फ्रांस की क्रांति के पूर्व यूरोप (Europe before the French Revolution)

फ्रांस की क्रांति के पूर्व यूरोप

यूरोपीय इतिहास में अठारहवीं शताब्दी का अंतिम चरण एक युग की समाधि और दूसरे युग का पालना था। अठारहवी शताब्दी में फ्रांस की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। आर्थिक रूप से जर्जर फ्रांस में कानून-व्यवस्था नाम की कोई वस्तु नहीं थी। विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के अतिरिक्त, शेष जनता का जीवन बहुत नरकीय था। इसी कारण 1789 ई. में फ्रांस में महान क्रांति हुई, जो न केवल फ्रांस के लिए बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक असाधारण घटना थी।

वास्तव में, फ्रांस की क्रांति ने समस्त यूरोप में एक अद्भुत हलचल और प्रबल उत्साह का संचार करते हुए एक नवीन युग का सूत्रपात किया। इस क्रांति ने यूरोप के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन के ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया, जिसके फलस्वरूप मनुष्य के जीवन में आमूल परिवर्तन अवश्यंभावी हो गया। 1917 ई. की रूस की बोल्शेविक क्रांति के पूर्व एक नूतन संसार को जन्म देने में जितना महत्त्वपूर्ण योगदान इस क्रांति का है, उतना संभवतः किसी अन्य ऐतिहासिक घटना का नहीं है। नवयुग के निर्माण और संसार के कायाकल्प का श्रेय फ्रांस की क्रांति को अनिवार्य रूप से मिलना चाहिए। यह क्रांति जितना शस्त्रों का संघर्ष थी, उतना ही विचारों का भी। इसने मानव सभ्यता को स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय का नवीन संदेश दिया, जो कालांतर में विश्व के कोने-कोने में फैल गये।

विश्व इतिहास की यह महान् घटना 1789 ई. में घटी थी। किंतु आज भी विश्व के स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों के प्रेमी इसे आदर के साथ याद करते हैं और यह मानते हैं कि यह क्रांति सामंतवाद के जीर्ण-शीर्ण सामाजिक व्यवस्था, वर्गीय विशेषाधिकार और शोषण, निरंकुश शासन और नौकरशाही के विरोध तथा मनुष्य-मात्र की समानता के दावे और अधिकार के आधार पर मानव समाज के नवनिर्माण के प्रयत्न का साकार रूप थी। स्पष्टतः यह एक असाधारण घटना थी और यही कारण है कि आधुनिक यूरोप के इतिहास का आरंभ फ्रांस की क्रांति से ही किया जाता है। किंतु इस क्रांति के विविध पहलुओं को भली-भाँति समझने के लिए अठारहवीं शताब्दी में यूरोप के राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को  जानना आवश्यक है।

यूरोप के राज्य

फ्रांस की राज्यक्रांति आरंभ होने से पूर्व यूरोप का राजनीतिक मानचित्र आज के मानचित्र से बिल्कुल भिन्न था। तीसवर्षीय युद्ध (1618-1648 ई.) ने मध्यकालीन यूरोप का पूरी तरह अंत कर दिया और अठारहवीं शताब्दी में निरंकुश शासकों के नेतृत्व में यूरोप का नवनिर्माण हुआ और उसकी आधुनिक ‘राज्य व्यवस्था’ (स्टेट सिस्टम) स्थापित हुई। यूरोप का नवनिर्माण उसके शासकों की आक्रामक नीति का परिणाम था, जो वेस्टफेलिया की संधि (1648 ई.) के बाद शुरू हुआ था और जो बाद के लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक चलता रहा। फ्रांस के अतिरिक्त, यूरोप की राजनीतिक इकाइयों का एक संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

पवित्र रोमन साम्राज्य
जर्मनी

उन दिनों जर्मनी आजकल की तरह एक राज्य नहीं, बल्कि अनेक छोटे छोटे राज्यों में विभक्त एक भौगोलिक अभिव्यक्ति मात्र था। वह सारा प्रदेश, जिसमें जर्मन भाषा बोली जाती थी, स्थूल रूप से जर्मनी कहलाता था। उसका अधिकांश भाग पवित्र रोमन साम्राज्य का ही एक अंग था, जिसमें प्रशा और ऑस्ट्रिया के राज्य भी सम्मिलित थे।

रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में जो अराजकता फैली, उसी समय फ्रेंक जाति के लोगों ने यूरोप के कुछ भू-भागों पर अधिकार करके अपना राज्य स्थापित कर लिया। आठवीं शताब्दी के आरंभ में इस जाति ने प्रायः समस्त पश्चिमी यूरोप पर अधिकार कर लिया। इस राजवंश का सबसे महान राजा शार्लमन हुआ। उसने अपने राज्य की सीमा का बहुत विस्तार किया और रोम और इटली को अपने राज्य में सम्मिलित किया। उस समय इटली के एक भू-भाग में रहने वाले लोम्बार्ड लोग पोप को बहुत तंग किया करते थे और यदा-कदा उसके भू-भाग पर आक्रमण कर देते थे। इससे परेशान होकर पोप ने अपनी रक्षा के लिए शार्लमेन की सहायता ली। शार्लमेन ने पोप की बड़ी सहायता की, जिससे प्रसन्न होकर 25 दिसंबर, 800 ई. को रोम के गिरजे में पोप तृतीय लिओ ने शार्लमेन के मस्तक पर राजमुकुट रखकर उसका रोम के सम्राट के पद पर अभिषेक किया। इस प्रकार सवा तीन सौ वर्षों के बाद पुराने रोमन साम्राज्य की पुनः स्थापना हुई। सम्राट के रूप में शार्लमेन का राज्याभिषेक पोप ने किया था। इस कारण शार्लमन का साम्राज्य ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ (होली रोमन अंपायर) कहलाया। शार्लमन के बाद के आठ सौ वर्षों में पवित्र रोमन साम्राज्य की सीमा, उसके स्वरूप और संगठन में कई परिवर्तन हुए। यह आधुनिक जर्मनी तक सीमित हो गया।

समस्त जर्मनी लगभग 360 छोटे-बड़े राज्यों में विभक्त था। इसमें कोई राज्य बहुत छोटा और कोई राज्य बड़ा था। इनमें संगठन का अभाव था। इन राज्यों की शासन-पद्धतियों में भी सभा शासन करती थी, जिसमें चर्च के बड़े-बड़े अधिकारी थे। कुछ में कुलीन पुरुषों की सभा शासन करती थी और कुछ में कुलीन सामंतों के वंशज राज कर रहे थे। ये सभी रियासते पवित्र रोमन साम्राज्य में सम्मिलित थीं। इन 360 रियासतों में हनोवर, विस्टेम्बर्ग, प्लेटिन, बबेरिया, सैक्सनी, ऑस्ट्रिया और प्रशा की रियासतें प्रमुख थीं और इनमें भी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण ऑस्ट्रिया और प्रशा के राज्य थे।

पवित्र रोमन साम्राज्य के सम्राट का पद वंशानुगत नहीं था। जर्मनी के सात बडे राज्य (बाद में बोहेमिया भी) के शासक उसका निर्वाचन करते थे। इसी कारण उन्हें ‘इलेक्टर’ कहा जाता था।

कई शताब्दियों से आस्ट्रिया का सम्राट ही पवित्र रोमन सम्राट बनता चला आ रहा था, किंतु वह नाममात्र का सत्ताधारी रह गया था। वेस्टफेलिया की संधि के उपरांत पवित्र रोमन साम्रज्य के सम्राट का कोई महत्त्वपूर्ण नियंत्रण नहीं रह गया। साम्राज्य के भीतर के राज्य अपने को स्वतंत्र मानते थे और समस्त कार्य अपनी मर्जी से करते थे। सम्राट न तो कोई आज्ञा दे सकता था, न कोई नीति निर्धारित कर सकता था और न कोई सेना रख सकता था। साम्राज्य के अंतर्गत विभिन्न रियासतों के पारस्परिक संबंधों की देख-रेख के लिए एक ‘डाइट’ अवश्य थी, किंतु सम्राट की भाँति वह भी शक्ति-विहीन थी। इस प्रकार पवित्र रोमन साम्राज्य एक अजीबोगरीब राजनैतिक संस्था बनकर रह गया था। वाल्टेयर के शब्दों में, ‘यह न तो पवित्र, न रोमन और न साम्राज्य ही था।’ पवित्र रोमन साम्राज्य के अंतर्गत आस्ट्रिया और प्रशा दो प्रमुख राज्य थे, जिनकी गणना यूरोप की प्रधान शक्तियों में की जाती थी।

आस्ट्रिया

पवित्र रोमन साम्राज्य के अंतर्गत आने वाला आस्ट्रिया सत्तरहवीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप का एक शक्तिशाली और प्रमुख राज्य था। इस पर शक्तिशाली हैप्सबर्ग वंश के राजाओं का शासन था। आस्ट्रिया का शासक पवित्र रोमन सम्राट भी हुआ करता था। इस कारण संपूर्ण साम्राज्य पर उसका प्रभुत्व था। किंतु यह प्रभुत्व केवल नाममात्र का था। स्वयं आस्ट्रिया का राज्य भी काफी विशाल था, जिसमे अनेक प्रजातियों के लोग निवास करते थे। किंतु राज्य का प्रमुख भाग स्वयं आस्ट्रिया था, जिसमें जर्मन जाति के लोग निवास करते थे। इसकी राजधानी वियेना थी। उत्तर में चेक जाति के लोगों के मोरेविया और बोहेमिया के राज्य थे। पूर्व की ओर हंगरी का राज्य था, जिसमें मगायर, क्रीट, रूपानियन तथा सर्ब जाति के लोग रहते थे। इटली के उत्तर में मिलान का राज्य था, जहाँ पर इटालियन लोग रहते थे। यह राज्य भी आस्ट्रिया साम्राज्य के अंतर्गत था। इन प्रदेशों के अतिरिक्त, बेल्जियम का राज्य, जहाँ फ्रांसीसी तथा फ्लेमिश लोग रहते थे और सभी आस्ट्रिया के अधिकार में थे। इस प्रकार आस्ट्रिया का राज्य विभिन्न प्रजातियों, भाषा-भाषियों का मिलाजुला एक भानुमती का कुनबा यानी ‘अजायबघर’ था। इन विविध तत्त्वों को एक साथ मिलाये रखना आस्ट्रिया के सम्राट के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य था और यही आस्ट्रिया की राज्य व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी थी, जिसके कारण साम्राज्य में बराबर उपद्रव और दंगे होते रहते थे।

तीसवर्षीय युद्ध (1618-1648 ई.) तक यूरोप की राजनीति में आस्ट्रिया का प्रमुख स्थान था, किंतु ‘वेस्टफेलिया की संधि’ (1648 ई.) से उसका पुराना गौरव समाप्त हो गया और उसकी प्रधानता समाप्त हो गई। जर्मनी में अपनी वास्तविक सत्ता कायम करने में वह असफल रहा। ऐसी स्थिति में आस्ट्रिया के शासकों ने अब पूर्व की ओर अपना प्रभाव बढ़ाने का निश्चय किया। सम्राट लियोपोल्ड ने तुर्कों से सिलवेनिया और हंगरी का एक बहुत बड़ा भू-भाग छीन लिया। उसके पश्चात् सम्राट चार्ल्स छठें (1711-1740 ई.) ने तुर्कों से हंगरी और बेलग्रेड के प्रदेशों को ले लिया।

आस्ट्रिया की साम्राज्ञी मारिया थेरेसा (1740-1765 ई.) के समय में प्रशा ने आस्ट्रिया से साइलेशिया का प्रांत छीन लिया और बहुत प्रयत्न करने पर भी वह उस प्रांत को वापस नहीं जीत सकी।

मारिया का उत्तराधिकारी जोजेफ द्वितीय (1765-1790 ई.) एक योग्य प्रबुद्ध शासक था। अपने शासन के दौरान जोजेफ द्वितीय ने ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किये। प्रशा के राजा फ्रेडरिक से मिलकर उसने पोलैंड का विभाजन किया, जिससे पोलैंड के एक बहुत बड़े भाग पर आस्ट्रिया का अधिकार हो गया। फ्रांस में जब क्रांति शुरू हुई, उस समय आस्ट्रिया का सम्राट जोजेफ द्वितीय ही था। फ्रांस की क्रांति के बाद आस्टिया का यूरोपीय राजनीति में महत्त्व पुनः बढ़ गया।

प्रशा

प्रशा का राज्य, आस्ट्रिया की भाँति पवित्र रोमन साम्राज्य का ही एक अंग था। किंतु जर्मनी के अन्य राज्यों की तुलना में वह अधिक शक्तिशाली था। वेस्टफेलिया की संधि से उसे बड़ा लाभ मिला था। प्रशा का वास्तविक इतिहास 1701 ई. से प्रारंभ होता है। यहाँ होहेनजोलर्न वंश के राजाओं का शासन था।

अठारहवीं शताब्दी के प्रशा के राजाओं में होहेनजोलर्न वंश का फ्रेडरिक द्वितीय (1740-86 ई.) सर्वाधिक प्रसिद्ध है। फ्रेडरिक द्वितीय के लंबे शासनकाल में इस राजवंश की चारित्रिक विशेषताओं, तरीकों और महत्त्वाकांक्षाओं की बहुत अच्छी अभिव्यक्ति हुई। निःसंदेह वह अपने वंश का योग्यतम शासक था और इसीलिए उसे ‘महान’ कहा जाता है।

फ्रेडरिक महान में सैनिक संगठन की अपूर्व क्षमता थी। उसने अपनी सेना का उत्तम ढंग से संगठन किया और तत्कालीन यूरोपीय युद्धों में भाग लेकर प्रशा की सीमाओं का विस्तार किया। आस्ट्रिया से साइलेशिया का प्रदेश छीन लिया और पश्चिम प्रशा का प्रदेश भी अपने राज्य में मिला लिया। पोलैंड के विभाजन में भी उसकी सबसे बड़ी भूमिका थी और उसका एक बहुत बड़ा भाग उसने हड़प लिया। इस प्रकार फ्रेडरिक ने प्रशा को एक शक्तिशाली राज्य बनाकर उसे यूरोप की एक प्रमुख शक्ति बना दिया।

फ्रेडरिक एक प्रबुद्ध शासक था। उसके आंतरिक सुधारों ने प्रशा को एक शक्तिशाली, दृढ़ और महान राज्य बना दिया। फ्रेडरिक ने अपने कार्यों से प्रशा को जर्मनी में आस्ट्रिया का प्रबल प्रतिद्वंदी बना दिया और वह सदैव उसकी योजनाओं को विफल करने का प्रयत्न करता रहा।

फ्रेडरिक ने राज्य विस्तार के साथ-साथ प्रजा के कल्याण के लिए बहुत से कार्य किये। राजा के कर्त्तव्यों के विषय में उसने एक बार कहा था: ‘शासक का देश में वही स्थान है, जो मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क का। वह समाज के लिए सोचे और ऐसे कार्य करे, जिससे सारे देश को लाभ हो। राजा केवल राज्य का निरंकुश शासक ही नहीं, बल्कि वह प्रजा का प्रथम सेवक भी है।’

प्रशा की उन्नति के लिए फ्रेडरिक ने कृषकों को वैज्ञानिक ढ़ंग से कृषि करने के लिए प्रोत्साहित किया, दलदलों को सुखाकर कृषि-योग्य भूमि का विस्तार किया, सिंचाई के लिए नहरें खुदवाई और पशुओं की नस्ल सुधारने के लिए अनुसंधान केंद्र खोले। उसने उद्योग धंधों को प्रोत्साहन दिया और विदेशी आगंतुकों को अपने देश में बसाया।

फ्रेडरिक ने न्याय-व्यवस्था में भी कई परिवर्तन किये। उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया। उसने कला और विज्ञान की उन्नति की ओर भी ध्यान दिया। बर्लिन में ‘विज्ञान अकादमी’ स्थापित की गई और अनेक प्राथमिक पाठशालाएँ खोली गईं । उसने नाटक, काव्य-रचना, चित्रकला आदि के विकास को विशेष प्रोत्साहन दिया।

किंतु फ्रेडरिक का उत्तराधिकारी फ्रेडरिक विलियम द्वितीय अत्यंत निर्बल और अयोग्य था। फ्रेडरिक महान के शासनकाल में प्रशा का जितना उत्कर्ष और यश विस्तार हुआ था, फ्रेडरिक विलियम द्वितीय के काल में उसकी प्रतिष्ठा और शक्ति को उतना ही आघात लगा।

इटली

अठारहवीं शताब्दी में इटली भी जर्मनी की तरह कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था और यूरोपीय राजनीति में उसका कोई महत्त्व नही था। इटली के राज्यों का आपस में कोई तालमेल नहीं था और वह आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से पिछड़े राज्यों का एक समूह मात्र था। इटली के अधिकांश क्षेत्रों पर विदेशी शक्तियों का प्रभाव था। फ्रांस और आस्ट्रिया जैसे शक्तिशाली राज्य इटली के भू-भागों पर अकसर अधिकार करने का प्रयत्न करते रहते थे। यहाँ के प्रमुख राज्य सेवाय, पीडमांट-सार्डीनिया, वेनिस, लोम्बार्डी, नेपिल्स, टस्कनी और रोम आदि थे। यहाँ के प्रायः सभी राजा निरंकुश और स्वेच्छाचारी थे, जिसके कारण इटली यूरोप का एक पिछड़ा हुआ राज्य बना रहा। किंतु 18वीं शताब्दी के अंत तक इटली में राजनीतिक जागृति के लक्षण उत्पन्न होने लगे थे और नई इटली के बीज अंकुरित होने लगे थे।

कैथोलिक संप्रदाय का सर्वोच्च अधिकारी पोप रोम में निवास करता था। इटली के एक विस्तृत भू-भाग पर उसका शासन था और संसार भर के कैथोलिकों का वह धर्मगुरु था। इस कारण यूरोप में उसका बड़ा प्रभाव था।

रूस

सीमा-विस्तार की दृष्टि से रूस यूरोप का सबसे विशाल देश था, किंतु अन्य सभी क्षेत्रों में वह यूरोप का सबसे पिछड़ा हुआ दकियानूस देश था। सत्तरहवीं शताब्दी के अंत तक रूस एक असभ्य और बर्बर देश माना जाता था, इसलिए यूरोपीय राजनीति में उसका कोई महत्त्व भी नहीं था। 18वीं शताब्दी का रूस के लिए भी अत्यधिक राजनीतिक महत्त्व है, क्योंकि इस समय में रूस की गणना यूरोप के प्रमुख राज्यों में की जाने लगी।

रूस को प्रगति के रास्ते पर अग्रसर कराने वाला शासक पीटर महान (1689-1725 ई.) था। पीटर की गणना विश्व इतिहास के कर्मठ और शक्तिशाली शासकों में होती है क्योंकि उसके 36 वर्षीय शासनकाल में रूस ने अपूर्व उन्नति की। उसने अपने जीवन में महान सफलताएँ ही नहीं प्राप्त कीं, बल्कि राष्ट्रीय जीवन के भावी उद्देश्य को भी बहुत कुछ निश्चित कर दिया। उसके शासनकाल में पाश्चात्य सभ्यता का रूस में प्रवेश हुआ और वहाँ एक सुसंगठित एवं शक्तिशाली शासन व्यवस्था की स्थापना हुई। पीटर महान अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसा बंदरगाह चाहता था, जिसका सरलतापूर्वक उपयोग किया जा सके, क्योंकि तब तक रूस के अधीन आर्केजल का ही बंदरगाह था, जो वर्ष में 9 महीने बर्फ जमने के कारण बंद रहता था। उसने रूस की सीमा को बाल्टिक सागर और काले सागर तक विस्तारित करने के लिए तुर्की और स्वीडन से युद्ध किया और बाल्टिक के तट पर स्थित कोरलैंड, स्थोर्निया तथा लिवोर्निया पर अधिकार कर वहाँ के बंदरगाह पर अधिकार कर लिया।

एक प्रबुद्ध शासक के रूप में पीटर ने देश में अनेक सुधार किये और जनसाधारण को सभ्य बनाने का हरसंभव प्रयास किया। उसके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप रूस का आर्थिक रूप से विकास हुआ, कारखाने खोले गये और नहरें बनाई गईं । पीटर ने रूस की परंपरागत राजधानी को बदलकर सेंट पीटर्सबर्ग को अपनी राजधानी बनाया।

पीटर महान के अधूरे कार्य को पूरा किया कैथरीन द्वितीय (1762-1769 ई.) ने। वह जार पीटर तृतीय की पत्नी थी और उसकी मृत्यु के बाद शासिका बनी थी। कैथरीन द्वितीय ने 34 वर्षों तक कठोरतापूर्वक शासन किया और पीटर की नीति का अनुसरण करके न केवल रूस का यूरोपीयकरण किया, बल्कि उसका विस्तार करके रूस को अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से एक सुदृढ़ राज्य बना दिया। तुर्की से युद्ध करके कैथरीन ने क्रीमिया और काले सागर तक रूस की सीमा का विस्तार किया। पोलैंड की दुर्बलता से लाभ उठाकर कैथरीन ने पोलैंड के विभाजन (1772 ई.) में आस्ट्रिया और प्रशा का साथ दिया। इस विभाजन में रूस को पोलैंड का एक बहुत बड़ा भाग मिल गया। फ्रांस में जब क्रांति शरू हुई, तो उस समय रूस पर कैथरीन महान का ही शासन था।

पोलैंड

भौगोलिक दृष्टि से पोलैंड रूस के बाद यूरोप का दूसरा बड़ा राज्य था। मध्य युग में पोलैंड एक शक्तिशाली राज्य था, किंतु सत्तरहवीं शताब्दी के शुरू से ही उसकी शक्ति का हृास होना प्रारंभ हो गया था।

फ्रांस की क्रांति (1789 ई.) से पूर्व पोलैंड की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी थी। शासन के अव्यवस्थित होने के कारण पोलैंड निरंतर कमजोर होता जा रहा था और इसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। पोलैंड की अव्यवस्था और दुर्बलता का लाभ उसके तीन पड़ोसी देशों- रूस, प्रशाआस्टिया ने उठाया और तीनों ने मिलकर पोलैंड को तीन बार (1772 ई., 1793 ई. और 1795 ई.) विभाजन किया। जिस समय फ्रांस में क्रांति का विस्फोट हुआ, उस समय एक राज्य के रूप में पोलैंड का अस्तित्व लगभग समाप्त होने वाला था

इंग्लैंड

फ्रांस में राज्य-क्रांति प्रारंभ होने से पूर्व इंग्लैंड में वैधानिक शासन की स्थापना हो चुकी थी और पार्लियामेंट की शक्ति बढ़ गई थी। इस समय तक इंग्लैंड विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली सामुद्रिक शक्ति बन गया था। फ्रांस के साथ इंग्लैंड की पुरानी शत्रुता थी और इस कारण दोनों के बीच उपनिवेश स्थापना के क्रम में कई युद्ध भी हुए। महाद्वीपीय शक्ति होने के कारण फ्रांस मुख्यतः महाद्वीप की राजनीति में ही उलझा रहा, जिसका लाभ उठाकर इंग्लैंड ने उसके साम्राज्य का बहुत बड़ा भाग छीन लिया।

किंतु अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (19 अप्रैल, 1775-3 सितंबर, 1783) में इंग्लैंड की पराजय से उसकी प्रतिष्ठा को बड़ा आघात पहुँचा। इस समय इंग्लैंड भी पतन की ओर अग्रसर था, किंतु बाद में छोटे पिट के योग्य एवं सफल नेतृत्व में इंग्लैंड शीघ्र ही यूरोप का महान देश बन गया।

अन्य राज्य

इस समय यूरोप के अन्य राज्य स्पेन, हॉलैंड, स्विटजरलैंड, पुर्तगाल, डेनमार्क, नार्वे और स्वीडन थे।

स्पेन

सोलहवीं शताब्दी तक स्पेन यूरोप का महान देश बना रहा, लेकिन सत्तरहवीं शताब्दी में उसका निरंतर पतन होता रहा। अठारहवी शताब्दी में स्पेन बहुत शक्तिशाली राज्य नहीं रहा था। स्पेन में बूर्बा वंश का शासन था। फ्रांस में भी बूर्बा वंश का ही शासन होने के कारण स्पेन और फ्रांस के संबंध अच्छे थे। फ्रांस की क्रांति शुरू होने के समय वहाँ का शासक चार्ल्स चतुर्थ था।

हॉलैंड

हॉलैंड में शक्तिशाली आरेंज वंश का शासन था। आरेंज वंश का शासक विलियम एक शक्तिशाली एवं निरंकुश शासक था।।

स्विट्जरलैंड

संपूर्ण यूरोप में स्विटजरलैंड ही एक ऐसा देश था, जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रचलित थी, किंतु राजनीतिक दृष्टि से यूरोप में स्विटजरलैंड का कोई विशेष महत्त्व नहीं था।

डेनमार्क, नार्वे और स्वीडन छोटे छोटे राज्य थे, जिनका यूरोपीय राजनीति पर विशेष प्रभाव न था। डेनमार्क और नार्वे में उस समय क्रिश्यिचन सप्तम और स्वीडेन में गस्टवस तृतीय का शासन था। ये दोनों राजा निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी थे।

राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था

पुरातन-व्यवस्था

इस समय यूरोप की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था सामंती व्यवस्था (फयूडल सिस्टम) पर आधारित थी। सामंती व्यवस्था वस्तुतः कोई व्यवस्था न होकर एक संगठित अव्यवस्था थी और रोमन साम्राज्य के पतन के उपरांत इसका उद्भव और विकास हुआ था। इस व्यवस्था के दो पक्ष थे- राजनीतिक और सामाजिक। राजनीतिक पक्ष में इसका मूल सिद्धांत शासन का विकेंद्रीकरण और सामाजिक पक्ष में असमानता था।

अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक सामंती व्यवस्था ने विकृत रूप धारण कर लिया था। प्रारंभ में सामंतों को कई विशेषाधिकार मिले थे, किंतु उनके साथ उन्हें कुछ कर्त्तव्यों का पालन भी करना पड़ता था। बाद में, सामंतों के विशेषाधिकार तो ज्यो-के-त्यों बने रहे, किंतु वे अपना कर्त्तव्य भूल गये और सर्वसाधारण का शोषण करने लगे।

उस समय संपूर्ण यूरोप में शासन का स्वरूप निरकुश एकतंत्र था। सामतों की सलाह पर राजा शासन करता था। ऐसी स्थिति में शासन राजा और मुट्ठी भर सामंतों के हित में होता था और जनता के कल्याण की ओर किसी का ध्यान नहीं था। अत्याचार और भ्रष्टाचार का सर्वत्र बोलबाला था। राज्य का मुख्य सिद्धांत शोषण बन चुका था। नैतिक दृष्टि से भी शासन पतित हो चला था और राजा अपना मुख्य कार्य राज्य-विस्तार और स्वार्थ साधन मानते थे। उन्हें दूसरों के अधिकारों और अपने दिये हुए वचनों की परवाह नहीं थी। विश्वासघात और वचन-भंग उनकी कूटनीति की कसौटी थी और सबल राष्ट्र निर्बल राष्ट्र को हड़पने में किसी तरह का संकोच नहीं करते थे। ऐसी अवस्था में कोई राज्य सुरक्षित नहीं था। यह सिद्धांतहीन एवं अनैतिक व्यवस्था यूरोपीय इतिहास में ‘पुरातन व्यवस्था’ कहलाती है।

पुरातन व्यवस्था के काल में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में अनेकानेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इसी युग में यूरोप में शांति को बनाये रखने के लिए ‘शक्ति-संतुलन का सिद्धांत’ कूटनीतिक व्यवहार का आधार बना। नये देशों की खोज, उपनिवेशों की स्थापना, भौगोलिक ज्ञान का विस्तार, नवीन व्यापारिक मार्गों की खोज, सभ्यताओं के बीच संघर्ष आदि का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव पड़ा। अब यूरोप की पुरानी सीमाएँ मिटने लगी और उसके स्थान पर नई सीमाएँ निर्धारित हुईं, जो एक ओर अटलांटिक सागर तक और दूसरी ओर प्रशांत महासागर तक फैली हुई थीं। इस काल में यूरोप के देशों का युद्ध केवल यूरोप तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्व के अन्य भागों में भी फैला। सप्तवर्षीय युद्ध प्रथम अंतर्राष्ट्रीय युद्ध था, जो यूरोप, उत्तरी अमेरिका और भारत में लड़ा गया। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी में राजनीति का क्षेत्र केवल यूरोप की समस्याओं तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्वव्यापी बन गया। यदि यूरोप में युद्ध के बादल उठते, तो उनका प्रभाव एशिया अथवा अमेरिका पर भी अनिवार्य रूप से पड़ता। इसी प्रकार यूरोप की समस्त घटनाओं एवं विचारधाराओं का प्रभाव संसार के प्रत्येक देशों पर पड़ने लगा।

अठारहवीं शताब्दी में यूरोप के साम्राज्यवादियों ने व्यापार और वाणिज्य के नाम पर एशिया तथा अफ्रीका के पिछडे हुए देशों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना आरंभ किया। भारत में अंग्रेज, फ्रांसीसी तथा पुर्तगालियों ने व्यापार एवं वाणिज्य के नाम पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न किया, जिनमें सफलता अंग्रेजों को मिली। इसी प्रकार अफ्रीका, आस्ट्रेलिया आदि देशों पर भी अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हुआ। फ्रांस, पुर्तगाल, हॉलैंड, बेल्जियम आदि देशों ने भी एशिया, अफ्रीका और दूसरे देशों पर अधिकार स्थापित किया। प्रादेशिक विस्तार के साथ-साथ ईसाई धर्म का भी प्रचार हुआ, साम्राज्यवादियों के साथ-साथ धर्म-प्रचारक गये और लोगों को ईसाई बनाये। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी यूरोप के सांस्कृतिक और राजनीतिक विस्तार का युग था।

सामाजिक व्यवस्था

यूरोपीय पुरातन व्यवस्था के अंतर्गत सर्वसाधारण जनता की दशा अत्यंत दयनीय थी। समाज मुख्यतः दो परस्पर विरोधी वर्गों में विभाजित था। एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों का था और दूसरा विशेषाधिकारविहीन वर्गों का। प्रथम विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के अंतर्गत कुलीन और पादरी थे, जबकि विशेषाधिकारविहीन वर्ग में छोटे पादरी, कृषक, मध्यम वर्ग, शिल्पी और कारीगर लोग आते थे।

कुलीन वर्ग

अठारहवीं शताब्दी के यूरोपीय समाज में कुलीन वर्ग का विशेष स्थान था। राजा तथा राजपरिवार के व्यक्तियों के बाद समाज में उनका स्थान सर्वोच्च था। राज्य के उच्च पदों पर इसी वर्ग के लोगों की नियुक्ति होती थी। राजा लोग स्वेच्छा से कुलीन वर्ग के किसी भी व्यक्ति को कोई भी पद प्रदान कर सकते थे, भले ही ऐसे व्यक्तियों में कोई योग्यता न हो।

यूरोप की सारी भूमि जागीरों में विभक्त थी और जागीरों के स्वामी कुलीन वर्ग के लोग ही थे। उन्हें पुराने सारे सामंती अधिकार अब भी प्राप्त थे। प्रत्येक देश में कुलीन वर्ग ‘राज करो और दायित्वों से मुक्त’ था और समाज में उनको विशेष प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त था। जनसाधारण और मध्यम श्रेणी के लोग उनसे आतंकित रहते और अनेक प्रकार की सेवा, भेंट और सम्मान द्वारा उनकी महत्ता को स्वीकार करते थे। उधर, कुलीन अपने दायित्वों का अनुभव लेशमात्र भी नहीं करते थे और उनका काम केवल जनता का शोषण करना था। इस प्रकार, कुलीनों का यह परजीवी वर्ग समाज पर भार बन गया था और जनता में इसके प्रति घोर असंतोष व्याप्त था।

पादरी वर्ग

कुलीनों की तरह पादरी लोग भी विशेषाधिकारों से संपन्न थे। पादरी वर्ग भी दो श्रेणियों में विभक्त थे-

उच्च पादरी वर्ग : पहली श्रेणी ऊँचे पादरियों की थी, जिसमें पादरी, सामंतों तथा बड़े-बड़े कुलीनों के पुत्र होते थे। ये लोग चर्च की अपरिमित आय के बल पर कुलीनों की भाँति विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। यद्यपि धार्मिक कृत्यों में इनकी कोई रुचि नहीं थी, फिर भी, इन लोगों ने चर्च के उन समस्त पदों पर अधिकार कर लिया था, जो धन के स्रोत थे। इनमें से अधिकांश राजदरबारों में रहकर विलासिता का जीवन जीते और वहाँ के षड्यंत्रों में भाग लेते रहते थे।

पादरी लोग सभी प्रकार के करों से सर्वथा मुक्त थे, किंतु सर्वसाधारण जनता से राज्य और जागीरदारों के अलावा चर्च भी कर वसूलते थे।

निम्न पादरी वर्ग : दूसरी श्रेणी में असंख्य छोटे-छोटे पादरी थे, जो अपने धार्मिक कर्त्तव्य करते हुए साधारण भिक्षुओं की तरह जीवन व्यतीत करते थे। उच्च और निम्न पादरी वर्ग की अवस्था में बड़ा अंतर था। निम्न पादरी वर्ग शिक्षित होता था और वह जनता को शिक्षित करना अपना कर्त्तव्य समझता था। यद्यपि समस्त धार्मिक कृत्य निम्न पादरी ही संपन्न कराते थे, किंतु बड़े पादरियों के समक्ष उनकी दशा बड़ी हीन थी। उन्हें बड़े पादरियों के अकर्मण्य तथा विलासी जीवन के मुकाबले में अपनी हीन दशा को लेकर बड़ा क्षोभ था और वे अपनी स्थिति से बहुत असंतुष्ट थे। अतः यह निम्न पादरी वर्ग क्रांतिकारी विचारधारा का समर्थक था और जन साधारण के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखता था।

कृषक

इस युग में यूरोप में अधिक जनसंख्या कृषकों की थी। कृषक वर्ग भी दो प्रकार का था- स्वतंत्र तथा अर्द्ध-दास (सर्फ)। पूर्वी यूरोप और मध्य यूरोप में अधिकांश कृषक अब भी अर्द्धदास की अवस्था में थे। उनकी दशा पशुओं से भी हीन थी। ये अर्द्ध-दास अपने जागीरदार की जमीन पर खेती करते थे और जागीरदारों के सब अत्याचारों को सहन करते थे। फ्रांस जैसे देश में जहाँ अर्द्ध-दास व्यवस्था (सर्फडम) टूट चुकी थी, यहाँ भी कृषक करों के भार से दबे हुए थे। इन लोगों को तीन प्रकार के कर देने पड़ते थे- राजा को, सामंतों को और चर्च को। सभी प्रकार के करों को देने के बाद उनके पास इतना भी नहीं बचता था कि वे सुखपूर्वक अपने जीवन का निर्वाह कर सकें।

कृषक वर्ग पुरातन व्यवस्था के शोषण का प्रबल शिकार था। जागीरदार अकसर शिकार खेलने जाते थे और उनके लहलहाते खेतों को रौंद डालते थे, किंतु कृषकों को इसके विरूद्ध आवाज उठाने का कोई अधिकार नहीं था। यदि उनके सामंत के यहाँ कोई उत्सव होता था, तो इसके व्यय का भार इन्हीं गरीबों को उठाना पड़ता था। उन्हें सप्ताह में तीन दिन सामंतों के यहाँ ‘बेगारी’ करनी पड़ती थी। खेतों की उपज भी इनके घर में आने के पहले ही बँट जाती थी। इनकी मेहनत और खून की कमाई जागीरदारों और पादरियों के भोग-विलास में व्यय की जाती थी। शायद ही किसी किसान के घर दो समय खाना बनता हो। अधिकतर इन्हें भूखों रहकर कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।

इस प्रकार कृषकों तथा अर्द्ध-दासों की अवस्था इतनी दयनीय थी कि उनको सुधारने के लिए एक क्रांति की आवश्यकता थी। किंतु कृषक वर्ग इस तरह की बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था। अशिक्षा और भूख ने उनकी विचार-शक्ति का हनन कर दिया था। वे सोच भी नहीं सकते थे कि सभी मनुष्य समान हो सकते हैं। वे अपनी अवस्था को ‘दैवी प्रकोप’ समझकर संतुष्ट थे।

मध्यम वर्ग

इन वर्गों के अतिरिक्त यूरोपीय समाज में एक मध्यम वर्ग भी था। इस वर्ग के अधिकतर लोग नगरों में रहते थे और इसके अंतर्गत समृद्ध व्यापारी वर्ग तथा वकील सरकारी नौकर और अध्यापक लोग थे। इस वर्ग की आर्थिक स्थिति अच्छी थी, किंतु कुलीन वर्ग के समान इनको विशेष अधिकार प्राप्त नहीं थे। वे शिक्षित थे और आर्थिक दृष्टि से कुलीनों की बराबरी के थे, परंतु राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से वे कुलीनों के नीचे थे। समाज में उन्हें कुलीनों के जैसा सम्मान और अधिकार नहीं प्राप्त था, अतएव यह वर्ग कुलीनों से बहुत असंतुष्ट था और उनसे ईर्ष्या रखता था। यह वर्ग अपने को कुलीन वर्ग से श्रेष्ठ समझता था और राज्य द्वारा किये गये भेदभाव को अपना अपमान मानता था। तत्कालीन क्रांतिकारी विचारधारा से मध्यमवर्ग अत्यधिक प्रभावित था। फ्रांस में इस वर्ग की संख्या अन्य यूरोपीय देशों के अपेक्षा बहुत अधिक थी और वे क्रांति नेतृत्व करने को तैयार बैठे थे।

शिल्पी और कारीगर

यूरोप के नगरों में एक वर्ग शिल्पियों और कारीगरों का भी था, जो अपनी-अपनी कारीगरी के अनुसार श्रेणियों में बँटे हुए थे। ये श्रेणियाँ अपने-अपने नियम बनाती थीं। यहाँ तक कि बनाये हुए माल का विक्रय मूल्य भी निर्धारित करती थीं। इसके फलस्वरूप व्यापार और उद्योग धंधों में प्रतिस्पर्द्धा नहीं होती थी, किंतु श्रेणी पद्धति के कुछ अवगुण भी थे। इस नियंत्रण के कारण कारीगरों को स्वतंत्रता नहीं थी। वे अपनी इच्छानुसार व्यवसाय नहीं कर सकते थे।

व्यवसायिक क्रांति

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एक व्यवसायिक क्रांति हुई। यांत्रिक आविष्कार और भाप की शक्ति का पता लगने के बाद यूरोप के आर्थिक जीवन में अमूल परिवर्तन होना निश्चित हो गया। इन आविष्कारों के फलस्वरूप चीजों का उत्पादन कम समय और कम खर्च में बहुत बड़े पैमाने पर होने लगा। अब पूँजीपतियों ने बड़े-बड़े कारखाने कायम किये और बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करना आरंभ किया। फलतः श्रेणी पद्धति का अंत होने लगा और पुराने शिल्पी इन्हीं कारखानों में मजदूरी करने के लिए विवश होने लगे। मजदूरों की स्थिति दिनों दिन बिगड़ने लगी और वे पूँजीपतियों से गुलाम हो गये।

बौद्धिक क्रांति

यूरोपीय समाज के इस अन्यायपूर्ण वातावरण में इस समय एक नई विचारधारा चलने लगी थी, जिसने बौद्धिक उथल-पुथल के लिए रास्ता खोल दिया। इस तरह का बौद्धिक आंदोलन अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही शुरू हो गया था। इस आदोलन ने यूरोप से अंधविश्वास को दूर किया और लोगों को स्वतंत्र रूप से चितन करने का अवसर दिया। इस वातावरण में लोग सामाजिक संस्थाओं की तर्क तथा उनकी उपादेयता के आधार पर परीक्षा करने लगे और उनके दोषों के निवारण का उपाय ढूँढ़ने लगे। इस नवीन विचारधारा का सूत्रपात अठारहवीं शताब्दी के कुछ विचारकों ने किया, जिन्होंने अपने लेखों और पुस्तकों के द्वारा लोगों का ध्यान ‘पुरातन व्यवस्था’ की त्रुटियों की ओर आकृष्ट किया और लोग विशेषाधिकार, अनाचार आदि के विरूद्ध सोचने और बोलने लगे और समाज तथा राजनीति में एक क्रांति का वातावरण तैयार हो गया।

इस प्रकार 18वीं शताब्दी के अंत तक यूरोप में इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, आस्ट्रिया और प्रशा का ही प्रभुत्व छाया हुआ था। अठारहवीं शताब्दी का अंतिम दशक ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हेजन ने लिखा है, ‘अंतिम दशक में अठारहवीं शताब्दी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई। यह दशक विश्व इतिहास का एक स्मरणीय युग है। फ्रांस की पुरातन व्यवस्था का जो उन्मूलन हुआ, उसने संपूर्ण यूरोप की ‘पुरातन व्यवस्था’ को बुरी तरह झकझोर दिया।’

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