लौह-प्रयोक्ता संस्कृतियाँ (Iron-user Cultures)

पत्थर से धातु के प्रयोग तक का संक्रमण क्रमिक एवं मंद था। मानव ने ताँबे, सोने, चाँदी और सबसे अंत में लोहे का प्रयोग करना सीखा। पहले लोगों को सोना पसंद था, किंतु बाद में उन्होंने ताँबा एवं काँस्य का प्रयोग करना आरंभ कर दिया जो चमकदार होने के साथ ही मजबूत धातुएँ थीं। उत्तर भारत में पत्थर के बाद ताँबे के कुठार, भाले के अग्रभाग आदि बनाये गये। भारत में काँस्य का प्रयोग ताम्रयुग से आरंभ हुआ, इसलिए इस संक्रमण काल को सामान्य रूप से ‘ताम्र-काँस्य युग’ कहा गया। लोहे का प्रयोग बहुत बाद में हुआ जिसे भारत में ‘लौह युग’ की संज्ञा दी जाती है।

चित्रित धूसर मदभांड, ताम्र तथा काँस्य के प्रयोग के पश्चात् मनुष्य ने लौह धातु का ज्ञान प्राप्त कर इसका प्रयोग अस्त्र-शस्त्र एवं कृषि-उपकरणों के निर्माण में किया जिससे मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। जिस प्रकार व्यवस्थित जीवन-शैली के उदय ने विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूप लिये, उसी प्रकार लोहे के प्रयोग ने विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरीकों से लोगों की जीवन-शैली को प्रभावित किया। उत्खनन के परिणामस्वरुप भारत के उत्तरी, पूर्वी, मध्य तथा दक्षिणी भागों के लगभग सात सौ से भी अधिक पुरास्थलों से लौह-उपकरणों के प्रयोग के साक्ष्य प्रकाश में आये हैं। दक्षिण एशिया के कुछ प्रमुख क्षेत्रों से लोहे के प्रयोग की प्राचीनता को जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया गया जिससे पता चला है कि आर्यों के आने का लोहे के प्रयोग से कोई संबंध नहीं है। जिन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया है, वहाँ पर काफी मात्रा में लौह-अयस्क पाया गया है।

उत्तर भारत के प्रमुख स्थल अतरंजीखेडा (एटा, उ.प्र.), आलमगीरपुर (मेरठ, उ.प्र.), अहिच्छत्रा (बरेली, उ.प्र.), अल्लाहपुर (मेरठ, उ.प्र.), खलोआ (आगरा, उ.प्र.), नोह (भरतपुर, राजस्थान), रोपड (पंजाब), बटेश्वर (आगरा, उ.प्र.), हस्तिनापुर (मेरठ, उ.प्र.), श्रावस्ती (उ.प्र.), कंपिल (बदायूँ, उ.प्र.), जखेड़ा (एटा, उ.प्र.) आदि हैं। इनमें हस्तिनापुर के उत्खनन की सामग्री ही विधिवत् प्रकाशित की गई। इन स्थलों की प्रमुख पात्र-परंपरा चित्रित धूसर मृद्भांड (पी.जी.डब्लू.) है। इसके साथ लोहे के विविध उपकरण, जैसे- भाले, बाणाग्र, कुल्हाड़ी, कुदाल, दरांती, चाकू, फलक, कीलें, पिन, चिमटा, वसूला आदि मिले हैं।

हस्तिनापुर तथा अंतरजीखेड़ा से धातुमल मिलता है, जिससे सूचित होता है कि धातु को गलाकर ढलाई की जाती थी। चित्रित धूसर पात्रा-परंपरा की तिथि रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर ई.पू. आठवीं-नवीं शताब्दी निधारित की गई है। नोह तथा इसके दोआब क्षेत्र से काले और लाल मृद्भांड (बी.आर.डब्लू.) के साथ लोहा प्राप्त हुआ है जिसकी संभावित तिथि ई.पू. 1400 के लगभग है। भगवानपुर, मांडा, दधेरी, आलमगीरपुर, रोपड़ आदि से चित्रित धूसर भांड, जिसका संबंध लोहे से माना जाता है, सैंधव सभ्यता के पतन के तत्काल बाद (लगभग ई.पू. 1700) मिल जाते हैं।

पूर्वी भारत के प्रमुख लौहकालीन स्थल है- पांडुराजार, ढ़िवि, महिशाल, सोनपुर, चिरांद आदि। यहाँ लौह-उपकरण काले और लाल मृद्भांडों के साथ मिले हैं। इनमें बाणाग्र, छेनियाँ, कीलें आदि हैं। माहिषादल से धातुमल तथा भट्ठियाँ मिली हैं, जिनसे सूचित होता है कि धातु को स्थानीय रुप से गलाकर उपकरण तैयार किये जाते थे। रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर यहाँ लोहे का प्रारंभ ई.पू. 750-700 निर्धारित किया गया है। दक्षिणी-पूर्वी उत्तर प्रदेश के विविध स्थलों- झूंसी (इलाहाबाद), राजा नल का टीला (सोनभद्र), मल्हार (चंदोली) आदि से प्राप्त लौह-पुरानिधियों के आधार पर लोहे की प्राचीनता ई.पू. 1500 तक जाती है।

मध्य भारत (मालवा) तथा राजस्थान के कई पुरास्थलों की खुदाई से लौह-उपकरण प्रकाश में आये हैं। मध्य भारत के प्रमुख पुरास्थल एरण तथा नागदा हैं। यहाँ से लौह-निर्मित दुधारी कटारें, कुल्हाड़ी, बाणाग्र, हँसिया, चाकू आदि मिलते हैं। एरण तथा नागदा का प्रारंभिक संस्कृति ताम्र-पाषाणिक है जिससे बाद में लोहा जुड़ गया। प्रारंभ में ऐसा माना जाता था कि एरण तथा नागदा में ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के तत्काल बाद ऐतिहासिक युग प्रारंभ हो गया (लगभग 700-600 ई.पू.) तथा इसी समय लोहे का प्रयोग होने लगा था। किंतु अब यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों के बीच कुछ व्यवधान था। इसी व्यवधान काल में लोहे का प्रयोग प्रारंभ हुआ। रेडियो कार्बन पद्धति से पता चला है कि मालवा एवं एरण क्षेत्र में लगभग ई.पू. 1100 में लोहे का प्रयोग शुरू हो गया था। मालवा में ताम्र-पाषाणिक युग के पश्चात् लौहावस्था आई थी। प्राप्त साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि दोनों अवस्थाओं में एक निरंतर संबंध है। मालवा में ताम्र-पाषाणिक युग का अंत लगभग ई.पू. 1300 में हुआ। इसी के समीपवर्ती राजस्थान के अहाड़ नामक पुरास्थल से लोहा तथा धातुमल प्रथम कालखंड के दूसरे स्तर के पाँच निक्षेपों से मिलता है जिसकी संभावित तिथि ई.पू. 1500 के लगभग निश्चित की गई है।

दक्षिण भारत के आंध्र, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु के विविध पुरास्थलों से बृहत् अथवा महापाषाणिक (मेगालिथिक) संस्कृतियों के साक्ष्य मिलते हैं। ब्रह्मगिरि, मास्की, पुदुकौ, चिंगलपुत, शानूर, हल्लूर, आदि महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। इन स्थलों से प्राप्त महापाषणिक समाधियों से बड़ी संख्या में लौह-उपकरण, जैसे- तलवार, कटार, त्रिशूल, चिपटी, कुल्हाड़ियाँ, फावड़े, छेनी, वसुली, हंसिया, चाकू, भाले आदि लगभग तैंतीस प्रकार के उपकरण काले तथा लाल रंग के मृद्भांडों के साथ मिले हैं। हल्लूर नवपाषाण एवं महापाषाण के बीच एक संक्रांति काल की सूचना देता है। विभिन्न पुरास्थलों से प्राप्त उपकरणों को भिन्न-भिन्न तिथिक्रमों में रखा गया है। ह्वीलर इस संस्कृति की प्राचीनतम् तिथि ई.पू. तीसरी-दूसरी शती निर्धारित करते हैं, किंतु आधुनिक शोधों से जो प्रमाण उपलब्ध हुए हैं, उनके आधार पर दक्षिण में लौह-उपकरणों के प्रयोग की प्राचीनता पीछे तक जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि दक्षिण मे लोहे का प्रयोग सहस्त्राब्दी ई.पू. में प्रारंभ हो गया था। हल्लूर उपकरणों की रेडियो कार्बन तिथि ई.पू. 1000 के लगभग निर्धारित की गई है।

लोहे की प्राचीनता (Antiquity of Iron)

भारत में लोहे की प्राचीनता के विषय में विवाद है। पहले ऐसा माना जाता था कि मध्य एशिया की हित्ती जाति (ई.पू. 1800-1200) का इस पर एकाधिकार था और सर्वप्रथम उसी ने इसका प्रयोग किया। किंतु अब इस संबंध में नवीन साक्ष्यों के मिल जाने के बाद यह मत मान्य नहीं है। नोह (राजस्थान) तथा इसके दोआब क्षेत्र से लोहा काले और लाल मृद्भांडों के साथ मिलता है जिसकी सम्भावित तिथि ई.पू. 1400 है। कुछ स्थलों, जैसे- भगवानपुर, मांडा, दधेरी, आलमगीरपुर, रोपड़ आदि चित्रित धूसर भांड सैंधव सभ्यता के पतन के साथ (लगभग ई.पू. 1700) मिलते हैं जिनका संबंध लोहे से माना गया है। ऋग्वेद में कवच (वर्म) का उल्लेख है जो अवश्य ही लोहे के रहे होंगे। कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि ऋग्वैदिक आर्यों को भी इसका ज्ञान था। हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त उत्तम कोटि के ताँबे और काँसे के उपकरण तथा गंगाघाटी से प्राप्त ताम्र-निधियों एवं गैरिक भांडों से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन भारतीयों का तकनीकी ज्ञान अत्यंत विकसित था। गंगाघाटी के ताम्र-धातुकर्मी ही लोहे के आविष्कर्ता रहें होगे क्योंकि कच्चे लोहे के दो बड़ी निधियाँ मांडी (हिमाचल) तथा नरनौल (पंजाब) उत्तर भारत से ही मिलती हैं।

भारत के विभिन्न स्थलों की खुदाई से लौह-प्रयोक्ता संस्कृतियों के साक्ष्य मिलते हैं। ये अत्यंत समृद्ध एवं विकसित ग्राम्य-संस्कृतियाँ हैं जिनकी पृष्ठभूमि पर ऐतिहासिक काल में द्वितीय नगरीकरण संभव हुआ। इन संस्कृतियों के लोग विशिष्ट प्रकार के मृद्भांड का प्रयोग करते थे। वे प्रधानतः धूसर या स्लेटी (हतमल) रंग के हैं और इनके ऊपर काले रंग में चित्रकारियाँ की गई हैं। इन्हें चित्रित धूसर मृद्भांड (पी.जी.डब्लू.) कहा जाता है। प्रारंभिक पात्रों के साथ लौह-उपकरण नहीं मिलते, किंतु बाद में ये सभी स्थलों में मिलते है। इस कारण चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति लौहयुगीन संस्कृति कही जाती है।

यद्यपि लौहयुगीन संस्कृति के अधिकांश स्थल मध्य प्रदेश अथवा गंगाघाटी क्षेत्र में स्थित हैं जो सतलज से गंगा नदी तक विस्तृत था, किंतु इसका विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी मिलता है। प्रमुख स्थल जिनकी खुदाई की गई है- अहिच्छत्रा, हस्तिनापुर, अंतरजीखेडा, आलमगीरपुर, अल्लाहपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, नोह, कांपिल्य आदि (उत्तरी भारत), नागदा तथा एरण (मध्य भारत) हैं। पूर्वी भारत में जिन स्थलों से ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं उनमें पांडुराजार, ढिबि, महिशाल, सोनपुर, चिरांद आदि महत्त्वपूर्ण हैं। उनके बाद के स्तर से लौह-उपकरण भी पाये गये हैं।

दक्षिण में बृहत्पाषाणिक समाधियों के स्थल से भी लौह-उपकरण मिलते हैं। इस प्रकार ज्ञात होता है कि ई.पू. 1000-600 तक भारत के प्रायः सभी भागों में लोहे के अस्त्र-शस्त्रों और उपकरणों का प्रयोग बहुतायत में किया जाने लगा था। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा की खुदाइयों में लौह-घातुमल तथा भट्ठियाँ पाई गई हैं, जिनसे पता चलता है कि यहाँ के निवासी लोहे को गलाकर विविध आकार-प्रकार के उपकरण बनाने में भी निपुण थे। पहले लोहे से युद्ध-संबंधी अस्त्रा-शस्त्र ही बनाये गये, किंतु बाद में कृषि-संबंधी उपकरणों, जैसे- हँसिया, खुरपी, फाल आदि का भी निर्माण किया जाने लगा। कृषि-कार्य में लौह-उपकरणों के प्रयोग से अधिकाधिक भूमि को खेती-योग्य बनाया गया तथा उत्पादन भी बड़ी मात्रा में होने लगा।

सिंधु घाटी की सभ्यता काँस्यकालीन है। उसके बाद में लौहयुग का प्रारंभ होता है। भारत में लोहे की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों ही प्रमाणों से सहायता मिलती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि विश्व में सर्वप्रथम हित्ती नामक जाति, जो एशिया माइनर (टर्की) में ई.पू. 1800-2000 के लगभग शासन करती थी, ने ही लोहे का प्रयोग किया था। उनका एक शक्तिशाली साम्राज्य था। ई.पू. 1200 के आसपास इस साम्राज्य का विघटन हुआ और इसके बाद ही विश्व के अन्य देशों में इस क्रांतिकारी धातु का प्रचलन हुआ। इस प्रकार ई.पू. 1200 के पहले भारत में लोहे की कल्पना नहीं की जा सकती है, किंतु लोहे पर हित्ती एकाधिकार की बात तर्कसंगत नहीं लगती है।

थाईलैंड में बानैची नामक पुरास्थल की खुदाई से स्तरीकृत संदर्भों में लोहा पाया गया है जिसकी तिथि ई.पू. 1600 से ई.पू. 1200 मानी जा सकती है। इसके अलावा भारत में नोह तथा इसके दोआबवाले क्षेत्र से लोहा कृष्ण लोहित मृद्भांडों के साथ मिलता है जिसकी संभावित तिथि ई.पू. 1400 के आसपास बताई जाती है।

परियार के दसवें स्तर से भी कृष्ण लोहित मृद्भांडों के साथ लोहे की एक भाले की नोंक मिली है। उज्जैन, विदिशा आदि से भी लोहे के प्रमाण पाये गये हैं। भगवानपुरा, आलमगीर और रोपड़ से लोहा चित्रित धूसर मृद्भांडों के साथ मिलता है जो उत्तर हड़प्पाकालीन स्तर है। अथर्ववेद में ‘नील-लोहित’ शब्द मिलता है, जिसका तात्पर्य कृष्ण-लोहित मृद्भांड से है। यदि इसे सत्य मान लिया जाये तो यह मानना पड़ेगा कि भारत में लोहे का प्रादुर्भाव कृष्ण लोहित मृद्भांडों के साथ ही हुआ था, न कि चित्रित धूसर मृद्भांडों के। कुछ इतिहासकार भगवानपुरा के साक्ष्य के आधार पर यह मानने का आग्रह करते हैं कि ऋग्वैदिक काल में भी लोहे की जानकारी थी।

ह्वीलर के अनुसार भारत में सर्वप्रथम लोहे का प्रचलन ईरान के हखामनी शासकों द्वारा किया गया। इसी प्रकार कुछ अन्य विद्वान् लोहे को भारत में लाने का श्रेय यूनानियों को देते हैं, किंतु यूनानी साहित्य से पता चलता है कि भारतवासी सिकंदर के पहले से ही लोहे से परिचित थे और यहाँ के कारीगर लौह-उपकरणों का निर्माण करने में निपुण थे। ऋग्वेद में भी तीरों तथा भालों की नोकों तथा वर्म (कवच) का उल्लेख मिलता है। एक स्थान पर कवच तथा शत्रुओं से सुरक्षित लौह-दुर्ग बनाने के लिए सोम का आह्वान किया गया है।

मालव नामक एक प्रसिद्ध ऋषि ने पांचाल नरेश दिवोदास को दशराज्ञ युद्ध में लोहे की तलवारें देकर सहायता की थी। हड़प्पा सभ्यता से उत्तम-कोटि के ताँबे और काँसे के उपकरणों, गंगाघाटी में मिलनेवाली ताम्र-निधियों एवं गैरिक-मृद्भांडों से लगता है कि गांगाघाटी के ताम्र-धातुकर्मी ही लोहे के आविष्कर्ता रहे हैं। लोहे की दो बड़ी ताम्र-निधियाँ मांडी (हिमाचल प्रदेश) तथा नरनौल (पंजाब) से प्राप्त हुई हैं। अफ्रीका के समान भारत में भी ऐसी आदिम जातियाँ निवास करती थीं जो देशी-तकनीक से लोहा तैयार करती थीं और अपने द्वारा निर्मित बर्तनों का व्यापार करती थीं। इन समुदायों को लोहे का ज्ञान नियमित लौहयुग के वर्षों पूर्व हो चुका था। मध्य तथा दक्षिणी भारत में लोहे की अधिकता को देखते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि यहाँ लौह-तकनीक कोएक स्वतंत्र आरंभिक केंद्र था। इस प्रकार आद्यैतिहासिक काल से ही भारत में लोहे की निरंतरता के प्रमाण मिलते हैं।

उत्तर वैदिककालीन ग्रंथों में लौह-धातु और उसके व्यापक प्रचलन के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। अथर्ववेद में ‘लोहायस्’ तथा ‘श्यामअयस्’ शब्द मिलते हैं। वाजसनेयी संहिता में भी ‘लोह’ तथा ‘श्याम’ शब्द आया है। कुछ विद्वानों ने ‘लोह’ शब्द को ताँबे के अर्थ में तथा ‘श्याम’ शब्द को लोहे के अर्थ में ग्रहण किया है। संभवतः अथर्ववेद में उल्लिखित ‘श्यामअयस्’ का तात्पर्य लौह-धातु से ही है।

अथर्ववेद में लोहे के फाल का उल्लेख मिलता है। यही नहीं, काठक संहिता में चौबीस बैलों द्वारा खींचे जानेवाले भारी हलों का उल्लेख मिलता है। इन हलों में निश्चित रूप से लोहे की फाल ही लगाई जाती रही होगी। इससे स्पष्ट है कि ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी में भारतीयों को लोहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी भारत में लोहे की प्राचीनता ई.पू. 1000 तक जाती है। प्रमाणों से पता चलता है कि चित्रित धूसर मृद्भांडों के प्रयोक्ता लोहे के ज्ञान से परिचित थे और वे अनेक प्रकार के लौह-उपकरणों का निर्माण करना जानते थे। लोहे के अगणित उपकरण गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में मिलते हैं। इन स्थलों पर जनसंख्या का दबाव उत्तरी हड़प्पा की तुलना में अधिक था।

अहिछत्रा, अतरंजीखेड़ा, माहुरझारी, हस्तिनापुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थानों की खुदाइयों से लौहयुगीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। इन स्थानों से लौह-उपकरण, जैसे- भाला, तीर, वसुली, खुरपी, चाकू, कटार आदि मिलते हैं।

अतरंजीखेड़ा के लौह-उपकरण 1025 ई.पू. के बताये जाते हैं। यहाँ से खुदाई में धातु-शोधन करनेवाली भट्ठियों के प्रमाण मिले हैं। माहुरझारी में पाई गई एक कुल्हाड़ी तो इस्पात की बनी है जिसमें 6 प्रतिशत कार्बन की मात्रा है।

पूर्वी भारत में सोनपुर, चिरांद आदि स्थानों से लोहे की बर्छियाँ, छेनी, कीलें आदि मिली हैं जिनका समय आठवीं शताब्दी ई.पू. माना जाता है। मध्य भारत के एरण, नागदा, उज्जैन, कायथा आदि स्थानों के उत्खनन में लौह-उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनका काल ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी माना जाता है। दक्षिण भारत के महापाषाणिक समाधियों से लोहे के उपकरण बड़ी मात्रा में पाये गये हैं। इस संस्कृति के लोग काले तथा लाल रंग के बर्तनों का प्रयोग करते थे। विद्वानों ने इस संस्कृति का समय ई.पू. एक हजार से लेकर पहली शताब्दी ई. तक निर्धारित किया है। स्पष्ट है कि दक्षिण भारत के लोग ई.पू. 1000 में लोहे के प्रयोग से परिचित थे।

किसी एक क्षेत्र-विशेष में पहली बार लोहे का प्रयोग नहीं प्रारंभ हुआ होगा, अपितु कुछ शताब्दियों के अंदर ही बहुत सारे समुदायों ने लोहे का प्रयोग करना शुरू कर दिया होगा। अनेक विद्वानों का अनुमान है कि दक्षिण भारत में पाषाण काल के बाद लौहकाल प्रारंभ हो गया था, जबकि उत्तरी भारत में पाषाण काल के बाद ताम्र, काँस्य, फिर इसके कई सौ वर्ष बाद लौहकाल आया।

लोहे के ज्ञान ने मानव-जीवन के विकास में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। डी.डी. कोसम्बी के अनुसार बड़े पैमाने पर जंगलों का काटा जाना तथा कृषि-व्यवस्था का गंगाघाटी में अपनाया जाना लोहे के प्रयोग के बिना संभव नहीं था। बुद्धकाल तक आते-आते पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार में इस धातु का व्यापक रूप से प्रयोग होने लगा। लौह-तकनीक के परिणामस्वरूप कृषि-उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई जिससे अधिशेष उत्पादन संभव हुआ। लौह-तकनीक के कारण ही गंगाघाटी में द्वितीय नगरीय क्रांति संभव हुई तथा बड़े-बड़े नगरों की स्थापित हुए।