वैदिक साहित्य में वर्णित भारतीय संस्कृति : ऋग्वेदकालीन संस्कृति (Indian Culture Described in Vedic Literature: Rigvedic Culture)

वैदिक काल प्राचीन भारतीय संस्कृति का वह कालखंड माना जाता है, जब वेदों की रचना हुई थी। इस कालखंड की संस्कृति को वैदिक संस्कृति कहा जाता है क्योंकि इसकी जानकारी के प्रमुख स्रोत वैदिक साहित्य ही हैं।

वैदिक साहित्य का सर्वेक्षण (Survey of Vedic literature)

Indian Culture Described in Vedic Literature: Rigvedic Culture
वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य के अंतर्गत ऋक्, यजुष्, साम, और अथर्व की संहिताएं अर्थात् मंत्र-खंड ही नहीं, अपितु गद्य एवं दार्शनिक-खंड अर्थात् विभिन्न ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् भी वर्गीकृत किये जा सकते हैं। यह संपूर्ण संहिता-इतर साहित्य गद्य में ही नहीं है, अपितु पद्य-मिश्रित भी है। कभी-कभी सूत्र-साहित्य और वेदांगों को भी वैदिक साहित्य में सम्मिलित कर लिया जाता है जो अत्यंत परवर्ती काल की रचनाएँ हैं।

ऋग्वेद

वैदिक संहिताओं में ऋग्वेद प्राचीनतम् है। प्रायः सभी इतिहासकार इसको हिंद-यूरोपीय (भारोपीय) भाषा-परिवार की पहली रचना मानते हैं। इस ग्रंथ में 10,600 मंत्र और 1,028 सूक्त हैं जो दस मंडलों में विभक्त हैं। यद्यपि ऋग्वेद में अन्य प्रकार के सूक्त भी हैं, किंतु देवताओं की स्तुति करनेवाले मंत्रों की प्रधानता है। ऋग्वेद में मृत्युनिवारक न्नयम्बक मंत्र या मृत्युंजय मंत्र तथा प्रसिद्ध गायत्री मंत्र हैं। इसमें अनेक प्रकार के लोकोपयोगी सूक्त, जैसे- रोग निवारक-सूक्त, लक्ष्मी-सूक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट खिलसूक्त में), नासदीय-सूक्त, हिरण्यगर्भ-सूक्त और विवाह आदि के सूक्त वर्णित हैं। कहते हैं कि इस ग्रंथ के अधिकांश सूक्तों की रचना सप्त-सैंधव प्रदेश (पंजाब) में हुई थी।

यजुर्वेद

‘यजुष्’ शब्द का अर्थ है- यज्ञ। यजुर्वेद में अधिकांशतः यज्ञों एवं हवनों के नियम और विधान हैं। इसमें 40 अध्याय, 1975 कंडिकाएँ तथा 3988 मंत्र हैं। इस ग्रंथ में भी गायत्री मंत्र तथा महामृत्युंजय मंत्र मिलते हैं। यजुर्वेद का अंतिम अध्याय ईशावास्य उपनिषद् है, जिसका संबंध आध्यात्मिक चिंतन से है। यजुर्वेद से श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, ईश, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य उपनिषद् संबद्ध हैं।

यजुर्वेद के दो भेद हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता को आपस्तंब संहिता भी कहते हैं। शुक्ल यजुर्वेद की संहिताओं को वाजसनेय (माध्यन्दिन और काण्व संहिता) कहा जाता है।

जहाँ ऋग्वेद की रचना सप्त-सिंधु प्रदेश में हुई थी, वहीं यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है। इस ग्रंथ से पता चलता है कि आर्य सप्त-सैंधव प्रदेश से आगे बढ़ चुके थे और गंगा-यमुना का क्षेत्र आर्य-संस्कृति का केंद्र हो गया था।

सामवेद

‘साम’ शब्द का अर्थ है ‘गान’। सामवेद में यज्ञ के अवसर पर उद्गाता द्वारा गाई जानेवाली ऋचाओं का संग्रह है जिनकी संख्या 1875 है। भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे ‘भारतीय संगीत का मूल’ माना जाता है।

अथर्ववेद

अथर्ववेद वेदों में अंतिम है। इसकी भाषा ऋग्वेद की भाषा की तुलना में स्पष्टतः बाद की है और कई स्थानों पर ब्राह्मण ग्रंथों से मिलती है। इसका रचनाकाल लगभग 1000 ई.पू. माना जाता है। इसमें आर्य और अनार्य धार्मिक विचारों का सम्मिश्रण है। अथर्ववेद में देवताओं की स्तुति कम, जादू, चमत्कार, आयुर्वेद, चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन के मंत्र अधिक हैं। इसे ब्रह्मवेद, अथर्वांगिरस वेद, भैषज्यवेद तथा महीवेद भी कहते हैं। इसमें 20 कोंड, 34 प्रपाठक, 111 अनुवाक, 731 सूक्त तथा 5,839 मंत्र हैं।

अथर्ववेद में शांति-पुष्टि तथा अभिचारिक दोनों तरह के अनुष्ठानों का वर्णन है। इस ग्रंथ में भूगोल, खगोल (ब्रह्मांडीय सिद्धांत), वनस्पति विद्या, असंख्य जड़ी-बूटियाँ, आयुर्वेद, गंभीर रोगों का निदान और उनकी चिकित्सा, अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धांत, राजनीति के गुह्य तत्त्व, राष्ट्रभूमि तथा राष्ट्रभाषा की महिमा, शल्य-चिकित्सा, कृमियों से उत्पन्न होनेवाले रोगों का विवेचन, विवाह प्रार्थनाएँ, अंतिम संस्कार के मंत्र, मृत्यु को दूर करने के उपाय, प्रजनन-विज्ञान अदि सैकड़ों लोकोपकारक विषयों का निरूपण है। इसमें भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि के मंत्रों से लगता है कि इस समय आर्य प्रकृति-पूजा की अपेक्षा प्रेत-आत्माओं व तंत्र-मंत्र में विश्वास करने लगे थे। इस वेद में महीसूक्त के द्वारा पहली बार राष्ट्रीय भावना का प्रतिपादन मिलता है। अथर्ववेद के एक सूक्त में मानव शरीर की रचना का वर्णन है जिसके आधार पर आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली अपनी उत्पत्ति अथर्ववेद से मानती है।

ब्राह्मण-ग्रंथ

यज्ञीय कर्मकांडों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भाँति समझने के लिए ब्राह्मण ग्रंथों की रचना हुई। प्रायः गद्य में लिखे हुए इन ग्रंथों से उत्तर वैदिककालीन समाज एवं संस्कृति का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने ब्राह्मण हैं। ऐतरेय एवं कौशीतकि ब्राह्मण ऋग्वेद से संबद्ध हैं।

शुनःशेप की प्रसिद्ध कथा ऐतरेय ब्राह्मण में ही है। शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद से संबद्ध है जिसमें सौ अध्याय हैं। इसी प्रकार साम के साथ पंचविश और अथर्व के साथ गोपथ ब्राह्मण संबद्ध है।

आरण्यक

आरण्यक का चिंतन, मनन अरण्य (वन) में किया जाता था। आरण्यकों में केवल छः आरण्यक ही उपलब्ध हैं- ऐतरेय, शांखयन, बृहदारण्यक, मैत्रायणी उपनिषद् तथा तवलकार आरण्यक (जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण)। ऐतरेय एवं शांखायन ऋग्वेद से, बृहदारण्यक एवं मैत्रायणी उपनिषद् आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से तथा तवलकार आरण्यक सामवेद से संबद्ध हैं। अथर्ववेद का कोई आरण्यक नहीं मिलता, यद्यपि उससे संबद्ध गोपथ-ब्राह्मण के पूर्वार्द्ध में कुछ सामग्री आरण्यकों के अनुरूप मिलती है।

आरण्यकों में कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं, जैसे- तैत्तिरीय आरण्यक में कुरु, पांचाल, काशी, विदेह आदि महाजनपदों का उल्लेख है तथा कुरुक्षेत्र एवं खांडव वन का वर्णन है। इससे लगता है कि इसका संबंध कुरु-पांचाल जनपदों से रहा है। शांखयन आरण्यक में उशीनर, मत्स्य, कुरु-पांचाल और काशी तथा विदेह जनपदों का वर्णन है।

उपनिषद्

उपनिषद् ब्रह्मज्ञान के ग्रंथ हैं। उपनिषदों में मानव-जीवन और विश्व के गूढ़तम् प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया गया है। इनका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय आत्मन्-ब्रह्मन् के विश्लेषण द्वारा अद्वैतवाद का निरूपण तथा अन्य वैदिक ग्रंथों के विपरीत कर्मकांड का खंडन करना है। वैदिक साहित्य का अंतिम भाग होने के कारण इन्हें ‘वेदांत’ भी कहा जाता हैं। जहाँ ब्राह्मणों और आरण्यकों की रचना ब्राह्मण पुरोहितों ने की थी, वहीं उपनिषदों के सृजन में क्षत्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

उपनिषदों की कुल संख्या 108 बताई जाती है, किंतु ग्यारह उपनिषद् अधिक महत्त्वपूर्ण हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर। इनमें छांदोग्य और बृहदारण्यक अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन और उपयोगी हैं। ऋग्वेद से संबंधित दस उपनिषद् हैं, जबकि शुक्ल यजुर्वेद के उन्नीस और कृष्ण यजुर्वेद के बत्तीस उपनिषद् हैं। सामवेद के सोलह तथा अथर्ववेद के इक्तीस उपनिषद् हैं।

सूत्र-साहित्य

वैदिक कर्मकांड से संबद्ध सारगर्भित छोटे-छोटे वाक्यों को सूत्रा कहा जाता है। संपूर्ण सूत्र-साहित्य को चार भागों में बांटा गया- श्रौत, गृह, धर्म और शुल्वसूत्र। पहले में वैदिक यज्ञीय कर्मकांड का, दूसरे में गृहस्थ के दैनिक यज्ञों का, तीसरे में सामाजिक नियमों का और चाथे में यज्ञवेदियों के निर्माण का वर्णन है। शुल्वसूत्र भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम् ग्रंथ है।

वेदांग

वेदों के अर्थ तथा विषयों के स्पष्टीकरण के लिए रचित सूत्रा-ग्रंथों को वेदांग कहा जाता है। वेदांग छः हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष। इन्हें वेद-पुरुष का छः अंग बताया गया है। शिक्षा ग्रंथों की सहायता से वेद-मंत्रों के उच्चारण का शुद्ध ज्ञान होता है। कल्पसूत्र में वैदिक कर्मकांडों के विधि-नियमों का प्रतिपादन है। व्याकरण का उद्देश्य संधि, शब्द-रूप, धातु-रूप एवं इनकी निर्माण-पद्धति का ज्ञान कराना था।

पाणिनि की अष्टाध्यायी प्रसिद्ध व्याकरण-ग्रंथ है। निरुक्त में वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति दिखाई गई है। क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघंटु’ की व्याख्या हेतु यास्क ने निरुक्त की रचना की थी, जो भाषाशास्त्र का पहला ग्रंथ कहा जाता है।

वैदिक मंत्र छंदोबद्ध हैं, इसलिए वेद-मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए छंदों का सही ज्ञान होना आवश्यक था। पिंगल का छंदशास्त्र प्रसिद्ध है। वैदिक युग में काल-ज्ञान के लिए ज्योतिष का विकास हुआ। इसका प्राचीनतम् ग्रंथ लगधमुनि रचित ज्योतिष है।

प्रायः वैदिक साहित्य की रचना का श्रेय आर्य लोगों को दिया जाता है, किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से आर्य नामक किसी जाति-विशेष की पहचान संभव नहीं हो सकी है। सापेक्षिक दृष्टि से आर्यों की पहचान एक विशेष भाषा-भाषी वर्ग से की जा सकती है।

लगता है कि भारत में आर्य भाषा-भाषी लोगों में एक से अधिक वर्ग के लोग सम्मिलित थे जो सामूहिक रूप से भारोपीय भाषा परिवार की एक विशेष भाषा ‘संस्कृत’ बोलते थे। ज्यों-ज्यों इन लोगों का भारत में प्रसार होता गया, यहाँ के मूल निवासियों के साथ उनका मिश्रण होता गया। यही कारण है कि वैदिक साहित्य में जिस संस्कृत भाषा का प्रयोग हुआ है उसमें द्रविड़ भाषाओं का भी प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है।

वैदिक साहित्य का रचनाकाल (Creation Time of Vedic Literature)

वेदों के रचनाकाल का निर्धारण वैदिक साहित्येतिहास की एक जटिल समस्या है। मोटेतौर पर संपूर्ण वैदिक साहित्य के रचनाकाल को दो भागों में बाँटा जा सकता है- पूर्व वैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल।

साधारणतः ऋक् संहिता के रचनाकाल को पूर्ववैदिक काल तथा शेष अन्य संहिताओं एवं ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के रचनाकाल को उत्तर वैदिक काल कहा जाता है।

प्रायः सभी संहिताओं और वैदिक ग्रंथों में स्तरीकरण के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं, इसलिए सामान्यतः ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू. लगभग 1500 से 1000 तक तथा उत्तर वैदिक काल ई.पू. 1000 से 500 ई.पू. तक माना जाता है। ऋग्वेद में लोहे का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि उत्तर वैदिक काल के साहित्य में लोहे का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

अभी तक उत्तरी भारत में लोहे के प्रयोग के साक्ष्य ई.पू. 1000 के पहले के नहीं मिले हैं, यद्यपि अतरंजीखेड़ा (एटा, उ.प्र.) से प्राप्त लोहे के साक्ष्य को ई.पू. 1025 का बताया जाता है।

आर्यों का मूल-स्थान (Origin of Aryans)

आर्यों के मूल-स्थान के संबंध में भारतीय विद्वानों का एक वर्ग का मानता है कि आर्य मूलतः भारत के ही निवासी थे और यहीं से विश्व के विभिन्न भागों में फैले। इन विद्वानों में पं. गंगानाथ झा बह्मर्षि देश को, डी.एस. त्रिवेदी मुल्तान स्थित देविका को, एल.डी. कल्ल कश्मीर तथा हिमालय क्षेत्र को आर्यों का मूल-स्थान सिद्ध करते हैं।

किंतु अब यह सिद्ध हो चुका है कि भारत आर्यों का मूल-निवास स्थान नहीं था। उत्तर-पश्चिम में बलूचिस्तान से ‘ब्राहुई’ भाषा का साक्ष्य मिला है जो द्रविड़़ परिवार की भाषा थी। इससे स्पष्ट है कि भारत का कम से कम एक बड़ा भाग अनार्य भाषा-भाषियों का था जो आर्यों के भारतीय मूल के सिद्धांत के विरूद्ध सबसे सबल प्रमाण है।

बाल गंगाधर तिलक आर्यों का आदि स्थान उत्तरी घ्रुव बताते हैं। ऋग्वेद के एक सूक्त में दीर्घकालीन उषा की स्तुति है और महाभारत में सुमेरु पर्वत के वर्णन में छः महीने की रात और छः महीने के दिन का उल्लेख मिलता है। इन उल्लेखों के आधार पर तिलक महोदय उत्तरी घ्रुव को आर्यों का मूल-स्थान मानते हैं, किंतु इस मत का कोई अन्य सैद्धांतिक आधार नहीं है।

आर्यों की संस्कृत भाषा को भारोपीय भाषा वर्ग का मान लेने पर भी उनके मूल-स्थान की समस्या का समाधान नहीं हो पाता, क्योंकि विभिन्न भाषाओं की जननी मूल भारोपीय भाषा स्वयं कहाँ जन्मी थी, यह निश्चित करना कठिन है।

अनेक इतिहासकार एशिया और यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों को आर्यों का मूल स्थान सिद्ध करते हैं। पेन्का, हर्ट आदि विद्वानों का अनुमान है कि स्कैंडेनीविया भारोपीय भाषा परिवार का मूल-स्थान था। पुरातत्त्व एवं तुलनात्मक भाषाशास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर मैक्समूलर मध्य एशिया को आर्यों का आदि देश मानते हैं।

एडवर्ड मेयर, पीक, नेहरिंग, पिग एवं गार्डेन चाइल्ड दक्षिणी रूस को आर्यों का मूल-स्थान मानते हैं। मेयर का अनुमान है कि पामीर के पठार से ही इंडो-ईरानी जाति पूरब में पंजाब तथा पश्चिम में मेसोपोटामिया की ओर गई। इसका समर्थन ओल्डेनवर्ग और कीथ भी करते हैं। भारोपीय तथा मध्य रूस की फिनो-उग्रीयन भाषाओं में आश्चर्यजनक समानता दिखाई देती है। इससे लगता है कि भारोपीय तथा मध्य रूस की जाति में प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक संपर्क था।

भारतीय भाषाकोश के आधार पर ब्रैंडेस्टीन ने बताया कि आर्य मूलतः एक पर्वत के नीचे घास के मैदान में निवास करते थे और यह मैदान यूराल पर्वत के दक्षिण में स्थिर किर्जिंग में था। भाषा-विज्ञान संबंधी अध्ययनों से ज्ञात होता है कि भारोपीय वर्ग की अधिकांश भाषाओं में भेड़ियाँ, भालू एवं घोड़ा जैसे पशुओं और करंज (बीज) तथा भोजवृक्षों के लिए समान शब्दावली का प्रयोग किया गया है। इससे लगता है कि इस वर्ग की विभिन्न भाषाओं का प्रयोग करनेवाले लोगों का संबंध शीतोष्ण जलवायुवाले ऐसे क्षेत्रों से था, जहाँ घास से आच्छादित विशाल मैदान थे। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस क्षेत्र की पहचान सामान्यतया दक्षिणी रूस अर्थात् यूराल पर्वत श्रेणी के दक्षिण में मध्य एशियाई इलाके के निकट स्टेप मैदानों से की जा सकती है।

पुरातात्विक साक्ष्यों से इस क्षेत्र से एशिया और यूरोप के विभिन्न भागों की ओर बहिर्गामी प्रवासन की प्रक्रिया के चिन्ह भी मिलते हैं। यह प्रक्रिया अत्यंत क्रमिक थी और ऐसी ही प्रक्रिया के फलस्वरूप भारत में आर्यों का आगमन हुआ।

भारत में आर्यों के आगमन विंटरनित्ज ई.पू. 2500 मानते हैं जबकि बालगंगाधर तिलक ने इसकी तिथि ई.पू. 6000 निर्धारित की है, किंतु यह घटना ई.पू. 1500 के आसपास की मानी जा सकती है। संभवतः आर्यों ने भारत में कई बार आक्रमण किया और इनकी एक से अधिक लहरें भारत आई थीं। सबसे महत्त्वपूर्ण कबीला भरत था और माना जाता है कि इसी भरत कबीले के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

ऋग्वेदकालीन संस्कृति, ई.पू. 1500-1000 (Rigvedic Culture, BC 1500–1000)

वैदिक साहित्य
भारत में आर्यों का आगमन

भारत में आर्यों का आगमन ई.पू. 1500 के आसपास हुआ और उनकी एक से अधिक लहरें भारत आईं। उन्होंने सर्वप्रथम सप्तसैंधव प्रदेश में बसना आरंभ किया। ऋग्वेद में वर्णित नदियों में संभवतः सिंधु नदी सबसे महत्त्वपूर्ण नदी थी जो सप्तसैंधव प्रदेश की पश्चिमी सीमा भी थी। इस नदी को हिरण्यनी, सुवास और ऊर्पावर्ती भी कहा गया है जो उसके आर्थिक महत्त्व के सूचक हैं। इस प्रदेश में बहनेवाली अन्य नदियों में सरस्वती, शतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम), अस्किनी (चिनाब) आदि का उल्लेख ऋग्वेद में है।

विपाशा (व्यास) नदी के तट पर ही इंद्र ने उषा को पराजितकर उसके रथ को तोड़ डाला था। आर्यजन अफगानिस्तान की कुभा (काबुल नदी), क्रमु (कुर्रम), गोमती (गोमल) एवं सुवास्तु (स्वात) आदि नदियों से भी परिचित थे।

ऋग्वेद में सबसे पवित्र नदी सरस्वती बताई गई है जिसे ‘नदीतमा’ (नदियों की माता) कहा गया है। दृशवती भी एक पवित्र नदी थी। सरस्वती और दृशवती दोनों अदृश्य नदियाँ वर्तमान राजस्थान के मरुभूमि में प्रवाहशील थीं। ऋग्वेद में यमुना का उल्लेख तीन बार और गंगा का उल्लेख एक बार हुआ है। सामान्यतया गंगा को ऋग्वेदकालीन आर्यों के निवास की पूर्वी सीमा माना जा सकता है। ऋग्वेद में दशराज्ञ युद्ध के संदर्भ में जिन अज, शिग तथा अन्यत्र क्रिवि नामक जनजातियों का उल्लेख है, वे गंगा-यमुना दोआब के निवासी प्रतीत होते हैं। आर्य हिमालय पर्वत से परिचत थे क्योंकि ऋग्वेद में हिमालय की एक चोटी को ‘मूजदंत’ कहा गया है जो सोम के लिए प्रसिद्ध थी।

पुरातात्विक प्रमाण

ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खानेवाली संस्कृतियों में गैरिक मृद्भांड, ताम्रपुंजों एवं लाल और काले मृद्भांडवाली संस्कृतियों की गणना की जाती है, किंतु इनमें से किसी को भी ऋग्वैदिक लोगों की कृति मानना कठिन है। गैरिक मृद्भांड ऋग्वेदकालीन माने जा सकते हैं, किंतु इस संस्कृति के ज्ञात लगभग एक सौ से अधिक स्थलों में से बहुत कम स्थल सप्तसैंधव क्षेत्र में हैं। अधिकांश स्थल गंगा-यमुना दोआब में केंद्रित हैं। यद्यपि ऋग्वेद में ताम्र-काँस्य का उल्लेख मिलता है, किंतु उत्तरी भारत में ताम्रपुंजों के अवशेष भी गंगा-यमुना दोआब एवं उसके पूरब में ही केंद्रित हैं। ताम्रपुंजों के विभिन्न अस्त्रों से भी पता चलता है कि वे शिकार में प्रयुक्त किये जाते रहे होंगे।

अफगानिस्तान, पंजाब तथा उत्तरी राजस्थान से प्राप्त धूसर मृद्भांडों को तिथिक्रम की दृष्टि से ऋग्वैदिक काल के अंतिम चरण का माना जा सकता है। यदि इन पुरातात्विक संस्कृतियों को ऋग्वेदकालीन मान भी लिया जाये तो भी इनसे किसी स्थायी जीवन का संकेत नहीं मिलता। लालकिला (बुलंदशहर, उ.प्र.) तथा अतरंजीखेड़ा के कुछ अपवादों को छोड़कर गेरूवर्णी मृद्भांड के स्थलों से भी स्थायी जीवन के अवशेष नहीं मिले हैं।

दास एवं दस्यु

ऋग्वेद में आर्यों को ‘दास’ एवं ‘दस्युओं’ से संघर्ष का पर्याप्त वर्णन मिलता है। पाश्चात्य विद्वानों की धारणा रही है कि ये अनार्य जातियाँ इस भूभाग की आदिम निवासी थीं जिन्होंने आर्य भाषा-भाषियों कोघोर विरोध किया था। दास लोगों के बारे में कहा गया है कि वे न तो अग्नि में हविर्दान करते थे और न ही इंद्र-वरुण के पक्षपाती थे। संभव है कि ये लोग आर्यों के विभिन्न दलों के प्रतिनिधि रहे हों और कुछ सांस्कृतिक एवं सैद्धांतिक मतभेदों के कारण दास कहे गये हों।

ऋग्वेद के दो महत्त्वपूर्ण नायक दिवोदास एवं सुदास के नाम के अंत में भी ‘दास’ शब्द मिलता है और यदु, तुर्वश जैसी आर्य जातियों को भी एक स्थान पर ‘दास’ कहा गया है। शंबर, शुष्ण, तुग्र, वेतुस, अर्बुद जैसे दास नेताओं के नाम भी भाषाशास्त्रा की दृष्टि से अनार्य नहीं लगते।

ऋग्वेद में दासों की तुलना में दस्युओं को आर्यों का बड़ा शत्रा बताया गया है और दस्युओं को अदेवयुः (वैदिक देवताओं को न माननेवाला), अब्रह्मन् (श्रद्धा एवं धार्मिक विश्वास से रहित) एवं अयज्वन् (यज्ञ न करनेवाला) कहा गया है। इसी प्रकार ‘अनासः’ (चपटी नाकवाला) एवं मृद्धवाक् (कटु-वाणीवाले-पणियों के लिए) जैसे विशेषणों के आधार पर भी दस्युओं को आर्यों से भिन्न जाति एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का बताया गया है।

पुरातात्त्विक दृष्टि से इनका संबंध गैरिक मृद्भांड एवं लाल और काले मृद्भांडवाले लोगों से किया जा सकता है। आर्यों के मन में इनके प्रति इतनी घृणा थी कि एक स्थल पर इन्हें ‘अमानुष’ कहा गया है। इससे लगता है कि ‘दस्यु’ भारत की आदिम अनार्य जाति (मूलनिवासी) थे और इन मूल निवासियों ने आर्य जनों का कड़ा प्रतिरोध किया था। यद्यपि आर्य दस्युओं के विरुद्ध युद्ध में घोड़े चलित रथ, काँसे के अच्छे उपकरण, कवच (वर्म), पुरचष्णि (दुर्गों को गिरानेवाला) और संभवतः विशिष्ट प्रकार के धनुष-बाण का प्रयोग करते थे, किंतु अपनी बर्बरता और बड़े पैमाने पर अग्नि के प्रयोग से ही वे अंततः सफल हो सके। इसकी पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित विदेध माधव एवं अग्नि वैश्वानर की कथा से भी होती है।

भौतिक जीवन

ऋग्वेद के अध्ययन से लगता है कि ऋग्वैदिक आर्यों के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक जीवन में कबायली तत्त्वों की ही प्रधानता थी। पुरातात्विक प्रमाणों से स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक लोग संभवतः स्थायी जीवन व्यतीत नहीं कर रहे थे। इस समय युद्धों, आक्रमणों एवं जनसंहारों का बोलबाला था। ऋग्वेद में जातियों के आंतरिक एवं अंतर्जातीय युद्धों के अनेक उदाहरण बिखरे पड़े हैं। आर्यों के विभिन्न जन आपस में लड़ा करते थे। ऋग्वेद में दश राजाओं के एक प्रसिद्ध युद्ध का वर्णन है जो भरत जन के राजा सुदास तथा अन्य दस जनों के मध्य परुष्णी (रावी) नदी के तट पर हुआ था।

संभवतः दस राजाओं का यह युद्ध पश्चिमोत्तर प्रदेश में बसे हुए पूर्वकालीन जन तथा ब्रह्मवर्त के उत्तरकालीन आर्यों के बीच उत्तराधिकार के प्रश्न पर लड़ा गया था। भरत के विरोधी संघ में पाँच आर्य- पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्म और अनु (पंचजन) तथा पाँच अनार्य- अलिन, पक्थ, भलानस, विषाणिन और शिव कबीले सम्मिलित थे। इस दशराज्ञ युद्ध में भरतों के राजा सुदास को विजय मिली। प्रकीर्ण लेखों से पता चलता है कि इस युद्ध में दस नहीं, अपितु तीस से भी अधिक राजाओं ने भाग लिया था। इस सर्वव्यापी युद्धरतता से पता चलता है कि वे लोग कोई विशेष स्थायी जीवन-यापन नहीं करते थे।

ऋग्वैदिक लोगों के भौतिक जीवन में पशुपालन का विशेष महत्त्व था। ऋग्वेद में ‘गो’ शब्द का प्रयोग 174 बार आया है। युद्ध का प्रमुख कारण गायों की गवेषणा अर्थात् ‘गविष्टि’ था। इसी प्रकार गवेषण, गोय, गव्य, गम्य आदि सभी शब्द युद्ध के लिए प्रयुक्त होते थे। पशुओं के लिए युद्ध करना कबायली संगठनों की विशेषता मानी जाती है। ऋग्वेद में संपत्ति का मुख्य रूप गोधन था और वही दक्षिणा की वस्तु समझी जाती थी। मुद्रा के रूप में भी गाय का ही प्रयोग किया जाता था और वही विनिमय का मुख्य साधन थी। गाय की महत्ता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि समय की माप के लिए ‘गोधुल‘ और दूरी के लिए ‘गवयतु’ शब्द का प्रयोग किया जाता था और एक स्थान पर देवताओं को भी गाय से उत्पन्न हुआ बताया गया है। मंत्रों में बार-बार देवताओं की स्तुति करते हुए पशु-संपदा पाने की माँग की गई है। ‘रयि’ अर्थात् संपत्ति की गणना मुख्यतः मवेशियों से ही होती थी। एक व्यक्ति को ‘शतदाय’ कहा गया है क्योंकि उसके प्राण की कीमत सौ गाय थी। गायों के अतिरिक्त अवि (भेड़), अजा (बकरी), घोड़े का ऋग्वेद में अनेक बार उल्लेख हुआ है।

ऋग्वेद में पशुपालन की अपेक्षा कृषि गौण व्यवसाय था क्योंकि कृषि का उल्लेख मात्र 24 बार हुआ है और इसमें भी अधिकांश क्षेपक माने जाते हैं। ऋक्-संहिता के मूल भाग में कृषि के महत्त्व के मात्रा तीन शब्द मिलते हैं- ऊर्वर, धान्य एवं वपंति। परवर्ती काल के प्रथम मंडल से पता चलता है कि अश्विनकुमारों ने मनु को हल चलाना सिखाया था।

ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल में खेती की प्रक्रिया का वर्णन है। इसी प्रकार सिंचाई से संबंधित सभी उल्लेख भी परवर्ती काल के मंडलों में मिलते हैं जिसमें खनित्रिमा (खोदकर प्राप्त किया गया जल) और स्वयंजा (प्राकृतिक जल) दो प्रकार के सिंचाई का उल्लेख है। हंसिया (दात्र, सृणि), कोठार (स्थिति), गठ्टर (वर्ष), चलनी (तिउत), सूप (शूर्प), अनाज का ओसानेवाला (धान्यकृत) आदि शब्दों का उल्लेख भी परवर्ती काल के मंडलों में मिलता है। ऋग्वेद में एक ही अनाज ‘यव’ का कुल 15 बार उल्लेख हुआ है जिनमें से मात्र 3 ही मूल पाठ में मिलते हैं। ‘यव’ या तो विभिन्न प्रकार के अनाजों का सामान्य नाम था या फिर परवर्ती संहिताओं की तरह जौ का सूचक। ऋग्वेद में चावल का उल्लेख नहीं है और पुरातात्त्विक साक्ष्यों में केवल अतरंजीखेड़ा के तीसरे चरण से ही एक प्रकार के जौ एवं चावल के अवशेष मिले हैं जिनकी तिथि ई.पू. लगभग 1200 से 600 बताई गई है। इससे लगता है कि चावल वस्तुतः उत्तर वैदिक काल से संबंधित है।

ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था के आरंभिक चरणों में कृषि के गौण होने की पुष्टि देवकुल में देवियों के गौण स्थान से भी होती है। इंद्राणी, रोदसी, श्रद्धा, धृति आदि को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया गया है और अदिति एवं उषा जैसी महत्त्वपूर्ण देवियों का भी आदर से उल्लेख नहीं हुआ है। अनेक स्थलों पर इंद्र-उषा के द्वंद्व का वर्णन है जिसमें आर्यों एवं अनार्यों के संघर्ष की झलक देखी जा सकती है। वस्तुतः ऋग्वैदिक देवकुल में देवियों का गौण स्थान कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था पर आधारित लोगों की सैद्धांतिक मान्यताओं के विरुद्ध है। इस प्रकार स्पष्ट है कि अभी पशुचारण ही लोगों का प्रमुख व्यवसाय था। इस काल के अंतिम चरण में कृषि का आगमन हो चुका था, जो अनार्य लागों के संपर्क के कारण हुआ होगा। यही कारण है कि इसे विजित लोगों का व्यवसाय बताया गया है।

ऋग्वैदिक साहित्य में वस्त्र धुलनेवाले, वस्त्र बनानेवाले, लकड़ी एवं धातु का काम करनेवाले एवं बर्तन बनानेवाले शिल्पों के विकास का विवरण मिलता है। चर्मकार एवं कुम्हार का भी उल्लेख है। ऋग्वेद में हिरण्य एवं सुवर्ण शब्द का प्रयोग सोने के लिए किया गया है। ‘अयस’ शब्द का उपयोग ऋग्वेद में संभवतः करघा के लिए, ‘ओत’ एवं ‘तंतु’ शब्द का प्रयोग ताने-बाने के लिए एवं ‘शुध्यव’ शब्द का प्रयोग ऊन के लिए किया जाता था।

ऋग्वैदिक काल में स्त्रियाँ चटाई बुनने के लिए नद (नरकट) का प्रयोग करती थीं। ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं है। चमड़ा सिझानेवालों को ‘चर्मग्न’ कहा जाता था। ‘तक्षन्’ व ‘तष्ट’ शब्द का प्रयोग बढ़ई के अर्थ में किया गया है। आर्यों के सामाजिक जीवन में रथों का अधिक महत्व होने के कारण तक्षा की सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक बढ़ी हुई थी। साधारण गाड़ी को ‘अनस’ कहा जाता था।

ऋग्वेदकालीन व्यापार विनिमय प्रणाली पर आधारित था। इस प्रणाली में वस्तु-विनिमय के साथ-साथ गाय, घोड़े एवं स्वर्ण से भी क्रय-विक्रय किया जाता था। विनिमय के माध्यम के रूप में ‘निष्क’ का उल्लेख मिलता है। यह संभवतः प्रारंभ में हार जैसा कोई स्वर्णाभूषण था, जो कालांतर में सिक्के के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा।

ऋग्वैदिक काल में व्यापार करनेवाले व्यापारियों एवं व्यापार हेतु सदूरवर्ती प्रदेशों में भ्रमण करनेवाले को ‘पणि’ कहा जाता था। ऋग्वेद में एक स्थान पर देवताओं तथा पणियों के बीच संघर्ष तथा देवताओं द्वारा उनके संहार का वर्णन है। व्यापार थल एवं जल दोनों मार्गों से होता था। आंतरिक व्यापार प्रायः गाड़ियों, रथों एवं पशुओं के माध्यम से किया जाता था। आर्यों को समुद्र की जानकारी थी या नहीं, यह अस्पष्ट है। ऋग्वेद में सौ पतवारोंवाली नौका से यात्रा करने का वर्णन है। यही नहीं, एक स्थान पर तुग्र के पुत्र भुज्य की समुद्र-यात्रा का उल्लेख है जिसने मार्ग में जलयान के नष्ट हो जाने पर आत्मरक्षा के लिए अश्विनीकुमारों से प्रार्थना की थी। अश्विनी कुमारों ने उनकी रक्षा के लिए सौ पतवारोंवाला जहाज भेजा था।

सामाजिक जीवन

वैदिक साहित्य
आर्यों का सामाजिक जीवन

उत्तर-पूर्व से पशुचारी आर्य जनजातियों के भारतीय प्रायद्वीप में प्रवेश से अनेक सामाजिक और राजनीतिक समस्याएं उत्पन्न हुईं। आर्यों-अनार्यों के परस्पर क्रिया और प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ढा़ँचागत सामाजिक-व्यवस्था की शुरुआत हुई। आर्यों के साथ अनार्यों के संघर्ष और पराजय के बाद उन्हें अपनी सामाजिक व्यवस्था में घुला-मिला लेने के मिथकीय और भाषा-शास्त्रीय साक्ष्य मिलते हैं। प्रारंभ में विजेता आर्यों की एक ही जाति थी। आर्यों का पशुधन कबीले की सामुदायिक संपत्ति हुआ करती थी और निजी संपत्ति की परिघटना अभी विकसित नहीं हुई थी। परवर्ती कालीन वर्णव्यवस्था के चिन्ह ऋग्वेद में नहीं दिखाई देते हैं और निम्न वर्ण अर्थात् शूद्रों पर किसी प्रकार की अपात्राता नहीं थोपी गई थी।

ऋग्वेद में ही विभिन्न व्यवसायों में एक ही परिवार के लगे रहने के उल्लेख मिलते हैं। समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया था। कोई विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग नहीं था और राजन् भी संपूर्ण कबीले के अन्य लोगों के समान था। ऋग्वेद में जन्, विश्, गण, व्रात, सार्ध आदि जिन इकाइयों का उल्लेख है, वे सभी भाईचारावाले सिद्धांत पर आधारित थीं (यो वः सेनानीर्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो वभूव)।

इसका आशय यह नहीं है कि ऋग्वैदिक समाज समतावादी या वर्गविहीन समाज था। युद्ध के लूट का बड़ा भाग कबीले के मुखिया एवं उनके पुरोहितों को मिलता था क्योंकि वे कबीले के प्रतिनिधि माने जाते थे। परवर्ती वर्णभेदवाले समाज की तुलना में अंतर यह था कि अधिशेष उत्पादन के अभाव में कबायली समाज में वर्गभेद की परिस्थितियों का उदय नहीं हो सका था। ऋग्वेद में ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रयोग 15 बार और ‘क्षत्रिय’ शब्द का प्रयोग 9 बार हुआ है।

ऋग्वेद के अंतिम काल में वर्ण समाज की रूपरेखा तैयार होने लगी थी जब अलग-अलग जातियों को एक सामाजिक संगठन के अंदर लाने की साझा कोशिश के परिणामस्वरूप ब्रह्म, क्षत्र और विश स्थापित रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो गये।

परवर्ती काल के पुरुष-सूक्त (10.90) में पहली बार चतुर्वर्ण का उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया कि विराट-पुरुष के मुख से ब्राह्मण, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय, उसके उदर से वैश्य एवं उसके पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। यह मानना कि शूद्र वर्ण का निर्माण आर्य-पूर्व लोगों से हुआ था उतना ही एकांगी है, जितना कि यह समझना कि उस वर्ण में मुख्यतः आर्य ही थे। वस्तुतः आर्थिक एवं सामाजिक विषमताओं के कारण आर्य और आर्येतर, दोनों ही वर्गों में श्रमिक समुदाय का उदय हुआ और यही श्रमिक कालांतर में ‘शूद्र’ कहलाये।

पशुचारण की प्रधानता ने पितृत्मक सामाजिक संरचना के निर्माण में सहायता दी। कृषि-प्रधान समाजों में मातृत्व का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है, जबकि पशुचारण समाज में पुरुषों को अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त होता है। ऋग्वैदिक समाज पितृसत्तात्मक समाज था और पिता ही परिवार का मुखिया होता था। वरुणसूक्त के ‘शुनःशेष’ के आख्यान, ऋजाश्व की कथा एवं दिवालिये जुआरी के उल्लेखों से स्पष्ट है कि परिवार में पुरुष मुखिया का पूर्ण नियंत्रण रहता था।

ऋग्वेद में ‘कुल’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं है, परिवार के लिए ‘गृह’ शब्द प्रयुक्त किया गया है। कई परिवार (गृह) मिलकर ‘ग्राम’ तथा कई ग्राम मिलकर ‘विश’ कहलाते थे। कई विश मिलकर ‘जन’ कहलाते थे जो सबसे बड़ी इकाई थी। ऋग्वेद में कबायली एवं सामूहिक जीवन इंगित करनेवाले जन एवं विश शब्द का सैकड़ों बार प्रयोग हुआ है।

परिवार की परिकल्पना अत्यंत विशद् प्रतीत होती है जिसमें कई पीढ़ियों और संपूर्श्विक शाखएँ भी सम्मिलित थीं। नाना, दादी, नाती, पोते आदि के लिए ‘नप्तृ’ शब्द मिलता है जिससे लगता है कि सभी एक साथ रहते थे। पुत्र-प्राप्ति हेतु देवताओं से कामना की जाती थी और पुत्र को संपत्ति का अधिकारी माना जाता था।

ऋग्वेद में जायदस्तम अर्थात् ‘पत्नी ही गृह है’ कहकर नारी के महत्व को स्वीकार किया गया है। स्त्रियों को जनसभा एवं विदथ में अपनी बात कहने का अधिकार था। वे अपने पति के साथ यज्ञ-कार्यों में सम्मिलित होती एवं दान कर सकती थी। संभवतः स्त्रियाँ शिक्षा भी ग्रहण करती थीं और कन्याओं का उपनयन संस्कार किया जाता था। जीवनभर अविवाहित रहनेवाली लड़कियों को ‘अमाजू’ कहा जाता था। ऋग्वेद में लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, अपाला एवं विश्वारा जैसी विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। विधवा विवाह, अंतर्जातीय एवं पुनर्विवाह की सम्भावना का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

कन्या की विदाई के समय उपहार एवं द्रव्य दिये जाते थे, जिसे ‘वस्तु’ कहते थे। समाज में नियोग प्रथा, जिसके अंतर्गत पुत्रविहीन विधवा पुत्र-प्राप्ति हेतु अपने देवर से यौन-संबंध स्थापित कर सकती थी एवं बहुपतीत्व प्रथा का भी प्रचलन था। उदाहरणार्थ- मरुतों ने रोदसी को मिलकर भोगा था, सूर्या (सूर्य की पुत्री) अपने दो भाई अश्विन के साथ रहती थी। ऋग्वैदिक समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी होने के बावजूद उन्हें राजनीति में भाग लेने और संपूति संबंधी अधिकार प्राप्त नहीं था।

ऋग्वेदकालीन लोग अन्न में यव, धान्य, उड़द एवं मूंग आदि का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त फल, दूध, दही, घी एवं मांस अन्य भोज्य पदार्थ थे। पेय पदार्थ में सोमरस का पान करते थे। ऋग्वेद के नवें मंडल में सोम की स्तुति में कई सूक्त मिलते हैं। माँस में भेड़, बकरी एवं बैल का माँस खाया जाता था। गाय के वध के प्रमाण भी मिलते हैं। आर्य लोग संभवतः नमक एवं मछली का प्रयोग नहीं करते थे।

ऋग्वेदकलीन आर्य संभवतः तीन प्रकार के वस्त्र धारण करते थे- वासस् (शरीर पर धारण किया जानेवाला मुख्य वस्त्र), अधिवास एवं उष्णीय (पगड़ी)। इस काल के लोग क्षेम (अलसी का सूत), ऊन और मृग के चमड़े से निर्मित वस्त्र धारण करते थे। ऋग्वेद में ऊनी कपड़े को ‘सामूल्य’ एवं कढ़े हुए कपड़े को ‘पेशस’ कहा गया है।

स्त्री और पुरुष दोनों आभूषण धारण करते थे। आभूषणों में निष्क, कुरीर एवं कर्णशोभन का उल्लेख मिलता है। रथ दौड़, घुड़दौड़, द्यूतक्रीड़ा एवं आखेट आमोद-प्रमोद के मुख्य साधन थे। संभवतः जुए का भी प्रचलन था।

राजनीतिक व्यवस्था

पशुचारण अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि तथा युद्धों के सर्वव्यापी वातावरण में लोगों के स्थायी जीवन बिताने की संभावना नहीं थी। ऐसी स्थिति में किसी जटिल राजनीतिक संगठन के विकास की कोई संभावना भी नहीं थी। ऋग्वैदिक आर्य कबीले के रूप में संगठित थे जिसको ‘जन’ भी कहा जाता था। ऋग्वेद के अनुसार आर्यों के कई कबीलों में पाँच मुख्य थे- पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्म और अनु। इन्हीं पाँच कबीलों के कारण इन्हें पंचजन्य कहा गया है। जन काबीलाई संगठन था। कबीले या ‘जन’ के शासक को ‘राजन’ कहा जाता था। राजन् की पहचान उसके कबीले से की जाती थी, इसलिए ऋग्वैदिक काल का राजन् एक कबीलाई मुखिया से अधिक कुछ नहीं था। उसे ‘जनस्य गोपा’, ‘पुरचेत्ता’, गोपति व जनराजन् कहा गया है क्योंकि जन या कबीले की रक्षा करना, गो-संपदा प्रदान करना उसी का कर्तव्य था। गणपति, व्रातपः, विशपति आदि के उल्लेखों से स्पष्ट है कि वह कोई पैतृक शासक नहीं था, अपितु कबीले का ही सर्वेसर्वा था।

इस प्रकार ऋग्वेद में उल्लिखित राजन् को किसी भौगोलिक क्षेत्र पर स्थायी रूप से शासन करनेवाला राजा नहीं माना जा सकता है। राष्ट्र की क्षेत्रीय अवधारणा का धीरे-धीरे विकास हो रहा था क्योंकि ऋग्वेद के परवर्ती दशवें मंडल में राजा से राष्ट्र की रक्षा करने को कहा गया है। कालांतर में यही जन जनपदों के रूप में विकसित हुए।

प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘गृह’ था जिसका प्रमुख गृहपति कहलाता था। इसके ऊपर ‘ग्राम’ था जिसका शासन ग्रामणी देखता था। ग्राम से बड़ी प्रशासनिक इकाई ‘विश’ थी जिसका शासक विशपति कहलाता था। उसके ऊपर ‘जन’ होता था। ऋग्वेद में ‘विश’ का उल्लेख 170 बार हुआ है और ‘जन’ का उल्लेख 275 बार। शासन की सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र थी, किंतु यह प्रभुता-संपन्न राज्य का सूचक नहीं है।

कबीले के लोग स्वेच्छा से राजा को कर देते थे जिसे ‘बलि’ कहा जाता था। राजा कोई भी निर्णय कबीलाई संगठनों के परामर्श से लेता था। राजा की सहायता हेतु पुरोहित सेनानी, एवं ग्रामणी नामक अधिकारी थे।

भागदुध एक विशिष्ट अधिकारी था, जो राजा के अनुयायियों के मध्य बलि (भेंट) का समुचित बँटवारा एवं कर का निर्धारण करता था।

पुरोहित का पद प्रायः वंशानुगत होता था। सैन्य-संचालन व्रात, गण, ग्राम व सर्ध नामक कबीलाई टुकड़ियाँं करती थीं। लड़ाकू दल के प्रधान ग्रामणी कहलाते थे। सूतकार, रथकार तथा कम्मादि जैसे ‘रत्निन्’ नामक बारह पदाधिकारियों कोएक अन्य वर्ग था जो राजा के राज्याभिषेक के समय उपस्थित रहता था। दुर्गपति ‘पुरप’ कहलाते थे और जनता की गतिविधियों पर नजर रखनेवाले गुप्तचरों को ‘स्पश’ कहा जाता था। दूत नामक पदाधिकारी समय-समय पर संधि-विग्रह के प्रस्तावों को लेकर राजा के पास जाता था। ‘वाजपति’ गोचर भूमि का अधिकारी था तथा ‘कुलप’ परिवार का मुखिया होता था।

विदथ, सभा, समिति और गण

ऋग्वैदिक साहित्य में कुछ कबीलाई संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जैसे- विदथ, सभा, समिति तथा गण। विदथ आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था थी। ऋग्वेद में विदथ का उल्लेख 22 बार हुआ है। संभवतः विदथ आर्यों की ऐसी प्राचीनतम् संस्था थी जो युद्ध में लूटी गई वस्तुओं अथवा उपहार और समय-समय पर मिलनेवाली भेटों की सामग्रियों का वितरण करती थी। सभा का वर्णन ऋग्वेद के मूलभाग में मिलता है और इसकी चर्चा 8 बार की गई है। यह वृद्ध (श्रेष्ठ) एवं अभिजात (सम्भ्रांत) लोगों की संस्था प्रतीत होती है। वेदों में इसके सदस्यों को पितरः (पिता) कहकर सम्बोधित कहा गया है। संभवतः यह समिति नीति-निर्धारण एवं राजन् के कार्यों का मूल्यांकन भी करती थी।

ऋग्वेद में समिति का उल्लेख परवर्ती मंडलों में 9 बार हुआ है। यह साधारण जनप्रतिनिधियों की सभा थी। इस प्रकार विद्थ, सभा और समिति वैदिक राजतंत्र में सहायक के रूप में काम करती थीं।

ऋग्वैदिक राजन् कानूनी सलाहकारों तथा पुरोहित की सहायता से न्याय करता था। चोरी, डकैती, राहजनी आदि अनेक अपराधों का उल्लेख मिलता है। इसमें पशुओं की चोरी सबसे अधिक होती थी जिसे पणि लोग करते थे। इनके अधिकांश युद्ध गाय को लेकर हुए हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गाविष्ठ (गाय का अन्वेषण) है। मृत्यदंड की प्रथा नहीं थी। अपराधियों को शरीर-दंड तथा जुर्माने की सजा दी जाती थी। वेरदेय (बदला चुकाने की प्रथा) का प्रचलन था। इस काल में ऋण देकर ब्याज लेनेवाले वर्ग को ‘बेकनाट’ (सूदखोर) कहा जाता था। सूद का भुगतान वस्तु के रूप में किया जाता था। दिवालिये को ऋणदाता का दास बनाया जाता था।

ऋत् की अवधारणा

ऋग्वेद में एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा ‘ऋत्’ की मिलती है जिसकी व्याख्या सृष्टि की नियमितता, भौतिक एवं नैतिक व्यवस्था, आंतरिक्षीय एवं नैतिक व्यवस्था आदि रूपों में की गई है। ऋक्-संहिता में 24 ऐसे श्लोक हैं जिनमें कहा गया है कि ऋत् के द्वारा लोगों को गायें, जल, उनका भोजन, उनकी भौतिक समृद्धि तथा जीवन के अन्य साधन प्राप्त होते हैं। वरुण को ऋत् का संरक्षक कहा गया है। उसके आदेशों के उल्लंघन पर उसके द्वारा दंडित किये जाने का वर्णन मिलता है। संभवतः ऋग्वेद में प्राप्त ऋत् की अवधारणा तत्कालीन प्राक्वर्गीय समाज और कबायली जीवन के अनुरूप थी और संपत्ति की सामूहिकता के द्वारा ही न्याय और ऋत् की स्थापना होती थी। कालांतर में जब समाज वर्गों और वर्णों में विभाजित होने लगा तथा लोगों में ईर्ष्या, लालच और स्वार्थ की भावना पनपने लगी तो ऋत् का हृस होने लगा। यही कारण है कि ऋग्वेद के मंत्र-द्रष्टाओं ने ऋत् के हृस पर आँसू बहाये हैं और उसके पुनरुत्थान की कामनाएँ की हैं। उत्तर वैदिक काल में ऋत् का पूर्णरूप से लोप हो गया और इसलिए वरुण की महत्ता का भी पतन हो गया।

ऋग्वेदकालीन धर्म एवं धार्मिक विश्वास

ऋग्वेदकालीन धार्मिक जीवन तथा उस समय की सैद्धांतिक मान्यताएँ तत्कालीन भौतिक जीवन से प्रभावित थीं। ऋग्वैदिक पशुचारी आर्य प्राकृतिक शक्तियों से अत्यधिक प्रभावित थे। संभवतः यही कारण है कि जहाँ ऋग्वैदिक देवकुल में अनेक देवताओं को स्थान मिला है, वहीं ये सभी देवता प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक भी हैं। इस काल में बहुदेववाद का दर्शन होता है जिसमें प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया गया है।

ऋग्वेद में उल्लिखित देवी-देवताओं को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- इंद्र, मरुत, रुद्र, वायु, पर्जन्य, मातरिश्वन्, अज एकपाद, आप, अहिर्बुध्न्य आदि आंतरिक्ष के देव थे।

आकाश के देवताओं में सूर्य, द्यौस, वरुण, मित्र, पूषन्, विष्णु, उषा, अपांनपात, सविता, विंवस्वत्, आदित्य, अश्विनद्वय आदि को रखा जा सकता है।

अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति तथा नदियाँ आदि पृथ्वी स्थानीय देव थे। इसके अतिरिक्त श्रद्धा, मन्यु, धातृ, विधातृ आदि अमूर्त भावनाओं को भी देवरूप माना गया है।

इस काल के अधिकांश देवताओं का स्वरूप महिमामंडित मानवों का है, किंतु कुछ देवताओं की पशु के रुप में आराधना की जाती थी। इंद्र की कल्पना वृषभ (बैल) के रूप में एवं सूर्य की अश्व के रूप में की गई है। इंद्र की गाय खोजनेवाला सरमा (कुत्तिया) स्वान के रूप में है। अज एकपाद और अहितर्बुध्न्य दोनों देवताओं की परिकल्पना पशु के रूप में की गई है। मरुतों की माता की परिकल्पना चितकबरी गाय के रूप में की गई है।

ऋग्वेद में इंद्र का उल्लेख सर्वाधिक प्रतापी देवता के रूप में मिलता है। ऋग्वेद के लगभग 250 सूक्तों में इंद्र का वर्णन है तथा 50 ऐसे सूक्त हैं जिनमें दूसरे देवताओं के साथ उसका वर्णन है। इंद्र की महत्ता का प्रमुख कारण देवताओं को विजयी बनाना था। अनेक किलों को नष्ट करने के कारण उसे ‘पुरंदर’ कहा गया है। उसे समस्त संसार का स्वामी बताया गया है। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इंद्र झंझावात का देवता है, जो बादलों में गर्जन एवं बिजली की चमक उत्पन्न करता है। ओल्डेनवर्ग एवं हिलब्रैंट के अनुसार पार्थिव पर्वतों से जल की मुक्ति इंद्र द्वारा हुई है। इंद्र वर्षा का देवता था। इंद्र वृत्तासुर को मारकर जल को मुक्त करते हैं, इसीलिए उन्हे ‘वृत्राहन्’ और ‘पुर्मिद’ कहा गया है।

अधिकांश वैदिक विद्वानों का मत है कि वृत्र सूखा (अनावृष्टि) का दानव है। इंद्र अपने वज्र-प्रहार से वृत्रासुर का वध कर जल को मुक्त करता है जिससे पृथ्वी पर वर्षा होती है। उसका एक विशेषण अंसुजीत (पानी को जीतनेवाला) भी है। वह कुशल रथ-योद्धा (रथेष्ठ), महान् विजेता (विजेंद्र) और सोम का पान करनेवाला (सोमपा) है। लगता है कि इंद्र के युद्ध-कौशल के कारण आर्यों ने दानवों से युद्ध करने के लिए इंद्र को अपना सैनिक नेता मान लिया था। इस प्रकार ऋग्वैदिक इंद्र उनकी सैनिक-विजय एवं साम्राज्यवादी विचारों का प्रतीक है।

ऋग्वेद का दूसरा महत्त्वपूर्ण देवता अग्नि है, जो मनुष्य और देवता के मध्य मध्यस्थ की भूमिका निभाता था। ऋग्वेद में अग्नि के 200 सूक्त प्राप्त होते हैं। अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है। ऋग्वेद के अनुसार अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुण-संपन्न वीर पुरुष पर करता है।

ऋग्वेदकालीन देवताओं में तीसरा स्थान वरुण का है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व का नियामक और शासक, सत्य का प्रतीक, ऋतु-परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता-धर्ता, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता बताया गया है। ऋत का संरक्षक होने के कारण इन्हें ‘ऋतस्यगोपा’ भी कहा गया है। इनकी स्तुति लगभग 30 सूक्तों में की गई है। ऋग्वेद का सातवाँ मंडल वरुण देवता को ही समर्पित है। ईरान में इन्हें अहुरमज्दा तथा यूनान में यूरेनस के नाम से जाना जाता है।

ऋग्वेद के नवें मंडल के सभी 144 सूक्त सोम देवता को समर्पित हैं। सोम देवताओं का प्रमुख पेय था। यह वनस्पतियों का देवता था। इसकी तुलना ईरान के होम तथा यूनान के डिआनासिस से की जा सकती है।

आकाश के देवताओं में सूर्य प्रमुख था जिसकी स्तुति पूरे दस सूक्तों में की गई है। उसे सर्वदर्शी व ‘स्पश’ कहा गया है, सविता उन्हीं का एक रूप है।

कल्याणकारी और विपत्ति-विनाशक अश्विनकुमार (अश्विनद्वय) देवताओं के चिकित्सक थे। इन्हें ‘नासत्य’ भी कहा गया है। इंद्र, अग्नि और सोम के बाद सर्वाधिक सूक्त इन्हीं को समर्पित हैं।

ऋग्वेद में पशुओं के देवता पूषन्, शपथ एवं प्रतिज्ञा के देवता मित्र, विश्व के संरक्षक और पालनकर्ता विष्णु, रुद्र, देवताओं का जनक विवस्तान्, अदिति, विश्वदेव, आर्यमन् आदि कुछ अन्य देवताओं का भी उल्लेख मिलता है। ऋग्वैदिक कालीन देवों में सबसे प्राचीन द्यौ (आकाश) थे।

ऋग्वैदिक साहित्य में वर्णित पशुचारी पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष देवों की प्रधानता और देवियों का अपेक्षाकृत गौण स्थान होना स्वाभाविक था। ऋक् संहिताओं में प्रथम उल्लेख वनदेवी अरण्यानी का मिलता है। सिंधु नदी को नदियों की माता ‘नदीतमा’ कहा गया है। अन्य ऋग्वैदिक देवियों में प्रगति एवं उत्थान की देवी ऊषा, अदिति, सूर्या, वाक्, इला, सरस्वती, मही, पुरंधि, धिषणा, निशा, इंद्राणी, कुहू आदि का उल्लेख मिलता है, किंतु इनकी स्थिति गौण थी और इन्हें विशेष सम्मान प्राप्त नहीं था।

ऋग्वेद में भूत-प्रेतों, राक्षसों, अर्ध-देवताओं, अप्सराओं, पिशाचों आदि का भी उल्लेख मिलता है जिससे तत्कालीन धार्मिक जीवन में कबायली अवस्था की पुष्टि होती है। कृत्या (दुष्ट स्त्री), निद्धति (अधर्म की स्त्री या दरिद्रादेवी), यातुधान (राक्षस), ससरपरी (उड़नेवाली परियाँ) इसी प्रकार की अपकारक शक्तियाँ थीं।

अज, शिग्रु, काश्यप, गोतम, कौशिक, माडूक्य, मत्स्य आदि जाति एवं व्यक्तियों के नामों से गण-चिन्हात्मक आस्थाओं के प्रचलन की पुष्टि होती है।

कहीं-कहीं इंद्र की मूर्ति को शत्रुओं से रक्षा करनेवाली बताया गया है, इससे लगता है कि गंडा-ताबीज में विश्वास किया जाने लगा था। यही नहीं, एक स्थान पर स्वयं प्रजापति की कल्पना कूर्म के रूप में की गई है।

ऋग्वेद के कुछ स्थानों पर, विशेषकर परवर्ती काल के मंडलों में विभिन्न देवताओं को सर्वोच्च मानकर उनमें संपूर्ण गुणों का आरोपण किया गया है। मैक्समूलर ने आर्यों की इस प्रवृति के ‘हीनाथीज्म’ कहा है। परवर्ती काल के प्रसिद्ध पुरुषसूक्त के विराट पुरुष में पहली बार अद्वैतवाद की अनुभूति होती है। ऋग्वेद के परवर्ती नारदीय सूक्त में निर्गुण ब्रह्म का वर्णन मिलता है। इसी चरण में एकेश्वरवाद के चिन्ह भी दृष्टिगोचर होते हैं। पहले सभी देवताओं को बारी-बारी से सर्वोच्च स्थान दिया गया, फिर इंद्र-वरुण, वरुण-मित्र, इंद्र-मित्र, वरुण-अग्नि, द्यावा-पृथ्वी, उषा-रात्रि जैसे युगल देवता अस्तित्व में आये। ऋग्वेद के 9 सूक्तों में इंद्र एवं वरुण का संयुक्त उल्लेख है। इसके बाद कहा गया कि ‘महद्देवानामसुरत्वेकम्’ तथा ‘एकं सत् विप्राः बहुधा वदंति’ अर्थात् ‘सत् एक है, ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।’ इस एकेश्वरवाद के पीछे संभवतः कबायली जीवन में आनेवाले परिवर्तन थे क्योंकि छोटे-छोटे जन (कबीले) अब बड़ी-बड़ी इकाइयों में विलीन होकर जनपद बनते जा रहे थे।

ऋग्वैदिक धर्म पूर्णतः प्रवृत्तिमार्गी है। देवी-देवताओं की स्तुतियों का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति था, न कि पारमार्थिक सुख। ऋत के मार्ग को श्रेष्ठ बताया गया है (सुगाऋतस्य पंथाः)। ऋक्-संहिता की तमाम प्रार्थनाओं में दीर्घायु, रोगों से मुक्ति, वीर संतति, पशुओं की प्राप्ति और शत्राओं पर विजय की कामना की गई है। इससे लगता है कि ऋग्वैदिक आर्य भौतिक जीवन के प्रति उदासीन नहीं थे।

इस प्र्रकार ऋग्वैदिक धर्म की जड़ें आदिम हिंद-ईरानी धर्म और उससे भी प्राचीन आदिम हिंद-यूरोपीय धर्म तक पहुँचती हैं, जिनके कारण मित्र, वरुण, बृहस्पति (द्यौस-पितृ), वायु-वात, सरस्वती जैसे अनेक वैदिक देवी-देवता यूरोप, मध्य एशिया और ईरान के प्राचीन धर्मों में भी किसी-न-किसी रूप में मान्य थे। इसी प्रकार सोम (फारसी में होम), यज्ञ (फारसी में ‘यस्न’) जैसे बहुत से धार्मिक शब्दों के सजातीय शब्द पारसी धर्म और प्राचीन यूरोपीय धर्मों में भी पाये जाते हैं। इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य जैसे कुछ देवताओं का उल्लेख ई.पू. 1400 के बोगजकोई अभिलेख में भी मिलता है।