ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (29 सितंबर 106 ई.पू. – 28 सितंबर 48 ई.पू.)
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (29 सितंबर 106 ई.पू. – 28 सितंबर 48 ई.पू.), जिन्हें सामान्यतः पॉम्पे महान (Pompey the Great) के नाम से जाना जाता है, रोमन गणराज्य के अंतिम काल के सबसे प्रभावशाली सेनापतियों और राजनेताओं में से एक था। उसने उस समय रोमन राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई, जब गणराज्य गृहयुद्धों, सत्ता-संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। अपने प्रारंभिक जीवन में वह तानाशाह लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला का समर्थक रहा और उसके नेतृत्व में अनेक सैन्य अभियानों में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं। सुल्ला की मृत्यु के बाद भी उसने अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा और राजनीतिक कौशल के बल पर रोमन राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखा।
पॉम्पे प्रथम ट्रायमविर (60–53 ई.पू.) के तीन सदस्यों में से एक था। प्रारंभ में वह जूलियस सीज़र का सहयोगी था, किंतु बाद में उसका सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गया। अफ्रीका में उसके सैनिकों ने उसे सबसे पहले ‘मैग्नस’ (महान) की उपाधि दी, जिसे उसने 81 ई.पू. के बाद अपने आधिकारिक उपनाम के रूप में अपना लिया। सीनेटर वर्ग के एक प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण उसने कम आयु में ही सैन्य जीवन आरंभ किया था। 83–81 ई.पू. के गृहयुद्ध में सुल्ला के प्रमुख सेनानायक के रूप में उसकी विजयों ने उसेअपार प्रसिद्धि दिलाई। उसकी असाधारण सफलताओं के कारण उसे पारंपरिक ‘कुर्सुस होनोरुम’ (सार्वजनिक पदों की क्रमिक व्यवस्था) का पूर्ण पालन किए बिना ही उच्च पद प्राप्त हुए। वह 70, 55 और 52 ई.पू. में तीन बार रोमन कौंसल निर्वाचित हुआ तथा उसे तीन बार ट्रायम्फ (विजय-उत्सव) मनाने का गौरव प्राप्त हुआ। उसने सर्टोरियन युद्ध, तृतीय दास युद्ध (तृतीय सर्वाइल युद्ध), तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध तथा अनेक अन्य अभियानों का सफल नेतृत्व किया। उसके विरोधी उसकी कठोरता के कारण उसे ‘एडुलेसेंटुलुस कार्निफ़ेक्स’ अर्थात् ‘किशोर जल्लाद’ भी कहते थे।
60 ई.पू. में पॉम्पे ने मार्कस लिसिनियस क्रैसस और जूलियस सीज़र के साथ मिलकर एक अनौपचारिक राजनीतिक गठबंधन बनाया, जिसे इतिहास में प्रथम ट्रायमविर के नाम से जाना जाता है। सीज़र की पुत्री जूलिया से उसके विवाह ने इस गठबंधन को और सुदृढ़ बनाया। किंतु 54 ई.पू. में जूलिया तथा 53 ई.पू. में क्रैसस की मृत्यु के बाद यह गठबंधन कमजोर पड़ गया। इसके बाद पॉम्पे ने सीनेट के रूढ़िवादी गुट ऑप्टिमेट्स का समर्थन करना आरंभ किया। धीरे-धीरे उसके और सीज़र के बीच सत्ता-संघर्ष तीव्र हो गया, जिसके परिणामस्वरूप 49 ई.पू. में रोमन गृहयुद्ध प्रारंभ हो गया। 48 ई.पू. में फ़ारसालस के युद्ध में सीज़र ने पॉम्पे को पराजित कर दिया। पराजय के बाद वह मिस्र भाग गया, जहाँ टॉलेमी तेरहवें के दरबारियों ने 28 सितंबर 48 ई.पू. को उसकी हत्या कर दी।
पॉम्पे महान का प्रारंभिक जीवन
ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (पॉम्पे महान) का जन्म 29 सितंबर 106 ईसा पूर्व में इटली के पिसेनुम क्षेत्र में हुआ था। उसके पिता ग्नेयस पोंपेयस स्ट्रैबो एक प्रभावशाली प्रांतीय कुलीन, सफल सेनानायक तथा 89 ईसा पूर्व के कौंसल थे। वह अपने परिवार के प्रथम सदस्य था जिसने रोमन सीनेट में स्थान प्राप्त किया। यद्यपि वह एक सक्षम सैन्य नेता था, फिर भी लालच, राजनीतिक कठोरता और क्रूरता के कारण उसकी प्रतिष्ठा विवादास्पद रही।
पॉम्पे ने अपने सैन्य जीवन का आरंभ 91–88 ईसा पूर्व के सोशल युद्ध के दौरान अपने पिता के साथ सेवा करते हुए किया। इसके तुरंत बाद लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला और गायस मारियस के बीच सत्ता-संघर्ष प्रारंभ हो गया। 88–87 ईसा पूर्व के गृहयुद्ध में उसके पिता ने सुल्ला का साथ देने के बजाय मारियस और उसके समर्थकों का समर्थन किया। 87 ईसा पूर्व में बेल्लुम ऑक्टावियानुम के दौरान स्ट्रैबो की मृत्यु हो गई। प्राचीन स्रोत उसकी मृत्यु के कारण पर एकमत नहीं हैं; कुछ के अनुसार वह महामारी के शिकार हुए, जबकि अन्य के अनुसार उsके ही सैनिकों ने उसकी हत्या कर दी। मृत्यु से पूर्व उस पर सार्वजनिक धन के गबन का आरोप लगाया गया था। उसका उत्तराधिकारी होने के कारण पॉम्पे पर भी मुकदमा चलाया गया, किंतु वह दोषमुक्त घोषित कर दिया गया। माना जाता है कि इसी अवधि में उसने न्यायाधीश की पुत्री एंटिस्टिया से विवाह किया था।
पिता की मृत्यु के बाद पॉम्पे ने स्वयं को मारियन दल से अलग कर लिया। 84 ईसा पूर्व में, जब लूसियस कॉर्नेलियस सिन्ना की सेना सुल्ला के विरुद्ध अभियान के लिए बाल्कन की ओर बढ़ रही थी, तब पॉम्पे के लापता होने की अफवाह फैल गई। इसके परिणामस्वरूप सैनिकों ने विद्रोह कर सिन्ना की हत्या कर दी। इस घटना में पॉम्पे की वास्तविक भूमिका आज भी इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय बनी हुई है।
उसी समय प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध के नेतृत्व और रोम की सत्ता को लेकर राजनीतिक संघर्ष तीव्र हो चुका था। सुल्ला के पूर्व में अभियान पर रहने के दौरान सिन्ना, ग्नेयस पैपिरियस कार्बो और गायस मारियस (कनिष्ठ) के नेतृत्व में मारियन दल ने रोम पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। किंतु 83 ईसा पूर्व में सुल्ला के इटली लौटते ही भीषण गृहयुद्ध आरंभ हो गया। इसी वर्ष पॉम्पे ने पिसेनुम में अपने समर्थकों की सहायता से तीन लीजियन संगठित किया और सुल्ला के स्वतंत्र सहयोगी के रूप में उसके अभियान में सम्मिलित हो गया। इस युद्ध में उसकी असाधारण सैन्य प्रतिभा शीघ्र ही उभरकर सामने आई, जिसके परिणामस्वरूप सुल्ला ने उसे अपने सबसे विश्वसनीय युवा सेनानायकों में स्थान दिया। इसी काल में उसका विवाह सुल्ला की सौतेली पुत्री एमीलिया से हुआ। 83–82 ईसा पूर्व के अभियानों में प्राप्त सफलताओं ने पॉम्पे के भावी सैन्य और राजनीतिक उत्कर्ष की सुदृढ़ नींव रखी।

गृहयुद्ध के दौरान पॉम्पे
83 ईसा पूर्व में जब लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला पूर्व से इटली लौटा, उससे लगभग एक वर्ष पहले ही ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (पॉम्पे) ने पिसेनुम में अपने पिता के पुराने समर्थकों, स्थानीय अभिजात वर्ग तथा अनुभवी सैनिकों को संगठित कर एक सुदृढ़ सेना तैयार कर ली थी। उसी वर्ष वसंत ऋतु में सुल्ला ब्रुंडिसियम पहुँचा और कैम्पानिया की ओर बढ़ा, जबकि पॉम्पे अपनी सेना के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान कर उससे मिलने निकला। मारियन समर्थक सरकार ने दोनों सेनाओं के एकीकरण को रोकने के लिए तीन अलग-अलग सेनाएँ भेजीं, किंतु पॉम्पे ने उनमें से एक सेना को पराजित कर दिया। शेष दोनों सेनापति समन्वय के अभाव में पीछे हट गए, जिससे पॉम्पे सुरक्षित रूप से सुल्ला के शिविर तक पहुँच गया। उसकी सैन्य प्रतिभा से प्रभावित होकर सुल्ला ने उसका स्वागत ‘इम्पेरेटर’ की उपाधि देकर किया, जो विजयी रोमन सेनापतियों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सैन्य सम्मान था।
83 ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में सुल्ला ने पॉम्पे को पिसेनुम लौटाकर नई सेना की भर्ती का दायित्व सौंपा। अगले वर्ष 82 ईसा पूर्व में गृहयुद्ध के नए अभियान के दौरान सुल्ला रोम की ओर बढ़ा, जबकि उसके प्रमुख सेनापति क्विंटस कैसिलियस मेटेलस पियस ने सिसाल्पाइन गॉल में कौंसल गायस पैपिरियस कार्बो के विरुद्ध अभियान चलाया। इस अभियान में पॉम्पे मेटेलस की घुड़सवार सेना का प्रमुख कमांडर था। एएसिस नदी के निकट हुए युद्ध में मेटेलस और पॉम्पे ने कार्बो के सेनापति गायस कैरिनस को पराजित किया। बाद में कार्बो ने उसे घेरने का प्रयास किया, किंतु सैक्रिपोर्टस में सुल्ला की विजय का समाचार मिलते ही वह पीछे हट गया। पीछे हटती शत्रु सेना का पॉम्पे ने लगातार पीछा किया और उसे भारी क्षति पहुँचाई।
इसके पश्चात मेटेलस ने गायस मार्सियस सेंसरिनस को भी पराजित किया। पॉम्पे की घुड़सवार सेना ने सेंसरिनस की सेना को हराकर उस नगर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद मेटेलस उत्तर-पश्चिम में अभियान चलाता रहा, जबकि पॉम्पे दक्षिण में सुल्ला की मुख्य सेना से जा मिला। वाया फ्लामिनिया मार्ग पर उनकी भेंट मार्कस लिसिनियस क्रैसस से हुई और दोनों ने मिलकर पुनः कैरिनस को पराजित कर स्पोलेटियम में घेर लिया। यद्यपि कैरिनस वहाँ से बच निकला, फिर भी पॉम्पे शीघ्र ही सुल्ला की सेना में लौट आया और सेंसरिनस की एक अन्य बड़ी सेना पर आकस्मिक आक्रमण कर उसे भी परास्त कर दिया। यह सेना प्रेनेस्टे में घिरे गायस मारियस (कनिष्ठ) की सहायता के लिए भेजी गई थी। इस प्रकार अम्ब्रिया और एट्रूरिया में मारियन दल के सभी प्रयास विफल हो गए।
82 ईसा पूर्व के अंतिम चरण में मारियन समर्थकों ने सैम्नाइट तथा लूकानियाई जनजातियों के साथ मिलकर प्रेनेस्टे को बचाने का अंतिम प्रयास किया। पॉम्पे ने उनका लगातार पीछा किया, किंतु वे प्रेनेस्टे तक नहीं पहुँच सके। इसके बाद मारियन समर्थकों ने रोम पर आक्रमण करने का प्रयास किया, परंतु सुल्ला ने कोलाइन द्वार के निर्णायक युद्ध में उन्हें पराजित कर दिया। इस युद्ध के तुरंत बाद पॉम्पे भी अपनी सेना सहित वहाँ पहुँच गया। वर्ष के अंत तक सुल्ला ने इटली में अपने सभी प्रमुख विरोधियों का दमन कर स्वयं को तानाशाह घोषित कर दिया। इसके पश्चात उसने पॉम्पे के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उसका विवाह अपनी सौतेली पुत्री एमिलिया से करा दिया। इस प्रकार सुल्ला के गृहयुद्ध में पॉम्पे की सैन्य सफलताओं ने उसे रोमन गणराज्य के सबसे प्रतिभाशाली युवा सेनानायकों में स्थापित कर दिया तथा उसके भावी राजनीतिक और सैन्य उत्कर्ष की नींव रखी।
सिसिली, अफ्रीका और लेपिडस का विद्रोह
सुल्ला की विजय के बाद भी मारियन दल के अनेक समर्थक जीवित थे। वे सिसिली भाग गए, जहाँ उनके सहयोगी मार्कस परपेर्ना प्रोप्रेटर के रूप में शासन कर रहे थे। उन्हें कार्बो के नौसैनिक बेड़े का समर्थन प्राप्त था, जबकि ग्नेअस डोमिटियस एहेनोबार्बस ने अफ्रीका के रोमन प्रांत पर अधिकार कर लिया था। सुल्ला के आदेश पर सीनेट ने पॉम्पे को सिसिली और अफ्रीका से मारियन दल का प्रभाव समाप्त करने का दायित्व सौंपा। उसने 82 ईसा पूर्व के अभियान में यह कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया, जिसमें परपेर्ना बिना युद्ध किए द्वीप छोड़कर भाग गया। कार्बो पकड़ा गया और बाद में उसे मृत्युदंड दिया गया। पॉम्पे ने इस कार्रवाई को रोमन नागरिकों के विरुद्ध कार्बो के अपराधों का दंड बताया, किंतु उसके विरोधियों ने इसी कारण उसे ‘एडुलेस्सेंटुलुस कार्निफ़ेक्स’ (युवा कसाई) की उपाधि दी।
सिसिली पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद पॉम्पे अफ्रीका के लिए रवाना हुआ और द्वीप का प्रशासन अपने बहनोई गायस मेमियस को सौंप दिया। यूटिका के युद्ध में उसने एहेनोबार्बस को पराजित कर उसका वध किया। इसके बाद उसने नुमिडिया पर अधिकार कर वहाँ के राजा हियार्बास को परास्त किया, जो मारियन दल का समर्थक था। उसके स्थान पर उसने पूर्व शासक हिएम्पसल द्वितीय को पुनः सिंहासन पर बैठाया। इसी अभियान के दौरान उसके सैनिकों ने उसकी असाधारण सफलताओं से प्रभावित होकर उसे ‘मैग्नस’ (महान) की उपाधि दिया। बाद में पॉम्पे ने इस उपाधि को स्थायी रूप से अपने नाम का अंग बना लिया।
रोम लौटने पर पॉम्पे ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में ट्रायम्फ (विजय-उत्सव) मनाने की अनुमति माँगी। उसने अपनी सेना को भंग करने से इनकार कर दिया और सेना सहित रोम के द्वार तक पहुँच गया, जिससे सुल्ला को उसकी माँग स्वीकार करनी पड़ी। यह घटना उस समय असाधारण मानी गई, क्योंकि विधिक रूप से किसी सेनापति को अपनी सेना के साथ इटली में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। यद्यपि सुल्ला ने उसके सम्मान को कुछ कम करने के उद्देश्य से अन्य दो सेनापतियों—लूसियस लिसिनियस मुरेना और गायस वैलेरियस फ्लैकस को भी उसी समय ट्रायम्फ प्रदान किया, फिर भी पॉम्पे की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती रही। इसी काल में उसने प्रभावशाली मेटेलस परिवार की सदस्य मुसिया टर्टिया से विवाह किया। इस विवाह से उसके तीन संतानें हुईं—ग्नेअस पोंपेयस (पॉम्पे द यंगर), पुत्री पोम्पिया मैग्ना तथा कनिष्ठ पुत्र सेक्स्टस पोंपेयस। 61 ईसा पूर्व में उसका यह विवाह तलाक के साथ समाप्त हो गया।
लेपिडस का विद्रोह
79 ईसा पूर्व में सुल्ला के सार्वजनिक जीवन से निवृत्त होने के बाद पॉम्पे ने 78 ईसा पूर्व के कौंसल पद के लिए सुल्ला के पूर्व सहयोगी मार्कस एमिलियस लेपिडस का समर्थन किया। 78 ईसा पूर्व में लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला की मृत्यु के बाद लेपिडस ने उसके राजकीय अंतिम संस्कार का विरोध किया तथा उस्के कई संवैधानिक सुधारों और कानूनों को समाप्त करने का प्रयास किया। उसी वर्ष उसे सिसाल्पाइन गॉल और ट्रांसाल्पाइन गॉल का प्रोकौंसल नियुक्त किया गया। जब सीनेट ने लेपिडस को रोम लौटने का आदेश दिया, तब उसने इसका पालन करने से इनकार कर दिया। उसने शर्त रखी कि उसे पुनः कौंसल चुना जाए, किंतु सीनेट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद लेपिडस ने सेना संगठित कर रोम की ओर कूच प्रारंभ किया। इस संकट से निपटने के लिए सीनेट ने अनेक आपात कदम उठाए, जिनमें पॉम्पे को विशेष सैन्य अधिकार प्रदान करना भी सम्मिलित था।
जब लेपिडस दक्षिण की ओर बढ़ रहा था, तब पॉम्पे ने पिसेनम में अपने अनुभवी सैनिकों को एकत्र किया और उत्तर की ओर बढ़कर सिसाल्पाइन गॉल की राजधानी मुटिना (वर्तमान मोडेना) का घेराव किया। इस नगर पर लेपिडस के समर्थक मार्कस जूनियस ब्रूटस का अधिकार था। लंबे घेराव के बाद ब्रूटस ने आत्मसमर्पण कर दिया, किंतु अगले ही दिन उसकी हत्या कर दी गई। अनेक प्राचीन स्रोतों के अनुसार यह हत्या पॉम्पे के आदेश पर की गई थी। इसके बाद सीनेट की सेना के सेनापति क्विंटस लुटातियस कैटुलस ने रोम के निकट लेपिडस को पराजित किया, जबकि पॉम्पे ने पीछे से आक्रमण कर उसे कोसा के निकट घेर लिया। पराजय के बाद लेपिडस अपने शेष सैनिकों के साथ सार्डिनिया भाग गया, जहाँ शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार लेपिडस का विद्रोह समाप्त हो गया और पॉम्पे की सैन्य प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ गई।
पॉम्पे महान और सर्टोरियन युद्ध
सर्टोरियन युद्ध 80 ईसा पूर्व में आरंभ हुआ, जब मारियन दल के प्रमुख सेनापति क्विंटस सर्टोरियस ने हिस्पानिया में रोमन सीनेट के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसे मारियन समर्थक अनेक रोमन निर्वासितों, विशेषकर मार्कस परपेर्ना, का सहयोग प्राप्त था। स्थानीय इबेरियाई जनजातियों के समर्थन से उसने हिस्पानिया उल्टेरियर पर अधिकार स्थापित कर लिया और गुरिल्ला युद्ध-नीति अपनाकर सीनेट की सेनाओं को लगातार पराजित किया। उसने सुल्ला समर्थक सेनापति क्विंटस कैसिलियस मेटेलस पियस को भी निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं करने दी और शीघ्र ही हिस्पानिया के अधिकांश भाग पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
लेपिडस के विद्रोह को कुचलने के बाद पॉम्पे ने अपनी सेना भंग नहीं की। उसने इसी सैन्य शक्ति के आधार पर सीनेट पर दबाव डाला कि उसे प्रोकौंसल के विशेष अधिकारों के साथ हिस्पानिया भेजा जाए, जहाँ वह मेटेलस पियस की सहायता कर सके। अंततः सीनेट ने उसे प्रोकौंसल के अधिकार प्रदान कर यह दायित्व सौंपा। यह नियुक्ति रोमन परंपरा से हटकर थी और इससे पॉम्पे की बढ़ती प्रतिष्ठा तथा सीनेट का उसपर विश्वास का परिचय मिलता है।
पॉम्पे ने लगभग 30,000 पैदल सैनिकों और 1,000 घुड़सवारों की सेना संगठित की। हिस्पानिया की ओर बढ़ते समय उसने गालिया नार्बोनेन्सिस में एक विद्रोह का दमन किया और नार्बो मार्टियस के निकट शीतकालीन शिविर स्थापित किया। 76 ईसा पूर्व के प्रारंभ में वह कोल द पोर्ते दर्रे को पार कर इबेरियाई प्रायद्वीप में प्रवेश कर गया, जहाँ अगले पाँच वर्षों तक उसका अभियान चलता रहा।
पॉम्पे के आगमन से मेटेलस की सेना का मनोबल बढ़ा और कुछ विद्रोहियों ने सर्टोरियस का साथ छोड़ दिया, किंतु प्रारंभिक चरण में उसे लॉरॉन के युद्ध में गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में उसकी लगभग एक-तिहाई सेना नष्ट हो गई, जबकि सर्टोरियस को अपेक्षाकृत कम क्षति पहुँची। इस असफलता के बाद पॉम्पे ने अपनी सेना का पुनर्गठन किया और नई रणनीति अपनाई। उसी समय मेटेलस भी सर्टोरियस को निर्णायक रूप से पराजित करने में असफल रहा, जिसके कारण सीनेट की सेनाओं को कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली।

75 ईसा पूर्व में सर्टोरियस ने अपना मुख्य अभियान मेटेलस के विरुद्ध चलाया, जबकि पॉम्पे ने वैलेंटिया के निकट परपेर्ना और गायस हेरेनियस की सेनाओं को पराजित किया। इसके बाद सर्टोरियस स्वयं पॉम्पे का सामना करने आया। इसी बीच मेटेलस ने इटालिका के युद्ध में सर्टोरियस के सहयोगी लूसियस हिर्टुलियस को भी पराजित कर दिया। इसके पश्चात सुक्रो नदी के निकट दोनों प्रमुख सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस संघर्ष का कोई स्पष्ट विजेता नहीं हुआ। युद्ध के दौरान सर्टोरियस ने पॉम्पे के दाहिने मोर्चे को पीछे धकेल दिया और वह लगभग उसे बंदी बनाने में सफल हो गया था, किंतु पॉम्पे के अधीनस्थ सेनापति लूसियस अफ्रानियस ने विद्रोही सेना के दूसरे भाग को पराजित कर स्थिति संभाल ली। बाद में सगुंटुम के निकट पुनः युद्ध हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को भारी क्षति उठानी पड़ी।
यद्यपि मेटेलस ने परपेर्ना को एक अन्य युद्ध में पराजित कर दिया, फिर भी सर्टोरियस क्लूनिया पहुँचकर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में सफल रहा। उसने नगर की सुरक्षा मजबूत की, नई सेना संगठित की तथा स्थल और समुद्र दोनों मार्गों से रोमन सेनाओं की रसद व्यवस्था को बाधित कर दिया। परिणामस्वरूप आपूर्ति संकट उत्पन्न हो गया और मेटेलस को अपनी सेना गॉल में ठहरानी पड़ी, जबकि पॉम्पे ने वैक्काई जनजाति के क्षेत्र में शीतकाल बिताया। युद्ध के लंबे खिंचने और सर्टोरियस की प्रभावी गुरिल्ला नीति से चिंतित होकर पॉम्पे ने सीनेट से अतिरिक्त धन और सैनिकों की माँग की और स्पष्ट किया कि पर्याप्त सहायता के बिना अभियान जारी रखना कठिन होगा।
सीनेट ने पॉम्पे के अनुरोध पर अतिरिक्त धन और दो नई लीजन भेजीं। इन नई सेनाओं के साथ 74 ईसा पूर्व में पॉम्पे और मेटेलस ने सर्टोरियस के विरुद्ध क्रमिक और सुनियोजित अभियान चलाया। इस समय तक सर्टोरियस अपने अधिकांश अनुभवी रोमन सैनिक खो चुका था और खुली लड़ाई में उसके पास पहले जैसी क्षमता थी। फलस्वरूप दोनों रोमन सेनापतियों ने धीरे-धीरे उसके नियंत्रण वाले नगरों पर अधिकार करना प्रारंभ कर विद्रोही शक्ति को कमजोर कर दिया।
इसी बीच सर्टोरियस के रोमन और इबेरियाई समर्थकों के बीच असंतोष बढ़ने लगा। अंततः 73 या 72 ईसा पूर्व में परपेर्ना और उसके साथियों ने षड्यंत्र रचकर सर्टोरियस की हत्या कर दी तथा विद्रोही सेना का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। पॉम्पे ने शीघ्र ही परपेर्ना का पीछा किया और ओस्का के निकट हुए युद्ध में उसे पराजित कर बंदी बना लिया। परपेर्ना ने प्राणरक्षा के बदले वे गुप्त पत्र सौंपने की पेशकश की, जिनमें रोम के अनेक प्रमुख व्यक्तियों के विद्रोहियों से संबंधों का उल्लेख था, किंतु पॉम्पे ने उन पत्रों को बिना पढ़े ही जलवा दिया और परपेर्ना को मृत्युदंड देने का आदेश दिया।
युद्ध की समाप्ति के बाद पॉम्पे ने कुछ समय तक हिस्पानिया में रहकर प्रशासन का पुनर्गठन किया और अपने पूर्व विरोधियों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई। इससे हिस्पानिया तथा दक्षिणी गॉल में उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सर्टोरियस के शेष समर्थकों का दमन करने के बाद वह विजयी होकर रोम लौटा।
स्पार्टकस विद्रोह और क्रैसस से प्रतिद्वंद्विता
हिस्पानिया में सर्टोरियन युद्ध की सफल समाप्ति के बाद जब ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (पॉम्पे) 71 ईसा पूर्व में इटली लौटा, तब रोमन गणराज्य एक अन्य गंभीर संकट से जूझ रहा था। दास नेता स्पार्टकस के नेतृत्व में चल रहा तृतीय सर्वाइल युद्ध (73–71 ईसा पूर्व) पूरे इटली की स्थिरता के लिए चुनौती बन चुका था। इस विद्रोह के दमन का उत्तरदायित्व मार्कस लिसिनियस क्रैसस को सौंपा गया था। 71 ईसा पूर्व में क्रैसस ने विद्रोही सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया, किंतु युद्ध के अंतिम चरण में इटली लौट रहे पॉम्पे ने उत्तर की ओर भाग रहे लगभग 6,000 विद्रोहियों का संहार कर दिया। इसके बाद उसने सीनेट को लिखे अपने पत्र में यह दावा किया कि यद्यपि क्रैसस ने विद्रोह को परास्त किया, किंतु उसका पूर्ण अंत उसने किया। इस कथन से क्रैसस अत्यंत असंतुष्ट हुआऔर दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक तथा व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता कई वर्षों तक बनी रही।
दूसरी विजय-यात्रा और कौंसल पद
हिस्पानिया में अपनी उल्लेखनीय सफलताओं के उपलक्ष्य में पॉम्पे को दूसरी बार विजय-जुलूस (ट्रायम्फ) मनाने का सम्मान प्राप्त हुआ। इसी समय उसने कौंसल पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत की। यद्यपि वह अभी तक कुर्सुस होनोरुम (रोमन सार्वजनिक पदों की पारंपरिक क्रमिक व्यवस्था) के सभी चरण पूरा नहीं कर पाया था और निर्धारित न्यूनतम आयु से भी कम था, फिर भी उसकी असाधारण सैन्य उपलब्धियों तथा लोकप्रियता के कारण सीनेट ने उसे विशेष अनुमति प्रदान की। परिणामस्वरूप 70 ईसा पूर्व में पॉम्पे और मार्कस लिसिनियस क्रैसस संयुक्त रूप से रोमन गणराज्य के कौंसुल निर्वाचित हुए। प्राचीन लेखक प्लूटार्क के अनुसार पॉम्पे ने स्वयं क्रैसस को सह-कौंसुल बनने में सहायता प्रदान की थी, जिससे दोनों के बीच राजनीतिक संतुलन बना रह सके। किंतु दोनों के स्वभाव, महत्त्वाकांक्षाओं और राजनीतिक दृष्टिकोण में पर्याप्त भिन्नता थी, जिसके फलस्वरूप उनका संयुक्त कार्यकाल निरंतर प्रतिस्पर्धा और मतभेदों से प्रभावित रहा। इसके बावजूद दोनों नेताओं ने राज्यहित में कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए, जिनका रोमन गणराज्य की राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा।
ट्रिब्यूनों की शक्तियों की पुनर्स्थापना
पॉम्पे और क्रैसस के कौंसल पद की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि जन-प्रतिनिधियों (ट्रिब्यून ऑफ द प्लेब्स) की शक्तियों की पुनर्स्थापना थी। तानाशाह लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला ने अपने शासनकाल में ट्रिब्यूनों के अधिकारों को सीमित कर दिया था, जिससे सामान्य नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। दोनों कौंसलों ने इन प्रतिबंधों को समाप्त करते हुए ट्रिब्यूनों को उनके पारंपरिक अधिकार पुनः प्रदान किए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार सीनेट के प्रस्तावों पर वीटो लगाने की शक्ति थी। इस सुधार से रोमन गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था में संतुलन पुनः स्थापित हुआ और सामान्य नागरिकों के प्रतिनिधियों की भूमिका सुदृढ़ हुई। जनसाधारण ने इस निर्णय का स्वागत किया, जबकि सीनेट के रूढ़िवादी ऑप्टिमेट्स गुट ने इसका विरोध किया। फिर भी पॉम्पे और क्रैसस के संयुक्त समर्थन के कारण यह सुधार सफलतापूर्वक लागू हो गया।
समुद्री लुटेरों के विरुद्ध अभियान
पहली शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक भूमध्यसागर में समुद्री लुटेरों की गतिविधियाँ अत्यधिक बढ़ चुकी थीं। विशेष रूप से सिलिसिया के तट पर सक्रिय इन समुद्री शक्तियों ने समुद्री व्यापार, अनाज की आपूर्ति तथा रोमन समुद्री मार्गों को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया था। अनेक अवसरों पर उन्होंने रोम के शत्रुओं, विशेषकर सर्टोरियस और मिथ्रिडेट्स षष्ठम, के साथ भी सहयोग किया। कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि ये केवल साधारण समुद्री लुटेरे नहीं थे, बल्कि संगठित समुद्री शक्तियाँ थीं, जिनकी राजनीतिक और सैन्य क्षमता भी उल्लेखनीय थी।
68 ईसा पूर्व में समुद्री लुटेरों ने रोम के निकट स्थित ओस्तिया बंदरगाह पर आक्रमण कर दो रोमन सीनेटरों का अपहरण कर लिया। इस घटना से पूरे रोम में गहरा भय और आक्रोश फैल गया। संकट की गंभीरता को देखते हुए 67 ईसा पूर्व में ट्रिब्यून ऑलुस गैबिनियस ने जनसभा में लेक्स गैबिनिया नामक विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके माध्यम से पॉम्पे को समुद्री लुटेरों के दमन के लिए अभूतपूर्व अधिकार प्रदान किए गए। उसे अनेक लेगेट नियुक्त करने, विशाल नौसेना और सेना संगठित करने तथा आवश्यक आर्थिक संसाधनों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करने की अनुमति मिली। यद्यपि सीनेट के अनेक रूढ़िवादी सदस्य इतने व्यापक अधिकार दिए जाने के विरोधी थे, फिर भी जनसमर्थन के कारण यह विधेयक पारित हो गया।
पॉम्पे ने इस अभियान में अपनी अद्वितीय संगठन क्षमता का परिचय दिया। उसने पूरे भूमध्यसागर को अनेक नौसैनिक क्षेत्रों में विभाजित कर प्रत्येक क्षेत्र की जिम्मेदारी अपने विश्वसनीय लेगेटों को सौंप दी। इस सुव्यवस्थित रणनीति के कारण समुद्री लुटेरे किसी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भागकर बच नहीं सके। सबसे पहले उसने पश्चिमी भूमध्यसागर को सुरक्षित किया और केवल चालीस दिनों में वहाँ समुद्री डकैतों का लगभग पूर्णतः अंत कर दिया। इसके बाद उसने पूर्वी भूमध्यसागर की ओर अभियान चलाया। अंतिम निर्णायक संघर्ष सिलिसिया के तट पर स्थित कोराकेसियम के निकट हुआ, जहाँ पॉम्पे की नौसेना ने समुद्री लुटेरों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। लगभग तीन महीनों के भीतर पूरा अभियान सफलतापूर्वक समाप्त हो गया और भूमध्यसागर के समुद्री मार्ग पुनः सुरक्षित हो गए।
विजय के बाद पॉम्पे ने केवल सैन्य सफलता पर ही संतोष नहीं किया, बल्कि दूरदर्शी प्रशासनिक नीति भी अपनाई। उसने आत्मसमर्पण करने वाले अधिकांश समुद्री लुटेरों को मृत्युदंड देने के स्थान पर विभिन्न नगरों में पुनर्वासित किया। अनेक लोगों को सिलिसिया के सोली नगर में बसाया गया, जिसका नाम बदलकर पोम्पियोपोलिस रखा गया, जबकि अन्य समूहों को ग्रीस के डाइमे तथा लीबिया और कैलाब्रिया के विभिन्न नगरों में बसाया गया। इस नीति का उद्देश्य उन्हें स्थायी आजीविका प्रदान करना और पुनः समुद्री डकैती की ओर लौटने से रोकना था।
समुद्री लुटेरों के विरुद्ध यह अभियान पॉम्पे के सैन्य जीवन की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है। इस विजय ने न केवल भूमध्यसागर में रोमन प्रभुत्व को पुनः सुदृढ़ किया, बल्कि रोमन व्यापार, अनाज की आपूर्ति और समुद्री संचार को भी सुरक्षित बनाया। साथ ही, इस सफलता ने पॉम्पे की प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँचा दिया और उसे अपने युग का सबसे प्रभावशाली सेनानायकों तथा राजनेताओं में स्थापित कर दिया।
तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध (74–63 ईसा पूर्व)
तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध (74–63 ईसा पूर्व) रोमन गणराज्य और पोंटस के शक्तिशाली शासक मिथ्रिडेट्स षष्ठम (मिथ्रिडेट्स यूएपेटर) के बीच लड़ा गया अंतिम और निर्णायक संघर्ष था। इसकी पृष्ठभूमि 74 ईसा पूर्व में बनी, जब बिथिनिया के अंतिम राजा निकोमीडीस चतुर्थ ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपना राज्य रोम को वसीयत कर दिया। रोम ने इस वसीयत के आधार पर बिथिनिया पर अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु मिथ्रिडेट्स षष्ठम ने इसका विरोध किया। उसने अपने सहयोगी आर्मेनिया के शक्तिशाली राजा टिग्रानेस महान (टिग्रानेस द्वितीय) के साथ मिलकर रोमन विस्तारवाद को चुनौती दी। परिणामस्वरूप रोमन गणराज्य और पोंटस के बीच तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध आरंभ हुआ, जिसने लगभग एक दशक तक एशिया माइनर और निकट पूर्व की राजनीति को प्रभावित किया।
लूकुलस के अभियान
73 ईसा पूर्व में लूसियस लिसिनियस लूकुलस को सिलिसिया का प्रोकौंसल तथा युद्ध का प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। उसने प्रारंभिक वर्षों में उल्लेखनीय सैन्य सफलताएँ प्राप्त कीं और मिथ्रिडेट्स तथा टिग्रानेस दोनों को अनेक युद्धों में पराजित किया। लूकुलस ने पोंटस और आर्मेनिया के भीतरी क्षेत्रों तक अभियान चलाकर रोमन प्रभाव का विस्तार किया। उसकी सफलताओं के बावजूद युद्ध लंबे समय तक चलता रहा। निरंतर अभियानों से सैनिक थक गए और लूकुलस पर व्यक्तिगत यश तथा धन-संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगने लगे। फलस्वरूप उसकी लोकप्रियता घटने लगी और सेना में भी असंतोष फैल गया।
पॉम्पे की नियुक्ति
68 ईसा पूर्व में क्विंटस मार्सियस रेक्स को सिलिसिया तथा मैनियस एसिलियस ग्लाब्रियो को बिथिनिया का दायित्व सौंपा गया। दोनों सेनापति मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध निर्णायक सफलता प्राप्त करने में असफल रहे। इस अवसर का लाभ उठाकर मिथ्रिडेट्स ने 67 ईसा पूर्व में पोंटस के अधिकांश भाग पर पुनः अधिकार कर लिया तथा रोमन सहयोगी राज्य कैप्पाडोसिया पर भी आक्रमण कर दिया। इससे रोम में यह धारणा बनी कि युद्ध को समाप्त करने के लिए अधिक सक्षम और प्रभावशाली नेतृत्व की आवश्यकता है।
इसी समय पॉम्पे पूर्वी भूमध्यसागर में समुद्री लुटेरों के विरुद्ध अपना सफल अभियान चला रहा था। उसकी असाधारण सफलताओं से प्रभावित होकर 66 ईसा पूर्व में ट्रिब्यून गायस मैनिलियस ने लेक्स मैनिलिया नामक विधेयक प्रस्तुत किया। इस कानून के माध्यम से पॉम्पे को मिथ्रिडेट्स षष्ठम के विरुद्ध युद्ध का सर्वोच्च सेनापतित्व सौंपा गया तथा उसे युद्ध करने, संधियाँ संपन्न करने और समूचे रोमन पूर्वी प्रदेश के पुनर्गठन के व्यापक अधिकार दिए गए। यद्यपि सीनेट के रूढ़िवादी ऑप्टिमेट्स गुट ने एक ही व्यक्ति को इतने व्यापक अधिकार दिए जाने का विरोध किया, फिर भी पॉम्पे की लोकप्रियता और जनसमर्थन के कारण यह विधेयक पारित हो गया।
मिथ्रिडेट्स पर निर्णायक विजय
सेनापतित्व ग्रहण करने के बाद पॉम्पे ने अत्यंत सुनियोजित रणनीति अपनाई। उसने पार्थिया के राजा फ़्राटेस तृतीय के साथ मैत्री स्थापित की और उसे आर्मेनिया पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया, जिससे मिथ्रिडेट्स और उसके सहयोगी टिग्रानेस पर एक साथ दबाव डाला जा सके। इसी बीच मिथ्रिडेट्स ने युद्धविराम का प्रस्ताव रखा, किंतु पॉम्पे ने ऐसी कठोर शर्तें प्रस्तुत कीं जिन्हें स्वीकार करना उसके लिए संभव नहीं था। परिणामस्वरूप युद्ध जारी रहा।
संख्या में कम होने के कारण मिथ्रिडेट्स आर्मेनिया की ओर पीछे हट गया, किंतु पॉम्पे ने उसका लगातार पीछा किया। 66 ईसा पूर्व के अंत में लिकस नदी के निकट हुए निर्णायक युद्ध में पॉम्पे ने मिथ्रिडेट्स को पराजित कर दिया। इस पराजय के बाद मिथ्रिडेट्स कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ काला सागर के पूर्वी तट पर स्थित कोल्खिस भाग निकला। वहाँ पहुँचकर उसने अपने पुत्र माखारेस से बोस्पोरस राज्य का नियंत्रण छीन लिया। अपमानित माखारेस ने बाद में आत्महत्या कर ली।
मिथ्रिडेट्स की पराजय के बाद पॉम्पे ने आर्मेनिया की ओर ध्यान केंद्रित किया। उसने टिग्रानेस महान के पुत्र टिग्रानेस कनिष्ठ का समर्थन प्राप्त कर आर्मेनिया पर आक्रमण किया। परिस्थितियों की गंभीरता को समझते हुए टिग्रानेस महान ने बिना लंबा संघर्ष किए आत्मसमर्पण कर दिया। समझौते के अनुसार उसने रोम को भारी क्षतिपूर्ति राशि अदा की, रोमन सर्वोच्चता स्वीकार की तथा अपने पूर्ववर्ती अधिकांश प्रदेश पुनः प्राप्त कर लिए। साथ ही उसने रोमन सैनिकों को अपने राज्य में रहने की अनुमति भी दी। इस समझौते से पॉम्पे बिना बड़े युद्ध के आर्मेनिया को रोम का अधीनस्थ सहयोगी राज्य बनाने में सफल रहा।
काकेशस और कोल्खिस का अभियान
65 ईसा पूर्व में पॉम्पे ने कोल्खिस की ओर अभियान आरंभ किया। मार्ग में उसे अनेक स्थानीय कबीलों और मिथ्रिडेट्स के सहयोगियों का सामना करना पड़ा। कई संघर्षों में विजय प्राप्त करने के बाद वह फ़ैसिस नदी तक पहुँचा, जहाँ उसकी भेंट काला सागर में तैनात रोमन नौसेना के एडमिरल पब्लियस सर्विलियस से हुई। इसी समय काकेशियन अल्बानिया में विद्रोह भड़क उठा, जिसके कारण पॉम्पे को अपना अभियान रोककर लौटना पड़ा। अबास नदी के निकट उसने विद्रोही सेनाओं को पराजित किया, अल्बानियाई जनजातियों को संधि के लिए विवश कियाऔर काकेशस के अन्य कबीलों के साथ भी मैत्री स्थापित की। इसके बाद उसने आर्मेनिया में शीतकाल व्यतीत किया और अपने सहयोगियों फ़्राटेस तृतीय तथा टिग्रानेस महान के बीच सीमा-विवादों का समाधान किया।
सीरिया पर अधिकार
64 ईसा पूर्व में पॉम्पे ने मिथ्रिडेट्स को पूर्णतः अलग-थलग करने के उद्देश्य से काला सागर क्षेत्र की नौसैनिक नाकाबंदी जारी रखी। इसी अवसर का लाभ उठाकर उसने सीरिया के समृद्ध नगरों तथा शेष सेल्यूसिड साम्राज्य पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही सीरिया को रोमन गणराज्य का नया प्रांत घोषित कर दिया गया। इस विजय से न केवल रोम का पूर्वी साम्राज्य अत्यधिक विस्तृत हुआ, बल्कि निकट पूर्व में उसका राजनीतिक प्रभाव भी सुदृढ़ हो गया। यद्यपि पॉम्पे के कुछ राजनीतिक विरोधियों ने उन पर अपने अधिकार-क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य करने का आरोप लगाया, फिर भी उसकी सफलताओं ने उसकी प्रतिष्ठा को और अधिक बढ़ा दिया।
मिथ्रिडेट्स की मृत्यु और युद्ध का अंत
उधर वृद्ध मिथ्रिडेट्स बोस्पोरस की राजधानी पैंटिकापायोन में अपने ही पुत्र फ़ार्नाकेस द्वितीय के विद्रोह से घिर गया। पराजय निश्चित देखकर उसने विषपान कर आत्महत्या का प्रयास किया, किंतु सफल नहीं हो सका। अंततः 63 ईसा पूर्व में उसके ही सैनिकों ने उसकी हत्या कर दी। फ़ार्नाकेस द्वितीय ने अपने पिता का शव सम्मानपूर्वक पॉम्पे के पास भेज दिया। इसके बदले पॉम्पे ने उसे बोस्पोरस साम्राज्य का शासक स्वीकार किया और रोम का सहयोगी राजा घोषित कर दिया।
तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध की समाप्ति के साथ एशिया माइनर में रोमन प्रभुत्व निर्णायक रूप से स्थापित हो गया। पोंटस की शक्ति का अंत हो गया, आर्मेनिया रोम का अधीनस्थ सहयोगी राज्य बन गया और सीरिया को रोमन प्रांत के रूप में संगठित कर लिया गया। काकेशस तथा काला सागर क्षेत्र में भी रोम का प्रभाव बढ़ा। इन सफलताओं के कारण पॉम्पे न केवल अपने समय का सबसे सफल सेनानायक सिद्ध हुआ, बल्कि उसने रोमन गणराज्य की पूर्वी सीमा का व्यापक पुनर्गठन कर उसे भूमध्यसागरीय विश्व की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित करने में निर्णायक योगदान दिया।
पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों का पुनर्गठन
सीरिया पर रोमन अधिकार
तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध की समाप्ति के बाद ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (पॉम्पे) ने पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों का व्यापक प्रशासनिक एवं राजनीतिक पुनर्गठन किया। उसका उद्देश्य केवल विजित प्रदेशों पर अधिकार स्थापित करना नहीं था, बल्कि उन्हें रोमन प्रशासनिक व्यवस्था में संगठित करना भी था। उसने सीरिया को रोमन गणराज्य का नया प्रांत बनाया और वहाँ स्थायी प्रशासन की स्थापना की। 63 ईसा पूर्व के प्रारंभ में वह अन्ताकिया (एंटिओक) से दक्षिण की ओर बढ़ा और अपामिया सहित अनेक तटीय नगरों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद एंटी-लेबनान पर्वतमाला को पार कर उसने पेला और दमिश्क को भी रोमन नियंत्रण में ले लिया। इससे रोमन साम्राज्य की पूर्वी सीमा और अधिक सुदृढ़ हो गई।
यहूदिया में हस्तक्षेप
इसी अभियान के दौरान पॉम्पे ने यहूदिया (जूडिया) के आंतरिक उत्तराधिकार-संघर्ष में हस्तक्षेप किया। उस समय हस्मोनी राजवंश में गृहयुद्ध चल रहा था। एक पक्ष का नेतृत्व हाइरकानस द्वितीय कर रहा था, जबकि दूसरे पक्ष का नेतृत्व उसका भाई अरिस्टोबुलस द्वितीय कर रहा था। दमिश्क में दोनों पक्षों ने पॉम्पे के समक्ष अपने-अपने दावे प्रस्तुत किए। हाइरकानस ने स्वयं को ज्येष्ठ और वैध उत्तराधिकारी बताया, जबकि अरिस्टोबुलस ने दावा किया कि उसने राज्य का शासन परिस्थितियों के कारण संभाला था। प्राचीन इतिहासकार फ्लावियस जोसेफस और डायोडोरस सिकुलस के अनुसार एक तीसरे प्रतिनिधिमंडल ने भी पॉम्पे से राजशाही समाप्त कर महायाजकों के शासन की पुनर्स्थापना का अनुरोध किया।
यरूशलेम की घेराबंदी
पॉम्पे ने तत्काल कोई निर्णय नहीं लिया और अपनी सेना के साथ यहूदिया की ओर बढ़ गया। जेरिको पहुँचने पर अरिस्टोबुलस ने उन्हें धन देने तथा यरूशलेम में प्रवेश की अनुमति देने का आश्वासन दिया, किंतु उसके समर्थकों ने रोमन सेना के लिए नगर के द्वार बंद कर दिए। दूसरी ओर, हाइरकानस के समर्थकों ने नगर के द्वार खोल दिए, जबकि अरिस्टोबुलस के अनुयायी मंदिर पर्वत (टेम्पल माउंट) में जाकर डट गए। इसके बाद पॉम्पे ने लगभग तीन महीनों तक यरूशलेम का घेराव किया। उसने यहूदियों के विश्राम-दिवस शब्बत का लाभ उठाकर अंततः नगर तथा मंदिर परिसर पर अधिकार कर लिया।
विजय के बाद पॉम्पे मंदिर के सबसे पवित्र कक्ष ‘होली ऑफ होलीज़’ (पवित्रतम स्थान) में प्रवेश कर गया, जिसे यहूदी धार्मिक परंपरा में गंभीर अपवित्रीकरण माना गया। इसके बावजूद उसने मंदिर की संपत्ति अथवा खजाने को नहीं छुआ। उसने मंदिर की शुद्धि कराने का आदेश दिया और नियमित धार्मिक अनुष्ठानों को पुनः प्रारंभ करने की अनुमति दी।
यहूदिया और एशिया माइनर का पुनर्गठन
विजय के उपरांत पॉम्पे ने हाइरकानस द्वितीय को रोम का आश्रित शासक नियुक्त किया। उसे महायाजक का पद बनाए रखने की अनुमति दी गई, किंतु राजा की उपाधि नहीं दी गई। दूसरी ओर, अरिस्टोबुलस द्वितीय तथा उसके पुत्रों को बंदी बनाकर रोम भेज दिया गया। साथ ही, यहूदिया के भू-भाग को छोटा कर अनेक हेलेनिस्टिक नगरों को नवगठित सीरिया प्रांत में सम्मिलित कर दिया गया। आगे चलकर इन नगरों में से दस प्रमुख नगरों ने डेकापोलिस नामक संघ का निर्माण किया, जिसने पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रोमन प्रभाव को और अधिक सुदृढ़ किया।
पॉम्पे ने एशिया माइनर का भी व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन किया। उसने बिथिनिया और पोंटस को मिलाकर एक नया रोमन प्रांत बनाया तथा मिथ्रिडेट्स षष्ठम के शेष प्रदेशों का विभाजन रोम के सहयोगी शासकों के बीच कर दिया। कैप्पाडोसिया के राजा एरियोबार्ज़ानेस प्रथम को पुनः उसका राज्य सौंप दिया गया। लेसर आर्मेनिया को गैलेटिया में सम्मिलित कर पॉम्पे के सहयोगी डिओटारस को उसका शासक नियुक्त किया गया। साथ ही सिलिसिया प्रांत का पुनर्गठन कर उसमें पैम्फिलिया के तटीय क्षेत्रों और कुछ भीतरी प्रदेशों को सम्मिलित किया गया, जिससे वह एक सुदृढ़ रोमन प्रशासनिक इकाई बन गया।
पुनर्गठन का महत्त्व
पॉम्पे के इन प्रशासनिक और राजनीतिक सुधारों ने रोमन गणराज्य की पूर्वी सीमा को स्थायी रूप से सुरक्षित कर दिया। प्रांतों से प्राप्त होने वाला राजस्व उल्लेखनीय रूप से बढ़ा तथा पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रोमन प्रभुत्व दृढ़ता से स्थापित हो गया। इन सफलताओं ने न केवल रोम की सामरिक और आर्थिक शक्ति को बढ़ाया, बल्कि पॉम्पे की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, राजनीतिक प्रभाव और आर्थिक संसाधनों में भी वृद्धि की।
रोम वापसी और भव्य विजय-उत्सव
66–62 ईसा पूर्व के पूर्वी अभियानों में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त करने के बाद ग्नेयस पोंपेयस मैग्नस (पॉम्पे) दिसंबर 62 ईसा पूर्व में ब्रुंडिसियम (वर्तमान ब्रिंडिसी) लौटा। अपनी असाधारण विजयों और विशाल सेना के बावजूद उसने इटली पहुँचते ही अपनी सेना भंग कर दी। इस निर्णय का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि वह व्यक्तिगत तानाशाही स्थापित करने का इच्छुक नहीं हैं, बल्कि रोमन गणराज्य की संवैधानिक परंपराओं और सीनेट की सर्वोच्चता का सम्मान करता है। यह कदम उसके समकालीनों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि रोम के इतिहास में शक्तिशाली सेनानायकों द्वारा सेना के बल पर सत्ता प्राप्त करने की आशंका सदैव बनी रहती थी।
61 ईसा पूर्व में पॉम्पे को तीसरी बार ट्रायम्फ (विजय-उत्सव) मनाने का सम्मान प्राप्त हुआ। इस अवसर पर समुद्री लुटेरों के दमन, मिथ्रिडेट्स षष्ठम पर विजय, सीरिया के अधिग्रहण तथा पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के प्रशासनिक पुनर्गठन जैसी उसकी उपलब्धियों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। इस विजय-उत्सव ने पॉम्पे की प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँचा दिया और वह रोम का सर्वाधिक सम्मानित सेनानायक के रूप में स्थापित हो गया।
सीनेट से टकराव
यद्यपि पॉम्पे की लोकप्रियता चरम पर थी, फिर भी उसे रोमन राजनीति में अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उसके प्रमुख विरोधी ऑप्टिमेट्स (कुलीन वर्ग का रूढ़िवादी गुट) थे, जो उसकी बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव से चिंतित थे। सीनेट ने पूर्व में पॉम्पे द्वारा किए गए प्रशासनिक प्रबंधों, संधियों और राजनीतिक निर्णयों को तत्काल वैधानिक स्वीकृति देने से इनकार कर दिया। इसके अतिरिक्त, उसके सेवानिवृत्त सैनिकों को भूमि प्रदान करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया गया। पॉम्पे बल प्रयोग या गृहयुद्ध का मार्ग अपनाने का पक्षधर नहीं था। उसने राजनीतिक समझौते के माध्यम से अपने उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयास किया। यही परिस्थिति आगे चलकर रोमन राजनीति के एक नए गठबंधन का आधार बनी।
प्रथम ट्रायम्विरेट का गठन
इसी समय जूलियस सीज़र अपनी प्रोप्रेटरशिप समाप्त कर हिस्पानिया से रोम लौटा। वह 59 ईसा पूर्व के लिए कौंसल बनना चाहता था, जबकि मार्कस लिसिनियस क्रैसस अपने वित्तीय और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखना चाहता था। तीनों नेताओं की आवश्यकताएँ एक-दूसरे की पूरक थीं। परिणामस्वरूप 60 ईसा पूर्व में पॉम्पे, क्रैसस और सीज़र के बीच एक अनौपचारिक राजनीतिक समझौता हो गया, जिसे इतिहास में ‘प्रथम ट्रायम्विरेट’ के नाम से जाना जाता है। यह कोई संवैधानिक संस्था नहीं थी, बल्कि तीन प्रभावशाली नेताओं के बीच किया गया निजी राजनीतिक गठबंधन था। इसका मुख्य उद्देश्य सीनेट के रूढ़िवादी गुट के प्रभाव को संतुलित करना तथा अपने-अपने राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करना था।

गठबंधन के उद्देश्य और उपलब्धियाँ
प्रथम ट्रायमविर के प्रत्येक सदस्य के अलग-अलग उद्देश्य थे। पॉम्पे चाहता था कि उसके पूर्वी प्रशासनिक निर्णयों और संधियों को विधिक मान्यता मिले तथा उसके सेवानिवृत्त सैनिकों को भूमि प्रदान की जाए। क्रैसस अपने वित्तीय समर्थकों और कर-वसूलने वाले व्यापारिक वर्ग के हितों की रक्षा करना चाहता था। दूसरी ओर, सीज़र दीर्घकालीन प्रांतीय सैन्य कमान प्राप्त कर अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित बनाना चाहता था।
59 ईसा पूर्व में कौंसल बनने के बाद सीज़र ने सबसे पहले भूमि-वितरण संबंधी कानून पारित कराया, जिसके अंतर्गत पॉम्पे के पूर्व सैनिकों और निर्धन नागरिकों को भूमि प्रदान की गई। इसके बाद कैम्पानिया की सार्वजनिक भूमि के वितरण का कानून भी पारित किया गया। सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि सीज़र ने पूर्व में पॉम्पे द्वारा किए गए सभी प्रशासनिक निर्णयों, संधियों और प्रांतीय व्यवस्थाओं को सीनेट से वैधानिक स्वीकृति दिला दी। इससे पूर्वी प्रदेशों में पॉम्पे की नीतियों को आधिकारिक मान्यता मिल गई।
सीज़र से पारिवारिक संबंध
राजनीतिक गठबंधन को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए पॉम्पे ने सीज़र की पुत्री जूलिया से विवाह किया। यह विवाह केवल पारिवारिक संबंध नहीं था, बल्कि प्रथम ट्रायमविर की एकता और स्थिरता का प्रमुख आधार भी था। इस संबंध ने कुछ वर्षों तक पॉम्पे और सीज़र के बीच विश्वास तथा सहयोग बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी वर्ष लेक्स वाटिनिया के अंतर्गत सीज़र को गालिया सिसाल्पिना और इलिरिकुम का पाँच वर्षों के लिए शासन तथा सैन्य कमान प्रदान की गई। बाद में गालिया ट्रांसाल्पिना (नार्बोनेन्सिस) भी उसके अधिकार में आ गया। इन प्रांतों ने सीज़र को विशाल सेना और स्वतंत्र सैन्य शक्ति प्रदान की, जिसके आधार पर उसने 58 ईसा पूर्व से गैलिक युद्धों का आरंभ किया। यही अभियान आगे चलकर उसे रोम का सबसे शक्तिशाली नेता बनाने वाला सिद्ध हुआ।
अन्न-संकट और पॉम्पे की प्रशासनिक सफलता
57 ईसा पूर्व में रोम भीषण अन्न-संकट से प्रभावित हुआ। जनता में असंतोष बढ़ने लगा और खाद्यान्न की कमी राजनीतिक संकट का रूप लेने लगी। इस परिस्थिति में सीनेट ने पॉम्पे को प्रेफेक्टस अन्नोने (अनाज आपूर्ति का सर्वोच्च आयुक्त) नियुक्त किया तथा भूमध्यसागर के विभिन्न क्षेत्रों से अनाज की खरीद और आपूर्ति सुनिश्चित करने के व्यापक अधिकार प्रदान किए। पॉम्पे ने अपनी संगठन क्षमता और प्रशासनिक दक्षता का परिचय देते हुए अल्प समय में ही संकट पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे उसकी लोकप्रियता पुनः बढ़ गई और वह जनता के बीच एक कुशल प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
लूका सम्मेलन और गठबंधन का नवीनीकरण
इसी अवधि में रोमन राजनीति में नए तनाव उत्पन्न होने लगा। जननेता पब्लियस क्लोडियस पुल्खर के कारण सिसरो को 58 ईसा पूर्व में निर्वासन झेलना पड़ा। बाद में परिस्थितियाँ बदलने पर पॉम्पे ने सिसरो की वापसी का समर्थन किया और 57 ईसा पूर्व में उसका पुनः रोम लौटना संभव हुआ।
56 ईसा पूर्व तक पॉम्पे और क्रैसस के बीच मतभेद बढ़ने लगे थे। दूसरी ओर, गॉल में सीज़र की लगातार सफलताओं ने दोनों को यह अनुभव कराया कि यदि उनका गठबंधन टूट गया तो सीज़र अत्यधिक शक्तिशाली हो जाएगा। इन मतभेदों को समाप्त करने के लिए अप्रैल 56 ईसा पूर्व में लूका सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें यह निर्णय लिया गया कि पॉम्पे और क्रैसस 55 ईसा पूर्व के लिए संयुक्त रूप से कौंसल निर्वाचित होंगे। साथ ही दोनों को पाँच वर्षों के लिए प्रांतीय सैन्य कमान दी जाएगी और सीज़र की गॉल में सैन्य कमान भी पाँच वर्ष के लिए बढ़ा दी जाएगी।
योजना के अनुसार 55 ईसा पूर्व में पॉम्पे और क्रैसस कौंसल निर्वाचित हुए। इसके बाद पारित कानूनों के अंतर्गत सीज़र की सैन्य कमान का विस्तार कर दिया गया, जबकि पॉम्पे को हिस्पानिया और क्रैसस को सीरिया का प्रभार सौंपा गया। यद्यपि पॉम्पे स्वयं इटली में ही रहा, उसने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से हिस्पानिया का प्रशासन सफलतापूर्वक संचालित किया। इस प्रकार प्रथम ट्रायमविर ने कुछ वर्षों तक रोमन राजनीति पर निर्णायक प्रभाव बनाए रखा, यद्यपि आगे चलकर यही गठबंधन रोमन गणराज्य के अंतिम गृहयुद्धों की पृष्ठभूमि भी बना।
प्रथम ट्रायम्विरेट का विघटन
60 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र, ग्नेयस पॉम्पेयस मैग्नस (पॉम्पे) और मार्कस लिसिनियस क्रैसस के बीच स्थापित प्रथम ट्रायम्विरेट ने कुछ वर्षों तक रोमन राजनीति को नियंत्रित किया। तीनों नेताओं ने परस्पर सहयोग के माध्यम से अपने-अपने राजनीतिक और सैन्य उद्देश्य पूरे किए। किंतु 54 ईसा पूर्व के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदलने लगीं और उनके हित अलग-अलग दिशाओं में विकसित होने लगे, जिसके परिणामस्वरूप यह गठबंधन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।
ट्रायम्विरेट के विघटन का पहला बड़ा कारण सितंबर 54 ईसा पूर्व में जूलिया की मृत्यु थी। जूलिया, जूलियस सीज़र की पुत्री और पॉम्पे की पत्नी थीं। उसका विवाह केवल पारिवारिक संबंध नहीं था, बल्कि पॉम्पे और सीज़र के बीच राजनीतिक विश्वास का भी प्रमुख आधार था। जूलिया की असामयिक मृत्यु के साथ दोनों नेताओं के बीच का सबसे मजबूत व्यक्तिगत संबंध समाप्त हो गया। इसके बाद दोनों के संबंध औपचारिक तो बने रहे, किंतु उनके बीच अविश्वास लगातार बढ़ने लगा। उधर सीज़र गॉल में अपने विजय अभियानों में व्यस्त था और उसकी सैन्य प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही थी। दूसरी ओर, पॉम्पे रोम में रहकर राजनीतिक मामलों का संचालन कर रहा था, जबकि क्रैसस पूर्व में पार्थियन साम्राज्य के विरुद्ध अभियान की तैयारी कर चुका था।
क्रैसस की मृत्यु और शक्ति-संतुलन का अंत
53 ईसा पूर्व में मेसोपोटामिया के कैरहे के युद्ध में क्रैसस और उसके पुत्र पब्लियस की मृत्यु हो गई। क्रैसस की मृत्यु के साथ ही प्रथम ट्रायम्विरेट का तीसरा स्तंभ भी गिर गया। अब रोम की राजनीति में केवल दो असाधारण शक्तियाँ बची थीं—सीज़र और पॉम्पे। यद्यपि इस समय तक पॉम्पे ने सार्वजनिक रूप से सीज़र से संबंध नहीं तोड़ा था, फिर भी दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी थी। सीनेट के रूढ़िवादी ऑप्टिमेट्स गुट ने भी धीरे-धीरे पॉम्पे को सीज़र के विरुद्ध अपने प्रमुख नेता के रूप में देखना प्रारंभ कर दिया।
52 ईसा पूर्व का राजनीतिक संकट
जनवरी 52 ईसा पूर्व में जननेता पब्लियस क्लोडियस की हत्या उसके प्रतिद्वंद्वी टाइटस एनियस मिलो के समर्थकों द्वारा कर दी गई। इस घटना के बाद रोम में भीषण हिंसा फैल गई। उग्र भीड़ ने सीनेट भवन तक को आग के हवाले कर दिया और राजधानी में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। उस समय कोई वरिष्ठ मजिस्ट्रेट पद पर नहीं था, इसलिए व्यवस्था बहाल करने के लिए सीनेट ने पॉम्पे को विशेष अधिकार प्रदान करने का निर्णय लिया। यद्यपि अनेक कुलीन नेता उसे तानाशाह नियुक्त करने के पक्ष में नहीं थे, फिर भी परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए मार्कस कैल्पुर्नियस बिबुलस के प्रस्ताव तथा मार्कस पोर्सियस कैटो (कैटो द यंगर) सहित अनेक प्रभावशाली नेताओं के समर्थन से पॉम्पे को एकमात्र कौंसल (सोल कौंसल) नियुक्त किया गया। यह रोमन गणराज्य के इतिहास की असाधारण संवैधानिक व्यवस्था थी। व्यवस्था स्थापित होने के बाद पॉम्पे ने कॉर्नेलिया मेटेला से विवाह किया, जो पब्लियस क्रैसस की विधवा तथा मेटेलस स्किपियो नासिका की पुत्री थीं। बाद में उसने मेटेलस स्किपियो को वर्ष के शेष भाग के लिए अपना सह-कौंसल भी नियुक्त कराया।
सीज़र के विरुद्ध कानूनी संकट
एकमात्र कौंसल के रूप में पॉम्पे ने अनेक संवैधानिक और न्यायिक सुधारों का समर्थन किया, जिनके दूरगामी परिणाम हुए। 59 ईसा पूर्व में कौंसल रहते हुए सीज़र ने अपने कार्यकाल के दौरान किए गए विवादास्पद निर्णयों के कारण संभावित अभियोगों से बचने के लिए प्रोकौंसल के रूप में विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त किया था। किंतु पॉम्पे समर्थित नए कानूनों ने पूर्ववर्ती मामलों पर भी मुकदमा चलाने का मार्ग खोल दिया। इसका अर्थ यह था कि जैसे ही सीज़र गॉल में अपना सैन्य अधिकार (इम्पेरियम) छोड़ता, उस पर मुकदमा चलाया जा सकता था। इससे बचने के लिए सीज़र चाहता था कि वह गॉल में रहते हुए ही 48 ईसा पूर्व के कौंसल पद के लिए चुनाव लड़े। यद्यपि उसे पहले ऐसी अनुमति मिल चुकी थी, परंतु पॉम्पे समर्थित नए कानून के अनुसार प्रत्येक उम्मीदवार का चुनाव के समय रोम में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना आवश्यक था। इससे सीज़र ऐसी स्थिति में पहुँच गया जहाँ उसे या तो अपनी सेना छोड़कर अभियोग का सामना करना पड़ता या अपना सैन्य अधिकार बनाए रखते हुए टकराव का मार्ग अपनाना पड़ता।
समझौते के प्रयास और बढ़ता तनाव
51–50 ईसा पूर्व के दौरान सीज़र को गॉल से वापस बुलाने के कई प्रयास किए गए, किंतु उसके समर्थकों के कारण वे सफल नहीं हो सके। इस बीच पॉम्पे सीज़र की बढ़ती सैन्य शक्ति और लोकप्रियता को गणराज्य के लिए संभावित खतरा के रूप में देखने लगा। सीनेट के अधिकांश ऑप्टिमेट्स भी इसी मत के थे। इसी समय प्लेबियन ट्रिब्यून गाइयस स्क्रिबोनियस क्यूरियो ने एक समझौतापूर्ण प्रस्ताव रखा कि सीज़र और पॉम्पे दोनों एक साथ अपनी-अपनी सेनाओं का त्याग करें; अन्यथा दोनों को राज्य का शत्रु घोषित किया जाए। यह प्रस्ताव गृहयुद्ध टालने का सबसे व्यावहारिक प्रयास था, क्योंकि इससे दोनों पक्षों के साथ समान व्यवहार होता। किंतु ऑप्टिमेट्स गुट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उसका आग्रह था कि केवल सीज़र ही बिना किसी शर्त के अपनी सेना भंग करें। इस निर्णय ने दोनों पक्षों के बीच सशस्त्र संघर्ष की संभावना को लगभग निश्चित बना दिया।
गृहयुद्ध की ओर अंतिम कदम
50 ईसा पूर्व के अंत में सीनेट ने पॉम्पे के नेतृत्व में सेना के विस्तार के लिए धन स्वीकृत किया। जब सीज़र को राज्य का शत्रु घोषित करने का प्रयास तत्काल सफल नहीं हुआ, तब निर्वाचित कौंसल गायस क्लॉडियस मार्सेलस ने प्रतीकात्मक रूप से पॉम्पे को तलवार सौंपकर गणराज्य की रक्षा का दायित्व ग्रहण करने का अनुरोध किया। पॉम्पे ने इस जिम्मेदारी को स्वीकार कर सेना के संगठन का कार्य प्रारंभ किया। दूसरी ओर, सीज़र भी परिस्थितियों पर नजर रखे हुए था। दिसंबर 50 ईसा पूर्व में वह अपनी अनुभवी तेरहवीं सेना के साथ आल्प्स पार कर रावेन्ना पहुँचा, जो इटली की सीमा के निकट स्थित था। 1 जनवरी 49 ईसा पूर्व को उसने सीनेट के समक्ष अंतिम समझौता प्रस्ताव प्रस्तुत किया और स्पष्ट किया कि यदि उसके अधिकारों की रक्षा नहीं की गई तो वह सेना सहित इटली में प्रवेश करेगा।
सीनेट ने अंततः 7 जनवरी 49 ईसा पूर्व को सेनातुस कोंसुल्तुम उल्तिमुम पारित कर सीज़र को राज्य का शत्रु घोषित कर दिया और पॉम्पे को गणराज्य की रक्षा का दायित्व सौंपा। इसके केवल चार दिन बाद, 10–11 जनवरी 49 ईसा पूर्व के बीच सीज़र ने रूबिकॉन नदी पार कर इटली में प्रवेश किया। इस घटना के साथ ही रोमन गणराज्य का महान गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसने अंततः गणराज्य के पतन और रोमन साम्राज्य के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
गृहयुद्ध की प्रारंभिक स्थिति
49 ईसा पूर्व में जब जूलियस सीज़र ने रूबिकॉन नदी पार कर रोमन गृहयुद्ध का आरंभ किया, तब पहली दृष्टि में परिस्थितियाँ ग्नेयस पॉम्पेयस मैग्नस (पॉम्पे) के पक्ष में दिखाई देती थीं। सीज़र को सीनेट ने विद्रोही घोषित कर दिया था। उसके पास प्रभावी नौसेना नहीं थी और उसकी सेना में अपेक्षाकृत कम संख्या में, किंतु अत्यंत अनुभवी लीजन थे। इसके विपरीत पॉम्पे को रोमन गणराज्य के विशाल संसाधनों, सीनेट की वैधानिक मान्यता तथा पूर्वी प्रांतों और सहयोगी राजाओं का समर्थन प्राप्त था। किंतु वास्तविक स्थिति इतनी सरल नहीं थी। पॉम्पे यद्यपि गणराज्य का सर्वोच्च सेनानायक था, फिर भी वह सीनेट और निर्वाचित कौंसलों के राजनीतिक निर्णयों से बँधा था। सीनेट के अनेक सदस्य युद्ध के स्थान पर समझौते के पक्षधर थे, जबकि कुछ लोग सीज़र के समान ही पॉम्पे की बढ़ती शक्ति से भी सशंकित थे। इस कारण उसकी रणनीतिक योजनाएँ बार-बार राजनीतिक मतभेदों से प्रभावित होती रहीं। सिसरो जैसे प्रभावशाली नेताओं ने सैनिक भर्ती में अपेक्षित सहयोग नहीं दिया, जबकि कैटो ने सिसिली जैसी महत्त्वपूर्ण अन्न-आपूर्ति वाले प्रांत की कमान स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इससे पॉम्पे की प्रारंभिक तैयारियाँ अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो सकीं।
सीज़र की तीव्र प्रगति और इटली से पीछे हटना
सीज़र ने युद्ध के आरंभिक चरण में असाधारण गति और साहस का परिचय दिया। गॉल के लंबे अभियानों में प्रशिक्षित उसकी सेना अनुशासित, अनुभवी और अपने सेनानायक के प्रति पूर्णतः निष्ठावान थी। इसके विपरीत, पॉम्पे की सेना में बड़ी संख्या में नए भर्ती सैनिक थे, जिन्हें अभी पर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त नहीं हुआ था। इसी दौरान ऑप्टिमेट्स गुट के प्रमुख नेता लूसियस डोमिटियस एहेनोबार्बस ने कोर्फिनियम नगर की रक्षा का प्रयास किया, किंतु उसे सीज़र ने पराजित कर बंदी बना लिया। उसके लगभग 13,000 सैनिक बाद में सीज़र की सेना में सम्मिलित हो गए, जिससे उसकी सैन्य शक्ति और बढ़ गई।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पॉम्पे ने रोम को खाली करने का निर्णय लिया। उसने सीनेटरों और प्रमुख अधिकारियों को अपने साथ दक्षिण की ओर ब्रुंडिसियम चलने का आदेश दिया। वहाँ से उसने अपनी सेना को सफलतापूर्वक एड्रियाटिक सागर पार कर यूनान के डिर्राखियम (प्राचीन ड्यूरैचियम) पहुँचा दिया। यद्यपि विरोधियों ने इसे पीछे हटना कहा, किंतु सामरिक दृष्टि से यह एक सुविचारित निर्णय था। पूर्वी प्रांतों के संसाधनों और विशाल नौसैनिक शक्ति के आधार पर वह लंबा युद्ध लड़ने की स्थिति में आ गया।
उस समय सीज़र के पास पर्याप्त जहाज़ नहीं थे, इसलिए वह तुरंत पॉम्पे का पीछा नहीं कर सका। उसने पहले हिस्पानिया में स्थित पॉम्पे की सेनाओं को पराजित कर अपनी पश्चिमी सीमा सुरक्षित की और फिर दिसंबर 49 ईसा पूर्व में रोम लौट आया। इस बीच पॉम्पे ने पूर्वी प्रांतों से विशाल सेना संगठित कर ली। उसकी नौसेना ने एड्रियाटिक सागर पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा तथा सीज़र के लिए तैयार किए जा रहे अनेक जहाज़ों को नष्ट कर दिया। इससे इटली और यूनान के बीच समुद्री मार्गों पर पॉम्पे का नियंत्रण स्थापित हो गया।
डिर्राखियम अभियान
इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद जनवरी 48 ईसा पूर्व में सीज़र सात लीजन के साथ एड्रियाटिक सागर पार करने में सफल रहा। उसने दक्षिणी इलिरिकुम में उतरकर ओरिकुम और अपोलोनिया पर अधिकार कर लिया तथा डिर्राखियम की ओर बढ़ा, जो पॉम्पे का प्रमुख रसद और सैन्य केंद्र था। पॉम्पे समय रहते वहाँ पहुँच गया और उसने एप्सस नदी के दूसरी ओर सुदृढ़ शिविर स्थापित कर लिया। कई सप्ताह तक दोनों सेनाएँ आमने-सामने रहीं। कोई भी पक्ष निर्णायक युद्ध का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं था। सीज़र सैनिक संख्या में कमज़ोर था, जबकि पॉम्पे अपनी पारंपरिक रणनीति के अनुसार शत्रु की रसद काटकर उसे धीरे-धीरे कमजोर करना चाहता था।
मार्च 48 ईसा पूर्व के अंत में स्थिति तब बदली जब मार्क एंटनी चार अतिरिक्त लीजन लेकर एड्रियाटिक पार करने में सफल रहा। पॉम्पे ने उसका मार्ग रोकने का प्रयास किया, किंतु स्थानीय समर्थकों द्वारा सूचना मिलने से एंटनी सुरक्षित रहा और अंततः उसकी सेना सीज़र से जा मिली। दोनों सेनाओं के एकत्र होने के बाद पॉम्पे ने स्वयं को दो ओर से घिरने से बचने के लिए पीछे हटना उचित समझा।
सीज़र ने अपनी संयुक्त सेना का पुनर्गठन किया और थेसाली तथा मैसेडोनिया की दिशा में आवश्यक सैन्य तैयारियाँ कीं। इसी बीच पॉम्पे के ज्येष्ठ पुत्र ग्नेयस पॉम्पेयस ने ओरिकुम और लिस्सुस के निकट सीज़र के बेड़े को नष्ट कर दिया। इसके परिणामस्वरूप इटली से अतिरिक्त सैनिक और रसद भेजना लगभग असंभव हो गया। डिर्राखियम पर सीधा आक्रमण करने के लिए सीज़र के पास पर्याप्त घेराबंदी उपकरण नहीं थे। इसलिए उसने एक साहसिक योजना बनाते हुए पॉम्पे के विशाल शिविर को चारों ओर से घेरने और उसकी रसद-पंक्ति को काटने का प्रयास किया। पॉम्पे के पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार था, किंतु सीज़र ने स्थानीय जलस्रोतों का मार्ग बदलकर उसके शिविर में जल और घोड़ों के चारे की कमी उत्पन्न कर दी। लंबे गतिरोध के बाद जुलाई 48 ईसा पूर्व में पॉम्पे ने सीज़र की घेराबंदी रेखा के एक भाग को तोड़ दिया। इससे सीज़र की पूरी योजना विफल हो गई और उसे सुव्यवस्थित ढंग से पीछे हटकर अपोलोनिया की दिशा में जाना पड़ा। डिर्राखियम की यह सफलता गृहयुद्ध में पॉम्पे की सबसे महत्त्वपूर्ण सामरिक उपलब्धियों में गिनी जाती है।
फ़ारसालस की ओर प्रस्थान
इसी समय मेटेलस स्किपियो अपनी सेना के साथ थेसाली पहुँच चुका था। सीज़र ने उसके साथ मिलने से पहले डोमिटियस कैल्विनस की सेना से जुड़ने के उद्देश्य से दक्षिण की ओर कूच किया। मार्ग में उसने गोम्फी नगर पर अधिकार कर अपने सैनिकों को वहाँ लूट की अनुमति दी, जिससे उसकी सेना का मनोबल बढ़ गया। इसके बाद सीज़र फ़ारसालस के निकट पहुँचा और कई दिनों तक पॉम्पे को निर्णायक युद्ध के लिए उकसाता रहा। पॉम्पे अपनी सावधानीपूर्ण रणनीति के कारण खुली लड़ाई से बचना चाहता था, क्योंकि उसे विश्वास था कि रसद संकट के कारण अंततः सीज़र स्वयं कमजोर पड़ जाएगा। किंतु उसके साथ उपस्थित अनेक सीनेटरों और सहयोगी सेनानायकों ने लगातार उस पर निर्णायक युद्ध करने का दबाव डाला। अंततः पॉम्पे ने युद्ध करने का निर्णय लिया।
फ़ारसालस का निर्णायक युद्ध
9 अगस्त 48 ईसा पूर्व को फ़ारसालस के मैदान में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हुईं। पॉम्पे के पास लगभग 38,000 पैदल सैनिक और लगभग 7,000 घुड़सवार थे, जबकि सीज़र की सेना में लगभग 22,000 पैदल सैनिक और केवल 1,000 घुड़सवार थे। संख्या की दृष्टि से स्पष्ट बढ़त पॉम्पे के पक्ष में थी। पॉम्पे की योजना अपनी विशाल अश्वसेना द्वारा सीज़र के बाएँ पंख को घेरकर उसकी सेना को पीछे से तोड़ने की थी। किंतु सीज़र ने इस संभावना का पूर्वानुमान लगाते हुए अपने सर्वश्रेष्ठ पैदल सैनिकों की एक विशेष पंक्ति घुड़सवारों के पीछे तैनात कर दी। जैसे ही पॉम्पे की अश्वसेना ने आक्रमण किया, इन सैनिकों ने भालों और तलवारों से उन पर तीव्र प्रहार किया। पॉम्पे की घुड़सवार सेना घबराकर पीछे हट गई, जिससे उसकी पैदल सेना का बायाँ भाग पूरी तरह असुरक्षित हो गया।

सीज़र ने तुरंत इस अवसर का लाभ उठाया और अपने आरक्षित सैनिकों के साथ निर्णायक आक्रमण कर दिया। दोनों ओर से हुए भीषण प्रहारों के सामने पॉम्पे की सेना बिखर गई। फ़ारसालस की यह पराजय उसके राजनीतिक और सैन्य जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। युद्धभूमि छोड़कर वह समुद्र तट की ओर चला गा, जहाँ से उसने पूर्व की ओर पलायन किया। इस विजय ने जूलियस सीज़र को रोमन गृहयुद्ध में निर्णायक बढ़त दिला दी और रोमन गणराज्य के भविष्य की दिशा बदल दी।
मृत्यु
48 ईसा पूर्व में फ़ारसालस के युद्ध में जूलियस सीज़र से निर्णायक पराजय के बाद ग्नेयस पॉम्पेयस मैग्नस (पॉम्पे) युद्धभूमि से निकलकर पहले मिथिलिनी पहुँचा, जहाँ उसकी पत्नी कॉर्नेलिया उससे आ मिली। उसके अधिकांश सहयोगी या तो युद्ध में मारे जा चुके थे अथवा बंदी बना लिए गए थे। ऐसी परिस्थिति में उसने मिस्र में शरण लेने का निर्णय किया, जहाँ युवा शासक टॉलेमी तेरहवाँ शासन कर रहा था। दूसरी ओर, कैटो ने अफ्रीका जाकर सीज़र के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने का निश्चय किया, जबकि सिसरो और मार्कस जूनियस ब्रूटस सहित अनेक प्रमुख सीनेटरों ने सीज़र से समझौता कर रोम लौटना उचित समझा।
साइप्रस से एक छोटे बेड़े के साथ प्रस्थान करने के बाद पॉम्पे 28 सितंबर 48 ईसा पूर्व को मिस्र के पेलुसियम पहुँचा। उस समय टॉलेमी तेरहवाँ अपनी बहन एवं सह-शासक क्लियोपेट्रा सप्तम के साथ गृहयुद्ध में उलझा हुआ था। जब पॉम्पे मिस्र के अधिकारियों से मिलने के लिए एक छोटी नाव में तट की ओर बढ़ा, तभी मिस्र की सेना में कार्यरत रोमन अधिकारी तथा उसके पूर्व सहयोगी लूसियस सेप्टिमियस ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद उसके शव का अंतिम संस्कार उसके दो सेवकों ने किया, जबकि उसका सिर प्रमाण के रूप में सुरक्षित रख लिया गया।
इतिहासकारों के अनुसार टॉलेमी तेरहवें और उसके सलाहकारों को आशंका थी कि पॉम्पे मिस्र की राजनीति में हस्तक्षेप कर सकता है या राज्य पर अधिकार करने का प्रयास कर सकता है। साथ ही वे यह भी मानते थे कि पॉम्पे की हत्या करके वे जूलियस सीज़र की कृपा प्राप्त कर सकेंगे। किंतु उनकी यह योजना सफल नहीं हुई। सीज़र ने इस हत्या का स्वागत करने के बजाय इसे निंदनीय और विश्वासघातपूर्ण कृत्य माना। बाद में पॉम्पे का सिर उसकी पत्नी कॉर्नेलिया को सौंप दिया गया, जिसने उसे अल्बान पहाड़ियों स्थित उनके पारिवारिक निवास में सम्मानपूर्वक दफना दिया। सिसरो ने उसकी मृत्यु पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘उसका जीवन उसकी शक्ति से अधिक लंबा सिद्ध हुआ।’
विवाह और संतानें
पॉम्पे ने अपने जीवन में कुल पाँच विवाह किए। उसका पहला विवाह 86 ईसा पूर्व में एंटिस्टिया से हुआ, जो 82 ईसा पूर्व में समाप्त हो गया और इससे कोई संतान नहीं हुई। इसके बाद उसने उसी वर्ष एमिलिया स्कौरा से विवाह किया, किंतु प्रसव के दौरान एमिलिया तथा नवजात शिशु दोनों की मृत्यु हो गई। 79 ईसा पूर्व में उसने मुसिया टर्टिया से विवाह किया। यह उसका सबसे लंबा वैवाहिक संबंध था, जो 61 ईसा पूर्व तक चला। इसी विवाह से उसके तीन बच्चे हुए—दो पुत्र- ग्नेयस पॉम्पेयस (पॉम्पे द यंगर) और सेक्स्टस पॉम्पेयस तथा एक पुत्री पॉम्पेया। 59 ईसा पूर्व में उसने जूलियस सीज़र की पुत्री जूलिया से विवाह किया, जिससे दोनों नेताओं का राजनीतिक गठबंधन सुदृढ़ हुआ। किंतु 54 ईसा पूर्व में प्रसव के समय जूलिया तथा कुछ समय बाद नवजात शिशु की मृत्यु हो गई। अंततः 52 ईसा पूर्व में पॉम्पे ने कॉर्नेलिया मेटेला से विवाह किया, किंतु इस विवाह से भी उसकी कोई संतान नहीं हुई।
साहित्यिक महत्त्व
पॉम्पे का जीवन, उसकी असाधारण सैन्य सफलताएँ तथा उसका नाटकीय उत्थान और पतन प्राचीन काल से ही साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का विषय रहा है। उसकी मृत्यु के कुछ समय बाद रोमन कवि मार्कस एन्नायस लूकानुस ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य ‘दे बेलो सिविली’ (फ़ार्सालिया) में सीज़र और पॉम्पे के गृहयुद्ध का विस्तृत चित्रण किया तथा पॉम्पे की मृत्यु के बाद उसकी प्रतिशोधी आत्मा का भी उल्लेख किया।
पुनर्जागरण काल में इंग्लैंड और फ्रांस के अनेक नाटककारों ने भी उसके जीवन को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। जॉर्ज चैपमैन के ‘द वॉर्स ऑफ़ पॉम्पे एंड सीज़र’, थॉमस किड के कॉर्नेलिया’ तथा पियरे कॉर्नेय के ‘ला मोर्त द पॉम्पे’ जैसे नाटकों में उसके जीवन और मृत्यु का प्रभावशाली नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया। आधुनिक युग में भी जॉन मेसफ़ील्ड के ‘द ट्रेजेडी ऑफ़ पॉम्पे द ग्रेट’ तथा कॉलीन मैक्कलॉ, स्टीवन सेलर और रॉबर्ट हैरिस जैसे ऐतिहासिक उपन्यासकारों की कृतियों ने पॉम्पे के व्यक्तित्व को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया। इस प्रकार सैन्य इतिहास, राजनीति और साहित्य तीनों क्षेत्रों में पॉम्पे की विरासत आज भी महत्त्वपूर्ण है।
पॉम्पे महान का महत्त्व
एक महान सेनानायक के रूप में
ग्नेयस पॉम्पेयस मैग्नस (पॉम्पे महान) रोमन गणराज्य के अंतिम चरण के सबसे प्रभावशाली सेनानायकों और राजनेताओं में से एक था। लगभग दो दशकों तक वह रोम का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सैन्य नेता रहा और उसकी विजयों ने भूमध्यसागरीय विश्व में रोमन प्रभुत्व के विस्तार में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि उसके समकालीन सेनानायकों, विशेषकर सर्टोरियस और लूकुलस,ने समय-समय पर उसकी आलोचना की, फिर भी उसकी सैन्य सफलताओं, संगठन क्षमता और प्रशासनिक दक्षता ने उसे असाधारण प्रतिष्ठा दिलाई। उसके दीर्घ सैन्य जीवन में एकमात्र फ़ारसालस के युद्ध में ही उसकी पराजय हुई, जबकि उससे पूर्व उसने अनेक कठिन अभियानों में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त की थी।
पॉम्पे की सैन्य रणनीति का सबसे प्रमुख गुण उसकी व्यावहारिकता, धैर्य और संतुलन था। वह नवीन युद्ध-कौशल का आविष्कारक नहीं था, किंतु सुविचारित योजना, कठोर अनुशासन, संसाधनों के कुशल उपयोग तथा परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता के कारण निरंतर सफल रहा। वह अनावश्यक जोखिम उठाने का पक्षधर नहीं था और जब तक विजय की संभावना सुनिश्चित न हो जाए, तब तक निर्णायक युद्ध से बचना ही उचित समझता था। युद्धभूमि में उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति सैनिकों का मनोबल बढ़ाती थी। विशाल सेनाओं का संचालन, सुदृढ़ रसद व्यवस्था तथा दूरस्थ अभियानों का सफल प्रबंधन उसकी विशिष्ट विशेषताएँ थीं।
सैन्य अभियानों की उपलब्धियाँ
सर्टोरियन युद्ध में पॉम्पे की धैर्यपूर्ण रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। प्रारंभिक कठिनाइयों के बावजूद उसने उतावलेपन में निर्णायक युद्ध करने के स्थान पर सर्टोरियस की शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करने की नीति अपनाई। उसने विद्रोहियों के दुर्गों और नगरों पर अधिकार किया तथा उनके प्रमुख सेनानायकों को पराजित कर उनके संगठन को कमजोर किया। सर्टोरियस की मृत्यु के बाद उसने परपेर्ना के विरुद्ध तीव्र अभियान चलाकर शीघ्र ही विद्रोह का अंत कर दिया।
इसी प्रकार समुद्री डाकुओं के विरुद्ध उसका अभियान उसकी संगठन क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण था। उसने पूरे भूमध्यसागर को अलग-अलग नौसैनिक क्षेत्रों में विभाजित कर अल्प समय में समुद्री डकैती का लगभग पूर्णतः उन्मूलन कर दिया। तृतीय मिथ्रिडेटिक युद्ध में भी उसने मिथ्रिडेट्स षष्ठ और उसके सहयोगियों को पराजित कर एशिया माइनर में रोमन प्रभुत्व को निर्णायक रूप से स्थापित किया। इन विजयों ने उसे अपने युग का सबसे सफल रोमन सेनानायक बना दिया।
राजनीतिक एवं प्रशासनिक योगदान
राजनीतिक जीवन में पॉम्पे का मूल्यांकन अपेक्षाकृत जटिल है। वह न तो क्रांतिकारी था और न ही परंपरावादी प्रतिक्रियावादी। उसका विश्वास था कि उसकी सैन्य उपलब्धियाँ और जनसमर्थन ही उसे स्वाभाविक नेतृत्व प्रदान करेंगे। पूर्वी प्रांतों के पुनर्गठन में उसने असाधारण प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया। उसने सीरिया को रोमन प्रांत बनाया, अनेक आश्रित राज्यों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया तथा स्थानीय प्रशासन को अधिक व्यवस्थित रूप दिया। इन सुधारों के परिणामस्वरूप रोम की पूर्वी सीमा अधिक सुरक्षित हुई, राजस्व में वृद्धि हुई और रोमन शासन की स्थिरता मजबूत हुई। यद्यपि गृहयुद्ध से पूर्व उसने प्रथम ट्रायम्विरेट के माध्यम से सीज़र और क्रैसस के साथ राजनीतिक सहयोग स्थापित किया, किंतु बाद में यही गठबंधन उसके और सीज़र के बीच संघर्ष का कारण बन गया। फ़ारसालस के युद्ध में उसकी पराजय ने उसके राजनीतिक जीवन का अंत कर दिया, किंतु इससे उसके प्रशासनिक और सैन्य योगदान का महत्त्व कम नहीं होता।
व्यक्तित्व और ऐतिहासिक महत्त्व
पॉम्पे का व्यक्तिगत चरित्र भी उल्लेखनीय था। अपने समय के सबसे धनी व्यक्तियों में होने के बावजूद वह अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। वह विशाल संपत्ति का स्वामी था, किंतु विलासिता के अनावश्यक प्रदर्शन से दूर रहा। स्टोइक दार्शनिक पैनेटियस के प्रति उसका सम्मान उसके बौद्धिक और दार्शनिक झुकाव का सूचक है। उसके पारिवारिक जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए, किंतु जूलिया के साथ उसका संबंध विशेष रूप से स्नेहपूर्ण बना रहा। उसकी मृत्यु के बाद भी उनसकी प्रतिष्ठा लंबे समय तक बनी रही। रोमन कवि लूकान ने अपने महाकाव्य ‘फ़ार्सालिया’ में उसके जीवन और गृहयुद्ध का प्रभावशाली चित्रण किया। बाद के अनेक इतिहासकारों और साहित्यकारों ने भी उसे रोमन इतिहास के महानतम सेनानायकों में स्थान दिया। सिसरो जैसे समकालीन राजनेताओं ने भी अंततः संकट की घड़ी में उसके नेतृत्व पर विश्वास व्यक्त किया।
कुल मिलाकर देखा जाए तो पॉम्पे महान ने अपनी सैन्य प्रतिभा, संगठन क्षमता, प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक प्रभाव से रोमन गणराज्य के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। यद्यपि अंततः वह जूलियस सीज़र से पराजित हुए, फिर भी भूमध्यसागरीय विश्व में रोमन प्रभुत्व के विस्तार, पूर्वी प्रांतों के पुनर्गठन तथा रोमन राज्य की शक्ति को सुदृढ़ करने में उस का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। इतिहास में उसका स्थान केवल एक विजयी सेनानायक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक और रोमन गणराज्य के अंतिम महान नेताओं में से एक के रूप में भी सुरक्षित है।


