गायस जूलियस सीज़र ऑगस्टस जर्मैनिकस (कैलिगुला)
गायस जूलियस सीजर जर्मेनिकस, जो इतिहास में आम तौर पर अपने उपनाम ‘कैलिगुला’ के नाम से प्रसिद्ध है, 37 से 41 ईस्वी तक रोम का तीसरा सम्राट था। जूलियो-क्लाउडियन राजवंश के इस शासक का शासनकाल अत्यंत संक्षिप्त था, किंतु अपनी विवादास्पद नीतियों, निरंकुश शासन और रहस्यमय व्यक्तित्व के कारण इसकी गणना रोमन इतिहास के सर्वाधिक चर्चित सम्राटों में की जाती है।
प्रारंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि
गायस जूलियस सीज़र ऑगस्टस जर्मैनिकस (Gaius Julius Caesar Augustus Germanicus) का जन्म 31 अगस्त 12 ईस्वी को एंटियम में हुआ था। कैलिगुला प्रसिद्ध रोमन सेनानायक जर्मेनिकस तथा एग्रीपिना द एल्डर का पुत्र था। उसका पिता जर्मेनिकस सम्राट टिबेरियस (14–37 ई.) का भतीजा और दत्तक पुत्र था, जबकि उसकी माता एग्रीपिना प्रथम रोमन सम्राट ऑगस्टस की पौत्री थी। इस प्रकार कैलिगुला जन्म से ही जूलियो-क्लॉडियन राजवंश का प्रमुख सदस्य था। उसके पिता की असाधारण लोकप्रियता के कारण यह यह माना जाता था कि भविष्य में वह टिबेरियस का उत्तराधिकारी होगा।
कैलिगुला का जन्म टिबेरियस के सम्राट बनने से लगभग दो वर्ष पूर्व हुआ था। उसके दो बड़े भाई नीरो जूलियस सीज़र और ड्रूसस जूलियस सीज़र थे, जबकि उसकी तीन छोटी बहनें- एग्रीपिना द यंगर, जूलिया ड्रूसिला तथा जूलिया लिविल्ला थीं। उसका चाचा आगे चलकर सम्राट क्लॉडियस बना।

‘कैलिगुला’ उपनाम की उत्पत्ति
लगभग दो या तीन वर्ष की आयु में कैलिगुला अपने पिता जर्मेनिकस के साथ जर्मेनिया में रोमन सैन्य अभियानों पर जाने लगा। उसकी माता उसे सैनिकों के लिए विशेष रूप से तैयार की गई लघु सैनिक वर्दी पहनाती थी, जिसमें छोटे सैन्य जूते (Caligae) तथा कवच होते थे। इस वेशभूषा के कारण सैनिक स्नेहपूर्वक उसे ‘कैलिगुला’ (छोटा सैनिक जूता) कहने लगे। यही उपनाम आगे चलकर उसका स्थायी नाम बन गया, यद्यपि वयस्क होने पर उसे यह संबोधन विशेष पसंद नहीं था।
कैलिगुला का पिता जर्मेनिकस अपने सैनिकों तथा रोमन जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय था, जिसके कारण अनेक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उससे असंतुष्ट थे। 19 ईस्वी में सीरिया के एंटिओक में वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और मात्र 33 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। मरते समय उसने यह विश्वास व्यक्त किया कि उसे सीरिया के रोमन गवर्नर ग्नियस कैल्पुर्नियस पिसो ने विष देकर मरवाया है। समकालीन रोमन समाज में भी यह धारणा व्याप्त थी कि इस षड्यंत्र के पीछे सम्राट टिबेरियस (14–37 ई.) अथवा उसके निकटवर्ती सहयोगी का अप्रत्यक्ष हाथ था, यद्यपि इसका कोई निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
जर्मेनिकस की मृत्यु के पश्चात् कैलिगुला का जीवन पूरी तरह बदल गया। अब उसका परिवार रोमन दरबार की कटु राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का शिकार बनने लगा।
आरंभिक संघर्ष
एग्रीपिना द एल्डर अपने पुत्रों के भविष्य को लेकर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थीं। परिणामस्वरूप उसके और सम्राट टिबेरियस के बीच संबंध निरंतर बिगड़ते गए। टिबेरियस स्वभाव से अत्यधिक संदेहशील था और उसे निरंतर षड्यंत्रों एवं राजनीतिक विरोधियों का भय बना रहता था। इसी कारण उसने एग्रीपिना को पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उसे आशंका थी कि इससे कोई नया राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उभर सकता है।
टिबेरियस के शासनकाल के अंतिम वर्षों में रोम में देशद्रोह के अनेक मुकदमे चलाए गए। इन मुकदमों में सीनेट की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। 29 ईस्वी में एग्रीपिना प्रथम और उसके बड़े पुत्र नीरो जूलियस सीज़र पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें निर्वासित कर दिया गया। बाद में दूसरे पुत्र ड्रूसस को भी बंदी बना लिया गया, जहाँ अंततः उसकी मृत्यु हो गई। इन घटनाओं के पश्चात् किशोर कैलिगुला को उसकी परदादी लिविया ड्रुसिल्ला के संरक्षण में भेजा गया, किंतु लिविया की मृत्यु के बाद वह अपनी नानी एंटोनिया माइनर के साथ रहने लगा। 30 ईस्वी के आसपास कैलिगुला तथा उसकी तीनों बहनों को व्यावहारिक रूप से टिबेरियस की निगरानी में रखा गया। यद्यपि उन्हें औपचारिक रूप से बंदी नहीं बनाया गया था, फिर भी उनकी प्रत्येक गतिविधि पर कड़ी दृष्टि रखी जाती थी।
कैप्री में निवास (31–37 ईस्वी)
31 ईस्वी में कैलिगुला के बड़े भाई नीरो जूलियस सीज़र की निर्वासन के दौरान मृत्यु हो गई। उसी वर्ष सम्राट टिबेरियस के आदेश पर कैलिगुला को कैप्री द्वीप स्थित राजप्रासाद विला जोविस भेज दिया गया, जहाँ वह सम्राट की प्रत्यक्ष निगरानी और संरक्षण में रहने लग। कैप्री में टिबेरियस का दरबार रोम की राजनीति से अलग होने पर भी साम्राज्य की सत्ता का वास्तविक केंद्र था। यहीं कैलिगुला को यहाँ लगभग छह वर्षों तक राजदरबार की जटिल राजनीति, सत्ता-संतुलन तथा सम्राट के स्वभाव को निकट से समझने का अवसर मिला।
नैवियस सुतोरियस मैक्रो का संरक्षण
कैप्री में कैलिगुला का प्रेटोरियन गार्ड के प्रीफेक्ट नैवियस सुतोरियस मैक्रोसे घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ। वह टिबेरियस का विश्वसनीय अधिकारी था तथा सम्राट और रोम स्थित सीनेट के बीच प्रमुख संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करता था। समकालीन यहूदी दार्शनिक और राजदूत फिलो ऑफ अलेक्ज़ान्द्रिया के अनुसार मैक्रो ने कैलिगुला की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने टिबेरियस के समक्ष कैलिगुला की ऐसी छवि प्रस्तुत की कि सम्राट को उसके राजनीतिक इरादों पर संदेह न हो। उसने कैलिगुला को एक आज्ञाकारी, विनम्र तथा अपने चचेरे भाई टिबेरियस जेमेलस के प्रति निष्ठावान युवक के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे टिबेरियस का विश्वास उस पर बना रहा।
कैलिगुला का व्यक्तित्व और राजनीतिक सूझ-बूझ
कैप्री में निवास के दौरान कैलिगुला ने असाधारण आत्मसंयम और राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया। प्राचीन लेखकों के अनुसार वह उत्कृष्ट वक्ता, शिक्षित, बुद्धिमान, विनम्र तथा अभिनय-कला में निपुण था। वह भली-भाँति जानता था कि टिबेरियस के शासनकाल में थोड़ी-सी राजनीतिक भूल भी उसके जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। यही कारण है कि उसने अपने परिवार के साथ हुए अन्याय के प्रति किसी प्रकार का सार्वजनिक असंतोष प्रकट नहीं किया और सम्राट के प्रति पूर्ण निष्ठा का प्रदर्शन किया। इतिहासकार टैसिटस ने कैलिगुला की इस विनम्रता को वास्तविक स्वभाव न मानकर राजनीतिक विवशता का परिणाम बताया है। उसके अनुसार कैलिगुला ने अपने भीतर के क्रोध और महत्त्वाकांक्षा को परिस्थितियों के कारण दबाकर रखा। आधुनिक इतिहासकार अलोइस विंटरलिंग का मत है कि यदि कैलिगुला ने उस समय टिबेरियस का खुलकर विरोध किया होता, तो संभवतः वह भी अपने परिवार के अन्य सदस्यों की भाँति मृत्यु का शिकार हो जाता।इसी संदर्भ में बाद के रोमन लेखक सुएटोनियस ने लिखा कि ‘उससे बेहतर दास और उससे बुरा स्वामी कभी नहीं हुआ।’
जूनिया क्लाउडिल्ला से विवाह
33 ईस्वी में टिबेरियस ने कैलिगुला का विवाह जूनिया क्लाउडिल्ला से करा दिया, जो टिबेरियस के विश्वसनीय सहयोगी और सीनेटर मार्कस जूनियस सिलानुस की पुत्री थीं। यह विवाह राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि इससे कैलिगुला का संबंध रोमन सीनेट के एक प्रभावशाली कुल से स्थापित हो गया।
विवाह के बाद कैलिगुला को क्वेस्टर का मानद पद प्रदान किया गया, जो रोमन प्रशासन में सार्वजनिक पदों की श्रृंखला ‘कुर्सुस होनोरुम’ का प्रारंभिक पद था। कैलिगुला को यह पद सम्मानस्वरूप प्रदान किया गया था और सम्राट बनने तक किसी उच्च प्रशासनिक पद पर नियुक्त नहीं हुआ। 34 ईस्वी में जूनिया क्लाउडिल्ला की प्रसव के दौरान उसके नवजात शिशु सहित मृत्यु हो गई। यह घटना कैलिगुला के व्यक्तिगत जीवन के लिए एक और गहरा आघात सिद्ध हुई।
उत्तराधिकारी के रूप में नामांकन
टिबेरियस ने 35 ईस्वी में अपनी वसीयत में कैलिगुला तथा अपने पौत्र टिबेरियस जेमेलस को संयुक्त उत्तराधिकारी घोषित किया। उस समय जेमेलस अल्पायु था और शासन करने योग्य नहीं था। संभवतः टिबेरियस का उद्देश्य दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना तथा भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार उत्तराधिकार सुनिश्चित करना था।
समकालीन लेखक फिलो के अनुसार टिबेरियस जेमेलस से स्नेह रखता था, किंतु उसे उसकी कमउम्र और अनुभवहीनता के कारण उसकी शासन-क्षमता पर पूर्ण विश्वास नहीं था। दूसरी ओर वह कैलिगुला की महत्त्वाकांक्षा और लोकप्रियता से भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं था।
सुएटोनियस के अनुसार टिबेरियस को कैलिगुला के व्यक्तित्व में एक अस्थिर और अप्रत्याशित स्वभाव दिखाई देता था। उसके अनुसार सम्राट को आशंका थी कि भविष्य में कैलिगुला अत्यंत क्रूर शासक सिद्ध हो सकता है। इसी संदर्भ में उसने टिबेरियस के इस प्रसिद्ध कथन को उद्धृत किया है कि ‘गायस को जीवित रखना अपने तथा समस्त मानव जाति के विनाश को पोषित करने के समान है। मैं रोमन जनता के लिए एक साँप और समस्त संसार के लिए एक फ़ैथॉन का पालन-पोषण कर रहा हूँ।’
आधुनिक इतिहासकारों को इस कथन की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर संदेह है। अलोइस विंटरलिंग का मत है कि सुएटोनियस ने यह टिप्पणी कैलिगुला के शासनकाल के बाद प्रचलित नकारात्मक परंपराओं के आधार पर की है। याह विचार कि टिबेरियस को पहले से ही कैलिगुला के भावी शासन की प्रकृति का सही अनुमान हो चुका था, अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों को स्वीकार नहीं है।
उत्तराधिकार की परिस्थितियाँ
कैप्री में बिताए गए वर्षों ने कैलिगुला को धैर्य, आत्मसंयम तथा राजनीतिक व्यवहार-कुशलता का महत्त्व सिखाया था। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि यदि उसने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को सावधानीपूर्वक छिपाकर न रखा होता, तो वह भी अपने परिवार के अन्य सदस्यों की भाँति मार दिया जाता। उसकी इस सफलता का एक बड़ा श्रेय प्रेटोरियन प्रीफेक्ट नैवियस सुतोरियस मैक्रो को भी जाता है, जिसने समय-समय पर उसकी सुरक्षा तथा राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुछ प्राचीन लेखकों का मत है कि यदि टिबेरियस कुछ और वर्षों तक जीवित रहता, तो संभवतः वह कैलिगुला को उत्तराधिकार से हटाकर टिबेरियस जेमेलस को अपना एकमात्र उत्तराधिकारी घोषित कर देता। किंतु 16 मार्च 37 ईस्वी को टिबेरियस की मृत्यु के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदल गईं। अपनी वसीयत में उसने कैलिगुला और टिबेरियस जेमेलस दोनों को संयुक्त उत्तराधिकारी बनाया था, किंतु प्रेटोरियन गार्ड तथा सीनेट के समर्थन से शीघ्र ही कैलिगुला स्वतंत्र रूप से रोमन सम्राट घोषित कर दिया गया।
सम्राट का पद और शासन का प्रारंभ
16 मार्च 37 ईस्वी को लिबरेलिया उत्सव से एक दिन पूर्व 77 वर्ष की आयु में सम्राट टिबेरियस की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के संबंध में प्राचीन रोमन इतिहासकार सुएटोनियस, टैसिटस तथा कैसियस डियो ने अनेक अफवाहों का उल्लेख किया है। इनके अनुसार कैलिगुला ने संभवतः प्रेटोरियन प्रीफेक्ट नैवियस सुतोरियस मैक्रो के साथ मिलकर टिबेरियस की मृत्यु में भूमिका निभाई थी। इसके विपरीत, समकालीन लेखक फिलो ऑफ अलेक्ज़ान्द्रिया तथा प्रथम शताब्दी के यहूदी-रोमन इतिहासकार फ्लावियस जोसेफस ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि टिबेरियस की मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी। आधुनिक इतिहासकार भी सामान्यतः इसी मत को अधिक विश्वसनीय मानते हैं।
टिबेरियस की मृत्यु के दिन ही मिसेनुम में स्थित प्रेटोरियन गार्ड ने कैलिगुला को सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात् सीनेट ने उसे ‘डोमुस कैसारिस’ अर्थात् सीज़र के राजवंश का वैधानिक प्रमुख तथा परिवार का ‘पातेर फ़मिलियास’ स्वीकार किया। टिबेरियस की मृत्यु के दो दिन बाद सीनेट ने औपचारिक रूप से कैलिगुला को रोमन सम्राट घोषित कर दिया।
प्रिंसेप्स के रूप में अधिकार
लगभग 28 अथवा 29 मार्च 37 ईस्वी को कैलिगुला ने रोम में विजयी सम्राट के रूप में प्रवेश किया। वह पहला ऐसा रोमन सम्राट था, जिसे केवल पच्चीस वर्ष की आयु में एक ही अधिनियम के माध्यम लगभग वे सभी अधिकार, सम्मान और विशेषाधिकार प्राप्त हो गए, जिन्हें ऑगस्टस ने अपने दीर्घ राजनीतिक जीवन में धीरे-धीरे अर्जित किया था। उल्लेखनीय है कि कैलिगुला ने इससे पूर्व न तो कोई महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पद सँभाला था और न ही किसी सैन्य अभियान का नेतृत्व किया था।
सीनेट की पहली औपचारिक बैठक तक कैलिगुला ने अपनी अधिकांश उपाधियों का सार्वजनिक रूप से उपयोग नहीं किया। उसके इस संयमित व्यवहार से कई सीनेटरों को लगा कि नया सम्राट अपने पूर्ववर्ती की अपेक्षा अधिक सहयोगात्मक और संवैधानिक ढंग से शासन करेगा। यद्यपि कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों को इस असाधारण राजनीतिक व्यवस्था पर असंतोष भी था, क्योंकि इससे सम्राट को अत्यधिक अधिकार प्राप्त हो गए थे।
इन अधिकारों के परिणामस्वरूप कैलिगुला को विधि निर्माण, कानूनों के अनुपालन अथवा उनकी उपेक्षा करने की व्यापक शक्ति मिल गई थी। ऑगस्टस ने सिद्ध किया था कि प्रिंसेप्स अर्थात् ‘प्रथम नागरिक’ की संस्था तभी सफल हो सकती है, जब सम्राट व्यक्तिगत संयम, उत्तरदायित्व और राजनीतिक विवेक का परिचय दे। टिबेरियस इस संतुलन को बनाए रखने में पूर्णतः सफल नहीं रहा था। इतिहासकार एंथनी ए. बैरेट के के अनुसार कैलिगुला की शक्ति पर नियंत्रण रखने वाला एकमात्र तत्त्व उसका अपना विवेक था और शासनकाल के साथ वह भी क्रमशः क्षीण होता गया।
टिबेरियस की वसीयत और उत्तराधिकार
सिंहासन ग्रहण करने के पश्चात् कैलिगुला ने सीनेट से अपने पूर्ववर्ती टिबेरियस को देवत्व प्रदान करने का प्रस्ताव रखने का अनुरोध किया। किंतु सीनेट तथा जनमत दोनों ही टिबेरियस को इस सम्मान के योग्य नहीं मानते थे। परिणामस्वरूप यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया और कैलिगुला ने भी इस विषय पर आगे आग्रह नहीं किया।
टिबेरियस की वसीयत में दो उत्तराधिकारियों—कैलिगुला तथा टिबेरियस जेमेलस का नाम था। किंतु जेमेलस अभी अल्पवयस्क था और शासन करने की स्थिति में नहीं था। अतः सीनेट ने यह तर्क देते हुए वसीयत को निरस्त कर दिया कि वसीयत लिखते समय टिबेरियस की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। यद्यपि कानूनी दृष्टि से वसीयत निरस्त कर दी गई, फिर भी कैलिगुला ने उसकी अनेक व्यवस्थाओं का सम्मान किया।
टिबेरियस ने अपनी वसीयत में प्रत्येक प्रेटोरियन सैनिक को 500 सेस्टर्स देने का प्रावधान किया था। कैलिगुला ने इस राशि को दोगुना कर दिया और इसे अपनी उदारता के रूप में प्रस्तुत किया। उसने केवल प्रेटोरियन गार्ड ही नहीं, बल्कि रोम की नगर-सेना तथा इटली के बाहर तैनात सैनिकों को भी विशेष धनराशि प्रदान की। इसके अतिरिक्त, रोम के प्रत्येक नागरिक को 150 सेस्टर्स दिए गए, जबकि प्रत्येक परिवार के मुखिया को इससे दुगुनी राशि दी गई। उसने पैलेटाइन पहाड़ी तथा रोम के अन्य भागों में अनेक सार्वजनिक निर्माण-कार्य प्रारंभ करने की भी घोषणा की, जिन पर पर्याप्त राजकोषीय व्यय किया जाना था।
लोकप्रियता और प्रारंभिक जनकल्याणकारी नीतियाँ
प्रेटोरियन प्रीफेक्ट मैक्रो द्वारा पूर्व से की गई राजनीतिक तैयारियों के कारण कैलिगुला का राज्याभिषेक अत्यंत सफल और प्रभावशाली सिद्ध हुआ। सेना पहले ही उसे अपना सम्राट स्वीकार कर चुकी थी और उसके प्रति निष्ठा की शपथ ले चुकी थी। कैलिगुला ने अपने पूर्ववर्ती टिबेरियस का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराया तथा सार्वजनिक रूप से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
सम्राट बनने के बाद उसने विशाल सार्वजनिक खेलों, उत्सवों तथा मनोरंजन कार्यक्रमों का आयोजन किया। समकालीन लेखक फिलो के अनुसार उस समय संपूर्ण साम्राज्य में कैलिगुला के प्रति अत्यधिक उत्साह और आशा का वातावरण था। सुएटोनियस ने भी लिखा है कि जर्मेनिकस का प्रिय पुत्र होने के कारण कैलिगुला जनता के बीच बहुत लोकप्रिय था।
लगभग तीन महीनों तक रोम में उत्सव जैसा वातावरण बना रहा। फिलो ने कैलिगुला के शासन के प्रारंभिक सात महीनों को ‘स्वर्ण युग’ बताया है। इसी प्रकार फ्लावियस जोसेफस के अनुसार शासन के पहले दो वर्षों में कैलिगुला ने न्यायप्रिय, उदार और संतुलित शासन किया, जिसके कारण संपूर्ण रोमन साम्राज्य में उसे व्यापक सम्मान मिला।
प्रथम कौंसलशिप और राजवंशीय सम्मान
सिंहासन ग्रहण करने के लगभग दो महीने बाद 1 जुलाई 37 ईस्वी को कैलिगुला ने अपना प्रथम कौंसल पद ग्रहण किया। उसने ‘राष्ट्रपिता’ (पातेर पात्रियाए) की उपाधि को छोड़कर मिलने वाले लगभग सभी सम्मान स्वीकार कर लिए। अपनी अल्पायु के कारण उसने प्रारंभ में इस उपाधि को स्वीकार करने से इनकार किया, किंतु बाद में 21 सितंबर 37 ईस्वी को इसे भी धारण कर लिया।
कैलिगुला ने अपने पिता जर्मेनिकस की स्मृति को विशेष सम्मान दिया। उसके चित्र रोमन सिक्कों पर अंकित करवाया तथा उसके सम्मान में अनेक सार्वजनिक घोषणाएँ की। कैलिगुला ने अपनी तीनों बहनों—एग्रीपिना द यंगर, जूलिया ड्रूसिला तथा जूलिया लिविल्ला और अपनी दादी एंटोनिया माइनर को ऐसे कई सम्मान एवं विशेषाधिकार प्रदान किए, जो सामान्यतः केवल वेस्टल कन्याओं अथवा शाही परिवार की विशिष्ट महिलाओं को दिए जाते थे, जिसके परिणामस्वरूप राज्य की प्रार्थनाओं, सीनेट की कार्यवाही तथा राजकीय अनुष्ठानों में उनके नामों का विधिवत उल्लेख किया जाने लगा। कैलिगुला ने अपनी प्रिय बहन ड्रूसिला को विशेष राजकीय प्रतिष्ठा प्रदान की और उसे अपने निकटतम उत्तराधिकारियों में स्थान दिया। उसके शासनकाल में सम्राट और उसके समस्त परिवार के नाम पर सार्वजनिक शपथ ली जाने लगी। कुछ सिक्कों पर उसकी प्रत्येक बहन को क्रमशः ‘सुरक्षा’, ‘सौहार्द’ तथा ‘सौभाग्य’ जैसे राजकीय गुणों के प्रतीक के रूप में दिखाया गया। उसने यह भी आदेश दिया कि उसकी दिवंगत माता एग्रीपिना द एल्डर की प्रतिमा प्रत्येक राजकीय विजय-यात्रा और सार्वजनिक उत्सव में सम्मिलित की जाए।
क्लॉडियस का उत्थान
कैलिगुला ने अपने चाचा क्लॉडियस को अपना सहकौंसल नियुक्त किया, यद्यपि दोनों के बीच बहुत अच्छे संबंध नहीं थे। क्लॉडियस को कैलिगुला के दोनों दिवंगत भाइयों की प्रतिमाओं की स्थापना का दायित्व सौंपा और अनेक सार्वजनिक समारोहों, खेलों और राजकीय उत्सवों में सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित रहने का अधिकार भी दिया।
यद्यपि क्लॉडियस की शारीरिक दुर्बलताओं—विशेषकर उनके लंगड़ाने और हकलाने के कारण राजपरिवार के कुछ सदस्य उसका उपहास उड़ाते थे, फिर भी कैलिगुला की इस नियुक्ति से उसके राजनीतिक जीवन को नई दिशा मिली। इससे क्लॉडियस घुड़सवार वर्ग से आगे बढ़कर सीनेट का प्रभावशाली सदस्य बना और भविष्य में कौंसल पद प्राप्त करने का पात्र हो गया।
टिबेरियस के अभिलेखों का दहन
कैलिगुला ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि उसने टिबेरियस के शासनकाल के गोपनीय अभिलेखों को नष्ट कर दिया है। इन अभिलेखों में विशेष रूप से देशद्रोह के मुकदमों से संबंधित दस्तावेज़ थे, जिनके आधार पर अनेक सीनेटरों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोग चलाए गए थे। इन मुकदमों के दौरान अनेक लोगों ने व्यक्तिगत लाभ, राजनीतिक उन्नति अथवा सम्राट की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने ही सहयोगियों के विरुद्ध गवाही दी थी। कैलिगुला ने दावा किया कि उसने इन दस्तावेज़ों को पढ़े बिना ही नष्ट कर दिया है, यद्यपि बाद में इस दावे की सत्यता पर प्रश्न उठाए गए। उसने अपने इस कदम का प्रचार सिक्कों के माध्यम से भी कराया और इसे कानून तथा न्याय की पुनर्स्थापना का प्रतीक बताया।
इसके अतिरिक्त, उसने न्यायालयों में लंबित मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई तथा अनेक मामलों में शाही स्वीकृति की अनिवार्यता समाप्त कर दी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक तीव्र हो सकी।
परिवार का सम्मान और सार्वजनिक निर्माण
कैलिगुला ने ऑगस्टस के वंश से अपने संबंध को रेखांकित करते हुए अपनी माता एग्रीपिना द एल्डर तथा अपने दोनों भाइयों के अवशेष उनके निर्वासन-स्थलों से मँगवाए और उन्हें पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ ऑगस्टस के समाधि-स्थल में पुनः दफन कराया। उसने ऑगस्टस की पत्नी लिविया ड्रुसिल्ला के सम्मान में एक मंदिर के निर्माण का कार्य भी प्रारंभ कराया। लिविया को उसके जीवनकाल में राज्य द्वारा ‘ऑगस्टा’ की सम्मानसूचक उपाधि प्राप्त हुई थी।
बीमारी और स्वास्थ्य-लाभ
लगभग अक्टूबर और नवंबर 37 ईस्वी के बीच कैलिगुला गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसकी स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि लगभग एक महीने तक उसका जीवन संकट में बना रहा। रोम के सार्वजनिक स्थलों पर बड़ी संख्या में लोग उनके स्वास्थ्य-लाभ के लिए देवताओं से प्रार्थना करने लगे। अनेक लोगों ने उसके स्वस्थ होने की मन्नतें मानीं और कुछ ने तो अपने प्राण तक अर्पित करने का संकल्प लिया। अक्टूबर के अंत तक कैलिगुला पूर्णतः स्वस्थ हो गया। स्वास्थ्य-लाभ के बाद उसने उन व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई आरंभ की, जिन पर उसे षड्यंत्र अथवा विश्वासघात का संदेह था।
यद्यपि शासन के प्रारंभिक महीनों में कैलिगुला के सीनेट के साथ संबंध सामान्य थे, किंतु शीघ्र ही प्रसिद्ध सीनेटर मार्कस जूनियस सिलानुस, जो कैलिगुला के पूर्व श्वसुर थे, की मृत्यु हो गई। इसके अतिरिक्त टिबेरियस जेमेलस, जिसे कैलिगुला ने दत्तक ग्रहण कर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था और जो उस समय लगभग अठारह वर्ष का होकर विधिक रूप से वयस्क हो चुका था, उसे भी मृत्युदंड दिया गया।
कुछ महीनों बाद 38 ईस्वी के प्रारंभ में कैलिगुला ने अपने प्रेटोरियन प्रीफेक्ट नैवियस सुतोरियस मैक्रो को भी आत्महत्या करने के लिए बाध्य किया। मैक्रो वही था जिसकी सहायता और संरक्षण के कारण कैलिगुला न केवल जीवित बच सका था, बल्कि सम्राट के रूप में सिंहासन तक पहुँचने में भी सफल हुआ था। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि स्वास्थ्य-लाभ के बाद कैलिगुला मैक्रो के बढ़ते प्रभाव और नियंत्रण से असंतुष्ट था।
38 ईस्वी में कैलिगुला ने मार्कस एमिलियस लेपिडस को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उसका विवाह अपनी प्रिय बहन जूलिया ड्रूसिला से करा दिया। किंतु उसी वर्ष 19 जून 38 ईस्वी को ड्रूसिला की मृत्यु हो गई। कैलिगुला ने उसे राजकीय सम्मान के साथ देवी घोषित किया और उसे ‘पन्थेया’ अर्थात् ‘समस्त देवियों के समान’ की उपाधि प्रदान की। रोमन इतिहास में वह पहली ऐसी महिला थी, जिसे किसी रोमन सम्राट ने आधिकारिक रूप से देवी (दिवा) घोषित किया। ड्रूसिला की मृत्यु के बाद उसने संपूर्ण साम्राज्य में अनिवार्य राजकीय शोक की घोषणा की और सार्वजनिक उत्सवों तथा मनोरंजन कार्यक्रमों पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया।

कैलिगुला की गंभीर बीमारी, ड्रूसिला की मृत्यु तथा इस काल में घटित अन्य घटनाओं को कुछ प्राचीन लेखकों ने उसके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन का प्रमुख कारण बताया है। इतिहासकार वेडेमन का मत है कि कैलिगुला के शासन के प्रारंभिक चरण में ही विरोधियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाइयाँ यह संकेत देती हैं कि उसने टिबेरियस के शासन से बहुत कुछ सीखा था। उसके अनुसार कैलिगुला के शासन को ‘प्रारंभ में आदर्श और बाद में अत्याचारी’ जैसे दो स्पष्ट चरणों में विभाजित करना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है।
सार्वजनिक व्यक्तित्व
कैलिगुला को निम्न वर्ग तथा युवा अभिजात वर्ग में लोकप्रिय मनोरंजनों का विशेष शौक था। उसे सार्वजनिक खेल, विशेष रूप से ग्लैडिएटर प्रतियोगिताएँ, रथ-दौड़, घुड़दौड़, नाट्य-प्रदर्शन तथा जुआ अत्यंत प्रिय थे। वह इन आयोजनों पर अत्यधिक धन व्यय करता था। उसने स्वयं भी पेशेवर ग्लैडिएटरों के साथ युद्धाभ्यास किया तथा अत्यंत भव्य ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं का आयोजन कराया। सीनेट ने उसे उन व्यय-सीमाओं से छूट प्रदान कर दी थी, जो सामान्यतः रोम में रखे जाने वाले ग्लैडिएटरों की संख्या पर लागू होती थीं।
कैलिगुला खुले रूप से अपने प्रिय रथ-चालकों, रेसिंग दलों, ग्लैडिएटरों तथा अभिनेताओं का समर्थन करता था और जिन व्यक्तियों को वह पसंद नहीं करता था, उनका सार्वजनिक रूप से उपहास भी उड़ाता था। कभी-कभी वह स्वयं भी पेशेवर कलाकारों के साथ गीत गाता या रंगमंचीय संवाद बोलता तथा सामान्य दर्शकों की भाँति सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेता था।
ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं में वह विशेष रूप से पार्मुलारियस प्रकार के योद्धाओं का समर्थन करता था, जो छोटी गोल ढालों का उपयोग करते थे। रथ-दौड़ में वह हरित (ग्रीन) दल का कट्टर समर्थक था। उसका प्रिय घोड़ा इंसितातुस (इंसिटाटस) था, जिसे वह अत्यधिक सम्मान और स्नेह प्रदान करता था। किंतु रोमन अभिजात में सम्राट का इस प्रकार सार्वजनिक मनोरंजनों में सक्रिय भाग लेना अत्यंत अनुचित और प्रतिष्ठा के प्रतिकूल माना जाता था।
कैलिगुला ने सीनेट के भीतर पद, प्रतिष्ठा और विशेषाधिकारों के पारंपरिक भेदों का विशेष सम्मान नहीं किया। टिबेरियस ने एक अवसर पर सीनेटरों को ‘दास बनने के लिए तत्पर पुरुष’ कहा था और कैलिगुला ने भी कई बार सीनेट के प्रति तिरस्कारपूर्ण व्यवहार किया। उसने उन अनेक व्यक्तियों को निर्वासन से वापस बुला लिया, जिन्हें टिबेरियस ने दंडित किया था। इनमें अभिनेता तथा अन्य सार्वजनिक कलाकार भी थे, जिन्होंने किसी न किसी कारण से टिबेरियस को अप्रसन्न किया था।
ऐसा प्रतीत होता है कि कैलिगुला ने अपने प्रति निष्ठावान मुक्तदासों, सामान्य नागरिकों तथा सार्वजनिक कलाकारों का एक नया समर्थक वर्ग तैयार किया। वह इन पर उदारतापूर्वक धन और उपहारों की वर्षा करता था। इसके विपरीत, वह अनेक सीनेटरों और अभिजात वर्ग के लोगों पर अविश्वास करता था तथा अवसर मिलने पर उनका सार्वजनिक रूप से अपमान भी करता था।
कैसियस डियो के अनुसार कैलिगुला ने कुछ योग्य घुड़सवारों को सीनेटर का सम्मान प्रदान किया। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों से संपन्न व्यक्तियों को घुड़सवार वर्ग में सम्मिलित किया तथा इस वर्ग की सदस्यता सूची की सावधानीपूर्वक समीक्षा कराई। भ्रष्टाचार अथवा सार्वजनिक कलंक से जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई, किंतु साधारण त्रुटियों की प्रायः उपेक्षा की। संभवतः उसका उद्देश्य ऐसे ‘नोवी होमिनेस’ अर्थात् नए परिवारों से आने वाले व्यक्तियों को आगे बढ़ाना था, जो अपनी योग्यता के आधार पर पहली बार सीनेट तक पहुँच रहे थे और स्वाभाविक रूप से सम्राट के प्रति अधिक निष्ठावान रहते।
सार्वजनिक सुधार और वित्त
38 ईस्वी में कैलिगुला ने सेंसरशिप को समाप्त कर दिया तथा सार्वजनिक कोष और सरकारी व्यय का लेखा-जोखा प्रकाशित करवाया। सुएटोनियस के अनुसार किसी रोमन सम्राट द्वारा ऐसा कदम पहली बार उठाया गया था। इस उपाय का उद्देश्य शासन की पारदर्शिता बढ़ाना तथा जनता को यह बताना था कि राज्य की आय और व्यय का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है। 38 ईस्वी में जारी एक क्वाड्रांस सिक्के पर कैलिगुला द्वारा एक कर समाप्त किए जाने का उत्सव दिखाया गया है।

सिंहासन पर बैठने के तुरंत बाद कैलिगुला ने सामान्य नागरिकों की ओर से मजिस्ट्रेटों के निर्वाचन के लिए जनसभा के अधिकार को पुनर्स्थापित कर दिया। यह अधिकार पहले ऑगस्टस और टिबेरियस के शासनकाल में व्यवहारतः सीनेट के नियंत्रण में चला गया था। अब ऐडाइल (रोमन नगराधिकारी) जैसे निर्वाचित अधिकारियों, जिनका कार्य सार्वजनिक खेलों, उत्सवों, सड़कों और धार्मिक स्थलों की देखरेख करना था, को पुनः जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए लोकप्रिय कार्यक्रमों और सार्वजनिक उपहारों पर धन व्यय करने की प्रेरणा मिली।
कैसियस डियो लिखता हैं कि यद्यपि इस निर्णय से सामान्य जनता अत्यंत प्रसन्न हुई, किंतु अनेक अनुभवी राजनीतिज्ञ चिंतित थे। उनका विचार था कि यदि सार्वजनिक पदों का नियंत्रण पुनः व्यापक जनसमूह के हाथों में चला गया, तो इससे राजनीतिक अस्थिरता और अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। जब सीनेट ने इस व्यवस्था को पूर्ण रूप से स्वीकार करने में अनिच्छा दिखाई, तब कैलिगुला ने चुनावों का नियंत्रण पुनः उनके हाथों में लौटा दिया। फिर भी अंतिम निर्णय सम्राट के प्रभाव में ही रहता था, क्योंकि वही यह निर्धारित करता था कि कौन-से उम्मीदवार चुनाव लड़ सकेंगे और किन्हें पद प्राप्त होगा।
कैलिगुला में अपनी नीतियों और निर्णयों पर पुनर्विचार करने की क्षमता भी थी। जब उसे किसी योजना के विरुद्ध तीव्र विरोध अथवा उसके संभावित दुष्परिणामों का आभास होता, तो वह उसे संशोधित कर देता या पूरी तरह त्याग देता था। उसने आवश्यकता पड़ने पर सार्वजनिक सहायता भी प्रदान की। जिन लोगों की संपत्ति अग्निकांड में नष्ट हो गई थी, उन्हें आर्थिक सहायता दी गई। इसके अतिरिक्त, उसने बिक्री पर लगाए गए एक अत्यंत अलोकप्रिय कर को समाप्त कर दिया। यद्यपि यह स्पष्ट नहीं है कि उसके शासन के प्रारंभिक वर्षों में अभिनेताओं, रथ-चालकों तथा अन्य सार्वजनिक कलाकारों को दिए गए भव्य उपहार उसके निजी कोष से दिए गए थे अथवा राजकोष से।
रोमन राजनीतिक परंपरा में सम्राट से व्यक्तिगत उदारता और दानशीलता की अपेक्षा की जाती थी, किंतु इसके साथ विवेक, उत्तरदायित्व और वित्तीय संतुलन भी आवश्यक माना जाता था। कैलिगुला ने यह भी नियम बनाया कि राज्य के पदाधिकारियों को वसीयत द्वारा प्राप्त की गई संपत्ति व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय उस पद से संबंधित मानी जाएगी। अर्थात् वह संपत्ति पदाधिकारी की निजी नहीं, बल्कि उसके कार्यालय की संपत्ति समझी जाएगी।
कर और राजकोष
सुएटोनियस का दावा है कि शासन के प्रथम वर्ष में कैलिगुला ने लगभग 2.7 अरब सेस्टर्स व्यय कर दिए, जिसके परिणामस्वरूप राजकोष पर भारी दबाव पड़ा और बाद में सम्राट ने धन एकत्र करने के लिए धनी व्यक्तियों की संपत्तियाँ जब्त कीं, उन पर आरोप लगाए, जुर्माने लगाए तथा कुछ मामलों में मृत्युदंड तक दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार की कठोर वित्तीय नीतियाँ विशेष रूप से 39 ईस्वी के आरंभ में सीनेट के साथ उसके टकराव के समय अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
इतिहासकार विल्किन्सन के अनुसार कैलिगुला के शासनकाल में जारी सिक्कों में बहुमूल्य धातुओं का निरंतर उपयोग यह संकेत नहीं देता कि राजकोष वास्तव में दिवालिया हो गया था। यद्यपि यह संभव है कि सम्राट की निजी संपत्ति और राज्य की आय के बीच की सीमाएँ कुछ हद तक धुँधली हो गई हों। कैलिगुला के उत्तराधिकारी क्लॉडियस ने सत्ता ग्रहण करने के बाद कई कर समाप्त किए, अनेक महँगी निर्माण-परियोजनाएँ प्रारंभ की तथा 41 ईस्वी में प्रत्येक प्रेटोरियन सैनिक को 15,000 सेस्टर्स का दान दिया। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि कैलिगुला अपने उत्तराधिकारी के लिए खाली खजाना छोड़कर नहीं गया था।
यह सही है कि कैलिगुला का व्यय उसकी नियमित आय से अधिक था। अतः अतिरिक्त राजस्व प्राप्त करना शासन की आवश्यकता थी। साम्राज्य के प्रांतों के निवासी पहले से ही सेना के व्यय हेतु प्रत्यक्ष कर देते थे, जबकि इटली के नागरिकों को अनेक करों से छूट प्राप्त थी। कैलिगुला ने कुछ अलोकप्रिय कर समाप्त किए, जिनमें बिक्री कर भी शामिल था, किंतु साथ ही उसने कई नए कर भी लगाए। विभिन्न स्रोतों के अनुसार करों का विस्तार मधुशालाओं, कारीगरों, दासों, दास-नियोजन, खाद्य पदार्थों की बिक्री, न्यायिक मामलों, विवाहों, कुलियों अथवा संदेशवाहकों की मजदूरी तथा अन्य अनेक आर्थिक गतिविधियों तक कर दिया गया था। सबसे अधिक कुख्यात कर वेश्याओं और उनके दलालों पर लगाया गया था। इस कर के अंतर्गत वेश्याओं को अपनी आय के एक निश्चित भाग का भुगतान राज्य को करना पड़ता था। इन करों की वसूली के लिए पारंपरिक ‘कर-ठेकेदारों’ (पुब्लिकानी) पर निर्भर रहने के बजाय राज्य ने प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया।
कैलिगुला के शासनकाल में इटली के नागरिकों की कुछ पारंपरिक कर-छूटें भी समाप्त कर दी गईं। यद्यपि अधिकांश व्यक्तिगत कर अपेक्षाकृत छोटे थे, किंतु सामूहिक रूप से उनका भार पर्याप्त था। कुछ प्राचीन स्रोतों के अनुसार उसके शासनकाल में कुल कर-भार लगभग दोगुना हो गया था।
इसके बावजूद राजस्व की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। रोम की सामान्य जनता इन नए करों से असंतुष्ट थी। फ्लावियस जोसेफस के अनुसार करों के विरोध में सर्कस में अशांति और दंगे तक हुए। इतिहासकार बैरेट का मत है कि इन घटनाओं के परिणामस्वरूप हुए कथित ‘सामूहिक मृत्युदंडों’ के विवरणों को प्राचीन लेखकों की सामान्य अतिशयोक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।
सम्राट के रूप में टिबेरियस को प्राप्त होने वाली, किंतु उसकी मृत्यु के समय तक अप्राप्त संपत्तियाँ और धनराशि कैलिगुला को हस्तांतरित हो गईं। रोमन उत्तराधिकार कानून वसीयतकर्ता को अपने परिवार के लिए प्रावधान करने का दायित्व देता था, किंतु कैलिगुला का दृष्टिकोण था कि राज्य के प्रति दायित्व भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। सेना को भी इस नीति से छूट नहीं मिली। जो शताधिपति सम्राट के लिए अपनी वसीयत में पर्याप्त धनराशि नहीं छोड़ते थे, उन पर कृतघ्नता का आरोप लगाया जा सकता था और उनकी वसीयतों को चुनौती दी जा सकती थी। जिन शताधिपतियों ने युद्ध-लूट अथवा अन्य साधनों से पर्याप्त संपत्ति अर्जित की थी, उन्हें कभी-कभी अपनी संपत्ति का एक भाग राज्य को देने के लिए बाध्य किया जाता था।
शाही महल, वेश्यावृत्ति और वित्तीय नीतियाँ
कैलिगुला के शासनकाल में शाही महल में वेश्यालय संचालित होने की कथा का उल्लेख सुएटोनियस और कैसियस डियो दोनों ने किया है, किंतु आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि यह संभवतः किसी एक घटना का अतिरंजित रूप था। अलोइस विंटरलिंग के अनुसार महल के नवनिर्मित कक्षों में रहने वाले कुलीन व्यक्तियों से प्रेटोरियन सुरक्षा और सम्राट के निकट निवास के बदले अत्यधिक किराया लिया जाता था; डियो के मूल विवरण में वेश्यालय का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
सुएटोनियस के अनुसार कैलिगुला अपने तथाकथित मित्रों और उच्च अधिकारियों से उपहार, वसीयतों तथा अन्य अवसरों पर धन वसूल करता था, जबकि उसके प्रतिनिधि उनकी निष्ठा के नाम पर अतिरिक्त धन की माँग करते थे। विंटरलिंग का मत है कि अनेक कुलीन परिवार प्रेटोरियन निगरानी में बंधक-जैसी स्थिति में थे और जिन्हें धन की आवश्यकता होती, उन्हें सम्राट ऊँचे ब्याज पर ऋण देता था। इन नीतियों का उद्देश्य विशेष रूप से धनी एवं प्राचीन रोमन कुलों को आर्थिक और सामाजिक रूप से अपमानित करना था।
यद्यपि प्राचीन लेखकों ने कैलिगुला की कर-नीति की आलोचना की, फिर भी उसके कई कर उसकी मृत्यु के बाद भी प्रभावी रहे। वेश्यावृत्ति पर लगाया गया कर सम्राट सेवेरस अलेक्ज़ेंडर के शासनकाल तक लागू रहा, जबकि वसीयत द्वारा शासक को प्राप्त संपत्ति को व्यक्तिगत नहीं बल्कि राजकीय संपत्ति मानने के सिद्धांत को बाद में सम्राट एंटोनिनस पायस के शासनकाल में विधिक मान्यता मिल गई।
सिक्कों की ढलाई
कैलिगुला ने ऑगस्टस द्वारा स्थापित तथा टिबेरियस द्वारा जारी रखी गई रोमन मौद्रिक व्यवस्था की मूल संरचना में कोई परिवर्तन नहीं किया, किंतु उसके सिक्कों की विषय-वस्तु अपने पूर्ववर्ती सम्राटों से भिन्न थी।
सामान्यतः माना जाता है कि कैलिगुला ने अपने शासन के प्रारंभ में सोने और चाँदी के सिक्के लुगडुनम (ल्योन, फ्रांस) में ढलवाए, जैसा कि उसके पूर्ववर्ती शासकों के समय होता था। बाद में 37–38 ईस्वी के दौरान टकसाल को रोम स्थानांतरित कर दिया गया। यद्यपि कुछ विद्वानों का मत है कि यह परिवर्तन वास्तव में नीरो के शासनकाल में हुआ था। आधार धातु के सिक्कों की ढलाई रोम की टकसाल में ही की जाती थी। कैलिगुला ने कैप्पाडोसिया के कैसरिया स्थित उस टकसाल को भी चालू रखा, जिसकी स्थापना टिबेरियस ने की थी। इस टकसाल का मुख्य उद्देश्य प्रांत में तैनात सेना के व्यय का भुगतान चाँदी के ड्राक्मा के माध्यम से करना था।

टिबेरियस के विपरीत, जिसके सिक्कों की रूपरेखा उसके पूरे शासनकाल में लगभग अपरिवर्तित रही, कैलिगुला ने अनेक प्रकार के सिक्के जारी किए। इनमें दिवुस ऑगस्टस, उसके पिता जर्मेनिकस, माता एग्रीपिना द एल्डर, उसके दिवंगत भाई नीरो और ड्रूसस तथा उसकी तीनों बहनें एग्रीपिना, ड्रूसिला और लिविला अंकित थीं। अपने परिवार को इस प्रकार प्रदर्शित करने का उद्देश्य जूलियन और क्लॉडियन दोनों राजवंशों की ओर से अपने वैध उत्तराधिकार के दावे को प्रदर्शित करना तथा शाही परिवार की एकता को रेखांकित करना था। उसकी तीनों बहनों वाले सेस्टर्स सिक्कों का निर्गमन 39 ईस्वी के बाद बंद कर दिया गया, क्योंकि कैलिगुला को उनकी निष्ठा पर संदेह होने लगा था।
कैलिगुला ने प्रेटोरियन कोहोर्टों के सम्मान में भी एक सेस्टर्स जारी किया और प्रेटोरियन गार्ड के प्रति अपने सम्मान और पुरस्कार को प्रदर्शित किया। इसके अतिरिक्त, उसने एक छोटा काँस्य सिक्का क्वाड्रांस भी जारी किया, जो बिक्री पर लगाए जाने वाले ड्यूसेन्टेसिमा अर्थात् 0.5 प्रतिशत कर की समाप्ति का प्रतीक था।
बहुमूल्य धातुओं के सिक्कों का उत्पादन अपेक्षाकृत सीमित था तथा उसके सेस्टर्स भी कम संख्या में ढाले गए। इसी कारण आज कैलिगुला के सिक्के अत्यंत दुर्लभ हैं। किंतु इस दुर्लभता का कारण कैलिगुला के कथित दाम्नातियो मेमोरिये को नहीं माना जा सकता, जिसका उल्लेख कैसियस डियो ने किया है, क्योंकि व्यवहारतः किसी सम्राट के सभी सिक्कों को प्रचलन से हटाना संभव नहीं था। इसका प्रमाण यह भी है कि मार्क एंटनी के सिक्के उसकी मृत्यु के लगभग दो शताब्दियों बाद तक प्रचलन में बने रहे।
कैलिगुला के सामान्यतः वेस्टा, जर्मेनिकस, एग्रीपिना द एल्डर तथा विशेष रूप से उसके नाना मार्कुस विप्सानियुस अग्रिप्पा वाले आधार-धातु के सिक्के सर्वाधिक पाए जाते हैं।
कुछ मुद्राशास्त्रियों ने कैलिगुला के सिक्कों की कलात्मक गुणवत्ता संभवतः टिबेरियस और क्लॉडियस के सिक्कों की तुलना में निम्न स्तर का बताया है, जो कठोर तथा सूक्ष्म कलात्मक विवरणों से रहित थे।
निर्माण कार्य
कैलिगुला को विशाल और महँगी निर्माण-परियोजनाओं का विशेष शौक था। यद्यपि इनमें से अनेक परियोजनाएँ सार्वजनिक उपयोग अथवा जन-मनोरंजन के उद्देश्य से थीं, फिर भी अधिकांश रोमन लेखकों ने उन्हें अनावश्यक और अपव्ययी बताया है।
रोम नगर में उसने ऑगस्टस के मंदिर तथा पोम्पी के रंगमंच के पुनर्निर्माण कार्य को पूरा कराया। यह भी कहा जाता है कि उसने कैस्टर और पोलक्स के मंदिर तथा कैपिटोलाइन पहाड़ी के मध्य एक पुल का निर्माण कराया। इतिहासकार एंथनी ए. बैरेट का मत है कि इस पुल का उल्लेख केवल सुएटोनियस के विवरण में मिलता है और संभवतः यह किसी व्यंग्यात्मक कथा अथवा अतिशयोक्ति पर आधारित है।
कैलिगुला ने सैप्टा जूलिया के समीप स्थित एक एम्फीथिएटर का निर्माण आरंभ कराया। इसके समीप स्थित क्षेत्र को अखाड़े के रूप में परिवर्तित किया गया तथा उसे जल से भरकर नौमाखिया अर्थात् कृत्रिम नौसैनिक युद्धों के प्रदर्शन के लिए उपयोग में लाया गया।
उसने अपने कला-संग्रह के प्रदर्शन हेतु शाही महल का विस्तार और पुनर्निर्माण भी कराया। अपनी राजनयिक यात्रा के दौरान फिलो तथा उस्के प्रतिनिधिमंडल को इस कला-दीर्घा का अवलोकन कराया गया। इतिहासकार बैरेट का मत है कि फिलो द्वारा कैलिगुला को ‘भावी कला-रसिक और सौंदर्य-प्रेमी’ के रूप में चित्रित करना संभवतः पूरी तरह निराधार नहीं था।
रोम में बढ़ती जल-आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से कैलिगुला ने एक्वा क्लाउडिया तथा एनियो नोवस नामक जलसेतुओं के निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया। इसी परियोजना के अंतर्गत उसने एक विशाल मिस्री ओबेलिस्क (एकाश्म स्तंभ) रोम मँगवाया, जिसे आज वेटिकन ओबेलिस्क के नाम से जाना जाता है। इसे समुद्री मार्ग से एक विशेष रूप से निर्मित विशाल जहाज द्वारा लाया गया था, जिसमें संतुलन के लिए लगभग 1,20,000 मोडियस (रोमन अनाज-माप) मसूर का उपयोग किया गया था। सिराक्यूज़ में उसने नगर की प्राचीरों और मंदिरों की मरम्मत करवाई।
उसने संपूर्ण साम्राज्य में सड़कों की मरम्मत और विस्तार पर विशेष बल दिया। इसके लिए वर्तमान तथा पूर्व राजमार्ग आयुक्तों के वित्तीय अभिलेखों की जाँच कराई गई। जो अधिकारी लापरवाही, गबन अथवा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के दोषी पाए गए, उन्हें या तो हड़पी गई धनराशि लौटानी पड़ी अथवा अपने निजी व्यय पर निर्माण कार्य पूरा कराना पड़ा।
कैलिगुला ने सामोस में पॉलीक्रेट्स के महल के पुनर्निर्माण, डिडिमा के अपोलो मंदिर को पूरा कराने तथा वहाँ अपने पंथ और प्रतिमा स्थापित करने की योजना बनाई। इसके अतिरिक्त, उसने आल्प्स में एक नया नगर बसाने तथा यूनान में कोरिंथ के इस्थमस (स्थलडमरूमध्य) के आर-पार एक नहर बनवाने की योजना भी बनाई। इस उद्देश्य से उसने स्थल का सर्वेक्षण कराने के लिए एक प्रधान शताधिपति को भेजा था। किंतु इनमें से कोई भी योजना पूर्ण नहीं हो सकी।
देशद्रोह के मुकदमे
39 ईस्वी के दौरान कैलिगुला और सीनेट के बीच संबंध निरंतर तनावपूर्ण होते गए और अंततः वे प्रत्यक्ष शत्रुता तथा टकराव में बदल गए। कैलिगुला ने पूरी सीनेट को कठोर शब्दों में फटकार लगाई तथा उनके वर्तमान और पूर्व आचरण की समीक्षा कर उनकी निंदा की। उसने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने टिबेरियस और सेजानुस के जीवित रहते हुए उनकी चापलूसी की, उन्हें सम्मान दिए और उनकी मृत्यु के बाद वही सम्मान वापस ले लिए। उसके अनुसार यह दासता, विश्वासघात और पाखंड का प्रमाण था। इस प्रकार कैलिगुला ने आदर्श ‘प्रिंसेप्स’ अथवा ‘प्रथम सीनेटर’ की पारंपरिक अवधारणा को ही चुनौती दे दी। अगले दिन जब सीनेट पुनः एकत्र हुई, तो उसके सदस्यों ने उसके संदेह को और पुष्ट कर दिया। उन्होंने उसकी तथा उसकी प्रतिमाओं की सुरक्षा के लिए प्रेटोरियन सैनिकों का एक विशेष सशस्त्र दल नियुक्त किया तथा उसे प्रसन्न करने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से प्रस्ताव रखा कि सीनेट भवन में उसकी आसंदी एक ऊँचे मंच पर स्थापित की जाए। यही नहीं, उन्होंने उसे राजा के समान सम्मान दिया और अन्य लोगों को मृत्युदंड देकर उसे जीवित रखने के लिए उसका धन्यवाद भी किया।
इतिहासकार अलोइस विंटरलिंग के अनुसार कैलिगुला ने अपने बाद के तीनों कौंसल पदों की शपथ रोस्ट्रा पर इस उद्देश्य से ग्रहण की कि वह सीनेटरों को अपने समान मानने और उन्हें सार्वजनिक सम्मान देने के निष्फल प्रयासों का प्रतिरोध कर सके। दूसरी ओर, इतिहासकार बैरेट इन बाद के कौंसल पदों को सीनेट और राज्य पर कैलिगुला के निरंतर प्रभुत्व स्थापित करने की उसकी इच्छा का प्रतीक मानता है। उसके अनुसार कैलिगुला का शासन धीरे-धीरे प्रशासनिक विघटन, गंभीर कुप्रबंधन और गहरे अविश्वास की ओर बढ़ता गया तथा अंततः आतंक का रूप धारण कर लिया। फिर भी, कैसियस डियो का यह दावा कि उस समय केवल नरसंहार ही नरसंहार था, इस तथ्य से कमज़ोर हो जाता है कि अधिकांश सीनेटर कैलिगुला के शासनकाल में अपनी संपत्ति और जीवन दोनों सुरक्षित रखने में सफल रहे।
अंततः यह पता चला कि कैलिगुला ने टिबेरियस के शासनकाल के देशद्रोह (मेएस्टास) संबंधी मुकदमों के अभिलेख वास्तव में नष्ट नहीं किए थे। उसने उनकी पुनः समीक्षा कर यह निष्कर्ष निकाला कि अनेक सीनेटर प्रारंभ से ही सम्राट और राज्य के विरुद्ध षड्यंत्रों में संलिप्त थे, जिन्हें ‘मेएस्टास’ का गंभीर अपराध माना जाता था। टिबेरियस के शासनकाल में ऐसे मुकदमों ने पेशेवर मुखबिरों (डेलाटोर्स) को बढ़ावा दिया था, जिनसे जनता घृणा करती थी। अनेक अभियुक्तों ने अपने बचाव में एक-दूसरे के विरुद्ध तथा कैलिगुला के परिवार के विरुद्ध भी गवाही दी थी और कुछ ने अभियोजन में भी भाग लिया था। कैलिगुला का मानना था कि जिन्होंने उसके परिवार के विरुद्ध कार्य किया था, वे उसके विरुद्ध भी षड्यंत्र कर सकते थे; इसलिए उसने नई जाँच प्रारंभ कराई। कैसियस डियो ने पाँच पूर्व कौंसल रह चुके प्रतिष्ठित सीनेटरों का नाम दिया है, जिन पर मेएस्टास का अभियोग चलाया गया, किंतु उसका यह दावा कि बड़ी संख्या में सीनेटरों और अन्य व्यक्तियों को मृत्युदंड दिया गया, प्रमाणित नहीं है क्योंकि इन पाँच में से दो कैलिगुला के शासनकाल तथा उसके बाद भी समृद्ध और प्रभावशाली बने रहे। कैलिगुला अपने विरोधियों, विशेषकर प्राचीन कुलीन परिवारों के सदस्यों को उनके पैतृक सम्मान, प्रतिष्ठा और उपाधियों से वंचित कर सार्वजनिक रूप से अपमानित करना पसंद करता था। सितंबर 39 ईस्वी के प्रारंभ में उसने दो सफ़ेक्ट कौंसलों को केवल इस कारण पदच्युत कर दिया कि उन्होंने उसके जन्मदिन (31 अगस्त) का उत्सव नहीं मनाया था और उसके स्थान पर एक्टियम के युद्ध (2 सितंबर) की वर्षगाँठ को अधिक महत्त्व दिया था। यह युद्ध उसके दो प्रमुख पूर्वजों के मध्य हुए गृहयुद्ध का अंतिम निर्णायक संघर्ष था, जिसे मनाने का उसके लिए कोई विशेष कारण नहीं था। पदच्युत किए गए कॉन्सलों में से एक ने आत्महत्या कर ली। संभवतः कैलिगुला को उस पर किसी षड्यंत्र में सम्मिलित होने का संदेह था।
इंसिटेटस
सुएटोनियस और कैसियस डियो दोनों ने उल्लेख किया है कि कैलिगुला ने अपने प्रिय रथ-घोड़े इंसिटेटस (स्विफ्ट) को कॉन्सल तथा बाद में अपने शाही पंथ का पुरोहित बनाने का प्रस्ताव रखा था। संभव है कि यह केवल एक लंबा व्यंग्यपूर्ण मज़ाक रहा हो, जिसके माध्यम से कैलिगुला सीनेट का उपहास करना चाहता था। बाद की परंपरा में यह धारणा प्रचलित हो गई कि उसने वास्तव में अपने घोड़े को कॉन्सल नियुक्त किया था, जो अयोग्य व्यक्तियों को उच्च पद देने का एक प्रसिद्ध प्रतीक बन गया। यह भी संभव है कि यह कैलिगुला द्वारा सीनेटर वर्ग के प्रति किया गया एक परोक्ष, कटाक्षपूर्ण और अपमानजनक व्यंग्य था। विंटरलिंग इसे स्वयं कॉन्सल पद का उपहास मानते हैं। उसके अनुसार किसी धनी रोमन की सर्वोच्च आकांक्षा कॉन्सल बनना होती थी और कैलिगुला ने उसी आकांक्षा को उपहास का विषय बना दिया।
दूसरी ओर डेविड वुड्स का मत है कि यह संभावना कम है कि कैलिगुला वास्तव में कॉन्सल पद का अपमान करना चाहता था, क्योंकि वह स्वयं भी इस पद पर आसीन रह चुका था। संभवतः सुएटोनियस इस व्यंग्य का आशय समझ नहीं पाया और उसने इसे कैलिगुला के कथित पागलपन का एक और प्रमाण मान लिया। इसी कारण उसने इस कथा में महल, सेवकों, स्वर्ण-पात्रों तथा भोज के निमंत्रण जैसी अतिरिक्त बातें भी जोड़ दीं, जो सामान्यतः केवल उच्च सीनेटर वर्ग से संबद्ध मानी जाती थीं।
बैए में पुल
39 या 40 ईस्वी में सुएटोनियस के अनुसार कैलिगुला ने एक अस्थायी तैरता हुआ पुल बनवाने का आदेश दिया। इस पुल के निर्माण के लिए जहाज़ों की दोहरी पंक्ति को नौकाओं का अस्थायी तैरते पुल (पोंटून) के रूप में प्रयोग किया गया। उन्हें मिट्टी से भरकर सुदृढ़ बनाया गया और यह पुल नेपल्स के निकट स्थित बैए के प्रसिद्ध विश्राम-स्थल से लेकर पड़ोसी बंदरगाह पुटियोली (पोज़्ज़ुओली) तक दो मील से अधिक लंबा था। पुल के मध्य भाग में विश्राम-स्थल भी बनाए गए थे। कुछ जहाज़ विशेष रूप से इसी उद्देश्य के लिए तैयार किए गए थे, जबकि कुछ अनाज ढोने वाले जहाज़ों को भी वहाँ लाकर सुरक्षित रूप से जोड़कर अस्थायी रूप से पुनर्निर्मित किया गया था। इस पुल का कोई व्यावहारिक उद्देश्य स्पष्ट नहीं है। संभवतः इसका निर्माण कैलिगुला द्वारा ब्रिटेन पर प्रस्तावित आक्रमण की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए किया गया था।
समुद्र के देवता नेपच्यून तथा इन्विडिया (ईर्ष्या) को अर्पण चढ़ाकर दो दिनों तक धार्मिक समारोह आयोजित किए गए और परिणाम संतोषजनक रहा, क्योंकि समुद्र पूर्णतः शांत था। कहा जाता है कि यह पुल फ़ारसी सम्राट ज़र्क्सीस द्वारा हेल्स्पॉन्ट पर निर्मित पोंटून पुल की बराबरी करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
उद्घाटन समारोह के अवसर पर कैलिगुला ने सिकंदर महान के कथित वक्ष-कवच को धारण किया और अपने प्रिय घोड़े इंसिटेटस पर सवार होकर पुल पार किया। संभवतः इसका उद्देश्य टिबेरियस के ज्योतिषी थ्रैसिलस ऑफ़ मेंडेस की उस भविष्यवाणी को असत्य सिद्ध करना था कि कैलिगुला के सम्राट बनने की संभावना उतनी ही कम है, जितनी बैए की खाड़ी को घोड़े पर सवार होकर पार करने की।
दूसरे दिन वह सैनिकों, प्रमुख अभिजात व्यक्तियों तथा बंधकों के साथ कई बार पूरे वेग से पुल के एक छोर से दूसरे छोर तक गया। डियो इस घटना का उल्लेख सीनेट के विरुद्ध कैलिगुला के क्रोधपूर्ण भाषण के तुरंत बाद करता है। बैरेट का अनुमान है कि संभवतः कैलिगुला ने इस आयोजन से यह सिद्ध किया कि संपूर्ण सत्ता उसी के हाथों में है। यह उसकी फ़िज़ूलखर्ची का सबसे बड़ा उदाहरण है और संभवतः निरर्थक होना ही इसका वास्तविक उद्देश्य था।
जूडिया और मिस्र
कैलिगुला के शासनकाल में यहूदियों और जातीय यूनानियों के बीच तनाव बढ़ता गया। दोनों समुदाय रोमन साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बसे हुए थे, जबकि जूडिया (यहूदिया) पर रोमन अधीनस्थ राज्य (क्लाइंट किंगडम) के रूप में शासन किया जाता था। यूनानी लोग मैसेडोनियाई विजय के बाद मिस्र में बस गए थे और रोमन विजय के बाद भी वहीं बने रहे। जहाँ अलेक्ज़ेंड्रिया में यूनानियों को नागरिकता प्राप्त थी, वहीं यहूदियों को केवल निवासी (सेटलर) माना जाता था, जिनके अधिकार रोमन गवर्नरों द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों तक सीमित थे। यूनानियों को आशंका थी कि यदि यहूदियों को भी नागरिकता प्राप्त हो गई, तो उनके अपने विशेषाधिकार और सामाजिक स्थिति कमजोर हो जाएगी।
कैलिगुला ने मिस्र के प्रीफेक्ट औलुस अविलियुस फ्लैक्कुस को हटाकर अपने निजी मित्र तथा बटानिया और त्राखोनाइटिस के शासक हेरोद अग्रिप्पा प्रथम का समर्थन किया। फ्लैक्कुस पर आरोप था कि उसने कैलिगुला की माता के विरुद्ध षड्यंत्र रचा था तथा उसके मिस्र के अलगाववादियों से संबंध थे। 38 ईस्वी में कैलिगुला ने अग्रिप्पा को बिना पूर्व सूचना के अलेक्ज़ेंड्रिया भेजा, ताकि वह वहाँ की स्थिति का निरीक्षण कर सके।
फिलो के अनुसार अग्रिप्पा के इस आगमन का यूनानियों ने उपहास किया और उसे केवल ‘यहूदियों का राजा’ कहकर उसका मज़ाक उड़ाया। इसी समय यूनानी भीड़ ने यहूदी धार्मिक परंपराओं का उल्लंघन करते हुए आराधनालयों (सिनेगॉग) में कैलिगुला की मूर्तियाँ स्थापित करने तथा मंदिर निर्माण का प्रयास किया। इसके प्रत्युत्तर में फ्लैक्कुस ने यहूदियों को ‘विदेशी’ और ‘परदेसी’ घोषित करते हुए उन्हें अलेक्ज़ेंड्रिया के पाँच जिलों में से केवल एक जिले तक सीमित कर दिया, जहाँ उन्हें अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में रहना पड़ा। फिलो ने अलेक्ज़ेंड्रिया के यहूदियों पर यूनानी जनसमुदाय द्वारा किए गए अत्याचारों का विस्तार से वर्णन किया है। अंततः कैलिगुला ने इन उपद्रवों के लिए फ्लैक्कुस को उत्तरदायी ठहराया, उसे निर्वासित कर दिया और बाद में उसकी हत्या करवा दी।
39 ईस्वी में अग्रिप्पा ने अपने चाचा हेरोद एंटिपास, जो गलील और पेरेआ के टेट्रार्क थे, पर पार्थिया के सहयोग से रोमन शासन के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया। हेरोद एंटिपास ने यह आरोप स्वीकार कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप कैलिगुला ने उसे निर्वासित कर दिया और उसके प्रदेश अग्रिप्पा को पुरस्कारस्वरूप प्रदान कर दिए।
40 ईस्वी में अलेक्ज़ेंड्रिया में यहूदियों और यूनानियों के बीच पुनः दंगे भड़क उठे। जिन यहूदियों ने सम्राट की देवता के रूप में पूजा करने से इनकार किया, उन पर सम्राट का अपमान करने का आरोप लगाया गया। इसी समय यहूदी नगर जाम्निया में यूनानियों ने शाही पंथ के लिए एक वेदी बनवाई, जिसका उद्देश्य यहूदियों को उकसाना था। यहूदियों ने उसे तत्काल नष्ट कर दिया, जिसे विद्रोह का कार्य माना गया।
इसके प्रत्युत्तर में कैलिगुला ने यरूशलेम के यहूदी मंदिर में अपनी प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। रोमन दृष्टि से यह एक राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय था, किंतु यहूदियों के लिए यह उनके एकेश्वरवादी धर्म के विरुद्ध घोर ईशनिंदा थी। फिलो के अनुसार कैलिगुला यहूदियों को विशेष रूप से संदेह की दृष्टि से देखता था और मानता था कि वे उसके प्रति शत्रुतापूर्ण भाव रखते हैं।
40 ईस्वी के मई में फिलो अलेक्ज़ेंड्रिया के यहूदियों और यूनानियों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ कैलिगुला से मिला तथा उसी वर्ष 31 अगस्त के बाद हुए भीषण दंगों के समय एक दूसरे प्रतिनिधिमंडल के साथ पुनः उससे भेंट की। दोनों अवसरों पर कैलिगुला ने अपने सामान्य, मित्रवत प्रतीत होने वाले व्यंग्यपूर्ण व्यवहार का प्रदर्शन किया, जिसका लक्ष्य प्रायः यहूदी प्रतिनिधिमंडल ही होता था। उसने अपने वस्त्रों अथवा व्यवहार के माध्यम से स्वयं को देवता घोषित नहीं किया, बल्कि दूसरी भेंट के दौरान केवल व्यंग्यात्मक ढंग से यह प्रश्न किया कि यहूदियों के लिए उसकी पूजा करना इतना कठिन क्यों है। फिलो और जोसेफस दोनों ने कैलिगुला के इस व्यवहार को उसके देवत्व के दावे से प्रेरित माना और उसे यहूदी दृष्टिकोण से उसके ‘पागलपन’ के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।
जर्मनी और राइन सीमा
39 ईस्वी के अंत अथवा 40 ईस्वी की शुरुआत में कैलिगुला ने ऊपरी जर्मनी में सैन्य बल और रसद एकत्रित करने का आदेश दिया तथा एक विशाल सैन्य काफ़िले के साथ वहाँ पहुँचा, जिसमें अभिनेता, ग्लैडिएटर, महिलाएँ तथा प्रेटोरियन गार्ड की एक टुकड़ी भी सम्मिलित थी। संभवतः उसका उद्देश्य अपने पिता जर्मेनिकस और दादा के मार्ग का अनुसरण करते हुए ऊपरी राइन क्षेत्र के जर्मनिक कबीलों के विरुद्ध अभियान चलाना था। प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार वह पर्याप्त तैयारी के बिना अभियान पर निकला और भयभीत होकर लौट आया। किंतु आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उसके जर्मनिक अभियान के पीछे ठोस राजनीतिक कारण थे और संभवतः वह इसमें कुछ हद तक सफल भी रहा। फिर भी उसके अभियान के वास्तविक स्थानों और विरोधी कबीलों की निश्चित पहचान नहीं की जा सकी है। संभव है कि उसके अभियान का लक्ष्य वर्तमान हेसे तथा उसके आसपास के क्षेत्र के चट्टी अथवा ऊपरी राइन के पूर्व में रहने वाले सुएबी रहे हों।
प्राचीन स्रोतों के अनुसार कैलिगुला ने जर्मनी में अपने अभियान का उपयोग उन धनी सहयोगियों की संपत्तियाँ जब्त करने के लिए भी किया, जिन पर वह आसानी से देशद्रोह का संदेह कर सकता था। कुछ व्यक्तियों को केवल इस आधार पर मृत्युदंड दे दिया गया कि वे कथित रूप से ‘षड्यंत्र’ या ‘विद्रोह’ में सम्मिलित थे। कैलिगुला ने शाही प्रतिनिधि गेटुलिकस पर ‘घृणित षड्यंत्र’ का आरोप लगाया और उसकी हत्या करवा दी। कैसियस डियो के अनुसार उसे इसलिए भी मरवा दिया गया क्योंकि वह अपने सैनिकों में अत्यंत लोकप्रिय था।
मार्कस एमिलियस लेपिडस पर भी कैलिगुला की दो बहनों—एग्रीपिना और लिविला के साथ षड्यंत्र में सम्मिलित होने का आरोप लगाया गया। लेपिडस को मृत्युदंड दिया गया तथा कैलिगुला की दोनों बहनों को व्यभिचार के आरोप में दोषी ठहराकर निर्वासित कर दिया गया।
इस नवीनतम षड्यंत्र के दमन पर सम्राट को बधाई देने के लिए कैलिगुला के चाचा क्लॉडियस के नेतृत्व में रोम से एक सीनेटीय प्रतिनिधिमंडल आया, जिसका शत्रुतापूर्ण स्वागत किया गया। एक विवरण के अनुसार क्लॉडियस को राइन नदी में धकेल दिया गया, यद्यपि यह संभव है कि यह गॉल में उस शीतकाल के दौरान कैलिगुला द्वारा आयोजित लैटिन और यूनानी वक्तृत्व प्रतियोगिता में पराजित होने वालों को मिलने वाला प्रतीकात्मक दंड रहा हो।
उत्तर से लौटने के बाद कैलिगुला ने ऑगस्टस द्वारा आरंभ की गई थिएटर में बैठने की उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया, जिसके अनुसार सामाजिक पद और प्रतिष्ठा के आधार पर स्थान निर्धारित किए जाते थे। इसके परिणामस्वरूप सभी के लिए बैठने की व्यवस्था स्वतंत्र कर दी गई और स्थान भाग्य अथवा पहले पहुँचने के आधार पर मिलने लगे। परिणामस्वरूप सीनेटरों और सामान्य नागरिकों के बीच श्रेष्ठ स्थानों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गए, जिससे कैलिगुला को विशेष आनंद मिला।
अपने शासनकाल के अंतिम चरण में संभवतः मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व कैलिगुला ने उत्तर में अपने सैन्य अभियानों तथा लेपिडस के दमन के बाद रोम में अपने प्रस्तावित विजय-प्रवेश की तैयारी के संबंध में एक आधिकारिक घोषणा जारी की। इस घोषणा में उसने सीनेट अथवा सीनेटरों का कोई उल्लेख नहीं किया, क्योंकि इस समय तक वह उन पर निरंतर संदेह करने लगा था।
नीलामियाँ
39 ईस्वी के उत्तरार्ध में कैलिगुला ने गॉल के लुगडुनम (वर्तमान ल्योन) में शीतकाल व्यतीत किया, जहाँ उसने अपनी बहनों की चल संपत्ति की नीलामी करवाई। इन संपत्तियों में आभूषण, दास तथा मुक्तदास भी सम्मिलित थे। कैसियस डियो के अनुसार इन नीलामियों में धनी बोलीदाता वस्तुओं के वास्तविक मूल्य से कहीं अधिक बोली लगाते थे। कुछ ऐसा अपनी सम्राट के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने के लिए करते थे, जबकि कुछ अपनी अत्यधिक संपत्ति का प्रदर्शन कम करना चाहते थे, जिससे उन पर राजद्रोह का संदेह न हो। डियो का यह भी दावा है कि कैलिगुला ने नीलामी की कीमतें बढ़ाने के लिए भय, दबाव तथा विभिन्न युक्तियों का सहारा लिया। पहली नीलामी से प्राप्त भारी आय के बाद उसने रोम स्थित अपने महल की अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ, जिनमें शाही परिवार की पैतृक धरोहरें भी शामिल थीं, लुगडुनम मँगवाकर नीलाम कर दीं। नीलामी के दौरान वह स्वयं प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति तथा उसके शाही संबंध का उल्लेख करता था, जिससे उनका मूल्य और बढ़ जाता था तथा धनी खरीदार उन्हें उत्साहपूर्वक खरीदते थे।
दूसरी नीलामी से अपेक्षाकृत कम आय प्राप्त हुई। इस नीलामी में विक्रेता और नीलामीकर्ता के रूप में कैलिगुला का व्यवहार उस पारंपरिक तानाशाही छवि से भिन्न था, जो प्राचीन स्रोतों में उसके संबंध में प्रस्तुत की जाती है। शाही संपत्ति की नीलामी रोमन राज्य की वित्तीय व्यवस्था में एक स्वीकृत उपाय थी, जिसका उपयोग इससे पूर्व ऑगस्टस तथा बाद में ट्राजन ने भी किया था। ऐसी नीलामियों का उद्देश्य राज्य की आय को बढ़ाना तथा खरीदार और विक्रेता दोनों के लिए लाभकारी लेन-देन सुनिश्चित करना था। यद्यपि रोमन समाज में नीलामीकर्ताओं को विशेष सम्मान प्राप्त नहीं था, फिर भी इस अवसर पर कैलिगुला ने बिना किसी द्वेष, लालच या भय के अपेक्षाकृत उदार शासक का व्यवहार प्रदर्शित किया।
ब्रिटानिया
40 ईस्वी के वसंत में कैलिगुला ने ब्रिटानिया में रोमन प्रभुत्व का विस्तार करने का प्रयास किया और इसके लिए दो सेनाओं का गठन किया गया, जिनका नाम संभवतः कैलिगुला की नवजात पुत्री के सम्मान में प्रिमिजेनिया रखा गया था। प्राचीन स्रोतों के अनुसार कैलिगुला या तो आक्रमण करने से भयभीत था अथवा उसका व्यवहार असामान्य था; किंतु अपनी ही सेना को दंडित करने की उसकी धमकियों से विद्रोह की संभावना का भी संकेत मिलता है। यह निश्चित रूप से कहना असंभव है कि सेना ने आक्रमण क्यों नहीं किया। विद्रोह की संभावना के अतिरिक्त यह भी संभव है कि ब्रिटिश सरदारों ने रोम की शर्तें स्वीकार कर ली हों, जिससे युद्ध का औचित्य ही समाप्त हो गया हो। एक अन्य मत के अनुसार यह केवल एक सैन्य अभ्यास और टोही अभियान था अथवा ब्रिटिश सरदार एडमिनियस के आत्मसमर्पण को स्वीकार करने के उद्देश्य से चलाया गया सीमित अभियान था।
सुएटोनियस के अनुसार कैलिगुला ने अपने सैनिकों को ‘समुद्र की लूट’ के रूप में समुद्र तट से सीपियाँ एकत्र करने का आदेश दिया। कुछ विद्वानों का मत है कि ‘मस्कुली’ शब्द का गलत अर्थ लगाया गया है, जिसका आशय घेराबंदी में प्रयुक्त सैन्य यंत्रों से भी हो सकता है। ब्रिटानिया पर वास्तविक रोमन विजय अंततः कैलिगुला के उत्तराधिकारी क्लॉडियस के शासनकाल में प्राप्त हुई।
मॉरिटानिया
40 ईस्वी में कैलिगुला ने मॉरिटानिया पर अधिकार कर लिया, जो रोम का एक समृद्ध तथा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्लाइंट राज्य था। वहाँ बड़ी संख्या में स्वतंत्र एवं घुमंतू जनजातियाँ निवास करती थीं, जो रोमीकरण का विरोध करती थीं। इसके शासक मॉरिटानिया के टॉलेमी, जुबा द्वितीय के समृद्ध वंशज थे। उसे लोकप्रिय, अत्यंत धनी, किंतु ‘निष्क्रिय और अयोग्य’ शासक माना जाता था। टॉलेमी विद्रोहों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में असफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप उसे पदच्युत कर दिया गया। सामान्यतः अयोग्य क्लाइंट राजाओं को सेवानिवृत्ति अथवा आरामदायक निर्वासन दिया जाता था, किंतु कैलिगुला ने टॉलेमी को रोम बुलाकर 40 ईस्वी के वसंत में उसकी हत्या करवा दी। उसके हटाए जाने से मॉरिटानिया में व्यापक असंतोष फैल गया और विद्रोह भड़क उठा।
प्लिनी का दावा है कि विद्रोह कैलिगुला के इस निर्णय का प्रत्यक्ष परिणाम था, जबकि कैसियस डियो के अनुसार विद्रोह को 42 ईस्वी में अर्थात् कैलिगुला की मृत्यु के बाद गायुस सुएटोनियस पॉलिनस और ग्नायस होसिडियस गेटा ने दबाया था। इस विरोधाभास से संकेत मिलता है कि संभवतः कैलिगुला ने प्रांत-विभाजन का निर्णय तो ले लिया था, किंतु विद्रोह के कारण उसका पूर्ण कार्यान्वयन कुछ समय के लिए स्थगित हो गया। संयुक्त प्रांतों के प्रथम ज्ञात अश्वारोही गवर्नर मार्कस फेडियस सेलेर फ्लावियानुस थे, जो 44 ईस्वी में इस पद पर थे।
39–44 ईस्वी के मॉरिटानियाई घटनाक्रम का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। डियो और टैसिटस का मत है कि कैलिगुला ने यह कदम संभवतः भय, ईर्ष्या अथवा उत्तर में अपने असफल सैन्य अभियानों की भरपाई के उद्देश्य से उठाया था, न कि किसी वास्तविक सैन्य या आर्थिक आवश्यकता के कारण। दूसरी ओर, टैकफारिनास के विद्रोह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अफ्रीका प्रोकोन्सुलारिस का पश्चिमी भाग कितना असुरक्षित था तथा मॉरिटानिया के क्लाइंट शासक उसकी पर्याप्त रक्षा करने में असमर्थ थे। इसलिए यह भी संभव है कि कैलिगुला का यह विस्तार भविष्य के संभावित खतरों का दूरदर्शी तथा अंततः सफल उत्तर था।
धर्म
इतिहासकार बैरेट के अनुसार ‘अपने संक्षिप्त शासनकाल में कैलिगुला के सभी विचित्र और प्रदर्शनप्रिय व्यवहारों में से किसी ने भी उसके पागलपन की धारणा को उतना सुदृढ़ नहीं किया, जितना स्वयं को देवता के रूप में स्वीकार किए जाने की उसकी स्पष्ट इच्छा ने किया।’
कैलिगुला के समकालीन लेखक फिलो के अनुसार वह स्वयं को विभिन्न नायकों और देवताओं के रूप में अलंकृत करता था। इनमें डायोनिसोस, हेराक्लीज़ तथा डायोस्कुरी (जुड़वाँ देवता कैस्टर एवं पोलक्स) जैसे अर्द्धदेवताओं से लेकर मर्करी, वीनस और अपोलो जैसे प्रमुख देवता भी सम्मिलित थे। फिलो ने इन रूपों का उल्लेख निजी पैंटोमाइम अथवा रंगमंचीय प्रस्तुतियों के संदर्भ में किया है, जिन्हें उसने अपनी राजनयिक यात्रा के दौरान देखा अथवा जिनके विषय में सुना था। फिलो के अनुसार कैलिगुला स्वयं को जीवित देवता के रूप में पूजित कराना चाहता था और एक यहूदी तथा एकेश्वरवादी होने के कारण उसने इसे कैलिगुला के पागलपन का प्रमाण माना है।
कैलिगुला के इस प्रकार के अभिनय का एक पूर्व उदाहरण ऑगस्टस के शासनकाल में भी मिलता है। एक बार भोज में ऑगस्टस और उसके अतिथि ओलंपियन देवताओं के रूप में सुसज्जित हुए थे, जिसमें ऑगस्टस ने अपोलो का रूप धारण किया था। किंतु इससे किसी ने उसे पागल नहीं माना और न ही उसने स्वयं को उस देवता का वास्तविक अवतार बताया। इसे देवताओं के प्रति लगभग ईशनिंदात्मक असम्मान तथा सामान्य जनता के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण माना गया, क्योंकि यह भोज अकाल के समय आयोजित किया गया था। प्रारंभिक 20 ईसा पूर्व के कुछ आधिकारिक रोमन सिक्कों पर ऑक्टेवियन को अपोलो, जुपिटर तथा नेपच्यून के रूप में भी चित्रित किया गया था, किंतु इसे भी बाद में दोहराया नहीं गया।
संभवतः कैलिगुला स्वयं भी इन रूपों को उतनी गंभीरता से नहीं लेता था, जितनी गंभीरता फिलो ने दिखाई है। कैसियस डियो के अनुसार एक अवसर पर जब एक गॉल निवासी मोची ने कैलिगुला को जुपिटर के वेश में ऊँचे मंच से भविष्यवाणी करते देखा, तो वह हँस पड़ा। कैलिगुला ने उससे पूछा, “तुम मुझे क्या समझते हो?” मोची ने उत्तर दिया, ‘मूर्ख।’ ऐसा लगता है कि कैलिगुला ने उसकी स्पष्टवादिता की सराहना की।
डियो का दावा है कि कैलिगुला अनेक स्त्रियों को आकर्षित करने के उद्देश्य से जुपिटर का रूप धारण करता था। वह कभी-कभी सार्वजनिक अवसरों पर स्वयं को देवता भी कहता था तथा कुछ अभिलेखों में उसे ‘जुपिटर’ कहकर संबोधित किया गया। रोम के सर्वोच्च देवता जुपिटर के प्रति कैलिगुला की विशेष रुचि की पुष्टि अन्य स्रोतों से भी होती है। इतिहासकार सिम्पसन का मत है कि संभवतः कैलिगुला स्वयं को जुपिटर का समकक्ष, यहाँ तक कि उसका प्रतिद्वंद्वी मानता था।
इताई ग्रैडेल के अनुसार विभिन्न देवताओं के रूप में कैलिगुला का प्रदर्शन मुख्यतः उसके प्रदर्शनप्रिय स्वभाव तथा लोगों को चकित करने की प्रवृत्ति का परिणाम था। सम्राट होने के कारण वह ‘पोंटिफ़ेक्स मैक्सिमस’ भी था, जो रोम का सर्वोच्च राजकीय पुरोहित पद था। रोम के पूर्वी सहयोगी तथा आश्रित राज्यों में जीवित शासकों को देवतुल्य सम्मान प्रदान करना एक सामान्य परंपरा थी। अपने पूर्वी दौरे के दौरान जर्मेनिकस, एग्रीपिना तथा उनके बच्चों, जिनमें कैलिगुला भी सम्मिलित था, को यूनानी पूर्व के अनेक नगरों में जीवित देवताओं के समान सम्मान प्रदान किया गया था।
रोमन परंपरा में कोई भी आश्रित अपने संरक्षक की प्रशंसा करते हुए उसे ‘पृथ्वी पर जुपिटर’ कह सकता था और इसके लिए उसे कोई दंड नहीं दिया जाता था। डिवी अर्थात् शाही परिवार के वे दिवंगत सदस्य, जिन्हें सीनेट द्वारा औपचारिक रूप से देवत्व प्रदान किया जाता था, उनके लिए पुरोहित नियुक्त किए जाते थे तथा राजकीय व्यय पर उनका पंथ स्थापित किया जाता था। सिसरो जीवित जूलियस सीज़र को देवतुल्य सम्मान दिए जाने का विरोध कर सकता था, किंतु कैटिलाइन के षड्यंत्र के विरुद्ध सहायता के लिए उसने पब्लियुस लेंटुलुस को ‘पिता और देवता’ (पारेन्स आक देउस) कहकर संबोधित किया था। दैनिक जीवन में संरक्षकों, परिवार-प्रमुखों तथा प्रभावशाली व्यक्तियों को उनके आश्रितों द्वारा विशेष सम्मान देना भी सामान्य सामाजिक परंपरा थी। 30 ईसा पूर्व से ऑक्टेवियन (ऑगस्टस) के जीनियस को सार्वजनिक एवं निजी भोजों में अर्घ्य अर्पित करना एक कर्तव्य माना जाने लगा तथा 12 ईसा पूर्व से जीवित सम्राट के नाम पर राजकीय शपथ भी ली जाने लगी।
यद्यपि कैसियस डियो का दावा है कि रोम में जीवित सम्राटों की पूजा निषिद्ध थी, फिर भी ऑगस्टस के जीवनकाल में इटली तथा अन्य क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर संगठित और वित्तपोषित सम्राट पूजा के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं किसी भी रोमन नागरिक पर अपने सम्राट के लिए बलि चढ़ाने के कारण कभी कोई अभियोग नहीं चलाया गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि कैलिगुला अपने धार्मिक कर्तव्यों को अत्यंत गंभीरता से लेता था। उसने लेक नेमी में देवी डायना के वृद्ध पुजारी के स्थान पर नए पुजारी की नियुक्ति कराई, साली (मंगल देव के पुजारियों) का पुनर्गठन किया तथा इस बात पर विशेष बल दिया कि जुपिटर के प्रधान पुजारी फ्लामेन डियालिस के लिए किसी भी प्रकार की शपथ लेना नेफास (धार्मिक दृष्टि से अनुचित) माना जाता था; अतः वह सम्राट के प्रति निष्ठा की शपथ नहीं ले सकता था।
कैलिगुला एशिया माइनर के डिडिमा स्थित अपोलो के भव्य किंतु अधूरे मंदिर को अपने शाही पंथ के लिए अधिग्रहित कर उसमें अपना स्थान स्थापित करना चाहता था। इसके लिए संभवतः उसकी प्रतिमा भी तैयार कर ली गई थी, किंतु उसे कभी स्थापित नहीं किया गया। लगभग एक शताब्दी बाद जब इतिहासकार एवं भूगोलवेत्ता पॉसानियास ने उस मंदिर का भ्रमण किया, तब वहाँ की आराध्य प्रतिमा अपोलो की ही थी। इसी काल की एक प्रतिमा में कैलिगुला को पोंटिफ़ेक्स मैक्सिमस के रूप में भी दिखाया गया है।
सुएटोनियस तथा कैसियस डियो दोनों ने रोम में कैलिगुला के एक मंदिर का उल्लेख किया है। अधिकांश आधुनिक विद्वानों का मत है कि यदि ऐसा कोई मंदिर वास्तव में था, तो वह संभवतः पैलेटाइन पहाड़ी पर रहा होगा। ऑगस्टस ने पहले ही कैस्टर और पोलक्स के मंदिर को अपने पैलेटाइन स्थित शाही निवास से जोड़ दिया था तथा सेवीरी ऑगस्टालेस नामक एक आधिकारिक पुजारी-वर्ग की स्थापना की थी, जिनका कार्य जीनियस ऑगुस्टी (सम्राट की संरक्षक आत्मा) तथा लारेस की उपासना करना था।
डियो के अनुसार कैलिगुला स्वयं जुपिटर लैटियारिस के वेश में कैस्टर और पोलक्स की प्रतिमाओं के बीच बैठकर पूजा व्यंग्यपूर्वक उन्हें अपना द्वारपाल कहता था। डियो का यह भी दावा है कि रोम में कैलिगुला के लिए दो मंदिर बनाए गए थे, किंतु इसकी पुष्टि नहीं होती।
रोम में यूनानी नगर-राज्यों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कैलिगुला का स्वागत ‘नए देवता ऑगस्टस’ के रूप में किया। यूनानी नगर साइज़िकस में उसे ‘नव सूर्य’ की उपाधि प्रदान की गई, जहाँ उसे सूर्यदेव के प्रकाशमय मुकुट के साथ अथवा उसके दिव्य पूर्वज डिवस ऑगस्टस के रूप में चित्रित किया गया। इसके विपरीत, अन्य आधिकारिक सिक्कों पर कैलिगुला की छवि में इस प्रकार के स्पष्ट दैवीकरण का कोई संकेत नहीं मिलता है।
राज्य के प्रमुख देवताओं की पूर्ण विकसित उपासना की तुलना में जीनियस पंथ का महत्त्व अपेक्षाकृत सीमित था। ऑगस्टस की मृत्यु के बाद उसे आधिकारिक रूप से डिवस (देवत्व-प्राप्त शासक) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। उसके उत्तराधिकारी टिबेरियस ने रोम में अपने निजी पंथ को अस्वीकार कर दिया, संभवतः इसलिए कि जूलियस सीज़र की जीवित देवता के रूप में प्रतिष्ठा के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। ऑगस्टस तथा टिबेरियस दोनों का सिद्धांत था कि यदि किसी प्रांत का स्थानीय अभिजात वर्ग उनके सम्मान में मंदिर बनाना चाहे, तो वह सम्राट के साथ-साथ सीनेट के जीनियस, रोमन जनता अथवा स्वयं रोम के जीनियस को भी समर्पित किया जाए।
डियो के अनुसार कैलिगुला ने अपने अनौपचारिक जीनियस पंथ के लिए सबसे धनी अभिजात व्यक्तियों को प्रति व्यक्ति एक करोड़ (10 मिलियन) सेस्टर्स लेकर पुजारी पद बेचा तथा तत्काल भुगतान न कर सकने वालों को ऋण भी प्रदान किया। उसके अनुसार इन पुजारियों में उसकी पत्नी कैसोनिया तथा उसके चाचा क्लॉडियस भी थे, जो इस व्यय के कारण लगभग दिवालिया हो गए।
अपने पूरे शासनकाल में कैलिगुला रोम तथा साम्राज्य के सामान्य लोगों के बीच लोकप्रिय बना रहा। इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि उसने रोमन अथवा अन्य देवताओं को हटाकर स्वयं को स्थापित करने का प्रयास किया हो अथवा ऐसा करने की धमकी दी हो। इस प्रकार के अधिकांश विवरण उसके जीवनीकारों की शत्रुतापूर्ण कथाओं पर आधारित हैं। बैरेट के अनुसार ‘भौतिक साक्ष्यों का स्पष्ट और निर्विवाद संदेश यह है कि कैलिगुला नहीं चाहता था कि संसार उसे देवता के रूप में माने, यद्यपि अधिकांश लोगों की भाँति उसे भी देवतुल्य सम्मान प्राप्त होना प्रिय था।’
उसने स्वयं को जीवित देवता के रूप में पूजने की स्पष्ट माँग नहीं की; किंतु जहाँ उसे ऐसी पूजा अर्पित की गई, वहाँ उसने उसे स्वीकार किया। ऑगस्टस और टिबेरियस की परंपरा का अनुसरण करते हुए वह प्रत्यक्ष रूप से दैवी सम्मान को अस्वीकार करता था, किंतु उसे अर्पित करने वालों के प्रति आभार व्यक्त करता था, जिससे उनका सम्मान बना रहता था।
ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने जीनियस पंथ को अत्यंत गंभीरता से लेता था; किंतु उसका सबसे बड़ा दोष यह था कि वह जानबूझकर प्रत्येक प्रभावशाली व्यक्ति का सार्वजनिक अपमान करता था। अंततः इसी प्रवृत्ति ने उन सैन्य अधिकारियों को भी उसके विरुद्ध कर दिया, जिन्होंने उसकी हत्या कर दी।
हत्या और उसके बाद की घटनाएँ
24 जनवरी 41 ईस्वी को अलेक्ज़ेंड्रिया के लिए निर्धारित प्रस्थान से एक दिन पूर्व कैलिगुला की हत्या प्रेटोरियन ट्रिब्यून कैसियस कैरेआ, कॉर्नेलियस सबिनस तथा कुछ सेंचुरियनों ने मिलकर कर दी। जोसेफस ने इस षड्यंत्र में कैलिगुला के अनेक निकटस्थ व्यक्तियों को सम्मिलित बताया है, जबकि कैसियस डियो का विवरण संभवतः सीनेटर वर्ग की परंपरा पर आधारित है, जिसमें कई अन्य व्यक्तियों के नामों का भी उल्लेख मिलता है। किंतु अधिक संभावना यही है कि षड्यंत्रकारियों की संख्या सीमित थी और सभी का परस्पर प्रत्यक्ष संपर्क होना आवश्यक नहीं था। इससे पूर्व भी कई षड्यंत्र असफल हो चुके थे, क्योंकि सहभागी यातना, उसके भय अथवा पुरस्कार के लालच में अपने साथियों के विरुद्ध साक्ष्य दे देते थे। सीनेट स्वयं स्वार्थी, संपन्न और परस्पर अविश्वासी अभिजात वर्ग का विभाजित निकाय था, जो अपने हितों को जोखिम में डालकर संगठित रूप से कार्य करने के लिए तैयार नहीं था।
जोसेफस के अनुसार कैसियस कैरेआ एक आदर्शवादी व्यक्ति था, जो गणतांत्रिक स्वतंत्रता के प्रति गहरी निष्ठा रखता था। साथ ही, वह कैलिगुला द्वारा निरंतर किए जाने वाले व्यक्तिगत अपमान और उपहास से भी अत्यंत क्षुब्ध था। सुएटोनियस तथा अन्य स्रोतों के अनुसार कैलिगुला प्रायः उसे ‘प्रियापस’ अथवा ‘वीनस’ जैसे व्यंग्यात्मक संबोधनों से पुकारता था, जिनका संबंध उसकी पतली और ऊँची आवाज़, कर-संग्रह के समय उसके अपेक्षाकृत कोमल व्यवहार अथवा वेश्याओं से कर वसूलने के उसके दायित्व से जोड़ा जाता था। कैरेआ, सबिनस और उनके साथियों ने कैलिगुला पर उस समय आक्रमण किया, जब वह डिवस ऑगस्टस के सम्मान में आयोजित खेलों और नाट्य-प्रदर्शनों के दौरान महल के नीचे युवा अभिनेताओं के एक दल को संबोधित कर रहा था। स्रोतों से पता चलता है कि पहला प्रहार कैरेआ ने ही किया था। घटना जिस संकरे मार्ग में हुई, वहाँ कैलिगुला के लिए भाग निकलना लगभग असंभव था। जब तक उसके निष्ठावान जर्मनिक अंगरक्षक सहायता के लिए पहुँचे, तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने वहाँ उपस्थित अनेक व्यक्तियों की हत्या कर दी, जिनमें कुछ निर्दोष सीनेटर और अन्य दर्शक भी सम्मिलित थे। अंततः प्रेटोरियन गार्ड ने हस्तक्षेप कर स्थिति पर नियंत्रण स्थापित किया।
हत्या के बाद षड्यंत्रकारियों को आशंका थी कि कैलिगुला का परिवार अथवा उसके समर्थक प्रतिशोध ले सकते हैं। इसलिए उन्होंने उसकी पत्नी कैसोनिया तथा उसकी अल्पायु पुत्री जूलिया ड्रूसिला की भी हत्या कर दी, किंतु वे कैलिगुला के चाचा क्लॉडियस तक नहीं पहुँच सके। परंपरागत विवरण के अनुसार एक सैनिक ग्रेटस ने क्लॉडियस को महल के एक पर्दे के पीछे छिपा हुआ पाया। प्रेटोरियन गार्ड के सैनिक उसे गुप्त रूप से अपने शिविर में ले गए और वहीं उसे सम्राट घोषित कर दिया। बाद में सीनेट ने भी इस निर्णय की पुष्टि कर दी। कैलिगुला के प्रभावशाली मुक्तदास कैलिस्टस ने संभवतः उत्तराधिकार की यह व्यवस्था पहले ही सुनिश्चित कर ली थी और कैलिगुला के जीवनकाल में ही अपनी निष्ठा गुप्त रूप से क्लॉडियस के पक्ष में स्थानांतरित कर दी थी।
कैलिगुला की हत्या विधिक दृष्टि से अवैध थी और वस्तुतः राजहत्या के समान थी, क्योंकि षड्यंत्रकारियों ने उसके प्रति ली गई निष्ठा की शपथ का उल्लंघन किया था। क्लॉडियस अपने पूर्ववर्ती की त्रुटियों को स्वीकार कर सकता था, किंतु उसकी हत्या को वैध नहीं ठहरा सकता था और न ही प्रिंसिपेट की संस्था को दोषपूर्ण घोषित कर सकता था। कैलिगुला सामान्य रोमन जनता के बीच अब भी पर्याप्त लोकप्रिय था और सीनेट भी इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकती थी। क्लॉडियस ने एक नए प्रेटोरियन प्रीफेक्ट की नियुक्ति की तथा कैसियस कैरेआ, ल्यूपस नामक एक ट्रिब्यून और षड्यंत्र में सम्मिलित सेंचुरियनों को मृत्युदंड दिलाया, जबकि कॉर्नेलियस सबिनस को आत्महत्या करने की अनुमति प्रदान की गई।
क्लॉडियस ने सीनेट के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, जिसमें कैलिगुला को औपचारिक रूप से होस्टिस अर्थात् ‘राज्य का सार्वजनिक शत्रु’ घोषित करने अथवा उसकी स्मृति की औपचारिक निंदा करने की माँग की गई थी। उसने सभी सीज़रों की सामूहिक निंदा तथा उनके मंदिरों के ध्वंस के प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया। यद्यपि शपथ-पत्रों और समर्पण संबंधी आधिकारिक अभिलेखों से कैलिगुला का नाम हटा दिया गया, अनेक शिलालेख मिटा दिए गए अथवा परिवर्तित कर दिए गए तथा उसकी अधिकांश मूर्तियों के सिर पुनः तराशकर उन्हें ऑगस्टस, क्लॉडियस अथवा एक मामले में नीरो के समान बना दिया गया। सुएटोनियस के अनुसार कैलिगुला के शव को प्रारंभ में केवल घास-फूस से ढँककर अस्थायी रूप से दफना दिया गया था। बाद में उसकी बहनों ने उसका अंतिम संस्कार कराया तथा उसकी अस्थियों का विधिवत् दाह-संस्कार और दफ़न कराया।
कैलिगुला का निजी जीवन
कैलिगुला का बचपन संभवतः दुर्बल स्वास्थ्य में बीता। 14 ईस्वी में जब ऑगस्टस उसके माता-पिता से मिलने उत्तरी प्रांतों की यात्रा पर गया, तो वह अपने साथ दो चिकित्सकों को भी ले गया था। सुएटोनियस का अनुमान है कि कैलिगुला को बचपन में मिर्गी जैसे दौरे पड़ते थे। बैरेट के अनुसार वह अत्यधिक तनावग्रस्त और चिंतित स्वभाव का व्यक्ति था। सार्वजनिक भाषण देते समय वह अत्यधिक उत्तेजित हो जाता, इधर-उधर टहलने लगता और अपने विचारों के प्रवाह में बह जाता था, यद्यपि वह एक प्रभावशाली वक्ता था।
38 ईस्वी में वह एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त हुआ, जो संभवतः अत्यधिक भोजन, मद्यपान, विलासिता तथा मानसिक तनाव से उत्पन्न स्नायविक विकार का परिणाम थी। इस बीमारी के बाद कैलिगुला का बाहरी संयम समाप्त हो गया और उसकी अंतर्निहित क्रूरता तथा निर्दयता खुलकर सामने आ गई, जिसका उदाहरण उसके ससुर मार्कस जूनियस सिलानुस तथा उसके चचेरे भाई टिबेरियस गेमेल्लुस की हत्या में देखा जा सकता है।
कैलिगुला के यौन जीवन के संबंध में प्राचीन स्रोतों में अनेक परस्पर विरोधी कथाएँ मिलती हैं। सेनेका का दावा है कि एक सार्वजनिक भोज में उसने अपने घनिष्ठ मित्र सीनेटर डेसिमस वैलेरियस एशियाटिकस का उसकी पत्नी के साथ उसके कथित यौन व्यवहार का सार्वजनिक उपहास उड़ाकर अपमान किया था। प्राचीन लेखकों ने कैलिगुला के अनेक प्रेम-संबंधों तथा उसकी उपपत्नियों और पुरुष प्रेमियों का भी उल्लेख किया है। किंतु इतिहासकार बैरेट का मत है कि इन कथाओं का अधिकांश भाग अतिरंजित प्रतीत होता है। सम्राट बनने के बाद कैलिगुला ने टिबेरियस द्वारा कैप्री द्वीप पर रखे गए कथित स्पिन्ट्रिया (यौन सेवकों) को वहाँ से हटवा दिया था, जो उसके अत्यधिक विलासी होने की प्रचलित धारणा से मेल नहीं खाता।
कैलिगुला की पहली पत्नी जूनिया क्लाउडिया थी, जो पूर्व कौंसल मार्कस जूनियस सिलानुस की पुत्री थी। रोम के उच्चवर्ग की अधिकांश शादियों की भाँति यह भी एक राजनीतिक गठबंधन था, जिसका उद्देश्य वैध उत्तराधिकारी उत्पन्न करना तथा जूलियो-क्लॉडियन वंश की निरंतरता सुनिश्चित करना था। विवाह के एक वर्ष से भी कम समय में जूनिया तथा उसके नवजात शिशु की प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई। इसके तुरंत बाद प्रेटोरियन प्रीफेक्ट नैवियस सुटोरियस मैक्रो ने संभवतः उसके शोक को कम करने के उद्देश्य से अपनी पत्नी एनिया थ्रैसिला को कैलिगुला के निकट आने के लिए प्रेरित किया। कैलिगुला का संभवतः एक विवाह लिविया ओरेस्टिला से हुआ था, यद्यपि कुछ इतिहासकार इस विवाह को केवल एक मद्यपान-समारोह के दौरान घटित नाटकीय प्रसंग मानते हैं, वैधानिक विवाह नहीं।
कैलिगुला का अंतिम विवाह कैसोनिया से हुआ, जो अत्यंत धनी, प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध महिला थी। प्राचीन स्रोत उसे सुंदर और संपन्न बताते हैं। कैलिगुला उसके प्रति अत्यंत अनुरक्त था और उससे एक पुत्री उत्पन्न हुई, जिसका नाम उसने अपनी दिवंगत बहन की स्मृति में जूलिया ड्रूसिला रखा था।
कैलिगुला और उसकी बहनों, विशेषकर ड्रूसिला के बीच अनाचार (इंसेस्ट) के आरोप सुएटोनियस से पूर्व किसी भी प्राचीन लेखक नहीं लगाए। स्वयं सुएटोनियस भी स्वीकार करता है कि यह केवल प्रचलित अफवाहें थीं। कैलिगुला के समकालीन सेनेका और फिलो भी इन आरोपों का उल्लेख नहीं करते। यह सही है कि कैलिगुला अपनी सबसे छोटी बहन ड्रूसिला से अत्यधिक स्नेह करता था, किंतु बाद के लेखकों ने उसकी ‘पागल सम्राट’ की छवि को और सुदृढ़ करने के लिए उस पर अनाचार के आरोप आरोपित कर दिए।
मानसिक स्थिति
कैलिगुला के जीवनकाल में उसके मानसिक रूप से विक्षिप्त होने का कोई निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यदि वह वास्तव में मानसिक रोग से ग्रस्त होता, तो रोमन विधि के अनुसार उसे अपने कार्यों के लिए पूर्णतः उत्तरदायी नहीं माना जाता। इसलिए अधिकांश आधुनिक इतिहासकार उसके व्यवहार की व्याख्या केवल ‘पागलपन’ के आधार पर नहीं करते, बल्कि उसका विश्लेषण राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भों में करते हैं। इतिहासकार बैरेट के अनुसार बचपन में माता-पिता और अन्य निकट संबंधियों की मृत्यु से उसके व्यक्तित्व में गहरी असुरक्षा विकसित हुई, जबकि सम्राट बनने के बाद प्राप्त असीमित सत्ता ने उसके अहंकार, शक्ति-प्रदर्शन और क्रूर हास्यबोध को और अधिक प्रबल कर दिया।
फिलो ने 37 ईस्वी की उसकी गंभीर बीमारी को स्नायविक मानसिक पतन का परिणाम माना है, जबकि कुछ आधुनिक विद्वानों ने मिर्गी सहित अन्य चिकित्सीय संभावनाएँ भी प्रस्तुत की हैं। किंतु इन पर कोई सर्वसम्मति नहीं है। इसी प्रकार देवी सेलेने से उसके संवाद अथवा सुएटोनियस द्वारा उसके शारीरिक रूप के नकारात्मक वर्णन को भी अधिकांश आधुनिक इतिहासकार ऐतिहासिक तथ्य के बजाय विरोधी साहित्यिक परंपरा और राजनीतिक प्रचार का परिणाम मानते हैं।
स्रोत
कैलिगुला के शासनकाल के अधिकांश समकालीन अभिलेख और ऐतिहासिक विवरण नष्ट हो चुके हैं, इसलिए उसके शासन का पुनर्निर्माण मुख्यतः बाद के लेखकों की रचनाओं पर आधारित है। प्रमुख स्रोतों में सुएटोनियस, कैसियस डियो, फिलो, सेनेका और जोसेफस की कृतियाँ सम्मिलित हैं, जिनमें प्रत्येक का अपना विशिष्ट दृष्टिकोण और पूर्वाग्रह है। टैसिटस तथा अन्य समकालीन इतिहासकारों की अनेक कृतियाँ अब उपलब्ध नहीं हैं और उनके बारे में केवल बाद के लेखकों के माध्यम से जानकारी मिलती है। चूँकि उपलब्ध अधिकांश स्रोत कैलिगुला की मृत्यु के कई दशकों बाद लिखे गए तथा उनके लेखक प्रायः रोमन अभिजात वर्ग या सीनेट से जुड़े थे, इसलिए आधुनिक इतिहासकारों के लिए उनका आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक है।
इस प्रकार कैलिगुला का चार वर्षीय शासनकाल (37–41 ई.) रोमन इतिहास के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक है। उसके शासन में एक ओर व्यापक निर्माण कार्य, प्रशासनिक हस्तक्षेप, सीमांत क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियाँ तथा राजसत्ता के केंद्रीकरण के प्रयास दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर निरंकुशता, आर्थिक दबाव, अभिजात वर्ग के साथ संघर्ष तथा राजनीतिक दमन भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। उसके व्यक्तित्व और शासन का अधिकांश चित्रण सुएटोनियस, कैसियस डियो तथा अन्य प्राचीन लेखकों के माध्यम से प्राप्त होता है, जिनके विवरणों में पूर्वाग्रह और अतिरंजना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए कैलिगुला को केवल एक ‘पागल अत्याचारी’ के रूप में देखना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाना चाहिए। वस्तुतः उसका शासन रोमन साम्राज्य में सम्राट, सीनेट, सेना और प्रांतीय समाज के बीच शक्ति-संतुलन के तीव्र संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। उसकी हत्या ने न केवल उसके शासन का अंत किया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि रोमन साम्राज्य में सम्राट की निरंकुश शक्ति भी सेना और राजनीतिक अभिजात वर्ग के सहयोग पर ही निर्भर थी।




