ईसाई धर्म (Christianity)

ईसाई धर्म (Christianity)
ईसाई धर्म मुख्य लेख : रोमन सभ्यता ईसाई धर्म एक अब्राहमिक और एकेश्वरवादी धर्म है, […]

ईसाई धर्म

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मुख्य लेख : रोमन सभ्यता

ईसाई धर्म एक अब्राहमिक और एकेश्वरवादी धर्म है, जो बाइबिल तथा यीशु मसीह की शिक्षाओं पर आधारित है। ईसाई विश्वास के अनुसार यीशु परमेश्वर के पुत्र और मसीहा अर्थात् मसीह हैं। उनके जीवन, उपदेश, क्रूस पर मृत्यु और पुनरुत्थान का वर्णन नए नियम के चार प्रामाणिक सुसमाचारों- मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना में मिलता है। ईसाई धर्म का मूल संदेश ‘गॉस्पेल’ अर्थात् ‘शुभ समाचार’ कहलाता है। ईसाई मान्यता के अनुसार यीशु का आगमन पुराने नियम में वर्णित मसीहाई भविष्यवाणियों की पूर्ति से संबंधित है।

आज ईसाई धर्म विश्व के प्रमुख धर्मों में से एक है और इसके अनुयायी लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाते हैं। इसकी धार्मिक परंपराओं, सिद्धांतों और संस्थागत व्यवस्थाओं में पर्याप्त विविधता है। यीशु के स्वरूप, मुक्ति के सिद्धांत, चर्च की संरचना, पादरी व्यवस्था तथा धार्मिक अनुष्ठानों को लेकर विभिन्न ईसाई संप्रदायों में मतभेद हैं। फिर भी अधिकांश ईसाई परंपराएँ यीशु को परमेश्वर का पुत्र तथा ‘लोगोस’ का मानवीय रूप मानती हैं और उनके जीवन, क्रूस पर मृत्यु तथा पुनरुत्थान को मानव मुक्ति के केंद्र में रखती हैं।

ईसाई धर्म की उत्पत्ति

ईसाई धर्म का उद्भव पहली सदी ईस्वी में रोमन साम्राज्य के प्रांत जूडिया में एक यहूदी धार्मिक आंदोलन के रूप में हुआ। उस समय जूडिया में दूसरे मंदिर के यहूदी धर्म की परंपराएँ प्रभावी थीं। यीशु के प्रारंभिक अनुयायी मुख्यतः यहूदी थे और वे यीशु के जीवन, मृत्यु तथा पुनरुत्थान को तत्कालीन यहूदी मसीहाई और प्रलयवादी धारणाओं के संदर्भ में समझते थे। प्रारंभिक चरण में उन्होंने स्वयं को यहूदी धर्म से अलग कोई नया धर्म स्थापित करने वाला समुदाय नहीं माना।

यीशु की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने यह विश्वास व्यक्त किया कि वे मृतकों में से पुनर्जीवित हुए हैं। यरूशलेम में उनके अनुयायियों का एक समुदाय विकसित हुआ, जो यीशु के पुनरागमन की आशा करता था और उनके संदेश को अन्य यहूदियों तथा यहूदी प्रवासी समुदायों तक पहुँचाने का प्रयास करता था। प्रारंभिक समुदाय में जेम्स द जस्ट, पीटर और जॉन जैसे नेताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। 70 ईस्वी में रोमन सेना द्वारा यरूशलेम और दूसरे मंदिर के विनाश के बाद प्रारंभिक ईसाई समुदायों का स्वरूप तथा उनके भौगोलिक केंद्र धीरे-धीरे बदलने लगे।

प्रेरितों का युग

ईसाई धर्म के प्रारंभिक विकास में प्रेरितों अर्थात् एपोसल्स की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। यीशु के अनुयायियों ने जूडिया और गैलिली से बाहर पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में उनके संदेश का प्रचार किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन गैर-यहूदियों अर्थात् जेंटाइल समुदायों के बीच भी फैलने लगा। विशेष रूप से वे गैर-यहूदी लोग, जो यहूदी धर्म से प्रभावित थे और सिनेगॉग की धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते थे, इस आंदोलन से जुड़े।

इस विस्तार के साथ यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठा कि क्या गैर-यहूदी अनुयायियों के लिए यहूदी धार्मिक नियमों, विशेषकर खतना और मूसा की व्यवस्था, का पालन आवश्यक था। इस प्रश्न के समाधान में प्रेरित पौलुस की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। पौलुस मूलतः एक यहूदी फरीसी थे और प्रारंभ में यीशु के अनुयायियों का विरोध करते थे, किंतु बाद में ईसाई धर्म के प्रमुख प्रचारकों में शामिल हो गए। उन्होंने पूर्वी भूमध्यसागरीय संसार में गैर-यहूदियों के बीच ईसाई संदेश का व्यापक प्रचार किया।

पौलुस का तर्क था कि गैर-यहूदी लोग यीशु मसीह में विश्वास, बपतिस्मा तथा उनकी मृत्यु और पुनरुत्थान में सहभागिता के माध्यम से परमेश्वर के वादों में सहभागी बन सकते हैं। इसके लिए यहूदी व्यवस्था का पूर्ण पालन, विशेषकर खतना, अनिवार्य नहीं था। इस विचार ने ईसाई आंदोलन को व्यापक गैर-यहूदी समाज तक पहुँचाने और आगे चलकर उसकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

‘ईसाई’ शब्द की व्युत्पत्ति

प्रारंभिक यीशु-अनुयायी स्वयं को ‘द वे’ अर्थात् ‘मार्ग’ के अनुयायी भी कहते थे। यह अभिव्यक्ति यीशु के मार्ग और उनके अनुयायियों की जीवन-पद्धति से संबंधित थी। ‘क्रिश्चियन’ शब्द का प्रयोग यीशु के अनुयायियों के लिए पहली बार एंटिओक में हुआ माना जाता है। इसका सामान्य अर्थ ‘मसीह के अनुयायी’ है।

‘क्रिश्चियनिटी’ या ‘क्रिश्चियनिज़्म’ के समतुल्य शब्द का प्रारंभिक लिखित प्रयोग दूसरी सदी के आरंभ में एंटिओक के इग्नेशियस की रचनाओं में मिलता है। ‘यीशु’ नाम प्राचीन यूनानी ‘ईएसूस’ से संबंधित है, जो हिब्रू और अरामी परंपरा के ‘येशुआ’ नाम से विकसित हुआ।

प्रारंभिक ईसाई धर्म और एंटे-नाइसिन काल

पहली और दूसरी सदी में ईसाई समुदाय रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में फैलने लगे। इस काल में ईसाई धर्म पूरी तरह संगठित और एकरूप आंदोलन नहीं था, बल्कि विभिन्न स्थानीय समुदायों, परंपराओं और धार्मिक विचारधाराओं का समूह था। समय के साथ बिशपों की संस्था अधिक संगठित और प्रभावशाली हुई तथा अनेक समुदायों में बिशपों को प्रेरितों के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा।

दूसरी सदी के मध्य से ईसाई विद्वानों ने ईसाई विश्वास की व्याख्या और उसकी रक्षा के लिए अनेक रचनाएँ लिखीं। इन लेखकों को ‘चर्च फादर्स’ कहा गया और उनके विचारों के अध्ययन को ‘पैट्रिस्टिक्स’ कहा जाता है। एंटिओक के इग्नेशियस, पॉलीकार्प, जस्टिन मार्टर, इरेनियस, टर्टुलियन, अलेक्जेंड्रिया के क्लेमेंट और ओरिजेन प्रमुख प्रारंभिक चर्च फादर्स में शामिल थे।

इसी काल में ईसाई समुदायों के भीतर विभिन्न धार्मिक मत विकसित हुए। ‘हेरेसी’ शब्द उन विचारधाराओं के लिए प्रयुक्त होने लगा जिन्हें मुख्यधारा के ईसाई नेता प्रेरितों की मूल शिक्षाओं से विचलित मानते थे। वैलेन्टिनस से संबंधित ग्नोस्टिक विचारधारा में मुक्ति के लिए विशेष आध्यात्मिक ज्ञान अर्थात् ग्नोसिस को महत्त्व दिया गया। दूसरी ओर, सिनोप के मार्शियन ने पुराने नियम के परमेश्वर और यीशु के पिता के रूप में माने जाने वाले परमेश्वर के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने का प्रयास किया। इरेनियस और अन्य चर्च फादर्स ने इन विचारों के विरुद्ध प्रेरितिक परंपरा तथा चर्च की एकरूप शिक्षा पर बल दिया।

रोमन साम्राज्य में ईसाइयों की स्थिति और उत्पीड़न

रोमन साम्राज्य में ईसाइयों की स्थिति लंबे समय तक अस्थिर रही। रोमन समाज में धार्मिक परंपराएँ नागरिक और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ी थीं। ईसाइयों द्वारा पारंपरिक रोमन देवताओं की पूजा से इनकार को कई बार सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में देखा गया।

ईसाइयों पर उत्पीड़न के प्रारंभिक उदाहरणों में संत स्टीफन की हत्या और पौलुस द्वारा अपने ईसाई-विरोधी अतीत का उल्लेख मिलता है। रोमन इतिहासकार टैसिटस के अनुसार, 64 ईस्वी में रोम की भीषण आग के बाद सम्राट नीरो ने ईसाइयों को दोषी ठहराया और उन पर दमन किया। हालांकि पहली और दूसरी सदी में ईसाइयों का उत्पीड़न सामान्यतः स्थानीय और असंगठित स्वरूप का था तथा पूरे साम्राज्य में एक समान नीति के रूप में लागू नहीं था।

तीसरी सदी में स्थिति अधिक गंभीर हुई। 249 ईस्वी में सम्राट डेसियस ने रोमन देवताओं के सम्मान में सार्वजनिक बलि देने का आदेश दिया। इस आदेश का पालन न करने वाले ईसाइयों को दंडित किया गया। 303 ईस्वी में सम्राट डायोक्लेटियन के शासनकाल में ईसाइयों के विरुद्ध व्यापक उत्पीड़न हुआ। उनके धार्मिक भवनों को नष्ट किया गया, धार्मिक ग्रंथों को जब्त किया गया, संपत्ति पर कार्रवाई की गई और अनेक ईसाइयों को कारावास तथा अन्य दंड दिए गए।

कॉन्स्टेंटाइन और ईसाई धर्म का राजकीय उत्थान

चौथी सदी में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन प्रथम के शासनकाल में ईसाई धर्म की स्थिति में निर्णायक परिवर्तन आया। 311 ईस्वी के सहिष्णुता संबंधी आदेश और 313 ईस्वी के मिलान के आदेश के माध्यम से ईसाइयों को व्यापक धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई और राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न का अंत हुआ। कॉन्स्टेंटाइन ने स्वयं ईसाई धर्म को संरक्षण दिया और चर्च की संस्थागत शक्ति को बढ़ावा दिया।

325 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन ने नाइसिया की पहली परिषद बुलाई। इसका प्रमुख उद्देश्य एरियन विवाद का समाधान करना था। परिषद ने नाइसिन क्रीड के प्रारंभिक रूप को स्वीकार किया, जिसमें यीशु मसीह की दिव्यता और पिता के साथ उनके संबंध को स्पष्ट किया गया। यह परिषद आगे की सार्वभौमिक अर्थात् इकुमेनिकल परिषदों की परंपरा में पहली प्रमुख परिषद मानी जाती है।

381 ईस्वी में सम्राट थियोडोसियस प्रथम के शासनकाल में कॉन्स्टेंटिनोपल की परिषद ने नाइसिन विश्वास को और स्पष्ट किया। इसी काल में नाइसिन ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य की आधिकारिक धार्मिक व्यवस्था का प्रमुख आधार प्राप्त हुआ। इसके बाद ईसाई चर्च और रोमन राज्य के संबंध अत्यंत घनिष्ठ हो गए तथा विधर्मी माने जाने वाले विचारों के विरुद्ध राज्य का समर्थन भी प्राप्त होने लगा।

रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म का प्रसार

ईसाई धर्म भूमध्यसागरीय तट से आगे रोमन साम्राज्य के आंतरिक क्षेत्रों तक फैल गया। यह अरामी भाषा बोलने वाले समुदायों में भी लोकप्रिय हुआ और पार्थियन तथा बाद में ससानियन साम्राज्य के क्षेत्रों तक पहुँचा। मिस्र में पहली सदी के मध्य से ईसाई उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं और दूसरी सदी के अंत तक उत्तरी अफ्रीका में कार्थेज के आसपास ईसाई समुदाय मजबूत हो चुके थे।

ईसाई परंपरा में मार्क द इवेंजेलिस्ट को अलेक्जेंड्रिया के चर्च की स्थापना से जोड़ा जाता है। उत्तरी अफ्रीका और मिस्र के ईसाई बौद्धिक जीवन में टर्टुलियन, अलेक्जेंड्रिया के क्लेमेंट, ओरिजेन, सिप्रियन, अथानेसियस और हिप्पो के ऑगस्टीन जैसे विद्वानों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

आर्मेनिया में चौथी सदी के आरंभ में राजा तिरिदातेस तृतीय ने ईसाई धर्म को राजकीय धर्म का दर्जा दिया। इसी कारण आर्मेनिया को सामान्यतः ईसाई धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अपनाने वाला पहला राज्य माना जाता है, यद्यपि वहाँ ईसाई धर्म इसके पहले ही फैल चुका था।

बाइजेंटाइन साम्राज्य और ईसाई सभ्यता

बाइजेंटाइन साम्राज्य में ईसाई धर्म ने राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। कॉन्स्टेंटिनोपल ईसाई संसार का प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बन गया। यूनानी दर्शन, साहित्य और कला की परंपराओं का ईसाई विचारों के साथ गहरा समन्वय विकसित हुआ।

बाइजेंटाइन कला, स्थापत्य और साहित्य का यूरोप तथा पूर्वी ईसाई संसार पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा। दूसरी ओर, सातवीं सदी से उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में इस्लाम के विस्तार के कारण अनेक पुराने ईसाई समुदाय राजनीतिक और सामाजिक रूप से कमजोर हुए। फिर भी मिस्र में कॉप्टिक चर्च, इथियोपिया में इथियोपियन ऑर्थोडॉक्स टेवाहेडो चर्च और नूबिया में ईसाई समुदाय लंबे समय तक बने रहे।

प्रारंभिक मध्य युग और ईसाई धर्म का यूरोपीय विस्तार

पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद पश्चिमी यूरोप में पोप का पद धीरे-धीरे धार्मिक संस्था के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव के केंद्र के रूप में भी उभरने लगा। चर्च ने विभिन्न जर्मनिक, सेल्टिक और बाद में स्लाव समुदायों के बीच मिशनरी गतिविधियों का विस्तार किया। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अनेक यूरोपीय समाज धीरे-धीरे ईसाई परंपरा में सम्मिलित हुए।

मठवाद ने मध्ययुगीन ईसाई सभ्यता के विकास में विशेष भूमिका निभाई। बेनेडिक्ट ऑफ नर्सिया ने मठवासी जीवन के लिए एक व्यवस्थित नियम विकसित किया, जिसने पश्चिमी यूरोप के मठों के संगठन को गहराई से प्रभावित किया। मठ शिक्षा, साहित्य, पांडुलिपि-संरक्षण और धार्मिक अध्ययन के प्रमुख केंद्र बन गए। आयरलैंड, स्कॉटलैंड और गॉल के मठों ने शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया तथा कैरोलिंगियन पुनर्जागरण के लिए बौद्धिक आधार तैयार किया।

मध्य युग में चर्च और धार्मिक परिवर्तन

मध्य युग में चर्च के प्रशासन और धार्मिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए। पोप ग्रेगरी द ग्रेट ने चर्च के प्रशासन, संगठन और मिशनरी गतिविधियों को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आठवीं सदी में बाइजेंटाइन साम्राज्य में आइकनोक्लाज़्म अर्थात् धार्मिक चित्रों और प्रतीकों के विरोध का विवाद उठा। 787 ईस्वी में नाइसिया की दूसरी इकुमेनिकल परिषद ने धार्मिक चित्रों के सम्मान को स्वीकार किया।

दसवीं सदी में क्लूनी के मठ से जुड़े सुधारों ने पश्चिमी मठवाद को नई ऊर्जा प्रदान की। इन सुधारों का उद्देश्य मठों में अनुशासन, धार्मिक जीवन और आध्यात्मिक आदर्शों को मजबूत करना था। आगे चलकर इन सुधारों ने पश्चिमी चर्च के व्यापक सुधार आंदोलनों को भी प्रभावित किया।

विश्वविद्यालय, भिक्षु संघ और मध्ययुगीन संस्कृति

ग्यारहवीं और बारहवीं सदी के बाद पश्चिमी यूरोप के कुछ कैथेड्रल विद्यालय धीरे-धीरे विश्वविद्यालयों में विकसित हुए। बोलोग्ना, पेरिस और ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालय मध्ययुगीन ईसाई बौद्धिक संस्कृति के प्रमुख केंद्र बने। यहाँ धर्मशास्त्र के साथ कानून, चिकित्सा, दर्शन और प्रशासन से संबंधित विषयों का भी अध्ययन किया जाने लगा।

यूरोपीय नगरों के विकास के साथ भिक्षु संघों का भी विस्तार हुआ। फ्रांसिस ऑफ असीसी द्वारा स्थापित फ्रांसिस्कन और डोमिनिक द्वारा स्थापित डोमिनिकन संघ प्रमुख थे। इन संघों ने नगरों में धार्मिक प्रचार, शिक्षा और सामाजिक सेवा के कार्य किए तथा विश्वविद्यालयों के बौद्धिक जीवन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी काल में सिस्टरसियन मठों ने भी यूरोप के ग्रामीण और अपेक्षाकृत निर्जन क्षेत्रों के विकास में भूमिका निभाई।

मध्ययुगीन यूरोप में धार्मिक वास्तुकला का भी अभूतपूर्व विकास हुआ। रोमनस्क और गोथिक स्थापत्य शैलियों में विशाल चर्च और कैथेड्रल निर्मित किए गए। ये भवन केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि मध्ययुगीन यूरोपीय कला, स्थापत्य और सामुदायिक जीवन के महत्त्वपूर्ण प्रतीक भी बने।

पूर्वी और पश्चिमी ईसाई धर्म का विभाजन

ईसाई चर्च में लंबे समय तक प्रशासनिक, धार्मिक और धर्मशास्त्रीय मतभेद बढ़ते रहे। इन मतभेदों ने पश्चिमी लैटिन परंपरा और पूर्वी यूनानी परंपरा के बीच गहरा विभाजन पैदा किया। 1054 ईस्वी का ईस्ट-वेस्ट स्किज़्म अर्थात् पूर्व-पश्चिम महाविभाजन इस प्रक्रिया का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। इसके परिणामस्वरूप कैथोलिक और ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स परंपराएँ अलग-अलग संस्थागत रूप में विकसित हुईं।

पोप की सर्वोच्चता, धार्मिक अनुष्ठानों और कुछ धर्मशास्त्रीय प्रश्नों को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद बने रहे। ल्योन की दूसरी परिषद 1274 ईस्वी और फ्लोरेंस की परिषद 1439 ईस्वी ने दोनों परंपराओं को पुनः एकजुट करने का प्रयास किया, किंतु स्थायी सफलता नहीं मिली। दोनों परंपराएँ आज भी अलग-अलग संस्थागत और धार्मिक रूपों में विद्यमान हैं।

क्रूसेड और धार्मिक संघर्ष

ग्यारहवीं से तेरहवीं सदी के बीच क्रूसेड अर्थात् धर्मयुद्धों की श्रृंखला चली। 1095 ईस्वी में पोप अर्बन द्वितीय के आह्वान पर पहला धर्मयुद्ध आरंभ हुआ। इसके प्रमुख उद्देश्यों में पवित्र भूमि में ईसाई नियंत्रण स्थापित करना और बाइजेंटाइन साम्राज्य को तुर्की विस्तार के विरुद्ध सहायता देना शामिल था।

धर्मयुद्ध कई चरणों में चले, किंतु वे पवित्र भूमि में स्थायी ईसाई राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने में सफल नहीं हुए। 1204 ईस्वी में चौथे धर्मयुद्ध के दौरान कॉन्स्टेंटिनोपल की लूट ने पूर्वी और पश्चिमी ईसाइयों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया।

इसी काल में यूरोप में धार्मिक असहिष्णुता भी बढ़ी। कैथर जैसे समूहों को विधर्मी घोषित किया गया और उनके विरुद्ध सैन्य अभियान चलाए गए। बारहवीं और तेरहवीं सदी में इनक्विज़िशन नामक संस्थागत व्यवस्थाओं का विकास हुआ, जिनका उद्देश्य धार्मिक विधर्म की जाँच और दमन करना था। यहूदियों के प्रति भी यूरोप के अनेक क्षेत्रों में शत्रुता बढ़ी और उन्हें कुछ राज्यों तथा नगरों से निष्कासित किया गया।

पुनर्जागरण और सुधार आंदोलन

पंद्रहवीं सदी के पुनर्जागरण ने प्राचीन यूनानी और रोमन ज्ञान, साहित्य तथा कला में नई रुचि पैदा की। पुनर्जागरण के अनेक मानवतावादी स्वयं ईसाई थे और चर्च ने कला तथा साहित्य की अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियों को संरक्षण दिया। इस काल में ईसाई धर्म, शास्त्रीय संस्कृति और मानवतावादी विचारों के बीच जटिल संबंध विकसित हुए।

सोलहवीं सदी में कैथोलिक चर्च के भीतर सुधार की आवश्यकता को लेकर व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ। 1517 ईस्वी में मार्टिन लूथर ने इंडल्जेंस अर्थात् पाप-मुक्ति के प्रमाण-पत्रों की बिक्री की आलोचना करते हुए अपनी पंचानवे थीसिस प्रस्तुत की। उनके विचार तेजी से यूरोप में फैले। 1521 ईस्वी के एडिक्ट ऑफ वर्म्स के बाद लूथर को चर्च से बहिष्कृत कर दिया गया और उनके समर्थकों का आंदोलन स्वतंत्र धार्मिक परंपरा के रूप में विकसित होने लगा।

ज़्विंगली, कैल्विन, नॉक्स और अन्य सुधारकों ने भी कैथोलिक चर्च की शिक्षाओं तथा पूजा-पद्धतियों की आलोचना की। इन आंदोलनों से प्रोटेस्टेंटवाद की विभिन्न शाखाओं का विकास हुआ। इंग्लैंड में हेनरी अष्टम के शासनकाल के दौरान 1534 के एक्ट ऑफ सुप्रीमेसी के बाद चर्च ऑफ इंग्लैंड की स्वतंत्र संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई। दूसरी ओर, थॉमस मुंट्ज़र, एंड्रियास कार्लस्टेड और अन्य कट्टरपंथी सुधारकों के आंदोलनों से रैडिकल रिफॉर्मेशन तथा एनाबैपटिस्ट परंपराओं का विकास हुआ।

कैथोलिक सुधार या काउंटर-रिफॉर्मेशन

प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन की प्रतिक्रिया तथा चर्च के आंतरिक सुधार की आवश्यकता के परिणामस्वरूप कैथोलिक चर्च ने व्यापक सुधार और पुनर्गठन की प्रक्रिया आरंभ की, जिसे काउंटर-रिफॉर्मेशन या कैथोलिक रिफॉर्म कहा जाता है। 1545 से 1563 ईस्वी तक चली काउंसिल ऑफ ट्रेंट ने कैथोलिक सिद्धांतों को स्पष्ट किया, धार्मिक अनुशासन को मजबूत किया तथा पादरियों की शिक्षा और चर्च प्रशासन में सुधारों को बढ़ावा दिया।

इस अवधि में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट शक्तियों के बीच धार्मिक तथा राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तीव्र हुई। फ्रेंच वॉर्स ऑफ रिलिजन, तीस वर्षीय युद्ध और इंग्लिश सिविल वॉर जैसे संघर्षों में धार्मिक, राजनीतिक और राजवंशी हित एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इन घटनाओं ने धार्मिक सहिष्णुता तथा चर्च और राज्य के संबंधों पर यूरोपीय बहस को गहरा किया।

वैज्ञानिक क्रांति और ईसाई धर्म

वैज्ञानिक क्रांति के दौरान ईसाई धर्म और वैज्ञानिक विचारों के संबंध जटिल रहे। निकोलस कोपरनिकस, गैलीलियो गैलीली, जोहान्स केप्लर, आइज़ैक न्यूटन और रॉबर्ट बॉयल जैसे अनेक प्रमुख वैज्ञानिक स्वयं को ईसाई मानते थे। इस कारण कुछ इतिहासकारों ने आधुनिक विज्ञान के विकास और यूरोपीय ईसाई बौद्धिक परंपरा के बीच महत्त्वपूर्ण संबंधों की ओर संकेत किया है।

यद्यपि वैज्ञानिक विचारों और चर्च की कुछ स्थापित व्याख्याओं के बीच तनाव के उदाहरण भी मिले। गैलीलियो का मामला इसका प्रसिद्ध उदाहरण है, जिसमें सूर्य-केंद्रीय सिद्धांत को लेकर कैथोलिक चर्च और उनके विचारों के बीच गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ।

खोज का युग और वैश्विक प्रसार

पंद्रहवीं से सत्रहवीं सदी के बीच यूरोपीय समुद्री विस्तार और खोज के युग ने ईसाई धर्म के वैश्विक प्रसार को गति दी। 1492 ईस्वी में क्रिस्टोफर कोलंबस की अमेरिका यात्रा के बाद मिशनरी गतिविधियाँ अमेरिका में व्यापक हुईं। यूरोपीय साम्राज्यवादी विस्तार, व्यापार, प्रवास और मिशनरी कार्यों के माध्यम से ईसाई धर्म अमेरिका, ओशिनिया, एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचा।

इस प्रसार में धार्मिक उत्साह के साथ-साथ यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के राजनीतिक और आर्थिक हित भी जुड़े हुए थे। इसलिए ईसाई मिशनरी गतिविधियों का इतिहास केवल धार्मिक प्रचार का इतिहास नहीं है, बल्कि वह यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार, सांस्कृतिक संपर्क और स्थानीय समाजों में हुए परिवर्तनों से भी संबंधित है।

प्रबोधन और आधुनिक युग

प्रबोधन के युग में तर्कवाद, वैज्ञानिक चिंतन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता जैसे विचारों का विकास हुआ। इसके परिणामस्वरूप यूरोप में पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं की सामाजिक और राजनीतिक भूमिका पर प्रश्न उठने लगे। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान ईसाई-विमुखीकरण की नीतियाँ अपनाई गईं। बाद में कुछ समाजवादी और मार्क्सवादी आंदोलनों ने भी धर्म की आलोचना की तथा कुछ देशों में राज्य-नास्तिकता की नीतियाँ अपनाई गईं।

नेपोलियन युग के बाद आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के विकास ने चर्च और राज्य के संबंधों को नया रूप दिया। यूरोप के विभिन्न देशों में कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और अन्य ईसाई समुदायों की स्थिति अलग-अलग रही। कुछ देशों में धर्म और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे, जबकि फ्रांस जैसे देशों में राज्य और चर्च के स्पष्ट पृथक्करण की दिशा मजबूत हुई।

जर्मनी में चर्च और राज्य के बीच तनाव ने कुल्टर्काम्फ का रूप लिया। अल्ट्रामोंटेनिज़्म और राष्ट्रवाद के बीच संघर्ष ने विशेष रूप से कैथोलिक समुदायों के सामने चर्च के प्रति निष्ठा और राष्ट्र-राज्य की अपेक्षाओं के बीच संतुलन का प्रश्न खड़ा किया।

आधुनिक काल में ईसाई धर्म

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता और औद्योगिकीकरण के प्रभाव से यूरोप के अनेक क्षेत्रों में पारंपरिक धार्मिक प्रतिबद्धता में कमी आई। हालांकि अमेरिका और कुछ अन्य क्षेत्रों में ईसाई धार्मिक जीवन अपेक्षाकृत मजबूत बना रहा। दूसरी ओर, मिशनरी गतिविधियों, जनसंख्या वृद्धि और स्थानीय ईसाई आंदोलनों के कारण अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी गोलार्ध के अन्य क्षेत्रों में ईसाई धर्म का तेजी से विस्तार हुआ।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक ईसाई धर्म का जनसांख्यिकीय केंद्र धीरे-धीरे पश्चिमी यूरोप से हटकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका की ओर बढ़ने लगा। इस परिवर्तन ने ईसाई धर्म को अधिक वैश्विक और सांस्कृतिक रूप से विविध बनाया।

ईसाई धर्म की प्रमुख मान्यताएँ

विश्वभर के ईसाई कुछ मूलभूत मान्यताओं पर व्यापक रूप से सहमत हैं, किंतु बाइबिल और पवित्र परंपराओं की व्याख्या तथा उनके धार्मिक अर्थों को लेकर विभिन्न समुदायों में पर्याप्त मतभेद हैं। इसी कारण ईसाई धर्म में धर्मशास्त्रीय विचारों की अनेक धाराएँ विकसित हुई हैं, जिनमें रूढ़िवादी, कट्टरपंथी, उदारवादी और प्रगतिशील परंपराएँ प्रमुख हैं।

ईसाई विश्वास के केंद्र में एक परमेश्वर, यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, मानव पाप, मुक्ति, यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान तथा अंतिम न्याय की मान्यताएँ हैं। अधिकांश मुख्यधारा के ईसाई यीशु मसीह को परमेश्वर का पुत्र और मानवता के उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं।

क्रीड अर्थात् विश्वास-पत्र

ईसाई धर्म में विश्वास की संक्षिप्त घोषणाओं या सिद्धांतात्मक वक्तव्यों को ‘क्रीड’ अर्थात् विश्वास-पत्र कहा जाता है। इनका प्रारंभ प्रारंभिक ईसाई बपतिस्माई विश्वास-वचनों से हुआ। चौथी और पाँचवीं सदी में यीशु मसीह के स्वरूप और परमेश्वर के संबंध में उत्पन्न धार्मिक विवादों के कारण इन विश्वास-वचनों का विस्तार हुआ और वे औपचारिक आस्था-पत्रों के रूप में विकसित हुए।

“यीशु प्रभु हैं” ईसाई धर्म की प्राचीनतम विश्वास-घोषणाओं में से एक है। बाद में प्रेरितों का क्रीड, नाइसिन क्रीड और अथानेसियन क्रीड विभिन्न ईसाई परंपराओं में महत्त्वपूर्ण बने।

प्रेरितों का क्रीड

प्रेरितों का क्रीड पश्चिमी ईसाई परंपरा में व्यापक रूप से स्वीकृत प्रारंभिक विश्वास-पत्र है। इसका उपयोग अनेक ईसाई संप्रदाय धार्मिक अनुष्ठानों, उपासना और धार्मिक शिक्षा में करते हैं। कैथोलिक चर्च की लैटिन परंपरा, लूथरनवाद, एंग्लिकनवाद तथा अनेक अन्य पश्चिमी ईसाई परंपराओं में इसका विशेष महत्त्व है।

यह एक ही समय में तैयार नहीं हुआ, बल्कि प्रारंभिक बपतिस्माई विश्वास-वचनों से क्रमशः विकसित हुआ। इसमें पिता परमेश्वर, उनके पुत्र यीशु मसीह और पवित्र आत्मा में विश्वास, यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान, स्वर्गारोहण, चर्च की पवित्रता, संतों की संगति, पापों की क्षमा, मृतकों के पुनरुत्थान और अंतिम न्याय जैसी प्रमुख मान्यताएँ सम्मिलित हैं।

नाइसिन क्रीड

नाइसिन क्रीड का प्रारंभिक रूप 325 ईस्वी में नाइसिया की परिषद में तैयार किया गया और 381 ईस्वी में कॉन्स्टेंटिनोपल की परिषद में इसे विस्तृत रूप दिया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य एरियनवाद सहित उन धार्मिक मतों का उत्तर देना था जो यीशु मसीह की पूर्ण दिव्यता को चुनौती देते थे। नाइसिन विश्वास-पत्र में पिता और पुत्र के संबंध तथा मसीह की पूर्ण दिव्यता पर विशेष बल दिया गया। बाद में यह अधिकांश कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और अनेक प्रोटेस्टेंट परंपराओं में ईसाई आस्था का महत्त्वपूर्ण आधार बना।

कैल्सेडोनियन परिभाषा

451 ईस्वी में कैल्सेडोन की परिषद में कैल्सेडोनियन परिभाषा स्वीकार की गई। इसमें यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि यीशु मसीह एक ही व्यक्ति हैं, जिनमें पूर्णतः ईश्वरीय और पूर्णतः मानवीय दोनों स्वभाव विद्यमान हैं। ये दोनों स्वभाव बिना मिश्रण, बिना परिवर्तन, बिना विभाजन और बिना पृथक्करण के एक ही व्यक्ति में संयुक्त हैं।

ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स चर्चों ने कैल्सेडन की इस परिभाषा को स्वीकार नहीं किया। इसी धर्मशास्त्रीय मतभेद के कारण पूर्वी ईसाई परंपराओं के बीच महत्त्वपूर्ण संस्थागत विभाजन विकसित हुआ।

अथानेसियन क्रीड

अथानेसियन क्रीड पश्चिमी ईसाई परंपरा में महत्त्वपूर्ण विश्वास-पत्र है। इसमें त्रित्व के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि पिता परमेश्वर हैं, पुत्र परमेश्वर हैं और पवित्र आत्मा परमेश्वर हैं, फिर भी तीन परमेश्वर नहीं, बल्कि एक ही परमेश्वर हैं। कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स, ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स और अधिकांश प्रोटेस्टेंट परंपराएँ प्रमुख क्रीडों में व्यक्त ईसाई शिक्षाओं को स्वीकार करती हैं।

यीशु मसीह

ईसाई धर्म की केंद्रीय मान्यता यह है कि यीशु मसीह परमेश्वर के पुत्र और मसीहा हैं। ईसाई विश्वास के अनुसार परमेश्वर ने यीशु को मानवता के उद्धारकर्ता के रूप में भेजा और उनका आगमन पुराने नियम में वर्णित मसीह संबंधी भविष्यवाणियों की पूर्ति से संबंधित है।

मुख्यधारा के ईसाई धर्म के अनुसार यीशु मसीह पूर्णतः ईश्वर और पूर्णतः मनुष्य हैं। उन्होंने मनुष्य के रूप में पीड़ा और प्रलोभनों का सामना किया, किंतु पाप नहीं किया। ईसाई विश्वास के अनुसार उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया, उनकी मृत्यु हुई, वे मृतकों में से जी उठे और स्वर्गारोहण के बाद परमेश्वर के दाहिने हाथ विराजमान हुए। अंततः वे पुनः आएँगे और मृतकों के पुनरुत्थान तथा अंतिम न्याय सहित मसीह से संबंधित भविष्यवाणियों की पूर्णता होगी।

मत्ती और लूका के सुसमाचारों के अनुसार यीशु का जन्म पवित्र आत्मा की शक्ति से कुँवारी मरियम के गर्भ से हुआ। प्रामाणिक सुसमाचारों में उनके बचपन के बारे में अपेक्षाकृत कम विवरण मिलता है, जबकि उनके सार्वजनिक जीवन और मृत्यु से पहले के अंतिम दिनों का अपेक्षाकृत विस्तृत वर्णन मिलता है। उनके सार्वजनिक जीवन में बपतिस्मा, उपदेश, शिक्षा, दृष्टांत और चमत्कार प्रमुख थे।

यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान

ईसाई धर्म में यीशु का पुनरुत्थान विश्वास की आधारशिला माना जाता है। प्रेरित पौलुस ने भी पुनरुत्थान को ईसाई विश्वास का केंद्रीय आधार माना। नए नियम के अनुसार यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, उनकी शारीरिक मृत्यु हुई, उन्हें कब्र में रखा गया और तीसरे दिन वे मृतकों में से जी उठे।

नए नियम में पुनरुत्थान के बाद यीशु के अपने प्रेरितों और अन्य शिष्यों के सामने प्रकट होने का वर्णन मिलता है। एक स्थान पर पाँच सौ से अधिक विश्वासियों के सामने उनके प्रकट होने का उल्लेख भी किया गया है। यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान की स्मृति ईसाई उपासना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और पवित्र सप्ताह, विशेषकर गुड फ्राइडे तथा ईस्टर रविवार, में इस पर विशेष बल दिया जाता है।

मुख्यधारा के अधिकांश ईसाई यीशु के पुनरुत्थान को ऐतिहासिक और धार्मिक सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। कुछ आधुनिक उदारवादी ईसाई इसकी शारीरिक व्याख्या को स्वीकार नहीं करते और इसे प्रतीकात्मक या आध्यात्मिक घटना के रूप में देखते हैं।

मुक्ति का सिद्धांत

ईसाई धर्म में मुक्ति का अर्थ पाप, मृत्यु और परमेश्वर से मनुष्य के अलगाव से मुक्ति तथा परमेश्वर के साथ पुनः संबंध स्थापित होना है। प्रेरित पौलुस के धर्मशास्त्र में यीशु की मृत्यु को मानवता के उद्धार से जोड़ा गया है। पौलुस के अनुसार मसीह में विश्वास करने वाले गैर-यहूदी भी अब्राहम की संतति और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के उत्तराधिकारी बन सकते हैं।

पूर्वी ऑर्थोडॉक्स धर्मशास्त्र यीशु की मृत्यु को मानवता और परमेश्वर के बीच संबंध की पुनर्स्थापना से जोड़ता है। इस परंपरा में ‘थियोसिस’ अर्थात् ‘दिव्यीकरण’ की धारणा महत्त्वपूर्ण है, जिसके अनुसार मनुष्य परमेश्वर की कृपा से उस आध्यात्मिक अवस्था की ओर बढ़ता है जिसके लिए उसका सृजन हुआ है।

कैथोलिक धर्मशास्त्र में यीशु की मृत्यु को मानव पापों से उत्पन्न दोष और परमेश्वर के प्रति मनुष्य के दायित्व की पूर्ति से जोड़ा जाता है। कैथोलिक परंपरा में मुक्ति के लिए विश्वास के साथ प्रेम, नैतिक जीवन और चर्च के संस्कारों में सहभागिता को भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र की अनेक धाराओं में यीशु की मृत्यु को प्रतिस्थापनात्मक दंड के रूप में समझाया गया है। इस दृष्टिकोण के अनुसार मानव पाप के कारण जो दंड अपेक्षित था, उसे मसीह ने अपने ऊपर लिया।

ईसाई संप्रदायों में इस बात को लेकर मतभेद है कि मुक्ति में परमेश्वर की पूर्वनियति और मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा की भूमिका कितनी है। रिफॉर्म्ड धर्मशास्त्र परमेश्वर की कृपा और पूर्वनियति पर विशेष बल देता है, जबकि कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और आर्मिनियन प्रोटेस्टेंट परंपराएँ मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा तथा विश्वास की भूमिका को अधिक महत्त्व देती हैं।

त्रित्व

त्रित्व ईसाई धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है। इसके अनुसार एक ही परमेश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में विद्यमान हैं। ये तीनों अलग-अलग व्यक्ति हैं, किंतु तीन अलग-अलग देवता नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति पूर्णतः परमेश्वर है, जबकि परमेश्वर एक ही है।

त्रित्व का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर का केवल एक-तिहाई भाग है। तीनों के बीच अंतर उनकी पारस्परिक संबंधात्मक पहचान में है, न कि उनकी दिव्यता की मात्रा में।

बाइबिल में ‘ट्रिनिटी’ शब्द सीधे नहीं मिलता, किंतु नए नियम में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के संबंध में मिलने वाली शिक्षाओं के आधार पर प्रारंभिक ईसाई धर्मशास्त्रियों ने इस सिद्धांत को व्यवस्थित किया। तीसरी और चौथी सदी में त्रित्व संबंधी धर्मशास्त्र अधिक स्पष्ट हुआ और चौथी सदी की सार्वभौमिक परिषदों में इसकी मुख्य धार्मिक रूपरेखा स्थापित हुई। यूनानी शब्द ‘ट्रायस’ का प्रारंभिक प्रयोग एंटिओक के थियोफिलस की रचनाओं में मिलता है। बाद में टर्टुलियन ने इसका लैटिन रूप ‘ट्रिनिटास’ प्रयोग किया।

त्रित्ववाद और गैर-त्रित्ववाद

त्रित्ववाद उन ईसाइयों की धार्मिक धारणा है जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा में एक परमेश्वर के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। लगभग सभी मुख्यधारा के कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और अधिकांश प्रोटेस्टेंट चर्च त्रित्ववादी हैं। त्रित्ववाद इस विचार को अस्वीकार करता है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा तीन अलग-अलग देवता हैं। यह तीन देवताओं की मान्यता तथा परमेश्वर के केवल अलग-अलग हिस्सों में विभाजन की धारणाओं को भी अस्वीकार करता है। इसी प्रकार त्रित्ववाद एरियनवाद को भी अस्वीकार करता है, जिसमें पुत्र को पिता से निम्न और सृष्ट प्राणी माना गया था।

गैर-त्रित्ववाद उन ईसाई धर्मशास्त्रीय विचारों को कहा जाता है जो त्रित्व के पारंपरिक सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते। प्रारंभिक ईसाई इतिहास में एडॉप्शनिज़्म और मोडलिज़्म जैसी धारणाएँ सामने आईं। बाद के काल में गैर-त्रित्ववादी विचार विभिन्न रूपों में विकसित हुए। सोलहवीं सदी के सुधार आंदोलनों, अठारहवीं सदी के प्रबोधन, उन्नीसवीं सदी के पुनर्स्थापना आंदोलनों तथा आधुनिक वननेस पेंटेकोस्टल आंदोलनों में इनके अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। यूनिटेरियन परंपराएँ, यहोवा के साक्षी और लेटर-डे सेंट्स आंदोलन भी पारंपरिक त्रित्व सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते।

अंत-समय का सिद्धांत

‘एस्केटोलॉजी’ अर्थात् अंत-समय का सिद्धांत ईसाई धर्म में मनुष्य, इतिहास और संसार के अंतिम भविष्य से संबंधित धार्मिक विचारों का अध्ययन है। इसमें मृत्यु, मृत्यु के बाद का जीवन, अंतिम न्याय, मसीह का पुनरागमन, मृतकों का पुनरुत्थान, परमेश्वर के राज्य की स्थापना, स्वर्ग, नरक, पर्गेटरी, संसार का अंत तथा नए स्वर्ग और नई पृथ्वी जैसी अवधारणाएँ शामिल हैं।

मुख्यधारा के अधिकांश ईसाई मानते हैं कि मसीह समय के अंत में पुनः आएँगे, मृतकों का पुनरुत्थान होगा और अंतिम न्याय किया जाएगा। इसके बाद परमेश्वर के राज्य की पूर्ण स्थापना की धारणा जुड़ी हुई है। हालांकि इन घटनाओं के क्रम और स्वरूप की व्याख्या विभिन्न ईसाई परंपराओं में अलग-अलग है। कुछ इवेंजेलिकल परंपराएँ मसीह के हजार वर्षीय राज्य तथा विश्वासियों के स्वर्गारोहण की धारणा पर विशेष बल देती हैं, जबकि कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और अनेक प्रोटेस्टेंट परंपराएँ इन विषयों की अलग धर्मशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।

मृत्यु और उसके बाद का जीवन

अधिकांश ईसाई परंपराओं के अनुसार मनुष्य को मृत्यु के बाद परमेश्वर के न्याय का सामना करना पड़ता है और उसके कर्म तथा विश्वास के अनुसार उसे अनंत जीवन या दंड प्राप्त होता है। ईसाई धर्म में अंतिम न्याय और मृतकों के पुनरुत्थान की धारणा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स और अधिकांश प्रोटेस्टेंट परंपराएँ यह मानती हैं कि शारीरिक मृत्यु के बाद व्यक्ति की आत्मा किसी प्रकार के व्यक्तिगत न्याय का सामना करती है।

कैथोलिक धर्मशास्त्र के अनुसार जो लोग परमेश्वर की कृपा की अवस्था में मरते हैं, किंतु अभी पूर्णतः शुद्ध नहीं हुए हैं, वे पर्गेटरी अर्थात् शुद्धि-लोक की अवस्था से गुजरते हैं। वहाँ आत्मा को उस आध्यात्मिक पवित्रता के लिए तैयार किया जाता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश के लिए आवश्यक मानी जाती है।

कुछ ईसाई समूह, विशेषकर सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट मरणशीलता के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। इसके अनुसार मानव आत्मा स्वाभाविक रूप से अमर नहीं है और मृत्यु तथा पुनरुत्थान के बीच व्यक्ति अचेतन अवस्था में रहता है। कुछ समूह विनाशवाद को भी मानते हैं, जिसके अनुसार अंतिम न्याय के बाद दुष्टों का अस्तित्व अनंत यातना के बजाय समाप्त हो जाएगा।

ईसाई धर्म की प्रमुख शाखाएँ

ईसाई धर्म में अनेक संप्रदाय और धार्मिक परंपराएँ हैं। इसकी प्रमुख शाखाओं में कैथोलिक धर्म, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्सी और प्रोटेस्टेंट धर्म शामिल हैं। इसके अतिरिक्त ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्सी, चर्च ऑफ द ईस्ट, रेस्टोरेशनिस्ट परंपराएँ तथा अनेक स्वतंत्र ईसाई समुदाय भी महत्त्वपूर्ण हैं। व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि से ईसाई धर्म को पश्चिमी और पूर्वी परंपराओं में भी विभाजित किया जाता है, जिसका विकास विशेष रूप से ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्व-पश्चिम महाविभाजन से जुड़ा है।

इन परंपराओं में धार्मिक सिद्धांतों, चर्च संगठन, पूजा-पद्धति, संस्कारों और पादरी व्यवस्था के संबंध में महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं। फिर भी नाइसीन क्रीड को कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स, ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स तथा अनेक प्रमुख प्रोटेस्टेंट परंपराएँ ईसाई विश्वास की महत्त्वपूर्ण आधारभूत घोषणा के रूप में स्वीकार करती हैं।

कैथोलिक चर्च

कैथोलिक चर्च उन विशिष्ट चर्चों का समुदाय है जिनका नेतृत्व बिशप करते हैं और जो रोम के बिशप अर्थात् पोप के साथ पूर्ण धार्मिक एकता में रहते हैं। कैथोलिक परंपरा पोप को आस्था, नैतिकता और चर्च के प्रशासन से जुड़े मामलों में सर्वोच्च धार्मिक नेता मानती है। कैथोलिक चर्च अपनी उत्पत्ति यीशु मसीह द्वारा स्थापित ईसाई समुदाय और प्रेरितों की परंपरा से जोड़ता है।

कैथोलिक विश्वास का विस्तृत विवरण कैटेकिज़्म ऑफ द कैथोलिक चर्च में मिलता है। कैथोलिक चर्च सात संस्कारों को मान्यता देता है, जिनमें यूचरिस्ट का विशेष महत्त्व है। यूचरिस्ट का आयोजन मास के दौरान किया जाता है। कैथोलिक शिक्षा के अनुसार पवित्र संस्कार में अभिषिक्त रोटी और दाखरस मसीह के शरीर और रक्त में परिवर्तित होते हैं।

वर्जिन मैरी को कैथोलिक परंपरा में ईश्वर की माता के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। कैथोलिक सामाजिक शिक्षा दया, न्याय और मानव सेवा पर बल देती है तथा गरीबों, बीमारों और पीड़ितों की सहायता को धार्मिक कर्तव्य का महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानती है। कैथोलिक चर्च ने विश्वभर में विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, अनाथालयों तथा अनेक धर्मार्थ संस्थाओं की स्थापना की है।

कैनन विधि और वैश्विक संगठन

कैनन विधि कैथोलिक चर्च के संगठन, प्रशासन और धार्मिक अनुशासन को नियंत्रित करने वाली कानून एवं कानूनी सिद्धांतों की व्यवस्था है। लैटिन चर्च की कैनन विधि पश्चिमी जगत की सबसे पुरानी निरंतर विकसित कानूनी परंपराओं में से एक है। पूर्वी कैथोलिक चर्चों के लिए अलग-अलग कैनन परंपराएँ भी विकसित हुई हैं।

कैथोलिक चर्च विश्व का सबसे बड़ा एकल ईसाई चर्च है। इसके अनुयायी यूरोप और अमेरिका के अतिरिक्त अफ्रीका, एशिया तथा ओशिनिया में भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। मिशनरी गतिविधियों, प्रवासन और धर्म-परिवर्तन ने इसके वैश्विक विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च

ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च में पूर्वी ईसाई परंपरा के वे चर्च शामिल हैं जो विभिन्न पैट्रियार्कल सीज़ और स्वायत्त चर्चों से जुड़े हैं। इनमें कॉन्स्टेंटिनोपल के एक्यूमेनिकल पैट्रियार्केट का विशेष ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके प्रमुख को ‘प्राइमस इंटर पेरेस’ अर्थात् ‘बराबर वालों में प्रथम’ माना जाता है।

ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च अपनी धार्मिक विरासत को प्रेरितों की परंपरा, पवित्र धर्मग्रंथ, प्रारंभिक चर्च फादर्स की शिक्षाओं और सात इकुमेनिकल काउंसिलों की परंपरा से जोड़ता है। इसके विभिन्न चर्च प्रशासनिक रूप से काफी हद तक स्वायत्त हैं और अनेक राष्ट्रीय चर्चों के रूप में संगठित हैं।

ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स परंपरा सात प्रमुख संस्कारों को स्वीकार करती है। इनमें यूचरिस्ट का विशेष महत्त्व है और इसका आयोजन सामूहिक धार्मिक सभा में किया जाता है। वर्जिन मैरी को ‘थियोटोकॉस’ अर्थात् ‘ईश्वर को जन्म देने वाली’ के रूप में सम्मान दिया जाता है। इनके प्रमुख समुदाय रूस, दक्षिण-पूर्वी यूरोप, पूर्वी यूरोप, साइप्रस, जॉर्जिया और काकेशस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त मध्य पूर्व, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी इनके समुदाय हैं।

ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स चर्च

ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स चर्च उन प्राचीन पूर्वी चर्चों का समूह है जो निकिया, कॉन्स्टेंटिनोपल और इफिसुस की पहली तीन इकुमेनिकल परिषदों को स्वीकार करते हैं, किंतु 451 ईस्वी की कैल्सेडन परिषद की धार्मिक परिभाषाओं को स्वीकार नहीं करते। इन चर्चों की धर्मशास्त्रीय परंपरा को सामान्यतः मियाफाइसाइट क्राइस्टोलॉजी से जोड़ा जाता है।

इस परंपरा में सीरियाक ऑर्थोडॉक्स चर्च, कॉप्टिक ऑर्थोडॉक्स चर्च, इथियोपियन ऑर्थोडॉक्स चर्च, इरिट्रियन ऑर्थोडॉक्स चर्च, मलंकारा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और अर्मेनियाई अपोस्टोलिक चर्च शामिल हैं। ये चर्च धार्मिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, किंतु प्रशासनिक रूप से स्वतंत्र हैं।

ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स चर्चों ने आर्मेनिया, मिस्र, इथियोपिया, इरिट्रिया, सीरिया, भारत और मध्य पूर्व के इतिहास तथा संस्कृति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनके कुछ समुदायों में पुराने नियम से संबंधित कुछ सांस्कृतिक-धार्मिक प्रथाओं की झलक भी मिलती है।

चर्च ऑफ द ईस्ट

चर्च ऑफ द ईस्ट का विकास प्राचीन पूर्वी ईसाई परंपरा में हुआ। 431 ईस्वी की एफेसुस परिषद के बाद रोमन और फ़ारसी साम्राज्यों के बीच धार्मिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इसका विकास एक विशिष्ट दिशा में हुआ। बाद में फ़ारस की मुस्लिम विजय के पश्चात यह इस्लामी शासन के अधीन एक धिम्मी समुदाय के रूप में अस्तित्व में रहा।

नौवीं से चौदहवीं शताब्दी के बीच चर्च ऑफ द ईस्ट का भौगोलिक विस्तार अत्यंत व्यापक था। इसके धर्मप्रांत और ईसाई समुदाय मेसोपोटामिया, ईरान, मध्य एशिया, भारत और चीन तक फैले हुए थे। तांग राजवंश के काल में चीन में भी इसके समुदाय स्थापित हुए। मंगोल साम्राज्य के दौरान इसका विस्तार कुछ समय के लिए और बढ़ा तथा इसके धर्मगुरुओं का मंगोल दरबार से संपर्क रहा।

असीरियन चर्च ऑफ द ईस्ट

असीरियन चर्च ऑफ द ईस्ट ऐतिहासिक चर्च ऑफ द ईस्ट की परंपरा से अपनी निरंतरता का दावा करता है। यह एक स्वतंत्र पूर्वी ईसाई चर्च है और अपनी पारंपरिक क्राइस्टोलॉजी तथा एक्लेसियोलॉजी का पालन करता है। इसकी पूजा-पद्धति में ईस्ट सीरियाक राइट का प्रयोग होता है।

सीरियाक इसकी प्रमुख धार्मिक भाषा है, जो पूर्वी अरामी की एक शाखा है। इसके समुदाय ईरान, इराक, सीरिया, तुर्की, भारत तथा विभिन्न प्रवासी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इसके प्रशासनिक ढाँचे में पैट्रियार्क, मेट्रोपॉलिटन बिशप, डायोसेसन बिशप, पादरी और डीकन शामिल हैं।

एंशिएंट चर्च ऑफ द ईस्ट

एंशिएंट चर्च ऑफ द ईस्ट 1964 ईस्वी में असीरियन चर्च ऑफ द ईस्ट से अलग हुआ। यह भी ऐतिहासिक चर्च ऑफ द ईस्ट की परंपरा से अपनी निरंतरता का दावा करता है और मेसोपोटामिया की प्राचीन ईसाई विरासत से जुड़ा है। इसके अनुयायियों में असीरियन समुदाय की प्रमुखता है।

प्रोटेस्टेंट धर्म

सुधार आंदोलन की उत्पत्ति

प्रोटेस्टेंट धर्म का उदय सोलहवीं शताब्दी के सुधार आंदोलन से हुआ। 1521 ईस्वी के एडिक्ट ऑफ वर्म्स के माध्यम से मार्टिन लूथर की शिक्षाओं की निंदा की गई और उन्हें पवित्र रोमन साम्राज्य में प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके बाद रोमन कैथोलिक चर्च के भीतर धार्मिक सुधार की प्रक्रिया ने व्यापक रूप ग्रहण किया।

मार्टिन लूथर, हुल्ड्रिख ज़्विंगली और जॉन कैल्विन इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे। 1529 ईस्वी में स्पेयर में हुए विरोध के कारण सुधार समर्थकों के लिए ‘प्रोटेस्टेंट’ शब्द प्रचलित हुआ। लूथर के अनुयायी लूथरन कहलाए, जबकि ज़्विंगली और कैल्विन से संबंधित परंपराएँ आगे चलकर सुधारवादी परंपरा के रूप में विकसित हुईं। एंग्लिकन परंपरा चर्च ऑफ इंग्लैंड से विकसित हुई और बाद में एंग्लिकन कम्युनियन के रूप में संगठित हुई।

मैजिस्टीरियल और रैडिकल रिफॉर्मेशन

एंग्लिकन, लूथरन और सुधारवादी शाखाओं का विकास कई स्थानों पर राज्य या शासकीय संस्थाओं के सहयोग से हुआ। इसलिए इन्हें मैजिस्टीरियल रिफॉर्मेशन कहा जाता है। इसके विपरीत एनाबैपटिस्ट जैसे समूह रैडिकल रिफॉर्मेशन से जुड़े थे। वे शिशु बपतिस्मा को स्वीकार नहीं करते थे और वयस्क विश्वासियों के बपतिस्मा अर्थात् क्रेडोबपटिज़्म पर बल देते थे।

एनाबैपटिस्ट परंपरा से अमिश, मेनोनाइट, हटराइट और ब्रुडरहोफ़ जैसे विभिन्न समुदाय विकसित हुए। इन समूहों की धार्मिक और सामाजिक संरचना प्रोटेस्टेंट धर्म की मुख्यधारा से कई मामलों में अलग रही।

मेथोडिज़्म और आधुनिक प्रोटेस्टेंट आंदोलन

अठारहवीं शताब्दी में एंग्लिकन पादरी जॉन वेस्ले के धार्मिक पुनरुद्धार आंदोलन से मेथोडिज़्म का विकास हुआ। बाद में अनेक पेंटेकोस्टल और नॉन-डिनोमिनेशनल चर्चों पर मेथोडिस्ट तथा इवेंजेलिकल परंपराओं का प्रभाव पड़ा।

मेथोडिस्ट, पेंटेकोस्टल और अनेक इवेंजेलिकल समुदाय व्यक्तिगत विश्वास, यीशु मसीह को प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने तथा ‘नए जन्म’ की धार्मिक धारणा पर बल देते हैं। इसी कारण इनमें ‘बॉर्न अगेन’ ईसाई पहचान का प्रयोग भी प्रचलित हुआ। इक्कीसवीं शताब्दी में इवेंजेलिकल, पेंटेकोस्टल और स्वतंत्र प्रोटेस्टेंट समुदायों का विस्तार विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में हुआ है।

नॉन-डिनोमिनेशनल ईसाई धर्म

नॉन-डिनोमिनेशनल ईसाई धर्म में वे चर्च और समुदाय शामिल हैं जो किसी विशिष्ट ऐतिहासिक ईसाई संप्रदाय से औपचारिक रूप से संबद्ध नहीं होते। इनका विकास विशेष रूप से आधुनिक इवेंजेलिकल और रेस्टोरेशनिस्ट परंपराओं के प्रभाव में हुआ। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में स्टोन-कैंपबेल रेस्टोरेशन आंदोलन ने इस प्रवृत्ति के विकास में योगदान दिया।

इन समुदायों में स्वयं को केवल ‘ईसाई’ या ‘मसीह के अनुयायी’ कहने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। अनेक नॉन-डिनोमिनेशनल चर्च इवेंजेलिकल धर्मशास्त्र से प्रभावित हैं और व्यक्तिगत विश्वास, बाइबिल के अध्ययन तथा स्थानीय चर्च समुदाय पर विशेष बल देते हैं।

धार्मिक रीतियाँ और संस्कार

ईसाई धर्म की विभिन्न शाखाओं में धार्मिक रीतियों और संस्कारों की संख्या तथा स्वरूप अलग-अलग हैं। बपतिस्मा, यूकेरिस्ट या प्रभु-भोज, प्रार्थना, पाप-स्वीकारोक्ति, पुष्टि-संस्कार, अंतिम संस्कार, विवाह तथा बच्चों की धार्मिक शिक्षा प्रमुख धार्मिक विधियों में शामिल हैं। अधिकांश चर्चों में नियुक्त पादरी या अन्य धार्मिक अधिकारी सामूहिक उपासना का संचालन करते हैं।

ईसाई धर्म में कोई एक अनिवार्य पवित्र भाषा निर्धारित नहीं है। प्रारंभिक ईसाई धर्म में यूनानी, लैटिन और सीरियाक प्रमुख धार्मिक भाषाएँ थीं। समय के साथ विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ता गया और आज ईसाई उपासना अनेक भाषाओं में संपन्न होती है।

सामूहिक उपासना

ईसाई सामूहिक उपासना का निर्धारित क्रम ‘लिटर्जी’ अर्थात् धार्मिक पूजा-विधि कहलाता है। दूसरी शताब्दी के ईसाई लेखक जस्टिन मार्टर ने अपनी ‘फर्स्ट अपोलॉजी’ में अपने समय की ईसाई उपासना का वर्णन किया है। उनके अनुसार ईसाई रविवार को एकत्र होते थे, धर्मग्रंथों का पाठ सुनते थे, उपदेश ग्रहण करते थे, सामूहिक प्रार्थना करते थे और रोटी तथा दाखरस के साथ यूकेरिस्ट मनाते थे। संपन्न सदस्य जरूरतमंदों की सहायता के लिए दान भी देते थे।

प्रारंभिक ईसाई उपासना की यह संरचना आगे चलकर विभिन्न लिटर्जिकल परंपराओं के विकास का आधार बनी। सामान्यतः रविवार को ‘प्रभु का दिन’ मानकर ईसाई सामूहिक उपासना के लिए एकत्र होते हैं। धर्मग्रंथ के पाठ के बाद उपदेश या प्रवचन दिया जाता है। सामूहिक प्रार्थनाओं में धन्यवाद, पाप-स्वीकार, याचना और दूसरों के लिए मध्यस्थता शामिल होती है। अनेक चर्चों में भजन, स्तुति-गीत और धार्मिक संगीत भी उपासना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

यूकेरिस्ट या प्रभु-भोज

लगभग सभी ऐतिहासिक ईसाई परंपराओं में यूकेरिस्ट या प्रभु-भोज का विशेष महत्त्व है। इसमें रोटी और दाखरस अथवा उनके धार्मिक विकल्पों का प्रयोग किया जाता है। इसका आधार यीशु का अंतिम भोज है, जिसमें उन्होंने अपने शिष्यों को उनकी स्मृति में इस अनुष्ठान को जारी रखने का निर्देश दिया था।

आधुनिक काल में विभिन्न चर्चों में प्रभु-भोज के संबंध में अलग-अलग नियम हैं। कुछ लूथरन चर्च सीमित प्रभु-भोज की व्यवस्था रखते हैं, जबकि एंग्लिकन और मेथोडिस्ट परंपराओं के अनेक चर्च खुले प्रभु-भोज की व्यवस्था रखते हैं।

संस्कार और धार्मिक विधियाँ

ईसाई धर्म में ‘सैक्रामेंट’ अर्थात् धार्मिक संस्कार से आशय ऐसी पवित्र धार्मिक विधि से है जिसे मसीह से संबंधित माना जाता है और जिसके माध्यम से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। यह शब्द लैटिन ‘सैक्रामेंटम’ से निकला है, जिसका प्रयोग यूनानी ‘मिस्टेरियन’ अर्थात् रहस्य के अनुवाद के रूप में किया गया।

अधिकांश ईसाई परंपराएँ बपतिस्मा और यूकेरिस्ट को प्रमुख संस्कार मानती हैं। कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स और ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स चर्च सात संस्कार स्वीकार करते हैं—बपतिस्मा, यूकेरिस्ट, कन्फर्मेशन या क्रिस्मेशन, पाप-स्वीकारोक्ति या पेनेंस, बीमारों का अभिषेक, धार्मिक पद पर नियुक्ति और विवाह।

कुछ लूथरन तथा एंग्लिकन चर्च सात संस्कारों की परंपरा के कुछ रूपों को स्वीकार करते हैं, जबकि अधिकांश प्रोटेस्टेंट परंपराएँ मुख्यतः बपतिस्मा और प्रभु-भोज को संस्कार मानती हैं। क्वेकर जैसे कुछ समुदाय संस्कारात्मक धर्मशास्त्र को स्वीकार नहीं करते। एनाबैपटिस्ट परंपराओं में मसीह द्वारा अनुयायियों के लिए निर्धारित धार्मिक कार्यों के लिए ‘ऑर्डिनेंस’ अर्थात् धार्मिक विधि शब्द अधिक प्रचलित है।

बपतिस्मा

बपतिस्मा जल के माध्यम से संपन्न होने वाली ईसाई धार्मिक विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति को ईसाई समुदाय में प्रवेश दिया जाता है। इसके धार्मिक महत्त्व और विधि को लेकर विभिन्न ईसाई संप्रदायों में मतभेद हैं।

कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स, लूथरन और एंग्लिकन परंपराएँ बपतिस्मा को आध्यात्मिक रूप से प्रभावकारी संस्कार मानती हैं। इसके विपरीत बैपटिस्ट और प्लायमाउथ ब्रेथरेन परंपराएँ इसे मुख्यतः विश्वास के सार्वजनिक प्रतीक के रूप में देखती हैं।

बपतिस्मा की प्रमुख विधियों में जल में डुबाना, पूर्ण निमज्जन, पानी डालना और पानी छिड़कना शामिल हैं। ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्चों में शिशु बपतिस्मा की परंपरा है और सामान्यतः पिता, पुत्र तथा पवित्र आत्मा के नाम पर जल में तीन बार निमज्जन किया जाता है। कैथोलिक और लूथरन चर्चों में भी शिशु बपतिस्मा प्रचलित है।

एनाबैपटिस्ट परंपराएँ आस्थावानों के बपतिस्मा को स्वीकार करती हैं। इसमें व्यक्ति स्वयं यीशु का अनुसरण करने का निर्णय लेने के बाद बपतिस्मा ग्रहण करता है। मेनोनाइट, अमिश और हटराइट समुदायों में जल डालने की विधि प्रचलित है, जबकि कुछ अन्य एनाबैपटिस्ट परंपराओं में पूर्ण जल-निमज्जन की विधि अपनाई जाती है।

प्रार्थना

ईसाई धर्म में प्रार्थना परमेश्वर के साथ संवाद और संबंध स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम है। मत्ती के सुसमाचार में यीशु द्वारा सिखाई गई ‘प्रभु की प्रार्थना’ ईसाई प्रार्थना का आदर्श मानी जाती है। ‘डिडाके’ में ईसाइयों को दिन में तीन बार प्रभु की प्रार्थना करने का निर्देश मिलता है।

दूसरी शताब्दी की ‘अपोस्टोलिक ट्रेडिशन’ में प्रार्थना के सात निश्चित समयों का उल्लेख मिलता है। इनमें जागने का समय, शाम, सोने का समय, आधी रात तथा दिन के तीसरे, छठे और नौवें घंटे शामिल थे। प्रारंभिक ईसाई परंपरा में घुटने टेककर, खड़े होकर और दंडवत होकर प्रार्थना करने की मुद्राएँ भी प्रचलित थीं।

पूर्वी ईसाई परंपराओं में निर्धारित प्रार्थना-समयों के लिए विशेष प्रार्थना-पुस्तकों का उपयोग किया जाता है। कुछ पूर्वी परंपराओं में प्रार्थना करते समय पूर्व दिशा की ओर मुख करने की प्रथा भी है। मध्यस्थता की प्रार्थना दूसरे लोगों के कल्याण के लिए की जाने वाली प्रार्थना है।

पूर्वी और पश्चिमी ईसाई परंपराओं में संतों से मध्यस्थता की प्रार्थना करने की परंपरा विकसित हुई। यह कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स तथा कुछ लूथरन और एंग्लिकन चर्चों में आज भी विद्यमान है। इसके विपरीत अधिकांश प्रोटेस्टेंट सुधारवादी परंपराएँ मसीह को एकमात्र मध्यस्थ मानते हुए संतों से प्रार्थना करने की प्रथा को स्वीकार नहीं करतीं।

विवाह

ईसाई धर्म में विवाह को पारंपरिक रूप से पुरुष और महिला के बीच धार्मिक तथा सामाजिक बंधन के रूप में देखा गया है। विभिन्न ईसाई संप्रदायों में विवाह की धार्मिक मान्यता और समलैंगिक विवाह के संबंध में अलग-अलग दृष्टिकोण विकसित हुए हैं। कुछ चर्च समलैंगिक विवाह को धार्मिक आशीर्वाद देने की अनुमति देते हैं, जबकि अनेक अन्य चर्च इसे स्वीकार नहीं करते। इस विषय पर ईसाई धर्म के भीतर आधुनिक धर्मशास्त्रीय और सामाजिक बहस जारी है।

धार्मिक कैलेंडर और प्रमुख पर्व

कैथोलिक, पूर्वी ईसाई, लूथरन, एंग्लिकन और अनेक पारंपरिक प्रोटेस्टेंट चर्च अपनी पूजा-पद्धति को ‘लिटर्जिकल ईयर’ अर्थात् धार्मिक वर्ष के अनुसार व्यवस्थित करते हैं। धार्मिक वर्ष को विभिन्न मौसमों और कालखंडों में बाँटा जाता है और प्रत्येक का अपना धार्मिक महत्त्व होता है।

धार्मिक वर्ष के दौरान चर्च की सजावट, पादरियों के वस्त्र, धार्मिक रंग, धर्मग्रंथों के पाठ और उपदेश के विषयों में परिवर्तन किया जाता है। पश्चिमी ईसाई धार्मिक कैलेंडर मुख्यतः रोमन रीति पर आधारित है, जबकि पूर्वी ईसाई अपने-अपने धार्मिक चक्रों के अनुसार कैलेंडर का उपयोग करते हैं।

क्रिसमस, ईस्टर और पेंटेकोस्ट प्रमुख ईसाई पर्व हैं। क्रिसमस में यीशु के जन्म, ईस्टर में उनके पुनरुत्थान और पेंटेकोस्ट में शिष्यों पर पवित्र आत्मा के अवतरण की स्मृति मनाई जाती है। लेंट जैसे उपवास-काल भी धार्मिक वर्ष का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। कुछ ईसाई समुदाय, जैसे क्वेकर, औपचारिक धार्मिक कैलेंडर का उपयोग नहीं करते।

ईसाई प्रतीक

क्रूस ईसाई धर्म का सबसे प्रसिद्ध प्रतीक है। प्रारंभिक ईसाई काल से ही इसका धार्मिक महत्त्व रहा है। टर्टुलियन ने दूसरी और तीसरी शताब्दी के संधिकाल में ईसाइयों द्वारा माथे पर क्रूस का चिह्न बनाने की परंपरा का उल्लेख किया था। हालांकि क्रूस का प्रयोग प्रारंभिक काल में ही मिलता है, किंतु यीशु की आकृति वाले क्रूस अर्थात् क्रूसिफिक्स का व्यापक उपयोग बाद की शताब्दियों में विकसित हुआ।

प्रारंभिक ईसाई प्रतीकों में मछली या ‘इक्थिस’ का विशेष महत्त्व था। यूनानी शब्द ‘इक्थिस’ को उस संक्षिप्त धार्मिक वाक्य से जोड़ा जाता है जिसका अर्थ है—“यीशु मसीह, परमेश्वर के पुत्र, उद्धारकर्ता।” अन्य प्रमुख ईसाई प्रतीकों में ची-रो मोनोग्राम, कबूतर, जैतून की शाखा, बलि का मेमना और अंगूर की बेल शामिल हैं।

धर्मग्रंथ और बाइबिल

बाइबिल ईसाई धर्म का प्रमुख पवित्र ग्रंथ है। इसमें मुख्यतः पुराना नियम और नया नियम शामिल हैं। ईसाई परंपरा बाइबिल को परमेश्वर से प्रेरित वचन मानती है, हालांकि इसके अर्थ, अधिकार और व्याख्या को लेकर विभिन्न संप्रदायों में मतभेद हैं।

परंपरागत ईसाई दृष्टिकोण के अनुसार परमेश्वर ने मानवीय लेखकों के माध्यम से कार्य किया ताकि उनके द्वारा लिखे गए ग्रंथ उनकी इच्छा को व्यक्त करें। दूसरी तीमुथियुस 3:16 में प्रेरणा के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द ‘थियोपन्यूस्टोस’ है, जिसका अर्थ लगभग ‘ईश्वर द्वारा प्रेरित’ या ‘ईश्वर की श्वास से उत्पन्न’ है।

बाइबिल की त्रुटिहीनता के विषय में ईसाई धर्म में विभिन्न दृष्टिकोण हैं। कुछ ईसाई मानते हैं कि ईश्वरीय प्रेरणा के कारण बाइबिल में कोई त्रुटि नहीं है। कुछ अन्य मानते हैं कि मूल पांडुलिपियाँ त्रुटिहीन थीं, किंतु वे मूल प्रतियाँ अब उपलब्ध नहीं हैं। एक अन्य दृष्टिकोण यह मानता है कि बाइबिल मुक्ति से संबंधित विषयों में पूर्णतः विश्वसनीय है, जबकि इतिहास, भूगोल या विज्ञान जैसे विषयों में मानवीय सीमाएँ दिखाई दे सकती हैं।

बाइबिल का कैनन

प्रोटेस्टेंट चर्चों द्वारा स्वीकार किया गया पुराने नियम का कैनन कैथोलिक और ऑर्थोडॉक्स चर्चों के कैनन से छोटा है। कैथोलिक और ऑर्थोडॉक्स परंपराओं में उन अतिरिक्त पुस्तकों को भी स्वीकार किया जाता है जिन्हें ड्यूटेरोकैनोनिकल कहा जाता है और जिनका संबंध मुख्यतः सेप्टुआजेंट परंपरा से है। प्रोटेस्टेंट परंपराएँ सामान्यतः इन पुस्तकों को अपोक्रिफा कहती हैं।

नए नियम में 27 पुस्तकें हैं और सभी प्रमुख ईसाई चर्च इन्हें स्वीकार करते हैं। नया नियम मुख्यतः कोइने यूनानी भाषा में लिखा गया था। कुछ ईसाई धार्मिक आंदोलनों में बाइबिल के अतिरिक्त अन्य धार्मिक ग्रंथों को भी आधिकारिक महत्त्व दिया जाता है।

बाइबिल की व्याख्या

प्राचीन व्याख्यात्मक परंपराएँ

प्राचीन ईसाई धर्म में अलेक्जेंड्रिया और एंटिओक दो महत्त्वपूर्ण व्याख्यात्मक केंद्र बने। अलेक्जेंड्रिया की परंपरा, जिसका प्रतिनिधित्व ओरिजेन जैसे धर्मशास्त्री करते थे, धर्मग्रंथ के प्रतीकात्मक और रूपकात्मक अर्थ पर अधिक बल देती थी। इसके विपरीत एंटिओक की परंपरा पाठ के शाब्दिक और ऐतिहासिक अर्थ को अधिक महत्त्व देती थी तथा प्रतीकात्मक अर्थ को शाब्दिक अर्थ पर आधारित मानती थी।

कैथोलिक व्याख्या

कैथोलिक धर्मशास्त्र धर्मग्रंथ के दो प्रमुख अर्थों में अंतर करता है—शाब्दिक अर्थ और आध्यात्मिक अर्थ। आध्यात्मिक अर्थ को रूपकात्मक, नैतिक और एनागॉजिकल अर्थों में विभाजित किया जाता है।

रूपकात्मक अर्थ में पुराने नियम की घटनाओं को नए नियम और ईसाई विश्वास की घटनाओं के संकेत के रूप में समझा जाता है। नैतिक अर्थ धर्मग्रंथ में निहित नैतिक शिक्षाओं और मनुष्य के आचरण से संबंधित है, जबकि एनागॉजिकल अर्थ अंतिम समय, अनंत जीवन और संसार की अंतिम पूर्णता से संबंधित है।

कैथोलिक धर्मशास्त्र के अनुसार धर्मग्रंथ के आध्यात्मिक अर्थ शाब्दिक अर्थ से अलग होकर स्वतंत्र नहीं हो सकते। सुसमाचारों की ऐतिहासिकता को स्वीकार किया जाता है और धर्मग्रंथ को चर्च की जीवंत परंपरा के संदर्भ में पढ़ा जाता है। इसकी आधिकारिक व्याख्या का दायित्व पोप और उनके साथ एकता में रहने वाले बिशपों से संबंधित माना जाता है।

प्रोटेस्टेंट व्याख्या

प्रोटेस्टेंट ईसाइयों में धर्मग्रंथ के अधिकार और व्याख्या को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण हैं। लूथरन और रिफॉर्म्ड परंपराओं में ‘सोला स्क्रिप्टुरा’ अर्थात् ‘केवल धर्मग्रंथ’ का सिद्धांत महत्त्वपूर्ण है। इसके अनुसार बाइबिल ईसाई सिद्धांतों के लिए सर्वोच्च और अंतिम धार्मिक अधिकार है।

मेथोडिस्ट और एंग्लिकन परंपराओं में ‘प्राइमा स्क्रिप्टुरा’ अर्थात् ‘धर्मग्रंथ की प्रधानता’ का सिद्धांत अधिक प्रचलित है। इसके अनुसार बाइबिल ईसाई विश्वास का मुख्य स्रोत है, किंतु परंपरा, अनुभव और तर्क भी धर्मशास्त्रीय समझ को समृद्ध कर सकते हैं, बशर्ते वे धर्मग्रंथ के मूल संदेश के अनुरूप हों।

कई प्रोटेस्टेंट मानते हैं कि सामान्य विश्वासी भी पवित्र धर्मग्रंथ को समझ सकते हैं क्योंकि उसका मुख्य संदेश पर्याप्त रूप से स्पष्ट है। मार्टिन लूथर ने धर्मग्रंथ की स्पष्ट और सरल समझ पर बल दिया। जॉन कैल्विन ने भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में धर्मग्रंथ को समझने की क्षमता पर जोर दिया।

प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र में धर्मग्रंथ की प्रभावशीलता और पर्याप्तता पर विशेष बल दिया जाता है। प्रभावशीलता का अर्थ है कि धर्मग्रंथ मनुष्य को विश्वास की ओर ले जाने में सक्षम है, जबकि पर्याप्तता का अर्थ है कि मुक्ति प्राप्त करने और ईसाई जीवन जीने के लिए आवश्यक शिक्षाएँ धर्मग्रंथ में उपलब्ध हैं।

धर्मग्रंथ के मूल अर्थ की व्याख्या

प्रोटेस्टेंट व्याख्या में धर्मग्रंथ के मूल अर्थ को निर्धारित करने के लिए ऐतिहासिक-व्याकरणिक विधि महत्त्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य उस मूल अर्थ को समझना है जिसे पाठ के प्रारंभिक लेखक और पाठक समझते थे।

इस पद्धति में व्याकरण, वाक्य-विन्यास, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, साहित्यिक शैली और धर्मग्रंथ के व्यापक संदर्भ का अध्ययन किया जाता है। यह पाठ के मूल अर्थ और उसके बाद के धार्मिक उपयोग या अनुप्रयोग के बीच अंतर करती है। कुछ प्रोटेस्टेंट व्याख्याकार टाइपोलॉजी का भी प्रयोग करते हैं, जिसके अंतर्गत पुराने नियम की कुछ घटनाओं, व्यक्तियों या प्रतीकों को बाद में यीशु मसीह और ईसाई मुक्ति-संदेश में पूर्ण होने वाले पूर्वसंकेत के रूप में समझा जाता है।

ईसाई धर्म की जनसांख्यिकी

प्यू रिसर्च सेंटर के 2020 ईस्वी के अनुमान के अनुसार लगभग 2.3 अरब अनुयायियों के साथ ईसाई धर्म विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय था और विश्व की लगभग 28.8 प्रतिशत आबादी ईसाई थी। ईसाई समुदाय मुख्यतः कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स जैसी प्रमुख परंपराओं में विभाजित है।

पिछली लगभग एक शताब्दी में विश्व की कुल जनसंख्या में ईसाइयों का अनुपात मोटे तौर पर एक-तिहाई के आसपास रहा है, किंतु इस स्थिरता के पीछे ईसाई आबादी के भौगोलिक वितरण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे विकसित क्षेत्रों में ईसाई आबादी के अनुपात में कमी आई है, जबकि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों में ईसाई समुदायों का विस्तार हुआ है।

ईसाई आबादी का एक बड़ा हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राज़ील, मेक्सिको, फिलीपींस, रूस, नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इथियोपिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली जैसे देशों में केंद्रित है।

क्षेत्रीय परिवर्तन

2010 ईस्वी में विश्व की लगभग 87 प्रतिशत ईसाई आबादी ऐसे देशों में रहती थी जहाँ ईसाई बहुसंख्यक थे, जबकि लगभग 13 प्रतिशत ईसाई ऐसे देशों में रहते थे जहाँ वे अल्पसंख्यक थे। यूरोप, अमेरिका, ओशिनिया और उप-सहारा अफ्रीका में ईसाई धर्म प्रमुख धार्मिक परंपराओं में से एक है। मध्य एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में भी महत्त्वपूर्ण ईसाई समुदाय पाए जाते हैं।

आर्मेनिया, साइप्रस, जॉर्जिया, पूर्वी तिमोर और फिलीपींस में ईसाई धर्म प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। दूसरी ओर, उत्तरी और पश्चिमी यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, कनाडा तथा कुछ अन्य पश्चिमी देशों में ईसाई आबादी के अनुपात में गिरावट देखी गई है। मध्य पूर्व में राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष और प्रवासन के कारण भी कई देशों में ईसाई समुदायों की संख्या कम हुई है।

पश्चिमी देशों में स्थिति

पश्चिमी देशों में ईसाई धर्म के अनुयायियों की संख्या और धार्मिक भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में कमी आई है, फिर भी यह क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में बना हुआ है। पश्चिमी यूरोप में अनेक लोग स्वयं को ईसाई मानते हैं, किंतु नियमित धार्मिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी कई देशों में पहले की तुलना में कम हुई है।

विकसित देशों में चर्च जाने की दर में गिरावट को अनेक विद्वान पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं से बढ़ती दूरी तथा धार्मिक विश्वासों के सामाजिक महत्त्व में कमी से जोड़ते हैं। इसके विपरीत लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के अनेक देशों में ईसाई धार्मिक जीवन अधिक सक्रिय है।

प्रोटेस्टेंट और करिश्माई आंदोलनों का विस्तार

बीसवीं शताब्दी के दौरान प्रोटेस्टेंट धर्म ने अफ्रीका, एशिया, ओशिनिया और लैटिन अमेरिका में तेजी से विस्तार किया। विशेष रूप से इवेंजेलिकल और पेंटेकोस्टल आंदोलनों की वृद्धि उल्लेखनीय रही। करिश्माई ईसाई आंदोलन भी अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के अनेक हिस्सों में व्यापक रूप से स्थापित हुए।

इन आंदोलनों में व्यक्तिगत धार्मिक अनुभव, पवित्र आत्मा, उपचार, प्रार्थना और यीशु मसीह को व्यक्तिगत रूप से उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने पर विशेष बल दिया जाता है। दक्षिण-पूर्वी एशिया में भी ईसाई धर्म का विस्तार हुआ और सिंगापुर, चीन, हांगकांग, ताइवान, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया तथा वियतनाम में नए ईसाई समुदाय विकसित हुए।

राजकीय धर्म और आधिकारिक मान्यता

कुछ देशों में ईसाई धर्म की किसी परंपरा को राजकीय धर्म या विशेष संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। उदाहरण के लिए, डेनमार्क और नॉर्वे में लूथरन परंपरा, इंग्लैंड में एंग्लिकन परंपरा, ग्रीस में ग्रीक ऑर्थोडॉक्स परंपरा तथा माल्टा, मोनाको और वेटिकन सिटी में कैथोलिक परंपरा को विशेष धार्मिक स्थिति प्राप्त है। कुछ अन्य देशों में किसी संप्रदाय को राजकीय धर्म का दर्जा न होते हुए भी उसे विशेष संवैधानिक या कानूनी मान्यता प्राप्त है।

ईसाई संस्कृति और सांस्कृतिक प्रभाव

ईसाई जगत का इतिहास लगभग दो सहस्राब्दियों में विकसित हुआ है। इस दौरान ईसाई धर्म ने सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ कला, वास्तुकला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और शिक्षा के विकास को प्रभावित किया। प्रारंभिक ईसाई धर्म के लेवांत से यूरोप और उत्तरी अफ्रीका तक प्रसार के बाद विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट ईसाई संस्कृतियाँ विकसित हुईं।

पश्चिमी ईसाई जगत का प्रमुख केंद्र रोम और बाद में पश्चिमी यूरोप रहा, जबकि पूर्वी ईसाई परंपराओं के प्रमुख केंद्र कॉन्स्टेंटिनोपल, एंटिओक और अलेक्जेंड्रिया जैसे नगर रहे। बाइजेंटाइन साम्राज्य पूर्वी ईसाई सभ्यता के विकास का एक प्रमुख केंद्र बना।

बाइबिल और पश्चिमी सभ्यता पर प्रभाव

बाइबिल ने पश्चिमी सभ्यता और विश्व की अनेक संस्कृतियों पर गहरा प्रभाव डाला। इसका प्रभाव कानून, राजनीति, नैतिकता, साहित्य, कला, शिक्षा, पारिवारिक जीवन और सामाजिक संस्थाओं तक दिखाई देता है। लगभग दो हजार वर्षों में विकसित इसकी साहित्यिक परंपरा ने पश्चिमी साहित्य और विचारधारा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ईसाई विचारकों ने दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, ललित कला, वास्तुकला, राजनीति, साहित्य, संगीत और सामाजिक सेवा सहित अनेक क्षेत्रों में योगदान दिया। मध्ययुगीन यूरोप में मठों और चर्च संस्थाओं ने शिक्षा तथा ज्ञान के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस्लामी सभ्यता पर प्रभाव

पश्चिमी जगत के बाहर भी ईसाई विद्वानों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्ययुगीन इस्लामी सभ्यता में पूर्वी ईसाई विद्वानों ने यूनानी दार्शनिक और वैज्ञानिक ग्रंथों के संरक्षण तथा अनुवाद में योगदान दिया। उन्होंने अनेक यूनानी रचनाओं का पहले सीरियाक और बाद में अरबी में अनुवाद किया तथा दर्शन, चिकित्सा, विज्ञान और धर्मशास्त्र के विकास में योगदान दिया।

मध्य पूर्व, ईरान, तुर्की और मशरिक के सांस्कृतिक इतिहास में ईसाई समुदायों का योगदान लंबे समय तक महत्त्वपूर्ण रहा। इस प्रकार ईसाई धर्म का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व की अनेक सभ्यताओं में भी दिखाई देता है।

पश्चिमी संस्कृति पर प्रभाव

पश्चिमी इतिहास के लंबे कालखंड में ईसाई धर्म और पश्चिमी संस्कृति के बीच गहरा संबंध रहा। यूरोप की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के निर्माण में ईसाई धर्म ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद पश्चिमी यूरोप में कैथोलिक चर्च एक प्रमुख स्थायी संस्था के रूप में उभरा और मध्ययुगीन समाज के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर उसका व्यापक प्रभाव रहा।

ईसाई परंपरा ने दर्शन, साहित्य, कला, संगीत और विज्ञान के विकास को प्रभावित किया। मध्ययुगीन विश्वविद्यालयों के विकास में चर्च और ईसाई संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। अनेक धार्मिक विद्वानों और पादरियों ने विज्ञान तथा चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान दिया। जेसुइट विद्वानों ने विशेष रूप से खगोलशास्त्र, गणित, भूगोल और अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया।

ईसाई सामाजिक परंपरा ने अस्पतालों, दान संस्थाओं, गरीबों की सहायता, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के विकास में भी योगदान दिया। प्रोटेस्टेंट परंपरा के संदर्भ में प्रोटेस्टेंट कार्य-नीति और आधुनिक आर्थिक संस्कृति के बीच संबंधों पर भी अनेक समाजशास्त्रीय अध्ययन हुए हैं।

सांस्कृतिक ईसाई और ईसाई-धर्म-बाद का दौर

‘सांस्कृतिक ईसाई’ ऐसे लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द है जिनकी सांस्कृतिक विरासत ईसाई है, किंतु जो आवश्यक रूप से ईसाई धर्म के सभी धार्मिक दावों को स्वीकार नहीं करते। वे फिर भी ईसाई कला, संगीत, त्योहारों और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रह सकते हैं।

‘ईसाई-धर्म-बाद’ का दौर उस सामाजिक स्थिति को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होता है जिसमें ऐतिहासिक रूप से ईसाई समाजों में ईसाई धर्म का सांस्कृतिक और संस्थागत प्रभाव कम हो रहा है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से पश्चिमी यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य विकसित समाजों में दिखाई देती है।

ईसाई धर्म और पर्यावरण

आधुनिक काल में ईसाई समुदायों के भीतर पर्यावरण संरक्षण को लेकर सक्रियता बढ़ी है। ईसाई धर्म की कुछ परंपराएँ पृथ्वी को ईश्वर की सृष्टि मानते हुए मनुष्य को उसकी देखभाल का नैतिक दायित्व देती हैं। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में अनेक ईसाई संगठनों ने पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया है।

पोप फ्रांसिस के 2015 ईस्वी के विश्वपत्र ‘लौडाटो सी’ ने पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रश्नों पर वैश्विक ईसाई विमर्श को विशेष रूप से प्रभावित किया। ‘ग्रीन क्रिश्चियन’ और ‘लौडाटो सी मूवमेंट’ जैसे संगठनों ने ईसाई आस्था को पर्यावरणीय न्याय और सतत विकास से जोड़ने का प्रयास किया है।

इकुमेनिज़्म और ईसाई एकता

ईसाई इकुमेनिज़्म का उद्देश्य विभिन्न ईसाई चर्चों और संप्रदायों के बीच सहयोग, संवाद और एकता को बढ़ावा देना है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में इस दिशा में कई महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ और आंदोलन विकसित हुए। 1846 ईस्वी में वर्ल्ड इवेंजेलिकल एलायंस की स्थापना और 1910 ईस्वी में एडिनबर्ग मिशनरी कॉन्फ्रेंस ने अंतर-ईसाई सहयोग को बढ़ावा दिया।

1948 ईस्वी में वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेस की स्थापना आधुनिक इकुमेनिकल आंदोलन की महत्त्वपूर्ण घटना थी। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय चर्च परिषदों का गठन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा रहा। कुछ स्थानों पर अलग-अलग प्रोटेस्टेंट संप्रदायों ने औपचारिक रूप से एकीकृत चर्चों का निर्माण किया। 1947 ईस्वी में एंग्लिकन, बैपटिस्ट, मेथोडिस्ट, कॉन्ग्रेगेशनल और प्रेस्बिटेरियन परंपराओं के मिलन से चर्च ऑफ साउथ इंडिया की स्थापना हुई।

1965 ईस्वी में कैथोलिक और ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्चों के बीच संबंध सुधारने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया। दोनों पक्षों ने 1054 के महान विभाजन से संबंधित पारस्परिक बहिष्कारों को समाप्त किया। इसके बाद कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स, एंग्लिकन और प्रोटेस्टेंट परंपराओं के बीच धार्मिक संवाद बढ़ा।

1999 ईस्वी में लूथरन वर्ल्ड फेडरेशन और कैथोलिक चर्च ने न्यायोचित ठहराए जाने के सिद्धांत पर संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किए। 2006 ईस्वी में वर्ल्ड मेथोडिस्ट काउंसिल ने भी इस घोषणा को स्वीकार किया। इन प्रयासों का उद्देश्य ऐतिहासिक धार्मिक मतभेदों को कम करना और ईसाई एकता को मजबूत करना था।

टेज़े समुदाय

टेज़े समुदाय ईसाई इकुमेनिज़्म का एक प्रमुख आधुनिक उदाहरण है। फ्रांस के टेज़े में स्थित इस समुदाय में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक परंपराओं से जुड़े धार्मिक सदस्य साथ रहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य ईसाई संप्रदायों के बीच मेल-मिलाप और आध्यात्मिक एकता को बढ़ावा देना है। इसका मुख्य चर्च ‘चर्च ऑफ रिकॉन्सिलिएशन’ अर्थात् ‘मेल-मिलाप का चर्च’ कहलाता है और प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में युवा तीर्थयात्री यहाँ आते हैं।

ईसाई धर्म की आलोचना

ईसाई धर्म की आलोचना इसकी प्रारंभिक उत्पत्ति के समय से ही होती रही है। नए नियम में यीशु के अनुयायियों और यहूदी धार्मिक नेताओं के बीच मतभेदों का उल्लेख मिलता है। दूसरी शताब्दी में कुछ यहूदी विद्वानों ने ईसाई दावों और यीशु से संबंधित भविष्यवाणियों की व्याख्या पर प्रश्न उठाए।

यूनानी दार्शनिक सेल्सस ने दूसरी शताब्दी में ईसाई धर्म की आलोचना करते हुए ‘द ट्रू वर्ड’ नामक रचना लिखी। इसके उत्तर में ओरिजेन ने ‘कॉन्ट्रा सेल्सम’ की रचना की। तीसरी शताब्दी में दार्शनिक पोर्फिरी ने भी ईसाई धर्म की आलोचना की।

मध्ययुग में यहूदी विद्वानों ने ईसाई धर्म की धार्मिक मान्यताओं, विशेषकर यीशु के ईश्वरत्व और मूर्तिपूजा के प्रश्न पर आलोचना की। आधुनिक काल में फ्रेडरिक नीत्शे ने ईसाई नैतिकता और उसके जीवन-दृष्टिकोण की आलोचना की। बीसवीं शताब्दी में बर्ट्रेंड रसेल ने ‘व्हाई आई एम नॉट अ क्रिश्चियन’ में ईसाई धर्म को न मानने के अपने तर्क प्रस्तुत किए।

आधुनिक काल में भी त्रित्व सिद्धांत, बाइबिल की ऐतिहासिकता तथा यीशु के ऐतिहासिक अस्तित्व और स्वरूप से संबंधित विभिन्न प्रश्नों पर धर्मशास्त्रीय और अकादमिक बहस जारी है।

ईसाइयों का उत्पीड़न

इतिहास के विभिन्न कालों में ईसाई समुदायों को अनेक क्षेत्रों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। आधुनिक समय में भी मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण और पूर्वी एशिया के कुछ क्षेत्रों में ईसाइयों के विरुद्ध हिंसा, भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध की घटनाएँ सामने आती रही हैं।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ईसाइयों के उत्पीड़न की व्यापकता पर अलग-अलग अनुमान प्रस्तुत किए हैं। कुछ अध्ययनों के अनुसार उत्तर कोरिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कुछ संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में ईसाइयों के लिए परिस्थितियाँ विशेष रूप से कठिन रही हैं। हालांकि उत्पीड़न की परिभाषा और आँकड़ों को लेकर विभिन्न संगठनों के आकलनों में पर्याप्त अंतर पाया जाता है।

ईसाई अपोलोजेटिक्स

ईसाई अपोलोजेटिक्स का उद्देश्य ईसाई धर्म की मान्यताओं के पक्ष में तार्किक, दार्शनिक और ऐतिहासिक तर्क प्रस्तुत करना है। ‘अपोलोजेटिक्स’ शब्द यूनानी परंपरा के ऐसे शब्द से निकला है जिसका अर्थ ‘बचाव में बोलना’ या ‘पक्ष में तर्क प्रस्तुत करना’ है। इसकी परंपरा प्रारंभिक ईसाई लेखकों से लेकर आधुनिक दार्शनिकों और धर्मशास्त्रियों तक विकसित हुई है।

थॉमस एक्विनास ने ‘सुम्मा थियोलॉजिका’ में ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में प्रसिद्ध पाँच तर्क प्रस्तुत किए। उनकी ‘सुम्मा कॉन्ट्रा जेंटाइल्स’ भी ईसाई धर्म के दार्शनिक प्रतिपादन की महत्त्वपूर्ण कृति है। आधुनिक युग में जी. के. चेस्टरटन ने ईसाई धर्म की दार्शनिक और सांस्कृतिक उपयोगिता पर लिखा। भौतिक विज्ञानी एवं पादरी जॉन पोल्किंगहॉर्न ने धर्म और विज्ञान के संबंध पर विचार प्रस्तुत किए।

आधुनिक ईसाई अपोलोजेटिक्स में रवि ज़कारियास, जॉन लेनॉक्स और विलियम लेन क्रेग जैसे विचारकों ने भी योगदान दिया। दूसरी ओर, क्रिएशनिस्ट अपोलोजेटिक्स ईसाई सृष्टिवादी विचारों के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करता है। इस प्रकार ईसाई अपोलोजेटिक्स धार्मिक विश्वास, दर्शन, विज्ञान और इतिहास के बीच संबंधों पर निरंतर विचार-विमर्श की एक व्यापक बौद्धिक परंपरा है।

वर्तमान स्थिति और ऐतिहासिक महत्त्व

आज ईसाई धर्म विश्व के लगभग सभी महाद्वीपों में विद्यमान है। पश्चिमी यूरोप में धर्मनिरपेक्षता के कारण पारंपरिक ईसाई धार्मिक पहचान और संस्थागत सहभागिता में कमी आई है, जबकि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक क्षेत्रों में ईसाई समुदायों की संख्या और धार्मिक सक्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस प्रकार समकालीन ईसाई धर्म केवल यूरोप या पश्चिमी समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक वैश्विक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविध धर्म बन चुका है।

ईसाइयों की स्थिति विभिन्न देशों में अलग-अलग है। अनेक क्षेत्रों में वे स्वतंत्र रूप से धार्मिक जीवन जीते हैं, जबकि कुछ देशों में ईसाई समुदायों को सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक दबाव तथा उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और एशिया के कुछ क्षेत्रों में ईसाई अल्पसंख्यकों की स्थिति ऐतिहासिक तथा समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित रही है।

ईसाई धर्म का इतिहास केवल एक धार्मिक परंपरा के विकास का इतिहास नहीं है। इसके विकास में रोमन साम्राज्य, बाइजेंटाइन सभ्यता, मध्ययुगीन यूरोप, मठवाद, धर्मयुद्ध, पुनर्जागरण, सुधार आंदोलन, वैज्ञानिक क्रांति, औपनिवेशिक विस्तार, आधुनिक राष्ट्र-राज्य और धर्मनिरपेक्षता जैसी व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। लगभग दो सहस्राब्दियों के दौरान इस धर्म ने विश्व के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक और धार्मिक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया है।

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