पेरिस शांति-सम्मेलन (Paris Peace Conference)

पेरिस शांति-सम्मेलन (Paris Peace Conference)
पेरिस शांति सम्मेलन पेरिस शांति सम्मेलन (1919–1920 ई.) प्रथम विश्व युद्ध के बाद आयोजित एक […]

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पेरिस शांति सम्मेलन

पेरिस शांति सम्मेलन (1919–1920 ई.) प्रथम विश्व युद्ध के बाद आयोजित एक महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जिसमें विजयी मित्र राष्ट्रों ने पराजित केंद्रीय शक्तियों के साथ शांति की शर्तें निर्धारित कीं। सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन 18 जनवरी 1919 ई. को पेरिस में हुआ। इसके प्रमुख निर्णयों पर अमेरिका के वुडरो विल्सन, ब्रिटेन के डेविड लॉयड जॉर्ज, फ्रांस के जॉर्ज क्लेमेंसो और इटली के वित्तोरियो ओरलैंडो का विशेष प्रभाव था, जिन्हें सामान्यतः ‘बिग फोर’ कहा जाता है। सम्मेलन का उद्देश्य युद्धोत्तर यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था का पुनर्गठन और स्थायी शांति की स्थापना करना था। इसके परिणामस्वरूप जर्मनी के साथ वर्साय की संधि (1919 ई.) तथा ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, हंगरी और उस्मानी साम्राज्य के साथ अलग-अलग शांति संधियाँ की गईं। सम्मेलन की प्रमुख उपलब्धियों में राष्ट्र संघ की स्थापना, यूरोप की सीमाओं का पुनर्निर्धारण और पराजित साम्राज्यों के क्षेत्रों का पुनर्वितरण शामिल था। हालांकि, जर्मनी पर लगाए गए कठोर राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिबंधों तथा विजयी शक्तियों के बीच मतभेदों ने युद्धोत्तर व्यवस्था में असंतोष पैदा किया, जिसने आगे चलकर यूरोप की राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाने में योगदान दिया।

जर्मनी के आत्म-समर्पण के बाद 11 नवंबर 1918 ई. को प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति हो गई। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व-स्तर पर शांति-स्थापना के उद्देश्य से पेरिस में शांति-सम्मेलन (1919-20 ई.) आयोजित किया गया। इसमें विजयी एवं पराजित राष्ट्रों के मध्य स्थायी समझौते, राज्यों का सीमा-निर्धारण और स्थायी शांति स्थापित करने के प्रयास किए जाने थे। चूंकि विश्वयुद्ध के दौरान विश्व की संपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति अस्त-व्यस्त हो चुकी थी, इसलिए जहाँ एक ओर पराजित देश ऑस्ट्रिया, हंगरी, तुर्की एवं जर्मनी भावी व्यवस्था को लेकर आतंकित थे, वहीं दूसरी ओर विजयी मित्र राष्ट्र और उनके सहयोगी विजय के उन्माद में फूले नहीं समा रहे थे। किंतु जैसा कि ई.एच. कार ने कहा है कि इस विजय के उन्माद के नीचे चिंता के अस्पष्ट स्वर सुनाई दे रहे थे।

पेरिस शांति-सम्मेलन और वर्साय की संधि
पेरिस शांति-सम्मेलन

सम्मेलन स्थल का चयन

शांति सम्मेलन आयोजित करने के लिए पहले जेनेवा को चुना गया था, किंतु बाद में मित्र राष्ट्रों ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में शांति-सम्मेलन का आयोजन किया। पेरिस को शांति-सम्मेलन का स्थान चुने जाने के कई कारण थे- एक तो, प्रथम विश्वयुद्ध में फ्रांस ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, दूसरे, युद्धविराम-संधि के लिए वार्ताएँ पेरिस में ही संपन्न हुई थीं, सर्वोच्च युद्ध परिषद के कई कार्यालय पेरिस में ही स्थित थे और चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, यूगोस्लाविया आदि देशों की निर्वासित सरकारें भी यहीं थीं। किंतु शांति-सम्मेलन के परिणामों को देखकर लगता है कि पेरिस का चुनाव करके मित्र राष्ट्रों ने भारी भूल की, क्योंकि पूरे सम्मेलन में फ्रांसीसी जनता की बदले की भावना सम्मेलन के प्रतिनिधियों पर भारी पड़ी और उनके निर्णयों पर भी उसका बुरा प्रभाव पड़ा।

सम्मेलन के प्रतिनिधि

पेरिस शांति-सम्मेलन में भाग लेने के लिए 32 राष्ट्रों को निमंत्रण दिया गया था, लेकिन पराजित राष्ट्रों—जर्मनी, तुर्की, बुल्गारिया और ऑस्ट्रिया—तथा रूस को आमंत्रित नहीं किया गया था। सभी विजेता राष्ट्रों के लगभग 70 प्रतिनिधि पेरिस में एकत्रित हुए, जिनमें अमेरिका के राष्ट्रपति के अलावा 11 देशों के प्रधानमंत्री, 12 विदेश मंत्री तथा कई अन्य प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ शामिल थे। यद्यपि इस सम्मेलन में वियना कांग्रेस की तरह सम्राटों की भीड़ नहीं थी, लेकिन यहाँ भी वियना जैसी ही स्थिति बनने वाली थी।

सम्मेलन के ‘चार बड़े’

पेरिस शांति-सम्मेलन में चार राष्ट्रों—अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड और इटली—को ही प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। इन चारों देशों के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन की कार्यवाही और महत्त्वपूर्ण निर्णयों में प्रमुख भूमिका निभाई। प्रारंभ में जापान को भी बड़े राष्ट्रों में शामिल किया गया था, किंतु बाद में सम्मेलन की कार्यवाही की अध्यक्षता क्लेमेंसो को मिलने के बाद जापान पेरिस सम्मेलन की प्रमुख कार्यवाही से अलग हो गया। इस प्रकार सम्मेलन में प्रमुख निर्णय लेने का कार्य मुख्यतः अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड और इटली के प्रतिनिधियों के हाथों में केंद्रित हो गया।

पेरिस शांति-सम्मेलन और वर्साय की संधि (Paris Peace Conference and Treaty of Versailles)
पेरिस शांति-सम्मेलन के ‘चार बड़े’

वुडरो विल्सन

वुडरो विल्सन संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति था, जो अपने चौदह सिद्धांतों के साथ पेरिस शांति-सम्मेलन में उपस्थित हुआ था। सम्मेलन में शामिल सभी लोगों में एकमात्र विल्सन ही ऐसा व्यक्ति था, जो सच्चे हृदय से स्थायी शांति स्थापित करने का इच्छुक था। जिस समय युद्ध समाप्त हुआ, संपूर्ण संसार विल्सन की ओर ऐसे देख रहा था, मानो उससे किसी चीज की याचना कर रहा हो। विल्सन का मुख्य उद्देश्य था कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों को सुलझाने के लिए राष्ट्रसंघ की स्थापना की जाए और इसके लिए उसने एक चौदहसूत्रीय सिद्धांत प्रस्तुत किया। विल्सन यह भी चाहता था कि आत्मनिर्णय के सिद्धांत को मान्यता दी जाए और जनता की इच्छानुसार सीमाओं का निर्धारण किया जाए।

वास्तव में, विल्सन युद्ध-पीड़ित देशों में शांति के अग्रदूत के रूप में कार्य कर रहा था, किंतु इन खूबियों के साथ-साथ उसमें कुछ चारित्रिक दोष भी थे। वह दूसरों की बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता था। यद्यपि उसे यूरोपीय राजनीति का बहुत कम ज्ञान था, फिर भी, विशेषज्ञों की राय लेना उसे पसंद नहीं था। लॉयड जॉर्ज और क्लेमेंसो दोनों विल्सन की कमजोरी को जानते थे, इसलिए उनके सामने विल्सन के आदर्शवादी सिद्धांत टिक नहीं पाए।

विल्सन का चौदहसूत्रीय सिद्धांत

विल्सन ने जिन चौदह सूत्रों के आधार पर विश्व-शांति का स्वप्न देखा था, उनका संक्षिप्त विवरण निम्न है-

  1. गोपनीय तरीके से अंतर्राष्ट्रीय समझौते नहीं किए जाएँगे, सभी संधियाँ प्रत्यक्ष और खुले रूप में की जाएँ।
  2. युद्ध तथा शांति दोनों ही स्थितियों में समुद्री-मार्गों में जहाज चलाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
  3. आंतरिक सुरक्षा के लिए जितने अस्त्र-शस्त्र पर्याप्त हों, उतने ही रखे जाएँ।
  4. उपनिवेशों की जनता की भावनाओं का सम्मान किया जाए और औपनिवेशिक दावे बिना पक्षपात के निर्णीत हों।
  5. रूस से सेनाएँ हटा ली जाएँ और उसकी स्वतंत्रता को मान्यता दी जाए।
  6. बेल्जियम को जर्मन सेना से मुक्ति दिलाई जाए और उसकी स्वतंत्रता मान्य हो।
  7. अल्सास और लोरेन के प्रदेश फ्रांस को लौटा दिए जाएँ तथा फ्रांस के सभी प्रदेशों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए।
  8. इटली की सीमाओं का राष्ट्रीयता के आधार पर निर्धारण किया जाए।
  9. समस्त राज्यों को व्यापार के समान अवसर प्रदान किए जाएँ।
  10. ऑस्ट्रिया तथा हंगरी में स्वायत्त शासन की स्थापना की जाए।
  11. रोमानिया, सर्बिया तथा मॉन्टेनीग्रो से सेना हटा ली जाए और सर्बिया को समुद्र तक का रास्ता दिया जाए।
  12. तुर्की अपने शासन के अंतर्गत रहने वाली सभी जातियों के प्रति समानता की नीति अपनाए और डार्डानेल्स एवं बॉस्फोरस के जलडमरूमध्य का अंतर्राष्ट्रीयकरण किया जाए।
  13. पोलैंड की एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापना की जाए, उसे समुद्र तट तक स्वतंत्र मार्ग दिया जाए और उसकी राजनीतिक, आर्थिक स्वतंत्रता एवं प्रादेशिक अखंडता को मान्यता दी जाए।
  14. विश्व-शांति के लिए छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों का एक संगठन (राष्ट्रसंघ) बनाया जाए, जिससे दोनों प्रकार के राष्ट्रों को स्वतंत्रता की गारंटी समान रूप से दी जा सके।
चौदहसूत्रीय सिद्धांत का मूल्यांकन

विश्व-शांति की कल्पना में विल्सन के चौदहसूत्रीय सिद्धांत का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शांति-सम्मेलन में कई निर्णयों में इन सूत्रों का पालन नहीं किया जा सका, जैसे-निःशस्त्रीकरण केवल पराजित राष्ट्रों का किया गया। उपनिवेशों के बँटवारे में संरक्षण के सिद्धांत का भी आंशिक प्रयोग ही किया गया। कुल मिलाकर विल्सन के चौदह सिद्धांत राजनीतिक भाषण मात्र थे, और कुछ तो अपने आप में परस्पर-विरोधी भी थे। इसके बावजूद पेरिस की संधियों की कठोरता को कम करने में इन सिद्धांतों ने काफी मदद की।

ब्रिटेन का प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज

ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और राजनीतिक चतुराई के लिए प्रसिद्ध था। वह अन्य राजनीतिज्ञों की चारित्रिक दुर्बलताओं और राजनीतिक कमजोरियों को शीघ्रता से पहचान लेता था तथा आवश्यकता पड़ने पर उनका अपने पक्ष में लाभ उठाता था। उसने 1916 ई. में ऐसे समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पद संभाला, जब प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी लगातार सफलताएँ प्राप्त कर रहा था और मित्र राष्ट्रों के सामने गंभीर चुनौतियाँ थीं। लॉयड जॉर्ज ने युद्ध-प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए म्यूनिशन वार तथा युद्ध-परिषद जैसी व्यवस्थाओं को संगठित किया। उसके नेतृत्व में ब्रिटेन ने युद्ध की सैन्य और औद्योगिक क्षमता को मजबूत किया तथा अंततः मित्र राष्ट्रों को जर्मनी के विरुद्ध विजय प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिली। जर्मनी की पराजय के बाद लॉयड जॉर्ज ने अपने योगदान को रेखांकित करते हुए कहा था—“दूसरे लोगों ने साधारण लड़ाइयाँ जीती हैं, मैंने एक युद्ध पर विजय प्राप्त की है।”

फिर भी, जर्मनी के प्रति लॉयड जॉर्ज का दृष्टिकोण फ्रांस के प्रधानमंत्री क्लेमेंसो की तुलना में अधिक उदार था। वह जर्मनी को पूरी तरह नष्ट करने के पक्ष में नहीं था, क्योंकि उसका मानना था कि जर्मनी को अत्यधिक कमजोर करने से यूरोप का आर्थिक और राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसी विचार को स्पष्ट करते हुए उसने कहा था कि “जर्मनीरूपी गाय का दूध और माँस एक साथ नहीं लिया जा सकता।” अर्थात् जर्मनी से ब्रिटेन को आर्थिक लाभ भी प्राप्त करना था और साथ ही उसे पूरी तरह नष्ट भी नहीं करना था; दोनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा करना संभव नहीं था।

युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद लॉयड जॉर्ज के सामने मुख्यतः तीन उद्देश्य थे। पहला, नौसैनिक शक्ति के मामले में वह जर्मनी को अत्यंत कमजोर करना चाहता था, ताकि भविष्य में जर्मन नौसेना ब्रिटेन के लिए चुनौती न बन सके। दूसरा, वह फ्रांस को अत्यधिक शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता था, क्योंकि इससे यूरोप में शक्ति-संतुलन बिगड़ सकता था। वह यूरोप में ऐसा शक्ति-संतुलन बनाए रखना चाहता था जिसमें कोई एक राष्ट्र अत्यधिक प्रभावशाली न हो। तीसरा, वह ब्रिटेन के हितों को सुरक्षित रखते हुए युद्ध के बाद प्राप्त होने वाले लाभों में अधिक-से-अधिक हिस्सा ब्रिटेन को दिलाना चाहता था। इस प्रकार लॉयड जॉर्ज की नीति में ब्रिटेन की सुरक्षा, यूरोपीय शक्ति-संतुलन और ब्रिटिश राष्ट्रीय हितों को विशेष महत्त्व दिया गया। वह अपने इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में काफी हद तक सफल भी रहा।

फ्रांस का प्रधानमंत्री जॉर्ज यूजेन बेंजामिन क्लेमेंसो

फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज यूजेन बेंजामिन क्लेमेंसो अपनी कुशल कूटनीति, राजनीतिक सूझ-बूझ और दीर्घकालीन राजनीतिक अनुभव के कारण पेरिस शांति-सम्मेलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक सिद्ध हुआ। सम्मेलन में उसकी भूमिका इतनी प्रभावशाली थी कि उसे ‘सम्मेलन का शेर’ तथा ‘वयोवृद्ध केसरी’ जैसी उपाधियाँ दी गईं। प्रथम विश्व युद्ध के कठिन दौर में उसने फ्रांस का दृढ़तापूर्वक नेतृत्व किया और युद्ध में फ्रांस की विजय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण फ्रांस की जनता के बीच उसकी लोकप्रियता बहुत अधिक थी और उसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था। वह फ्रांस के हितों की रक्षा के लिए अत्यंत दृढ़ और कठोर नीति अपनाने के लिए तैयार रहता था।

क्लेमेंसो का सबसे प्रमुख उद्देश्य फ्रांस की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। वह चाहता था कि भविष्य में जर्मनी फ्रांस के लिए किसी प्रकार का सैन्य खतरा न बन सके। इसके लिए वह जर्मनी को कमजोर करने तथा उसकी सैन्य शक्ति पर कठोर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में था। वह इस प्रश्न पर किसी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं था। पेरिस शांति-सम्मेलन में उसकी कठोर नीति का मुख्य आधार यही भय था कि यदि जर्मनी को पर्याप्त रूप से कमजोर नहीं किया गया, तो वह भविष्य में फिर से शक्तिशाली होकर फ्रांस पर आक्रमण कर सकता है।

क्लेमेंसो ने लॉयड जॉर्ज और वुडरो विल्सन की नीतियों पर व्यंग्य करते हुए कहा था—“लॉयड जॉर्ज अपने को नेपोलियन समझता है और विल्सन स्वयं को ईसा मसीह।” इसी प्रकार विल्सन के चौदह सूत्रों पर कटाक्ष करते हुए उसने कहा था—“ईश्वर दस आदेश देता है तो विल्सन चौदह।” इन कथनों से क्लेमेंसो की तीक्ष्ण राजनीतिक दृष्टि और सम्मेलन में विल्सन तथा लॉयड जॉर्ज के विचारों से उसके मतभेद स्पष्ट होते हैं।

क्लेमेंसो के मन में जर्मनी के प्रति गहरा क्षोभ और अविश्वास था। इसका एक प्रमुख कारण 1870–71 ई. के फ्रांको-प्रशियन युद्ध में फ्रांस की पराजय और उसके बाद जर्मनी द्वारा फ्रांस के साथ किया गया व्यवहार था। उस युद्ध में फ्रांस को भारी सैन्य और राजनीतिक अपमान सहना पड़ा था। इस ऐतिहासिक अनुभव ने क्लेमेंसो के मन में जर्मनी के प्रति गहरी शत्रुता और बदले की भावना उत्पन्न कर दी थी। इसलिए पेरिस शांति-सम्मेलन में वह जर्मनी के प्रति कठोरतम नीति अपनाने का समर्थक बना रहा।

क्लेमेंसो चाहता था कि जर्मनी को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह भविष्य में फ्रांस पर दोबारा आक्रमण करने का साहस न कर सके। वह जर्मनी की सैन्य शक्ति को सीमित करने, उसकी सीमाओं को पुनर्गठित करने और उस पर कठोर शांति-शर्तें लागू करने के पक्ष में था। इस प्रकार फ्रांस की सुरक्षा और जर्मनी को नियंत्रित रखना उसकी पूरी नीति के केंद्र में था।

अपनी दृढ़ता, अनुभव, कूटनीतिक कौशल और फ्रांस के हितों के प्रति अडिग रवैये के कारण क्लेमेंसो पूरे पेरिस शांति-सम्मेलन में प्रभावशाली बना रहा। उसने फ्रांस की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और सम्मेलन की चर्चाओं तथा निर्णयों पर अपना गहरा प्रभाव डाला। इस प्रकार क्लेमेंसो की कठोर नीतियों के कारण वह सम्मेलन के प्रमुख नेताओं में छाया रहा और ऐसा प्रतीत हुआ कि उसने सम्मेलन की कार्यवाही में अपने पक्ष को काफी हद तक प्रभावी बना लिया था।

इटली का विटोरियो इमैनुएल ऑरलैंडो

विटोरियो इमैनुएल ऑरलैंडो पेरिस शांति-सम्मेलन में इटली का प्रमुख प्रतिनिधि और नेतृत्वकर्ता था। वह एक कुशल वक्ता, विद्वान और अनुभवी कूटनीतिज्ञ था। सम्मेलन में उसका मुख्य उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों द्वारा इटली से किए गए वादों के अनुसार इटली को उसके अपेक्षित क्षेत्रीय लाभ दिलाना था। ऑरलैंडो का मानना था कि इटली ने युद्ध में मित्र राष्ट्रों का साथ देकर भारी क्षति उठाई थी, इसलिए युद्ध के बाद शांति-व्यवस्था में उसके योगदान के अनुरूप उसे क्षेत्रीय लाभ मिलना चाहिए।

सम्मेलन में ऑरलैंडो की प्रमुख माँगों में एड्रियाटिक सागर के तट पर स्थित फ्यूम (Fiume) का इटली में विलय शामिल था। फ्यूम एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था और इटली इसे अपने सामरिक तथा आर्थिक हितों के लिए आवश्यक मानता था। ऑरलैंडो ने इस माँग का आधार 1915 ई. की लंदन की गुप्त संधि (लंदन संधि) को बनाया। इस संधि में मित्र राष्ट्रों ने इटली को युद्ध में अपने पक्ष में शामिल करने के लिए कुछ क्षेत्रीय लाभ देने का आश्वासन दिया था। इसलिए ऑरलैंडो चाहता था कि युद्ध समाप्त होने के बाद इन वादों को पूरा किया जाए।

हालाँकि फ्यूम के प्रश्न पर इटली को अमेरिका और अन्य मित्र राष्ट्रों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के सिद्धांत के आधार पर फ्यूम को इटली को सौंपने के पक्ष में नहीं थे। इससे ऑरलैंडो और अन्य मित्र राष्ट्रों के बीच मतभेद बढ़ गए। अपनी माँग पूरी न होने से ऑरलैंडो अत्यंत असंतुष्ट हुआ और कुछ समय बाद पेरिस शांति-सम्मेलन छोड़कर चला गया।

इस प्रकार ऑरलैंडो की सम्मेलन से दूरी का मुख्य कारण फ्यूम के बंदरगाह पर इटली का दावा और उस दावे को लेकर मित्र राष्ट्रों के साथ उत्पन्न मतभेद था। उसकी भूमिका से यह स्पष्ट होता है कि पेरिस शांति-सम्मेलन में विजेता राष्ट्रों के बीच भी अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर गहरे मतभेद मौजूद थे।

सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन

18 जनवरी 1919 ई. को पेरिस शांति-सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन का उद्घाटन फ्रांस के राष्ट्रपति रेमंड पॉइन्कारे ने किया। इसके बाद सर्वसम्मति से फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो को सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया। इस प्रकार सम्मेलन की औपचारिक कार्यवाही का संचालन क्लेमेंसो के नेतृत्व में शुरू हुआ।

पेरिस शांति-सम्मेलन में भाग लेने वाले चार प्रमुख नेताओं में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज, फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो और इटली के प्रधानमंत्री विटोरियो इमैनुएल ऑरलैंडो प्रमुख थे। इन चारों नेताओं के अपने-अपने राष्ट्रीय हित और युद्ध के बाद की व्यवस्था को लेकर अलग-अलग विचार थे। इनमें विल्सन ऐसे प्रमुख नेता थे, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थायी शांति स्थापित करने के उद्देश्य को विशेष महत्त्व दे रहे थे।

विल्सन अपने प्रसिद्ध ‘चौदह सिद्धांतों’ को लागू कराने के दृढ़ संकल्प के साथ पेरिस पहुँचे थे। उनका उद्देश्य ऐसी शांति-व्यवस्था स्थापित करना था, जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और युद्धों की संभावना को कम कर सके। वे खुले कूटनीतिक संबंधों, राष्ट्रीय आत्मनिर्णय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित नई व्यवस्था के पक्षधर थे। इस प्रकार विल्सन पेरिस शांति-सम्मेलन में केवल अमेरिकी हितों का प्रतिनिधित्व करने के बजाय एक व्यापक और स्थायी अंतरराष्ट्रीय शांति-व्यवस्था स्थापित करने की योजना लेकर आए थे।

परिषदों का गठन

पेरिस शांति-सम्मेलन की कार्यप्रणाली

वियना कांग्रेस की असफलताओं से सीख लेते हुए पेरिस शांति-सम्मेलन की आगे की कार्यवाही को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए दस व्यक्तियों की एक सर्वोच्च समिति गठित की गई। इस समिति में अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली और जापान के दो-दो प्रतिनिधि शामिल थे। इसी कारण इसे ‘दस की परिषद’ कहा गया। इस परिषद का उद्देश्य सम्मेलन में उठने वाले महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना और शांति-व्यवस्था से संबंधित मामलों पर निर्णय लेने में सहायता करना था।

‘दस की परिषद’ की बैठकें सामान्यतः दिन में दो बार आयोजित की जाती थीं। जिन विषयों पर विशेष जानकारी या विशेषज्ञता की आवश्यकता होती थी, उन पर विचार करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों और सलाहकारों को भी बैठकों में शामिल किया जाता था। इससे विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सैनिक और क्षेत्रीय प्रश्नों पर विस्तृत विचार-विमर्श संभव हुआ।

लेकिन कुछ समय बाद ‘दस की परिषद’ आकार में बड़ी प्रतीत होने लगी। इतने अधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति में महत्त्वपूर्ण विषयों पर स्वतंत्र और गोपनीय रूप से विचार करना कठिन हो गया। वार्ताओं को गुप्त रखना भी मुश्किल होने लगा तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल हो गई। इस समस्या को देखते हुए मार्च 1919 में ‘चार बड़ों की परिषद’ का गठन किया गया। इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो, इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज और इटली के प्रधानमंत्री विटोरियो इमैनुएल ऑरलैंडो शामिल थे।

‘चार बड़ों की परिषद’ ने पेरिस शांति-सम्मेलन की कार्यवाही में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन चारों नेताओं ने 145 बंद सत्रों में बैठकें कीं और सम्मेलन से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए। इन बैठकों में प्रमुख राजनीतिक, क्षेत्रीय और शांति-संधियों से संबंधित प्रश्नों पर विचार किया गया। इन चारों नेताओं द्वारा लिए गए निर्णयों को बाद में सम्मेलन की व्यापक सभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाता था और वहाँ उन्हें स्वीकार किया जाता था।

 ‘चार बड़ों’ के बीच भी अनेक प्रश्नों पर मतभेद थे। विशेष रूप से फ्यूम के प्रश्न पर इटली के प्रधानमंत्री ऑरलैंडो की माँग पूरी नहीं हुई। इससे वह अत्यंत नाराज हुआ और अंततः पेरिस शांति-सम्मेलन छोड़कर वापस चला गया। ऑरलैंडो के चले जाने के बाद ‘चार बड़ों’ की परिषद प्रभावी रूप से ‘तीन बड़ों’ की परिषद बन गई। इसमें अमेरिका के वुडरो विल्सन, फ्रांस के क्लेमेंसो और इंग्लैंड के लॉयड जॉर्ज प्रमुख रूप से रह गए।

इसके बाद पेरिस शांति-सम्मेलन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शक्ति इन तीन नेताओं के हाथों में केंद्रित हो गई। सम्मेलन की प्रमुख समस्याओं और शांति-व्यवस्था से संबंधित महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर इन तीनों का ही निर्णायक प्रभाव रहा। तीनों नेताओं के उद्देश्य और राजनीतिक दृष्टिकोण एक-दूसरे से काफी भिन्न थे। विल्सन आदर्शवादी अंतरराष्ट्रीय शांति और अपने चौदह सूत्रों को लागू करने पर जोर दे रहे थे, जबकि क्लेमेंसो फ्रांस की सुरक्षा और जर्मनी को कमजोर करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे थे। दूसरी ओर लॉयड जॉर्ज ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों, यूरोपीय शक्ति-संतुलन और जर्मनी से प्राप्त होने वाले आर्थिक एवं राजनीतिक लाभों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहता था।

इन भिन्न उद्देश्यों के बावजूद सम्मेलन की कार्यवाही में क्लेमेंसो का प्रभाव अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। फ्रांस की सुरक्षा के प्रति उसकी दृढ़ नीति और कूटनीतिक प्रभाव के कारण सम्मेलन के अनेक निर्णयों पर उसका प्रभाव दिखाई दिया। अंततः पराजित राष्ट्रों को सम्मेलन की निर्णय-प्रक्रिया में समान रूप से भाग लेने का अवसर नहीं दिया गया और उन्हें तैयार की गई कठोर एवं अपमानजनक शांति-संधियों को स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस प्रकार पेरिस शांति-सम्मेलन की वास्तविक निर्णय-शक्ति धीरे-धीरे व्यापक सभा से हटकर कुछ प्रमुख नेताओं के हाथों में केंद्रित हो गई।

पेरिस शांति-सम्मेलन की समस्याएँ

गुप्त संधियाँ

पेरिस शांति-सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य केवल युद्ध समाप्त करके शांति स्थापित करना ही नहीं था, बल्कि ऐसी स्थायी और सुदृढ़ शांति-व्यवस्था कायम करना भी था, जो भविष्य में युद्ध की संभावनाओं को कम कर सके। किंतु शांति की स्थापना के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक गुप्त संधियाँ थीं, जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों के बीच की गई थीं। इन संधियों में युद्ध की समाप्ति के बाद पराजित राष्ट्रों के क्षेत्रों और अन्य लाभों को विजेता राष्ट्रों के बीच बाँटने का विचार किया गया था। परिणामस्वरूप पेरिस शांति-सम्मेलन में विभिन्न राष्ट्र अपने-अपने पूर्व निर्धारित हितों और वादों को पूरा कराने पर जोर देने लगे, जिससे एक सर्वमान्य और न्यायपूर्ण शांति-व्यवस्था स्थापित करना कठिन हो गया।

संधि का प्रारूप

जब पेरिस में शांति-स्थापना के लिए सम्मेलन शुरू हुआ तो संधि का प्रारूप तैयार करने को लेकर अनेक बाधाएँ आईं। विश्वयुद्ध के पहले जो युद्ध होते थे, उनमें मुख्यतः दो देशों के बीच विवाद रहता था, इसलिए युद्ध की समाप्ति के बाद संधि-प्रारूप तैयार करने में कोई विशेष समस्या नहीं आती थी, क्योंकि वहाँ संधियाँ द्विपक्षीय होती थीं। किंतु प्रथम विश्वयुद्ध में पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्रों के नेतृत्व में लगभग संपूर्ण विश्व ने भाग लिया था। इसलिए सम्मेलन में भाग लेने वाले कुछ प्रतिनिधियों ने इस बात पर बल दिया कि संधि की शर्तें महाशक्तियों एवं सामान्य राष्ट्रों के लिए समान होनी चाहिए। किंतु विजयी राष्ट्रों के प्रतिनिधि महाशक्तियों के पक्षधर थे, इसलिए संधि का प्रारूप तैयार करना पेरिस शांति-सम्मेलन की एक बड़ी समस्या थी।

संधि प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष

पेरिस शांति-सम्मेलन में भाग लेने वाले कुछ राष्ट्रों के प्रतिनिधि संधि की शर्तों का निर्धारण गुप्त तरीके से करना चाहते थे, किंतु अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन और उनके समर्थक संधियों की गुप्तता के विरोधी थे। विल्सन का कहना था कि विश्व की राजनीतिक परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं और गुप्त-संधि की कूटनीति संपूर्ण विश्व के लिए घातक होगी। विल्सन के ठोस तर्क के बावजूद संधियाँ गुप्त निर्णयों के आधार पर ही की गईं। इस दौरान कुछ देशों ने संधियों में लिए जाने वाले गुप्त निर्णयों को प्रकाशित करना शुरू कर दिया, जिससे संधियों के निर्णयों की गोपनीयता संकट में पड़ने लगी।

विल्सन के चौदहसूत्रीय सिद्धांत

विल्सन का चौदहसूत्रीय सिद्धांत भी पेरिस शांति-सम्मेलन के लिए एक बड़ी बाधा ही सिद्ध हुआ। इन्हीं चौदहसूत्रीय सिद्धांत के आधार पर ही जर्मनी ने युद्ध-विराम संधि को मान्यता दी थी। किंतु क्लेमेंसो के प्रभाव के कारण संधियों का प्रारूप गुप्त निर्णयों के आधार पर तैयार किया गया। इस प्रकार पेरिस शांति-सम्मेलन में विल्सन के आदर्शवाद पर यूरोपीय भौतिकवाद की ही विजय हुई।

राज्य-पुनर्निर्माण की समस्या

विश्वयुद्ध के पूर्व और विश्वयुद्ध के दौरान साम्राज्य-विस्तार के क्रम में कई क्षेत्र ऐसे थे, जो दो साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच विवाद के कारण बन गए थे। फिर कुछ ऐसे भी राष्ट्र थे, जो अपने संपूर्ण क्षेत्र में स्वतंत्रता चाह रहे थे, जैसे- अल्सास एवं लोरेन और पोलैंड। अल्सास और लोरेन पर फ्रांस और जर्मनी, दोनों अपने अधिकारों का दावा कर रहे थे, जबकि पोलैंड रूस, ऑस्ट्रिया और जर्मनी के बीच विभक्त हो गया था। इस प्रकार विभिन्न राष्ट्रों की सीमा निर्धारित करना और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए राज्यों का पुनर्निर्माण करना भी पेरिस शांति-सम्मेलन की बड़ी समस्या थी।

पेरिस की शांति-संधियाँ

पेरिस शांति-सम्मेलन में पराजित शक्तियों को शांति-समझौतों की तैयारी और निर्णय-प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर नहीं दिया गया। विजयी राष्ट्रों ने आपसी विचार-विमर्श के बाद शांति की शर्तें तैयार कीं और पराजित राष्ट्रों को इन शर्तों को स्वीकार करना पड़ा। इस व्यवस्था के कारण शांति-संधियाँ विजेता राष्ट्रों की राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनीं। पराजित राष्ट्रों को अपनी शर्तें रखने या संधियों की शर्तों पर स्वतंत्र रूप से बातचीत करने का सीमित अवसर ही मिला।

पेरिस शांति-सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशन्स) की स्थापना थी। इसके साथ ही प्रथम विश्व युद्ध में पराजित केंद्रीय शक्तियों के साथ अलग-अलग शांति-संधियाँ की गईं। चूँकि ये प्रमुख संधियाँ पेरिस शांति-सम्मेलन के बाद बनी नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा थीं, इसलिए इन्हें सामूहिक रूप से ‘पेरिस की शांति-संधियाँ’ कहा जाता है। इन संधियों का उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूरोप की राजनीतिक और क्षेत्रीय व्यवस्था को पुनर्गठित करना तथा युद्ध से उत्पन्न विवादों का समाधान करना था। पेरिस की पाँच प्रमुख शांति-संधियाँ निम्नलिखित थीं—

  1. वर्साय की संधि-जर्मनी के साथ, 28 जून 1919 ई.
  2. सेंट-जर्मेन की संधि- ऑस्ट्रिया के साथ, 10 सितंबर 1919 ई.
  3. न्यूइली की संधि- बुल्गारिया के साथ, 27 नवंबर 1919 ई.
  4. ट्रियानन की संधि- हंगरी के साथ, 4 जून 1920 ई.
  5. सेव्र की संधि- तुर्की के साथ, 10 अगस्त 1920 ई.

वर्साय की संधि (28 जून 1919 ई.)

मुख्य लेख : वर्साय की संधि

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद पेरिस शांति-सम्मेलन में अनेक संधियों और समझौतों के प्रारूप तैयार किए गए, किंतु उनमें जर्मनी के साथ की गई वर्साय की संधि का विशेष महत्त्व था। जर्मन प्रतिनिधिमंडल 30 अप्रैल 1919 ई. को विदेश मंत्री काउंट फॉन ब्रॉकडॉर्फ-रांटजौ के नेतृत्व में वर्साय पहुँचा। जर्मन प्रतिनिधियों को कँटीले तारों से घिरे ट्रियानन पैलेस होटल में ठहराया गया। संधि का प्रारूप 6 मई 1919 ई. को तैयार हुआ। इसमें 15 भाग, 440 धाराएँ और लगभग 80 हजार शब्द थे। 7 मई को क्लेमेंसो ने जर्मन प्रतिनिधियों के समक्ष संधि का 230 पृष्ठों का मसविदा प्रस्तुत किया और उस पर विचार करने के लिए सीमित समय दिया। जर्मन प्रतिनिधियों ने गहन विचार-विमर्श के बाद मित्र राष्ट्रों को विस्तृत संशोधन-प्रस्ताव दिया। उनकी मुख्य आपत्ति यह थी कि जिन सिद्धांतों के आधार पर जर्मनी ने आत्मसमर्पण किया था, प्रस्तावित संधि में उनका पालन नहीं किया गया था। विशेष रूप से उनका विरोध इस बात पर था कि निःशस्त्रीकरण का सिद्धांत केवल जर्मनी पर लागू किया जा रहा था और संधि की धारा 231 में जर्मनी तथा उसके सहयोगियों को युद्ध के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था।

पेरिस शांति-सम्मेलन और वर्साय की संधि (Paris Peace Conference and Treaty of Versailles)
वर्साय की संधि

मित्र राष्ट्र जर्मनी की आपत्तियों के आधार पर संधि में कोई महत्त्वपूर्ण संशोधन करने के लिए तैयार नहीं हुए। जर्मन प्रतिनिधियों को संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया और उन्हें चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने निर्धारित समय में हस्ताक्षर नहीं किए, तो युद्ध की स्थिति पुनः उत्पन्न हो सकती है। अंततः जर्मन प्रतिनिधियों को विवश होकर संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े। 28 जून 1919 ई. को वर्साय के शीशमहल में संधि पर हस्ताक्षर किए गए। यह वही स्थान था जहाँ लगभग 50 वर्ष पहले बिस्मार्क के नेतृत्व में जर्मन साम्राज्य की स्थापना की घोषणा की गई थी। इस प्रकार वर्साय का शीशमहल जर्मनी के साम्राज्यवादी उत्थान और प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उसके पराभव- दोनों का प्रतीक बन गया।

राष्ट्रसंघ की स्थापना

वर्साय की संधि का एक महत्त्वपूर्ण प्रावधान राष्ट्रसंघ की स्थापना था। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के प्रभाव के कारण संधि के प्रारंभिक भाग में ही राष्ट्रसंघ की व्यवस्था की गई। संधि की पहली 26 धाराओं में राष्ट्रसंघ के संविधान अर्थात् उसके संगठन और कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान शामिल थे। राष्ट्रसंघ का प्रमुख उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सामूहिक सुरक्षा तथा विश्व में स्थायी शांति स्थापित करना था।

सैनिक व्यवस्था

वर्साय की संधि द्वारा जर्मनी की सैन्य शक्ति को अत्यंत सीमित कर दिया गया। विल्सन के चौदह सूत्रों में सामान्य निःशस्त्रीकरण की भावना व्यक्त की गई थी, किंतु व्यवहार में निःशस्त्रीकरण की कठोर शर्तें मुख्यतः जर्मनी और उसके सहयोगियों पर लागू की गईं। जर्मनी की सेना को 1,00,000 सैनिकों तक सीमित कर दिया गया तथा अनिवार्य सैन्य सेवा समाप्त कर दी गई। उसकी नौसेना भी अत्यंत सीमित कर दी गई। जर्मनी को केवल छह युद्धपोत, छह हल्के क्रूजर, बारह तोपची जहाज और बारह टारपीडो नौकाएँ रखने की अनुमति दी गई। उसे पनडुब्बियाँ रखने की अनुमति नहीं थी और वायुसेना पर भी प्रतिबंध लगाया गया। हथियारों के आयात-निर्यात तथा जहरीली गैसों के निर्माण और संग्रह पर भी रोक लगा दी गई। सीमा-शुल्क अधिकारियों, वन रक्षकों और तटरक्षकों की संख्या पर भी नियंत्रण रखा गया, जबकि पुलिस की संख्या जनसंख्या के अनुपात में निर्धारित की जानी थी। शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सेवामुक्त सैनिकों की संस्थाओं, शिकार तथा भ्रमण क्लबों आदि को सैन्य गतिविधियों से दूर रखने की व्यवस्था की गई। इस प्रकार जर्मनी का निःशस्त्रीकरण अत्यंत कठोर था।

प्रादेशिक व्यवस्था

वर्साय की संधि ने जर्मनी के क्षेत्रीय स्वरूप में व्यापक परिवर्तन किया। अल्सास और लोरेन के प्रदेश फ्रांस को वापस कर दिए गए, जिन्हें जर्मनी ने 1870-71 ई. के फ्रांस-प्रशा युद्ध के बाद फ्रांस से प्राप्त किया था। फ्रांस की सुरक्षा के लिए राइनलैंड में 15 वर्षों तक मित्र राष्ट्रों की सेना रखने की व्यवस्था की गई तथा राइनलैंड का असैनिककरण कर दिया गया। जर्मनी को हेलिगोलैंड के बंदरगाह की किलेबंदी नष्ट करनी पड़ी और भविष्य में उसकी पुनः किलेबंदी न करने का आश्वासन देना पड़ा।

सार घाटी को राष्ट्रसंघ के संरक्षण में रखा गया, जबकि वहाँ की कोयला-खानों का स्वामित्व फ्रांस को दिया गया। 15 वर्ष बाद जनमत-संग्रह के आधार पर यह निर्धारित किया जाना था कि सार क्षेत्र जर्मनी के साथ रहेगा या फ्रांस में सम्मिलित होगा। श्लेसविग के उत्तरी भाग को जनमत-संग्रह के बाद डेनमार्क को दे दिया गया। यूपेन, माल्मेडी और मोरेसनेट बेल्जियम को दिए गए। मेमेल को जर्मनी से अलग कर लिथुआनिया को दिया गया। पोलैंड का पुनर्गठन किया गया और उसे बाल्टिक सागर तक पहुँच प्रदान की गई। पोसेन तथा पश्चिमी प्रशा के बड़े भाग पोलैंड को मिले, जिसके कारण पूर्वी प्रशा जर्मनी के मुख्य भाग से अलग हो गया। डैन्ज़िग को जर्मनी से अलग करके राष्ट्रसंघ के संरक्षण में स्वतंत्र नगर का दर्जा दिया गया। इसके अतिरिक्त जर्मनी को फिनलैंड और चेकोस्लोवाकिया की स्वतंत्रता को स्वीकार करना पड़ा। इन प्रादेशिक परिवर्तनों से जर्मनी को लगभग 25 हजार वर्ग मील क्षेत्र और लगभग 70 लाख जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा।

आर्थिक व्यवस्था

वर्साय की संधि की धारा 231 के अंतर्गत जर्मनी और उसके सहयोगी देशों को युद्ध से हुई क्षति के लिए उत्तरदायी ठहराया गया। मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी से युद्ध-क्षतिपूर्ति वसूल करने का निर्णय किया। क्षतिपूर्ति की अंतिम राशि निर्धारित करने के लिए एक आयोग गठित किया जाना था। तब तक जर्मनी को लगभग पाँच अरब डॉलर की राशि मित्र राष्ट्रों को देनी थी। इसके अतिरिक्त जर्मनी को जलपोत, कोयला, रंग, रासायनिक उत्पाद, पशु तथा अन्य वस्तुओं के रूप में भी क्षतिपूर्ति करनी थी। फ्रांस और इटली को निर्धारित अवधि तक कोयला तथा फ्रांस और बेल्जियम को पशु आदि उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। 1870 ई. के बाद जर्मनी द्वारा अन्य देशों से प्राप्त कुछ कलात्मक वस्तुओं और ध्वजों को भी वापस करने की शर्त रखी गई। नील नहर का अंतरराष्ट्रीयकरण कर उसे सभी देशों के जहाजों के लिए खोल दिया गया।

उपनिवेश-संबंधी व्यवस्था

वर्साय की संधि के अंतर्गत जर्मनी के सभी उपनिवेश उससे छीन लिए गए और उन्हें राष्ट्रसंघ की मैंडेट व्यवस्था के अंतर्गत मित्र राष्ट्रों तथा उनके सहयोगियों के नियंत्रण में दे दिया गया। अफ्रीका स्थित जर्मन उपनिवेशों को ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम और दक्षिण अफ्रीका के बीच बाँट दिया गया। प्रशांत क्षेत्र में विषुवत रेखा के उत्तर के जर्मन उपनिवेश जापान को तथा दक्षिण के उपनिवेश ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के नियंत्रण में चले गए। चीन, मोरक्को और मिस्र में जर्मनी के विशेषाधिकार भी समाप्त कर दिए गए। उपनिवेशों के चले जाने से जर्मनी को तेल, रबर और सूत जैसे कच्चे माल के स्रोतों पर अपना नियंत्रण खोना पड़ा, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

न्यायिक व्यवस्था

संधि में युद्ध के लिए उत्तरदायित्व निर्धारित करने के साथ न्यायिक कार्रवाई की भी व्यवस्था की गई। धारा 231 के आधार पर जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय पर युद्ध आरंभ करने का आरोप लगाया गया और उसके विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चलाने की योजना बनाई गई। युद्ध के दौरान जर्मनी की ओर से लड़ने वाले कुछ सैनिकों और अधिकारियों पर भी कार्रवाई का प्रावधान किया गया। किंतु कैसर विलियम द्वितीय को नीदरलैंड द्वारा शरण दिए जाने के कारण उसके विरुद्ध प्रस्तावित मुकदमा व्यवहार में नहीं चल सका।

वर्साय की संधि का मूल्यांकन

वर्साय की संधि आधुनिक इतिहास की सबसे अधिक विवादित शांति-संधियों में से एक रही। फ्रांसीसी सेनापति मार्शल फोश ने इसे वास्तविक शांति-संधि के बजाय लगभग 20 वर्षों के युद्धविराम के रूप में देखा था। बाद की घटनाओं ने इस आशंका को काफी हद तक सही सिद्ध किया, क्योंकि लगभग दो दशकों बाद विश्व को पुनः द्वितीय विश्वयुद्ध का सामना करना पड़ा।

वर्साय की संधि को अपमानजनक और आरोपित संधि माना गया। जर्मनी को संधि-निर्माण की प्रक्रिया में प्रभावी रूप से भाग लेने का अवसर नहीं मिला और उसे तैयार शर्तों को स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया। जर्मन प्रतिनिधिमंडल के साथ किए गए व्यवहार ने जर्मन जनता में अपमान और असंतोष की भावना को और गहरा किया। ई. एच. कार के अनुसार, यह संधि विजेताओं द्वारा विजितों पर थोपी गई थी और इसमें पारस्परिक बातचीत की भावना बहुत कम थी।

संधि को प्रतिशोधात्मक भी कहा गया, क्योंकि मित्र राष्ट्रों की नीति में जर्मनी को दंडित करने की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। कठोर सैन्य प्रतिबंधों, भारी क्षतिपूर्ति, प्रादेशिक हानि और उपनिवेशों के छिन जाने ने जर्मनी की राजनीतिक तथा आर्थिक शक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

वर्साय की संधि का एकपक्षीय स्वरूप भी इसकी प्रमुख कमजोरी था। जर्मनी को मुख्यतः संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बुलाया गया था और निःशस्त्रीकरण की कठोर शर्तें उसी पर लागू की गईं। आत्मनिर्णय के सिद्धांत का भी जर्मनी के संदर्भ में समान रूप से पालन नहीं किया गया।

अंततः इसकी प्रादेशिक व्यवस्था भी विवादास्पद रही। जर्मनी के क्षेत्रों का पुनर्गठन करके अनेक नए राजनीतिक स्वरूपों को जन्म दिया गया। इससे यूरोप की राजनीतिक संरचना में व्यापक परिवर्तन तो हुआ, किंतु अनेक समस्याएँ भी बनी रहीं। इस प्रकार वर्साय की संधि ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन उसकी कठोर, दंडात्मक और असंतुलित प्रकृति ने जर्मनी में गहरा असंतोष उत्पन्न किया। इसी असंतोष ने आगे चलकर यूरोप में संशोधनवादी और आक्रामक राजनीति के विकास की पृष्ठभूमि तैयार की और अंततः संपूर्ण विश्व को द्वितीय विश्वयुद्ध की ले जाने वाला महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ।

सेंट जर्मेन की संधि (10 सितंबर 1919 ई.)

पेरिस के निकट स्थित सेंट जर्मेन नामक स्थान पर मित्र राष्ट्रों और उनके सहयोगियों ने 10 सितंबर 1919 ई. को ऑस्ट्रिया के साथ सेंट जर्मेन की संधि की। इस संधि के परिणामस्वरूप ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के विघटन को औपचारिक रूप दिया गया। ऑस्ट्रिया ने पोलैंड, हंगरी, यूगोस्लाविया तथा चेकोस्लोवाकिया के अस्तित्व को स्वीकार किया। बोहेमिया, मोराविया और सिलेसिया के प्रमुख भागों को मिलाकर चेकोस्लोवाकिया का निर्माण किया गया, जबकि बोस्निया-हर्जेगोविना सहित दक्षिण स्लाव क्षेत्रों को नए यूगोस्लाव राज्य में सम्मिलित किया गया।

पोलैंड को गैलिशिया का अधिकांश भाग तथा रोमानिया को बुकोविना प्राप्त हुआ। ऑस्ट्रिया के पूर्ववर्ती साम्राज्य में रहने वाली विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लिए नए राजनीतिक सीमांकन किए गए। इटली को दक्षिणी टायरॉल, ट्रेंटिनो और इस्ट्रिया के बड़े भाग प्राप्त हुए। इस संधि से हैप्सबर्ग शासन का अंत हो गया और ऑस्ट्रिया एक छोटे गणराज्य के रूप में सीमित रह गया।

सैन्य व्यवस्था के अंतर्गत ऑस्ट्रिया की सेना की संख्या 30,000 सैनिकों तक सीमित कर दी गई। उसकी वायुसेना और नौसेना समाप्त कर दी गई तथा उसे डैन्यूब नदी में केवल कुछ हल्के जलयानों को रखने की अनुमति दी गई। युद्ध-क्षतिपूर्ति के लिए एक क्षतिपूर्ति आयोग गठित किया जाना था, जो ऑस्ट्रिया द्वारा दी जाने वाली राशि निर्धारित करता। टेशिन के औद्योगिक क्षेत्र का विभाजन पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के बीच किया गया। इसके अतिरिक्त, ऑस्ट्रिया को युद्ध-अपराध के आरोपित व्यक्तियों को मित्र राष्ट्रों के समक्ष प्रस्तुत करने की व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी।

इस प्रकार ऑस्ट्रिया के क्षेत्र और राजनीतिक शक्ति को बहुत सीमित कर दिया गया तथा उसके पूर्व साम्राज्य के विभिन्न भागों में नए राष्ट्र-राज्यों का निर्माण हुआ। ई. एच. कार के अनुसार आत्मनिर्णय के सिद्धांत के संदर्भ में संधि की आलोचना की जा सकती है। विशेष रूप से ऑस्ट्रिया और जर्मनी के राजनीतिक संघ पर प्रतिबंध तथा जर्मन-भाषी दक्षिणी टायरॉल को इटली को सौंपना आत्मनिर्णय के सिद्धांत के विरोधाभासी उदाहरण माने गए।

न्यूइली की संधि (27 नवंबर 1919 ई.)

न्यूइली की संधि 27 नवंबर 1919 ई. को बुल्गारिया और मित्र राष्ट्रों के बीच हुई। इसके अनुसार बुल्गारिया को अपने कुछ क्षेत्र पड़ोसी देशों को सौंपने पड़े। पश्चिमी बुल्गारिया के कुछ प्रदेश यूगोस्लाविया को तथा पश्चिमी थ्रेस यूनान को दिया गया, जिसके कारण बुल्गारिया समुद्र से लगभग वंचित हो गया।

इस संधि के अंतर्गत बुल्गारिया की सेना को 20,000 सैनिकों तक सीमित कर दिया गया तथा उसकी वायुसेना और नौसैनिक क्षमता पर भी कठोर प्रतिबंध लगाए गए। युद्ध-क्षतिपूर्ति के रूप में बुल्गारिया को लगभग 22.5 करोड़ स्वर्ण फ्रैंक देने थे, जिन्हें निर्धारित किश्तों में चुकाया जाना था।

ट्रियानन की संधि (4 जून 1920 ई.)

ट्रियानन की संधि 4 जून 1920 ई. को हंगरी और मित्र शक्तियों के बीच हुई। इस संधि के अनुसार हंगरी ने अपने विशाल भू-भाग का बड़ा हिस्सा खो दिया। ट्रांसिल्वेनिया और पूर्वी बनात का अधिकांश भाग रोमानिया को, क्रोएशिया-स्लावोनिया को सर्ब-क्रोएट-स्लोवेन राज्य को तथा स्लोवाकिया और कार्पेथियन रूथेनिया को चेकोस्लोवाकिया में सम्मिलित किया गया। हंगरी को ऑस्ट्रिया से अलग एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दी गई।

हंगरी की सेना को 35,000 सैनिकों तक सीमित कर दिया गया। उस पर भी युद्ध-क्षतिपूर्ति का दायित्व लगाया गया। इस संधि के कारण हंगरी ने अपने पूर्व साम्राज्य के लगभग दो-तिहाई भू-भाग और बड़ी संख्या में आबादी को खो दिया।

सेव्र की संधि (10 अगस्त 1920 ई.)

सेव्र की संधि 10 अगस्त 1920 ई. को उस्मानी साम्राज्य की सरकार और मित्र शक्तियों के बीच हुई। इस संधि के अनुसार उस्मानी साम्राज्य के विशाल क्षेत्रों को उससे अलग कर दिया गया। अर्मेनिया को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने की व्यवस्था की गई तथा कुर्दिस्तान के लिए भी स्वायत्तता की संभावना का प्रावधान किया गया। पूर्वी थ्रेस और इज़मिर सहित कुछ क्षेत्रों पर यूनान का प्रभाव स्थापित किया गया।

मिस्र, सीरिया, फिलिस्तीन, मेसोपोटामिया और अरब के क्षेत्रों पर उस्मानी साम्राज्य का अधिकार समाप्त कर दिया गया। इनमें से अनेक क्षेत्रों को राष्ट्र संघ के मैंडेट के रूप में मित्र राष्ट्रों के प्रशासन के अधीन कर दिया गया। बॉस्फोरस और डार्डानेल्स जलडमरूमध्यों पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण की व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप उस्मानी साम्राज्य अत्यंत सीमित होकर मुख्यतः अनातोलिया तक सिमट गया।

सेव्र की संधि को मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व वाले तुर्की राष्ट्रवादी आंदोलन ने स्वीकार नहीं किया। तुर्की राष्ट्रवादियों ने यूनानी सेना को पराजित किया और मित्र राष्ट्रों को संधि पर पुनर्विचार करने के लिए विवश किया। अंततः 24 जुलाई 1923 ई. को लोसान की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसने सेव्र की संधि का स्थान लिया और आधुनिक तुर्की की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मान्यता प्रदान की। इस दृष्टि से लोसान की संधि को तुर्की के लिए वास्तविक शांति-संधि माना जाता है।

लोसान की संधि (24 जुलाई 1923 ई.)

पेरिस शांति-व्यवस्था के अंतर्गत की गई संधियों में वर्साय की संधि जर्मनी के लिए सबसे कठोर संधि थी। जर्मनी के प्रतिनिधियों ने इसे विरोध के बावजूद स्वीकार करते हुए हस्ताक्षर किए। जर्मनी में इस संधि को राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखा गया। बाद में हिटलर के नेतृत्व में नाजी शासन ने वर्साय की संधि द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करने तथा जर्मनी की सैन्य और राजनीतिक शक्ति पुनः स्थापित करने की आक्रामक नीति अपनाई। इन नीतियों ने यूरोप में तनाव को बढ़ाया और अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख कारणों में योगदान दिया।

इन संधियों के माध्यम से विजयी राष्ट्रों ने युद्धोत्तर यूरोप की राजनीतिक सीमाओं को पुनर्गठित करने, पराजित शक्तियों की सैन्य शक्ति को नियंत्रित करने और नई अंतरराष्ट्रीय शांति-व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। इन संधियों के कारण जर्मनी, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, हंगरी और तुर्की की राजनीतिक तथा क्षेत्रीय स्थिति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पुराने साम्राज्यों के विघटन और नए राज्यों के निर्माण के कारण यूरोप का राजनीतिक मानचित्र भी काफी हद तक बदल गया।

हालाँकि इन शांति-संधियों का उद्देश्य स्थायी शांति स्थापित करना था, लेकिन इनके द्वारा पराजित राष्ट्रों पर लगाई गई अनेक कठोर राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और क्षेत्रीय शर्तों ने उनमें असंतोष पैदा किया। विशेष रूप से जर्मनी में वर्साय की संधि को राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखा गया। इसी प्रकार अन्य पराजित राष्ट्र भी युद्धोत्तर व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। दूसरी ओर विजेता राष्ट्रों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित और परस्पर विरोधी उद्देश्य भी थे। इसलिए पेरिस में निर्मित शांति-व्यवस्था उतनी स्थायी सिद्ध नहीं हुई, जितनी उसके निर्माताओं ने आशा की थी।

इस प्रकार पेरिस की शांति-संधियाँ प्रथम विश्व युद्ध के बाद नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास थीं, लेकिन पराजित राष्ट्रों की असंतुष्टि, कठोर शर्तों और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन की समस्याओं के कारण यह व्यवस्था दीर्घकालीन शांति कायम करने में सफल नहीं हो सकी। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के लगभग 20 वर्ष बाद ही 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो गया। इस प्रकार पेरिस शांति-सम्मेलन और उससे संबंधित संधियाँ विश्व में स्थायी शांति स्थापित करने के अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सकीं।

पेरिस शांति सम्मेलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1. पेरिस शांति सम्मेलन कब और क्यों आयोजित किया गया था?

पेरिस शांति सम्मेलन जनवरी 1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद आयोजित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध के बाद शांति की शर्तें निर्धारित करना, पराजित देशों के साथ शांति-संधियाँ करना, यूरोप की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना तथा भविष्य में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की व्यवस्था स्थापित करना था।

प्रश्न 2. पेरिस शांति सम्मेलन में प्रमुख भूमिका किन देशों ने निभाई?

सम्मेलन में अनेक देशों ने भाग लिया, लेकिन इसके निर्णयों पर प्रमुख रूप से चार शक्तियों—अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली—का प्रभाव रहा। इनके प्रमुख नेता वुडरो विल्सन, डेविड लॉयड जॉर्ज, जॉर्ज क्लेमांसो और विटोरियो ऑरलैंडो थे, जिन्हें सामान्यतः ‘बिग फोर’ कहा जाता है। जापान भी प्रमुख संबद्ध शक्तियों में शामिल था।

प्रश्न 3. पेरिस शांति सम्मेलन के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?

सम्मेलन के प्रमुख उद्देश्यों में पराजित देशों के साथ शांति-संधियाँ करना, नई राष्ट्रीय सीमाएँ निर्धारित करना, युद्ध की क्षतिपूर्ति और वित्तीय दायित्व तय करना, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना, राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के सिद्धांत पर विचार करना तथा भविष्य के युद्धों को रोकने के लिए राष्ट्रसंघ की स्थापना करना शामिल था।

प्रश्न 4. पेरिस शांति सम्मेलन का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम क्या था?

सम्मेलन का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम वर्साय की संधि (28 जून 1919) और अन्य पराजित देशों के साथ की गई शांति-संधियाँ थीं। जर्मनी पर क्षेत्रीय, सैन्य और आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए तथा उसके उपनिवेशों को उससे छीन लिया गया। सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि राष्ट्रसंघ की स्थापना की योजना भी थी।

प्रश्न 5. पेरिस शांति सम्मेलन में राष्ट्रसंघ का क्या महत्त्व था?

राष्ट्रसंघ का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना तथा युद्धों को रोककर सामूहिक सुरक्षा और स्थायी शांति स्थापित करना था। राष्ट्रसंघ का विधान वर्साय की संधि में शामिल किया गया और इसमें प्रस्तावना तथा 26 अनुच्छेद थे।

प्रश्न 6. पेरिस शांति सम्मेलन की प्रमुख आलोचनाएँ क्या थीं?

सम्मेलन की आलोचना मुख्यतः इसलिए की गई कि प्रमुख निर्णयों में विजयी शक्तियों का प्रभाव बहुत अधिक था और पराजित देशों को शांति की शर्तें तय करने में वास्तविक भागीदारी नहीं मिली। जर्मनी पर लगाए गए कठोर राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रावधानों से वहाँ असंतोष बढ़ा। दूसरी ओर, आत्मनिर्णय के सिद्धांत को भी सभी क्षेत्रों में समान रूप से लागू नहीं किया गया। इन परिस्थितियों ने युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में असंतोष और भविष्य के तनावों को बढ़ाने में योगदान दिया।
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