मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (Marcus Fabius Quintilianus, ‘Quintilian’)

मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (Marcus Fabius Quintilianus, ‘Quintilian’)
मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (क्विंटिलियन) मुख्य लेख : रोमन सभ्यता मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (लगभग 35–100 ई.), जिन्हें […]
वर्जिल (Virgil)
मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (Marcus Fabius Quintilianus, ‘Quintilian’)
रोमन गृहयुद्ध (Roman Civil Wars)

मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (क्विंटिलियन)

Table of Contents

मुख्य लेख : रोमन सभ्यता

मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस (लगभग 35–100 ई.), जिन्हें सामान्यतः क्विंटिलियन के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के प्रसिद्ध शिक्षक, विधिवेत्ता तथा भाषण-कला (रेटोरिक) के महान आचार्य थे। उनका जन्म रोमन प्रांत हिस्पानिया टैराकोनेन्सिस के कैलागुरिस (आधुनिक कालाहोरा, स्पेन) में हुआ था। वे रोमन वक्तृत्व-कला के सर्वश्रेष्ठ सिद्धांतकारों में गिने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ ने न केवल रोमन शिक्षा-व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया, बल्कि मध्यकालीन यूरोप और पुनर्जागरण काल में भी भाषण-कला तथा शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श ग्रंथ का स्थान प्राप्त किया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

क्विंटिलियन के पिता स्वयं एक शिक्षित व्यक्ति तथा भाषण-कला के जानकार थे। उन्होंने अपने पुत्र को उच्च शिक्षा के लिए सम्राट नीरो के शासनकाल के प्रारंभ में रोम भेजा। रोम उस समय शिक्षा, विधि और सार्वजनिक जीवन का प्रमुख केंद्र था। यहाँ क्विंटिलियन ने प्रसिद्ध वक्ता डोमिटियस एफ़र के सान्निध्य में भाषण-कला का गहन अध्ययन किया। एफ़र अपने समय के सर्वाधिक प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं और वक्ताओं में गिने जाते थे। क्विंटिलियन ने न्यायालयों में उनके तर्क, वाद-विवाद तथा वक्तृत्व-कौशल का निकट से अध्ययन किया। इसी प्रभाव के कारण उनके भीतर सिसरो की शैली और आदर्शों के प्रति गहरा सम्मान विकसित हुआ, जो आगे चलकर उनकी शिक्षण-पद्धति और साहित्यिक दृष्टिकोण का आधार बन गया।

सार्वजनिक जीवन और शिक्षण कार्य

डोमिटियस एफ़र की मृत्यु के पश्चात् क्विंटिलियन अपने जन्मप्रदेश हिस्पानिया लौट गए, जहाँ उन्होंने संभवतः न्यायालयों में अधिवक्ता के रूप में कार्य किया। लगभग 68 ईस्वी में वे सम्राट गैल्बा के साथ पुनः रोम लौटे। गैल्बा की अल्पकालिक सत्ता तथा 69 ईस्वी के ‘चार सम्राटों के वर्ष’ की राजनीतिक उथल-पुथल के पश्चात् भी क्विंटिलियन सुरक्षित रहे, क्योंकि वे सक्रिय राजनीतिक संघर्षों से दूर रहे। इसी अवधि में उन्होंने रोम में भाषण-कला का एक प्रतिष्ठित विद्यालय स्थापित किया, जो शीघ्र ही पूरे रोमन साम्राज्य में प्रसिद्ध हो गया। उनके विद्यार्थियों में यंगर प्लिनी तथा संभवतः टेसिटस जैसे महान लेखक और इतिहासकार भी सम्मिलित थे। सम्राट वेस्पासियन ने उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर उन्हें राज्यकोष से वेतन प्रदान किया। इस प्रकार वे रोमन इतिहास के प्रथम ऐसे शिक्षक बने जिन्हें राज्य द्वारा नियमित वेतन दिया गया। इस राजकीय संरक्षण ने उन्हें पूर्ण मनोयोग से शिक्षण कार्य करने का अवसर प्रदान किया, यद्यपि उन्होंने समय-समय पर न्यायालयों में अधिवक्ता के रूप में भी कार्य किया।

व्यक्तिगत जीवन और अंतिम वर्ष

क्विंटिलियन के निजी जीवन के संबंध में सीमित जानकारी उपलब्ध है। ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ में उनकी पत्नी तथा दो पुत्रों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने अत्यंत मार्मिक शब्दों में लिखा है कि उनकी पत्नी का असामयिक निधन हो गया और उनके दोनों पुत्र भी युवावस्था में ही उनसे पहले संसार छोड़ गए। इन पारिवारिक आघातों ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। लगभग 88 ईस्वी में सम्राट डोमिटियन के शासनकाल के दौरान उन्होंने शिक्षण और वकालत दोनों से अवकाश ग्रहण किया। इसके पीछे आर्थिक सुरक्षा, साहित्य-सृजन की इच्छा तथा सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाए रखने की प्रवृत्ति प्रमुख कारण माने जाते हैं। यद्यपि डोमिटियन का शासन कठोर और संदेहपूर्ण था, तथापि उसने क्विंटिलियन की विद्वत्ता का सम्मान करते हुए लगभग 90 ईस्वी में उन्हें अपने दो परिजनों का शिक्षक नियुक्त किया। माना जाता है कि उनका निधन लगभग 100 ईस्वी के आसपास हुआ, जिससे उनका जीवन रोमन साम्राज्य की प्रथम शताब्दी के प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का साक्षी बना।

क्विंटिलियन की रचनाएँ

मार्कस फैबियस क्विंटिलियनस की प्रसिद्धि मुख्यतः उनकी महान कृति ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ के कारण है। यह भाषण-कला और शिक्षा पर आधारित बारह पुस्तकों का विस्तृत ग्रंथ है, जिसकी रचना लगभग 95 ईस्वी में हुई। यह प्राचीन रोम में वक्तृत्व-कला पर उपलब्ध सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और पूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें केवल प्रभावशाली भाषण देने की तकनीक ही नहीं, बल्कि एक आदर्श वक्ता के बौद्धिक, नैतिक और व्यावहारिक विकास की संपूर्ण प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है।

क्विंटिलियन की एक अन्य रचना ‘दे कॉसिस करप्टे एलोक्वेंटिए’ (भाषण-कला के पतन के कारण) का उल्लेख प्राचीन स्रोतों में मिलता है, किंतु यह ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है। विद्वानों का मत है कि इस कृति में व्यक्त अनेक विचारों को उन्होंने परिपक्व रूप में ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ में सम्मिलित किया। इसके अतिरिक्त ‘डिक्लामेशनिस मायोरेस’ और ‘डिक्लामेशनिस मिनोरेस’ नामक भाषण-संग्रह भी दीर्घकाल तक उनके नाम से प्रचलित रहे, किंतु आधुनिक शोधों से स्पष्ट होता है कि ये उनके शिष्यों अथवा किसी परवर्ती लेखक द्वारा तैयार किए गए संग्रह हैं।

इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया

‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ क्विंटिलियन की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावशाली कृति है। बारह पुस्तकों में विभाजित इस शिक्षाशास्त्रीय एवं वक्तृत्वशास्त्रीय ग्रंथ में उन्होंने बालक की प्रारंभिक शिक्षा, भाषा-अध्ययन, व्याकरण, साहित्य, नैतिक प्रशिक्षण, तर्कशास्त्र, वाद-विवाद, न्यायालयीन वक्तृत्व तथा सार्वजनिक जीवन में वक्ता की भूमिका का क्रमबद्ध विवेचन किया है। यह ग्रंथ केवल भाषण देने की कला तक सीमित नहीं, बल्कि आदर्श नागरिक और आदर्श शिक्षक के निर्माण का भी मार्गदर्शन करता है।

क्विंटिलियन के अनुसार किसी भी महान वक्ता का निर्माण केवल अभ्यास और तकनीकी दक्षता से नहीं होता; उसके चरित्र, शिक्षा और नैतिक मूल्यों का समान रूप से महत्त्व होता है। इसलिए उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम न मानकर व्यक्तित्व-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। उनका मत था कि बालकों की शिक्षा प्रेम, प्रोत्साहन और अनुशासन के संतुलित वातावरण में होनी चाहिए तथा कठोर दंड के स्थान पर प्रेरणा और समझाइश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस दृष्टि से उनके विचार आधुनिक शिक्षाशास्त्र के अनेक सिद्धांतों के निकट हैं।

यह ग्रंथ सम्राट डोमिटियन के शासनकाल के अंतिम वर्षों में लिखा गया। यद्यपि उस समय राजनीतिक वातावरण कठोर था, तथापि क्विंटिलियन ने शिक्षा और नैतिकता के आदर्शों को निर्भीकता से प्रस्तुत किया। उन्होंने वक्तृत्व-कला को राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का साधन बनाने के बजाय समाज-सेवा और न्याय-स्थापना का माध्यम माना।

आदर्श वक्ता की अवधारणा

क्विंटिलियन की सर्वप्रसिद्ध अवधारणा ‘विर बोनस, डिकेंडी पेरिटुस’ है, जिसका अर्थ है – ‘बोलने की कला में निपुण एक श्रेष्ठ व्यक्ति।’ यह विचार मूलतः कैटो द एल्डर से प्रेरित था, किंतु क्विंटिलियन ने इसे अधिक विकसित और व्यवस्थित रूप प्रदान किया। उनके अनुसार केवल भाषण-कौशल किसी व्यक्ति को महान वक्ता नहीं बना सकता। यदि उसके चरित्र में सत्यनिष्ठा, न्यायप्रियता और नैतिकता का अभाव है, तो उसकी वाक्पटुता समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। इसी कारण उन्होंने कहा कि आदर्श वक्ता बनने से पहले मनुष्य का अच्छा नागरिक और श्रेष्ठ चरित्र वाला व्यक्ति होना आवश्यक है। उन्होंने वक्तृत्व-कला को नैतिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि वाणी का उपयोग केवल विजय प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की स्थापना के लिए किया जाना चाहिए। यही कारण है कि उनका शिक्षा-दर्शन नागरिक उत्तरदायित्व, नैतिकता और सार्वजनिक सेवा की भावना पर आधारित है।

सिसरो और प्लेटो का प्रभाव

क्विंटिलियन की वक्तृत्व-दृष्टि पर सिसरो का गहरा प्रभाव था। उन्होंने ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ में सिसरो की अनेक बार प्रशंसा करते हुए उन्हें आदर्श वक्ता और महान शिक्षक बताया है। उनके अनुसार सिसरो की शैली में ज्ञान, भावनात्मक प्रभाव, भाषा की सुंदरता और नैतिक गरिमा का अद्वितीय समन्वय मिलता है। उनका मत था कि प्रत्येक विद्यार्थी को सिसरो की रचनाओं का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि वे उत्कृष्ट भाषा और प्रभावशाली अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

क्विंटिलियन ने प्लेटो के विचारों को भी स्वीकार किया। उन्होंने विशेष रूप से ‘फैड्रस’ में व्यक्त उस सिद्धांत का समर्थन किया जिसमें कहा गया है कि न्याय का ज्ञान प्राप्त किए बिना कोई व्यक्ति वास्तविक अर्थों में महान वक्ता नहीं बन सकता। उनके अनुसार दर्शन, इतिहास और साहित्य का अध्ययन वक्ता की बौद्धिक क्षमता तथा अभिव्यक्ति दोनों को समृद्ध करता है। उन्होंने अनुकरण को शिक्षा का आवश्यक अंग माना, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि महान लेखकों का अनुकरण केवल प्रेरणा प्राप्त करने के लिए होना चाहिए, अंधानुकरण के लिए नहीं। विद्यार्थी को पूर्ववर्ती आचार्यों से शिक्षा लेकर अपनी मौलिक शैली का विकास करना चाहिए।

क्विंटिलियन का प्रभाव

‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ ने प्राचीन रोम से लेकर पुनर्जागरण काल तक शिक्षा, साहित्य और वक्तृत्व-कला की परंपरा को गहराई से प्रभावित किया। क्विंटिलियन ने नैतिकता, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन को वक्तृत्व का अभिन्न अंग मानते हुए एक समग्र मानवीय आदर्श स्थापित किया। यही कारण है कि उनकी शिक्षाएँ अनेक शताब्दियों तक यूरोप के विद्यालयों और विद्वानों के लिए आदर्श बनी रहीं।

सेनेका की शैली की आलोचना

क्विंटिलियन के प्रभाव का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी साहित्यिक आलोचना है। उनके समय में सेनेका की शैली अत्यंत लोकप्रिय थी और रोमन साम्राज्य के ‘रजत युग’ की अलंकृत एवं प्रभावोत्पादक लेखन-परंपरा का प्रमुख प्रतिनिधित्व करती थी। क्विंटिलियन का मत था कि सेनेका की भाषा यद्यपि आकर्षक और प्रभावशाली है, तथापि उसमें अत्यधिक अलंकार, कृत्रिमता तथा चमत्कारप्रियता के कारण शास्त्रीय संतुलन का अभाव है। उन्होंने इसे युवा विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से हानिकारक बताया, क्योंकि वे उसकी बाहरी चमक से प्रभावित होकर भाषा की गंभीरता और संयम की उपेक्षा कर सकते थे। उनकी इस आलोचना ने परवर्ती युगों में सेनेका की साहित्यिक प्रतिष्ठा और उनकी शैली के मूल्यांकन को भी गहराई से प्रभावित किया।

समकालीन साहित्यकारों पर प्रभाव

क्विंटिलियन की विद्वत्ता का प्रभाव उनके समकालीन साहित्यकारों पर स्पष्ट दिखाई देता है। लैटिन कवि मार्शल ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में उन्हें भटकते हुए युवाओं का श्रेष्ठ मार्गदर्शक तथा रोमन संस्कृति का गौरव बताया है। यद्यपि मार्शल की रचनाओं में व्यंग्य और विनोद का समावेश रहता था, तथापि यह प्रशंसा इस तथ्य का प्रमाण है कि क्विंटिलियन अपने समय में अत्यंत सम्मानित शिक्षक माने जाते थे। उनके प्रमुख शिष्य यंगर प्लिनी ने भी अपने पत्रों में उनके व्यक्तित्व और शिक्षण की प्रशंसा की है। रोमन व्यंग्यकार जुवेनाल, जिन्हें कुछ विद्वान उनका शिष्य मानते हैं, ने उन्हें ऐसे आदर्श शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जिसने ज्ञान, संयम और नैतिकता के बल पर समाज में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त की। इस प्रकार प्रथम और द्वितीय शताब्दी ईस्वी में क्विंटिलियन रोमन शिक्षा-जगत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आचार्यों में गिने जाते थे।

ईसाई विद्वानों पर प्रभाव

तृतीय से पञ्चम शताब्दी ईस्वी के बीच भी क्विंटिलियन के विचारों का प्रभाव बना रहा। ईसाई धर्मशास्त्री संत ऑगस्टीन ने संकेतों, भाषा और अभिव्यक्ति के संबंध में अपने विचारों में अनेक स्थानों पर क्विंटिलियन की शिक्षाओं का अनुसरण किया। इसी प्रकार संत जेरोम, जिन्होंने लैटिन वल्गेट बाइबिल का संपादन किया, शिक्षा और भाषा के विषय में क्विंटिलियन के सिद्धांतों से प्रभावित थे। यद्यपि इन ईसाई विद्वानों का उद्देश्य धार्मिक शिक्षा था, तथापि उन्होंने वक्तृत्व-कला और नैतिक शिक्षा के क्षेत्र में क्विंटिलियन की पद्धति को उपयोगी माना।

मध्य युग और पुनर्जागरण में पुनः खोज

मध्य युग के दौरान क्विंटिलियन की प्रसिद्धि कुछ कम हो गई, क्योंकि ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ की उपलब्ध अधिकांश पांडुलिपियाँ अपूर्ण थीं। परिणामस्वरूप विद्वानों को उनके विचारों का सीमित ज्ञान ही प्राप्त था। यह स्थिति 1416 ईस्वी में बदल गई, जब इतालवी मानवतावादी पोगियो ब्राच्चोलिनी ने स्विट्ज़रलैंड के सेंट गाल मठ में इस ग्रंथ की एक लगभग पूर्ण पांडुलिपि खोज निकाली, जो दीर्घकाल से उपेक्षित अवस्था में सुरक्षित थी। इस खोज ने पुनर्जागरणकालीन मानवतावादी विद्वानों में अत्यधिक उत्साह उत्पन्न किया और क्विंटिलियन की रचनाओं के व्यवस्थित अध्ययन का नया युग प्रारंभ हुआ।

मानवतावादी विद्वानों द्वारा सम्मान

पांडुलिपि की खोज के पश्चात् प्रसिद्ध विद्वान लियोनार्डो ब्रूनी ने पोगियो ब्राच्चोलिनी को पत्र लिखकर इस उपलब्धि की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने लिखा कि क्विंटिलियन जैसे महान आचार्य को विस्मृति के अंधकार से पुनः ज्ञान-जगत में लाना समस्त विद्वानों के लिए गौरव का विषय है। ब्रूनी के अनुसार सिसरो की ‘दे रे पब्लिका’ के अतिरिक्त कोई अन्य प्राचीन रचना ऐसी नहीं थी जिसकी पुनर्प्राप्ति से विद्वानों को इतनी प्रसन्नता हुई हो। पुनर्जागरण काल के मानवतावादियों ने क्विंटिलियन को शिक्षा, नैतिकता और शास्त्रीय लैटिन भाषा का सर्वोच्च आचार्य माना तथा उनकी शिक्षण-पद्धति को यूरोप के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में व्यापक रूप से अपनाया।

पुनर्जागरण काल में प्रभाव

पुनर्जागरण काल में क्विंटिलियन की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हुई और ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ मानवतावादी शिक्षा का प्रमुख आधार बन गई। प्रसिद्ध इतालवी मानवतावादी कवि पेट्रार्क ने अपने ‘मृत व्यक्तियों को लिखे पत्रों’ में एक पत्र क्विंटिलियन को संबोधित किया है। यह केवल साहित्यिक श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि शास्त्रीय शिक्षा और नैतिक आदर्शों के प्रति उनके गहरे सम्मान का प्रतीक भी थी। अनेक विद्वानों का मत है कि पेट्रार्क ने क्विंटिलियन के विचारों से प्रेरणा लेकर मानवतावादी शिक्षा की उस परंपरा को सुदृढ़ किया, जिसने पुनर्जागरणकालीन यूरोप की बौद्धिक चेतना को नई दिशा प्रदान की। उनके माध्यम से क्विंटिलियन के शिक्षा-दर्शन का प्रभाव इटली से निकलकर पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में समूचे उत्तरी यूरोप तक फैल गया।

मानवतावादी विद्वानों और धर्मसुधारकों पर प्रभाव

जर्मन धर्मसुधारक मार्टिन लूथर क्विंटिलियन के प्रति विशेष सम्मान रखते थे। उन्होंने लिखा कि वे अधिकांश लेखकों की अपेक्षा क्विंटिलियन को अधिक महत्त्व देते हैं, क्योंकि वे केवल वाक्पटुता का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि उसके माध्यम से प्रभावी ढंग से शिक्षा भी प्रदान करते हैं। प्रसिद्ध मानवतावादी विद्वान रॉटरडैम के इरास्मस पर भी क्विंटिलियन का गहरा प्रभाव था। इरास्मस ने शास्त्रीय शिक्षा, भाषा की शुद्धता और नैतिक प्रशिक्षण को जिस प्रकार महत्त्व दिया, उसमें क्विंटिलियन की शिक्षण-पद्धति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। इस प्रकार पुनर्जागरण और धर्मसुधार आंदोलन के प्रमुख चिंतकों ने उन्हें आदर्श शिक्षाशास्त्री और उत्कृष्ट वक्तृत्वाचार्य के रूप में स्वीकार किया।

संगीत और शिक्षा पर प्रभाव

क्विंटिलियन का प्रभाव साहित्य और शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहा; संगीत के क्षेत्र में भी उनकी शिक्षाओं की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। संगीत इतिहासकार उर्सुला किर्केंडेल ने यह मत व्यक्त किया कि जोहान सेबास्टियन बाख की प्रसिद्ध रचना ‘दास म्यूज़िकालिशेस ओफ़र’ की रचना-पद्धति पर ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ का अप्रत्यक्ष प्रभाव है। बाख के लाइपज़िग स्थित थोमासशूले में कार्यकाल के दौरान लैटिन शिक्षा और वक्तृत्व-कला का अध्ययन पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण भाग था। उस विद्यालय के प्रधानाचार्य और भाषाविद् योहान मैथियास गेस्नर ने क्विंटिलियन की कृति का एक महत्त्वपूर्ण संस्करण प्रकाशित किया तथा उसकी भूमिका में बाख की विद्वत्ता और कलात्मक क्षमता की प्रशंसा की। इससे स्पष्ट होता है कि अठारहवीं शताब्दी में भी क्विंटिलियन की शिक्षाएँ विद्वानों और शिक्षकों के बीच सम्मानित थीं।

अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में मूल्यांकन

अठारहवीं शताब्दी के पश्चात् क्विंटिलियन की लोकप्रियता में कुछ कमी अवश्य आई, किंतु उनका प्रभाव पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेज़ी कवि अलेक्जेंडर पोप ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘ऐन एसे ऑन क्रिटिसिज़्म’ में क्विंटिलियन का उल्लेख करते हुए उन्हें आलोचना और साहित्यिक सिद्धांतों का विश्वसनीय मार्गदर्शक बताया। इसी प्रकार मिशेल द मॉन्तेन तथा गॉटहोल्ड एफ्राइम लेसिंग जैसे विचारकों ने भी अपने लेखन में उनका उल्लेख किया।

उन्नीसवीं शताब्दी तक उनकी रचनाओं का अध्ययन अपेक्षाकृत कम होने लगा था, क्योंकि उनकी शैली को कठिन तथा ग्रंथ को अत्यधिक विद्वत्तापूर्ण माना जाता था। तथापि अंग्रेज़ दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा में क्विंटिलियन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ को शिक्षा, संस्कृति और बौद्धिक विकास का प्राचीन विश्वकोश बताते हुए लिखा कि जीवन भर उनके अनेक मूल्यवान विचारों का स्रोत यही ग्रंथ रहा। अंग्रेज़ लेखक थॉमस डी क्विन्सी ने भी क्विंटिलियन की प्रशंसा करते हुए उन्हें व्यावहारिक वक्तृत्व-कला का सर्वोत्तम आचार्य बताया।

आधुनिक युग में पुनर्मूल्यांकन

बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी में क्विंटिलियन के विचारों का पुनर्मूल्यांकन हुआ और शिक्षा के इतिहास में उनका महत्त्व पुनः स्थापित हुआ। अनेक शिक्षाविद् उन्हें बालक-केंद्रित शिक्षा का प्रारंभिक समर्थक मानते हैं, क्योंकि उन्होंने बालकों की प्राकृतिक क्षमता, नैतिक विकास और सकारात्मक शिक्षण-पद्धति पर विशेष बल दिया था। साहित्य, भाषण-कला, व्यावसायिक लेखन तथा संचार-अध्ययन के क्षेत्र में भी उनकी कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। वक्तृत्व-कला की संरचना, शैली, तर्क, अलंकार तथा भाषा-प्रयोग का उनका व्यवस्थित विश्लेषण आधुनिक भाषाविज्ञान और साहित्यिक आलोचना के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। विशेष रूप से ट्रोप्स (रूपकात्मक अभिव्यक्तियाँ) और अलंकारों के संबंध में उनके विचारों ने आधुनिक साहित्यिक सिद्धांतों को प्रभावित किया। समकालीन भाषिक और साहित्यिक चिंतन में भाषा की संरचना, अर्थ तथा अभिव्यक्ति पर होने वाली चर्चाओं में क्विंटिलियन के सिद्धांतों की प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से अनुभव की जाती है। इस प्रकार वे शिक्षा, वक्तृत्व-कला और साहित्यिक आलोचना के इतिहास में एक स्थायी और प्रभावशाली स्थान रखते हैं।

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