतीय प्रशासन को व्यवस्थित किया, न्यायिक नियंत्रण को सुदृढ़ किया और सेना को व्यक्तिगत सेनापतियों के प्रभाव से निकालकर स्थायी साम्राज्यवादी संस्था का रूप दिया। यही सुधार आगे चलकर रोमन साम्राज्य की दीर्घकालीन स्थिरता और पैक्स रोमाना की आधारशिला बने।
नौसैनिक सुधार
ऑगस्टस ने स्थलसेना के पुनर्गठन के साथ-साथ रोमन नौसेना को भी स्थायी और संगठित स्वरूप प्रदान किया। गृहयुद्धों के दौरान विकसित नौसैनिक शक्ति को उसने नियमित साम्राज्यिक व्यवस्था में शामिल किया और भूमध्यसागर की सुरक्षा को राज्य की प्राथमिकताओं में रखा। उसके शासनकाल में स्थायी नौसैनिक बेड़ों का संगठन किया गया, जिनके प्रमुख अड्डे मिसेनुम और रवेन्ना में स्थापित किए गए। इन बेड़ों के अतिरिक्त साम्राज्य की आवश्यकताओं के अनुसार अन्य समुद्री तथा नदीय क्षेत्रों में भी नौसैनिक टुकड़ियाँ तैनात की जाती थीं। नौसेना का प्रमुख उद्देश्य भूमध्यसागर में रोमन प्रभुत्व बनाए रखना, समुद्री डकैती को नियंत्रित करना, तटवर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा करना तथा सेना और आवश्यक सामग्री के आवागमन को सुगम बनाना था। सुरक्षित समुद्री मार्गों ने मिस्र, एशिया माइनर, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न प्रांतों के बीच व्यापार को बढ़ावा दिया। इस प्रकार नौसैनिक शक्ति केवल सैन्य सुरक्षा का साधन नहीं रही, बल्कि साम्राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक एकता का भी महत्त्वपूर्ण आधार सिद्ध हुई।
प्रेटोरियन गार्ड
ऑगस्टस ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा और राजधानी की राजनीतिक-सैन्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए प्रेटोरियन गार्ड को स्थायी रूप दिया। यह संस्था गणतंत्र के अंतिम चरण में विभिन्न सेनापतियों के साथ कार्य करने वाली प्रेटोरियन कोहोर्टों की परंपरा से विकसित हुई थी। ऑगस्टस ने इसे पुनर्गठित कर अपने नियंत्रण में रखा और इसकी कुछ इकाइयों को रोम के आसपास स्थायी रूप से तैनात किया। प्रेटोरियन गार्ड का प्राथमिक दायित्व सम्राट की सुरक्षा और राजधानी की रक्षा था। इसके सैनिकों को सामान्य लीजनरी सैनिकों की तुलना में अधिक वेतन और विशेष सुविधाएँ प्राप्त होती थीं। बाद के साम्राज्यकाल में यह सेना अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक संस्था बन गई और कई बार सम्राटों के उत्तराधिकार तथा सत्ता-संघर्षों में निर्णायक भूमिका निभाई। यद्यपि ऑगस्टस के समय इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षा था, इसकी स्थापना ने सम्राट और राजधानी के बीच एक स्थायी सैन्य संबंध को मजबूत किया।
आर्थिक सुधार
ऑगस्टस समझता था कि राजनीतिक स्थिरता के लिए मजबूत वित्तीय व्यवस्था आवश्यक है। इसलिए उसने गृहयुद्धों से प्रभावित राजकोष को व्यवस्थित किया और कर-संग्रह तथा सार्वजनिक वित्त के संचालन में सुधार किए। साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों से प्राप्त राजस्व को नियमित करने के लिए जनगणना और संपत्ति के आकलन की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया गया। इससे कर निर्धारण अपेक्षाकृत व्यवस्थित हुआ और राज्य को नियमित आय प्राप्त होने लगी।
प्रांतीय करों में भूमिकर तथा अन्य प्रत्यक्ष कर महत्त्वपूर्ण थे। इसके अतिरिक्त बिक्री, दासों की बिक्री, दास-मुक्ति, नीलामी और उत्तराधिकार आदि पर विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष कर लगाए जाते थे। ऑगस्टस ने कर-वसूली में निजी ठेकेदारों की मनमानी को नियंत्रित करने तथा प्रांतीय जनता के शोषण को कम करने का प्रयास किया। हालाँकि निजी कर-ठेकेदारों की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, फिर भी कई क्षेत्रों में राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण और नियमित प्रशासन की भूमिका बढ़ी।
राज्य की वित्तीय व्यवस्था में ‘एरारियम’ (सार्वजनिक राजकोष) महत्त्वपूर्ण था, जबकि सम्राट के नियंत्रण में आने वाले राजस्व के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था विकसित हुई। 6 ईस्वी में ऑगस्टस ने ‘एरारियम मिलिटारे’ (सैन्य कोष) की स्थापना की। इसका उद्देश्य सैनिकों की सेवा-समाप्ति पर उन्हें आर्थिक लाभ प्रदान करने के लिए स्थायी वित्तीय आधार तैयार करना था। ऑगस्टस ने स्वयं इस कोष में बड़ी धनराशि का योगदान दिया। इससे सैनिकों के वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों की व्यवस्था अधिक स्थिर हुई तथा सेना पर राज्य का वित्तीय नियंत्रण मजबूत हुआ।
ऑगस्टस के शासन में सड़कों, बंदरगाहों और संचार व्यवस्था के विकास पर भी ध्यान दिया गया। भूमध्यसागर पर रोमन नियंत्रण तथा समुद्री डकैती में कमी के कारण व्यापारिक गतिविधियों को अपेक्षाकृत सुरक्षित वातावरण मिला। कृषि उत्पादन और प्रांतीय व्यापार के विस्तार से साम्राज्य की आर्थिक एकता मजबूत हुई। फिर भी यह ध्यान रखना चाहिए कि ऑगस्टस की आर्थिक नीति आधुनिक अर्थ में केंद्रीकृत आर्थिक नियोजन नहीं थी; उसका मुख्य उद्देश्य राज्य के राजस्व, सेना और प्रशासन के लिए स्थिर वित्तीय आधार तैयार करना था।
सामाजिक और नैतिक सुधार
ऑगस्टस ने सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी हस्तक्षेप किया। उसके अनुसार लंबे गृहयुद्धों और विलासिता के प्रसार ने पारंपरिक रोमन परिवार तथा नागरिक नैतिकता को कमजोर किया था। विवाह में विलंब, संतानहीनता और व्यभिचार जैसी प्रवृत्तियों को वह रोमन समाज की जनसांख्यिकीय और नैतिक कमजोरी से जोड़ता था। इसलिए उसने विवाह, संतानोत्पत्ति और पारिवारिक जीवन को प्रोत्साहित करने के लिए कई कानून बनाए।
18 ईसा पूर्व के लेक्स जूलिया तथा बाद में 9 ईस्वी के लेक्स पापिया पोप्पैया ने विवाह और संतानोत्पत्ति को प्रोत्साहित करने तथा अविवाहित और संतानहीन व्यक्तियों पर कुछ कानूनी प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। अधिक संतान वाले परिवारों को कुछ विशेषाधिकार दिए गए, जबकि अविवाहित अथवा संतानहीन व्यक्तियों के उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों पर सीमाएँ लगाई गईं। व्यभिचार को भी सार्वजनिक अपराध के रूप में विनियमित किया गया और उसके लिए कानूनी दंड निर्धारित किए गए।
ऑगस्टस ने विलासिता और अत्यधिक अपव्यय पर नियंत्रण के लिए भी कानून बनाए। इनका उद्देश्य रोमन अभिजात वर्ग के जीवन में संयम तथा पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना था। साथ ही, दास-मुक्ति की प्रक्रिया पर भी कानूनी नियंत्रण स्थापित किया गया, जिससे नागरिकता और सामाजिक स्थिति से संबंधित व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित किया जा सके।
इस प्रकार ऑगस्टस के नौसैनिक, आर्थिक और सामाजिक सुधारों का व्यापक उद्देश्य साम्राज्य को केवल सैन्य शक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि स्थिर वित्त, सुरक्षित संचार, संगठित प्रशासन, नियंत्रित सामाजिक व्यवस्था और मजबूत राज्य-संस्थाओं के आधार पर सुदृढ़ बनाना था। इन सुधारों ने उसके शासन को दीर्घकालीन स्थायित्व प्रदान किया और रोमन साम्राज्य की संस्थागत संरचना को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
धार्मिक सुधार
ऑगस्टस का मानना था कि लंबे गृहयुद्धों और राजनीतिक अस्थिरता के पीछे पारंपरिक रोमन धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों का क्षय भी एक कारण था। इसलिए उसने रोमन राज्य के प्राचीन धार्मिक संस्कारों, अनुष्ठानों और संस्थाओं के पुनरुद्धार को अपनी शासन-नीति का महत्त्वपूर्ण अंग बनाया। उसका उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था को पुनर्जीवित करना नहीं था, बल्कि धर्म के माध्यम से सामाजिक अनुशासन, पारंपरिक मूल्यों और राज्य के प्रति निष्ठा को भी मजबूत करना था। ऑगस्टस ने अनेक प्राचीन मंदिरों का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कराया तथा उपेक्षित धार्मिक अनुष्ठानों और उत्सवों को पुनः सक्रिय किया। उसने पुरोहित पदों को व्यवस्थित किया और स्वयं अनेक महत्त्वपूर्ण धार्मिक संस्थाओं से जुड़ा रहा। 12 ईसा पूर्व में मार्कस एमिलियस लेपिडस की मृत्यु के बाद ऑगस्टस पोंटिफ़ेक्स मैक्सिमस अर्थात् रोमन धर्म का सर्वोच्च पुरोहित बना। इससे उसके राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व का समन्वय और अधिक मजबूत हुआ। उसने पारंपरिक रोमन देवताओं की पूजा तथा राज्य-समर्थित धार्मिक अनुष्ठानों को प्रोत्साहित किया। साथ ही, अपने दत्तक पिता जूलियस सीज़र की मृत्यु के बाद विकसित उसकी दिव्य प्रतिष्ठा को भी राजनीतिक वैधता के साधन के रूप में उपयोग किया। इस प्रकार धर्म ऑगस्टस की शासन-व्यवस्था में केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं रहा, बल्कि राज्य, समाज और सम्राट की वैधता से जुड़ा महत्त्वपूर्ण तत्व बन गया।
सांस्कृतिक एवं साहित्यिक उत्थान
ऑगस्टस का शासनकाल रोमन साहित्य और संस्कृति के उत्कर्ष का भी युग था। उसने कवियों, इतिहासकारों, विद्वानों और कलाकारों को संरक्षण दिया। उसके समय में वर्जिल, होरेस, लिवी और अन्य साहित्यकारों ने ऐसी रचनाएँ कीं, जिनका रोमन संस्कृति पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा। वर्जिल ने एनीड की रचना की, जिसमें रोम की उत्पत्ति और उसके गौरव को महाकाव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। लिवी ने रोम के इतिहास का विस्तृत वर्णन किया। इस साहित्यिक गतिविधि ने ऑगस्टस के शासन को रोमन अतीत, परंपरा और राष्ट्रीय गौरव से जोड़ने में सहायता की।
ऑगस्टस ने सार्वजनिक मनोरंजन और भव्य आयोजनों को भी प्रोत्साहित किया। ग्लैडिएटर प्रतियोगिताएँ, नाट्य प्रदर्शन और विदेशी पशुओं के सार्वजनिक प्रदर्शन जैसे आयोजन रोम की जनता के लिए आकर्षण का प्रमुख साधन थे। 2 ईसा पूर्व में आयोजित नौमाकिया ऑगस्टी में कृत्रिम जलाशय में नौसैनिक युद्ध का प्रदर्शन कराया गया। ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थे; वे सम्राट की शक्ति, संपन्नता और सैन्य गौरव को प्रदर्शित करने का माध्यम भी थे।
वास्तुकला और सार्वजनिक निर्माण
ऑगस्टस ने रोम के भौतिक स्वरूप को बदलने के लिए व्यापक निर्माण कार्यक्रम चलाया। उसका उद्देश्य राजधानी को अधिक भव्य, सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाना था। सड़कों, पुलों, जलापूर्ति प्रणालियों, मंदिरों, मंचों और अन्य सार्वजनिक भवनों का निर्माण तथा पुनर्निर्माण कराया गया। प्रमुख मार्गों के सुधार से सैनिकों, व्यापारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के आवागमन में सुविधा हुई। बंदरगाहों और परिवहन व्यवस्था के विकास से साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक संपर्क भी मजबूत हुआ।
रोम के निर्माण कार्यों में ‘आरा पैसिस’ (शांति की वेदी) विशेष महत्त्व रखती है। यह ऑगस्टस की शांति और समृद्धि की नीति का प्रतीक बन गई। ऑगस्टस का फ़ोरम और उसमें स्थित मार्स अल्टोर का मंदिर भी उसकी स्थापत्य नीति और राजनीतिक विचारधारा के प्रमुख उदाहरण थे। उसने अपने दत्तक पिता जूलियस सीज़र द्वारा आरंभ की गई कुछ निर्माण परियोजनाओं को पूरा कराया तथा अनेक पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया।
रोम की जलापूर्ति और नागरिक सुविधाओं के विकास में उसके सहयोगी मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। एग्रीप्पा ने जलसेतुओं, जलाशयों और सार्वजनिक स्नानागारों के निर्माण तथा रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया। इससे राजधानी में स्वच्छ जल की उपलब्धता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं में सुधार हुआ।
ऑगस्टस के निर्माण कार्यक्रम का सबसे प्रसिद्ध वर्णन उसके ‘रेस गेस्टे’ में मिलता है, जहाँ उसने अपने शासन के दौरान रोम में किए गए व्यापक निर्माण कार्यों पर गर्व व्यक्त किया। बाद की परंपरा में उसके कथन को इस रूप में प्रसिद्ध किया गया कि उसने ‘ईंटों का रोम पाया और संगमरमर का रोम छोड़ा।’ यद्यपि यह कथन उसके निर्माण कार्यक्रम का शाब्दिक विवरण नहीं, बल्कि उसके शासनकाल में हुए भौतिक और स्थापत्य परिवर्तन का प्रतीकात्मक वर्णन है।
इस प्रकार ऑगस्टस के धार्मिक पुनरुद्धार, साहित्यिक संरक्षण और व्यापक सार्वजनिक निर्माण कार्यक्रमों ने उसके शासन को केवल राजनीतिक और सैन्य उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा। उसने रोम की धार्मिक परंपराओं को पुनर्जीवित किया, साहित्य और कला को संरक्षण दिया तथा राजधानी के स्थापत्य और नागरिक ढाँचे को व्यापक रूप से विकसित किया। इन प्रयासों ने उसकी सत्ता को वैचारिक वैधता प्रदान की और रोमन समाज में शांति, व्यवस्था तथा साम्राज्य के गौरव की एक नई छवि स्थापित की।
ऑगस्टस का सांस्कृतिक चित्रण
ऑगस्टस का व्यक्तित्व प्राचीन साहित्य, मूर्तिकला, स्थापत्य और सिक्कों में एक आदर्श रोमन शासक के रूप में चित्रित किया गया है। रोमन लेखक सुएटोनियस ने अपनी कृति ‘द ट्वेल्व सीज़र्स’ में उसके जीवन, व्यक्तित्व और शारीरिक स्वरूप का विस्तृत वर्णन किया है। दूसरी ओर, ऑगस्टस की आधिकारिक प्रतिमाओं में उसे सामान्यतः सदैव युवा, ऊर्जावान, विजयी और आदर्श शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्राइमा पोर्टा के ऑगस्टस, आरा पैसिस के शिल्प तथा वाया लैबिकाना के ऑगस्टस की प्रतिमा इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इन कलाकृतियों में रोमन परंपरा के साथ हेलेनिस्टिक कला की आदर्शवादी शैली का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
ऑगस्टस ने कला और मूर्तिकला को केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता और राजकीय विचारधारा के प्रसार का माध्यम बनाया। उसकी प्रतिमाएँ, स्मारक और सिक्के पूरे साम्राज्य में उसकी सत्ता, सैन्य विजय, धार्मिक भूमिका और शांति-स्थापना का संदेश प्रसारित करते थे। सिक्कों पर उसकी छवि और विभिन्न उपाधियों का प्रयोग उसके शासन की वैधता को मजबूत करता था। बाद के सम्राटों ने भी स्वयं को ऑगस्टस की राजनीतिक परंपरा का उत्तराधिकारी सिद्ध करने के लिए उसकी छवि और उपाधियों का अनुकरण किया।
ऑगस्टस की सांस्कृतिक छवि का प्रभाव प्राचीन काल तक सीमित नहीं रहा। मध्ययुगीन और पुनर्जागरणकालीन यूरोप में भी उसे रोमन शांति और सुव्यवस्थित शासन के प्रतीक के रूप में देखा गया। बाद के यूरोपीय कलाकारों ने उसे रोमन साम्राज्य की महिमा तथा ईसाई परंपरा के साथ भी जोड़ा। इस प्रकार ऑगस्टस की छवि ने विभिन्न ऐतिहासिक कालों में नए अर्थ ग्रहण करते हुए अपनी सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखी।
ऑगस्टस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
ऑगस्टस का ऐतिहासिक महत्त्व केवल इस तथ्य में नहीं है कि वह रोमन साम्राज्य का प्रथम सम्राट था, बल्कि इस बात में भी है कि उसने लंबे गृहयुद्धों से जर्जर रोमन राज्य को एक स्थिर और संगठित साम्राज्य में परिवर्तित किया। उसने गणतांत्रिक संस्थाओं को औपचारिक रूप से बनाए रखते हुए प्रिंसिपेट की स्थापना की और इस प्रकार राजसत्ता को गणतांत्रिक परंपराओं के साथ समन्वित किया। उसके प्रशासनिक, प्रांतीय, सैनिक और वित्तीय सुधारों ने साम्राज्य की संस्थागत संरचना को मजबूत किया। उसकी स्थायी सेना, प्रांतीय प्रशासन, कर-व्यवस्था, न्यायिक सुधार तथा सार्वजनिक निर्माणों ने शासन को अधिक प्रभावी बनाया। इसके साथ ही धार्मिक पुनरुत्थान, सामाजिक कानूनों और साहित्य तथा कला के संरक्षण ने उसके शासन को व्यापक सांस्कृतिक आधार प्रदान किया। उसके शासन से उत्पन्न स्थिरता ने आगे चलकर पैक्स रोमाना के दीर्घकालीन युग की नींव रखी।
फिर भी, टैसिटस ने ऑगस्टस के उदय को गणराज्य की स्वतंत्रता के क्रमिक ह्रास से जोड़ते हुए उसके शासन के निरंकुश पक्ष पर प्रकाश डाला है, जबकि कैसियस डियो ने उसकी व्यावहारिकता और प्रशासनिक क्षमता को अधिक महत्त्व दिया है। आधुनिक इतिहासकारों में भी मतभेद है। रोनाल्ड साइम ने उसे अत्यंत कुशल और महत्त्वाकांक्षी राजनीतिज्ञ बताया है, जिसने राजनीतिक प्रचार और संवैधानिक साधनों के माध्यम से व्यक्तिगत सत्ता को संस्थागत रूप दिया। इसके विपरीत, एड्रियन गोल्ड्सवर्थी और अन्य आधुनिक विद्वान उसकी प्रशासनिक दूरदर्शिता, सैन्य संगठन और दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता को उसकी प्रमुख उपलब्धि मानते हैं। उसके शासन का एक विरोधाभासी पक्ष सांस्कृतिक संरक्षण और राजनीतिक नियंत्रण का सह-अस्तित्व था। उसने वर्जिल और होरेस जैसे कवियों को संरक्षण दिया तथा साहित्यिक संस्कृति को प्रोत्साहित किया, किंतु ओविड का निर्वासन यह भी दर्शाता है कि सम्राट की नैतिक और राजनीतिक नीतियों से टकराने वाले व्यक्तियों के लिए सीमाएँ मौजूद थीं।
अतः ऑगस्टस को न तो केवल निरंकुश शासक और न ही पूर्णतः आदर्श सम्राट के रूप में समझना उचित है। वह एक व्यावहारिक, दूरदर्शी और अत्यंत कुशल राजनीतिज्ञ था, जिसने सैन्य शक्ति, राजनीतिक वैधता, धार्मिक परंपरा और प्रशासनिक सुधारों का संयोजन करके रोमन राज्य को नई दिशा दी। उसकी शासन-व्यवस्था ने रोमन साम्राज्य की दीर्घकालीन स्थिरता की आधारशिला रखी और प्राचीन विश्व के इतिहास में गणराज्य से साम्राज्य की ओर संक्रमण को स्थायी रूप प्रदान किया। इसी कारण ऑगस्टस विश्व इतिहास के सबसे प्रभावशाली शासकों में गिना जाता है।
टाइबेरियस (14–37 ई.)
मुख्य लेख : टाइबेरियस
14 ईस्वी में ऑगस्टस की मृत्यु के बाद उसका दत्तक पुत्र टाइबेरियस (14–37 ई.) जूलियस सीज़र ऑगस्टस रोमन साम्राज्य का दूसरा सम्राट बना। वह जूलियो–क्लाडियन वंश का सदस्य था और ऑगस्टस की पत्नी लिविया का पूर्व विवाह से उत्पन्न पुत्र था। ऑगस्टस ने लंबे राजनीतिक अनुभव और उत्तराधिकार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया तथा अंततः उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित किया। टाइबेरियस लगभग 55 वर्ष की आयु में सत्ता में आया। वह अनुभवी सेनानायक, कुशल प्रशासक और व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था तथा यूनानी और लैटिन साहित्य एवं दर्शन में भी उसकी रुचि थी।
सत्ता ग्रहण करने के बाद टाइबेरियस ने ऑगस्टस की स्थापित शासन-व्यवस्था को बनाए रखा। प्राचीन स्रोतों में उसके प्रारंभिक व्यवहार से यह संकेत मिलता है कि वह सम्राट के रूप में अत्यधिक व्यक्तिगत सत्ता का प्रदर्शन करने से बचना चाहता था और सीनेट की भूमिका को औपचारिक सम्मान देता था। उसने स्वयं को अत्यधिक आडंबरपूर्ण उपाधियों से विभूषित कराने में विशेष रुचि नहीं दिखाई। किंतु व्यवहार में वह प्रिंसिपेट की केंद्रीय सत्ता को बनाए रखने के लिए बाध्य था, क्योंकि साम्राज्य की प्रशासनिक और सैन्य संरचना अब सम्राट के नेतृत्व पर निर्भर हो चुकी थी।
प्रशासन और वित्तीय नीति
टाइबेरियस के शासन के प्रारंभिक वर्षों में प्रशासनिक स्थिरता और वित्तीय अनुशासन दिखाई देता है। उसने अनावश्यक सार्वजनिक खर्च को नियंत्रित किया और राज्य के राजस्व तथा व्यय पर विशेष ध्यान दिया। उसकी वित्तीय नीति का उद्देश्य राजकोष को मजबूत रखना था। उसने नए और व्यापक कर लगाने के बजाय उपलब्ध राजस्व के प्रभावी उपयोग तथा प्रशासनिक खर्चों पर नियंत्रण को प्राथमिकता दी। इसके परिणामस्वरूप उसके शासनकाल के अधिकांश समय में राज्य की वित्तीय स्थिति मजबूत बनी रही। टाइबेरियस ने ऑगस्टस की अपेक्षा अपेक्षाकृत सावधान विदेश नीति अपनाई। वह अनावश्यक विजय-अभियानों के बजाय साम्राज्य की मौजूदा सीमाओं की सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिरता को अधिक महत्त्व देता था। इस नीति ने रोम को लंबे और महँगे युद्धों से बचाए रखा।
जर्मेनिकस और पूर्वी नीति
टाइबेरियस के शासनकाल की प्रारंभिक प्रमुख सैन्य घटनाओं में उसके भतीजे और दत्तक पुत्र जर्मेनिकस के जर्मेनिया अभियानों का विशेष स्थान है। 14–16 ईस्वी के बीच जर्मेनिकस ने राइन के पार कई सैन्य अभियान चलाकर ट्यूटोबर्ग वन की पराजय के बाद खोई हुई रोमन प्रतिष्ठा को कुछ हद तक पुनर्स्थापित किया। किंतु टाइबेरियस ने जर्मेनिकस को आगे व्यापक विजय अभियान चलाने के बजाय पूर्वी प्रांतों में भेज दिया, जहाँ वह रोमन हितों के लिए कार्य करने लगा।
19 ईस्वी में एंटिओक में जर्मेनिकस की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के कारणों को लेकर प्राचीन काल से ही संदेह और आरोप रहे हैं। कुछ लोगों ने टाइबेरियस के प्रतिनिधि ग्नीयस कैलपुर्नियस पिसो पर जर्मेनिकस को विष देने का आरोप लगाया। यद्यपि टाइबेरियस द्वारा जर्मेनिकस की हत्या करवाने का कोई निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, उसकी मृत्यु ने सम्राट की लोकप्रियता को प्रभावित किया। जर्मेनिकस की पत्नी एग्रीपिना वरिष्ठ और उसके समर्थकों के साथ टाइबेरियस के संबंध भी तनावपूर्ण हो गए।
सेजानस का उदय
टाइबेरियस के शासन के उत्तरार्ध में प्रेटोरियन गार्ड का प्रमुख लूसियस एलियस सेजानस अत्यंत प्रभावशाली हो गया। टाइबेरियस ने 26 ईस्वी के आसपास कैप्री में स्थायी निवास कर लिया और शासन के अनेक कार्य सेजानस तथा अन्य अधिकारियों के माध्यम से संचालित होने लगे। सेजानस ने इस स्थिति का लाभ उठाकर अपने राजनीतिक विरोधियों को हटाना शुरू किया और सत्ता पर अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया।
टाइबेरियस ने देशद्रोह से संबंधित लेक्स माईएस्टाटिस के प्रावधानों का कठोर प्रयोग किया। इसके अंतर्गत सम्राट अथवा राज्य के विरुद्ध माने जाने वाले कार्यों पर मुकदमे चलाए जा सकते थे। समय के साथ इन कानूनों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध होने लगा और भय का वातावरण उत्पन्न हुआ।
31 ईस्वी में टाइबेरियस को सेजानस की महत्त्वाकांक्षा और षड्यंत्रों का पता चला। उसने सीनेट के माध्यम से सेजानस को गिरफ्तार कराया और उसी वर्ष उसे मृत्युदंड दे दिया गया। इसके बाद उसके समर्थकों तथा सहयोगियों के विरुद्ध भी कार्रवाई हुई। इस घटना ने टाइबेरियस के शासन को और अधिक संदेहपूर्ण तथा दमनकारी स्वरूप प्रदान किया।
टाइबेरियस की मृत्यु और मूल्यांकन
जीवन के अंतिम वर्षों में टाइबेरियस ने कैप्री में अपेक्षाकृत एकांत जीवन बिताया, किंतु वह साम्राज्य के प्रशासन पर नियंत्रण बनाए रहा। 37 ईस्वी में मिसेनम के निकट उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद कैलिगुला सम्राट बना।
टाइबेरियस सैन्य दृष्टि से अनुभवी, प्रशासनिक रूप से सक्षम और वित्तीय अनुशासन के लिए प्रसिद्ध शासक था। उसने अनावश्यक विस्तार के बजाय साम्राज्य की सुरक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता दी। दूसरी ओर, उसके शासन के उत्तरार्ध में देशद्रोह के मुकदमों, राजनीतिक दमन और सेजानस के प्रभाव ने उसकी प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसलिए टाइबेरियस को न तो केवल अत्याचारी शासक और न ही आदर्श प्रशासक के रूप में देखा जा सकता है। वह एक सावधान, सक्षम किंतु अत्यधिक संदेहशील सम्राट था, जिसके शासन ने ऑगस्टस द्वारा स्थापित प्रिंसिपेट को आगे बढ़ाया और जूलियो–क्लाडियन साम्राज्य की संस्थागत निरंतरता बनाए रखी।
कैलिगुला (37–41 ई.)
मुख्य लेख : कैलिगुला
टाइबेरियस ने 35 ईस्वी में अपनी वसीयत में गायस सीजर तथा अपने पौत्र टाइबेरियस जेमेल्लुस को संयुक्त उत्तराधिकारी घोषित किया था। उसकी मृत्यु के बाद गायस जूलियस सीज़र जर्मैनिकस, जो इतिहास में ‘कैलिगुला’ के नाम से प्रसिद्ध है, ने प्रारंभ में अपने सह-उत्तराधिकारी टाइबेरियस जेमेल्लुस का समर्थन किया, किंतु शीघ्र ही उसकी हत्या करवाकर संपूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार 37 ईस्वी में वह रोम का एकमात्र शासक बन गया। कैलिगुला का बचपन सैनिक शिविरों में बीता था। उसका पिता जर्मेनिकस एक प्रसिद्ध सेनानायक था और वह अपनी माता एग्रीपिना के साथ अनेक सैन्य अभियानों में गया था। बाल्यावस्था में वह सैनिकों की वेशभूषा पहनता था तथा छोटे सैनिक-जूते धारण करता था। इन्हीं जूतों को लैटिन भाषा में ‘कैलिगे’ कहा जाता था, जिससे उसे ‘कैलिगुला’ (छोटे जूते वाला) उपनाम मिला।
सिंहासन पर बैठने के बाद कैलिगुला ने घोषणा की कि वह ऑगस्टस की नीतियों का अनुसरण करेगा तथा सीनेट के साथ मिलकर शासन चलाएगा। प्रारंभिक दिनों में उसने उदारता और लोकप्रियता का परिचय दिया। उसने जनता को धन वितरित किया, निर्वासित व्यक्तियों को वापस बुलाया, कुछ करों में कमी की तथा अधिकारियों के चयन में जनता की भूमिका बढ़ाई। उसके इन कार्यों से रोमवासियों को लगा कि ऑगस्टस के स्वर्णयुग की पुनः स्थापना होने वाली है। किंतु कुछ ही समय बाद उसका व्यवहार बदलने लगा। एक गंभीर बीमारी के बाद उसके स्वभाव में असाधारण परिवर्तन आ गया। वह अत्यंत निरंकुश, घमंडी और स्वेच्छाचारी हो गया। उसने सीनेटरों को अपने चरण चूमने का आदेश दिया तथा स्वयं को देवता घोषित कर अपनी पूजा करवानी शुरू कर दी। यह व्यवहार रोमन परंपराओं के विरुद्ध था और इससे जनता तथा अभिजात वर्ग दोनों में असंतोष फैलने लगा।
प्राचीन रोमन लेखकों के अनुसार कैलिगुला का निजी जीवन भी अत्यंत विवादास्पद था। उस पर विलासिता, व्यभिचार और पारिवारिक मर्यादाओं के उल्लंघन के आरोप लगाए गए। यद्यपि इन विवरणों में कुछ अतिशयोक्ति है, फिर भी इतना स्पष्ट है कि उसका आचरण रोमन समाज के आदर्शों के अनुरूप नहीं था। उसने अनेक विवाह किए और व्यक्तिगत सुख-विलास में अत्यधिक धन खर्च किया। कैलिगुला की अपव्ययी नीतियों का प्रभाव शीघ्र ही राजकोष पर पड़ने लगा। उसने भव्य निर्माण कार्यों, उत्सवों और विलासपूर्ण जीवन पर भारी धनराशि व्यय की। कहा जाता है कि उसने बैए की खाड़ी पर जहाजों को जोड़कर एक विशाल अस्थायी पुल बनवाया। ऐसे अनेक कार्यों में अत्यधिक खर्च किया, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। राजकोष की पूर्ति के लिए उसने नए कर लगाए और विभिन्न प्रकार के शुल्कों में वृद्धि की, जिससे जनता में असंतोष और बढ़ गया।
यद्यपि उसने व्यापार को प्रोत्साहन देने तथा कुछ योग्य व्यक्तियों को सीनेट में स्थान देने जैसे कार्य भी किए, किंतु उसकी निरंकुशता और विलासप्रियता ने इन उपलब्धियों को ढक दिया। धीरे-धीरे सेना, सीनेट और जनता—तीनों वर्ग उससे असंतुष्ट हो गए। अंततः 41 ईस्वी में प्रेटोरियन गार्ड के कुछ अधिकारियों ने उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा, जिसका नेतृत्व कैसियस कैरेआ नामक अधिकारी ने किया। अंततः जब वह डिवस ऑगस्टस के सम्मान में आयोजित उतसव के दौरान कैलिगुला की हत्या कर दी गई। इसके बाद उसकी पत्नी कैसोनिया और अल्पायु पुत्री जूलिया ड्रूसिला की भी हत्या कर दी गई, किंतु हत्यारे कैलिगुला के चाचा क्लॉडियस तक नहीं पहुँच सके। प्रारंभ में लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि सम्राट वास्तव में मारा गया है, क्योंकि वे इसे किसी राजनीतिक चाल का हिस्सा समझ रहे थे। किंतु सत्य स्पष्ट होने पर रोमवासियों ने राहत की सांस ली।
टाइबेरियस क्लॉडियस (41–54 ई.)
मुख्य लेख : क्लॉडियस
कैलिगुला की मृत्यु के बाद रोम में उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हो गया। राजकोष लगभग खाली था और राजनीतिक स्थिति अस्थिर थी। ऐसे समय में प्रेटोरियन गार्ड ने क्लॉडियस को सम्राट घोषित किया तथा बाद में सीनेट ने भी इसकी पुष्टि कर दी। इस प्रकार 41 ईस्वी में क्लॉडियस रोम का नया सम्राट बना। क्लॉडियस ऑक्टाविया और मार्क एंटोनी का पौत्र, जर्मेनिकस का भाई तथा ड्रूसस और एंटोनिया का पुत्र था। सत्ता ग्रहण के समय उसकी आयु लगभग पचास वर्ष थी। वह शारीरिक रूप से दुर्बल और अस्वस्थ था, किंतु बौद्धिक दृष्टि से अत्यंत प्रतिभाशाली था। उसे इतिहास, कानून, दर्शन तथा भाषाओं का गहरा ज्ञान था। उसने एट्रूरिया, कार्थेज और रोम के इतिहास पर ग्रंथ भी लिखे थे।
क्लॉडियस ने शासन संभालते ही प्रशासनिक सुधारों पर विशेष ध्यान दिया। उसने सीनेट का सम्मान बनाए रखा, किंतु वास्तविक प्रशासनिक शक्ति अपने हाथों में रखी। शासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसने एक संगठित नौकरशाही और सलाहकार परिषद की स्थापना की। योग्य अधिकारियों की नियुक्ति कर उसने प्रशासन को अधिक व्यवस्थित और सक्षम बनाया। उसने सार्वजनिक निर्माण कार्यों को भी प्रोत्साहित किया। नई नहरें और जल-प्रणालियाँ बनवाईं, पुरानी जलापूर्ति योजनाओं की मरम्मत करवाई तथा यातायात और सिंचाई की सुविधाओं में सुधार किया। भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की गई और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाई गई। इन सुधारों से साम्राज्य की व्यवस्था मजबूत हुई। क्लॉडियस ने नागरिकता संबंधी नियमों में भी उदारता दिखाई। उसने गॉल के अनेक निवासियों को रोमन नागरिकता प्रदान की तथा प्रांतीय लोगों को शासन में भागीदारी का अवसर दिया। इससे रोमन साम्राज्य की एकता को बल मिला। सीमाओं की सुरक्षा पर भी उसने विशेष ध्यान दिया और कई आश्रित प्रदेशों को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया।
क्लॉडियस की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि 43 ईस्वी में ब्रिटेन (ब्रिटानिया) की विजय थी। रोमन सेनाओं ने सफल अभियान चलाकर दक्षिणी ब्रिटेन पर अधिकार स्थापित किया। यह रोमन इतिहास की महत्त्वपूर्ण विजय थी। बाद में उसने पराजित ब्रिटिश नेता कैराटाकस को क्षमा भी कर दिया, जो उसकी उदारता का परिचायक था।
यद्यपि क्लॉडियस का राजनीतिक जीवन सफल रहा, उसका पारिवारिक जीवन अत्यंत दुखद था। उसकी तीसरी पत्नी वैलेरिया मेसालिना अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी और चरित्रहीन थी। उसने क्लॉडियस की अनुपस्थिति में एक रोमन कुलीन गायस सिलियस से विवाह कर लिया और सत्ता हथियाने का षड्यंत्र रचा। इस षड्यंत्र का भंडाफोड़ होने पर उसे मृत्युदंड दे दिया गया।
मेसालिना की मृत्यु के बाद क्लॉडियस ने अपनी भतीजी कनिष्ठ एग्रीपिना से विवाह किया। यह विवाह उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। एग्रीपिना अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थी। उसने अपने पुत्र लूसियस डोमिटियस एहेनोबार्बस (नीरो) को उत्तराधिकारी घोषित करवाया और उसका विवाह क्लॉडियस की पुत्री ऑक्टाविया से करा दिया। धीरे-धीरे उसने अपने पुत्र के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त कर लिया। अंततः 54 ईस्वी में एग्रीपिना ने कथित रूप से विष मिले मशरूम खिलाकर क्लॉडियस की हत्या करवा दी। उसकी मृत्यु के साथ ही एक सक्षम और सुधारवादी शासक का अंत हो गया। क्लॉडियस ने प्रशासनिक सुधारों, सार्वजनिक निर्माण कार्यों और ब्रिटेन विजय के माध्यम से रोमन साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया, इसलिए उसे रोमन इतिहास के महत्त्वपूर्ण और सफल सम्राटों में गिना जाता है।
नीरो (54–68 ई.)
मुख्य लेख : नीरो
क्लॉडियस की मृत्यु के बाद उसका दत्तक पुत्र लूसियस डोमिटियस एहेनोबर्बस, जो इतिहास में नीरो के नाम से प्रसिद्ध है, 54 ईस्वी में रोमन साम्राज्य का शासक बना। वह जूलियो-क्लाडियन वंश का अंतिम शासक था। उसकी शिक्षा प्रसिद्ध स्टोइक दार्शनिक सेनेका तथा विद्वान कैरेमोन के संरक्षण में हुई थी। कैरेमोन ने उसे यूनानी संस्कृति और भाषा का ज्ञान दिया, जबकि सेनेका ने साहित्य, दर्शन और नैतिकता की शिक्षा प्रदान की। शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसकी माता एग्रीपिना, दार्शनिक सेनेका तथा प्रेटोरियन गार्ड के प्रमुख बुरुस उसके प्रमुख सलाहकार थे। उनके मार्गदर्शन में नीरो ने प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों को अपनाया तथा साम्राज्य में सुशासन स्थापित करने का प्रयास किया। शासन के आरंभिक वर्षों में नीरो ने अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ किया, योग्य प्रांतीय अधिकारियों की नियुक्ति की तथा सीमाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। उसके शासनकाल में काला सागर के समुद्री डाकुओं का प्रभाव कम हुआ और व्यापारिक मार्ग अधिक सुरक्षित बने। 55 ईस्वी में उसने सेनापति ग्नेयस डोमिटियस कॉर्बुलो को पार्थिया की समस्या के समाधान हेतु भेजा। कॉर्बुलो ने सफल सैन्य अभियान चलाकर आर्मेनिया पर पुनः रोमन प्रभाव स्थापित किया तथा पार्थिया के साथ दीर्घकालीन शांति सुनिश्चित की। इस अवधि में प्रशासनिक भ्रष्टाचार में कमी आई, नौकरशाही अधिक व्यवस्थित हुई और राज्य की वित्तीय स्थिति मजबूत बनी।
नीरो के शासन की प्रारंभिक सफलता का एक प्रमुख कारण सेनेका की नीतियाँ थीं। उसके परामर्श पर कई अप्रत्यक्ष करों को समाप्त किया गया, जिससे व्यापार और वाणिज्य को प्रोत्साहन मिला। साम्राज्य के विभिन्न भागों में वस्तुओं का आवागमन सरल हुआ और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि हुई। राजकोष का संचालन भी सावधानी और मितव्ययिता के साथ किया जाने लगा। इन सुधारों के कारण रोमन जनता ने प्रारंभ में नीरो को एक योग्य और लोकप्रिय शासक के रूप में स्वीकार किया। किंतु समय के साथ नीरो के व्यक्तित्व में परिवर्तन आने लगा। वह विलासिता, मनोरंजन और व्यक्तिगत सुखों में अधिक रुचि लेने लगा। उसने अपने सौतेले भाई ब्रिटानिकस की हत्या करवा दी और धीरे-धीरे अपने राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने लगा। उसने अपनी पत्नी ऑक्टाविया का परित्याग कर पहले क्लॉडिया अक्टे और बाद में अपने मित्र ओथो की पत्नी पोप्पैया साबीना से संबंध स्थापित किए। इन घटनाओं के कारण राजपरिवार में संघर्ष बढ़ गया। जब उसकी माता एग्रीपिना ने इन संबंधों का विरोध किया, तो उसकी भी हत्या कर दी गई। 62 ईस्वी में नीरो ने ऑक्टाविया को तलाक देकर पोप्पैया से विवाह कर लिया और शीघ्र ही ऑक्टाविया की भी हत्या करवा दी गई। धीरे-धीरे नीरो ने स्वयं को असाधारण और लगभग दैवीय व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया। उसने अपने विशाल महलों और स्मारकों के निर्माण पर अत्यधिक धन व्यय किया। कला, संगीत और नाट्यकला में उसकी विशेष रुचि थी। वह स्वयं को महान कलाकार मानता था और सार्वजनिक रूप से संगीत तथा अभिनय प्रस्तुत करता था। रोम में उसने अपने सम्मान में एक विशाल प्रतिमा स्थापित करवाई, जो उसकी बढ़ती हुई आत्ममुग्धता का प्रतीक थी।
नीरो के शासनकाल की सबसे प्रसिद्ध घटना 64 ईस्वी की रोम का भीषण अग्निकांड है। 18 जुलाई 64 ईस्वी को सर्कस मैक्सिमस क्षेत्र में भीषण आग लग गई और नौ दिनों तक नगर आग की चपेट में रहा। रोम का लगभग दो-तिहाई भाग नष्ट हो गया। अनेक भवन, मंदिर, पुस्तकालय और अमूल्य कलाकृतियाँ जलकर नष्ट हो गईं तथा हजारों लोग बेघर हो गए। बाद की परंपराओं में यह कथा प्रसिद्ध हुई कि ‘जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंशी बजा रहा था’, किंतु आधुनिक इतिहासकार इस कथन को प्रमाणित नहीं मानते हैं। वास्तव में, नीरो ने उदारतापूर्वक राहत कार्यों का आयोजन किया, बेघर लोगों के लिए सार्वजनिक भवनों को खोल दिया और पड़ोसी क्षेत्रों से खाद्यान्न मँगवाकर सहायता पहुँचाई। अग्निकांड के बाद नीरो ने रोम के पुनर्निर्माण का कार्यक्रम प्रारंभ किया। नई सड़कों का निर्माण कराया गया, भवन निर्माण के लिए बेहतर नियम बनाए गए और नगर की योजना को अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया। इसी काल में उसने अपना प्रसिद्ध ‘स्वर्ण महल’ (डोमुस ऑरिया) बनवाया। यद्यपि इन निर्माण कार्यों से रोम को नया स्वरूप मिला, किंतु उन पर होने वाले भारी व्यय के कारण जनता और अभिजात वर्ग में असंतोष भी बढ़ने लगा।
रोमन राजनेता गायस कैलपुर्नियस पिसो ने अनेक प्रतिष्ठित रोमन नागरिकों, सीनेटरों, बुद्धिजीवियों के सहयोग से नीरो के विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा, जो ‘पिसोनियन षड्यंत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है। टैसिटस के अनुसार षड्यंत्रकारी रोमन गणतंत्र की पुनर्स्थापना करना चाहते थे। किंतु इस षड्यंत्र का भंडाफोड़ हो गया, जिसके परिणामस्वरूप षड्यंत्रकारियों को दंडित किया गया या आत्महत्या करने के लिए विवश किया गया। इस घटना के बाद नीरो और अधिक संदेही तथा क्रूर हो गया। उसके शासन में भय और दमन का वातावरण फैलने लगा। इसके पश्चात नीरो यूनान गया और वहाँ विभिन्न सांस्कृतिक तथा खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया। उसने स्वयं को कलाकार और विजेता के रूप में प्रस्तुत किया तथा यूनानी नगरों को अनेक विशेषाधिकार प्रदान किए। उसने एथेंस, स्पार्टा और अन्य यूनानी नगरों को कर-मुक्त करने की घोषणा भी की। किंतु उसकी अनुपस्थिति में साम्राज्य के अनेक भागों में असंतोष बढ़ता गया और प्रांतीय गवर्नरों का विश्वास उससे उठने लगा।
67–68 ईस्वी तक स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई। स्पेन में सर्वियस सुल्पिसियस गाल्बा तथा गॉल में जूलियस विंडेक्स ने नीरो के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अनेक प्रांतों और सेनाओं ने उनका समर्थन किया। यद्यपि विंडेक्स पराजित हो गया, किंतु उसके विद्रोह ने नीरो के पतन का मार्ग प्रशस्त किया। अंततः रोमन सीनेट ने नीरो को ‘राज्य का शत्रु’ घोषित कर गाल्बा को नया सम्राट स्वीकार कर लिया। संकट की इस घड़ी में नीरो को अपने मित्रों और अधिकारियों का भी समर्थन नहीं मिला। स्वयं को पूर्णतः असहाय पाकर अंततः उसने जून 68 ईस्वी में आत्महत्या कर ली। नीरो की मृत्यु के साथ ही ऑगस्टस द्वारा स्थापित जूलियो-क्लाडियन वंश का अंत हो गया और साम्राज्य राजनीतिक अस्थिरता तथा गृहयुद्ध की स्थिति में पहुँच गया।
इतिहास में नीरो का व्यक्तित्व अत्यंत विवादास्पद रहा है। उसके शासन के प्रारंभिक वर्ष सुशासन, आर्थिक सुधार और प्रशासनिक दक्षता के लिए स्मरणीय हैं, जबकि बाद के वर्ष निरंकुशता, विलासिता, पारिवारिक हत्याओं और राजनीतिक दमन के कारण कुख्यात हैं। इस प्रकार नीरो का शासन रोमन इतिहास में उत्थान और पतन की अद्भुत कहानी है।
त्रिशासकों का काल (69 ई.)
नीरो की मृत्यु के बाद रोमन साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का दौर आरंभ हो गया। 68 से 69 ईस्वी के बीच सत्ता के लिए संघर्ष इतना तीव्र हो गया कि एक ही वर्ष में तीन सम्राटों का उत्थान और पतन हुआ। इसी कारण इस अवधि को रोमन इतिहास में ‘त्रिशासकों का काल’ (तीन सम्राटों का वर्ष) कहा जाता है। यह काल रोमन साम्राज्य में सैन्य शक्ति की बढ़ती भूमिका तथा राजसत्ता की अस्थिरता का स्पष्ट प्रमाण था। नीरो के बाद सर्वियस सुल्पिसियस गाल्बा जून 68 ईस्वी में रोम का सम्राट बना। वह एक अनुभवी सेनानायक और प्रशासक था, किंतु उसकी कठोर आर्थिक नीति जनता तथा सेना दोनों को अप्रिय लगी। उसने नीरो द्वारा सैनिकों और अधिकारियों को दिए गए उपहारों तथा पुरस्कारों को वापस लेने का प्रयास किया और राजकोष को सुदृढ़ करने के लिए कठोर कदम उठाए। इससे उसके विरुद्ध व्यापक असंतोष फैल गया, जिसके परिणामस्वरूप केवल कुछ महीनों के शासन के बाद जनवरी 69 ईस्वी में उसकी हत्या कर दी गई।
गल्बा की हत्या के पश्चात् मार्कस साल्वियस ओथो जनवरी 69 ईस्वी में सम्राट बना। ओथो ने प्रेटोरियन गार्ड के समर्थन से सत्ता प्राप्त की थी और सीनेट ने भी उसे सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया। किंतु उसी समय जर्मनी की सेनाओं ने अपने सेनानायक औलुस विटेलियस को सम्राट घोषित कर दिया। विटेलियस की सेना इटली की ओर बढ़ी और निर्णायक संघर्ष में ओथो की सेना पराजित हो गई। गृहयुद्ध को आगे बढ़ाने के स्थान पर अप्रैल 69 ईस्वी में ओथो ने आत्महत्या कर ली। इस प्रकार उसका शासन लगभग तीन महीने ही चल सका।
ओथो की मृत्यु के बाद औलुस विटेलियस रोम का सम्राट बना। वह सैनिकों का प्रिय था, किंतु प्रशासनिक दृष्टि से प्रभावी शासक सिद्ध नहीं हुआ। उसने शासन का अधिकांश कार्य अपने सहयोगियों पर छोड़ दिया और राज्य की समस्याओं पर उचित ध्यान नहीं दिया। इसी समय पूर्वी प्रांतों में तैनात रोमन सेनाओं ने अपने सेनापति वेस्पासियन को सम्राट घोषित कर दिया। वेस्पासियन के समर्थक सेनानायक मार्कस एंटोनियस प्राइमस ने इटली पर आक्रमण किया और क्रेमोना के युद्ध में विटेलियस की सेनाओं को पराजित कर दिया। इसके बाद रोम पर अधिकार कर लिया गया और दिसंबर 69 ईस्वी में विटेलियस की हत्या कर दी गई। इस प्रकार एक ही वर्ष में गल्बा, ओथो और विटेलियस—तीनों सम्राटों का अंत हो गया। इस राजनीतिक उथल-पुथल ने स्पष्ट कर दिया कि अब रोमन साम्राज्य में सम्राट का चयन केवल सीनेट नहीं, बल्कि सेना की शक्ति भी निर्धारित करती है। अंततः वेस्पासियन के सत्ता ग्रहण के साथ साम्राज्य में स्थिरता लौटी और एक नए राजवंश की स्थापना हुई।
फ्लेवियन काल
मुख्य लेख : फ्लेवियन काल
टाइटस फ्लेवियस वेस्पासियन (69–79 ई.)
मुख्य लेख : टाइटस फ्लेवियस वेस्पासियन
69 ईस्वी में वेस्पासियन के सत्ता ग्रहण के साथ रोम में फ्लेवियन वंश की स्थापना हुई। वह रोमन अभिजात वर्ग से संबंधित नहीं था। फिर भी, अपनी योग्यता, सैन्य सफलता और प्रशासनिक दक्षता के बल पर उसने साम्राज्य की सर्वोच्च सत्ता प्राप्त की। सत्ता ग्रहण करते समय वेस्पासियनके सामने सबसे बड़ी चुनौती गृहयुद्ध से उत्पन्न अव्यवस्था को समाप्त करना और सम्राट की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना था। उसने सबसे पहले कानून और व्यवस्था को सुदृढ़ किया, सीनेट के साथ सहयोगपूर्ण संबंध स्थापित किया और साम्राज्य में शांति एवं स्थिरता कायम की। नीरो तथा उसके बाद के संघर्षों के दौरान दंडित किए गए अनेक लोगों को उसने क्षमादान देकर मुक्त कर दिया। सेना का पुनर्गठन किया गया और प्रेटोरियन गार्ड की शक्ति को सीमित किया गया ताकि भविष्य में वे राजनीतिक हस्तक्षेप न कर सकें।
वेस्पासियन ने प्रशासनिक क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने इटली और पश्चिमी प्रांतों के अनेक प्रतिष्ठित परिवारों को रोमन अभिजात वर्ग में स्थान दिया तथा शासन में प्रांतों के योग्य व्यक्तियों को अवसर प्रदान किया। इससे साम्राज्य के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों की भागीदारी बढ़ी और प्रशासन अधिक व्यापक तथा प्रभावी हो गया। उसने शासन को केवल रोमन कुलीनों तक सीमित न रखकर साम्राज्य के विभिन्न वर्गों के लिए खोल दिया। आर्थिक क्षेत्र में वेस्पासियन ने विशेष ध्यान दिया। गृहयुद्धों और पूर्ववर्ती शासकों की अपव्ययी नीतियों के कारण राजकोष लगभग खाली हो चुका था। उसने राजस्व बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के कर लगाए तथा प्रांतों से कर-संग्रह को व्यवस्थित किया। यूनान सहित कई क्षेत्रों को पुनः कर व्यवस्था के अंतर्गत लाया गया। सार्वजनिक भूमि को पट्टे पर दिया गया और राज्य की आय बढ़ाने के लिए अनेक उपाय किए गए। यहाँ तक कि सार्वजनिक मूत्रालयों के उपयोग पर भी कर लगाया गया। इसी प्रसंग से उसका प्रसिद्ध कथन जुड़ा है कि ‘धन की कोई दुर्गंध नहीं होती।’
वेस्पासियन शिक्षा और संस्कृति का भी संरक्षक था। उसने पहली बार राज्य द्वारा शिक्षकों को वेतन देने की व्यवस्था की। यूनानी और लैटिन साहित्य के विद्वानों को सरकारी सहायता प्रदान की गई तथा दीर्घ सेवा के बाद उन्हें पेंशन देने की व्यवस्था की गई। इससे शिक्षा और बौद्धिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला। सार्वजनिक निर्माण कार्यों में भी वेस्पासियन का योगदान उल्लेखनीय था। उसने अनेक प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और नए भवनों का निर्माण करवाया। शांति की देवी के सम्मान में पैक्स मंदिर का निर्माण कराया। उसने नीरो के भव्य ‘स्वर्ण महल’ के बड़े भाग को हटवाकर उसके स्थान पर जनता के उपयोग हेतु विशाल सार्वजनिक भवनों और मनोरंजन स्थलों का निर्माण कराया। बाद में इसी क्षेत्र में प्रसिद्ध फ्लेवियन एम्फीथिएटर (कोलोसियम) का निर्माण आरंभ हुआ, जो उसके पुत्र टाइटस (79–81 ई.) के शासनकाल में पूरा हुआ।
विदेश नीति और साम्राज्य विस्तार के क्षेत्र में भी वेस्पासियन सफल रहा। उसने अपने पुत्र टाइटस को यहूदिया के विद्रोह के दमन का दायित्व सौंपा। टाइटस ने 70 ईस्वी में यरूशलेम पर अधिकार कर विद्रोह का अंत कर दिया। साम्राज्य की पूर्वी सीमाओं को सुरक्षित किया गया और एशिया माइनर के कई क्षेत्रों को सीधे रोमन प्रशासन के अधीन लाया गया। ब्रिटेन में भी रोमन प्रभाव को सुदृढ़ किया गया। इस प्रकार वेस्पासियन का शासन रोमन इतिहास में पुनर्निर्माण, स्थिरता और व्यावहारिक प्रशासन के लिए प्रसिद्ध है। उसने गृहयुद्ध से जर्जर साम्राज्य को पुनः संगठित किया, आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया और शांति स्थापित की। 79 ईस्वी में 69 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।
टाइटस (79- 81 ई.)
मुख्य लेख : टाइटस
वेस्पासियन के बाद उसका पुत्र टाइटस 79 ईस्वी में रोमन सम्राट बना। वह अपनी उदारता, विनम्रता और जनकल्याणकारी कार्यों के कारण अत्यंत लोकप्रिय था। उसने 70 ईस्वी में यरूशलेम पर अधिकार कर नगर तथा यहूदी मंदिर को नष्ट कर दिया, जिसकी स्मृति में बाद में रोम में ‘टाइटस का मेहराब’ बनवाया गया। यहूदी युद्ध के दौरान ही टाइटस का संबंध यहूदी राजकुमारी बेरेनिस से स्थापित हुआ, जो कुछ समय तक रोम में टाइटस के साथ रही थी। टाइटस के शासनकाल में 79 ईस्वी में वेसुवियस ज्वालामुखी का भीषण विस्फोट हुआ, जिससे पोम्पेई और हरक्यूलेनियम नगर नष्ट हो गए। प्राचीन स्रोतों में इस आपदा तथा 80 ईस्वी में रोम में लगी भीषण आग से निपटने के लिए उसके प्रयासों की प्रशंसा की गई है। उसने प्रसिद्ध ‘कोलोसियम’ (फ्लावियन एम्फीथिएटर) का निर्माण पूरा कराया और उसके उद्घाटन के लिए सौ दिन तक भव्य खेल और उत्सव आयोजित किए।
टाइटस के सुंदर व्यक्तित्व, मधुर स्वभाव और उदार चरित्र के कारण रोमन इतिहासकार सुएटोनियस ने उसे ‘मानव जाति का प्रिय’ बताया है। 81 ईस्वी में 41 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसका भाई डोमिशियन रोमन सम्राट बना।
डोमिशियन (81-96 ई.)
मुख्य लेख : डोमिशियन
टाइटस की मृत्यु के बाद 81 ईस्वी में उसका छोटा भाई डोमिशियन रोमन सिंहासन पर बैठा। वह फ्लेवियन राजवंश का तीसरा और अंतिम सम्राट था। उसके शासनकाल में साम्राज्य की सीमाओं को सुदृढ़ किया गया, अनेक सैन्य अभियान चलाए गए तथा रोम और अन्य नगरों में व्यापक निर्माण एवं पुनर्निर्माण कार्य कराए गए। उसने रोमन मुद्रा में चाँदी की मात्रा बढ़ाकर वित्तीय व्यवस्था को मजबूत किया और कला, साहित्य तथा धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया। इन उपलब्धियों के कारण वह सेना और सामान्य जनता के बीच पर्याप्त लोकप्रिय रहा। डोमिशियन का सीनेट के साथ संबंध सदैव तनावपूर्ण बने रहे क्योंकि उसने सम्राट की सर्वोच्चता पर बल दिया और प्रशासन का केंद्रीकरण कर विरोधियों के प्रति कठोर नीति अपनाई। परिणामतः 18 सितंबर 96 ईस्वी को शाही दरबार के कुछ अधिकारियों द्वारा रचे गए षड्यंत्र में उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद मार्कस कोक्केयस नर्वा सम्राट बना और फ्लेवियन राजवंश का अंत हो गया।
नर्वा-एंटोनाइन वंश (96–192 ई.)
मुख्य लेख : नर्वा-एंटोनाइन वंश
डोमिशियन की हत्या के बाद सीनेट ने 96 ईस्वी में 61 वर्षीय नर्वा को रोमन सम्राट घोषित किया, जिससे नर्वा-एंटोनाइन राजवंश की स्थापना हुई। इस वंश के सात सम्राटों ने 96 ईस्वी से 192 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। इनमें से प्रथम पाँच शासक- नर्वा, ट्राजन, हैड्रियन, एंटोनिनस पायस और मार्कस ऑरेलियस विश्व इतिहास में ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ (फाइव गुड एंपरर्स) के नाम से प्रसिद्ध हैं और उनका शासनकाल रोमन साम्राज्य का स्वर्णयुग माना जाता है। नर्वा-एंटोनाइन राजवंश इतिहास में अपनी ‘दत्तक उत्तराधिकार प्रणाली’ के लिए प्रसिद्ध है, जिसके अंतर्गत सम्राट अपने जैविक पुत्रों के स्थान पर दत्तक ग्रहण (गोद लेने) की परंपरा के माध्यम से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते थे। रोमन विधि में दत्तक पुत्र को वास्तविक पुत्र के समान ही कानूनी अधिकार प्राप्त होते थे। अतः सम्राट योग्य उत्तराधिकारी को गोद लेकर शासन की स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करते थे।
रोमन अभिजात परिवारों में दत्तक ग्रहण की परंपरा पहले से ही प्रचलित थी। सम्राट ऑगस्टस ने टाइबेरियस को तथा सम्राट क्लॉडियस ने नीरो को गोद लिया था। इसी प्रकार जूलियस सीज़र ने अपने प्रपौत्र-भतीजे गायस ऑक्टावियस को दत्तक ग्रहण किया, जो बाद में ऑगस्टस के नाम से रोम का प्रथम सम्राट बना। नर्वा-एंटोनाइन वंश में भी उत्तराधिकार प्रायः इसी व्यवस्था के अनुसार संपन्न किया गया। नर्वा ने ट्राजन को, ट्राजन ने हैड्रियन को, हैड्रियन ने एंटोनिनस पायस को तथा एंटोनिनस पायस ने मार्कस ऑरेलियस और लूसियस वेरस को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। मार्कस ऑरेलियस द्वारा अपने पुत्र कॉमोडस को उत्तराधिकारी नियुक्त करना परवर्ती इतिहासकारों की दृष्टि में एक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय था, क्योंकि इसके साथ ही रोमन साम्राज्य के क्रमिक पतन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई।
मार्कस नर्वा (96–98 ई.)
मार्कस नर्वा सीनेट द्वारा चुने गए रोम के प्रसिद्ध ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ के क्रम में पहला था। उसका पूरा नाम मार्कस कोक्केयस नर्वा था। यद्यपि उसका शासनकाल अल्पकालिक था, फिर भी उसने सेना, सीनेट और सामान्य जनता के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया। उसने अपने पूर्ववर्ती डोमिशियन के निरंकुश शासन के दौरान छीनी गई स्वतंत्रता को बहाल किया, करों में कमी की और कृषि सुधार किए। सेना और प्रेटोरियन गार्ड के विद्रोहों से बचने के लिए उसने योग्य और लोकप्रिय सैन्य कमांडर ट्राजन को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी बनाया। जनवरी 98 ईस्वी में स्ट्रोक के कारण उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद ट्राजन रोम का सम्राट बना।
ट्राजन (98–117 ई.)
रोमन सम्राट ट्राजन की गणना प्राचीन रोम के सर्वश्रेष्ठ शासकों में की जाती है। उसने न केवल रोमन साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, न्याय, सार्वजनिक निर्माण और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। यही कारण है कि उसका शासनकाल रोमन इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में से एक है। ट्राजन का जन्म हिस्पानिया (स्पेन) में हुआ था। वह रोम का पहला ऐसा सम्राट था, जिसक जन्म इटली के बाहर किसी प्रांत में हुआ था। उसकी सैनिक प्रतिभा और प्रशासनिक योग्यता के कारण सम्राट नर्वा ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। 98 ईस्वी में नर्वा की मृत्यु के बाद ट्राजन रोम का सम्राट बना। सत्ता ग्रहण करते समय उसने सीनेट का सम्मान बनाए रखा और स्वयं को राज्य का सेवक बताया। इस विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा ने उसे जनता तथा अभिजात वर्ग दोनों का प्रिय बना दिया। ट्राजन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी सैन्य विजयों में निहित है। डैन्यूब नदी के उत्तर में स्थित डेसिया (रोमानिया का क्षेत्र) रोमन साम्राज्य के लिए चुनौती बना हुआ था। ट्राजन ने 101–102 ईस्वी तथा 105–106 ईस्वी के अभियानों में डेसिया के शक्तिशाली शासक डेसेबलस को पराजित कर उस प्रदेश को रोम में मिला लिया। डेसिया की विजय से रोम को अपार धन, सोने-चाँदी की खदानें और नए संसाधन प्राप्त हुए, जिससे साम्राज्य की आर्थिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई। डेसिया की विजय के पश्चात ट्राजन ने पूरब की ओर अरब के नबाताई राज्य को जीतकर रोमन साम्राज्य का प्रांत बनाया। इसके बाद पार्थिया के विरुद्ध अभियान चलाकर उसने अर्मीनिया, मेसोपोटामिया तथा असीरिया के विस्तृत क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। 116 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया।
ट्राजन केवल विजेता ही नहीं, बल्कि एक न्यायप्रिय और कुशल प्रशासक भी था। उसका सिद्धांत था कि किसी निर्दोष व्यक्ति को दंड नहीं मिलना चाहिए, भले ही इससे कुछ अपराधी बच जाएँ। वह अधिकारियों से ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और जनहित की अपेक्षा करता था। प्रांतीय प्रशासन पर उसकी विशेष दृष्टि रहती थी। जिन नगरों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी, वहाँ उसने योग्य अधिकारियों को भेजकर वित्तीय व्यवस्था सुधारने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से उसने प्रसिद्ध लेखक और प्रशासक कनिष्ठ प्लिनी (प्लिनी द यंगर) को बिथीनिया प्रांत में नियुक्त किया था।
ट्राजन के शासनकाल में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को विशेष प्रोत्साहन मिला। उसने सड़कों, पुलों, भवनों, मंदिरों और पुस्तकालयों का निर्माण कराया। यातायात और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अनेक राजमार्ग बनाए गए। रोम में निर्मित ‘ट्राजन फोरम’ तथा ‘ट्राजनस्तंभ’ उसकी उपलब्धियों के प्रतीक हैं। इन निर्माण कार्यों से न केवल साम्राज्य की भव्यता बढ़ी, बल्कि आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के अवसरों को भी प्रोत्साहन मिला।
आर्थिक क्षेत्र में भी ट्राजन ने संतुलित नीति अपनाई। उसने नए कर लगाने के बजाय प्रचलित करों में कमी करने का प्रयास किया और व्यापार तथा कृषि को बढ़ावा दिया। गरीब बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा के लिए उसने ‘अलिमेंटा’ नामक योजना चलाई, जिसके अंतर्गत राज्य की ओर से सहायता प्रदान की जाती थी। इससे समाज के कमजोर वर्गों को लाभ मिला और राज्य के प्रति जनता का विश्वास बढ़ा।
यद्यपि ट्राजन की विजयों ने रोम की शक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया, फिर भी साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार भविष्य की समस्याओं का कारण बनने लगा। पूर्वी क्षेत्रों में विद्रोह होने लगे और पार्थिया के विरुद्ध संघर्ष जारी रहा। मेसोपोटामिया, मिस्र तथा सीरीन के यहूदियों ने भी विद्रोह कर दिया। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए ट्राजन ने अपने सेनापतियों को विभिन्न क्षेत्रों में भेजा, जबकि वह स्वयं स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करता रहा। 117 ईस्वी में रोम लौटते समय सिलिसिया के सेलिनस नगर में 64 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। ट्राजन ने लगभग उन्नीस वर्षों तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद उसकी अस्थियाँ रोम लाकर सम्मानपूर्वक स्थापित की गईं। उसके उत्तराधिकारी हैड्रियन ने उसकी स्मृति को आदरपूर्वक संरक्षित रखा।
ट्राजन का शासनकाल रोमन इतिहास में साम्राज्यवादी विस्तार, सुशासन, न्यायप्रियता और लोककल्याण का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। उसकी सैन्य सफलताओं, प्रशासनिक दक्षता और जनहितकारी नीतियों ने उसे रोम के महानतम सम्राटों की श्रेणी में स्थापित कर दिया। आज भी ट्राजन को उस शासक के रूप में स्मरण किया जाता है, जिसने रोमन साम्राज्य को उसकी सर्वाधिक शक्ति, समृद्धि और गौरव प्रदान किया।
पब्लियस ऐलियस हैड्रियन (117–138 ई.)
ट्राजन की मृत्यु के बाद 117 ईस्वी में पब्लियस एलियस हैड्रियन रोम का सम्राट बना। उसके उत्तराधिकार को लेकर प्राचीन इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि ट्राजन ने स्वयं उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया था, जबकि अन्य के अनुसार ट्राजन की पत्नी पोम्पेया प्लोटिना ने उसकी उत्तराधिकार-प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हैड्रियन का जन्म स्पेन के इटालिका नगर में हुआ था, जो ट्राजन का भी जन्मस्थान था। बाल्यावस्था में ही उसके पिता का निधन हो गया था, जिसके कारण उसका पालन-पोषण ट्राजन तथा सीलियस एलीयानस ने किया। उसकी पत्नी विबिया साबीना संभवतः ट्राजन की भांजी-नातिन थी। हैड्रियन अत्यंत विद्वान, जिज्ञासु और बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। उसने साहित्य, दर्शन, संगीत, चिकित्सा, गणित, चित्रकला तथा मूर्तिकला का गहन अध्ययन किया था। उसे यूनानी संस्कृति से विशेष प्रेम था और वह स्वयं को यूनानी सभ्यता का प्रशंसक मानता था।
ट्राजन की तुलना में हैड्रियन का दृष्टिकोण अधिक शांतिपूर्ण था। वह निरंतर युद्धों और साम्राज्य-विस्तार की नीति का समर्थक नहीं था। उसका मानना था कि अत्यधिक विस्तार से साम्राज्य की शक्ति कमजोर हो सकती है। इसलिए सिंहासन ग्रहण करने के बाद उसने ट्राजन द्वारा विजित अर्मीनिया, असीरिया और मेसोपोटामिया जैसे क्षेत्रों से रोमन सेनाएँ वापस बुला लीं। अर्मीनिया को प्रत्यक्ष रोमन प्रांत बनाने के स्थान पर आश्रित राज्य का दर्जा दिया गया और फरात (यूफ्रेटीज़) नदी को साम्राज्य की पूर्वी सीमा स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार उसने विजय की अपेक्षा साम्राज्य के संगठन और स्थिरता पर अधिक ध्यान दिया।
हैड्रियन का शासन लगभग बीस वर्षों तक शांति और सुव्यवस्था का प्रतीक था। यद्यपि उसके शासन के प्रारंभ में कुछ सेनानायकों ने उसके विरुद्ध षड्यंत्र किया, किंतु उनका प्रयास विफल रहा। इसके बाद उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों का व्यापक भ्रमण किया और प्रत्यक्ष रूप से प्रशासनिक व्यवस्था का निरीक्षण किया। वह उन विरले रोमन सम्राटों में था, जो राजधानी में बैठकर शासन करने के बजाय स्वयं प्रांतों का दौरा करते थे। निर्माण कार्यों के क्षेत्र में हैड्रियन ने ब्रिटेन में टाइन नदी से सोलवे फर्थ तक प्रसिद्ध हैड्रियन दीवार का निर्माण करवाया, जिसका उद्देश्य रोमन क्षेत्रों को उत्तरी बर्बर जातियों के आक्रमणों से सुरक्षित करना था। एशिया माइनर, यूनान और रोम में उसने अनेक मंदिरों, स्नानागारों, नाट्यशालाओं और सार्वजनिक भवनों का निर्माण करवाया। विशेष रूप से एथेंस के प्रति उसका प्रेम प्रसिद्ध था, जहाँ उसने अनेक भव्य निर्माण कार्य करवाए। आर्थिक क्षेत्र में भी हैड्रियन ने महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने कर-वसूली प्रणाली को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाया तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए राजकोषीय अधिकारियों की नियुक्ति की। उसने प्रांतीय प्रशासन में वित्तीय अनुशासन स्थापित करने का प्रयास किया, जिससे कर-संग्रह में पारदर्शिता आई और जनता पर अनावश्यक आर्थिक दबाव कम हुआ। हैड्रियन ने किसानों की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया। उसने भूमि, लगान और श्रम-संबंधी कठिनाइयों को समझते हुए ऐसी नीतियाँ अपनाईं, जिनका उद्देश्य कृषि व्यवस्था को स्थिर बनाना और किसानों को राहत प्रदान करना था। उसने कुछ पुराने करों को समाप्त या कम किया, जिससे जनता को आर्थिक राहत मिली, यद्यपि इससे राजकोष की आय में कुछ कमी आई।
हैड्रियन के शासनकाल में व्यापार, कृषि और उद्योग का निरंतर विकास हुआ। उसकी स्थिर प्रशासनिक नीतियों और सुव्यवस्थित राजस्व व्यवस्था के कारण रोमन साम्राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी रही। उसके शासन के अंत तक रोमन राजकोष पर्याप्त रूप से समृद्ध था। कुछ प्राचीन स्रोतों के अनुसार उसकी मृत्यु के समय राजकोष में लगभग 2.7 अरब सेस्टर्स की धनराशि सुरक्षित थी। न्याय और प्रशासन के क्षेत्र में हैड्रियन ने योग्य व्यापारियों, सीनेटरों और विधिवेत्ताओं को सम्मिलित करके एक ‘परामर्श परिषद’ (कौंसिलियम) का गठन किया, जो शासन-नीति के निर्धारण में सहायता करती थी। उसने प्रसिद्ध विधिवेत्ता जूलियन से रोमन कानूनों का संहिताकरण करवाया। एक न्यायप्रिय शासक के रूप में हैड्रियन दुर्बलों, दासों, छोटे किसानों और सामान्य प्रजा के हितों की रक्षा करने का प्रयास करता था। उसके निर्णय प्रायः सामाजिक न्याय और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित होते थे।
हैड्रियन की नीतियों के परिणामस्वरूप रोमन साम्राज्य में शांति, समृद्धि और प्रशासनिक दक्षता अपने उच्च स्तर पर पहुँच गई। उसके शासनकाल में रोम केवल कर-संग्रह करने वाला राज्य नहीं रहा, बल्कि एक सुव्यवस्थित और उत्तरदायी साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ। किंतु हैड्रियन के शासन के अंतिम वर्षों में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। 132–135 ईस्वी के बीच यहूदियों ने रोमन शासन के विरुद्ध भीषण विद्रोह किया, जिसे ‘बार-कोखबा विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है। यद्यपि हैड्रियन ने कठोर सैन्य कार्रवाई द्वारा इस विद्रोह का दमन कर दिया, परंतु इस संघर्ष के दौरान वह क्षय तथा जलोदर जैसे गंभीर रोगों से पीड़ित हो गया।
उत्तराधिकार के संकट से बचने के लिए हैड्रियन ने सर्वप्रथम लूसियस सीओनियस कॉमोडस (लूसियस ऐलियस सीज़र) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। किंतु 138 ईस्वी में उसकी अकाल मृत्यु हो जाने पर हैड्रियन ने टाइटस ऑरेलियस एंटोनिनस (एंटोनिनस पायस) को दत्तक ग्रहण कर अपना उत्तराधिकारी बनाया। साथ ही उसने एंटोनिनस पायस के समक्ष यह शर्त रखी कि वह मार्कस एन्नियस वेरस (मार्कस ऑरेलियस) तथा लूसियस ऐलियस के पुत्र लूसियस ऑरेलियस वेरस (लूसियस वेरस) को गोद लेकर उनको शासन-प्रशासन का प्रशिक्षण देगा। इस प्रकार हैड्रियन ने उत्तराधिकार की समस्या का समाधान करते हुए साम्राज्य के लिए योग्य उत्तराधिकारियों की व्यवस्था सुनिश्चित की। अंततः 138 ईस्वी में लगभग इक्कीस वर्षों तक शासन करने के बाद 62 वर्ष की आयु में हैड्रियन की मृत्यु हो गई।
एंटोनिनस पायस (138–161 ई.)
हैड्रियन के बाद उसका उत्तराधिकारी एंटोनिनस पायस 138 ईस्वी में रोमन साम्राज्य का सम्राट बना। उसका पूरा नाम कैसर टाइटस एलियस हैड्रियनस एंटोनिनस ऑगस्टस पायस था। उसने 138 से 161 ईस्वी तक लगभग तेईस वर्षों तक शासन किया। उसका जन्म 19 सितंबर 86 ईस्वी को लेटियम के लैनुवियम नगर में एक संपन्न एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। वह रोमन सम्राट हैड्रियन का विश्वसनीय सलाहकार था और 138 ईस्वी में हैड्रियन ने उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। सम्राट बनने के बाद उसने हैड्रियन को देवता घोषित किया, जो उसकी स्वामिभक्ति और निष्ठा का प्रमाण है।
एंटोनिनस का शासनकाल रोमन इतिहास के सबसे शांतिपूर्ण और स्थिर कालों में गिना जाता है। उसने ब्रिटेन तथा अन्य प्रांतों में हुए विद्रोहों को सफलतापूर्वक दमन किया और उत्तरी ब्रिटेन में साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एंटोनाइन दीवार का निर्माण करवाया। एंटोनिनस न्यायप्रिय उदार और कुशल प्रशासक था। उसने अनेक ऐसे कानून बनाए जिनसे दासों, अनाथों और निर्धनों की स्थिति में सुधार हुआ। उसने प्रजा के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया और प्रशासन को मानवीय बनाने का प्रयास करता था। उसकी कर्तव्यपरायणता के कारण उसे ‘पायस’ (धर्मनिष्ठ या कर्तव्यपरायण) की उपाधि मिली थी। 7 मार्च 161 ईस्वी को लगभग चौहत्तर वर्ष की आयु में एंटोनिनस की मृत्यु हो गई। उसके साथ रोम के स्वर्णिम और शांतिपूर्ण युग का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
रोमन सम्राट एंटोनिनस पायस की मृत्यु के बाद मार्कस ऑरेलियस (161-180 ई.) और लूसियस वेरस (161-169 ई.) संयुक्त रूप से सम्राट बने। मार्कस ऑरेलियस ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ में से एक था और वह इतिहास का अंतिम महान दार्शनिक सम्राट माना जाता है, जिसने स्टोइक दार्शन पर ‘मेडिटेशंस’ जैसी प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
मार्कस ऑरेलियस के दत्तक भाई तथा सहशासक लूसियस वेरस की 169 ईस्वी में बीमारी के कारण असामयिक मृत्यु हो गई। इसके बाद मार्कस ऑरेलियस ने अपने पुत्र कॉमोडस को 177 ईस्वी में सहशासक घोषित किया। तत्पश्चात मार्कस ऑरेलियस ने 180 ईस्वी में अपनी मृत्यु तक शासन किया।
कॉमोडस (180–192 ई.)
मार्कस ऑरेलियस की मृत्यु (180 ई.) के बाद उसका पुत्र और सहशासक कॉमोडस (180–192 ई.) रोमन सम्राट बना, जो रोमन साम्राज्य के इतिहास में अपने क्रूर, विचित्र और आत्म-केंद्रित कृत्यों के लिए जाना जाता है। कॉमोडस ने साम्राज्य को संभालने के बजाय अपना अधिकांश समय मनोरंजन, शिकार और हरम में बिताया, जिससे केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी। 182 ईस्वी में उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा गया, परंतु वह असफल रहा। इसके बाद वह अत्यधिक शक्की और क्रूर बन गया। जिस किसी पर भी उसे संदेह होता, उसे दंडित करता या मृत्युदंड दिलवा देता था। उसके क्रूर और विक्षिप्त शासन ने 84 वर्षों की शांति एवं समृद्धि के युग (पैक्स रोमाना) का अंत कर दिया। कॉमोडस ने रोम शहर का नाम बदलकर अपने नाम पर ‘कोलोनिया कॉमोडियाना’ रखा और स्वयं को पौराणिक वीर हरक्युलिस का अवतार घोषित किया। जब राजकोष का धन सार्वजनिक कल्याण के स्थान पर प्रदर्शन, खेलों और व्यक्तिगत विलासिता पर व्यय किया जाने लगा, तो जनता और अभिजात वर्ग दोनों असंतुष्ट हो गए। अंततः 192 ईस्वी में उसकी प्रेयसी मर्सिया, राजमहल के अधिकारी इक्लेक्टस तथा प्रायटोरियन प्रीफेक्ट लीटस ने षड्यंत्र रचकर मल्लयोद्धा नरसिसस के माध्यम से 31 दिसंबर 192 ईस्वी को उसकी हत्या करवा दी। कॉमोडस की मृत्यु के साथ ही एंटोनाइन राजवंश का अंत हो गया।
पाँच सम्राटों का वर्ष (193 ई.)
रोमन इतिहास में 193 ईस्वी को ‘पाँच सम्राटों का वर्ष’ कहा जाता है। दिसंबर 192 ईस्वी में सम्राट कॉमोडस की हत्या के बाद उत्तराधिकार का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया, जिसके परिणामस्वरूप पर्टिनैक्स, डिडियस जूलियनस, पेस्केनियस नाइजर, क्लोडियस अल्बिनस तथा सेप्टिमियस सेवेरस ने विभिन्न समयों पर रोमन सम्राट होने का दावा किया। जनवरी 193 ईस्वी में पर्टिनैक्स सम्राट बना, किंतु प्रशासनिक एवं वित्तीय सुधारों के प्रयासों से असंतुष्ट प्रेटोरियन गार्ड ने लगभग तीन माह बाद उसकी हत्या कर दी। इसके पश्चात प्रेटोरियन गार्ड ने सम्राट पद की खुले रूप से नीलामी की और सर्वाधिक धनराशि देने वाले डिडियस जूलियनस को सम्राट घोषित किया। किंतु जनता, सीनेट और सेना का व्यापक समर्थन प्राप्त न होने के कारण उसका शासन भी अल्पकालिक सिद्ध हुआ।
इस राजनीतिक अराजकता का लाभ उठाकर सीरिया के गवर्नर पेस्केनियस नाइजर तथा ब्रिटेन के गवर्नर क्लोडियस अल्बिनस ने भी सम्राट पद का दावा प्रस्तुत किया। दूसरी ओर, शक्तिशाली सेनानायक सेप्टिमियस सेवेरस ने अपनी सेना के समर्थन से रोम की ओर कूच किया, डिडियस जूलियनस को पदच्युत किया और क्रमशः अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पराजित किया। पेस्केनियस नाइजर गृहयुद्ध में मारा गया, जबकि क्लोडियस अल्बिनस 197 ईस्वी में लुगडुनम (ल्योन) के युद्ध में पराजित होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। अंततः सेप्टिमियस सेवेरस रोमन साम्राज्य का निर्विवाद सम्राट बना और उसने सेवेरन वंश की स्थापना की।
सेवेरन वंश (193- 235 ई.)
मुख्य लेख : सेवेरन वंश
सेवेरन वंश ने लगभग चार दशकों (193–235 ई.) तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। इस वंश की स्थापना 193 ईस्वी में सम्राट सेप्टिमियस सेवेरस ने की थी। सेवेरन काल में रोमन साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार हुआ, सेना का राजनीतिक प्रभाव बढ़ा और प्रशासन में सम्राट की शक्ति अधिक सुदृढ़ हुई। 212 ईस्वी में सम्राट काराकल्ला ने ‘कॉनस्टिट्यूटियो एंटोनिनियाना’ जारी करके साम्राज्य के लगभग सभी स्वतंत्र पुरुषों को रोमन नागरिकता प्रदान की। 235 ईस्वी में सम्राट अलेक्जेंडर सेवेरस की हत्या के साथ इस वंश का अंत हुआ। इसके बाद रोमन साम्राज्य राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य संघर्षों और आर्थिक संकटों से घिर गया, जिसे इतिहास में ‘तीसरी शताब्दी का संकट’ कहा जाता है।
सेप्टिमियस सेवेरस (193–211 ई.)
सेप्टिमियस सेवेरस सेवेरन वंश का संस्थापक और रोमन साम्राज्य का शक्तिशाली सम्राट था। उसका जन्म 145 ईस्वी में उत्तरी अफ्रीका के लेप्टिस मैग्ना नगर में हुआ था। उसने अपनी सैन्य क्षमता और प्रशासनिक योग्यता के बल पर रोमन शासन-व्यवस्था में उच्च पद प्राप्त किए। 187 ईस्वी में उसने सीरिया के एक प्रतिष्ठित परिवार की महिला जूलिया डोम्ना से विवाह किया, जिसने बाद में राजनीतिक मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 193 ईस्वी में सम्राट पर्टिनैक्स की हत्या के बाद उत्पन्न गृहयुद्ध में सेप्टिमियस सेवेरस ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को पराजित कर रोमन सिंहासन पर अधिकार कर लिया। उसने पहले पेस्केनियस नाइजर को साइजिकस, निकाया और इस्सस के युद्धों में हराया। इसके बाद उसने क्लोडियस अल्बिनस को 197 ईस्वी में लुग्डुनम (वर्तमान ल्योन, फ्रांस) के युद्ध में पराजित कर अपना शासन पूर्ण रूप से स्थापित किया और रोमन साम्राज्य में सैन्य शक्ति आधारित शासन की शुरुआत की।
सिंहासन पर बैठने के बाद सेप्टिमियस सेवेरस ने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित और सुदृढ़ करने पर विशेष ध्यान दिया। 197–198 ईस्वी में उसने पार्थियनों को पराजित कर उनकी राजधानी टेसिफोन पर अधिकार कर लिया तथा मेसोपोटामिया को पुनर्गठित कर रोमन प्रांत बनाया। बाद में उसने ब्रिटेन और कैलेडोनिया (वर्तमान स्कॉटलैंड) के क्षेत्रों में भी सैन्य अभियान चलाए तथा साम्राज्य की उत्तरी सीमाओं को मजबूत किया। उसकी सैन्य सफलताओं से कुछ समय के लिए रोमन साम्राज्य की प्रतिष्ठा और शक्ति पुनः स्थापित हुई।
सेवेरस की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में सेना का पुनर्गठन शामिल था। उसने सैनिकों के वेतन में वृद्धि की, उन्हें विवाह करने की अनुमति दी तथा सेवा-निवृत्ति के बाद भूमि और अन्य सुविधाएँ प्रदान करने की व्यवस्था की। इन सुधारों से सेना की निष्ठा और सम्राट के प्रति उसकी निर्भरता बढ़ गई। यद्यपि आगे चलकर सेना की बढ़ती राजनीतिक भूमिका रोमन शासन में अस्थिरता का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुई। प्रशासनिक क्षेत्र में सेवेरस ने इक्वेस्ट्रियन (अश्वारोही) वर्ग के लोगों को उच्च प्रशासनिक और सैन्य पदों पर नियुक्त किया तथा सीनेट के पारंपरिक प्रभाव को सीमित किया। उसने प्रांतीय प्रशासन को अधिक व्यवस्थित बनाया और न्यायिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। उसके शासनकाल में सम्राट की सत्ता पहले की अपेक्षा अधिक केंद्रीकृत और शक्तिशाली हो गई। सेवेरस ने राजकोषीय व्यवस्था में भी परिवर्तन किए। उसने एक अतिरिक्त कोषागार की स्थापना की और शासकीय संपत्तियों पर सम्राट का नियंत्रण बढ़ाया। सेप्टिमियस सेवेरस विद्या और संस्कृति का भी संरक्षक था। उसकी पत्नी जूलिया डोम्ना स्वयं विदुषी थी और उसके दरबार में अनेक दार्शनिक, साहित्यकार तथा विद्वान रहते थे। इस प्रकार उसका शासन केवल सैन्य सफलताओं तक सीमित न रहकर सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र बना।
इस प्रकार सेप्टिमियस सेवेरस ने गृहयुद्धों और राजनीतिक अराजकता से ग्रस्त रोमन साम्राज्य को पुनः स्थिरता प्रदान की। उसके शासनकाल में सेना की शक्ति बढ़ी और सम्राट की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हुई। यही कारण है कि उसका शासन रोमन इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। 211 ईस्वी में ब्रिटेन (यॉर्क) में सैन्य अभियान के दौरान सेवेरस की मृत्यु हो गई। किंतु मृत्यु से पूर्व उसने अपने दोनों पुत्रों—काराकल्ला और गेटा को संयुक्त रूप से साम्राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था।
काराकल्ला और गेटा (211-217 ई.)
सेवेरस के बाद उसके दोनों पुत्रों- काराकल्ला और गेटा (211-217 ई.) ने संयुक्त रूप से सत्ता संभाली, किंतु उनके बीच तीखे मतभेद थे। प्रारंभ में उनकी माता जूलिया डोम्ना ने दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया, परंतु अंततः 211 ईस्वी में काराकल्ला ने अपने भाई गेटा की हत्या करवा दी और स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। इसके बाद उसने गेटा के समर्थकों का दमन किया और सेना का समर्थन बनाए रखने के लिए सैनिकों के वेतन में वृद्धि की। काराकल्ला का शासनकाल कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। 212 ईस्वी में उसने ‘कॉन्स्टिट्यूटियो एंटोनिनियाना’, जिसे ‘एंटोनिनाइन एडिक्ट’ भी कहा जाता है, जारी किया। इसके द्वारा रोमन साम्राज्य के लगभग सभी स्वतंत्र निवासियों को रोमन नागरिकता प्रदान कर दी गई। काराकल्ला ने जर्मनिक और डेन्यूब क्षेत्र की जनजातियों के विरुद्ध भी सैन्य अभियान चलाया। किंतु उसके शासनकाल की प्रमुख उपलब्धि रोम में निर्मित विशाल ‘काराकल्ला के स्नानागार’ हैं। 217 ईस्वी में पार्थियनों के विरुद्ध अभियान के दौरान उसकी हत्या कर दी गई।
सेवेरन राजवंश के परवर्ती शासक (217-235 ई.)
काराकल्ला की मृत्यु के बाद प्रेटोरियन प्रीफेक्ट मैक्रिनस (217–218 ई.) ने सत्ता पर अधिकार कर लिया। वह सेवेरन परिवार का सदस्य नहीं था और रोमन इतिहास का पहला ऐसा सम्राट था, जो सीनेटर वर्ग के परिवार से संबंधित नहीं था। उसने पार्थियनों के साथ शांति स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु उसकी नीतियाँ सैनिकों को पसंद नहीं आईं, जिसके परिणामस्वरूप 218 ईस्वी में उसे अपदस्थ कर उसकी हत्या कर दी गई। मैक्रिनस के पतन के बाद जूलिया डोम्ना की बहन जूलिया मैसा के समर्थन से उसकी पुत्री का पुत्र एलागाबालस (218–222 ई.) रोमन सम्राट बना। वह मूल रूप से सीरिया के सूर्य देवता एलागाबल का पुजारी था। सम्राट बनने के बाद उसने रोमन धार्मिक परंपराओं में परिवर्तन करने का प्रयास किया, जिसके कारण जनता, सीनेट और सेना में असंतोष उत्पन्न हो गया। अंततः 222 ईस्वी में उसकी हत्या कर दी गई।
एलागाबालस के बाद उसका चचेरा भाई सेवेरस अलेक्जेंडर (222–235 ई.) सम्राट बना, जो सेवेरन वंश का अंतिम शासक था। सम्राट बनने के समय उसकी आयु केवल चौदह वर्ष थी, इसलिए शासन संचालन में उसकी माता जूलिया ममाया की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। प्राचीन लेखकों ने उसके शासनकाल को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण, कुशल और सुव्यवस्थित बताया है। किंतु 235 ईस्वी में जर्मनी के विरुद्ध अभियान के दौरान विद्रोही सैनिकों ने उसकी और उसकी माता की हत्या कर दी, जिससे सेवेरन राजवंश का अंत हो गया। सेवेरन राजवंश की समाप्ति के बाद रोमन साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता, गृहयुद्धों और बाहरी आक्रमणों का दौर प्रारंभ हुआ, जिसे इतिहास में ‘तीसरी शताब्दी का संकट’ कहा जाता है।
तीसरी शताब्दी का संकट (235-284 ई.)
मुख्य लेख : तीसरी शताब्दी का संकट
सेवेरन राजवंश के पतन (235 ई.) के बाद रोमन साम्राज्य में व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ। इन 50 वर्षों की अवधि में (235-284 ई.) विभिन्न सैन्य सेनापतियों और दावेदारों के बीच साम्राज्य पर नियंत्रण के लिए निरंतर गृहयुद्ध चलता रहा। इस सामाजिक अशांति, आर्थिक अस्थिरता तथा राजनीतिक विघटन के काल को रोमन इतिहास में ‘तीसरी शताब्दी का संकट’ कहा गया है।
238 ईस्वी में अनेक शासकों के तीव्र उत्थान और पतन के बाद गॉर्डियन तृतीय (238–244 ई.) रोमन सम्राट बना। वह कम आयु का शासक था और शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसका मार्गदर्शन उसके योग्य श्वसुर तथा प्रेटोरियन प्रीफेक्ट टाइमेसिथियस ने किया। दोनों ने मिलकर सासानी शासक शापुर प्रथम के विरुद्ध अभियान चलाया और पूर्वी सीमाओं पर रोमन प्रभाव को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया।
243 ईस्वी में टाइमेसिथियस की मृत्यु के बाद राजनीतिक स्थिति बदल गई और प्रेटोरियन प्रीफेक्ट फिलिप अरब ने दरबार में अपना प्रभाव बढ़ा लिया। 244 ईस्वी में गॉर्डियन तृतीय की मृत्यु के बाद फिलिप अरब (244-249 ई.) स्वयं सम्राट बन बैठा। उसके शासनकाल में पारसियों के साथ शांति की गई तथा 248 ईस्वी में रोम की स्थापना की एक हजारवीं वर्षगाँठ भव्य रूप से मनाई गई। किंतु 249 ईस्वी में सेनापति डेसियस के विरुद्ध संघर्ष में उसकी मृत्यु हो गई।
डेसियस (249–251 ई.) के शासनकाल में ईसाइयों पर व्यापक अत्याचार हुए। उसने सम्राट-पूजा को अनिवार्य कर दिया और आदेश का उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड दिया। किंतु 251 ईस्वी में गोथों के विरुद्ध युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद ट्रेबोनियान गैलस (251-253 ई.) गद्दी पर बैठा, किंतु उसके समय भी महामारी और राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। अंततः 253 ईस्वी में उसके अपने सैनिकों ने ही उसकी हत्या कर दी।
253 ईस्वी में पूर्व सीनेटर और सैन्य कमांडर वैलेरियन (253-260 ई.) रोमन सम्राट बना और उसने अपने पुत्र गैलियनस को सह-शासक नियुक्त किया। वैलेरियन ने साम्राज्य के स्वयं पूर्वी हिस्से में फारसी आक्रमणों का सामना किया, जबकि अपने पुत्र गैलियनस को पश्चिमी सीमाओं पर जर्मनिक जनजातियों से निपटने का कार्य सौंपा। 260 ईस्वी में एडेसा के युद्ध में ससानी सम्राट शापुर प्रथम ने वैलेरियन को पराजित कर बंदी बना लिया और कैद में ही उसकी मृत्यु हो गई।। यह रोमन इतिहास की सबसे अपमानजनक घटनाओं में से एक थी, क्योंकि पहली बार कोई रोमन सम्राट शत्रु के हाथों बंदी बनाया गया था।
वैलेरियन के बाद उसके पुत्र गैलियनस (260-268 ई.) ने पूरे साम्राज्य का शासन संभाला। उसके 15 वर्ष के शासनकाल में साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक विद्रोह हुए, जिन्हें अकसर ‘तीस अत्याचारियों का काल’(थर्टी टायरेंट्स) कहा जाता है। यद्यपि गेलियनस ने कुछ महत्त्वपूर्ण सैन्य और प्रशासनिक सुधार किए, फिर भी 268 ईस्वी में उसकी हत्या कर दी गई। गैलियनस की हत्या के बाद 268 ईस्वी में क्लॉडियस द्वितीय (268-270 ई.) रोमन सम्राट बना। उसने उत्तरी इटली में एलेमानी को पराजित किया और 269 ईस्वी में नैसस के युद्ध में गोथों को निर्णायक रूप से हराया, जिसके कारण उसे ‘गोथिकस’ की उपाधि मिली। किंवदंतियों के अनुसार सम्राट क्लॉडियस द्वितीय ने ही संत वैलेंटाइन को मृत्युदंड की सजा दी थी। 270 ईस्वी में प्लेग से क्लॉडियस द्वितीय की मृत्यु हो गई।
ऑरेलियन (270-275 ई.)
रोमन सेना ने 270 ईस्वी में ऑरेलियन को रोमन सम्राट घोषित किया। उस समय रोमन साम्राज्य ‘तीसरी शताब्दी के संकट’ से गुजर रहा था और लगभग विघटन के कगार पर था। ऑरेलियन ने रोमन साम्राज्य को बाहरी आक्रमणों से बचाया और उसको पुनर्संगठित कर ‘रेस्टिट्यूटर ऑर्बिस’ (विश्व का पुनर्स्थापक) की उपाधि प्राप्त की। ऑरेलियन ने 270 ईस्वी में उत्तरी इटली पर आक्रमण करने वाली जुथुंगी जनजाति को हराया और बाद में वंडल्स, गोथ्स और एलमानी जैसी जनजातियों को भी पीछे खदेड़ दिया। उसने पूर्व में 272 ईस्वी में पल्मायरा की रानी जेनोबिया को एंटिओक एवं एमेसा के युद्धों में पराजित कर पल्मायरा पर अधिकार कर लिया और पश्चिम में गॉलों को हराकर रोमन साम्राज्य को एकजुट किया। रोम शहर को बर्बर हमलों से बचाने के लिए उसने विशाल दीवारों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। धर्म के क्षेत्र में उसने ‘सोल इनविक्टस’ (अजेय सूर्य) नामक देवता को साम्राज्य में विशेष महत्त्व प्रदान दिया।
ऑरेलियन केवल पाँच वर्ष (270-275 ई.) शासन कर सका, फिर भी उसने विघटन की ओर बढ़ते साम्राज्य को पुनः संगठित करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। 275 ईस्वी में फारस के विरुद्ध अभियान की तैयारी के दौरान उसके ही कुछ अधिकारियों ने उसकी हत्या कर दी। इसके साथ एक ऐसे शासक का अंत हो गया, जिसने रोमन साम्राज्य को पतन के कगार से वापस शक्ति और एकता की ओर अग्रसर किया था।
रोमन साम्राज्य का पुनर्गठन
डायोक्लेटियन (284–305 ई.)
मुख्य लेख : डायोक्लेटियन
तीसरी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में रोमन साम्राज्य गंभीर राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक संकट से गुजर रहा था। सम्राटों की लगातार हत्या, गृहयुद्ध, सीमाओं पर बाहरी आक्रमण, मुद्रा-संकट और प्रशासनिक अव्यवस्था ने साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया था। इसी संकट की पृष्ठभूमि में 284 ईस्वी में डायोक्लेटियन सम्राट बना। उसका शासन 284 से 305 ईस्वी तक चला और उसके साथ रोमन इतिहास में एक नए चरण का आरंभ हुआ, जिसे सामान्यतः उत्तरकालीन रोमन साम्राज्य के उदय से जोड़ा जाता है। उसका प्रमुख उद्देश्य साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक क्षमता, आर्थिक आधार और सैन्य शक्ति को पुनर्गठित करना था। डायोक्लेटियन ने ऑगस्टस द्वारा स्थापित प्रिंसिपेट की अपेक्षाकृत गणतांत्रिक छवि से अलग सम्राट की सत्ता को अधिक स्पष्ट रूप से निरंकुश और राजकीय स्वरूप प्रदान किया। सम्राट को डोमिनस अर्थात् ‘स्वामी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया और राजदरबार में अधिक औपचारिकता तथा अनुशासन स्थापित किया गया। सम्राट की प्रतिष्ठा को दैवी संरक्षण से जोड़ने की नीति ने उसके शासन को धार्मिक और राजनीतिक वैधता प्रदान करने का प्रयास किया।
टेट्रार्की और प्रशासनिक पुनर्गठन
डायोक्लेटियन की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि टेट्रार्की अर्थात् चतुर्शासित शासन-व्यवस्था की स्थापना थी। उसका मानना था कि इतने विशाल साम्राज्य की सीमाओं, विद्रोहों और प्रशासनिक समस्याओं का सामना एक ही सम्राट के लिए कठिन था। इसलिए उसने शासन को चार शासकों के बीच बाँटने की व्यवस्था विकसित की। स्वयं डायोक्लेटियन पूर्वी भाग का ऑगस्टस बना और मैक्सिमियन को पश्चिमी भाग का ऑगस्टस नियुक्त किया। दोनों के अधीन एक-एक सीज़र को उत्तराधिकारी और कनिष्ठ सह-शासक के रूप में नियुक्त किया गया।
यह व्यवस्था आधुनिक अर्थ में साम्राज्य का स्थायी दो स्वतंत्र राज्यों में विभाजन नहीं थी। साम्राज्य राजनीतिक रूप से एक ही रोमन राज्य बना रहा, किंतु प्रशासन और सैन्य संचालन के लिए सत्ता कई केंद्रों में वितरित की गई। इस व्यवस्था से सीमांत क्षेत्रों में सम्राट की उपस्थिति बढ़ी और संकटग्रस्त क्षेत्रों में शीघ्र सैन्य प्रतिक्रिया संभव हुई।
डायोक्लेटियन ने प्रांतीय प्रशासन में भी व्यापक परिवर्तन किए। प्रांतों की संख्या बढ़ाकर उन्हें छोटी प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा गया और कई प्रांतों को डायोसीज़ नामक बड़े प्रशासनिक समूहों के अंतर्गत संगठित किया गया। नागरिक और सैन्य प्रशासन को अलग करने की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया गया। इससे प्रांतीय गवर्नरों की सैन्य शक्ति सीमित हुई और केंद्रीय प्रशासन का नियंत्रण मजबूत हुआ।
सैन्य सुधार
साम्राज्य की सुरक्षा के लिए डायोक्लेटियन ने सेना का पुनर्गठन किया। सीमांत क्षेत्रों में सैनिकों की स्थायी तैनाती के साथ-साथ ऐसी मोबाइल सैन्य शक्तियों का विकास किया गया जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न मोर्चों पर भेजा जा सके। घुड़सवार सेना का महत्त्व बढ़ाया गया और सीमाओं पर किलेबंदी तथा सैन्य चौकियों को मजबूत किया गया। उसने सेना के आकार और संगठन को साम्राज्य की नई प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला। सैनिकों के वेतन, आपूर्ति और भर्ती की व्यवस्था को अधिक नियमित किया गया। सेना को केंद्रीय सत्ता से जोड़ना उसके सुधारों का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था, क्योंकि तीसरी शताब्दी के सैनिक विद्रोहों ने बार-बार सम्राटों को अस्थिर किया था।
आर्थिक और वित्तीय सुधार
डायोक्लेटियन के सामने सबसे गंभीर आर्थिक समस्याओं में मुद्रा का अवमूल्यन, महँगाई और कर-व्यवस्था की अस्थिरता शामिल थीं। उसने कराधान को अधिक व्यवस्थित करने के लिए भूमि और जनसंख्या के सर्वेक्षण पर आधारित व्यवस्था विकसित की। करों का निर्धारण भूमि, उत्पादन और श्रम-क्षमता के आकलन से जोड़ा गया। इससे राज्य को नियमित राजस्व प्राप्त करने में सहायता मिली, यद्यपि किसानों और उत्पादकों पर कर का बोझ भी बढ़ा।
301 ईस्वी में डायोक्लेटियन ने ‘एडिक्ट ऑन मैक्सिमम प्राइसेज़’ जारी किया। इसमें अनेक वस्तुओं और सेवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित की गई थी। इसका उद्देश्य अत्यधिक महँगाई और मूल्य-वृद्धि को रोकना था। किंतु व्यापक और कठोर मूल्य-नियंत्रण व्यवहार में प्रभावी नहीं रहा और इसका उल्लंघन भी हुआ। फिर भी यह आर्थिक संकट को प्रशासनिक उपायों से नियंत्रित करने के प्रयास का महत्त्वपूर्ण उदाहरण था।
डायोक्लेटियन ने मुद्रा-व्यवस्था में भी सुधार किए और राज्य के वित्तीय नियंत्रण को मजबूत किया। अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए राज्य की भूमिका बढ़ाई गई। अनेक व्यवसायों और सेवाओं को नियंत्रित किया गया तथा कुछ पेशों में वंशानुगत दायित्वों की प्रवृत्ति विकसित हुई। इससे राज्य को आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराने में सुविधा हुई, लेकिन व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध भी बढ़े।
धार्मिक नीति और सार्वजनिक निर्माण
डायोक्लेटियन ने पारंपरिक रोमन धार्मिक व्यवस्था को राज्य की वैधता से जोड़ने का प्रयास किया। उसने पारंपरिक देवताओं, विशेषकर जुपिटर, की पूजा को प्रोत्साहित किया। उसके शासनकाल में ईसाइयों के विरुद्ध रोमन साम्राज्य का सबसे व्यापक उत्पीड़न हुआ, जिसे महान उत्पीड़न कहा जाता है। 303 ईस्वी से ईसाई गिरजाघरों के विनाश, धार्मिक ग्रंथों की जब्ती और ईसाइयों पर विभिन्न प्रकार के दंड लगाए गए। फिर भी ईसाई धर्म का प्रसार रोका नहीं जा सका।
डायोक्लेटियन ने साम्राज्य के प्रमुख नगरों में व्यापक सार्वजनिक निर्माण कराए। निकोमीडिया उसके प्रमुख निवास और प्रशासनिक केंद्रों में से एक बना। रोम में उसके नाम से निर्मित थर्मे ऑफ डायोक्लेटियन विशाल सार्वजनिक स्नानागार परिसर था। साम्राज्य के विभिन्न नगरों में किलेबंदी, राजप्रासाद, सड़कों और अन्य सार्वजनिक भवनों के निर्माण से उसकी प्रशासनिक और सैन्य नीतियों को आधार मिला।
उत्तराधिकार और राजत्याग
टेट्रार्की की मूल योजना में उत्तराधिकार को व्यवस्थित करने के लिए सीज़र पद का विशेष महत्त्व था। डायोक्लेटियन ने इस व्यवस्था के माध्यम से सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की संभावना बढ़ाने का प्रयास किया। किंतु उसकी सेवानिवृत्ति के बाद व्यवस्था अपेक्षित रूप से स्थिर नहीं रह सकी। 305 ईस्वी में डायोक्लेटियन ने स्वेच्छा से पद त्याग किया और मैक्सिमियन को भी पद छोड़ने के लिए बाध्य किया। यह रोमन इतिहास में असाधारण घटना थी।
राजत्याग के बाद डायोक्लेटियन ने डाल्माटिया में अपने महल में जीवन बिताया और 311 ईस्वी के आसपास उसकी मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु के बाद टेट्रार्की में सत्ता-संघर्ष बढ़ गया और अंततः कॉन्स्टेंटाइन का उदय हुआ।
इस प्रकार डायोक्लेटियन ने रोमन साम्राज्य को समाप्त होने से बचाने के लिए उसके प्रशासन, सेना, अर्थव्यवस्था और राजसत्ता का व्यापक पुनर्गठन किया। उसके सुधारों से साम्राज्य की राजनीतिक और सैन्य स्थिरता पुनः स्थापित हुई, यद्यपि इसके साथ करों, प्रशासनिक नियंत्रण और राजकीय निरंकुशता में वृद्धि भी हुई। इसलिए डायोक्लेटियन को रोमन साम्राज्य का केवल एक कठोर शासक नहीं, बल्कि ऐसा व्यवस्थापक और पुनर्गठक माना जाता है जिसने तीसरी शताब्दी के संकट के बाद साम्राज्य को एक नई संस्थागत संरचना प्रदान की।
कॉन्स्टेंटाइन महान (306–337 ई.)
मुख्य लेख : कॉन्स्टेंटाइन महान
305 ईस्वी में डायोक्लेटियन के स्वेच्छा से सिंहासन त्यागने के बाद रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों के शासकों के बीच सत्ता-संघर्ष आरंभ हो गया और टेट्रार्की व्यवस्था धीरे-धीरे विघटित हो गई। इसी अशांत वातावरण में कॉन्स्टेंटाइन (306–337 ई.) का उदय हुआ, जो इतिहास में ‘कॉन्स्टेंटाइन महान’ के नाम से प्रसिद्ध है। रोमन इतिहास ही नहीं, विश्व इतिहास में भी उसका स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसके शासनकाल में रोमन साम्राज्य को नई दिशा मिली और ईसाई धर्म को अभूतपूर्व संरक्षण प्राप्त हुआ। कॉन्स्टेंटाइन का जन्म लगभग 272 ईस्वी में हुआ था। उसका पिता फ्लेवियस कॉन्स्टैंटियस एक सफल सैनिक और बाद में रोमन शासक बना। उसकी माता हेलेना साधारण परिवार से थी। बाल्यकाल में कॉन्स्टेंटाइन को विशेष सुविधाएँ नहीं मिलीं, किंतु उसने अपनी प्रतिभा, साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को एक योग्य सेनानायक के रूप में स्थापित किया। युवावस्था में उसने मिस्र, सीरिया और फ़ारस के अभियानों में भाग लेकर अपनी सैनिक क्षमता का परिचय दिया। डायोक्लेटियन और गैलेरियस के शासनकाल में वह राजदरबार से भी परिचित हुआ और प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया।
306 ईस्वी में उसके पिता कॉन्स्टैंटियस की मृत्यु ब्रिटेन के यॉर्क नगर में हुई। इसके बाद वहाँ की सेना ने कॉन्स्टेंटाइन को अपना शासक घोषित कर दिया। दूसरी ओर रोम में मैक्सेंटियस (306–312 ई.) ने भी स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। फलतः रोमन साम्राज्य में अनेक प्रतिद्वंद्वी शासक उभर आए और सत्ता के लिए संघर्ष प्रारंभ हो गया। अगले कुछ वर्षों तक कॉन्स्टेंटाइन ने धैर्यपूर्वक अपनी स्थिति सुदृढ़ की और विभिन्न विरोधियों को पराजित करते हुए अपनी शक्ति का विस्तार किया। 312 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन ने रोम के निकट मिल्वियन पुल (मिल्वियन ब्रिज) के युद्ध में मैक्सेंटियस को पराजित कर दिया। इस विजय ने उसे पश्चिमी रोमन साम्राज्य का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बना दिया। बाद में, वह पश्चिमी और पूर्वी दोनों भागों का एकमात्र सम्राट बन गया। उसका शासनकाल 306 से 337 ईस्वी तक रहा। समकालीन परंपराओं के अनुसार युद्ध से पूर्व कॉन्स्टेंटाइन को ईसाई धर्म से संबंधित एक दिव्य संकेत प्राप्त हुआ था, जिसके कारण उसने अपनी विजय का श्रेय यीशु मसीह की कृपा को दिया। कॉन्स्टेंटाइन ने 313 ईस्वी में पूर्वी शासक लिसिनियस के साथ मिलकर ‘मिलान की घोषणा’ जारी की, जिसके द्वारा रोमन साम्राज्य में ईसाइयों पर हो रहे अत्याचार समाप्त हुए और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई। साथ ही, पूर्व में जब्त की गई उनकी संपत्तियाँ भी लौटाने का आदेश दिया गया। इस घोषणा से ईसाई धर्म के इतिहास में एक नए युग का आरंभ हुआ।
यद्यपि प्रारंभ में कॉन्स्टेंटाइन और लिसिनियस सहयोगी थे, किंतु शीघ्र ही दोनों के बीच संघर्ष आरंभ हो गया। सत्ता की महत्त्वाकांक्षा और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने इस संघर्ष को और तीव्र कर दिया। 314 ईस्वी से 324 ईस्वी तक दोनों के बीच अनेक युद्ध हुए। अंततः 324 ईस्वी में एड्रियनोपल और क्राइसोपोलिस के युद्धों में कॉन्स्टेंटाइन विजयी हुआ। लिसिनियस को पराजित कर उसने संपूर्ण रोमन साम्राज्य को पुनः एक शासन के अधीन किया। इस प्रकार डायोक्लेटियन के समय से विभाजित साम्राज्य लगभग चालीस वर्षों बाद पुनः एकीकृत हो गया।
कॉन्स्टेंटाइन के सुधार
प्रशासनिक पुनर्गठन
साम्राज्य का एकमात्र शासक बनने के बाद कॉन्स्टेंटाइन ने प्रशासनिक क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने डायोक्लेटियन द्वारा स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखा, किंतु उसे और अधिक सुदृढ़ किया। उसने सम्राट की शक्ति को सर्वोच्च माना और शासन के सभी प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति अपने हाथ में रखी। सीनेट का राजनीतिक महत्त्व घटा दिया गया तथा प्रशासन को पूर्णतः सम्राट-केंद्रित बनाया गया। दीवानी और सैनिक प्रशासन को अलग-अलग संगठित किया गया, जिससे शासन अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बन सका। कॉन्स्टेंटाइन के समय भी साम्राज्य अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित था। उसने प्रांतों पर कठोर नियंत्रण बनाए रखने के लिए अधिकारियों की संख्या बढ़ा दी तथा उनके कार्यों की निगरानी हेतु गुप्तचर व्यवस्था को सुदृढ़ किया। न्याय और वित्त प्रशासन को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया गया। सम्राट के आदेश को सर्वोच्च कानून माना जाने लगा और प्रशासनिक मशीनरी पूर्णतः उसके नियंत्रण में कार्य करने लगी।
सेना का भी आधुनिकीकरण
सैनिक क्षेत्र में भी कॉन्स्टेंटाइन ने व्यापक परिवर्तन किए। उसने सेना को नागरिक प्रशासन से पूर्णतः पृथक कर दिया। 312 ईस्वी में उसने प्रेटोरियन गार्ड को समाप्त कर दिया और सेना का नियंत्रण विशेष सैनिक अधिकारियों के हाथों में सौंप दिया। सैनिक संगठन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सेना को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया। साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा हेतु ‘लिमितानेई’ (स्थायी सीमा-सेना) की व्यवस्था की गई, जबकि साम्राज्य के आंतरिक भागों में एक शक्तिशाली चलायमान ‘कोमितातेंसिस’ (केंद्रीय सेना) रखी गई, जिसे आवश्यकता पड़ने पर किसी भी क्षेत्र में भेजा जा सकता था। घुड़सवार सेना को विशेष महत्त्व दिया गया तथा जर्मन, गोथ, सार्मेटियन और अन्य बर्बर जातियों के सैनिकों को भी सेना में भर्ती किया गया। इन सुधारों के परिणामस्वरूप रोमन सेना अधिक संगठित, गतिशील और प्रभावशाली बन गई, यद्यपि विदेशी सैनिकों पर बढ़ती निर्भरता आगे चलकर साम्राज्य के लिए एक चुनौती भी सिद्ध हुई।
आर्थिक सुधार
आर्थिक क्षेत्र में कॉन्स्टेंटाइन ने साम्राज्य को स्थिर आधार प्रदान करने का प्रयास किया। उसने नई स्वर्ण मुद्रा सोलिडस का प्रचलन किया, जो अपनी शुद्धता और स्थिर मूल्य के कारण प्रसिद्ध थी। इस मुद्रा ने रोमन अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया और व्यापार को प्रोत्साहन मिला। किंतु विशाल सेना और विस्तृत प्रशासनिक तंत्र के व्यय को पूरा करने के लिए करों में वृद्धि की गई। भूमि, व्यापार तथा विभिन्न व्यवसायों पर कर लगाए गए। कर व्यवस्था अपेक्षाकृत कठोर थी और इसका बोझ विशेष रूप से किसानों तथा सामान्य जनता पर पड़ता था। परिणामस्वरूप समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती गई और धनी तथा निर्धन वर्गों के बीच की खाई और अधिक चौड़ी हो गई।
ईसाई धर्म का उत्थान
कॉन्स्टेंटाइन का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान ईसाई धर्म के प्रति उसकी संरक्षण नीति थी। उसने 313 ईस्वी में ‘मिलान की घोषणा’ द्वारा ईसाइयों पर हो रहे अत्याचार को समाप्त कर दिया और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की थी। किंतु इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कि उसने ईसाई धर्म को औपचारिक रूप से राजधर्म बनाया था या नहीं, फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि उसने ईसाइयों को अभूतपूर्व संरक्षण प्रदान किया। उसने ईसाई धर्मावलंबियों पर होने वाले अत्याचारों को समाप्त किया, उनके गिरिजाघरों को पुनर्स्थापित कराया और उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्रदान किए। उसकी माता हेलेना भी ईसाई धर्म की समर्थक थी और माना जाता है कि उसके प्रभाव से कॉन्स्टेंटाइन ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुआ था।
निकिया की महासभा
ईसाई धर्म के भीतर उत्पन्न मतभेदों को समाप्त करने के लिए कॉन्स्टेंटाइन ने 325 ईस्वी में निकिया की महासभा का आयोजन किया। यह ईसाई धर्म के इतिहास की पहली महत्त्वपूर्ण ‘एक्युमेनिकल’ (सार्वभौमिक) महासभा थी, जिसमें साम्राज्य के विभिन्न भागों से आए बिशपों ने भाग लिया। सभा में ईसाई धर्म के मूल सिद्धांतों को व्यवस्थित करने तथा ‘निकियाई आस्था-घोषणा’ के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार कॉन्स्टेंटाइनने न केवल ईसाई धर्म को संरक्षण दिया, बल्कि उसके संगठन और एकता को भी सुदृढ़ करने का प्रयास किया ईसाई धर्म के प्रसार के लिए उसने अनेक गिरिजाघरों का निर्माण करवाया। रोम, यरूशलम और बैथलेहम सहित विभिन्न नगरों में भव्य चर्च स्थापित किए गए। उसकी माता हेलेना ने भी पवित्र स्थलों पर चर्चों के निर्माण में भूमिका निभाई। इन प्रयासों से ईसाई धर्म की लोकप्रियता तीव्र गति से बढ़ी और वह रोमन समाज में एक प्रभावशाली शक्ति बन गया।
कॉन्स्टेंटिनोपल की स्थापना
कॉन्स्टेंटाइन की एक अन्य महान उपलब्धि पुराने बाइजेंटियम नगर के स्थान पर एक नए नगर की स्थापना थी। प्रारंभ में इसे ‘नोवा रोमा’ (नया रोम) कहा गया, किंतु शीघ्र ही यह उसके नाम पर कॉन्स्टेंटिनोपल (कुस्तुंतुनिया/इस्तांबुल) के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 330 ईस्वी में उसने रोम और निकोमीडिया के स्थान पर कॉन्स्टेंटिनोपल नगर को रोमन साम्राज्य की राजधानी घोषित किया, जिससे साम्राज्य की शक्ति का केंद्र पश्चिम (रोम) से पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गया। कॉन्स्टेंटिनोपल अत्यंत सामरिक तथा भौगोलिक दृष्टि से उपयुक्त स्थान पर स्थित था। यह यूरोप और एशिया के संगम पर सात पहाड़ियों पर बसा हुआ था। इसकी जलवायु स्वास्थ्यवर्धक और समशीतोष्ण थी, भूमि उपजाऊ थी तथा इसके बंदरगाह सुरक्षित और विशाल थे। तीन ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण यह नगर सुरक्षित था। इसमें प्रवेश का स्थल सीमित और संकरा था, जिससे इसकी रक्षा करना अपेक्षाकृत सरल था। समुद्रतटीय स्थिति और बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित होने के कारण कॉन्स्टेंटिनोपल शीघ्र ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया। यूरोप, पश्चिमी एशिया और सुदूर पूर्व को जोड़ने वाले अनेक व्यापारिक मार्ग इसी नगर से होकर गुजरते थे। परिणामस्वरूप विभिन्न देशों के व्यापारी यहाँ आने लगे और नगर की समृद्धि निरंतर बढ़ती गई। सामरिक सुरक्षा और व्यापारिक सुविधा के इस अद्भुत संगम के कारण यह नगर पूर्वी रोमन अथवा बाइजेंटाइन साम्राज्य का केंद्र बन गया और लगभग एक हजार वर्षों तक विश्व राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा।
कॉन्स्टेंटाइन ने इस नवीन नगर को विशाल भवनों, राजप्रासादों, चर्चों और सार्वजनिक निर्माणों से सुसज्जित किया। नगर के सौंदर्यवर्धन के लिए यूनान और एशिया माइनर से मूर्तियाँ, चित्र तथा अन्य कलात्मक वस्तुएँ मँगाई गईं। अनेक यूनानी नगरों से संगमरमर लाकर भवनों का निर्माण किया गया। इससे कॉन्स्टेंटिनोपल कला, स्थापत्य और संस्कृति का भी प्रमुख केंद्र बन गया। इस नगर की विशालता का अनुमान इसकी सार्वजनिक सुविधाओं से लगाया जा सकता है। यहाँ एक विद्यालय, एक विशाल सर्कस, दो रंगमंच, आठ सार्वजनिक स्नानागार, 153 निजी स्नानागार, 52 पोर्टिको (स्तंभयुक्त बरामदे), अनेक जलाशय, विशाल सभागार, चौदह चर्च, चौदह राजप्रासाद तथा लगभग 4,388 आवासीय भवन निर्मित किए गए थे। इन सभी निर्माणों में रोमन और यूनानी स्थापत्य कला का उत्कृष्ट समन्वय था। कॉन्स्टेंटाइन का राजप्रासाद विशेष रूप से उल्लेखनीय था, जो लगभग 150 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था और अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध था।
इतिहासकार एडवर्ड गिबन के अनुसार कॉन्स्टेंटिनोपल की दीवारों, जलप्रणालियों और अन्य सार्वजनिक निर्माणों पर अत्यधिक धन व्यय किया गया था। किंतु यह व्यय व्यर्थ नहीं गया क्योंकि यह नगर शीघ्र ही पूर्वी रोमन साम्राज्य का हृदय बन गया और अगले लगभग एक हजार वर्षों तक यूरोपीय सभ्यता का एक प्रमुख केंद्र बना रहा। इतिहासकार टी. आर. ग्लोवर के अनुसार कॉन्स्टेंटिनोपल ने एक सहस्राब्दी से भी अधिक समय तक यूरोप के लिए सुरक्षा-कवच का कार्य किया। इसने यूरोप को हूणों, बर्बर जातियों, अरबों तथा तुर्कों के आक्रमणों से बचाए रखा। साथ ही इसने यूनानी साहित्य, दर्शन और ज्ञान की परंपराओं को सुरक्षित रखा, जिन्हें बाद में पुनर्जागरण काल में पश्चिमी यूरोप ने पुनः ग्रहण किया। 1453 ईस्वी में उस्मानी तुर्कों के सुल्तान मेहमेद द्वितीय ने इस नगर पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बना लिया।
यद्यपि कॉन्स्टेंटिनोपल की स्थापना पूर्वी रोमन साम्राज्य के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई, किंतु इसका एक दुष्परिणाम भी हुआ। नई राजधानी के उत्कर्ष के साथ रोम का महत्त्व धीरे-धीरे कम होने लगा। राजनीतिक शक्ति पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गई और रोम में पोप तथा चर्च का प्रभाव बढ़ता गया। इस प्रकार रोमन साम्राज्य की पारंपरिक राजधानी का गौरव क्रमशः क्षीण होने लगा।
कॉन्स्टेंटाइन के अंतिम दिन
कॉन्स्टेंटाइन का सार्वजनिक जीवन जितना सफल था, उसका पारिवारिक जीवन उतना सुखद नहीं था। उसकी माता हेलेना से उसके संबंध मधुर थे और कहा जाता है कि हेलेना ने अपने जीवन की अंतिम साँस अपने पुत्र की गोद में ली थी। किंतु परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उसके संबंध अनेक बार तनावपूर्ण रहे।
कॉन्स्टेंटाइन ने दो विवाह किए थे। उसकी पहली पत्नी मिनर्विना थी, जिससे उसका ज्येष्ठ पुत्र क्रिस्पस उत्पन्न हुआ। बाद में उसने मैक्सिमियन की पुत्री फाउस्ता से विवाह किया। फाउस्ता से उसके तीन पुत्र—कॉन्स्टेंटाइन द्वितीय, कॉन्स्टैंटियस द्वितीय और कॉन्स्टांस तथा तीन पुत्रियाँ हुईं। क्रिस्पस एक प्रतिभाशाली सेनानायक था और उसने लिसिनियस के विरुद्ध युद्धों में अपने पिता की बड़ी सहायता की थी। किंतु 326 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन ने उसे मृत्युदंड दिलवा दिया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार उस पर फाउस्ता के साथ अनुचित संबंध रखने का आरोप लगाया गया था। कुछ इतिहासकारों का मत है कि फाउस्ता ने अपने पुत्रों के उत्तराधिकार को सुरक्षित करने के लिए क्रिस्पस के विरुद्ध षड्यंत्र रचा था। बाद में जब वास्तविकता सामने आई, तो कॉन्स्टेंटाइन ने फाउस्ता को भी मृत्युदंड दे दिया। इस घटना ने उसके पारिवारिक जीवन को गहरे संकट में डाल दिया।
335 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन ने अपने पुत्रों और भतीजों के बीच साम्राज्य के विभाजन की व्यवस्था की। 337 ईस्वी में ईस्टर के अवसर पर उसने अपने शासनकाल का उत्सव मनाया, किंतु शीघ्र ही उसकी अस्वस्थता बढ़ने लगी। जब उसे अपनी मृत्यु निकट दिखाई देने लगी, तब उसने ईसाई परंपरा के अनुसार बपतिस्मा (दीक्षा-संस्कार) ग्रहण किया। उसका विश्वास था कि इस संस्कार से वह अपने जीवन के पापों से मुक्त हो जाएगा। इसके पश्चात उसने राजकीय वस्त्र त्यागकर साधारण ईसाई वस्त्र धारण किए और 337 ईस्वी में निकोमीडिया के निकट स्थित राजप्रासाद में उसका निधन हो गया। कॉन्स्टेंटाइन के निधन से पूरे साम्राज्य में शोक की लहर फैल गई। उसकी अंतिम इच्छा के अनुसार उसका पार्थिव शरीर कॉन्स्टेंटिनोपल लाया गया और वहाँ सम्मानपूर्वक दफनाया गया। कुछ समय तक राज्य के उच्च अधिकारी और सैनिक प्रतिदिन उसके समाधि-स्थल पर जाकर उसे श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे।
कॉन्स्टेंटाइन का मूल्यांकन
कॉन्स्टेंटाइन विश्व इतिहास के सबसे प्रभावशाली तथा विवादास्पद शासकों में से एक है। कुछ इतिहासकार उसे एक निरंकुश शासक मानते हैं, जिसने रोमन गणतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करके पूर्वी शैली की राजसत्ता को प्रोत्साहित किया। उसके दरबार में पूर्वी वैभव, राजकीय आडंबर तथा सम्राट-पूजा की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आलोचकों का मत है कि उसने ईसाई धर्म का उपयोग राजनीतिक एकता स्थापित करने और अपनी सत्ता को सुदृढ़ करने के साधन के रूप में किया। इतिहासकार एडवर्ड गिबन ने यह भी लिखा है कि कॉन्स्टेंटिनोपल के निर्माण में अत्यधिक धन व्यय किया गया, जिसका भार अंततः जनता पर पड़ा। करों में वृद्धि और प्रशासनिक कठोरता के कारण सामान्य जनता को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। साथ ही, उसने अपने विरोधियों तथा संभावित प्रतिद्वंद्वियों के प्रति कठोर नीति अपनाई।
दूसरी ओर, अनेक इतिहासकार तथा ईसाई परंपरा के विद्वान उसे एक महान शासक मानते हैं। उनके अनुसार उसमें असाधारण नेतृत्व क्षमता, दृढ़ इच्छाशक्ति और संगठन-कौशल था। वह आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था तथा अपने शिष्टाचार, सौजन्य और व्यवहार-कुशलता से लोगों को प्रभावित कर लेता था। उसने साम्राज्य को राजनीतिक स्थिरता प्रदान की, प्रशासन और सेना का पुनर्गठन किया, आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास किया तथा ईसाई धर्म को संरक्षण देकर यूरोपीय इतिहास की दिशा ही बदल दी। यद्यपि वह अत्यधिक शिक्षित नहीं था, फिर भी साहित्य, कला, शिक्षा और विज्ञान के संरक्षण में उसकी गहरी रुचि थी।
कॉन्स्टेंटाइन ने शिक्षा के विकास को प्रोत्साहन दिया। उसने एथेंस के शिक्षण संस्थानों को संरक्षण प्रदान किया तथा कॉन्स्टेंटिनोपल में उच्च शिक्षा के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। यूनानी और लैटिन भाषाओं, दर्शन तथा विधिशास्त्र के अध्ययन को बढ़ावा दिया गया। कलाकारों और विद्वानों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की गईं, जिससे सांस्कृतिक जीवन को नई ऊर्जा प्राप्त हुई।
कला और स्थापत्य के क्षेत्र में उसका सबसे बड़ा योगदान कॉन्स्टेंटिनोपल की स्थापना थी। यह नगर उसकी दूरदर्शिता, कलाप्रेम और संगठन-क्षमता का जीवंत स्मारक है। प्रशासनिक दृष्टि से उसने डायोक्लेटियन द्वारा आरंभ किए गए सुधारों को आगे बढ़ाया और साम्राज्य को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया। उसने सैनिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया, सीमाओं की सुरक्षा बढ़ाई तथा शासन को अधिक प्रभावी बनाया।
धार्मिक क्षेत्र में उसका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उसने ईसाइयों पर होने वाले अत्याचारों का अंत किया, चर्च को संरक्षण प्रदान किया और ईसाई धर्म को साम्राज्य में सम्मानजनक स्थान दिलाया। यद्यपि इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है कि उसने ईसाई धर्म को औपचारिक रूप से राजधर्म बनाया था या नहीं, फिर भी यह निर्विवाद है कि उसके शासनकाल में ईसाई धर्म के विकास को अभूतपूर्व गति मिली।
इस प्रकार कॉन्स्टेंटाइन का व्यक्तित्व अनेक विरोधाभासों से युक्त था। वह एक ओर कठोर और महत्त्वाकांक्षी शासक था, तो दूसरी ओर दूरदर्शी प्रशासक, कुशल सेनानायक, कला एवं शिक्षा का संरक्षक तथा धार्मिक नीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाला सम्राट भी था। इतिहासकार एच. जी. वेल्स के अनुसार ‘कॉन्स्टेंटाइन महान निश्चय ही अत्यंत बुद्धिमान और समर्पित सम्राट था।‘ वहीं विल ड्यूरेंट का मत है कि वह एक उत्कृष्ट सेनानायक, अद्वितीय प्रशासक और उच्चकोटि का राजनेता था, जिसने डायोक्लेटियन की नीतियों को आगे बढ़ाकर रोमन साम्राज्य को दीर्घकालीन स्थायित्व प्रदान किया। जो भी हो, कॉन्स्टेंटाइन केवल एक सफल सम्राट ही नहीं था, बल्कि वह रोमन तथा यूरोपीय सभ्यता के महान रूपांतरण का सूत्रधार भी था।
उत्तर कॉन्स्टेंटाइनकालीन रोम
कॉन्स्टेंटाइन महान के बाद रोमन साम्राज्य का इतिहास विभाजन, ईसाईकरण और अंततः पतन की कहानी है। इस काल में साम्राज्य दो भागों—पश्चिमी रोमन साम्राज्य और पूर्वी रोमन साम्राज्य—में विभाजित हो गया। कॉन्स्टेंटाइन महान ने अपने जीवनकाल में ही रोमन साम्राज्य को अपने पुत्रों और भतीजों के बीच विभाजित करने की व्यवस्था कर दी थी। किंतु 337 ईस्वी में उसकी मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष आरंभ हो गया। 350 ईस्वी में सिंहासन के एक अन्य दावेदार मैग्नेंटियस ने कॉन्स्टेंटाइन के पुत्र कॉन्स्टांस की हत्या कर दी। इसके बाद कॉन्स्टांस के भाई कॉन्स्टैंटियस द्वितीय ने स्थिति पर नियंत्रण किया और 351 ईस्वी में मुरसा के युद्ध में मैग्नेंटियस को पराजित कर संपूर्ण साम्राज्य पर अपना अधिकार कर लिया।
चौथी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रोमन साम्राज्य निरंतर राजनीतिक संघर्षों और षड्यंत्रों से घिरा रहा। 376–382 ईस्वी के बीच रोमन साम्राज्य ने आक्रमणकारी गोथों के विरुद्ध अनेक युद्ध लड़े, जिन्हें सामूहिक रूप से गोथिक युद्ध कहा जाता है। 9 अगस्त 378 ईस्वी को हुए एड्रियानोपल के युद्ध में रोमन सम्राट वैलेंस पराजित हुआ, जो पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। 392 ईस्वी में फ्रैंक सेनापति अर्बोगास्ट ने सम्राट वैलेंटिनियन द्वितीय की हत्या करवा दी और युजेनियस को सम्राट घोषित कर दिया। किंतु 394 ईस्वी में सम्राट थियोडोसियस प्रथम ने फ्रिगिडस के युद्ध में अर्बोगास्ट और युजेनियस को पराजित कर उनका अंत कर दिया। इसके परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए संपूर्ण रोमन साम्राज्य पुनः एकीकृत हो गया।
395 ईस्वी में थियोडोसियस प्रथम की मृत्यु के बाद साम्राज्य स्थायी रूप से उसके दो पुत्रों के बीच विभाजित हो गया। अर्केडियस को पूर्वी रोमन साम्राज्य मिला, जिसकी राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल थी और जो आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था; जबकि होनोरियस पश्चिमी रोमन साम्राज्य का शासक बना, जिसकी राजधानी प्रारंभ में रोम तथा बाद में रावेन्ना बनी और जो लगातार आर्थिक संकटों तथा बाहरी आक्रमणों का शिकार होता रहा। यह विभाजन आगे चलकर स्थायी सिद्ध हुआ।
थियोडोसियस प्रथम की मृत्यु के तुरंत बाद विसिगोथों ने बाल्कन क्षेत्र में उपद्रव आरंभ कर दिया। पूर्वी साम्राज्य के शक्तिशाली अधिकारी रुफिनस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, किंतु 395 ईस्वी में उसकी हत्या कर दी गई। दूसरी ओर, पश्चिमी साम्राज्य में होनोरियस (393–423 ई.) अपने योग्य सेनापति स्टिलिको के प्रभाव में था। स्टिलिको ने 396–397 ईस्वी में एलरिक के नेतृत्व में आए विसिगोथों को यूनान से खदेड़ दिया तथा 406 ईस्वी में इटली में घुसी बर्बर जातियों को भी पराजित किया। यद्यपि वह साम्राज्य का सबसे सक्षम रक्षक था, फिर भी 408 ईस्वी में होनोरियस ने उसकी हत्या करवा दी, जो पश्चिमी रोमन साम्राज्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई।
स्टिलिको की मृत्यु के बाद पश्चिमी साम्राज्य की स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। 409 ईस्वी में एलरिक ने पुनः इटली पर आक्रमण किया और एक कठपुतली शासक प्रिस्कस अत्तालस को गद्दी पर बैठाया, किंतु बाद में उसे पदच्युत् कर दिया गया। 410 ईस्वी में एलरिक की मृत्यु हो गई, किंतु उसके उत्तराधिकारी अताउल्फ के नेतृत्व में विसिगोथों ने गॉल और स्पेन में अपना प्रभाव बढ़ाना जारी रखा। अताउल्फ के उत्तराधिकारी वलिया ने पश्चिमी यूरोप में विसिगोथों के प्रथम स्थायी राज्य की नींव रखी। इसी काल में वंडल, एलन, स्यूवी तथा बर्गंडियन जातियों ने भी गॉल और स्पेन में प्रवेश कर अपने-अपने राज्य स्थापित करने आरंभ कर दिए।
423 ईस्वी में होनोरियस की मृत्यु के पश्चात जोहैन्स ने सत्ता पर अधिकार कर लिया, किंतु पूर्वी सम्राट थियोडोसियस द्वितीय की सेनाओं ने उसे पराजित कर मृत्युदंड दे दिया। इसके बाद वैलेंटिनियन तृतीय (425–455 ई.) पश्चिमी साम्राज्य का शासक बना। इस काल में साम्राज्य का वास्तविक संचालन उसके सेनानायक एटियस के हाथों में था। उसी समय पूर्वी साम्राज्य में मार्कियन (450–457 ई.) का शासन स्थापित हुआ। पाँचवीं शताब्दी के मध्य में हूणों के महान नेता अत्तिला ने संपूर्ण यूरोप को आतंकित कर दिया। 451 ईस्वी में उसने गॉल पर आक्रमण किया और अनेक नगरों को नष्ट कर दिया। किंतु विसिगोथ राजा थियोडोरिक प्रथम, फ्रैंकों तथा रोमन सेनानायक एटियस की संयुक्त सेना ने कैटालोनियन मैदानों का युद्ध (चालोंस का युद्ध) में उसे पराजित कर दिया। यद्यपि इससे अत्तिला की शक्ति पूर्णतः समाप्त नहीं हुई, फिर भी गॉल की रक्षा हो गई।
452 ईस्वी में अत्तिला ने पुनः इटली पर आक्रमण किया। उसने एक्विलिया, पडुआ तथा अन्य नगरों को नष्ट कर दिया और मिलान तक पहुँच गया। किंतु शीघ्र ही वह अज्ञात कारणों से लौट गया। 453 ईस्वी में अत्तिला की अचानक मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के साथ ही हूणों का विशाल महासंघ टूट गया, किंतु उसके आक्रमणों ने पश्चिमी रोमन साम्राज्य को गंभीर क्षति पहुँचाई। अत्तिला की मृत्यु के बाद पश्चिमी रोमन साम्राज्य तेजी से पतन की ओर बढ़ा। 455 से 476 ईस्वी के बीच अनेक अल्पकालिक सम्राट सत्ता में आए, किंतु कोई भी साम्राज्य को स्थिरता प्रदान नहीं कर सका। वास्तविक शक्ति जर्मन मूल के सेनानायकों और भाड़े के सैनिकों के हाथों में चली गई। अंततः रोमलस ऑगस्टलस (475–476 ई.) पश्चिमी रोमन साम्राज्य का अंतिम सम्राट बना। पश्चिमी रोमन साम्राज्य का औपचारिक अंत 4 सितंबर 476 ईस्वी को माना जाता है, जब जर्मन मूल के सेनानायक ओडोएकर ने अंतिम पश्चिमी रोमन सम्राट रोमलस ऑगस्टलस को पदच्युत कर दिया। यद्यपि कुछ इतिहासकार पश्चिमी रोमन साम्राज्य का वास्तविक अंत 480 ईस्वी में जूलियस नेपोस की मृत्यु के साथ मानते हैं।
इसके विपरीत, पूर्वी रोमन साम्राज्य लगभग एक हजार वर्षों तक जीवित रहा और आगे चलकर बाइज़ेंटाइन साम्राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। छठी शताब्दी में सम्राट जस्टिनियन प्रथम के नेतृत्व में पूर्वी साम्राज्य ने अपने पुराने गौरव को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के अनेक भागों पर पुनः अधिकार स्थापित किया। अंततः 1453 ईस्वी में ऑटोमन तुर्क सुल्तान मेहमेद द्वितीय ने कॉन्स्टेंटिनोपल पर विजय प्राप्त कर बाइज़ेंटाइन साम्राज्य का अंत कर दिया। यद्यपि पूर्वी साम्राज्य स्वयं को निरंतर ‘रोमन साम्राज्य’ ही कहता रहा, फिर भी उसकी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना प्राचीन रोम से काफी भिन्न हो चुकी थी। बाद के मध्यकाल में स्थापित पवित्र रोमन साम्राज्य भी नाममात्र का ही रोमन साम्राज्य था और उसका प्राचीन रोमन साम्राज्य से केवल सीमित वैचारिक संबंध था।
रोमन धर्म एवं धार्मिक जीवन
मुख्य लेख : रोमन धर्म
रोमन धर्म का उद्भव और विकास
रोमन धर्म का विकास किसी एक निश्चित धार्मिक सिद्धांत के आधार पर नहीं हुआ, बल्कि यह कई शताब्दियों तक चले सांस्कृतिक संपर्क, राजनीतिक विस्तार और धार्मिक समन्वय की प्रक्रिया का परिणाम था। प्रारंभिक रोमन धार्मिक परंपराओं पर इटली की स्थानीय संस्कृतियों, विशेषकर एट्रस्कनों तथा बाद में यूनानी और पूर्वी भूमध्यसागरीय संस्कृतियों का गहरा प्रभाव पड़ा। रोमन धर्म मूलतः बहुदेववादी और अनुष्ठानप्रधान था, जिसमें राज्य, परिवार और दैनिक जीवन के लगभग प्रत्येक पक्ष को धार्मिक कर्तव्यों से जोड़ा गया था। बाद की शताब्दियों में विदेशी धार्मिक संप्रदायों के प्रवेश और अंततः ईसाई धर्म के प्रसार ने इस धार्मिक व्यवस्था को गहराई से परिवर्तित कर दिया।
प्रारंभिक रोमन धार्मिक चेतना में किसी एक सर्वोच्च देवता की अपेक्षा विभिन्न अदृश्य दैवी शक्तियों की धारणा अधिक महत्त्वपूर्ण थी। इन शक्तियों को सामान्यतः नूमिना कहा जाता था। घर, खेत, द्वार, चूल्हे, विवाह, जन्म, यात्रा और कृषि जैसी गतिविधियों से संबंधित विशिष्ट दैवी शक्तियों की कल्पना की जाती थी। परिवार के स्तर पर लारेस और पेनाटेस जैसे संरक्षक देवताओं की पूजा होती थी। इस प्रकार धर्म केवल मंदिरों और सार्वजनिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था, बल्कि रोमन परिवार और दैनिक जीवन का अभिन्न अंग था।
समय के साथ रोमन देवताओं की धार्मिक व्यवस्था अधिक स्पष्ट रूप ग्रहण करने लगी। जूपिटर आकाश, बिजली और राज्य की सर्वोच्च सत्ता से संबद्ध प्रमुख देवता था, जबकि जूनो विवाह और स्त्रियों की संरक्षिका मानी जाती थी तथा मिनर्वा बुद्धि, शिल्प और कला से संबंधित थी। इन तीनों की संयुक्त उपासना कैपिटोलाइन त्रय के रूप में विकसित हुई। इसके अतिरिक्त मार्स, वीनस, नेप्च्यून, मर्क्युरी, अपोलो और अन्य देवताओं को भी रोमन धार्मिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। प्रारंभिक रोमन धर्म पर एट्रस्कन परंपराओं का भी प्रभाव था, विशेषकर धार्मिक संकेतों, भविष्यवाणी और अनुष्ठानों की विधियों पर।
रोमन धर्म की एक प्रमुख विशेषता उसका अनुष्ठानिक और राज्य-केंद्रित स्वरूप था। रोमन लोग मानते थे कि देवताओं और राज्य के बीच एक प्रकार का पारस्परिक संबंध है, जिसे धार्मिक अनुष्ठानों के उचित पालन से बनाए रखा जा सकता है। इस अवधारणा को आधुनिक विद्वान प्रायः ‘पैक्स देओरम’ (देवताओं की शांति/कृपा) देवताओं के साथ अनुकूल संबंध की धारणा से जोड़ते हैं। इसलिए युद्ध, सार्वजनिक निर्णय, राजनीतिक कार्य और अन्य महत्त्वपूर्ण अवसरों से पूर्व धार्मिक अनुष्ठान तथा शकुनों की व्याख्या आवश्यक मानी जाती थी।
रोमन विस्तार के साथ यूनानी संस्कृति का प्रभाव अत्यंत बढ़ गया। विशेषकर तीसरी और दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी नगरों तथा हेलेनिस्टिक संसार के संपर्क ने रोमन धर्म और कला को व्यापक रूप से प्रभावित किया। रोमन देवताओं की पहचान यूनानी देवताओं के साथ की जाने लगी; उदाहरणतः जूपिटर की तुलना ज़्यूस और मिनर्वा की तुलना एथेना से की गई। अपोलो जैसे यूनानी देवता सीधे रोमन धार्मिक जीवन में प्रतिष्ठित हुए। इस प्रक्रिया को केवल धार्मिक अनुकरण के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय की व्यापक प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।
रोमन साम्राज्य के विस्तार के साथ मिस्र, सीरिया, अनातोलिया और पश्चिमी एशिया से अनेक नए धार्मिक पंथ रोम पहुँचे। आइसिस की उपासना विशेष रूप से लोकप्रिय हुई। इसी प्रकार मिथ्रास से संबंधित पंथ ने साम्राज्य के अनेक भागों में, विशेषकर सैनिक समुदायों के बीच, प्रभाव स्थापित किया। आधुनिक इतिहासलेखन में मिथ्रावाद को ईसाई धर्म का सरल या प्रत्यक्ष प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय रोमन साम्राज्य के बहुलतावादी धार्मिक वातावरण की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। साथ ही स्टोइकवाद, एपिक्यूरियनवाद, नियो-पाइथागोरियनवाद और बाद में नियो-प्लेटोनिक विचारधारा ने आत्मा, नैतिकता, ईश्वर और जीवन के उद्देश्य संबंधी चिंतन को प्रभावित किया।
यहूदी धर्म का भी रोमन धार्मिक संसार पर प्रभाव पड़ा। रोम में यहूदी समुदाय का उल्लेख दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से मिलता है। यहूदी एकेश्वरवाद, नैतिक अनुशासन और याहवे की उपासना पर आधारित धार्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते थे। रोमन राज्य के साथ उनके संबंध समय-समय पर तनावपूर्ण रहे, फिर भी यहूदी धार्मिक परंपरा ने साम्राज्य के बहुधार्मिक वातावरण में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाए रखा।
ऑगस्टस के काल से सम्राट-पूजा को रोमन राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था में विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। दिवंगत जूलियस सीज़र के देवत्वीकरण तथा ऑगस्टस के सम्मान से विकसित यह परंपरा विभिन्न प्रांतों में सम्राट की राजनीतिक निष्ठा और साम्राज्य की एकता के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुई। हालांकि सभी सम्राटों की जीवित अवस्था में समान रूप से देवता के रूप में पूजा नहीं की जाती थी; सम्राट-पूजा का स्वरूप समय, स्थान और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा।
रोमन धार्मिक संगठन में पोंटिफेक्स मैक्सिमस का पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। यह राज्य के प्रमुख धार्मिक पदों में से एक था और इसके अधीन विभिन्न धार्मिक महाविद्यालय कार्य करते थे। इनमें पोंटिफिसेस, ऑगर्स और वेस्टल कुमारियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय थीं। ऑगर्स धार्मिक शकुनों की व्याख्या करते थे और सार्वजनिक निर्णयों से पूर्व उनके मत का महत्त्व था। वेस्टल कुमारियाँ देवी वेस्टा की पवित्र अग्नि की रक्षा करती थीं। उन्हें बचपन में चुना जाता था और सामान्यतः तीस वर्षों की धार्मिक सेवा के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था। सेवा पूरी होने के बाद उन्हें अत्यंत सम्मानित सामाजिक स्थिति प्राप्त होती थी।
इस प्रकार रोमन धर्म व्यक्तिगत आस्था की अपेक्षा राज्य, परिवार, सामाजिक परंपरा और सार्वजनिक अनुष्ठानों से गहराई से जुड़ी धार्मिक व्यवस्था था। इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता उसका समन्वयकारी स्वरूप था, जिसके कारण यूनानी, एट्रस्कन, मिस्री, पूर्वी और अन्य धार्मिक परंपराएँ रोमन संसार में स्थान प्राप्त कर सकीं। अंततः ईसाई धर्म के उदय ने इस बहुदेववादी व्यवस्था को चुनौती दी और चौथी शताब्दी ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन तथा बाद के सम्राटों की नीतियों के साथ धार्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया तीव्र हुई। इस दृष्टि से रोमन धर्म का इतिहास केवल देवताओं और धार्मिक अनुष्ठानों का इतिहास नहीं, बल्कि रोमन राज्य, समाज, संस्कृति और साम्राज्यवादी विस्तार के साथ निरंतर बदलती हुई धार्मिक चेतना का इतिहास है।
ईसाई धर्म
मुख्य लेख : ईसाई धर्म
ईसाई धर्म का उद्भव पहली शताब्दी ईस्वी में रोमन साम्राज्य के अधीन यहूदिया और गलील के धार्मिक-सामाजिक परिवेश में हुआ। इसका प्रारंभ एक यहूदी धार्मिक आंदोलन के रूप में हुआ, किंतु कुछ ही शताब्दियों में यह रोमन साम्राज्य की प्रमुख धार्मिक शक्तियों में परिवर्तित हो गया। आगे चलकर ईसाई धर्म यूरोप, पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में फैलकर विश्व इतिहास की सबसे प्रभावशाली धार्मिक परंपराओं में शामिल हुआ। इसके उदय को केवल धार्मिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि रोमन साम्राज्य की सामाजिक संरचना, यहूदी धार्मिक परंपरा, राजनीतिक परिस्थितियों और भूमध्यसागरीय संसार की सांस्कृतिक गतिशीलता के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
ईसाई धर्म के केंद्रीय व्यक्तित्व यीशु मसीह (जीसस क्राइस्ट) थे। उनके जीवन के संबंध में हमारे प्रमुख स्रोत चार सुसमाचार—मत्ती, मरकुस, लूका और जॉन—हैं। इनके अतिरिक्त रोमन लेखक टेसितुस तथा यहूदी इतिहासकार जोसेफस जैसे गैर-ईसाई स्रोत भी यीशु और प्रारंभिक ईसाई आंदोलन के संबंध में सीमित जानकारी प्रदान करते हैं। यीशु के जन्म की सटीक तिथि निश्चित नहीं है। ईसाई परंपरा उन्हें बेथलेहेम में जन्मा मानती है और उनका पालन-पोषण गलील के नाज़रेथ में हुआ माना जाता है। उनके माता-पिता के रूप में मरियम और जोसेफ का उल्लेख ईसाई परंपरा में मिलता है। आधुनिक इतिहासकार इन विवरणों में धार्मिक परंपरा और ऐतिहासिक तथ्य के बीच अंतर करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि यीशु पहली शताब्दी के यहूदी धार्मिक वातावरण में सक्रिय एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे।
यीशु का सार्वजनिक जीवन मुख्यतः गलील और यहूदिया में व्यतीत हुआ। उनके उपदेशों का केंद्र ईश्वर का राज्य, पश्चाताप, नैतिक शुद्धता, प्रेम, क्षमा और सामाजिक न्याय था। उन्होंने यहूदी धार्मिक परंपरा को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसके नैतिक और आध्यात्मिक पक्ष पर विशेष बल दिया। वे बाहरी कर्मकांड की अपेक्षा अंतःकरण की शुद्धता तथा नैतिक आचरण को अधिक महत्त्व देते थे। उनके अनुसार मनुष्य का धार्मिक जीवन केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका प्रभाव उसके व्यवहार और दूसरों के प्रति दृष्टिकोण में दिखाई देना चाहिए।
यीशु की शिक्षाओं में प्रेम और करुणा का विशेष स्थान था। उन्होंने पड़ोसी से प्रेम करने के साथ-साथ शत्रुओं के प्रति भी क्षमा और सद्भाव रखने की शिक्षा दी। गरीबों, रोगियों, सामाजिक रूप से उपेक्षित व्यक्तियों और पीड़ितों के प्रति उनकी सहानुभूति उनके उपदेशों की प्रमुख विशेषता थी। उनका नैतिक संदेश मनुष्य की सामाजिक स्थिति के बजाय उसके आचरण और अंतःकरण को महत्त्व देता था। उन्होंने लोभ, अहंकार, पाखंड और अत्यधिक धन-संचय की आलोचना की तथा विनम्रता, सेवा, त्याग और आत्मसंयम को श्रेष्ठ जीवन के आधार के रूप में प्रस्तुत किया।
यीशु की शिक्षाएँ तत्कालीन यहूदी समाज के धार्मिक और सामाजिक प्रश्नों से भी जुड़ी थीं। उस समय यहूदिया रोमन राजनीतिक नियंत्रण में था और समाज में विभिन्न धार्मिक समूह सक्रिय थे। कुछ यहूदी समूह रोमन शासन से राजनीतिक मुक्ति की अपेक्षा रखते थे, जबकि अन्य धार्मिक सुधार और आध्यात्मिक पुनरुत्थान पर बल देते थे। यीशु का आंदोलन इसी व्यापक धार्मिक वातावरण में विकसित हुआ। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और उनके द्वारा ‘ईश्वर के राज्य’ की घोषणा ने धार्मिक तथा राजनीतिक दोनों स्तरों पर चिंता उत्पन्न की। हालांकि आधुनिक इतिहासकार यीशु को सीधे रोमन-विरोधी राजनीतिक विद्रोही के रूप में प्रस्तुत करने से सावधान रहते हैं।
लगभग 30 ईस्वी के आसपास यीशु को यरूशलेम में गिरफ्तार किया गया और रोमन प्राधिकारी पोंटियस पीलातुस के शासनकाल में सूली पर चढ़ाया गया। उनके मृत्युदंड की परिस्थितियों की व्याख्या पर इतिहासकारों में विभिन्न मत हैं, किंतु यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि रोमन प्रशासन ने उन्हें क्रूस पर दंडित किया। ईसाई परंपरा में उनकी मृत्यु को मानवता के पापों के प्रायश्चित्त और उद्धार से जोड़ा गया है। उनके अनुयायियों का विश्वास था कि मृत्यु के बाद वे पुनर्जीवित हुए। पुनरुत्थान में विश्वास प्रारंभिक ईसाई समुदाय की धार्मिक पहचान का केंद्रीय आधार बन गया।
यीशु की मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने उनके संदेश का प्रचार प्रारंभ किया। प्रारंभिक ईसाई आंदोलन का विकास सबसे पहले यहूदी समुदायों के भीतर हुआ, लेकिन शीघ्र ही यह गैर-यहूदी समाज तक भी पहुँचने लगा। इस विस्तार में पॉल (सेंट पॉल) की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। उसने भूमध्यसागरीय संसार के विभिन्न नगरों में ईसाई समुदायों की स्थापना की और ईसाई संदेश को व्यापक गैर-यहूदी समाज के लिए प्रस्तुत किया। उसके पत्र प्रारंभिक ईसाई साहित्य के सबसे प्राचीन स्रोतों में गिने जाते हैं।
ईसाई धर्म के प्रारंभिक विकास में रोमन साम्राज्य की राजनीतिक और आर्थिक एकता ने भी अप्रत्यक्ष रूप से सहायता की। साम्राज्य के भीतर विकसित सड़कों, समुद्री मार्गों, नगरों और व्यापारिक नेटवर्क के कारण धार्मिक विचारों और संदेशों का तीव्र प्रसार संभव हुआ। यूनानी भाषा, जो पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में व्यापक संपर्क-भाषा थी, ने भी ईसाई संदेश के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारंभिक ईसाई समुदायों को कभी-कभी स्थानीय विरोध और रोमन प्रशासन के दमन का सामना करना पड़ा, हालांकि यह दमन पूरे साम्राज्य में निरंतर और समान रूप से नहीं था।
समय के साथ ईसाई धर्म यहूदी धार्मिक आंदोलन की सीमाओं से बाहर निकलकर एक स्वतंत्र और व्यापक धार्मिक परंपरा बन गया। दूसरी और तीसरी शताब्दियों में इसके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई तथा विभिन्न नगरों में संगठित ईसाई समुदाय विकसित हुए। चौथी शताब्दी में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन की नीतियों ने ईसाई धर्म की स्थिति को निर्णायक रूप से बदल दिया। 313 ईस्वी की मिलान की व्यवस्था के बाद ईसाइयों को धार्मिक सहिष्णुता प्राप्त हुई और राज्य का दृष्टिकोण बदलने लगा। बाद में सम्राट थियोडोसियस के शासनकाल में निकेनी ईसाई धर्म को साम्राज्य की प्रमुख आधिकारिक धार्मिक परंपरा का स्थान प्राप्त हुआ।
इस प्रकार ईसाई धर्म का उद्भव पहली शताब्दी के यहूदी धार्मिक संसार में हुआ, लेकिन उसका विकास रोमन साम्राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा रहा। यीशु की शिक्षाओं ने प्रेम, करुणा, क्षमा, सेवा और नैतिक उत्तरदायित्व को केंद्रीय महत्त्व दिया, जबकि उनके अनुयायियों और विशेषकर पॉल के प्रयासों ने इस संदेश को भूमध्यसागरीय संसार में व्यापक बनाया। अंततः ईसाई धर्म ने रोमन धार्मिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए स्वयं साम्राज्य की प्रमुख धार्मिक शक्ति का रूप ग्रहण किया। इस परिवर्तन ने न केवल रोमन साम्राज्य के धार्मिक इतिहास को बदला, बल्कि यूरोप और विश्व के राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास पर भी दीर्घकालीन प्रभाव डाला।
ईसाई धर्म का प्रचार एवं प्रसार
ईसा मसीह के बाद ईसाई धर्म का प्रचार एवं प्रसार
ईसा मसीह की मृत्यु ने उनके अनुयायियों के धार्मिक जीवन में गहरा परिवर्तन उत्पन्न किया। प्रारंभ में उनके शिष्यों के सामने निराशा और अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हुई, क्योंकि जिस व्यक्ति को वे मसीहा और ईश्वर के राज्य के उद्घोषक के रूप में देखते थे, उसका रोमन शासन के अधीन क्रूस पर दंडित किया जाना उनके लिए अत्यंत आघातकारी था। किंतु शीघ्र ही उनके समुदाय में यह विश्वास दृढ़ हुआ कि ईसा मृत्यु पर विजय प्राप्त कर पुनर्जीवित हुए हैं। पुनरुत्थान में विश्वास प्रारंभिक ईसाई धर्म की केंद्रीय मान्यता बना और इसी ने शिष्यों को ईसा के संदेश के प्रचार के लिए प्रेरित किया।
ईसा की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों का प्रारंभिक केंद्र यरूशलेम रहा। यहाँ उनके शिष्यों ने एक संगठित धार्मिक समुदाय का निर्माण किया। वे सामूहिक प्रार्थना करते, ईसा की शिक्षाओं का स्मरण करते और निर्धनों तथा जरूरतमंदों की सहायता करते थे। प्रारंभिक ईसाई समुदाय अभी यहूदी धार्मिक संसार से पूरी तरह अलग नहीं हुआ था, बल्कि स्वयं को यहूदी परंपरा की निरंतरता के रूप में देखता था। धीरे-धीरे गैर-यहूदी लोगों के धर्मांतरण के साथ यह आंदोलन एक स्वतंत्र और व्यापक धार्मिक समुदाय का रूप लेने लगा।
ईसाई धर्म के प्रारंभिक विस्तार में प्रेरितों और अन्य मिशनरियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। इनमें पीटर, पॉल और जॉन प्रमुख नाम हैं। प्रारंभिक प्रचारकों ने ईसा के प्रेम, क्षमा, करुणा, सेवा और ईश्वर के राज्य के संदेश को विभिन्न नगरों और समुदायों तक पहुँचाया। गरीबों, रोगियों और सामाजिक रूप से उपेक्षित लोगों की सहायता तथा समुदाय-आधारित जीवन ने भी ईसाई धर्म को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया।
संत पीटर (लगभग 1 ई. पू.– 64/68 ई.)
मुख्य लेख : संत पीटर
संत पीटर प्रारंभिक ईसाई समुदाय के सबसे प्रमुख नेताओं में थे। ईसाई परंपरा में उन्हें ईसा के प्रमुख शिष्यों में तथा रोम के प्रथम बिशप के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। हालांकि उनके रोम आगमन की निश्चित तिथि के संबंध में ऐतिहासिक स्रोत स्पष्ट नहीं हैं। आधुनिक इतिहासकार सामान्यतः यह मानते हैं कि पहली शताब्दी के मध्य तक रोम में एक संगठित ईसाई समुदाय अस्तित्व में आ चुका था।
संत पीटर ने प्रारंभिक ईसाई समुदाय को संगठित करने और ईसा के संदेश को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंपरा के अनुसार सम्राट नीरो के शासनकाल में रोम में ईसाइयों के उत्पीड़न के दौरान संत पीटर को भी मृत्युदंड दिया गया। ईसाई परंपरा में यह माना जाता है कि उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया था और उन्होंने स्वयं को ईसा के समान मृत्यु से बचाने के लिए उलटे क्रूस पर चढ़ाए जाने की इच्छा व्यक्त की थी। किंतु इस विवरण की ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है, फिर भी ईसाई परंपरा में संत पीटर का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा।
संत पॉल (लगभग 5–64/67 ई.)
मुख्य लेख : संत पॉल
ईसाई धर्म के विश्वव्यापी विस्तार में संत पॉल की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थी। उनका जन्म सिलिसिया के टार्सस नगर में हुआ था और वे यहूदी धार्मिक परंपरा में शिक्षित हुए थे। प्रारंभ में वे ईसाई आंदोलन के विरोधी थे, किंतु बाद में उनके जीवन में ऐसा धार्मिक परिवर्तन आया जिसने उन्हें ईसा के सबसे सक्रिय प्रचारकों में बदल दिया। संत पॉल की सबसे महत्त्वपूर्ण देन यह थी कि उन्होंने ईसा के संदेश को केवल यहूदियों तक सीमित न मानकर सभी मानव समुदायों के लिए सार्वभौमिक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ईसा में विश्वास और ईश्वर की कृपा मानव उद्धार के लिए केंद्रीय हैं तथा गैर-यहूदी लोगों को ईसाई समुदाय में प्रवेश के लिए यहूदी धार्मिक कानूनों के सभी अनुष्ठानों का पालन करना आवश्यक नहीं है। इस विचार ने ईसाई धर्म को यहूदी समुदाय की सीमाओं से बाहर निकालने में निर्णायक भूमिका निभाई। पॉल ने एशिया माइनर, यूनान और भूमध्यसागरीय संसार के अनेक नगरों की यात्राएँ कीं और वहाँ ईसाई समुदायों की स्थापना या संगठन में योगदान दिया। उनके नाम से संबद्ध पत्र प्रारंभिक ईसाई साहित्य के सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोतों में हैं। इन पत्रों में विश्वास, प्रेम, नैतिक जीवन, समुदाय और उद्धार जैसे विषयों पर विचार मिलता है। उनकी मृत्यु की निश्चित परिस्थितियाँ ज्ञात नहीं हैं, किंतु ईसाई परंपरा उन्हें नीरो के शासनकाल में रोम में शहीद हुआ मानती है।
संत जॉन (लगभग 6–100 ई.)
मुख्य लेख : संत जॉन
संत जॉन भी प्रारंभिक ईसाई परंपरा के प्रमुख व्यक्तित्वों में माने जाते हैं। उनके संबंध में ऐतिहासिक जानकारी अपेक्षाकृत सीमित और परंपराओं से मिश्रित है। ईसाई परंपरा उन्हें एशिया माइनर के ईसाई समुदायों से जोड़ती है। ‘प्रकाशितवाक्य’ का लेखक स्वयं को ‘जॉन’ नाम से संबोधित करता है और बताता है कि वह पटमोस द्वीप पर था। हालांकि आधुनिक इतिहासकार इस लेखक की पहचान को सीधे प्रेरित जॉन के साथ निश्चित रूप से नहीं जोड़ते। इसलिए इतिहासलेखन में ‘जॉन’ और प्रेरित जॉन के बीच अंतर रखना आवश्यक माना जाता है। प्रकाशितवाक्य में रोमन सत्ता, नैतिक पतन और धार्मिक संघर्षों की पृष्ठभूमि में अंतिम न्याय, ईश्वर की विजय और एक नई धार्मिक व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की गई है। इसमें संकटग्रस्त ईसाई समुदायों को धैर्य, विश्वास और आशा बनाए रखने का संदेश दिया गया।
ईसाई धर्म का विस्तार
पहली शताब्दी के उत्तरार्ध तक ईसाई समुदाय यरूशलेम से आगे बढ़कर सीरिया, एशिया माइनर, यूनान, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका और रोम तक पहुँच चुके थे। रोमन साम्राज्य की सड़कों, समुद्री व्यापारिक मार्गों, नगरों और व्यापक प्रशासनिक संपर्क-व्यवस्था ने इस विस्तार को अप्रत्यक्ष रूप से सुविधा प्रदान की। यूनानी भाषा के व्यापक प्रयोग ने भी ईसाई संदेश को भूमध्यसागरीय संसार में प्रसारित करने में सहायता की। दूसरी और तीसरी शताब्दियों में ईसाई धर्म को विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक विरोध और कभी-कभी राजकीय दमन का सामना करना पड़ा। किंतु यह उत्पीड़न पूरे साम्राज्य में निरंतर या समान रूप से नहीं हुआ। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ईसाइयों की स्थिति बदलती रही। इसके बावजूद ईसाई समुदायों की संख्या बढ़ती गई और उनके धार्मिक संगठन अधिक व्यवस्थित होते गए। चौथी शताब्दी में स्थिति निर्णायक रूप से बदल गई। सम्राट कॉन्स्टेंटाइन की धार्मिक नीति के कारण 313 ईस्वी के बाद ईसाइयों को व्यापक धार्मिक सहिष्णुता प्राप्त हुई। इसके बाद ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण मिलने लगा और 325 ईस्वी की नाइसिया परिषद ने ईसाई धर्म के सिद्धांतों को संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
इस प्रकार ईसा की मृत्यु के बाद प्रारंभ हुआ छोटा धार्मिक समुदाय धीरे-धीरे एक संगठित और व्यापक धर्म में परिवर्तित हुआ। पीटर ने प्रारंभिक समुदाय के संगठन में योगदान दिया, पॉल ने ईसाई संदेश को गैर-यहूदी संसार तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई और जॉन से संबद्ध परंपराओं ने ईसाई धर्म की आध्यात्मिक एवं भविष्यदर्शी धारणाओं को समृद्ध किया। उनके और अन्य प्रारंभिक प्रचारकों के प्रयासों से ईसाई धर्म पहली शताब्दी के एक सीमित धार्मिक आंदोलन से विकसित होकर रोमन साम्राज्य की प्रमुख धार्मिक शक्तियों में परिवर्तित होने की दिशा में अग्रसर हुआ।
ईसाई धर्म के विकास का द्वितीय चरण
रोमन सम्राटों का विरोध
ईसाई धर्म के प्रारंभिक विकास का दूसरा चरण लगभग पहली से चौथी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक माना जाता है। इस अवधि में ईसाई धर्म का प्रसार निरंतर होता रहा, किंतु उसे रोमन साम्राज्य के विभिन्न सम्राटों की ओर से समय-समय पर विरोध और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। ईसा मसीह की मृत्यु के बाद उनके शिष्यों और प्रचारकों ने यरूशलेम से लेकर सीरिया, एशिया माइनर, यूनान, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका और रोम तक ईसाई धर्म का प्रचार किया। दूसरी शताब्दी ईस्वी तक ईसाई समुदाय साम्राज्य के अनेक नगरों में स्थापित हो चुका था। सम्राट ट्राजन के शासनकाल में प्लिनी द यंगर ने भी लिखा कि ईसाई धर्म नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा था।
रोमन शासकों और ईसाइयों के बीच संघर्ष के कई कारण थे। रोमन राज्य में धार्मिक सहिष्णुता का अर्थ सामान्यतः यह था कि विभिन्न समुदाय अपने-अपने देवताओं की पूजा कर सकते थे और राज्य की धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते थे। इसके विपरीत ईसाई एकेश्वरवादी थे और केवल एक ईश्वर की उपासना को स्वीकार करते थे। वे रोमन देवताओं की पूजा तथा सम्राट-पूजा में भाग लेने से इनकार करते थे। रोमन अधिकारियों को यह केवल धार्मिक असहमति नहीं, बल्कि राज्य के प्रति निष्ठा की कमी प्रतीत होती थी। ईसाइयों की गुप्त सभाओं और उनके विशिष्ट धार्मिक आचरण के कारण भी उनके संबंध में अनेक अफवाहें फैलती थीं।
रोमन समाज के कुछ वर्गों में ईसाई धर्म की लोकप्रियता भी शासकों के लिए चिंता का विषय बन गई। ईसाई धर्म ने गरीबों, दासों, रोगियों, विधवाओं और सामाजिक रूप से उपेक्षित लोगों को धार्मिक समुदाय में सम्मान और समानता का भाव प्रदान किया। ईसाइयों की सेवा, परोपकार और सामुदायिक संगठन ने उनके प्रभाव को बढ़ाया। दूसरी ओर, रोमन समाज के पारंपरिक धार्मिक मूल्यों से उनकी दूरी ने उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा।
ईसाइयों के विरुद्ध पहला प्रमुख राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न सम्राट नीरो के शासनकाल में हुआ। 64 ईस्वी में रोम में भीषण आग लगी, जिसने नगर के बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया। आग के वास्तविक कारणों को लेकर निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, किंतु नीरो ने जनता में अपने प्रति बढ़ते संदेह को कम करने के लिए ईसाइयों पर इसका आरोप लगाया। इसके बाद अनेक ईसाइयों को गिरफ्तार कर कठोर यातनाएँ दी गईं और मृत्युदंड दिया गया। ईसाई परंपरा के अनुसार इसी काल में संत पीटर और संत पाल की भी मृत्यु हुई, यद्यपि उनके मृत्युदंड की परिस्थितियों के सभी विवरण निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं हैं। नीरो के अत्याचारों ने ईसाई धर्म को समाप्त करने के बजाय उसके अनुयायियों में त्याग और विश्वास की भावना को मजबूत किया।
नीरो के बाद ईसाइयों की स्थिति सम्राट-दर-सम्राट बदलती रही। डोमिशियन के शासनकाल में कुछ ईसाइयों पर कार्रवाई के प्रमाण मिलते हैं, किंतु व्यापक साम्राज्यव्यापी उत्पीड़न का स्पष्ट प्रमाण नहीं है। ट्राजन के समय ईसाइयों के संबंध में यह नीति बनी कि केवल ईसाई होने के कारण सक्रिय खोज करके उन्हें दंडित न किया जाए, लेकिन यदि वे विधिवत आरोपित किए जाएँ और रोमन धार्मिक परंपराओं का पालन करने से इनकार करें, तो उन्हें दंडित किया जा सकता था। इस प्रकार दूसरी शताब्दी में ईसाइयों की स्थिति स्थानीय परिस्थितियों और अधिकारियों के व्यवहार पर निर्भर करती थी।
तीसरी शताब्दी में सम्राट डेसियस और बाद में वैलेरियन के समय ईसाइयों के विरुद्ध अधिक संगठित कार्रवाई हुई। विशेष रूप से डेसियस ने साम्राज्य के नागरिकों से सार्वजनिक धार्मिक बलिदान करने की अपेक्षा की। ईसाइयों के लिए यह गंभीर समस्या थी, क्योंकि वे अन्य देवताओं की पूजा से इनकार करते थे। इसके परिणामस्वरूप अनेक ईसाइयों को कारावास, संपत्ति की जब्ती और अन्य दंडों का सामना करना पड़ा। सम्राट डायोक्लेटियन के शासनकाल में 303 ईस्वी से ईसाइयों के विरुद्ध सबसे व्यापक और कठोर उत्पीड़न आरंभ हुआ। चर्चों को नष्ट किया गया, धार्मिक ग्रंथों को जब्त किया गया और अनेक ईसाइयों को दंडित किया गया। फिर भी यह अभियान ईसाई धर्म को समाप्त नहीं कर सका।
ईसाई धर्म की विजय
चौथी शताब्दी के प्रारंभ में रोमन राज्य की नीति निर्णायक रूप से बदलने लगी। सम्राट गैलेरियस ने 311 ईस्वी में ईसाइयों के प्रति सहिष्णुता की घोषणा की। इसके बाद सम्राट कॉन्स्टेंटाइन के उदय ने ईसाई धर्म के इतिहास में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। 312 ईस्वी में मिल्वियन पुल के युद्ध से पूर्व कॉन्स्टेंटाइन के ईसाई प्रतीक से संबंधित अनुभव की परंपरा प्रसिद्ध है। युद्ध में विजय के बाद उसने ईसाई धर्म के प्रति संरक्षण की नीति अपनाई। 313 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन और लिसिनियस के बीच हुए समझौते, जिसे सामान्यतः ‘मिलान की राजाज्ञा’ कहा जाता है, के द्वारा ईसाइयों सहित विभिन्न धार्मिक समुदायों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई तथा जब्त की गई ईसाई संपत्तियों की वापसी की व्यवस्था की गई।
कॉन्स्टेंटाइन ने चर्च को आर्थिक और राजनीतिक संरक्षण दिया तथा बिशपों को कई विशेषाधिकार प्रदान किए। 325 ईस्वी में निकाइया की धर्मसभा का आयोजन भी उसके शासनकाल की महत्त्वपूर्ण घटना थी। इससे ईसाई धर्म के संगठन और सिद्धांतों को अधिक स्पष्ट रूप मिला।
ईसाई धर्म को अंतिम रूप से राजकीय सर्वोच्चता सम्राट थियोडोसियस प्रथम के शासनकाल में मिली। 380 ईस्वी की ‘थेसालोनिकी की राजाज्ञा’ द्वारा निकाइया-समर्थित ईसाई विश्वास को रोमन साम्राज्य का आधिकारिक धार्मिक मानक बनाया गया। 381 ईस्वी में कॉन्स्टेंटिनोपल की धर्मसभा ने इस धार्मिक व्यवस्था को और सुदृढ़ किया। इसके बाद पारंपरिक रोमन बहुदेववादी धर्मों का सार्वजनिक प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा।
इस प्रकार ईसाई धर्म ने लगभग तीन शताब्दियों तक विरोध और उत्पीड़न का सामना करने के बाद रोमन साम्राज्य में असाधारण सफलता प्राप्त की। इसका प्रसार केवल राजनीतिक संरक्षण का परिणाम नहीं था, बल्कि उसके संगठित धार्मिक समुदाय, नैतिक शिक्षाओं, सेवा-भावना और व्यापक सामाजिक आधार ने भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः ईसाई धर्म ने रोमन साम्राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना को गहराई से बदल दिया तथा यूरोपीय इतिहास की दिशा को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
ईसाई धर्म की सफलता के कारण
ईसाई धर्म की सफलता केवल रोमन सम्राटों के राजनीतिक संरक्षण का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे अनेक सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और संगठनात्मक कारण कार्यरत थे। पहली शताब्दी ईस्वी में एक छोटे धार्मिक आंदोलन के रूप में आरंभ होकर यह धर्म कुछ शताब्दियों में रोमन साम्राज्य का प्रमुख धर्म बन गया। इसकी सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे।
व्यापक ग्रहणशीलता
ईसाई धर्म ने अपने विकास के दौरान तत्कालीन धार्मिक और दार्शनिक वातावरण के अनेक विचारों को आत्मसात किया। यहूदी धर्म से एकेश्वरवाद, नैतिकता, पाप, पश्चाताप और ईश्वर की न्यायपूर्ण सत्ता जैसी धारणाएँ ग्रहण की गईं। यूनानी दर्शन तथा स्टोइक विचारधारा से मानव-बंधुत्व, आत्मसंयम और नैतिक जीवन के विचारों को बल मिला। पूर्वी धार्मिक परंपराओं से भी कुछ धारणाओं का प्रभाव ईसाई धार्मिक वातावरण पर पड़ा। इस ग्रहणशीलता ने ईसाई धर्म को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया।
गरीबों और पीड़ितों का समर्थन
ईसाई धर्म ने गरीबों, रोगियों, दासों, विधवाओं और समाज के अन्य उपेक्षित वर्गों को विशेष सम्मान दिया। ईसा मसीह और उनके अनुयायियों ने दीन-दुखियों की सेवा को धार्मिक कर्तव्य माना। इससे उन वर्गों में ईसाई धर्म के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ, जिन्हें रोमन समाज में पर्याप्त सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी। चर्चों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता और सामुदायिक सहयोग ने भी इसकी लोकप्रियता बढ़ाई।
प्रेम, क्षमा और करुणा का संदेश
ईसा की शिक्षाओं में प्रेम, क्षमा, दया और करुणा का विशेष स्थान था। उन्होंने अपने अनुयायियों को शत्रुओं से भी प्रेम करने तथा बुराई का उत्तर भलाई से देने की शिक्षा दी। इस नैतिक संदेश ने हिंसा, सामाजिक असमानता और राजनीतिक संघर्षों से प्रभावित समाज में लोगों को मानसिक शांति और नैतिक आशा प्रदान की।
समानता और मानवता का आदर्श
ईसाई धर्म ने सभी मनुष्यों को ईश्वर की संतान माना। उसकी धार्मिक दृष्टि में व्यक्ति का मूल्य केवल उसके धन, जन्म या सामाजिक स्थिति से निर्धारित नहीं होता था। यह विचार विशेष रूप से दासों, निर्धनों और सामाजिक रूप से उपेक्षित लोगों के लिए आकर्षक था। इससे ईसाई समुदाय में भाईचारे और सामुदायिक एकता की भावना विकसित हुई।
उत्पीड़न और बलिदान
रोमन शासन के विभिन्न कालों में ईसाइयों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। अनेक ईसाइयों ने अपने धार्मिक विश्वास से समझौता करने के बजाय मृत्यु स्वीकार की। शहीदों के त्याग और साहस ने अनुयायियों के विश्वास को मजबूत किया तथा बाहरी समाज में भी उनके प्रति सम्मान और सहानुभूति उत्पन्न की। इस प्रकार उत्पीड़न ईसाई धर्म को समाप्त करने के बजाय कई बार उसके संगठन और धार्मिक उत्साह को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।
सरल धार्मिक व्यवस्था
ईसाई धर्म में अत्यधिक जटिल कर्मकांडों और महँगे धार्मिक अनुष्ठानों की अनिवार्यता नहीं थी। ईश्वर की उपासना के साथ प्रेम, सेवा, नैतिक जीवन और परोपकार को महत्त्व दिया गया। इससे सामान्य लोगों के लिए धर्म को अपनाना अपेक्षाकृत सरल हुआ।
ऐतिहासिक व्यक्तित्व का प्रभाव
ईसा मसीह का जीवन और उनके उपदेश ईसाई धर्म की सफलता का महत्त्वपूर्ण आधार बने। वे एक ऐतिहासिक धार्मिक व्यक्तित्व थे, जिनके जीवन, मृत्यु और शिक्षाओं ने उनके अनुयायियों पर गहरा प्रभाव डाला। उनके शिष्यों ने उनके जीवन और संदेश को आगे बढ़ाया तथा अनेक क्षेत्रों में धार्मिक समुदायों का निर्माण किया।
धार्मिक साहित्य और प्रचार
नए नियम के ग्रंथों, विशेषकर सुसमाचारों तथा संत पाल के पत्रों ने ईसाई सिद्धांतों के प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। संत पाल ने यूनानी-भाषी पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों और रोमन विश्व के अनेक नगरों में ईसाई धर्म का प्रचार किया। लिखित साहित्य और मौखिक प्रचार के माध्यम से ईसाई विचार दूर-दूर तक पहुँचे।
चर्च संगठन की भूमिका
ईसाई धर्म की सफलता में चर्च के संगठित स्वरूप का विशेष योगदान था। विभिन्न नगरों में धार्मिक समुदाय स्थापित हुए और बिशपों तथा अन्य धार्मिक अधिकारियों के माध्यम से संगठन विकसित हुआ। 314 ईस्वी की आर्ल्स धर्मसभा और 325 ईस्वी की निकाइया धर्मसभा ने ईसाई समुदाय के संगठन तथा सिद्धांतगत एकता को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रोमन शासकों का संरक्षण
चौथी शताब्दी में ईसाई धर्म को निर्णायक राजनीतिक संरक्षण मिला। 311 ईस्वी में गैलेरियस ने सहिष्णुता की नीति अपनाई और 313 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन तथा लिसिनियस के समझौते के बाद ईसाइयों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई। बाद में कॉन्स्टेंटाइन ने चर्च को व्यापक संरक्षण दिया। अंततः 380 ईस्वी में थियोडोसियस प्रथम के शासनकाल में निकाइया-समर्थित ईसाई धर्म को साम्राज्य का आधिकारिक धार्मिक मानक बनाया गया।
इस प्रकार ईसाई धर्म की सफलता अनेक कारकों के संयुक्त परिणामस्वरूप हुई। इसकी नैतिक शिक्षाएँ, सेवा-भावना, समानता का आदर्श, मजबूत चर्च संगठन, प्रभावी प्रचार तथा अंततः रोमन शासकों का संरक्षण इसके विस्तार के प्रमुख आधार बने। इसका प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने रोमन समाज, संस्कृति और आगे चलकर यूरोपीय सभ्यता के विकास को भी गहराई से प्रभावित किया।
ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांत
ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांतों का विकास ईसा मसीह की शिक्षाओं, उनके अनुयायियों के विचारों तथा बाद की चर्च-परंपराओं के आधार पर हुआ। प्रारंभिक ईसाई धर्म में बाहरी कर्मकांड की अपेक्षा आंतरिक शुद्धता, ईश्वर में विश्वास, प्रेम, क्षमा, दया, सेवा और नैतिक जीवन पर अधिक बल दिया गया था। ईसा का मानना था कि मनुष्य का वास्तविक धर्म उसके आचरण और हृदय की पवित्रता में निहित है। किंतु ईसा की मृत्यु के बाद ईसाई धर्म के संगठित रूप में विकसित होने के साथ अनेक धार्मिक संस्कारों और सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया गया। आगे चलकर चर्च ने इन्हें ईसाई धार्मिक जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बना दिया।
प्रमुख संस्कार
ईसाई परंपरा में सात प्रमुख संस्कारों की मान्यता विकसित हुई—बपतिस्मा, दृढ़ीकरण, पवित्र परमप्रसाद, प्रायश्चित, रोगियों का अभिषेक, पुरोहिताभिषेक और विवाह। बपतिस्मा (बैपटिज्म) ईसाई धर्म में प्रवेश का प्रमुख संस्कार है। इसमें जल का प्रयोग किया जाता है, जो पाप से शुद्धि, आध्यात्मिक पुनर्जन्म और नए धार्मिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। इसके माध्यम से व्यक्ति ईसाई समुदाय का सदस्य बनता है। दृढ़ीकरण (कंफर्मेशन) के माध्यम से व्यक्ति अपने ईसाई विश्वास की पुष्टि करता है और धार्मिक जीवन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। इसकी आयु और विधि विभिन्न ईसाई परंपराओं में अलग-अलग रही है। पवित्र परमप्रसाद (होली यूकारिस्ट) ईसा के अंतिम भोज की स्मृति से संबंधित है। इसमें ईसा के बलिदान और उनके अनुयायियों के साथ स्थापित आध्यात्मिक संबंध का स्मरण किया जाता है। यह ईसाई उपासना का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग बन गया। प्रायश्चित (पेनेंस) का उद्देश्य पापों की स्वीकारोक्ति, पश्चात्ताप और आध्यात्मिक सुधार है। इसके माध्यम से व्यक्ति ईश्वर की क्षमा प्राप्त करने और नैतिक जीवन की ओर लौटने का प्रयास करता है। रोगियों का अभिषेक (ऐनॉइंटिंग ऑफ द सिक) गंभीर रूप से बीमार या मृत्यु के निकट व्यक्ति के लिए किया जाने वाला धार्मिक संस्कार है। इसमें तेल के अभिषेक के माध्यम से ईश्वर की कृपा, सांत्वना और आध्यात्मिक शक्ति की कामना की जाती है। पुरोहिताभिषेक (ऑर्डिनेशन) के द्वारा व्यक्ति को पादरी, बिशप अथवा अन्य धार्मिक पद के लिए नियुक्त किया जाता है। विवाह संस्कार पति-पत्नी के संबंध को धार्मिक और पवित्र बंधन के रूप में स्थापित करता है।
त्रित्व का सिद्धांत
ईसाई धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत त्रित्व या त्रिमूर्ति है। इसके अनुसार एक ही परमेश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा—इन तीन व्यक्तित्वों में विद्यमान है। ये तीनों अलग-अलग व्यक्तित्व होते हुए भी एक ही दिव्य सत्ता के अंग माने जाते हैं। चौथी शताब्दी में निकिया की धर्मसभा (325 ई.) और बाद की धर्मसभाओं के माध्यम से इस सिद्धांत को ईसाई धर्मशास्त्र में स्पष्ट रूप दिया गया।
अवतार का सिद्धांत
ईसाई धर्म के अनुसार परमेश्वर का वचन मानव रूप में ईसा मसीह के रूप में प्रकट हुआ। ईसा को ईश्वर का पुत्र तथा मानवता का उद्धारकर्ता माना गया। उनके जीवन, शिक्षाओं, मृत्यु और पुनरुत्थान को मानव मुक्ति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
मूल पाप और मानव-पतन का सिद्धांत
ईसाई परंपरा के अनुसार आदम और हव्वा के प्रथम पाप के कारण मानव जाति ईश्वर के साथ अपने मूल संबंध से दूर हो गई। इस घटना को मानव-पतन की संकल्पना से समझाया जाता है। बाद की ईसाई धर्मशास्त्रीय परंपराओं में इसे मूल पाप की धारणा से जोड़ा गया। मानव को ईश्वर की कृपा के माध्यम से आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त होती है।
कुँवारी मरियम से जन्म
ईसाई विश्वास के अनुसार ईसा मसीह का जन्म कुँवारी मरियम से हुआ। इसे ईश्वर की विशेष इच्छा और दैवी हस्तक्षेप का परिणाम माना जाता है। यह सिद्धांत ईसा के विशिष्ट दैवी स्वरूप को स्थापित करने वाली प्रमुख मान्यताओं में शामिल है।
ईसा का मानवीय और दैवी स्वरूप
ईसाई धर्मशास्त्र में ईसा को पूर्णतः मानव और पूर्णतः दैवी दोनों माना गया। वे मानव के रूप में जन्मे, दुःख और मृत्यु का अनुभव किया, किंतु साथ ही उन्हें परमेश्वर के पुत्र और दैवी सत्ता से अभिन्न माना गया। पाँचवीं शताब्दी में चाल्सीडन की धर्मसभा (451 ई.) ने इस विषय पर ईसाई धर्मशास्त्र की प्रमुख मान्यता को और स्पष्ट किया।
प्रायश्चित और पुनरुत्थान
ईसाइयों के अनुसार ईसा मसीह ने मानवता के पापों के प्रायश्चित के लिए क्रूस पर अपना जीवन बलिदान किया। उनकी मृत्यु को मानव मुक्ति के धार्मिक सिद्धांत से जोड़ा गया। इसके साथ ही पुनरुत्थान ईसाई विश्वास का केंद्रीय आधार है। ईसाई परंपरा के अनुसार क्रूस पर मृत्यु के तीसरे दिन ईसा पुनर्जीवित हुए। पुनरुत्थान को मृत्यु पर जीवन की विजय, आशा और अनंत जीवन का प्रतीक माना जाता है।
ईसाई धर्म में ईसा के पुनरागमन की धारणा भी महत्त्वपूर्ण है। विश्वास किया जाता है कि भविष्य में ईसा पुनः आएँगे और अंतिम न्याय की स्थापना होगी। यह विश्वास ईसाइयों को नैतिक जीवन, सदाचार और धार्मिक आस्था बनाए रखने के लिए प्रेरित करता रहा।
विभिन्न संप्रदायों का विकास
ईसाई धर्म के विस्तार के साथ उसके सिद्धांतों की व्याख्या को लेकर अनेक मतभेद उत्पन्न हुए। इनमें एरियन मत विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था। एरियस का मत था कि पुत्र अर्थात् ईसा, पिता परमेश्वर के समान शाश्वत और समान सत्ता वाले नहीं हैं। निकिया की धर्मसभा (325 ई.) ने इस मत को अस्वीकार कर ईसा की दैवी समानता के पक्ष में निर्णय दिया। नेस्टोरियन मत ईसा के मानवीय और दैवी स्वरूप तथा मरियम की धार्मिक उपाधि से संबंधित विवादों से विकसित हुआ। 431 ई. में इफिसुस की धर्मसभा ने नेस्टोरियस के मत को अस्वीकार कर दिया। इसके अतिरिक्त, ग्नॉस्टिक विचारधारा ने गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान को मुक्ति का साधन माना। दूसरी ओर मनीखी धर्म ईसाई धर्म से स्वतंत्र एक द्वैतवादी धार्मिक परंपरा थी, जिसने ईसाई जगत सहित रोमन साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों को प्रभावित किया।
ईसाई चर्च का संगठन
ईसाई धर्म के विस्तार में चर्च संगठन की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। स्थानीय समुदायों का नेतृत्व बिशपों के हाथों में आया और धीरे-धीरे रोम, एंटिओक, अलेक्ज़ांड्रिया, यरूशलेम तथा कॉन्स्टैंटिनोपुल जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्र विकसित हुए। धर्मसभाओं के माध्यम से सिद्धांतों को व्यवस्थित किया गया और धार्मिक मतभेदों का समाधान करने का प्रयास किया गया।
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भी चर्च ने यूरोप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने शिक्षा, साहित्य, प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, सामाजिक सेवा तथा नैतिक व्यवस्था के निर्माण में योगदान दिया। इस प्रकार ईसाई धर्म के सिद्धांतों और चर्च संगठन ने न केवल रोमन साम्राज्य के धार्मिक जीवन को प्रभावित किया, बल्कि मध्ययुगीन यूरोपीय सभ्यता के निर्माण में भी गहरी भूमिका निभाई।
चर्च का प्रारंभिक विकास
ईसाई धर्म के उदय के साथ ही उसके अनुयायियों को एक संगठित धार्मिक संस्था की आवश्यकता अनुभव हुई। प्रारंभिक अवस्था में ‘चर्च’ शब्द का अर्थ किसी विशेष भवन से अधिक ईसाइयों की धार्मिक सभा या समुदाय से था। यूनानी शब्द एक्लेसिया का अर्थ सभा अथवा समुदाय था और प्रारंभिक ईसाई इसी अर्थ में इसका प्रयोग करते थे। बाद में जिस भवन में ईसाई सामूहिक प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठान करते थे, उसके लिए भी ‘चर्च’ शब्द प्रचलित हो गया। ईसा मसीह की मृत्यु के बाद यरूशलेम ईसाई समुदाय का प्रारंभिक प्रमुख केंद्र बना। यहीं उनके शिष्यों ने संगठित धार्मिक समुदाय का निर्माण किया और ईसा के उपदेशों का प्रचार आरंभ किया। प्रारंभिक ईसाई समुदाय छोटे समूहों में एकत्रित होकर प्रार्थना, धार्मिक शिक्षा तथा सामूहिक भोजन करते थे।
ईसाई धर्म के प्रसार के साथ ये छोटे-छोटे समुदाय रोमन साम्राज्य के विभिन्न नगरों में स्थापित होने लगे। रोम में भी पहली शताब्दी ईस्वी के मध्य तक एक संगठित ईसाई समुदाय अस्तित्व में आ चुका था। संत पाल ने रोम के ईसाइयों को अपना प्रसिद्ध पत्र लिखा और परंपरा के अनुसार संत पीटर भी रोम में ईसाई समुदाय के प्रमुख नेता रहे। बाद की ईसाई परंपरा ने रोम के चर्च को संत पीटर और संत पाल की स्मृतियों से जोड़कर विशेष प्रतिष्ठा प्रदान की। ‘कैथोलिक’ शब्द का अर्थ ‘सार्वभौम’ अथवा ‘विश्वव्यापी’ है और यह धीरे-धीरे उस व्यापक ईसाई समुदाय के लिए प्रयुक्त होने लगा जो स्वयं को संपूर्ण ईसाई जगत का प्रतिनिधि मानता था।
प्रारंभिक चर्च संगठन
प्रारंभिक ईसाई समुदायों का संगठन स्थानीय स्तर पर विकसित हुआ। प्रत्येक समुदाय में धार्मिक सभाओं का संचालन वरिष्ठ धार्मिक व्यक्तियों द्वारा किया जाता था। प्रारंभ में प्रेस्बाइटर अर्थात् वरिष्ठ पुरोहित और डियाकोन अर्थात् उपयाजक धार्मिक कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उपयाजक गरीबों, विधवाओं और जरूरतमंदों की सहायता, धार्मिक सभाओं की व्यवस्था तथा अन्य सामुदायिक कार्यों में सहयोग करते थे।
जैसे-जैसे ईसाई समुदायों की संख्या बढ़ती गई, प्रत्येक नगर में एक प्रमुख धार्मिक अधिकारी की आवश्यकता महसूस हुई। इस प्रकार बिशप का पद अधिक महत्त्वपूर्ण बन गया। दूसरी शताब्दी तक अनेक क्षेत्रों में बिशप स्थानीय ईसाई समुदाय के सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनके अधीन प्रेस्बाइटर और डियाकोन कार्य करते थे। बिशप का मुख्य कार्य धार्मिक सिद्धांतों की रक्षा, उपासना का संचालन, धार्मिक अनुशासन बनाए रखना तथा समुदाय का नेतृत्व करना था।
ईसाई धर्म के विस्तार के साथ विभिन्न नगरों और प्रांतों के चर्चों के बीच समन्वय की आवश्यकता भी बढ़ी। बड़े और महत्त्वपूर्ण नगरों के बिशपों को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त होने लगी। बाद में इन्हें मेट्रोपोलिटन बिशप कहा गया। उनके अधीन किसी प्रांत अथवा बड़े क्षेत्र के अनेक स्थानीय चर्च कार्य करते थे। आगे चलकर रोम, कॉन्स्टैंटिनोपुल, अलेक्ज़ांड्रिया, एंटिओक और यरूशलेम जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों के बिशपों को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। बाद की परंपरा में इन्हें पैट्रियार्क कहा गया। पाँच प्रमुख केंद्रों की यह व्यवस्था आगे चलकर ‘पेंटार्की’ के रूप में प्रसिद्ध हुई।
चर्च की परिषदें और धर्मसभाएँ
ईसाई धर्म के विस्तार के साथ धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या को लेकर मतभेद भी उत्पन्न हुए। विभिन्न क्षेत्रों के ईसाइयों के बीच सिद्धांत, धार्मिक अनुशासन और चर्च प्रशासन से संबंधित विवादों के समाधान के लिए परिषदों अथवा धर्मसभाओं का आयोजन किया जाने लगा। स्थानीय अथवा प्रांतीय परिषदों में किसी विशेष क्षेत्र के बिशप और धार्मिक अधिकारी भाग लेते थे, जबकि व्यापक परिषदों में अनेक क्षेत्रों के प्रतिनिधि सम्मिलित होते थे। इन धर्मसभाओं में 325 ईस्वी की निकिया की प्रथम महान धर्मसभा का विशेष महत्त्व है। सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन के संरक्षण में आयोजित इस सभा में ईसा मसीह के स्वरूप से संबंधित एरियन विवाद पर विचार किया गया और निकीन मत-पत्र के माध्यम से ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया गया। इसके बाद भी अनेक धर्मसभाएँ हुईं, जिन्होंने ईसाई धर्मशास्त्र, धार्मिक अनुशासन और चर्च संगठन को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पादरियों का जीवन और ब्रह्मचर्य
प्रारंभिक ईसाई चर्च में पादरियों के लिए सार्वभौमिक रूप से अविवाहित रहना अनिवार्य नहीं था। अनेक प्रारंभिक धार्मिक अधिकारी विवाहित थे। समय के साथ, विशेषकर पश्चिमी चर्च में, धार्मिक पदों और वैवाहिक जीवन के संबंध में अधिक कठोर नियम विकसित हुए। तपस्या, आत्मसंयम और सांसारिक इच्छाओं से दूरी को धार्मिक आदर्श के रूप में अधिक महत्त्व मिलने लगा। मध्ययुग में पश्चिमी चर्च ने पादरियों के ब्रह्मचर्य को संस्थागत रूप से अधिक दृढ़ बनाया। इसलिए पादरी-ब्रह्मचर्य को प्रारंभिक ईसाई धर्म की तत्कालीन सार्वभौमिक व्यवस्था मानना उचित नहीं है; यह एक दीर्घकालीन ऐतिहासिक विकास का परिणाम था।
रोमन चर्च और पोप का उदय
ईसाई जगत में रोम के चर्च का महत्त्व धीरे-धीरे बढ़ता गया। इसके कई कारण थे। रोम रोमन साम्राज्य की राजनीतिक राजधानी और विशाल साम्राज्य का प्रमुख नगर था। इसके अतिरिक्त ईसाई परंपरा रोम को संत पीटर और संत पाल की गतिविधियों तथा उनके बलिदान से जोड़ती थी। विशेष रूप से संत पीटर को रोम के प्रथम बिशप और बाद के पोपों का आध्यात्मिक पूर्ववर्ती माना गया। तीसरी और चौथी शताब्दी में रोम के बिशप की प्रतिष्ठा लगातार बढ़ी। पश्चिमी रोमन साम्राज्य के कमजोर होने और अंततः उसके पतन के बाद चर्च के धार्मिक महत्त्व के साथ-साथ सामाजिक और प्रशासनिक भूमिका भी बढ़ गई। कई स्थानों पर बिशप स्थानीय जनता के प्रतिनिधि, मध्यस्थ और सामाजिक नेतृत्वकर्ता के रूप में कार्य करने लगे। वे निर्धनों की सहायता करते, संकट के समय लोगों का नेतृत्व करते तथा स्थानीय प्रशासन के साथ संपर्क बनाए रखते थे।
रोम के बिशप को धीरे-धीरे पोप की उपाधि और व्यापक अधिकार प्राप्त हुए। पश्चिमी यूरोप में रोम के चर्च की प्रतिष्ठा विशेष रूप से बढ़ी और आगे चलकर पोप पश्चिमी ईसाई जगत के सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व के केंद्र के रूप में उभरे। हालांकि पूर्वी और पश्चिमी चर्चों में रोम के बिशप की सर्वोच्चता को लेकर मतभेद बने रहे। अंततः इन मतभेदों ने मध्ययुगीन काल में पूर्वी और पश्चिमी ईसाई परंपराओं के बीच गहरी दूरी उत्पन्न की।
ईसाई मठ व्यवस्था का विकास
चर्च संगठन के समानांतर ईसाई धर्म में मठ व्यवस्था का भी विकास हुआ। प्रारंभिक ईसाइयों के सामने जब राजकीय उत्पीड़न की चुनौती थी, तब शहादत को धार्मिक आदर्श माना जाता था। लेकिन चौथी शताब्दी में जब सम्राटों का संरक्षण मिलने लगा और ईसाई धर्म को सार्वजनिक मान्यता प्राप्त हुई, तब कुछ धार्मिक व्यक्तियों ने सांसारिक जीवन से दूर रहकर तपस्या, प्रार्थना और आत्मसंयम को धार्मिक साधना का माध्यम बनाया। मठवासी जीवन का प्रारंभिक विकास मिस्र के मरुस्थलीय क्षेत्रों में हुआ। संत एंथनी को एकांतवासी तपस्या की प्रमुख प्रारंभिक परंपरा से जोड़ा जाता है। दूसरी ओर संत पचोमियस ने सामूहिक मठ जीवन अर्थात् सेनोबिटिक परंपरा को व्यवस्थित रूप दिया। उनके द्वारा स्थापित मठों में अनेक साधु सामूहिक नियमों के अंतर्गत रहते थे। इस प्रकार व्यक्तिगत एकांतवास के साथ-साथ संगठित मठ जीवन भी विकसित हुआ।
चौथी शताब्दी में मठ व्यवस्था मिस्र से सीरिया, एशिया माइनर और अन्य क्षेत्रों में फैलने लगी। संत बेसिल ने कप्पाडोसिया में मठवासी जीवन के लिए व्यवस्थित नियम विकसित किए। बाद में पश्चिमी यूरोप में संत बेनेडिक्ट की मठ परंपरा ने अत्यंत व्यापक प्रभाव डाला। मठ केवल धार्मिक तपस्या के केंद्र नहीं रहे, बल्कि शिक्षा, कृषि, चिकित्सा, पुस्तक-संरक्षण और सामाजिक सेवा के भी महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गए। मठवासी जीवन में सामान्यतः गरीबी, ब्रह्मचर्य, आज्ञापालन, प्रार्थना और श्रम को महत्त्व दिया जाता था। मठवासी सांसारिक संपत्ति और विलासिता से दूर रहकर धार्मिक साधना करते थे। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार कीं और अनेक ज्ञान-परंपराओं को सुरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाद की ईसाई परंपरा में चर्च के धार्मिक अधिकारियों और मठवासियों के लिए सेक्युलर क्लर्जी तथा रेगुलर क्लर्जी जैसे शब्द प्रचलित हुए। सेक्युलर पादरी सामान्य समाज के बीच रहकर धार्मिक कार्य करते थे, जबकि रेगुलर क्लर्जी किसी धार्मिक नियम या मठवासी अनुशासन के अंतर्गत जीवन बिताते थे।
चर्च का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व
चर्च के विकास ने ईसाई धर्म को केवल धार्मिक विश्वासों का समूह न रहने देकर एक संगठित सामाजिक संस्था में बदल दिया। चर्च ने गरीबों, विधवाओं, अनाथों और रोगियों की सहायता के लिए व्यवस्थाएँ विकसित कीं। ईसाई समुदायों में दान, सेवा और परोपकार को धार्मिक कर्तव्य माना गया। इससे चर्च का प्रभाव समाज के व्यापक वर्गों पर बढ़ता गया। चर्च शिक्षा और साहित्य के संरक्षण का भी प्रमुख केंद्र बना। विशेषकर पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद मठों ने प्राचीन ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार कर ज्ञान की अनेक परंपराओं को सुरक्षित रखा। धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ व्याकरण, दर्शन, इतिहास और साहित्य का अध्ययन भी कई मठों में जारी रहा।
इस प्रकार प्रारंभिक ईसाई चर्च का विकास एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था। छोटे-छोटे धार्मिक समुदायों से प्रारंभ होकर यह बिशपों, पुरोहितों और उपयाजकों से युक्त संगठित संस्था बना; फिर मेट्रोपोलिटन और पैट्रियार्क जैसे उच्च धार्मिक पद विकसित हुए तथा रोम का चर्च पश्चिमी ईसाई जगत में प्रभावशाली केंद्र के रूप में उभरा। दूसरी ओर मठ व्यवस्था ने तपस्या, शिक्षा, सेवा और ज्ञान-संरक्षण की परंपराओं को मजबूत किया। इस प्रकार चर्च और मठ दोनों ने ईसाई धर्म को संस्थागत शक्ति प्रदान की और आगे चलकर यूरोपीय मध्ययुगीन सभ्यता के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विकास की आधारभूत संस्थाओं में परिवर्तित हो गए।
ईसाई धर्म का प्रभाव
ईसाई धर्म का उद्भव और विकास केवल धार्मिक इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना नहीं था, बल्कि इसका रोमन साम्राज्य के सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। प्रथम शताब्दी ईस्वी में जूडिया से प्रारंभ हुआ यह धर्म ईसा मसीह के प्रेम, दया, क्षमा, सेवा, त्याग और मानव-कल्याण के सिद्धांतों के आधार पर धीरे-धीरे रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में फैल गया। प्रारंभ में रोमन शासकों द्वारा इसका कठोर दमन किया गया, किंतु चौथी शताब्दी में कॉन्स्टैन्टाइन के संरक्षण तथा बाद में थियोडोसियस के समय राजकीय समर्थन मिलने के बाद यह रोमन साम्राज्य का प्रमुख धर्म बन गया। इसके परिणामस्वरूप ईसाई विचारों ने रोमन समाज और आगे चलकर यूरोपीय सभ्यता के विकास को गहराई से प्रभावित किया।
सामाजिक जीवन पर प्रभाव
ईसाई धर्म ने रोमन समाज की सामाजिक एवं पारिवारिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। ईसाई विचारधारा ने विवाह को केवल सामाजिक अनुबंध न मानकर एक पवित्र धार्मिक संस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया। पति-पत्नी के बीच निष्ठा, पारिवारिक उत्तरदायित्व, माता-पिता के प्रति सम्मान तथा बच्चों के प्रति प्रेम को महत्त्व दिया गया। इससे परिवार को नैतिक जीवन की आधारभूत इकाई के रूप में स्थापित करने में सहायता मिली।
ईसाई धर्म ने स्त्रियों, गरीबों, अनाथों, रोगियों तथा समाज के अन्य उपेक्षित वर्गों के प्रति सहानुभूति की भावना को बढ़ावा दिया। यद्यपि रोमन समाज में दासप्रथा तत्काल समाप्त नहीं हुई, फिर भी ईसाई विचारों ने दासों और निम्न वर्गों को भी ईश्वर की संतान मानकर उनके मानवीय सम्मान की भावना को मजबूत किया। रविवार को ईसाइयों के लिए विश्राम और धार्मिक उपासना का दिन माना जाता था और बाद में इसे रोमन साम्राज्य में राजकीय अवकाश के रूप में भी मान्यता मिली।
मानवतावादी एवं नैतिक प्रभाव
ईसाई धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव उसके नैतिक सिद्धांतों के माध्यम से दिखाई देता है। ईसा ने प्रेम, क्षमा, दया, सत्य, त्याग, सेवा और करुणा को मानव जीवन के सर्वोच्च आदर्शों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने शत्रुओं से भी प्रेम करने तथा बुराई का उत्तर भलाई से देने की शिक्षा दी। इससे रोमन समाज में नैतिक जीवन और मानवीय संवेदनशीलता को नई प्रतिष्ठा मिली।
ईसाई धर्म ने अत्यधिक धन-संचय, विलासिता, स्वार्थ और अहंकार की आलोचना की। गरीबों और पीड़ितों की सेवा को धार्मिक कर्तव्य माना गया। इसके परिणामस्वरूप दान, परोपकार और समाज-सेवा की संस्थाओं का विकास हुआ। गरीबों, रोगियों, अनाथों और असहाय लोगों की सहायता के लिए चिकित्सालय, अनाथालय तथा आश्रय-स्थल स्थापित किए गए। ईसाई विचारधारा ने रोमन समाज के हिंसक मनोरंजनों की भी आलोचना की। ग्लैडिएटरों के युद्ध और रक्तरंजित सार्वजनिक खेलों जैसी परंपराओं के प्रति ईसाई दृष्टिकोण ने मानव जीवन के मूल्य और करुणा की भावना को अधिक महत्त्व दिया।
कला और स्थापत्य पर प्रभाव
ईसाई धर्म के विस्तार ने रोमन कला और स्थापत्य को भी नई दिशा प्रदान की। ईसाई उपासना के लिए बेसिलिकाओं और अन्य धार्मिक भवनों का निर्माण हुआ। चर्चों की दीवारों और भूमिगत कब्रगृहों में ईसा मसीह, संतों, बाइबिल की घटनाओं तथा धार्मिक प्रतीकों के चित्र बनाए जाने लगे। इस प्रकार ईसाई कला ने धार्मिक विषयों को चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य का प्रमुख विषय बना दिया।
बाद में सेंट पीटर्स बेसिलिका और कॉन्स्टैन्टिनोपुल की हागिया सोफिया जैसे विशाल धार्मिक भवन ईसाई स्थापत्य की भव्यता के प्रतीक बने। इस स्थापत्य पर रोमन और पूर्वी भूमध्यसागरीय परंपराओं का भी प्रभाव दिखाई देता है।
साहित्य और बौद्धिक जीवन पर प्रभाव
ईसाई धर्म ने साहित्य और इतिहास-लेखन को भी नई दिशा दी। यूसिबियस ने एक्लेसियास्टिकल हिस्ट्री की रचना करके प्रारंभिक ईसाई चर्च के इतिहास को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। संत एम्ब्रोस ने ईसाई नैतिकता को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। संत ऑगस्टाइन की प्रसिद्ध कृति सिटी ऑफ गॉड ने ईसाई दर्शन तथा मध्यकालीन यूरोपीय चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। संत जेरोम ने बाइबिल का लैटिन अनुवाद तैयार किया, जो आगे चलकर वुल्गेट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार ईसाई विद्वानों ने प्राचीन ज्ञान और धार्मिक साहित्य के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजनीति पर प्रभाव
प्रारंभ में ईसाई धर्म और रोमन राज्य के बीच संघर्ष रहा। ईसाइयों ने सम्राट-पूजा को अस्वीकार किया, जिसके कारण उन्हें राजकीय उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। किंतु कॉन्स्टैन्टाइन के शासनकाल में स्थिति बदल गई। 313 ईस्वी की मिलान की राजाज्ञा के बाद ईसाइयों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली और चर्च को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। बाद में थियोडोसियस प्रथम के शासनकाल में निकीन ईसाई धर्म को साम्राज्य का आधिकारिक धार्मिक आधार प्राप्त हुआ।
रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भी चर्च की राजनीतिक और सामाजिक भूमिका समाप्त नहीं हुई। पश्चिमी यूरोप में राजनीतिक सत्ता के विखंडन के बीच चर्च ने प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक संगठन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। रोम के बिशप, अर्थात् पोप, धीरे-धीरे पश्चिमी यूरोप के प्रभावशाली धार्मिक एवं राजनीतिक व्यक्तित्व बन गए। चर्च के विस्तृत संगठन और धार्मिक प्रभाव ने पोप को मध्यकालीन यूरोपीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण शक्ति प्रदान की।
इस प्रकार ईसाई धर्म का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसने रोमन समाज की नैतिकता, परिवार व्यवस्था, स्त्रियों और कमजोर वर्गों के प्रति दृष्टिकोण, समाज-सेवा, कला, स्थापत्य, साहित्य तथा राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। प्रारंभ में उत्पीड़ित धार्मिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ ईसाई धर्म आगे चलकर रोमन साम्राज्य की प्रमुख धार्मिक शक्ति बना और पश्चिमी यूरोप की मध्यकालीन सभ्यता के निर्माण में उसका केंद्रीय योगदान रहा।
रोमन साम्राज्य में दार्शनिक विचारधाराएँ
मुख्य लेख : रोमन साम्राज्य में दार्शनिक विचारधाराएँ
स्टोइक मत
रोमन साम्राज्य में प्रचलित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में स्टोइक मत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। यद्यपि इसका उद्भव यूनान में हुआ था, किंतु रोमन समाज में इसे विशेष लोकप्रियता मिली। रोमन जीवन की व्यावहारिकता, अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और आत्मसंयम की प्रवृत्तियाँ स्टोइक दर्शन के सिद्धांतों के अनुकूल थीं। इसलिए साम्राज्यकाल में यह रोम की प्रमुख नैतिक एवं दार्शनिक विचारधाराओं में सम्मिलित हो गया।
रोम द्वारा यूनान पर विजय प्राप्त करने के बाद यूनानी संस्कृति, साहित्य, शिक्षा और दर्शन का प्रभाव रोमन समाज पर तेजी से बढ़ा। अनेक यूनानी दार्शनिक रोम आए और उन्होंने अपने विचारों का प्रचार किया। प्रारंभ में रोमन अभिजात वर्ग इन विदेशी विचारों के प्रति सावधान था। 155 ईसा पूर्व में एथेंस से तीन प्रमुख दार्शनिक रोम आए—प्लेटोनिक परंपरा के कार्नीडीज़, अरस्तूवादी परंपरा के क्रिटोलाउस और स्टोइक परंपरा के डिओजिनीज़। इनके विचारों ने रोमन बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया। विशेष रूप से स्किपियो वंश से जुड़े विद्वानों ने स्टोइक दर्शन को संरक्षण दिया। रोम में इसके प्रारंभिक प्रमुख प्रचारकों में पैनैटियस का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने स्टोइक नैतिकता को रोमन जीवन के अनुरूप प्रस्तुत किया और कर्तव्य तथा सदाचार पर विशेष बल दिया।
साम्राज्यकाल में स्टोइक दर्शन का प्रभाव और बढ़ा। इसके प्रमुख रोमन विचारकों में सेनेका, एपिक्टेटस और सम्राट मार्कस ऑरेलियस विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सेनेका ने ऑन एंगर, ऑन द ब्रेविटी ऑफ लाइफ, ऑन द ट्रैंक्विलिटी ऑफ सोल, ऑन क्लेमेंसी, ऑन द हैपी लाइफ, ऑन बेनिफिट्स और ऑन प्रोविडेन्स जैसी रचनाओं के माध्यम से स्टोइक नैतिक विचारों को लोकप्रिय बनाया। मार्कस ऑरेलियस ने अपनी कृति मेडिटेशंस में आत्मसंयम, कर्तव्य और प्रकृति के अनुरूप जीवन के विचारों को व्यक्त किया।
स्टोइक दर्शन के प्रमुख सिद्धांत
स्टोइक मत का मूल उद्देश्य मनुष्य को आत्मसंयमी, विवेकशील, कर्तव्यनिष्ठ और प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने वाला व्यक्ति बनाना था। स्टोइक विचारकों के अनुसार मनुष्य विशाल विश्व-व्यवस्था का एक अंग है। इसलिए उसे केवल अपने व्यक्तिगत हित के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण को भी महत्त्व देना चाहिए। इस विचार ने विश्वबंधुत्व और मानव-समानता की भावना को प्रोत्साहित किया।
स्टोइक दर्शन में कर्तव्यपालन को मनुष्य का सर्वोच्च नैतिक दायित्व माना गया। व्यक्ति को परिस्थितियों और भावनाओं के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होने के बजाय विवेक के अनुसार कार्य करना चाहिए। सुख-दुःख, लाभ-हानि, सफलता-असफलता जैसी बाहरी परिस्थितियों को शांत मन से स्वीकार करना ही आत्मसंयम का प्रमाण माना गया। इसी कारण यह दर्शन सैनिकों, प्रशासकों और राज्यसेवकों के बीच विशेष रूप से प्रभावशाली रहा।
स्टोइक मत के अनुसार ईश्वर विश्व का नियामक और संचालक है। संपूर्ण ब्रह्मांड एक तर्कपूर्ण एवं सुव्यवस्थित व्यवस्था के अधीन है। मनुष्य इस सार्वभौमिक व्यवस्था का हिस्सा है और उसके भीतर भी दैवी तर्क या लोगोस का अंश विद्यमान है। इसलिए मनुष्य को प्रकृति और विश्व-व्यवस्था के अनुरूप जीवन जीना चाहिए। परिस्थितियों को बदलना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया को विवेकपूर्ण बनाना मनुष्य के हाथ में है।
स्टोइक विचारक प्रकृति के अनुरूप जीवन को आदर्श मानते थे। वे कृत्रिम विलासिता, अत्यधिक धन-संचय और भौतिक सुखों की लालसा के विरोधी थे। उनके अनुसार बाहरी संपत्ति वास्तविक सुख का आधार नहीं है। वास्तविक सुख मन की शांति, आत्मसंयम और सदाचार से प्राप्त होता है। मनुष्य को आवश्यक वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए, किंतु उन्हें जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं बनाना चाहिए।
सदाचार और आत्मनिरीक्षण
स्टोइक दर्शन में सदाचार सर्वोच्च शुभ माना गया। विवेक, न्याय, साहस और संयम को प्रमुख नैतिक गुण माना गया। सेनेका के अनुसार धन, विलासिता और शक्ति तभी उपयोगी हैं जब उनका उपयोग विवेकपूर्ण और नैतिक ढंग से किया जाए। केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाने वाला व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। इसके विपरीत सदाचार से प्राप्त संतोष स्थायी होता है।
स्टोइक विचारकों ने आत्मनिरीक्षण को भी महत्त्व दिया। व्यक्ति को नियमित रूप से अपने कार्यों और विचारों का परीक्षण करना चाहिए तथा यह देखना चाहिए कि उसने अपने कर्तव्यों का पालन कितनी निष्ठा से किया है। मनुष्य के भीतर ऐसी प्रवृत्तियाँ होती हैं जो उसे सदाचार की ओर ले जाती हैं और ऐसी भी जो उसे स्वार्थ, क्रोध तथा भौतिक लालसा की ओर प्रेरित करती हैं। इसलिए विवेक द्वारा श्रेष्ठ प्रवृत्तियों को विकसित करना आवश्यक है।
मानव-समता और विश्वबंधुत्व
स्टोइक दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण देन उसका सार्वभौमिक मानवतावाद था। स्टोइकों के अनुसार सभी मनुष्य एक ही विश्व-व्यवस्था के अंग हैं और उनमें समान दैवी तर्क का अंश विद्यमान है। इसलिए मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी जाति, जन्म, धन या सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी नैतिकता और विवेक से होती है। इस विचार ने दासों और निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति की भावना को मजबूत करने में योगदान दिया।
मृत्यु और आत्मा संबंधी विचार
स्टोइक मत में मृत्यु को प्रकृति की सामान्य व्यवस्था का हिस्सा माना गया। मनुष्य को मृत्यु से अनावश्यक भय नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे प्राकृतिक नियति के रूप में स्वीकार करना चाहिए। आत्मा की प्रकृति के संबंध में सभी स्टोइक विचारक एकमत नहीं थे; कुछ विचारों में आत्मा की स्थायित्व की धारणा दिखाई देती है, जबकि अन्य में उसके नश्वर स्वरूप पर बल दिया गया। फिर भी उनका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को मृत्यु के भय से मुक्त कर नैतिक जीवन के लिए प्रेरित करना था। कुछ स्टोइक विचारकों, विशेषकर सेनेका, ने असहनीय परिस्थितियों में आत्महत्या के प्रश्न पर भी विचार किया, जिसे वे कुछ विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते थे।
स्टोइक मत ने रोमन समाज में कर्तव्यपरायणता, आत्मसंयम, नैतिकता, मानव-समता और विश्वबंधुत्व की भावना को मजबूत किया। इसका प्रभाव केवल दर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रोमन कानून, प्रशासन और नैतिक चिंतन पर भी पड़ा। बाद के ईसाई विचारकों ने भी स्टोइक नैतिकता के कुछ तत्वों से प्रेरणा प्राप्त की।
इस प्रकार स्टोइक मत ने रोमन समाज को यह शिक्षा दी कि मनुष्य का वास्तविक गौरव धन, शक्ति और भौतिक सुखों में नहीं, बल्कि विवेक, सदाचार, कर्तव्य और आत्मसंयम में निहित है। इसी कारण यह दर्शन रोमन साम्राज्य की सबसे प्रभावशाली नैतिक विचारधाराओं में गिना जाता है और प्राचीन विश्व की मानवतावादी परंपरा में इसका स्थायी स्थान है।
अन्य दार्शनिक विचारधाराएँ
रोमन साम्राज्य में यूनानी दर्शन के प्रभाव से अनेक दार्शनिक विचारधाराओं का विकास हुआ। इनमें एपिक्युरियन, नियो-पाइथागोरियन और नियो-प्लेटोनिक मत विशेष रूप से उल्लेखनीय थे। इन विचारधाराओं ने रोमन समाज के धार्मिक विश्वासों, नैतिक जीवन और आध्यात्मिक चिंतन को प्रभावित किया। जहाँ एपिक्युरियन मत ने तर्क, प्रकृतिवाद और मानसिक शांति पर बल दिया, वहीं नियो-पाइथागोरियन और नियो-प्लेटोनिक विचारधाराओं ने आत्मा, नैतिक अनुशासन और आध्यात्मिक मुक्ति को विशेष महत्त्व प्रदान किया।
एपिक्युरियन मत
एपिक्युरियन मत का मूल विकास यूनान में हुआ था, किंतु रोमन समाज में भी इसका पर्याप्त प्रभाव पड़ा। विशेष रूप से शिक्षित और संपन्न वर्ग के कुछ लोगों ने इस विचारधारा को अपनाया। इसके प्रमुख रोमन प्रचारक लुक्रेटियस थे, जिनका जन्म लगभग 99 ईसा पूर्व और मृत्यु लगभग 55 ईसा पूर्व मानी जाती है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध दार्शनिक काव्य ‘दे रेरुम नातुरा’ (वस्तुओं के स्वभाव पर) में एपिक्युरियन सिद्धांतों को विस्तार से प्रस्तुत किया। यह कृति दर्शन, प्रकृति-विज्ञान और साहित्य की दृष्टि से प्राचीन विश्व की महत्त्वपूर्ण रचनाओं में गिनी जाती है।
एपिक्युरियन दर्शन का आधार भौतिकवादी प्रकृतिवाद था। इसके अनुसार संसार की समस्त वस्तुएँ सूक्ष्म, अविभाज्य और अविनाशी कणों अर्थात् परमाणुओं से निर्मित हैं। ब्रह्मांड की घटनाओं के लिए किसी दैवी हस्तक्षेप को आवश्यक नहीं माना गया। प्रकृति अपने नियमों के अनुसार संचालित होती है और विभिन्न पदार्थों तथा जीवों का निर्माण परमाणुओं के विभिन्न संयोजनों से होता है। किसी वस्तु के नष्ट होने पर उसके मूल कण समाप्त नहीं होते, बल्कि दूसरे रूपों में संयोजित हो जाते हैं। एपिक्युरियन विचारकों ने धार्मिक भय और अंधविश्वास की आलोचना की। उनके अनुसार मनुष्य देवताओं, मृत्यु और अलौकिक शक्तियों के भय से अनेक प्रकार की चिंताओं में फँस जाता है। इसलिए मनुष्य को प्रकृति के वास्तविक नियमों को समझना चाहिए और अंधविश्वासों से मुक्त होना चाहिए। वे ईश्वर के अस्तित्व को आवश्यक नहीं मानते थे और यह विचार रखते थे कि देवता यदि अस्तित्व में हैं भी, तो वे मानव जीवन की घटनाओं में हस्तक्षेप नहीं करते।
आत्मा के विषय में भी एपिक्युरियन मत भौतिकवादी था। उसके अनुसार आत्मा भी सूक्ष्म कणों से निर्मित है और शरीर से स्वतंत्र कोई शाश्वत सत्ता नहीं है। शरीर की मृत्यु के साथ आत्मा का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसलिए मृत्यु के बाद स्वर्ग, नरक या पुनर्जन्म की चिंता करना निरर्थक है। इस विचार का उद्देश्य मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त करना था।
एपिक्युरियन मत में जीवन का परम लक्ष्य सुख माना गया, किंतु इसका अर्थ अनियंत्रित भोग-विलास नहीं था। वास्तविक सुख मानसिक शांति, भय से मुक्ति और शारीरिक पीड़ा के अभाव में निहित माना गया। अत्यधिक धन, विलासिता और अनावश्यक इच्छाएँ अंततः मनुष्य के लिए चिंता और दुःख का कारण बनती हैं। इसलिए सरल जीवन, आत्मसंयम, मित्रता और विवेकपूर्ण इच्छाओं को महत्त्व दिया गया। इस दृष्टि से एपिक्युरियन मत को केवल भोगवादी दर्शन कहना उचित नहीं है; यह वास्तव में संयमित और विवेकपूर्ण सुखवाद का समर्थन करता था।
इस मत ने तर्क, अनुभव और प्राकृतिक कारणों के आधार पर संसार को समझने की प्रेरणा दी। इस कारण इसका प्रभाव विशेष रूप से शिक्षित वर्ग पर पड़ा। यद्यपि रोमन समाज में इसका प्रभाव स्टोइक मत की तुलना में सीमित रहा, फिर भी इसने धार्मिक भय और अंधविश्वास के विरुद्ध स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित किया।
नियो-पाइथागोरियन मत
नियो-पाइथागोरियन मत का विकास पाइथागोरस की प्राचीन परंपरा के पुनरुत्थान के रूप में हुआ। इसमें पाइथागोरियन विचारों के साथ प्लेटोनिक तथा अन्य धार्मिक-दार्शनिक धारणाओं का समन्वय दिखाई देता है। इसका विकास विशेष रूप से रोमन गणराज्य के अंतिम चरण और साम्राज्य के प्रारंभिक काल में हुआ।
नियो-पाइथागोरियन विचारकों के अनुसार संसार में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की वास्तविकताएँ विद्यमान हैं। मानव जीवन केवल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके भीतर एक आध्यात्मिक तत्व भी विद्यमान है। आत्मा को शरीर की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण और उच्च माना गया। मनुष्य का उद्देश्य अपनी आत्मा को शुद्ध करना और उसे नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाना था।
इस मत में आत्मसंयम, सादगी और नैतिक अनुशासन पर विशेष बल दिया गया। मनुष्य के भीतर अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं। इसलिए उसे अपनी निम्न प्रवृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करके विवेक और सदाचार का अनुसरण करना चाहिए। ज्ञान को आत्मिक उन्नति का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया। दैनिक जीवन में आत्मनिरीक्षण, संयम और नैतिक आचरण को आवश्यक समझा गया।
नियो-पाइथागोरियन मत में धार्मिक और रहस्यवादी तत्व भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद थे। इसके कुछ अनुयायी ज्योतिष, शकुन-अपशकुन और अन्य रहस्यवादी मान्यताओं में विश्वास करते थे। इस प्रकार इसमें तर्क, नैतिक अनुशासन और आध्यात्मिक रहस्यवाद का मिश्रण दिखाई देता है। इस विचारधारा ने रोमन समाज में आत्मशुद्धि और नैतिक जीवन की भावना को मजबूत करने में योगदान दिया।
नियो-प्लेटोनिक मत
नियो-प्लेटोनिक मत रोमन साम्राज्य के उत्तरकाल की प्रमुख दार्शनिक विचारधाराओं में से एक था। इसका आधार प्लेटो का दर्शन था, किंतु इसमें बाद के यूनानी तथा पूर्वी धार्मिक-दार्शनिक विचारों का भी प्रभाव दिखाई देता है। इसके प्रारंभिक विकास में एमोनियस सैकस का महत्त्व था, जबकि इसके महान दार्शनिक और व्यवस्थित व्याख्याता प्लॉटिनस थे।
प्लॉटिनस का जन्म लगभग 204 या 205 ईस्वी में मिस्र में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक एमोनियस सैकस से शिक्षा प्राप्त की और विभिन्न दार्शनिक तथा धार्मिक परंपराओं का अध्ययन किया। बाद में वे रोम आए और वहीं अपने दर्शन का व्यापक प्रचार किया। उनका जीवन अत्यंत सादा और संयमित था। वे सांसारिक विलासिता से दूर रहते थे और आत्मिक उन्नति को सर्वोच्च महत्त्व देते थे। प्लॉटिनस के अनुसार समस्त सृष्टि का मूल एक परम और सर्वोच्च तत्त्व है, जिसे उन्होंने ‘द वन’ या ‘एक’ कहा। यह परम तत्त्व समस्त अस्तित्व का स्रोत है। उससे क्रमशः बुद्धि और विश्वात्मा का प्राकट्य होता है तथा इनके माध्यम से भौतिक जगत का विकास होता है। इस प्रकार संसार की विविधता के पीछे एक ही परम आध्यात्मिक सत्य विद्यमान है।
नियो-प्लेटोनिक दर्शन में शरीर की अपेक्षा आत्मा को अधिक महत्त्व दिया गया। शरीर को सांसारिक बंधनों से जुड़ा हुआ माना गया, जबकि आत्मा को उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता का अंश समझा गया। मनुष्य का लक्ष्य केवल भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करके उसके मूल आध्यात्मिक स्रोत की ओर लौटाना है।
प्लॉटिनस के अनुसार मनुष्य की आत्मिक उन्नति ज्ञान, आत्मसंयम, सदाचार और ध्यान के माध्यम से संभव है। सांसारिक इच्छाओं तथा भौतिक आसक्तियों से ऊपर उठकर मनुष्य आध्यात्मिक सत्य का अनुभव कर सकता है। परम सत्य को केवल तर्क के माध्यम से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता; उसके लिए अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक अनुभव आवश्यक है। जब आत्मा परम सत्ता का साक्षात्कार करती है, तब उसे सर्वोच्च आनंद और आध्यात्मिक एकता की अनुभूति होती है।
नियो-प्लेटोनिक मत का महत्त्व इस बात में भी था कि उसने दर्शन और धर्म के बीच एक सेतु स्थापित किया। इसके आध्यात्मिक विचारों ने उत्तरकालीन रोमन धार्मिक चिंतन को प्रभावित किया और ईसाई दार्शनिकों को भी अनेक अवधारणाओं के विकास के लिए बौद्धिक आधार प्रदान किया। विशेष रूप से आत्मा, ईश्वर, नैतिक जीवन और आध्यात्मिक मुक्ति से संबंधित विचारों पर इसका प्रभाव दिखाई देता है।
ग्नॉस्टिक मत
रोमन साम्राज्य के उत्तरकाल में यूनानी तथा पूर्वी देशों की धार्मिक और दार्शनिक विचारधाराओं के पारस्परिक संपर्क से अनेक नवीन मतों का विकास हुआ। इनमें ग्नॉस्टिक मत विशेष रूप से उल्लेखनीय था। ‘ग्नॉस्टिक’ शब्द यूनानी भाषा के ‘ग्नोसिस’ से बना है, जिसका अर्थ है—‘ज्ञान’ या ‘विशेष आध्यात्मिक ज्ञान’। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित मत नहीं था, बल्कि यूनानी, मिस्री, फारसी, यहूदी तथा पश्चिमी एशियाई धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं के मिश्रण से विकसित विभिन्न विचारधाराओं का समूह था। दूसरी शताब्दी ईस्वी में इसका व्यापक प्रसार हुआ और इसके अनेक रूप रोम, मिस्र, सीरिया तथा पश्चिमी एशिया में दिखाई दिए।
ग्नॉस्टिक मत का मूल आधार रहस्यवादी आध्यात्मिक ज्ञान था। इसके अनुयायियों का विश्वास था कि परम सत्य को केवल तर्क, इंद्रिय-अनुभव अथवा सामान्य धार्मिक ज्ञान से प्राप्त नहीं किया जा सकता। वास्तविक सत्य अत्यंत गूढ़ है और उसकी अनुभूति विशेष आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से ही संभव है। यह ज्ञान आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप और ईश्वर से उसके संबंध का बोध कराता है। ग्नॉस्टिक विचारधारा में आत्मा और शरीर के बीच स्पष्ट अंतर किया गया। आत्मा को दिव्य, शाश्वत और अमर माना गया, जबकि शरीर को नश्वर तथा भौतिक बंधनों से युक्त समझा गया। इसलिए मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य सांसारिक इच्छाओं और भौतिक आसक्तियों से ऊपर उठकर आत्मिक मुक्ति प्राप्त करना था। इस दृष्टि से ग्नॉस्टिक अनुयायी संयम, तपस्या और सांसारिक भोगों से दूरी को महत्त्व देते थे। ग्नॉस्टिक परंपराओं में यह धारणा भी प्रचलित थी कि संसार की भौतिक व्यवस्था और परम आध्यात्मिक सत्ता के बीच एक गहरा अंतर है। मनुष्य विशेष आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करके इस भौतिक बंधन से मुक्त होकर अपने दिव्य मूल की ओर लौट सकता है। विभिन्न ग्नॉस्टिक समूहों में स्वर्ग, नरक, आत्मा की मुक्ति तथा धार्मिक संस्कारों के संबंध में अलग-अलग मान्यताएँ थीं।
इस प्रकार ग्नॉस्टिक मत ने रहस्यवाद, आत्मा की अमरता, आध्यात्मिक ज्ञान, आत्मसंयम और मुक्ति को विशेष महत्त्व दिया। प्रारंभिक ईसाई धर्म के विकास के समय इसके विचारों का ईसाई चिंतन से गहरा संपर्क और वैचारिक संघर्ष दोनों हुआ। ईसाई धर्म के प्रमुख धर्मशास्त्रियों ने इसके अनेक सिद्धांतों की आलोचना की, फिर भी ग्नॉस्टिक विचारों ने रोमन साम्राज्य के धार्मिक और दार्शनिक वातावरण को प्रभावित किया। इसने विशेष रूप से आत्मा, ईश्वर, संसार और मुक्ति से जुड़े प्रश्नों पर गहन चिंतन को प्रेरित किया।
रोमन साहित्य
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता में साहित्यिक विकास
रोमन साहित्य का वास्तविक विकास मुख्यतः गणतंत्रकाल में हुआ। प्रारंभिक एट्रस्कन काल में रोमवासी लेखन से परिचित थे, किंतु उस समय साहित्यिक रचनाओं का उल्लेखनीय विकास नहीं हुआ था। यूनान पर रोमन प्रभाव बढ़ने और दोनों संस्कृतियों के निकट संपर्क में आने के बाद रोमन साहित्य को नई दिशा मिली। रोम के विद्वानों ने यूनानी साहित्य का लैटिन भाषा में अनुवाद किया तथा उससे प्रेरणा लेकर मौलिक रचनाएँ भी कीं।
रोमन साहित्य के प्रारंभिक प्रमुख रचनाकार लिवियस एंड्रोनिकस थे, जिन्हें सामान्यतः रोमन साहित्य का प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि माना जाता है। उन्होंने होमर के ‘ओडिसी’ का लैटिन में अनुवाद किया तथा यूनानी शैली के नाटकों की रचना की। उनके बाद क्नेयस नेवियस ने नाटक और महाकाव्य के क्षेत्र में योगदान दिया। उन्होंने प्रथम प्यूनिक युद्ध पर आधारित ‘बेल्लुम पोएनिकुम’ नामक काव्य की रचना की, जिसमें रोमन राष्ट्रीय भावना दिखाई देती है।
रोमन हास्य नाटक के विकास में प्लॉटस का विशेष महत्त्व था। उन्होंने यूनानी नाट्य परंपरा से प्रेरणा लेकर अनेक हास्य नाटक लिखे। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘माइल्स ग्लोरियोसस’, ‘एंफिट्रिओन’, ‘औलुलारिया’ और ‘मेनेख्मी’ उल्लेखनीय हैं। उनके नाटकों में हास्य, व्यंग्य और तत्कालीन जनजीवन का सजीव चित्रण मिलता है।
एनियस ने ‘एनाल्स’ नामक महाकाव्य की रचना की, जिसमें रोम के इतिहास और राष्ट्रीय गौरव को काव्यात्मक रूप दिया गया। इतिहास-लेखन के क्षेत्र में क्विंटस फेबियस पिक्टर ने रोम का इतिहास यूनानी भाषा में लिखा, जबकि कैटो ने ‘ओरिजिंस’ नामक ग्रंथ द्वारा लैटिन में इतिहास-लेखन की परंपरा को मजबूत किया।
नाटक के क्षेत्र में टेरेंस का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। उनकी रचनाओं में ‘द यूनक’, ‘फॉर्मियो’ और ‘एडेल्फी’ प्रमुख हैं। उनके नाटक भाषा की शुद्धता, सूक्ष्म चरित्र-चित्रण और मानवीय भावनाओं की गहराई के लिए प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार गणतंत्रकाल में यूनानी प्रभाव और रोमन राष्ट्रीय चेतना के समन्वय से लैटिन साहित्य की मजबूत नींव पड़ी।
आगस्टसकालीन साहित्य
गणतंत्रकाल के बाद रोमन साहित्य का स्वर्णयुग सम्राट ऑगस्टस के शासनकाल में आया। इतिहासकारों ने इस युग की तुलना यूनान के पेरिक्लीज युग और इंग्लैंड के एलिज़ाबेथ युग से की है। ऑगस्टस के शासनकाल में कविता, महाकाव्य, इतिहास और गद्य साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ। इसका प्रमुख कारण ऑगस्टस तथा उसके सहयोगी मैसीनस द्वारा साहित्यकारों को प्रदान किया गया संरक्षण और प्रोत्साहन था। इस काल में साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि उसने रोमन राष्ट्रीय भावना, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक गौरव को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी प्राप्त किया। आगस्टसकालीन साहित्य की प्रमुख विशेषता उसका राष्ट्रीय स्वर था। साहित्यकारों ने रोम की महानता, उसकी गौरवशाली परंपराओं, विजयगाथाओं और प्राचीन विरासत का चित्रण किया। उन्होंने रोमन साम्राज्य की स्थिरता, शांति और समृद्धि को भी अपने साहित्य में स्थान दिया। इस युग का साहित्य रोमन राष्ट्रवाद तथा सांस्कृतिक आत्मगौरव का उत्कृष्ट दर्पण बन गया। इस काल के साहित्य में परंपरावाद की भावना भी स्पष्ट दिखाई देती है। ऑगस्टस स्वयं रोमन समाज में प्राचीन नैतिक मूल्यों, पारिवारिक अनुशासन और धार्मिक परंपराओं को पुनर्जीवित करना चाहता था। साहित्यकारों ने भी रोमन अतीत के आदर्शों और नैतिक मान्यताओं को अपनी रचनाओं में प्रतिष्ठित किया। साथ ही भाषा और शैली के सौंदर्य पर विशेष ध्यान दिया गया। यूनानी साहित्य और दर्शन का प्रभाव भी इस युग में अत्यंत व्यापक था। रोमन लेखकों ने यूनानी साहित्यिक परंपराओं से प्रेरणा लेकर लैटिन साहित्य को अधिक परिष्कृत और समृद्ध बनाया।
पद्य-साहित्य
ऑगस्टस के शासनकाल में काव्य साहित्य का विशेष विकास हुआ। इस काल के प्रमुख कवियों में वर्जिल, होरेस, टिबुलस, प्रोपर्टियस और ओविड के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें वर्जिल का स्थान सर्वोच्च माना जाता है और उसे लैटिन साहित्य के महानतम कवियों में गिना जाता है।
वर्जिल (70–19 ई. पू.)
मुख्य लेख : वर्जिल
पब्लियस वर्जिलियस मारो का जन्म उत्तरी इटली के मैंटुआ के निकट हुआ था। उसका बचपन ग्रामीण वातावरण में बीता, इसलिए प्रकृति और ग्राम्य जीवन के प्रति उसके मन में विशेष अनुराग था। उसने क्रेमोना, मिलान और रोम में शिक्षा प्राप्त की तथा यूनानी साहित्य और दर्शन का भी अध्ययन किया। गृहयुद्धों के कारण वर्जिल को अपनी पैतृक भूमि से वंचित होना पड़ा। बाद में उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ऑगस्टस के साहित्यिक संरक्षक मैसीनस ने उसे संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद वर्जिल ने अपना अधिकांश जीवन साहित्य-सृजन में व्यतीत किया। 19 ईसा पूर्व में यूनान से लौटते समय ब्रुंडिसियम में उसका निधन हो गया। वर्जिल की तीन प्रमुख रचनाएँ हैं—‘इक्लॉग्स’, ‘गिओर्गिक्स’ और ‘एनीड’।
इक्लॉग्स
वर्जिल की प्रारंभिक प्रसिद्ध रचना ‘इक्लॉग्स’ लगभग 37 ईसा पूर्व में रची गई। यह दस ग्रामीण गीतों का संग्रह है, जिसमें प्रकृति, प्रेम और ग्रामीण जीवन का मधुर चित्रण मिलता है। इस रचना पर यूनानी कवि थियोक्रिटस की ग्रामीण काव्य-परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। ‘इक्लॉग्स’ की विशेषता इसकी सरल, संगीतात्मक और भावपूर्ण भाषा है। इसमें ग्रामीण जीवन की शांति, किसानों की भावनाओं और प्रकृति के सौंदर्य का आकर्षक चित्रण मिलता है। इसके एक प्रसिद्ध गीत में एक दिव्य बालक के जन्म से स्वर्णयुग के आगमन की कल्पना की गई है। बाद के ईसाई विद्वानों ने इसे ईसा मसीह के जन्म की भविष्यवाणी के रूप में देखा, जिसके कारण इस रचना को मध्यकालीन ईसाई परंपरा में भी विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ।
गिओर्गिक्स
वर्जिल की दूसरी महत्त्वपूर्ण रचना ‘गिओर्गिक्स’ है, जिसका अर्थ कृषि या भूमि पर श्रम से संबंधित है। इसकी रचना लगभग 37 से 29 ईसा पूर्व के बीच हुई। उस समय इटली में कृषि की उपेक्षा हो रही थी और ग्रामीण जीवन अनेक कठिनाइयों से गुजर रहा था। इसलिए वर्जिल ने कृषि तथा कृषक जीवन के महत्त्व को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से इस काव्य की रचना की। इसमें खेती, पशुपालन, बागवानी और मधुमक्खी-पालन का काव्यात्मक एवं व्यावहारिक वर्णन मिलता है। भूमि की तैयारी, बीज बोने, फसल काटने, अंगूर और जैतून की खेती तथा पशुओं की देखभाल जैसे विषयों का भी वर्णन किया गया है। किंतु ‘गिओर्गिक्स’ केवल कृषि संबंधी ग्रंथ नहीं है। इसमें किसान के परिश्रम, ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और प्रकृति के साथ मनुष्य के संघर्ष का मार्मिक चित्रण मिलता है। वर्जिल कृषि को केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि रोमन नैतिकता और राष्ट्रीय शक्ति का आधार मानता था।
एनीड
वर्जिल की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘एनीड’ है। यह रोम का महान राष्ट्रीय महाकाव्य है, जिसकी रचना लगभग 29 से 19 ईसा पूर्व के बीच हुई। इसकी कथा ट्रॉय के वीर एनीयस के इर्द-गिर्द केंद्रित है। ट्रॉय के विनाश के बाद एनीयस अपने साथियों के साथ यात्रा करता हुआ कार्थेज पहुँचता है, जहाँ उसकी भेंट रानी डिडो से होती है। बाद में देवताओं के आदेश से वह इटली की ओर प्रस्थान करता है। अंततः लैटियम में उसके आगमन को उस परंपरा से जोड़ा गया, जिसके अनुसार आगे चलकर रोम की स्थापना का आधार तैयार हुआ। ‘एनीड’ पर होमर के ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ का प्रभाव स्पष्ट है, किंतु इसकी विषयवस्तु और उद्देश्य पूर्णतः रोमन हैं। एनीयस को कर्तव्यपरायणता, साहस, त्याग, धार्मिक आस्था और राष्ट्रभक्ति जैसे रोमन आदर्शों का प्रतीक बनाया गया है। महाकाव्य के माध्यम से वर्जिल ने रोम की गौरवशाली परंपरा और उसके ऐतिहासिक भाग्य को प्रस्तुत किया।
‘एनीड’ केवल युद्ध और वीरता का महाकाव्य नहीं है। इसमें युद्ध की विभीषिका, मानवीय पीड़ा, प्रेम, करुणा और कर्तव्य के बीच संघर्ष का भी अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। इसकी भाषा मधुर, गंभीर और कलात्मक है। प्रकृति-वर्णन, चरित्र-चित्रण और भावनात्मक गहराई इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
वर्जिल की प्रतिष्ठा
वर्जिल की महानता को उसके समकालीनों और बाद की पीढ़ियों ने व्यापक रूप से स्वीकार किया। यद्यपि कुछ आलोचकों ने ‘एनीड’ में ऑगस्टस की प्रशंसा तथा होमर के अत्यधिक अनुकरण की आलोचना की, फिर भी उसकी साहित्यिक प्रतिभा निर्विवाद रही। होरेस ने उसे महान कवियों की परंपरा में प्रतिष्ठित किया। मध्यकालीन यूरोप में वर्जिल को अत्यंत सम्मान प्राप्त हुआ और कई ईसाई विद्वानों ने उसकी रचनाओं में भविष्यवाणी के तत्व खोजे।
प्रसिद्ध इतालवी कवि दांते ने अपनी कृति ‘डिवाइन कॉमेडी’ में वर्जिल को अपना मार्गदर्शक बनाया। जॉन मिल्टन ने ‘पैराडाइज लॉस्ट’ की रचना में ‘एनीड’ से प्रेरणा ग्रहण की। इस प्रकार वर्जिल का प्रभाव रोमन साहित्य की सीमाओं से बहुत आगे तक पहुँचा और उसने यूरोपीय साहित्य की आगामी परंपरा को गहराई से प्रभावित किया।
इस प्रकार ऑगस्टसकालीन साहित्य रोमन साहित्य के उत्कर्ष का युग था। इस काल में यूनानी साहित्यिक परंपरा और रोमन राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत समन्वय हुआ। वर्जिल जैसे महान कवियों ने रोम के इतिहास, संस्कृति, नैतिक आदर्शों और राष्ट्रीय गौरव को साहित्यिक अमरता प्रदान की। इसी कारण ऑगस्टसकालीन साहित्य को न केवल रोमन साहित्य का स्वर्णयुग, बल्कि विश्व साहित्य के इतिहास का भी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
होरेस (65 ई. पू.–8 ई.)
मुख्य लेख : होरेस
आगस्टसकालीन साहित्य के प्रमुख कवियों में वर्जिल के बाद क्विंटस होरातियस फ्लैकस (होरेस) का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसका जन्म 65 ईसा पूर्व में दक्षिणी इटली के वेनुसिया नामक नगर में हुआ था। उसके पिता मूलतः एक मुक्तदास थे, जिन्होंने परिश्रम और बुद्धिमत्ता के बल पर अपने पुत्र को उच्च शिक्षा दिलाई। होरेस ने रोम और एथेंस में साहित्य, दर्शन तथा वक्तृत्वकला का अध्ययन किया। शिक्षा पूर्ण करने के बाद वह कुछ समय तक ब्रूटस की सेना में भी रहा और सैनिक जीवन का अनुभव प्राप्त किया। किंतु उसका वास्तविक झुकाव साहित्य की ओर था। गृहयुद्धों के परिणामस्वरूप उसकी पैतृक संपत्ति नष्ट हो गई, इसलिए जीविका के लिए उसे कुछ समय तक सरकारी कार्यालय में लिपिक का कार्य करना पड़ा। इसी अवधि में उसने कविता-रचना आरंभ की। होरेस स्वभाव से सरल, आत्मसम्मानी और एकांतप्रिय व्यक्ति था। उसे आडंबर तथा भीड़-भाड़ से दूर शांत जीवन पसंद था। वह वर्जिल का घनिष्ठ मित्र था और उसी के माध्यम से उसकी पहचान ऑगस्टस के प्रसिद्ध साहित्यिक संरक्षक मैसीनस से हुई। मैसीनस ने उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे संरक्षण दिया तथा रोम के निकट सैबाइन क्षेत्र में एक कृषि-भूखंड और निवास प्रदान किया। यहीं रहकर होरेस ने अपनी अनेक श्रेष्ठ रचनाओं की रचना की। 8 ईसा पूर्व में उसका निधन हो गया।
होरेस की प्रमुख रचनाएँ
होरेस की प्रमुख कृतियों में ‘सैटायर्स’, ‘इपोड्स’, ‘ओड्स’, ‘कार्मेन सैकुलेरे’, ‘एपिस्टल्स’ तथा ‘आर्स पोएटिका’ (काव्यकला) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसकी रचनाओं में व्यंग्य, नैतिकता, जीवन-दर्शन, मित्रता, देशभक्ति और संतुलित जीवन की भावना का सुंदर समन्वय मिलता है।
सैटायर्स
‘सैटायर्स’ होरेस की प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण रचनाओं में है। इसमें उसने हास्य और व्यंग्य के माध्यम से समकालीन रोमन समाज की विभिन्न प्रवृत्तियों का चित्रण किया है। इन कविताओं में सामान्य नागरिकों, व्यापारियों, दार्शनिकों, राजनेताओं, कवियों तथा अन्य सामाजिक वर्गों के जीवन की झलक मिलती है। होरेस ने मानव की कमजोरियों, सामाजिक आडंबरों, लोभ, अहंकार और नैतिक दोषों पर तीखा किंतु अपेक्षाकृत संयमित व्यंग्य किया। उसकी व्यंग्य-रचनाओं की विशेषता यह है कि उनमें उपदेशात्मकता होते हुए भी कटुता अत्यधिक नहीं है। वह समाज की बुराइयों की आलोचना करते हुए आत्मसंयम, संतोष और सरल जीवन का समर्थन करता है।
इपोड्स
‘इपोड्स’ होरेस की आरंभिक कविताओं का संग्रह है। इनमें कहीं-कहीं तीखा व्यंग्य और कटुता दिखाई देती है। यद्यपि इन्हें उसकी सर्वश्रेष्ठ कृतियों में नहीं गिना जाता, फिर भी इनमें उसके जीवन-दर्शन की अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ दिखाई देती हैं। होरेस ग्रामीण जीवन की शांति और सादगी से अत्यंत प्रभावित था। उसके अनुसार वास्तविक सुख धन, वैभव और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा में नहीं, बल्कि प्रकृति के निकट संतुलित एवं शांत जीवन में निहित है। यह विचार उसकी बाद की रचनाओं में भी बार-बार दिखाई देता है।
ओड्स
होरेस की सर्वाधिक प्रसिद्ध और श्रेष्ठ कृति ‘ओड्स’ है। यह यूनानी गीतिकाव्य परंपरा से प्रेरित है, किंतु इसकी विषयवस्तु और भावभूमि मुख्यतः रोमन है। इसमें प्रेम, मित्रता, प्रकृति, धर्म, राज्य, जीवन, मृत्यु और नैतिकता जैसे विविध विषयों का कलात्मक चित्रण मिलता है। ‘ओड्स’ में होरेस ने आगस्टसकालीन रोम की उपलब्धियों, शांति और राष्ट्रीय गौरव की प्रशंसा की है। साथ ही उसने संयम, आत्मनियंत्रण, सदाचार और संतुलित जीवन को अत्यधिक महत्त्व दिया। उसके अनुसार मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए, विपत्तियों में धैर्य बनाए रखना चाहिए और अनावश्यक महत्त्वाकांक्षाओं से बचना चाहिए। उसके जीवन-दर्शन में मध्यम मार्ग का विशेष महत्त्व है। होरेस के अनुसार मनुष्य का वास्तविक सुख बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मसंतोष और सदाचार में निहित है। उसकी कविताओं में मित्रता को भी विशेष महत्त्व प्राप्त है। प्रेम की अपेक्षा सच्ची मित्रता, नैतिक चरित्र और मानसिक शांति को अधिक स्थायी जीवन-मूल्य माना गया है।
होरेस का साहित्यिक महत्त्व
होरेस के साहित्य में रोमन राष्ट्रीयता, देशभक्ति और नैतिक आदर्शों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वह ग्रामीण जीवन का प्रशंसक था तथा ऑगस्टस द्वारा किए जा रहे नैतिक और सामाजिक सुधारों का समर्थक था। दार्शनिक दृष्टि से उसकी रचनाओं में स्टोइक नैतिकता तथा एपिक्युरियन जीवन-दृष्टि, दोनों का प्रभाव दिखाई देता है। वह अत्यधिक भोग-विलास का विरोध करता था, किंतु जीवन के स्वाभाविक सुखों और मित्रता को महत्त्व देता था।
होरेस की भाषा सरल, परिष्कृत, संतुलित और प्रभावशाली थी। उसकी काव्य-शैली में विचार और भावना का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। इसी कारण उसे लैटिन गीतिकाव्य के महानतम कवियों में स्थान दिया जाता है। उसकी रचनाओं का प्रभाव बाद के यूरोपीय साहित्य पर भी व्यापक रहा।
प्रणयगीतों का विकास
वर्जिल और होरेस के बाद आगस्टसकालीन रोमन काव्यधारा में एक नया परिवर्तन आया। प्रारंभिक कवियों की रचनाओं में जहाँ धर्म, प्रकृति, राष्ट्रीय गौरव और नैतिक आदर्शों को महत्त्व प्राप्त था, वहीं बाद के कवियों ने प्रेम और व्यक्तिगत भावनाओं को अपनी काव्य-सृष्टि का प्रमुख विषय बनाया। इस प्रकार महाकाव्य और राष्ट्रीय काव्य के साथ-साथ प्रणयगीतों की परंपरा का विकास हुआ। उस समय रोमन समाज में राजनीतिक संघर्षों के बाद आर्थिक समृद्धि और विलासिता बढ़ रही थी। सामाजिक जीवन में व्यक्तिगत सुख, भोग और प्रेम-संबंधों की प्रवृत्ति भी प्रबल हो रही थी। प्रणयगीतों में प्रेम, विरह, आकर्षण, ईर्ष्या, विश्वासघात और व्यक्तिगत भावनाओं का चित्रण प्रमुख रूप से हुआ। इन रचनाओं से तत्कालीन रोमन समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की अनेक विशेषताओं की जानकारी मिलती है। इस परंपरा के प्रमुख कवियों में अल्बियस टिबुलस, सेक्स्टस प्रोपर्टियस और ओविड के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
अल्बियस टिबुलस (लगभग 54–19 ई. पू.)
अल्बियस टिबुलस का जन्म टिबुर के निकट पेडुम में हुआ था। गृहयुद्धों के कारण उसे भी अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित होना पड़ा। बाद में प्रसिद्ध सेनानायक और साहित्य-प्रेमी मेसाला ने उसे संरक्षण दिया। कुछ समय तक वह मेसाला के साथ सैन्य अभियानों और यात्राओं पर गया, किंतु स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण शीघ्र ही लौट आया। टिबुलस ने राजनीतिक और सैनिक जीवन की अपेक्षा साहित्य को अपना जीवन-कार्य बनाया। उसकी कविताओं का प्रमुख विषय प्रेम था। डेलिया नामक स्त्री के प्रति उसके प्रेम की अभिव्यक्ति उसकी रचनाओं में विशेष रूप से दिखाई देती है। उसके प्रणयगीतों में प्रेम की मधुरता के साथ ईर्ष्या, विरह, प्रतिस्पर्धा और मानसिक वेदना का भी प्रभावशाली चित्रण मिलता है। टिबुलस युद्ध और राजनीति की अपेक्षा शांतिपूर्ण ग्रामीण जीवन को अधिक महत्त्व देता था। उसकी रचनाओं में प्रेम के साथ प्रकृति और शांत ग्रामीण जीवन के प्रति गहरा अनुराग दिखाई देता है। उसकी भाषा सरल, सहज और भावप्रधान है। इसी कारण उसे रोमन प्रणयगीत परंपरा का महत्त्वपूर्ण कवि माना जाता है।
सेक्स्टस प्रोपर्टियस (लगभग 49–15 ई. पू.)
सेक्स्टस प्रोपर्टियस का जन्म इटली के उम्ब्रिया प्रदेश में हुआ था। उसकी शिक्षा रोम में हुई। वह मैसीनस के साहित्यिक मंडल से जुड़ा हुआ था। यद्यपि उसी मंडली में होरेस भी था, फिर भी दोनों के बीच विशेष निकटता नहीं थी। प्रोपर्टियस के अधिकांश प्रणय-काव्य की केंद्रस्थली उसकी प्रिय सिंथिया है। उसके प्रति प्रेम, आकर्षण, विरह, ईर्ष्या और मानसिक संघर्ष का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण उसकी कविताओं में मिलता है। उसने प्रेम को जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया और कई स्थानों पर सांसारिक वैभव तथा राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की अपेक्षा प्रेम को अधिक महत्त्व दिया।
यद्यपि उसका काव्य मुख्यतः प्रणयप्रधान है, फिर भी उसमें देशभक्ति, मृत्यु-चिंतन, जीवन की नश्वरता और रोमन गौरव के भाव भी दिखाई देते हैं। उसकी भाषा कलात्मक, भावपूर्ण और अलंकारिक है। भावों की गहराई और अभिव्यक्ति की विशिष्टता के कारण उसे आगस्टसकालीन प्रणय-कवियों में प्रमुख स्थान प्राप्त है।
इस प्रकार आगस्टसकालीन साहित्य में होरेस ने रोमन जीवन, नैतिकता और राष्ट्रीय चेतना को गीतिकाव्य के माध्यम से अभिव्यक्ति दी, जबकि टिबुलस और प्रोपर्टियस जैसे कवियों ने व्यक्तिगत भावनाओं और प्रेम को काव्य का केंद्र बनाया। इन दोनों धाराओं ने मिलकर रोमन साहित्य को विविधता, गहराई और स्थायी साहित्यिक महत्त्व प्रदान किया।
ओविड (43 ई. पू.–17/18 ई.)
आगस्टसकालीन प्रणयगीतकारों में ओविड का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसका पूरा नाम पब्लियस ओविडियस नासो था। उसका जन्म 43 ईसा पूर्व में इटली के मध्य भाग में स्थित सल्मो के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उसके पिता ने उसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए रोम भेजा, जहाँ उसने विधि, साहित्य और वक्तृत्वकला का अध्ययन किया। कुछ समय तक उसने सार्वजनिक जीवन और न्यायिक कार्यों में भी रुचि ली, किंतु उसका वास्तविक झुकाव साहित्य की ओर था। अंततः उसने सरकारी जीवन से स्वयं को अलग कर साहित्य-सृजन को अपना प्रमुख कार्य बना लिया। अपनी प्रतिभा, विद्वत्ता और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण वह शीघ्र ही रोम के साहित्यिक समाज में प्रसिद्ध हो गया। ओविड की प्रमुख रचनाओं में ‘एमोरेस’, ‘हेरोइड्स’, ‘आर्स अमेटोरिया’, ‘रेमेडिया अमोरिस’, ‘फास्टी’, ‘मेटामॉर्फोसिस’, ‘ट्रिस्टिया’ तथा ‘एक्स पोंटो’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
एमोरेस
ओविड की प्रारंभिक प्रसिद्ध रचना ‘एमोरेस’ प्रेमगीतों का संग्रह है। इसमें उसने प्रेम और आकर्षण की भावनाओं को अत्यंत कलात्मक ढंग से व्यक्त किया है। इन कविताओं में कोरिन्ना नामक एक स्त्री का उल्लेख मिलता है, जिसे सामान्यतः एक काव्यात्मक या काल्पनिक पात्र माना जाता है। रचना की भाषा सरल, मधुर, प्रवाहपूर्ण और मनोरंजक है। इसके कारण यह कृति रोमन युवाओं में अत्यंत लोकप्रिय हुई।
आर्स अमेटोरिया
‘आर्स अमेटोरिया’ अर्थात् ‘प्रेम की कला’ ओविड की सबसे चर्चित रचनाओं में से एक है। इसमें प्रेम प्राप्त करने, प्रेम-संबंध स्थापित करने तथा उन्हें बनाए रखने के उपायों का काव्यात्मक और व्यंग्यात्मक वर्णन किया गया है। इसकी लोकप्रियता व्यापक थी, किंतु इसकी विषय-वस्तु और नैतिक दृष्टिकोण के कारण रूढ़िवादी वर्ग ने इसकी आलोचना भी की। आगस्टस द्वारा किए जा रहे नैतिक सुधारों की पृष्ठभूमि में ओविड की ऐसी रचनाएँ विवाद का कारण बनीं।
हेरोइड्स
‘हेरोइड्स’ में यूनानी और रोमन पौराणिक कथाओं की प्रसिद्ध स्त्री-पात्रों के काल्पनिक पत्रों के माध्यम से उनके प्रेम, विरह, पीड़ा और मानसिक संघर्षों को अभिव्यक्त किया गया है। इस कृति की विशेषता यह है कि ओविड ने पौराणिक पात्रों को मानवीय भावनाओं से युक्त जीवंत व्यक्तित्व प्रदान किया।
मेटामॉर्फोसिस
ओविड की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘मेटामॉर्फोसिस’ है। यह पंद्रह पुस्तकों में विभाजित एक विशाल काव्य है, जिसमें यूनानी और रोमन पौराणिक कथाओं को अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसका केंद्रीय विषय रूपांतरण है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर ओविड के समय तक की अनेक पौराणिक कथाओं को एक विस्तृत काव्यात्मक क्रम में प्रस्तुत किया गया है। इस कृति में कल्पना, हास्य, व्यंग्य, प्रेम, करुणा और काव्य-सौंदर्य का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। बाद के यूरोपीय साहित्य, चित्रकला और नाट्यकला पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। मध्यकाल और पुनर्जागरण युग के अनेक साहित्यकारों ने इससे प्रेरणा प्राप्त की। बोक्काच्चो, चौसर, स्पेंसर और टास्सो जैसे साहित्यकारों की रचनाओं में ओविड की परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
निर्वासन और अंतिम रचनाएँ
8 ईस्वी में सम्राट ऑगस्टस ने ओविड को रोम से निर्वासित कर काला सागर के तट पर स्थित टोमी भेज दिया, जो वर्तमान रोमानिया के कॉन्स्टांटा के निकट था। निर्वासन के कारण उसे परिवार, मित्रों और रोम से दूर रहना पड़ा। इस स्थिति ने उसके जीवन में गहरी मानसिक पीड़ा उत्पन्न की। इसी काल में उसने ‘ट्रिस्टिया’ और ‘एक्स पोंटो’ जैसी रचनाएँ लिखीं। इनमें उसके अकेलेपन, दुःख, स्वदेश-प्रेम और रोम लौटने की आकांक्षा की मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है। 17 या 18 ईस्वी के लगभग निर्वासन में ही उसका निधन हुआ। ओविड की भाषा सरल, मधुर और अत्यंत प्रवाहपूर्ण थी। कल्पनाशक्ति, विनोदप्रियता, भावाभिव्यक्ति और कथावाचन-कौशल उसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। वह केवल रोमन प्रणय-काव्य का महान कवि ही नहीं, बल्कि यूरोपीय साहित्य की दीर्घ परंपरा को प्रभावित करने वाला अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि था।
ऐतिहासिक साहित्य
आगस्टसकालीन रोमन साहित्य में पद्य के साथ-साथ गद्य-साहित्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल में इतिहास-लेखन विशेष रूप से समृद्ध हुआ। प्रमुख इतिहासकारों में टाइटस लिवियस (लिवी) तथा पॉम्पियस ट्रोगस का नाम उल्लेखनीय है।
टाइटस लिवियस (लिवी) (59 ई. पू.–17 ई.)
मुख्य लेख : लिवी
लिवी का जन्म 59 ईसा पूर्व में इटली के पटवियम, अर्थात् वर्तमान पडुआ, में हुआ था। उसके प्रारंभिक जीवन के संबंध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। बाद में वह रोम आया और साहित्यिक वातावरण में रहते हुए इतिहास-लेखन की ओर प्रवृत्त हुआ। उसने अपने जीवन के लगभग चालीस वर्ष रोम के इतिहास को लिखने में समर्पित किए। उसकी महान कृति ‘अब उर्बे कोंडिता’ अर्थात् ‘नगर की स्थापना से’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह रोम की स्थापना से लेकर उसके समकालीन काल तक के इतिहास का विशाल ग्रंथ था, जिसमें मूलतः 142 पुस्तकों में घटनाओं का वर्णन किया गया था। वर्तमान समय में इसकी केवल कुछ पुस्तकें ही पूर्ण रूप से उपलब्ध हैं।
लिवी ने रोमन इतिहास को केवल घटनाओं के क्रम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे राष्ट्रीय गौरव और नैतिक आदर्शों की गाथा के रूप में चित्रित किया। उसके अनुसार रोम की महानता का आधार केवल उसकी सैन्य शक्ति या राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि रोमन नागरिकों का अनुशासन, साहस, कर्तव्यपरायणता और नैतिक चरित्र था। वह अपने समय में बढ़ती विलासिता, स्वार्थ और नैतिक पतन से चिंतित था तथा प्राचीन रोमन मूल्यों को पुनर्जीवित करने का समर्थक था।
लिवी की भाषा अत्यंत प्रभावशाली, प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक सौंदर्य से युक्त थी। वह घटनाओं को इतनी सजीवता से प्रस्तुत करता था कि पाठक स्वयं को उनका प्रत्यक्षदर्शी अनुभव करता है। विशेष रूप से रोम और कार्थेज के संघर्षों तथा हैनिबल से संबंधित घटनाओं का उसका वर्णन अत्यंत प्रभावशाली है। रोमन गद्य-साहित्य में उसकी कृति का स्थान वही है जो पद्य-साहित्य में वर्जिल की ‘एनीड’ का है।
फिर भी लिवी पूर्णतः वैज्ञानिक इतिहासकार नहीं था। वह धार्मिक परंपराओं, शकुनों, देववाणियों और लोककथाओं में विश्वास करता था तथा प्रारंभिक रोमन इतिहास की किंवदंतियों को भी अपने वर्णन में सम्मिलित करता था। वह घटनाओं के मूल कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण करने की अपेक्षा उनके नैतिक और साहित्यिक पक्ष को अधिक महत्त्व देता था। सामाजिक संघर्षों तथा सामान्य जनता, विशेषकर प्लेबियनों की भूमिका का भी उसने पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया। इसलिए उसकी कृति राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत और साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान होने के बावजूद आधुनिक अर्थों में पूर्णतः निष्पक्ष इतिहास नहीं मानी जा सकती।
पॉम्पियस ट्रोगस (प्रथम शताब्दी ई.पू.)
मुख्य लेख : ट्रोगस
पॉम्पियस ट्रोगस लिवी का समकालीन इतिहासकार था। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘हिस्टोरियाए फिलिपिकाए’ 44 पुस्तकों में रचित थी। इसमें केवल मकदूनिया के इतिहास का ही वर्णन नहीं था, बल्कि विभिन्न राष्ट्रों, राज्यों और शासकों के इतिहास को भी व्यापक रूप से सम्मिलित किया गया था। इस कारण उसकी रचना रोमन इतिहास-लेखन को व्यापक विश्व-दृष्टि प्रदान करने वाली कृति मानी जाती है। मूल ग्रंथ अब पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है, किंतु बाद के लेखकों के उद्धरणों और सारांशों से उसके स्वरूप की जानकारी मिलती है।
इस प्रकार आगस्टसकालीन साहित्य में ओविड ने प्रणय, पौराणिकता और मानवीय भावनाओं को नई अभिव्यक्ति दी, जबकि लिवी और ट्रोगस जैसे इतिहासकारों ने अतीत को साहित्यिक और ऐतिहासिक रूप प्रदान किया। ओविड की कल्पनाशीलता और लिवी की राष्ट्रीय चेतना ने मिलकर आगस्टसकालीन साहित्य को रोमन संस्कृति के सबसे समृद्ध साहित्यिक युगों में प्रतिष्ठित किया।
पारिभाषिक एवं तकनीकी ग्रंथ
आगस्टसकालीन साहित्य केवल कविता और इतिहास तक सीमित नहीं था। इस काल में वास्तुकला, भूगोल, खगोलशास्त्र, पौराणिक साहित्य तथा अन्य ज्ञान-विज्ञान संबंधी विषयों पर भी महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई। इन रचनाओं ने रोमन बौद्धिक परंपरा को समृद्ध करने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का स्थायी आधार तैयार किया। इस क्षेत्र में मार्कस विट्रुवियस पोल्लियो का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसने पहले जूलियस सीज़र की सेना में अभियंता के रूप में कार्य किया और बाद में आगस्टस के शासनकाल में वास्तु संबंधी कार्यों से जुड़ा रहा। सेवानिवृत्ति के पश्चात् उसने वास्तुकला पर अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘दे आर्किटेक्चुरा’ लिखा और इसे आगस्टस को समर्पित किया। यह दस पुस्तकों में विभाजित है। इसमें भवन-निर्माण की सामग्री, वास्तुकला के सिद्धांत, मंदिरों और सार्वजनिक भवनों की योजना, नगर-निर्माण, जल-प्रणाली, मशीनों, जलघड़ियों तथा निर्माण-तकनीक का विस्तृत वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि रोमन वास्तुकला और अभियंत्रण अत्यंत विकसित थे। विशेष रूप से कंक्रीट के निर्माण और उसके उपयोग में रोमनों ने उल्लेखनीय दक्षता प्राप्त कर ली थी। पुनर्जागरण काल में इस ग्रंथ की पुनर्खोज ने यूरोप के वास्तुविदों और कलाकारों को गहराई से प्रभावित किया। लियोनार्डो दा विंची और आंद्रेआ पल्लादियो जैसे कलाकारों एवं वास्तुविदों ने इससे प्रेरणा प्राप्त की। इसलिए ‘दे आर्किटेक्चर’ प्राचीन रोमन वास्तुकला का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इस काल में गायस जूलियस हाइजिनस से संबंधित पौराणिक तथा खगोलीय रचनाएँ भी प्रसिद्ध थीं। ‘फैबुले’ और ‘पॉएटिकॉन एस्ट्रोनॉमिकॉन’ नामक ग्रंथ उससे संबद्ध माने जाते हैं, यद्यपि इन ग्रंथों के वास्तविक लेखकत्व के संबंध में आधुनिक विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। इन रचनाओं में यूनानी-रोमन पौराणिक कथाओं तथा नक्षत्रों से संबंधित विवरण मिलते हैं।
आगस्टसकाल में यूनानी भाषा का प्रभाव भी अत्यंत व्यापक था। इस कारण अनेक विद्वानों ने यूनानी भाषा में रचनाएँ कीं। डिओडोरस सिक्युलस ने ‘बिब्लियोथेका हिस्टोरिका’ अर्थात् ‘हिस्टोरिकल लाइब्रेरी’ नामक विशाल इतिहास-ग्रंथ की रचना की। इसमें विश्व के विभिन्न क्षेत्रों और सभ्यताओं के इतिहास का व्यापक विवरण मिलता है। उसकी कृति प्राचीन इतिहास की अनेक अब लुप्त हो चुकी परंपराओं के अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी है।
डिओनिसियस ऑफ हैलिकार्नासस आगस्टसकाल का एक अन्य महत्त्वपूर्ण यूनानी लेखक था। वह रोम में आकर बस गया और लगभग दो दशकों तक वहाँ रहा। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘रोमन एंटिक्विटीज’ थी, जो मूलतः बीस पुस्तकों में रचित थी। इसमें रोमुलस के समय से लेकर प्रथम प्यूनिक युद्ध तक के रोमन इतिहास का वर्णन मिलता है। उसने रोम की प्राचीन संस्थाओं और परंपराओं को यूनानी पाठकों के लिए समझाने का प्रयास किया। यद्यपि उसकी रचना उपयोगी है, फिर भी प्रारंभिक रोमन इतिहास के संबंध में उसने परंपरागत कथाओं पर पर्याप्त निर्भरता दिखाई।
यूनानी लेखक निकोलस ऑफ दमिश्क ने भी विश्व-इतिहास पर एक विशाल ग्रंथ की रचना की थी, किंतु उसका अधिकांश भाग नष्ट हो चुका है। उपलब्ध अंशों से ज्ञात होता है कि उसने विभिन्न राज्यों और शासकों के इतिहास के साथ-साथ अपने समकालीन व्यक्तियों, विशेषकर हेरोद और आगस्टस, का भी वर्णन किया। उसके लेखन में आगस्टस के प्रति प्रशंसा का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।
स्ट्रैबो इस युग का महान इतिहासकार और भूगोलवेत्ता था। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘ज्योग्राफिका’ है। इसमें यूरोप, एशिया और अफ्रीका के विभिन्न प्रदेशों का भौगोलिक तथा सांस्कृतिक विवरण मिलता है। उसने नदियों, पर्वतों, समुद्रों, नगरों, जनजातियों, प्राकृतिक संसाधनों और विभिन्न प्रदेशों की सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया। इसलिए उसकी कृति प्राचीन विश्व के इतिहास और भूगोल के अध्ययन के लिए अमूल्य स्रोत है।
उत्तर-आगस्टसकालीन साहित्य
आगस्टस की मृत्यु 14 ईस्वी में हुई। उसके बाद से तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध तक रोमन साहित्य में अनेक नए परिवर्तन दिखाई दिए। विशेष रूप से 14 से लगभग 117 ईस्वी तक का काल लैटिन साहित्य का ‘रजत युग’ कहलाता है। इस काल में यूनानी तथा पूर्वी संस्कृतियों का प्रभाव बढ़ा और साहित्य में विविधता, अलंकारिकता, व्यक्तिगत भावनाओं तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोण का विकास हुआ। इस युग के प्रमुख साहित्यकारों में सेनेका, लूकन, पेट्रोनियस, क्विंटिलियन, टैसिटस, मार्शल और स्टैटियस उल्लेखनीय हैं।
सेनेका (लगभग 4 ई. पू.–65 ई.)
मुख्य लेख : सेनेका
लूसियस एनियस सेनेका इस युग का महान दार्शनिक, नाटककार और गद्यकार था। उसका जन्म स्पेन के कोर्डुबा में हुआ, किंतु शिक्षा रोम में प्राप्त की। उसके पिता प्रसिद्ध वक्ता थे। सेनेका का जीवन राजनीतिक उतार-चढ़ावों से भरा रहा। सम्राट क्लॉडियस के शासनकाल में उसे जूलिया लिविल्ला के साथ कथित संबंधों के आरोप में कोर्सिका निर्वासित कर दिया गया। बाद में वह रोम लौटा और सम्राट नीरो का शिक्षक तथा सलाहकार बना। सेनेका ने अनेक दुखांत नाटकों की रचना की। उसकी रचनाओं में पात्रों की अपेक्षा विचार, भाषण, नैतिक संघर्ष और मनोवैज्ञानिक तनाव को अधिक महत्त्व दिया गया है। उसकी भाषा प्रभावशाली, अलंकारपूर्ण और चिंतनप्रधान है। उसके नाटकों का प्रभाव आगे चलकर यूरोपीय दुखांत नाटक पर पड़ा और पुनर्जागरणकालीन अंग्रेजी नाटककारों, विशेषकर शेक्सपियर के युग के नाटककारों, पर उसकी परंपरा का प्रभाव देखा जा सकता है।
लूकन (39–65 ई.)
मार्कस एनियस लूकन सेनेका का भतीजा था। उसका जन्म कोर्डुबा में हुआ और शिक्षा रोम में प्राप्त की। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘फार्सालिया’ है, जिसमें सीज़र और पॉम्पियस के बीच हुए गृहयुद्ध का वर्णन मिलता है। लूकन ने गणतांत्रिक स्वतंत्रता और राजनीतिक आदर्शों को महत्त्व दिया। उसने कैटो को स्वतंत्रता और गणतांत्रिक आदर्शों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। बाद में नीरो के विरुद्ध पिसो षड्यंत्र में उसकी संलिप्तता सामने आने पर उसे आत्महत्या का आदेश दिया गया, जिसे उसने स्वीकार किया।
पेट्रोनियस
पेट्रोनियस की प्रसिद्ध कृति ‘सैटिरिकॉन’ है। इसे प्राचीन रोमन गद्य-साहित्य की आरंभिक और विशिष्ट उपन्यासात्मक रचनाओं में माना जाता है। इसमें हास्य, व्यंग्य, गद्य और पद्य का अद्भुत मिश्रण है। इसकी विशेषता रोमन समाज के सामान्य वर्गों, पूर्वदासों, व्यापारियों और निम्न सामाजिक समूहों के जीवन का यथार्थ चित्रण है। इस दृष्टि से पेट्रोनियस का साहित्य आदर्शवादी परंपरा से हटकर सामाजिक यथार्थ और व्यंग्य की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
क्विंटिलियन (लगभग 35–100 ई.)
मुख्य लेख : क्विंटिलियन
मार्कस फेबियस क्विंटिलियन महान शिक्षाशास्त्री, वक्तृत्वशास्त्री और साहित्यिक आलोचक था। उसका जन्म स्पेन के कैलागुरिस में हुआ था। बाद में वह रोम आया और वहाँ वक्तृत्व-कला का विद्यालय स्थापित किया। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ है। इसमें उसने वक्ता के निर्माण, शिक्षा-पद्धति, भाषण-कला और साहित्यिक अभिव्यक्ति का विस्तृत विवेचन किया।
क्विंटिलियन के अनुसार श्रेष्ठ वक्ता केवल प्रभावशाली भाषण देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि नैतिक रूप से आदर्श और चरित्रवान व्यक्ति भी होना चाहिए। उसने वक्तृत्व-कला के प्रमुख चरणों के रूप में विषय-विचार, सामग्री का विन्यास, शैली, स्मरण और प्रस्तुति को महत्त्व दिया। उसने बाल्यावस्था से ही उचित शिक्षा और संस्कारों पर बल दिया। इस कारण उसका ग्रंथ केवल वक्तृत्वशास्त्र का ग्रंथ नहीं, बल्कि प्राचीन रोम की शिक्षा-पद्धति और नैतिक आदर्शों को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत भी है।
इस प्रकार आगस्टसकाल और उत्तर-आगस्टसकालीन साहित्य ने रोमन ज्ञान-परंपरा को अनेक दिशाओं में विकसित किया। विट्रुवियस और स्ट्रैबो ने वास्तुकला तथा भूगोल को समृद्ध किया, जबकि सेनेका, लूकन, पेट्रोनियस और क्विंटिलियन ने दर्शन, काव्य, गद्य, व्यंग्य और वक्तृत्व-कला को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। इन रचनाओं ने आगे चलकर यूरोपीय साहित्य, कला, शिक्षा और बौद्धिक परंपरा को गहराई से प्रभावित किया।
टैसिटस (लगभग 56–120 ई.)
मुख्य लेख : टैसिटस
पब्लियस कॉर्नेलियस टैसिटस रोमन साम्राज्य के महानतम इतिहासकारों में से एक था। वह इतिहासकार होने के साथ-साथ कुशल वक्ता, प्रशासक और गंभीर राजनीतिक विचारक भी था। उसने रोमन साम्राज्य के राजनीतिक जीवन, प्रशासन, सामाजिक परिस्थितियों तथा नैतिक समस्याओं का अत्यंत सूक्ष्म और आलोचनात्मक अध्ययन किया। उसकी प्रमुख कृतियों में ‘एग्रीकोला’, ‘जर्मानिया’, ‘हिस्ट्रीज़’ और ‘एनाल्स’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसकी रचनाओं में तत्कालीन रोमन शासन की वास्तविक स्थिति, सम्राटों की निरंकुश प्रवृत्तियाँ, राजनीतिक षड्यंत्र, दरबारी भ्रष्टाचार तथा नैतिक पतन का सजीव चित्रण मिलता है। इसी कारण उसे प्राचीन विश्व के श्रेष्ठ इतिहासकारों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है।
टैसिटस की ‘एग्रीकोला’ उसके ससुर ग्नियस जूलियस एग्रीकोला की जीवनी है, जो ब्रिटेन का रोमन गवर्नर था। इस कृति में एग्रीकोला के व्यक्तिगत चरित्र, सैन्य उपलब्धियों और ब्रिटेन में रोमन विस्तार का वर्णन मिलता है। इसके साथ ही टैसिटस ने रोमन शासन की राजनीतिक परिस्थितियों और सम्राट डोमिशियन के निरंकुश शासन की अप्रत्यक्ष आलोचना भी की है। ‘एग्रीकोला’ केवल जीवनी नहीं, बल्कि रोमन साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासन को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत भी है।

टैसिटस की दूसरी प्रसिद्ध कृति ‘जर्मानिया’ है। इसमें उसने राइन नदी के पार रहने वाली जर्मनिक जनजातियों के सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और नैतिक जीवन का वर्णन किया है। उसने जर्मनों के साहस, स्वतंत्रता-प्रेम, सरलता, अनुशासन और युद्ध-कौशल की प्रशंसा की तथा इन गुणों की तुलना अपने समय के विलासितापूर्ण और नैतिक रूप से पतनशील रोमन समाज से की। यद्यपि ‘जर्मानिया’ में जर्मनों का चित्रण पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है और उसमें आदर्शीकरण के तत्व भी दिखाई देते हैं, फिर भी यह प्राचीन जर्मनिक समाज के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
टैसिटस की ‘हिस्ट्रीज़’ में मुख्यतः 69 ईस्वी के ‘चार सम्राटों के वर्ष’ से आरंभ होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल और फ्लावियन वंश के प्रारंभिक शासन का वर्णन मिलता है। इसमें नीरो की मृत्यु के बाद उत्पन्न सत्ता-संघर्ष, गाल्बा, ओथो, वितेलियस और वेस्पासियन के बीच संघर्ष तथा गृहयुद्ध की परिस्थितियों का सजीव चित्रण किया गया है। टैसिटस ने इन घटनाओं के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया कि निरंकुश शासन में सत्ता प्राप्त करने की लालसा किस प्रकार राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा को जन्म देती है। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति ‘एनाल्स’ है। इसमें उसने टिबेरियस के शासन से लेकर नीरो के शासन के प्रारंभिक वर्षों तक की घटनाओं का वर्णन किया। इस ग्रंथ में जर्मेनिकस, सेजानस, क्लॉडियस, एग्रीपिना तथा नीरो जैसे प्रमुख व्यक्तित्वों का विस्तृत वर्णन मिलता है। टैसिटस ने सम्राटों की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं, दरबारी षड्यंत्रों, सीनेट की घटती शक्ति और राजनीतिक भय के वातावरण का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया है। विशेष रूप से नीरो के शासनकाल का उसका वर्णन रोमन साम्राज्य की राजनीतिक और नैतिक समस्याओं को समझने में अत्यंत उपयोगी है।
टैसिटस का इतिहास-दर्शन केवल घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं था। वह घटनाओं के पीछे कार्य करने वाली मानवीय प्रवृत्तियों और राजनीतिक शक्तियों का विश्लेषण करता था। उसका मानना था कि निरंकुश शासन में भय, चाटुकारिता और स्वार्थ राजनीतिक संस्थाओं को कमजोर कर देते हैं। उसने सम्राटों की निरंकुशता के साथ-साथ सीनेट के सदस्यों की कायरता और अवसरवादिता की भी आलोचना की। उसके इतिहास में स्वतंत्रता और राजनीतिक नैतिकता के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है।
टैसिटस की लेखन-शैली उसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। उसकी भाषा संक्षिप्त, गंभीर, प्रभावशाली और अर्थगर्भित है। वह बहुत कम शब्दों में गहन विचार व्यक्त करने में सक्षम था। घटनाओं का वर्णन करते समय वह पात्रों के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर विशेष ध्यान देता है। उसके भाषण और संवाद कई बार साहित्यिक रूप से रचित होते हैं, किंतु उनके माध्यम से वह तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और विभिन्न व्यक्तियों की मानसिकता को स्पष्ट करता है। उसके लेखन में व्यंग्य, विडंबना और नैतिक आलोचना का भी प्रभावशाली प्रयोग मिलता है।
फिर भी टैसिटस की इतिहास-लेखन पद्धति की कुछ सीमाएँ थीं। वह पूर्णतः आधुनिक अर्थों में निष्पक्ष इतिहासकार नहीं था। सम्राटों और अभिजात वर्ग के प्रति उसका दृष्टिकोण कई बार अत्यधिक आलोचनात्मक हो जाता है। उसने उपलब्ध स्रोतों, सीनेट की परंपराओं तथा राजनीतिक वृत्तांतों पर पर्याप्त निर्भरता दिखाई। इसके अतिरिक्त, कुछ स्थानों पर उसने घटनाओं के पीछे के उद्देश्यों के संबंध में अनुमान भी लगाए हैं। फिर भी उसकी आलोचनात्मक दृष्टि और साहित्यिक प्रतिभा उसकी इन सीमाओं को काफी हद तक संतुलित कर देती है।
टैसिटस का महत्त्व केवल रोमन इतिहास के इतिहासकार के रूप में नहीं है। उसने इतिहास को नैतिक और राजनीतिक चिंतन का माध्यम बनाया। उसके ग्रंथों में स्वतंत्रता, सत्ता, नैतिकता, भ्रष्टाचार और मानव-स्वभाव जैसे सार्वभौमिक प्रश्नों पर गंभीर विचार मिलता है। इसी कारण उसकी रचनाएँ केवल प्राचीन रोम के अध्ययन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि बाद के यूरोपीय इतिहासकारों और राजनीतिक चिंतकों को भी प्रभावित करती रहीं।
जुवेनल (लगभग 55–130 ई.)
मुख्य लेख : जुवेनल
डेसीमस जूनियस जुवेनालिस, जिसे सामान्यतः जुवेनल कहा जाता है, रोमन साहित्य का महान व्यंग्यकार था।जुवेनल उसका जन्म संभवतः एक्वीनम में हुआ था। उसने अपने व्यंग्यात्मक काव्य के माध्यम से रोमन समाज में बढ़ती विलासिता, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, राजनीतिक चाटुकारिता और नैतिक पतन की तीखी आलोचना की। उसके व्यंग्यों में धन और सत्ता की अंधी दौड़ तथा बाहरी वैभव के पीछे छिपे सामाजिक दोषों का सजीव चित्रण मिलता है। जुवेनल के व्यंग्यों का उद्देश्य केवल हास्य उत्पन्न करना नहीं था। वह सामाजिक और नैतिक सुधार की आवश्यकता पर बल देता था। उसके अनुसार अत्यधिक धन, विलासिता और कृत्रिम जीवन-पद्धति ने रोमन समाज के पारंपरिक मूल्यों को कमजोर कर दिया था। वह सादगी, आत्मसंयम और नैतिक जीवन को अधिक महत्त्व देता था। उसकी रचनाएँ तत्कालीन रोमन समाज के अनेक वर्गों और प्रवृत्तियों की तीखी आलोचना करती हैं। इस कारण जुवेनल को रोमन व्यंग्य-साहित्य का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि माना जाता है।
मार्शल (लगभग 40–104 ई.)
मुख्य लेख : मार्शल
मार्कस वलेरियस मार्शल का जन्म स्पेन में हुआ था, किंतु उसने अपने साहित्यिक जीवन का अधिकांश समय रोम में बिताया। वह विशेष रूप से अपने लघु व्यंग्यात्मक काव्य-संग्रह ‘एपिग्राम्स’ के लिए प्रसिद्ध है। उसकी कविताओं में दैनिक जीवन, सामाजिक संबंधों, धन, प्रतिष्ठा, मित्रता, प्रेम और मानवीय कमजोरियों का चुटीला चित्रण मिलता है। मार्शल की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संक्षिप्त, तीक्ष्ण और विनोदी अभिव्यक्ति है। वह साधारण घटनाओं के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों की वास्तविक प्रवृत्तियों को उजागर करता है। इस कारण मार्शल का साहित्य रोमन नगर-जीवन के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
स्टैटियस (लगभग 45–96 ई.)
मुख्य लेख : स्टैटियस
पब्लियस पपिनियस स्टैटियस उत्तर आगस्टसकालीन रोमन साहित्य का प्रमुख कवि था। उसकी प्रसिद्ध रचनाओं में ‘थेबैड’, ‘सिल्वी’ और ‘अकिलीइड’ शामिल हैं। ‘थेबैड’ यूनानी पौराणिक परंपरा पर आधारित महाकाव्य है, जिसमें थीब्स के संघर्षों का वर्णन मिलता है। ‘सिल्वी’ में विविध विषयों पर लिखी गई कविताएँ संग्रहीत हैं। उसकी भाषा अलंकृत, प्रभावशाली और भावपूर्ण थी। उसने सम्राट डोमिशियन की प्रशंसा में भी रचनाएँ कीं। यद्यपि बाद के युगों में उसकी प्रसिद्धि वर्जिल और होरेस की तुलना में कम रही, फिर भी रजत युग के साहित्य में उसका महत्त्वपूर्ण स्थान है।
स्यूटोनियस (लगभग 69–126 ई.)
मुख्य लेख : स्यूटोनियस
गायस स्यूटोनियस ट्रैंक्विलस रोमन जीवनी-लेखन का प्रमुख प्रतिनिधि था। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘द ट्वेल्व सीज़र्स’ है, जिसमें जूलियस सीज़र से लेकर डोमिशियन तक बारह प्रमुख रोमन शासकों के जीवन का वर्णन किया गया है। स्यूटोनियस ने राजनीतिक घटनाओं की अपेक्षा सम्राटों के व्यक्तित्व, आदतों, निजी जीवन, पारिवारिक संबंधों और दरबारी घटनाओं को अधिक महत्त्व दिया। उसकी रचनाओं में अनेक उपाख्यान और रोचक घटनाएँ मिलती हैं। यद्यपि इनमें सभी विवरण समान रूप से विश्वसनीय नहीं माने जाते, फिर भी रोमन सम्राटों के निजी जीवन और दरबारी संस्कृति को समझने के लिए उसका ग्रंथ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
इस प्रकार उत्तर आगस्टसकालीन साहित्य ने रोमन इतिहास, व्यंग्य, जीवनी और काव्य को नई दिशा प्रदान की। टैसिटस ने इतिहास को आलोचनात्मक और नैतिक दृष्टि दी, जुवेनल ने सामाजिक दोषों पर प्रहार किया, मार्शल ने दैनिक जीवन का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया, स्टैटियस ने महाकाव्य परंपरा को आगे बढ़ाया और स्यूटोनियस ने जीवनी-साहित्य को समृद्ध किया। इन साहित्यकारों ने मिलकर रोमन साम्राज्य के बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन का बहुआयामी चित्र प्रस्तुत किया।
रोमन कला एवं वास्तुकला
मुख्य लेख : रोमन कला
रोमन कला का प्रारंभिक विकास मुख्यतः एट्रस्कन सभ्यता और यूनानी कला के प्रभाव में हुआ। एट्रस्कन संस्कृति स्वयं पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों, विशेषकर आयोनिया, साइप्रस और मिस्र की कलात्मक परंपराओं से प्रभावित थी। बाद में जब रोम का संपर्क यूनानी तथा हेलेनिस्टिक संसार से बढ़ा, तब रोमन कला ने अधिक परिष्कृत और विकसित रूप धारण किया। यद्यपि मूर्तिकला और मृद्भांडकला में यूनानी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, फिर भी वास्तुकला, चित्रकला, कांस्य-प्रतिमा निर्माण तथा धातु-कला के क्षेत्र में एट्रस्कन परंपराओं ने रोमन कला के विकास को विशिष्ट दिशा प्रदान की।
एट्रस्कन लोग दुर्ग-निर्माण और स्थापत्य-कला में अत्यंत कुशल थे। वे नगरों के चारों ओर सुदृढ़ प्राचीर तथा सुरक्षा-व्यवस्था का निर्माण करते थे। एट्रस्कन नगरों में विकसित स्थापत्य तकनीकों का बाद में रोमनों ने व्यापक रूप से उपयोग किया। एट्रस्कन देवालयों और समाधियों में यूनानी प्रभाव दिखाई देता है, किंतु नगर-द्वारों, नालियों, जल-निकास प्रणालियों और सार्वजनिक निर्माणों में उन्होंने मेहराब तथा मेहराबदार संरचनाओं का प्रभावी प्रयोग किया। आगे चलकर यही तकनीक रोमन वास्तुकला की प्रमुख विशेषताओं में सम्मिलित हो गई।
एट्रस्कनों की मृद्भांडकला भी अत्यंत विकसित थी। यूनानी कला से प्रभावित होकर उन्होंने सुंदर और चमकदार पात्र तथा कलश बनाए। एट्रस्कन नगरों, विशेषकर टार्क्विनी और वुल्ची जैसे केंद्रों से प्राप्त मृद्भांड उनकी कलात्मक दक्षता के प्रमाण हैं। उनके पात्रों पर धार्मिक कथाओं, मानव आकृतियों, पशुओं और सजावटी अलंकरणों का प्रयोग मिलता है।
कांस्य-कला और धातु-कला में भी एट्रस्कन कलाकारों ने उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने प्रतिमाओं के साथ-साथ हथियार, शिरस्त्राण, कवच, भाले, ढाल, दर्पण, आभूषण, रथ तथा अनेक घरेलू और धार्मिक वस्तुएँ तैयार कीं। उनकी कांस्य-प्रतिमाएँ तकनीकी दक्षता और कलात्मक अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस प्रकार एट्रस्कन कला ने रोमन कलाकारों को केवल सौंदर्य-बोध ही नहीं दिया, बल्कि स्थापत्य और धातु-कला की ऐसी तकनीकें भी प्रदान कीं, जिन्हें रोमनों ने आगे विकसित करके अपनी विशिष्ट कला-परंपरा का आधार बनाया।
आगस्टसकालीन रोमन कला
आगस्टस के शासन से पहले रोमन समाज मुख्यतः सैन्य, राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय था। रोम के विस्तार के साथ उसकी सेनाएँ यूनान और एशिया माइनर के विजित प्रदेशों से अनेक मूर्तियाँ, स्तंभ, चित्र और अन्य कलाकृतियाँ रोम लाने लगीं। इससे रोमन अभिजात वर्ग में यूनानी कला के प्रति आकर्षण बढ़ा। धनी रोमन नागरिकों ने अपने भवनों और उद्यानों को यूनानी कलाकृतियों से सजाना आरंभ किया। बाद में यूनानी मूल कृतियों की रोमन प्रतिकृतियाँ भी बड़ी संख्या में बनाई जाने लगीं।
आगस्टस के शासनकाल में रोमन कला को राजकीय संरक्षण और राष्ट्रीय उद्देश्य प्राप्त हुआ। राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि और साम्राज्य की शक्ति ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निर्माण को संभव बनाया। आगस्टस ने रोम के सौंदर्यीकरण और पुनर्निर्माण को विशेष महत्त्व दिया। उसके शासनकाल की कला में यूनानी प्रभाव बना रहा, किंतु उसमें रोमन राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक परंपराओं और साम्राज्यवादी गौरव की स्पष्ट अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
आगस्टस से संबंधित प्रसिद्ध कथन है कि उसने “ईंटों के रोम को संगमरमर का रोम” बना दिया। यद्यपि यह कथन उसके निर्माण-कार्य की व्यापकता को व्यक्त करता है, वास्तव में रोम का रूपांतरण एक दीर्घकालीन प्रक्रिया थी। उसके शासनकाल में मंदिरों, वेदिकाओं, प्रेक्षागृहों, स्नानागारों, सड़कों, जल-प्रणालियों और अन्य सार्वजनिक भवनों का निर्माण तथा पुनर्निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ।
आगस्टसकालीन कला की प्रमुख विशेषता उसका राष्ट्रीय और राजकीय स्वरूप था। कला के माध्यम से रोम की शक्ति, शांति, समृद्धि और प्राचीन परंपराओं का प्रचार किया गया। सम्राट की प्रतिमाएँ केवल उसके व्यक्तिगत स्वरूप को प्रस्तुत नहीं करती थीं, बल्कि उसके शासन की वैधता, सैन्य शक्ति और नैतिक आदर्शों का भी प्रतीक थीं। इस प्रकार कला राजनीतिक प्रचार का महत्त्वपूर्ण साधन बन गई।
इस काल की कला की दूसरी विशेषता उपयोगितावाद और सार्वजनिक निर्माण थी। रोमन कलाकारों और वास्तुविदों ने ऐसे भवनों और संरचनाओं को विशेष महत्त्व दिया, जो नागरिक जीवन के लिए उपयोगी हों। मंदिरों के साथ-साथ स्नानागार, जलसेतु, सड़कें, प्रेक्षागृह, पुस्तकालय और अन्य सार्वजनिक भवन रोमन स्थापत्य-कला की उपलब्धियों के प्रतीक बने। विशालता, स्थायित्व और उपयोगिता का यह समन्वय आगे चलकर रोमन वास्तुकला की पहचान बना।
मूर्तिकला
आगस्टसकाल में मूर्तिकला ने भी उल्लेखनीय प्रगति की। इस काल की मूर्तियों में यूनानी आदर्शवाद और रोमन यथार्थवाद का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इन्हें मुख्यतः आकृत्यात्मक मूर्तिकला और संस्मरणात्मक या स्मारकीय मूर्तिकला के रूप में देखा जा सकता है। आकृत्यात्मक मूर्तियों का उद्देश्य व्यक्ति के स्वरूप और व्यक्तित्व को प्रस्तुत करना था, जबकि स्मारकीय कला के माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं, धार्मिक विश्वासों और राष्ट्रीय आदर्शों को अभिव्यक्त किया जाता था।
आगस्टस की अनेक प्रतिमाएँ इस कला की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हैं। इनमें प्राइमा पोर्टा का आगस्टस विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो वर्तमान में वैटिकन संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें आगस्टस को सैनिक वेशभूषा में दिखाया गया है। उसका शरीर आदर्शवादी और संतुलित रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि चेहरे पर आत्मविश्वास, गंभीरता और अधिकार का भाव दिखाई देता है। प्रतिमा में सैन्य शक्ति के साथ शांति और राजनीतिक स्थिरता का संदेश भी निहित है। यह यूनानी आदर्शवादी शैली तथा रोमन राजनीतिक प्रतीकवाद के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
आगस्टस की अन्य प्रतिमाओं में उसे विभिन्न आयु और भूमिकाओं में प्रस्तुत किया गया है। कुछ प्रतिमाओं में वह युवा शासक के रूप में, जबकि कुछ में धार्मिक पुरोहित के रूप में दिखाई देता है। इन प्रतिमाओं के माध्यम से कलाकारों ने उसके व्यक्तित्व के राजनीतिक, धार्मिक और नैतिक पक्षों को अभिव्यक्त किया।
स्मारकीय कला में आरा पैसिस ऑगस्टाए (ऑगस्टस की शांति की वेदी) का विशेष महत्त्व है। रोमन सीनेट ने 13 ईसा पूर्व में स्पेन और गॉल से आगस्टस की वापसी के उपलक्ष्य में इस शांति-वेदिका की स्थापना का निर्णय लिया था और इसका समर्पण 9 ईसा पूर्व में हुआ। यह संगमरमर से निर्मित एक भव्य स्मारक है, जिसकी बाहरी दीवारों पर अत्यंत सुंदर उत्कीर्ण दृश्य बनाए गए हैं।
आरा पैसिस की सजावट में टेलुस अथवा पृथ्वीमाता से संबंधित प्रसिद्ध दृश्य मिलता है, जिसमें उर्वरता, समृद्धि और शांति का प्रतीकात्मक चित्रण है। पुष्पों, फलों, अनाज और पशुओं का अंकन प्रकृति की समृद्धि को व्यक्त करता है। इसके अन्य भागों में धार्मिक जुलूस का चित्रण है, जिसमें आगस्टस के परिवार और रोमन समाज के प्रमुख व्यक्तियों को प्रदर्शित किया गया है। इसकी शैली पर यूनानी कला, विशेषकर पार्थेनॉन की शिल्प-परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है, किंतु विषय-वस्तु और राजनीतिक संदेश स्पष्ट रूप से रोमन हैं।
इस प्रकार प्रारंभिक रोमन कला ने एट्रस्कन तकनीकों और यूनानी सौंदर्य-बोध को ग्रहण करके अपनी विशिष्ट कला-परंपरा विकसित की। आगस्टस के शासनकाल में इस कला को राजकीय संरक्षण, राष्ट्रीय उद्देश्य और सार्वजनिक उपयोगिता का नया आयाम मिला। स्थापत्य, मूर्तिकला और स्मारकीय कला में प्राप्त उपलब्धियों ने आगे चलकर रोमन कला को प्राचीन विश्व की सबसे प्रभावशाली कलात्मक परंपराओं में प्रतिष्ठित किया।
चित्रकला
रोमन चित्रकला का उल्लेखनीय विकास आगस्टसकाल में हुआ, यद्यपि मौलिकता की दृष्टि से यह मूर्तिकला और वास्तुकला की अपेक्षा कुछ पीछे थी। रोम तथा इटली के अन्य नगरों में मंदिरों, सार्वजनिक भवनों, बरामदों और निजी आवासों की दीवारों से प्राप्त चित्रों के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं कि रोमन समाज में चित्रकला अत्यंत लोकप्रिय थी। विशेष रूप से पॉम्पेई और प्राइमा पोर्टा से प्राप्त भित्तिचित्र रोमन चित्रकला के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
रोमन चित्रकला पर यूनानी कला का गहरा प्रभाव था। रोमन चित्रकारों ने यूनानी विषयों, शैलियों और सौंदर्य-बोध को अपनाया तथा उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया। चित्रों में प्राकृतिक दृश्यों को विशेष महत्त्व दिया जाता था। पर्वत, नदियाँ, वन, उद्यान, खेत, समुद्र, सूर्योदय और सूर्यास्त जैसे दृश्यों का अत्यंत आकर्षक चित्रण किया जाता था। इसके अतिरिक्त पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं, मानव आकृतियों तथा दैनिक जीवन से संबंधित दृश्यों को भी चित्रित किया जाता था। निजी भवनों की दीवारों पर बनाए गए चित्रों से रोमन समाज के रहन-सहन, धार्मिक विश्वासों और सौंदर्य-बोध की जानकारी मिलती है।
चित्र निर्माण के लिए मुख्यतः तीन प्रमुख तकनीकों का प्रयोग किया जाता था। पहली फ्रेस्को विधि थी, जिसमें गीले प्लास्टर पर रंगों से चित्र बनाए जाते थे। प्लास्टर के सूखने के साथ रंग उसकी सतह में स्थायी रूप से समाहित हो जाते थे। दूसरी टेम्परा विधि थी, जिसमें अपेक्षाकृत सूखी सतह पर रंगों का प्रयोग किया जाता था। तीसरी एनकास्टिक विधि थी, जिसमें रंगों को पिघले हुए मोम के साथ मिलाकर चित्र बनाए जाते थे। यह तकनीक विशेष रूप से आकृतिचित्रों के निर्माण में उपयोगी थी। आगस्टसकालीन चित्रकारों में क्विंटस पेडियस का नाम उल्लेखनीय है। बाद के काल में, विशेषकर नीरो के शासनकाल में, एमुलियस जैसे चित्रकार प्रसिद्ध हुए। रोमन चित्रकला में विशाल भित्तिचित्रों तथा भवनों की सजावट का भी विशेष महत्त्व था।
रोमन चित्रकला के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण पॉम्पेई से प्राप्त हुए हैं। इस नगर से लगभग 3,500 भित्तिचित्रों के अवशेष मिले हैं। इन चित्रों में प्राकृतिक दृश्यों, पौराणिक कथाओं, वास्तुशिल्पीय रूपांकनों और मानव जीवन के विविध पक्षों का सुंदर चित्रण मिलता है। पॉम्पेई जैसे नगर से इतनी बड़ी संख्या में चित्रों की प्राप्ति यह प्रमाणित करती है कि रोमन समाज में चित्रकला केवल राजकीय या धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामान्य नागरिकों के निजी जीवन और भवन-सज्जा का भी महत्त्वपूर्ण अंग थी।
इस प्रकार रोमन चित्रकला ने यूनानी परंपरा से प्रेरणा ग्रहण करते हुए उसे रोमन जीवन और सौंदर्य-बोध से जोड़ा। यद्यपि इसमें मौलिकता अपेक्षाकृत कम थी, फिर भी इसकी तकनीकी दक्षता, विषय-विविधता और भित्तिचित्रों की कलात्मकता ने इसे प्राचीन रोमन संस्कृति की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बना दिया।
रोमन सभ्यता में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
मुख्य लेख : प्राचीन रोमन विज्ञान और प्रौद्योगिकी
विज्ञान
हेलेनिस्टिक यूनानियों ने गणित, खगोलशास्त्र, भौतिकी, भूगोल और चिकित्सा जैसे अनेक वैज्ञानिक विषयों में उल्लेखनीय प्रगति की थी। इसके विपरीत, रोमनों ने विज्ञान के सैद्धांतिक अनुसंधान को यूनानियों जितना महत्त्व नहीं दिया। रोमन समाज मुख्यतः व्यावहारिक और उपयोगितावादी प्रवृत्ति का था। उसका अधिक ध्यान प्रशासन, कानून, सैन्य संगठन, राजनीति, अभियांत्रिकी और साम्राज्य-विस्तार पर केंद्रित रहा। इसलिए प्रकृति के मूल सिद्धांतों की खोज की अपेक्षा रोमनों ने उपलब्ध वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने पर अधिक बल दिया। फिर भी प्रारंभिक साम्राज्यकाल में कुछ विद्वानों ने प्राकृतिक विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें सेनेका, प्लिनी, सेल्सस और बाद में गैलेन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सेनेका (4 ई. पू.-65 ई.)
मुख्य लेख : सेनेका
लूसियस एनियस सेनेका मूलतः दार्शनिक और नैतिक चिंतक था, किंतु प्राकृतिक घटनाओं के अध्ययन में भी उसकी गहरी रुचि थी। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘क्वाएस्टियोनेस नेचुरालेस’ में प्राकृतिक जगत से संबंधित अनेक विषयों का विवेचन मिलता है। इसमें वर्षा, ओले, तुषार, वायु, धूमकेतु, इंद्रधनुष, भूकंप, नदियों और झरनों जैसी प्राकृतिक घटनाओं के कारणों को समझाने का प्रयास किया गया है। सेनेका का उद्देश्य केवल प्राकृतिक घटनाओं का वर्णन करना नहीं था। वह प्रकृति के अध्ययन को दार्शनिक और नैतिक चिंतन से भी जोड़ता था। उसका विश्वास था कि प्रकृति के नियमों को समझने से मनुष्य में तर्कशीलता और जीवन के प्रति उचित दृष्टिकोण विकसित हो सकता है। उसके अनेक निष्कर्ष आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सही नहीं उतरते, फिर भी प्राकृतिक घटनाओं को तर्क के आधार पर समझने का उसका प्रयास महत्त्वपूर्ण था। इस दृष्टि से सेनेका रोमन बौद्धिक परंपरा में प्राकृतिक दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि था।
प्लिनी (23/24– 79 ई.)
मुख्य लेख : प्लिनी
रोमन विज्ञान और ज्ञान-परंपरा में प्लिनी द एल्डर का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘नेचुरालिस हिस्टोरिया’ (प्राकृतिक इतिहास) 37 पुस्तकों में रचित एक विशाल ज्ञानकोश है। इसमें खगोलशास्त्र, भूगोल, मानव जीवन, वनस्पति, प्राणी, औषधि, धातु, खनिज, कला और तकनीक जैसे अनेक विषयों की जानकारी संकलित की गई है। प्लिनी ने अपने समय से पूर्व के लगभग दो हजार ग्रंथों और अनेक लेखकों की सूचनाओं का उपयोग किया। उसकी कृति का सबसे बड़ा महत्त्व इस बात में है कि उसने प्राचीन ज्ञान की विशाल सामग्री को एक ही ग्रंथ में सुरक्षित कर दिया। इससे प्राचीन सभ्यता के प्राकृतिक संसाधनों, औषधीय पौधों, धातुओं, पशु-पक्षियों तथा विभिन्न तकनीकों के अध्ययन में आधुनिक विद्वानों को अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होती है।
प्लिनी आधुनिक अर्थ में वैज्ञानिक नहीं था। उसने निरीक्षण और विद्वानों के विवरण के साथ-साथ अनेक लोकविश्वासों, चमत्कारिक कथाओं और अंधविश्वासों को भी स्वीकार किया। इसलिए उसकी रचना में वैज्ञानिक जानकारी और परंपरागत धारणाओं का मिश्रण दिखाई देता है। फिर भी प्राचीन विश्व के ज्ञान के संरक्षण में उसका योगदान असाधारण था।
चिकित्साशास्त्र
रोमन सभ्यता में विज्ञान की अन्य शाखाओं की अपेक्षा चिकित्साशास्त्र का व्यावहारिक विकास अधिक महत्त्वपूर्ण रहा। प्रारंभ में रोमन समाज में घरेलू उपचार, धार्मिक अनुष्ठानों और लोकविश्वासों का प्रभाव था, किंतु समय के साथ यूनानी चिकित्सकों और यूनानी चिकित्सा-परंपरा के प्रभाव से रोम में चिकित्सा अधिक व्यवस्थित हुई। रोमन सेना के विस्तार के साथ सैनिक चिकित्सा की विशेष आवश्यकता उत्पन्न हुई और सैनिकों के लिए चिकित्सकीय सेवाओं तथा उपचार की व्यवस्थाएँ विकसित की गईं।
रोमन अभियांत्रिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का भी चिकित्सा से गहरा संबंध था। स्वच्छ जल की आपूर्ति, जलनिकासी, सार्वजनिक स्नानागार और नगरों की स्वच्छता संबंधी व्यवस्थाओं ने जनस्वास्थ्य को बनाए रखने में योगदान दिया। इस प्रकार रोमन चिकित्सा केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं थी, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ती गई।
सेल्सस (लगभग 25 ई. पू.-50 ई.)
मुख्य लेख : सेल्सस
ऑरेलियस कॉर्नेलियस सेल्सस रोमन चिकित्सा-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण नाम है। वह पहली शताब्दी ईसा पूर्व और पहली शताब्दी ईस्वी के संक्रमणकाल का विद्वान था। उसने अनेक विषयों पर एक विश्वकोशीय ग्रंथ ‘दे आर्टिबुस’ की रचना की थी, जिसका अधिकांश भाग अब उपलब्ध नहीं है। उसका चिकित्सा संबंधी भाग ‘दे मेडिसिना’ आज भी सुरक्षित है। ‘दे मेडिसिना’ में रोगों के लक्षण, निदान, औषधियों और उपचार-पद्धतियों का व्यवस्थित वर्णन मिलता है। सेल्सस ने विशेष रूप से शल्यचिकित्सा पर विस्तृत चर्चा की। उसने घावों के उपचार, रक्तस्राव रोकने, विभिन्न प्रकार की शल्यक्रियाओं तथा मोतियाबिंद की शल्यचिकित्सा जैसी प्रक्रियाओं का वर्णन किया। उसने सूजन, संक्रमण और घावों की प्रकृति का भी निरीक्षण किया। उसकी भाषा स्पष्ट और व्यवस्थित थी। यद्यपि उसका बहुत-सा ज्ञान यूनानी चिकित्सकीय परंपरा से प्राप्त था, फिर भी उसने उसे लैटिन भाषा में व्यवस्थित रूप देकर रोमन चिकित्सा-साहित्य को महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
गैलेन (129-216 ई.)
मुख्य लेख : गैलेन
रोमन साम्राज्यकालीन चिकित्सा-विज्ञान में गैलेन का स्थान सर्वोच्च माना जाता है। उसका जन्म लगभग 129 ईस्वी में पर्गेमम में हुआ था। उसके पिता निकोन एक वास्तुकार थे और उन्होंने अपने पुत्र की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। गैलेन ने दर्शन के साथ चिकित्सा का अध्ययन किया और पर्गेमम, स्मिर्ना, कोरिंथ तथा अलेक्जेंड्रिया जैसे प्रमुख बौद्धिक केंद्रों की यात्राएँ कीं। बाद में वह रोम पहुँचा और वहाँ प्रसिद्ध चिकित्सक बन गया। गैलेन ने शरीर-रचना, शरीर-क्रिया-विज्ञान, रोग-विज्ञान, औषधि-विज्ञान और दर्शन पर अनेक ग्रंथ लिखे। उसके कार्यों का बड़ा भाग बाद की शताब्दियों में सुरक्षित रहा और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक यूरोप तथा इस्लामी जगत की चिकित्सा-परंपराओं पर उसका गहरा प्रभाव बना रहा।
मानव शरीर के विच्छेदन पर प्राचीन समाजों में अनेक व्यावहारिक और नैतिक सीमाएँ थीं। इसलिए गैलेन ने मुख्यतः बंदरों, सूअरों, कुत्तों और अन्य पशुओं के विच्छेदन तथा प्रयोगों के आधार पर मानव शरीर की संरचना के संबंध में निष्कर्ष निकाले। इससे उसके कुछ निष्कर्ष बाद में गलत सिद्ध हुए, विशेषकर मानव शरीर-रचना और रक्त-संचरण के संबंध में। फिर भी उसके प्रयोगात्मक निरीक्षणों ने शरीर-रचना और शरीर-क्रिया-विज्ञान के अध्ययन को व्यवस्थित रूप दिया। गैलेन ने मस्तिष्क, तंत्रिकाओं, मांसपेशियों, हृदय तथा रक्तवाहिनियों के संबंध में अनेक महत्त्वपूर्ण निरीक्षण किए। उसने यह भी समझने का प्रयास किया कि मस्तिष्क और तंत्रिकाएँ शरीर की गतिविधियों को किस प्रकार नियंत्रित करती हैं। उसने अनेक रोगों के लक्षणों और उपचार-पद्धतियों का वर्णन किया तथा आहार, व्यायाम और उचित जीवन-पद्धति को स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना। औषधि-विज्ञान के क्षेत्र में भी उसने अनेक वनस्पतियों और प्राकृतिक पदार्थों के उपयोग का वर्णन किया।
यद्यपि गैलेन का रक्त-संचार संबंधी सिद्धांत आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत से भिन्न था और उसके अनेक शरीर-रचनात्मक निष्कर्ष बाद में गलत सिद्ध हुए, फिर भी उसकी पद्धति ने चिकित्सा के विकास पर गहरा प्रभाव डाला। उसके ग्रंथों का यूनानी, अरबी और लैटिन भाषाओं में अध्ययन किया गया और मध्यकालीन चिकित्सा शिक्षा में वे लंबे समय तक प्रामाणिक माने जाते रहे।
सोरानस (पहली–दूसरी शताब्दी ई.)
मुख्य लेख : सोरानस
गैलेन के समकालीन प्रसिद्ध चिकित्सकों में इफेसस के सोरानस का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने 116 ईस्वी के आसपास स्त्रीरोग, प्रसूति-विज्ञान और नवजात शिशुओं की देखभाल पर एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखा। उसने गर्भाशय की संरचना, प्रसव-प्रक्रिया, शिशु-पालन तथा स्त्री-स्वास्थ्य से संबंधित विषयों का विस्तृत वर्णन किया।व सोरानस ने स्त्रीरोग परीक्षण में प्रयुक्त योनिक स्पेकुलम जैसे उपकरणों का उल्लेख किया और चिकित्सा-प्रक्रियाओं को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। उसका मत था कि यदि गर्भावस्था माता के जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकती हो, तो गर्भपात कराया जाना उचित है। इन विचारों के कारण उसे प्राचीन विश्व का सर्वश्रेष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ माना जाता है। अनेक इतिहासकारों का मत है कि उसके बाद लगभग पंद्रह सौ वर्षों तक प्रसूति-विज्ञान में कोई ऐसी क्रांतिकारी प्रगति नहीं हुई, जो उसके ज्ञान को बहुत आगे बढ़ा सके। रोमन चिकित्सा-विज्ञान के विकास में रूफस का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। उसने नेत्रों की संरचना का अध्ययन किया, प्रेरक (मोटर) तथा संवेदक (सेंसरी) तंत्रिकाओं के बीच अंतर स्पष्ट किया तथा शल्यक्रिया के दौरान रक्तस्राव को नियंत्रित करने की तकनीकों में सुधार किया। सिकंदरिया के मेरिनस को खोपड़ी की शल्यक्रिया का विशेषज्ञ माना जाता था। उसने मस्तिष्क और कपाल से संबंधित अनेक जटिल शल्यक्रियाओं का विकास किया। इसी प्रकार एंटिलस अपने समय का सर्वश्रेष्ठ नेत्र-चिकित्सक और नेत्र-शल्यविशेषज्ञ माना जाता था। औषधि-विज्ञान के क्षेत्र में सिलिसिया के डिओस्कोरिडीज का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है। उसने लगभग 600 औषधीय पौधों का वर्णन करते हुए एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में विभिन्न जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों और प्राकृतिक पदार्थों के औषधीय गुणों का व्यवस्थित विवरण दिया गया था। यह कृति अनेक शताब्दियों तक यूरोप और पश्चिमी एशिया में औषधि-विज्ञान की आधारभूत पुस्तक बनी रही।
इस प्रकार रोमन साम्राज्य में चिकित्सा-विज्ञान ने उल्लेखनीय प्रगति की। यद्यपि उसमें अंधविश्वास और अनुभवजन्य धारणाओं का मिश्रण था, फिर भी प्लिनी, सेल्सस, गैलेन, सोरानस, रूफस और डिओस्कोरिडीज जैसे विद्वानों ने चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उनकी उपलब्धियों ने मध्यकालीन और आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान के विकास की मजबूत नींव रखी।
रोमन विधि संहिता
मुख्य लेख : रोमन कानून
यद्यपि पश्चिमी रोमन साम्राज्य का राजनीतिक अस्तित्व पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में समाप्त हो गया, फिर भी उसकी सांस्कृतिक, विधिक और प्रशासनिक विरासत आज तक जीवित है। रोमन सभ्यता ने यूरोप के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को अत्यंत गहराई से प्रभावित किया। रोमन साम्राज्य के माध्यम से यूनानी संस्कृति, दर्शन, साहित्य और कला का व्यापक प्रसार पश्चिमी यूरोप में हुआ। रोमनों ने अपने विशाल साम्राज्य में दीर्घकाल तक शांति और सुव्यवस्थित प्रशासन स्थापित किया, जिससे व्यापार, कृषि, नगरों का विकास तथा सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला।
रोमन सभ्यता की सबसे स्थायी और महत्त्वपूर्ण देनों में उसकी विधि-व्यवस्था (रोमन कानून) को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। रोमन कानूनों ने विधि के शासन, न्यायिक प्रक्रिया, नागरिक अधिकारों, संपत्ति के अधिकार तथा अनुबंध संबंधी सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। आधुनिक यूरोप तथा विश्व के अनेक देशों की न्याय-व्यवस्था पर आज भी रोमन कानूनों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
रोमन कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह पारसी, हिब्रू अथवा अन्य धार्मिक विधि-संहिताओं की भाँति पूर्णतः दैवी आदेशों पर आधारित नहीं था, बल्कि मनुष्यों द्वारा निर्मित और समयानुसार संशोधित किया जा सकने वाला कानून था। इसलिए उसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन और विकास की पर्याप्त संभावना बनी रही। रोमन कानून के प्रमुख स्रोत लोक-परंपराएँ, जनसभाओं द्वारा पारित कानून, सीनेट के निर्णय, सम्राटों की राजाज्ञाएँ, प्रेटरों के आदेश तथा प्रसिद्ध विधिवेत्ताओं की व्याख्याएँ थीं।
बारह पट्टिकाओं का कानून
प्रारंभिक रोमन गणराज्य में कानून लिखित रूप में उपलब्ध नहीं थे। उनकी जानकारी मुख्यतः पैट्रिशियन (अभिजात) वर्ग तथा पुरोहितों तक सीमित थी। वे अपनी सुविधा के अनुसार कानूनों की व्याख्या करते थे, जिससे प्लेबियन (साधारण नागरिक) वर्ग को अनेक प्रकार के अन्याय का सामना करना पड़ता था। इस असमानता के विरोध में प्लेबियनों ने कानूनों को सार्वजनिक रूप से लिखित रूप में प्रस्तुत करने की माँग की।
इसी संघर्ष के परिणामस्वरूप 454 ईसा पूर्व में एक प्रतिनिधिमंडल यूनान भेजा गया, ताकि वहाँ की विधि-व्यवस्था का अध्ययन किया जा सके। इसके बाद दस अधिकारियों (डेसेमवीरी) की एक समिति ने रोमन परंपराओं और यूनानी विधि से प्रेरणा लेकर कानूनों का संकलन तैयार किया। इन्हें बारह कांस्य अथवा लकड़ी की पट्टिकाओं पर अंकित किया गया, जिन्हें इतिहास में ‘बारह पट्टिकाओं का कानून’ कहा जाता है।
बारह पट्टिकाओं का कानून रोमन इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि था। पहली बार कानूनों को सार्वजनिक रूप से लिखित रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे न्याय-व्यवस्था केवल अभिजात वर्ग के नियंत्रण में नहीं रही। अगले कई शताब्दियों तक यही संहिता रोमन नागरिक कानून का आधार बनी रही। इसकी एक विशेषता यह भी थी कि इसमें धार्मिक नियमों और नागरिक कानूनों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया गया, जो विधि के धर्मनिरपेक्ष विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम था।
यद्यपि इस संहिता ने न्यायिक समानता की दिशा में प्रगति की, फिर भी इसमें अनेक कठोर प्रावधान थे। प्रारंभ में पैट्रिशियन और प्लेबियन वर्गों के बीच विवाह निषिद्ध था, यद्यपि बाद में यह प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया। पिता को परिवार पर अत्यधिक अधिकार प्राप्त थे। चोरी, राजद्रोह, आगजनी, हत्या तथा कृषि को नुकसान पहुँचाने जैसे अपराधों के लिए कठोर दंड निर्धारित थे। इन प्रावधानों से उस समय की सामाजिक एवं नैतिक धारणाओं का परिचय मिलता है।
लिखित कानून लागू होने के बाद प्लेबियन वर्ग की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। उन्हें प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने लगे। समय के साथ रोमन समाज अधिक जटिल और विकसित होता गया, इसलिए नए कानूनों की आवश्यकता भी बढ़ी। 287 ईसा पूर्व में पारित ‘लेक्स हॉर्टेन्सिया’ ने प्लेबियन सभा द्वारा पारित कानूनों को समस्त रोमन नागरिकों के लिए बाध्यकारी बना दिया। इससे कानून निर्माण की प्रक्रिया अधिक प्रतिनिधिक और प्रभावी बन गई।
गणराज्य के उत्तरकाल में प्रसिद्ध विधिवेत्ताओं और राजनेताओं ने कानूनों को अधिक व्यवस्थित और तर्कसंगत बनाने का प्रयास किया। कौंसल पब्लियस म्यूशियस स्कैवोला तथा उनके पुत्र क्विंटस म्यूशियस स्कैवोला ने विधिशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी काल में महान वक्ता, दार्शनिक और राजनेता सिसरो ने प्राकृतिक न्याय तथा विधि के सिद्धांतों को दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके अनुसार वास्तविक कानून बुद्धि और न्याय पर आधारित होना चाहिए तथा अन्यायपूर्ण कानून वास्तव में कानून कहलाने योग्य नहीं होते।
स्टोइक दर्शन का भी रोमन विधिशास्त्र पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्टोइक दार्शनिकों का विश्वास था कि प्रकृति के कुछ सार्वभौमिक नियम सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। यही विचार आगे चलकर प्राकृतिक कानून की अवधारणा का आधार बना।
रोमन साम्राज्य की स्थापना के बाद सम्राटों ने कानूनों के विकास को नई दिशा दी। जूलियस सीज़र न्याय-व्यवस्था में व्यापक सुधार करना चाहता था, किंतु उसकी हत्या के कारण उसकी योजनाएँ पूर्ण नहीं हो सकीं। उसके उत्तराधिकारी ऑगस्टस ने विवाह, परिवार, उत्तराधिकार तथा सार्वजनिक नैतिकता से संबंधित अनेक कानून बनाए। इनका उद्देश्य पारिवारिक जीवन को सुदृढ़ करना तथा सामाजिक अनुशासन बनाए रखना था।
दूसरी शताब्दी ईस्वी को रोमन विधिशास्त्र का स्वर्णकाल माना जाता है। सम्राट हेड्रियन ने प्रेटरों के विभिन्न आदेशों का संकलन कर एडिक्टम पर्पेटुअम (स्थायी आदेश) तैयार कराया, जिससे कानून अधिक व्यवस्थित और स्थायी बने। उनके उत्तराधिकारी एंटोनिनस पायस के समय न्यायिक व्यवस्था में मानवीय दृष्टिकोण को और अधिक महत्त्व दिया गया। इसी काल में यह सिद्धांत व्यापक रूप से स्वीकार किया गया कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध न हो जाए, तब तक उसे निर्दोष माना जाएगा। आधुनिक न्याय-व्यवस्था का यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्धांत रोमन कानून की अमूल्य देन है।
दूसरी और तीसरी शताब्दी में अनेक महान विधिवेत्ता हुए, जिनमें साल्वियस जूलियनस, गायस, पापिनियन, पौलस तथा उल्पियन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन विद्वानों ने कानूनों की व्याख्या को अधिक व्यवस्थित, तार्किक और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। उनके ग्रंथों ने रोमन विधिशास्त्र को विश्व की सबसे विकसित विधि-व्यवस्थाओं में स्थान दिलाया। इसी काल में विधि-शिक्षा का भी व्यापक विकास हुआ। चौथी और पाँचवीं शताब्दी में भी कानूनों का संकलन और संशोधन जारी रहा। सम्राट डायोक्लीशियन ने आर्थिक संकट से निपटने के लिए मूल्य नियंत्रण संबंधी प्रसिद्ध आदेश जारी किया। 438 ईस्वी में सम्राट थिओडोसियस द्वितीय ने पूर्ववर्ती सम्राटों के कानूनों का संकलन कर थिओडोसियन कोड प्रकाशित कराया, जिससे प्रशासन और न्याय-व्यवस्था अधिक सुव्यवस्थित बनी।
रोमन विधि के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य पूर्वी रोमन (वैजेंटाइन) सम्राट जस्टिनियन प्रथम (527–565 ई.) के शासनकाल में संपन्न हुआ। उसने प्रसिद्ध विधिवेत्ता ट्रिबोनियन की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया, जिसने रोमन कानूनों का विशाल संकलन तैयार किया। इस संकलन के चार प्रमुख भाग थे— कोडेक्स जस्टिनियानस, डाइजेस्टा, इन्स्टीट्यूट्स तथा नोवेल्ले। इन सभी को सामूहिक रूप से कॉर्पस ज्यूरिस सिविलिस (नागरिक विधि का संकलन) कहा जाता है। यही संहिता मध्यकालीन तथा आधुनिक यूरोप की नागरिक विधि-व्यवस्था का आधार बनी।
रोमन कानूनों के प्रमुख प्रकार
रोमन विधि-व्यवस्था को सामान्यतः तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है—
नागरिक कानून
यह केवल रोमन नागरिकों पर लागू होता था। इसमें संपत्ति, उत्तराधिकार, विवाह, अनुबंध तथा नागरिक अधिकारों से संबंधित नियम सम्मिलित थे। इसका उद्देश्य नागरिकों के जीवन, संपत्ति और वैधानिक अधिकारों की रक्षा करना था। आधुनिक नागरिक कानून की अनेक अवधारणाएँ इसी पर आधारित हैं।
जनजातीय अथवा राष्ट्रों का कानून
रोमन साम्राज्य के विस्तार के साथ विभिन्न देशों और जातियों के लोगों के बीच व्यापार और संपर्क बढ़ा। इसलिए ऐसे सामान्य नियम विकसित किए गए जो रोमन नागरिकों और विदेशियों दोनों पर समान रूप से लागू हो सकें। व्यापार, अनुबंध, संपत्ति और वाणिज्य संबंधी मामलों में इस कानून की विशेष भूमिका थी। इसने पूरे साम्राज्य में एक समान न्यायिक व्यवस्था स्थापित करने में सहायता की।
प्राकृतिक कानून
यह रोमन विधि का सबसे उच्च और दार्शनिक स्वरूप माना जाता है। इसकी प्रेरणा मुख्यतः यूनानी स्टोइक दर्शन से मिली थी। इसके अनुसार प्रकृति के कुछ सार्वभौमिक नियम सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। सिसरो का मत था कि वास्तविक कानून बुद्धि और न्याय पर आधारित होता है तथा वह शाश्वत और सार्वभौमिक होता है। यदि कोई शासक अन्यायपूर्ण कानून बनाता है, तो वह नैतिक दृष्टि से वैध नहीं माना जा सकता। स्टोइक दार्शनिक सेनेका ने भी सभी मनुष्यों की प्राकृतिक समानता का समर्थन किया। यही विचार आगे चलकर मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय कानून की आधारशिला बना।
इस प्रकार रोमन कानून केवल रोमन साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने विश्व की विधिक परंपरा को स्थायी दिशा प्रदान की। कानून के समक्ष समानता, निर्दोषता की धारणा, न्यायसंगत प्रक्रिया, अनुबंध की वैधता, संपत्ति के अधिकार तथा प्राकृतिक न्याय जैसे सिद्धांत आज भी आधुनिक न्याय-व्यवस्थाओं के मूल आधार हैं। यही कारण है कि रोमन विधिशास्त्र को मानव सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
रोमन साम्राज्य का पतन
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता का पतन
प्रथम और द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में पश्चिमी जगत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने वाला रोमन गणराज्य आगे चलकर रोमन साम्राज्य में परिवर्तित हुआ और दूसरी शताब्दी ईस्वी तक यूरोप, उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के विशाल भू-भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुका था। किंतु तीसरी शताब्दी ईस्वी से इसकी राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक शक्ति कमजोर होने लगी और अंततः पश्चिमी रोमन साम्राज्य का पतन पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। इसके पीछे कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं था, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सैनिक तथा बाहरी परिस्थितियों के सम्मिलित प्रभाव से साम्राज्य धीरे-धीरे दुर्बल हुआ।
इतिहासकारों के लिए रोमन साम्राज्य के पतन के कारणों का निर्धारण सदैव जटिल विषय रहा है। वास्तव में, रोम का पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि दीर्घकालीन समस्याओं की एक ऐसी प्रक्रिया थी, जिसने साम्राज्य की आंतरिक शक्ति को क्रमशः कमजोर किया।
नैतिक पतन
कुछ इतिहासकारों ने रोमन साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण रोमन समाज के नैतिक पतन को माना है। प्रारंभिक रोमन नागरिकों में परिश्रम, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, संयम और देशभक्ति जैसे गुणों को विशेष महत्त्व प्राप्त था। साम्राज्य के विस्तार के साथ रोम में अपार धन, दास और विलासिता की वस्तुएँ आने लगीं। इससे उच्च वर्ग में भोग-विलास, अपव्यय और ऐश्वर्य की प्रवृत्ति बढ़ी। धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, स्वार्थ, राजनीतिक षड्यंत्र और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ भी बढ़ती गईं।
यद्यपि केवल नैतिक पतन को रोम के पतन का मुख्य कारण मानना उचित नहीं है। आगस्टस के समय भी समाज में नैतिक समस्याएँ थीं, फिर भी उसका शासन रोमन इतिहास के समृद्ध कालों में गिना जाता है। अतः नैतिक पतन को अन्य राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के साथ जोड़कर देखना अधिक उचित है।
गणतांत्रिक संस्थाओं का पतन
रोमन गणराज्य की सीनेट, जनसभाएँ और निर्वाचित पदाधिकारी शासन-व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग थे। किंतु साम्राज्य की स्थापना के बाद सम्राटों की शक्ति लगातार बढ़ती गई और गणतांत्रिक संस्थाओं का वास्तविक प्रभाव घटता गया। सत्ता धीरे-धीरे सम्राट तथा उसके प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में केंद्रित हो गई। इससे नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और राज्य के प्रति सक्रिय निष्ठा कमजोर हुई। फिर भी, गणतांत्रिक संस्थाओं के पतन को अकेले साम्राज्य के पतन का कारण नहीं माना जा सकता। जब आर्थिक संकट, सामाजिक असमानता और सैनिक समस्याएँ गंभीर हो जाएँ, तब केवल राजनीतिक संस्थाओं का अस्तित्व किसी साम्राज्य को स्थिर नहीं रख सकता।
साम्राज्यवाद और अत्यधिक विस्तार
रोम की शक्ति का सबसे बड़ा आधार उसकी विजय और विस्तार की नीति थी, किंतु यही नीति आगे चलकर उसके लिए समस्या भी बन गई। भूमध्यसागर पर प्रभुत्व स्थापित करने के बाद रोमन साम्राज्य स्पेन से पश्चिमी एशिया और ब्रिटेन से उत्तरी अफ्रीका तक फैल गया। इतने विशाल भू-भाग की सीमाओं की रक्षा करना अत्यंत कठिन और खर्चीला था। साम्राज्य की सीमाओं पर जर्मनिक जनजातियों, पार्थियनों और बाद में सासानी फारसियों जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों से निरंतर संघर्ष करना पड़ा। सीमाओं की सुरक्षा के लिए विशाल सेना और भारी धन की आवश्यकता होती थी। निरंतर युद्धों ने राज्य के संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाला। विजयों के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में दास रोम लाए गए। सस्ते दास-श्रम के कारण स्वतंत्र कृषकों और छोटे उत्पादकों की स्थिति कमजोर हुई तथा विशाल जमींदारियाँ विकसित हुईं। इससे आर्थिक असमानता बढ़ी और पारंपरिक रोमन कृषि-व्यवस्था प्रभावित हुई।
निरंकुश शासन और प्रशासनिक संकट
सम्राटों की शक्ति बढ़ने के साथ शासन अधिक निरंकुश होता गया। कई सम्राटों ने व्यक्तिगत सत्ता को बनाए रखने के लिए सेना और प्रशासन पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई। इससे सीनेट और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका कमजोर हुई। प्रशासन में भ्रष्टाचार और पदों की खरीद-बिक्री जैसी प्रवृत्तियाँ भी बढ़ीं। राज्य के बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए करों में वृद्धि की गई। किसानों, व्यापारियों और नगरवासियों पर करों का भार बढ़ता गया। विशेष रूप से तीसरी शताब्दी के आर्थिक संकट के दौरान मुद्रा का अवमूल्यन और महँगाई गंभीर समस्या बन गई। परिणामस्वरूप सामान्य जनता का शासन के प्रति विश्वास कमजोर हुआ।
साम्राज्य की विशालता
रोमन साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार उसके प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया। रोम से दूर स्थित प्रांतों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना कठिन था। संचार के साधन सीमित होने के कारण संकट के समय केंद्रीय सत्ता को दूरस्थ सीमाओं तक शीघ्र सहायता पहुँचाना कठिन होता था। साम्राज्य के विशाल आकार ने प्रशासनिक विभाजन की आवश्यकता उत्पन्न की। डायोक्लेटियन ने साम्राज्य के शासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए टेट्रार्की अर्थात् चार शासकों की व्यवस्था स्थापित की। इससे प्रशासनिक नियंत्रण में कुछ सुधार हुआ, किंतु साम्राज्य के राजनीतिक विभाजन की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई।
प्रांतीय विद्रोह और गृहयुद्ध
कमजोर केंद्रीय सत्ता के समय रोमन प्रांतों और सेनापतियों ने स्वतंत्रता अथवा सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया। सेना का राजनीतिक प्रभाव इतना बढ़ गया कि सैनिक अपने पसंदीदा सेनापतियों को सम्राट घोषित करने लगे। इससे बार-बार गृहयुद्ध हुए और राज्य की शक्ति आंतरिक संघर्षों में नष्ट होने लगी। तीसरी शताब्दी में स्थिति विशेष रूप से गंभीर हो गई। अनेक सेनापतियों ने अल्प अवधि के लिए सम्राट के पद पर अधिकार किया। सम्राट वैलेरियन की 260 ईस्वी में सासानी शासक शापुर प्रथम द्वारा पराजय और बंदी बनाए जाने की घटना रोमन शक्ति के संकट का प्रतीक बनी।
इस प्रकार रोमन साम्राज्य का पतन किसी एक कारण का परिणाम नहीं था। नैतिक और सामाजिक परिवर्तन, गणतांत्रिक संस्थाओं का ह्रास, निरंकुश शासन, आर्थिक संकट, साम्राज्य की विशालता, प्रांतीय विद्रोह, गृहयुद्ध तथा सीमाओं पर बढ़ते बाहरी दबाव ने मिलकर उसकी शक्ति को कमजोर किया। अंततः पश्चिमी रोमन साम्राज्य 476 ईस्वी में समाप्त हुआ। इसके बावजूद रोमन राजनीतिक, कानूनी, प्रशासनिक और सांस्कृतिक परंपराएँ यूरोप के इतिहास पर लंबे समय तक प्रभाव डालती रहीं।
रोमन साम्राज्य के पतन के अन्य प्रमुख कारण
सैनिक पतन
रोमन साम्राज्य की शक्ति का प्रमुख आधार उसकी सुव्यवस्थित और अनुशासित सेना थी। किंतु साम्राज्य के उत्तरकाल में सेना की संरचना और निष्ठा में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। तीसरी शताब्दी में सम्राट गैलेनियस ने सीनेटरों को प्रांतीय सेनाओं की कमान से हटाकर सैन्य नेतृत्व को पेशेवर सैनिक अधिकारियों के हाथों में अधिक केंद्रित किया। इससे सेना पर सीनेट का प्रभाव कम हुआ, किंतु लंबे समय में सेना का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया। साम्राज्य के विस्तार के साथ सेना में प्रांतीयों और जर्मनिक तथा अन्य विदेशी सैनिकों की संख्या बढ़ने लगी। इनमें अनेक सैनिक रोमन सेना में दीर्घकालीन सेवा करते थे और उन्हें रोमन नागरिकता भी प्राप्त हो जाती थी। इसलिए सभी गैर-रोमन सैनिकों को अविश्वसनीय मानना उचित नहीं है। फिर भी, उत्तरकाल में सेना की निष्ठा कई बार राज्य की अपेक्षा अपने सेनापति के प्रति अधिक दिखाई देने लगी। सैनिक अपने सेनापतियों को सम्राट घोषित करने लगे और इससे गृहयुद्धों की स्थिति उत्पन्न हुई। सीमाओं की रक्षा के लिए विशाल सेना बनाए रखना अत्यंत महँगा था। जर्मनिक जनजातियों, सासानी फारस और अन्य शक्तियों से निरंतर युद्ध के कारण सैन्य व्यय बढ़ता गया। सेना के राजनीतिक हस्तक्षेप, सैनिक विद्रोह और सीमाओं पर बढ़ते दबाव ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया।
उत्तराधिकार की निश्चित व्यवस्था का अभाव
रोमन साम्राज्य में सम्राट के उत्तराधिकार के लिए कोई निश्चित और सर्वमान्य नियम नहीं था। परिणामस्वरूप सम्राट की मृत्यु या हत्या के बाद सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो जाता था। राजपरिवार, सेना, प्रांतीय अधिकारी और प्रभावशाली राजनीतिक समूह अपने-अपने उम्मीदवारों को सम्राट बनाने का प्रयास करते थे। विशेष रूप से 193 ईस्वी के बाद सेना की भूमिका अत्यधिक बढ़ गई। सैनिकों द्वारा समर्थित सेनापति सम्राट बनने लगे और कई बार एक ही समय में अनेक दावेदार सत्ता के लिए संघर्ष करते थे। इससे गृहयुद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अव्यवस्था बढ़ी। तीसरी शताब्दी का संकट इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। निरंतर सत्ता-संघर्ष ने साम्राज्य की आर्थिक और सैनिक शक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
सामाजिक समस्याएँ
रोमन समाज में प्रारंभ से ही सामाजिक असमानता मौजूद थी। गणराज्य के प्रारंभिक काल में पैट्रिशियन और प्लेबियन के बीच स्पष्ट अंतर था। साम्राज्यकाल में यह व्यवस्था धीरे-धीरे बदली और प्रांतीय लोगों को भी रोमन नागरिकता मिलने लगी। इससे रोमन समाज अधिक व्यापक और बहुजातीय बना, किंतु साथ ही पारंपरिक सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन आया। धन के असमान वितरण और अत्यधिक विलासिता के कारण उच्च वर्ग का एक भाग भोग-विलास में डूब गया। विशाल मनोरंजन-स्थलों में ग्लैडिएटरों के युद्ध और अन्य हिंसक खेल लोकप्रिय हुए। विवाह, परिवार और जनसंख्या से संबंधित समस्याएँ भी सामने आईं। हालाँकि इन सामाजिक परिवर्तनों को सीधे साम्राज्य के पतन का कारण नहीं माना जा सकता, फिर भी उन्होंने सामाजिक एकता और पारंपरिक नागरिक मूल्यों को प्रभावित किया।
आर्थिक संकट
रोमन साम्राज्य के पतन में आर्थिक संकट की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। लंबे समय तक चले युद्धों और विशाल सेना के खर्च ने राजकोष पर भारी दबाव डाला। कृषि-व्यवस्था भी प्रभावित हुई। युद्धों में स्वतंत्र कृषकों की भागीदारी तथा बड़े भू-स्वामित्व के विस्तार के कारण छोटे कृषकों की स्थिति कमजोर हुई और कई क्षेत्रों में दास-श्रम पर आधारित विशाल कृषि-संपदाएँ विकसित हुईं। साम्राज्य के उत्तरकाल में व्यापार और उद्योग को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तीसरी शताब्दी में मुद्रा का लगातार अवमूल्यन हुआ और सिक्कों में बहुमूल्य धातुओं की मात्रा घटाई गई। इससे महँगाई और आर्थिक अस्थिरता बढ़ी। राज्य ने बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए करों में वृद्धि की, जिससे कृषकों और नगरवासियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा। आर्थिक संकट ने निर्धनता, बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष को बढ़ावा दिया।
तकनीकी और प्रशासनिक सीमाएँ
रोमन इंजीनियरिंग अत्यंत विकसित थी, किंतु सैन्य और संचार तकनीक में निरंतर तीव्र परिवर्तन नहीं हो सका। विशाल साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा, सैनिकों की त्वरित आवाजाही और दूरस्थ प्रांतों से प्रभावी संचार कठिन बना रहा। यद्यपि रोम ने उत्कृष्ट सड़कें और जल-प्रणालियाँ बनाईं, फिर भी इतने विशाल भू-भाग की सुरक्षा और प्रशासन के लिए संसाधन अपर्याप्त पड़ने लगे।
पूर्वी प्रभाव और सांस्कृतिक परिवर्तन
उत्तरकालीन रोमन साम्राज्य पर पूर्वी भूमध्यसागरीय और निकट-पूर्वी संस्कृतियों का प्रभाव बढ़ा। सम्राटों के दरबार और प्रशासन में अधिक औपचारिकता तथा राजकीय वैभव दिखाई देने लगा। डायोक्लेटियन ने सम्राट की प्रतिष्ठा को अत्यधिक औपचारिक और निरंकुश स्वरूप प्रदान किया। इससे गणतांत्रिक परंपराओं से दूरी और बढ़ी। यद्यपि यूनानी तथा पूर्वी प्रभाव को स्वयं पतन का कारण मानना उचित नहीं है। रोमन सभ्यता आरंभ से ही अनेक संस्कृतियों को आत्मसात करती रही थी। समस्या तब उत्पन्न हुई जब राजनीतिक केंद्रीकरण, आर्थिक संकट और सामाजिक तनाव के साथ ये परिवर्तन भी जुड़े। इसी समय रहस्यवादी और धार्मिक विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ा तथा पारंपरिक रोमन धार्मिक व्यवस्था में भी परिवर्तन आया।
अयोग्य और अस्थिर शासक
रोमन साम्राज्य को कई सक्षम सम्राट मिले, किंतु कुछ शासकों की अक्षमता, निरंकुशता और विलासिता ने राजनीतिक संकट को बढ़ाया। कैलीगुला और नीरो जैसे सम्राटों के शासन में दरबारी षड्यंत्र, राजनीतिक दमन और सत्ता-संघर्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं। नीरो के शासनकाल में 64 ईस्वी का रोम का अग्निकांड हुआ। इस घटना के लिए स्वयं नीरो को दोषी सिद्ध करने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं, किंतु उसने ईसाइयों पर इसका आरोप लगाकर उनके विरुद्ध दमन किया। नीरो के शासन के अंत में व्यापक विद्रोह हुए और 68 ईस्वी में उसकी आत्महत्या के साथ जूलियो-क्लॉडियन वंश समाप्त हो गया। बाद की शताब्दियों में भी कई सम्राटों की हत्या, सैनिक विद्रोह और सत्ता-संघर्ष होते रहे। 193 ईस्वी का गृहयुद्ध और तीसरी शताब्दी का संकट इस राजनीतिक अस्थिरता के गंभीर उदाहरण हैं।
इस प्रकार सैनिक दुर्बलता, उत्तराधिकार की अनिश्चितता, सामाजिक असमानता, आर्थिक संकट, प्रशासनिक कठिनाइयाँ और राजनीतिक अस्थिरता ने मिलकर रोमन साम्राज्य की आंतरिक शक्ति को कमजोर किया। इन समस्याओं के साथ बाहरी आक्रमणों और सीमाओं पर बढ़ते दबाव ने संकट को और गंभीर बना दिया। अंततः पश्चिमी रोमन साम्राज्य 476 ईस्वी में समाप्त हुआ, जबकि पूर्वी रोमन साम्राज्य अनेक शताब्दियों तक अस्तित्व में बना रहा।
पश्चिमी रोमन साम्राज्य का पतन
पश्चिमी रोमन साम्राज्य का पतन भी किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि तीसरी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच धीरे-धीरे उत्पन्न हुई राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सैन्य कमजोरियों का परिणाम था। सम्राट थियोडोसियस प्रथम की मृत्यु के बाद 395 ईस्वी में रोमन साम्राज्य को स्थायी रूप से दो भागों—पूर्वी रोमन (बाइजेंटाइन) साम्राज्य और पश्चिमी रोमन साम्राज्य—में विभाजित कर दिया गया था। पूर्वी भाग, जिसकी राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल थी, आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से मजबूत बना रहा, जबकि पश्चिमी भाग निरंतर कमजोर होता गया।
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के कई कारण थे। साम्राज्य का आकार बहुत बड़ा हो जाने के कारण उसका प्रभावी प्रशासन कठिन हो गया। लगातार युद्धों और शाही खर्चों से राजकोष खाली होने लगा, जिसकी पूर्ति के लिए जनता पर भारी कर लगाए गए, जिससे कृषि, व्यापार और उद्योग प्रभावित हुए। राजनीतिक अस्थिरता, उत्तराधिकार के विवाद, भ्रष्टाचार और अयोग्य शासकों ने भी साम्राज्य को कमजोर कर दिया। सेना में रोमन सैनिकों की कमी होने पर जर्मनिक भाड़े के सैनिकों की भर्ती की गई, किंतु उनकी निष्ठा रोम के बजाय अपने सरदारों के प्रति थी। इसी समय विसिगोथ, वैंडल, ऑस्ट्रोगोथ और हूण जैसी बर्बर जातियों ने बार-बार आक्रमण किए। 410 ईस्वी में विसिगोथों के राजा अलारिक ने रोम को लूट लिया और 455 ईस्वी में वैंडलों ने पुनः रोम पर आक्रमण कर भारी विनाश किया।
अंततः 4 सितंबर 476 ईस्वी को जर्मनिक सेनानायक ओडोएकर ने पश्चिमी रोमन साम्राज्य के अंतिम सम्राट रोमुलस ऑगस्टुलस को पदच्युत कर दिया। इसके साथ ही पश्चिमी रोमन साम्राज्य का अंत हो गया। यद्यपि पूर्वी रोमन (बाइजेंटाइन) साम्राज्य 1453 ईस्वी तक अस्तित्व में बना रहा, फिर भी 476 ईस्वी को पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन तथा यूरोप में प्राचीन युग के अंत और मध्यकाल के प्रारंभ का प्रतीक माना जाता है।
रोमन सभ्यता का महत्त्व
रोमन सभ्यता विश्व इतिहास की महान सभ्यताओं में प्रमुख स्थान रखती है। इसका महत्त्व केवल विशाल साम्राज्य की स्थापना तक सीमित नहीं था, बल्कि राजनीति, कानून, प्रशासन, कला, स्थापत्य, भाषा, साहित्य और धर्म के क्षेत्र में इसकी उपलब्धियों ने विश्व सभ्यता को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित किया। रोमनों ने विभिन्न जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक व्यापक राजनीतिक व्यवस्था में संगठित किया। भूमध्यसागरीय क्षेत्र में स्थापित दीर्घकालीन शांति और स्थिरता को ‘पैक्स रोमाना’ कहा जाता है, जिसके दौरान व्यापार, प्रशासन तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान का विस्तार हुआ। राजनीतिक क्षेत्र में रोमन गणराज्य की सीनेट, जनसभाएँ, निर्वाचित पदाधिकारी और स्थानीय संस्थाएँ उल्लेखनीय थीं। साम्राज्य की स्थापना के बाद भी रोमन प्रशासनिक परंपराओं का पश्चिमी राजनीतिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। स्थापत्य और अभियांत्रिकी में कोलोसियम, पैन्थियॉन, स्नानागार, सड़कें, पुल और जलसेतु उनकी तकनीकी दक्षता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। लैटिन भाषा के माध्यम से रोमन साहित्य का व्यापक विकास हुआ। वर्जिल, होरेस, सिसरो, लिवी और टैसिटस जैसे लेखकों ने साहित्य और इतिहास-लेखन को समृद्ध किया। धार्मिक क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्रसार ने रोमन विश्व को गहराई से प्रभावित किया। कॉन्स्टैन्टाइन के शासनकाल में ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण मिला और बाद में यह साम्राज्य का आधिकारिक धर्म बन गया। इस प्रकार, रोमन राजनीतिक सत्ता के पतन के बावजूद उसकी विधिक, भाषायी, सांस्कृतिक, धार्मिक और स्थापत्य विरासत आधुनिक विश्व में आज भी विद्यमान है।
रोमन सभ्यता की सीमाएँ
यद्यपि रोमन सभ्यता ने प्रशासन, सैन्य संगठन, कानून, वास्तुकला और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, फिर भी उसकी कुछ गंभीर सीमाएँ थीं। दर्शन, साहित्य, कला और विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में रोमनों ने यूनानी परंपराओं से गहरी प्रेरणा ली। उन्होंने यूनानी ज्ञान को सुरक्षित, व्यवस्थित और व्यापक रूप से प्रसारित किया, किंतु मौलिक वैज्ञानिक सिद्धांतों तथा दार्शनिक चिंतन में उनका योगदान अपेक्षाकृत सीमित रहा। उनका विज्ञान मुख्यतः व्यावहारिक आवश्यकताओं, जैसे सैन्य अभियानों, निर्माण, जल-प्रबंधन और कृषि पर केंद्रित था। रोमन अर्थव्यवस्था और विशाल निर्माण-व्यवस्था दास-श्रम तथा विजित प्रदेशों से प्राप्त धन-संपत्ति पर अत्यधिक निर्भर थी। इस कारण श्रम-बचाने वाली तकनीकों और यांत्रिक नवाचारों को पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिला। सामाजिक स्तर पर भी पेट्रीशियन और प्लेबियन वर्गों के बीच असमानता बनी रही, जबकि दासों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं और हिंसक पशु-युद्धों जैसे मनोरंजन समाज की कठोर प्रवृत्तियों को दर्शाते थे। इसके अतिरिक्त, विशाल साम्राज्य का प्रशासन तथा लगभग 5,000 किलोमीटर लंबी सीमाओं की रक्षा अत्यधिक खर्चीली थी। निरंतर सैन्य व्यय, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता ने साम्राज्य को कमजोर किया। इस प्रकार, रोमन सभ्यता की उपलब्धियाँ अत्यंत प्रभावशाली और दीर्घकालिक थीं, किंतु दास-प्रथा, सामाजिक असमानता, आर्थिक निर्भरता, सैन्य भार और मौलिक चिंतन की सीमाओं जैसी आंतरिक कमजोरियों ने अंततः उसके पतन की परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं।
रोमन सभ्यता की आधुनिक विश्व में प्रासंगिकता
रोमन सभ्यता ने विश्व इतिहास को कानून, प्रशासन, भाषा, साहित्य, दर्शन, कला, स्थापत्य और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में स्थायी योगदान दिया। रोमनों की विशेषता मौलिक सिद्धांतों के आविष्कार से अधिक उपलब्ध ज्ञान को व्यावहारिक रूप देने और उसे व्यापक स्तर पर लागू करने में थी। उन्होंने यूनानी तथा पूर्ववर्ती सभ्यताओं से प्राप्त ज्ञान को अपनी संगठन-क्षमता और व्यावहारिक बुद्धि के आधार पर विकसित किया। इसी कारण रोमन सभ्यता का प्रभाव विशेष रूप से यूरोपीय सभ्यता पर दीर्घकाल तक बना रहा।
रोमन स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ विशालता, उपयोगिता, दृढ़ता और भव्यता थीं। वास्तुकार मार्कस विट्रुवियस पोलियो ने ‘दे आर्किटेक्चुरा’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की, जिसमें भवन-निर्माण, अनुपात, निर्माण-सामग्री और स्थापत्य के सिद्धांतों का विवेचन मिलता है। रोमनों ने मेहराब, गुंबद और चापाकार छत जैसी तकनीकों का आविष्कार नहीं किया था, किंतु उनका व्यापक और कुशल प्रयोग किया। सम्राट हेड्रियन के काल का पैन्थियॉन, कोलोसियम, कैराकल्ला के स्नानागार तथा ट्राजन और मार्कस ऑरेलियस के विजय-स्तंभ रोमन स्थापत्य और कला की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हैं। इन संरचनाओं में धार्मिक, सार्वजनिक और सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
अभियांत्रिकी के क्षेत्र में सड़कें, पुल, जलसेतु और जल-प्रबंधन प्रणालियाँ रोमन प्रतिभा का प्रमाण हैं। रोमन सड़कों ने सेना, व्यापारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के आवागमन को सुगम बनाया तथा विशाल साम्राज्य को परस्पर जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मजबूत मेहराबदार पुलों और दूरस्थ जलस्रोतों से नगरों तक जल पहुँचाने वाले जलसेतुओं का निर्माण उनकी तकनीकी दक्षता को दर्शाता है। सेक्टस जूलियस फ्रोंटिनस की ‘दे आक्वाएदुक्तु’ रोमन जल-व्यवस्था को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। सार्वजनिक स्नानागार, जलापूर्ति, जलनिकासी और स्वच्छता संबंधी व्यवस्थाएँ भी नगर-जीवन का अभिन्न अंग थीं। क्लोआका मैक्सिमा जैसी जल-निकासी प्रणाली रोमन नगर-नियोजन की उन्नति को दर्शाती है।
रोमन सभ्यता की स्थायी देनों में रोमन विधि का विशेष स्थान है। बारह सारणियों से विकसित रोमन विधि ने संपत्ति, संविदा, उत्तराधिकार, नागरिक अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित अनेक सिद्धांतों को व्यवस्थित किया। बाद में सम्राट जस्टिनियन द्वारा संकलित ‘कॉर्पस ज्यूरिस सिविलिस’ ने यूरोप की नागरिक विधि-व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। प्रशासन के क्षेत्र में रोमनों ने प्रांतों, नगरों और स्थानीय संस्थाओं को संगठित करने की प्रभावी व्यवस्था विकसित की। सीनेट, जनसभाएँ, निर्वाचित पदाधिकारी और नागरिकता की अवधारणा ने आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के विकास को भी प्रभावित किया। जूलियस सीज़र द्वारा 46 ईसा पूर्व में लागू किया गया जूलियन कैलेंडर रोमन प्रशासनिक दक्षता का उल्लेखनीय उदाहरण था।
भाषा और साहित्य के क्षेत्र में लैटिन का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सिसरो ने लैटिन गद्य और वक्तृत्व-कला को उच्च स्तर प्रदान किया। वर्जिल, होरेस, लिवी और टैसिटस ने कविता, इतिहास और गद्य-साहित्य को समृद्ध किया। वर्जिल की ‘एनीड’ रोमन साहित्य की महान कृतियों में मानी जाती है। लिवी और टैसिटस का इतिहास-लेखन तथा प्लॉटस और टेरेन्स के हास्य नाटक यूरोपीय साहित्य की परंपरा को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। आगे चलकर लैटिन यूरोप में शिक्षा, कानून, धर्म, दर्शन और प्रशासन की प्रमुख भाषा बनी। इतालवी, फ्रांसीसी, स्पेनी, पुर्तगाली और रोमानियाई जैसी रोमांस भाषाओं का विकास लैटिन से हुआ। चिकित्सा, विधि और विज्ञान की अनेक पारिभाषिक शब्दावलियों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा।
दर्शन के क्षेत्र में रोमन उपलब्धियाँ यूनानी दर्शन की तुलना में अपेक्षाकृत कम मौलिक थीं। रोमनों ने यूनानी दार्शनिक परंपराओं को अपनाकर उन्हें अपने सामाजिक और नैतिक जीवन के अनुरूप विकसित किया। एपिक्यूरियनवाद, स्टोइकवाद, नव-पाइथागोरसवाद और नव-प्लेटोनवाद का प्रभाव रोमन समाज में रहा। इनमें स्टोइकवाद विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। सिसरो ने यूनानी दर्शन को लैटिन में प्रस्तुत किया, सेनेका ने आत्मसंयम और सदाचार पर बल दिया तथा मार्कस ऑरेलियस ने अपने चिंतन में कर्तव्य, आत्मनियंत्रण और विश्व-नागरिकता को महत्त्व दिया। इस प्रकार रोमन दर्शन की प्रमुख देन यूनानी चिंतन का संरक्षण, उसका प्रसार और उसे व्यावहारिक नैतिक जीवन से जोड़ना थी।
विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में रोमन दृष्टिकोण मुख्यतः व्यावहारिक था। उन्होंने चिकित्सा, अभियांत्रिकी, भूगोल और प्राकृतिक विज्ञान के उपयोग पर अधिक ध्यान दिया तथा यूनानी वैज्ञानिक ज्ञान को सुरक्षित रखकर उसका व्यापक प्रयोग किया। प्लिनी की ‘नैचुरल हिस्ट्री’ में वनस्पतियों, पशुओं, खनिजों और प्राकृतिक घटनाओं का विस्तृत विवरण मिलता है। सेल्सस की ‘दे मेडिसीना’ में रोगों और शल्यचिकित्सा का विवेचन किया गया है। यूनानी मूल के चिकित्सक गैलेन ने रोम में कार्य करते हुए शरीर-विज्ञान, रोग-विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सोरानस ने स्त्रीरोग, प्रसूति और शिशु-स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।
समय-गणना के क्षेत्र में जूलियस सीज़र द्वारा 46 ईसा पूर्व में लागू किया गया जूलियन कैलेंडर भी रोमन सभ्यता की महत्त्वपूर्ण देन था। बाद में 1582 ईस्वी में इसमें सुधार करके ग्रेगोरियन कैलेंडर विकसित किया गया, जो आज विश्व के अधिकांश देशों में प्रचलित नागरिक कैलेंडर है। रोमन अंक भी उनकी उल्लेखनीय देन हैं, जिनका प्रयोग आज घड़ियों, अध्यायों, शताब्दियों, राजाओं के नाम और औपचारिक अभिलेखों में होता है। इस प्रकार रोमन सभ्यता की उपलब्धियाँ केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आधुनिक विश्व की अनेक संस्थाओं और परंपराओं का आधार बनीं।
हालाँकि रोमन सभ्यता की उपलब्धियाँ प्रभावशाली थीं, फिर भी उसके समाज में दास-प्रथा, सामाजिक असमानता, साम्राज्यवादी विस्तार, राजनीतिक संघर्ष और आर्थिक संकट जैसी गंभीर समस्याएँ विद्यमान थीं। विशाल साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा और प्रशासन पर होने वाला अत्यधिक व्यय भी आर्थिक दबाव का कारण बना। फिर भी इन सीमाओं के बावजूद रोमन सभ्यता की विरासत अत्यंत व्यापक और स्थायी रही। कानून, प्रशासन, राजनीति, नगर-नियोजन, अभियांत्रिकी, भाषा, साहित्य, शिक्षा और समय-गणना के क्षेत्र में उसका प्रभाव आज भी स्पष्ट दिखाई देता है। यूनानी तथा अन्य पूर्ववर्ती सभ्यताओं से प्राप्त ज्ञान को अपने संगठनात्मक कौशल और व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ना ही रोमन सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता थी। इसी कारण उसका राजनीतिक साम्राज्य समाप्त होने के बाद भी उसकी विधिक, भाषायी, साहित्यिक, स्थापत्य और प्रशासनिक विरासत आधुनिक विश्व में जीवित रही।


