रोमन धर्म
रोमन धर्म का इतिहास अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। सामान्यतः इसे दो प्रमुख कालों में विभाजित किया जाता है। पहला काल रोम की स्थापना से लेकर ईसा मसीह के आविर्भाव तक का है, जबकि दूसरा काल ईसा मसीह के जन्म के बाद से प्रारंभ होता है। प्रथम काल में रोमन धर्म पर इटली, यूनान, एट्रस्कन सभ्यता, मध्यसागरीय प्रदेशों तथा पश्चिमी एशिया का गहरा प्रभाव था। दूसरे काल में ईसाई धर्म का प्रभाव क्रमशः बढ़ता गया और अंततः उसने संपूर्ण रोमन साम्राज्य के सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को परिवर्तित कर दिया।
प्राचीन रोमन एक ऐसी विश्वव्यापी शक्ति में विश्वास करते थे, जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त थी और जिससे देवता तथा मनुष्य दोनों अनुप्राणित होते थे। एट्रस्कन तथा प्रारंभिक रोमन समाज बहुदेववादी था। जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था जिसके लिए कोई देवता न कल्पित किया गया हो। घर, द्वार, चूल्हा, खेत, खलिहान, निद्रा, यात्रा, विवाह, गर्भधारण तथा जन्म जैसे प्रत्येक कार्य के लिए पृथक-पृथक देवी-देवताओं की कल्पना की गई थी।
प्रमुख देवताओं में जूपिटर, जूनो, मिनर्वा, लिबेरा, तिनिया, वोल्केनस, जैनस, नेप्च्यून, मन्तुस, मनिया तथा लास विशेष रूप से पूजनीय थे। जूपिटर आकाश और पृथ्वी का सर्वोच्च देवता माना जाता था। उसकी पत्नी जूनो विवाह, मातृत्व और स्त्रीत्व की संरक्षिका देवी थी। मिनर्वा ज्ञान, युद्ध, कला, शिल्प तथा बुद्धि की देवी थी। तिनिया को मेघ, गर्जन और विद्युत का देवता माना जाता था। मन्तुस और मनिया पाताललोक के शासक माने जाते थे, जबकि लास को भाग्य की देवी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।
इन प्रमुख देवताओं के अतिरिक्त ग्राम-देवता, कुल-देवता तथा पारिवारिक संरक्षक देवताओं की भी पूजा की जाती थी। उनके छोटे-छोटे प्रतिमाएँ घरों में स्थापित की जाती थीं। यूनानी देवताओं के विपरीत रोमन देवताओं की कल्पना आरंभ में मानव-रूप में नहीं की जाती थी। वे उन्हें एक अदृश्य दिव्य शक्ति या चेतना मानते थे। इस शक्ति को ‘नूमिना’ कहा जाता था। नूमिना की धारणा रोमन धर्म की एक विशिष्ट विशेषता थी।
एट्रस्कन काल में रोमन धर्म मुख्यतः लौकिक तथा आभिचारिक स्वरूप का था। देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि दी जाती थी और कुछ अवसरों पर मानव-बलि भी दी जाती थी। मानव-बलि के लिए प्रायः अपराधियों या युद्धबन्दियों का चयन किया जाता था। रोमन समाज परलोक, स्वर्ग और नरक में विश्वास करता था। उनका विचार था कि मृत्यु के पश्चात मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार दंड या पुरस्कार प्राप्त होता है। नरक में विभिन्न प्रकार की यातनाएँ और स्वर्ग में अनेक प्रकार के सुख एवं आनन्द प्राप्त होते हैं।
जैसे-जैसे रोमन साम्राज्य का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे यूनानी धर्म और दर्शन का प्रभाव बढ़ता गया। यूनानी संस्कृति के संपर्क में आने के बाद रोमवासियों का विश्वास अपने अनेक प्राचीन देवताओं से डगमगाने लगा। विशेषकर हैनिबल की सफलताओं के पश्चात् अनेक रोमनों को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनके पारंपरिक देवताओं ने उनका साथ छोड़ दिया है। परिणामस्वरूप वे यूनानी देवताओं और धार्मिक धारणाओं की ओर आकर्षित हुए।
इस प्रक्रिया में अनेक यूनानी देवताओं का रोमन देवताओं के साथ समन्वय किया गया। उदाहरणार्थ, जूपिटर को यूनानी देवता ज़्यूस के समकक्ष माना गया। इसी प्रकार अपोलो, हेराक्लीज तथा अन्य यूनानी देवताओं को भी रोमन धार्मिक व्यवस्था में स्थान प्राप्त हुआ। यूनान, मिस्र, ईरान तथा पश्चिमी एशिया से अनेक देवी-देवताओं और धार्मिक संप्रदायों का आगमन हुआ, जिससे रोमन धर्म अधिक उदार और सहिष्णु बन गया।
मिस्र की देवी आइसिस को मातृशक्ति के रूप में विशेष सम्मान मिला। इसी प्रकार पश्चिमी एशिया के सूर्यदेव बाल तथा अन्य देवताओं की पूजा भी लोकप्रिय हुई। किंतु विदेशी संप्रदायों में सबसे अधिक प्रभाव मिथ्र (मित्र) धर्म का पड़ा, जो मूलतः ईरानी परंपरा से संबद्ध था। यह धर्म रोम साम्राज्य के विस्तृत क्षेत्रों—स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, यूनान, उत्तरी अफ्रीका तथा डैन्यूब क्षेत्र में फैल गया। मिथ्र को प्रकाश, सत्य और संरक्षण का देवता माना जाता था। विशेष रूप से सैनिकों और सीमावर्ती प्रदेशों में रहने वाले लोगों के बीच यह धर्म अत्यंत लोकप्रिय हुआ। बाद में यही धर्म ईसाई धर्म का एक शक्तिशाली प्रतिद्वन्द्वी बनकर उभरा।
इसी काल में स्टोइक, एपिक्युरियन, नियो-पाइथागोरियन, नियो-प्लेटोनिक तथा ग्नॉस्टिक जैसी दार्शनिक विचारधाराओं ने भी धार्मिक जीवन को प्रभावित किया। इन विचारधाराओं ने लोगों को नैतिकता, आत्मा, ईश्वर और मोक्ष जैसे प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
रोम में यहूदियों का आगमन दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ था। यद्यपि प्रारंभ में उन्हें निष्कासित कर दिया गया, किंतु बाद में जूलियस सीज़र के शासनकाल में वे पुनः रोम लौट आए। यहूदी पूर्णतः एकेश्वरवादी थे और याहवे को अपना सर्वोच्च ईश्वर मानते थे। वे नैतिकता, सदाचार और धार्मिक अनुशासन पर विशेष बल देते थे। इनके विचारों ने भी रोमन समाज के कुछ वर्गों को प्रभावित किया।
आगस्टस के काल से रोम में सम्राट-पूजा की परंपरा का भी विकास हुआ। रोमन जनता ने सीज़र, आगस्टस तथा डोमिशियन जैसे सम्राटों को देवताओं का प्रतिनिधि मानना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे सम्राटों में दैवी शक्ति का आरोपण किया जाने लगा। कुछ सम्राटों ने स्वयं को तथा अपने परिवार के सदस्यों को देवता घोषित कर उनकी मूर्तियाँ स्थापित कराईं और उनकी पूजा के लिए विशेष पुरोहित नियुक्त किए।
रोमन धर्म के संगठन में पुरोहितों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। जिस प्रकार परिवार का मुखिया पारिवारिक धार्मिक कार्यों का संचालन करता था, उसी प्रकार संपूर्ण राज्य के धार्मिक कार्यों की देखरेख के लिए एक प्रधान पुरोहित नियुक्त किया जाता था, जिसे ‘पोण्टिफेक्स मैक्सिमस’ कहा जाता था। यह रोमन धर्म का सर्वोच्च धार्मिक पद था। इस पद पर किसी विशेष वर्ग का एकाधिकार नहीं था और योग्य नागरिकों में से किसी को भी नियुक्त किया जा सकता था।
पोण्टिफेक्स मैक्सिमस के अधीन अनेक धार्मिक समितियाँ कार्य करती थीं, जिन्हें ‘कालेजिया’ कहा जाता था। इन समितियों की सदस्यता के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं थी। कोई भी नागरिक इनमें सम्मिलित हो सकता था तथा इच्छा होने पर त्याग भी कर सकता था। इन समितियों में ‘वेस्टल वर्जिन्स’ अर्थात् अग्निरक्षिका कुमारियों का विशेष स्थान था।
वेस्टल कुमारियाँ सामान्यतः छह से दस वर्ष की आयु के बीच चुनी जाती थीं। वे श्वेत वस्त्र धारण करती थीं और तीस वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पवित्र अग्नि की रक्षा का कार्य करती थीं। यदि कोई वेस्टल कुमारी अपने व्रत का उल्लंघन करती हुई पाई जाती, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था और कभी-कभी जीवित ही भूमि में गाड़ दिया जाता था। रोमन इतिहास में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। सेवाकाल पूर्ण होने के बाद उन्हें समाज में अत्यधिक सम्मान प्राप्त होता था और वे विवाह करने के लिए स्वतंत्र होती थीं, यद्यपि अधिकांश कुमारियाँ अविवाहित ही रहती थीं।
पुरोहितों की समितियों में ‘आगर्स’ नामक समिति भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। इसके सदस्य पक्षियों की उड़ान, उनकी गतिविधियों तथा अन्य प्राकृतिक संकेतों के आधार पर भविष्यवाणी करते थे। युद्ध, शासन, कानून अथवा किसी महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक कार्य के पूर्व इन भविष्यवक्ताओं से परामर्श लेना आवश्यक माना जाता था। इस प्रकार धर्म न केवल व्यक्तिगत जीवन का अंग था, बल्कि रोमन राज्य की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था का भी अभिन्न आधार था।
ईसाई धर्म
ईसाई धर्म का उद्भव और विकास केवल रोमन साम्राज्य के इतिहास की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और युगांतकारी घटना है। इस धर्म ने पश्चिमी जगत के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा नैतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। ईसाई धर्म के प्रभाव से लोगों में सदाचार, करुणा, दया, प्रेम और मानवता के आदर्शों का विकास हुआ। जिन समाजों में पहले युद्धप्रियता, हिंसा और कठोरता का प्रभुत्व था, वहाँ धीरे-धीरे सहिष्णुता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का प्रसार हुआ। आगे चलकर यह धर्म केवल रोमन साम्राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यूरोप, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा विश्व के अनेक क्षेत्रों में फैलकर एक महान विश्वधर्म के रूप में स्थापित हुआ।
ईसाई धर्म के सँस्थापक ईसा मसीह (जीसस क्राइस्ट) थे। उनके जीवन के संबंध में ऐतिहासिक स्रोत सीमित हैं, इसलिए उनके प्रारंभिक जीवन के अनेक पक्षों पर विद्वानों में मतभेद है। ईसाई परंपरा के अनुसार ईसा का जन्म रोमन सम्राट आगस्टस के शासनकाल में हुआ था। सामान्यतः उनका जन्म जूडिया के बेथलेहेम नगर में माना जाता है, जो यरूशलेम के दक्षिण में स्थित था। उनके पिता का नाम जोसेफ तथा माता का नाम मेरी (मिरियम) था। ईसाई मान्यता में मेरी को पवित्र माता माना जाता है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से अधिकांश विद्वान ईसा को एक सामान्य यहूदी परिवार में जन्मा मानव मानते हैं।
ईसा के जन्म के समय जूडिया रोमन साम्राज्य के अधीन था। वहाँ के लोगों का जीवन राजनीतिक दमन, आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक असंतोष से भरा हुआ था। यहूदी जनता किसी ऐसे मुक्तिदाता की प्रतीक्षा कर रही थी जो उन्हें विदेशी शासन से मुक्ति दिलाए। ईसा का बचपन और युवावस्था मुख्यतः गैलीली प्रदेश के नाज़रेथ नगर में बीती। इसी कारण उन्हें ‘नाज़रेथ के ईसा’ कहा जाता है। उनके पिता बढ़ई थे और प्रारंभिक जीवन में ईसा भी इसी व्यवसाय से जुड़े रहे।
ईसा का व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक, विनम्र, सहृदय और करुणामय था। वे साधारण लोगों, विशेषकर गरीबों, पीड़ितों, रोगियों और उपेक्षित वर्गों के बीच अधिक समय बिताते थे। उनका जीवन अत्यंत सरल था। वे धन, वैभव और सांसारिक प्रतिष्ठा से दूर रहते थे तथा मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म मानते थे। उनकी वाणी में ऐसी आत्मीयता और प्रभाव था कि लोग बड़ी संख्या में उनके उपदेश सुनने के लिए एकत्रित होने लगे।
ईसा के उपदेशों का मूल आधार प्रेम, दया, क्षमा और मानव समानता था। वे मानते थे कि ईश्वर संपूर्ण मानवता का पिता है और सभी मनुष्य उसकी संतान हैं। इसलिए जाति, वर्ग, धन, रंग, जन्म अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव उचित नहीं है। ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं। विशेष रूप से गरीब, पीड़ित, दलित और असहाय व्यक्तियों पर ईश्वर की विशेष कृपा रहती है।

ईसा ने यह शिक्षा दी कि मनुष्य को दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए, जिसकी वह स्वयं दूसरों से अपेक्षा करता है। यह सिद्धांत आगे चलकर ईसाई नैतिकता का आधार बना। उन्होंने मानव जीवन में परस्पर सम्मान, सहयोग और सद्भावना को अत्यंत आवश्यक बताया। उनके अनुसार समाज में शांति और सुख तभी संभव है जब लोग एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार करें।
ईसा ने पाप, पश्चाताप और क्षमा पर भी विशेष बल दिया। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति अपने अपराधों और पापों को स्वीकार कर सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा माँगे, तो ईश्वर उसे क्षमा कर सकता है। इस प्रकार उन्होंने मानव जीवन में आशा, आत्मसुधार और नैतिक पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त किया। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति इतना बड़ा पापी नहीं होता कि वह ईश्वर की करुणा से वंचित रह जाए।
ईसा के उपदेशों में प्रेम और क्षमा का सर्वोच्च स्थान था। उन्होंने केवल मित्रों से ही नहीं, बल्कि शत्रुओं से भी प्रेम करने की शिक्षा दी। उनका मत था कि घृणा का उत्तर घृणा से नहीं, बल्कि प्रेम से दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति हमें कष्ट पहुँचाए, उसके प्रति भी दया और क्षमा का भाव रखना चाहिए। इस प्रकार उन्होंने मानव संबंधों को नैतिक ऊँचाई प्रदान करने का प्रयास किया।
ईसा ने धार्मिक आडंबर, पाखंड और बाह्य प्रदर्शन का विरोध किया। उनका विश्वास था कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए भव्य धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांडों की आवश्यकता नहीं है। सच्ची भक्ति मानव सेवा में निहित है। उन्होंने कहा कि भूखों को भोजन देना, रोगियों की सेवा करना, दुःखी लोगों को सांत्वना देना तथा मानवता की सहायता करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।
ईसा का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत यह था कि ईश्वर का राज्य मनुष्य के अंतःकरण में स्थित है। उन्होंने मंदिरों, मूर्तियों और बाहरी धार्मिक प्रतीकों की अपेक्षा आंतरिक पवित्रता और नैतिक जीवन को अधिक महत्त्व दिया। उनके अनुसार सत्य, प्रेम और सदाचार के माध्यम से ही ईश्वर का अनुभव किया जा सकता है।
उन्होंने न्याय, करुणा, दया, सहानुभूति, त्याग और सदाचार को मानव जीवन के सर्वोच्च गुण बताया। ईसा ने लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा और स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियों की निंदा की। वे धन-संचय को आध्यात्मिक उन्नति में बाधक मानते थे। उनका प्रसिद्ध कथन था कि किसी धनी व्यक्ति के लिए ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना उतना ही कठिन है जितना सुई के छेद से ऊँट का निकलना। इस कथन का उद्देश्य धन के अहंकार और अत्यधिक भौतिकवाद की आलोचना करना था।
ईसा ने मनुष्य-पूजा और सम्राट-पूजा का भी विरोध किया। उस समय रोमन सम्राटों को देवतुल्य मानकर उनकी पूजा की जाती थी, किंतु ईसा ने इसे अनुचित बताया। उनके अनुसार केवल ईश्वर ही सर्वोच्च सत्ता है और मनुष्य को उसी की उपासना करनी चाहिए।
ईसा ने यह भी कहा कि एक दिन संसार का अंत होगा और उस समय ईश्वर का न्याय स्थापित होगा। उन्होंने ‘स्वर्ग के राज्य’ की कल्पना प्रस्तुत की, जहाँ न्याय, प्रेम, दया, सेवा, विश्वास और सदाचार का साम्राज्य होगा। यह राज्य केवल किसी भौतिक स्थान का नहीं, बल्कि आदर्श मानवीय समाज का प्रतीक था।
प्रारंभ में लोग ईसा को एक यहूदी धर्मोपदेशक के रूप में देखते थे, किंतु धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। उनके शिष्यों ने उन्हें ईश्वर का दूत, मसीहा और मानवता का उद्धारक मानना प्रारंभ कर दिया। इससे यहूदी धार्मिक नेताओं और रोमन अधिकारियों में चिंता उत्पन्न हुई। उन्हें भय था कि ईसा की बढ़ती लोकप्रियता सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।
अंततः यहूदी पुरोहितों ने ईसा पर लोगों को भड़काने तथा रोमन शासन के विरुद्ध विद्रोह फैलाने का आरोप लगाया। उन्हें गिरफ्तार कर रोमन गवर्नर पोंटियस पीलातुस (पाइलेट) के समक्ष प्रस्तुत किया गया। यद्यपि उनके विरुद्ध कोई ठोस अपराध सिद्ध नहीं हुआ, फिर भी राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया। लगभग 30 ईस्वी के आसपास यरूशलेम के निकट गोलगोथा नामक स्थान पर उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया। उस समय उनकी आयु लगभग 33 वर्ष थी।
ईसा की मृत्यु ईसाई धर्म के इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। उनके अनुयायियों का विश्वास था कि उन्होंने मानवता के उद्धार के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों का प्रचार प्रारंभ किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक संगठित धर्म के रूप में विकसित हुआ और आगे चलकर संपूर्ण रोमन साम्राज्य तथा विश्व के अनेक भागों में फैल गया। इसी प्रकार ईसाई धर्म ने मानव इतिहास की दिशा को गहराई से प्रभावित करते हुए विश्व की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में अपना स्थान बनाया।
ईसाई धर्म का प्रचार एवं प्रसार
ईसा मसीह की मृत्यु का उनके अनुयायियों पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके शिष्यों और समर्थकों को प्रारंभ में अत्यंत निराशा हुई। ऐसा प्रतीत होने लगा कि जिस महान उद्देश्य के लिए ईसा ने अपना जीवन समर्पित किया था, वह अब अधूरा रह जाएगा। कुछ समय तक उनके अनुयायी भय, शोक और अनिश्चितता की स्थिति में रहे। किंतु शीघ्र ही यह निराशा आशा में परिवर्तित हो गई। ईसा के अनुयायियों के बीच यह विश्वास फैलने लगा कि ईसा वास्तव में मृत नहीं हुए हैं, बल्कि पुनर्जीवित होकर अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। इस विश्वास ने उनके भीतर नया उत्साह और आत्मविश्वास भर दिया। परिणामस्वरूप वे संगठित होकर ईसा के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के कार्य में लग गए।
ईसा के अनुयायियों ने यरूशलेम में एक धार्मिक संगठन की स्थापना की तथा प्रथम गिरजाघर का निर्माण किया। उन्होंने ईसा के प्रेम, करुणा, सेवा और मानव-समता के संदेश का व्यापक प्रचार प्रारंभ किया। उनके अथक परिश्रम, त्याग और समर्पण के कारण ईसाई धर्म ने शीघ्र ही एक संगठित स्वरूप ग्रहण कर लिया और धीरे-धीरे रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में फैलने लगा।
ईसा की मृत्यु के बाद ईसाई धर्म के प्रचार और प्रसार को सामान्यतः तीन चरणों में विभाजित किया जाता है। पहला चरण लगभग 30 ईस्वी से 95 ईस्वी तक माना जाता है। इस काल में धर्म-प्रचार का कार्य मुख्यतः ईसा के शिष्यों और प्रारंभिक प्रचारकों ने किया। दूसरा चरण 96 ईस्वी से 305 ईस्वी तक का था, जिसमें ईसाई धर्म को रोमन शासकों के कठोर विरोध और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। तीसरा चरण 306 ईस्वी से 325 ईस्वी तक का था, जब ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ और वह उन्नति के शिखर पर पहुँच गया।
प्रचार एवं प्रसार का प्रथम चरण
ईसाई धर्म के प्रथम चरण में प्रचारकों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। ईसा के बारह प्रमुख शिष्य थे, जिन्हें ‘अपोस्टल’ अर्थात् धर्मप्रचारक कहा जाता है। इनमें संत पीटर, संत पाल और संत जॉन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनका विश्वास था कि ईसा पुनः पृथ्वी पर अवतरित होंगे और ईश्वर के राज्य की स्थापना करेंगे। इसलिए उन्होंने मानव-सेवा और धर्म-प्रचार को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मान लिया।
ये प्रचारक निर्धनों, रोगियों, विकलांगों, कुष्ठरोगियों तथा समाज के उपेक्षित लोगों की सेवा करते थे। उनकी सेवा-भावना और निःस्वार्थ कार्यों से लोग अत्यंत प्रभावित होते थे। परिणामस्वरूप ईसाई धर्म के अनुयायियों की संख्या निरंतर बढ़ने लगी। कुछ क्षेत्रों में तो अल्प समय में ही हजारों लोग इस धर्म से जुड़ गए।
संत पीटर
संत पीटर ईसा के सबसे निकटवर्ती शिष्यों में गिने जाते हैं। वे ईसाई धर्म के प्रारंभिक संगठनकर्ताओं में प्रमुख थे। उनके रोम आगमन की तिथि के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ विद्वानों के अनुसार वे लगभग 42 ईस्वी में रोम पहुँचे, जबकि अन्य स्रोत उन्हें सम्राट नीरो के शासनकाल में रोम आया हुआ बताते हैं।
पीटर ने सीरिया से लेकर रोम तक ईसा के संदेश का प्रचार किया। वे लोगों को प्रेम, सेवा और भाईचारे का सँदेश देते थे। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उन्होंने रोम में ईसाई अनुयायियों को संगठित कर एक धार्मिक समुदाय का निर्माण किया। उन्होंने ‘बपतिस्मा’ संस्कार के माध्यम से लोगों को ईसाई धर्म में दीक्षित किया और उनमें एकता स्थापित की।
उनकी बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव से रोमन शासक चिंतित हो उठे। परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर मृत्युदंड दिया गया। ईसाई परंपरा के अनुसार उन्हें सूली पर चढ़ाया गया। माना जाता है कि उनकी पत्नी भी इस उत्पीड़न की शिकार हुई। पीटर का बलिदान ईसाई इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।
संत पाल
ईसाई धर्म के प्रचारकों में संत पाल का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में ईसाई धर्म को एक सीमित यहूदी आंदोलन से विश्वधर्म बनाने का श्रेय मुख्यतः संत पाल को दिया जाता है। उनका जन्म एशिया माइनर के सिलिसिया प्रांत के टार्सस नगर में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने यरूशलेम में प्रसिद्ध यहूदी विद्वानों से शिक्षा ग्रहण की।
प्रारंभ में पाल ईसाई धर्म के विरोधी थे और उसे यहूदी धर्म के लिए खतरा मानते थे। किंतु बाद में उनके विचारों में परिवर्तन हुआ और वे ईसा के सबसे प्रभावशाली प्रचारकों में शामिल हो गए। उन्होंने घोषणा की कि ईसा केवल यहूदियों के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के उद्धारक हैं। उनके अनुसार ईसा ईश्वर के पुत्र थे और मानव जाति के पापों से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने स्वयं बलिदान दिया।
संत पाल ने यहूदी धर्म के जटिल कर्मकांडों का विरोध किया और विश्वास, प्रेम तथा ईश्वर-भक्ति को अधिक महत्त्व दिया। उन्होंने लोगों को सहिष्णुता, क्षमा और परोपकार का संदेश दिया। उनका कहना था कि मनुष्य को बुराई का उत्तर भी भलाई से देना चाहिए। उन्होंने लोभ, भ्रष्टाचार और विलासिता की कठोर आलोचना की तथा सादा और नैतिक जीवन अपनाने की प्रेरणा दी।
पाल ने रोम, यूनान तथा एशिया माइनर के अनेक नगरों की यात्राएँ कीं और ईसाई धर्म का प्रचार किया। अनेक स्थानों पर उन्हें विरोध और अपमान का सामना करना पड़ा। उन पर मुकदमे चलाए गए और उन्हें कारावास भी भुगतना पड़ा। फिर भी वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुए। उनके प्रयासों से ईसाई धर्म का प्रभाव रोमन साम्राज्य के दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँच गया। अंततः सम्राट नीरो के शासनकाल में उन्हें भी मृत्युदंड दिया गया। परंपरा के अनुसार उनका सिर कलम कर दिया गया। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके विचार और उपदेश ईसाई धर्म के विस्तार का आधार बने रहे। ईसाई जगत में ईसा के बाद संत पाल को सर्वाधिक सम्मान प्राप्त है।
संत जॉन
संत जॉन ईसाई धर्म के प्रमुख प्रचारकों में तीसरे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे। उनके जीवन के बारे में अपेक्षाकृत कम जानकारी उपलब्ध है, किंतु यह ज्ञात है कि एशिया माइनर के अनेक नगरों में उनकी अत्यंत प्रतिष्ठा थी। वे विभिन्न गिरजाघरों के मार्गदर्शक और धार्मिक नेता के रूप में सम्मानित थे। परंपरा के अनुसार सम्राट डोमिशियन के शासनकाल में उन्हें निर्वासन का दंड दिया गया और वे एजियन सागर के पटमोस द्वीप पर रहने लगे। वहीं उन्होंने ईसाई धर्म के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक ‘रिवेलेशन’ अथवा ‘अपोकैलिप्स’ की रचना की। जॉन धार्मिक आडंबर और पाखंड के विरोधी थे। उनका विश्वास था कि अंततः ईश्वर का राज्य स्थापित होगा और सत्य की विजय होगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस आदर्श व्यवस्था के स्थापित होने से पूर्व संसार को अनेक संकटों और संघर्षों का सामना करना पड़ेगा। उनके विचारों में नैतिकता, आस्था और भविष्य के प्रति आशा का विशेष स्थान था। उन्होंने रोमन साम्राज्य की नैतिक बुराइयों और अत्याचारों की आलोचना की तथा लोगों को धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार अंततः ईश्वर न्याय करेगा, अधर्म का विनाश होगा और एक नई तथा आदर्श व्यवस्था की स्थापना होगी जिसमें सत्य, शांति और धर्म का शासन होगा।
इस प्रकार ईसा मसीह के शिष्यों और प्रारंभिक प्रचारकों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया। उन्हें सामाजिक विरोध, धार्मिक कट्टरता और राजकीय उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने अपने उद्देश्य से समझौता नहीं किया। संत पीटर ने संगठन की नींव रखी, संत पाल ने ईसाई धर्म को विश्वव्यापी स्वरूप प्रदान किया और संत जॉन ने उसे आध्यात्मिक गहराई एवं दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके त्याग, परिश्रम और बलिदान के कारण ईसाई धर्म धीरे-धीरे एक छोटे धार्मिक आंदोलन से विकसित होकर विश्व के महान धर्मों में सम्मिलित हो गया।
ईसाई धर्म के विकास का द्वितीय चरण
रोमन सम्राटों का विरोध
ईसाई धर्म का दूसरा चरण लगभग 96 ई. से 305 ई. तक माना जाता है। इस अवधि में ईसाई धर्म का विस्तार निरंतर होता रहा, किंतु इसे रोमन सम्राटों के घोर विरोध और कठोर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। ईसा की मृत्यु के लगभग एक दशक बाद ही रोम में ईसाई धर्म की जड़ें मजबूत होने लगी थीं। 40 ई. तक यह धर्म रोम तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में पर्याप्त रूप से स्थापित हो चुका था। रोमन लेखक प्लिनी के अनुसार ईसाई धर्म किसी संक्रामक रोग की भांति नगरों और गांवों में फैल रहा था तथा इसके अनुयायियों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।
इटली और उत्तरी अफ्रीका में ईसाई धर्म पारंपरिक रोमन धर्म का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बन गया था। एशिया माइनर के अनेक क्षेत्रों में चौथी शताब्दी ई. के आरंभ तक बड़ी संख्या में लोग ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके थे। ईसाई धर्म की यह बढ़ती लोकप्रियता रोमन शासकों को चिंतित करने लगी, क्योंकि इसके सिद्धांत रोमन राज्य व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं से भिन्न थे।
रोमन सम्राटों के विरोध के कई कारण थे। ईसाई स्वयं को अन्य धार्मिक समुदायों से अलग रखते थे। वे सम्राट-पूजा, देवी-देवताओं की पूजा और मूर्ति-पूजा का विरोध करते थे। जबकि रोमन सम्राट अपने को देवतुल्य मानते थे और प्रजा से अपने लिए धार्मिक सम्मान तथा पूजा की अपेक्षा रखते थे। ईसाई इस प्रथा को ईश्वर के प्रति अपराध मानते थे। रोमन साम्राज्य युद्ध, विजय और सैन्य शक्ति पर आधारित था, जबकि ईसाई धर्म अहिंसा, प्रेम, त्याग और भाईचारे का संदेश देता था। ईसाई सैनिक सेवा, हिंसक खेलों, रक्तरंजित मनोरंजनों तथा साम्राज्यवादी नीतियों की आलोचना करते थे। वे रोमन जीवन की भौतिकता, विलासिता, मूर्तिपूजा और अनेक सामाजिक परंपराओं को भी उचित नहीं मानते थे। ईसाइयों ने रोम साम्राज्य के विभिन्न नगरों जैसे कोरिंथ, एथेंस और एंटिओक में गिरिजाघरों की स्थापना की और वहां धार्मिक सभाएं आयोजित करने लगे। धीरे-धीरे समाज के गरीब, दीन-हीन, गुलाम और शोषित वर्ग के लोग इस धर्म की ओर आकर्षित होने लगे। इससे रोमन शासकों को भय हुआ कि कहीं यह नया धर्म राज्य की एकता और सम्राट की सत्ता के लिए चुनौती न बन जाए।
नीरो का अत्याचार
रोमन सम्राट नीरो (54-68 ई.) के शासनकाल में ईसाइयों पर सबसे पहला बड़ा अत्याचार हुआ। 16 जुलाई 64 ई. को रोम नगर में भयंकर आग लगी, जिससे नगर का बड़ा भाग नष्ट हो गया। यद्यपि इस अग्निकांड के वास्तविक कारण स्पष्ट नहीं थे, फिर भी ईसाई-विरोधियों ने इसका दोष ईसाइयों पर लगा दिया।
इस घटना के बाद नीरो ने ईसाइयों को अपराधी घोषित कर दिया और उनके विरुद्ध अत्यंत कठोर कार्यवाही की। अनेक ईसाइयों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें भयानक यातनाएँ देकर मृत्यु के घाट उतार दिया गया। परंपरा के अनुसार इसी काल में ईसाई धर्म के प्रमुख प्रचारक संत पीटर और संत पाल को भी मृत्युदंड दिया गया। नीरो की क्रूरता इतनी अधिक थी कि समाज के अनेक लोगों में ईसाइयों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो गई। उनके बलिदान ने ईसाई धर्म को कमजोर करने के स्थान पर और अधिक मजबूत बना दिया।
अन्य रोमन सम्राटों के समय उत्पीड़न
नीरो के बाद भी ईसाइयों की स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुई। सम्राट डोमिशियन (81-96 ई.) के समय ईसाइयों को रोम से निष्कासित किया गया। सम्राट ट्रेजन (98-117 ई.) के शासनकाल में भी उनका उत्पीड़न जारी रहा। इस समय अनेक ईसाइयों को मृत्यु दंड दिया गया। जेरूसलेम के चर्च प्रमुख सिमियोन तथा एंटिओक के प्रमुख इग्नेटियस को भी इसी काल में मृत्युदंड मिला। सम्राट ऑरेलियस (161-180 ई.) और डिओक्लीशियन (284-305 ई.) के समय भी ईसाइयों के विरुद्ध दमन की नीति अपनाई गई। चर्चों की संपत्ति जब्त कर ली गई, ईसाइयों को सरकारी सेवाओं से हटाया गया और उनके विशेष अधिकार समाप्त कर दिए गए। विशेष रूप से डिओक्लीशियन के शासनकाल में ईसाइयों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया गया। किंतु इन कठोर उपायों के बावजूद ईसाई धर्म का प्रसार रुक नहीं सका। अत्याचारों ने ईसाइयों में त्याग, साहस और संगठन की भावना को और अधिक मजबूत कर दिया।
विकास का तृतीय चरण
ईसाई धर्म की विजय और राजधर्म के रूप में स्थापना
ईसाई धर्म के इतिहास का तृतीय चरण 306 ई. से 325 ई. तक माना जाता है। यह काल ईसाई धर्म की महान सफलता का युग था। लगभग तीन शताब्दियों तक उत्पीड़न सहने के बाद भी यह धर्म समाप्त नहीं हुआ, बल्कि और अधिक शक्तिशाली बनकर उभरा। तीसरी शताब्दी ई. के अंत और चौथी शताब्दी ई. के प्रारंभ तक रोमन सम्राटों का दृष्टिकोण बदलने लगा। सम्राट गैलेरियस ने अपने शासन के अंतिम समय में ईसाइयों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाली राजाज्ञा जारी की।
कॉन्स्टैन्टाइन और ईसाई धर्म
ईसाई धर्म के उत्थान में रोमन सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन (306-337 ई.) की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। 312 ई. में जब कॉन्स्टैन्टाइन अपने प्रतिद्वंद्वी मैक्सेन्टियस से सत्ता के लिए संघर्ष कर रहा था, तब परंपरा के अनुसार उसे आकाश में क्रॉस का चिन्ह दिखाई दिया। उसे यह संदेश मिला कि ‘इस चिन्ह के द्वारा विजय प्राप्त करो।’ इस घटना से प्रभावित होकर कॉन्स्टैन्टाइन ने अपने सैनिक ध्वज पर क्रॉस का चिन्ह अंकित कराया और ईसाई धर्म को संरक्षण प्रदान किया। उसने स्वयं भी ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया।
313 ई. में कॉन्स्टैन्टाइन और उसके सह-शासक लिसिनियस ने मिलकर प्रसिद्ध मिलान की राजाज्ञा जारी की। इस आदेश द्वारा ईसाइयों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली और पहले जब्त की गई उनकी संपत्ति वापस कर दी गई। इसके बाद ईसाइयों को अनेक विशेष सुविधाएँ मिलने लगीं। 320 ई. के लगभग बनाए गए कानूनों के अनुसार बिशपों को न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए और चर्चों को करों से मुक्त किया गया। जरूरतमंद ईसाइयों की सहायता की गई तथा कॉन्स्टैन्टिनोपुल सहित अनेक नगरों में भव्य चर्चों का निर्माण कराया गया। इस प्रकार ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ और धीरे-धीरे यह रोमन साम्राज्य का प्रमुख धर्म बन गया। रोम ईसाई धर्म का मुख्य केंद्र बन गया और बाद में रोमन चर्च का प्रमुख पादरी पोप कहलाने लगा।
थिओडोसियस और ईसाई धर्म की सर्वोच्चता
सम्राट थिओडोसियस महान (379-395 ई.) के शासनकाल में 380-381 ई. में कॉन्स्टैन्टिनोपुल में एक महत्त्वपूर्ण धर्मसभा आयोजित हुई। इसके बाद ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का आधिकारिक धर्म घोषित कर दिया गया और अन्य धर्मों के सार्वजनिक पालन पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके परिणामस्वरूप पारंपरिक रोमन धर्म जिसे ‘पगान धर्म’ कहा जाता था, धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। चर्च को करों से मुक्त किया गया, पादरियों को सैनिक सेवा से छूट दी गई और बिशपों को विशेष अधिकार प्रदान किए गए। यद्यपि समय के साथ ईसाई धर्म भी अन्य धार्मिक विचारों के प्रति असहिष्णु होने लगा। जिस प्रकार कभी रोमन शासकों ने ईसाइयों का दमन किया था, उसी प्रकार अब ईसाई संस्थाओं ने अपने विरोधियों के प्रति कठोर नीति अपनानी प्रारंभ कर दी।
ईसाई धर्म की सफलता के कारण
ईसाई धर्म की सफलता केवल राजनीतिक संरक्षण का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे अनेक सामाजिक, धार्मिक और नैतिक कारण थे। अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रारंभ होकर भी यह धर्म कुछ ही शताब्दियों में रोम और यूरोप का प्रमुख धर्म बन गया।
व्यापक ग्रहणशीलता
ईसाई धर्म की सफलता का एक प्रमुख कारण इसकी व्यापक ग्रहणशीलता थी। इसने विभिन्न धर्मों और दर्शनों के उपयोगी तत्वों को आत्मसात किया। यहूदी धर्म से ईश्वर की अवधारणा, नैतिक नियम, पाप और धर्म की धारणाएँ ग्रहण की गईं। जरथुस्त्र धर्म से स्वर्ग-नरक, अच्छाई और बुराई के संघर्ष तथा अंतिम न्याय की भावना प्रभावित हुई। स्टोइक दर्शन से विश्वबंधुत्व और मानव समानता की भावना मिली। कुछ विद्वान ईसाई धर्म के अहिंसा और करुणा के विचारों में बौद्ध धर्म का प्रभाव भी देखते हैं। इस प्रकार ईसाई धर्म अनेक धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं का समन्वित रूप बन गया।
गरीबों और पीड़ितों का समर्थन
ईसा और उनके अनुयायियों ने समाज के गरीब, शोषित और उपेक्षित वर्गों को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने दीन-दुखियों को आशा और सम्मान प्रदान किया। ईसा का संदेश था कि ईश्वर के राज्य में गरीबों और पीड़ितों का भी उतना ही अधिकार है जितना धनवानों का। इस विचार ने समाज के कमजोर वर्गों को अत्यधिक प्रभावित किया और वे बड़ी संख्या में ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुए।
प्रेम, क्षमा और करुणा का संदेश
ईसाई धर्म में प्रेम और क्षमा को अत्यधिक महत्त्व दिया गया। ईसा ने अपने अनुयायियों को शत्रुओं से भी प्रेम करने और बुराई का उत्तर भलाई से देने की शिक्षा दी। दया, सेवा और करुणा के इन सिद्धांतों ने सामान्य जनता के हृदय पर गहरा प्रभाव डाला।
समानता और मानवता का आदर्श
ईसाई धर्म ने सभी मनुष्यों को ईश्वर की संतान बताया। इसमें जाति, वर्ग और धन के आधार पर भेदभाव को महत्त्व नहीं दिया गया। इस समानता की भावना ने गुलामों, गरीबों और समाज के उपेक्षित वर्गों को विशेष रूप से आकर्षित किया।
उत्पीड़न और बलिदान
लगभग तीन शताब्दियों तक ईसाइयों ने अत्याचार सहन किए। पीटर, पाल और अनेक अन्य ईसाइयों के बलिदान ने इस धर्म को और अधिक शक्तिशाली बना दिया। उनके त्याग और साहस ने लोगों के मन में ईसाई धर्म के प्रति सम्मान उत्पन्न किया।
सरल धार्मिक व्यवस्था
अन्य समकालीन धर्मों की तुलना में ईसाई धर्म अधिक सरल था। इसमें जटिल कर्मकांडों और महँगे धार्मिक अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं थी। मानव सेवा को ही ईश्वर की सच्ची पूजा माना गया।
ऐतिहासिक व्यक्तित्व का प्रभाव
अन्य धर्मों के संस्थापकों की तुलना में ईसा एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे। उनके जीवन और शिक्षाओं ने लोगों को अधिक विश्वास प्रदान किया।
धार्मिक सहिष्णुता
प्रारंभिक ईसाई धर्म स्वयं को किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रखता था। इसका संदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए था। इसी कारण विभिन्न वर्गों के लोगों ने इसे स्वीकार किया।
धार्मिक साहित्य का योगदान
ईसाई साहित्य ने इसके प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। न्यू टेस्टामेंट, संत पाल के पत्र और शहीदों के जीवन-वृत्तान्तों ने ईसाई सिद्धांतों को दूर-दूर तक पहुँचाया।
चर्च संगठन की भूमिका
चर्च संगठन ने ईसाई धर्म के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। साम्राज्य के विभिन्न भागों में चर्च स्थापित किए गए और बिशपों के माध्यम से एक संगठित व्यवस्था विकसित हुई। 314 ई. में आर्ल्स की सभा तथा 325 ई. में नीसिया की धर्मसभा ने ईसाई संगठन को मजबूत आधार प्रदान किया।
रोमन शासकों का संरक्षण
गैलेरियस, कॉन्स्टैन्टाइन और थिओडोसियस जैसे शासकों के संरक्षण ने ईसाई धर्म को अत्यधिक शक्ति प्रदान की। अंततः यही धर्म रोमन साम्राज्य का आधिकारिक धर्म बन गया। इस प्रकार ईसाई धर्म का उदय और विकास विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि रोमन समाज, संस्कृति और यूरोपीय सभ्यता के निर्माण में इसका अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा।
ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांत
संस्कार
ईसा मसीह ने जिस धर्म का प्रचार किया था, उसके प्रारंभिक स्वरूप में कर्मकांड, बाहरी धार्मिक आडंबर तथा जटिल संस्कारों को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया था। ईसा का मुख्य बल आंतरिक शुद्धता, प्रेम, क्षमा, सेवा, सदाचार और ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा पर था। उनका विचार था कि मनुष्य का वास्तविक धर्म उसके आचरण और हृदय की पवित्रता में निहित है। किंतु ईसा की मृत्यु के बाद जब ईसाई धर्म एक संगठित धर्म के रूप में विकसित होने लगा, तब इसमें अनेक धार्मिक संस्कारों को सम्मिलित कर लिया गया। धीरे-धीरे ये संस्कार ईसाई जीवन का अनिवार्य अंग बन गए। एक व्यक्ति को पूर्ण ईसाई बनने के लिए इन धार्मिक संस्कारों का पालन आवश्यक माना जाने लगा। ईसाई धर्म में प्रमुख रूप से निम्नलिखित संस्कारों का विकास हुआ—
नामकरण संस्कार (बपतिस्मा या बैपटिज्म)
बपतिस्मा ईसाई धर्म का सबसे प्रमुख प्रारंभिक संस्कार माना गया। इसके द्वारा व्यक्ति को ईसाई समुदाय में प्रवेश कराया जाता था। इसका उद्देश्य पूर्व जन्म अथवा पूर्व जीवन के पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त करना था। इस संस्कार में जल का प्रयोग किया जाता था, जो पवित्रता और नवीन जीवन का प्रतीक माना जाता था।
प्रमाणीकरण संस्कार (कन्फर्मेशन)
यह संस्कार सामान्यतः बालक की लगभग बारह वर्ष की आयु में संपन्न किया जाता था। इसमें उसके ईसाई विश्वास की सार्वजनिक रूप से पुष्टि की जाती थी। इस संस्कार के माध्यम से बालक को धार्मिक जीवन के लिए तैयार किया जाता था।
पवित्र परमप्रसाद (होली यूकारिस्ट)
इस संस्कार का संबंध ईसा के अंतिम भोज (Last Supper) की स्मृति से था। इसमें ईसा के त्याग और बलिदान को स्मरण किया जाता था। ईसाइयों का विश्वास था कि इस संस्कार से मनुष्य को आध्यात्मिक शक्ति, धैर्य और कठिनाइयों को सहन करने की क्षमता प्राप्त होती है।
तप (पेनेंस)
इस संस्कार का उद्देश्य पापों का प्रायश्चित करना था। व्यक्ति अपने अपराधों को स्वीकार कर पश्चात्ताप करता था और धार्मिक नियमों का पालन करके आत्मशुद्धि का प्रयास करता था।
अतिशय विलेपन (एक्सट्रीम ऑन्क्शन)
यह संस्कार मृत्यु के निकट पहुँच चुके व्यक्ति के लिए किया जाता था। इसमें रोगी को पवित्र जल अथवा तेल से अभिषेक किया जाता था। विश्वास था कि इससे उसके पापों का नाश होगा और वह पवित्र अवस्था में ईश्वर के पास जा सकेगा।
पुरोहिताभिषेक (ऑर्डिनेशन)
इस संस्कार द्वारा किसी व्यक्ति को पादरी अथवा धार्मिक अधिकारी बनाया जाता था। इसका उद्देश्य उसे ईश्वर की सेवा और धार्मिक कार्यों के लिए दैवी अधिकार प्रदान करना था।
विवाह संस्कार
ईसाई धर्म में विवाह को पवित्र बंधन माना गया। इस संस्कार के माध्यम से पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन की पवित्रता और धार्मिक उत्तरदायित्व को स्वीकार किया जाता था। इस प्रकार संस्कारों ने ईसाई धर्म को एक व्यवस्थित धार्मिक सँस्था का रूप प्रदान किया।
त्रिमूर्ति का सिद्धांत
ईसाई धर्म का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्धांत त्रिमूर्ति या त्रित्व का सिद्धांत है। इसके अनुसार एक ही परमेश्वर तीन रूपों में विद्यमान है—पिता (God the Father), पुत्र (God the Son) और पवित्र आत्मा (Holy Spirit)। ईसाइयों का विश्वास था कि ये तीनों अलग-अलग होते हुए भी मूल रूप से एक ही परम दिव्य सत्ता के अंग हैं। इनमें कोई ऊँच-नीच नहीं है और तीनों समान रूप से ईश्वर के स्वरूप हैं। चौथी शताब्दी ईस्वी में इस सिद्धांत को विशेष रूप से मान्यता मिली और इसे ईसाई धर्म का मूल सिद्धांत स्वीकार किया गया।
अवतारवाद का सिद्धांत
ईसाई धर्म में अवतारवाद की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। ईसाइयों का विश्वास था कि परमेश्वर ने मानव जाति के उद्धार के लिए स्वयं ईसा मसीह के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। उनके अनुसार ईसा केवल एक सामान्य मनुष्य नहीं थे, बल्कि वे ईश्वर के पुत्र और मानवता के उद्धारकर्ता थे। उन्होंने अपने जीवन और बलिदान द्वारा संसार के पापों को समाप्त करने का प्रयास किया।
पतन का सिद्धांत
ईसाई धर्म के अनुसार मानव जाति का पतन आदम और हव्वा के प्रथम पाप के कारण हुआ। इस पाप के बाद मनुष्य ईश्वर के पूर्ण सान्निध्य से दूर हो गया। ईसाइयों का विश्वास था कि मनुष्य जन्म से ही पाप की प्रवृत्ति लेकर आता है और ईश्वर की कृपा तथा ईसा के माध्यम से ही वह पुनः आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
कन्या जननी का सिद्धांत
ईसाइयों का विश्वास था कि ईसा मसीह का जन्म एक कुमारी कन्या मरियम से हुआ था। यह जन्म सामान्य मानवीय प्रक्रिया से अलग एक दिव्य और रहस्यमय घटना थी। इस सिद्धांत के अनुसार ईसा का जन्म ईश्वर की विशेष इच्छा से हुआ, इसलिए वे साधारण मनुष्य नहीं बल्कि दिव्य शक्ति से सँपन्न थे।
ईसा का द्विविध स्वरूप
ईसाई धर्म में यह विश्वास किया जाता है कि ईसा मसीह का स्वरूप दोहरा था। वे एक ओर पूर्ण मनुष्य थे, क्योंकि उन्होंने मानव जीवन की सभी अवस्थाओं का अनुभव किया; दूसरी ओर वे पूर्ण ईश्वर भी थे, क्योंकि उनमें दैवी शक्ति विद्यमान थी। इस प्रकार ईसा को मानव और ईश्वर दोनों का सँयुक्त स्वरूप माना गया।
प्रायश्चित का सिद्धांत
ईसाइयों के अनुसार ईसा मसीह ने मानव जाति के पापों के प्रायश्चित के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। उन्होंने स्वयं कष्ट सहकर और क्रूस पर मृत्यु स्वीकार करके मनुष्य को पापों से मुक्ति का मार्ग दिखाया। ईसाई विश्वास के अनुसार ईश्वर दयालु है और सच्चे पश्चात्ताप करने वाले मनुष्य को क्षमा प्रदान करता है।
पुनरुत्थान का सिद्धांत
ईसाई धर्म का एक प्रमुख विश्वास ईसा के पुनरुत्थान से संबंधित है। ईसाइयों के अनुसार ईसा को क्रूस पर मृत्यु दिए जाने के तीन दिन बाद वे पुनः जीवित हो उठे और कब्र से बाहर आए। यह घटना ईसाई धर्म में आशा, अमरत्व और ईश्वर की शक्ति का प्रतीक मानी गई।
चर्च की महत्ता
ईसाइयों के अनुसार चर्च केवल प्रार्थना करने का स्थान नहीं था, बल्कि यह मनुष्य और ईश्वर के बीच आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का माध्यम था। चर्च धार्मिक शिक्षा, संस्कारों के संचालन और समाज के नैतिक मार्गदर्शन का प्रमुख केंद्र बन गया।
ईसा का पुनरागमन
ईसाई धर्म में यह विश्वास किया जाता है कि भविष्य में ईसा मसीह पुनः पृथ्वी पर आएंगे। उनका पुनरागमन मृत मनुष्यों के भाग्य का निर्णय करने और ईश्वर के राज्य की स्थापना के लिए होगा। इस विश्वास ने ईसाइयों को नैतिक जीवन, सदाचार और धार्मिक आस्था बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।
ईसाई धर्म में मतभेद और विभिन्न संप्रदायों का विकास
ईसा की मृत्यु के बाद जब ईसाई धर्म का विस्तार हुआ, तब इसके सिद्धांतों और संस्कारों की व्याख्या को लेकर ईसाइयों में मतभेद उत्पन्न होने लगे। धीरे-धीरे इन मतभेदों के आधार पर विभिन्न संप्रदायों का जन्म हुआ। वास्तव में, जब कोई धर्म व्यापक रूप से विकसित होता है, तो उसमें विभिन्न विचारधाराओं और बाहरी प्रभावों का समावेश होने लगता है। ईसाई धर्म के साथ भी यही हुआ। प्रारंभिक ईसाइयों ने अन्य धर्मों और दर्शनों के उन सिद्धांतों को स्वीकार किया जो उन्हें उपयोगी लगे। लेकिन समय बीतने के साथ यही विभिन्न विचारधाराएँ आपसी संघर्ष का कारण बन गईं।
बुद्धिवादी धारा
ईसाई धर्म में एक बुद्धिवादी धारा विकसित हुई, जिसने तर्क के आधार पर धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या करने का प्रयास किया। इस धारा के प्रमुख मत थे—
एरियन मत
इस मत के प्रवर्तक एरियस थे। यूनानी दर्शन के प्रभाव में उन्होंने ईसा को पूर्ण ईश्वर मानने से इनकार किया। उनका विचार था कि ईश्वर पिता है और ईसा पुत्र हैं। पुत्र की उत्पत्ति पिता से हुई है, इसलिए पुत्र पिता के समान नहीं हो सकता। इस मत का विरोध करने के लिए सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन के समय 325 ईस्वी में नीसिया में प्रथम महान धर्मसभा आयोजित की गई। इस सभा ने एरियन मत को अस्वीकार कर त्रिमूर्ति सिद्धांत को स्वीकार किया।
नेस्टोरियन मत
इस मत के प्रवर्तक नेस्टोरियस थे, जो मेसोपोटामिया के धर्मशास्त्री थियोडोर के शिष्य थे। उनका मत था कि मरियम ईसा की माता हो सकती हैं, लेकिन उन्हें ईश्वर की माता नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार उन्होंने ईसा के पूर्ण दैवी स्वरूप पर प्रश्न उठाया। बाद में, इस मत का विरोध हुआ और सम्राट थियोडोसियस द्वितीय ने नेस्टोरियस को निर्वासित कर दिया।
भक्तिवादी धारा
ईसाई धर्म में भक्तिवादी विचारधारा भी विकसित हुई। इसके प्रमुख संप्रदाय थे—
ग्नॉस्टिक मत : ग्नॉस्टिक अनुयायी रहस्यवादी ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभव को अधिक महत्त्व देते थे। उनका विश्वास था कि वास्तविक धर्म ईश्वर से प्राप्त होता है और उसे केवल तर्क से नहीं समझा जा सकता।
मेनीकियन मत : मेनीकियन भी तपस्या और रहस्यवाद में विश्वास करते थे। वे सांसारिक जीवन से दूर रहकर आत्मिक उन्नति को श्रेष्ठ मानते थे।
इस प्रकार ईसाई धर्म के विकास के साथ अनेक धार्मिक और दार्शनिक धाराएँ उत्पन्न हुईं, जिन्होंने इसके स्वरूप को प्रभावित किया।
ईसाई चर्च का संगठन
ईसाई धर्म के विकास और विस्तार में चर्च की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भी चर्च ने यूरोपीय समाज को सँगठित रखने, शिक्षा के संरक्षण और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
इतिहासकार बर्न्स के अनुसार चर्च ने बर्बर जातियों को सभ्य बनाने, सामाजिक न्याय के आदर्शों को बढ़ाने और प्राचीन ज्ञान की रक्षा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। थार्नडाइक ने भी लिखा कि ईसाई चर्च असभ्य जातियों पर प्रभाव स्थापित करने में सफल रहा। विल ड्युरैंट के अनुसार चर्च ने नई संस्कृति के निर्माण में पालनकर्ता की भूमिका निभाई।
चर्च का प्रारंभिक विकास
‘चर्च’ शब्द का अर्थ मूल रूप से धार्मिक सभा या पादरियों का समुदाय था। बाद में ईसाइयों के प्रार्थना-स्थल को भी चर्च कहा जाने लगा। सबसे पहला ईसाई चर्च जेरूसलेम में स्थापित किया गया। रोम में सम्राट क्लॉडियस (41-54 ई.) के शासनकाल में पहला चर्च स्थापित हुआ। परंपरा के अनुसार संत पाल ने यहाँ धार्मिक उपदेश दिए थे। प्रारंभिक चर्च को कैथोलिक चर्च कहा गया। कैथोलिक शब्द का अर्थ है— सार्वभौम या विश्वव्यापी।
चर्च के पदाधिकारी
प्रारंभ में ईसाई समुदाय धार्मिक सभाएँ आयोजित करता था जिन्हें एक्लेसिया कहा जाता था। प्रत्येक सभा अपने नेतृत्व के लिए वरिष्ठ पुरोहितों का चुनाव करती थी। इनकी सहायता के लिए उपयाजक और अन्य धार्मिक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। बाद में, जब ईसाइयों की संख्या बढ़ने लगी, तब प्रत्येक नगर में एक प्रमुख धार्मिक अधिकारी नियुक्त किया गया जिसे बिशप कहा गया। इस प्रकार चर्च संगठन में दो प्रमुख पद बने— एक प्रेस्बाइटर (पुरोहित) और दूसरा बिशप।
चर्च संगठन का विस्तार
धीरे-धीरे बिशपों की संख्या बढ़ने लगी। इनके बीच समन्वय स्थापित करने के लिए बड़े नगरों के बिशपों को विशेष अधिकार दिए गए। इन्हें मेट्रोपोलिटन कहा गया। बाद में रोम, कॉन्स्टैन्टिनोपुल, एंटिओक, जेरूसलेम और सिकंदरिया जैसे प्रमुख नगरों के बिशपों को उच्च स्थान मिला और वे पैट्रियार्क (धर्माध्यक्ष) कहलाने लगे। लगभग 400 ईस्वी तक ईसाई चर्च में चार पद विकसित हो चुके थे—पुरोहित, बिशप, आर्कबिशप और धर्माध्यक्ष (पैट्रियार्क)
चर्च परिषदें
चर्च के निर्णय लेने के लिए विभिन्न प्रकार की परिषदों का आयोजन किया जाता था। यदि किसी परिषद में केवल एक प्रांत के प्रतिनिधि भाग लेते थे तो उसे प्रांतीय परिषद कहा जाता था। यदि अनेक प्रांतों के प्रतिनिधि सम्मिलित होते थे, तो उसे सामान्य परिषद कहा जाता था। 325 ईस्वी में कॉन्स्टैन्टाइन के समय नीसिया की महान परिषद आयोजित की गई, जिसमें ईसाई सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप दिया गया।
पादरियों के नियम
प्रारंभिक तीन शताब्दियों तक पादरियों के लिए अविवाहित होना अनिवार्य नहीं था। वे धार्मिक पद प्राप्त करने से पहले विवाह कर सकते थे, लेकिन पद प्राप्त करने के बाद विवाह की अनुमति नहीं थी। बाद में, सांसारिक भोग-विलास के विरोध में ईसाई चर्च ने पादरियों के लिए ब्रह्मचर्य को अधिक महत्त्व देना प्रारंभ किया।
रोमन चर्च और पोप का उदय
ईसाई जगत में रोमन चर्च का महत्त्व धीरे-धीरे बढ़ता गया। रोम के बिशप को संत पीटर और संत पाल का उत्तराधिकारी माना गया। पाँचवीं शताब्दी में जब रोमन साम्राज्य कमजोर हुआ, तब चर्च ने प्रशासनिक और सामाजिक भूमिका निभाई। नगरों के बिशप प्रशासनिक कार्यों में कुशल थे, इसलिए उन्हें अनेक जिम्मेदारियां दी गईं। बाद में, रोम का बिशप पोप कहलाने लगा और रोमन चर्च पश्चिमी यूरोप का सबसे शक्तिशाली धार्मिक केंद्र बन गया।
ईसाई मठ व्यवस्था
ईसाई धर्म में तपस्या और एकांत जीवन की भावना के विकास से मठों की स्थापना हुई। इतिहासकारों के अनुसार पहला ईसाई मठ मिस्र में पचोमियस द्वारा स्थापित किया गया। बाद में संत बेसिल ने कप्पाडोसिया में मठ स्थापित किया। यद्यपि मठ जीवन की शुरुआत तीसरी शताब्दी में हो गई थी, लेकिन चौथी शताब्दी में इसका व्यापक विकास हुआ। कॉन्स्टैन्टाइन के समय ईसाइयों पर अत्याचार समाप्त हो गए। अब धर्म के लिए मृत्यु स्वीकार करने के स्थान पर तपस्या, त्याग और आत्मसंयम को धार्मिक सेवा का माध्यम माना जाने लगा। मठवासी सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके प्रार्थना, अध्ययन और सेवा का जीवन व्यतीत करते थे। ईसाई मठों में दो प्रकार के धार्मिक व्यक्ति थे— रेगुलर क्लर्जी, जो मठों में रहते थे और सेक्युलर क्लर्जी, जो समाज में रहकर धार्मिक कार्य करते थे। इस प्रकार चर्च और मठ व्यवस्था ने ईसाई धर्म को सँगठित, शक्तिशाली और दीर्घकालीन संस्था बनाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ईसाई धर्म का प्रभाव
ईसाई धर्म का उद्भव और विकास केवल धार्मिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना नहीं था, बल्कि इसने मानव सभ्यता के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा नैतिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। इसका प्रारंभ प्रथम शताब्दी ईस्वी में रोमन साम्राज्य के यहूदिया प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहने वाले साधारण परिवार से हुआ। इसके संस्थापक ईसा मसीह ने प्रेम, दया, क्षमा, सेवा, त्याग और मानव-कल्याण पर आधारित जिन सिद्धांतों का प्रचार किया, वे शीघ्र ही रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में फैल गए।
प्रारंभ में ईसाई धर्म को रोमन शासकों और परंपरावादी समाज का विरोध सहना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। चौथी शताब्दी ईस्वी में कॉन्स्टैन्टाइन महान के संरक्षण के बाद यह रोमन साम्राज्य का प्रमुख धर्म बन गया। इसके बाद ईसाई विचारों ने केवल धार्मिक क्षेत्र को ही नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन, कला, साहित्य, राजनीति और संस्कृति को भी प्रभावित किया।
सामाजिक जीवन पर ईसाई धर्म का प्रभाव
ईसाई धर्म के प्रभाव से रोमन समाज की जीवन-पद्धति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। ईसाइयों द्वारा रविवार (सब्बथ) को पवित्र विश्राम दिवस के रूप में मनाया जाता था। बाद में रविवार को रोमन साम्राज्य में राजकीय अवकाश के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त, ईसाई पर्व एवं धार्मिक उत्सव भी धीरे-धीरे सामाजिक और राजकीय जीवन का हिस्सा बन गए। ईसाई धर्म ने विवाह संस्था को अत्यधिक महत्त्व दिया। ईसाइयों के अनुसार विवाह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक पवित्र धार्मिक संस्था थी। उन्होंने पारिवारिक जीवन में नैतिकता, निष्ठा और पवित्रता पर बल दिया। इसका प्रभाव रोमन समाज पर पड़ा, जहाँ पहले विवाह संस्था अनेक विकृतियों से प्रभावित थी। ईसाई विचारों के कारण स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ और उन्हें समाज में अधिक सम्मान प्राप्त होने लगा। ईसाई धर्म ने परिवार को नैतिक जीवन की आधारभूत इकाई माना। पति-पत्नी के बीच निष्ठा, माता-पिता के प्रति सम्मान तथा बच्चों के प्रति प्रेम को धार्मिक कर्तव्य के रूप में स्वीकार किया गया। इससे रोमन समाज की पारिवारिक व्यवस्था अधिक अनुशासित और नैतिक बनी।
मानवतावादी विचारों का विकास
ईसाई धर्म मूल रूप से मानवतावादी धर्म था। इसमें जाति, वर्ग, धन, जन्म या सामाजिक स्थिति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव को स्वीकार नहीं किया गया। ईसा का संदेश था कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और सभी के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। इस विचारधारा का प्रभाव रोमन समाज पर पड़ा। दीन-हीन, गरीब, दलित और दास वर्ग के प्रति समाज का दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदलने लगा। ईसाई धर्म के विश्व-बंधुत्व के सिद्धांत ने दासों की स्थिति सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ईसा ने धन और विलासिता की आलोचना की थी। उनका मानना था कि अत्यधिक धन-संचय मनुष्य को ईश्वर और नैतिक जीवन से दूर करता है। उन्होंने गरीबों और पीड़ितों को विशेष महत्त्व दिया। इससे समाज में श्रमिकों, निर्धनों और कमजोर वर्गों के प्रति सहानुभूति की भावना विकसित हुई। ईसाई विचारों के प्रभाव से ईमानदारी, सत्यवादिता, कर्तव्यपरायणता, सरलता, मितव्ययिता और मानव सेवा जैसे नैतिक गुणों को महत्त्व मिलने लगा। समाज में केवल भौतिक सफलता के स्थान पर नैतिक जीवन को भी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
अहिंसा और सेवा की भावना का विकास
ईसाई धर्म हिंसात्मक मनोरंजन, क्रूर खेलों और रक्तपातपूर्ण उत्सवों का विरोधी था। रोमन समाज में ग्लैडिएटरों के हिंसक युद्ध जैसे मनोरंजन अत्यंत लोकप्रिय थे, लेकिन ईसाई विचारधारा ने ऐसी प्रवृत्तियों की आलोचना की। ईसा के उपदेशों में दया, क्षमा और प्रेम को विशेष महत्त्व दिया गया। इसके प्रभाव से लोगों में मानव जीवन के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता बढ़ी। मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के प्रति करुणा की भावना विकसित हुई। ईसाइयों ने समाज सेवा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किए। गरीबों, रोगियों, अनाथों और असहाय लोगों की सहायता के लिए अनाथालय, चिकित्सालय और विश्रामगृह स्थापित किए गए। ईसाई समुदाय ने मानव सेवा को ईश्वर की सच्ची पूजा माना और इस भावना से समाज कल्याण के अनेक कार्य किए।
कला और साहित्य पर ईसाई धर्म का प्रभाव
ईसाई धर्म ने कला और साहित्य के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके प्रभाव से अनेक विशाल और भव्य गिरिजाघरों का निर्माण हुआ, जो तत्कालीन स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें सेंट पीटर्स बेसिलिका, हागिया सोफिया तथा जेरूसलेम के प्रमुख ईसाई धार्मिक भवन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ईसाई धर्म के प्रभाव से चित्रकला को भी नया जीवन मिला। दूसरी शताब्दी ईस्वी तक रोमन चित्रकला का पतन हो चुका था, लेकिन चर्चों के निर्माण के साथ भित्तिचित्रों और धार्मिक चित्रों का विकास हुआ। चर्चों की दीवारों पर ईसा, संतों और धार्मिक घटनाओं के चित्र बनाए जाने लगे। साहित्य के क्षेत्र में भी ईसाई विद्वानों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यूसिबियस ने यूनानी भाषा में ‘एक्लेसियास्टिकल हिस्ट्री’ (चर्च का इतिहास) की रचना की, जिसमें प्रारंभिक ईसाई इतिहास और नीसिया की परिषद तक की घटनाओं का वर्णन मिलता है। उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में ‘लाइफ ऑफ कॉन्स्टैन्टाइन’ और ‘क्रॉनिकल्स’ शामिल हैं। संत एम्ब्रोस ने ‘ऑन द ड्यूटीज ऑफ मिनिस्टर्स’ नामक ग्रंथ की रचना की। उन्होंने रोमन लेखक सिसरो के विचारों से प्रेरणा ली, लेकिन ईसाई नैतिकता के अनुसार उनमें परिवर्तन भी किया। संत एम्ब्रोस के शिष्य संत ऑगस्टाइन ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सिटी ऑफ गॉड’ की रचना की। यह ईसाई दर्शन और मध्यकालीन यूरोपीय विचारधारा को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण ग्रंथ बना। संत जेरोम ने चौथी शताब्दी ईस्वी में लैटिन भाषा में बाइबिल का अनुवाद किया, जो ‘वुल्गेट’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह ईसाई साहित्य की महानतम उपलब्धियों में से एक है। इस अनुवाद के कारण लैटिन जगत में ईसाई धर्मग्रंथों की व्यापक समझ विकसित हुई।
रोमन राजनीति पर ईसाई धर्म का प्रभाव
ईसाई धर्म का रोमन राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। प्रारंभिक काल में रोमन शासक ईसाइयों के विरोधी थे। उन्होंने ईसाइयों की संपत्ति जब्त की, उन्हें निर्वासित किया, अनेक अनुयायियों को मृत्युदंड दिया और उनके गिरिजाघरों को नष्ट किया। किंतु चौथी शताब्दी ईस्वी में परिस्थितियाँ बदल गईं। कॉन्स्टैन्टाइन महान ने ईसाई धर्म को संरक्षण प्रदान किया और इसे राजकीय समर्थन प्राप्त हुआ। इसके बाद ईसाई धर्म और रोमन राजनीति के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गया। मध्यकाल तक चर्च और राज्य एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। चर्च के प्रमुख अधिकारी, जिन्हें आगे चलकर पोप कहा गया, यूरोप की राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली बन गए। रोम स्थित चर्च धार्मिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का भी केंद्र बन गया। आठवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में यूरोप की राजनीतिक परिस्थितियों में चर्च की भूमिका अत्यधिक बढ़ गई। पोप ने स्वयं को केवल धार्मिक नेता ही नहीं, बल्कि राजनीतिक मामलों में भी प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित किया। पोप के पास विशाल सेना नहीं थी, किंतु उसके पास संपूर्ण यूरोप में फैला हुआ चर्च संगठन और पादरियों का व्यापक प्रभाव था। इसके अतिरिक्त, धार्मिक विश्वासों के कारण लोग पोप के आदेशों को अत्यंत महत्त्व देते थे। स्वर्ग और नरक की धार्मिक अवधारणाओं के कारण पोप लोगों के आध्यात्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव रखते थे।
इस प्रकार मध्यकालीन यूरोप में जब विभिन्न शासक सत्ता और प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रहे थे, वहीं रोम का पोप ईसाई जगत के सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी के रूप में अपनी शक्ति और प्रभाव को बनाए रखने का प्रयास करता रहा। ईसाई धर्म का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसने रोमन समाज की नैतिकता, परिवार व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, दासों के जीवन, कला, साहित्य और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। प्रारंभ में उत्पीड़न सहने वाला यह धर्म धीरे-धीरे रोमन साम्राज्य की प्रमुख शक्ति बन गया और आगे चलकर यूरोप की सभ्यता एवं संस्कृति के निर्माण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।




