ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ (Copper-Stone Cattle Cultivator Cultures)

ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ (Copper-Stone Cattle Cultivator Cultures)
ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियाँ हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद लगभग दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में, सिंधु क्षेत्र […]

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ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियाँ

हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद लगभग दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में, सिंधु क्षेत्र के बाहर भारत के विभिन्न हिस्सों में अनेक ग्राम्य-संस्कृतियों का उदय हुआ, जो पशुपालन और कृषि पर आधारित थीं और पत्थर के साथ-साथ ताँबे के औजारों का उपयोग करती थीं। इस कारण इन्हें ‘ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ’ कहा जाता है। ये बस्तियाँ मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में पाई गई हैं। इन संस्कृतियों की पहचान उनके विशिष्ट मृद्भांडों के आधार पर की जाती है। हाल के शोधों से इन संस्कृतियों के व्यापारिक संपर्क, पर्यावरणीय प्रभावों और सामाजिक संरचना पर प्रकाश पड़ता है, जो इनके विकास और पतन को समझने में सहायक हैं।

प्रमुख ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियों का विकास

भारतीय उपमहाद्वीप में ताम्रपाषाण काल वह चरण था, जब मानव समुदायों ने पत्थर के उपकरणों के साथ-साथ ताँबे के उपकरणों का भी उपयोग शुरू किया। इस काल में कृषि, पशुपालन, स्थायी अथवा अर्ध-स्थायी बस्तियों, मृद्भांड निर्माण और क्षेत्रीय व्यापार का विकास हुआ। उत्तर-पश्चिम और सिंधु सभ्यता के समानांतर मध्य एवं पश्चिमी भारत में अनेक स्थानीय ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ विकसित हुईं। इनमें आहड़-बनास, कायथा, मालवा और जोर्वे संस्कृति विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त सवाल्दा, प्रभास पाटन और रंगपुर जैसी संस्कृतियों ने भी इस सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध किया।

आहड़-बनास संस्कृति

आहड़-बनास संस्कृति का विकास मुख्यतः दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में हुआ। इसका प्रमुख केंद्र आहड़ (उदयपुर क्षेत्र) था और इसका विस्तार बनास नदी तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों तक था। इसका काल सामान्यतः लगभग ईसा-पूर्व तीसरी सहस्राब्दी के उत्तरार्ध से दूसरी सहस्राब्दी के मध्य तक माना जाता है, यद्यपि विभिन्न स्थलों के आधार पर काल-निर्धारण में कुछ अंतर मिलता है।

इस संस्कृति की प्रमुख विशेषता काले-लाल मृद्भांडों पर सफेद रंग से की गई चित्रकारी है। यहाँ ताँबे के उपकरण बड़ी संख्या में मिले हैं। राजस्थान के अरावली क्षेत्र में ताँबे के अयस्क की उपलब्धता ने इस संस्कृति के धातु-उद्योग को विशेष आधार प्रदान किया। कृषि और पशुपालन इसके आर्थिक जीवन के प्रमुख आधार थे।

कायथा संस्कृति

कायथा संस्कृति का विकास मुख्यतः मध्य प्रदेश में, विशेषकर चंबल और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में हुआ। इसका प्रमुख स्थल कायथा है, जो वर्तमान उज्जैन क्षेत्र के निकट स्थित है। इसका काल लगभग ईसा-पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के आरंभिक चरण से संबंधित माना जाता है।

कायथा संस्कृति से विशिष्ट प्रकार के मृद्भांड, ताँबे की वस्तुएँ, पत्थर के उपकरण तथा मनके प्राप्त हुए हैं। इसके लोगों का जीवन कृषि, पशुपालन और स्थानीय शिल्प पर आधारित था। पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि इनका संपर्क आसपास की अन्य ताम्रपाषाण संस्कृतियों से भी था।

मालवा संस्कृति

मालवा संस्कृति का विकास मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में हुआ और इसका प्रमुख विस्तार नर्मदा तथा चंबल घाटी के आसपास दिखाई देता है। इसका काल लगभग ईसा-पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के आरंभ से मध्य भाग तक माना जाता है। नवदाटोली, एरण और नागदा इसके प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों में शामिल हैं।

मालवा संस्कृति की पहचान उसके विशिष्ट काले-लाल मृद्भांडों पर ज्यामितीय तथा अन्य चित्रांकन से होती है। यहाँ कृषि और पशुपालन के साथ-साथ ताँबे के उपकरणों का प्रयोग भी मिलता है। बस्तियों में मकानों के अवशेष, भंडारण की व्यवस्थाएँ तथा घरेलू उपयोग की वस्तुएँ सामाजिक जीवन की स्थिरता और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का संकेत देती हैं।

जोर्वे संस्कृति

जोर्वे संस्कृति का विकास मुख्यतः महाराष्ट्र में हुआ। इसका नाम अहमदनगर जिले के जोर्वे स्थल से लिया गया है। इसका काल लगभग ईसा-पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के उत्तरार्ध से पहली सहस्राब्दी ईसा-पूर्व के आरंभिक चरण तक माना जाता है। इनामगाँव, दैमाबाद और प्रकाश इसके महत्त्वपूर्ण स्थलों में हैं।

जोर्वे संस्कृति के लोगों की अर्थव्यवस्था कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। गेहूँ, जौ, दालों तथा अन्य फसलों की खेती के प्रमाण मिले हैं। लाल मृद्भांडों पर काले रंग से चित्रांकन इसकी प्रमुख विशेषताओं में है। इनामगाँव जैसे स्थलों से योजनाबद्ध बस्ती, मकानों, भंडारण और दफन संस्कारों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

अन्य ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ

पश्चिमी भारत में सवाल्दा संस्कृति का विकास मुख्यतः महाराष्ट्र के तापी क्षेत्र में हुआ। प्रभास पाटन संस्कृति गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में विकसित हुई और इसका संबंध हड़प्पाई परंपराओं तथा स्थानीय सांस्कृतिक विकास से भी जोड़ा जाता है। गुजरात की रंगपुर संस्कृति भी उत्तर-हड़प्पा एवं ताम्रपाषाण सांस्कृतिक परंपराओं को समझने में महत्त्वपूर्ण है।

सांस्कृतिक संपर्क और पतन

इन संस्कृतियों को पूर्णतः अलग-थलग विकसित परंपराएँ नहीं माना जा सकता। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मृद्भांडों, ताँबे की वस्तुओं, मनकों और अन्य सामग्रियों के आदान-प्रदान के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क का संकेत मिलता है। अरावली क्षेत्र के ताँबे जैसे संसाधनों ने दूरस्थ क्षेत्रों के साथ विनिमय को बढ़ावा दिया होगा।

इन संस्कृतियों के पतन के पीछे एक ही कारण नहीं था। जलवायु परिवर्तन, वर्षा में कमी, पर्यावरणीय दबाव, कृषि-व्यवस्था में परिवर्तन और संसाधनों की उपलब्धता में कमी जैसे अनेक कारकों ने अलग-अलग क्षेत्रों में इनकी बस्तियों को प्रभावित किया। इसलिए ताम्रपाषाण संस्कृतियों का विकास और अवसान एक जटिल क्षेत्रीय प्रक्रिया थी, जिसने आगे चलकर भारतीय उपमहाद्वीप की लौहयुगीन और प्रारंभिक ऐतिहासिक संस्कृतियों के विकास के लिए आधार तैयार किया।

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान

अहाड़ (बनास) संस्कृति

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की बनास नदी घाटी में अहाड़ (उदयपुर), गिलुंद (चित्तौड़गढ़) और बालाथल (उदयपुर) जैसे स्थलों का उत्खनन किया गया है। इस क्षेत्र की ताम्र-पाषाणिक संस्कृति को ‘अहाड़ संस्कृति’ या ‘बनास संस्कृति’ कहा जाता है। अहाड़ और गिलुंद बड़ी बस्तियाँ थीं, जहाँ मकान मिट्टी के गारे और पत्थरों से बनाए जाते थे। नींव में पत्थरों का उपयोग होता था, और दीवारों को बाँस के पर्दों या पत्थर की पिंडिकाओं से मजबूत किया जाता था। छतें ढलवाँ थीं, और गिलुंद में पक्की ईंटों के उपयोग के साक्ष्य भी मिले हैं। फर्श काली मिट्टी और पीली गाद से बनाए जाते थे, जिन पर कभी-कभी नदी की बजरी बिछाई जाती थी। अहाड़ में 33 फीट 10 इंच लंबा एक मकान मिला है, जिसे कच्ची दीवार से दो हिस्सों में बाँटा गया था। गिलुंद से भंडार-गर्त और कई मुँहवाले चूल्हे भी प्राप्त हुए हैं।

ताम्र-पाषाणिक
ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ

इस संस्कृति के लोग मुख्य रूप से कृषक और पशुपालक थे। वे गेहूँ, जौ, धान, चना, मूँग और संभवतः बाजरा की खेती करते थे, साथ ही गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सुअर पालते थे। उत्खनन में मछली, कछुए, मुर्गे और हिरण की अस्थियाँ मिली हैं, जो शिकार और मत्स्य पालन की ओर संकेत करती हैं। मृद्भांड मुख्य रूप से काले और लाल रंगों में थे, जिन पर सफेद रैखिक और बिंदीदार आकृतियाँ बनी थीं। अहाड़ के लोग ताँबे के उपकरणों, जैसे सपाट कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ, अंगूठियाँ, सुरमे की सलाइयाँ और चाकू, का निर्माण घरों में करते थे। गणेश्वर (अहाड़ के निकट) से प्राप्त ताम्र-उपकरणों से पता चलता है कि यहाँ ताँबा मध्य प्रदेश और दक्कन की समकालीन संस्कृतियों को निर्यात किया जाता था। रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर इस संस्कृति का काल ई.पू. 2100 से ई.पू. 1200 तक माना जाता है। हाल के शोधों ने सुझाव दिया है कि जलवायु परिवर्तन और नदी घाटियों में जल की कमी इस संस्कृति के लोप का कारण हो सकती है।

मालवा क्षेत्र

कायथा और मालवा संस्कृतियाँ

पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में कायथा, एरण, नवदाटोली और माहेश्वर जैसे स्थलों से ताम्र-पाषाणिक जीवन के साक्ष्य मिले हैं। कायथा में तीन संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं- कायथा संस्कृति (ई.पू. 2200-2000), अहाड़ संस्कृति (ई.पू. 2100-1500) और मालवा संस्कृति (ई.पू. 1600-1300)।

कायथा संस्कृति में चाक-निर्मित मृद्भांड, ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ, सूक्ष्म पाषाण-उपकरण, और बिल्लौर, गोमेद व सेलखड़ी के मनके मिले हैं। अहाड़ संस्कृति के साक्ष्य इस क्षेत्र में दक्षिण-पूर्वी राजस्थान से सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दर्शाते हैं। मालवा संस्कृति का सबसे प्रमुख साक्ष्य नवदाटोली से मिला है, जिसका उत्खनन एच.डी. सांकलिया ने किया था। नवदाटोली में दो प्रकार के गेहूँ, अलसी, मसूर, काला चना, हरा चना, हरी मटर और खेसरी की फसलों के अवशेष मिले हैं। यह भारत का सबसे विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम-स्थल है। मालवा संस्कृति के मृद्भांड अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें ज्यामितीय आकृतियाँ और काले-लाल रंगों का उपयोग प्रमुख है। नए शोधों से पता चलता है कि मालवा क्षेत्र व्यापार का केंद्र था, और यहाँ से ताँबे के उपकरण अन्य क्षेत्रों में निर्यात किए जाते थे।

ताम्र-पाषाणिक
ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ

महाराष्ट्र क्षेत्र

जोर्वे संस्कृति

पश्चिमी महाराष्ट्र में जोर्वे, नेवासा, दायमाबाद, सोनगाँव और इनामगाँव जैसे स्थलों से ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के अवशेष मिले हैं। दायमाबाद में सांस्कृतिक अनुक्रम से पता चलता है कि यहाँ का प्रारंभिक स्तर हड़प्पा सभ्यता से प्रभावित था, दूसरा स्तर अहाड़ संस्कृति से, और तीसरा मालवा संस्कृति से। चौथा स्तर जोर्वे संस्कृति (ई.पू. 1400-700) का है, जो महाराष्ट्र की विशिष्ट संस्कृति है। जोर्वे संस्कृति के मृद्भांड लाल तल पर काली ज्यामितीय आकृतियों और टोंटीदार बर्तनों के लिए प्रसिद्ध हैं। ताँबे के उपकरणों में चूड़ियाँ, मनके, फलक, छेनियाँ, सलाइयाँ, कुल्हाड़ियाँ और छोटे बर्तन शामिल हैं। दायमाबाद से प्राप्त ताँबे की चार चादरें (रथ, गैंडा, हाथी और साँड़) इस काल की शिल्पकला को दर्शाती हैं।

जोर्वे संस्कृति में जौ, गेहूँ, मसूर, कुलिथ, मटर और चावल की खेती होती थी। बेर की गुठलियाँ और पटसन के साक्ष्य भी मिले हैं। पालतू पशुओं में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, सुअर और घोड़ा शामिल थे। इनामगाँव से मातृदेवी और साँड़ की मिट्टी की प्रतिमाएँ मिली हैं, जो धार्मिक प्रथाओं को दर्शाती हैं। हाल के शोधों से संकेत मिलता है कि जोर्वे संस्कृति में नगरीकरण की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हो गई थी, विशेष रूप से दायमाबाद और इनामगाँव में, जहाँ किलेबंद बस्तियाँ और व्यापारिक केंद्र विकसित हुए थे।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में ताम्र-पाषाणिक तत्त्वों के प्रसार के साक्ष्य ब्रह्मगिरि, मास्की, पिकलीहल, उतनूर, संगनकल्लू, पायमपल्ली, हेम्मिगे, नागार्जुनकोंडा और कोडेकल जैसे स्थलों से मिले हैं। इनका काल रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर ई.पू. 2300 से 900 तक माना जाता है। मृद्भांडों में विविधता और पॉलिशदार पत्थर के उपकरण प्रमुख हैं। टेक्लाकोटा से प्राप्त सोने की लटकन से संकेत मिलता है कि इस काल में स्वर्ण का उपयोग शुरू हो गया था। बाजरा और चना मुख्य फसलें थीं, और भेड़-बकरियों के अवशेष पशुपालन के महत्त्व को दर्शाते हैं। नए शोधों के अनुसार, दक्षिण भारत की ये संस्कृतियाँ प्रारंभिक चरण में चरवाहा-प्रधान थीं, जो बाद में कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था में विकसित हुईं।

पूर्वी भारत

पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल के वीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर और बाँकुड़ा, साथ ही उड़ीसा, बिहार के चिरांद और सोनपुर, और पूर्वी उत्तर प्रदेश के खैराडीह और नौहान से ताम्र-पाषाणिक साक्ष्य मिले हैं। पांडुराजार ढिबि और महिशाल जैसे स्थलों से चावल-आधारित ग्राम-संस्कृति के प्रमाण हैं, जिनका काल ई.पू. 1500-700 माना जाता है। काले-लाल मृद्भांड इस क्षेत्र की विशेषता हैं। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि पूर्वी भारत में ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियाँ स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल थीं और चावल की खेती पर विशेष जोर देती थीं।

ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दोआब

ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दोआब में गेरुए मृद्भांड (ओ.सी.पी.) संस्कृति प्रमुख थी, जो सहारनपुर के मायापुर से इटावा के साईपाई तक फैली थी। साईपाई से प्राप्त तलवार और मत्स्य भाले का सिरा इस संस्कृति से संबंधित है। ‘गंगा घाटी ताम्रनिधि’ में कुल्हाड़ियाँ, मत्स्य भाले और श्रृंगिकायुक्त तलवारें शामिल हैं, जिनका काल ई.पू. 2000-1500 माना जाता है। अतरंजीखेड़ा से काले-लाल मृद्भांड (डब्लू.आर.डब्लू.) शैली मिली है, जो गेरुए और चित्रित धूसर भांड (पी.जी.डब्लू.) संस्कृतियों के बीच की कड़ी है। नए शोधों से संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियाँ हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद स्थानीय संसाधनों पर आधारित थीं और व्यापारिक नेटवर्क के माध्यम से अन्य क्षेत्रों से जुड़ी थीं।

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों की विशेषताएँ

चित्रित मृद्भांड

इन संस्कृतियों की प्रमुख विशेषता चाक-निर्मित चित्रित मृद्भांड थी। आकृतियाँ प्रायः ज्यामितीय थीं, और मृद्भांडों पर काला, लाल और सफेद रंगों का उपयोग होता था। कायथा में भूरे या चॉकलेटी रंग से चित्रित लाल मृद्भांड, और अहाड़ में काले-सफेद डिज़ाइन प्रमुख थे। प्रभास पाटन और रंगपुर में चिकनी सतह पर लाल रंग की शैली प्रचलित थी। मृद्भांड 500-700 डिग्री सेल्सियस पर भट्ठियों में पकाए जाते थे, जो तकनीकी प्रगति को दर्शाता है। हाल के शोधों से पता चलता है कि मृद्भांडों की शैलियाँ क्षेत्रीय व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दर्शाती हैं।

ताम्र-पाषाणिक उपकरण

पत्थर के ब्लेड और शल्क उद्योग इन संस्कृतियों की विशेषता थे। चेल्सेडनी, चर्ट, जैस्पर और एगेट से बने समानांतर ब्लेड, दाँतेदार ब्लेड, चाकू, अर्द्धचंद्राकार और त्रिकोण उपकरण प्रचलित थे। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पॉलिशदार हस्तकुठार भी मिले हैं। ताँबे के उपकरणों में समतल कुठार, सेल्ट, तीर और भाले के अग्रभाग, चूड़ियाँ, अंगूठियाँ और मनके शामिल थे। कायथा से 28 ताँबे की चूड़ियाँ मिली हैं। सूत, रेशम और मनके के हार कताई-बुनाई और स्वर्णकारी व्यवसाय की ओर संकेत करते हैं। नए अध्ययनों से पता चलता है कि ताँबे का व्यापार इन संस्कृतियों की अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।

निर्वाह-योग्य अर्थव्यवस्था

ये संस्कृतियाँ काली मिट्टी वाले अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में विकसित हुईं। अर्थव्यवस्था कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। जौ, गेहूँ, धान, बाजरा, मसूर, चना, मटर और काला चना मुख्य फसलें थीं। पालतू पशुओं में गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सुअर और ऊँट शामिल थे। मछली पकड़ना और शिकार भी प्रचलित था। अहाड़, गिलुंद, नवदाटोली और दायमाबाद जैसे स्थल व्यापारिक केंद्र थे। शोधों से संकेत मिलता है कि ये समुदाय क्षेत्रीय और अंतर-क्षेत्रीय व्यापार में सक्रिय थे।

बस्तियाँ और आवास

इन संस्कृतियों ने बड़े गाँवों की स्थापना की। बालाथल और गिलुंद में किलेबंद बस्तियाँ थीं। घर आयताकार, वर्गाकार या वृत्ताकार थे, जिन्हें मिट्टी के गारे, बाँस और घास-फूस से बनाया जाता था। नवदाटोली में चौकोर और वृत्ताकार घर मिले हैं। जोर्वे संस्कृति में पाँच कमरों वाला मकान और नेवासा में 45×20 फीट बड़ा घर मिला है। गर्त-निवास और भंडार-गर्त भी प्राप्त हुए हैं। हाल के शोधों से पता चलता है कि ये बस्तियाँ सामाजिक संगठन और स्थानीय संसाधनों के उपयोग को दर्शाती हैं।

शवाधान

महाराष्ट्र में शवों को अस्थि-कलश में फर्श के नीचे दफनाया जाता था। दक्षिण भारत में शवों के सिर पूर्व और पैर पश्चिम की ओर, जबकि महाराष्ट्र में सिर उत्तर और पैर दक्षिण की ओर मिले हैं। पश्चिमी भारत में पूर्ण शवाधान और पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान प्रचलित था। जोर्वे चरण में वयस्कों के टखने काटे जाते थे। इनामगाँव से चार पैरों वाला विशाल अस्थि-कलश (80×50 से.मी.) मिला है, जिसमें एक पुरुष कंकाल बैठी स्थिति में था। नए शोधों से पता चलता है कि शवाधान प्रथाएँ धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं से जुड़ी थीं।

धर्म और धार्मिक विश्वास

वृषभ और मातृदेवी की पूजा इन संस्कृतियों में महत्त्वपूर्ण थी। इनामगाँव और नेवासा से सिररहित नारी-प्रतिमाएँ और बैल की मूर्तियाँ मिली हैं, जो शाकंभरी देवी (उर्वरता की देवी) से संबंधित हो सकती हैं। दायमाबाद से ताँबे की ठोस मूर्तियाँ (हाथी, बैल) धार्मिक महत्त्व को दर्शाती हैं। अग्निवेदियों के साक्ष्य अग्निपूजा की संभावना दर्शाते हैं। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि ये धार्मिक प्रथाएँ पर्यावरणीय और सामाजिक आवश्यकताओं से प्रभावित थीं।

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियाँ स्थानीय तत्त्वों के साथ-साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सूचक हैं। ये दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में विकसित हुईं और पहली सहस्राब्दी ई.पू. के आसपास लुप्त हो गईं। जोर्वे संस्कृति कुछ स्थलों पर ई.पू. 700 तक बनी रही। हाल के शोधों के अनुसार बढ़ती शुष्कता और जलवायु परिवर्तन इनके पतन के प्रमुख कारण थे। ये संस्कृतियाँ भारतीय उपमहाद्वीप में द्वितीय नगरीकरण की नींव रखने में महत्त्वपूर्ण थीं, जो चौथी-पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में शुरू हुआ।

महत्त्वपूर्ण FAQ

  1. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ क्या थीं?


    उत्तर: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ वे ग्रामीण संस्कृतियाँ थीं, जिनमें लोग कृषि और पशुपालन दोनों पर निर्भर रहते थे। इनके लोग ताँबे के साथ पत्थर के उपकरणों का भी प्रयोग करते थे तथा स्थायी या अर्ध-स्थायी बस्तियों में रहते थे।

  2. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियों का प्रमुख क्षेत्र कौन-सा था?


    उत्तर: इन संस्कृतियों का प्रमुख विकास राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में हुआ। आहड़-बनास, कायथा, मालवा, जोर्वे, सवाल्दा और प्रभास पाटन जैसी संस्कृतियाँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

  3. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों के प्रमुख कृषि उत्पाद क्या थे?


    उत्तर: क्षेत्र के अनुसार इनके लोग गेहूँ, जौ, चावल, बाजरा, दालें और विभिन्न तिलहन उगाते थे। कृषि के साथ पशुपालन भी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार था।

  4. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक किन पशुओं को पालते थे?


    उत्तर: इनके प्रमुख पालतू पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी और सूअर शामिल थे। कुछ स्थलों से अन्य पशुओं के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं का उपयोग भोजन, कृषि कार्य और अन्य आर्थिक गतिविधियों में किया जाता था।

  5. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों की प्रमुख भौतिक विशेषताएँ क्या थीं?


    उत्तर: इन संस्कृतियों में ताँबे और पत्थर के उपकरण, विशिष्ट प्रकार के मृद्भांड, मनके, आभूषण तथा कृषि उपकरण मिलते हैं। बस्तियों में मिट्टी, बाँस और लकड़ी से बने घरों तथा अनाज भंडारण की व्यवस्थाओं के प्रमाण भी मिले हैं।

  6. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियों का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था?


    उत्तर: इन संस्कृतियों ने कृषि, पशुपालन, धातु-प्रयोग, शिल्प और ग्रामीण बस्तियों के विकास को आगे बढ़ाया। विभिन्न क्षेत्रों के बीच वस्तुओं और तकनीकों के आदान-प्रदान ने सांस्कृतिक संपर्क को मजबूत किया तथा आगे की लौहयुगीन और प्रारंभिक ऐतिहासिक संस्कृतियों के विकास की आधारभूमि तैयार की।

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