ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस लगभग 25 ईसा पूर्व से 50 ईस्वी के बीच सक्रिय रोमन विश्वकोशकार और लेखक थे। उन्हें विशेष रूप से उनकी प्रसिद्ध चिकित्सा-कृति ‘डी मेडिसिना’ के लिए जाना जाता है। यह कृति रोमन चिकित्सा-परंपरा के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। सेल्सस का बौद्धिक कार्यक्षेत्र केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने कृषि, कानून, वक्तृत्व-कला और सैन्य कला जैसे विषयों पर भी लेखन किया था। उनके व्यापक विश्वकोश का अधिकांश भाग अब उपलब्ध नहीं है, किंतु ‘डी मेडिसिना’ लगभग पूर्ण रूप में सुरक्षित है। इसी कारण सेल्सस को प्राचीन रोमन विश्वकोशीय साहित्य और चिकित्सा-लेखन की परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।
ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस का जीवन-परिचय
सेल्सस के व्यक्तिगत जीवन के संबंध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। उनके नाम के प्रथम भाग को लेकर भी विद्वानों में पूर्ण सहमति नहीं है। कुछ स्रोतों में उन्हें ‘ऑरेलियस’ कहा गया है, किंतु ‘ऑलस’ नाम अधिक संभावित माना जाता है। उनकी कृति ‘डी मेडिसिना’ से संकेत मिलता है कि वे पहली शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्द्ध में सक्रिय थे। उन्होंने यूनानी चिकित्सक थीमिसन का उल्लेख किया है, जिसके आधार पर उनके काल का निर्धारण किया जाता है।
सेल्सस के निवास-स्थान के संबंध में भी निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। रोम में मिले एक समाधिलेख को कभी-कभी उनसे संबंधित माना गया है, लेकिन इसे निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। कुछ विद्वानों ने यह अनुमान लगाया है कि उनका संबंध नारबोनीज़ गॉल से रहा होगा। इसका एक आधार उनके द्वारा ‘मार्कम’ नामक अंगूर की एक प्रजाति का उल्लेख है, जिसे प्लिनी ने उस क्षेत्र की स्थानीय प्रजाति बताया था। यह भी निश्चित नहीं है कि सेल्सस स्वयं चिकित्सक थे या मुख्यतः विद्वान और लेखक। उनकी कृति में चिकित्सा संबंधी व्यावहारिक ज्ञान अत्यंत व्यवस्थित रूप में मिलता है, जिससे उनके विषय-ज्ञान की गहराई स्पष्ट होती है। दूसरी ओर, उनके लेखन का व्यापक स्वरूप यह दर्शाता है कि वे विभिन्न विषयों का अध्ययन करने वाले विश्वकोशकार थे।
सेल्सस का विश्वकोशीय लेखन
सेल्सस ने केवल चिकित्सा पर ही लेखन नहीं किया था। उनके विशाल विश्वकोश में कृषि, कानून, वक्तृत्व-कला और सैन्य कला जैसे विषयों पर भी ग्रंथ शामिल थे। इन ग्रंथों का अधिकांश भाग कालांतर में नष्ट हो गया, इसलिए उनके बारे में जानकारी मुख्यतः बाद के लेखकों के उल्लेखों से प्राप्त होती है। क्विंटिलियन ने सेल्सस के लेखन का उल्लेख करते हुए उनके व्यापक बौद्धिक क्षेत्र की ओर संकेत किया है। इससे स्पष्ट होता है कि सेल्सस उस रोमन विद्वतापरंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसमें विभिन्न व्यावहारिक और सैद्धांतिक विषयों के ज्ञान को एकत्र करके व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाता था।

‘डी मेडिसिना’: सेल्सस की प्रमुख कृति
सेल्सस की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘डी मेडिसिना’ है। यह आठ पुस्तकों में विभाजित है और प्राचीन चिकित्सा-ज्ञान का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत करती है। इस कृति पर यूनानी चिकित्सा-परंपरा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। विशेष रूप से हिप्पोक्रेट्स और एस्क्लेपियाड्स जैसे चिकित्सकों की परंपरा से इसका संबंध दिखाई देता है।
पहली पुस्तक में चिकित्सा के इतिहास तथा अनेक चिकित्सकों का परिचय मिलता है। लगभग अस्सी चिकित्सकों के उल्लेख के कारण यह पुस्तक चिकित्सा के इतिहास के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इनमें से कुछ चिकित्सकों के विचारों और कार्यों की जानकारी आज मुख्यतः सेल्सस के विवरण से ही प्राप्त होती है। दूसरी पुस्तक सामान्य रोग-विज्ञान से संबंधित है। तीसरी पुस्तक विभिन्न विशिष्ट रोगों का वर्णन करती है, जबकि चौथी पुस्तक शरीर के अंगों और उनसे संबंधित रोगों पर केंद्रित है। पाँचवीं और छठी पुस्तकों में औषधियों तथा उनके प्रयोग का विवरण मिलता है। सातवीं पुस्तक मुख्यतः शल्यचिकित्सा से संबंधित है और आठवीं पुस्तक हड्डियों तथा उनके उपचार का विवेचन करती है।
सेल्सस की चिकित्सा-पद्धति
‘डी मेडिसिना’ की प्रस्तावना में सेल्सस ने चिकित्सा में सैद्धांतिक ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव के संबंध पर विचार किया है। उन्होंने चिकित्सा में निरीक्षण और अनुभव के महत्त्व को स्वीकार किया तथा विभिन्न चिकित्सा-पद्धतियों के बीच होने वाली बहस का उल्लेख किया। उन्होंने हेरोफिलोस और एरासिस्ट्रेटोस जैसे यूनानी चिकित्सकों का उल्लेख करते हुए जीवित प्राणियों पर किए जाने वाले प्रयोगों की परंपरा पर भी चर्चा की। उनके लेखन से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन चिकित्सा में शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को समझने और उनके आधार पर उपचार निर्धारित करने का प्रयास किया जाता था। सेल्सस का मानना था कि शरीर कई बार स्वयं रोग से संघर्ष करता है। इसलिए उपचार करते समय शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है। उन्होंने बुखार जैसे लक्षणों को शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रक्रिया से जोड़कर देखा और अनावश्यक चिकित्सकीय हस्तक्षेप से बचने की सलाह दी। हालांकि आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने औषधीय उपचार और शल्यचिकित्सा दोनों को महत्त्व दिया।
औषधि-विज्ञान और शल्यचिकित्सा में योगदान
सेल्सस ने अनेक औषधीय पदार्थों और उनके प्रयोग का विस्तृत विवरण दिया। इनमें विभिन्न वनस्पतियों, खनिज पदार्थों तथा अफीम से प्राप्त औषधियों का उल्लेख मिलता है। इससे पहली शताब्दी के रोमन औषधि-ज्ञान और चिकित्सा-पद्धतियों की जानकारी प्राप्त होती है। शल्यचिकित्सा के क्षेत्र में ‘डी मेडिसिना’ का विशेष महत्त्व है। सेल्सस ने घावों के उपचार, मोतियाबिंद निकालने, मूत्राशय की पथरी के उपचार तथा टूटी हुई हड्डियों को ठीक करने जैसी प्रक्रियाओं का वर्णन किया। उनके विवरण से पता चलता है कि रोमन चिकित्सा में शल्यचिकित्सा संबंधी व्यावहारिक ज्ञान पर्याप्त विकसित था।
सूजन के लक्षण और चिकित्सा-पारिभाषिक योगदान
चिकित्सा इतिहास में सेल्सस का नाम विशेष रूप से सूजन के चार प्रमुख लक्षणों—गर्मी, दर्द, सूजन और लालिमा के वर्णन के कारण प्रसिद्ध है। बाद में इन्हें सेल्सस के चार लक्षणों के रूप में जाना गया। यद्यपि सूजन की आधुनिक चिकित्सा-व्याख्या इससे कहीं अधिक विकसित हो चुकी है, फिर भी सेल्सस का विवरण चिकित्सा इतिहास में महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
कैंसर संबंधी पारिभाषिक शब्दावली में भी सेल्सस का योगदान उल्लेखनीय है। हिप्पोक्रेट्स ने घातक ट्यूमर के लिए यूनानी शब्द ‘कार्किनोस’ का प्रयोग किया था, जिसका अर्थ ‘केकड़ा’ है। सेल्सस ने इसका लैटिन रूप ‘कैंसर’ अपनाया। आगे चलकर यही शब्द आधुनिक चिकित्सा-शब्दावली में व्यापक रूप से प्रचलित हुआ।
नेत्र-विज्ञान में योगदान
सेल्सस ने आँख की संरचना और उससे संबंधित रोगों का भी अध्ययन किया। उन्होंने आँख की एक परत के लिए ‘कोरॉइड’ शब्द का प्रयोग किया, जो बाद की चिकित्सा-पारिभाषिक शब्दावली में भी प्रचलित रहा। सेल्सस के नेत्र-विज्ञान संबंधी विवरण से प्राचीन रोमन चिकित्सा में आँखों के रोगों तथा उनके उपचार के संबंध में उपलब्ध ज्ञान का पता चलता है। इस प्रकार उनकी कृति केवल सामान्य चिकित्सा का ग्रंथ नहीं, बल्कि प्राचीन चिकित्सा की विभिन्न शाखाओं का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
कृषि संबंधी लेखन
चिकित्सा के अतिरिक्त सेल्सस ने कृषि पर भी एक तकनीकी ग्रंथ लिखा था। यद्यपि यह ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन बाद के रोमन कृषि-लेखक कोलुमेला ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘डी रे रुस्तिका’ में सेल्सस के कृषि संबंधी विचारों का उपयोग किया था। इससे प्रमाणित होता है कि सेल्सस का अध्ययन और लेखन चिकित्सा से कहीं व्यापक था।
‘डी मेडिसिना’ का प्रकाशन और प्रभाव
‘डी मेडिसिना’ का पहला मुद्रित संस्करण 1478 ईस्वी में प्रकाशित हुआ। पुनर्जागरण काल में प्राचीन यूनानी और रोमन ज्ञान के पुनरुद्धार के साथ इस ग्रंथ का महत्त्व फिर से बढ़ा। इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए और विद्वानों ने इसकी लैटिन भाषा की स्पष्टता, शुद्धता और शैली की विशेष प्रशंसा की। आधुनिक इतिहासलेखन में भी ‘डी मेडिसिना’ प्राचीन रोमन चिकित्सा, औषधि-विज्ञान और शल्यचिकित्सा के अध्ययन का प्रमुख स्रोत है। यह ग्रंथ न केवल प्राचीन चिकित्सा-ज्ञान को सुरक्षित रखता है, बल्कि यूनानी चिकित्सा-परंपरा के रोमन समाज में प्रसार और उसके व्यावहारिक रूपांतरण को समझने में भी सहायता करता है।
सेल्सस का ऐतिहासिक महत्त्व
ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस का महत्त्व इस बात में निहित है कि उन्होंने अपने समय के उपलब्ध चिकित्सा-ज्ञान को व्यवस्थित, स्पष्ट और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया। उनकी ‘डी मेडिसिना’ प्राचीन रोमन चिकित्सा के इतिहास का एक अमूल्य स्रोत है। इसमें रोग-विज्ञान, औषधि-विज्ञान, शल्यचिकित्सा, नेत्र-विज्ञान और उपचार-पद्धतियों का विस्तृत विवरण मिलता है।
सेल्सस की कृति ने प्राचीन चिकित्सा-परंपराओं को बाद की पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से ‘कैंसर’ जैसे चिकित्सा-पारिभाषिक शब्द और सूजन के चार प्रमुख लक्षणों का उनका विवरण चिकित्सा इतिहास में उनकी स्थायी पहचान बनाता है। इस प्रकार सेल्सस रोमन चिकित्सा, विश्वकोशीय लेखन और प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।


