उत्तर वैदिक संस्कृति (लगभग 1000–600 ई.पू.)
परिचय
उत्तर वैदिक काल भारतीय इतिहास का वह चरण था जिसमें वैदिक संस्कृति का विस्तार पश्चिमी गंगा-यमुना दोआब से लेकर पूर्वी गंगा घाटी तक हुआ और समाज, अर्थव्यवस्था तथा राजनीतिक संगठन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। लोहे के बढ़ते उपयोग ने वन क्षेत्रों को कृषि योग्य बनाने में सहायता की, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बन गई। ऋग्वैदिक काल के अपेक्षाकृत छोटे कबीलाई संगठनों के स्थान पर कुरु, पांचाल, कोसल और विदेह जैसे बड़े राजनीतिक क्षेत्र उभरने लगे, राजसत्ता अधिक शक्तिशाली और क्रमशः वंशानुगत हुई, तथा सभा और समिति जैसी पुरानी जन-संस्थाओं का प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ।
सामाजिक जीवन में चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का विभाजन अधिक स्पष्ट और क्रमशः जन्म-आधारित होता गया। गोत्र-व्यवस्था विकसित हुई और सगोत्र विवाह निषिद्ध माना जाने लगा। स्त्रियों की सामाजिक स्थिति ऋग्वैदिक काल की तुलना में गिरी, यद्यपि गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों के उदाहरण मिलते हैं। धार्मिक जीवन में यज्ञ-कर्मकांड अधिक जटिल हुए, परंतु इसी काल के उत्तरार्ध में इस जटिलता के प्रति दार्शनिक प्रतिक्रिया के रूप में उपनिषदों में आत्मा, ब्रह्म, कर्म और मोक्ष संबंधी चिंतन विकसित हुआ। इस प्रकार यह काल जन-आधारित कबीलाई व्यवस्था से स्थायी कृषि-आधारित राज्य-व्यवस्था की ओर संक्रमण की आधारभूमि तैयार करता है।
काल-निर्धारण और साहित्यिक स्रोत
ऋक्-संहिता से इतर संहिता-ग्रंथों, ब्राह्मणों, आरण्यकों और प्रारंभिक उपनिषदों का रचनाकाल सामान्यतः लगभग 1000–600 ई.पू. माना जाता है, यद्यपि सबसे प्राचीन उपनिषदों की रचना-परंपरा लगभग 500 ई.पू. तक विस्तृत रही है।
संहिता-साहित्य
उत्तर वैदिककालीन संहिता-साहित्य में सामवेद संहिता प्रमुख है। यजुर्वेद की कृष्ण शाखा से संबंधित तैत्तिरीय संहिता, मैत्रायणी संहिता और काठक संहिता इसी परंपरा का हिस्सा हैं, जबकि यजुर्वेद की शुक्ल शाखा से संबंधित वाजसनेयी संहिता एक पृथक धारा प्रस्तुत करती है। इनके साथ अथर्ववेद संहिता भी इस काल के सामाजिक-धार्मिक जीवन, विशेषतः लोक-विश्वासों, जादू-टोने और गार्हस्थ्य जीवन की जानकारी का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
ब्राह्मण-ग्रंथ
ब्राह्मण-ग्रंथ प्रत्येक वेद से संबद्ध होकर यज्ञ-कर्मकांडों की व्याख्या करते हैं। ऋग्वेद से संबद्ध ऐतरेय और कौषीतकि ब्राह्मण, सामवेद से संबद्ध पंचविंश (तांड्य) और जैमिनीय ब्राह्मण, यजुर्वेद से संबद्ध तैत्तिरीय और शतपथ ब्राह्मण, तथा अथर्ववेद से संबद्ध गोपथ ब्राह्मण इस श्रेणी के प्रमुख ग्रंथ हैं। इनमें शतपथ ब्राह्मण को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन की दृष्टि से सर्वाधिक विस्तृत और महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
आरण्यक और उपनिषद्
आरण्यक और उपनिषद् इन्हीं ब्राह्मण-ग्रंथों के अंतिम भागों में सम्मिलित माने जाते हैं और वन में एकांतवास करते हुए दार्शनिक चिंतन की परंपरा को प्रतिबिंबित करते हैं। सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण उपनिषदों में बृहदारण्यक, छांदोग्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय और कौषीतकि उपनिषद् गिने जाते हैं, जिनमें आत्मा, ब्रह्म, कर्म और मोक्ष जैसे विषयों पर गहन दार्शनिक विचार-विमर्श मिलता है।
भौगोलिक विस्तार
उत्तर वैदिककालीन साहित्य से स्पष्ट है कि आर्य सप्तसैंधव प्रदेश से पूर्व की ओर बढ़े और यमुना, गंगा तथा सदानीरा (गंडक) नदियों के मैदानों पर अधिकार कर लिया। गंगा-यमुना दोआब और उसके आसपास का क्षेत्र ब्रह्मर्षि देश कहलाता था, जहाँ से आर्य-संस्कृति कोशल, काशी और विदेह (उत्तरी बिहार) तक फैली। इस काल में सभ्यता का केंद्र हिमालय और विंध्याचल के बीच का मध्यदेश (आर्यावर्त) बन गया। लोहे के हथियारों और अश्वचालित रथों के प्रयोग ने आर्यों के इस विस्तार को संभव बनाया।
विदेध माधव की कथा
शतपथ ब्राह्मण के अनुसार विदेध माधव ने वैश्वानर अग्नि को मुख में धारण किया था; घृत का नाम लेने पर वह अग्नि उनके मुँह से निकलकर पृथ्वी पर जा पहुँची। उस समय विदेध माधव सरस्वती के तट पर निवास करते थे। यह अग्नि सब कुछ जलाती हुई पूर्व दिशा की ओर बढ़ी, और उनके पीछे-पीछे विदेध माधव तथा उनके पुरोहित गौतम राहुगण चले। यह अग्नि अनेक नदियों को जलाती गई, किंतु हिमालय से बहने वाली सदानीरा नदी को नहीं जला सकी। यह आख्यान आर्य-संस्कृति के पूर्व दिशा में क्रमिक विस्तार का प्रतीकात्मक वर्णन माना जाता है।
मगध और अंग प्रदेश इस समय आर्य-क्षेत्र से बाहर थे, और दक्षिणी बिहार ‘असनातनी संप्रदायों’ का केंद्र माना जाता था। विंध्य प्रदेश को उत्तर वैदिककालीन साहित्य की भौगोलिक पृष्ठभूमि की दक्षिणी सीमा कहा जा सकता है; इससे आगे आंध्र, शबर और पुलिंद जैसी जनजातियाँ थीं, जो वैदिक सभ्यता से दूर थीं।
पुरातात्त्विक साक्ष्य और लौह-प्रौद्योगिकी
उत्तर वैदिककालीन साहित्य की पुष्टि के लिए पुरातात्त्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश-बिहार में केंद्रित उत्तरी काली पॉलिशदार मृद्भांड (NBPW)-पूर्व कृष्ण-लाल मृद्भांड परंपराएँ इस काल की पुरातात्त्विक अवशेष मानी जाती हैं, यद्यपि चित्रित धूसर मृद्भांड को पूरे उत्तर वैदिक काल की एकमात्र या सार्वभौमिक संस्कृति नहीं समझा जाना चाहिए। ये बस्तियाँ स्थायी जीवन की ओर संकेत करती हैं।
उत्तर वैदिक काल में उत्तरी भारत में लौह-तकनीक का आगमन हुआ, जिसे वैदिक ग्रंथों में ‘श्याम अयस’ या ‘कृष्ण अयस’ कहा गया है। गंधार, बलूचिस्तान, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगभग 1000 ई.पू. से लोहे के उपयोग के प्रमाण मिलते हैं; गंधार की कब्रों में मृतकों के साथ लौह-उपकरण रखे मिले हैं। हस्तिनापुर, आलमगीरपुर, अतरंजीखेड़ा और बटेसर जैसे स्थलों से लौह बाणाग्र, भाले के अग्रभाग, चाकू, चिमटे, पिन और कीलें प्राप्त हुई हैं; अतरंजीखेड़ा से एक दराँती और नोह से एक लौह कुल्हाड़ी मिली है। हल का फाल दुर्लभ है, केवल अतरंजीखेड़ा से चित्रित धूसर मृद्भांड काल के अंत का एक लौह हल-फाल मिला है।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र-क्षेत्र के भगवानपुरा स्थल से गारे/मिट्टी की दीवारों वाला एक तेरह-कक्षीय बड़ा भवन मिला है, जो संभवतः किसी प्रमुख या ग्राम-प्रधान का निवास रहा होगा; भवन में एक आँगन और गलियारा भी था। इसके अतिरिक्त भगवानपुरा में पकी हुई (आवा में पकाई) ईंटें भी बिखरी अवस्था में मिली हैं, जिन्हें विद्वान संभवतः यज्ञ-वेदियों जैसे धार्मिक निर्माणों में प्रयुक्त मानते हैं, न कि आवासीय भवनों में। यह भवन गंगा घाटी में स्थायी बस्तियों और समृद्ध ग्रामीण जीवन का सूचक है। इसी परंपरा के जाखेड़ा स्थल से मिट्टी के ठीकरों से बनी पक्की सड़कें, जल-प्रबंधन के लिए नहर और बाँध के अवशेष भी मिले हैं, जो कृषक समाज की तकनीकी परिपक्वता दर्शाते हैं।
इससे पूर्व की गैरिक मृद्भांड (OCP) और ताम्र-निधि परंपराएँ गंगा-यमुना दोआब में पहले से विद्यमान थीं, जिन पर उत्तर वैदिक काल की लौह-आधारित कृषि-अर्थव्यवस्था क्रमशः विकसित हुई। आर्य जनजातियाँ अधीनस्थ श्रम और परिष्कृत खाद्य-उत्पादन तकनीकों के साथ दोआब क्षेत्र में स्थायी बस्तियाँ बसाने लगीं; दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. के अंत में दोआब और पश्चिमी गांगेय मैदान में छोटी बस्तियों के स्थान पर उन्नत कृषकों की बड़ी बस्तियाँ स्थापित हुईं, जिन्होंने प्रथम सहस्राब्दी ई.पू. के पूर्वार्द्ध तक लौह-प्रौद्योगिकी अपनाई। मध्य गांगेय मैदान और दक्षिण बिहार में लौह-प्रौद्योगिकी का उपयोग कृष्ण-लाल-मृद्भांड संस्कृति से समर्थित था।
धार्मिक-अनुष्ठान की निरंतरता के प्रमाण भी मिलते हैं: प्राक्-चित्रित धूसर तथा चित्रित धूसर मृद्भांड स्थलों पर याज्ञिक गड्ढे, अतरंजीखेड़ा से वृत्ताकार अग्निकुंड, कौशांबी से यज्ञवेदी और श्रावस्ती से छोटे मृद्भांडों वाले गड्ढे प्राप्त हुए हैं।
जनपदों का उदय और राजनीतिक व्यवस्था
क्षेत्रीय जनपदों का उदय
उत्तर वैदिक काल में कबायली संगठन में दरार पड़ी, जिससे छोटे कबीले विलीन होकर बड़े क्षेत्रीय जनपद बनने लगे। पुरु और भरत कबीले मिलकर कुरु तथा तुर्वश और क्रिवि कबीले मिलकर पांचाल कहलाए; इनका आधिपत्य दिल्ली से लेकर दोआब के मध्य और ऊपरी भागों तक था। ब्राह्मण-ग्रंथों में कुरु-पांचाल युग्म का उल्लेख वैदिक सभ्यता के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में मिलता है, और लौह-तकनीक ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई-अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर, आलमगीरपुर, नोह और बटेसर जैसे स्थल कुरु-पांचाल प्रदेश में ही स्थित हैं, जहाँ से लौह बरछी-शीर्ष और बाणाग्र प्राप्त हुए हैं। कुरु-पांचाल शासकों द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराए जाने का उल्लेख उनकी सैन्य-शक्ति का सूचक है। ऐतरेय और जैमिनीय ब्राह्मण में विदर्भ, पुंड और अन्य राज्यों के भी आर्यों के अधीन आने का उल्लेख है, तथा त्रिककुद, कैज और मैनाम जैसे हिमालयी पर्वतों का भी जिक्र मिलता है।
कुरु राज्य के शासकों में परीक्षित् और उनके पुत्र जनमेजय का विशेष उल्लेख मिलता है, जिनके समय में कुरु राज्य की समृद्धि और राजनीतिक प्रतिष्ठा अपने चरम पर पहुँची। पांचाल के शासक प्रवाहण जैवलि दार्शनिक चिंतन के लिए विख्यात थे और छांदोग्य उपनिषद् में उनका उल्लेख मिलता है। विदेह के शासक जनक अपनी विद्वत्सभा के लिए प्रसिद्ध थे, जहाँ याज्ञवल्क्य जैसे दार्शनिकों तथा गार्गी वाचक्नवी सहित अनेक विद्वानों के बीच गंभीर दार्शनिक संवाद हुआ करते थे।
राजतंत्र, उपाधियाँ और अधिकार
उत्तर वैदिक काल में पैतृक राजतंत्र और ‘राष्ट्र’ की अवधारणा स्पष्ट हुई। अथर्ववेद में राजा को क्षेत्र का स्वामी बताया गया है, जिसे वरुण, बृहस्पति, इंद्र और अग्नि दृढ़ता प्रदान करते हैं। शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय संहिता में कर्मकांड द्वारा राजा के राष्ट्र-प्राप्ति और साम्राज्य-पोषण का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में दुष्टरीतु पौंसायन को सृंजयों की दसवीं पीढ़ी का प्रतिनिधि बताया गया है, और ऐतरेय ब्राह्मण में ‘दश-पुरुषं राज्यं’ का वर्णन है। राजा का पद धार्मिक अनुमोदन पर आधारित था; शतपथ ब्राह्मण में राजा के निर्वाचन और राजसूय यज्ञ द्वारा राज्याभिषेक की परंपरा का उल्लेख है। राजा को तेरह ‘रत्निनों’ (अधिकारियों) का समर्थन प्राप्त होता था। भरत दौषयंति और शतनिक सत्राजित द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
ऋग्वेद काल की तुलना में राजा के अधिकार बढ़ गए और उन्हें अधिराज, राजाधिराज, सम्राट, एकराट् जैसी उपाधियाँ मिलने लगीं। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार पूर्व का शासक सम्राट, पश्चिम का स्वराट, उत्तर का विराट, दक्षिण का भोज और मध्यदेश का शासक राजा कहलाता था; अथर्ववेद में समुद्र-पर्यंत पृथ्वी के शासक को एकराट् कहा गया है। कृषि के विकास ने भूमि-स्वामित्व के आधार पर राजा की शक्ति को बढ़ाया। ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग इस काल में क्षेत्र के अर्थ में हुआ, और शतपथ ब्राह्मण में ‘राष्ट्री’ शब्द उस राज्य के लिए प्रयुक्त है जो जनता की संपत्ति का उपभोग करता था।
कर-प्रणाली
उत्तर वैदिक काल में ‘कर’ इकट्ठा करने की प्रथा आरंभ हुई। प्रारंभ में यह स्वैच्छिक भेंट थी, पर बाद में यह अनिवार्य ‘बलि’ बन गई। मुद्रा-प्रणाली के अभाव में कर प्रायः वस्तुओं के रूप में लिया जाता था। तैत्तिरीय संहिता और ऐतरेय ब्राह्मण में राजा को ‘विशमत्ता’ (उत्पादक वर्गों का भक्षक) कहा गया है। वैश्यों और गायों से कर लिया जाता था, जबकि ब्राह्मणों और क्षत्रियों को कर से मुक्त रखा गया था; ब्राह्मणों से शुल्क लेने वाले राज्य की निंदा भी की गई है।
प्रशासनिक और सैन्य संगठन
कृषकों पर क्षत्रियों का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए ब्राह्मणों ने अनुष्ठानों का विकास किया, और सैन्य-श्रेष्ठता तथा आनुष्ठानिक समर्थन के कारण अभिजात वर्ग वैश्यों की तुलना में प्रबल बना रहा। साथ ही प्रजा द्वारा राजा को अपदस्थ करने के उदाहरण भी मिलते हैं—जैसे सृंजयों द्वारा दुष्टरीतु पौंसायन का निष्कासन, जिसका उल्लेख तैत्तिरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण में है। तांड्य ब्राह्मण में प्रजा द्वारा अप्रिय राजा के विनाश हेतु विशेष यज्ञ का भी उल्लेख है। सभा और समिति राजा की निरंकुशता पर कुछ अंकुश बनाए रखती थीं, यद्यपि उनका प्रभाव ऋग्वैदिक काल की तुलना में घट चुका था; अथर्ववेद में इन्हें ‘प्रजापति की पुत्रियाँ’ कहा गया है।
इस काल में स्थायी सेना की अवधारणा के बीज भी दिखाई देते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में कुरु-नरेश के 64 योद्धाओं (उनके पुत्रों और पौत्रों) का उल्लेख है, तो शतपथ ब्राह्मण में पांचाल-नरेश शोण सात्रसाह के हजारों बख्तरबंद योद्धाओं का उल्लेख मिलता है। रत्निन् या ‘वीर’ कहलाने वाले पदाधिकारी राजा की सहायता करते थे, जिनमें ब्राह्मण (पुरोहित), राजन्य, सेनानी, सूत, ग्रामणी, क्षत्र, संगहीता, भाग्दुध, अक्षवाप, गोविकर्तन और पालागल सम्मिलित थे। सेनानी सेना का प्रबंध करता था, रथपति क्षेत्र का शासक होता था, तथा उग्र या जीवग्रम पुलिस-अधिकारी का कार्य करते थे। दूत या प्रहित गुप्तचर का काम करते थे; ग्राम्यवादिन गाँव का न्यायाधीश था और शतिपति सौ ग्रामों का प्रमुख होता था।
आर्थिक जीवन
कृषि-अर्थव्यवस्था
ऋग्वेद काल का पशुचारण-आधारित समाज उत्तर वैदिक काल में क्रमशः कृषि-प्रधान हो गया। अथर्ववेद में मवेशियों की वृद्धि के लिए प्रार्थनाएँ मिलती हैं, पर कृषि ही मुख्य व्यवसाय बन चुकी थी; तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्न-उपार्जन को ‘व्रत’ कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में जुताई (कर्षण), बुआई (वपन), कटाई (कर्तन) और मड़ाई (मर्दन) का उल्लेख है, तथा चार से चौबीस बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हलों का जिक्र मिलता है। लकड़ी और ‘खदिर’ (खैर) के फाल प्रचलित थे, परंतु ‘प्रवीरवंत’ और ‘पवीरव’ नामक धातु-फालों का भी उल्लेख है; अतरंजीखेड़ा से दराँती के अवशेष मिले हैं।
गेहूँ, जौ, चावल (व्रीहि), उड़द, तिल और बाजरे (श्यामाक) की खेती होती थी; छांदोग्य उपनिषद् में अन्न के महत्त्व का वर्णन है, और साठ दिनों में पकने वाली ‘षष्टिक’ धान का उल्लेख मिलता है। प्राकृतिक गोबर-खाद, सिंचाई और ऋतुओं के ज्ञान से कृषि को उन्नत बनाया गया। अथर्ववेद में ‘कृषिदासियों’, नहर खोदने और टिड्डियों से फसल-नाश का भी उल्लेख है। भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व की शुरुआत हुई, जिसके लिए उर्वरासा, उर्वरापत्ति, क्षेत्रसा और क्षेत्रपति जैसे शब्द प्रयुक्त हैं; पशुओं के कानों पर स्वामित्व-चिह्न लगाए जाते थे। कृषकों का अधिशेष उत्पादन पुरोहितों, कर्मचारियों और राजाओं का भरण-पोषण करता था।
शिल्प, व्यापार और मुद्रा
लौह-प्रौद्योगिकी ने शिल्पों को बढ़ावा दिया। वाजसनेयी संहिता में सोना, ताँबा और सीसा का उल्लेख है, तथा अथर्ववेद में ताँबे से गेंद बनाने का जिक्र मिलता है। इस काल के व्यवसायों में महावत, सारथी, व्याध, गड़ेरिया, धीवर, मणिकार, रस्सी बटने वाले, टोकरी बुनने वाले, धोबी, लुहार, नाई, रंगसाज, जुलाहे, खटिक, धातु-शोधक, रथकार, बढ़ई, चर्मकार, स्वर्णकार, कुम्हार और व्यापारी सम्मिलित थे। शतपथ ब्राह्मण में नट और बाँसुरीवादक का उल्लेख है; स्त्रियाँ रंगाई और कसीदाकारी का काम करती थीं। सौ पतवारों वाली नाव का उल्लेख नौ-निर्माण उद्योग के अस्तित्व का प्रमाण है।
वणिकों और व्यापारियों के संगठन थे, जिनका प्रमुख ‘श्रेष्ठी’ कहलाता था। निष्क, अष्टप्रद और शतमान जैसे शब्द संभवतः मुद्रा या मूल्यवान धातु-पिंडों के अर्थ में प्रयुक्त होते थे, यद्यपि इस काल में विनिमय मुख्यतः वस्तु-विनिमय पर आधारित रहा। तैत्तिरीय संहिता में ‘कुसीद’ (ऋण) और शतपथ ब्राह्मण में ‘कुसीदिन’ (उधार देने वाला) का उल्लेख है।
दान की अवधारणा
संपत्ति और दान की अवधारणा में भी परिवर्तन आया। भौतिक वस्तुओं और स्वर्ग-प्राप्ति की कामना के साथ सामान्य जनों को भी कर्मकांड में सम्मिलित किया गया। गाय, बछड़े, बैल, स्वर्ण, पका चावल, झोंपड़ियाँ और जोते हुए खेत दान में दिए जाते थे। ‘इष्ट’ और ‘पूर्त’ दान में भेद किया जाता था—पूर्त-दान में कुएँ, तालाब, मंदिर, बगीचे और भूमि सम्मिलित थे, और शूद्र भी पूर्त-दान कर सकते थे। सामान्यतः राजन्य करों पर तथा ब्राह्मण आनुष्ठानिक भेंटों पर नियंत्रण रखते थे।
सामाजिक संरचना
वर्ण-व्यवस्था
उत्तर वैदिककालीन जटिल उत्पादन-व्यवस्था ने सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया; समुदाय के अधिकांश लोग अब कृषक बन चुके थे। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच विभाजन का आधार पशुपालन के दौर से ही मौजूद था—ऋग्वेद की दान-स्तुतियों में ब्राह्मण और राजन्य-क्षत्रिय परस्पर प्रतिष्ठा प्रदान करते थे: ब्राह्मण राजन्य की ओर से देवताओं से प्रार्थना करते और युद्ध तथा गो-हरण में उनकी सफलता सुनिश्चित करने का प्रयास करते, जिससे राजन्य को शक्ति और राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती; बदले में राजन्य ब्राह्मणों को संपत्ति देकर उनकी आय का प्रमुख स्रोत बनते।
उत्तर वैदिक समाज इसी वर्ण-व्यवस्था पर आधारित होकर अधिक स्पष्ट हुआ: ब्राह्मण धार्मिक अनुष्ठानों के प्रतिष्ठापक (बौद्धिक वर्ग), क्षत्रिय योद्धा-शासक, वैश्य कृषि-पशुपालन में संलग्न और शूद्र तीनों उच्च वर्णों की सेवा में नियुक्त माने गए। वैश्यों को सैनिक सेवाएँ भी देनी पड़ती थीं। ब्राह्मण और क्षत्रिय स्वयं प्रत्यक्ष उत्पादन में संलग्न न होते हुए भी विशेषाधिकार-प्राप्त थे, क्योंकि वे उत्पादन को नियंत्रित करते थे; वैश्य और शूद्र उत्पादन के लिए उत्तरदायी थे। व्यवहार में क्षत्रिय ब्राह्मणों के निकट और शूद्र वैश्यों के निकट थे। शूद्रों की स्थिति सबसे दयनीय थी- सेवा करना उनका कर्तव्य माना जाता था और राजा उन्हें दंडित या उत्पीड़ित कर सकता था। चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था शूद्रों और वैश्यों पर ब्राह्मण-क्षत्रिय प्रभुत्व का सैद्धांतिक आधार बनी।
परिवार, विवाह और स्त्रियों की स्थिति
उत्तर वैदिक काल में ‘कुल’ की अवधारणा का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है, जो ऋग्वेद में नहीं मिलता। एकपत्नी-विवाह मान्य था, पर बहुपत्नी-विवाह भी प्रचलित था, जिसमें प्रथम पत्नी को विशेष अधिकार प्राप्त था। विवाह हेतु कन्याओं के क्रय-विक्रय के उदाहरण मिलते हैं, यद्यपि इसे उचित नहीं माना जाता था। पितृसत्तात्मक समाज में पुत्र-जन्म की कामना की जाती थी- पुत्री को प्रायः दुःखों का कारण और पुत्र को परिवार का रक्षक माना जाता था।
उपनिषदों में याज्ञवल्क्य-गार्गी संवाद से पता चलता है कि कुछ स्त्रियाँ उच्च शिक्षा और दार्शनिक चिंतन में भाग लेती थीं, परंतु उनकी सामाजिक सीमाएँ बनी रहीं। मैत्रायणी संहिता में स्त्रियों को द्यूत (पासा) और सुरा के साथ तीन प्रमुख बुराइयों में गिना गया है। स्त्रियों को ऋण के बदले बंधक रखे जाने, गायों की भाँति उधार दिए जाने और ब्याज पर दी जाने वाली वस्तुओं में सम्मिलित किए जाने के उल्लेख मिलते हैं; उधार ली गई स्त्री को लौटाते समय उसकी संतान भी लौटानी पड़ती थी। स्त्रियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था। परवर्ती वशिष्ठ धर्मसूत्र के अनुसार शूद्र स्त्रियों को केवल आमोद-प्रमोद के लिए उपयुक्त माना गया, धार्मिक कृत्यों के लिए नहीं।
ब्राह्मण-क्षत्रिय संबंध और सामाजिक द्वंद्व
धार्मिक अनुष्ठानों ने ब्राह्मणों और क्षत्रियों के वैश्यों-शूद्रों पर संयुक्त प्रभुत्व को सुदृढ़ किया, परंतु राजा और पुरोहितों के आपसी संबंध सदैव मधुर नहीं रहे। सुदास और वशिष्ठ, सृंजय वैतहव्यस और भृगुओं, श्यपर्ण और विष्वंतर सौशदमन, तथा जनमेजय और असित्मृगस् के बीच विवाद के उदाहरण मिलते हैं; पुरोहित-परिवारों में भी राजाश्रय हेतु परस्पर संघर्ष होता था। सामाजिक अधिशेष पर नियंत्रण के इस संघर्ष के बीच शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथों में ब्राह्मण-क्षत्रिय एकता पर विशेष बल दिया गया है। वैश्यों के प्रत्यक्ष विरोध का उल्लेख नहीं मिलता, किंतु धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से संभावित असंतोष और विद्रोह की आशंका को न्यूनतम रखने का प्रयास किया जाता था; आगे चलकर उपनिषदों में प्रतिपादित कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत भी कुछ सीमा तक इसी सामाजिक व्यवस्था को वैचारिक आधार प्रदान करता प्रतीत होता है।
इस सामाजिक संरचना की तुलना कभी-कभी यूनान और ईरान के समकालीन आदिम समाजों से भी की जाती है। ब्राह्मण वर्ग का विकास आर्य एवं प्राक्-आर्य तत्त्वों के सम्मिश्रण से हुआ माना जाता है।
धार्मिक जीवन
यज्ञ और कर्मकांड
उत्तर वैदिक काल में धार्मिक आस्थाएँ बदलती भौतिक पृष्ठभूमि से प्रभावित हुईं। ब्राह्मणों ने यज्ञ-अनुष्ठान और कर्मकांडीय व्यवस्था को क्रमशः अधिक जटिल और विस्तृत बनाया। प्रमुख यज्ञों में अग्निष्टोम, दर्श-पूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयण, निरूढ़-पशुबंध, सौत्रामणि, पिंडपितृयज्ञ, षोडशी, अतिरात्र और पुरुषमेध सम्मिलित थे; पुरुषमेध में प्रतीकात्मक मानव-बलि का विधान बताया गया है। यज्ञों में ब्राह्मणों को गाय, सोना, वस्त्र, भूमि, तालाब और बाग जैसी दक्षिणा दी जाती थी। अश्वमेध, वाजपेय और राजसूय जैसे राजकीय यज्ञ राजसत्ता की वैधता, कृषि-समृद्धि और राजनीतिक प्रभुत्व को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से किए जाते थे, और इनमें प्रजनन-उर्वरता से जुड़े प्रतीकात्मक अनुष्ठान भी सम्मिलित थे। मगध जैसे परिधीय क्षेत्रों के ‘व्रात्य’ मुखियाओं को वैदिक समाज में समाहित करने हेतु विशेष कर्मकांड (व्रात्यस्तोम) आयोजित किए जाते थे।
देवी-देवता और उपासना
ऋग्वैदिक देवताओं में वरुण और इंद्र का महत्त्व घटा, जबकि प्रजापति, विष्णु और रुद्र-शिव का महत्त्व बढ़ा। प्रजापति को सृष्टि का निर्माता और नियामक माना गया, जो आगे चलकर ‘ब्रह्मा’ कहलाए। रुद्र का संहारक स्वरूप ही आगे शिव के रूप में विकसित हुआ और विष्णु क्रमशः सर्वोच्च देवताओं में गिने जाने लगे। इसी परंपरा से आगे चलकर ब्रह्मा-विष्णु-महेश की त्रिमूर्ति-उपासना का आधार तैयार हुआ। देवी-शक्ति की उपासना के भी प्रारंभिक संकेत इस काल में मिलते प्रतीत होते हैं। पशु-पूजा के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते, किंतु भूत-प्रेत, जादू-टोना, इंद्रजाल और वशीकरण जैसी अंधविश्वास-मूलक मान्यताएँ धर्म में सम्मिलित होने लगीं; अप्सरा, गंधर्व और नाग को अर्ध-देवरूप में स्वीकार किया गया। स्वर्ग और नरक की अवधारणा भी पहली बार इसी काल में स्पष्ट रूप से सामने आई।
उपनिषदीय विचारधारा
लगभग 600 ई.पू. के आसपास उपनिषदों की रचना-परंपरा प्रबल हुई, जो यज्ञ-केंद्रित कर्मकांड की जटिलता के प्रति एक दार्शनिक प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुई। उपनिषदों में यज्ञों को भवसागर पार करने के लिए दुर्बल नौका कहा गया है, और उनके स्थान पर ज्ञान-मार्ग द्वारा ब्रह्म और आत्मा के अद्वैत का प्रतिपादन किया गया। बृहदारण्यक उपनिषद् का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’, छांदोग्य उपनिषद् में उद्दालक आरुणि द्वारा पुत्र श्वेतकेतु को दिया गया उपदेश ‘तत्त्वमसि’ तथा इसी उपनिषद् का ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ ये सभी महावाक्य ब्रह्म-आत्मा की इसी तादात्म्यता के सूचक हैं। यह दार्शनिक चिंतन कबायली जीवन के क्रमिक विघटन से उत्पन्न आध्यात्मिक अस्थिरता को संबोधित करने का भी एक प्रयास था।
इस प्रकार वैदिक और अवैदिक (श्रमण-परंपरा से प्रभावित) विचारधाराओं के सम्मिश्रण से निवृत्तिमार्गी प्रवृत्तियों का विकास हुआ, और आगे चलकर काया-क्लेश तथा संन्यास को भी जीवन-दर्शन के रूप में मान्यता मिली। ब्राह्मण चिंतकों ने इसी निवृत्तिमार्गी विचारधारा को अपनी सामाजिक व्यवस्था में स्थान देने हेतु मानव-जीवन के लिए आश्रम-व्यवस्था का विधान किया।
महाजनपद काल की ओर संक्रमण
उत्तर वैदिक काल के अंत तक विकसित हुई यह कृषि-आधारित, स्थायी राजनीतिक संगठन तथा जटिल सामाजिक-धार्मिक संरचना आगे चलकर छठी शताब्दी ई.पू. के आसपास सोलह महाजनपदों के उदय तथा नगरीकरण के दूसरे चरण (द्वितीय नगरीकरण) की आधारभूमि सिद्ध हुई, जिसमें मगध, कोसल, वत्स और अवंति जैसे बड़े और शक्तिशाली राज्यों का विकास हुआ। इस प्रकार उत्तर वैदिक काल जन-आधारित कबीलाई व्यवस्था से क्षेत्रीय राज्य-व्यवस्था की ओर, तथा यज्ञ-केंद्रित कर्मकांडीय धार्मिकता से ज्ञान-केंद्रित उपनिषदीय चिंतन की ओर हुए संक्रमण का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक चरण था।


