ऑगस्टस (Augustus)

ऑगस्टस (Augustus)

ऑगस्टस (27 ई. पू.–14 ई.) : रोमन साम्राज्य का संस्थापक और प्रथम सम्राट

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गायस ऑक्टेवियस ऑगस्टस, जिसे उसके दत्तक ग्रहण के बाद ऑक्टेवियन के नाम से जाना गया, रोमन साम्राज्य का संस्थापक तथा उसका प्रथम सम्राट था। उसने 27 ईसा पूर्व से लेकर 14 ईस्वी में अपनी मृत्यु तक शासन किया। उसके शासनकाल में रोमन इतिहास के एक नए युग का आरंभ हुआ, जिसे ‘पैक्स रोमाना’ (रोमन शांति) या ‘पैक्स ऑगस्टा’ कहा जाता है। यह ऐसा काल था जब रोमन विश्व का अधिकांश भाग गृहयुद्धों और बड़े आंतरिक संघर्षों से मुक्त रहा तथा राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहन मिला।

ऑगस्टस ने रोमन शासन-व्यवस्था में प्रिंसिपेट नामक प्रणाली की स्थापना की। इस व्यवस्था में सम्राट स्वयं को केवल प्रिंसिप्स (प्रथम नागरिक) के रूप में प्रस्तुत करता था और बाहरी रूप से सीनेट तथा गणराज्य की संस्थाओं का सम्मान बनाए रखता था, किंतु वास्तविक सत्ता उसी के हाथों में केंद्रित रहती थी। यही शासन-व्यवस्था लगभग तीसरी शताब्दी के संकट (क्राइसिस ऑफ द थर्ड सेंचुरी) तक रोमन साम्राज्य की आधारशिला बनी रही।

ऑगस्टस का प्रारंभिक जीवन

ऑक्टेवियन का जन्म 23 सितंबर 63 ईसा पूर्व को रोम के एक प्रतिष्ठित अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन) परिवार में हुआ था। उसके पिता गायस ऑक्टेवियस एक सम्मानित रोमन अधिकारी थे, जबकि उसकी माता एटिया जूलियस सीज़र की भतीजी थी। इस प्रकार ऑक्टेवियन का संबंध रोम के सबसे प्रभावशाली सेनानायक और राजनेता जूलियस सीज़र से था। सीज़र ने उसकी प्रतिभा और राजनीतिक क्षमता को प्रारंभ से ही पहचान लिया था तथा उसे अपने संरक्षण में रखा। किशोरावस्था में ही ऑक्टेवियन को प्रशासन और सैन्य प्रशिक्षण का अवसर मिला, जिससे वह भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों के लिए तैयार हुआ।

ऑगस्टस (Augustus)
रोमन सम्राटऑगस्टस
जूलियस सीज़र का उत्तराधिकारी

44 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र की हत्या के समय ऑक्टेवियन इलिरिया के अपोलोनिया नगर में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। सीज़र की मृत्यु के बाद जब उसकी वसीयत सार्वजनिक हुई, तब यह ज्ञात हुआ कि उसने ऑक्टेवियन को अपना विधिवत् दत्तक पुत्र तथा मुख्य उत्तराधिकारी नियुक्त किया है। चूँकि सीज़र की कोई वैध संतान नहीं थी, इसलिए रोमन कानून के अनुसार ऑक्टेवियन उसका वैधानिक उत्तराधिकारी बन गया। दक्षिणी इटली के ब्रुंडिसियम पहुँचने पर उसने वसीयत स्वीकार की, सीज़र की संपत्ति का अधिकांश भाग प्राप्त किया और उसका नाम धारण कर ‘गायस जूलियस सीज़र’ बन गया। यद्यपि समकालीन लेखक और राजनेता उसे पहचान के लिए ‘ऑक्टेवियानुस’ अथवा ‘ऑक्टेवियन’ कहते रहे।

उत्तराधिकार स्वीकार करना केवल सम्मान का विषय नहीं था, बल्कि एक अत्यंत जोखिमपूर्ण राजनीतिक निर्णय भी था। उसके सौतेले पिता लूसियस मार्सियस फिलिप्पुस ने उसे इस उत्तराधिकार से दूर रहने की सलाह दी, क्योंकि इससे उसे गृहयुद्ध और सत्ता-संघर्ष में उतरना पड़ता। इसके बावजूद ऑक्टेवियन ने सीज़र की विरासत को स्वीकार किया और शीघ्र ही उसके समर्थकों, अनुभवी सैनिकों तथा पूर्व अधिकारियों का विश्वास जीतना प्रारंभ कर दिया। उसने ब्रुंडिसियम में सुरक्षित विशाल धनराशि तथा अन्य आर्थिक संसाधनों का उपयोग कर अपनी राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ किया और सैनिकों की भर्ती प्रारंभ की।

ऑक्टेवियन भली-भाँति जानता था कि रोम की राजनीति में केवल वैधानिक उत्तराधिकार पर्याप्त नहीं है; वास्तविक शक्ति सेना और धन पर निर्भर करती है। इसलिए उसने सीज़र के पूर्व सैनिकों और पार्थिया अभियान के लिए चयनित लीजियनों को अपने पक्ष में संगठित किया। कैम्पेनिया सहित इटली के विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में अनुभवी सैनिक उसकी सेना में शामिल हुए। जून 44 ईसा पूर्व तक वह लगभग 3,000 सैनिकों की एक संगठित सेना तैयार करने में सफल हो गया। सैनिकों की निष्ठा सुनिश्चित करने के लिए उसने प्रत्येक सैनिक को 500 डेनारी (रोमन मुद्रा) का विशेष पुरस्कार दिया, जिससे उसकी लोकप्रियता और प्रभाव दोनों में वृद्धि हुई।

इसी बीच रोम में राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं। कौंसल मार्क एंटनी ने प्रारंभ में सीज़र के हत्यारों के साथ समझौता करने का प्रयास किया और सीनेट ने उन्हें सामान्य क्षमादान भी प्रदान किया। किंतु सीज़र के अंतिम संस्कार में एंटनी के भावनात्मक भाषण ने जनता को हत्यारों के विरुद्ध भड़का दिया, जिसके परिणामस्वरूप अधिकांश षड्यंत्रकारियों को रोम छोड़कर भागना पड़ा। इस बदलती परिस्थिति का ऑक्टेवियन ने कुशलतापूर्वक लाभ उठाया। सीज़र के वैधानिक उत्तराधिकारी, पर्याप्त आर्थिक संसाधनों और बढ़ते सैन्य समर्थन के बल पर उसने स्वयं को रोमन राजनीति की एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया, जिसने आगे चलकर उसके साम्राज्य-निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

सीज़र की विरासत को लेकर संघर्ष

जूलियस सीज़र की मृत्यु के बाद सबसे बड़ा प्रश्न उसकी राजनीतिक विरासत और जनसमर्थन पर अधिकार का था। प्रारंभ में कौंसल मार्क एंटनी को इस स्थिति का लाभ मिला, क्योंकि वह सीज़र का निकटतम सहयोगी था। किंतु शीघ्र ही उसकी नीतियों से सीज़र के अनेक समर्थक असंतुष्ट हो गए। विशेष रूप से जब उसने सीज़र को औपचारिक रूप से देवत्व प्रदान करने के प्रस्ताव का विरोध किया, तब लोगों के एक बड़े वर्ग ने उससे दूरी बनानी शुरू कर दी। दूसरी ओर, ऑक्टेवियन ने स्वयं को सीज़र का वैधानिक दत्तक पुत्र, राजनीतिक उत्तराधिकारी और उसके समर्थकों का वास्तविक नेता घोषित किया। परिणामस्वरूप दोनों नेताओं के बीच सीज़र की विरासत पर अधिकार को लेकर तीव्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई।

मार्क एंटनी ने ऑक्टेवियन की बढ़ती लोकप्रियता को रोकने के लिए अनेक बाधाएँ उत्पन्न कीं। सीज़र की वसीयत के अनुसार रोम के प्रत्येक नागरिक को 300 सेस्टर्सेस दिए जाने थे, किंतु एंटनी ने ऑक्टेवियन को उसकी वैधानिक उत्तराधिकार-संपत्ति सौंपने से इनकार कर दिया, ताकि वह जनता का समर्थन प्राप्त न कर सके। इतना ही नहीं, उसने क्यूरियेट सभा में ऑक्टेवियन के दत्तक ग्रहण को कानूनी मान्यता दिलाने के प्रयासों में भी अवरोध उत्पन्न किया। सीज़र को देवता घोषित करने तथा सार्वजनिक समारोहों में उसके स्वर्ण सिंहासन को पुनः स्थापित करने जैसी योजनाओं का भी उसने विरोध किया। इसके बावजूद ऑक्टेवियन ने अपनी निजी संपत्ति और उपलब्ध धन का उपयोग कर सीज़र की इच्छा के अनुसार जनता में धन वितरित किया, जिससे उसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी और एंटनी की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ने लगी।

44 ईसा पूर्व की गर्मियों तक ऑक्टेवियन ने सीज़र के अनेक अनुभवी सैनिकों तथा प्रभावशाली सीनेटरों का समर्थन प्राप्त कर लिया। वे सीनेटर, जो मार्क एंटनी को गणराज्य के लिए संभावित खतरा मानते थे, धीरे-धीरे ऑक्टेवियन के पक्ष में आने लगे। इसी दौरान एक न्यायिक सुनवाई में, जो सीज़र द्वारा जब्त की गई संपत्तियों की वापसी से संबंधित थी, एंटनी ने अपने लिक्टरों द्वारा ऑक्टेवियन को बलपूर्वक वहाँ से हटवा दिया। इस घटना ने दोनों नेताओं के संबंधों को और अधिक कटु बना दिया। ऑक्टेवियन ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि सीज़र की वसीयत के अनुसार जनता में धन बाँटने के कारण एंटनी ने उसे जान से मारने की धमकी दी है।

दोनों नेताओं के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए सीज़र के अनुभवी सैनिकों ने समझौता कराने का प्रयास किया और जुपिटर ऑप्टिमस मैक्सिमस के मंदिर में दोनों का सार्वजनिक मेल-मिलाप भी कराया गया। किंतु यह समझौता अधिक समय तक नहीं टिक सका। इसके बाद एंटनी ने सीज़र के हत्यारों मार्कस जूनियस ब्रूटस और गायस कैसियस लॉन्गिनस के विरुद्ध कठोर कदम उठाए, जिससे अनेक मध्यमार्गी सीनेटर चिंतित हो गए। इसी समय प्रसिद्ध वक्ता और राजनीतिज्ञ मार्कस टुलियस सिसरो ने अपने प्रसिद्ध ‘फिलिप्पिक’ भाषणों के माध्यम से एंटनी को गणराज्य की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया और अप्रत्यक्ष रूप से ऑक्टेवियन का समर्थन किया। इन घटनाओं ने रोम की राजनीति को दो स्पष्ट गुटों में विभाजित कर दिया और ऑक्टेवियन तथा मार्क एंटनी के बीच संघर्ष खुली राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में बदल गया।

एंटनी के साथ पहला टकराव

मार्क एंटनी और ऑक्टेवियन के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा शीघ्र ही खुले संघर्ष में बदल गई। कौंसल के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले एंटनी ने एक विवादास्पद कानून पारित कराकर उत्तरी इटली के महत्त्वपूर्ण प्रांत सिसलपाइन गॉल का शासन अपने लिए सुरक्षित कर लिया। इस निर्णय का सीनेट और अनेक प्रमुख नेताओं ने विरोध किया। दूसरी ओर, ऑक्टेवियन ने अवसर का लाभ उठाते हुए जूलियस सीज़र के पूर्व सैनिकों की भर्ती शुरू कर दी और अपनी एक निजी सेना संगठित कर ली। नवंबर 44 ईसा पूर्व में वह इसी सेना के साथ रोम पहुँचा और पहली बार प्रत्यक्ष रूप से मार्क एंटनी की सत्ता को चुनौती दी। यद्यपि प्रारंभिक चरण में उसे कुछ असफलताओं का सामना करना पड़ा और कई सैनिक उसका साथ छोड़ दिए, फिर भी उसने धन और राजनीतिक कौशल के बल पर एंटनी की दो लीजियनों को अपने पक्ष में करके अपनी सैन्य शक्ति को पुनः सुदृढ़ कर लिया।

संघर्ष का मुख्य कारण सिसलपाइन गॉल पर अधिकार का प्रश्न था। यह प्रांत पहले से ही जूलियस सीज़र के हत्यारों में से एक डेसिमस जूनियस ब्रूटस एल्बिनस के अधीन था, जिसने एंटनी को इसका नियंत्रण सौंपने से इनकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप एंटनी ने मुटिना (वर्तमान मोडेना) नगर में डेसिमस ब्रूटस की घेराबंदी कर दी। इस संकट का लाभ उठाते हुए ऑक्टेवियन ने सीनेट के साथ मिलकर हस्तक्षेप किया। इसी समय प्रसिद्ध वक्ता और राजनीतिज्ञ मार्कस टुलियस सिसरो ने सीनेट में ऑक्टेवियन का खुलकर समर्थन किया। उसके प्रयासों से 1 जनवरी 43 ईसा पूर्व को ऑक्टेवियन को सीनेट की सदस्यता, इम्पेरियम प्रो प्रेटोरे का अधिकार तथा अपनी सेना का वैधानिक नेतृत्व प्रदान किया गया। इस प्रकार पहली बार उसकी सैन्य शक्ति को रोमन राज्य की आधिकारिक मान्यता मिली।

मुटिना के युद्ध (43 ईसा पूर्व)

अप्रैल 43 ईसा पूर्व में फोरम गैलोरम और मुटिना के निर्णायक युद्ध लड़े गए। इन युद्धों में सीनेट और ऑक्टेवियन की संयुक्त सेनाओं ने मार्क एंटनी को पराजित कर उसे ट्रांसलपाइन गॉल की ओर पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। यद्यपि यह विजय ऑक्टेवियन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, लेकिन युद्ध के दौरान दोनों निर्वाचित कौंसल—औलुस हिर्तियस और गायस विबियस पांसा मारे गए। परिणामस्वरूप उनकी सेनाओं की कमान ऑक्टेवियन के हाथों में आ गई। इस विजय के उपलक्ष्य में उसे पहली बार ‘इम्पेरेटर’ की उपाधि प्रदान की गई, जो सफल रोमन सेनापतियों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सैन्य सम्मान था।

ऑगस्टस (Augustus)
मुटिना के युद्ध (43 ईसा पूर्व)
रोमन गणराज्य का कौंसल (19 अगस्त 43 ईसा पूर्व)

युद्ध में सफलता के बाद भी ऑक्टेवियन और सीनेट के संबंध मधुर नहीं रहे। सीनेट ने उसके योगदान की अपेक्षा डेसिमस जूनियस ब्रूटस को अधिक सम्मान देने का प्रयास किया और कौंसलों की सेनाओं का नेतृत्व भी उसे सौंपना चाहा। इससे असंतुष्ट होकर ऑक्टेवियन ने मार्क एंटनी का पीछा करने से इनकार कर दिया और अपनी सेना के साथ पो नदी की घाटी में ही डटा रहा। जब सीनेट ने उसे कौंसल नियुक्त करने और उसकी अन्य राजनीतिक माँगों को अस्वीकार कर दिया, तब उसने अपनी सेना सहित रोम की ओर प्रयाण किया। बिना किसी बड़े प्रतिरोध के 19 अगस्त 43 ईसा पूर्व को मात्र 19 वर्ष की आयु में वह क्विंटस पेडियस के साथ रोमन गणराज्य का कौंसल निर्वाचित हुआ, जो उसकी असाधारण राजनीतिक सफलता का प्रमाण था।

कौंसल बनने के बाद ऑक्टेवियन ने अपनी स्थिति को कानूनी और राजनीतिक रूप से और अधिक सुदृढ़ किया। क्विंटस पेडियस द्वारा पारित विशेष कानून के अंतर्गत जूलियस सीज़र के हत्यारों के विरुद्ध न्यायाधिकरण स्थापित किया गया, जिसने मार्कस जूनियस ब्रूटस, गायस कैसियस लॉन्गिनस तथा अन्य षड्यंत्रकारियों को अनुपस्थिति में ही दोषी ठहराकर निर्वासन का दंड दिया। इसी अवधि में क्यूरियेट सभा ने जूलियस सीज़र द्वारा किए गए ऑक्टेवियन के दत्तक ग्रहण को भी विधिवत् कानूनी मान्यता प्रदान की। इसके साथ ही वह केवल सीज़र की वसीयत का ही नहीं, बल्कि रोमन कानून के अनुसार भी उसका वैध दत्तक पुत्र और उत्तराधिकारी बन गया, जिससे उसकी राजनीतिक वैधता और अधिकार निर्विवाद हो गए।

एंटनी और लेपिडस का गठबंधन

मुटिना के युद्ध के बाद रोमन राजनीति ने एक नया मोड़ लिया। पराजित होने के बावजूद मार्क एंटनी ने अपनी स्थिति को शीघ्र ही सुदृढ़ कर लिया और गैलिया नारबोनेन्सिस के गवर्नर मार्कस एमिलियस लेपिडस से गठबंधन कर लिया। लेपिडस भी जूलियस सीज़र का समर्थक था और उसके पास पर्याप्त सैन्य शक्ति थी। प्रारंभ में सीनेट ने एंटनी और लेपिडस दोनों को ‘जनता का शत्रु’ घोषित कर दिया, किंतु बाद में कौंसल क्विंटस पेडियस के सुझाव पर यह निर्णय वापस ले लिया गया। इसी बीच ऑक्टेवियन भी अपनी सेना के साथ उत्तर की ओर बढ़ा। उसका उद्देश्य डेसिमस ब्रूटस की शक्ति का अंत करना और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए एंटनी से समझौते की संभावनाओं पर विचार करना था। इन घटनाओं ने अंततः तीनों नेताओं को एक साझा गठबंधन बनाने के लिए प्रेरित किया।

द्वितीय ट्रायम्विरेट (त्रिशासक गठबंधन)

अक्टूबर 43 ईसा पूर्व में बोनोनिया (वर्तमान बोलोन्या) के निकट ऑक्टेवियन, मार्क एंटनी और मार्कस एमिलियस लेपिडस की ऐतिहासिक बैठक हुई। इस बैठक में तीनों ने मिलकर द्वितीय ट्रायम्विरेट की स्थापना का निर्णय लिया।

प्रथम ट्रायमविरेट प्राचीन रोमन गणराज्य के इतिहास में तीन शक्तिशाली राजनेताओं—जूलियस सीज़र, पोम्पेई द ग्रेट और मार्कस लिसिनियस क्रैसस के बीच लगभग 60 ईसा पूर्व किया गया एक गुप्त व अनौपचारिक राजनीतिक गठबंधन था, जिसका उद्देश्य रूढ़िवादी सीनेट के विरोध को दरकिनार कर तीनों सदस्यों के व्यक्तिगत और राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करना था।

27 नवंबर 43 ईसा पूर्व को लेक्स टिटिया नामक कानून पारित किया गया, जिसने द्वितीय त्रिशासक गठबंधन को पाँच वर्षों के लिए वैधानिक मान्यता प्रदान की। यह रोमन इतिहास में पहली बार था जब तीन व्यक्तियों के संयुक्त शासन को विधिक स्वीकृति मिली। इस व्यवस्था के अंतर्गत तीनों नेताओं को लगभग कौंसल के समान व्यापक अधिकार प्राप्त हुए, जिनमें उच्च अधिकारियों की नियुक्ति, प्रशासनिक निर्णय लेने और रोमन प्रांतों का विभाजन करने की शक्तियाँ शामिल थीं। परिणामस्वरूप रोमन राज्य की वास्तविक सत्ता इन तीनों के हाथों में केंद्रित हो गई।

अपने राजनीतिक गठबंधन को स्थायी और मजबूत बनाने के लिए तीनों नेताओं ने पारिवारिक संबंधों का भी सहारा लिया। ऑक्टेवियन ने अपनी पूर्व सगाई समाप्त कर मार्क एंटनी की सौतेली पुत्री क्लाउडिया से सगाई कर ली, जिससे दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक विश्वास और सहयोग को बढ़ावा मिल सके। इसी नीति के अंतर्गत ऑक्टेवियन ने अपने कौंसल पद से त्यागपत्र देकर यह पद एंटनी के विश्वस्त सहयोगी पब्लियस वेंटिडियस को सौंप दिया। इन कदमों का उद्देश्य व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करते हुए गठबंधन को स्थिर बनाए रखना और सीज़र के विरोधियों के विरुद्ध संयुक्त रूप से कार्य करना था।

प्रोस्क्रिप्शन

द्वितीय ट्रायम्विरेट की स्थापना के तुरंत बाद तीनों नेताओं ने प्रोस्क्रिप्शन (Proscription) नामक कठोर राजनीतिक अभियान आरंभ किया। इसके अंतर्गत राज्य के शत्रुओं की आधिकारिक सूची प्रकाशित की जाती और जिनके नाम सूची में आते, उन्हें अपराधी घोषित कर दिया जाता था। उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाती थी और उन्हें बिना न्यायिक प्रक्रिया के मृत्युदंड दिया जा सकता था। इस अभियान में लगभग 300 प्रमुख सीनेटरों और अश्वारोही वर्ग के प्रतिष्ठित व्यक्तियों सहित अनेक राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों का उन्मूलन कर सत्ता को सुरक्षित बनाना था।

किंतु प्रोस्क्रिप्शन का उद्देश्य केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी था। उस समय मार्कस जूनियस ब्रूटस और गायस कैसियस के विरुद्ध एक विशाल सैन्य अभियान की तैयारी चल रही थी, जिसके लिए बड़ी सेना का गठन और सैनिकों के वेतन की व्यवस्था करना था। इसलिए प्रोस्क्रिप्शन के अंतर्गत जब्त की गई संपत्तियों को बेचकर युद्ध के लिए धन जुटाया गया। फिर भी अपेक्षित धनराशि एकत्र न होने पर ट्रायम्विरेट ने राज्य की आय बढ़ाने के लिए नए कर लगाए। इस प्रकार द्वितीय ट्रायम्विरेट ने एक ओर अपने राजनीतिक विरोधियों का दमन किया, तो दूसरी ओर आर्थिक संसाधनों को संगठित कर आगे चलकर फिलिपी के निर्णायक अभियान की आधारशिला रखी।

नए कर और जनता की प्रतिक्रिया

द्वितीय ट्रायम्विरेट के गठन के बाद सबसे बड़ी चुनौती विशाल सेना के संचालन और गृहयुद्ध के खर्चों के लिए धन जुटाने की थी। इस उद्देश्य से ट्रायम्विरों ने अनेक कठोर आर्थिक उपाय लागू किए। संपत्ति कर को पुनः लागू किया गया, दासों (गुलामों) पर नए कर लगाए गए और रोम की धनी महिलाओं की संपत्ति का मूल्यांकन कर उन पर भी कर लगाने का निर्णय लिया गया। इस प्रस्ताव का विशेष रूप से अभिजात वर्ग की महिलाओं ने तीव्र विरोध किया। व्यापक जनदबाव और विरोध-प्रदर्शनों के कारण ट्रायम्विरों को अंततः इस कर में कमी करनी पड़ी। इन कठोर आर्थिक नीतियों ने स्पष्ट कर दिया कि ट्रायम्विरेट अपने शासन को बनाए रखने के लिए कठोर प्रशासनिक और वित्तीय उपाय अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।

फिलिप्पी का युद्ध (अक्टूबर 42 ईसा पूर्व)

1 जनवरी 42 ईसा पूर्व को, जब लेपिडस कौंसल था, रोमन सीनेट ने जूलियस सीज़र को मरणोपरांत देवता घोषित करते हुए उसे ‘दिवुस जूलियस’ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद ऑक्टेवियन ने स्वयं को ‘दिवि फिलियस’ अर्थात् ‘देवता का पुत्र’ कहना प्रारंभ किया। इस उपाधि ने उसकी राजनीतिक वैधता और जनप्रतिष्ठा को और अधिक मजबूत बनाया। इसके पश्चात् ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी ने संयुक्त रूप से सीज़र के हत्यारों मार्कस जूनियस ब्रूटस और गायस कैसियस लॉन्गिनस के विरुद्ध निर्णायक अभियान चलाया। अक्टूबर 42 ईसा पूर्व में मैसेडोनिया के फिलिप्पी के मैदान में हुए दो युद्धों में ट्रायम्विरों की सेनाओं ने निर्णायक विजय प्राप्त की। पराजय के बाद ब्रूटस और कैसियस ने आत्महत्या कर ली, जिससे सीज़र के हत्यारों का संगठित प्रतिरोध समाप्त हो गया और रोमन गणराज्य के अंतिम प्रमुख विरोधी गुट का अंत हो गया।

ऑगस्टस (Augustus)
फिलिप्पी का युद्ध (अक्टूबर 42 ईसा पूर्व)
रोमन प्रांतों का पुनर्विभाजन

फिलिप्पी की विजय के बाद तीनों ट्रायम्विरों ने रोमन प्रांतों का पुनर्विभाजन किया। सिसल्पाइन गॉल को स्थायी रूप से इटली में मिला दिया गया तथा हिस्पानिया के दोनों प्रांत ऑक्टेवियन को सौंप दिए गए। दूसरी ओर, मार्क एंटनी ने पूर्वी प्रांतों का नियंत्रण सँभाला और मिस्र जाकर रानी क्लियोपेट्रा सप्तम के साथ राजनीतिक गठबंधन किया। उसने गैलिया कोमाटा तथा गैलिया नार्बोनेन्सिस पर भी अपना प्रभाव बनाए रखा। लेपिडस पर सेक्स्टस पॉम्पियस से गुप्त संबंध रखने का संदेह किया गया, जिसके परिणामस्वरूप उसके अधिकांश प्रांत उससे ले लिए गए और अंततः उसके अधिकार में केवल अफ्रीका प्रांत ही शेष रह गया। इस पुनर्विभाजन के बाद रोमन राज्य की वास्तविक शक्ति मुख्यतः ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के हाथों में केंद्रित हो गई।

सैनिकों का पुनर्वास

फिलिप्पी की विजय के बाद ऑक्टेवियन के सामने हजारों सेवानिवृत्त सैनिकों के पुनर्वास की गंभीर समस्या उत्पन्न हुई। इन सैनिकों में ट्रायम्विरेट की सेना के साथ-साथ ब्रूटस और कैसियस की पूर्व सेनाओं के सैनिक भी शामिल थे, जिन्हें गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद भूमि देकर बसाना आवश्यक था। चूँकि इटली में पर्याप्त सार्वजनिक भूमि उपलब्ध नहीं थी, इसलिए ऑक्टेवियन ने अनेक नगरों के सामान्य नागरिकों की निजी भूमि अधिग्रहित कर सैनिकों में बाँटने का निर्णय लिया। इस नीति से लगभग अठारह नगर प्रभावित हुए और अनेक परिवारों को अपनी पैतृक भूमि छोड़नी पड़ी। परिणामस्वरूप इटली के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक असंतोष फैल गया, जिसने आगे चलकर नए राजनीतिक संघर्षों और गृहयुद्धों की पृष्ठभूमि तैयार की।

पेरुसिन युद्ध (40 ईसा पूर्व)

फिलिप्पी के युद्ध के बाद सैनिकों के पुनर्वास के लिए अपनाई गई भूमि-अधिग्रहण नीति ने इटली में व्यापक असंतोष उत्पन्न कर दिया। इस स्थिति का लाभ मार्क एंटनी के भाई लूसियस एंटोनियस और उसकी पत्नी फुल्विया ने उठाया। इसी समय ऑक्टेवियन ने राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने पर मार्क एंटनी की सौतेली पुत्री क्लाउडिया से अपना वैवाहिक संबंध समाप्त कर दिया, जिससे दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया। फुल्विया और लूसियस एंटोनियस ने मार्क एंटनी के अधिकारों की रक्षा के नाम पर ऑक्टेवियन के विरुद्ध विद्रोह छेड़ दिया और कुछ समय के लिए रोम पर भी अधिकार कर लिया। यद्यपि अधिकांश रोमन सैनिकों की निष्ठा अंततः ट्रायम्विरेट के प्रति बनी रही। ऑक्टेवियन ने विद्रोहियों को पेरुसिया (पेरूजिया) में घेर लिया और कई महीनों की घेराबंदी के बाद फरवरी 40 ईसा पूर्व में लूसियस एंटोनियस ने आत्मसमर्पण कर दिया।

पेरुसिन युद्ध में विजय के बाद ऑक्टेवियन ने लूसियस एंटोनियस को क्षमा कर दिया, जबकि फुल्विया यूनान के सिस्योन नगर भाग गई, जहाँ शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई। इसके बावजूद ऑक्टेवियन ने विद्रोह के समर्थकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की। जूलियस सीज़र की हत्या की वर्षगाँठ पर लगभग 300 सीनेटरों और अश्वारोही वर्ग के प्रमुख व्यक्तियों को मृत्युदंड दिया गया तथा पेरुसिया नगर को लूटकर लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। इन कठोर दमनात्मक उपायों से ऑक्टेवियन को राजनीतिक रूप से तो लाभ पहुँचा, किंतु उसकी छवि एक कठोर और निर्दयी शासक की बन गई।

इसी अवधि में भूमध्यसागर में सेक्स्टस पॉम्पियस की शक्ति निरंतर बढ़ रही थी। उसने सिसिली, सार्डिनिया और कोर्सिका पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था, जिसके कारण ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी दोनों उसके साथ समझौता करने के इच्छुक थे। राजनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ऑक्टेवियन ने 40 ईसा पूर्व में स्क्रिबोनिया से विवाह किया। इस विवाह से उसकी एकमात्र जैविक संतान जूलिया का जन्म हुआ, किंतु उसने शीघ्र ही स्क्रिबोनिया को तलाक दे दिया और लिविया ड्रुसिला से विवाह कर लिया। लिविया आगे चलकर ऑक्टेवियन के जीवन की सबसे प्रभावशाली साथी सिद्ध हुईं और उनके पुत्र टाइबेरियस तथा ड्रुसस ने भी रोमन इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ब्रुंडिसियम की संधि (40 ईसा पूर्व)

उधर मिस्र में मार्क एंटनी और रानी क्लियोपेट्रा सप्तम के बीच राजनीतिक संबंध धीरे-धीरे व्यक्तिगत संबंधों में परिवर्तित हो गए और उनके तीन बच्चों का जन्म हुआ। इसी बीच गॉल में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने से ऑक्टेवियन और एंटनी के बीच तनाव पुनः बढ़ गया। 40 ईसा पूर्व में एंटनी विशाल सेना के साथ इटली पहुँचा और ब्रुंडिसियम नगर की घेराबंदी कर दी। किंतु दोनों पक्षों के सैनिक गृहयुद्ध के पक्ष में नहीं थे, इसलिए दोनों नेताओं ने ब्रुंडिसियम की संधि कर ली, जिसके अंतर्गत रोमन साम्राज्य का पुनः विभाजन किया गया। एंटनी को पूर्वी प्रांत, ऑक्टेवियन को पश्चिमी प्रांत और लेपिडस को अफ्रीका का प्रशासन सौंपा गया। साथ ही राजनीतिक गठबंधन को स्थायी बनाने के लिए ऑक्टेवियन ने अपनी बहन ऑक्टेविया माइनर का विवाह मार्क एंटनी से कराया। इस संधि ने कुछ समय के लिए गृहयुद्ध को टाल दिया और ट्रायम्विरेट के भीतर संतुलन स्थापित हो गया, यद्यपि यह शांति अधिक समय तक नहीं टिक सकी।

मिसेनम की संधि (39 ईसा पूर्व)

ब्रुंडिसियम की संधि के बाद भी भूमध्यसागर में सेक्स्टस पॉम्पियस का नौसैनिक प्रभुत्व बना रहा। उसके नियंत्रण के कारण रोम की समुद्री आपूर्ति लगातार बाधित होती रही। 39 ईसा पूर्व के प्रारंभ में उसने पुनः इटली की समुद्री नाकेबंदी कर दी, जिससे रोम में अनाज का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। खाद्यान्न की कमी और बढ़ती महँगाई से जनता में भारी असंतोष फैल गया तथा क्रोधित भीड़ ने ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी दोनों को इसके लिए उत्तरदायी ठहराया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दोनों नेताओं ने 39 ईसा पूर्व में मिसेनम की संधि की। इस समझौते के अंतर्गत सेक्स्टस पॉम्पियस के सिसिली, सार्डिनिया, कोर्सिका और पेलोपोनीज़ पर अधिकार को अस्थायी रूप से स्वीकार किया गया तथा भविष्य में उसे कौंसल बनाने का आश्वासन दिया गया। बदले में उसने इटली की समुद्री नाकेबंदी समाप्त कर दी, जिससे रोम में खाद्यान्न की आपूर्ति पुनः सामान्य हो गई।

टैरेंटम की संधि (37 ईसा पूर्व)

यह शांति अधिक समय तक नहीं टिक सकी। 38 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन द्वारा स्क्रिबोनिया को तलाक देकर लिविया ड्रुसिला से विवाह करने तथा मार्क एंटनी द्वारा पेलोपोनीज़ सेक्स्टस पॉम्पियस को न सौंपने के कारण दोनों पक्षों के बीच अविश्वास बढ़ गया। परिणामस्वरूप सेक्स्टस ने पुनः समुद्री नाकेबंदी लागू कर दी और रोम एक बार फिर खाद्यान्न संकट से जूझने लगा। इसी दौरान उसका प्रमुख नौसैनिक सेनापति मेनास ऑक्टेवियन के पक्ष में आ गया और उसने कोर्सिका तथा सार्डिनिया उसके अधिकार में सौंप दिए। यद्यपि कुमाए के निकट हुए नौसैनिक युद्ध में ऑक्टेवियन को पराजय मिली, जिससे स्पष्ट हो गया कि शक्तिशाली नौसेना के बिना वह सेक्स्टस का मुकाबला नहीं कर सकता। इसलिए उसने मार्क एंटनी से सहायता माँगी और 37 ईसा पूर्व में टैरेंटम की संधि के माध्यम से दोनों नेताओं ने अपने राजनीतिक गठबंधन को अगले पाँच वर्षों के लिए बढ़ा दिया।

टैरेंटम की संधि के अनुसार मार्क एंटनी ने ऑक्टेवियन को सेक्स्टस पॉम्पियस के विरुद्ध अभियान के लिए 120 युद्धपोत उपलब्ध कराए, जबकि ऑक्टेवियन ने पार्थियन अभियान हेतु 20,000 सैनिक भेजने का वचन दिया। इसी समय ऑक्टेवियन ने अपने सर्वश्रेष्ठ सेनापति मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा को नौसेना के पुनर्गठन का दायित्व सौंपा। एग्रीप्पा ने पोर्टुस जूलियस नामक आधुनिक कृत्रिम नौसैनिक अड्डे का निर्माण कराया, जहाँ नए युद्धपोत तैयार किए गए और नाविकों को व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया गया। इस सुदृढ़ नौसैनिक व्यवस्था के बल पर 36 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन और लेपिडस ने सिसिली पर संयुक्त अभियान आरंभ किया। अगस्त में माइले और सितंबर में नौलोकस के निर्णायक नौसैनिक युद्धों में एग्रीप्पा ने सेक्स्टस पॉम्पियस की नौसेना को पराजित कर लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। सेक्स्टस पूर्व की ओर भाग गया और अंततः 35 ईसा पूर्व में माइलेटस में मार्क एंटनी के आदेश पर उसे मृत्युदंड दे दिया गया।

इलीरिकम की विजय

सेक्स्टस पॉम्पियस की पराजय के बाद ऑक्टेवियन ने अपना ध्यान इलीरिकम (इलिरिया) की ओर केंद्रित किया। 35–33 ईसा पूर्व के बीच उसने वहाँ कई सफल सैन्य अभियान चलाकर विद्रोही जनजातियों को पराजित किया और रोमन प्रभुत्व को सुदृढ़ किया। इन अभियानों के दौरान उसने तटीय क्षेत्रों तथा आंतरिक पर्वतीय प्रदेशों पर नियंत्रण स्थापित किया, जिससे इटली की पूर्वी सीमा अधिक सुरक्षित हो गई। इलीरिकम की विजय से ऑक्टेवियन को अनुभवी सैनिक, अपार युद्ध-लूट और एक विजयी सेनानायक की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इन सफलताओं ने उसकी सैन्य और राजनीतिक शक्ति को अत्यधिक बढ़ाया तथा आगे चलकर मार्क एंटनी के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष की ठोस आधारशिला तैयार की।

लेपिडस का पतन और निर्वासन

36 ईसा पूर्व में सेक्स्टस पॉम्पियस की पराजय के बाद रोमन राजनीति में शक्ति-संतुलन निर्णायक रूप से बदल गया। इस अवसर का लाभ उठाकर ट्रायम्विर मार्कस एमिलियस लेपिडस ने सिसिली पर अपना अधिकार स्थापित करने और स्वयं को उसका शासक घोषित करने का प्रयास किया। यद्यपि वह ट्रायम्विरेट का सदस्य था, फिर भी उसकी यह महत्त्वाकांक्षा ऑक्टेवियन के लिए स्वीकार्य नहीं थी। ऑक्टेवियन ने प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर राजनीतिक और कूटनीतिक उपाय अपनाए तथा लेपिडस की सेना के अधिकारियों और सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया। परिणामस्वरूप अधिकांश सैनिकों ने लेपिडस का साथ छोड़ दिया और उसकी सैन्य तथा राजनीतिक शक्ति बिना किसी बड़े संघर्ष के समाप्त हो गई।

लेपिडस की शक्ति समाप्त होने के बाद ऑक्टेवियन ने उसे सक्रिय राजनीति से हटाकर आजीवन सार्वजनिक जीवन से दूर रहने के लिए विवश कर दिया। यद्यपि उससे सभी राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार छीन लिए गए, फिर भी उसे सम्मानपूर्वक ‘पोंटिफेक्स मैक्सिमस’ (सर्वोच्च धर्माध्यक्ष) के पद पर बने रहने दिया गया। इस प्रकार लेपिडस औपचारिक रूप से जीवित और सम्मानित रहा, किंतु रोमन शासन में उसकी कोई वास्तविक भूमिका नहीं बची। उसके पतन के साथ ही द्वितीय ट्रायम्विरेट व्यावहारिक रूप से दो शक्तिशाली नेताओं—ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी—के बीच सीमित होकर रह गया।

सेक्स्टस पॉम्पियस की पराजय के बाद ऑक्टेवियन ने अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत बनाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक कदम उठाए। उसने रोमन नागरिकों के संपत्ति अधिकारों की रक्षा का आश्वासन दिया तथा सेवानिवृत्त सैनिकों को इटली के बजाय अन्य प्रांतों में बसाने की नीति अपनाई, जिससे भूमि विवादों में कमी आई। इसके अतिरिक्त उसने लगभग 30,000 भगोड़े दासों को पकड़कर उनके स्वामियों को वापस सौंप दिया। रोम लौटने पर उसने अपने, अपनी पत्नी लिविया तथा अपनी बहन ऑक्टेविया के लिए विशेष कानूनी संरक्षण (ट्रिब्यूनीय पवित्रता) प्राप्त किया, जिससे उनके विरुद्ध किसी प्रकार की हिंसा या कानूनी उत्पीड़न को गंभीर अपराध घोषित कर दिया गया। इन उपायों से उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और सुरक्षा दोनों सुदृढ़ हुईं।

इलिरिकम, यूनान तथा मिस्र की विजय
इलीरिकम में सैन्य अभियान (35 ईसा पूर्व)

इसी समय ऑक्टेवियन ने इलीरिकम (वर्तमान क्रोएशिया और उसके आसपास का क्षेत्र) में सैन्य अभियान आरंभ किया। 35 ईसा पूर्व में उसने सेगेस्टा पर अधिकार किया और उसके बाद मेटुलम नगर की घेराबंदी की। इस अभियान के दौरान घेराबंदी के लिए बनाए गए लकड़ी के रैंप के ढह जाने से वह स्वयं घायल हो गया, फिर भी अभियान सफलतापूर्वक जारी रहा। इन विजयों ने उसकी सैन्य प्रतिष्ठा को और अधिक बढ़ाया। यद्यपि रोमन सीनेट ने उसे विजय-उत्सव मनाने का अधिकार दिया, उसने तत्काल इसे स्वीकार नहीं किया और बाद में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि इन सफलताओं का बड़ा श्रेय उसके सेनापतियों मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा और स्टैटिलियस टॉरस को भी जाता है।

लेपिडस के पतन के बाद ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के बीच प्रतिद्वंद्विता खुलकर सामने आने लगी। पार्थिया अभियान में एंटनी की असफलता तथा मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा के साथ उसके बढ़ते संबंधों ने ऑक्टेवियन को उसके विरुद्ध व्यापक प्रचार करने का अवसर मिल गया। ऑक्टेवियन ने आरोप लगाया कि एंटनी एक विदेशी रानी के प्रभाव में आकर रोमन हितों की उपेक्षा कर रहा है। 33–32 ईसा पूर्व में यह प्रचार युद्ध और तीव्र हो गया। एंटनी द्वारा ऑक्टेविया को तलाक देने, ‘अलेक्जेंड्रिया के उपहार’ के माध्यम से क्लियोपेट्रा और उसके बच्चों को प्रदेश एवं उपाधियाँ प्रदान करने तथा उसकी वसीयत के सार्वजनिक होने से रोमन जनता और सीनेट का विश्वास एंटनी से उठने लगा। अंततः 32 ईसा पूर्व में सीनेट ने क्लियोपेट्रा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यद्यपि औपचारिक रूप से यह युद्ध मिस्र की रानी के विरुद्ध था, वास्तव में यह ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के बीच अंतिम निर्णायक संघर्ष की शुरुआत थी, जिसका परिणाम अगले वर्ष एक्टियम के युद्ध में सामने आया।

एक्टियम का युद्ध (31 ईसा पूर्व)

2 सितंबर 31 ईसा पूर्व को पश्चिमी यूनान के एक्टियम के निकट ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी के बीच निर्णायक नौसैनिक युद्ध हुआ। मार्क एंटनी और क्लियोपेट्रा की संयुक्त नौसेना ऑक्टेवियन के सेनापति मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा की सुव्यवस्थित रणनीति के सामने टिक नहीं सकी। युद्ध के दौरान क्लियोपेट्रा अपने जहाज़ों के साथ युद्धक्षेत्र से भाग गई और कुछ ही समय बाद एंटनी भी उसके पीछे भाग गया। इसके परिणामस्वरूप उसकी शेष थलसेना का मनोबल टूट गया और अंततः उसने ऑक्टेवियन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। यह विजय रोमन गृहयुद्ध का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।

ऑगस्टस (Augustus)
एक्टियम का युद्ध (31 ईसा पूर्व)
निकोपोलिस नगर की स्थापना

एक्टियम की विजय के बाद ऑक्टेवियन की प्रतिष्ठा पूरे रोमन विश्व में अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई। अनेक सहयोगी राजा और पूर्व समर्थक उसके पक्ष में आ गए तथा रोम में उसके सर्वोच्च नेतृत्व को व्यापक स्वीकृति मिलने लगी। इस महान विजय की स्मृति में उसने युद्धस्थल के निकट निकोपोलिस (विजय का नगर) नामक नगर की स्थापना की, जो उसकी सैन्य सफलता और रोमन प्रभुत्व का स्थायी प्रतीक बन गया।

ऑगस्टस (Augustus)

निकोपोलिस नगर

अगले वर्ष 30 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन ने अलेक्जेंड्रिया पर अधिकार कर लिया। पराजय के बाद मार्क एंटनी ने आत्महत्या कर ली और कुछ समय बाद क्लियोपेट्रा ने भी बंदी बनकर रोम ले जाए जाने के अपमान से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। ऑक्टेवियन ने अपने शासन के संभावित प्रतिद्वंद्वी सीज़ेरियन तथा एंटनी के बड़े पुत्र मार्कस एंटोनियस एंटिलस को मृत्युदंड दिलवाया, जबकि एंटनी और क्लियोपेट्रा की अन्य संतानों को जीवित रहने दिया तथा बाद में उनकी देखभाल की व्यवस्था भी की।

मिस्र की विजय ऑक्टेवियन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी। अपार धन-संपत्ति और समृद्ध कर-व्यवस्था पर अधिकार मिलने से उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई। उसने मिस्र को सीनेट के अधीन सामान्य प्रांत न बनाकर सीधे अपने नियंत्रण में रखा तथा अश्वारोही वर्ग के अधिकारी कॉर्नेलियस गैलस को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। मिस्र पर अधिकार के साथ ही हेलेनिस्टिक युग का अंत हुआ और संपूर्ण भूमध्यसागरीय विश्व पर रोम का निर्विवाद प्रभुत्व स्थापित हो गया।

29 ईसा पूर्व में ऑक्टेवियन विजयी होकर रोम लौटा और इलिरिकम, यूनान तथा मिस्र की विजयों के उपलक्ष्य में तीन भव्य विजय-समारोह (ट्रायम्फ) मनाए। इसके बाद उसने स्वयं को राजा या तानाशाह घोषित करने के बजाय ‘प्रिंसिप्स’ अर्थात् ‘प्रथम नागरिक’ के रूप में प्रस्तुत किया। गणराज्य की बाहरी संस्थाओं को बनाए रखते हुए उसने वास्तविक सत्ता अपने हाथों में केंद्रित की और एक नई शासन-व्यवस्था ‘प्रिंसिपेट’ की स्थापना की। यही व्यवस्था आगे चलकर रोमन साम्राज्य की राजनीतिक संरचना की आधारशिला बनी और ऑक्टेवियन को रोम का प्रथम सम्राट बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

ऑगस्टस के संवैधानिक सुधार

13 जनवरी 27 ईसा पूर्व को ऑक्टेवियन ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि वह अपनी असाधारण शक्तियाँ, प्रांतों का नियंत्रण और सेनाओं की कमान रोमन सीनेट को लौटा रहा है। यद्यपि यह कदम गणराज्य की पुनर्स्थापना जैसा प्रतीत हुआ, परंतु वास्तव में यह एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति थी। उसकी विशाल संपत्ति, सेना पर नियंत्रण तथा सैनिकों और समर्थकों की निष्ठा के कारण वास्तविक शक्ति उसके हाथों में ही बनी रही। इसी आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव के बल पर उसने स्वयं को राज्य का संरक्षक और उदार शासक के रूप में स्थापित किया।

प्रथम संवैधानिक समझौता

16 जनवरी 27 ईसा पूर्व को हुए प्रथम संवैधानिक समझौते के अंतर्गत सीनेट ने ऑक्टेवियन से आग्रह किया कि वह साम्राज्य के सैन्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और अशांत प्रांतों का प्रशासन पुनः अपने हाथ में ले। उसने इन प्रांतों का शासन दस वर्षों के लिए स्वीकार किया। हिस्पानिया, गॉल, सीरिया, सिलिसिया, साइप्रस और मिस्र जैसे प्रमुख प्रांत उसके अधीन आ गए, जहाँ रोमन साम्राज्य की अधिकांश स्थायी सेनाएँ तैनात थीं। इसके विपरीत सीनेट के अधीन केवल कुछ शांतिपूर्ण प्रांत और सीमित सैन्य शक्ति ही रही। इस प्रकार गणराज्य की संस्थाएँ औपचारिक रूप से बनी रहीं, किंतु वास्तविक सत्ता ऑगस्टस के हाथों में केंद्रित हो गई।

प्रांतों के प्रशासन की भी नई व्यवस्था बनाई गई। ऑगस्टस के अधीन प्रांतों का संचालन उसके नियुक्त लेगेट (प्रतिनिधि) करते थे, जबकि सीनेट के अधीन प्रांतों के गवर्नर स्वयं सीनेट नियुक्त करती थी। फिर भी आवश्यकता पड़ने पर ऑगस्टस सीनेट के प्रांतों के गवर्नरों को भी निर्देश दे सकता था। इस प्रकार संपूर्ण साम्राज्य के प्रशासन, सुरक्षा और सैन्य व्यवस्था पर उसका प्रभाव बना रहा। उसने इस व्यवस्था को साम्राज्य की स्थिरता और शांति के लिए आवश्यक बताया।

‘ऑगस्टस’ की उपाधि (27 ईसा पूर्व)

सीनेट ने 16 जनवरी 27 ईसा पूर्व को ऑक्टेवियन को ‘ऑगस्टस’ की सम्मानजनक उपाधि प्रदान की, जिसका अर्थ है—‘सम्मानित’, ‘पूजनीय’ या ‘महिमामय’। साथ ही उसे प्रिंसेप्स सेनेटस (सीनेट का प्रथम सदस्य) की प्रतिष्ठा भी मिली। उसने अपना आधिकारिक नाम ‘इम्पेरेटर सीज़र दिवि फिलियस’ धारण किया, जिससे वह स्वयं को देवत्व प्राप्त जूलियस सीज़र का वैध उत्तराधिकारी सिद्ध करता था। यद्यपि उसे अनेक सम्मान दिए गए, फिर भी उसने जानबूझकर राजदंड, मुकुट और अन्य राजशाही प्रतीकों को स्वीकार नहीं किया, ताकि वह स्वयं को राजा नहीं बल्कि ‘प्रथम नागरिक’ के रूप में प्रस्तुत कर सके।

23 ईसा पूर्व तक प्रथम संवैधानिक समझौते की कुछ सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं। लगातार कई वर्षों तक कॉन्सुल बने रहने से ऑगस्टस का राजनीतिक प्रभुत्व अत्यधिक बढ़ गया और अन्य कुलीन व्यक्तियों के लिए इस सर्वोच्च पद तक पहुँचना कठिन हो गया। साथ ही अपने भांजे मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस को संभावित उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने के प्रयासों से भी राजनीतिक विवाद उत्पन्न हुए। इन परिस्थितियों ने ऑगस्टस को आगे चलकर अपने संवैधानिक अधिकारों में नए परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया, जिसने उसके शासन को और अधिक स्थायी तथा सुदृढ़ बना दिया।

कॉन्सुल पद से इस्तीफ़ा

23 ईसा पूर्व में ऑगस्टस गंभीर रूप से बीमार पड़ गया, जिससे उसे अपने उत्तराधिकार और शासन-व्यवस्था के भविष्य की चिंता होने लगी। उसने अपनी व्यक्तिगत मुहर वाली अँगूठी अपने विश्वस्त सेनापति मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा को सौंपने की तैयारी की, जबकि राज्य के प्रशासनिक दस्तावेज़ अपने सह-कॉन्सुल कैल्पुर्नियस पिसो को सौंप दिया। उसने किसी औपचारिक राजवंशीय उत्तराधिकार की घोषणा नहीं की, क्योंकि वह यह आभास नहीं देना चाहता था कि रोम में राजतंत्र स्थापित किया जा रहा है। स्वस्थ होने के बाद उसने 1 जुलाई 23 ईसा पूर्व को स्वेच्छा से कॉन्सुल पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद उसने केवल दो अवसरों—5 ईसा पूर्व और 2 ईसा पूर्व—में ही यह पद ग्रहण किया। उसके इस निर्णय से अन्य सीनेटरों के लिए कॉन्सुल बनने के अवसर बढ़े, जबकि वह स्वयं बिना इस पद के भी अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा और प्रभाव बनाए रखने में सफल रहा।

मार्कस प्रिमस प्रकरण

कॉन्सुल पद छोड़ने के बाद एक संवैधानिक समस्या उत्पन्न हुई कि अब ऑगस्टस सीनेट के अधीन प्रांतों में किस अधिकार से हस्तक्षेप करेगा। यह प्रश्न मार्कस प्रिमस प्रकरण के दौरान और अधिक गंभीर हो गया। मैसेडोनिया के पूर्व प्रोकॉन्सुल मार्कस प्रिमस पर सीनेट की अनुमति के बिना थ्रेस के ओड्रिसियन राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का आरोप लगा। प्रिमस ने दावा किया कि उसने यह अभियान ऑगस्टस के आदेश पर चलाया था, जबकि ऑगस्टस ने न्यायालय में उपस्थित होकर इस आरोप का खंडन किया। यद्यपि प्रिमस दोषी ठहराया गया, इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि ऑगस्टस के अधिकारों की संवैधानिक सीमाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित करना आवश्यक है।

दूसरा संवैधानिक समझौता (23 ईसा पूर्व)

इसी पृष्ठभूमि में 23 ईसा पूर्व का दूसरा संवैधानिक समझौता (Second Settlement) हुआ। इसके अंतर्गत ऑगस्टस को इम्पेरियम प्रोकॉन्सुलारे मायुस (श्रेष्ठ प्रोकॉन्सुलर अधिकार) प्रदान किया गया। इस अधिकार के कारण वह केवल अपने प्रांतों का ही नहीं, बल्कि पूरे रोमन साम्राज्य के सभी प्रांतीय गवर्नरों से संवैधानिक रूप से उच्च माना गया। अब वह किसी भी प्रांत में हस्तक्षेप कर सकता था और आवश्यकता पड़ने पर वहाँ के गवर्नरों को आदेश दे सकता था। इस प्रकार बिना कॉन्सुल बने भी उसकी सर्वोच्च प्रशासनिक और सैन्य सत्ता सुरक्षित रही।

दूसरे संवैधानिक समझौते के अंतर्गत ऑगस्टस को आजीवन ट्रिब्यूनिशिया पोटेस्टास (ट्रिब्यून की शक्तियाँ) भी प्रदान की गईं। इन अधिकारों के आधार पर वह जब चाहे सीनेट और जनसभा की बैठक बुला सकता था, कानून प्रस्तुत कर सकता था, निर्णयों पर वीटो लगा सकता था, चुनावों की अध्यक्षता कर सकता था तथा राज्य के प्रमुख राजनीतिक निर्णयों में प्रथम मत व्यक्त कर सकता था। यद्यपि वह औपचारिक रूप से ट्रिब्यून नहीं था, फिर भी उसे जीवनभर ट्रिब्यून की सभी प्रमुख शक्तियाँ प्राप्त रहीं। इसके साथ ही उसे सार्वजनिक नैतिकता, जनगणना और सीनेट की सदस्यता से संबंधित कुछ सेंसर संबंधी अधिकार भी प्राप्त हुए, जिनका उपयोग उसने पारंपरिक रोमन मूल्यों और प्रशासनिक अनुशासन को सुदृढ़ करने के लिए किया।

इन संवैधानिक सुधारों के परिणामस्वरूप ऑगस्टस ने बिना राजा या तानाशाह बने ही रोमन राज्य की सर्वोच्च सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली। उसने गणराज्य की संस्थाओं और परंपराओं को औपचारिक रूप से बनाए रखा, किंतु व्यापक प्रोकॉन्सुलर अधिकार, ट्रिब्यून की शक्तियों और अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा (ऑक्टोरिटास) के माध्यम से पूरे साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया। यही व्यवस्था आगे चलकर प्रिंसिपेट शासन की स्थायी संवैधानिक आधारशिला सिद्ध हुई।

रोम में अपनी सत्ता को स्थायी और निर्विवाद बनाने के लिए ऑगस्टस ने यह सुनिश्चित किया कि उसके प्रोकॉन्सुलर अधिकार केवल प्रांतों तक सीमित न रहें। परंपरागत रूप से किसी भी प्रोकॉन्सुल का इम्पेरियम रोम की पवित्र सीमा (पोमेरियम) में प्रवेश करते ही समाप्त हो जाता था और नगर के भीतर प्रशासनिक तथा सैन्य अधिकार निर्वाचित कॉन्सुलों के पास चले जाते थे। किंतु 23 अथवा 19 ईसा पूर्व में सीनेट ने विशेष निर्णय लेकर ऑगस्टस के इम्पेरियम को रोम नगर के भीतर भी प्रभावी बनाए रखा। इससे वह राजधानी में भी सर्वोच्च अधिकार संपन्न शासक बन गया और उसकी शक्ति किसी अन्य अधिकारी से अधिक हो गई।

इसी अधिकार के कारण रोमन साम्राज्य की लगभग सभी महत्त्वपूर्ण सैन्य सफलताओं का श्रेय ऑगस्टस को मिलने लगा। अधिकांश सेनाएँ उसके अधीन प्रांतों में तैनात थीं और उनके सेनापति उसके प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते थे। यदि सीनेट के किसी प्रांत में भी विजय प्राप्त होती, तब भी ऑगस्टस अपने व्यापक प्रोकॉन्सुलर अधिकार के आधार पर उस अभियान का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता था। परिणामस्वरूप रोमन परंपरा का सर्वोच्च सैन्य सम्मान ट्रायम्फ धीरे-धीरे लगभग पूरी तरह शाही परिवार तक सीमित हो गया।

ऑगस्टस ने केवल सैन्य क्षेत्र ही नहीं, बल्कि विदेश नीति पर भी अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। उसके शासनकाल में भारत, पार्थिया तथा ब्रिटेन जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से दूतावास रोम आए और अधिकांश विदेशी प्रतिनिधि सीधे उसी से भेंट करने लगे। यद्यपि औपचारिक रूप से विदेश नीति में सीनेट की भूमिका बनी रही, लेकिन व्यवहार में कूटनीतिक निर्णयों का केंद्र ऑगस्टस ही था। वृद्धावस्था में उसने विदेशी दूतावासों के दैनिक कार्यों के लिए पूर्व कॉन्सुलों की एक समिति नियुक्त कर प्रशासन को और अधिक व्यवस्थित बनाया।

ऑगस्टस की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि रोमन जनता उसे राज्य का अनिवार्य संरक्षक मानने लगी थी। जब उसने कई बार कॉन्सुल बनने से इनकार किया, तब भी जनता और जनसभा उसे पुनः सर्वोच्च पद पर देखना चाहती थी। 22 ईसा पूर्व के भीषण अनाज संकट के दौरान लोगों ने उससे तानाशाह जैसी असाधारण शक्तियाँ ग्रहण करने की भी माँग की। यद्यपि उसने औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, फिर भी अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करके उसने अनाज आपूर्ति की व्यवस्था अपने हाथ में ले ली और संकट का सफलतापूर्वक समाधान किया।

प्रेफेक्टस एनोना

प्रशासन को अधिक स्थायी बनाने के उद्देश्य से ऑगस्टस ने आगे चलकर कई संस्थागत सुधार किए। 8 ईस्वी में उसने प्रेफेक्टस एनोना नामक स्थायी पद की स्थापना की, जिसका दायित्व रोम के लिए नियमित और सुरक्षित खाद्यान्न आपूर्ति सुनिश्चित करना था। इस प्रकार उसने गणराज्य की पारंपरिक संस्थाओं को औपचारिक रूप से बनाए रखते हुए प्रशासन, सेना, विदेश नीति और सार्वजनिक व्यवस्था पर अपना प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया तथा रोमन साम्राज्य की स्थिर शासन-व्यवस्था की मजबूत आधारशिला रखी।

ऑगस्टस के विरुद्ध षड्यंत्र (22 ईसा पूर्व)

ऑगस्टस की बढ़ती राजनीतिक शक्ति से असंतुष्ट कुछ रोमन कुलीनों ने 22 ईसा पूर्व में उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा, जिसका नेतृत्व फैन्नियस कैपियो कर रहा था। इस षड्यंत्र में लूसियस लिसिनियस वैरो मुरेना भी शामिल था, जो पहले मार्कस प्रिमस प्रकरण से जुड़ा हुआ था। षड्यंत्र का भेद खुलने पर सभी अभियुक्तों पर उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया। टाइबेरियस ने अभियोजन पक्ष का नेतृत्व किया और दोषी सिद्ध होने पर सभी षड्यंत्रकारियों को राजद्रोह के आरोप में मृत्युदंड दे दिया गया। यद्यपि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिला, फिर भी ऑगस्टस ने पूरे मामले को गणराज्य की कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

इसके बाद ऑगस्टस की संवैधानिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ होती गई। 19 ईसा पूर्व में सीनेट ने उसे अतिरिक्त कौंसुलीय तथा व्यापक प्रोकॉन्सुलर अधिकार प्रदान किए, जिससे उसकी सर्वोच्च सत्ता इटली और रोम नगर तक भी स्पष्ट रूप से विस्तृत हो गई। उसे सार्वजनिक समारोहों में कॉन्सुल के सम्मान-चिह्न धारण करने, सीनेट में विशेष स्थान ग्रहण करने तथा फासेस जैसे अधिकार-प्रतीकों के उपयोग की अनुमति भी मिल गई। बाद में 12 ईसा पूर्व में लेपिडस की मृत्यु के पश्चात् उसने पोंटिफ़ेक्स मैक्सिमस का सर्वोच्च धार्मिक पद ग्रहण किया और 2 ईसा पूर्व में उसे ‘पाटर पैट्रिए’ (देश का पिता) की सम्मानजनक उपाधि प्रदान की गई।

उत्तराधिकार और शासन की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए ऑगस्टस ने अपने विश्वसनीय सहयोगी मार्कस विप्सानियस एग्रीप्पा को सत्ता में महत्त्वपूर्ण भागीदारी दी। एग्रीप्पा को प्रोकॉन्सुलर इम्पेरियम तथा ट्रिब्यून की शक्तियाँ प्रदान की गईं, जिससे वह सम्राट का प्रमुख सहयोगी और संभावित उत्तराधिकारी बन गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि यदि ऑगस्टस की अकाल मृत्यु हो जाए, तो रोम पुनः गृहयुद्ध की स्थिति में न पहुँचे और शासन की निरंतरता बनी रहे।

ऑगस्टस ने अपने शासनकाल में साम्राज्य के व्यापक सैन्य विस्तार को भी प्राथमिकता दी। उसकी सेनाओं ने उत्तरी हिस्पानिया, गैलेटिया, आल्प्स, रेटिया, नोरिकम, इलीरिकम और पैनोनिया जैसे क्षेत्रों पर रोमन प्रभुत्व स्थापित किया। गैलेटिया बिना बड़े युद्ध के रोमन प्रांत बना, जबकि हिस्पानिया के खनिज-संपन्न क्षेत्रों और आल्प्स पर विजय ने साम्राज्य की आर्थिक तथा सामरिक शक्ति को अत्यधिक बढ़ाया। इन विजयों के उपलक्ष्य में सैनिकों ने ऑगस्टस को अनेक बार ‘इम्पेरेटर’ की उपाधि प्रदान की और उसकी उपलब्धियों का वर्णन उसके प्रसिद्ध अभिलेख ‘रेस गेस्टे दिवी ऑगस्ती’ में भी किया गया।

ऑगस्टस ने अपनी सैन्य सफलताओं को केवल राजनीतिक विजय के रूप में नहीं, बल्कि रोमन सभ्यता के गौरव और विश्वव्यापी प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। समकालीन साहित्य, विशेषकर कवि वर्जिल के महाकाव्य एनीड ने यह विचार लोकप्रिय बनाया कि रोम को देवताओं ने संसार पर शासन करने का दैवी अधिकार प्रदान किया है। इस प्रकार सैन्य विस्तार, राजनीतिक स्थिरता और सांस्कृतिक प्रचार—तीनों ने मिलकर ऑगस्टस के शासन को रोमन साम्राज्य के स्वर्णिम युग की आधारशिला बना दिया।

आल्प्स पर विजय के बाद ऑगस्टस ने साम्राज्य की उत्तरी सीमाओं के विस्तार का दायित्व अपने सौतेले पुत्रों टाइबेरियस और ड्रूसस को सौंपा। 12 ईसा पूर्व से दोनों ने अलग-अलग दिशाओं में सफल सैन्य अभियान चलाए। टाइबेरियस ने इलीरिकम की पैनोनियन जनजातियों को पराजित किया, जबकि ड्रूसस ने राइन नदी पार कर जर्मेनिया में रोमन प्रभाव का विस्तार किया। 9 ईसा पूर्व तक उसकी सेना एल्बे नदी तक पहुँच गई, जो उस समय रोमन साम्राज्य की सबसे दूरस्थ सीमा थी। इसी अभियान के दौरान घोड़े से गिरने के कारण ड्रूसस की मृत्यु हो गई। उसके सम्मान में रोम में सार्वजनिक श्रद्धांजलि दी गई और उसे महान सेनापति के रूप में स्मरण किया गया।

इलीरिकम विद्रोह (6-9 ईस्वी)

6 ईस्वी में इलीरिकम की अनेक जनजातियों ने रोमन शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह कर दिया, जो ऑगस्टस के शासनकाल का सबसे गंभीर प्रांतीय विद्रोह था। टाइबेरियस और उसके भतीजे जर्मेनिकस ने लगभग तीन वर्षों तक लगातार युद्ध करके 9 ईस्वी में इस विद्रोह का दमन किया। इस सफलता के बाद ऑगस्टस ने अपनी पुनर्गठित स्थायी सेना को साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा और नए क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए अधिक प्रभावी ढंग से संगठित किया।

पूर्वी सीमा पर ऑगस्टस ने प्रत्यक्ष विजय के स्थान पर कूटनीति और आश्रित राज्यों की नीति अपनाई। उसने सीरिया में शक्तिशाली रोमन सेना तैनात की और टाइबेरियस को पार्थिया के साथ वार्ता के लिए भेजा। 20 ईसा पूर्व में पार्थिया के साथ समझौते के परिणामस्वरूप कैरहे के युद्ध में खोए हुए रोमन सैन्य ध्वज वापस मिल गए और अर्मेनिया में रोमन प्रभाव पुनः स्थापित हुआ। ऑगस्टस ने इस उपलब्धि को सैन्य विजय के समान महत्त्व दिया तथा इसे रोमन गौरव और अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में व्यापक प्रचारित किया।

ट्यूटोबर्ग वन के युद्ध (9 ईस्वी)

पश्चिम और उत्तर में रोमन विस्तार को 9 ईस्वी में ट्यूटोबर्ग वन के युद्ध में गंभीर आघात पहुँचा। चेरुस्की नेता आर्मिनियस ने वारुस के नेतृत्व वाली तीन रोमन लीजियनों का पूर्ण विनाश कर दिया। इसके बाद ऑगस्टस ने टाइबेरियस को राइन सीमा की सुरक्षा के लिए भेजा, जिसने स्थिति को नियंत्रित कर सीमा को स्थिर किया। इस पराजय के बाद ऑगस्टस ने जर्मेनिया के भीतरी भागों में आगे विस्तार की नीति त्याग दी और राइन नदी को ही रोमन साम्राज्य की स्थायी उत्तरी सीमा स्वीकार कर लिया।

ऑगस्टस (Augustus)
ट्यूटोबर्ग वन के युद्ध (9 ईस्वी)

ऑगस्टस के शासनकाल में अन्य क्षेत्रों में भी अनेक सैन्य और कूटनीतिक अभियान चलाए गए। दक्षिणी अरब में सबा साम्राज्य के विरुद्ध अभियान असफल रहा, किंतु कुश साम्राज्य के साथ संघर्ष के बाद लाभदायक शांति-संधि स्थापित हुई। उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में गैटुली जनजातियों के विद्रोह का सफल दमन कर मॉरिटानिया में रोमन प्रभाव सुरक्षित रखा गया। इन अभियानों से स्पष्ट होता है कि ऑगस्टस ने केवल विजय प्राप्त करने पर ही नहीं, बल्कि साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने पर भी समान रूप से ध्यान दिया।

उत्तराधिकार की समस्या

23 ईसा पूर्व में ऑगस्टस की गंभीर बीमारी ने रोमन साम्राज्य में उत्तराधिकार के प्रश्न को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना दिया। यदि उसकी अचानक मृत्यु हो जाती, तो लंबे गृहयुद्धों के बाद स्थापित राजनीतिक स्थिरता फिर संकट में पड़ सकती थी। इसलिए उसने ऐसा उत्तराधिकारी चुनने का प्रयास किया जो न केवल सक्षम सेनानायक और प्रशासक हो, बल्कि रोमन जनता और सीनेट का भी विश्वास प्राप्त कर सके। साथ ही वह किसी भी प्रकार की वंशानुगत राजशाही का आभास देने से बचना चाहता था।

प्रारंभ में ऑगस्टस के संभावित उत्तराधिकारियों में उसके भांजे मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस और विश्वसनीय सहयोगी मार्कस विप्सानियस एग्रीपा प्रमुख थे। मार्सेलस की असमय मृत्यु के बाद ऑगस्टस ने अपनी पुत्री जूलिया का विवाह एग्रीपा से कराया तथा उसे प्रोकॉन्सुलर इम्पेरियम और ट्रिब्यून की शक्तियाँ प्रदान कीं। बाद में उसने एग्रीपा और जूलिया के पुत्रों- गायस सीज़र और लूसियस सीज़र को गोद लेकर उन्हें सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ाया, जिससे स्पष्ट हो गया कि भविष्य में वही उसके उत्तराधिकारी बनने वाले हैं।

एग्रीपा और ड्रूसस की मृत्यु तथा उसके बाद लूसियस और गायस सीज़र के क्रमशः 2 और 4 ईस्वी में मृत्यु ने ऑगस्टस की उत्तराधिकार योजना को पूरी तरह बदल दिया। अंततः उसने 4 ईस्वी में अपने सौतेले पुत्र टाइबेरियस को विधिवत गोद लिया और उसे ट्रिब्यूनिशियन शक्तियाँ तथा सर्वोच्च प्रोकॉन्सुलर अधिकार प्रदान किए। साथ ही उसने यह भी सुनिश्चित किया कि टाइबेरियस अपने भतीजे जर्मेनिकस को गोद ले, जिससे उत्तराधिकार की निरंतरता बनी रहे।

ऑगस्टस का एक अन्य पौत्र एग्रीपा पोस्टमस भी संभावित दावेदार था, किंतु उसके उग्र स्वभाव और अनुशासनहीन व्यवहार के कारण उसे पहले निर्वासित किया गया और बाद में उत्तराधिकार से वंचित कर दिया गया। 13 ईस्वी तक टाइबेरियस को ऑगस्टस के समान अधिकार प्राप्त हो चुके थे और वह उसका निर्विवाद उत्तराधिकारी बन गया था। इस प्रकार ऑगस्टस ने सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित कर रोमन साम्राज्य में उत्तराधिकार की एक स्थिर परंपरा स्थापित की, जिसने उसके निधन के बाद भी साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था को स्थिर बनाए रखा।

ऑगस्टस का ऐतिहासिक महत्त्व

ऑगस्टस को रोमन इतिहास का सबसे प्रभावशाली शासक माना जाता है, क्योंकि उसने लंबे गृहयुद्धों का अंत कर एक ऐसी स्थायी शासन-व्यवस्था स्थापित की, जिसने रोमन साम्राज्य को लगभग दो शताब्दियों तक शांति, स्थिरता और समृद्धि प्रदान की। उसके शासनकाल को ‘पैक्स रोमाना’ या ‘पैक्स ऑगस्टा’ के नाम से जाना जाता है। यद्यपि इस काल को रोमन इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है, फिर भी इसकी सफलता के पीछे ऑगस्टस की कुशल राजनीतिक दूरदर्शिता, प्रशासनिक सुधार और सैन्य संगठन की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। उसकी स्थापित प्रिंसिपेट व्यवस्था ने आगे चलकर बाइजेंटाइन तथा पवित्र रोमन साम्राज्य जैसी राजशाही व्यवस्थाओं की वैचारिक नींव भी रखी।

ऑगस्टस ने रोमन शासन की ऐसी परंपराएँ विकसित कीं, जिनका प्रभाव सदियों तक बना रहा। उसकी मृत्यु के बाद भी ‘सीज़र’ और ‘ऑगस्टस’ रोमन सम्राटों की स्थायी शाही उपाधियाँ बनी रहीं। आगे चलकर ‘सीज़र’ शब्द से जर्मन कैसर और रूसी ज़ार जैसी शाही उपाधियों का विकास हुआ, जबकि ‘इम्पेरेटर’ शब्द से आधुनिक ‘एम्परर’ (सम्राट) शब्द निकला। प्रारंभिक रोमन सम्राट स्वयं को ‘प्रथम नागरिक’ के रूप में प्रस्तुत करते रहे, जिससे गणराज्य की परंपराओं और राजसत्ता के बीच संतुलन बना रहा।

ऑगस्टस (Augustus)
रोमन सम्राटऑगस्टस

ऑगस्टस ने केवल शासन और राजनीति में ही नहीं, बल्कि साहित्य, इतिहास और प्रशासनिक परंपराओं में भी स्थायी योगदान दिया। उसकी आत्मवृत्तात्मक रचना ‘रेस गेस्टे डिवी ऑगस्टी’ प्राचीन रोम के सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलेखों में गिनी जाती है। इसमें उसने अपने शासन, सैन्य अभियानों और सार्वजनिक कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। यह अभिलेख रोमन साम्राज्य के अनेक भागों में लैटिन और यूनानी भाषाओं में स्थापित किया गया तथा आज भी ऑगस्टस के शासन का सबसे विश्वसनीय समकालीन स्रोत माना जाता है। इसके अतिरिक्त उसने साहित्य, दर्शन और आत्मकथा संबंधी कई रचनाएँ भी लिखीं, यद्यपि उनमें से अधिकांश अब उपलब्ध नहीं हैं।

ऑगस्टस की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने विजय और कूटनीति के माध्यम से एक विशाल तथा विविधतापूर्ण साम्राज्य को स्थिर राजनीतिक ढाँचे में संगठित किया। उसकी नीति के अनुसार साम्राज्य के अधीन प्रदेशों को स्थानीय परंपराओं और धार्मिक स्वतंत्रता की अनुमति दी जाती थी, जबकि बदले में वे रोमन सत्ता को स्वीकार करते और कर अदा करते थे। इसी नीति ने रोमन शासन को दीर्घकालीन स्थिरता प्रदान की। यही कारण है कि बाद के सम्राटों ने उसके शासन को आदर्श माना और रोमन इतिहास में ऑगस्टस को साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक तथा महानतम सम्राट के रूप में सम्मानित किया जाता है।

ऑगस्टस के सुधार

प्रशासनिक और नागरिक सुधार

ऑगस्टस ने रोम नगर के प्रशासन में व्यापक सुधार किए और उसे एक अधिक संगठित, सुरक्षित तथा सुव्यवस्थित राजधानी के रूप में विकसित किया। उसने स्थायी पुलिस व्यवस्था, अग्निशमन सेवा तथा प्रेफेक्टस उरबी (नगर-प्रमुख) के पद को सुदृढ़ किया।

6 ईस्वी में उसने विजिलेस नामक संयुक्त अग्निशमन एवं पुलिस बल की स्थापना की। यह व्यवस्था 22 और 7 ईसा पूर्व में स्थापित अस्थायी अग्निशमन सेवाओं के अनुभवों पर आधारित थी। विजिलेस को 500 से 1,000 सैनिकों वाली कोहोर्टों में विभाजित किया गया था। रोम के चौदह प्रशासनिक क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कुल सात कोहोर्ट नियुक्त की गईं। इस पूरे बल का नेतृत्व प्रेफेक्टस विगिलुम (विजिलेस का प्रमुख) करता था, जबकि प्रत्येक क्षेत्र की देखरेख विकोमजिस्त्री नामक स्थानीय अधिकारियों को सौंपी गई थी। इन अधिकारियों की नियुक्ति 7 ईसा पूर्व में रोम में लगी भीषण आग के बाद की गई थी।

स्थायी सेना का गठन

ऑगस्टस ने रोमन इतिहास की पहली स्थायी पेशेवर सेना का संगठन किया। इस सेना में लगभग 28 लीजन थीं, जिनमें लगभग 1,70,000 रोमन नागरिक सैनिक सेवा करते थे। गृहयुद्ध समाप्त होने पर 30 ईसा पूर्व में रोमन सेना में लगभग 60 लीजन थीं, जिन्हें घटाकर उसने अधिक सुव्यवस्थित और स्थायी स्वरूप प्रदान किया।

इनके अतिरिक्त, अनेक सहायक सैन्य इकाइयाँ (ऑक्सिलिया) भी गठित की गईं, जिनमें सामान्यतः लगभग 500 गैर-रोमन सैनिक होते थे। इन सैनिकों की भर्ती प्रायः विजित प्रदेशों से की जाती थी। इस प्रकार ऑगस्टस ने एक ऐसी पेशेवर सेना की स्थापना की, जो व्यक्तिगत सेनानायकों के बजाय सीधे राज्य के प्रति निष्ठावान थी।

सड़क और संचार व्यवस्था

ऑगस्टस ने पूरे इटली में सड़कों के निर्माण तथा उनके रखरखाव के लिए स्थायी वित्तीय व्यवस्था स्थापित की। साथ ही उसने सरकारी संदेशों और अधिकारियों के आवागमन के लिए रिले-स्टेशनों पर आधारित एक आधिकारिक संचार प्रणाली विकसित की, जिसकी देखरेख प्रेफेक्टस वेहिक्युलोरुम नामक अधिकारी करता था।

इस व्यवस्था से प्रशासनिक संचार पहले की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र और प्रभावी हो गया। साथ ही रोमन सेनाओं को भी साम्राज्य के विभिन्न भागों में शीघ्रता से पहुँचाना संभव हुआ।

सैन्य कोष की स्थापना

6 ईस्वी में ऑगस्टस ने ‘एरेरियम मिलिटारे’ नामक एक स्वतंत्र सैन्य कोष की स्थापना की। उसने इस कोष में स्वयं लगभग 17 करोड़ सेस्टर्स का योगदान दिया। इस कोष का उद्देश्य सक्रिय सैनिकों के वेतन, सेवामुक्त सैनिकों की पेंशन तथा अन्य सैन्य व्ययों की नियमित व्यवस्था करना था। इससे रोमन सेना की आर्थिक व्यवस्था अधिक स्थायी, संगठित और सुरक्षित बन गई।

प्रेटोरियन गार्ड की स्थापना

ऑगस्टस की सबसे महत्त्वपूर्ण और दीर्घकालीन उपलब्धि प्रेटोरियन गार्ड की स्थापना थी। इसका गठन 27 ईसा पूर्व में किया गया। प्रारंभ में इसका नेतृत्व दो प्रेटोरियन प्रीफेक्ट करते थे, किंतु 2 ईसा पूर्व के बाद यह दायित्व सामान्यतः एक ही अधिकारी को सौंपा जाने लगा। प्रारंभ में प्रेटोरियन गार्ड का कार्य युद्ध के मैदान में सम्राट की व्यक्तिगत सुरक्षा करना था, परंतु धीरे-धीरे यह रोमन सम्राट की स्थायी शाही अंगरक्षक सेना बन गया। समय के साथ यह रोमन राजनीति की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में परिवर्तित हो गया और अनेक अवसरों पर सम्राटों की नियुक्ति तथा पदच्युति में निर्णायक भूमिका निभाने लगा। यह संस्था चौथी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक अस्तित्व में रही।

राजस्व सुधार
कर व्यवस्था में सुधार

ऑगस्टस के कर सुधारों ने रोमन साम्राज्य की आर्थिक स्थिरता को नई मजबूती प्रदान की। उसने कर व्यवस्था को अधिक संगठित, नियमित और पारदर्शी बनाया तथा प्रांतों को सीधे रोमन राजकोष से जोड़ दिया। इससे राज्य की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, राजस्व संग्रह नियमित हुआ तथा स्थानीय अधिकारियों और कर-ठेकेदारों द्वारा होने वाले भ्रष्टाचार और मनमानी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ। परिणामस्वरूप प्रांतों में रोमन शासन के प्रति असंतोष भी कम हुआ।

ऑगस्टस का सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार ‘टैक्स फार्मिंग’ (कर-वसूली के ठेके) की प्रथा को समाप्त करना था। गणराज्य काल में निजी कर-ठेकेदार, जिन्हें ‘पब्लिकानी’ कहा जाता था, कर वसूलते थे और अत्यधिक कर-वसूली तथा भ्रष्टाचार के लिए बदनाम थे। ऑगस्टस ने उनके स्थान पर राज्य द्वारा वेतन प्राप्त करने वाले अधिकारियों की नियुक्ति की, जिससे कर-संग्रह अधिक नियंत्रित और न्यायसंगत हो गया।

ऑगस्टस के शासनकाल में कर निर्धारण का आधार नियमित जनगणना बनाई गई। प्रत्येक प्रांत के लिए निश्चित कर-कोटा निर्धारित किया जाता था। रोम और इटली के नागरिक मुख्यतः अप्रत्यक्ष कर देते थे, जबकि प्रांतों के निवासियों से प्रत्यक्ष कर लिया जाता था। अप्रत्यक्ष करों में दासों की बिक्री पर 4 प्रतिशत कर, नीलामी में बिकने वाली वस्तुओं पर 1 प्रतिशत कर तथा निकट संबंधियों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति से 1,00,000 सेस्टर्स से अधिक मूल्य की विरासत प्राप्त होने पर 5 प्रतिशत उत्तराधिकार कर शामिल था। बाद में 9 ईस्वी में ‘लेक्स पापिया पोपेया’ में संशोधन कर कुछ दंडों को कम किया गया, किंतु राज्य को विरासत से राजस्व प्राप्त होता रहा।

मिस्र का आर्थिक महत्त्व

मिस्र पर अधिकार प्राप्त करने के बाद ऑगस्टस को वहाँ की अपार संपत्ति और समृद्ध संसाधनों का लाभ मिला। उसने मिस्र को सामान्य रोमन प्रांत न बनाकर अपनी शाही निजी संपत्ति के समान शासित किया। यही व्यवस्था बाद के रोमन सम्राटों ने भी अपनाई।

मिस्र के प्रशासन के लिए उसने किसी सीनेटर या प्रोकॉन्सुल के स्थान पर अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन) वर्ग से एक प्रीफेक्ट नियुक्त किया। उसका दायित्व प्रशासन चलाना तथा मिस्र के अत्यंत लाभदायक समुद्री बंदरगाहों और कर-व्यवस्था की देखरेख करना था। यह पद प्रेटोरियन प्रीफेक्ट के अतिरिक्त अश्वारोही वर्ग के लिए सर्वोच्च प्रशासनिक पद माना जाता था।

टॉलेमी वंश के शाही खजाने में संचित विशाल मात्रा में सोना और चाँदी रोमन सिक्कों के निर्माण में प्रयुक्त किए गए। अपनी वसीयत में ऑगस्टस ने अपने परिवार के लिए संपत्ति छोड़ने के साथ-साथ रोमन जनता को 4 करोड़ 30 लाख सेस्टर्स, प्रत्येक प्रेटोरियन सैनिक को 1,000 सेस्टर्स, प्रत्येक अर्बन कोहॉर्ट के सैनिक को 500 सेस्टर्स तथा प्रत्येक सामान्य सैनिक को 300 सेस्टर्स देने का भी प्रावधान किया।

अगस्त महीने का नामकरण

8 ईसा पूर्व में रोमन पंचांग के ‘सेक्सटिलिस’ महीने का नाम बदलकर ऑगस्टस के सम्मान में ‘अगस्त’ रखा गया। यह महीना इसलिए चुना गया क्योंकि इसी अवधि में ऑगस्टस पहली बार कॉन्सुल बना था तथा उसकी अनेक महत्त्वपूर्ण सैन्य और राजनीतिक सफलताएँ भी इसी महीने प्राप्त हुई थीं।

इससे पहले जूलियन पंचांग में ‘क्विंटिलिस’ महीने का नाम जूलियस सीज़र के सम्मान में ‘जुलाई’ रखा जा चुका था। इस प्रकार रोमन पंचांग में किसी व्यक्ति के नाम पर रखे गए दो प्रमुख महीनों—जुलाई और अगस्त—की परंपरा स्थापित हुई।

निर्माण परियोजनाएँ
रोम का पुनर्निर्माण

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में ऑगस्टस ने गर्व से कहा था : ‘मैंने रोम को ईंटों का शहर पाया और संगमरमर का शहर छोड़कर जा रहा हूँ।’ यह कथन उसके व्यापक निर्माण कार्यों का प्रतीक माना जाता है। यद्यपि ऑगस्टस से पहले भी रोम में संगमरमर का उपयोग होता था, किंतु उसके शासनकाल में पहली बार इसे बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निर्माण की प्रमुख सामग्री के रूप में अपनाया गया।

ऑगस्टस ने रोम को एक भव्य साम्राज्यिक राजधानी का स्वरूप देने के लिए अनेक स्मारकों का निर्माण कराया। उसने कैंपस मार्टियस में आरा पैसिस (शांति की वेदी) का निर्माण कराया, जो उसके शासनकाल की शांति और समृद्धि का प्रतीक था। इसी क्षेत्र में उसने एक विशाल सूर्यघड़ी भी बनवाई, जिसका मुख्य भाग (ग्नोमन) मिस्र से लाया गया एक विशाल ओबिलिस्क था।

ऑगस्टस (Augustus)
आरा पैसिस (शांति की वेदी)

आरा पैसिस पर उत्कीर्ण उत्कृष्ट मूर्तियाँ ऑगस्टस की उपलब्धियों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती हैं। इनमें प्रेटोरियन गार्ड, वेस्टल पुजारिनें, सीनेटर, शाही परिवार के सदस्य तथा सामान्य रोमन नागरिकों को दर्शाया गया है। इन नक्काशियों में उसकी प्रसिद्ध आत्मकथात्मक अभिलेख ‘रेस गेस्टे डिवी ऑगस्टी’ में वर्णित उपलब्धियों का कलात्मक रूप भी दिखाई देता है।

ऑगस्टस के शासनकाल में कोरिंथियन स्थापत्य शैली रोमन वास्तुकला की प्रमुख शैली बन गई। यूनानी वास्तुकला से प्रेरित इस शैली में एथेंस के अनेक स्मारकों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। ऑगस्टस और उसके विश्वस्त सहयोगी मार्कस विप्सानियस एग्रीपा ने मिलकर रोम को उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा के अनुरूप एक भव्य शाही राजधानी के रूप में विकसित किया।

ऑगस्टस ने अनेक महत्त्वपूर्ण धार्मिक और सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया। इनमें दिव्य जूलियस सीज़र का मंदिर, जुपिटर टोनन्स का मंदिर, अपोलो पैलेटिनस का मंदिर, ऑगस्टस का फ़ोरम तथा उसमें स्थित मार्स अल्टोर (प्रतिशोधी मंगल) का मंदिर प्रमुख थे। उसने एग्रीपा द्वारा निर्मित स्नानागारों और पैंथियन के निर्माण को भी संरक्षण प्रदान किया।

इसके अतिरिक्त, उसने अपने परिजनों और सहयोगियों के नाम पर अनेक सार्वजनिक भवनों के निर्माण के लिए भी धन उपलब्ध कराया। इनमें पोर्टिको ऑफ ऑक्टेविया, थिएटर ऑफ मार्सेलस तथा बाल्बस का थिएटर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के लिए एक विशाल मकबरे का भी निर्माण कराया। 29 ईसा पूर्व में एक्टियम की विजय की स्मृति में कैस्टर और पोलक्स के मंदिर के निकट आर्च ऑफ ऑगस्टस का निर्माण कराया गया। बाद में 19 ईसा पूर्व में इसका विस्तार कर इसे तीन मेहराबों वाला भव्य स्मारक बना दिया गया।

ऑगस्टस ने अपने दत्तक पिता जूलियस सीज़र की अधूरी निर्माण योजनाओं को भी पूरा कराया। इनमें क्यूरिया जूलिया (सीनेट भवन), सीज़र का फ़ोरम तथा वीनस जेनेट्रिक्स का मंदिर प्रमुख थे। इसके अतिरिक्त उसने 35 ईसा पूर्व में आग से नष्ट हुई बैसिलिका एमिलिया का पुनर्निर्माण कराया, जो 2 ईसा पूर्व तक पूरा हुआ।

सार्वजनिक मनोरंजन और भव्य आयोजन

ऑगस्टस ने रोम में अनेक भव्य सार्वजनिक समारोहों और मनोरंजन कार्यक्रमों का आयोजन कराया। 34 से 29 ईसा पूर्व के बीच स्टैटिलियस टॉरस द्वारा निर्मित रोम के पहले पत्थर के एम्फीथिएटर का उद्घाटन ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं के साथ किया गया। इन्हीं आयोजनों के दौरान रोमवासियों ने पहली बार गैंडे और दरियाई घोड़े जैसे विदेशी पशुओं का सार्वजनिक प्रदर्शन और शिकार देखा। उसने सर्कस मैक्सिमस में शेरों के शिकार का आयोजन कराया तथा सर्कस फ्लेमिनियस में मगरमच्छों के प्रदर्शन और शिकार के लिए अस्थायी रूप से पानी भरवाया। इसके अतिरिक्त सेप्टा जूलिया में ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं के भी आयोजन किए गए।

2 ईसा पूर्व में ऑगस्टस ने टाइबर नदी के पश्चिमी तट पर एक विशाल कृत्रिम झील बनवाकर नौमाकिया ऑगस्टी नामक भव्य नकली नौसैनिक युद्ध का आयोजन कराया। इस झील में एक्वा एल्सीटिना जलसेतु के माध्यम से पानी पहुँचाया जाता था, जिसकी लंबाई लगभग 32 किलोमीटर थी। इस अवसर पर प्रसिद्ध सलामिस की नौसैनिक लड़ाई का पुनर्मंचन किया गया, जो सितंबर 480 ईसा पूर्व में ग्रीस की मुख्य भूमि और सलामिस द्वीप के बीच एक संकरे जलडमरूमध्य में लड़ी गई एक ऐतिहासिक नौसैनिक लड़ाई थी। इसमें यूनानी नगर-राज्यों के गठबंधन ने फारसी राजा ज़ेरक्सेस प्रथम के विशाल बेड़े को हरा दिया था।

जल-आपूर्ति और नगर व्यवस्था

ऑगस्टस ने रोम की जल-आपूर्ति, स्वच्छता, जल-निकासी व्यवस्था, सार्वजनिक स्नानागारों तथा सड़कों की देखरेख का दायित्व अपने विश्वस्त सहयोगी मार्कस विप्सानियस एग्रीपा को सौंपा। एग्रीपा ने 33 ईसा पूर्व में एडाइल के रूप में इन कार्यों की निगरानी की और बाद में अपने निजी धन से भी अनेक सार्वजनिक निर्माण कराए।

एग्रीपा ने एक्वा जूलिया जलसेतु का निर्माण कराया तथा नए जलाशयों, जल-टैंकों और जल-टावरों का निर्माण करवाया, जिससे रोम की पेयजल व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

12 ईसा पूर्व में एग्रीपा की मृत्यु के बाद ऑगस्टस ने जल-व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए सीनेट के तीन सदस्यों का एक आयोग गठित किया। इन आयुक्तों का कार्य जल-आपूर्ति की निगरानी करना तथा जलसेतुओं की मरम्मत और रखरखाव सुनिश्चित करना था।

सड़कें, पुल और सार्वजनिक भवन

त्रिमूर्व शासन तथा ऑगस्टस के प्रारंभिक शासनकाल में एग्रीपा ने विशेष रूप से राइन सीमा तक नई सैन्य सड़कों के निर्माण की देखरेख की। बाद में ऑगस्टस ने ‘क्यूरेटोरेस वियारुम’ नामक सीनेटरों का एक आयोग गठित किया, जिसका दायित्व पूरे साम्राज्य में सड़कों की मरम्मत और रखरखाव करना था। यह आयोग स्थानीय अधिकारियों और ठेकेदारों के सहयोग से कार्य करता था।

ऑगस्टस ने मिल्वियन पुल और मिनुशियन पुल को छोड़कर रोम के लगभग सभी प्रमुख पुलों की मरम्मत करवाई। उसने रोम और अरिमिनम (आधुनिक रिमिनी) के बीच स्थित प्रसिद्ध वाया फ्लेमिनिया सड़क को भी पक्का करवाया, जिससे यातायात तथा सैनिक आवागमन अधिक सुगम हो गया।

अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में ऑगस्टस ने क्यूरेटोरेस लोकोरुम पब्लिकोरुम ज्यूडिकांडोरुम नामक पाँच सीनेटरों का एक नया आयोग स्थापित किया। इस आयोग का दायित्व सार्वजनिक भवनों, मंदिरों तथा अन्य सरकारी संपत्तियों के संरक्षण, रखरखाव और मरम्मत की व्यवस्था करना था। इस प्रकार ऑगस्टस ने केवल नए निर्माण ही नहीं कराए, बल्कि सार्वजनिक अवसंरचना के नियमित संरक्षण की भी स्थायी व्यवस्था स्थापित की।

आवास

ऑगस्टस का आधिकारिक निवास पैलेटाइन पहाड़ी पर स्थित डोमस ऑगस्टी था। यद्यपि पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर इसकी सटीक पहचान अभी सुनिश्चित नहीं हो सकी है, फिर भी अधिकांश इतिहासकार इसे ऑगस्टस का मुख्य शाही निवास मानते हैं।

रोमन इतिहासकार सुएटोनियस के अनुसार ऑगस्टस का घर अपेक्षाकृत साधारण था और उसमें अत्यधिक विलासिता का प्रदर्शन नहीं किया गया था। किंतु यदि इसे पैलेटाइन पहाड़ी पर अपोलो पैलेटिनस मंदिर के पश्चिम में स्थित तथाकथित कैरेटोनी हाउस से जोड़ा जाए, तो यह निवास लिखित विवरणों की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल और भव्य प्रतीत होता है।

28 ईसा पूर्व में ऑगस्टस ने अपने निवास के निकट अपोलो को समर्पित एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। अपोलो को वह अपना संरक्षक देवता मानता था। उसके सम्मान में जारी अनेक सिक्कों पर ऑगस्टस को लॉरेल (तेजपत्ते) के नागरिक मुकुट के साथ दर्शाया गया है, जो अपोलो से उसके विशेष संबंध का प्रतीक था।

डोमस ऑगस्टी के निकट ही कासा रोमुली (रोमुलस का घर) स्थित था। रोमन परंपरा के अनुसार यही रोम के संस्थापक रोमुलस का निवास था। इस प्रकार ऑगस्टस ने अपने निवास को प्रतीकात्मक रूप से रोम की प्राचीन परंपराओं और उसके संस्थापक से भी जोड़ दिया। ऑगस्टस की पत्नी लिविया का निवास भी इसी क्षेत्र में था, यद्यपि यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है कि वे ऑगस्टस के जीवनकाल में उसी भवन में रहती थीं या किसी पृथक आवास में।

रोम के बाहर स्थित विला

रोम के अतिरिक्त ऑगस्टस के पास तीन प्रमुख ग्रामीण विला भी थे। यद्यपि ये अत्यधिक भव्य नहीं थे, फिर भी इनमें सुंदर उद्यान और आरामदायक सुविधाएँ उपलब्ध थीं। उसने कैप्री द्वीप पर पलाज़ो आ मारे नामक एक विला बनवाया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार यहाँ उसने जीवाश्मों तथा विभिन्न प्रकार की दुर्लभ हड्डियों का संग्रह रखा था, जिन्हें आधुनिक विद्वान प्रागैतिहासिक जीवों के अवशेष मानते हैं।

वेंटोटेने द्वीप पर स्थित विला जूलिया विशेष रूप से प्रसिद्ध है, क्योंकि यहीं ऑगस्टस ने अपनी पुत्री जूलिया को निर्वासित किया था। इस विला में उन्नत हाइपोकॉस्ट प्रणाली द्वारा केंद्रीय ताप व्यवस्था की गई थी, जिससे स्नानागारों के लिए गर्म पानी तथा भवन के कमरों में ताप उपलब्ध कराया जाता था। इसमें दो बड़े स्नानागार तथा एक काल्डारियम (गर्म जल स्नान कक्ष) भी था।

ऑगस्टस का पैतृक निवास नोला में स्थित था। यहीं उसके पिता का निधन हुआ था और बाद में स्वयं ऑगस्टस की भी मृत्यु इसी स्थान पर हुई। अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि यह वही विला था, जिसके अवशेष आधुनिक सोम्मा वेसुवियाना में प्राप्त हुए हैं।

ऑगस्टस का मूल्यांकन

ऑगस्टस के व्यक्तित्व और शासन के संबंध में प्राचीन तथा आधुनिक इतिहासकारों की राय एकमत नहीं है। कुछ इतिहासकारों ने उसे गृहयुद्धों का अंत करके रोम में शांति, स्थिरता और सुव्यवस्थित शासन स्थापित करने वाला महान शासक बताया है, जबकि अन्य ने उसे रोमन गणराज्य का अंत कर निरंकुश राजसत्ता स्थापित करने वाला शासक कहा है। समकालीन विधिवेत्ता मार्कस एंटीस्टियस लैबियो गणराज्य की परंपराओं का समर्थक था और उसका मत था कि ऑगस्टस ने रोमन गणराज्य की मूल भावना को कमजोर कर दिया। इतिहासकार टैसिटस ने भी लिखा कि ऑगस्टस ने गणराज्य की संस्थाओं को बनाए रखने का आभास दिया, परंतु वास्तविक सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली। वहीं कैसियस डियो ने उसे व्यावहारिक, संयमी और उदार शासक माना, यद्यपि उसने भी स्वीकार किया कि उसका शासन अंततः एक प्रकार की राजसत्ता ही था।

आधुनिक इतिहासकारों का मूल्यांकन भी मिश्रित है। कुछ विद्वानों का मत है कि ऑगस्टस ने गृहयुद्धों और राजनीतिक हिंसा से जुड़े अनेक अभिलेख नष्ट करवाकर अपनी सत्ता को वैध ठहराने का प्रयास किया। फिर भी उसके शासनकाल में साहित्यिक गतिविधियाँ पूरी तरह नियंत्रित नहीं थीं। वर्जिल, होरेस और प्रोपरटियस जैसे कवियों को सीमित स्तर पर स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अवसर मिला। यद्यपि वर्जिल और होरेस ने अपनी रचनाओं में ऑगस्टस की प्रशंसा की है, वहीं प्रोपरटियस ने पेरुसिन युद्ध की घटनाओं की अप्रत्यक्ष आलोचना भी की है। केवल ओविड का निर्वासन इस बात का संकेत है कि कुछ परिस्थितियों में सम्राट साहित्यिक अभिव्यक्ति पर भी नियंत्रण स्थापित कर सकता था।

मध्ययुग और पुनर्जागरण काल में ऑगस्टस की छवि अत्यंत सकारात्मक रही है। ईसाई विद्वान उसे ऐसा शासक मानते थे, जिसने शांति और स्थिरता स्थापित कर ईसा मसीह के आगमन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार की। पुनर्जागरण के मानवतावादी विद्वान पेट्रार्क ने भी उसे आदर्श और न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रस्तुत किया है। इसके विपरीत, प्रारंभिक आधुनिक युग में जोनाथन स्विफ्ट, मोंटेस्क्यू, वोल्टेयर और थॉमस ब्लैकवेल जैसे विचारकों ने उसे निरंकुश शासक और सत्ता हथियाने वाला राजनीतिज्ञ बताया है। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने पुनः उसके शासन का संतुलित मूल्यांकन करते हुए उसे ऐसा सुधारक बताया है, जिसने विघटित हो चुके रोमन गणराज्य की अराजकता समाप्त कर दीर्घकालीन शांति, सुव्यवस्था और समृद्धि की नींव रखी।

20वीं शताब्दी में ऑगस्टस के मूल्यांकन में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। विशेषकर 1930 और 1940 के दशकों में फासीवाद के उदय के बाद इतिहासकारों ने उसके सत्ता प्राप्त करने के तरीकों की आलोचनात्मक समीक्षा की। इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी ने 1937–38 में ऑगस्टस की द्विसहस्राब्दी के अवसर पर भव्य प्रदर्शनी आयोजित कर उसे आदर्श शासक के रूप में प्रस्तुत किया। इसके प्रतिरोध में इतिहासकार रोनाल्ड साइम ने 1939 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द रोमन रिवोल्यूशन’ प्रकाशित की, जिसमें ऑगस्टस को एक महत्त्वाकांक्षी और कुशल राजनीतिज्ञ बताया तथा उसकी सत्ता-स्थापना की आलोचनात्मक व्याख्या की। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विद्वानों का ध्यान उसके शासन की कला, साहित्य और सांस्कृतिक उपलब्धियों की ओर अधिक केंद्रित हुआ।

समकालीन इतिहासकार एड्रियन गोल्ड्सवर्दी के अनुसार आधुनिक दृष्टि से ऑगस्टस को सैन्य तानाशाह कहा जा सकता है, किंतु उसे मुसोलिनी जैसे आधुनिक तानाशाहों की श्रेणी में रखना उचित नहीं है। दूसरी ओर, वर्नर एक, सारोल्टा ताकाक्स और वाल्टर एडर जैसे इतिहासकारों का मत है कि ऑगस्टस ने स्थायी पेशेवर सेना, प्रभावी प्रशासन, सुव्यवस्थित उत्तराधिकार व्यवस्था तथा दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता की नींव रखी। उसने मंदिरों के जीर्णोद्धार, पूर्व सैनिकों के पुनर्वास, नागरिकों को आर्थिक सहायता तथा मितव्ययी शासन-शैली को उसकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया। इस प्रकार आज अधिकांश इतिहासकार ऑगस्टस को न तो केवल निरंकुश शासक मानते हैं और न ही केवल आदर्श सम्राट, बल्कि उसे एक व्यावहारिक, दूरदर्शी और अत्यंत प्रभावशाली शासक के रूप में देखते हैं।

ऑगस्टस का सांस्कृतिक चित्रण

ऑगस्टस का व्यक्तित्व और स्वरूप प्राचीन साहित्य तथा कला में व्यापक रूप से चित्रित हुआ है। रोमन लेखक सुएटोनियस ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ट्वेल्व सीज़र्स’ में उसके जीवन और शारीरिक बनावट का विस्तृत वर्णन किया है। आधुनिक इतिहासकार एड्रियन गोल्ड्सवर्दी के अनुसार ऑगस्टस के बाल हल्के भूरे अथवा सुनहरे-भूरे रंग के थे और उसकी ऊँचाई लगभग 1.75 मीटर थी। उसकी आधिकारिक प्रतिमाएँ, जैसे प्राइमा पोर्टा की प्रतिमा, आरा पैसिस के शिल्प तथा वाया लैबिकाना की मूर्ति उसे सदैव युवा, आदर्श और विजयी शासक के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उसके चित्रों और मूर्तियों पर हेलेनिस्टिक कला का स्पष्ट प्रभाव है।

ऑगस्टस (Augustus)
रोमन सम्राटऑगस्टस

ऑगस्टस ने अपने चित्रों को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाया। जूलियस सीज़र द्वारा आरंभ की गई परंपरा का अनुसरण करते हुए उसने अपने चित्र और नाम को रोमन सिक्कों पर अंकित कराया, जिससे उसकी सत्ता और वैधता पूरे साम्राज्य में स्थापित हुई। बाद के सम्राटों ने भी अपने सिक्कों पर ऑगस्टस का चित्र अंकित कर उसकी प्रतिष्ठा और उत्तराधिकार की निरंतरता को प्रदर्शित किया। इस प्रकार उसकी छवि केवल एक शासक की नहीं, बल्कि रोमन साम्राज्य की स्थिरता और वैधता के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गई।

शास्त्रीय युग के बाद भी यूरोपीय कला और संस्कृति में ऑगस्टस का महत्त्व बना रहा। मध्ययुगीन और पुनर्जागरणकालीन चित्रों से लेकर आधुनिक यूरोपीय कला तक उसे शांति, सुव्यवस्था और आदर्श शासन के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया। चार्ल्स-आंद्रे वैन लू तथा जीन-लियोन जेरोम जैसे कलाकारों ने भी अपनी प्रसिद्ध कृतियों में ऑगस्टस को रोमन शांति और ईसा मसीह के जन्म से प्रतीकात्मक रूप से जोड़कर प्रस्तुत किया, जिससे उसकी सांस्कृतिक विरासत आने वाली शताब्दियों तक जीवित रही।

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