सिंधुघाटी की सभ्यता : कला-स्थापत्य एवं धार्मिक जीवन (Indus Valley Civilization: Art-Architecture and Religious Life)

सैंधव सभ्यता में कला के विभिन्न रूपों का भी सम्यक् विकास हुआ था। हड़प्पाई कला के विविध पक्षों का विकसित रूप इस सभ्यता के विभिन्न स्थलों से पाये गये नगरों, भवनों के अलावा मूर्तियों, मुहरों, मनकों, मृद्भांडों आदि के निर्माण एवं उन पर उत्कीर्ण चित्रों में परिलक्षित होता है। सौन्दर्य और तकनीक की दृष्टि से हड़प्पाई कला का भारतीय कला के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

वास्तु (स्थापत्य) कला (Architectural art)

सैंधव सभ्यता के नगर नियोजन में वास्तुकला का उत्कृष्ट रूप दिखाई देता है। इस सभ्यता के लोग महान् निर्माता थे। उनके स्थापत्य-कौशल का प्रमाण उनकी विकसित नगर योजना से संबंधित नगर-निवेश, सार्वजनिक तथा निजी भवन, सुरक्षा-प्राचीर, सार्वजनिक स्नानागार, सुनियोजित मार्ग व्यवस्था तथा सुंदर नालियों के प्रावधान में परिलक्षित होता है। इस सभ्यता जैसा उच्चकोटि का ‘वसति विन्यास’ समकालीन किसी भी अन्य सभ्यता में नहीं मिलता है। हड़प्पा सभ्यता की नगर बस्तियाँ चार विभिन्न इकाइयों में विभक्त थीं, जैसे- केंद्रीय राजधानी, प्रांतीय राजधानियाँ, व्यावसायिक नगर और दुर्गरक्षित बस्तियाँ। नगर निश्चित योजनानुसार बसाये गये हैं जो ‘ग्रिड पद्धति’ पर आधारित हैं। सैंधव नगर दो इकाइयों में स्पष्ट रूप से से विभाजित थे- पश्चिमी दिशा में दुर्ग और पूरब दिशा में मुख्य नगर। ऐसे प्रमाण हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धौलावीरा आदि स्थलों से मिले हैं। किंतु लोथल तथा सुरकोटदा में पूरी बस्ती एक ही रक्षा-प्राचीर से घिरी थी। गुजरात के धौलावीरा में तीन इकाइयों में विभाजित नगर का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

सुरक्षा-प्राचीर

Indus Valley Civilization
सैंधव सभ्यता के नगर नियोजन

दुर्ग क्षेत्र की प्रमुख विशेषता है- सुरक्षा-प्राचीर, जिनका निर्माण इंग्लिश बांड शैली में हुआ है। इन सुरक्षा प्राचीरों का भारतीय नगर योजना के इतिहास में विशेष महत्त्व है क्योंकि इन्हें नगर प्राचीर का प्राचीनतम् रूप माना जा सकता है।

सैंधव सभ्यता के नगर नियोजन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष भवन निर्माण कला है। भवनों का निर्माण सुंदर पकी ईंटों की चिनाई करके किया गया है। दीवारों की चिनाई में पहले ईंटों को लंबाई के आधार पर और पुनः चौड़ाई के आधार पर जोड़ा गया है जो इंग्लिश बांड शैली से मिलती-जुलती है। संपन्न लोगों के घरों में शौचालय भी थे। कहीं-कहीं खिड़कियों के भी निशान मिलते है।

सैंधव नगरों में सड़कों का जाल-सा बिछा था जो नगरों को आयताकार खंडों में विभाजित करती थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मोहनजोदड़ो की उत्तर से दक्षिण जानेवाली मुख्य सड़क को ‘राजपथ’ कहा गया है। मुख्य सड़कें लगभग तीस फीट और गलियाँ पाँच से दस फीट तक चैड़ी होती थीं। संभवतः सड़कों की स्वच्छता के लिए सड़कों के किनारे कूड़ा रखने के लिए गड्ढे बने थे अथवा कूड़ेदान रखे रहते थे। मोहनजोदड़ो में जगह-जगह सड़कों के किनारे चबूतरे पाये गये हैं जो दुकानदारों के उपयोग के लिए थे।

अपवाह प्रणाली की दृष्टि से यह सभ्यता अपने समकालीन सभी सभ्यताओं से श्रेष्ठ थी। सभी नगरों में नालियों का निर्माण सुंदर पकी ईंटों से किया गया है जो नगरीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ईंटों की जुड़ाई जिप्सम से की गई है। नालियाँ प्रायः 30 से.मी. तक गहरी और 20-30 से.मी. चौड़ी होती थीं। नालियाँ ढकी हुई होती थीं जिनमें स्थान-स्थन पर नरमोखे (मेनहोल) होते थे। अनेक नालियाँ एक-दूसरे से जुड़ी होती थीं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो की कुछ नालियाँ सोख्ता-गड्ढ़ों में गिरती थीं। नालियों में कहीं-कहीं दंतक मेहराब भी पाये गये हैं। प्रत्येक घर की नाली सड़क की मुख्य नाली से मिली रहती थी। वस्तुतः नालियों की ऐसी सुंदर व्यवस्था तत्कालीन विश्व की किसी अन्य सभ्यता में नहीं मिलती है।

इसके अलावा सार्वजनिक एवं निजी भवन, भवनों में शौचालय एवं स्नानगृह की व्यवस्था, सार्वजनिक स्नानागार (महाजलकुंड), विशाल अन्नागार, कपड़े बदलने के कमरे, पकी ईंटों की सीढि़याँ, सभा भवन या सामूहिक बाजार हड़प्पाई स्थापत्य कला के विकसित तकनीक का द्योतक हैं।

मूर्तियाँ एवं मुहरें

The Main Elements of the Indus Valley Civilization
मोहनजोदड़ो के पुजारी की मूर्ति

हड़प्पाई नगरों के उत्खनन में पत्थर, धातु एवं मिट्टी की असंख्य मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जो कला की दृष्टि से उच्चकोटि की हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग एक दर्जन मूर्तियों में से पाँच गढ़ीवाले टीले के एच.आर.क्षेत्र से मिली हैं, जिनमें अधिकांशतः खंडित और अपेक्षाकृत छोटी हैं। इनमें सबसे विशिष्ट सेलखड़ी निर्मित 19 से.मी. की खंडित पुरुष मूर्ति है जिसका सिर से वक्षस्थल तक का भाग अवशेष है। मूँछविहीन इस मूर्ति में दाढ़ी बनाने के लिए पत्थर से लकीर खींचा गया है और बाल पीछे की ओर फीते से बाँधा गया है। मस्तक पर गोल अलंकरण है और बाँया कंधा तिपतिया अलंकरण के शाल से ढका है। इसकी आँखे अर्धनिमीलित और दृष्टि नासाग्र पर टिकी है। मैके ने इसको पुजारी की मूर्ति बताया है, जबकि ए.एल. बाशम के अनुसार यह प्रस्तर मूर्ति किसी मंगोल जाति के व्यक्ति का रूपांकन है।

मोहनजोदड़ो से ही श्वेत पत्थर का लगभग सात इंच (17.8 से.मी.) का एक दाढ़ीयुक्त पुरुष का सिर मिला है जिसकी मूँछें नहीं हैं। बालों का जूड़ा पीछे की ओर बँधा है और आँखों में पच्चीदार पुतली है, किंतु यह पहली मूर्ति जैसी कलात्मक नहीं है। इसी प्रकार सामान्य ढ़ंग से बनाई गई ग्यारह इंच (29.5 से.मी.) की एक अलबेस्टर की मूर्ति का अधोभाग प्राप्त हुआ है जो पारदर्शी वस्त्र पहने हुए है तथा बाँये कंधे पर उत्तरीय ओढ़े हुए है। इसके पीठ पर गूँथे हुए बालों का जूड़ा है। हड़प्पा से दो खंडित प्रस्तर-मूर्तियाँ मिली हैं जिसमें एक लाल बलुआ पत्थर से बना किसी नवयुवक का धड़ है। दूसरा चूने पत्थर की मूर्ति किसी नृत्य-मुद्रा की आकृति है। इसके अंगों का विन्यास कला के विकास की दृष्टि से रोचक है। मार्शल के अनुसार इस मूर्ति के तीन सिर रहे होंगे और इसे ‘नटराज शिव’ का पूर्वरूप माना जा सकता है, किंतु मूर्ति के क्षीण कटि, गुरु नितंब और अन्य नारी-सुलभ अंगों से लगता है कि यह किसी नवयुवती की मूर्ति है। इस प्रकार स्पष्ट है कि हड़प्पाई शिल्पी उच्चकोटि की स्वाभाविक प्रतिमाओं का निर्माण कर सकते थे।

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मोहनजोदड़ो का एक दाढ़ीयुक्त पुरुष का सिर

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल, कालीबंगा आदि स्थलों से काँसे और ताँबे की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं। मोहनजोदड़ो के एच.आर. क्षेत्र से प्राप्त एक नृत्यांगना की काँस्य मूर्ति कलात्मक दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। 4.5 इंच (12 से.मी.) लंबी इस निर्वस्त्र मूर्ति के पैरों का निचला भाग टूटा हुआ है, बाँईं भुजा चूडि़यों से भरा है और हाथ में एक पात्र है। गले में कंठहार है जिसकी तीन लडि़याँ नीचे स्तन को स्पर्श कर रही हैं। दाहिनी भुजा कटि पर अवलंबित है जिसमें अपेक्षाकृत कम चूडि़याँ हैं। इसके बाल घुघराले हैं जिसमें पीछे की ओर जूड़ा बँधा है। आँखें बड़ी, किंतु अर्धनिमीलित हैं। इसकी भाव-भंगिमा और क्षीण-कटि की मुद्रा से लगता है कि यह किसी नृत्यकला में अभ्यस्त नर्तकी की मूर्ति है। जान मार्शल ने इसे आदिवासी युवती के रूपांकन का प्रयास बताया है। स्टुअर्ट पिग्गट ने इसकी तुलना कुल्ली (बलूचिस्तान) से प्राप्त मिट्टी की नारी आकृति से किया है। इस काँस्य मूर्ति की कलात्मक सुगढ़ता समस्त प्राचीन कलात्मक जगत् में अनूठी एवं अतुलनीय है। इसके अलावा मोहनजोदड़ो से काँसे का भैंसा और भेड़ा की मूर्ति, चांहूदड़ो से इक्कागाड़ी, कालीबंगा से ताम्र-वृषभ, लोथल से ताम्रनिर्मित पक्षी, बैल, खरगोश तथा कुत्ते की मूर्तियाँ मिली हैं जो कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं और हड़प्पाई कलाकारों की तकनीकी ज्ञान के वैशिष्ट्य का प्रमाण हैं।

हड़प्पा सभ्यता की शिल्प-आकृतियों में मानव, पशु-पक्षी एवं खिलौनों की मृंडमूर्तियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं जो काँचली मिट्टी व क्वाटर्ज पत्थर के घिसे मिश्रण से बनाई गई हैं। मानव मृंडमूर्तियाँ ठोस हैं, जबकि अन्य खोखली हैं। कुछ पुरुष आकृतियाँ बैठी हैं, तो कुछ खड़ी हैं। चांहूदड़ो और मोहनजोदड़ो की कुछ मृण्डमयी पुरुष आकृतियों के गले में एक धागा-सा अंकित है जो संभवतः जनेऊ की भाँति धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। मोहजोदड़ो के एच.आर. क्षेत्र से प्राप्त पुरुषमूर्ति आभूषणयुक्त है, जिससे ज्ञात होता है कि स्त्रियों की तरह पुरुष भी आभूषणों का प्रयोग करते थे। कालीबंगा से प्राप्त मिट्टी का मानव सिर भी महत्त्वपूर्ण है जिसका माथा पीछे की ओर ढलुआ, सीधी नुकीली नाक, नीचे का होंठ कुछ मोटा तथा आँखें बादाम के आकर की बनी हैं। इसी प्रकार लोथल से दो पुरुष आकृतियाँ मिली हैं जिसमें एक की दाढ़ी वर्गाकार कटी है तथा नाक तीखी है। एस.आर. राव के अनुसार यह सुमेरी पाषाण-मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती है।

 

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मोहनजोदड़ो के एच.आर. क्षेत्र से प्राप्त नृत्यांगना की काँस्य मूर्ति

चांहूदड़ो की अधिकांश नारी आकृतियाँ पगड़ी पहनी हैं जिनके गले में कंठाहार है, हार के दोनों ओर उभरे हुए स्तन हैं। पेट उभरे हुए हैं जो संभवतः गर्भवती होने के संकेत हैं। कामस्थान का त्रिकोण भाग उभारा गया है, किंतु नग्नता नहीं है। कभी-कभी नारी-आकृतियों के कटि-प्रदेश के पास एक बच्चा भी दर्शाया गया है जिससे उसका मातृत्व सूचित होता है। मृंडमूर्तियाँ अधिकतर निर्वस्त्र हैं, किंतु कुछ के अधोभाग पर लहंगा जैसा वस्त्रा है। समस्त नारी-मूर्तियों की शैली में एकरूपता तथा अलंकरण का सादृश्य परिलक्षित होता है। संभवतः इनका निर्माण धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर किया गया था जो मातृदेवी के रूप में लोकप्रिय था।नारी-मृंडमूर्तियाँ पुरुष मूर्तियों की अपेक्षा अधिक प्रभावोत्पादक हैं। आभूषणों से सुसज्जित नारी-मूर्तियों की आँखों एवं मुँह का निर्माण चीरा पद्धति से किया गया है। स्तनों और कभी-कभी आँखों को बनाने के लिए मिट्टी के गोल टुकड़ों को चिपकाया गया है। अधिकांश नारी मूर्तियों में मस्तक पर पंखेे के समान फैला हुआ आभरण, कानों में गोलाकार कुंडल, बाँहों में भुजबंद, गले में कंठा, छाती पर कई लडि़योंवाला हार, कमर में करधनी आदि प्रदर्शित किये गये हैं। पंखे के समान फैले हुए इस आभरण की तुलना ऋग्वेद के ओपेश से की गई है।

मानव-मृंडमूर्तियों की तरह पशु-पक्षियों की आकृतियाँ भी आकर्षक और कलात्मक हैं। मृंडमयी पशु-पक्षियों में बैल ;वृषभद्ध, भैंसा, बंदर, भेंड़ा, बकरा, कुत्ता, हाथी, गैंडा, भालू, सुअर, खरगोश, गिलहरी, साँप, कौआ, मुर्गा, कबूतर आदि की आकृतियाँ मिली हैं। सर्वाधिक संख्या वृषभ की है। अधिकांश मृंडमूर्तियाँ चिकनी मिट्टी से बनी हैं जिन पर लाल पालिश का लेप है। कुछ पशु-आकृतियाँ सेलखड़ी, सीप तथा हड्डी से भी बनी हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक छोटी सींगवाले छोटे वृषभ की आकृति कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उसका शरीर मांसल तथा भाव-भंगिमा आकर्षक है जो शिल्पकार के कला-चातुर्य का द्योतक है। मार्शल के अनुसार इसके निर्माता में महान् कलाकार होने की पूरी संभावना थी। इसकी तुलना किसी भी काल के उत्तम उदाहरणों से की जा सकती है। हड़प्पा से प्राप्त शंख में बने एक बैल के गले में माला पड़ी है। चांहूदड़ो से एक मिट्टी के हाथी की आकृति मिली है जिसे किसी विशेष अवसर के लिए सजाया गया था। बनावली से प्राप्त हल की आकृति भी महत्त्वपूर्ण है।

सैंधव सभ्यता की कला का सर्वोत्तम स्वरूप मोहनजोदड़ो, हड़प्पा तथा चांहूूूदड़ो से प्राप्त मुहरों (ताबीजों) एवं मुद्राओं पर अंकित मिलता है। मुद्राएँ प्रायः सेलखड़ी तथा चीनी मिट्टी से बनी हैं, किंतु लोथल तथा देशालपुर से ताम्र-मुद्राएँ भी पाई गई हैं। मुद्राएँ वर्गाकार, आयताकार, बेलनाकार, चतुर्भुजाकार, बटन जैसी एवं गोलाकर मिली हैं। सेलखड़ी की वर्गाकार मुद्राएँ अधिक लोकप्रिय थीं। इन मुद्राओं पर वृषभ, हाथी, गैंडा, बाघ आदि पशुओं का अंकन एवं मुद्रालेख मिलता है। जिनपर पशु तथा लेख अंकित हैं, वे मुद्रा और ताबीज दोनों का काम करती थीं, किंतु जिन पर केवल पशु अंकित हैं, वे केवल ताबीज के रूप में प्रयुक्त होती थीं। लोथल और कालीबंगा से प्राप्त मुद्राओं पर एक ओर सैंधव लिपियुक्त मुहर की छाप तथा दूसरी ओर भेजे जानेवाली वस्तु का निशान अंकित है। इससे स्पष्ट है कि ये मुद्राएँ ही थीं जिनके ठप्पे (छापे) सामानों, पार्सलों आदि को बंद करने के लिए प्रयुक्त किये जाते थे।

मुहरों पर अंकित कुछ विशिष्ट दृश्यों के अंकन भी कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। एक मुहर पर तीन सिरोंवाले पशु का अंकन है जिसका एक सिर हिरण का, मुख्य शरीर एकश्रृंगी पशु का और तीसरा सिर भेड़े का है। इसे संश्लिष्ट पशु की संज्ञा दी गई है। मैके को एक ऐसी मुद्रा मिली है जिस पर संभवतः भगवान् त्रिनयनशिव का अंकन है। इस पर छः अक्षरों का लेख है। योगी तथा पशुपति के रूप में रुद्रशिव कई मुद्राओं पर अंकित हैं। इन मुद्राओं तथा ताबीजों का कलात्मक रूपायन अद्वितीय है। प्राचीन कला के क्षेत्र में इन मुहरों के सदृश कुछ भी नहीं है। कुछ मुद्राओं पर स्वास्तिक का भी अंकन मिलता है।

सैंधव मृद्भांड और उन पर उत्कीर्ण चित्र कला और उपादेयता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। मृद्भांड मुख्यतः लाल तथा गुलाबी रंग के हैं जिनके ऊपर लाल रंग की चमकदार पाॅलिश लगाई गई है। विशेष श्रेणी के बर्तनों पर लाल या पीले रंग की पालिश की जाती थी। मृद्भांड प्रायः चाक पर बनाये गये है, किंतु हस्तनिर्मित नमूने भी मिले हैं। चांहूदड़ो से प्राप्त मृद्भांड पर कूचियों द्वारा रंगे हुए कलात्मक चित्र आकर्षक हैं। मृद्भांडों पर वृषभ, हिरण, बारहसिंगा, मोर, सारस, बत्तख, मछली आदि पशु-पक्षियों की आकृतियों के अलावा त्रिभुज, वृत्त, वर्ग आदि ज्यामितीय अलंकरण भी मिलते हैं। हड़प्पा से प्राप्त कुछ मृद्भांडों पर उड़ते हुए कबूतर आकर्षक हैं जिनके बीच में तारे बने हैं तथा उनके पीठ पर अर्द्धमानव एवं पशु-आकृतियाँ अंकित हैं।

सिंधु सभ्यता के लोग विभिन्न प्रकार के आभूषणों के निर्माण में भी दक्ष थे। आभूषणों कोएक बड़ा निधान हड़प्पा से और चार मोहनजादड़ो से मिले हैं। हड़प्पा के निधान में भुजबंद तथा सोने और मनके के हारों के लगभग पांच सौ टुकड़े थे। छः लडि़यों की एक करधनी उत्कृष्ट स्वर्णकारी का नमूना है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक हार में सोने के मटर जैसे दानों की छः लडि़याँ थीं जिसके दोनों सिरों पर अर्द्धचक्र है, जो संभवतः मटरमाला है।

धार्मिक जीवन एवं विश्वास (Religious life and Faith)

सिंधु सभ्यता के विभिन्न स्थलों से बड़ी संख्या में मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ तथा मुहरें पाई गई हैं जिनसे अनुमान किया जाता है कि विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं की भाँति इस सभ्यता के लोग भी बहुदेववादी और प्रकृतिपूजक थे। यहाँ मातृदेवी, पशुपति शिव, प्रजनन शक्ति, पशु, जल तथा पीपल, नीम आदि वृक्षों एवं नागादि जीव-जंतुओं की उपासना के प्रचलित होने का संकेत मिलता है।

मातृदेवी की उपासना

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मातृशक्ति की उत्पादक शक्ति का प्रतीकात्मक अंकन

हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों से प्राप्त होनेवाली सुसज्जित नारी मूर्तिकाओं की बहुलता से स्पष्ट है कि इस सभ्यता में मातृदेवी की उपासना का अस्तित्व था। विद्वानों का अनुमान है कि मातृदेवी की उपासना पृथ्वीदेवी अथवा उर्वरता की देवी के रूप में की जाती थी। मातृदेवी की मूर्तियाँ क्रीट, एशिया माइनर और मेसोपोटामिया से भी पाई गई हैं, जिससे पता चलता है कि फारस से लेकर यूनान के निकट इजियन सागर तक के सभी देशों में मातृदेवी की उपासना प्रचलित थी। मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में खड़ी हुई अर्धनग्न नारी की मृंडमूर्तियाँ मिली हैं जिनके शरीर पर छोटा-सा लहँगा है, जिसे कटि-प्रदेश पर मेखला से बाँधा गया है। गले में हार है तथा पंखे के आकार की विचित्र शिरोभूषा है। मैके महोदय को कुछ ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं जिन पर धुँये का निशान है। संभवतः देवी को प्रसन्न करने के लिए तेल या धूपादि सुगंधित द्रव्य जलाया जाता था।20 व्यंकटेश ने मातृदेवी को ‘दीपलक्ष्मी’ बताया है। मुहरों पर अंकित कुछ मृंडमूर्तियों में शिशु को स्तनपान कराते हुए नारी को प्रदर्शित किया गया है जो मातृत्व का सूचक है। बलूचिस्तान से कुछ नारी मृंडमूर्तियाँ रौद्र रूप की भी पाई गई हैं।

सिंधु सभ्यता के लोग पृथ्वी को उर्वरता की देवी मानते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस तरह मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस् की। हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर में सिर के बल खड़ी एक नग्न नारी के गर्भ से एक पौधा निकलता दिखाया गया है और पृष्ठ भाग पर एक तरफ चाकू लिये हुए एक पुरुष का अंकन है। दूसरी तरफ एक स्त्री अपने हाथों को ऊपर उठाये हुए है जिसकी संभवतः बलि चढ़ाई जानेवाली है। कुछ विद्वानों के अनुसार पृथ्वीदेवी की इस प्रतिमा में मातृशक्ति की उत्पादक शक्ति का प्रतीकात्मक अंकन है जिसका संबंध पौधों के जन्म और वृद्धि से रहा होगा। एक दूसरी मुहर पर पीपल के वृक्ष की दो शाखाओं के बीच एक स्त्री का चित्रण है और उसके सामने एक बकरा बँधा है जिसके पीछे लोग ढोल बजाते हुए नाच रहे हैं। मार्शल के अनुसार उस समय देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि का विधान था। एक अन्य मूर्ति में पालथी मारे बैठी देवी के दोनों ओर पुजारी बैठे हैं तथा इसके सिर पर एक पीपल का वृक्ष है। इसे उर्वरता तथा सृजनशीलता का प्रतीक बताया गया है। इस प्रकार पृथ्वीपूजा से शक्ति की उपासना जुड़ी है और यहीं से शक्तिपूजा का आरंभ माना जाता है। शक्ति पूजा प्राचीन विश्व की प्रायः सभी सभ्यताओं में होती रही है, संभवतः इसीलिए शक्ति को आदिशक्ति माना जाता है। मार्शल के अनुसार माता भगवती की पूजा ने जितना अधिक भारत को प्रभावित किया, उतना किसी अन्य देश को नहीं। संभवतः प्रत्येक परिवार में इनकी प्रतिष्ठा और पूजा होती थी।

पशुपति की पूजा

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मोहनजोदड़ो क त्रिमुखी पुरुष

सिंधु सभ्यता में एक पुरुष देवता की उपासना का भी प्रमाण मिलता है। मोहनजोदड़ो की एक मुहर में एक त्रिमुखी पुरुष तिपाई पर पद्मासन की मुद्रा में नग्न बैठा है। उसके सिर पर त्रिशूल जैसा सींग और विचित्र शिरोभूषा है, हाथों में चूडि़याँ और गले में हार है। इसके दाँई ओर चीता और हाथी तथा बाँई ओर गैंडा और भैंसा चित्रित हैं। चौकी के नीचे हिरण है। मार्शल और मैके इसे शिव की मूर्ति मानते हैं। पद्मासन में ध्यानावस्थित मुद्रा में इसकी नासाग्र दृष्टि शिव के योगेश्वर या महायोगी रूप को प्रदर्शित करती है। अनेक इतिहासकार इस पुरुष देवता को जैनों के पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ से भी समीकृत करते हैं जिनका चिन्ह बैल था। हिरण तीर्थंकर शांतिनाथ का और बाघ या शेर तीर्थंकर महावीर का चिन्ह है। हाथी भगवान् अजितनाथ का चिन्ह है।

कुछ इतिहासकारों ने मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध शालधारिणी मूर्ति का संबंध योग से जोड़ा है। एक मुहर पर योगमुद्रा में ध्यान की स्थिति में बैठे शिव की आकृति का अंकन है। इसके सामने दो तथा दोनों ओर बगल में बैठी एक-एक सर्प की आकृति बनी है। यहाँ से प्राप्त दो कबंध प्रस्तर-मूर्तियाँ, जो पैरों की भाव-भंगिमा के कारण नृत्य की स्थिति का बोध कराती है, नटराज शिव की मानी जाती हैं। एक मुहर पर तीर-धनुष चलाते हुए एक आकृति मिली है जिसे किराती शिव कोरूप बताया गया है। तीन अन्य मुहरें भी शिव के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डालती हैं। एक में त्रिमुखी देवता चाौकी पर योगासन में विराजमान है, हाथों को दोनों ओर फैलाये हुए है जिनमें चूडि़याँं हैं। सिर पर सींगों के बीच से फूल या पत्ती निकलती हुई दिखाई गई है। दूसरी मुहर पर एकमुखी आकृति भूमि पर बैठी हुई है जो श्रृंगयुक्त है और जिसके सिर से वनस्पति निकलता प्रदर्शित है। तीसरी मुहर में शृंगयुक्त आकृति के बीच से फल और पत्तियाँ निकल रही हैं जिसका आधा भाग मानव का है और आधा बाघ का। हड़प्पा से प्राप्त दो अन्य मुहरों पर भी देवता जैसी किसी आकृति का अंकन है जिसके सिर पर तीन पंखों का आभरण है। इस प्र्रकार सैंधव सभ्यता में मातृदेवी के समान शिव जैसे किसी पुरुष देवता की पूजा का भी विधान था।

विविध प्रकार की शिव मूर्तियों की प्राप्ति के आधार पर अनुमान किया जाता है कि शिव आर्यों के पूर्व भारत के मूल निवासियों, जंगली कबीलों तथा आर्येतर जातियों के देवता रहे हैं। इसी से इनका रंग कृष्ण था, जबकि आर्य गौर वर्ण के थे। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि बलशाली जंगली पशु जैसे- सर्प, साँड़ आदि उनके साथ जुड़े हैं। उत्पादन के देवता के रूप में भी शिव की पूजा होती थी। शिव के साथ सांड़ का साहचर्य उनके तत्कालीन उत्पादक देवता होने का बोधक है। आज भी कृषि में उत्पादन के लिए साँड़ों तथा बैलों का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार शिवपूजा का आरंभ हड़प्पा निवासियों के समय से ही माना जा सकता है। शिव के विविध रूप मानवाकृति, लिंगायत, पशुपति आदि इस समय से प्रचलन में आ चुके थे जो कालांतर में शैव परिवार में अलग-अलग धार्मिक संप्रदायों के रूप में प्रकट हुए।

प्रजनन-शक्ति की पूजा

सिंधुवासी प्रजनन-शक्ति के रूप में लिंग एवं योनि की पूजा भी करते थे जो उनकी धार्मिक पद्धति में वैज्ञानिकता के समावेशन के प्रमाण हैं। यह लिंग-योनि का द्वैत विश्व के उद्भव एवं रचनात्मकता का परिचायक है। हड़प्प्पा, मोहनजोदड़ो से बड़ी संख्या में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने शंकु तथा बेलन के आकार के लिंग मिले हैं। लिंग बड़े तथा छोटे दोनों आकार के पाये गये हैं। बड़े लिंग चूना पत्थर के और छोटे लिंग सीपों के बने हैं। इसी प्रकार पत्थर, काँच की मिट्टी, शंख आदि के बने छोटे और बड़े चक्र या छल्ले (योनि) बड़ी संख्या में मिले हैं। कुछ छोटे लिंगों और छल्लों में मिले छिद्रों से प्रतीत होता है कि सिंधुवासी किसी प्रकार के टोटका के रूप में छोटे-छोटे लिंगों को योनि के साथ ताबीज रूप में गले में धारण करते थे। ऋग्वेद में शिश्नपूजकों की निंदा की गई है। इससे लगता है कि पूर्वकाल के लोग लिंग एवं योनि पूजा करते थे। संभवतः लिंग एवं योनि पूजा का संबंध शिव एवं शक्ति से था।

वृक्ष-पूजा

मुहरों पर उत्कीर्ण विभिन्न प्रकार के वृक्षों की आकृतियों से ज्ञात होता है कि हड़प्पा की सभ्यता में पीपल, नीम जैसे वृक्षों की पूजा की जाती थी। एक ठीकरे पर बनी आकृति में एक सींगवाले पशु के दो सिर बने हैं जिनके ऊपर पीपल की कोमल पत्तियाँ फूटती हुई दिखाई देती हैं। मार्शल के अनुसार संभवतः यह एकश्रृंगी पशु पीपल देवता का वाहन था। एक दूसरी मुहर पर देवता की नग्न मूर्ति मिली है जिसके दोनों ओर पीपल की दो शाखाएँ चित्रित हैं। एक अन्य मुहर में पीपल के वृक्ष के बीच एक देवता का चित्रण है जिसकी पूजा सात स्त्रियाँ कर रही हैं। इनमें एक पशु का भी अंकन है जो बैल और बकरी से मिलता-जुलता है। यह संभवतः पीपल देवता का चित्र है और सात स्त्री मूर्तियाँ सप्तमातृकाओं का प्रतीक हैं। अन्य मुहरों में वृक्ष देवता के सम्मान में बकरी की बलि देने का दृश्य एवं पशुओं तथा सर्पों द्वारा वृक्षों की रक्षा करने का चित्र अंकित है जो वृक्षपूजा की महत्ता का परिचायक है। ऋग्वेद में अश्वत्थ का उल्लेख पीपल का ही बोधक है। अन्य वृक्षों में नीम, खजूर, बबूल आदि का भी अंकन है। इस प्रकार पौराणिक काल से पीपल, नीम, आँवला आदि वृक्षों की पूजा समाज में की जाती रही है तथा इससे संबंधित अनेक त्योहारों की मान्यता आज भी है।

पशु-पूजा

सैंधव सभ्यता की मुहरों पर अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों के अंकन से प्रतीत होता है कि हड़प्पाई विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों की भी उपासना करते थे। पशुओं में हाथी, बैल, बाघ, भैंसे, गैंडे और घडि़याल के चित्र अधिक मिले हैं। इनमें से अनेक पशुओं की आज देवताओं के वाहन रूप में पूजा की जाती है, किंतु यह कहना कठिन है कि उस समय इनकी वाहनों के रूप में प्रतिष्ठा थी या स्वतंत्र रूप में। पशु-अंकन की विविधता और अधिकता देखकर लगता है कि पशुओं को देवता का अंश माना जाता था। इसका प्रमाण यह है कि प्रायः प्रत्येक देवता के साथ एक पशु वाहन के रूप में जुड़ा हुआ है। इस सभ्यता में मानव के रूप में निर्मित देवताओं के सिर पर सींग की कल्पना से स्पष्ट है कि सींग शक्ति का प्रतीक माना जाता था।

सिंधु सभ्यता में बैल की पूजा विशेष रूप से होती थी क्योंकि इसके विविध प्रकारों का अंकन यहाँ के मुहरों पर बहुतायात में मिलता है, जैसे- एकश्रृंगी, कूबड़दार, लंबी लटकी लोरदार आदि। लगता है, शिव के साथ बैल का संबंध इसी सभ्यता से शुरू हुआ था क्योंकि यहाँ इन दोनों की आकृतियाँ एक साथ मुहरों पर बहुलता से अंकित हैं। कुछ पशु ऐसे भी चित्रित हैं जो काल्पनिक लगते हैं और इनकी रचना विभिन्न पशुओं के अंगों के योग से की गई हैं। एक ठीकरे पर मानव-सिर से युक्त बकरे का अंकन है। एक मुहर पर ऐसा पशु चित्रित है जिसका सिर गैंडे का, पीठ दूसरे पशु की तथा पूँछ किसी अन्य पशु की है। कुछ पशुओं की खोपड़ी धूपदानी की तरह कटोरानुमा है जिनके किनारे धुँए के चिन्ह हैं। संभवतः पशु-पूजन में धूप जलाने का भी प्रचलन था।

कुछ विद्वानों के अनुसार सूर्य पूजा तथा स्वास्तिक के चिन्ह भी पाये गये हैं। एक मुद्रा पर एकशृंगी पशु के सामने सूर्य जैसी आकृति बनी हुई है। इस आधार पर कुछ इतिहासकार वैष्णव संप्रदाय का बीजारोपण इसी समय से मानते हैं। लोथल से प्राप्त तीन बर्तन के टुकड़ों पर सर्प की आकृति से लगता है कि साँपों को दूध पिलाने तथा नागपूजा का विचार भी हड़प्पाकालीन है। कुछ मुहरों पर घेरों के भीतर वृक्ष से फन निकाले नाग की आकृति लोक-जीवन की धार्मिक भावना का परिचायक है। वीर पुरुषों की पूजा करने का विचार भी संभवतः हड़प्पा सभ्यता में था। दो बाघों के साथ लड़ते हुए एक पुरुष की सुमेर के प्रसिद्ध वीर गिल्गामेश के साथ तुलना की गई है।

योग हड़प्पा सभ्यता का उज्ज्वल एवं अनोख पक्ष है जिसके द्वारा वे अध्यात्म और विज्ञान का तादात्म्य धर्म से स्थापित कर सके थे। योग के विभिन्न आसनों का चित्रण यहाँ से प्राप्त योगी एवं मिट्टी की मूर्तियों से होता है। एक मूर्ति को मार्शल ने ‘कायोत्सर्ग’ आसन की मुद्रा में खड़ा बताया है। योगमुद्रा की विभिन्न मूर्तियों से स्पष्ट है कि योग क्रिया का विकास सिंधु सभ्यता से जुड़ा हुआ है और यह अनादिकाल से चली आ रही है।

इस प्रकार सैंधव सभ्यता से प्राप्त धड़विहीन ध्यानावस्थित संन्यासी की आकृति एक ओर आध्यात्मिक चेतना को उजागर करती है तो दूसरी ओर देवी के सम्मुख पशुबलि के लिए बँधे बकरे की आकृति कर्मकांड की गहनतम् भावना का प्रतीक है। मंत्र-तंत्र में भी इनका विश्वास था। मुहरों पर बने चिन्हों पर कुछ अपठनीय लिपि में लिखा गया है जो संभवतः मंत्र रहे होंगे। मिट्टी के एक मुहर (ताबीज) पर एक व्यक्ति को ढोल पीटता हुआ तथा दूसरे व्यक्ति को नाचते हुए दिखाया गया है। लगता है कि आज की भाँति उस समय भी नृत्य और संगीत उपासना के अंग थे। मोहनजोदड़ो की नर्तकी की प्रसिद्ध काँस्य-मूर्ति देवता के सम्मुख नाचनेवाली किसी देवदासी की प्रतिमा लगती है।

इस सभ्यता के किसी भी स्थल से किसी देवालय का साक्ष्य नहीं मिला है। मार्शल का अनुमान है कि इस सभ्यता के मंदिर काष्ठ निर्मित थे, जो नष्ट हो गये। किंतु हड़प्पाई मूर्तिपूजक थे, यह स्पष्ट है। लोथल और कालीबंगा से संदिग्ध यज्ञ-वेदिकाएँ मिली हैं जिनसे अग्निपूजा एवं बलि की प्रथा का अनुमान किया जाता है।

इस प्रकार सैंधव धर्म में देवीपूजा तथा पुरुष देवता की पूजा के साथ-साथ अनेक पशु-पक्षियों, वृक्षों, वनस्पतियों, मांगलिक प्रतीकों आदि की पूजा का विधान था। मार्शल के अनुसार कालांतर में हिंदू धर्म में प्रचलित अनेक कर्मकांड और अंधविश्वास सैंधव धर्म में पाये जाते हैं।

सिंधु सभ्यता का पतन (The The Downfall of the Indus Valley Civilization)

सिंधु सभ्यता लगभग 1700 ई.पू. तक चलती रही। किंतु लगता है कि यह सभ्यता अपने अंतिम चरण में पतनोन्मुख हो गई थी। इस समय भवनों में पुरानी ईंटों के प्रयोग की सूचना है। इस विकसित सभ्यता के विनाश के कारणों पर विद्वान् एकमत नहीं हैं। इसके पतन के कारणों के संबंध में विद्वानों ने विभिन्न तर्क दिये हैं, जैसे- बर्बर आक्रमण, जलवायु परिवर्तन एवं पारिस्थितिक असंतुलन, बाढ़ तथा भू-तात्त्विक परिवर्तन, महामारी, आर्थिक दुव्र्यवस्था, प्रशासनिक शिथिलता आदि। सर जान मार्शल के अनुसार प्रशासनिक शिथिलता के कारण ही इस सभ्यता का विनाश हुआ था। डी.डी. कोसाम्बी का मानना है कि मोहनजोदड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या की गई थी।

सर जान मार्शल, अर्नेस्ट मैके एवं एस.आर. राव जैसे विद्वान् मानते हैं कि हड़प्पा सभ्यता का विनाश नदी की बाढ़ के कारण हुआ। हड़प्पाई नगर नदियों के किनारे पर बसे हुए थे जिनमें प्रतिवर्ष बाढ़ आती रहती थी। हड़प्पा, मोहजोदड़ो के उत्खनन से भी पता चलता है कि इन नगरों का कई बार पुनर्निर्माण किया गया था। मार्शल को मोहनजोदड़ो की खुदाई में विभिन्न स्तरों पर बालू की परतें मिली हैं जो बाढ़ के कारण ही जमा हुई थीं। मैके महोदय को चांहूदड़ो के उत्खनन में बाढ़ के साक्ष्य मिले हैं। इनका मानना है कि बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए यहाँ के निवासियों ने ऊँचे स्थानों पर शरण ली होगी। एस.आर. राव को भी लोथल तथा भगतराव में बाढ़ आने के संकेत मिले हैं।

एक संभावना यह भी है कि ऋग्वेद में इंद्र द्वारा वृत्तासुर के वध करने का आशय यह भी हो सकता है कि जिन सुरक्षा-प्राचीरों (वृत्तों) से इस सभ्यता के लोग सुरक्षित थे, उन्हें आर्यों ने अपने कबीले के मुखिया (इंद्र) के नेतृत्व में ध्वस्त कर दिया हो, जिससे बाढ़ के कारण इस विकसित सभ्यता के अनेक समृद्ध बंदरगाह, व्यापारिक नगर और भवन जलप्लावित हो गये और इस सभ्यता का पतन हो गया।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बाढ़ के कारण सिंधु तट पर बसे नगरों का विनाश हुआ होगा, किंतु जो नगर सिंधु या अन्य नदियों के तट पर नहीं थे, उनका विनाश कैसे हुआ होगा? निश्चित रूप से अन्य अनेक नगरों के विनाश के अन्य कारण रहे होंगे। गार्डेन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, डी.एच. गार्डन, स्टुअर्ड पिग्गट के अनुसार सैंधव सभ्यता विदेशी आर्यों के आक्रमण से नष्ट हुई।

ह्वीलर महोदय ने ऋग्वेद के ‘हरियूपिया’ को हड़प्पा से समीकृत कर हड़प्पाई दुर्गों को ‘पुर’ और आर्यों के देवता इंद्र को ‘पुरंदर’ मानकर आर्य-आक्रमण के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। पुरंदर का अर्थ है- दुर्गों का विध्वंसक और हड़प्पाई नगरों कोयह विनाशक पुरंदर इंद्र ही था। आर्यों ने ई.पू. 1500 के आसपास अचानक आक्रमण करके सैंधव नगरों को ध्वस्त कर दिया और बड़े पैमाने पर नागरिकों की हत्या कर दी। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर-कंकाल किसी एक समय के नहीं हैं और इनसे किसी भीषण नर-संहार का संकेत नहीं मिलता है।

आरेल स्टाइन, ए.एन. घोष जैसे विद्वान् मानते हैं कि जलवायु में हुए व्यापक परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हुई। सिंधु, राजस्थान, पंजाब आदि क्षेत्रों में पहले वर्षा अधिक होती थी और यह क्षेत्र घने वनों से युक्त था। किंतु इस सभ्यता के विकसित चरण में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटान से जलवायु में व्यापक परिवर्तन हुआ जिससे अनाज की पैदावार कम हो गई और अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस जलवायु परिवर्तन के कारण नदियाँ सूख गईं, व्यापार-वाणिज्य अवरुद्ध हो गया जिससे सैंधव नगरों का पतन हो गया।

एम.आर. साहनी, आर.एल. राइक्स, जाॅर्ज एफ. डेल्स एवं एच.टी. लैम्ब्रिक का अनुमान है कि भू-तात्त्विक परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हुई। पहले तो जलप्लावन के कारण जमीन दलदल हुई जिससे यातायात बाधित हुआ और अनाज की पैदावर घट गई। दूसरे, इस प्राकृतिक आपदा के कारण लोगों को अपना घर-बार छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाना पड़ा जिससे इस सभ्यता का पतन हो गया।

लैब्रिक और माधोस्वरूप वत्स जैसे इतिहासकारों का मानना है कि सिंधु तथा अन्य नदियों के मार्ग- परिवर्तन के कारण इस सभ्यता का विनाश हुआ।

जी.एफ. डेल्स के अनुसार कालीबंगा का विनाश घग्घर तथा उसकी सहायक नदियों के मार्ग-परिवर्तन के कारण हुआ। नदियों के मार्ग परिवर्तन के कारण पीने के पानी और खेतों की सिंचाई के लिए पानी का अभाव हो गया। यही नहीं, इससे जलीय व्यापार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ जो बाद में इस सभ्यता के पतन का कारण बना।

के.यू.आर. केनेडी ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों का परीक्षण कर बताया कि सैंधव निवासी मलेरिया, महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हुए। इन बीमारियों से हड़प्पाई लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया जिसके परिणामस्वरूप इस सभ्यता का पतन हो गया।

कुछ विद्वान् आर्थिक दुव्र्यवस्था को सिंधु सभ्यता के पतन का कारण मानते हैं। वस्तुतः हड़प्पाई नगरों की समृद्धि का मुख्य आधार पश्चिम एशिया, विशेषकर मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता से व्यापार था। ऐसी सूचना मिलती है कि ई.पू. 1750 के आसपास यह व्यापार अचानक अवरुद्ध हो गया। व्यापारिक गतिविधियों के सहसा बंद हो जाने के कारण हड़प्पा सभ्यता का नगरीय स्वरूप समाप्त हो गया और उसमें ग्रामीण संस्कृति के तत्त्व स्पष्ट होने लगे। संभवतः यही कारण है कि इस सभ्यता के पतनकाल में बड़े-बड़े भवनों का स्थान छोटे-छोटे भवन लेने लगे और इनके निर्माण में पुरानी ईंटों का प्रयोग किया जाने लगा।

रूसी इतिहासकार एम. दिमित्रियेव का दावा है कि इस सभ्यता का विनाश पर्यावरण में अचानक होनेवाले किसी भौतिक-रसायनिक विस्फोट ‘अदृश्य गाज’ के द्वारा हुआ। इस विस्फोट से निकली हुई ऊर्जा तथा ताप 15000 डिग्री सेल्सियस के लगभग मानी जाती है जिससे दूर-दूर तक सब कुछ विनष्ट हो गया। इससे पर्यावरण पूरी तरह विषाक्त हो गया। मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों की स्थिति और पिघले पत्थरों के अवशेषों से इस विस्फोट का समर्थन भी होता है।

ऐसा लगता है कि इस सभ्यता के पतन का कोई एक कारण नहीं था, बल्कि विभिन्न कारणों ने इसके पतन में सहयोग किया। मोहनजोदड़ो में नगर और जल-निकास की व्यवस्था से महामारी की सम्भावना कम रह जाती है। पुरातत्त्विक उत्खननों से इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं कि कोई आक्रमण जैसी आकस्मिक घटना अवश्य घटी थी। मोहनजोदड़ो से लूटपाट और आगजनी के अवशेष पाये गये हैं। केवल एक ही कमरे में 14 मृत व्यक्तियों के अस्थि-पंजर और एक गली में कुछ स्त्रियों और बालकों के अस्थि-अवशेष बाढ़, आक्रमण, आगजनी और महामारी की ओर संकेत करते हैं। यह बात अलग है कि कुछ इतिहासकारों और पुराविदों को आर्य-आक्रमण की बात निराधार लगती है।

निरंतरता और उत्तरजीविता (Continuity and Survival)

हड़प्पा सभ्यता अपने पतन के बाद विलुप्त हो गई या चलती रही, यह विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा है। बी.बी. लाल, अमलानंद घोष, रामशरण शर्मा जैसे विद्वानों का विचार है कि हड़प्पा सभ्यता और बाद की भारतीय सभ्यता में कोई संबंध नहीं है। इसके विपरीत अनेक विद्वान् भारतीय सभ्यता पर हड़प्पा सभ्यता का गहरा प्रभाव मानते हैं। इन विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता विलुप्त नहीं हो गई, वरन् दूसरे रूपों में चलती रही और इसने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को प्रभावित किया। वस्तुतः हड़प्पा सभ्यता का प्रसार जिस क्षेत्र में हुआ था, वहाँ इस सभ्यता के पतन के पश्चात् नई स्थानीय संस्कृतियों का उदय हुआ, जैसे- सिंधु में झूकर संस्कृति, पंजाब में कब्रिस्तान एच. संस्कृति, दक्षिण-पूर्व राजस्थान, महाराष्ट्र, मालवा, गंगा-यमुना दोआब इत्यादि स्थानों पर ताम्रपाषाणयुगीन संस्कृतियाँ। कब्रिस्तान एच. संस्कृति, झूकर, झाँगर (चांहूदड़ो) और बनास संस्कृतियों में अनेक नये तत्त्व परिलक्षित होते हैं। मिट्टी के नये प्रकार के बर्तन भी प्रयोग में आने लगे थे, किंतु कुछ स्थानों पर हड़प्पा संस्कृति के तत्त्व बाद की सभ्यताओं में भी मिलते हैं।

अल्चिन कब्रिस्तान एच. संस्कृति और सिंधु सभ्यता के मृद्भांडों में अंतर को बहुत अधिक महत्त्व नहीं देते हैं। एच.डी. सांकलिया के अनुसार ‘दोनों संस्कृति के मृद्भांडों में इतनी समानता है कि इन्हें एक ही संस्कृति का मानना चाहिए और मृद्भांडों में जो भिन्नता है वह कार्यात्मक है, सांस्कृतिक नहीं।’ मैके ने झूकर संस्कृति के दो छेददार पत्थर की मुहरों को सिंधु संस्कृति से प्रभावित माना है। काठियावाड़ तथा कच्छ क्षेत्र में भी सैंधव सभ्यता की निरंतरता का प्रमाण मिलता है। यहाँ के निवासियों ने हड़प्पा संस्कृति के तत्त्वों को नया स्वरूप देकर एक नई संस्कृति की स्थापना की। रंगपुर में जिस प्रकार के चमकीले लाल मृद्भांड प्रयुक्त होते थे वैसे बर्तन बाद में अहाड़ (उदयपुर के निकट राजस्थान), नवदाटोली (मालवा) एवं अन्य स्थानों पर मिलते हैं। इस प्रकार उपलब्ध प्रमाणों से स्पष्ट है कि सीमित मात्रा में ही सही, हड़प्पा संस्कृति के तत्त्व मालवा और ऊपरी दकन के ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों को प्रभावित करते रहे। रंगपुर में पतनोन्मुख हड़प्पा संस्कृति ऐतिहासिक काल के उदय तक चलती रही। इसी प्रकार गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र के गेरुवर्णी मृद्भांड संस्कृति पर हड़प्पा संस्कृति के प्रभाव दिखाई देते हैं, जिसे एस.आर. राव ने निम्न या उत्तर हड़प्पा संस्कृति नाम दिया है। बड़गाँव, अंबखेड़ी, अहिछत्रा, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, कोशांबी इत्यादि स्थानों पर भी हड़प्पा संस्कृति के प्रभाव दृष्टिगत होते हैं। ताम्रनिधि संस्कृतियों के साथ भी हड़प्पा संस्कृति का संबंध जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि हड़प्पा संस्कृति पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई, वरन् पतनोन्मुख स्थिति में भी बाद तक चलती रही।

सैंधव सभ्यता का महत्त्व (Importance of Indus Valley Civilization)

हड़प्पा सभ्यता तो विनष्ट हो गई, किंतु उसने परवर्ती भारतीय सभ्यता और संस्कृति को स्थायी रूप से प्रभावित किया। परवर्ती भारतीय सभ्यता के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं कलात्मक पक्षों का आदि रूप सैंधव सभ्यता में दिखाई पड़ता है। कुछ इतिहासकारों ने भारतीय सामाजिक जीवन में विद्यमान चातुर्वर्ण व्यवस्था का बीज हड़प्पाई समाज में ढूँढने का प्रयास किया है। सैंधव समाज के विद्वान्, योद्धा, व्यापारी तथा शिल्पकार और श्रमिक संभवतः परवर्ती काल के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का पूर्वरूप हैं।

आर्थिक क्षेत्र में कृषि, पशुपालन, उद्योग-धंधों, व्यापार-वाणिज्य आदि को हड़प्पावासियों ने ही संगठित रूप प्रदान किया। चावल, कपास का उत्पादन एवं बैलगाड़ी का आरंभ इन्हीं लोगों ने किया। सैंधव निवासियों ने ही सबसे पहले बाह्य जगत् से संपर्क स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया जो बाद की शताब्दियों तक विकसित होता रहा। संभवतः भारतीय आहत मुद्राओं पर अंकित प्रतीक और साँचे में ढालकर बनाई गई मुद्राएँ अपने आकर-प्रकार के लिए हड़प्पाई मुद्राओं की ऋणी हैं।

सैंधव सभ्यता का सर्वाधिक प्रभाव भारतीय धर्मों एवं धार्मिक विश्वासों पर परिलक्षित होता है। मार्शल के अनुसार भारतीय हिंदू धर्म का प्रमुख रूप सैंधव धर्म में प्राप्त होता है। प्राकृतिक शक्तियों की पूजा, बाद में भी भारतीय धर्म का अभिन्न अंग बनी रही। पशुओं को पूज्य मानने की परंपरा, शक्ति के विभिन्न रूपों की पूजा, शिव की आराधना, सूर्य एवं स्वास्तिक की पूजा, जादू-मंत्र, यज्ञबलि में विश्वास बाद के भारतीय धर्म में भी देखे जा सकते हैं। सिंधु सभ्यता में प्रकृति देवी के रूप में मातृदेवी की उपासना का प्रमुख स्थान था, जिसका विकसित रूप शाक्त धर्म में दिखाई देता है।

सिंधु सभ्यता में जिस प्रधान पुरुष देवता की उपासना का प्रमाण मिलता है, उसे पशुपति शिव का आदि रूप बताया गया है। सैंधव मुद्राओं पर योगासन में बैठे योगी की मूर्ति का प्रभाव बुद्ध की मूर्तियों में दिखाई देता है। हड़प्पा सभ्यता की लिंग पूजा को कालांतर में शिव से संबद्ध कर दिया गया। कार्योत्सर्ग योगासनवाली मूर्ति से लगता है कि योग की क्रिया, जो जैनियों में प्रचलित थी, यहीं से प्रारंभ हुई है। सिंधु घाटी की मूर्तियों में वृषभ की आकृतियाँ विशेष रूप से मिलती हैं जिसे शिव के वाहन नंदी के रूप में मान्यता दे दी गई। जैन धर्म के प्रवर्तक आदिनाथ या वृषभनाथ का चिन्ह भी बैल है। सिंधु घाटी से प्राप्त बैल की आकृति से स्पष्ट है कि उस समय जैनधर्म का बीजारोपण हो चुका था। इस प्रकार विभिन्न भारतीय धर्मों का आदिरूप हड़प्पा सभ्यता में मिलने का दावा किया जाता है।

हड़प्पा सभ्यता में वृक्षों की पूजा का विधान था। विभिन्न मुहरों पर अंकित पीपल के वृक्ष, टहनी, पत्तियाँ आदि से स्पष्ट है कि पीपल को पवित्र माना जाता था। हिंदू तथा बौद्ध दोनों ही पीपल को पवित्र मानते हैं। इसी वृक्ष के नीचे गौतम को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। भरहुत, साँची के स्तूपों पर भी इस वृक्ष का अंकन मिलता है। हिंदू धर्म में तो पीपल को तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का निवास-स्थान बताया जाता है।

हिंदू समाज में प्रचलित नागपूजा (बसंत-पंचमी के दिन) की परंपरा भी सैंधव सभ्यता की ही देन है। हड़प्पा सभ्यता में जल को भी पवित्र माना जाता था और धार्मिक समारोहों के अवसर पर सामूहिक स्नान का महत्त्व था। यह भावना आज भी हिंदू धर्म में विद्यमान है। पूजा के लिए धूप-दीप का प्रयोग हड़प्पा सभ्यता की ही देन माना जा सकता है। संभवतः हड़प्पाई स्वास्तिक, स्तंभ आदि प्रतीकों की पूजा करते थे और हिंदू धर्म में स्वास्तिक को माँगलिक चिन्ह माना जाता है। सैंधव सभ्यता के लोग मूर्तिपूजा करते थे और इसके लिए देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों की मूर्तियों का निर्माण करते थे। कालांतर में पौराणिक हिंदू धर्म में मूर्ति उपासना का प्रमुख आधार बन गई।

भारतीय कला के विभिन्न तत्त्वों का मूलरूप भी सैंधव कला में परिलक्षित होता है। भारतीयों को दुर्ग निर्माण और प्राचीर निर्माण की प्रेरणा हड़प्पाई कलाकारों ने ही दिया। संभवतः राजगृह की साइक्लोयियन दीवार तथा अन्य प्राचीन नगरों की प्राचीरों के निर्माण में हड़प्पाई नगर योजना और प्राचीरों का अनुसरण किया गया था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्तंभयुक्त भवन मौर्य कलाकारों के लिए प्रेरणास्रोत बने। मूर्तिकला का प्रारंभ सर्वप्रथम सिंधु सभ्यता में ही हुआ, जिसका प्रभाव परवर्ती भारत की मूर्तिकला पर पड़ा। संभवतः अशोक के रमपुरवा स्तंभ का नटवा बैल सिंधु सभ्यता के वृषभ का अनुकरण करके ही बनाया गया है। इस प्रकार ऐतिहासिक काल की मूर्तिकला सैंधव मूर्तिकला से प्रभावित है।

यद्यपि सिंधु सभ्यता का नगरीय स्वरूप स्थायी प्रभाव नहीं डाल सका, क्योंकि बाद की अनेक शताब्दियों तक भारत में नगरों का विकास नहीं हो सका, किंतु खान-पान, रहन-सहन, वस्त्र-आभूषण आदि की परम्पपरा न्यूनाधिक परिवर्तनों के साथ बाद के काल में भी चलती रही। मिट्टी के बर्तन, धातु का काम, लेखन-कला, मूर्तिकला, चित्राकारी और नृत्य-संगीत की कला बाद में भी भारत में विकसित होती रही। इस प्रकार भारतीय सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों पर हड़प्पा सभ्यता का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।