गेयस वैलेरियस डायोक्लेटियन (डायोक्लीज़)
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
गेयस वैलेरियस डायोक्लेटियन, जिन्हें प्रारंभ में डायोक्लीज़ के नाम से जाना जाता था, का जन्म लगभग 242–245 ईस्वी के बीच रोमन प्रांत डेलमेटिया में हुआ था। उनका जन्म संभवतः सलोना नगर के निकट हुआ था। उनके परिवार की सामाजिक स्थिति सामान्य थी। उनके पिता के संबंध में विभिन्न मत मिलते हैं; कुछ स्रोत उन्हें लिपिक बताते हैं, जबकि कुछ के अनुसार वे किसी सीनेटर के मुक्तदास थे। डायोक्लेटियन के जीवन के प्रारंभिक चालीस वर्षों के संबंध में बहुत कम निश्चित जानकारी उपलब्ध है।
डायोक्लेटियन ने एक सैनिक के रूप में अपना जीवन आरंभ किया और ऑरेलियन तथा प्रोबस के अधीन सेवा की। उनकी सैन्य प्रतिभा के कारण उन्हें क्रमशः उच्च पद प्राप्त होते गए। 282 ईस्वी में सम्राट कारस ने उन्हें प्रेटेक्टोरेस डोमेस्टिकी नामक विशिष्ट घुड़सवार सेना का सेनापति नियुक्त किया। 283 ईस्वी में उन्हें कौंसल का सम्मान भी प्राप्त हुआ। फारस के विरुद्ध अभियान के दौरान सम्राट कारस की मृत्यु हो गई और उनके पुत्र न्यूमेरियन तथा कैरिनस ने सत्ता संभाली। न्यूमेरियन पूर्व में सेना के साथ लौट रहे थे। नवंबर 284 ईस्वी में निकोमीडिया के निकट उनकी हत्या का पता चला। सेना के सेनापतियों और अधिकारियों ने उत्तराधिकारी चुनने के लिए सभा की और डायोक्लीज़ को सम्राट घोषित किया। उन्होंने न्यूमेरियन की हत्या के लिए प्रीफेक्ट एपर को जिम्मेदार ठहराया और उसके बाद अपना नाम बदलकर गेयस वैलेरियस डायोक्लेटियनस रख लिया।
कैरिनस से संघर्ष
डायोक्लेटियन के सम्राट बनने के बाद उनका मुख्य प्रतिद्वंद्वी कैरिनस था, जो पश्चिमी साम्राज्य पर शासन कर रहा था। दोनों के बीच निर्णायक संघर्ष मार्गस नदी के निकट हुआ। कैरिनस की सेना अधिक शक्तिशाली थी, किंतु उसके शासन से असंतोष व्याप्त था। युद्ध के दौरान उसके कुछ प्रमुख अधिकारी भी डायोक्लेटियन के पक्ष में चले गए। अंततः कैरिनस अपने ही सैनिकों द्वारा मारा गया और डायोक्लेटियन को पूर्व तथा पश्चिम दोनों की सेनाओं ने सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया। इस विजय के बाद डायोक्लेटियन ने उन अधिकारियों को भी अपने पदों पर बनाए रखा जिन्होंने कैरिनस के अधीन कार्य किया था। इससे उन्होंने राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने और रोमन सीनेट तथा प्रशासनिक वर्ग का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।
मैक्सिमियन के साथ सह-शासन
डायोक्लेटियन ने शीघ्र ही अनुभव किया कि विशाल रोमन साम्राज्य की समस्याओं का सामना अकेले करना कठिन था। इसलिए उन्होंने अपने विश्वस्त सैन्य अधिकारी मैक्सिमियन को सह-शासक बनाया। प्रारंभ में मैक्सिमियन को सीज़र और बाद में 1 अप्रैल 286 ईस्वी को ऑगस्टस की उपाधि प्रदान की गई। डायोक्लेटियन ने पूर्वी क्षेत्रों की जिम्मेदारी अपने हाथ में रखी, जबकि मैक्सिमियन को पश्चिमी क्षेत्रों की देखरेख सौंपी गई। दोनों शासकों ने अपने नामों में एक-दूसरे के पारिवारिक नामों को सम्मिलित करके एक कृत्रिम पारिवारिक संबंध भी स्थापित किया। लगभग 287 ईस्वी में डायोक्लेटियन ने जोवियस और मैक्सिमियन ने हरक्यूलियस की उपाधि धारण की। इन उपाधियों के माध्यम से दोनों शासकों को रोमन देवताओं से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा गया। इससे सम्राटों की सत्ता को केवल सैन्य शक्ति के बजाय धार्मिक वैधता भी प्राप्त हुई।
सरमाटियन और फारस के साथ संघर्ष
डायोक्लेटियन के शासन का एक प्रमुख उद्देश्य साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करना था। उन्होंने बाल्कन क्षेत्र में सरमाटियन और अन्य जनजातियों के विरुद्ध कई अभियान चलाए। 285 ईस्वी के बाद सरमाटियन के साथ संघर्ष हुआ और बाद के वर्षों में भी उनके विरुद्ध अभियान जारी रहे। पूर्व में डायोक्लेटियन ने फारस के साथ युद्ध की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी किए। 287 ईस्वी के आसपास फारसी शासक बहराम द्वितीय ने रोमन साम्राज्य के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। इसी अवधि में फारस ने आर्मेनिया पर अपने दावे को सीमित किया और टिगरिस नदी के पश्चिम तथा दक्षिण के क्षेत्रों में रोमन अधिकार को स्वीकार किया। इन घटनाओं के बाद डायोक्लेटियन ने मेसोपोटामिया की सीमा को पुनर्गठित किया और यूफ्रेट्स नदी पर स्थित सिरसियम को सुदृढ़ किया।
मैक्सिमियन और कैरोसियस का विद्रोह
पश्चिम में मैक्सिमियन को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। गॉल में बागाउडे नामक विद्रोही किसानों के आंदोलन को दबाने के बाद मैक्सिमियन ने समुद्री डाकुओं के विरुद्ध अभियान चलाया। इसी दौरान कैरोसियस नामक सैन्य अधिकारी ने ब्रिटेन में अपनी शक्ति स्थापित कर ली और स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। कैरोसियस ने ब्रिटेन तथा उत्तर-पश्चिमी गॉल में अपना प्रभाव बढ़ाया। उसने अपने सिक्कों के माध्यम से स्वयं को डायोक्लेटियन और मैक्सिमियन के साथ वैध शासक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। डायोक्लेटियन ने उसे शाही व्यवस्था में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मैक्सिमियन ने कैरोसियस के विरुद्ध अभियान की तैयारी की और राइन क्षेत्र की जनजातियों के विरुद्ध भी सैन्य अभियान चलाया। इसी समय डायोक्लेटियन और मैक्सिमियन ने अलमानी के विरुद्ध संयुक्त अभियान चलाकर साम्राज्य की सीमाओं को और सुरक्षित किया।
टेट्रार्की की स्थापना
साम्राज्य की विशालता और निरंतर सैन्य चुनौतियों को देखते हुए डायोक्लेटियन ने शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। 293 ईस्वी में उन्होंने मैक्सिमियन के साथ मिलकर टेट्रार्की की व्यवस्था स्थापित की। टेट्रार्की यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ है—चार व्यक्तियों का शासन। इस व्यवस्था के अंतर्गत दो वरिष्ठ सम्राटों को ऑगस्टस और दो कनिष्ठ सम्राटों को सीज़र बनाया गया। मैक्सिमियन के अधीन कॉन्स्टेंटियस और डायोक्लेटियन के अधीन गैलेरियस को सीज़र नियुक्त किया गया। कॉन्स्टेंटियस को गॉल और ब्रिटेन की जिम्मेदारी दी गई, जबकि गैलेरियस को सीरिया, फिलिस्तीन, मिस्र तथा पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्रों का दायित्व सौंपा गया। टेट्रार्की का उद्देश्य साम्राज्य को चार प्रशासनिक और सैन्य क्षेत्रों में विभाजित करके शासन को अधिक प्रभावी बनाना था। प्रत्येक शासक अपने क्षेत्र में प्रशासन, सेना और न्याय व्यवस्था का संचालन करता था, जबकि सभी शासक साम्राज्य की समग्र एकता बनाए रखने के लिए एक-दूसरे से जुड़े रहते थे।
बाल्कन और मिस्र में अभियान
डायोक्लेटियन ने डेन्यूब क्षेत्र में साम्राज्य की सुरक्षा को विशेष महत्व दिया। 294 ईस्वी में उन्होंने सरमाटियन के विरुद्ध सफल अभियान चलाया। इसके बाद डेन्यूब के उत्तर में अनेक किलों और सैन्य प्रतिष्ठानों का निर्माण कराया गया। इस नई रक्षात्मक व्यवस्था को रिपा सरमाटिका कहा गया। 295 और 296 ईस्वी में भी उन्होंने इस क्षेत्र में अभियान जारी रखे तथा 296 ईस्वी में कार्पी पर विजय प्राप्त की। उनके शासन के अंत तक डेन्यूब सीमा को किलों, पुलों, मार्गों और सुदृढ़ नगरों से सुरक्षित कर दिया गया था।
इसी बीच मिस्र में प्रशासनिक सुधारों के कारण असंतोष उत्पन्न हुआ। 297 ईस्वी में डोमिशियस डोमिनियनस ने स्वयं को ऑगस्टस घोषित कर दिया और मिस्र के एक बड़े भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। डायोक्लेटियन स्वयं मिस्र पहुँचे और विद्रोह को दबाने के लिए अभियान चलाया। अलेक्जेंड्रिया की घेराबंदी के बाद विद्रोह समाप्त कर दिया गया। 298 ईस्वी में उनकी विजय के सम्मान में अलेक्जेंड्रिया में एक विजय-स्तंभ स्थापित किया गया। मिस्र में रहते हुए डायोक्लेटियन ने जनगणना और प्रशासनिक पुनर्गठन का कार्य भी कराया। इससे मिस्र की प्रशासनिक व्यवस्था रोमन साम्राज्य की सामान्य व्यवस्था के अधिक निकट आ गई।
फारस के साथ युद्ध
294 ईस्वी में नरसेह सासानी साम्राज्य का शासक बना। 295 या 296 ईस्वी में उसने रोम के विरुद्ध युद्ध आरंभ किया। उसने आर्मेनिया पर आक्रमण किया और 297 ईस्वी में रोमन मेसोपोटामिया में प्रवेश किया। इस संघर्ष में गैलेरियस को प्रारंभिक पराजय मिली। इसके बाद गैलेरियस ने नई सेना संगठित की और आर्मेनिया के मार्ग से उत्तरी मेसोपोटामिया पर आक्रमण किया। कठिन भूगोल का लाभ उठाते हुए उसने नरसेह को निर्णायक रूप से पराजित किया। रोमन सेना ने फारसी शाही शिविर पर अधिकार कर लिया और नरसेह के परिवार तथा राजकोष को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद गैलेरियस ने आगे बढ़कर फारसी राजधानी सीटेसिफॉन पर भी अधिकार कर लिया।
निसिबिस की संधि
298–299 ईस्वी में रोम और फारस के बीच शांति वार्ता हुई। इसके परिणामस्वरूप निसिबिस की संधि हुई। इस संधि से रोमन साम्राज्य को पूर्व में महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामरिक लाभ प्राप्त हुए। आर्मेनिया पुनः रोमन प्रभाव क्षेत्र में आ गया और तिरिडेट्स को अपना सिंहासन वापस मिला। कोकेशियान इबेरिया ने रोमन प्रभुत्व स्वीकार किया। निसिबिस को रोम और फारस के बीच व्यापार का प्रमुख केंद्र बनाया गया। इसके अतिरिक्त टिगरिस और आर्मेनिया के बीच स्थित कई क्षेत्रों पर रोमन प्रभाव स्थापित हुआ। इस संधि ने पूर्वी सीमा को लंबे समय के लिए स्थिर किया और रोमन साम्राज्य को फारसी आक्रमणों से कुछ समय के लिए राहत प्रदान की।
ईसाइयों पर अत्याचार
डायोक्लेटियन पारंपरिक रोमन धार्मिक व्यवस्था के समर्थक थे। 299 ईस्वी के आसपास दरबार में धार्मिक अनुष्ठानों और भविष्यवाणी से संबंधित घटनाओं के बाद ईसाइयों के प्रति कठोर नीति अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ी। गैलेरियस इस नीति का विशेष रूप से समर्थक था। 301–302 ईस्वी में डायोक्लेटियन ने मानी धर्म के विरुद्ध भी कठोर आदेश जारी किए। इसके बाद ईसाइयों के विरुद्ध व्यापक दमन की नीति अपनाई गई। 23 फरवरी 303 ईस्वी को निकोमीडिया में ईसाई उपासना-स्थल को नष्ट करने का आदेश दिया गया। ईसाई धर्मग्रंथों को जलाने और धार्मिक संपत्ति जब्त करने के निर्देश दिए गए। इसके बाद साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में ईसाई पादरियों की गिरफ्तारी तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए दबाव बढ़ाया गया।
यद्यपि इन अत्याचारों का उद्देश्य ईसाई धर्म को समाप्त करना था, किंतु यह नीति सफल नहीं हुई। अनेक ईसाइयों ने अत्याचार सहते हुए अपने धर्म का पालन जारी रखा। 311 ईस्वी में गैलेरियस ने उत्पीड़न समाप्त करने का आदेश जारी किया और स्वीकार किया कि ईसाइयों को पारंपरिक रोमन धर्म में वापस लाने का प्रयास सफल नहीं हुआ।
बीमारी और पदत्याग
303 ईस्वी में डायोक्लेटियन रोम पहुँचे और अपने शासन की बीसवीं वर्षगाँठ तथा टेट्रार्की की दसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर समारोहों में भाग लिया। इसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। 304 ईस्वी में बीमारी के कारण वे सार्वजनिक जीवन से लगभग अलग हो गए। 305 ईस्वी के प्रारंभ में उनकी स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई। अंततः 1 मई 305 ईस्वी को उन्होंने निकोमीडिया के निकट उसी स्थान पर सम्राट पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया जहाँ लगभग दो दशक पहले उन्हें सम्राट घोषित किया गया था। इस प्रकार डायोक्लेटियन रोमन इतिहास के उन विरल सम्राटों में शामिल हो गए जिन्होंने स्वेच्छा से सत्ता का त्याग किया।
अवकाश और मृत्यु
पदत्याग के बाद डायोक्लेटियन डेलमेटिया चले गए और स्पैलाटम के निकट अपने विशाल महल में रहने लगे। यह महल बाद में आधुनिक स्प्लिट नगर के ऐतिहासिक केंद्र का आधार बना। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों का अधिकांश समय महल के उद्यानों में बिताया। 308 ईस्वी में कार्नुंटम में उन्हें पुनः सत्ता में लौटने का अनुरोध किया गया, किंतु उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। वे अपने द्वारा स्थापित व्यवस्था को टूटते हुए देखते रहे। टेट्रार्की धीरे-धीरे उत्तराधिकार संघर्षों और गृहयुद्धों के कारण कमजोर हो गई। डायोक्लेटियन की मृत्यु 311 ईस्वी में हुई; कुछ स्रोत उनकी मृत्यु की तिथि 312 ईस्वी के आसपास बताते हैं। उनकी मृत्यु के समय तक उनके द्वारा स्थापित राजनीतिक व्यवस्था गंभीर संकट में प्रवेश कर चुकी थी।
डायोक्लेटियन के सुधार
प्रशासनिक सुधार
डायोक्लेटियन स्वयं को रोमन साम्राज्य का पुनर्स्थापक मानते थे। उनका उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता स्थापित करना, प्रशासन को केंद्रीकृत करना और साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा करना था। उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था का व्यापक पुनर्गठन किया। नागरिक और सैन्य प्रशासन को अलग किया गया तथा सम्राट के दरबार में विभिन्न विभागों का गठन किया गया। सलाहकार परिषद को अधिक संगठित रूप देकर उसे कंसिस्टोरियम का स्वरूप दिया गया। विभिन्न विभागों में अधिकारियों और सचिवों की नियुक्ति की गई, जो याचिकाओं, पत्रों, कानूनी मामलों और विदेशी दूतावासों से संबंधित कार्य करते थे। उन्होंने प्रेटोरियन प्रीफेक्ट की भूमिका को भी पुनर्गठित किया। उसकी सैन्य शक्ति सीमित कर दी गई, जबकि नागरिक प्रशासन, कर व्यवस्था और न्यायिक कार्यों में उसका महत्व बना रहा।
प्रांतीय पुनर्गठन
डायोक्लेटियन ने प्रांतों की संख्या लगभग दोगुनी कर दी। छोटे-छोटे प्रांत बनाए गए ताकि प्रशासन अधिक प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सके और कर तथा संसाधनों का संग्रह आसान हो। प्रांतों को डायोसीज़ों में विभाजित किया गया। प्रत्येक डायोसीज़ का प्रशासन एक विकेरियस के हाथों में रखा गया। इस व्यवस्था से केंद्रीय सत्ता को प्रांतीय प्रशासन पर अधिक नियंत्रण प्राप्त हुआ। सैन्य और नागरिक अधिकारों को अलग करना इस सुधार की प्रमुख विशेषता थी। गवर्नरों को मुख्यतः न्याय और कर-संग्रह की जिम्मेदारी दी गई, जबकि सैन्य कमान ड्यूक्स नामक अधिकारियों के हाथों में दी गई।
नागरिक सेवा और सेना
डायोक्लेटियन के शासन में प्रशासनिक अधिकारियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने के लिए एक विस्तृत नागरिक सेवा का निर्माण किया गया। प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ सैन्य अधिकारियों की व्यवस्था को भी अधिक संगठित किया गया। इससे केंद्रीय सरकार की पहुँच साम्राज्य के दूर-दराज के क्षेत्रों तक बढ़ी। हालांकि इस विस्तृत प्रशासन और बड़ी सेना के कारण राज्य के खर्च में भी वृद्धि हुई, जिसके लिए कर व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन आवश्यक हुआ।
कर सुधार
डायोक्लेटियन के शासन में कर व्यवस्था को अधिक नियमित और मानकीकृत किया गया। विभिन्न प्रांतों में कर-संग्रह की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया गया और राज्य की बढ़ती सैन्य तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राजस्व में वृद्धि की गई। कर सुधारों के कारण सरकार को स्थायी सेना, प्रशासन और निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध हुए। हालांकि इन सुधारों से कई क्षेत्रों में कर का बोझ भी बढ़ा और कुछ स्थानों पर असंतोष उत्पन्न हुआ।
मूल्य नियंत्रण
301 ईस्वी में डायोक्लेटियन ने अधिकतम मूल्यों से संबंधित एक आदेश जारी किया। इसका उद्देश्य बढ़ती महँगाई को नियंत्रित करना था। आदेश में विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के अधिकतम मूल्य निर्धारित किए गए। यद्यपि यह प्रयास व्यवहार में सफल नहीं हुआ। बाजार की वास्तविक परिस्थितियों और वस्तुओं की उपलब्धता के कारण निर्धारित मूल्य लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सके और इस व्यवस्था की व्यापक रूप से उपेक्षा की गई।
कानूनी सुधार
डायोक्लेटियन के शासनकाल में कानूनी मामलों का महत्व बहुत बढ़ गया। सम्राट बड़ी संख्या में याचिकाओं और अपीलों पर निर्णय देते थे। उनके नाम से जारी किए गए अनेक आदेश और पुनर्लेख सुरक्षित हैं। इसी अवधि में ग्रेगोरियस और हर्मोजेनियनस ने सम्राटों द्वारा जारी किए गए पुनर्लेखों का संकलन किया। कोडेक्स ग्रेगोरियनस में 292 ईस्वी तक के अनेक पुनर्लेख संकलित किए गए, जबकि कोडेक्स हर्मोजेनियनस ने बाद के आदेशों को भी संग्रहित किया। डायोक्लेटियन के प्रांतीय सुधारों के बाद प्रांतीय गवर्नरों को न्यायिक कार्यों में अधिक स्पष्ट जिम्मेदारियाँ दी गईं। नागरिकों को उच्च अधिकारियों और अंततः सम्राट के समक्ष अपील करने का अधिकार प्राप्त रहा।
सैन्य और सीमा सुरक्षा
डायोक्लेटियन ने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए व्यापक सैन्य और निर्माण कार्यक्रम चलाए। डेन्यूब, राइन, मेसोपोटामिया और अरब सीमा क्षेत्रों में किले, सड़कें, पुल और अन्य सैन्य प्रतिष्ठान बनाए गए। उन्होंने सेना को अधिक संगठित किया और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों की स्थायी उपस्थिति बढ़ाई। सैन्य कमान को नागरिक प्रशासन से अलग करने से सेना के संचालन में अधिक स्पष्टता आई। इन सुधारों और अभियानों ने तीसरी सदी के संकट से कमजोर हुए रोमन साम्राज्य को पुनः स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डायोक्लेटियन की व्यवस्था उनके जीवनकाल के बाद राजनीतिक संघर्षों के कारण कमजोर अवश्य हुई, किंतु उनके प्रशासनिक, सैन्य और आर्थिक सुधारों ने बाद के रोमन साम्राज्य की संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला।


