गायस मारियस (Gaius Marius)

गायस मारियस (Gaius Marius)

गायस मारियस (लगभग 157 ई. पू.–13 जनवरी 86 ई. पू.)

गायस मारियस (लगभग 157 ई. पू.–13 जनवरी 86 ई. पू.) रोमन गणराज्य के एक महान सेनानायक एवं प्रभावशाली राजनेता थे, जिन्होंने अभूतपूर्व रूप से सात बार कॉन्सुल पद धारण किया। अर्पिनम के निकट एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे मारियस ने 134 ई. पू. में नुमंटिया अभियान से अपना सैन्य जीवन आरम्भ किया और शीघ्र ही अपनी योग्यता के बल पर रोमन राजनीति एवं सेना में उच्च स्थान प्राप्त किया। 119 ई. पू. में ट्रिब्यून ऑफ़ द प्लेब्स तथा 115 ई. पू. में प्रेटर बनने के बाद उन्होंने फ़र्दर स्पेन के गवर्नर के रूप में सफलता प्राप्त की। 107 ई. पू. में प्रथम बार कॉन्सुल निर्वाचित होकर उन्होंने जुगर्थिन युद्ध का सफल समापन किया तथा 104–100 ई. पू. के बीच लगातार पाँच बार कॉन्सुल रहते हुए एक्वे सेक्सटिए और वर्सेले के युद्धों में क्रमशः ट्यूटोन्स और सिम्ब्री जनजातियों को पराजित कर रोम को गंभीर संकट से बचाया। बाद के वर्षों में उनका सुला के साथ सत्ता-संघर्ष रोमन गृहयुद्ध का प्रमुख कारण बना, जिसके दौरान उन्हें निर्वासन भी झेलना पड़ा; किंतु वे पुनः रोम लौटे, सत्ता पर अधिकार किया और सातवीं बार कॉन्सुल बने। 86 ई. पू. में सातवें कॉन्सुल पद का कार्यभार संभालने के कुछ ही सप्ताह बाद उनका निधन हो गया। यद्यपि परंपरागत इतिहास-लेखन में उन्हें तथाकथित ‘मारियन सैन्य सुधारों’ का प्रवर्तक बताया गया है, किंतु आधुनिक इतिहासकार इस मत को पूर्णतः स्वीकार नहीं करते और इसे बाद की ऐतिहासिक व्याख्या मानते हैं।

मारियस का आरंभिक जीवन

गायस मारियस का जन्म लगभग 157 ईसा पूर्व में अर्पिनम नगर के निकट स्थित सेरियाटे (सेरेआते) नामक गाँव में हुआ था। यह क्षेत्र चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के अंत में रोमन शासन के अधीन आया था। प्रारंभ में यहाँ के निवासियों को सीमित नागरिकता प्राप्त थी, किंतु 188 ईसा पूर्व में उन्हें पूर्ण रोमन नागरिकता प्रदान कर दी गई।

प्राचीन लेखक प्लूटार्क ने मारियस के पिता को एक साधारण मजदूर बताया है, किंतु उपलब्ध साक्ष्यों से लगता है कि मारियस एक प्रतिष्ठित स्थानीय इक्वेस्ट्रियन (घुड़सवार) परिवार से थे। उनके परिवार का स्थानीय राजनीति में प्रभाव था और रोम के कुलीन परिवारों से भी उनके संबंध थे। यद्यपि रोम की राजनीति में उन्हें ‘नोवुस होमो’ (नया व्यक्ति) होने के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी वे न तो निर्धन थे और न ही साधारण किसान परिवार से थे। उनके परिवार के पास पर्याप्त संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा थी। उनके छोटे भाई मार्कस मारियस ने भी सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था। 134 ईसा पूर्व में मारियस नुमंटिया अभियान के दौरान स्किपिओ एमिलियानस की सेना में एक अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए। इस अभियान में उनकी सैन्य क्षमता ने स्किपिओ एमिलियानस को अत्यंत प्रभावित किया। एक प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार, जब किसी ने स्किपिओ से पूछा कि उनके बाद रोम का योग्य सेनापति कौन होगा, तो उन्होंने मारियस की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘शायद यही व्यक्ति।’

गायस मारियस (Gaius Marius)
गायस मारियस

सैन्य जीवन के प्रारंभिक चरण से ही मारियस की रुचि राजनीति में थी। अपनी योग्यता के आधार पर वे चौबीस विशेष सैन्य ट्रिब्यूनों में चुने गए। इसके बाद उन्होंने संभवतः क्विंटस कैसिलियस मेटेलस बैलेरिकस के अधीन बैलेरिक द्वीपों के अभियान में भाग लिया और उनकी विजय में योगदान दिया। इसके पश्चात मारियस ने अर्पिनम के एक स्थानीय पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। माना जाता है कि इसके बाद उन्होंने रोमन राजनीति में आगे बढ़ने का प्रयास जारी रखा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने क्वेस्टर पद के लिए चुनाव लड़ा, जबकि अन्य का मत है कि वे सीधे प्लेबियन ट्रिब्यून के पद तक पहुँचे। संभवतः 121 ईसा पूर्व में उन्होंने इसरे नदी के युद्ध में भी भाग लिया, जिसमें रोमन सेना की विजय से दक्षिणी गॉल पर रोमन प्रभुत्व और अधिक सुदृढ़ हुआ।

120 ईसा पूर्व में मारियस अगले वर्ष के लिए प्लेबियन ट्रिब्यून निर्वाचित हुए। इस चुनाव में उन्हें कैसिलियस मेटेलस परिवार, विशेषकर लूसियस कैसिलियस मेटेलस डेलमैटिकस का समर्थन प्राप्त था। यद्यपि प्लूटार्क ने मेटेलस परिवार को मारियस का पारंपरिक संरक्षक बताया है, आधुनिक इतिहासकार इस दावे को अतिरंजित मानते हैं। उस समय प्रभावशाली राजनेताओं द्वारा अपने समर्थकों को ट्रिब्यून पद पर निर्वाचित कराने की प्रथा सामान्य थी, जिससे राजनीतिक विरोध और वीटो की संभावना कम हो सके।

मारियस ने जन-प्रतिनिधि (ट्रिब्यून) के रूप में एक ऐसा कानून पारित कराया, जिसने चुनावों में धनी वर्ग के हस्तक्षेप को सीमित कर दिया। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में मौखिक मतदान के स्थान पर गुप्त मतदान (बैलेट) की व्यवस्था लागू की जा चुकी थी, किंतु प्रभावशाली और संपन्न लोग मतपत्रों की जाँच करके मतदाताओं पर दबाव डालने का प्रयास करते थे। इसे रोकने के लिए मारियस ने मतदान-मार्ग को संकरा करने का कानून बनवाया, जिससे बाहरी लोग मतदाताओं को न तो प्रभावित कर सकें और न ही यह जान सकें कि उन्होंने किसके पक्ष में मतदान किया है। यद्यपि प्लूटार्क इस कानून को अत्यंत विवादास्पद बताते हैं, परंतु सिसरो ने अपने विवरण में ‘लेक्स मारिया’ (मारियस का कानून) को सामान्य और निर्विवाद बताया है। प्लूटार्क के अनुसार इसके बाद मारियस ने अनाज वितरण बढ़ाने वाले एक विधेयक पर वीटो लगाकर सामान्य जनता को नाराज़ कर दिया, किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उन्होंने अनाज वितरण बढ़ाने का नहीं, बल्कि प्रचलित व्यवस्था में परिवर्तन करने के प्रस्ताव का विरोध किया था।

कुछ समय बाद 117 ईसा पूर्व में मारियस ने एडाइल पद के लिए चुनाव लड़ा, परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। यह स्पष्ट है कि तब तक उन्होंने पर्याप्त आर्थिक संसाधन अर्जित कर लिए थे, क्योंकि एडाइल पद पर भारी व्यक्तिगत व्यय करना पड़ता था। उनकी पराजय का एक कारण प्रभावशाली मेटेली परिवार का विरोध भी माना जाता है। 116 ईसा पूर्व में वे अगले वर्ष के लिए प्रेटर निर्वाचित हुए, यद्यपि वे सबसे अंतिम स्थान पर रहे। चुनाव के तुरंत बाद उन पर ‘एम्बिटस’ (चुनावी भ्रष्टाचार) का आरोप लगाया गया, जो उस समय रोमन राजनीति में सामान्य बात थी। अंततः वे इस आरोप से निर्दोष सिद्ध हुए और रोम में प्रेटर के रूप में शांतिपूर्वक अपना कार्यकाल पूरा किया। संभवतः उन्होंने ‘प्रेटर पेरेग्रिनस’ अथवा भ्रष्टाचार संबंधी मामलों की अदालत के प्रमुख के रूप में कार्य किया।

114 ईसा पूर्व में उनका कार्यकाल बढ़ा दिया गया और उन्हें ‘हिस्पानिया अल्टिरियर’ (फर्दर स्पेन) का प्रांतीय गवर्नर (प्रो-कॉन्सल) नियुक्त किया गया। वहाँ उन्होंने खनन क्षेत्रों में सक्रिय लुटेरों के विरुद्ध छोटे-छोटे सैन्य अभियान चलाए और लगभग दो वर्षों तक सफलतापूर्वक प्रांत का प्रशासन संभाला। 113 ईसा पूर्व के अंत में वे पर्याप्त निजी संपत्ति अर्जित करके रोम लौटे।

रोम लौटने पर उन्हें विजय-जुलूस (ट्रायम्फ) का सम्मान नहीं मिला, किंतु उन्होंने जूलिया से विवाह किया, जो जूलियस सीज़र के परिवार की सदस्य थीं। जूलियाई (जूलियस) कुल उस समय एक प्रतिष्ठित पैट्रिशियन परिवार था, यद्यपि उसे लंबे समय से सर्वोच्च राजनीतिक पद, अर्थात् कॉन्सल पद, प्राप्त करने में सफलता नहीं मिल रही थी। यह वैवाहिक संबंध दोनों पक्षों के लिए लाभदायक सिद्ध हुआ—मारियस को एक प्रतिष्ठित कुलीन परिवार से संबंध स्थापित करने का सम्मान मिला, जबकि जूलियाई परिवार को आर्थिक सुदृढ़ता और राजनीतिक समर्थन प्राप्त हुआ। उपलब्ध स्रोतों से यह स्पष्ट नहीं होता कि इसके बाद मारियस ने कितनी बार कॉन्सल पद के लिए प्रयास किया, किंतु यह संभावना अवश्य व्यक्त की जाती है कि प्रारंभिक प्रयासों में उन्हें सफलता नहीं मिली।

मेटेलस के अधीन मारियस

112 ईसा पूर्व में जुगुर्था युद्ध का आरंभ न्यूमिडिया के राजा जुगुर्था की महत्त्वाकांक्षी और आक्रामक नीतियों के कारण हुआ। उसने अपने सौतेले भाइयों की हत्या कर सत्ता पर अधिकार कर लिया, गृहयुद्ध के दौरान अनेक इटालियनों का नरसंहार कराया तथा रोमन सीनेट में समर्थन प्राप्त करने के लिए कई प्रभावशाली रोमन नेताओं को रिश्वत दी। युद्ध के प्रारम्भिक चरण में रोम को लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ा। न्यूमिडिया भेजी गई पहली रोमन सेना को कथित रूप से रिश्वत के कारण वापस बुला लिया गया, जबकि दूसरी सेना पराजित हुई और उसे अपमानजनक रूप से ‘जुए के नीचे से’ होकर गुजरना पड़ा। इन पराजयों ने रोमन कुलीन वर्ग की सैन्य एवं प्रशासनिक क्षमता पर जनता का विश्वास कमजोर कर दिया।

यद्यपि ट्रिब्यून और प्रेटर के रूप में कार्य करते समय मारियस के कैसिलिई मेटेली परिवार से मतभेद हो गए थे, फिर भी इस परिवार ने उनके प्रति कोई विशेष शत्रुता नहीं दिखाई। 109 ईसा पूर्व में मारियस ने जुगुर्था के विरुद्ध अभियान में तत्कालीन कॉन्सल क्विंटस कैसिलियस मेटेलस के अधीन लेगेट (सैन्य सहायक) के रूप में कार्य स्वीकार किया। माना जाता है कि मेटेलस ने मारियस के व्यापक सैन्य अनुभव का लाभ उठाया, जबकि मारियस ने इस अवसर का उपयोग अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ाने और भविष्य में कॉन्सल बनने की संभावनाओं को सुदृढ़ करने के लिए किया। उपलब्ध स्रोतों से संकेत मिलता है कि वे मेटेलस के सबसे विश्वसनीय और वरिष्ठ सहयोगियों में से एक थे।

मुथुल के युद्ध में मारियस ने असाधारण सैन्य कौशल का परिचय दिया। जुगुर्था ने रोमन सेना को मुथुल नदी तक पहुँचने से रोक दिया, जहाँ उसे पानी की अत्यंत आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप रोमनों को रेगिस्तानी क्षेत्र में युद्ध लड़ना पड़ा, जहाँ न्यूमिडिया की हल्की घुड़सवार सेना को स्पष्ट सामरिक बढ़त प्राप्त थी। न्यूमिडियनों ने रोमन सेना को छोटी-छोटी टुकड़ियों में विभाजित कर दिया, जिससे प्रत्येक दल को अलग-अलग संघर्ष करना पड़ा। इस संकट की घड़ी में मारियस ने बिखरे हुए सैनिकों को पुनः संगठित किया और लगभग 2,000 सैनिकों के साथ न्यूमिडियनों की पंक्तियों को चीरते हुए मेटेलस की सेना से जा मिले। इसके बाद दोनों सेनानायकों ने संयुक्त रूप से पहाड़ी पर तैनात न्यूमिडियन पैदल सेना पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। फिर उन्होंने अपनी सेना को न्यूमिडियन घुड़सवार सेना के पीछे से हमला करने का आदेश दिया। इस रणनीति से रोमन सेना को निर्णायक बढ़त मिली और अंततः न्यूमिडियन सेना को युद्धभूमि छोड़कर पीछे हटना पड़ा।

कॉन्सुल पद के लिए चुनाव

108 ईसा पूर्व तक मारियस ने कॉन्सुल पद के लिए चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिया था। उन्होंने रोम लौटने की अनुमति माँगी, किंतु उनके सेनापति क्विंटस कैसिलियस मेटेलस ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया। कहा जाता है कि मेटेलस ने उन्हें सलाह दी कि वे उनके पुत्र के कॉन्सुल बनने तक प्रतीक्षा करें, जबकि उस समय उनका पुत्र अभी बहुत युवा था। इसके बावजूद मारियस ने अपने चुनाव अभियान की तैयारी प्रारंभ कर दी। इतिहासकार सैलस्ट के अनुसार, एक भविष्यवक्ता ने उन्हें महान सफलता का आश्वासन दिया था और देवताओं पर विश्वास रखते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करने की सलाह दी थी।

मारियस ने अपनी सादगी, अनुशासन और परिश्रम के कारण सैनिकों का विश्वास और सम्मान प्राप्त कर लिया। वे सैनिकों के साथ भोजन करते थे और हर प्रकार के कठिन कार्य में स्वयं भाग लेते थे। उन्होंने इतालवी व्यापारियों का भी समर्थन हासिल किया। उनका दावा था कि यदि उन्हें सेना की कमान मिले, तो वे मेटेलस की अपेक्षा आधी सेना के साथ ही कुछ दिनों में जुगुर्था को पराजित कर सकते हैं। सैनिकों और व्यापारियों ने रोम भेजे गए अपने पत्रों में मारियस की प्रशंसा की तथा उन्हें युद्ध शीघ्र समाप्त करने में सक्षम बताया, जबकि मेटेलस की धीमी और क्रमिक रणनीति की आलोचना की।

109–108 ईसा पूर्व की शीत ऋतु में वागा नगर में तैनात एक रोमन छावनी पर अचानक आक्रमण हुआ, जिसमें लगभग पूरी टुकड़ी नष्ट हो गई। छावनी के कमांडर टाइटस टर्पिलियस सिलानस बिना किसी चोट के बच निकले। प्रारंभ में मारियस ने उन पर कायरता का आरोप लगाकर मृत्युदंड देने का समर्थन किया, लेकिन बाद में उन्होंने स्वयं इस दंड को अत्यधिक कठोर बताया। इसी समय उन्होंने रोम में ऐसे पत्र भी भेजे, जिनमें आरोप लगाया कि मेटेलस अपने व्यापक सैन्य अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं और सत्ता से अत्यधिक मोह रखने लगे हैं।

अपने असंतुष्ट सहयोगी से सावधान होकर मेटेलस ने अंततः मारियस को रोम लौटने की अनुमति दे दी। प्राचीन स्रोतों में इस बात पर मतभेद है कि वे चुनाव प्रचार के लिए समय पर पहुँचे या नहीं, किंतु इतना स्पष्ट है कि उन्हें अपने पक्ष में प्रभावी ढंग से प्रचार करने का अवसर मिल गया।

जुगुर्था के विरुद्ध युद्ध को शीघ्र समाप्त करने की बढ़ती जन-अपेक्षा तथा युद्ध संचालन को लेकर सीनेट के प्रति इक्वेस्ट्रियन वर्ग की असंतुष्टि के बीच, मारियस 107 ईसा पूर्व के लिए कॉन्सुल निर्वाचित हुए। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान मेटेलस की धीमी युद्ध-नीति की खुलकर आलोचना की। यद्यपि सीनेट ने न्यूमिडिया में मेटेलस का कार्यकाल बढ़ा दिया था, जिससे मारियस को सेना की कमान नहीं मिल सकती थी, फिर भी उन्होंने अपने सहयोगी ट्रिब्यून टाइटस मैनियस मैनसिनस के माध्यम से जनसभा (कॉन्सिलियम प्लेबिस) से सीनेट का निर्णय बदलवा दिया और जुगुर्था के विरुद्ध अभियान की कमान अपने हाथ में ले ली। मेटेलस ने व्यक्तिगत रूप से मारियस को सेना का नेतृत्व सौंपने से इनकार किया और रोम लौट गए। वहाँ उनकी सेवाओं के सम्मान में उन्हें विजय-जुलूस (ट्रायम्फ) मनाने का अधिकार तथा ‘न्यूमिडिकस’ की उपाधि प्रदान की गई।

मारियस को न्यूमिडिया में कमान

न्यूमिडिया में सेना की शक्ति बढ़ाने और शीघ्र विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से मारियस को सैनिकों की भर्ती में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय रोमन परंपरा के अनुसार सामान्यतः केवल संपत्ति रखने वाले नागरिकों को ही सेना में भर्ती किया जाता था। यद्यपि सीनेट ने उन्हें सैनिक भर्ती की अनुमति दे दी थी, फिर भी पर्याप्त संख्या में योग्य सैनिक उपलब्ध नहीं थे। इसलिए मारियस ने विजय और युद्ध-लाभ का आश्वासन देकर स्वयंसेवकों, विशेष रूप से सेवानिवृत्त अनुभवी सैनिकों (इवोकाती) को भर्ती किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने पहली बार बड़ी संख्या में भूमिहीन नागरिकों (कैपिटे सेन्सी) को भी स्वेच्छा से सेना में शामिल किया। दक्षिणी इटली में सेना संगठित करने के बाद वे अफ्रीका के लिए रवाना हुए और अपनी घुड़सवार सेना की जिम्मेदारी अपने नव-निर्वाचित क्वेस्टर लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला को सौंप दी।

अफ्रीका पहुँचने पर मारियस को शीघ्र ही यह अनुभव हुआ कि जुगुर्था को पराजित करना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन था। जुगुर्था गुरिल्ला युद्ध की नीति अपनाए हुए था और परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि मेटेलस की धीमी किंतु प्रभावी रणनीति से बेहतर कोई अन्य उपाय दिखाई नहीं देता था। 107 ईसा पूर्व में मारियस ने सिरटा के निकट एक युद्ध में सफलता प्राप्त की। वर्ष के अंत में उन्होंने रेगिस्तान के कठिन मार्ग से होकर दक्षिण में स्थित कैपसा नगर पर अचानक आक्रमण किया। नगर के आत्मसमर्पण के बाद वहाँ के वयस्क पुरुषों का वध कर दिया गया, शेष लोगों को दास बना लिया गया, नगर को नष्ट कर दिया गया तथा प्राप्त लूट सैनिकों में बाँट दी गई। इसके बाद उन्होंने लगातार दबाव बनाए रखते हुए जुगुर्था को दक्षिण और पश्चिम की ओर मॉरिटानिया की दिशा में पीछे हटने पर विवश कर दिया। इसी अभियान के दौरान सुल्ला ने एक कुशल और लोकप्रिय अधिकारी के रूप में अपनी योग्यता भी सिद्ध की।

उधर जुगुर्था ने अपने ससुर, मॉरिटानिया के राजा बोक्कस, को रोम के विरुद्ध युद्ध में शामिल करने का प्रयास किया। 106 ईसा पूर्व में मारियस अपनी सेना के साथ पश्चिम की ओर बढ़े और मोलोचाथ नदी के निकट एक दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस अभियान के कारण वे बोक्कस के राज्य की सीमा के निकट पहुँच गए। शीघ्र ही न्यूमिडिया और मॉरिटानिया की संयुक्त सेनाओं ने उन पर अचानक आक्रमण कर दिया। उस समय रोमन सेना युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी, इसलिए मारियस ने रक्षात्मक घेरा बनाकर अपनी सेना को संगठित किया। शत्रु की घुड़सवार सेना के तीव्र आक्रमण के कारण मारियस अपनी मुख्य सेना सहित एक पहाड़ी पर घिर गए, जबकि सुल्ला दूसरी पहाड़ी पर अपने सैनिकों के साथ डटे रहे। रोमन सैनिकों ने पूरे दिन शत्रु का सामना किया और संध्या होते-होते विरोधी सेना पीछे हट गई। अगले दिन प्रातःकाल मारियस ने शत्रु के असुरक्षित शिविर पर अचानक आक्रमण किया, जिससे न्यूमिडिया और मॉरिटानिया की संयुक्त सेना को निर्णायक पराजय मिली।

इसके बाद मारियस अपनी सेना को लेकर सिरटा की ओर बढ़े, जहाँ उन्होंने शीतकालीन पड़ाव स्थापित किया। पीछे हटती रोमन सेना पर शत्रु की हल्की घुड़सवार सेना लगातार आक्रमण करती रही, किंतु सुल्ला ने उन्हें सफलतापूर्वक पीछे धकेल दिया। अब यह स्पष्ट हो गया था कि केवल सैन्य बल से जुगुर्था की गुरिल्ला युद्ध-नीति को समाप्त करना कठिन होगा। इसलिए मारियस ने बोक्कस के साथ पुनः कूटनीतिक वार्ता आरंभ की। यद्यपि बोक्कस युद्ध में भाग ले चुका था, फिर भी उसने औपचारिक रूप से रोम के विरुद्ध युद्ध की घोषणा नहीं की थी।

अंततः मारियस और बोक्कस के बीच एक समझौता हुआ। इसके अनुसार सुल्ला, जो बोक्कस के दरबार के कुछ प्रमुख व्यक्तियों का विश्वासपात्र था, उसके शिविर में गया। वहाँ बोक्कस ने जुगुर्था के शेष समर्थकों का अंत कर उसे बंदी बना लिया और बेड़ियों में जकड़कर सुल्ला के हवाले कर दिया। इस समझौते के बाद बोक्कस ने जुगुर्था के राज्य के पश्चिमी भाग पर अधिकार कर लिया और रोम का सहयोगी बन गया। जुगुर्था को रोम लाकर टुलियानम कारागार में बंद कर दिया गया। बाद में 104 ईसा पूर्व में मारियस के विजय-जुलूस के उपरांत उसकी मृत्यु हो गई।

जुगुर्था की गिरफ्तारी के बाद यह विवाद उत्पन्न हुआ कि उसकी गिरफ्तारी का श्रेय किसे मिलना चाहिए। रोमन परंपरा के अनुसार, अभियान का सर्वोच्च सेनापति होने के कारण यह सम्मान मारियस को मिलना चाहिए था। किंतु सुल्ला और उसके समर्थक कुलीनों ने जुगुर्था की गिरफ्तारी में सुल्ला की प्रत्यक्ष भूमिका को अधिक महत्व दिया। यही विवाद आगे चलकर मारियस और सुल्ला के बीच गहरी राजनीतिक और व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का प्रारंभिक कारण बना।

मारियस के संभावित सैन्य सुधार

उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने, विशेषकर जर्मन विद्वानों के प्रभाव में, यह मत स्थापित किया कि 107–100 ईसा पूर्व के बीच गायस मारियस ने रोमन सेना में व्यापक और स्थायी सुधार किए, जिन्हें बाद में ‘मारियन सुधार’ कहा गया। इस धारणा के अनुसार उन्होंने सैनिकों की कमी को दूर करने के लिए निर्धन नागरिकों (प्रोलेटारी) को स्वेच्छा से सेना में भर्ती होने की अनुमति दी, जिससे रोमन सेना एक पेशेवर सैन्य बल में परिवर्तित हो गई। साथ ही, नागरिक घुड़सवार सेना और हल्की पैदल सेना की भूमिका में कमी, पिलम (भाले) के स्वरूप में परिवर्तन, चील (ईगल) को सेना का प्रमुख ध्वज बनाना तथा मैनिपल के स्थान पर कोहोर्ट को मुख्य सामरिक इकाई के रूप में अपनाने का श्रेय भी उन्हें दिया गया। इसके अतिरिक्त, सैनिकों को अपना अधिकांश सामान स्वयं ढोने का प्रशिक्षण देने के कारण उनके सैनिक ‘मारियस के खच्चर’ कहलाए, जिससे सेना की गति, अनुशासन और अभियान क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

आधुनिक इतिहासकार इन तथाकथित ‘मारियन सुधारों’ को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार 107 ईसा पूर्व में निर्धन नागरिकों की भर्ती एक असाधारण और अस्थायी उपाय था, जिसे नुमिडिया तथा बाद में सिम्ब्री संकट जैसी विशेष परिस्थितियों में अपनाया गया था; इससे रोमन सेना की सामाजिक संरचना में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं हुआ। अधिकांश प्राचीन स्रोत भी यह संकेत देते हैं कि गणराज्य के अंतिम चरण तक सेना का गठन मुख्यतः अनिवार्य भर्ती के आधार पर होता रहा और सैनिकों का अधिकांश भाग ग्रामीण नागरिकों से ही आता था। इसी प्रकार, पिलम, ईगल ध्वज, कोहोर्ट प्रणाली तथा अन्य सुधारों को सीधे मारियस से जोड़ने के पर्याप्त समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। आधुनिक विद्वानों का मत है कि रोमन गृहयुद्धों का वास्तविक कारण सेना की संरचना नहीं, बल्कि सोशल वॉर के बाद उत्पन्न राजनीतिक एवं सामाजिक संकट, सेनापतियों के बीच सत्ता-संघर्ष तथा सेवानिवृत्त सैनिकों को भूमि देने की राजनीति थी। इसलिए आज अधिकांश इतिहासकार ‘मारियन सुधारों’ को किसी एक व्यक्ति द्वारा किए गए व्यापक सैन्य परिवर्तन के बजाय बाद के इतिहास-लेखन की एक व्याख्या मानते हैं।

सिम्ब्री और ट्यूटोन्स

109 ईसा पूर्व में सिम्ब्री नामक एक जर्मनिक जनजाति गॉल (वर्तमान फ्रांस) में पहुँची और मार्कस जूनियस सिलानस के नेतृत्व वाली रोमन सेना को पराजित कर दिया। इस पराजय से रोम की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा और दक्षिणी गॉल की उन सेल्टिक जनजातियों में भी असंतोष फैल गया, जिन्हें रोम ने हाल ही में अपने अधीन किया था।

107 ईसा पूर्व में कॉन्सुल लूसियस कैसियस लॉन्गिनस को टिगुरिनी जनजाति ने बुरी तरह पराजित किया। उनकी सेना के बचे हुए सैनिकों को केवल अपना आधा सामान छोड़ने और अपमानजनक रूप से ‘जुए के नीचे से’ होकर गुजरने के बाद ही प्राणरक्षा का अवसर मिला। अगले वर्ष, 106 ईसा पूर्व में, कॉन्सुल क्विंटस सर्विलियस कैपिओ नई सेना लेकर गॉल भेजे गए। उनका कार्यकाल बढ़ा दिया गया और 105 ईसा पूर्व के कॉन्सुल ग्नेअस मैलियस मैक्सिमस को भी एक अन्य सेना के साथ दक्षिणी गॉल भेजा गया। किंतु कैपिओ और मैलियस के बीच व्यक्तिगत वैमनस्य इतना अधिक था कि दोनों सेनापति एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के लिए तैयार नहीं हुए।

इसी दौरान सिम्ब्री और ट्यूटोन्स जनजातियाँ रोन नदी के क्षेत्र में पहुँच गईं। कैपिओ नदी के पश्चिमी तट पर थे, जबकि मैलियस पूर्वी तट पर अपनी सेना के साथ डेरा डाले हुए थे। कैपिओ ने मैलियस की सहायता करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। रोमन सीनेट भी दोनों सेनापतियों के बीच समन्वय स्थापित कराने में असफल रही। परिणामस्वरूप 105 ईसा पूर्व में अराउसियो के युद्ध में सिम्ब्री ने पहले कैपिओ की सेना को पराजित किया। पीछे हटते हुए उसके सैनिक मैलियस की सेना से जा मिले, जिससे दोनों सेनाएँ अव्यवस्थित हो गईं। संख्या में कहीं अधिक सिम्ब्री योद्धाओं ने इस अवसर का लाभ उठाकर दोनों रोमन सेनाओं को लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। यह रोम की सबसे भीषण सैन्य पराजयों में से एक थी।

अराउसियो की पराजय का समाचार उसी समय रोम पहुँचा, जब मारियस जुगुर्था के विरुद्ध अपना अभियान सफलतापूर्वक पूरा कर चुके थे। उस समय गणराज्य के पास ऐसा कोई अन्य सेनापति नहीं था, जिसने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय सैन्य सफलता प्राप्त की हो। इसलिए रोमन जनता ने परंपरागत नियमों की उपेक्षा करते हुए मारियस को उनकी अनुपस्थिति में ही लगातार दूसरी बार कॉन्सुल चुन लिया। यद्यपि यह निर्णय प्रचलित संवैधानिक परंपराओं के विरुद्ध था, फिर भी जनसभा के अधिकारों के आधार पर इसे वैध माना गया और मारियस को पुनः कॉन्सुल निर्वाचित कर दिया गया।

मारियस कॉन्सुल के रूप में

जब जनसभा ने मारियस को 104 ईसा पूर्व के लिए कॉन्सुल निर्वाचित किया, उस समय वे अभी भी अफ्रीका में थे। अपने कार्यकाल के आरंभ में वे जुगुर्था पर विजय प्राप्त करके रोम लौटे। उन्होंने विजय-जुलूस निकाला और उत्तर अफ्रीका से प्राप्त धन-संपत्ति भी रोम लाई। जुगुर्था, जिसने कभी यह दावा किया था कि रोम को धन से खरीदा जा सकता है, विजय-जुलूस के दौरान बेड़ियों में बाँधकर रोम की सड़कों पर घुमाया गया और बाद में उसे रोमन कारागार में मृत्यु दंड दिया गया।

सिम्ब्री जनजातियों से उत्पन्न गंभीर संकट का सामना करने के लिए मारियस को गॉल प्रांत की जिम्मेदारी सौंपी गई। वहाँ पहुँचकर उन्होंने रोमन सेना का पुनर्गठन किया। उन्होंने पहले से प्रशिक्षित सैनिकों को आधार बनाकर नई सेना तैयार की और एक बार फिर सैनिक भर्ती के लिए संपत्ति संबंधी शर्तों में छूट प्राप्त की। अपनी बढ़ती प्रतिष्ठा के बल पर उन्होंने लगभग 30,000 रोमन सैनिकों तथा 40,000 इतालवी सहयोगी और सहायक सैनिकों की सेना संगठित की। इसके बाद उन्होंने एक्वे सेक्सटिए के निकट अपना सैन्य शिविर स्थापित किया और सैनिकों को कठोर प्रशिक्षण देना प्रारंभ किया। उनके प्रमुख सहयोगियों में उनके पूर्व क्वेस्टर लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला भी थे, जिससे स्पष्ट होता है कि उस समय दोनों के बीच कोई गंभीर मतभेद नहीं था।

104 ईसा पूर्व में ही मारियस 103 ईसा पूर्व के लिए पुनः कॉन्सुल निर्वाचित हुए। यद्यपि वे प्रोकॉन्सुल के रूप में भी सेना का नेतृत्व कर सकते थे, फिर भी उन्हें दोबारा कॉन्सुल चुना गया। संभवतः इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सेना की कमान को लेकर वैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, जैसी पहले कैपिओ और मैलियस के बीच देखने को मिली थी। कुछ प्राचीन लेखकों ने यह संकेत दिया है कि इस अवधि में उनके सह-कॉन्सुल का प्रभाव बहुत कम था, किंतु आधुनिक इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते।

103 ईसा पूर्व तक सिम्ब्री जनजातियाँ अभी भी हिस्पानिया से बाहर नहीं निकली थीं। इसी दौरान मारियस के सह-कॉन्सुल की मृत्यु हो गई, जिसके कारण उन्हें नए चुनाव कराने के लिए रोम लौटना पड़ा। उस समय यह निश्चित नहीं था कि वे फिर से कॉन्सुल चुने जाएंगे, क्योंकि सिम्ब्री संकट का अभी तक कोई निर्णायक समाधान नहीं निकला था। किंतु ट्रिब्यून लूसियस एपुलेयस सैटर्निनस के समर्थन तथा अन्य उम्मीदवारों की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति के कारण मारियस 102 ईसा पूर्व के लिए एक बार फिर कॉन्सुल निर्वाचित हो गए। इस बार उनके सह-कॉन्सुल क्विंटस लुटाटियस कैटुलस थे।

अपने लगातार कॉन्सुल कार्यकालों के दौरान मारियस ने समय व्यर्थ नहीं किया। उन्होंने अपनी सेना को निरंतर प्रशिक्षण दिया, प्रभावी गुप्तचर व्यवस्था विकसित की और गॉल की सीमा पर रहने वाली विभिन्न जनजातियों के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित कर संभावित आक्रमण की तैयारी जारी रखी।

मारियस का जर्मनिक जनजातियों के साथ संघर्ष

102 ईसा पूर्व के लिए मारियस का पुनः कॉन्सुल चुना जाना शीघ्र ही उचित सिद्ध हुआ। उसी समय सिम्ब्री जनजाति हिस्पानिया से लौटकर अन्य जर्मनिक और सेल्टिक जनजातियों के साथ इटली की ओर बढ़ने लगी। उनकी योजना के अनुसार ट्यूटोन्स और उनके सहयोगी एम्ब्रोन्स दक्षिण की ओर बढ़ते हुए भूमध्यसागरीय तट के मार्ग से इटली में प्रवेश करते, जबकि सिम्ब्री उत्तर में ब्रेनर दर्रे से आल्प्स पार करते। दूसरी ओर, टिगुरिनी जनजाति उत्तर-पूर्वी आल्प्स के मार्ग से आक्रमण करने वाली थी। इस खतरे का सामना करने के लिए दोनों कॉन्सुलों ने अपनी सेनाएँ बाँट दीं। मारियस ने गॉल के पश्चिमी क्षेत्र की रक्षा का दायित्व संभाला, जबकि क्विंटस लुटाटियस कैटुलस को उत्तरी इटली और आल्प्स क्षेत्र की सुरक्षा सौंपी गई।

गॉल में मारियस ने ट्यूटोन्स और एम्ब्रोन्स के साथ तुरंत निर्णायक युद्ध करने के बजाय धैर्य और सावधानी की नीति अपनाई। उन्होंने अपनी सेना को एक सुदृढ़ किलेबंद शिविर में रखा और शत्रु के सभी आक्रमण विफल कर दिए। जब ट्यूटोन्स शिविर पर अधिकार करने में असफल रहे, तो वे आगे बढ़ गए। मारियस भी उनकी गतिविधियों पर लगातार नज़र रखते हुए उचित अवसर की प्रतीक्षा करते रहे।

एक्वे सेक्सटिए (वर्तमान एक्स-एन-प्रोवेंस) के निकट अचानक एक छोटी-सी झड़प बड़े युद्ध में बदल गई। रोमन शिविर के कुछ सेवक पानी लेने गए थे, जहाँ उनकी एम्ब्रोन्स के सैनिकों से कहासुनी हो गई। यह घटना शीघ्र ही दोनों सेनाओं के बीच भीषण संघर्ष में परिवर्तित हो गई। इस युद्ध में रोमन सेना ने एम्ब्रोन्स को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया और उनके लगभग 30,000 सैनिक मारे गए।

अगले दिन ट्यूटोन्स और एम्ब्रोन्स ने रोमन सेना पर संगठित आक्रमण किया। इसी समय मारियस के अधिकारी मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस ने लगभग 3,000 सैनिकों के साथ शत्रु की पीछे हटने की राह रोक दी। परिणामस्वरूप शत्रु दोनों ओर से घिर गया और युद्ध एक भीषण नरसंहार में बदल गया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार इस अभियान में लगभग एक से दो लाख जर्मनिक योद्धा मारे गए या बंदी बना लिए गए। विजय के बाद मारियस ने रोम को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि लगभग 37,000 प्रशिक्षित रोमन सैनिकों ने दो युद्धों में एक लाख से अधिक जर्मनिक योद्धाओं को पराजित किया।

गायस मारियस (Gaius Marius)
गायस मारियस

उधर मारियस के सह-कॉन्सुल क्विंटस लुटाटियस कैटुलस को उतनी सफलता नहीं मिली। ट्राइडेंटम के निकट एक पहाड़ी घाटी में हुए संघर्ष में उनकी सेना को क्षति पहुँची, जिसके बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा। इसका लाभ उठाकर सिम्ब्री उत्तरी इटली में प्रवेश करने में सफल हो गए। वहाँ उन्होंने अपनी सेना का पुनर्गठन किया और आल्प्स के अन्य मार्गों से आने वाले अपने सहयोगियों की प्रतीक्षा करने लगे।

वर्सेले का युद्ध और पाँचवाँ कॉन्सुल पद

एक्वे सेक्सटिए में पश्चिमी आक्रमणकारी जनजातियों को पराजित करने के कुछ ही समय बाद मारियस को यह समाचार मिला कि उन्हें 101 ईसा पूर्व के लिए लगातार चौथी बार तथा कुल मिलाकर पाँचवीं बार कॉन्सुल चुना गया है। उनके सह-कॉन्सुल उनके निकट सहयोगी मैनियस एक्विलियस थे। चुनाव के बाद मारियस विजय-जुलूस मनाने के बजाय केवल अपनी सफलता की घोषणा करने के लिए रोम पहुँचे और फिर तुरंत अपनी सेना लेकर उत्तर की ओर बढ़ गए, जहाँ उन्होंने कैटुलस की सेना से जाकर मोर्चा संभाला। कैटुलस का कार्यकाल बढ़ा दिया गया था, क्योंकि दूसरे कॉन्सुल मैनियस एक्विलियस को सिसिली में दासों के विद्रोह को दबाने के लिए भेजा गया था।

101 ईसा पूर्व की जुलाई के अंत में सिम्ब्री जनजाति के प्रतिनिधियों और रोमन अधिकारियों के बीच एक भेंट हुई। सिम्ब्री ने रोमनों को ट्यूटोन्स और एम्ब्रोन्स की ओर से आने वाले आक्रमण की धमकी दी, किंतु उन्हें बताया गया कि वे दोनों जनजातियाँ पहले ही पराजित हो चुकी हैं। इसके बाद दोनों पक्ष युद्ध के लिए तैयार हो गए।

वर्सेले के युद्ध (जिसे रौडाइन मैदान का युद्ध भी कहा जाता है) में रोमन सेना ने सिम्ब्री को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। युद्ध के दौरान सुल्ला की घुड़सवार सेना ने सिम्ब्री को पीछे से घेर लिया, कैटुलस की पैदल सेना ने उनके अग्रिम मार्ग को रोक दिया और मारियस ने पार्श्व से आक्रमण किया। इस संयुक्त रणनीति के कारण सिम्ब्री सेना पूरी तरह टूट गई। प्राचीन स्रोतों के अनुसार लगभग 1,20,000 सिम्ब्री मारे गए तथा शेष को बंदी बनाकर दास बना लिया गया। इस पराजय के बाद टिगुरिनी जनजाति ने भी इटली पर आक्रमण का विचार त्याग दिया और अपने क्षेत्र लौट गई।

रोम में पंद्रह दिनों तक विजय के उपलक्ष्य में धन्यवाद समारोह आयोजित किए गए। इसके बाद मारियस और कैटुलस ने संयुक्त रूप से विजय-जुलूस निकाला। यद्यपि कुछ प्राचीन लेखकों ने मारियस को ‘रोम का तीसरा संस्थापक’ कहा है, आधुनिक इतिहासकार इस उपाधि की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त करते हैं। फिर भी जनता की दृष्टि में जर्मनिक आक्रमणों का निर्णायक अंत करने का सबसे बड़ा श्रेय मारियस को ही प्राप्त हुआ। इसी समय उनके सह-कॉन्सुल मैनियस एक्विलियस ने सिसिली में दूसरे दास विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया।

अपनी सैन्य सफलताओं और बढ़ती लोकप्रियता के कारण मारियस ने एक बार फिर कॉन्सुल बनने का निश्चय किया। उनका उद्देश्य अपने अनुभवी सैनिकों के लिए भूमि की व्यवस्था करना और अपनी विजयों का पूरा राजनीतिक लाभ प्राप्त करना था। परिणामस्वरूप वे 100 ईसा पूर्व के लिए लूसियस वैलेरियस फ्लैकस के साथ पुनः कॉन्सुल निर्वाचित हुए।

मारियस को छठा कॉन्सुल पद

100 ईसा पूर्व में अपने छठे कॉन्सुल कार्यकाल के दौरान मारियस का सामना ट्रिब्यून लूसियस एपुलेयस सैटर्निनस से हुआ, जो दूसरी बार इस पद पर निर्वाचित हुआ था। सैटर्निनस ने ग्रैक्की बंधुओं की परंपरा का अनुसरण करते हुए अनेक सुधार प्रस्तावित किए। अपने एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या के बाद उसने ऐसे विधेयक प्रस्तुत किए, जिनमें मेटेलस न्यूमिडिकस को निर्वासित करना, सरकारी अनाज को सस्ता करना तथा मारियस के पूर्व सैनिकों और इतालवी सहयोगियों को उपनिवेशों में भूमि प्रदान करना शामिल था।

प्रारंभ में मारियस ने भूमि-वितरण और मेटेलस न्यूमिडिकस के निर्वासन संबंधी प्रस्तावों का समर्थन किया तथा सैटर्निनस और उसके सहयोगी ग्लौसिया के साथ मिलकर कार्य किया। किंतु जब उनकी नीतियाँ अधिक उग्र होती गईं, तो उन्होंने उनसे दूरी बना ली। बाद में मारियस ने ग्लौसिया को कॉन्सुल पद का उम्मीदवार बनने से रोकने का प्रयास किया। इसके उत्तर में सैटर्निनस और ग्लौसिया के समर्थकों ने चुनाव के दौरान अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गैयस मेमियस की हत्या करवा दी, जिसके कारण चुनाव स्थगित कर दिए गए।

स्थिति बिगड़ने पर सीनेट ने सेनाटुस कंसल्टुम अल्टिमुम (आपातकालीन आदेश) जारी किया और राज्य में शांति स्थापित करने के लिए मजिस्ट्रेटों को आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार दे दिया। मारियस ने सेना बुलाने के बजाय नगर के नागरिकों और अपने पूर्व सैनिकों से स्वयंसेवक एकत्र किए। उन्होंने कैपिटोलिन पहाड़ी की जलापूर्ति बंद कर दी और सैटर्निनस तथा उसके समर्थकों को घेरकर आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया।

आत्मसमर्पण के बाद मारियस ने सैटर्निनस और उसके साथियों को सुरक्षित रखकर उन पर विधिसम्मत मुकदमा चलाने का प्रयास किया। किंतु उत्तेजित भीड़ ने सीनेट भवन की छत पर चढ़कर टाइलें उखाड़ लीं और उन्हें नीचे बंद कैदियों पर फेंकना शुरू कर दिया। इस हिंसक हमले में सैटर्निनस और उसके अधिकांश साथी मारे गए। ग्लौसिया को भी उसके छिपने के स्थान से निकालकर भीड़ ने मार डाला।

इन घटनाओं के दौरान मारियस ने सीनेट के आदेशों का पालन करते हुए यह दिखाने का प्रयास किया कि वे गणराज्य की पारंपरिक व्यवस्था और सीनेट के प्रति निष्ठावान हैं। उनका उद्देश्य स्वयं को एक उत्तरदायी और सम्मानित राजनेता के रूप में स्थापित करना था, न कि केवल एक लोकप्रिय सेनानायक के रूप में।

फिर भी इस संकट से मारियस की राजनीतिक प्रतिष्ठा को विशेष लाभ नहीं मिला। पद छोड़ने के बाद मेटेलस न्यूमिडिकस के समर्थकों ने उनके निर्वासन का विरोध किया और उन्हें वापस बुलाने की माँग की। यद्यपि कुछ प्राचीन स्रोतों में कहा गया है कि इस घटना के बाद मारियस ने अपने अनेक समर्थक खो दिए, आधुनिक इतिहासकार इस निष्कर्ष से पूर्णतः सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, इन घटनाओं के बाद मारियस सक्रिय राजनीति से कुछ दूरी बनाकर एक वरिष्ठ राजनेता के रूप में अपेक्षाकृत शांत सार्वजनिक जीवन व्यतीत करने लगे।

मारियस 90 ईसा पूर्व के दशक में

100 ईसा पूर्व की घटनाओं के बाद मारियस ने प्रारंभ में मेटेलस न्यूमिडिकस की वापसी का विरोध किया, जिन्हें पहले सैटर्निनस ने निर्वासित करवा दिया था। किंतु जब यह स्पष्ट हो गया कि उनका विरोध सफल नहीं होगा, तो 98 ईसा पूर्व में मारियस पूर्व की ओर गैलेटिया चले गए। उन्होंने इस यात्रा का कारण देवी मैग्ना मेटर से की गई अपनी एक मन्नत को पूरा करना बताया।

प्राचीन लेखक प्लूटार्क के अनुसार यह यात्रा वास्तव में एक प्रकार का स्वैच्छिक निर्वासन थी। उनके मत में, छह बार कॉन्सुल रह चुके मारियस की राजनीतिक प्रतिष्ठा इतनी गिर चुकी थी कि उन्हें 97 ईसा पूर्व में सेंसर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी भी वापस लेनी पड़ी। प्लूटार्क यह भी उल्लेख करते हैं कि पूर्व में रहते हुए मारियस ने पोंटस के राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठम् को रोम के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए उकसाने का प्रयास किया, ताकि रोम को फिर से उनके सैन्य नेतृत्व की आवश्यकता पड़े। किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस कथा को विश्वसनीय नहीं मानते। उनके अनुसार, यह संभवतः मारियस के विरोधियों द्वारा फैलाई गई एक अफवाह थी। कुछ विद्वानों का मत है कि उनकी यह यात्रा वास्तव में रोमन सीनेट की योजना का भाग थी, जिसका उद्देश्य कैपाडोसिया में मिथ्रिडेट्स की गतिविधियों का गुप्त रूप से आकलन करना था।

आधुनिक इतिहासकार यह भी मानते हैं कि मारियस की राजनीतिक प्रतिष्ठा में आई गिरावट बहुत अधिक समय तक नहीं रही। लगभग 98–97 ईसा पूर्व में, एशिया माइनर में रहते हुए ही उन्हें अनुपस्थिति में रोमन धर्म के प्रतिष्ठित पुजारी-समूह ऑगर्स का सदस्य चुना गया, जो उनके सम्मान और प्रभाव का प्रमाण था।

98 ईसा पूर्व में मारियस ने अपने मित्र और पूर्व सह-कॉन्सुल मैनियस एक्विलियस के पक्ष में न्यायालय में गवाही दी। माना जाता है कि उनके प्रभाव के कारण एक्विलियस, स्पष्ट आरोपों के बावजूद, दोषमुक्त हो गए। इसके अतिरिक्त 95 ईसा पूर्व में उन्होंने स्पोलेटियम के निवासी टी. मैट्रिनियस का सफलतापूर्वक बचाव किया। मैट्रिनियस को रोमन नागरिकता स्वयं मारियस ने प्रदान की थी और बाद में नागरिकता संबंधी नए कानून के अंतर्गत उन पर मुकदमा चलाया गया था। मारियस की प्रभावशाली पैरवी के कारण वे भी आरोपों से मुक्त हो गए।

मारियस और सोशल वॉर

जब मारियस पूर्व से लौटे, तब कुछ वर्षों तक रोम में अपेक्षाकृत शांति बनी रही। 95 ईसा पूर्व में रोम ने ‘लेक्स लिसिनिया मुसिया’ नामक कानून पारित किया, जिसके अंतर्गत उन लोगों की जाँच की गई जो बिना वैध अधिकार के स्वयं को रोमन नागरिक बताते थे और ऐसे व्यक्तियों को रोम से निष्कासित किया गया। 91 ईसा पूर्व में मार्कस लिवियस ड्रूसस ट्रिब्यून निर्वाचित हुए। उन्होंने भूमि सुधार, सस्ते अनाज के वितरण, सीनेट के विस्तार तथा इटली के सहयोगी राज्यों को रोमन नागरिकता प्रदान करने जैसे व्यापक सुधारों का प्रस्ताव रखा। इन सुधारों का उद्देश्य इटली के सहयोगियों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों का समाधान करना था। उपलब्ध स्रोतों से यह स्पष्ट नहीं होता कि इन प्रस्तावों पर मारियस का क्या मत था। ड्रूसस की हत्या के बाद अनेक इतालवी सहयोगी राज्यों ने रोम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यही संघर्ष 91–87 ईसा पूर्व का सोशल वॉर कहलाया, जिसका नाम लैटिन शब्द सोची (Socii) अर्थात् ‘सहयोगी’ से निकला है।

अगले अभियान वर्ष में मारियस को कॉन्सुल पब्लियस रुटिलियस लुपस के वरिष्ठ लेगेटों (सैन्य अधिकारियों) में नियुक्त किया गया। 11 जून 90 ईसा पूर्व को टोलेनस नदी पार करते समय लुपस की सेना पर मार्सी जनजाति ने घात लगाकर आक्रमण किया, जिसमें लुपस मारे गए। उसी समय मारियस एक अलग सेना का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने तत्काल प्रतिआक्रमण करके शत्रु को भारी क्षति पहुँचाई और उसे पीछे हटने पर विवश कर दिया।

गायस मारियस (Gaius Marius)
मारियस और सोशल वॉर

लुपस की मृत्यु के बाद सीनेट ने मारियस और प्रेटर क्विंटस सर्विलियस कैपिओ को संयुक्त रूप से सेना की कमान सौंपी। किंतु शीघ्र ही कैपिओ भी मार्सी लोगों के छल का शिकार होकर मारे गए, जिसके बाद पूरी कमान मारियस के हाथों में आ गई। उत्तरी मोर्चे का नेतृत्व करते हुए उन्होंने फ्यूसिन झील के दक्षिण के पर्वतीय क्षेत्र में अपने पुराने सहयोगी लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला की सहायता से मार्सी सेना को पराजित किया। इस युद्ध में मारुसिनी जनजाति के प्रेटर हेरियस असिनियस भी मारे गए।

इसके बाद मारियस ने अत्यधिक सावधानी की नीति अपनाई और आगे बढ़कर निर्णायक युद्ध करने से परहेज़ किया। प्राचीन लेखक प्लूटार्क के अनुसार, मार्सी नेता पोपेडियस सिलो ने उन्हें चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे इतने महान सेनापति हैं तो अपने सुरक्षित शिविर से बाहर निकलकर युद्ध करें। इस पर मारियस ने उत्तर दिया कि यदि सिलो स्वयं को इतना कुशल सेनापति मानते हैं, तो वे उन्हें ऐसा करने के लिए विवश करके दिखाएँ।

अगले वर्ष कॉन्सुल लूसियस पोर्सियस कैटो ने मारियस का स्थान ले लिया और उन्हें सेना की कमान से हटा दिया गया। इसके कारणों के बारे में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि उनकी बढ़ती आयु या स्वास्थ्य इसका कारण हो सकता है, जबकि अन्य के अनुसार उनकी अत्यधिक सतर्क युद्ध-नीति के कारण उन्हें हटाया गया।

युद्ध अंततः रोम के पक्ष में समाप्त हुआ। 90 ईसा पूर्व में लेक्स जूलिया कानून पारित किया गया, जिसके अंतर्गत उन सभी इतालवी सहयोगी राज्यों को रोमन नागरिकता प्रदान कर दी गई, जो रोम के प्रति निष्ठावान रहे थे या जिन्होंने शीघ्र ही आत्मसमर्पण कर दिया था। यद्यपि मारियस ने इस युद्ध में वरिष्ठ सेनानायक के रूप में सेवा की और कुछ महत्वपूर्ण सफलताएँ भी प्राप्त कीं, फिर भी उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। संभवतः इसी अनुभव ने उनके भीतर एक बार फिर बड़ी सैन्य कमान और नई प्रतिष्ठा प्राप्त करने की आकांक्षा को प्रबल कर दिया।

सुल्ला और पहला गृह युद्ध

सोशल वॉर के दौरान मारियस के सहयोगी और मित्र मैनियस एक्विलियस ने निकोमीडिया और बिथिनिया के शासकों को पोंटस के राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठम् के विरुद्ध युद्ध के लिए प्रेरित किया। इसके उत्तर में मिथ्रिडेट्स ने दोनों राज्यों के साथ-साथ एशिया माइनर में स्थित रोमन प्रदेशों पर भी आक्रमण कर दिया। एक्विलियस की सेना पराजित हो गई और उन्हें लेस्बोस द्वीप में शरण लेनी पड़ी।

सोशल वॉर समाप्त होने के बाद पूर्व में होने वाले अभियान से अपार धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होने की संभावना थी। इसी कारण 88 ईसा पूर्व के कॉन्सुल चुनाव अत्यंत प्रतिस्पर्धी रहे। अंततः लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला कॉन्सुल निर्वाचित हुए और उन्हें मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान की कमान सौंप दी गई।

मिथ्रिडेट्स के आक्रमण का समाचार मिलने के बाद मारियस ने संभवतः सातवीं बार कॉन्सुल बनने और पूर्वी अभियान का नेतृत्व प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी समय ट्रिब्यून पब्लियस सुल्पिसियस रूफस नए इतालवी नागरिकों को सभी पैंतीस मतदान-जनजातियों (ट्राइब्स) में समान रूप से शामिल करने का प्रस्ताव लेकर आए। माना जाता है कि मारियस ने इन प्रस्तावों का समर्थन किया, क्योंकि इससे उन्हें व्यापक राजनीतिक समर्थन मिल सकता था। इन विधेयकों को लेकर रोम के फोरम में हिंसक संघर्ष हुआ। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कॉन्सुल सुल्ला को अपनी सुरक्षा के लिए कुछ समय के लिए मारियस के घर में शरण लेनी पड़ी। अंततः एक समझौते के बाद मतदान संबंधी विधेयक पारित हो गया और सुल्ला पूर्वी अभियान की तैयारी के लिए रोम से निकल गए।

सुल्ला के रोम छोड़ने के बाद सुल्पिसियस ने एक नया कानून पारित कराया, जिसके द्वारा पोंटस के विरुद्ध अभियान की कमान सुल्ला से लेकर मारियस को सौंप दी गई, जबकि उस समय मारियस किसी भी सार्वजनिक पद पर नहीं थे। इसके बाद मारियस ने अपने प्रतिनिधियों को सुल्ला से सेना का नियंत्रण ग्रहण करने के लिए भेजा। आधुनिक इतिहासकार इस निर्णय को अत्यंत जोखिमपूर्ण और राजनीतिक दृष्टि से अविवेकपूर्ण मानते हैं।

सुल्ला ने आदेश मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने मारियस के प्रतिनिधियों की हत्या करवा दी और अपनी सेना को विश्वास दिलाया कि उनके सम्मान और अधिकारों पर आघात किया गया है। प्राचीन स्रोतों के अनुसार सैनिकों को यह भी भय था कि यदि अभियान की कमान मारियस को मिल गई, तो वे पूर्व के युद्ध से मिलने वाली धन-संपत्ति से वंचित हो जाएंगे। शीघ्र ही सुल्ला की सेना ने उनके प्रति निष्ठा की शपथ ले ली। जब मारियस के समर्थकों ने सैनिकों को समझाने के लिए दो ट्रिब्यून भेजे, तो सुल्ला की सेना ने उनकी भी हत्या कर दी।

इसके बाद सुल्ला ने अपनी सेना को लेकर सीधे रोम की ओर कूच किया। यह रोमन इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी, क्योंकि इससे पहले किसी रोमन सेनापति ने अपनी ही सेना के साथ राजधानी पर आक्रमण नहीं किया था। रोमन परंपरा और कानून दोनों के अनुसार ऐसा करना निषिद्ध माना जाता था।

सुल्ला के बढ़ते हुए खतरे का सामना करने के लिए मारियस ने जल्दबाजी में नगर की रक्षा का प्रयास किया और ग्लैडिएटरों सहित उपलब्ध लोगों को संगठित किया। किंतु उनकी अस्थायी सेना प्रशिक्षित रोमन लीजियनों का सामना नहीं कर सकी। मारियस पराजित हुए और रोम छोड़कर भाग गए। अनेक कठिनाइयों और मृत्यु के संकट से बचते हुए वे अंततः अफ्रीका पहुँचने में सफल रहे, जहाँ उन्हें अपने पुराने सैनिकों का सहयोग प्राप्त हुआ।

रोम पर अधिकार करने के बाद सुल्ला और उनके समर्थकों ने सीनेट के माध्यम से बारह प्रमुख व्यक्तियों को निर्वासित घोषित किया तथा मारियस, उनके पुत्र, पब्लियस सुल्पिसियस रूफस और उनके अन्य सहयोगियों को मृत्युदंड का दोषी ठहराया। सुल्पिसियस की हत्या कर दी गई, किंतु प्राचीन लेखक प्लूटार्क के अनुसार सुल्ला की इस कठोर कार्रवाई से रोम के अनेक नागरिक असंतुष्ट थे।

87 ईसा पूर्व के लिए हुए चुनावों में सुल्ला के समर्थक ग्नेयस ऑक्टेवियस तथा मारियस के समर्थक लूसियस कॉर्नेलियस सिन्ना कॉन्सुल चुने गए। इसके बाद सुल्ला ने एक बार फिर मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान की कमान संभाली और अपनी सेना के साथ पूर्व की ओर प्रस्थान कर गए।

मारियस का सातवीं बार कॉन्सुल बनना

जब सुल्ला यूनान में मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान चला रहा था, उसी समय रोम में उसके समर्थक ग्नेयस ऑक्टेवियस और लोकप्रिय दल के नेता लूसियस कॉर्नेलियस सिन्ना के बीच इटली के सहयोगी राज्यों के नागरिकों के मतदान अधिकारों को लेकर संघर्ष छिड़ गया। ऑक्टेवियस के समर्थकों ने सिन्ना को रोम छोड़ने पर मजबूर कर दिया, लेकिन सिन्ना ने शीघ्र ही इटली के सहयोगी राज्यों, विशेषकर सैम्नाइटों, का समर्थन प्राप्त कर लिया और लगभग दस लीजियनों की सेना संगठित कर ली।

इसी दौरान मारियस अपने पुत्र के साथ अफ्रीका से निर्वासन समाप्त कर एट्रुरिया पहुँचे, जहाँ उन्होंने भी एक सेना तैयार की। इसके बाद वे सिन्ना के साथ मिल गए और दोनों ने ऑक्टेवियस के विरुद्ध संयुक्त अभियान चलाया। मारियस ने ट्रिब्यूनों के माध्यम से अपने निर्वासन को समाप्त कराने का कानून भी पारित कराया। अंततः सिन्ना की विशाल सेना के दबाव में सीनेट को रोम के द्वार खोलने पड़े और दोनों नेता नगर में प्रवेश कर गए।

मारियस की मृत्यु

रोम पर अधिकार करने के बाद मारियस और सिन्ना ने अपने प्रमुख राजनीतिक विरोधियों का दमन आरंभ किया। अनेक विरोधियों की हत्या कर दी गई और उनके कटे हुए सिर रोमन फोरम में प्रदर्शित किए गए। इस दमन में चौदह प्रमुख व्यक्तियों की मृत्यु हुई, जिनमें छह पूर्व कॉन्सुल भी शामिल थे। इनमें लूसियस लिसिनियस क्रैसस, गैयुस एटिलियस सेरानुस, मार्कस एंटोनियस, लूसियस जूलियस सीज़र, उसके भाई गैयुस जूलियस सीज़र स्ट्रैबो, क्विंटस म्यूशियस स्केवोला, पब्लियस कॉर्नेलियस लेंटुलस, गैयुस नेमेटोरियस, गैयुस बेबियस तथा ग्नेयस ऑक्टेवियस प्रमुख थे। कुछ लोगों को तत्काल नहीं मारा गया, बल्कि औपचारिक मुकदमे चलाने के बाद उन्हें मृत्यु दंड दिया गया। इसी समय मारियस और सिन्ना ने सुल्ला को राज्य का शत्रु घोषित कर दिया और उससे पूर्व में मिली प्रोकॉन्सुलर कमान भी छीन ली।

यद्यपि प्राचीन लेखकों ने इस दमन को अत्यधिक रक्तपातपूर्ण बताया है, आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि यह कहना उचित नहीं होगा कि मारियस के समर्थकों ने अंधाधुंध हत्या की थी। इन कार्रवाइयों का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों में भय उत्पन्न करना और अपने शासन को सुरक्षित करना था।

विरोध शांत होने के बाद 86 ईसा पूर्व के लिए चुनाव कराए गए। इन चुनावों में मारियस और सिन्ना को असामान्य परिस्थितियों में क्रमशः सातवीं बार और दूसरी बार कॉन्सुल चुना गया। किंतु सातवीं बार कॉन्सुल पद ग्रहण करने के कुछ ही सप्ताह बाद मारियस का निधन हो गया।

मारियस की मृत्यु के संबंध में प्राचीन स्रोतों में विभिन्न विवरण मिलते हैं। पोसिडोनियस के अनुसार उनकी मृत्यु फुफ्फुसावरण शोथ (प्ल्यूरिसी) से हुई। गैयुस पिसो का वर्णन है कि मृत्यु से पहले वे अपने मित्रों के साथ अपनी उपलब्धियों की चर्चा कर रहे थे और उन्होंने कहा था कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति केवल भाग्य पर निर्भर नहीं रहता। प्लूटार्क एक अन्य परंपरा का उल्लेख करते हैं, जिसके अनुसार मृत्यु से पहले उन्हें उन्माद का दौरा पड़ा और वे स्वयं को मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध युद्ध का सेनापति समझने लगे। प्लूटार्क यह भी लिखते हैं कि जीवन भर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी रहे मारियस ने अंत समय में यह खेद व्यक्त किया कि अपनी असाधारण सफलताओं, अपार धन और सात बार कॉन्सुल चुने जाने के बावजूद वे अपनी सभी महत्त्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं कर सके।

मारियस की मृत्यु के बाद उनकी जगह लूसियस वैलेरियस फ्लैकस कॉन्सुल चुने गए। उन्हें दो लीजियनों के साथ मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान पर भेजा गया, जहाँ वे सुल्ला से अलग रहते हुए युद्ध करने वाले थे। यद्यपि बाद के लेखकों ने कभी-कभी मारियस को राजनीतिक शुद्धिकरण (पर्ज) के लिए उत्तरदायी ठहराया है, फिर भी उनकी आकस्मिक मृत्यु ने उनके समर्थकों को नीति में परिवर्तन किए बिना अधिकांश दोष उन्हीं पर डालने का अवसर दे दिया। इसके बाद सिन्ना और उनके सहयोगियों, विशेषकर कार्बो ने गृहयुद्ध जारी रखा, जो अंततः सुल्ला की विजय और उसके तानाशाह बनने पर समाप्त हुआ।

मारियस का मूल्यांकन

मारियस प्राचीन रोम के सबसे सफल सेनानायकों और प्रभावशाली राजनेताओं में गिने जाते हैं। प्राचीन इतिहासकारों ने उन्हें प्रायः अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी और अवसरवादी व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। प्लूटार्क के अनुसार, यदि मारियस ने अपनी असाधारण सैन्य और राजनीतिक सफलताओं के बाद संयम और विवेक बनाए रखा होता, तो उनका जीवन अधिक सम्मानजनक ढंग से समाप्त होता। उनके मत में, अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा और सत्ता की निरंतर इच्छा ने उनके अंतिम वर्षों को कलंकित कर दिया।

आधुनिक इतिहासकार रिचर्ड इवांस इस चित्रण को पूरी तरह सही नहीं मानते। उनके अनुसार, कॉन्सुल बनने और राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की मारियस की आकांक्षा उस समय के रोमन नेताओं के लिए असामान्य नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत लगातार पाँच बार कॉन्सुल चुना जाना था। उस समय रोम गंभीर संकटों से घिरा हुआ था, इसलिए जनता ने असाधारण परिस्थितियों में एक ही व्यक्ति को बार-बार सर्वोच्च पद सौंपा। इससे पहली बार किसी एक नेता के हाथों में लंबे समय तक अभूतपूर्व राजनीतिक और सैन्य शक्ति केंद्रित हुई।

फिर भी, अपने जीवन के अंतिम वर्षों में मारियस अपने अनेक समकालीनों के बीच अलोकप्रिय हो गए। प्राचीन लेखकों का मत है कि वृद्धावस्था में भी उनकी असीम महत्त्वाकांक्षा और लगातार नए सैन्य अभियान प्राप्त करने की इच्छा ने राजनीतिक संघर्षों को बढ़ावा दिया, जो अंततः 87 ईसा पूर्व के गृहयुद्ध का एक प्रमुख कारण बनी। इस दृष्टि से उनकी महत्त्वाकांक्षा ने रोमन गणराज्य की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को गहरे स्तर पर चुनौती दी। रोमन गणराज्य का आधार सीमित कार्यकाल और समान अधिकार वाले पदाधिकारियों की व्यवस्था थी, जिसे मारियस जैसे अत्यधिक शक्तिशाली व्यक्तित्व के उदय ने कमजोर कर दिया।

आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार गायस मारियस द्वारा सीनेट के निर्णयों को बदलने के लिए बार-बार जनसभाओं (असेंबली) का उपयोग करने से रोमन गणराज्य की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था और विदेश नीति पर सीनेट का सामूहिक नियंत्रण कमजोर हुआ। न्यूमिडिया में क्विंटस कैसिलियस मेटेलस से सैन्य कमान लेकर स्वयं प्राप्त करना तथा बाद में मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध युद्ध की कमान सुल्ला से छीनकर जनसभा के माध्यम से अपने पक्ष में करवाना इस प्रवृत्ति के प्रमुख उदाहरण थे। यद्यपि उस समय यह माना जाता था कि जनसभा द्वारा पारित कानूनों का सभी पालन करेंगे, किंतु सुल्ला ने अपनी सेना सहित रोम पर चढ़ाई करके इस परंपरा को तोड़ दिया। इसी काल में राजनीतिक हिंसा भी अभूतपूर्व रूप से बढ़ी। मारियस के छठे कॉन्सुल कार्यकाल में सैटर्निनस और ग्लौसिया के विरुद्ध सेनाटस कंसल्टम अल्टिमम (सीनेट का अंतिम आदेश) जारी किया गया, जिसके परिणामस्वरूप पहली बार पदासीन मजिस्ट्रेटों के विरुद्ध बल प्रयोग और उनकी हत्या को वैधता मिली। इसके बाद राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की हत्या, सैन्य शक्ति के बल पर सत्ता प्राप्त करने की प्रवृत्ति और सीनेट तथा जनसभाओं के बीच बढ़ते संघर्ष ने रोमन गणराज्य को दीर्घकालीन राजनीतिक अस्थिरता की ओर धकेल दिया, जो अंततः गणराज्य के पतन और रोमन साम्राज्य के उदय की प्रमुख पृष्ठभूमि बनी।

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