प्यूनिक युद्ध (Punic Wars)

प्यूनिक युद्ध (Punic Wars)

प्यूनिक युद्ध (264 ई.पू.-146 ई. पू.)

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प्यूनिक युद्ध प्राचीन विश्व के इतिहास की उन निर्णायक घटनाओं में से हैं, जिन्होंने पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संरचना को स्थायी रूप से परिवर्तित कर दिया। ये युद्ध रोमन गणराज्य और कार्थेज के मध्य 264 ईसा पूर्व से 146 ईसा पूर्व के बीच तीन चरणों में लड़े गए। लगभग एक शताब्दी तक चले इन संघर्षों में स्थल और समुद्र दोनों पर व्यापक सैन्य अभियान संचालित हुए, जिनकी कुल अवधि लगभग तैंतालीस वर्षों की थी। इन युद्धों का मूल कारण सिसिली जैसे सामरिक द्वीपों, भूमध्यसागर के व्यापारिक मार्गों तथा समुद्री वाणिज्य पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा थी। उस समय रोम इटली प्रायद्वीप में तीव्र गति से उभरती हुई स्थलीय शक्ति था, जबकि कार्थेज पश्चिमी भूमध्यसागर की सबसे प्रभावशाली समुद्री और व्यापारिक शक्ति के रूप में स्थापित था। दोनों राज्यों की विस्तारवादी नीतियों और परस्पर टकराते हितों ने अंततः लंबे और विनाशकारी संघर्ष का रूप ले लिया।

प्रथम प्यूनिक युद्ध (264–241 ई. पू.) का प्रारंभ सिसिली द्वीप पर अधिकार के प्रश्न से हुआ। इस युद्ध ने रोम को पहली बार एक संगठित नौसैनिक शक्ति के रूप में विकसित होने का अवसर प्रदान किया। समुद्री युद्धों में नवीन रणनीतियों का प्रयोग करते हुए रोम ने कार्थेज को पराजित किया, जिसके परिणामस्वरूप कार्थेज को सिसिली त्यागनी पड़ी, भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति देनी पड़ी तथा सिसिली रोम का पहला विदेशी प्रांत बना। इस पराजय के बाद कार्थेज में भाड़े के सैनिकों के वेतन विवाद से उत्पन्न मर्सिनरी युद्ध ने उसकी आर्थिक और सैन्य शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। यद्यपि हैमिलकर बार्का ने इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया, परंतु उसने भविष्य की तैयारी के लिए आइबेरिया में कार्थेज की शक्ति का पुनर्गठन किया और वहाँ एक नए सामरिक एवं आर्थिक आधार की स्थापना की।

द्वितीय प्यूनिक युद्ध (218–201 ई. पू.) प्राचीन सैन्य इतिहास का सर्वाधिक प्रसिद्ध संघर्ष माना जाता है। इसका तात्कालिक कारण कार्थेज के सेनानायक हैनिबल बार्का द्वारा रोमन सहयोगी नगर सगुंटम पर आक्रमण था। युद्ध के दौरान हैनिबल ने आल्प्स पर्वत पार कर इटली में प्रवेश किया और ट्रेबिया, ट्रासीमेन झील तथा कैन्ने जैसे युद्धों में रोम को अभूतपूर्व पराजय दी। विशेष रूप से कैन्ने का युद्ध सैन्य इतिहास में दोहरे घेराव की रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके बावजूद रोम ने धैर्य, संसाधनों के प्रभावी उपयोग तथा दीर्घकालिक युद्धनीति के माध्यम से कार्थेज की शक्ति को क्रमशः क्षीण किया। युद्ध केवल इटली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके अभियान आइबेरिया, सिसिली, सार्डिनिया, ग्रीस और उत्तर अफ्रीका तक फैल गए। अंततः पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो ने उत्तर अफ्रीका पर आक्रमण कर हैनिबल को इटली छोड़ने के लिए विवश किया और 202 ईसा पूर्व में ज़ामा के युद्ध में उसे निर्णायक रूप से पराजित किया। 201 ईसा पूर्व की संधि के बाद कार्थेज को अपने अधिकांश विदेशी प्रदेशों का परित्याग करना पड़ा, उसकी नौसैनिक शक्ति सीमित कर दी गई तथा वह राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से रोम का अधीनस्थ राज्य बन गया।

द्वितीय युद्ध के उपरांत कार्थेज ने आर्थिक पुनरुत्थान अवश्य किया, किंतु उसकी सैन्य स्वतंत्रता समाप्त हो चुकी थी। न्यूमिडिया के साथ सीमा-विवाद और 201 ईसा पूर्व की संधि के उल्लंघन के आरोपों को आधार बनाकर रोम ने 149 ईसा पूर्व में तृतीय प्यूनिक युद्ध आरंभ किया। लगभग तीन वर्षों तक चली घेराबंदी के बाद 146 ईसा पूर्व में स्किपियो एमिलियानस के नेतृत्व में रोमन सेना ने कार्थेज नगर पर अधिकार कर लिया। भीषण युद्ध के पश्चात नगर को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया गया, बड़ी संख्या में नागरिकों की हत्या हुई तथा हजारों लोगों को दास बना लिया गया। इसके साथ ही कार्थेज का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया और उसका समस्त क्षेत्र रोमन अफ्रीका प्रांत में सम्मिलित कर लिया गया। प्यूनिक युद्धों के परिणामस्वरूप रोम न केवल पश्चिमी भूमध्यसागर, बल्कि आगे चलकर समूचे भूमध्यसागरीय विश्व की सर्वोच्च सैन्य, राजनीतिक और सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ।

प्यूनिक युद्धों के ऐतिहासिक स्रोत

प्यूनिक युद्धों के इतिहास के अध्ययन के लिए सबसे प्रामाणिक और विश्वसनीय स्रोत यूनानी इतिहासकार पॉलीबियस (लगभग 200–118 ई. पू.) की प्रसिद्ध कृति ‘द हिस्ट्रीज़’  है। पॉलीबियस 167 ईसा पूर्व में रोम लाए गए थे, जहाँ उनका रोमन अभिजात वर्ग, विशेषकर स्किपियो एमिलियानस के परिवार से घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ। उन्होंने इतिहास-लेखन में आलोचनात्मक पद्धति अपनाई तथा उपलब्ध अभिलेखों, प्रत्यक्षदर्शियों और युद्ध में भाग लेने वाले व्यक्तियों के विवरणों का तुलनात्मक अध्ययन किया। तृतीय प्यूनिक युद्ध के दौरान वे स्वयं स्किपियो एमिलियानस के साथ उत्तर अफ्रीका में उपस्थित थे, जिससे उन्हें युद्ध की परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ। यद्यपि उनमें रोमन पक्ष के प्रति कुछ सहानुभूति दिखाई देती है, फिर भी उनकी निष्पक्ष विश्लेषणात्मक शैली, स्रोतों के आलोचनात्मक परीक्षण और घटनाओं की तार्किक व्याख्या के कारण उन्हें प्यूनिक युद्धों का सर्वाधिक विश्वसनीय इतिहासकार माना जाता है।

पॉलीबियस के अतिरिक्त रोमन इतिहासकार टाइटस लिवियस (लिवी) की कृति भी इन युद्धों के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। लिवी ने अपने विवरण में पॉलीबियस सहित अनेक पूर्ववर्ती स्रोतों का उपयोग किया तथा रोमन राजनीति, प्रशासन और सामाजिक परिस्थितियों का विस्तृत चित्र प्रस्तुत किया। यद्यपि उनके कुछ सैन्य विवरणों की ऐतिहासिक शुद्धता पर आधुनिक विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं, फिर भी रोमन दृष्टिकोण को समझने के लिए उनका इतिहास अत्यंत उपयोगी है। इसके अतिरिक्त, डायोडोरस सिकुलस, प्लूटार्क, एपियन और डियो कैसियस जैसे प्राचीन इतिहासकारों की कृतियाँ भी प्यूनिक युद्धों के पुनर्निर्माण में महत्त्वपूर्ण सहायक स्रोत हैं।

कार्थेज के अधिकांश मूल अभिलेख तृतीय प्यूनिक युद्ध के दौरान नगर के विनाश के साथ नष्ट हो गए, जिसके कारण उसका दृष्टिकोण प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध नहीं है। इस कमी की पूर्ति आधुनिक इतिहासकार पुरातात्त्विक उत्खननों, अभिलेखों, सिक्कों, बंदरगाहों के अवशेषों, युद्धपोतों के पुनर्निर्माण तथा अन्य भौतिक साक्ष्यों के तुलनात्मक अध्ययन से करते हैं। इन साहित्यिक और पुरातात्त्विक स्रोतों के समन्वित विश्लेषण ने प्यूनिक युद्धों के इतिहास को अधिक प्रामाणिक, संतुलित और वैज्ञानिक रूप में पुनर्निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्यूनिक युद्ध की पृष्ठभूमि और उत्पत्ति

प्रथम प्यूनिक युद्ध (264–241 ई. पू.) की पृष्ठभूमि को समझने के लिए तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के पश्चिमी भूमध्यसागरीय विश्व की राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है। इस समय रोम और कार्थेज दो ऐसी शक्तियाँ थीं, जिनका निरंतर विस्तार अंततः उन्हें प्रत्यक्ष संघर्ष की ओर ले गया। एक ओर रोमन गणराज्य इटली में अपनी स्थलीय शक्ति का विस्तार कर रहा था, जबकि दूसरी ओर कार्थेज समुद्री व्यापार, उपनिवेशों और शक्तिशाली नौसेना के आधार पर विशाल सामुद्रिक साम्राज्य स्थापित कर चुका था। दोनों राज्यों के आर्थिक एवं सामरिक हितों के टकराव ने अंततः प्यूनिक युद्धों को जन्म दिया।

तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभ तक रोमन गणराज्य ने इटली प्रायद्वीप में उल्लेखनीय विस्तार कर लिया था। लगभग एक शताब्दी तक चले सैन्य अभियानों के परिणामस्वरूप रोम ने एट्रूरिया, लैटियम, साम्नियम तथा दक्षिणी इटली के अधिकांश भागों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। 280–275 ईसा पूर्व के पाइरिक युद्ध के उपरांत एपिरस के राजा पाइरहस की पराजय तथा दक्षिणी इटली के यूनानी नगरों (मैग्ना ग्रेशिया) के आत्मसमर्पण के बाद 270 ईसा पूर्व तक अर्नो नदी के दक्षिण का लगभग संपूर्ण इटली रोमन नियंत्रण में आ गया। इस विजय ने रोम को इटली की सबसे शक्तिशाली स्थलीय शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।

उधर कार्थेज, जिसकी राजधानी वर्तमान ट्यूनीशिया में स्थित थी, पश्चिमी भूमध्यसागर का सबसे समृद्ध समुद्री साम्राज्य था। उसका प्रभुत्व उत्तरी अफ्रीका के अधिकांश तटीय भाग, दक्षिणी आइबेरिया (आधुनिक स्पेन और पुर्तगाल), बैलेरिक द्वीपसमूह, कोर्सिका, सार्डिनिया तथा सिसिली के पश्चिमी भाग तक विस्तृत था। उसकी आर्थिक समृद्धि का आधार समुद्री व्यापार, उपनिवेश, नौसैनिक शक्ति तथा भूमध्यसागर के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण था। इस कारण कार्थेज को उस समय की प्रमुख समुद्री शक्ति (थैलासोक्रेसी) माना जाता था।

सिसिली का सामरिक महत्त्व

सिसिली द्वीप रोम और कार्थेज के बीच बढ़ते तनाव का प्रमुख केंद्र था। यह द्वीप इटली और उत्तरी अफ्रीका के मध्य स्थित होने के कारण व्यापारिक तथा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से कार्थेज और सिसिली के यूनानी नगर-राज्यों, विशेषकर सिरैक्यूज़ के मध्य इस द्वीप के नियंत्रण को लेकर अनेक युद्ध हुए थे। यद्यपि इनमें से अधिकांश संघर्ष निर्णायक सिद्ध नहीं हुए, फिर भी 264 ईसा पूर्व तक कार्थेज ने सिसिली के पश्चिमी और दक्षिणी भागों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, जबकि पूर्वी भाग पर सिरैक्यूज़ का नियंत्रण बना रहा। इस प्रकार सिसिली पश्चिमी भूमध्यसागर की दो महान शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया।

रोम और कार्थेज के प्रारंभिक संबंध

प्रथम प्यूनिक युद्ध से पूर्व रोम और कार्थेज के संबंध सामान्यतः मैत्रीपूर्ण थे। दोनों राज्यों के बीच 509 ईसा पूर्व, 348 ईसा पूर्व तथा लगभग 279 ईसा पूर्व में औपचारिक संधियाँ हुई थीं, जिनमें व्यापारिक अधिकारों तथा प्रभाव-क्षेत्रों का निर्धारण किया गया था। इन संधियों ने दोनों शक्तियों के मध्य संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों राज्यों के बीच सक्रिय व्यापारिक संबंध भी स्थापित थे, जिससे आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिला।

पाइरिक युद्ध (280–275 ई. पू.) के दौरान कार्थेज ने रोम के साथ सहयोगात्मक व्यवहार किया। जब एपिरस के राजा पाइरहस ने पहले इटली में रोम और बाद में सिसिली में कार्थेज के विरुद्ध अभियान चलाया, तब कार्थेज ने रोम को रसद, सैन्य सामग्री तथा नौसैनिक सहायता प्रदान की। इस सहयोग से स्पष्ट होता है कि उस समय दोनों राज्यों के मध्य प्रत्यक्ष शत्रुता नहीं थी। फिर भी जैसे-जैसे रोम का विस्तार दक्षिण की ओर और कार्थेज का प्रभाव उत्तर की ओर बढ़ा, दोनों के सीमावर्ती हित एक-दूसरे से टकराने लगे। परिणामस्वरूप अविश्वास, प्रतिस्पर्धा तथा राजनीतिक तनाव धीरे-धीरे बढ़ने लगा। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि दोनों राज्यों ने प्रारंभ में दीर्घकालिक युद्ध की कल्पना नहीं की थी, किंतु परिस्थितियों और क्षेत्रीय विवादों ने उन्हें अनपेक्षित रूप से व्यापक संघर्ष में धकेल दिया।

रोमन सेना का संगठन

रोमन गणराज्य की सैन्य व्यवस्था नागरिक-आधारित प्रणाली पर आधारित थी। जिन रोमन नागरिकों के पास निर्धारित मात्रा में संपत्ति होती थी, उनके लिए सैन्य सेवा अनिवार्य थी। अधिकांश नागरिक पैदल सेना में भर्ती किए जाते थे, जबकि अधिक संपन्न वर्ग घुड़सवार सेना में सेवा करता था। युद्ध के समय सामान्यतः दो लीजन संगठित किए जाते थे, जिनमें प्रत्येक में लगभग 4,200 पैदल सैनिक तथा 300 घुड़सवार सैनिक होते थे। आवश्यकता पड़ने पर लीजन की संख्या तथा सैनिकों की संख्या बढ़ाई भी जा सकती थी।

रोमन पैदल सेना को आर्थिक स्थिति और युद्ध-सज्जा के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया था। निर्धन अथवा कम आयु के सैनिक वेलीतेस कहलाते थे। वे हल्के पैदल सैनिक थे, जो भाले फेंकने, शत्रु को प्रारंभिक क्षति पहुँचाने तथा मुख्य सेना की रक्षा करने का कार्य करते थे। उनके पास हल्के भाले, छोटी तलवार तथा गोल ढाल होती थी।

मुख्य युद्ध का भार भारी पैदल सेना उठाती थी। इन सैनिकों के पास धातु का कवच, बड़ी आयताकार ढाल (स्कूटम), छोटी तलवार (ग्लेडियस) तथा भाले होते थे। रोमन सेना की विशेषता उसका अनुशासन, लचीला संगठन तथा मैनिपुलर व्यवस्था थी, जिसके कारण वह युद्धक्षेत्र की बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को शीघ्र ढाल लेती थी। प्रत्येक वर्ष निर्वाचित दो कॉन्सुलों में से प्रत्येक एक प्रमुख सेना का नेतृत्व करता था। रोमन लीजन के साथ उसके इतालवी सहयोगी राज्यों की सेनाएँ भी सम्मिलित रहती थीं, जिनमें प्रायः घुड़सवार सैनिकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती थी।

कार्थेज की सैन्य व्यवस्था

रोम के विपरीत कार्थेज की सेना मुख्यतः भाड़े के सैनिकों तथा अधीनस्थ राज्यों की सैन्य टुकड़ियों पर आधारित थी। कार्थेज के नागरिक सामान्यतः तभी सेना में भर्ती किए जाते थे जब स्वयं कार्थेज नगर पर प्रत्यक्ष संकट उपस्थित होता था। नागरिक सैनिक भारी कवच तथा लंबे भालों से सुसज्जित होते थे, किंतु प्रशिक्षण और अनुशासन की दृष्टि से वे रोमन सैनिकों की तुलना में कम प्रभावी थे।

कार्थेज की नियमित सेना बहुजातीय स्वरूप की थी। इसमें उत्तरी अफ्रीका के लीबियाई पैदल सैनिक, न्यूमिडिया के प्रसिद्ध हल्के घुड़सवार, आइबेरिया और गॉल के आक्रामक योद्धा तथा बैलेरिक द्वीपों के दक्ष गोफनधारी सैनिक सम्मिलित होते थे। लीबियाई भारी पैदल सेना लंबे भाले, बड़ी ढाल और कवच से लैस होकर घनी फैलैंक्स (व्यूह) संरचना में युद्ध करती थी। न्यूमिडियाई घुड़सवार सेना अपनी तीव्र गति, फुर्ती और दूर से भाले फेंकने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध थी। आइबेरियाई तथा गॉल के सैनिक साहस और आक्रामकता के लिए विख्यात थे तथा युद्ध के प्रारंभिक चरण में तीव्र आक्रमण करने में दक्ष माने जाते थे।

कार्थेज की सेना की एक अन्य विशिष्ट विशेषता युद्ध-हाथियों का प्रयोग था। उत्तर अफ्रीका में उस समय पाए जाने वाले स्थानीय अफ्रीकी वन्य हाथियों को प्रशिक्षित कर युद्ध में उपयोग किया जाता था। इन हाथियों का उद्देश्य शत्रु की युद्ध-पंक्तियों में भय तथा अव्यवस्था उत्पन्न करना था। यद्यपि अनेक अवसरों पर इनका प्रभाव निर्णायक सिद्ध हुआ, फिर भी प्रशिक्षित एवं अनुशासित रोमन सेनाओं ने समय के साथ इनके विरुद्ध प्रभावी रणनीतियाँ विकसित कर लीं।

रोमन और कार्थेजीय सैन्य व्यवस्थाओं में मूलभूत अंतर स्पष्ट था। रोम की सेना नागरिक-आधारित, अनुशासित और स्थायी संगठन वाली थी, जबकि कार्थेज की सैन्य शक्ति विविध जातीय समूहों, सहयोगी राज्यों तथा भाड़े के सैनिकों पर निर्भर करती थी। यही संरचनात्मक अंतर आगे चलकर प्यूनिक युद्धों के परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में से एक सिद्ध हुआ।

सैन्य अभियान, रसद व्यवस्था और युद्ध संचालन

प्राचीन भूमध्यसागरीय युद्धों में किसी सेना की सफलता केवल उसके सैनिकों की वीरता पर निर्भर नहीं करती थी, बल्कि उसकी रसद व्यवस्था, अनुशासन, सैन्य संगठन तथा अभियान संचालन की क्षमता भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण थी। रोमन तथा कार्थेजीय सेनाओं का अधिकांश समय प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय सैन्य चौकियों की सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा, घेराबंदी अभियानों तथा सेना के लिए भोजन और अन्य आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था करने में व्यतीत होता था। किसी नगर या दुर्ग पर अधिकार प्राप्त करने के लिए दीर्घकालीन घेराबंदी सामान्य सैन्य रणनीति थी, जबकि सीमावर्ती क्षेत्रों में चौकियों की सुरक्षा के माध्यम से विजय प्राप्त क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखा जाता था।

अभियान के दौरान सेनाएँ निरंतर गतिशील रहती थीं। वे अवसर मिलने पर शत्रु पर आकस्मिक आक्रमण, घात लगाकर हमला, छल-युक्तियाँ तथा रणनीतिक भ्रम उत्पन्न करने जैसी युद्ध-नीतियों का प्रयोग करती थीं। इन उपायों का उद्देश्य प्रत्यक्ष निर्णायक युद्ध से पहले शत्रु को कमजोर करना, उसकी रसद व्यवस्था को बाधित करना तथा उसके मनोबल को गिराना होता था। रोमन सेना विशेष रूप से अनुशासित सैन्य अभियानों और योजनाबद्ध रणनीतियों के लिए प्रसिद्ध थी, जबकि कार्थेज के सेनानायक हैनिबल ने भी घात, छल और तीव्र गति से संचालित अभियानों के माध्यम से अनेक उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं।

रसद व्यवस्था और ‘फॉरजिंग’ की रणनीति

प्राचीन सेनाओं के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भोजन, पशुचारा, हथियार तथा अन्य आवश्यक सामग्रियों की नियमित आपूर्ति बनाए रखना थी। हजारों सैनिकों और उनके साथ रहने वाले घोड़ों, बोझा ढोने वाले पशुओं तथा सहायक कर्मचारियों की आवश्यकताओं की पूर्ति एक जटिल कार्य था। यदि सेना लंबे समय तक किसी क्षेत्र में ठहरती, तो स्थानीय संसाधन शीघ्र समाप्त हो जाते थे। इसलिए प्रभावी रसद व्यवस्था किसी भी अभियान की सफलता का मूल आधार मानी जाती थी।

सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति सामान्यतः दो प्रमुख स्रोतों से की जाती थी। पहला, पूर्व-निर्धारित भंडार था, जहाँ भोजन, हथियार तथा अन्य सामग्री पहले से संग्रहित रहती थी और बोझा ढोने वाले पशुओं अथवा गाड़ियों के माध्यम से सेना तक पहुँचाई जाती थी। दूसरा उपाय स्थानीय संसाधनों का संग्रह था, जिसे फॉरजिंग कहा जाता था। इस प्रक्रिया में सैनिक आसपास के क्षेत्रों से अनाज, पशु, लकड़ी, चारा तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करते थे। शत्रु क्षेत्र में यह कार्य अत्यंत सावधानी से किया जाता था, क्योंकि ऐसे समय सैनिक छोटे-छोटे दलों में विभाजित हो जाते थे और उन पर शत्रु द्वारा अचानक आक्रमण किए जाने की संभावना अधिक रहती थी।

घुड़सवार सेना इस व्यवस्था में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। वह संसाधन एकत्र कर रहे सैनिकों की सुरक्षा करती थी तथा अवसर मिलने पर शत्रु के ऐसे दलों पर भी आक्रमण करती थी जो स्वयं भोजन या अन्य सामग्री जुटाने में लगे होते थे। यदि कोई सेना लंबे समय तक स्थानीय संसाधनों पर निर्भर रहती, तो उसे समय-समय पर अपना शिविर बदलना पड़ता था, क्योंकि आसपास का क्षेत्र शीघ्र ही संसाधन-विहीन हो जाता था। इस प्रकार रसद व्यवस्था केवल प्रशासनिक विषय नहीं थी, बल्कि युद्धनीति का भी अभिन्न अंग थी।

युद्ध-पूर्व तैयारी और युद्ध-व्यूह

प्राचीन सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध प्रायः तत्काल नहीं होते थे। अनेक अवसरों पर दोनों सेनाएँ कई दिनों अथवा सप्ताहों तक एक-दूसरे से कुछ किलोमीटर की दूरी पर शिविर डालकर उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करती थीं। दोनों पक्ष प्रतिदिन युद्ध के लिए तैयार रहते थे, किंतु यदि किसी सेनापति को अपनी स्थिति प्रतिकूल प्रतीत होती, तो वह बिना युद्ध किए पीछे हट सकता था। इस कारण किसी विरोधी सेना को निर्णायक युद्ध के लिए विवश करना सरल नहीं था।

युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व सेना को व्यवस्थित युद्ध-व्यूह में स्थापित करना एक जटिल और समयसाध्य प्रक्रिया थी। सामान्यतः भारी पैदल सेना को युद्ध-पंक्ति के मध्य भाग में रखा जाता था, क्योंकि वही मुख्य आक्रमण और प्रतिरक्षा का भार वहन करती थी। उसके अग्रभाग में हल्की पैदल सेना या स्कर्मिशर तैनात किए जाते थे, जिनका कार्य भालों, गोफनों अथवा अन्य प्रक्षेपास्त्रों द्वारा शत्रु को प्रारंभिक क्षति पहुँचाना होता था। दोनों पार्श्वों पर घुड़सवार सेना तैनात रहती थी, जो शत्रु की घुड़सवार शक्ति का सामना करने के साथ-साथ अवसर मिलने पर उसके पार्श्व या पीछे से आक्रमण करती थी।

प्राचीन युद्धों में अनेक बार विजय का निर्णय तब होता था जब किसी पक्ष की पैदल सेना पर बगल अथवा पीछे से आक्रमण कर उसे घेर लिया जाता था। ऐसी स्थिति में सेना का संगठन टूट जाता था और सैनिकों का मनोबल शीघ्र गिर जाता था। हैनिबल द्वारा 216 ईसा पूर्व के कैन्ने के युद्ध में अपनाई गई दोहरी घेराबंदी इसी प्रकार की रणनीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण मानी जाती है।

रोमन और कार्थेजीय नौसेनाएँ

प्यूनिक युद्धों का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष समुद्री युद्ध था। इस युग में क्विंक्वेरीम (पाँच कतारों वाला युद्धपोत) सबसे शक्तिशाली और व्यापक रूप से प्रयुक्त युद्धपोत था। रोमन तथा कार्थेजीय दोनों नौसेनाओं का मुख्य आधार यही जहाज़ थे। पॉलीबियस ने भी अनेक स्थानों पर ‘युद्धपोत’ के पर्याय के रूप में इसी शब्द का प्रयोग किया है।

एक क्विंक्वेरीम में लगभग 300 व्यक्तियों का दल होता था, जिसमें लगभग 280 चप्पू चलाने वाले नाविक तथा लगभग 20 अधिकारी एवं डेक कर्मचारी सम्मिलित होते थे। इनके अतिरिक्त सामान्यतः लगभग 40 समुद्री सैनिक तैनात रहते थे, जिनकी संख्या युद्ध की स्थिति में बढ़ाकर लगभग 120 तक कर दी जाती थी। समुद्री सैनिकों का मुख्य कार्य शत्रु के जहाज़ पर चढ़कर प्रत्यक्ष युद्ध करना था।

कार्थेज को समुद्री युद्ध का दीर्घ अनुभव प्राप्त था और उसके जहाज़ अधिक संतुलित, तीव्र गति वाले तथा संचालन में दक्ष थे। इसके विपरीत रोम प्रारंभ में नौसैनिक शक्ति से लगभग वंचित था। 260 ईसा पूर्व के आसपास रोम ने अपनी पहली बड़ी नौसेना का निर्माण किया। परंपरा के अनुसार रोमनों ने समुद्र में फँसे एक कार्थेजीय क्विंक्वेरीम को नमूने के रूप में उपयोग कर उसी के आधार पर अपने जहाज़ तैयार किए। यद्यपि उन्होंने अल्प समय में विशाल नौसेना खड़ी कर ली, फिर भी अनुभव के अभाव में उनके प्रारंभिक जहाज़ अपेक्षाकृत भारी तथा संचालन में कम सक्षम थे।

‘कॉर्वस’ और रोमन नौसैनिक नवाचार

समुद्री युद्ध में अपनी प्रारंभिक कमजोरियों की भरपाई करने के लिए रोमनों ने एक अभिनव उपकरण विकसित किया, जिसे ‘कॉर्वस’ (चढ़ाई-पुल) कहा जाता था। यह लगभग 11 मीटर लंबा तथा लगभग 1.2 मीटर चौड़ा लकड़ी का पुल था, जिसके अग्रभाग में लोहे का भारी नुकीला काँटा लगा होता था। जब रोमन जहाज़ शत्रु के समीप पहुँचता, तब इस पुल को शत्रु के जहाज़ पर गिरा दिया जाता था। काँटा उसके डेक में धँस जाता और दोनों जहाज़ स्थिर रूप से जुड़ जाते थे। इसके बाद रोमन समुद्री सैनिक उस पुल के माध्यम से शत्रु के जहाज़ पर चढ़कर स्थल-युद्ध की शैली में युद्ध करते थे। इस तकनीक ने रोम की सबसे बड़ी कमजोरी को उसकी शक्ति में बदल दिया। जहाँ कार्थेज समुद्री संचालन और जहाज़ों की गति पर निर्भर था, वहीं रोम ने युद्ध को प्रत्यक्ष पैदल संघर्ष में परिवर्तित कर दिया, जिसमें उसकी अनुशासित लीजन अधिक प्रभावी सिद्ध हुई। कॉर्वस के कारण रोम ने प्रारंभिक नौसैनिक युद्धों में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं और कार्थेज की समुद्री श्रेष्ठता को चुनौती दी।

प्राचीन नौसैनिक युद्ध की तकनीक

प्राचीन युद्धपोतों के अग्रभाग में काँस्य से निर्मित रैम (टक्कर मारने वाला कांस्य-मढ़ा अग्रभाग) लगा होता था, जिसका उद्देश्य शत्रु के जहाज़ के निचले भाग पर तीव्र गति से प्रहार कर उसमें छेद करना था। किंतु तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक जहाज़ों का आकार और भार बढ़ जाने के कारण प्रभावी रैमिंग करना कठिन होता जा रहा था। बड़े और भारी जहाज़ों में पर्याप्त गति तथा तीव्र मोड़ लेने की क्षमता का अभाव था, जबकि उनकी मजबूत संरचना के कारण रैम का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम हो गया था। परिणामस्वरूप शत्रु के जहाज़ पर चढ़कर प्रत्यक्ष युद्ध करना अधिक प्रभावी रणनीति बन गया। कॉर्वस का प्रयोग इसी बदलती नौसैनिक प्रवृत्ति का परिणाम था। तथापि इसके कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी थे। जहाज़ के अग्रभाग पर अतिरिक्त भार पड़ने से उसकी संतुलन क्षमता और संचालन दक्षता कम हो जाती थी। ऊँची लहरों तथा तूफानी समुद्र में कॉर्वस का उपयोग लगभग असंभव था और इससे जहाज़ों के पलटने का खतरा भी बढ़ जाता था। इसी कारण प्रथम प्यूनिक युद्ध के उत्तरार्ध में रोम ने धीरे-धीरे इसका प्रयोग बंद कर दिया और नौसैनिक संचालन तथा समुद्री युद्ध-कौशल में प्रत्यक्ष दक्षता विकसित करने पर अधिक बल दिया।

प्रथम प्यूनिक युद्ध (264–241 ई. पू.)
सिसिली में युद्ध का प्रारंभ (264–262 ई. पू.)

प्रथम प्यूनिक युद्ध का अधिकांश भाग सिसिली द्वीप तथा उसके आसपास के समुद्री क्षेत्रों में लड़ा गया। सिसिली का पर्वतीय एवं दुर्गम भूभाग बड़ी सेनाओं की तीव्र गति से आवाजाही के लिए अनुकूल नहीं था, जिसके कारण युद्ध का स्वरूप मुख्यतः घेराबंदी, सीमित सैन्य अभियानों तथा आकस्मिक आक्रमणों तक सीमित रहा। पूरे तेईस वर्षों तक चले इस युद्ध में केवल दो ही बड़े स्थल-युद्ध निर्णायक रूप से लड़े गए। इस प्रकार प्रारंभिक चरण में दोनों पक्षों ने अपने-अपने सामरिक दुर्गों और बंदरगाहों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी तथा युद्ध का वास्तविक केंद्र धीरे-धीरे समुद्र की ओर स्थानांतरित हो गया।

प्यूनिक युद्ध (Punic Wars)
प्रथम प्यूनिक युद्ध (264–241 ई. पू.)

युद्ध का तात्कालिक कारण सिसिली के सामरिक नगर मेसाना (मेसिना, इटली) पर अधिकार का विवाद था। 264 ईसा पूर्व में रोम ने मेसाना में हस्तक्षेप कर नगर पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह विजय सिसिली में रोमन प्रभाव की शुरुआत सिद्ध हुई। इसके पश्चात रोम ने द्वीप के शक्तिशाली यूनानी नगर-राज्य सिराक्यूज़ (सिराकूसा, इटली) को संधि करने के लिए विवश किया, जिससे उसे एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी प्राप्त हुआ। इसके बाद रोमन सेना ने दक्षिणी सिसिली में स्थित कार्थेज के प्रमुख सैन्य एवं प्रशासनिक केंद्र एग्रीजेंटम (एग्रीजेंटो, इटली)की घेराबंदी आरंभ कर दी। इस अभियान का उद्देश्य कार्थेज की सिसिली स्थित शक्ति को निर्णायक आघात पहुँचाना था।

एग्रीजेंटम का युद्ध

262 ईसा पूर्व में कार्थेज ने लगभग 50,000 पैदल सैनिकों, 6,000 घुड़सवारों तथा 60 युद्ध-हाथियों से युक्त विशाल सेना भेजकर एग्रीजेंटम की घेराबंदी हटाने का प्रयास किया। किंतु भीषण संघर्ष के बाद रोमन सेना ने कार्थेजियों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। पराजय के उपरांत कार्थेज की सेना रात्रि के अंधकार में युद्धभूमि छोड़कर भाग गई। इसके बाद रोमनों ने नगर पर अधिकार कर लिया तथा बड़ी संख्या में निवासियों को बंदी बना लिया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार लगभग 25,000 लोगों को दास बनाकर बेच दिया गया। एग्रीजेंटम की विजय ने सिसिली में रोमन प्रतिष्ठा को अत्यधिक सुदृढ़ किया और यह स्पष्ट कर दिया कि रोम अब केवल इटली की शक्ति न रहकर भूमध्यसागरीय राजनीति का प्रमुख खिलाड़ी बन चुका था।

युद्ध का समुद्री स्वरूप

एग्रीजेंटम के पतन के बाद सिसिली में युद्ध गतिरोध की स्थिति में पहुँच गया। कार्थेज ने अपनी रणनीति बदलते हुए समुद्रतटीय दुर्गों और बंदरगाहों की रक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। इन किलाबंद नगरों को समुद्री मार्ग से निरंतर रसद और सैनिक सहायता प्राप्त होती थी, जिससे रोमन सेना अपनी स्थल-शक्ति का पूरा लाभ नहीं उठा सकती थी। परिणामस्वरूप युद्ध का केंद्र समुद्री संघर्ष बन गया।

यद्यपि रोम स्थल-युद्ध में अत्यंत दक्ष था, परंतु उसके पास उस समय कोई संगठित एवं शक्तिशाली नौसेना नहीं थी। इससे पूर्व समुद्री अभियानों के लिए वह अपने लैटिन और यूनानी सहयोगियों पर निर्भर रहता था। दूसरी ओर कार्थेज पश्चिमी भूमध्यसागर की सबसे शक्तिशाली समुद्री शक्ति थी और उसके नाविकों को समुद्री युद्ध का दीर्घ अनुभव प्राप्त था। इस चुनौती का सामना करने के लिए रोम ने अभूतपूर्व गति से एक विशाल नौसेना का निर्माण किया। कार्थेज के एक डूबे हुए युद्धपोत के आधार पर रोमन जहाजों का निर्माण किया गया तथा सैनिकों को समुद्री युद्ध का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। रोमन अभियंताओं ने कॉर्वस चल पुल के माध्यम से रोमन सैनिक शत्रु के जहाजों पर चढ़कर स्थल-युद्ध जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकते थे।

माइले और सुल्सी के नौसैनिक युद्ध

रोमन नौसेना ने अपनी नई युद्ध-रणनीति का पहला बड़ा प्रदर्शन 260 ईसा पूर्व में माइले (मिलात्सो, इटली) के नौसैनिक युद्ध में किया। कॉर्वस के प्रभावी उपयोग के कारण रोम ने कार्थेज की अनुभवी नौसेना को पराजित कर अपनी पहली महत्त्वपूर्ण समुद्री विजय प्राप्त की। इस सफलता ने सिद्ध कर दिया कि रोम केवल स्थल-युद्ध ही नहीं, बल्कि समुद्री युद्ध में भी कार्थेज को चुनौती देने में सक्षम हो चुका था।

माइले की विजय के बाद रोम ने कोर्सिका स्थित कार्थेज के एक प्रमुख नौसैनिक अड्डे पर अधिकार कर लिया, यद्यपि सार्डिनिया पर उसका प्रारंभिक आक्रमण असफल रहा और बाद में कोर्सिका का नियंत्रण भी उसके हाथ से निकल गया। इसके बावजूद रोमन नौसेना का विस्तार निरंतर जारी रहा। 258 ईसा पूर्व में रोम ने सार्डिनिया के पश्चिमी तट के निकट सुल्सी (सांत’आंतिओको, सार्डिनिया, इटली) के नौसैनिक युद्ध में कार्थेज के एक छोटे बेड़े को पराजित किया। इन प्रारंभिक समुद्री सफलताओं ने रोमन नौसैनिक शक्ति की नींव को सुदृढ़ किया और आगे चलकर प्रथम प्यूनिक युद्ध की दिशा रोम के पक्ष में मोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अफ्रीका में रोमन अभियान (256–255 ई. पू.)

सिसिली के समुद्री मोर्चे पर लगातार सफलताओं के बाद रोम ने युद्ध को निर्णायक रूप देने के उद्देश्य से पहली बार उत्तरी अफ्रीका में आक्रमण करने की योजना बनाई। उसका लक्ष्य कार्थेज की मुख्य भूमि पर प्रत्यक्ष दबाव डालकर उसे आत्मसमर्पण के लिए विवश करना था। 256 ईसा पूर्व में विशाल रोमन बेड़ा अफ्रीका की ओर रवाना हुआ, किंतु कार्थेज ने सिसिली के दक्षिणी तट के समीप केप एक्नोमस (पोग्जो सांत’आंजेलो, सिसिली) के निकट उसका मार्ग रोकने का प्रयास किया। यह प्राचीन विश्व के सबसे विशाल नौसैनिक युद्धों में से एक माना जाता है। यद्यपि कार्थेज के नाविक समुद्री युद्ध में अधिक अनुभवी थे, फिर भी रोमन युद्धपोतों पर लगाए गए कॉर्वस ने युद्ध की दिशा बदल दी। इस यंत्र के कारण समुद्री संघर्ष हाथापाई में परिवर्तित हो गया, जहाँ रोमन पैदल सैनिकों की दक्षता निर्णायक सिद्ध हुई। परिणामस्वरूप कार्थेज को पुनः पराजय का सामना करना पड़ा और रोम को अफ्रीका में उतरने का मार्ग मिल गया।

ट्यूनिस का युद्ध और रोमन पराजय

अफ्रीका में प्रारंभिक चरण में रोमन अभियान अत्यंत सफल रहा। रोमन सेना ने कार्थेज के आसपास के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और कार्थेज को शांति-वार्ता के लिए विवश कर दिया। किंतु रोम द्वारा प्रस्तुत शांति-शर्तें अत्यधिक कठोर थीं, जिन्हें स्वीकार करना कार्थेज के लिए असंभव था। परिणामस्वरूप युद्ध पुनः आरंभ हुआ। कार्थेज ने स्पार्टा के अनुभवी भाड़े के सेनानायक ज़ैंथिपस को अपनी सेना का नेतृत्व सौंपा। उसने कार्थेज की पैदल सेना, घुड़सवार सेना तथा युद्ध-हाथियों का प्रभावी समन्वय करते हुए 255 ईसा पूर्व में ट्यूनिस के युद्ध में रोमनों पर निर्णायक आक्रमण किया। खुली भूमि पर लड़े गए इस युद्ध में कार्थेज के हाथियों और घुड़सवार सेना ने रोमन युद्ध-व्यूह को छिन्न-भिन्न कर दिया। रोमन सेना को भीषण पराजय का सामना करना पड़ा और उसके अधिकांश सैनिक मारे गए अथवा बंदी बना लिए गए। यह प्रथम प्यूनिक युद्ध में रोम की सबसे गंभीर स्थलीय पराजयों में से एक थी।

केप हर्मायम का युद्ध

ट्यूनिस की पराजय के बाद रोम ने अपने जीवित सैनिकों को अफ्रीका से निकालने के लिए एक विशाल नौसैनिक बेड़ा भेजा। कार्थेज ने केप हर्मायम (केप बॉन, ट्यूनीशिया) के समीप इस अभियान को रोकने का प्रयास किया, किंतु वहाँ भी रोमन नौसेना विजयी रही, किंतु यह सफलता अल्पकालिक सिद्ध हुई। इटली लौटते समय रोमन बेड़ा एक भीषण समुद्री तूफ़ान की चपेट में आ गया, जिससे उसके अधिकांश युद्धपोत नष्ट हो गए। प्राचीन स्रोतों के अनुसार इस दुर्घटना में लगभग एक लाख सैनिक और नाविक मारे गए। अनेक इतिहासकारों का मत है कि रोमन जहाजों पर लगे भारी कॉर्वस के कारण उनकी समुद्री संतुलन क्षमता कम हो गई थी, जिससे तूफ़ान में क्षति और अधिक बढ़ गई। इसी घटना के बाद रोमन नौसेना में कॉर्वस का उपयोग लगभग समाप्त हो जाता है।

सिसिली में संघर्ष का पुनः विस्तार (255–250 ई. पू.)

अफ्रीका में रोमन विफलता के बावजूद युद्ध समाप्त नहीं हुआ। संघर्ष का मुख्य केंद्र पुनः सिसिली बन गया, जहाँ अगले कई वर्षों तक कोई भी पक्ष निर्णायक बढ़त प्राप्त नहीं कर सका। 255 ईसा पूर्व में कार्थेज ने अक्रागास (एग्रीजेंटो, सिसिली) पर पुनः अधिकार कर लिया, किंतु उसकी रक्षा कठिन समझकर नगर को नष्ट कर स्वयं खाली कर दिया। दूसरी ओर रोम ने आश्चर्यजनक गति से अपनी नौसेना का पुनर्निर्माण किया और लगभग 220 नए युद्धपोत तैयार किए। इसके बल पर उसने 254 ईसा पूर्व में सिसिली के महत्त्वपूर्ण नगर पैनोरमस (पलेर्मो, सिसिली) पर अधिकार स्थापित कर लिया। किंतु अगले ही वर्ष एक प्रचंड तूफ़ान में रोमन बेड़े के लगभग 150 जहाज नष्ट हो गए, जिससे उसकी नौसैनिक शक्ति को पुनः भारी आघात पहुँचा।

252 और 251 ईसा पूर्व के दौरान रोमनों ने बड़े युद्धों से परहेज किया, क्योंकि कार्थेज ने सिसिली में बड़ी संख्या में युद्ध-हाथी तैनात कर दिए थे। किंतु 250 ईसा पूर्व में कार्थेज की सेना ने पैनोरमस पर आक्रमण किया। नगर की दीवारों के बाहर हुए युद्ध में रोमन सेनापतियों ने अत्यंत चतुराई से हाथियों को लक्ष्य बनाकर उन पर भालों की वर्षा की। भयभीत हाथी पीछे मुड़कर कार्थेज की अपनी ही सेना में घुस गए, जिससे उसकी युद्ध-पंक्ति अस्त-व्यस्त हो गई। इस अवसर का लाभ उठाकर रोमन पैदल सेना ने निर्णायक आक्रमण किया और कार्थेज को पराजित कर दिया। इस विजय ने सिद्ध कर दिया कि रोमन सेना अब युद्ध-हाथियों की चुनौती का भी प्रभावी समाधान खोज चुकी थी।

लिलिबेयम और ड्रेपाना की घेराबंदी

पैनोरमस की विजय के पश्चात रोम ने सिसिली के अधिकांश भाग पर अधिकार स्थापित कर लिया। अब कार्थेज के पास केवल दो प्रमुख दुर्ग— लिलिबेयम (मार्साला, सिसिली) और ड्रेपाना (त्रापानी, सिसिली) शेष रह गए थे, जो पश्चिमी सिसिली में उसके अंतिम शक्तिशाली आधार थे। 250 ईसा पूर्व में रोमनों ने इन दोनों नगरों की घेराबंदी आरंभ की। लिलिबेयम की विशाल प्राचीरें और उसका सुरक्षित बंदरगाह रोमन आक्रमणों के सामने अडिग बने रहे। अनेक बार नगर पर प्रत्यक्ष धावा बोलने तथा समुद्री मार्ग अवरुद्ध करने के प्रयास किए गए, किंतु कोई निर्णायक सफलता नहीं मिली। परिणामस्वरूप यह घेराबंदी लगभग नौ वर्षों तक चलती रही।

इसी दौरान रोम ने कार्थेज के बेड़े पर आकस्मिक आक्रमण करने का प्रयास किया, किंतु ड्रेपाना के नौसैनिक युद्ध में उसे करारी पराजय मिली। यह प्रथम प्यूनिक युद्ध में कार्थेज की सबसे बड़ी समुद्री विजय थी। इसके कुछ समय बाद फिंटियास (लिकाता, सिसिली) के नौसैनिक युद्ध में भी कार्थेज ने रोम को परास्त किया, जिससे रोमन नौसेना लगभग निष्क्रिय हो गई। इन पराजयों के बाद रोम को अपनी नौसैनिक शक्ति के पुनर्निर्माण में लगभग सात वर्ष लगे, जबकि कार्थेज ने संसाधनों की बचत के लिए अपने अधिकांश युद्धपोतों को आरक्षित स्थिति में रखकर युद्ध को दीर्घकाल तक खींचने की नीति अपनाई।

दोनों शक्तियों की हानि

लगभग तेईस वर्षों तक चले प्रथम प्यूनिक युद्ध ने रोम और कार्थेज दोनों को आर्थिक, सैन्य तथा जनसंख्या की दृष्टि से अत्यंत दुर्बल बना दिया था। निरंतर युद्ध, विशाल सैन्य व्यय तथा नौसैनिक अभियानों ने दोनों राज्यों की वित्तीय स्थिति को संकटग्रस्त कर दिया। कार्थेज की आर्थिक कमजोरी का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसने टॉलेमिक मिस्र से 2,000 टैलेंट का ऋण प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया। दूसरी ओर रोम भी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। युद्ध के प्रारंभ की तुलना में उसकी वयस्क पुरुष नागरिक आबादी, जो सेना और नौसेना के लिए सैनिक उपलब्ध कराती थी, लगभग 17 प्रतिशत घट चुकी थी। इतिहासकार एड्रियन गोल्ड्सवर्दी ने इस जनहानि को रोमन इतिहास की सबसे भीषण क्षतियों में से एक माना है।

रोमन नौसेना का पुनर्निर्माण

इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद रोम ने युद्ध को निर्णायक रूप से समाप्त करने का निश्चय किया। 243 ईसा पूर्व में रोमन सीनेट ने राज्य के सबसे समृद्ध नागरिकों से विशेष ऋण लेकर एक नए युद्ध बेड़े के निर्माण का निर्णय लिया। प्रत्येक धनी नागरिक को एक युद्धपोत के निर्माण का व्यय वहन करने के लिए प्रेरित किया गया, यह आश्वासन देते हुए कि विजय प्राप्त होने पर कार्थेज से वसूले जाने वाले हर्जाने से उनका धन वापस कर दिया जाएगा। इस प्रकार अल्प समय में एक शक्तिशाली एवं आधुनिक नौसेना का पुनर्गठन किया गया। इस नए बेड़े ने सिसिली में स्थित कार्थेज की शेष छावनियों और बंदरगाहों की प्रभावी नाकेबंदी कर दी, जिससे उन्हें रसद और सैनिक सहायता मिलनी लगभग असंभव हो गई।

एगेट्स द्वीपसमूह का निर्णायक युद्ध

रोमन नाकेबंदी को तोड़ने के उद्देश्य से कार्थेज ने भी एक नया नौसैनिक बेड़ा तैयार किया और सिसिली की ओर भेजा। दोनों पक्षों के बीच 241 ईसा पूर्व में एगेट्स द्वीपसमूह (एगादी द्वीपसमूह, सिसिली के निकट) के निकट निर्णायक नौसैनिक युद्ध हुआ। इस समय तक रोमन नाविकों को पर्याप्त अनुभव प्राप्त हो चुका था, जबकि कार्थेज के जहाजों पर पर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त चालक दल का अभाव था। परिणामस्वरूप रोमन नौसेना ने कार्थेज के बेड़े को पूरी तरह पराजित कर दिया। इस पराजय के बाद सिसिली में तैनात कार्थेज की सेनाएँ बाहरी सहायता से वंचित हो गईं और उन्हें युद्ध जारी रखना असंभव प्रतीत हुआ। अंततः कार्थेज ने शांति-वार्ता का मार्ग स्वीकार किया।

लुटाटियस की संधि

युद्ध की समाप्ति लुटाटियस की संधि (241 ई. पू.) के माध्यम से हुई। इस संधि के अनुसार कार्थेज ने रोम को 3,200 टैलेंट चाँदी का भारी युद्ध-हरजाना देने तथा सिसिली से अपना संपूर्ण अधिकार छोड़ने पर सहमति व्यक्त की। इसके साथ ही सिसिली रोम का पहला विदेशी प्रांत बन गया। यूनानी इतिहासकार पॉलीबियस ने प्रथम प्यूनिक युद्ध को ‘इतिहास के सबसे लंबे, सबसे निरंतर और सबसे कठिन संघर्षों में से एक’ बताया है। इस विजय के बाद रोम ने स्वयं को पश्चिमी भूमध्यसागर की प्रमुख सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया और आगे चलकर संपूर्ण भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अपने विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

युद्धों के बीच का काल (241–218 ई. पू.)
मर्सिनरी (भाड़े के सैनिकों का) युद्ध

प्रथम प्यूनिक युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद कार्थेज एक नए संकट में घिर गया। 241 ईसा पूर्व में सिसिली से लौटे लगभग 20,000 विदेशी भाड़े के सैनिकों को उनका बकाया वेतन समय पर नहीं दिया गया। वेतन-विवाद शीघ्र ही व्यापक विद्रोह में परिवर्तित हो गया, जिसका नेतृत्व स्पेंडियस और मैथो ने किया। इस विद्रोह को कार्थेज के अधीन अफ्रीकी क्षेत्रों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। लगभग 70,000 स्थानीय अफ्रीकी विद्रोही उनके साथ आ मिले और उन्होंने पर्याप्त रसद, धन तथा सैनिक शक्ति उपलब्ध कराई। इस कारण यह संघर्ष केवल सैनिक विद्रोह न रहकर कार्थेज के विरुद्ध एक व्यापक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन बन गया।

रोम की प्रारंभिक तटस्थता

यद्यपि रोम अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी की कठिन स्थिति से परिचित था, फिर भी उसने प्रारंभ में इस संकट का लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया। रोमन सरकार ने इटली के व्यापारियों को विद्रोहियों के साथ व्यापार करने से रोक दिया तथा अपने सहयोगी सिराक्यूज़ के शासक हिएरो द्वितीय को कार्थेज के लिए आवश्यक खाद्यान्न भेजने की अनुमति दी। उस समय विद्रोह के कारण कार्थेज अपने आंतरिक प्रदेशों से पर्याप्त रसद प्राप्त नहीं कर पा रहा था। दूसरी ओर, कार्थेज की सेना प्रारंभिक अभियानों में विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सकी और सेनापति हैनो के नेतृत्व में उसे लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ा।

हैमिलकर बारका का अभियान

240 ईसा पूर्व में सिसिली के युद्धों में अपनी सैन्य प्रतिभा सिद्ध कर चुके हैमिलकर बारका को संयुक्त सेना का नेतृत्व सौंपा गया और अगले वर्ष वह कार्थेज की सेना का सर्वोच्च सेनापति बना। उसने प्रारंभ में उदार नीति अपनाकर विद्रोहियों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया। किंतु विद्रोही नेताओं ने इसका उत्तर अत्यंत क्रूरता से दिया। विद्रोही नेता स्पेंडियस ने लगभग 700 कार्थेजी बंदियों को यातनाएँ देकर मृत्युदंड दिलाया, जिसके बाद संघर्ष अत्यधिक निर्दय और रक्तरंजित हो गया। कई वर्षों तक चले अभियान के उपरांत हैमिलकर ने क्रमशः विद्रोहियों को पराजित किया और 237 ईसा पूर्व तक अधिकांश विद्रोही नगरों एवं क्षेत्रों पर पुनः कार्थेज का अधिकार स्थापित कर दिया।

सार्डिनिया और कोर्सिका पर रोमन अधिकार

भाड़े के सैनिकों के विद्रोह के दौरान सार्डिनिया में भी कार्थेज के विरुद्ध विद्रोह हुआ, जहाँ विद्रोही सैनिकों ने कार्थेज के अधिकांश निवासियों की हत्या कर दी। विद्रोह शांत होने के बाद कार्थेज ने सार्डिनिया पर पुनः अधिकार स्थापित करने की तैयारी की, किंतु रोम ने इसे अपने विरुद्ध संभावित सैन्य कार्रवाई घोषित कर दिया। रोमन सीनेट ने कार्थेज से सार्डिनिया और कोर्सिका दोनों द्वीप रोम को सौंपने तथा अतिरिक्त 1,200 टैलेंट का हर्जाना देने की माँग की। दीर्घकालीन युद्धों से अत्यंत दुर्बल हो चुके कार्थेज के पास इस अन्यायपूर्ण माँग को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।

पॉलीबियस ने रोमन नीति को न्याय के विरुद्ध बताया है, जबकि आधुनिक इतिहासकार इसे अवसरवाद, संधि-उल्लंघन तथा आक्रामक साम्राज्यवादी नीति का उदाहरण मानते हैं। इन घटनाओं ने कार्थेज में रोम के प्रति गहरी शत्रुता और प्रतिशोध की भावना को जन्म दिया। यही कटुता आगे चलकर हैमिलकर बारका तथा उसके पुत्र हैनिबल की नीतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई दी और अंततः 218 ईसा पूर्व में द्वितीय प्यूनिक युद्ध के प्रमुख कारणों में से एक बनी।

आइबेरिया में कार्थेज का विस्तार

मर्सिनरी (भाड़े के सैनिकों) के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाने के बाद कार्थेज के महान सेनानायक हैमिलकर बारका ने यह समझ लिया कि यदि भविष्य में रोम का प्रभावी ढंग से सामना करना है, तो केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होगी; इसके लिए सुदृढ़ आर्थिक संसाधन, विशाल जनशक्ति और सुरक्षित सामरिक आधार भी आवश्यक होंगे। प्रथम प्यूनिक युद्ध के बाद कार्थेज की स्थिति कमजोर हो चुकी थी और आइबेरिया (स्पेन एवं पुर्तगाल) में उसका नियंत्रण केवल दक्षिणी तटीय नगरों तक सीमित रह गया था। ऐसी परिस्थिति में हैमिलकर ने 237 ईसा पूर्व में अपनी अनुभवी सेना के साथ आइबेरिया की ओर अभियान प्रारंभ किया और वहाँ दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में कार्थेज के अधीन एक अर्ध-स्वायत्त तथा शक्तिशाली प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। यह क्षेत्र कार्थेज के लिए आर्थिक पुनर्निर्माण और सैन्य पुनर्संगठन का प्रमुख आधार बन गया।

आइबेरिया पर कार्थेज के बढ़ते नियंत्रण से उसे चाँदी की समृद्ध खदानें, उपजाऊ कृषि भूमि, बड़ी संख्या में सैनिकों की भर्ती का अवसर तथा जहाज़ निर्माण के लिए आवश्यक संसाधन प्राप्त हुए। इन साधनों ने कार्थेज की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ किया और उसकी सैन्य क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की। साथ ही, यह क्षेत्र रोम के संभावित आक्रमणों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण सामरिक सुरक्षा-कवच भी सिद्ध हुआ। हैमिलकर ने यहाँ प्रतिनिधि शासक के रूप में शासन किया और उसके निधन के बाद उसके दामाद हसद्रुबल ने सत्ता संभाली। हसद्रुबल की मृत्यु के पश्चात् 221 ईसा पूर्व में हैमिलकर के पुत्र हैनिबल ने नेतृत्व ग्रहण किया, जिसने आगे चलकर कार्थेज को रोम के विरुद्ध द्वितीय प्यूनिक युद्ध की दिशा में अग्रसर किया।

कार्थेज के तीव्र विस्तार से चिंतित होकर रोम ने 226 ईसा पूर्व में हसद्रुबल के साथ एब्रो संधि संपन्न की। इस संधि के अनुसार एब्रो नदी को कार्थेज के प्रभाव-क्षेत्र की उत्तरी सीमा स्वीकार किया गया, जिससे दोनों शक्तियों के बीच प्रत्यक्ष टकराव को अस्थायी रूप से टालने का प्रयास किया गया। किंतु इसके कुछ वर्षों बाद रोम ने एब्रो नदी के दक्षिण में स्थित सगुंटम (सगुंतो, स्पेन) नगर के साथ पृथक मैत्री-संधि कर ली। यह कदम एब्रो संधि की भावना के विपरीत माना गया और दोनों महाशक्तियों के बीच अविश्वास को और गहरा कर गया। आगे चलकर यही विवाद द्वितीय प्यूनिक युद्ध का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुआ।

द्वितीय प्यूनिक युद्ध (218–201 ई. पू.)
सगुंटम का संकट

द्वितीय प्यूनिक युद्ध का तात्कालिक कारण 219 ईसा पूर्व में कार्थेज के महान सेनानायक हैनिबल द्वारा सगुंटम नगर की घेराबंदी, विजय और लूट था। यद्यपि सगुंटम एब्रो नदी के दक्षिण में स्थित था, फिर भी वह रोम का सहयोगी बन चुका था। हैनिबल ने इसे कार्थेज के प्रभाव-क्षेत्र में रोमन हस्तक्षेप माना और नगर पर आक्रमण कर दिया। सगुंटम के पतन के बाद रोम ने इसे संधि का उल्लंघन और अपनी प्रतिष्ठा पर सीधी चुनौती माना। फलस्वरूप 218 ईसा पूर्व के वसंत में रोमन गणराज्य ने कार्थेज के विरुद्ध युद्ध की औपचारिक घोषणा कर दी।

प्यूनिक युद्ध (Punic Wars)
द्वितीय प्यूनिक युद्ध (218–201 ई. पू.)

इतिहासकारों के बीच इस बात पर मतभेद है कि क्या हैनिबल ने जानबूझकर रोम को युद्ध के लिए उकसाया था अथवा रोम पहले से ही कार्थेज की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए अवसर खोज रहा था। अनेक आधुनिक विद्वानों का मत है कि दोनों शक्तियों के बीच बढ़ता अविश्वास, सामरिक प्रतिस्पर्धा तथा भूमध्यसागर में प्रभुत्व की आकांक्षा युद्ध के वास्तविक कारण थे। द्वितीय प्यूनिक युद्ध तीन प्रमुख मोर्चों—इटली, आइबेरिया और उत्तरी अफ्रीका में लड़ा गया। इसके अतिरिक्त सिसिली, सार्डिनिया तथा यूनान में भी सहायक अभियान चलाए गए, किंतु युद्ध का मुख्य केंद्र इटली ही रहा।

इटली अभियान

युद्ध के प्रारंभिक चरण में 218 ईसा पूर्व सिसिली के निकट कुछ नौसैनिक संघर्ष हुए, जिनमें रोम ने कार्थेज के आक्रमण को विफल कर दिया तथा माल्टा द्वीप पर अधिकार स्थापित कर लिया। इसी समय उत्तरी इटली के सिसाल्पाइन गॉल क्षेत्र में अनेक गैलिक जनजातियों ने रोमन उपनिवेशों में विद्रोह कर दिया। परिणामस्वरूप रोम को अपनी योजनाएँ बदलनी पड़ीं और आइबेरिया भेजी जाने वाली सेना का एक बड़ा भाग उत्तरी इटली भेजना पड़ा। इस कारण आइबेरिया अभियान में विलंब  हुआ और हैनिबल को अपनी योजना लागू करने का पर्याप्त समय मिल गया।

दूसरी ओर हैनिबल ने न्यू कार्थेज (कार्टाजेना) में विशाल सेना संगठित की और 218 ईसा पूर्व के मई–जून में उत्तर की ओर प्रस्थान किया। उसने भूमध्यसागरीय तटीय मार्ग छोड़कर आंतरिक भूभाग का मार्ग अपनाया, जिससे वह रोम के सहयोगी नगरों से बच सका। रोन नदी पार करते समय उसने स्थानीय गॉल जनजातियों को पराजित किया और रोमन सेना के पहुँचने से पहले ही आगे बढ़ गया। रोमन बेड़ा जब मसालिया (मार्सेय) पहुँचा, तब तक हैनिबल उनसे बचकर  निकल चुका था।

आल्प्स पर्वत का ऐतिहासिक पारगमन

हैनिबल का सबसे साहसिक सैन्य अभियान आल्प्स पर्वत को पार करना था। देर शरद ऋतु में उसकी सेना आल्प्स की तलहटी में पहुँची और लगभग चौबीस दिनों के कठिन अभियान के बाद पर्वत श्रृंखला पार करने में सफल हुई। इस दौरान सैनिकों को हिमपात, दुर्गम मार्ग, भूस्खलन, तीव्र ठंड तथा स्थानीय जनजातियों के गुरिल्ला हमलों का सामना करना पड़ा। इन कठिनाइयों के कारण सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी, फिर भी हैनिबल अपनी सैन्य क्षमता और नेतृत्व के बल पर इटली पहुँच गया।

नवंबर 218 ईसा पूर्व में जब उसकी सेना उत्तरी इटली के पीडमोंट क्षेत्र में पहुँची, तब उसके पास लगभग 20,000 पैदल सैनिक, 6,000 घुड़सवार तथा कुछ शेष युद्ध-हाथी थे। इटली में कार्थेजीय सेना की इस अप्रत्याशित उपस्थिति ने रोम की समस्त युद्ध-योजना बदल दी। रोम को अफ्रीका पर प्रस्तावित आक्रमण स्थगित करना पड़ा और अपनी संपूर्ण शक्ति इटली की रक्षा में लगानी पड़ी।

प्रारंभिक विजय और गैलिक समर्थन

इटली पहुँचते ही हैनिबल ने टॉरिनी जनजाति की राजधानी पर अधिकार कर वहाँ के खाद्यान्न भंडार अपने नियंत्रण में ले लिए। इसके तुरंत बाद टिसिनस नदी के युद्ध में उसकी घुड़सवार सेना ने रोमन घुड़सवारों और हल्की पैदल सेना को पराजित किया। इस विजय का महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि उत्तरी इटली की अधिकांश गैलिक जनजातियाँ रोम का साथ छोड़कर कार्थेज के पक्ष में आ गईं, जिससे हैनिबल की सेना की संख्या लगभग 37,000 तक पहुँच गई।

इसके पश्चात ट्रेबिया के युद्ध में हैनिबल ने अपनी श्रेष्ठ रणनीति का परिचय दिया। उसने रोमन सेना को प्रतिकूल परिस्थितियों में युद्ध करने के लिए विवश किया और फिर योजनाबद्ध घेराबंदी द्वारा उसे लगभग नष्ट कर दिया। लगभग 42,000 रोमन सैनिकों में से केवल लगभग 10,000 ही सुरक्षित निकल सके; शेष मारे गए अथवा बंदी बना लिए गए। यह विजय कार्थेज के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इससे गैलिक जनजातियों का समर्थन और अधिक बढ़ गया।

लेक ट्रैसिमीन का घातक युद्ध

217 ईसा पूर्व के प्रारंभ में हैनिबल ने बिना किसी प्रतिरोध के एपिनाइन पर्वतमाला पार कर मध्य इटली में प्रवेश किया। उसने रोमन सेना को खुले युद्ध के लिए उकसाने हेतु उस क्षेत्र को नष्ट करना प्रारंभ किया जिसकी रक्षा का दायित्व रोमन सेनापति के पास था। क्रोधित रोमन कमांडर ने बिना समुचित टोही के शीघ्र पीछा किया, जिसका लाभ उठाकर हैनिबल ने लेक ट्रैसिमीन के निकट इतिहास के सबसे सफल घात-युद्धों में से एक को अंजाम दिया।

इस युद्ध में लगभग 15,000 रोमन सैनिक, जिनमें उनके सेनापति भी शामिल थे, मारे गए और लगभग 15,000 सैनिक बंदी बना लिए गए। सहायता के लिए भेजी गई 4,000 घुड़सवारों की टुकड़ी भी नष्ट हो गई। हैनिबल ने रोमन नागरिकों और उनके इतालवी सहयोगियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया। रोमन सैनिकों को बंदी बनाया गया, जबकि अनेक सहयोगी राज्यों के सैनिकों को मुक्त कर दिया गया ताकि रोम के सहयोगियों में असंतोष फैल सके। उसकी नीति थी कि इटली के राज्य रोम का साथ छोड़कर कार्थेज के साथ आ जाएँ, क्योंकि रोम की सैन्य शक्ति का बड़ा भाग इन्हीं सहयोगियों पर निर्भर था।

फैबियस मैक्सिमस और ‘फैबियन रणनीति’

लगातार पराजयों से विचलित रोमन सीनेट ने असाधारण कदम उठाते हुए क्विंटस फैबियस मैक्सिमस को तानाशाह नियुक्त किया। फैबियस ने यह समझ लिया था कि खुली लड़ाई में हैनिबल की श्रेष्ठ रणनीति और अनुभवी सेना का सामना करना अत्यंत जोखिमपूर्ण होगा। इसलिए उन्होंने प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए शत्रु को धीरे-धीरे कमजोर करने की नीति अपनाई, जिसे इतिहास में ‘फैबियन रणनीति’ के नाम से जाना जाता है। इस रणनीति के अंतर्गत रोमन सेना हैनिबल की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रखती थी, उसकी छोटी टुकड़ियों पर आक्रमण करती थी, उसकी रसद व्यवस्था बाधित करती थी तथा निर्णायक युद्ध से बचती थी। यद्यपि इस नीति से हैनिबल को शीघ्र विजय नहीं मिल सकी, फिर भी रोमन जनता, सैनिकों और सीनेट के अनेक सदस्य इसे कायरता मानते थे। हैनिबल ने इटली के समृद्ध और उपजाऊ क्षेत्रों को नष्ट करके फैबियस को युद्ध के लिए विवश करने का प्रयास किया, किंतु फैबियस ने धैर्य बनाए रखा और प्रत्यक्ष संघर्ष से परहेज किया।

कैने का युद्ध और रोम की पराजय

216 ईसा पूर्व में लूसियस एमिलियस पॉलस और गायस टेरेंटियस वारो कौंसल चुने गए। दोनों फैबियस की सावधानीपूर्ण नीति के विरोधी थे और निर्णायक युद्ध चाहते थे। रोमन सीनेट ने लगभग 86,000 सैनिकों की विशाल सेना संगठित की, जो उस समय तक रोमन इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति थी। यह सेना दक्षिण-पूर्वी इटली के कैने के मैदान में हैनिबल का सामना करने पहुँची।

कैने का युद्ध सैन्य इतिहास की महानतम रणनीतिक विजय के रूप में प्रसिद्ध है। हैनिबल ने अपने मध्य भाग को जानबूझकर अपेक्षाकृत कमजोर रखा, जिससे रोमन सेना उसी दिशा में आगे बढ़ी। इसी समय दोनों किनारों पर तैनात लीबियाई भारी पैदल सेना ने अर्धवृत्ताकार ढंग से आगे बढ़कर रोमन सेना के दोनों पंखों को घेर लिया। कार्थेजीय घुड़सवार सेना ने रोमन घुड़सवारों को परास्त कर पीछे से लौटकर रोमन पैदल सेना पर आक्रमण कर दिया। परिणामस्वरूप रोमन सेना चारों ओर से घिर गई और उसके लिए बच निकलना असंभव हो गया।

इस अभूतपूर्व दोहरी घेराबंदी के कारण कम से कम 67,500 रोमन सैनिक मारे गए या बंदी बना लिए गए। इतिहासकार रिचर्ड माइल्स ने कैने को रोम के इतिहास की सबसे भीषण सैन्य आपदा कहा है, जबकि अन्य विद्वानों के अनुसार ट्रेबिया, लेक ट्रैसिमीन और कैने की लगातार पराजयों ने रोमन गणराज्य को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया। कैने के कुछ ही सप्ताह बाद सिल्वा लिटाना के युद्ध में बोई गॉलों ने लगभग 25,000 सैनिकों वाली एक अन्य रोमन सेना का भी विनाश कर दिया। इन लगातार पराजयों के बावजूद रोम ने आत्मसमर्पण नहीं किया और दीर्घकालिक संघर्ष जारी रखने का निश्चय किया। 215 ईसा पूर्व में फैबियस मैक्सिमस पुनः कौंसल चुने गए और उनकी सावधानीपूर्ण युद्ध-नीति ने आगे चलकर रोम की पुनरुत्थान प्रक्रिया की आधारशिला रखी।

कैने के बाद इटली की बदलती राजनीतिक स्थिति

216 ईसा पूर्व में कैने के निर्णायक युद्ध में रोम की भीषण पराजय के बाद इटली की राजनीतिक और सामरिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया। इस काल के संबंध में यूनानी इतिहासकार पॉलीबियस का विवरण सीमित रूप में उपलब्ध है, इसलिए घटनाओं के पुनर्निर्माण के लिए रोमन इतिहासकार लिवी का वृत्तांत प्रमुख स्रोत माना जाता है। कैने की विजय के बाद हैनिबल की प्रतिष्ठा पूरे इटली में अत्यधिक बढ़ गई और अनेक नगर-राज्यों तथा जनजातियों ने यह मान लिया कि रोम की शक्ति अब स्थायी रूप से कमजोर हो चुकी है। परिणामस्वरूप दक्षिणी इटली के कई नगरों और समुदायों ने रोम से संबंध तोड़कर कार्थेज का साथ स्वीकार कर लिया।

इनमें कैपुआ जैसे समृद्ध और प्रभावशाली नगर तथा टैरेंटम जैसे महत्त्वपूर्ण बंदरगाह विशेष रूप से उल्लेखनीय थे। अनेक स्थानों पर कार्थेज-समर्थक गुटों ने नगरों की सुरक्षा व्यवस्था में विश्वासघात करके हैनिबल के लिए द्वार खोल दिए। इसी अवधि में दो प्रमुख सैमनाइट जनजातियाँ भी कार्थेज के पक्ष में आ गईं। 214 ईसा पूर्व तक दक्षिणी इटली का अधिकांश भाग किसी न किसी रूप में रोम के नियंत्रण से बाहर हो चुका था, यद्यपि मध्य इटली के अधिकांश सहयोगी राज्य अब भी रोम के प्रति निष्ठावान बने रहे।

हैनिबल की रणनीतिक सीमाएँ

यद्यपि हैनिबल को अनेक नए सहयोगी प्राप्त हुए, फिर भी यह सफलता उसके लिए पूर्णतः लाभकारी सिद्ध नहीं हुई। अधिकांश इतालवी नगर मजबूत प्राचीरों और किलाबंदियों से सुरक्षित थे, इसलिए उन्हें बलपूर्वक जीतना अत्यंत कठिन था। किसी नगर की घेराबंदी में लंबा समय और पर्याप्त संसाधन लगते थे, जबकि समुद्री बंदरगाहों पर अधिकार स्थापित करना बिना सशक्त नौसेना के लगभग असंभव था। इस कारण हैनिबल अपनी विजयों का पूर्ण सामरिक लाभ नहीं उठा सका। इसके अतिरिक्त, कार्थेज के नए सहयोगियों में आपसी एकता और साझा राजनीतिक उद्देश्य का अभाव था। वे कार्थेज की अपेक्षा अपने-अपने स्थानीय हितों को अधिक महत्त्व देते थे। इन सहयोगी नगरों की रक्षा का उत्तरदायित्व भी हैनिबल की सेना पर आ गया, जिससे उसकी सैन्य शक्ति अनेक मोर्चों पर बँट गई। दूसरी ओर, इन राज्यों ने कार्थेज को अपेक्षित संख्या में सैनिक उपलब्ध नहीं कराए। जो स्थानीय इतालवी सेनाएँ गठित की गईं, वे अपने गृहक्षेत्र से दूर अभियान चलाने के प्रति अनिच्छुक थीं और युद्धभूमि में उनका प्रदर्शन भी सामान्यतः संतोषजनक नहीं रहा। परिणामस्वरूप हैनिबल की रणनीतिक स्थिति उतनी मजबूत नहीं बन सकी, जितनी उसकी प्रारंभिक विजयों से प्रतीत होती थी।

215 ईसा पूर्व की गर्मियों में दक्षिणी इटली का बंदरगाह नगर लोकरी कार्थेज के पक्ष में आ गया। यह घटना हैनिबल के लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई, क्योंकि इसी बंदरगाह के माध्यम से कार्थेज ने इटली में अपनी सेना को सैनिकों, युद्ध-सामग्री, रसद तथा युद्ध-हाथियों से सुदृढ़ किया। पूरे द्वितीय प्यूनिक युद्ध के दौरान यही एकमात्र अवसर था जब हैनिबल को कार्थेज से उल्लेखनीय सैन्य सहायता प्राप्त हुई।

कार्थेज ने हैनिबल के सबसे छोटे भाई मैगो बारका के नेतृत्व में एक अन्य सेना भी इटली भेजने की योजना बनाई थी। किंतु आइबेरिया में डर्टोसा के युद्ध में कार्थेज की पराजय के कारण यह योजना विफल हो गई और मैगो को इटली के बजाय आइबेरिया में ही युद्ध जारी रखना पड़ा। इस प्रकार हैनिबल को अपेक्षित अतिरिक्त सैन्य सहायता नहीं मिल सकी, जिससे उसके दीर्घकालीन अभियान की संभावनाएँ सीमित होती गईं।

रोम की व्यापक सैन्य पुनर्संगठन नीति

कैने की विनाशकारी हार के बावजूद रोम ने आत्मसमर्पण करने के बजाय अपनी सैन्य व्यवस्था का अभूतपूर्व पुनर्गठन किया। सैनिकों की भारी कमी को पूरा करने के लिए राज्य ने असाधारण कदम उठाए। दासों, अपराधियों तथा उन नागरिकों को भी सेना में भर्ती किया गया जो सामान्य परिस्थितियों में सैन्य सेवा के लिए आवश्यक संपत्ति-योग्यता पूरी नहीं करते थे। इस कठोर नीति के परिणामस्वरूप रोम शीघ्र ही अपनी सैन्य शक्ति का पुनर्निर्माण करने में सफल रहा।

215 ईसा पूर्व तक रोम ने कम-से-कम 12 लीजन तैयार कर लिए थे। दो वर्षों के भीतर उनकी संख्या बढ़कर 18 हो गई और उसके अगले वर्ष 22 लीजन सक्रिय थे। 212 ईसा पूर्व तक रोमन सेना में एक लाख से अधिक सैनिक सेवा दे रहे थे, जबकि लगभग इतनी ही संख्या में इटली के सहयोगी राज्यों के सैनिक भी रोम की ओर से युद्ध कर रहे थे। यह विशाल सैन्य संगठन रोम की प्रशासनिक क्षमता, संसाधन-संग्रह और दीर्घकालिक युद्ध लड़ने की अद्भुत शक्ति का प्रमाण था।

रोमन प्रतिआक्रमण

रोम ने अपनी नई सेनाओं का अधिकांश भाग दक्षिणी इटली में तैनात किया। यद्यपि लगभग 20,000 सैनिकों की फील्ड आर्मी खुली लड़ाई में हैनिबल का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं थी, फिर भी उसका उद्देश्य प्रत्यक्ष निर्णायक युद्ध नहीं था। इन सेनाओं ने हैनिबल की गतिविधियों पर निरंतर दबाव बनाए रखा, उसके सहयोगी नगरों को असुरक्षित किया तथा उसे अपनी सेना को एक स्थान पर केंद्रित रखने के लिए विवश कर दिया। इससे हैनिबल की स्वतंत्र संचालन क्षमता धीरे-धीरे सीमित होने लगी।

दक्षिणी इटली में संघर्ष लगातार तीव्र बना रहा। अनेक नगर कभी कार्थेज के पक्ष में चले जाते, तो कभी रोम घेराबंदी अथवा स्थानीय रोम-समर्थक गुटों की सहायता से उन्हें पुनः अपने अधिकार में ले लेता। यद्यपि हैनिबल ने अनेक अवसरों पर रोमन सेनाओं को पराजित किया और 208 ईसा पूर्व में एक घुड़सवार संघर्ष के दौरान दोनों रोमन कौंसल भी मारे गए, फिर भी वह इटली में स्थायी राजनीतिक परिवर्तन लाने में सफल नहीं हो सका। जहाँ उसकी मुख्य सेना उपस्थित नहीं होती थी, वहाँ रोमन सेनाएँ कार्थेज-समर्थक नगरों पर दबाव डालतीं, उनके सहयोगियों को पराजित करतीं और धीरे-धीरे अपने खोए हुए क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित कर लेतीं।

लगातार रोमन प्रतिआक्रमण, सीमित कार्थेजीय सहायता और सहयोगी राज्यों की घटती निष्ठा के कारण 207 ईसा पूर्व तक हैनिबल की स्थिति पहले जैसी नहीं रही। उसे इटली के सुदूर दक्षिणी भाग तक सीमित होकर रहना पड़ा। जिन नगरों और क्षेत्रों ने कैने के बाद कार्थेज का साथ दिया था, उनमें से अनेक धीरे-धीरे पुनः रोम के प्रति वफादार हो गए। इस प्रकार युद्ध का संतुलन धीरे-धीरे रोम के पक्ष में झुकने लगा और हैनिबल की प्रारंभिक शानदार सफलताओं का राजनीतिक प्रभाव क्रमशः समाप्त होने लगा।

मैसेडोनिया और ग्रीस में युद्ध का विस्तार

द्वितीय प्यूनिक युद्ध केवल रोम और कार्थेज के बीच सीमित संघर्ष नहीं था, बल्कि उसने समूचे भूमध्यसागरीय क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। 216 ईसा पूर्व में कैने की निर्णायक विजय के बाद कार्थेज की शक्ति और हैनिबल की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई कि मैसेडोनिया के राजा फिलिप पंचम ने रोम-विरोधी नीति अपनाते हुए हैनिबल को अपना समर्थन देने का वचन दिया। इस गठबंधन के परिणामस्वरूप 215 ईसा पूर्व में प्रथम मैसेडोनियन युद्ध का आरंभ हुआ, जिसने संघर्ष को इटली से आगे बढ़ाकर यूनानी जगत तक फैला दिया।

रोम ने इस नए खतरे का सामना केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि कूटनीतिक उपायों से भी किया। उसने मैसेडोनिया के पारंपरिक विरोधी एटोलियन लीग के साथ गठबंधन स्थापित किया और यूनानी नगर-राज्यों को फिलिप पंचम के विरुद्ध संगठित किया। परिणामस्वरूप मैसेडोनिया अपनी ऊर्जा ग्रीस में ही व्यस्त रखने को विवश हुआ और वह हैनिबल को प्रभावी सहायता नहीं दे सका। लगभग एक दशक तक चले इस संघर्ष का अंत 205 ईसा पूर्व में एक वार्तात्मक शांति-संधि के साथ हुआ, जिसने रोम को पूर्वी भूमध्यसागर में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर प्रदान किया।

सिसिली में शक्ति-संतुलन

द्वितीय प्यूनिक युद्ध के प्रारंभिक वर्षों में सिसिली रोम के नियंत्रण में बना रहा। यह स्थिति रोम के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे कार्थेज हैनिबल को समुद्री मार्ग से बड़े पैमाने पर सहायता भेजने में असमर्थ रहा। किंतु 215 ईसा पूर्व में सिरैक्यूज़ के वृद्ध शासक हिएरो द्वितीय की मृत्यु ने सिसिली की राजनीति को अस्थिर कर दिया।

हिएरो के उत्तराधिकारी हिएरोनिमस ने रोम के बजाय कार्थेज का साथ देने का निर्णय लिया। हैनिबल के साथ हुई संधि के अनुसार, कार्थेज ने सिरैक्यूज़ को पूरे सिसिली पर प्रभुत्व स्थापित कराने का आश्वासन दिया। इसके बाद सिरैक्यूज़ रोम के विरुद्ध युद्ध में उतर आया। यद्यपि उसकी सेना रोमन सेनापति मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस की संगठित सैन्य शक्ति का सामना नहीं कर सकी और 213 ईसा पूर्व में नगर की घेराबंदी प्रारंभ हो गई।

आर्किमिडीज़ और सिरैक्यूज़ की घेराबंदी

सिरैक्यूज़ की घेराबंदी प्राचीन सैन्य इतिहास की सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में गिनी जाती है। नगर की रक्षा में महान गणितज्ञ, अभियंता और वैज्ञानिक आर्किमिडीज़ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अनेक प्रकार की घेराबंदी-विरोधी यांत्रिक मशीनें विकसित कीं, जिनमें विशाल गुलेलें, पत्थर फेंकने वाले यंत्र तथा जहाजों को क्षति पहुँचाने वाली युक्तियाँ शामिल थीं। इन आविष्कारों के कारण रोमन सेना को लंबे समय तक सफलता नहीं मिली। मार्सेलस को स्वीकार करना पड़ा कि आर्किमिडीज़ की प्रतिभा ने सिरैक्यूज़ को अपेक्षा से कहीं अधिक समय तक सुरक्षित रखा। यह घेराबंदी प्राचीन विज्ञान और सैन्य तकनीक के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।

कार्थेजीय सहायता और सिरैक्यूज़ का पतन

213 ईसा पूर्व में हिमिलको के नेतृत्व में कार्थेज ने सिरैक्यूज़ की सहायता के लिए एक विशाल सेना सिसिली भेजी। इस अभियान ने प्रारंभिक सफलता प्राप्त की और अनेक स्थानों पर रोमन प्रभुत्व को चुनौती दी। कई रोमन चौकियाँ नष्ट कर दी गईं तथा कुछ सैनिक टुकड़ियों का संहार कर दिया गया। किंतु परिस्थितियाँ शीघ्र ही बदल गईं। 212 ईसा पूर्व में रोमनों ने रात्रिकालीन आक्रमण कर सिरैक्यूज़ के महत्त्वपूर्ण भागों पर अधिकार कर लिया। इसी दौरान कार्थेजीय सेना महामारी, विशेषकर प्लेग, से बुरी तरह प्रभावित हुई। आवश्यक रसद और सहायता समय पर न पहुँच पाने के कारण सिरैक्यूज़ की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। अंततः उसी वर्ष नगर रोमनों के हाथों में चला गया। इस विजय के दौरान आर्किमिडीज़ की एक रोमन सैनिक द्वारा हत्या कर दी गई।

सिसिली पर रोम का पूर्ण प्रभुत्व

सिरैक्यूज़ के पतन के बाद भी कार्थेज ने सिसिली में संघर्ष जारी रखा। 211 ईसा पूर्व में अतिरिक्त सैनिक भेजे गए और कुछ समय के लिए कार्थेजीय सेना ने आक्रामक रुख अपनाया। तथापि रोम अब द्वीप पर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर चुका था। 210 ईसा पूर्व में रोमन सेना ने कार्थेज के प्रमुख गढ़ एग्रीजेंटम पर आक्रमण किया। नगर के भीतर मौजूद एक असंतुष्ट कार्थेजीय अधिकारी ने विश्वासघात करते हुए इसे रोमनों के हवाले कर दिया। इसके बाद कार्थेज के अधीन अधिकांश नगरों ने या तो आत्मसमर्पण कर दिया अथवा बलपूर्वक अधिग्रहित कर लिए गए। परिणामस्वरूप संपूर्ण सिसिली पर रोम का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो गया और यह द्वीप रोमन सेना के लिए अनाज तथा अन्य आवश्यक संसाधनों का प्रमुख स्रोत बन गया।

हसद्रुबल का इटली अभियान

इटली में हैनिबल की दीर्घकालिक उपस्थिति के बावजूद रोम उसे निर्णायक विजय प्राप्त करने से रोकने में सफल रहा। 207 ईसा पूर्व में कार्थेज ने युद्ध की दिशा बदलने का एक साहसिक प्रयास किया। हैनिबल के भाई हसद्रुबल बारका ने लगभग 35,000 सैनिकों के साथ आल्प्स पर्वत पार कर इटली में प्रवेश किया। उसका उद्देश्य अपने भाई की सेना से मिलकर रोम पर संयुक्त दबाव बनाना था। रोमन नेतृत्व ने इस खतरे को गंभीरता से लिया। दक्षिण में हैनिबल का सामना कर रहे कौंसल क्लॉडियस नीरो ने गुप्त रूप से अपनी सेना का एक बड़ा भाग उत्तर की ओर भेज दिया। वहाँ दूसरे कौंसल मार्कस लिवियस सालिनेटर पहले से ही हसद्रुबल का सामना कर रहे थे। दोनों रोमन सेनाएँ एकजुट होकर निर्णायक युद्ध के लिए तैयार हुईं।

मेटॉरस का निर्णायक युद्ध

207 ईसा पूर्व में मेटॉरस नदी के निकट दोनों पक्षों के बीच निर्णायक संघर्ष हुआ। संयुक्त रोमन सेना ने हसद्रुबल की सेना पर प्रबल आक्रमण किया। युद्ध में कार्थेजीय सेना पूरी तरह पराजित हुई और स्वयं हसद्रुबल भी मारा गया।

इस विजय का प्रभाव अत्यंत दूरगामी था। इससे हैनिबल की अपने भाई से मिलने और इटली में संयुक्त अभियान चलाने की योजना समाप्त हो गई। इतिहासकारों के अनुसार मेटॉरस का युद्ध द्वितीय प्यूनिक युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था, जिसने इटली में रोमन प्रभुत्व को पुनः स्थापित किया और फैबियन रणनीति के सफल परिणाम को स्पष्ट किया।

मैगो का अभियान और उत्तरी इटली की स्थिति

कार्थेज ने 205 ईसा पूर्व में हैनिबल के छोटे भाई मैगो बारका ने स्पेन से बचे हुए सैनिकों के साथ उत्तर-पश्चिमी इटली के जेनुआ में उतरकर नया मोर्चा खोल दिया। वहाँ उसे गॉल और लिगुरियन जनजातियों का समर्थन भी प्राप्त हुआ। मैगो ने पो घाटी की ओर बढ़कर कार्थेज के पारंपरिक सहयोगियों को संगठित करने का प्रयास किया, किंतु रोमन सेना ने उसे निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं करने दी। 203 ईसा पूर्व में इंसुब्रिया के युद्ध में वह पराजित हुआ। इससे उत्तरी इटली में कार्थेज की संभावनाएँ लगभग समाप्त हो गईं।

अफ्रीका पर रोमन आक्रमण और हैनिबल की वापसी

युद्ध का अंतिम चरण तब प्रारंभ हुआ जब 204 ईसा पूर्व में पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो ने उत्तरी अफ्रीका में कार्थेज के मूल क्षेत्र पर आक्रमण किया। उन्होंने लगातार दो बड़ी लड़ाइयों में कार्थेजीय सेनाओं को पराजित किया और न्यूमिडियन शासकों का समर्थन भी प्राप्त कर लिया। अफ्रीका में उत्पन्न संकट ने कार्थेज को इटली से हैनिबल को वापस बुलाने के लिए विवश कर दिया। लगभग पंद्रह वर्षों तक इटली में अभियान चलाने के बाद हैनिबल अपने लगभग 15,000–20,000 अनुभवी सैनिकों के साथ समुद्री मार्ग से कार्थेज लौटा। इसी समय मैगो को भी वापस बुलाया गया, किंतु यात्रा के दौरान घावों के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसके कुछ जहाज रोमनों द्वारा पकड़ लिए गए, यद्यपि उसके अनेक सैनिक सुरक्षित कार्थेज पहुँचने में सफल रहे।

आइबेरिया में रोमन अभियान

द्वितीय प्यूनिक युद्ध का एक अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आइबेरिया था, जहाँ से कार्थेज को धन, सैनिक और संसाधन प्राप्त होते थे। 218 ईसा पूर्व में रोमन बेड़ा मसालिया से आगे बढ़ा और उत्तर-पूर्वी आइबेरिया में सेना उतारी। स्थानीय जनजातियों के समर्थन ने रोमनों को प्रारंभिक बढ़त प्रदान की। उसी वर्ष सिसा के युद्ध में कार्थेजीय सेना का आक्रमण विफल कर दिया गया। इसके बाद 217 ईसा पूर्व में एब्रो नदी के निकट हुए नौसैनिक युद्ध में रोमन और मसालियाई जहाजों ने कार्थेज के बेड़े को गंभीर क्षति पहुँचाई। इस विजय के परिणामस्वरूप एब्रो और पाइरेनीज़ के बीच का क्षेत्र रोम के प्रभाव में आ गया तथा हैनिबल तक सहायता पहुँचाने वाले मार्ग अवरुद्ध हो गए।

हसद्रुबल की चुनौतियाँ

आइबेरिया में कार्थेजीय सेनाओं का नेतृत्व हसद्रुबल बारका कर रहा था। 215 ईसा पूर्व में उसने रोमन प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया, किंतु डर्टोसा के युद्ध (215 ई. पू.) में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। यद्यपि दोनों पक्षों को भारी क्षति पहुँची, फिर भी रोम अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रहा।

बाद के वर्षों में अनेक सेल्टिबेरियन जनजातियाँ रोम के पक्ष में आ गईं। रोमनों ने सगुंटम पर पुनः अधिकार कर लिया और अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में सेल्टिबेरियन भाड़े के सैनिक नियुक्त किए। किंतु 211 ईसा पूर्व में रोमन सेनापतियों ने अपनी सेना को विभाजित करने की गंभीर रणनीतिक भूल की। अलग-अलग मोर्चों पर लड़ी गई लड़ाइयों, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘अपर बेटिस के युद्ध (211 ई. पू.)’ कहा जाता है, में रोमन सेनाएँ पूरी तरह पराजित हो गईं। हसद्रुबल ने रोमन भाड़े के सैनिकों को रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया और रोमनों को एब्रो नदी के उत्तर स्थित अपने तटीय गढ़ों में पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। 210 ईसा पूर्व में अतिरिक्त रोमन सेनाओं के आगमन के बाद ही स्थिति पुनः स्थिर हो सकी।

स्किपियो का आइबेरिया अभियान

210 ईसा पूर्व में रोमन सेनापति पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो अतिरिक्त सैन्य बल के साथ आइबेरिया पहुँचे। उस समय तक रोम को वहाँ अनेक पराजयों का सामना करना पड़ा था, इसलिए स्किपियो का अभियान युद्ध की दिशा बदलने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया। उन्होंने 209 ईसा पूर्व में अत्यंत सुनियोजित और साहसिक रणनीति अपनाते हुए न्यू कार्थेज (वर्तमान कार्टाजेना) पर अचानक आक्रमण किया। यह नगर आइबेरिया में कार्थेज का प्रमुख प्रशासनिक, सैन्य और आर्थिक केंद्र था, किंतु उसकी सुरक्षा अपेक्षाकृत कमजोर थी। रोमन आक्रमण की तीव्रता के कारण नगर शीघ्र ही उनके अधिकार में आ गया।

न्यू कार्थेज की विजय से रोम को अपार लाभ प्राप्त हुआ। स्किपियो के हाथ बड़ी मात्रा में सोना, चाँदी, युद्ध-सामग्री तथा घेराबंदी में प्रयुक्त होने वाले यंत्र लगे। इसके अतिरिक्त उन्होंने कार्थेज द्वारा बंधक बनाए गए अनेक आइबेरियाई प्रमुखों और उनके परिवारों को मुक्त कर दिया, जिन्हें स्थानीय जनजातियों की निष्ठा बनाए रखने के लिए बंदी बनाकर रखा गया था। स्किपियो ने उदार नीति अपनाते हुए सामान्य नागरिकों को भी स्वतंत्र कर दिया, जिससे वे स्थानीय जनता का विश्वास जीतना चाहते थे। यद्यपि उनकी इस नीति का तत्काल सकारात्मक प्रभाव पड़ा, फिर भी अनेक आइबेरियाई जनजातियाँ बाद में पुनः रोम के विरुद्ध संघर्ष में शामिल हो गईं।

बैकुला का युद्ध

208 ईसा पूर्व के वसंत में कार्थेज के सेनानायक हसद्रुबल बारका ने स्किपियो को रोकने के उद्देश्य से बैकुला के युद्ध में उनका सामना किया। इस संघर्ष में रोमन सेना ने विजय प्राप्त की, किंतु यह सफलता पूर्णतः निर्णायक सिद्ध नहीं हुई। हसद्रुबल अपनी अधिकांश अनुभवी सेना को सुरक्षित निकालने में सफल रहा और उसने रोमनों को प्रभावी ढंग से पीछा करने का अवसर नहीं दिया। युद्ध में उसकी सबसे अधिक क्षति उसके आइबेरियाई सहयोगियों को हुई, जबकि मुख्य कार्थेजीय सैन्य बल सुरक्षित रहा।

युद्ध के बाद हसद्रुबल ने अपनी शेष सेना के साथ पाइरेनीज़ पर्वत के पश्चिमी दर्रों को पार कर गॉल की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उसने बड़ी संख्या में सैनिक भर्ती किए और अपने भाई हैनिबल से मिलने के उद्देश्य से आल्प्स पार करके इटली पहुँचा। यद्यपि यह योजना अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थी, किंतु 207 ईसा पूर्व में मेटॉरस के युद्ध में उसकी सेना पराजित हुई और स्वयं हसद्रुबल युद्धभूमि में मारा गया। इस घटना ने इटली में कार्थेज की संयुक्त सैन्य रणनीति को निर्णायक रूप से विफल कर दिया।

इलिपा का निर्णायक युद्ध

206 ईसा पूर्व में स्किपियो ने इलिपा के युद्ध में अपनी उत्कृष्ट सैन्य प्रतिभा का परिचय दिया। लगभग 48,000 सैनिकों वाली रोमन सेना, जिसमें इटली और आइबेरिया दोनों के सैनिक शामिल थे, ने 54,500 सैनिकों तथा 32 युद्ध-हाथियों से सुसज्जित कार्थेजीय सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस विजय ने आइबेरिया में कार्थेज की राजनीतिक और सैन्य शक्ति की रीढ़ तोड़ दी तथा वहाँ रोमन प्रभुत्व लगभग सुनिश्चित हो गया।

इलिपा की हार के बाद कार्थेज का अंतिम प्रमुख गढ़ गैडेस (कैडिज़) भी रोम के पक्ष में चला गया। इसी वर्ष रोमन सेना के कुछ सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जिसे कुछ असंतुष्ट आइबेरियाई नेताओं का समर्थन प्राप्त था। उनका मानना था कि कार्थेज को पराजित करने के बाद रोमन सेनाओं को प्रायद्वीप छोड़ देना चाहिए था। स्किपियो ने दृढ़ नेतृत्व और प्रभावी सैन्य कार्रवाई के माध्यम से इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया। 205 ईसा पूर्व में मैगो बारका ने न्यू कार्थेज को पुनः प्राप्त करने का अंतिम प्रयास किया, किंतु वह असफल रहा और अपनी शेष सेना के साथ सिसाल्पाइन गॉल की ओर लौट गया। यद्यपि 203 ईसा पूर्व तक कार्थेज कुछ भाड़े के सैनिक आइबेरिया से भर्ती करने में सफल रहा, फिर भी उस क्षेत्र में उसकी वास्तविक शक्ति समाप्त हो चुकी थी और रोम का प्रभुत्व स्थापित हो गया था।

अफ्रीका में शक्ति-संतुलन

द्वितीय प्यूनिक युद्ध के अंतिम चरण में उत्तर अफ्रीका की राजनीतिक परिस्थितियाँ तीव्र गति से परिवर्तित होने लगीं। इस क्षेत्र में न्यूमिडिया के विभिन्न जनजातीय राज्यों का विशेष प्रभाव था, जिनमें राजा सिफ़ैक्स और राजकुमार मैसिनिसा  प्रमुख थे। प्रारंभ में मैसिनिसा कार्थेज का सहयोगी था, जबकि सिफ़ैक्स ने रोम से मैत्री स्थापित की। 213 ईसा पूर्व के आसपास रोम ने सिफ़ैक्स के साथ संबंध सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सैन्य सलाहकार भेजे, जिन्होंने उसकी सेना को रोमन पद्धति के अनुसार प्रशिक्षित किया। इसके बाद सिफ़ैक्स ने कार्थेज के सहयोगी तथा पूर्वी न्यूमिडिया के शासक गाला के विरुद्ध अभियान प्रारंभ किया। यद्यपि बाद के वर्षों में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहीं, फिर भी न्यूमिडियाई राज्यों की प्रतिद्वंद्विता ने रोम और कार्थेज दोनों के लिए सामरिक महत्त्व प्राप्त कर लिया।

206 ईसा पूर्व में कार्थेज ने सिफ़ैक्स के साथ संधि कर न्यूमिडिया के विभिन्न क्षेत्रों का पुनर्विभाजन किया। इस समझौते के कारण मैसिनिसा अपने उत्तराधिकार और प्रभाव से वंचित हो गया। परिणामस्वरूप उसने कार्थेज का साथ छोड़कर रोम से गठबंधन कर लिया। यह परिवर्तन द्वितीय प्यूनिक युद्ध की निर्णायक घटनाओं में से एक सिद्ध हुआ, क्योंकि मैसिनिसा की घुड़सवार सेना बाद में रोमन विजय का प्रमुख आधार बनी। न्यूमिडिया की राजनीति में हुए इस परिवर्तन ने कार्थेज को एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी से वंचित कर दिया और रोम को उत्तर अफ्रीका में एक विश्वसनीय सैन्य साथी प्राप्त हो गया।

स्किपियो का अफ्रीका अभियान (204–202 ई. पू.)

205 ईसा पूर्व में रोमन सीनेट ने पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो को सिसिली में सेना का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया तथा उसे अफ्रीका पर आक्रमण की अपनी योजना को कार्यान्वित करने की अनुमति प्रदान की। स्किपियो का विश्वास था कि यदि युद्ध को निर्णायक रूप से समाप्त करना है तो कार्थेज के मूल क्षेत्र पर आक्रमण करना आवश्यक होगा। उसने व्यापक स्तर पर सैन्य तैयारियाँ कीं। सैनिकों को कठोर प्रशिक्षण दिया गया, युद्ध सामग्री का विशाल भंडार एकत्र किया गया तथा सिसिली, सार्डिनिया और दक्षिणी इटली में खाद्यान्न एवं रसद की ऐसी व्यवस्था की गई कि सेना को अभियान के दौरान आपूर्ति संबंधी कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। यह सुव्यवस्थित रसद व्यवस्था रोमन सैन्य संगठन की एक उल्लेखनीय उपलब्धि थी।

204 ईसा पूर्व में स्किपियो अपनी सेना के साथ अफ्रीका के तट पर उतरा। उसके पहुँचते ही मैसिनिसा अपनी घुड़सवार सेना सहित रोमन शिविर में आ मिला। न्यूमिडियाई अश्वारोही सेना अपनी गति, अनुशासन और युद्ध-कौशल के लिए प्रसिद्ध थी, जिससे रोमन सेना की शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रोमन जहाज आवश्यक सामग्री उतारने के बाद पुनः सिसिली लौट गए, जबकि स्किपियो ने अफ्रीका में स्थायी रसद केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई। अगले दो वर्षों में उसने क्रमशः कार्थेज की दो बड़ी सेनाओं को पराजित कर उनकी सामरिक शक्ति को गंभीर रूप से क्षीण कर दिया।

203 ईसा पूर्व में महान मैदान के युद्ध में रोमन सेना ने कार्थेज और उसके सहयोगियों को निर्णायक रूप से पराजित किया। इसके बाद मैसिनिसा ने सिफ़ैक्स का पीछा करते हुए न्यूमिडिया की राजधानी सिर्टा के समीप उसे बंदी बना लिया। रोमन सहायता से मैसिनिसा ने सिफ़ैक्स के अधिकांश राज्य पर अधिकार कर लिया और शीघ्र ही संपूर्ण न्यूमिडिया का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बन गया। इस प्रकार रोम को उत्तर अफ्रीका में एक स्थायी और विश्वसनीय सहयोगी प्राप्त हो गया।

शांति-वार्ता और हैनिबल की वापसी

अफ्रीका में लगातार पराजयों के कारण कार्थेज ने रोम के साथ शांति-वार्ता प्रारंभ की। साथ ही उसने इटली में लगभग सोलह वर्षों तक अभियान चलाने वाले अपने महान सेनानायक हैनिबल को तत्काल स्वदेश लौटने का आदेश दिया। रोमन सीनेट ने प्रारंभिक शांति-प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया था, किंतु कार्थेज में यह विश्वास प्रबल हो गया कि हैनिबल की वापसी से युद्ध की दिशा बदली जा सकती है। परिणामस्वरूप कार्थेज ने संधि को अस्वीकार कर संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया।

हैनिबल अफ्रीका पहुँचने पर अपने साथ इटली से लौटे अनुभवी सैनिकों तथा नई भर्ती की गई अफ्रीकी सेना को संगठित करने में सफल हुआ। यद्यपि उसकी पैदल सेना अभी भी सुदृढ़ थी, किंतु न्यूमिडिया के रोम समर्थक हो जाने के कारण उसकी घुड़सवार सेना पहले की तुलना में बहुत कमजोर हो चुकी थी। दूसरी ओर स्किपियो के पास रोमन लीजन के अतिरिक्त मैसिनिसा की उत्कृष्ट अश्वारोही सेना भी उपलब्ध थी, जिसने आगे चलकर निर्णायक भूमिका निभाई।

ज़ामा का निर्णायक युद्ध (202 ई. पू.)

अक्टूबर 202 ईसा पूर्व में ज़ामा के मैदान में प्राचीन इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण युद्धों में से एक लड़ा गया। इस युद्ध में पहली बार परिस्थितियाँ उलट चुकी थीं। पहले के अधिकांश प्यूनिक युद्धों में कार्थेज की घुड़सवार सेना रोम पर भारी पड़ती थी, किंतु ज़ामा में रोमन पक्ष के पास अधिक प्रभावी अश्वारोही शक्ति थी, जबकि कार्थेज की मुख्य शक्ति उसकी पैदल सेना थी।

युद्ध के प्रारंभ में हैनिबल ने लगभग अस्सी युद्ध-हाथियों का प्रयोग कर रोमन पंक्तियों को तोड़ने का प्रयास किया। स्किपियो ने अपनी सेना को इस प्रकार व्यवस्थित किया कि हाथियों के लिए मार्ग छोड़ दिया गया और तुरहियों तथा अनुशासित सैन्य गठन के कारण अधिकांश हाथी आतंकित होकर लौट पड़े। अनेक हाथियों ने कार्थेज की अपनी ही सेना में अव्यवस्था फैला दी। इसके बाद रोमन तथा न्यूमिडियाई घुड़सवार सेना ने कार्थेज की अश्वारोही सेना को युद्धक्षेत्र से खदेड़ दिया। दोनों पक्षों की पैदल सेनाओं के बीच लंबे समय तक भीषण संघर्ष चलता रहा, किंतु निर्णायक क्षण तब आया जब विजयी रोमन घुड़सवार सेना पीछे से लौटकर कार्थेज की पैदल सेना पर टूट पड़ी। इस दोहरे आक्रमण ने कार्थेज की सेना को चारों ओर से घेर लिया और उसका संगठन पूरी तरह नष्ट हो गया। हैनिबल कुछ गिने-चुने सैनिकों के साथ युद्धभूमि से निकलने में सफल रहा, किंतु उसकी सेना का अधिकांश भाग नष्ट हो गया।

शांति संधि और युद्ध के परिणाम

ज़ामा की पराजय के पश्चात कार्थेज के पास शांति स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। 201 ईसा पूर्व में संपन्न संधि के अनुसार कार्थेज को अपने सभी विदेशी उपनिवेश तथा कुछ अफ्रीकी प्रदेश रोम को सौंपने पड़े। उस पर 10,000 रजत टैलेंट का भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति कर लगाया गया, जिसे पचास वर्षों में चुकाना था। कार्थेज को युद्ध-हाथी रखने से वंचित कर दिया गया और उसके नौसैनिक बेड़े को केवल दस युद्धपोतों तक सीमित कर दिया गया। उसे रोम की अनुमति के बिना अफ्रीका के बाहर किसी भी प्रकार का युद्ध करने तथा अफ्रीका के भीतर भी सैन्य अभियान चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यद्यपि कार्थेज के कुछ नेताओं ने इन कठोर शर्तों का विरोध किया, फिर भी हैनिबल ने राज्य के अस्तित्व की रक्षा के लिए इन्हें स्वीकार करने का समर्थन किया। परिणामस्वरूप 201 ईसा पूर्व में यह संधि लागू हुई और कार्थेज व्यावहारिक रूप से रोम का अधीनस्थ राज्य बन गया। इस महान विजय के उपलक्ष्य में स्किपियो को रोमन परंपरा के अनुसार ‘ट्रायम्फ’ का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया तथा उसे ‘अफ्रीकानस’ की उपाधि से अलंकृत किया गया।

अंतरयुद्ध काल (201–149 ई. पू.)

द्वितीय प्यूनिक युद्ध की समाप्ति के पश्चात उत्तर अफ्रीका में मैसिनिसा सबसे शक्तिशाली शासक बनकर उभरा। अगले लगभग अड़तालीस वर्षों तक उसने कार्थेज की सैन्य दुर्बलता का लाभ उठाते हुए उसके सीमावर्ती प्रदेशों पर क्रमशः अधिकार करना प्रारंभ किया। जब भी कार्थेज ने रोम से न्याय या सैन्य हस्तक्षेप की अनुमति माँगी, रोमन सीनेट ने अपने सहयोगी मैसिनिसा का ही समर्थन किया। परिणामस्वरूप कार्थेज निरंतर अपने प्रदेश खोता गया। अंततः 151 ईसा पूर्व में कार्थेज ने संधि की शर्तों का उल्लंघन करते हुए मैसिनिसा के विरुद्ध सेना भेजी, किंतु ओरोस्कोपा के युद्ध में उसे विनाशकारी पराजय का सामना करना पड़ा और उसकी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया।

यद्यपि इस समय तक कार्थेज युद्ध-क्षतिपूर्ति का अधिकांश भाग दे चुका था और आर्थिक दृष्टि से पुनः समृद्ध हो रहा था, फिर भी रोम के अनेक प्रभावशाली नेता, विशेषकर कैटो द एल्डर उसके अस्तित्व को भविष्य के संभावित खतरे के रूप में देखते थे। मैसिनिसा के विरुद्ध सैन्य अभियान को शांति संधि का उल्लंघन घोषित करते हुए रोमन सीनेट ने इसे युद्ध का वैध आधार बनाया और 149 ईसा पूर्व में कार्थेज के विरुद्ध तृतीय प्यूनिक युद्ध की घोषणा कर दी।

तृतीय प्यूनिक युद्ध (149–146 ई. पू.)

द्वितीय प्यूनिक युद्ध की समाप्ति के बाद कार्थेज ने शांति संधि की शर्तों का पालन करते हुए अपनी सैन्य शक्ति को सीमित कर लिया था, किंतु आर्थिक दृष्टि से वह पुनः समृद्ध होने लगा। उसकी बढ़ती समृद्धि और उत्तर अफ्रीका में राजनीतिक प्रभाव से रोम के अनेक नेता, विशेषकर कैटो द एल्डर चिंतित थे। उनके निरंतर आग्रह के परिणामस्वरूप रोमन सीनेट ने अंततः कार्थेज के विरुद्ध युद्ध का निर्णय लिया। 149 ईसा पूर्व में लगभग 50,000 सैनिकों की एक विशाल रोमन सेना, दोनों कौंसलों के संयुक्त नेतृत्व में कार्थेज से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर स्थित यूटिका के समीप उतरी। रोम ने युद्ध टालने की शर्त के रूप में कार्थेज से उसके समस्त हथियार और युद्ध सामग्री सौंपने की माँग की। कार्थेज ने संघर्ष से बचने के उद्देश्य से लगभग 2,00,000 कवच, 2,000 कैटापल्ट तथा बड़ी संख्या में युद्धपोत रोम को सौंप दिए। इसके बाद भी रोमन सीनेट ने एक और कठोर शर्त रखी कि कार्थेज के नागरिक अपने नगर को खाली कर उसे नष्ट कर दें तथा समुद्र से कम-से-कम 16 किलोमीटर दूर जाकर नया नगर बसाएँ। यह प्रस्ताव कार्थेज के अस्तित्व पर प्रत्यक्ष आघात था। फलतः कार्थेज ने वार्ता समाप्त कर दी और अपने सीमित संसाधनों के बावजूद पुनः हथियार निर्माण तथा युद्ध की तैयारियाँ प्रारंभ कर दीं।

प्यूनिक युद्ध (Punic Wars)
तृतीय प्यूनिक युद्ध (149–146 ई. पू.)
कार्थेज की घेराबंदी

युद्ध की औपचारिक शुरुआत के साथ ही रोमन सेना ने कार्थेज की घेराबंदी कर दी। नगर की सुरक्षा अत्यंत सुदृढ़ थी तथा उसकी विशाल प्राचीरें भूमध्यसागरीय विश्व की सबसे शक्तिशाली रक्षा व्यवस्थाओं में से एक थीं। कार्थेजवासियों ने हसद्रुबल बोएथार्क के नेतृत्व में एक संगठित स्थल-सेना भी तैयार की, जो नगर के दक्षिण में तैनात रही और समय-समय पर रोमन सेना पर आक्रमण करती रही। रोमन सेना ने नगर की दीवारों को भेदने के अनेक प्रयास किए, किंतु प्रारंभिक दो वर्षों तक उसे कोई निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हुई। कार्थेज के सैनिकों और नागरिकों ने असाधारण साहस का परिचय देते हुए निरंतर प्रतिरोध किया तथा रोमन संचार मार्गों पर आक्रमण कर उनकी रसद व्यवस्था को बाधित किया।

148 ईसा पूर्व में कार्थेज के नौसैनिकों ने अग्नि-पोतों का प्रयोग कर रोमन बेड़े के अनेक जहाजों को नष्ट कर दिया। दूसरी ओर रोमन सेना का मुख्य शिविर दलदली क्षेत्र में स्थित होने के कारण वहाँ महामारी और बीमारियाँ फैल गईं, जिससे उनकी सैन्य क्षमता प्रभावित हुई। इन परिस्थितियों में रोमनों को अपना शिविर तथा नौसैनिक अड्डा स्थानांतरित करना पड़ा और उन्होंने पूर्ण घेराबंदी के स्थान पर नगर की नाकेबंदी की नीति अपनाई। इसके बावजूद कार्थेज ने अपने सीमित संसाधनों के सहारे संघर्ष जारी रखा और नगर की रक्षा को बनाए रखा।

स्किपियो एमिलियानस का नेतृत्व

147 ईसा पूर्व में परिस्थितियाँ तब बदलीं जब स्किपियो एमिलियानस, जो प्रसिद्ध विजेता स्किपियो अफ्रीकानस के दत्तक पौत्र थे, रोमन कौंसल निर्वाचित हुए और उन्हें युद्ध का सर्वोच्च नेतृत्व सौंपा गया। स्किपियो ने पहले के असफल अभियानों से शिक्षा लेते हुए रोमन सेना का पुनर्गठन किया तथा घेराबंदी को अधिक संगठित और कठोर बना दिया। इसी बीच कार्थेजवासियों ने नए युद्धपोतों का निर्माण किया और रोमन नौसेना के विरुद्ध दो बार समुद्री संघर्ष किए, किंतु दोनों अवसरों पर उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

रोमन सेना ने नगर की दीवारों पर कई बार आक्रमण किया। एक अवसर पर वे नगर के भीतर प्रवेश करने में सफल भी हुए, किंतु भीषण प्रतिरोध और अंधकार के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। इसके पश्चात हसद्रुबल अपनी सेना सहित नगर के भीतर लौट आया और रक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया। उसने रोमन बंदियों को नगर की प्राचीरों पर यातनाएँ देकर मृत्युदंड दिलवाया, जिससे नागरिकों में युद्ध की भावना को और उग्र बनाया जा सके। जब नगर परिषद के कुछ सदस्यों ने उसके इस अमानवीय व्यवहार का विरोध किया, तब हसद्रुबल ने उन्हें भी मृत्युदंड दिलाकर सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर ली। इस समय तक कार्थेज की बाहरी सेना लगभग समाप्त हो चुकी थी, जिसके परिणामस्वरूप अनेक अधीनस्थ नगरों ने रोम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

कार्थेज का पतन

स्किपियो एमिलियानस ने नगर की समुद्री आपूर्ति पूर्णतः रोकने के लिए बंदरगाह के सामने एक विशाल बाँध का निर्माण कराया, जिससे कार्थेज बाहरी सहायता से कट गया। 146 ईसा पूर्व के वसंत में रोमन सेना बंदरगाह के समीप स्थित किलेबंदी पर अधिकार करने में सफल हुई और शीघ्र ही नगर के मुख्य भाग में प्रवेश कर गई। इसके बाद छह दिनों तक भीषण सड़क-युद्ध चला। रोमन सैनिक घर-घर लड़ते हुए आगे बढ़े, मार्ग में आने वाले प्रत्येक प्रतिरोध का निर्ममता से दमन किया तथा अनेक भवनों में आग लगा दी। कई स्थानों पर सैनिक छतों के ऊपर से आगे बढ़े ताकि संकरी गलियों में होने वाले आक्रमणों से बचा जा सके।

अंतिम चरण में कार्थेज के शेष रक्षक, जिनमें रोमन सेना से भागे हुए सैनिक भी सम्मिलित थे, एश्मौन का मंदिर में एकत्र होकर अंतिम समय तक युद्ध करते रहे। जब उन्हें विजय की कोई संभावना दिखाई नहीं दी, तब अनेक लोगों ने आत्मसमर्पण के स्थान पर मंदिर में ही अग्नि प्रज्वलित कर आत्मोत्सर्ग कर दिया। लगभग 50,000 जीवित बचे नागरिकों को बंदी बनाकर दास के रूप में बेच दिया गया। नगर को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त कर दिया गया और कार्थेज का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया। प्रचलित कथा के विपरीत रोमन सेना द्वारा कार्थेज की भूमि पर नमक बिखेरने का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है; आधुनिक इतिहासकार इसे उन्नीसवीं शताब्दी में प्रचलित हुई एक किंवदंती मानते हैं।

कार्थेज के पतन के बाद की घटनाएँ

146 ईसा पूर्व में तृतीय प्यूनिक युद्ध की समाप्ति के पश्चात रोम ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि कार्थेज पुनः एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभर न सके। इसी उद्देश्य से रोमन सीनेट ने एक विशेष आयोग नियुक्त किया, जिसने विजेता सेनापति स्किपियो एमिलियानस के निर्देशन में नगर के शेष भागों को भी ध्वस्त कराया। कार्थेज की भूमि को रोमन राज्य की सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर दिया गया तथा उसके अधीनस्थ समस्त क्षेत्रों को मिलाकर ‘अफ्रीका’ नामक रोमन प्रांत की स्थापना की गई, जिसकी राजधानी यूटिका बनाई गई। यह प्रांत शीघ्र ही रोम के लिए अनाज, जैतून के तेल तथा अन्य कृषि उत्पादों का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गया। उत्तरी अफ्रीका के अनेक पूर्व प्यूनिक नगरों को रोमन शासन के अधीन कर लिया गया, किंतु स्थानीय प्रशासन, सामाजिक परंपराओं तथा सांस्कृतिक जीवन में अपेक्षाकृत कम हस्तक्षेप किया गया। परिणामस्वरूप प्यूनिक भाषा, धर्म और सांस्कृतिक परंपराएँ लंबे समय तक जीवित रहीं। आधुनिक इतिहासकार इस सांस्कृतिक निरंतरता को ‘नियो-प्यूनिक सभ्यता’ के नाम से अभिहित करते हैं।

कार्थेज का पुनर्निर्माण

कार्थेज के विनाश के लगभग एक शताब्दी बाद उसके ऐतिहासिक महत्त्व और सामरिक स्थिति को देखते हुए जूलियस सीज़र ने वहाँ एक नए रोमन उपनिवेश की स्थापना की योजना बनाई, जिसे बाद में ऑगस्टस के शासनकाल में पूर्ण रूप से विकसित किया गया। रोमन साम्राज्य के काल में यह नगर रोमन अफ्रीका के सबसे समृद्ध और महत्त्वपूर्ण नगरों में सम्मिलित हो गया तथा व्यापार, प्रशासन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। कार्थेज के प्राचीन अवशेष ट्यूनीशिया की राजधानी ट्यूनिस से लगभग 24 किलोमीटर पूर्व से मिले हैं, जो विश्व की महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक धरोहर हैं। 1985 में रोम और कार्थेज (ट्यूनिस) के महापौरों ने शांति और मैत्री का एक प्रतीकात्मक समझौता कर प्राचीन शत्रुता के स्थान पर सहयोग और सद्भाव का संदेश दिया।

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