दिल्ली सल्तनत: तुगलक वंश 1320-1412 ई. (Delhi Sultan: Tughlaq Dynasty 1320-1412 AD)

तुगलक वंश की स्थापना 1320 ई. में गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) ने की थी। गाजी मलिक का वंश स्वदेशी माना जाता है। उसका पिता बलबन के समय में हिंदुस्तान आया था और उसने पंजाब की एक जाट कन्या से विवाह किया था। इस वंश में तीन योग्य शासक हुए- गयासुद्दीन तुगलक (1320-1324 ई.), उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक (1324-1351 ई.) और उसका उत्तराधिकारी फिरोजशाह तुगलक (1351-1387 ई.)। इनमें से पहले दो शासकों का अधिकार लगभग लगभग पूरे देश पर था। फिरोज का साम्राज्य उनसे छोटा अवश्य था, किंतु अलाउद्दीन खिलजी के साम्राज्य से छोटा नहीं था। यद्यपि तुगलक वंश के सुल्तान 1412 ई. तक दिल्ली पर शासन करते रहे, किंतु 1398 ई. में तैमूर के दिल्ली पर आक्रमण के साथ ही तुगलक साम्राज्य का विघटन आरंभ हो गया और 1413 ई. में दिल्ली में सैय्यद वंश की सत्ता स्थापित हो गई।

गयासुद्दीन तुगलक (1320-1325 ई.) (Gayasuddin Tughlaq)

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गयासुद्दीन तुगलक

गयासुद्दीन तुगलक तुगलक वंश का पहला शासक था। वह ‘गाजी मलिक’ या ‘तुगलक गाजी’ के नाम से 8 सितंबर, 1320 ई. को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था, जिसने अपने नाम के साथ ‘गाजी’ अर्थात् ‘काफिरों का वध करनेवाला’ शब्द जोड़ा था। सुल्तान बनने से पहले गयासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी के शासनकाल में उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (दीपालपुर) के गर्वनर (सूबेदार) के रूप में मंगोल आक्रमणों से सल्तनत की सीमाओं की रक्षा की थी। जब खुसरव शाह ने मुबारकशाह की हत्या करके सिंहासन पर अधिकार कर लिया तो गयासुद्दीन ने विद्रोह कर दिया और शक्तिशाली सेना के साथ दिल्ली पहुँचकर सुलतान खुसरव की हत्या करके स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। मुल्तान के एक मस्जिद में एक अभिलेख में गाजी ने यह दावा किया है कि ‘मैंने 29 लड़ाइयों में ततारों को पराजित किया है, मेरा नाम मलिक-उल-गाजी है।

गयासुद्दीन तुगलक की कठिनाइयाँ

गयासुद्दीन के सिंहासन पर बैठने के समय परिस्थितियाँ बहुत गंभीर थीं। सीमावर्ती प्रांतों में दिल्ली सल्तनत का प्रभाव समाप्त हो चुका था। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद जो अराजकता का युग आया, उसमें उसकी शासन-पद्धति भी विच्छिन्न हो गई थी। केंद्रीय सत्ता की दुर्बलता के कारण अनेक सूबेदार विद्रोही हो गये थे, कुछ सूबेदारों ने अपनी स्वतंत्रता भी घोषित कर दी थे। राज्य में चारों ओर अव्यवस्था फैली हुई थी, किंतु गाजी मलिक अपने पूर्वगामियों से भिन्न था, मुख्यतया विपरीत परिस्थितियों में अपने प्रारंभिक प्रशिक्षण के कारण उसमें चरित्रबल था। गयासुद्दीन तुगलक पुण्यात्मा दयालु एवं उदार प्रवृति का था और ईश्वर से डरता था। अमीर खुसरो ने गयासुद्दीन की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि ‘उसके प्रत्यक कार्य से बुद्धिमत्ता और चतुराई प्रकट होती थी। ऐसा लगता था कि उसके मुकुट के नीचे योग्यताओं का निवास है।’ लेनपूल ने लिखा है कि ‘वह एक विश्वसनीय सीमारक्षक, न्यायप्रिय, उच्चाशय तथा शक्तिशाली शासक था।’

गयासुद्दीन तुगलक की उपलब्धियाँ (Gaiasuddin Tughlaq’s Achievements)

गयासुद्दीन तुगलक ने अमीरों को प्रसन्न करने की नीति अपनाई, यद्यपि कुछ विद्रोही सरदारों का कठोरतापूर्वक दमन भी किया। बरनी के अनुसार जिस प्रशासन के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने रक्तपात व अत्याचार की नीति अपनाई, उसी प्रशासन को गयासुद्दीन गाजी मलिक ने चार वर्षों में ही बिना किसी कठोरता के संभव बना दिया।

सैनिक अभियान और विजयें (Military Campaigns and Victories)

गयासुद्दीन तुगलक पूर्णतः साम्राज्यवादी सुल्तान था। उसने विभिन्न प्रांतों पर सल्तनत का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए सैनिक प्रभुत्व एवं साम्राज्यवाद की खिलजी नीति का अनुसरण किया, जिसके विरुद्ध प्रतिक्रिया उसके उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक की असफलता के साथ आरंभ हुई। उसकी सेना में गिज, तुर्क, मंगोल, रूमी, ताजिक, खुरासानी, मेवाती सम्मिलित थे।

दक्षिण की विजयें

वारंगल व तेलंगाना की विजय

दक्कन में वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरुद्रदेव द्वितीय ने अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद की अव्यवस्था के समय में अपनी अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी और दिल्ली सरकार को निश्चित कर देना बंद कर दिया था। गयासुद्दीन ने अपने शासन के दूसरे वर्ष 1321 ई. में अपने ज्येष्ठ पुत्र तथा भावी उत्तराधिकारी फखरुद्दीन जौना खाँ के अधीन वारंगल के विरुद्ध एक सेना भेजी। दिल्ली की सेना ने वारंगल के मिट्टी के दुर्ग पर घेरा डाल दिया, किंतु षड्यंत्रों तथा सेना में महामारी फैल जाने के कारण शाहजादा जौना खाँ को बिना कुछ किये ही दिल्ली लौट आना पड़ा।

दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुनर्स्थापना के लिए 1323 ई. में सुल्तान ने पुनः उसी शहजादे जौना खाँ के अधीन एक दूसरी सेना वारंगल के विरुद्ध भेजी। इस बार जूना खाँ सफल रहा और काकतीय राजा प्रतापरुद्रदेव ने परिवार एवं सरदारों के सहित आत्मसमर्पण कर दिया। शहजादा जौना खाँ ने उसे दिल्ली भेजकर काकतीयों के संपूर्ण राज्य को दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिया तथा वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर कर दिया। यद्यपि दिल्ली के सुल्तान ने काकतीय राज्य को विधिवत् अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया, परंतु शीघ्र ही इसकी प्राचीन शक्ति एवं गौरव का अंत हो गया। जौना खाँ ने मदुरा के पांड्य राज्य को भी विजितकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया।

वारंगल से दिल्ली लौटते समय जौना खाँ ने तिरहुत (उड़ीसा) के राजा हरसिंहदेव पर आक्रमण किया और ढेर सारा धन प्राप्त किया। पराजित राजा अब दिल्ली सल्तनत का जागीरदार बन गया। इस प्रकार गयासुद्दीन के समय में ही पहली बार दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया गया।

मंगोल विजय

1324 ई. जिस समय समय जौना खाँ दक्षिण भारत की विजय में व्यस्त था, मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। गयासुद्दीन ने मंगोलों का सामना करने के लिए एक शक्तिशाली सेना भेजी, जिसने मंगोलों को पराजित कर भारतीय सीमा से बाहर खदेड़ दिया।

बंगाल विद्रोह का दमन

वारंगल की भाँति बंगाल ने भी दिल्ली में व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी थी। 1322 ई. में बंगाल में शम्सुद्दीन फिरोजशाह की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों- गयासुद्दीन बहादुर, शहाबुद्दीन बोगारशाह और नासिरुद्दीन के बीच छिड़े सत्ता-संघर्ष के कारण गयासुद्दीन तुगलक को उस प्रांत के मामले में हस्तक्षेप करने का बहाना मिल गया। गयासुद्दीन बहादुर, जो सोनारगाँव को अपनी राजधानी बनाकर पूर्वी बंगाल में 1310 ई. से स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था, शहाबुद्दीन बोगारशाह, जो बंगाल के राजसिंहासन पर अपने पिता के बाद बैठा और जिसकी राजधानी लखनौती थी तथा नासिरुद्दीन बंगाल में अपनी-अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिए संघर्ष करने लगे थे। गयासुद्दीन बहादुर ने शहाबुद्दीन बोगराशाह को पराजितकर बंगाल के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस पर छोटे भाई नासिरुद्दीन की भी लोलुप दृष्टि लगी थी। अतः नसिरुद्दीन ने सहायता के लिए दिल्ली के सुल्तान से अपील की। सुल्तान गाजी मलिक ने बंगाल के इस सुदूरवर्ती प्रांत को, जिसकी दिल्ली के सुल्तान के प्रति भक्ति सदैव डाँवाँडोल रहती थी, पूर्णरूप से अपने अधिकार में लाने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया और 1324 ई. में जफर खाँ के नेतृत्व में लखनौती पर आक्रमण करने करने के लिए एक सेना भेजी। जफर खाँ ने बंगाल पर अधिकार कर लिया, गयासुद्दीन बहादुर को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया और नसिरुद्दीन को अधीन शासक के रूप में पश्चिमी बंगाल के राजसिंहासन पर बैठा दिया। पूर्वी बंगाल को भी दिल्ली सल्तनत का एक प्रांत बना दिया गया।

गयासुद्दीन जब बंगाल में था, तभी सूचना मिली कि जौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) निजामुद्दीन औलिया का शिष्य बन गया है और वह उसे राजा होने की भविष्यवाणी कर रहा है। निजामुद्दीन औलिया को गयासुद्दीन तुगलक ने धमकी दी तो औलिया ने उत्तर दिया था कि ‘हुनूज दिल्ली दूर अस्त’ अर्थात् ‘दिल्ली अभी बहुत दूर है।’

गयासुद्दीन तुगलक के बंगाल-अभियान से लौटने पर उसके स्वागत के लिए जौना खाँ ने तुगलकाबाद से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अफगानपुर में अहमद अयाज से एक लकड़ी का महल तैयार करवाया था। सुल्तान गयासुद्दीन के महल में प्रवेश करते ही महल गिर गया और उसमें दबकर मार्च, 1325 ई. को सुल्तान की मुत्यृ हो गई। इस घटना के समय शेख रुकनुद्दीन महल में मौजूद था, जिसे उलूग खाँ ने नमाज पढ़ने के बहाने उस स्थान से हटा दिया था। सुल्तान की मृत्यु के लिए जौना खाँ उत्तरदायी था या यह एक दुर्घटना मात्र थी, इस संबंध में इतिहासकारों में विवाद है। गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा तुगलकाबाद में स्थित है।

गयासुद्दीन तुगलक के सुधार (Reformation of Ghiyasuddin Tughlaq)

गयासुद्दीन तुगलक अपने पूर्वगामी शासन के दोषों को दूर कर शासन-पद्धति को पुनः सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया। यद्यपि इस कार्य से उसकी थोड़ी बदनामी भी हुई, किंतु वह उसकी विवेकपूर्ण उदारता एवं अपनी प्रजा-हित में किये गये कार्यों से शीघ्र मिट गई। उसने प्रांतों में कर्मनिष्ठ शासक नियुक्त किये, राज्य के करों में कटौती कर सरकारी लूट तथा उत्पीड़न के विरुद्ध समुचित व्यवस्था की और खेती को, जो इस देश के लोगों का प्रमुख धंधा है, विशेष प्रोत्साहन दिया।

आर्थिक सुधार

मुबारकशाह एवं खुसरव के अपव्ययता के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गई थी। गयासुद्दीन ने अलाउद्दीन खिलजी की कठोर नीति के विरुद्ध अपनी आर्थिक नीति का आधार संयम, सख्ती एवं नरमी के मध्य संतुलन को बनाया जिसे बरनी ने ‘रस्म-ए-मियान’ अथवा ‘मध्यपंथी नीति’ कहा है। उसने सभी विशेषाधिकारों एवं जागीरों की दृढ़ता से़ जाँच करवाई और सुल्तान खुसरव द्वारा दी गई अवैध जागीरों तथा उपहारों को जब्त कर लिया। खुत, मुकद्दम और चौधरी को कुछ रियायतें वापस दे दी गईं, किंतु हुकूक-ए-खुती को वापस नहीं किया गया। खिलजी के समय के भूमि-माप की व्यवस्था ‘मसाहत की पद्धति’ त्याग दी गई और पुरानी व्यवस्था को पुनः बहाल कर दिया गया।

कृषि को प्रोत्साहन

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गयासुद्दीन तुगलक के सिक्के

गयासुद्दीन ने कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों के हितों की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने किसानों को ऋण देने और प्राकृतिक आपदा के समय ऋण माफ करने की व्यवस्था की। सुल्तान ने एक वर्ष में इक्ता के राजस्व में 1/10 से 1/11 भाग से अधिक की वृद्धि न करने का अधिकारियों को आदेश दिया और शारीरिक यातना द्वारा राजकीय ऋण-वसूली को प्रतिबंधित कर दिया। खेतों की सिंचाई के लिए कुँओं एवं नहरों का निर्माण करवाया गया। संभवतः नहर का निर्माण करवानेवाला गयासुद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था। बगीचे लगाये गये और कृषकों को लुटेरों के विरुद्ध शरण देने के लिए दुर्ग बनाये गये।

सेना एवं पुलिस व्यवस्था में सुधार

सेना एवं पुलिस जैसे शासन की दूसरी शाखाओं में भी सुधार किये, जिससे देश में व्यवस्था एवं सुरक्षा का वातावरण बना। सैनिक विभाग को कार्यक्षम एवं सुव्यवस्थित करने के प्रयास किये गये। सेना में अनुशासन बनाये रखने के लिए सुल्तान स्वयं सेना का निरीक्षण करता था। बरनी के अनुसार सुल्तान अपने सैनिकों के साथ पुत्रवत् व्यवहार करता था। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चलाई गई घोड़ा दागने एवं चेहरा प्रथा प्रभावी तरीके से लागू किये गये। पुलिस व्यवस्था का पुनगर्ठन किया गया। बरनी के शब्दों में, ‘पुलिस व्यवस्था के संगठित होने के कारण मार्ग सुरक्षित हो गये और लुटेरे कृषि-कार्य करने लगे।’

न्याय विभाग की स्थापना

न्याय व्यवस्था सुगम और निष्पक्ष बनाने के लिए एक न्याय विभाग स्थापित किया गया, पुराने नियमों व कुरान के आधार पर नये विधान तैयार करवाये गये और उन्हें कठोरता से लागू किया गया। गयासुद्दीन का शासन न्याय एवं उदारता के सिद्धांतों पर आधारित था, और अपने नियमों को कार्यान्वित करने में वह सदैव सार्वजनिक सुख की वृद्धि का ध्यान रखता था।

सार्वजनिक सुधार

सल्तनतकाल में डाक-व्यवस्था को सुदृढ़ करने का श्रेय गयासुद्दीन तुगलक को ही प्राप्त है। बरनी ने उसकी श्रेष्ठ डाक-व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है। पत्र-व्यवहार की सुविधा के लिए देश की डाक-व्यवस्था का पुनः संगठन किया गया। यातयात व्यवस्था में सुधार के लिए अनेक नवीन मार्गों का निर्माण करवाया गया और पुराने मार्गों की साफ-सफाई करवाई गई। सुल्तान दानी स्वभाव का होने के कारण जनकल्याणकारी कार्यों में भी रुचि लेता था। उसने दरिद्रों, निर्धनों और अपाहिजों की सहायता के लिए ‘दानशाला’ की व्यवस्था की और धार्मिक संस्थाओं एवं साहित्यकों की सहायता की। उसके राजकवि अमीर खुसरो को एक हजार टंका प्रतिमाह की पेंशन मिलती थी।

निर्माण-कार्य

स्थापत्य कला के क्षेत्रा में गयासुद्दीन ने विशेष रूप में रुचि ली। उसके शासनकाल में अनेक किलों, पुलों और नहरों का निर्माण हुआ और तुगलकाबाद नामक एक नये दुर्ग की नींव रखी गई।

धार्मिक नीति

यद्यपि गयासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था, किंतु अन्य धर्मों के प्रति भी उसने सहिष्णुता की नीति अपनाई। इस्लाम धर्म में उसकी गहरी आस्था थी और उसके सिद्धांतों का वह सावधानीपूर्वक पालन करता था। वह संगीत का घोर विरोधी था।

मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351 ई.) (Muhammad bin Tughluq 1325-1351 AD)

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मुहम्मद बिन तुगलक

फरवरी-मार्च 1325 ई. में अपने पिता की मृत्यु के तीन दिन के पश्चात् शहजादा जौना खाँ ने अपने को मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली का सुल्तान घोषित किया और मुहम्मद तुगलक शाह की उपाधि धारण की। राजामुंदरी के एक अभिलेख में मुहम्मद तुगलक (जौना या जूना खाँ) को ‘दुनिया का खान’ कहा गया है। 1320 ई. में जब उसका पिता गयासुद्दीन सुल्तान बना था, तो उसने स्वयं को युवराज घोषित कर ‘उलूग खाँ’ की उपाधि धारण की थी। वारंगल के विरुद्ध अभियान में वह अपनी सैनिक कुशलता का परिचय दे चुका था।

पिता गयासुद्दीन की मृत्यु के चालीस दिन बाद वह दिल्ली की ओर बढ़ा तथा सुल्तानों के प्राचीन राजमहल में बिना किसी विरोध के बड़े तड़क-भड़क के बीच राजसिंहासन पर बैठा। अलाउद्दीन की तरह उसने लोगों में सोने-चाँदी सिक्कों का तथा सरदारों में उपाधियों का खूब वितरण किया।

मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के इतिहास का अध्ययन करने के लिए एक समकालीन पदाधिकारी जियाउद्दीन बरनी, जिसने सुल्तान के उत्तराधिकारी फिरोजशाह के समय में अपना ग्रंथ लिखा था, के प्रशंसनीय इतिहास के अतिरिक्त, अनेक अन्य फारसी ग्रंथ हैं, जैसे- शम्से सिराज का तवारीख-ए-फीरोजशाही, ऐनुल्मुल्क मुल्तानी का मुनशाते माहरू, अमीर खुसरो का तुगलकनामा तथा यहिया बिन अहमद सरहिंदी का तवारीख-ए-मतुबारकशाही, जो तुलनात्मक दृष्टि से बाद का ग्रंथ है और जिसमें काफी परिपूरक वृत्तांत हैं। अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता का ग्रंथ भी इस काल के इतिहास के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वह सितंबर, 1333 ई. में भारत आया और दिल्ली के सुल्तान ने उसे दिल्ली का प्रमुख काजी नियुक्त किया। इस पद पर वह जुलाई, 1342 ई. में सुल्तान का राजदूत बनाकर चीन भेजे जाने तक बना रहा। उसका वृत्तांत प्रायः निष्पक्ष है। इसके अलावा मुहम्मद बिन तुगलक के सिक्कों से भी उपयोगी सूचनाएँ मिलती हैं।

मुहम्मद बिन तुगलक का व्यक्तित्व असाधारण है, इसलिए इतिहास में उसका स्थान-निर्धारण करना कठिन कार्य है। अपनी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण उसे स्वप्नशील, पागल एवं रक्त-पिपासु, अधर्मी आदि बहुत कुछ कहा गया है। वह अपूर्व प्रतिभाशाली था अथवा पागल?, आदर्शवादी था या स्वप्नदर्शी? रक्त का प्यासा प्रजापीड़क था अथवा परोपकारी शासक? पाखंडी और धर्म में अविश्वासी था अथवा धर्मात्मा मुसलमान? वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली के सभी सुल्तानों में सर्वाधिक विद्वान्, कुशाग्र-बुद्धि संपन्न, धर्मनिरेपक्ष, कला-प्रेमी एवं अनुभवी सेनापति था। वह तर्कशास्त्र, दर्शन, गणित, ज्योतिष विद्या एवं पदार्थ विज्ञान आदि विद्याओं की विभिन्न शाखाओं में पारंगत था। रचना एवं शैली पर उसका पूर्ण अधिकार था। उसे अरबी एवं फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान था और वह अपने पत्रों में फारसी पद्यों का उद्धरण दिया करता था। औषधिशास्त्र से वह अनभिज्ञ नहीं था। जिस विषय में वह पूर्ण दक्ष था, उसमें उससे कोई विवाद आरंभ करने के पहले विद्वान् दो बार अवश्य सोचते थे। वह अनुभवी सेनापति था, उसने अनेक बार विजयें हासिल की थीं और बहुत कम आक्रमणों में वह पराजित हुआ था।

किंतु सुल्तान में व्यवहारिक निर्णय-शक्ति एवं सामान्य बुद्धि का अभाव था। अपने सैद्धांतिक ज्ञान के आवेश में वह ऊँचे सिद्धांतों एवं काल्पनिक योजनाओं में डूबा रहता था। अलाउद्दीन खिलजी की भाँति अपने शासनकाल के प्रारंभ में उसने न तो खलीफा से अपने पद की स्वीकृति ली और न उलेमा वर्ग का सहयोग लिया, यद्यपि बाद में उसे ऐसा करना पड़ा। उसने न्याय विभाग पर उलेमा वर्ग के एकाधिपत्य को समाप्त किया। सर्वप्रथम मुहम्मद तुगलक ने ही बिना किसी भेदभाव के योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया और नस्ल तथा वर्ग-विभेद को समाप्त करके योग्यता के आधार पर अधिकारियों को नियुक्त करने की नीति अपनाई। यद्यपि उसकी योजनाएँ सिद्धांत रूप से ठोस रहती थीं तथा कभी-कभी उनमें राजनैतिक सूझ-बूझ की चमक भी होती थी, किंतु यह उस शासक का दुर्भाग्य था कि उसकी नवाचारी योजनाएँ अव्यवहारिक सिद्ध हुईं जिसके कारण वह इतिहासकारों की आलोचना का पात्र बन गया।

सिंहासन पर बैठने के बाद तुगलक ने अमीरों एवं सरदारों को विभिन्न उपाधियाँ एवं पद प्रदान किया। उसने तातार खाँ को ‘बहराम खाँ’ की उपाधि, मलिक कबूल को ‘इमाद-उल-मुल्क’ की उपाधि एवं ‘वजीर-ए-मुमालिक’ का पद दिया था, किंतु कालांतर में उसे ‘खानेजहाँ’ की उपाधि के साथ गुजरात का हाकिम बना दिया। उसने मलिक अयाज को ‘ख्वाजाजहाँ’ की उपाधि के साथ ‘शहना-ए-इमारत’ का पद, मौलाना गयासुद्दीन को (सुल्तान का अध्यापक) ‘कुतुलुग खाँ’ की उपाधि के साथ वकील-ए-दर की पदवी तथा अपने चचेरे भाई फिरोजशाह तुगलक को ‘नायब बारबक’ का पद प्रदान किया।

मुहम्मद बिन तुगलक की नवीन योजनाएँ (Muhammad bin Tughluq’s New Plans)

मुहम्मद तुगलक के सिंहासन पर बैठते समय दिल्ली सल्तनत कुल 23 प्रांतों में बँटा हुआ था, जिनमें मुख्य थे- दिल्ली, देवगिरि, लाहौर, मुल्तान, सरमुती, गुजरात, अवध, कन्नौज, लखनौती, बिहार, मालवा, जाजनगर (उड़ीसा), द्वारसमुद्र आदि। कश्मीर एवं बलूचिस्तान दिल्ली सल्तनत में शामिल नहीं थे। मुहम्मद तुगलक ने विभिन्न कारणों से अपनी कुछ नवीन योजनाओं को क्रियान्वित करने का प्रयास किया-

  1. दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि
  2. राजधानी परिवर्तन
  3. सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
  4. खुरासन एवं काराचिल का अभियान

दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि (Tax Increase in Doab Region)

अपने शासनकाल के आरंभ में मुहम्मद बिन तुगलक ने गंगा एवं यमुना के बीच की समृद्ध एवं उर्वर भूमि दोआब में एक अविचारपूर्ण आर्थिक प्रयोग किया। उसने भूमिकर की दर को बढ़ा दिया और कुछ अतिरिक्त करों (अबवाबों) को पुनर्जीवित कर दिया। समकालीन एवं उत्तरकालीन मुस्लिम लेखकों के वर्णनों में भेद एवं संदिग्धता रहने के कारण इस अतिरिक्त कर-निर्धारण के वास्तविक मूल्य को ठीक-ठीक निश्चित करना संभव नहीं है। कुछ आधुनिक लेखकों का सुझाव है कि यह कर-वृद्धि मूलरूप में अत्यधिक नहीं थी तथा अधिकतम् 50 प्रतिशत से आगे नहीं गई थी, जो अलाउद्दीन के समय में निर्धारित सीमा में ही थी। इतिहासकारों का मानना है कि इस कर-वृद्धि का उद्देश्य दोआब के विद्रोही निवासियों के विरुद्ध दंडप्रद कार्य तथा कोष को पुनः भरने का साधन नहीं था, जैसा कि बदायूँनी तथा आधुनिक काल में सर वुल्जले हेग ने अनुमान किया है। इसका मुख्य उद्देश्य था सैनिक साधनों को बढ़ाना और शासन को एक कार्यक्षम आधार पर संगठित करना। जो कुछ भी हुआ हो, इसमें संदेह नहीं कि इस कार्य से दोआब के लोगों को बहुत कष्ट हुआ, विशेषरूप में इसलिए कि यह उस समय लगाया गया जब देश में दुर्भिक्ष फैला हुआ था और पैदावार बहुत कम हो गई थी। जियाउद्दीन बरनी लिखता है कि ‘रैयत की हड्डी टूट गई, अन्न महँगा हो गया और वर्षा कम हुई, चारों ओर दुर्भिक्ष फैल गया। यह अवस्था कई वर्षों तक चलती रही, जिससे हजारों व्यक्तियों का जीवन कष्टमय हो गया। परिश्रम करनेवाले किसान वर्ग की कठिनाइयों को कम करने का राज्य ने कोई उपाय भी नहीं किया। दुर्भिक्ष के कारण राज्य ने अपनी माँगों को तो कम नहीं किया, इसके विपरीत उसके अधिकारी कठोरता से कर वसूल करते रहे। अधिकारियों द्वारा जबरन कर वसूलने के कारण क्षेत्र के किसानों ने विद्रोह कर दिया।

यद्यपि बाद में सुल्तान द्वारा खेतिहरों को कम ब्याज पर ऋण (सोनथर) देने, कुँआ खुदवाने तथा बिना जोती हुई भूमि पर खेती करवाने में आर्थिक सहायता देने जैसे राहत-कार्य किये गये, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। खेती भयानक रूप से बर्बाद हुई तथा दोआब के दरिद्र किसान अपने खेत छोड़कर अन्य स्थानों पर जा बसे। अंततः क्रुद्ध होकर सुल्तान ने अनिच्छुक रैयतों को अपने कार्य पर वापस लाने के लिए कठोर प्रतिशोध का सहारा लिया, जिसका परिणाम तुगलक वंश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हुआ।

अमीर-ए-कोही की स्थापना (Establishment of Amir-e-Kohi)

सुल्तान ने कृषि के विकास के लिए ‘अमीर-ए-कोही’ नामक एक नवीन विभाग की स्थापना की। राज्य की ओर से आर्थिक सहायता देकर कृषि-योग्य भूमि का विस्तार करना इसका मुख्य उद्देश्य था। इस योजना के लिए 60 वर्गमील का एक भूभाग चुना गया और इसकी देखरेख के लिए अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त किये गये। इस भूखंड में बारी-बारी से विभिन्न फसलें बोई गईं और दो वर्ष में लगभग 70 लाख रुपया खर्च कर दिये गये। किंतु सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता, भूमि के उपजाऊ न होने के कारण यह कृषि-उन्नति संबंधी योजना तीन वर्ष पश्चात् समाप्त कर दी गई। वस्तुतः योजना के लिए अवमुक्त धन का सही ढंग से उपयोग नहीं किया गया और अंततः यह योजना अधिकारियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।

राजधानी-परिवर्तन, 1327 ई. ) (Capital Change, 1327 AD)

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दौलताबाद का किला

1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक का अपनी राजधानी को दिल्ली से देवगिरि, जिसका नाम उसने दौलताबाद रखा था, स्थानांतरित करने का निर्णय एक दूसरा अनुचित कदम सिद्ध हुआ। देवगिरि को ‘कुव्वतुल इस्लाम’ भी कहा गया है। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी ने देवगिरि का नाम कुतुबाबाद रखा था और मुहम्मद बिन तुगलक ने इसका नाम बदलकर ‘दौलताबाद’ कर दिया। सुल्तान की यह योजना लोगों से प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से एक पागलपनपूर्ण प्रयोग नहीं था, जैसा कि कुछ आधुनिक लेखकों का अनुमान है, बल्कि इस राजधानी-परिवर्तन के पीछे कई ठोस कारण थे। नई राजधानी सल्तनत के केंद्र में स्थित थी और सामरिक दृष्टि से इसकी स्थिति अच्छी थी। उस समय राज्य के अंतर्गत उत्तर में दोआब, पंजाब के मैदान, लाहौर और सिंधु से लेकर गुजरात के समुद्रतट तक फैले प्रदेश, पूर्व में बंगाल का संपूर्ण प्रांत, मध्य भाग में मालवा, महोबा, उज्जैन एवं धार के राज्य तथा (दक्षिण में) दक्कन सम्मिलित थे।

बरनी लिखता है कि दौलताबाद साम्राज्य के केंद्र में स्थित था तथा दिल्ली, गुजरात, लखनौती, सातगाँव, सोनारगाँव, तेलेम, माबर, द्वारसमुद्र एवं काम्पिल यहाँ से लगभग समान दूरी पर थे और इन दूरियों में बहुत कम अंतर था। यहाँ से संपूर्ण देश के प्रशासन को समुचित ढंग से चलाया जा सकता था। इसके अलावा नई राजधानी मंगोल आक्रमणों से पूर्णतया सुरक्षित थी जिनका भय सदैव बना रहता था।

दौलताबाद में सुंदर भवनों का निर्माणकर सुल्तान ने नई राजधानी को अधिकारियों एवं जनता के रहने-योग्य बनाने का भरसक प्रयत्न किया। इन सुंदर भवनों के वैभव का वर्णन इब्नबतूता, शाहजहाँ के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी तथा सत्रहवीं सदी के यूरोपीय यात्रियों ने किया है। जो बाहर से यहाँ आकर बसना चाहते थे, उनके लिए सभी सुविधाओं का प्रबंध किया गया। जनता की सुविधा के लिए एक लंबी-चैड़ी सड़क बनवाई गई, इसके दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाये गये, स्थान-स्थान पर सराय बनवाये गये तथा दिल्ली और दौलताबाद के बीच नियमित रूप से डाक का प्रबंध किया गया। बरनी लिखता है कि सुल्तान (दिल्ली से) बाहर जानेवालों के प्रति, उनकी यात्रा में तथा उनके (दौलताबाद) पहुँचने पर, दानशीलता और अनुग्रह दिखाने में उदार था। इन सब में सुल्तान ने विवेक से काम लिया।

किंतु जब दिल्लीवासियों ने भावनावश अपने घर को छोड़ने में आगा-पीछा किया, तब सुल्तान की सुबुद्धि पर उसके कठोर स्वभाव ने विजय पाई तथा उसने दिल्ली के सभी लोगों को अपने सामान लेकर एक साथ दौलताबाद जाने की आज्ञा दे डाली। इब्नबतूता के इस कथन में विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है कि एक अंधे को घसीटकर दिल्ली से दौलताबाद ले जाया गया और एक शैयागत लँगड़े को पत्थर फेंकनेवाले एक यंत्र के द्वारा वहाँ फेंका गया था। बरनी लिखता है कि ‘उसने बिना किसी मंत्रणा के दिल्ली का नाश कर दिया जो 170-80 साल से समृद्ध होती आ रही थी और जो बगदाद और काहिरा से प्रतिद्वंद्विता करती थी। नगर, उसकी सरायें, किनारे के भाग, आसपास के गाँव, सब नष्ट हो गये अथवा उजड़ गये। एक बिल्ली अथवा कुत्ता भी नहीं बचा। लोगों को अपने परिवार सहित नगर छोड़ने के लिए विवश किया गया, उनके हदय टूट गये, अनेक रास्ते में ही मर गये, जो देवगिरि पहुँचे भी, वे निर्वासन को न सह सके और घुट-घुट कर मर गये।’ बरनी के इस अतिशयोक्तिपूर्ण कथन को भी अक्षरशः स्वीकार नहीं किया जा सकता कि नगर (दिल्ली) के भवनों, प्रासादों अथवा इसके बाहरी भागों में एक भी बिल्ली या कुत्ता नहीं बचे। वस्तुतः इस प्रकार नगर का पूर्ण विनाश अथवा परित्याग तो सोचा भी नहीं जा सकता। यह सही है कि सात सौ मील की लंबी यात्रा में दिल्ली के लोगों को अत्यंत कष्ट हुआ होगा। उनमें से बहुत तो यात्राजनित कठिनाइयों के कारण रास्ते में ही मर गये होंगे और कुछ, जो दौलताबाद पहुँच भी गये, अपरिचित भूमि में निर्वासितों की तरह अत्यंत नैराश्य एवं कष्ट में परलोक सिधार गये होंगे। इस प्रकार सुल्तान के इस कथित मूर्खतापूर्ण कार्य के भयानक परिणाम हुए। स्टैनले लेनपूल का कहना उचित ही है कि दौलताबाद गुमराह शक्ति का स्मारक चिन्ह था।

अंततः अपनी गलती का एहसास होने पर सुल्तान कचहरी को पुनः दिल्ली ले आया और जनता को दिल्ली वापस आने की अनुमति देनी पड़ी। किंतु बहुत कम लौटने के लिए जीवित बचे। दिल्ली ने अपनी पुरानी समृद्धि एवं ऐश्वर्य खो दिया, जो बहुत काल तक पुनः प्राप्त नहीं किया जा सका। 1334 ई. में इब्नबतूता को दिल्ली में कहीं-कहीं निर्जन एवं विनाश के चिन्ह दिखाई पड़े थे। किंतु इस राजधानी-परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का प्रचार और विकास हुआ, जिससे बहमनी साम्राज्य के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन (Nominal currency Circulation)

मुद्रा-सुधार के क्षेत्र में मुहम्मद बिन तुगलक ने क्रांतिकारी परिवर्तन किये। सिक्के-संबंधी विविध प्रयोगों के कारण ही एडवर्ड टामस ने उसका वर्णन ‘धनवानों का युवराज’ के रूप में किया है। उसने सोने का एक नया सिक्का चलाया, जिसे इब्नबतूता ‘दीनार’ कहता था तथा जिसका तौल 200 ग्रेन था। पहले के 175 ग्रेन के तौल के सोने और चाँदी के सिक्कों के बदले उसने सोने के ‘अदली’ (एक सिक्के का नाम) को फिर से चलाया, जिसका वजन 140 ग्रेन चाँदी के बराबर था। शायद इस परिवर्तन का कारण दक्कन के आक्रमणों के कारण राजकीय कोष में सोना-चाँदी अधिक हो जाने से उनके मूल्य में होनेवाली कमी थी। उसने साधारण क्रय-विक्रय के लिए ‘दोकनी’ और ‘सुल्तान’ नामक सिक्का चलाया। उसके सिक्के अपनी बनावट और कलात्मक डिजाइनों के लिए प्रसिद्ध थे। टामस उसकी प्रशंसा में लिखते हैं: ‘मुद्रा ढ़ालनेवालों के सरताज के रूप में ही मुहम्मद तुगलक हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। नवीनता तथा विभिन्नता दोनों ही दृष्टि से उसके सिक्के शिक्षाप्रद थे, रूप तथा बनावट की कलात्मक श्रेष्ठता को ध्यान में रखते हुए भी वे अधिक सराहनीय हैं और उनका विशेष महत्त्व इसलिए है कि वे स्वयं सुल्तान के व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करते हैं।’

किंतु सुल्तान के प्रयोगों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण था 1329 ई. और 1330 ई. के बीच ताँबे के सिक्कों के रूप में सांकेतिक मुद्रा (टोकन करेंसी) का प्रचालन, जिसके लिए उसके समक्ष चीन एवं फारस के दृष्टांत थे। तेरहवीं सदी के अंत में चीन के मंगोल सम्राट कुबलई खाँ ने चीन में कागज की सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन किया था और फारस के शासक गाईखत्तू ने 1294 ई. में चमड़े का सिक्का चलाया था। ईरान का प्रयोग तो असफल हो गया था, किंतुु चीन में कुबलाई खाँ का प्रयोग सफल रहा। मुहम्मद बिन तुगलक ने आज्ञा निकालकर घोषणा की कि लेनदेन के सभी कार्यों में बरनी के अनुसार ताँबे के और फरिश्ता के अनुसार पीतल के सांकेतिक सिक्के, सोने-चाँदी के सिक्कों की तरह प्रचलित सिक्कों के रूप में चलाये जाएं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उस समय संपूर्ण विश्व में चाँदी की भारी कमी हो गई थी और इससे निपटने के लिए सुल्तान ने सांकेतिक सिक्कों का प्रचलन किया। वस्तुतः इस योजना के पीछे सुल्तान का मुख्य उद्देश्य अपने रिक्त कोष को पुनः भरना तथा विजय एवं शासन की अपनी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराना था। अतः उस पर लोगों के छलने की युक्ति या अभिप्राय रखने का अपराध नहीं लगाया जा सकता। मेंहदी हुसैन के अनुसार सुल्तान का यह प्रयोग सामूहिक रूप से अच्छा था और राजनीतिज्ञता से पूर्ण था, किंतु सुल्तान ने इसे कार्यरूप देने में गलती कर दी। अंततः मुहम्मद तुगलक का यह प्रयोग भी असफल हो गया और राज्य को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी।

यह योजना मुख्यतः दो कारणों से असफल हुई। एक, यह योजना समय से बहुत आगे थी और जनता इसका वास्तविक महत्त्व नहीं समझ सकी। दूसरे, यह कि सुल्तान ने ताँबे के सिक्के चलाने पर राज्य का एकाधिकार स्थापित नहीं किया तथा जालसाजी के विरुद्ध उचित सावधानी बरतने में वह असफल रहा। जैसा कि टामस लिखता है, राजकीय टकसाल के बनाये हुए एवं साधारण कौशल-संपन्न शिल्पकारों के हाथ से बनाये हुए सिक्कों में अंतर परखने के लिए कोई विशेष प्रबंध नहीं था। चीन में कागज के नोटों के अनुकरण को रोकने के लिए जिस प्रकार सावधानी बरती जाती थी, वैसे ताँबे के सांकेतिक सिक्कों की प्रमाणिकता के लिए कोई विशेष प्रतिबंध नहीं था। परिणाम यह हुआ कि अनेक जाली टकसाल बन गये और बड़ी संख्या में जाली सिक्के चल निकले। बरनी कहता है कि इस आज्ञा की घोषणा से प्रत्येक हिंदू का घर टकसाल बन गया तथा विभिन्न प्रांतों के हिंदुओं ने ताँबे के करोड़ों और लाखों सिक्के ढाले। इन्हीं से वे अपना कर अदा करते थे और इन्हीं से वे घोड़े, अस्त्र-शस्त्र तथा सब तरह की सुंदर वस्तुएँ खरीदते थे। राय, गाँव के मुखिया तथा भूमिपति ताँबे के इन सिक्कों के सहारे धनी एवं बलवान बन गये, किंतु राज्य निर्धन हो गया……उन स्थानों में, जहाँ सुल्तान की आज्ञा का भय था, सोने के टंके का मूल्य बढ़कर सौ (ताँबे के) टंकों के बराबर हो गया। प्रत्येक सोनार अपनी दुकान में ताँबे के सिक्के बनाया करता था। लगान जाली सिक्कों से दिया जाने लगा, कोष ताँबे के इन सिक्कों से भर गया। उनका मूल्य इतना घट गया कि ये कंकड़ों अथवा ठीकरों से अधिक मूल्यवान नहीं रह गये। पुराने सिक्के का मूल्य दुर्लभ होने के कारण चार-पाँच गुना बढ़ गया। फलतः व्यापार एवं व्यवसाय पर बुरा प्रभाव पड़ा और साम्राज्य में अर्थव्यस्था ठप्प हो गई। अंततः सुल्तान को अपनी गलती का एहसास हुआ और लगभग चार वर्ष बाद उसने अपनी आज्ञा रद्द की। सुल्तान ने घोषणा की कि ताँबे के सिक्के राजकोष में जमा कर दिये जाएं और उनके बदले राज्य द्वारा स्वीकृत मूल्य के बराबर के सोने एवं चाँदी के सिक्के ले जाएं। इस प्रकार राज्य के बिना किसी लाभ के सार्वजनिक धन का बलिदान हो गया। ताँबे के इतने अधिक सिक्के दिल्ली लाये गये कि तुगलकाबाद में उनके पहाड़ जैसे ढेर हो गये, जो एक शताब्दी बाद मुबारकशाह द्वितीय के राज्यकाल में देखे जा सकते थे।

खुरासान विजय की योजना (Khorasan Vijay Plans)

अलाउद्दीन की तरह मुहम्मद बिन तुगलक भी विश्व-विजय के स्वप्न देखा करता था। कुछ खुरासानी सरदारों से, जो सुल्तान की अत्याधिक उदारता से प्रलोभित होकर उसके दरबार में आये थे तथा अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे, प्रोत्साहन पाकर सुल्तान ने, अपने शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में खुरासान एवं इराक जीतने की महत्त्वाकांक्षी योजना बनाई तथा इस उद्देश्य से एक विशाल सेना इकट्ठी की। बरनी लिखता है कि दीवाने अर्ज के दफ्तर में तीन लाख सत्तर हजार सैनिक भरती किये गये तथा उन्हें पूरे एक वर्ष तक राज्य की ओर से अग्रिम वेतन दिया गया जो नगद और इक्ता दोनों ही रूपों में था। अस्त्र-शस्त्र की खरीद के लिए भारी मात्रा में धन व्यय किया गया। आशा की गई कि खुरासान की लूट से इस व्यय की भरपाई कर ली जायेगी।

यह सच है कि उस समय खुरासान अपने राजा अबुसईद के अधीन अव्यवस्थित दशा में था, जिसका लाभ कोई भी बाहरी शत्रु उठा सकता था। किंतु दिल्ली के सुल्तान द्वारा इसकी विजय निस्संदेह एक असंभव कार्य था, क्योंकि सुल्तान का अधिकार स्वयं उसके अपने राज्य भर में, विशेषतः दक्कन में, सुरक्षित नहीं था। भौगोलिक तथा यातायात की कठिनाइयाँ अपनी जगह थीं। हिंदुकुश अथवा हिमालय की घाटियों से होकर एक विशाल सेना को ले जाना तथा दूरस्थ क्षेत्रों में इनके लिए खाद्य-सामग्री का प्रबंध करना बहुत कठिन था। फिर दिल्ली के सैनिकों के लिए, जो अब तक दुर्बल एवं विभाजित भारतीय शक्तियों के विरुद्ध विजय प्राप्त किये थे, मध्य एशिया के वीरों के सामने लड़ना आसान नहीं था। और भी, चगताई सरदार तरमाशरीन खाँ तथा मिस्र का सुल्तान, दोनों पतनशील फारसी साम्राज्य की पूर्वी एवं पश्चिमी सीमा पर आँखें गड़ाये बैठे थे, वे दिल्ली के सुल्तान के झूठे मित्र थे तथा उसके आयोजित आक्रमण में उसकी सहायता करने की अपेक्षा अपना उल्लू सीधा करते। इस प्रकार प्रत्येक दृष्टिकोण से दिल्ली के सुल्तान की योजना पूर्णतया नीति-विरुद्ध थी।

किंतु खुरासान के सुल्तान द्वारा अपने विरोधियों का दमनकर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के कारण दोनों देशों के मध्य समझौता हो गया और सुल्तान की यह महत्त्वाकांक्षी योजना भी त्याग दी गई। बरनी लिखता है कि ‘जिन देशों के प्रति लोभ किया गया, वे अधिकृत नहीं हुए तथा उसका धन जो राजनैतिक शक्ति का वास्तविक स्रोत था, खर्च हो गया। इससे सैनिक निराश और बेरोजगार हो गये, जो बाद में सल्तनत के लिए संकट का कारण बने।’

अन्य उपलब्धियाँ (Other Achievements)

नगरकोट की विजय

खुरासान विजय की योजना तो त्याग दी गई, किंतु सुल्तान दूसरे राज्यों की विजय करने के लिए प्रयासरत रहा। उसने पंजाब प्रांत के कांगड़ा जिले में स्थित नगरकोट के दुर्ग को जीतने के लिए 1337 ई. में आक्रमण कर दिया। यह किला महमूद गजनवी के समय से ही तुर्क सुल्तानों के लिए चुनौती बना हुआ था। दुर्ग के हिंदू राजा ने वीरतापूर्वक आक्रमण का सामना किया, किंतु पराजित हुआ और सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने को बाध्य हुआ।

कराचिल अभियान

मुहम्मद बिन तुगलक ने तिब्बत एवं चीन पर विजय प्राप्त करने का असंभव विचार कभी नहीं रखा, किंतु बरनी एवं इब्नबतूता स्पष्ट रूप से उसकी करजल पर्वत, जो हिंद (भारत) एवं चीन के राज्यों के मध्य में है, योजना का उल्लेख करते हैं। स्पष्टतः यह आक्रमण कुमायूँ-गढ़वाल क्षेत्र की कतिपय जातियों के विरुद्ध किया गया, जो सुल्तान की सीमांत नीति का ही एक हिस्सा थी। इब्नबतूता के अनुसार यह क्षेत्र दिल्ली से दस दिन की यात्रा की दूरी पर था।’ 1337-1338 ई. में एक योग्य सेनापति खुसरो मलिक के अधीन 10,000 सैनिकों की एक विशाल सेना दिल्ली से भेजी गई।

सुल्तान ने इस अभियान के लिए पूरा बंदोबस्त किया था कि रसद की पूर्ति कहाँ से होगी और दुर्घटना की दशा में कहाँ शरण लिया जायेगा। योजना की सफलता के लिए जगह-जगह सैनिक-चौकियाँ भी स्थापित की गईं। आरंभ में कुछ सफलता भी मिली और सेना ने जिद्दा पर अधिकार भी कर लिया। किंतु कुछ समय बाद वर्षा आरंभ हो गई और सुल्तान के मना करने के बावजूद सेनापति मलिक खुसरो आगे बढ़ता गया। भौगोलिक कठिनाइयों, भारी वर्षा एवं खाद्य-पदार्थ की कमी के कारण दिल्ली की सेना में बीमारी फैल गई और भगदड़ मच गई। पहाड़ी निवासियों ने पत्थर फेंककर उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी। इस अव्यवस्था के बीच पूरी सेना जंगलों रास्तों में भटक गई। बरनी के अनुसार केवल दस और इब्नबतूता के अनुसार केवल तीन अधिकारी ही इस दुर्भाग्यपूर्ण आक्रमण की कहानी बताने के लिए बचकर वापस आ सके।

यद्यपि आक्रमण का तात्कालिक उद्देश्य पूरा हो गया, क्योंकि पहाडि़यों ने संधि कर ली तथा दिल्ली के सुलतान को कर देने के लिए राजी हो गये, किंतु ‘इस अभियान के परिणामस्वरूप सुल्तान की सैनिक शक्ति को इतना धक्का लगा कि वह इसके बाद कभी शत्रु के विरुद्ध इतनी बड़ी सेना को संगठित नहीं कर सका।’ इस प्रकार सुल्तान की सभी महत्त्वाकांक्षी योजनाएँ एक-एक करके असफल हो गईं और वह ‘असफलताओं का बादशाह’ बन गया।

मंगोल अक्रमण (Mongol Aggression)

मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में भी दिल्ली सल्तनत बाहरी संकट से पूर्णतः मुक्त नहीं थी। इसके पूर्व गयासुद्दीन तुगलक ने पश्चिमी सीमाओं की किलेबंदी कर दी थी जिससे उसके शासनकाल में मंगोल भारत में नहीं आ सके थे। 1328-29 ई. के मध्य जब सुल्तान अपनी राजधानी दौलताबाद लेकर गया था, तो उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उत्तर-पश्चिमी सीमा से ट्रांस-आक्सियाना के चगताई सरदार तरमाशरीन ने एक विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण कर दिया। वह पंजाब के मैदानों को लूटता हुआ दिल्ली के बाहरी अंचल पर पहुँच गया। यहिया बिन अहमद तथा बदायूँनी के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे पराजितकर देश के बाहर खदेड़ दिया, किंतु फरिश्ता लिखता है कि सुल्तान ने सोने और जवाहरात के बहुत-से उपहारों का, जिनका वर्णन वह राज्य के मूल्य के रूप में करता है, रिश्वत देकर उसे अपनी ओर मिला लिया। जो भी हो, यह आक्रमण साधारण धावे से अधिक नहीं था और तरमाशरीन जिस प्रकार अकस्मात् आया था, उसी प्रकार अदृश्य भी हो गया। इसके बाद फिर कभी मुहम्मद तुगलक के समय में भारत पर मंगोलों का आक्रमण नहीं हुआ।

अत्यंत व्यग्र करनेवाली इस परिस्थिति में सुल्तान ने मिस्र के अब्बासी खलीफा से अधिकार-पत्र प्राप्त कर अपनी पतनशील प्रभुता को दृढ़ करने के लिए धार्मिक स्वीकृति की चेष्टा की। यह इच्छित विशिष्ट अधिकार-पत्र को पाकर मुहम्मद बिन तुगलक ने खुतबा एवं सिक्कों पर अपने नाम के बदले खलीफा का नाम चढ़वाया, किंतु उसका लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। उसकी प्रजा की राजभक्ति तथा आस्था पर इतना कठोर आघात हुआ था कि वह खलीफा के विशिष्ट अधिकार-पत्र के बल पर भी पुनः प्राप्त नहीं हो सकती थी। सच तो यह है कि राजसिंहासन पर सुल्तान के अधिकार के विषय में तो किसी ने आपत्ति नहीं की थी, यह तो उसकी नीति और उसके कार्य थे, जो उसकी प्रजा को पसंद नहीं आये।

राज्य के प्रायः सभी भागों में सुल्तान को भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तेलंगाना में प्रलय नायक और उसके बाद उसके भतीजे कृष्ण ने होयसल के राजा वीर वल्लाल तृतीय की सहायता से मुस्लिम शासन के विरुद्ध एक हिंदू राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन किया। कृष्णा नदी के निकट के प्रदेश में भी इसी तरह का आंदोलन शुरू हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि विजयनगर में हिंदू राज्य तथा दक्कन में कुछ अन्य हिंदू राज्यों की स्थापना हुई। सुल्तान द्वारा अमीरान-ए-सदा (सौ अमीरों की एक संस्था) को तंग करने से उसकी विपत्तियाँ और भी बढ़ गईं तथा विद्रोह पर विद्रोह होने लगे। देवगिरि में विदेशी अमीर विद्रोह कर बैठे तथा अगस्त, 1347 ई. के प्रारंभ में अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह द्वारा बहमनी राज्य की नींव पड़ गई। जब सुल्तान एक भाग में किसी उपद्रव को रोकने के लिए आगे बढ़ता, तब किसी भिन्न दिशा में दूसरा उपद्रव आरंभ हो जाता। इसी प्रकार जब वह सिंध में विद्रोहियों का पीछा करने में व्यस्त था कि उसे थट्टा के निकट ज्वर हो आया और 20 मार्च, 1351 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। बदायूँनी लिखता है कि ‘और इस तरह राजा अपनी प्रजा से मुक्त हुआ तथा प्रजा अपने राजा से मुक्त हुई।’

वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक के राज्यकाल का दुःखपूर्ण अंत हुआ और तेईस प्रांतों का उसका विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। इसमें संदेह नहीं कि इस दुःखांत नाटक के लिए सुल्तान स्वयं अधिकांशतः उत्तरदायी था। वह असाधारण बुद्धि एवं परिश्रम से संपन्न था, किंतु एक रचनात्मक राजनीतिज्ञ के आवश्यक गुणों का उसमें अभाव था और उसके अनुचित कार्यों एवं कठोर नीतियों ने, जो जन साधारण की इच्छा के विरुद्ध व्यवहार में लाई जाती थी, उसके साम्राज्य का नाश निश्चित कर दिया था।

मुहम्मद तुगलक के काल के प्रमुख विद्रोह (Major Rebellions of Muhammad Tughlaq’s Period)

दिल्ली सल्तनत की सीमा का सर्वाधिक विस्तार इसी के शासनकाल में हुआ था। तुगलक बुद्धिमान सुल्तान था और उसने अनेक योजनाएँ प्रजा की भलाई के लिए लागू की, किंतु योजनाएँ असफल हो गई। यद्यपि उसकी योजनाएँ गलत नहीं थीं, किंतु उनका कार्यान्व्यन ठीक ढंग से नहीं किया जा सका। दोआब में करवृद्धि से कृषक वर्ग असंतुष्ट तो था ही, बेरोजगार सैनिकों के कारण भी साम्राज्य में अव्यवस्था फैली। इसी प्रकार राजधानी परिवर्तन, खुरासान और कराचिल के विजय की योजनाएँ भी सुल्तान के लिए कठिनाई का कारण बनीं और सांकेतिक मुद्रा के प्रचलन की योजना ने तो सल्तनत का सत्यानाश ही कर दिया। इसके कारण जनता को अपार कष्ट हुआ जिससे प्रजा में व्यापक असंतोष फैला और सुल्तान को अनेक विद्रोहों का सामना करना पड़ा। इस सुल्तान की नीतियों के कारण इसके शासनकाल में ही सबसे अधिक विद्रोह हुए, जिनमें से 27 विद्रोह तो अकेले दक्षिण भारत में ही हुए। इसके शासनकाल में हुए कुछ महत्त्वपूर्ण विद्रोहों का विवरण इस प्रकार हैं-

बहाउद्दीन गुरशास्प का विद्रोह

1327 ई. में गयासुद्दीन तुगलक का भाँजा और मुहम्मद बिन तुगलक का खास फुफेरे भाई बहाउद्दीन गुरशास्प ने, जो दकन में गुलबर्गा के निकट सागर का जागीरदार था, सुल्तान की प्रभुता मानने से इनकार कर दिया और 1327 ई. में उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। याहिया सरहिंदी ने लिखा है कि यह मुहम्मद तुगलक के शासनकाल का पहला विद्रोह था। गुरशास्प बुरी तरह पराजित हुआ और बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया। जीवित अवस्था में उसकी खाल खिंचवाकर भूसा भरवा दिया गया, उसका मृत शरीर नगर में चारों ओर घुमाया गया तथा उसकी फाँसी दूसरों के लिए चेतावनी के रूप में घोषित हुई कि इसी प्रकार सभी राजद्रोही नेस्तनाबूद होंगे।

बहराम आईबा ऊर्फ किश्लू खाँ का विद्रोह

अगले वर्ष 1327-1328 ई. में सिंध तथा मुल्तान के जागीरदार बहराम आईबा ऊर्फ किश्लू खाँ ने भयंकर विद्रोह किया। इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान उससे पहले से ही असंतुष्ट था क्योंकि उसने सुल्तान के आदेश का पालन नहीं किया था। मुहम्मद बिन तुगलक उस समय देवगिरि में था। वह दिल्ली होकर मुलतान की ओर बढ़ा तथा अबूहर के निकट दोनों की सेनाओं की मुठभेड़ हुई। सुल्तान ने बहराम को धोखा देने के लिए शेख इसामुद्दीन को शाही छत्र के नीचे लिटाया। बहराम ने इसामुद्दीन को सुलतान समझकर मार दिया और स्वयं विश्राम करने लगा। बहराम को पकड़ कर उसका सिर काट कर मुलतान नगर के द्वार पर लटका दिया गया। सुल्तान मुलतानवासियों के कत्ले-आम का हुक्म देने की सोच रहा था, किंतु फकीर रुक्नुद्दीन ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इन दोनों विद्रोहों के दमन से सुल्तान की स्थिति जरा भी मजबूत नहीं हुई, बल्कि 1325 ई. से उसके भाग्य का हृास होने लगा, उसकी प्रभुता को हिंदू सरदार और प्रांतों के मुस्लिम शासक (सूबेदार) खुलेआम ललकारने लगे और वे स्वतंत्रता व्यक्त करने का भी साहस करने लगे।

उत्तर भारत में सुल्तान के उलझे रहने का लाभ उठाकर माबर के शासक जलालुद्दीन हसनशाह ने 1335 ई. में अपने को स्वतंत्र घोषित किया तथा अपने नाम से सिक्के ढाले। सुल्तान स्वयं उसके विरुद्ध सेना लेकर चला, किंतु वारंगल पहुँचने पर उसकी सेना में हैजा फैल गया, जिससे विवश होकर उसे दौलताबाद लौटना पड़ा और माबर सुल्तान के हाथ से निकल गया। इसी प्रकार मदुरा में स्वतंत्र मुस्लिम राज्य स्थापित हुआ, जो 1377-1378 ई. तक बना रहा।

बंगाल प्रांत के शासक फकरूद्दीन मुबारकशाह ने, जिसकी दिल्ली सल्तनत के प्रति स्वामिभक्ति सर्वदा संदेहजनक रहती आई थी, 1338 ई. में अपनी राजभक्ति का जुआ उतार फेंका तथा अपने नाम से सिक्के ढाले। दिल्ली का सुल्तान, जो उस समय दूसरी मुसीबतों में पहले से ही उलझा हुआ था, उसे वशीभूत करने के लिए कुछ भी नहीं कर सका और इस प्रकार बंगाल एक स्वतंत्र प्रांत बन गया।

साम्राज्य के अन्य भागों में भी एक के बाद दूसरे बलवे शीघ्रता से होते रहे। 1337-1338 ई. में कड़ा के सूबेदार निजाम भाई ने विद्रोह किया जिसे सुल्तान ने पराजित कर उसकी खाल में भूसा भरवा दिया, 1338-1339 ई. में बीदर के सूबेदार नुसरत खाँ ने भी विद्रोह किया। उसे आत्म-समर्पण करना पड़ा और उसकी जागीर छीन ली गई। 1339-1340 ई. में गुलबर्गा के अलीशाह ने विद्रोह कर दिया तो सुल्तान ने उसे पराजित गजनी निर्वासित कर दिया।

यद्यपि ये सभी विद्रोह 1342 ई. के अंत तक दबा दिये गये, किंतु इन्होंने राज्य के साधनों पर बुरा प्रभाव डाला। इन विद्रोहों ने सुल्तान की शक्ति को समाप्त कर दिया तथा उसके जोश को ठंडा कर दिया।

अवध का विद्रोह

अवध के सूबेदार ऐनुलमुल्क सुल्तान का मित्र था जिसे अवध तथा जाफराबाद का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। जब सुल्तान ने 1340 ई. में उसे दौलताबाद स्थानांतरित कर दिया, तो उसने समझा कि सुल्तान उसकी शक्ति कम करने के लिए ऐसा कर रहा है। उसने दक्षिण जाने से इनकार कर दिया। ऐनुलमुल्क पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया, किंतु उसकी पूर्व की सेवाओं को देखते हुए क्षमा कर पुनः प्रतिष्ठित कर दिया गया।

सिंध तथा मुल्तान में विद्रोह

सिंध में जाटों और राजपूतों ने व्रिदोह किया, किंतु सभी पराजित हुए और उनके नेताओं को मुसलमान बना लिया गया। इसी समय एक विद्रोही शाह अफगान ने राज्यपाल बहजाद का वध कर स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। सुल्तान द्वारा पराजित होकर शाह अफगान पहाड़ों की ओर भाग गया।

विजयनगर की स्थापना

1335 ई. में दक्षिण में मदुरा में एक हिंदू राज्य की स्थापना हो चुकी थी। दक्षिण में 1336 ई. में हरिहर एवं बुक्का नामक दो भाइयों ने स्वतंत्र विजयनगर राज्य की स्थापना की। 1343-44 ई. में कृष्णनायक ने 1346 ई. में होयसल राज्य के पतन से इस राज्य का विस्तार किया।

देवगिरि तथा बहमनी राज्य की नींव

दौलताबाद के सूबेदार कुतलुग खाँ ने राजस्व के धन का गबन कर दिया था, इसलिए सुल्तान ने ऐनुलमुल्क को दौलताबाद भेजना चाहा। ऐनुलमुल्क दक्षिण नहीं जाना चाहता था, इसलिए उसने विद्रोह कर दिया। इसके बाद आलिमउल्मुल्क को दौलताबाद का अस्थायी रूप से राज्यपाल नियुक्त किया गया, किंतु अमीरों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। फरिश्ता के अनुसार कुतलुग खाँ के हटाये जाने और नये शासक की अयोग्यता के कारण लोगों में बहुत असंतोष फैल गया और चारों ओर विद्रोह खड़ा हो गया, जिसके कारण पूरा देश उजाड़ हो गया। सुल्तान को स्वयं दौलताबाद की ओर चला, किंतु गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए उसे वापस लौटना पड़ गया। उसके लौटते ही अमीरों ने देवगिरि पर पुनः अधिकार कर लिया और हसन गंगू नामक सरदार को अपना नेता मान लिया। देवगिरि का यही क्षेत्र बाद में बहमनी साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ।

गुजरात का विद्रोह और सुल्तान की मृत्यु

गुजरात का विद्रोह सुल्तान के लिए अंतिम सिद्ध हुआ। देवगिरि में उसे सूचना मिली कि तार्गी नामक सरदार के नेतृत्व में देशी और विदेशी मुस्लिम अमीरों और हिंदू सरदारों ने विद्रोह कर दिया है। सुल्तान ने गुजरात की ओर बढ़कर तार्गी को गुजरात से खदेड़ दिया। तार्गी ने सिंध के शासक शुभ्र के यहाँ शरण ली थी। मुहम्मद तुगलक तार्गी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर बढ़ा, तो मार्ग में थट्टा के निकट गोडाल पहुँचकर वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और 20 मार्च, 1351 ई.को उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु पर इतिहासकार बदायूँनी ने कहा कि ‘सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई।’

मुहम्मद तुगलक की असफलता के कारण (Because of Muhammad Tughlaq’s Failure)

मुहम्मद तुगलक अपनी दूरदर्शितापूर्ण योजनाओं को सफलततापूर्वक कियान्वित नहीं करवा सका और पूरी तरह असफल रहा। अपने ऊँचे आदर्शों और प्रजा की भलाई के लिए होकर भी वह असफल रहा। उसकी योजनाओं की असफलता के पीछे कई कारण थे, जैसे- उसने अपनी योजना को सही तरीके से कार्यान्वित नहीं किया और प्रजा को कष्ट हुआ जिससे उनमें विद्रोह की भावनाएँ पैदा हुई। वह अन्य सुल्तानों की तरह कट्टर मुसलमान नहीं था और उसने उलेमा वर्ग को राजनीति से दूर रखकर अधिकांश मुस्लिम जनता और पदाधिकारियों को अपना शत्रु बना लिया था। वह मुल्लाओं के अपराधी होने पर उन्हें भी कड़ा दंड देता था। उसने अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम खुदवाना भी बंद कर दिया था।

अनेक इतिहासकार उसकी दानशीलता को उसकी असफलता का कारण मानते हैं। लेनपूल के अनुसार उसने अपने राज्यारोहण के समय पैसा पानी की तरह बहाया जिससे खजाना खाली हो गया। उसके लंगर में रोज 400 लोग भोजन करते थे। इससे राज्य की आर्थिक दशा खराब होनी ही थी। इसके अलावा उसकी कठोर दंडनीति, योग्य परामर्शदाताओं का अभाव और सबसे बढ़कर उसका अपना अस्थिर चरित्र उसके लिए हानिकारक सिद्ध हुए। सुल्तान के अधिकारियों ने भी उसका सही सहयोग नहीं किया और उन्होंने भ्रष्टाचार कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया जिससे समस्त योजनाएँ एक-एक कर असफल हो गईं।

धर्मिक नीति

मुहम्मद तुगलक धार्मिक रूप में सहिष्णु था। उसने जैन विद्वान् एवं संत जिनप्रभुसूरि को दरबार में बुलाकर सम्मानित किया था। मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने हिंदू त्योहारों- होली, दीपावली में भाग लिया। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी शेख शिहाबुद्दीन को दीवान-ए-मुस्तखराज नियुक्त किया तथा शेख मुईजुद्दीन को गुजरात का गर्वनर तथा सैय्यद कलामुद्दीन अमीर किरमानी को सेना में नियुक्त किया था। शेख निजामुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली सुल्तान के विरोधियों में एक थे। इसामी ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को इस्लाम धर्म का विरोधी बताया है।

अनेक इतिहाकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक को ‘शैतान का वास्तविक अवतार’ बताया है और कुछ विद्वान् जैसे स्मिथ और गार्डिनर ब्राउन उसे अर्धविक्षिप्त मानते हैं। लेनपूल के अनुसार उसकी विफलताएँ स्वतः पराजित उच्च भावनाओं का दुःखद परिणाम थीं। किंतुु मध्ययुग के सुल्तानों में वह निःसंदेह ही योग्यतम् व्यक्ति था। यद्यपि वह बहुत दयालु था, किंतु कभी-कभी वह अत्यधिक क्रूर और अत्याचारी हो जाता था। इस आधार पर माना जाता है कि उसके चरित्र में विरोधी गुणों का सम्मिश्रिण था। कुल मिलाकर मध्य युग में राजमुकुट धारण करनेवालों में मुहम्मद तुगलक निःसंदेह योग्य व्यक्ति था। मुस्लिम शासन की स्थापना के पश्चात् दिल्ली के सिंहासन को सुशोभित करनेवाले शासकों में वह सर्वाधिक विद्वान् एवं सुसंस्कृत शासक था। उसने अपने सिक्कों पर ‘अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह’, ‘सुल्तान ईश्वर की छाया’, ‘सुल्तान ईश्वर का समर्थक है’ आदि अंकित करवाया। मुहम्मद बिन तुगलक एक अच्छा कवि और संगीत प्रेमी भी था।

फिरोजशाह तुगलक (1351-1388 ई.) (Ferozeshah Tughlaq 1351-1388 AD)

Firoz Shah-min
फिरोजशाह तुगलक

थट्टा के निकट 20 मार्च, 1351 ई. को मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण नेतृत्वविहीन सेना में गडबड़ी एवं अव्यवस्था फैल गई। ऐसी अवस्था में सरदारों ने हतोत्साहित सेना को नष्ट होने से बचाने के लिए फिरोज से राजसिंहासन पर बैठने का आग्रह किया। पहले तो फिरोज ने राजमुकुट स्वीकार करने में कुछ हिचकिचाहट दिखाई, किंतु स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वह राजी हो गया और 23 मार्च, 1351 ई. को छियालीस वर्ष की अवस्था में थट्टा के निकट उसका राज्याभिेषेक हुआ। वह सेना में व्यवस्था की पुनः प्रतिष्ठा करने में सफल रहा। फिरोजशाह का जन्म 1309 ई. में हुआ था। वह मुहम्मद तुगलक के चाचा सिपहसालार रज्जब का पुत्र था। उसकी माँ ‘बीबी नैला’ दिपालपुर के राजपूत सरदार रणमल की पुत्री थी।

अभी फिरोज सिंध के बाहर भी नहीं आया था कि स्वर्गीय सुल्तान के प्रतिनिधि ख्वाजाजहाँ ने दिल्ली में एक लड़के को मुहम्मद बिन तुगलक का पुत्र एवं उत्तराधिकारी घोषितकर उसे गद्दी पर बैठा दिया। अब फिरोज के लिए स्थिति संकटपूर्ण हो गई। उसने मुल्तान पहुँचकर सरदारों एवं मुस्लिम कानूनविदों से परामर्श किया। सरदारों ने यह स्वीकार ही नहीं किया कि मुहम्मद बिन तुगलक के कोई पुत्र भी है। मुस्लिम कानूनविदों ने ख्वाजा-ए-जहाँ के उम्मीदवार को नाबालिग होने के कारण अयोग्य ठहराया। बालक सुल्तान के पक्ष के अत्यंत कमजोर होने के कारण ख्वाजा-ए-जहाँ शीघ्र फिरोज की शरण में आ गिरा और फिरोज का दूसरा राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ। फिरोज ने उसकी पिछली सेवाओं को ध्यान में रखकर उसे क्षमा कर दिया तथा उसे समाना की जागीर में जाकर अपने अंतिम दिन व्यतीत करने की आज्ञा दे दी। किंतु सुनाम एवं समाना के सेनापति शेर खाँ के एक सहयोगी ने राह में उसका (ख्वाजा-ए-जहाँ का) काम तमाम कर दिया। इसी बीच मृत सुल्तान की बहन खुदावंदजादा ने फिरोज के प्रति सम्मान के बावजूद अपने पुत्र दावर मलिक को सुल्तान बनाने के लिए नये सुल्तान की हत्या की साजिश रचने लगी जिसकी सूचना सुल्तान को मिल गई। फिरोज ने उसकी पेंशन घटाकर उसके पति को निर्वासित कर दिया ताकि वह षड्यंत्र में भाग न ले सके।

फिरोज के समक्ष वस्तुतः बड़ा कठिन कार्य था। दिल्ली सल्तनत को शक्तिहीनता एवं आचार-भ्रष्टता की अवस्था से ऊपर उठाना था, जो उसके पूर्वगामी के सुल्तानों शासनकाल के अंतिम वर्षों से गिर चुकी थी। किसानों और अमीर वर्गों का असंतोष उभर रहा था, सल्तनत पर विघटन का संकट मंडरा रहा था। मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों के कारण उलेमा वर्ग भी असंतुष्ट था। खजाना भी खाली हो गया था। नया सुल्तान भी बहुत सक्षम नहीं था, उसमें उत्तम सेनापति के आवश्यक गुणों का अभाव था। उसने सल्तनत के खोये हुए प्रांतों को पुनः प्राप्त करने का कभी मन से प्रयास नहीं किया तथा उसके सैनिक-कार्य अधिकतर असफल रहे। उसमें त्वरित निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी, अपने आक्रमणों के समय अंतिम क्षणों में जब वह करीब-करीब जीतने को होता था, तब अपने सहधर्मियों के रक्तपात से बचने के लिए वहाँ से लौट पड़ता था।

सैनिक कार्रवाइयाँ (Military Operations)

बंगाल के विरुद्ध अभियान

सुल्तान बनने के बाद फिरोज तुगलक ने दिल्ली सल्तनत से अलग हुए अपने प्रदेशों को जीतने के लिए सैनिक अभियान किया। पूर्व में बंगाल का स्वतंत्र शासक हाजी इलियास, जिसने शम्सुद्दीन इलियास शाह की उपाधि धारण कर ली थी, विभिन्न दिशाओं में अपने राज्य की सीमाएँ बढ़ाने में व्यस्त था तथा दिल्ली राज्य की सीमाओं का भी उल्लंघन कर रहा था। फिरोज नवंबर, 1353 ई. में दिल्ली से सत्तर हजार घुड़सवारों को लेकर उसे सबक सिखाने के लिए चला। उसके आने के विषय में सुनकर इलियास अपनी राजधानी पाडुंआ को छोड़कर इकदला के दुर्ग में चला गया। दिल्ली की सेना ने उस पर आक्रमण कर उसे पराजित कर दिया, किंतु फिरोज ने कठिनाई से प्राप्त हुई इस विजय से लाभ नहीं उठाया। वह बंगाल को अपने साम्राज्य में बिना मिलाये, जिसके लिए उसका सेनापति तातार खाँ आग्रह कर रहा था, 1 सितंबर, 1354 ई. को दिल्ली लौट आया।

सुल्तान के अपमानपूर्ण ढंग से पीछे हटने के दो कारण बताये गये हैं- इतिहासकार शम्से-सिराज अफीफ के अनुसार सुल्तान घिरे हुए दुर्ग की स्त्रियों के रोने और कराहने से द्रवित होकर लौट आया, जबकि कुछ उत्तरकालीन लेखकों के अनुसार सुल्तान वर्षा ऋतु के आरंभ होने के कारण होनेवाली कठिनाइयों के भय से लौटा था। उसके लौटने का कारण जो भी रहा हो, टामस का कहना सही लगता है कि इस आक्रमण का परिणाम केवल दुर्बलता को स्वीकार करना ही हुआ।

1359-60 ई. में फिरोज तुगलक ने बंगाल पर अधिकार करने का पुनः प्रयास किया, इसके लिए उसे बहाना भी मिल गया। पूर्वी बंगाल के फखरुद्दीन मुबारकशाह के दामाद जफर खाँ ने सोनारगाँव से समुद्र मार्ग द्वारा भागकर सुल्तान के दरबार में आकर बंगाल के शासक के अत्याचार की शिकायत की और सैनिक सहायता माँगी। सुल्तान वीर एवं योग्य शासक शम्सुद्दीन इलियास की मृत्यु से भी बंगाल के विरुद्ध अभियान करने को प्रोत्साहित हुआ। 1359 ई. में सभी पिछली संधियों एवं मित्रता के आश्वासनों को तिलांजलि देकर एक विशाल सेना लेकर सुल्तान तत्कालीन शासक शम्सुद्दीन इलियासशाह के पुत्र सिकंदरशाह के विरुद्ध बढ़ा। राह में गोमती के किनारे जफराबाद में वह छः महीनों के लिए ठहरा तथा इसके पाश्र्व में अपने चचेरे भाई फखरुद्दीन जौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में जौनपुर नगर की नींव डाली।

वर्षा ऋतु बीत जाने पर सुल्तान बंगाल की ओर चला। उसने सिकंदरशाह द्वारा भेजे गये मित्रता के संदेशों का कुछ उत्तर नहीं दिया, इसलिए सिंकदरशाह एकदला के मिट्टी के किले में भाग गया। दिल्ली की सेना ने इस दुर्ग पर घेरा डाल दिया। बंगाल की सेना वर्षा ऋतु आने तक वीरतापूर्वक अपने गढ़ की प्रतिरक्षा करती रही। वर्षा ऋतु में आनेवाली बाढ़ घेरा डालनेवालों के विरुद्ध हो गई। शीघ्र ही सिकंदर के पक्ष में एक संधि हो गई। शम्से सिराज अफीफ के अनुसार जफर खाँ को सुनारगाँव का शासक मान लिया गया और उसने कुछ हाथी प्रतिवर्ष दिल्ली भेजने का वादा किया। इसके बदले में फिरोज ने सिकंदर को एक एक रत्नजडि़त ताज, 80,000 टंका, 500 अरबी और तुर्की घोड़े दिये। इस प्रकार दिल्ली के सुल्तान द्वारा बंगाल पर किया गया दूसरा आक्रमण भी पहले की तरह निष्फल ही रहा और सुल्तान ने पुनः अपने कमजोर एवं विचलित स्वभाव का परिचय दिया।

उड़ीसा पर आक्रमण

1360 ई. में सुल्तान जाजनगर (आधुनिक उड़ीसा) के विरुद्ध सेना लेकर बढ़ा। दिल्ली की सेना के आते ही वहाँ का राय भानुदेव तृतीय तेलंगाना की ओर भाग गया, सुल्तान ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त कर दिया और लूटपाट किया। ऐनुलमुल्क के अनुसार ‘सुल्तान के इस अभियान का उद्देश्य मूर्तियों को तोड़ना, इस्लाम के शत्रुओं का खून बहाना और हाथियों का शिकार करना था।’ बाद में राय ने कुछ हाथियों को समर्पित कर सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली और सुल्तान भेंट-उपहार लेकर दिल्ली लौट आया।

कांगड़ा पर आक्रमण

अपने दिल्ली लौटने के शीघ्र बाद 1361 ई. में फिरोज ने नगरकोट दुर्ग पर आक्रमण किया, जिसको मुहम्मद बिन तुगलक ने 1337 ई. में जीता था, किंतु उसके शासनकाल के अंतिम वर्षों में दिल्ली के अधिकार से निकलकर स्वतंत्र हो गया था। सुल्तान छः महीने तक किले पर घेरा डाले रहा। विवश होकर कांगड़ा के राजा को संधि करनी पड़ी। फिरोज नगर के प्रसिद्ध ज्वलामुखी के मंदिर में गया और वहाँ पुस्तकालय में विभिन्न विषयों पर उपलब्ध तीन सौ संस्कृत पुस्तकों का अपने राजकवि खालिद खानी द्वारा ‘दलाइले-फिरोजशाही’ के नाम से फारसी-पद्य में अनुवाद करवाया।

सिंध विजय

1362-63 ई. में में फिरोज ने सिंध-विजय के कार्य को पुनः आरंभ किया, जो लगभग 11 वर्ष पहले मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु होने पर त्याग दिया गया था। सुल्तान 90 हजार घुड़सवारों, बहुत से पैदल सिपाहियों, 480 हाथियों तथा हजार नावों को लेकर सिंध के जामो की राजधानी थट्टा की ओर चला। सिंध के शासक जाम बाबनिया ने बीस हजार घुड़सवारों एवं चार लाख पैदल सिपाहियों की सेना के साथ सुल्तान का सामना किया। रास्ता भटक जाने के कारण सुल्तान की सेना लगभग छः महीने तक कच्छ के मैदान (रन) में फँसी रही, तभी संक्रामक पशुरोग फैल जाने के कारण लगभग तीन चौथाई सेना भी समाप्त हो गई। जब योग्य वजीर खानेजहाँ मकबूल ने दिल्ली से एक नई शक्तिशाली सेना सुल्तान की सहायता के लिए भेजी, तब सुल्तान ने सिंधियों पर आक्रमण किया और उन्हें संधि करने के लिए बाध्य किया। जामबाबनियों ने सुल्तान की अधीनता को स्वीकार कर लिया और कई लाख टंका वार्षिक कर देना स्वीकार किया। बंगाल के आक्रमणों की तरह, सिंध के आक्रमण में भी सुल्तान में सैनिक योग्यता एवं व्यूह-रचना की कुशलता का अभाव परिलक्षित हुआ।

फिरोज के शासनकाल में मंगोलों के आक्रमण नहीं हुए। यहिया बताता है कि राज्य की सीमाएँ विशाल सेनाओं एवं सुल्तान के शुभचिंतकों के अधीन सुरक्षित कर ली गई थीं, किंतु सुल्तान ने दक्कन के विजयनगर, बहमनी एवं मदुरा को पुनः दिल्ली सल्तनत के अधीन लाने का कोई प्रयास नहीं किया। जब उसके अधिकारियों ने उसे दौलताबाद पर आक्रमण करने की सलाह दी, तो शम्से-सिराज अफीम के अनुसार वह दुःखी हो गया, उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये तथा उनके तर्कों को स्वीकार करते हुए उसने कहा कि मैंने इस्लाम धर्म के लोगों से आगे कभी युद्ध न करने का निश्चय कर लिया है। वस्तुतः सुल्तान फिरोज तुगलक ने साम्राज्य-विस्तार के लिए कोई भी सैनिक अभियान नहीं किया। उसने जो भी अभियान किया भी, वह मात्र साम्राज्य को बचाये रखने के लिए थे।

विद्रोहों का दमन

सुल्तान के शासन के अंतिम दिनों में 1370 ई. में इटावा के हिंदू जमींदारों को विद्रोह दबा दिया गया। जब बुंदेलखंड में स्थित कटेहर के राजा खरकू ने बदायूँ के गवर्नर सैयद मुहम्मद की हत्या करवा दी और विद्रोह कर दिया, तो सुल्तान स्वयं विद्रोह का दमन करने पहुँचा, किंतु खरकू अपनी जान बचाकर कुमायूँ की पहाडि़यों में भाग गया। कहते हैं कि सुल्तान फिरोज ने यहाँ 23,000 हिंदुओं को बलात् मुसलमान बना दिया था।

फिरोज तुगलक की प्रशासनिक नीतियाँ और सुधार (Firoz Tughlaq’s Administrative Policies and Reforms)

फिरोज का शासन कल्याणकारी निरंकुशता पर आधारित था। वह प्रथम सुल्तान था, जिसनें विजयों तथा युद्धों की तुलना में अपनी प्रजा की भौतिक उन्नति को श्रेष्ठ स्थान दिया, शासक के कर्तव्यों को विस्तृत रूप से व्याख्यायित किया। फिरोजशाह तुगलक की सफलताओं का श्रेय उसके प्रधानमंत्री ‘खान-ए-जहाँ मकबूल’ का दिया जाता है।

जागीरदारी प्रथा पुनर्प्रचलन

संभवतः सरदारों एवं अधिकारियों को खुश रखने की इच्छा से फिरोज ने अलाउद्दीन द्वारा समाप्त कर दी गई जागीरदारी प्रणाली (जागीर के रूप में वेतन देने) को पुनर्जीवित किया, जिससे इजारेदारी प्रथा को पुनः बढ़ावा मिला। खम्स (युद्ध में लूट का माल) का 4/5 भाग पुनः सैनिकों को देने के आदेश दिये गये, राजकीय पद वंशानुगत कर दिये गये। यद्यपि प्रकट रूप से इन कामों से नये सुल्तान की स्थिति मजबूत हुई, किंतु इससे अंत में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला और केंद्रीय सत्ता को भारी क्षति पहुँची।

सामंतवादी आधार पर सैन्य-संगठन

राज्य की सेना का संगठन सामंतवादी आधार पर किया गया। संभवतः स्थायी सैनिकों को जागीरों के रूप में जमीन मिलती थी, जो उनके सुख से रहने के लिए पर्याप्त थी। अस्थायी सैनिकों (गैरवझ, गैरवज) को सीधे राजकीय कोष से नगद वेतन दिया जाता था। बहुसंख्यक सैनिकों, जिन्हें इन दोनों में किसी प्रकार से वेतन नहीं मिलता था, को वेतन के बदले विभिन्न प्रदेशों के राजस्व के भाग सौंपे जाते थे, जिनका हस्तांतरण हो सकता था। वेतन देने की इस प्रथा से सल्तनत में बड़ा भ्रष्टाचार फैला और सैनिक अनुशासन की हानि हुई। अफीफ के अनुसार ‘सुल्तान ने एक सैनिक को अपने खजाने से एक टंका दिया था, ताकि वह रिश्वत देकर अर्ज में अपने घोड़े को पास करवा सकें।’ राज्य की सेना में अस्सी या नब्बे हजार अश्वारोही थे, जिसमें सरदारों के सेवक भी अतिरिक्त रूप में भतीं किये जा सकते थे। असैनिक ही नहीं, सैनिक पदों को भी वंशानुगत कर दिया गया। सैनिक सेवा में योग्यता का बिना कोई विचार किये, वंश, परंपरा-संबंधी अधिकार की स्वीकृति निस्संदेह एक अपकारक प्रथा थी। सैनिकों के प्रति सुल्तान की विवेकहीन उदारता से सेना की कार्यक्षमता अवश्य प्रभावित हुई।

उलेमा वर्ग को प्रधानता

फिरोज संभवतः दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था, जिसने इस्लामी नियमों का कड़ाई से पालन किया और प्रशासनिक कार्यों में उलेमा वर्ग को प्रधानता प्रदान की। न्याय व्यवस्था पर पुनः धर्मगुरुओं का प्रभाव स्थापित हो गया और मुक्ती कानूनों की व्याख्या करने लगे। अंग-भेग और यातना दिये जानेवाली सजाएँ कम कर दी गईं। मुसलमान अपराधियों को मृत्यु-दंड देना बंद कर दिया गया। अपनी आत्मकथा ‘फतुहाते-ए-फीरोजशाही’ में लिखा है कि ‘महान् एवं दयालु ईश्वर ने मुझे प्रेरणा दी है कि मैं मुसलमानों को अनुचित रूप से मारे जाने से रोकूँ।’ वी.ए. स्मिथ के अनुसार ‘उसका एक सुधार अंगों का काटना, यातनाओं का अंत करना पूर्णतया प्रशंसनीय है। उसके शासनकाल में तत्संबंधी आज्ञाओं को बहुत सीमा तक पालन किया गया होगा।’

राजस्व व्यवस्था में सुधार

फिरोज का लगभग सैतीस वर्षीय लंबा शासनकाल तुलनात्मक दृष्टि से जनता के लिए सुख का युग था। उसने राजस्व व्यवस्था को अधिक जनोपयोगी बनाने के लिए पहले से चले आ रहे 24 कष्टप्रद एवं अनुचित करों को समाप्त कर दिया और कुरान द्वारा अनुमोदित चार प्रकार के कर- ‘खराज’ (लगान) अथवा खेती की हुई भूमि पर दसवाँ भाग, ‘जकात’ (इस्लाम धर्म के अनुसार अढ़ाई प्रतिशत का दान, जो उन लोगों को देना पड़ता है, जो मालदार हों और उन लोगों को दिया जाता है जो अपाहिज या असहाय और साधनहीन हों), ‘जजिया’ अथवा गैर-मुसलमानों पर लगाया जानेवाला कर तथा ‘खुम्स’ अथवा लूट के माल एवं खानों की आय का पाँचवाँ भाग, वसूल करने की अनुमति दी। अलाउद्दीन और मुहम्मद तुगलक जहाँ खुम्स में 4/5 भाग स्वयं हड़प लेते थे, वहीं फिरोज ने कुरान की आज्ञानुसार 4/5 भाग सैनिकों को दिया और 1/5 भाग स्वयं लिया। फिरोज प्रथम मुस्लिम सुल्तान था जिसने जजिया को खराज से पृथक् कर दिया। उलेमाओं से परामर्श कर उसने एक नया सिंचाई (शर्ब) कर भी लगाया, जो उपज का दस प्रतिशत होता था।

फिरोज सल्तनतकालीन पहला सुल्तान था जिसने प्रांतों का दौराकर राजस्व अभिलेखों का निरीक्षण किया और ख्वाजा हिसामुद्दीन को राज्य की आय का ब्यौरा तैयार करने के लिए नियुक्त किया। छः वर्ष के कठिन परिश्रम के बाद हिसामुद्दीन ने अनुमान लगाया कि राज्य की खालसा भूमि का वार्षिक राजस्व 6 करोड़ 85 लाख टंका और दोआब का राजस्व अस्सी लाख टंका थी। लगान संभवतः उपज का 1/5 से 1/3 भाग होता था। सुल्तान ने भूमि की नाप के आधार पर राजस्व निर्धारित करने की वैज्ञानिक पद्धति को त्याग दिया। राज्य के अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दे दी गई कि वे निश्चित रकम के अतिरिक्त कुछ भी न माँगें। अनुचित रूप से रुपये ऐंठने के लिए उन्हें दंड दिया जाता था। फिरोज का एक अन्य परोपकारी कार्य था- बंजर भूमि को पुनः प्राप्त करना, जिससे प्राप्त आमदनी को धार्मिक एवं शैक्षिक कार्यों पर व्यय किया जाता था।

सिंचाई-व्यवस्था

सुल्तान द्वारा कृषि के विकास के लिए नहरें खुदवाई गईं जिससे सिंचाई की समुचित व्यवस्था हुई। शम्स-ए-सिराज अफीफ ने फिरोज की आज्ञा से खोदी गई दो नहरों का उल्लेख किया है- पहली सतलज से तथा दूसरी यमुना से, किंतु यहिया ने, जिसे सरहिंद का निवासी होने के कारण नहर-प्रणाली का अधिक ज्ञान था, उसके राज्यकाल में निर्मित चार नहरों का उल्लेख किया है- पहली नहर सतलज नदी से घग्घर नदी तक 96 मील लंबी थी, दूसरी मंडवी एवं सिरमौर की पहाडि़यों से निकलकर हाँसी तक तथा वहाँ से अरसनी तक बढ़ाई गई थी, जहाँ पर हिसार फिरोजा के दुर्ग की नींव पड़ी। तीसरी घग्घर से निकलकर सिरसुती (सरस्वती दुर्ग) होती हुई हिरनी खेड़ा गाँव तक गई थी। चौथी नहर यमुना से निकालकर फिरोजाबाद तक ले जाई गई तथा वहाँ से और आगे गई थी। नहरों के अधीक्षण तथा कुशल देखभाल के लिए कुशल अभियंताओं (इंजीनियरों) को नियुक्त किया गया था। यही नहीं, सिंचाई और यातायात की सुविधा के लिए नदियों पर 50 बाँध बनवाये गये और 160 कुँएं भी खुदवाये गये।

फिरोज द्वारा व्यापार एवं कृषि के विकास के लिए किये गये कार्यों के लाभदायक परिणाम हुए। शम्स-ए-सिराज अफीफ लिखता है कि सुल्तान की लोकोपकारी नीतियों के परिणामस्वरूप रैयत समृद्ध एवं संतुष्ट हो गई। उनके घर अन्न, संपत्ति, घोड़ों एवं साज-सामान से परिपूर्ण हो गये। प्रत्येक के पास प्रचुर मात्रा में सोना-चाँदी थे। कोई स्त्री ऐसी नहीं थी जिसके पास आभूषण न हों और कोई ऐसा घर नहीं था जिसमें अच्छी पलंग और बिछावन न हो। धन की भरमार थी और सभी सुख-सुविधा संपन्न थे।’

नगर एवं सार्वजनिक निर्माण कार्य

फिरोज को नये नगरों के निर्माण करने एवं प्राचीन नगरों के पुनः नामकरण करने का व्यसन था। उसने एक सार्वजनिक निर्माण विभाग का गठन किया। उसके समय में यमुना नदी के किनारे जौनपुर, फतेहाबाद, हिसार, बदायूँ के निकट फिरोजपुर तथा राजधानी से दस मील की दूर फिरोजाबाद जैसे नगर स्थापित किये गये। फिरोजाबाद नगर सुल्तान को सर्वाधिक प्रिय था और जौनपुर नगर की नींव फिरोज ने अपने चचेरे भाई फखरुद्दीन जौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में डाली थी। अपने बंगाल के आक्रमणों के समय उसने एकदला का नाम आजादपुर तथा पांडुआ का नाम फिरोजाबाद रखा।

सुल्तान ने लगभग तेरह मकबरों एवं मदरसों, चार मस्जिदों, तीन महलों, दो सौ काफिला सरायों, पाँच जलाशयों, पाँच अस्पतालों, सौ कब्रों, दस स्नानागारों, दस समाधियों और सौ पुलों का निर्माण करवाया था। मलिक गाजी शहना राज्य का प्रमुख कारीगर था, जिसकी सहायता अब्दुल हक करता था। उसका एक अन्य शिष्य अहमद भी था। फिरोज स्वयं कहता है कि ‘उन अनेक दानों में, जो अल्लाह ने अपने मुझ-जैसे मामूली सेवक को प्रदान किया है, सार्वजनिक भवनों के निर्माण करने की इच्छा भी थी। इसलिए मैने अनेक मस्जिदों, कालेजों एवं मठों का निर्माण किया, ताकि विद्वान् एवं वद्ध तथा धर्मात्मा लोग इन भवनों में बैठकर अल्लाह की इबादत कर सकें और दयालु निर्माणकर्ता की अपनी उपासना से सहायता करें।’ उसने इल्तुतमिश के मदरसे और हौज-ए-खास की मरम्मत कराई, साथ ही खिज्राबाद एवं मेरठ से अशोक के दो पत्थर के स्तंभ-लेखों को लाकर दिल्ली में स्थापित करवाया। बागवानी में अपनी अभिरुचि के कारण सुल्तान ने दिल्ली के निकट बारह सौ नये बाग लगाये तथा अलाउद्दीन के तीस पुराने बागों को फिर से लगवाया। वूल्जे हेग के अनुसार फिरोज को निर्माण-कार्य का इतना चाव था कि इस दृष्टि से वह रोमन सम्राट अगस्टस ने बड़ा नहीं, तो उसके समान अवश्य था।

सिक्कों का प्रचलन

फिरोज तुगलक ने मुद्रा-व्यवस्था के अंतर्गत बड़ी संख्या में ताँबा एवं चाँदी के मिश्रण से निर्मित नये सिक्के चलवाये, जिसे संभवतः ‘अद्धा’ (जीतल का आधा) एवं ‘मिस्र’ (जीतल का एक चौथाई) कहा जाता था। उसने ‘शंशगनी’ (6 जीतल का एक विशेष सिक्का) नामक सिक्कों पर अपने नाम के साथ अपने पुत्र अथवा उत्तराधिकारी ‘फतेह खाँ’ का नाम अंकित करवाया। यद्यपि शंशगनी का संबंध अफीफ ने विशेषरूप से फिरोज के साथ जोड़ा है, किंतु इसका उल्लेख मुहम्मद बिन तुगलक के समकालीन इब्नबतूता ने भी किया है। सुल्तान ने अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित करवाया और स्वयं को खलीफा का नायब लिखवाया।

दास विभाग की स्थापना

फीरोज को दासों का बड़ा शौक था, इसलिए उसके राज्यकाल में दासों की संख्या 1,80,000 तक पहुँच गई थी। फिरोज ने दासों की देखभाल के लिए ‘दीवान-ए-बंदगान’ नामक एक अलग विभाग ही खोल दिया था। राज्य के विभिन्न भागों के जागीरदार सुल्तान को दास भेंट किया करते थे, जिसके बदले उनके द्वारा सरकार को दिये जानेवाले कर में उसी हिसाब से कमी कर दी जाती थी। शम्से सिराज अफीफ के अनुसार उसने अपने जागीरदारों एवं अधिकारियों को आदेश दिया था कि जब कभी युद्ध में जाओ, दासों को पकड़कर उनमें से अच्छों को छाँटकर दरबार की सेवा के लिए भेज दो।’ उसने दासों के निर्यात पर पाबंदी लगाई और दासों के दस्तकारी आदि के प्रशिक्षण प्रशिक्षण का प्रबंध किया। यही नहीं, दासों को नियोजित करने के लिए छत्तीस राजकीय कारखाने भी स्थापित किये गये।

कल्याणकारी कार्य

अपने कल्याणकारी कार्यों के अंतर्गत फिरोज ने मुस्लिम गरीबों के कल्याण के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ नामक विभाग स्थापित किया। यह विभाग गरीब मुसलमानों की पुत्री की शादी के लिए धन भी देता था। इसी तरह सुल्तान ने मुस्लिम बेरोजगारों के कल्याण के लिए एक रोजगार ब्यूरो ‘रोजगार-दफ्तर’ की भी स्थापना की। दिल्ली में एक ‘दार-उल-सफा’ नामक राजकीय अस्पताल की स्थापना की गई ताकि गरीबों, असहायों का मुफ्त इलाज किया जा सके।

शिक्षा का प्रसार

शिक्षा-प्रसार के क्षेत्र में सुल्तान की विशेष रुचि थी। उसने अनेक मकतबों, मठों तथा मदरसों की स्थापना करवाई। उसने शिक्षण संस्थाओं को राज्य की ओर से अनुदान दिया और विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान की। वह जियाउद्दीन बरनी एवं शम्स-ए-सिराज अफीफ जैसे विद्वानों का संरक्षक था। बरनी ने उसी के समय में ‘फतवा-ए-जहाँदारी’ एवं ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ की रचना की थी। फिरोज ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘फुतूहात-ए-फिरोजशाही’ के नाम से लिखी। इसके काल में किसी अज्ञात विद्वान् द्वारा ‘सीरत-ए-फिरोजशाही’ की भी रचना की गई। उसने ज्वालामुखी मंदिर के पुस्तकालय से लूटे गये 1300 ग्रंथों में से कुछ का एजुद्दीन खालिद खानी द्वारा ‘दलायले-फिरोजशाही’ नाम से अनुवाद करवाया। ‘दलायले-फिरोजशाही’ आयुर्वेद से संबंधित ग्रंथ था। उसने जल घड़ी का भी आविष्कार किया था।

धर्म और धार्मिक नीति (Religion and Religious Policy)

हिंदू माँ की संतान होने क बावजूद फिरोज कट्टर सुन्नी मुसलमान था। मिस्र के खलीफा के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा थी। मुस्लिम भारत के इतिहास में अपने को खलीफा का प्रतिनिधि माननेवाला फिरोज पहला सुल्तान था। उसने सिक्कों पर अपना नाम खलीफा के नाम के साथ खुदवाया था। अपने शासनकाल के प्रथम छः वर्षों में उसे दो बार शासक के विशिष्ट अधिकार-पत्र तथा सम्मान के परिधान प्राप्त हुए। यद्यपि फिरोज भड़कीले दिखावटीपन के साधारणतया विरुद्ध था, किंतु अपने पूर्वगामियों की तरह वह भी शानदार तथा ऐश्वर्यवान् दरबार रखता था, जो शम्से-सिराज अफीफ के अनुसार, जिसे ईद एवं शबेरात जैसे त्यौहारों के अवसर पर विशेषरूप से सजाया जाता था। इसके निमित्त राजकीय अधिकारियों का एक अलग दल होता था।

फिरोज ने ऐसे धार्मिक नियम बनाये, जो उसके पूर्वगामियों द्वारा अनुसरण की हुई धार्मिक नीति से भिन्न थे। उसने अपनी विभिन्न मतावलंबी प्रजा को उस धर्म का आलिंगन करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उसे स्वयं शांति मिलती थी। उसने धर्म-परिवर्तन के बदले हिंदुओं को जागीरें, उपाधियाँ और सम्मान दिया। उसने हिंदू जनता को ‘जिम्मी’ कहा और ब्राह्मणों पर पहली बार ‘जजिया’ कर लगाया। फीरोज ने स्वयं लिखा है कि ‘मैंने अपनी काफिर प्रजा को मुहम्मद के मजहब को स्वीकार करने के लिए उत्साहित किया तथा मैंने घोषणा की कि प्रत्येक व्यक्ति जो मुसलमान ,जजिया से मुक्त कर दिया जायेगा।’ इतिहासकारों के अनुसार वह धर्मांध एवं असहिष्णु शासक था और इस क्षेत्र में सिंकदर लोदी एवं औरंगजेब का अग्रगामी था।’

फिरोज तुगलक के अंतिम दिन

सुल्तान के अंतिम दिन बहुत दुःखदायी रहे। 23 जुलाई, 1374 ई. को उसके ज्येष्ठ पुत्र फतेह खाँ की मृत्यु हो गई जिससे सुल्तान को भारी आघात पहुँचा। 1387 ई. में उसका दूसरा पुत्र खानेजहाँ भी परलोक सिधार गया। ढ़लती आयु के साथ उसके विवेक ने जवाब दे दिया और उसकी कार्यक्षमता घटने लगी। उसने अपने सबसे बड़े जीवित पुत्र मुहम्मद खाँ को शासन-कार्य में सहयोग के लिए लगाया, किंतु मुहम्मद खाँ एक अयोग्य प्रशासक सिद्ध हुआ। वह राज्य के शासन-प्रबंध की देखभाल करने के बजाय विषय-सुख में लिप्त हो गया। सुल्तान के जीवनकाल में ही एक गृह-युद्ध आरंभ हो गया। मुहम्मद खाँ सिरमौर की पहाडि़यों की ओर भाग गया। तब फिरोज ने अपने पौत्र तथा स्वर्गीय फतेह खाँ के पुत्र तुगलक खाँ को मुहम्मद खाँ की राजकीय उपाधि प्रदान की। 20 सितंबर, 1388 ई. को सुल्तान फिरोजशाह की मृत्यु हो गई।

फिरोजशाह तुगलक का मूल्यांकन (Evaluation of Ferozeshah Tughlaq)

समकालीन भारतीय लेखक एक स्वर से फिरोजशाह के गुणों की प्रशंसा करते हैं। बरनी तथा शम्से सिराज अफीफ के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद के बाद कोई सुल्तान इतना न्यायशील, दयावान्, शिष्ट एवं अल्लाह से डरनेवाला अथवा वैसा निर्माण करनेवाला नहीं हुआ था, जैसा फिरोज। वास्तव में फिरोज का हृदय स्नेह एवं परोपकारिता जैसे अत्युत्तम गुणों से संपन्न था। उसके शासनकाल में शान्ति एवं समृद्धि रही। हेनरी इलियट और एलफिंसटन ने फिरोज तुगलक को ‘सल्तनत युग का अकबर’ कहा है।

किंतु ‘फिरोज उस विशाल हदय तथा विस्तीर्ण मस्तिष्कवाले सम्राट अकबर का शतांश भी नहीं था, जिसने सार्वजनिक हितों के उच्च मंच से सभी संप्रदायों और धर्मों के प्रति शांति, सद्भावना तथा सहिष्णुता का संदेश दिया।’ उसकी विचार-शून्य उदारता एवं रियायतों ने अंत में चलकर दिल्ली सल्तनत के पतन में अपना पूरा योग दिया। उसके जागीर-प्रथा को पुनर्जीवित करने से भी विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई तथा राज्य की पूर्णता को धक्का पहुँचा। ‘विधाता की कुटिल गति इतिहास के इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य से प्रकट हुई कि जिन गुणों ने फिरोज को लोकप्रिय बनाया, वे ही दिल्ली सल्तनत की दुर्बलता के लिए उत्तरदायी सिद्ध हुए।’ अपने सुधारों के द्वारा भी फिरोज अधिकांश हिंदुओं का विश्वास प्राप्त करने असफल रहा।

परवर्ती तुगलक सुल्तान (Subsequent Tughlaq Sultan)

फिरोजशाह की मृत्यु के बाद उसका पौत्र (फतेह खाँ का पुत्र) तुगलक खाँ 1389 ई. में दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया गया। उसने गयासुद्दीन तुगलकशाह द्वितीय की उपाधि धारण की। किंतु अपनी विलासी प्रवृति के कारण वह 19 फरवरी, 1389 को कुछ अधिकारियों एवं सरदारों के षड्यंत्र का शिकार हो गया। तब दिल्ली के सरदारों ने उसके चचेरे भाई जफर खाँ के पुत्र अबूबक्र को दिल्ली सल्तनत का सुल्तान घोषित किया। इसी समय फिरोज के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद ने 24 अप्रैल, 1369 को अपने को ‘समाना’ में सुल्तान घोषित कर दिया।

शहजादा नासिरुद्दीन मुहम्मद ने अगस्त, 1390 ई. में दिल्ली पर आक्रमण कर अबूबक्र को अपदस्थ कर दिया और स्वयं ‘नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह’ की उपाधि के साथ दिल्ली का सुल्तान बन गया। किंतु अधिक शराब पीने के कारण नासिरुद्दीन महमूदशाह की जनवरी, 1394 ई. में मृत्यु हो गई। उसके मरने के बाद उसके पुत्र ‘हुमायूँ’ को ‘अलाउद्दीन सिकंदरशाह’ की उपाधि के साथ दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया जो छः सप्ताह के अल्पकाल में ही परलोक चला गया।

तुगलक वंश का अगला शासक मुहम्मद का कनिष्ठ पुत्र नासिरुद्दीन महमूद तुगलक वंश का अंतिम सुल्तान था। उसका प्रतिद्वंदी फतेह खाँ के पुत्र नसरतशाह तीन-चार वर्ष तक फिरोजाबाद में रहकर दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार करने का प्रयास करता रहा।

वास्तव में फिरोज के सभी उत्तराधिकारी दुर्बल एवं अयोग्य सिद्ध हुए। वे कुछ सिद्धांत-शून्य सरदारों के हाथों की कठपुतली मात्र थे जो अपनी स्वार्थ-साधना में प्रायः गृह-युद्धों को प्रोत्साहित करते रहते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रायः सभी मुस्लिम सूबेदार एवं हिंदू नायक सल्तनत की प्रभुता की अवहेलना करने लगे। हिजड़ा मलिक सरवर ने, जिसने महमूद तुगलक को फुसलाकर मलिक-उस-शर्क (पूर्वाधिपति) की उपाधि ले ली थी, जौनपुर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली।

जब तैमूरलंग ने 1398 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया, तो दोनों सुल्तान नसरतशाह और महमूद तुगलक भाग खड़े हुए। 15 दिन तक दिल्ली में रहने के पश्चात् तैमूर खिज्र खाँ को अपने विजित प्रदेशों का राज्यपाल नियुक्त कर वापस चला गया। तैमूर के आक्रमण ने तुगलक साम्राज्य के विघटन की गति को और तेज कर दिया। तैमूर के वापस जाने के बाद् कुछ सरदारों के सहायता से नसरतशाह ने, जो अब तक दोआब में छिपा था, 1399 ई. में दिल्ली पर अधिकार करने का प्रयास किया, किंतु वह मल्लू इकबाल द्वारा पराजित कर नगर से भगा दिया गया और बाद में उसकी हत्या हो गई।

मल्लू इकबाल की सहायता से सुल्तान महमूद ने, जिसने धार में शरण ले रखी थी, पुनः दिल्ली सिंहासन पर अधिकार कर लिया। कहते हैं कि इस समय दिल्ली सल्तनत का विस्तार सिमट कर पालम तक ही रह गया था। 12 नवंबर, 1405 ई. को मुलतान, दीपालपुर एवं ऊपरी सिंध के शासक खिज्र खाँ से युद्ध करते समय मल्लू इकबाल की मृत्यु हो गई। एक अफगान सरदार दौलत खाँ लोदी की सहायता से लगभग बीस वर्ष तक नाममात्र का शासन करने के बाद दुर्बल सुल्तान महमूद की फरवरी, 1413 ई. में कैथल में मृत्यु हो गई और तुगलक वंश का अंत हो गया।