प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) : कारण, प्रमुख घटनाएँ और परिणाम
प्रथम विश्व युद्ध का परिचय
प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चला एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय युद्ध था। इसका प्रारंभ यूरोप में हुआ, लेकिन धीरे-धीरे यह यूरोप से बाहर एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और समुद्री क्षेत्रों तक फैल गया। युद्ध में उस समय की प्रमुख विश्व शक्तियाँ दो बड़े गुटों में विभाजित होकर शामिल हुईं। एक ओर मित्र राष्ट्र थे, जिनमें प्रारंभिक रूप से ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, सर्बिया और बाद में इटली, जापान तथा संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश शामिल हुए; दूसरी ओर केंद्रीय शक्तियों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, उस्मानी साम्राज्य और बुल्गारिया प्रमुख थे। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे उपनिवेशों ने भी सैनिक तथा आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराए।
समकालीन लोगों ने इस युद्ध को ‘महायुद्ध’ और ‘सभी युद्धों को समाप्त करने वाला युद्ध’ कहा, क्योंकि उन्हें आशा थी कि इतनी व्यापक तबाही के बाद भविष्य में इस प्रकार के युद्धों की पुनरावृत्ति नहीं होगी। किंतु इतिहास ने इसके विपरीत परिणाम दिखाया। प्रथम विश्व युद्ध ने यूरोप की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संरचना को गहराई से बदल दिया तथा इसके बाद उत्पन्न असंतोष और अंतरराष्ट्रीय तनाव ने आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
यह युद्ध आधुनिक औद्योगिक युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण था। इसमें मशीनगन, भारी तोपखाने, टैंक, विमान, पनडुब्बियाँ और रासायनिक हथियारों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। पश्चिमी मोर्चे पर खंदक युद्ध ने सैनिकों के जीवन को अत्यंत कठिन बना दिया। सैनिकों को लंबे समय तक कीचड़, ठंड, चूहों, रोगों, गोलाबारी और भोजन तथा स्वच्छता की समस्याओं के बीच रहना पड़ता था। इस कारण युद्ध केवल सैनिकों के बीच संघर्ष नहीं रहा, बल्कि संपूर्ण समाज और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला ‘सर्वग्राही युद्ध’ बन गया।
युद्ध में करोड़ों सैनिकों ने भाग लिया और सैनिकों तथा असैनिकों सहित लगभग दो करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। इसके अतिरिक्त करोड़ों लोग घायल, विस्थापित और स्थायी रूप से विकलांग हुए। युद्ध के बाद फैली 1918–1920 की इन्फ्लुएंजा महामारी, जिसे सामान्यतः ‘स्पेनिश फ्लू’ कहा जाता है, ने भी विश्वभर में अत्यधिक जनहानि की। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध आधुनिक इतिहास की सबसे विनाशकारी घटनाओं में से एक सिद्ध हुआ।
प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारण
प्रथम विश्व युद्ध किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। इसके पीछे कई वर्षों से विकसित हो रहे राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और राष्ट्रीय तनाव जिम्मेदार थे। साम्राज्यवाद, उग्र राष्ट्रवाद, सैन्यवाद, गुटबंदी, हथियारों की होड़, बाल्कन क्षेत्र की समस्याएँ, फ्रांस और जर्मनी की प्रतिद्वंद्विता तथा जर्मनी की बढ़ती वैश्विक महत्त्वाकांक्षा ने यूरोप को युद्ध के लिए अनुकूल वातावरण में पहुँचा दिया था। 1914 में साराजेवो हत्याकांड ने इस लंबे समय से जमा तनाव को विस्फोट में बदल दिया।
साम्राज्यवाद और उपनिवेशवादी प्रतिस्पर्धा
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औद्योगिक क्रांति के विस्तार के साथ यूरोपीय शक्तियों की आर्थिक और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा बहुत तेज हो गई। औद्योगिक देशों को कच्चे माल, नए बाजारों, निवेश के क्षेत्रों और सामरिक मार्गों की आवश्यकता थी। ब्रिटेन और फ्रांस पहले से ही विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर चुके थे, जबकि जर्मनी का एकीकरण 1871 में हुआ और उसने अपेक्षाकृत देर से औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा में प्रवेश किया। जर्मनी को लगता था कि विश्व की शक्तियों के बीच उसका राजनीतिक और आर्थिक महत्त्व उसके औपनिवेशिक विस्तार की तुलना में अधिक होना चाहिए।
जर्मनी की बढ़ती आर्थिक और नौसैनिक शक्ति ने ब्रिटेन को चिंतित किया। जर्मनी ने अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र में कुछ उपनिवेश प्राप्त किए, लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस की तुलना में उसका औपनिवेशिक साम्राज्य छोटा था। जर्मनी की ‘विश्व राजनीति’ (वेल्टपोलिटिक) ने उसे यूरोप के बाहर भी प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। इससे ब्रिटेन और फ्रांस के साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ा।
मोरक्को संकटों ने इस प्रतिद्वंद्विता को और तीव्र किया। 1905–06 के प्रथम मोरक्को संकट तथा 1911 के अगादीर संकट में जर्मनी और फ्रांस आमने-सामने आए। यद्यपि इन संकटों का तत्काल समाधान हो गया, लेकिन इनसे यूरोप की शक्तियों के बीच अविश्वास और गहरा हुआ।
जर्मनी द्वारा बर्लिन–बगदाद रेलवे परियोजना को समर्थन देना भी ब्रिटेन और रूस के लिए चिंता का विषय बना। यह परियोजना जर्मनी को उस्मानी साम्राज्य और पश्चिमी एशिया से जोड़ सकती थी तथा जर्मन आर्थिक और सामरिक प्रभाव को बढ़ा सकती थी। इसलिए साम्राज्यवाद केवल उपनिवेश प्राप्त करने की प्रतियोगिता नहीं रहा, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन का प्रश्न बन गया।
राजनीतिक गुटबंदी और सैन्य गठबंधन
प्रथम विश्व युद्ध से पहले यूरोप में दो प्रमुख शक्ति-गुट विकसित हो गए थे। इन गुटों ने किसी भी स्थानीय विवाद को व्यापक युद्ध में बदलने की संभावना बढ़ा दी। 1879 में जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के बीच द्विराष्ट्र संधि हुई। 1882 में इटली भी इस समझौते में शामिल हो गया और इस प्रकार त्रिगुट (ट्रिपल एलायंस) का निर्माण हुआ। इसका उद्देश्य मुख्यतः फ्रांस और रूस के विरुद्ध शक्ति-संतुलन स्थापित करना था। बिस्मार्क की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य फ्रांस को यूरोप में अलग-थलग रखना और जर्मनी को दो मोर्चों पर युद्ध से बचाना था। 1890 में बिस्मार्क को सत्ता से हटाए जाने के बाद जर्मनी की विदेश नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। 1894 में फ्रांस और रूस के बीच सैन्य समझौता हुआ। इससे जर्मनी को दो मोर्चों पर संभावित युद्ध का खतरा दिखाई देने लगा।
ब्रिटेन लंबे समय तक यूरोपीय स्थायी गठबंधनों से दूरी बनाए रखने की नीति पर चल रहा था, जिसे ‘शानदार पृथक्करण’ (स्प्लेंडिड आइसोलेशन) कहा जाता है। किंतु जर्मनी की बढ़ती शक्ति और नौसैनिक विस्तार से चिंतित होकर ब्रिटेन ने 1902 में जापान के साथ एंग्लो-जापानी संधि की। 1904 में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच ‘एंतांत कॉर्डियल’ (एंताँत कॉर्दियाल) हुआ। 1907 में ब्रिटेन और रूस के बीच समझौते के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच ‘त्रिराष्ट्र मैत्री’ (ट्रिपल एंतांत) का स्वरूप स्पष्ट हुआ।
इस प्रकार यूरोप दो बड़े शक्ति-समूहों में विभाजित हो गया। यह औपचारिक रूप से एक ही प्रकार के सैन्य गठबंधनों का सरल विभाजन नहीं था, फिर भी इन गुटों ने संकट की स्थिति में देशों को एक-दूसरे के पक्ष में खड़ा होने के लिए बाध्य किया। परिणामस्वरूप 1914 में ऑस्ट्रिया और सर्बिया के बीच आरंभ हुआ स्थानीय संघर्ष कुछ ही दिनों में यूरोपीय युद्ध और फिर विश्व युद्ध में बदल गया।
सैन्यवाद और हथियारों की होड़
प्रथम विश्व युद्ध से पहले यूरोप में सैन्यवाद तेजी से बढ़ रहा था। जर्मनी, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अन्य शक्तियाँ अपनी सेनाओं और हथियारों को लगातार बढ़ा रही थीं। अनिवार्य सैनिक सेवा, विशाल स्थायी सेनाएँ, आधुनिक तोपखाने, मशीनगन और युद्धपोतों का निर्माण यूरोपीय देशों की सैन्य नीति का हिस्सा बन गया था।
विशेष रूप से ब्रिटेन और जर्मनी के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा अत्यंत तीव्र थी। जर्मनी ने ब्रिटेन की समुद्री शक्ति को चुनौती देने के लिए आधुनिक युद्धपोतों का निर्माण शुरू किया। ब्रिटेन ने इसका उत्तर अपने शक्तिशाली रॉयल नेवी के विस्तार से दिया। 1906 में ब्रिटेन द्वारा ‘एचएमएस ड्रेडनॉट’ जैसे आधुनिक युद्धपोत के निर्माण के बाद नौसैनिक हथियारों की होड़ और बढ़ गई।
सैन्यवाद का प्रभाव केवल सरकारों तक सीमित नहीं था। सैन्य शक्ति को राष्ट्रीय गौरव और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाने लगा। अनेक देशों में यह धारणा मजबूत हुई कि शक्तिशाली सेना के बिना राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं की जा सकती। इस मानसिकता ने समझौते और कूटनीति की तुलना में सैन्य समाधान को अधिक स्वीकार्य बना दिया।
उग्र राष्ट्रवाद
उग्र राष्ट्रवाद प्रथम विश्व युद्ध का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कारण था। उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीयता की भावना ने यूरोप में कई नए राष्ट्रों के निर्माण में योगदान दिया था, किंतु बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक यह भावना कई क्षेत्रों में आक्रामक रूप ले चुकी थी। फ्रांस में 1871 की फ्रांको-प्रशियन युद्ध की हार और अल्सास-लोरेन के जर्मनी के अधीन चले जाने से जर्मनी के प्रति गहरा असंतोष बना रहा। फ्रांस में इन प्रदेशों को वापस प्राप्त करने की इच्छा लंबे समय तक बनी रही। जर्मनी में पैन-जर्मनवाद की भावना विकसित हुई। इसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले जर्मन भाषी लोगों को एक व्यापक जर्मन राष्ट्र के अंतर्गत संगठित करना था। इसी प्रकार रूस में पैन-स्लाववाद का प्रभाव बढ़ा। रूस स्वयं को बाल्कन क्षेत्र के स्लाव लोगों, विशेषकर सर्बिया, का संरक्षक मानता था।
बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रवाद विशेष रूप से विस्फोटक था। सर्ब, बुल्गार, यूनानी और अन्य जातीय समूह उस्मानी साम्राज्य के कमजोर होने के बाद अपने स्वतंत्र राष्ट्रीय राज्यों का विस्तार करना चाहते थे। ऑस्ट्रिया-हंगरी के साम्राज्य में भी अनेक स्लाव समुदाय रहते थे। सर्बिया के विस्तारवादी राष्ट्रवाद और ऑस्ट्रिया-हंगरी की साम्राज्यवादी सुरक्षा-चिंताओं का टकराव अंततः गंभीर संकट का कारण बना।
बाल्कन संकट
बाल्कन प्रायद्वीप को प्रथम विश्व युद्ध से पहले ‘यूरोप का बारूद का ढेर’ कहा जाने लगा था। इसका प्रमुख कारण उस्मानी साम्राज्य का लगातार कमजोर होना और उसके यूरोपीय क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए विभिन्न शक्तियों तथा स्थानीय राष्ट्रवादी समूहों की प्रतिस्पर्धा थी।
1908 में ऑस्ट्रिया-हंगरी ने बोस्निया और हर्जेगोविना का औपचारिक विलय कर लिया। सर्बिया इस कदम से अत्यंत नाराज हुआ, क्योंकि वह दक्षिणी स्लाव क्षेत्रों को एक बड़े सर्ब राष्ट्र में शामिल करना चाहता था। रूस भी सर्बिया का समर्थन करता था, लेकिन 1904–05 के रूस-जापान युद्ध में पराजय के बाद रूस तत्काल बड़े युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था।
1912–13 के बाल्कन युद्धों ने क्षेत्र की स्थिति को और अस्थिर कर दिया। इन युद्धों में उस्मानी साम्राज्य को यूरोप में भारी क्षेत्रीय क्षति हुई और बाल्कन के छोटे राष्ट्रों की शक्ति बढ़ी। सर्बिया की शक्ति में वृद्धि ऑस्ट्रिया-हंगरी के लिए विशेष रूप से चिंताजनक थी। इस प्रकार 1914 तक बाल्कन में ऐसा वातावरण बन चुका था जिसमें एक छोटी-सी घटना भी बड़े युद्ध को जन्म दे सकती थी।
फ्रांस और जर्मनी की प्रतिद्वंद्विता
फ्रांस और जर्मनी के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण 1870–71 का फ्रांको-प्रशियन युद्ध था। इस युद्ध में फ्रांस की पराजय हुई और फ्रैंकफर्ट की संधि के बाद अल्सास तथा लोरेन का अधिकांश भाग जर्मनी को मिल गया। फ्रांसीसी समाज में इन प्रदेशों को वापस लेने की इच्छा बनी रही।
अल्सास-लोरेन का प्रश्न केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से संबंधित नहीं था, बल्कि इन क्षेत्रों का औद्योगिक और सामरिक महत्त्व भी था। वहाँ कोयला और लौह संसाधनों के कारण आर्थिक महत्त्व था। इसलिए फ्रांस और जर्मनी के बीच प्रतिस्पर्धा यूरोप की व्यापक शक्ति-राजनीति से जुड़ गई।
कैसर विलियम द्वितीय की विश्व-नीति
1888 में जर्मनी का सम्राट बनने वाले कैसर विलियम द्वितीय ने बिस्मार्क की अपेक्षाकृत सावधान विदेश नीति की तुलना में अधिक सक्रिय और महत्वाकांक्षी विदेश नीति अपनाई। 1890 में बिस्मार्क के पद से हटने के बाद जर्मनी ने विश्व राजनीति में अधिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया।
विलियम द्वितीय ने जर्मनी की सेना के साथ-साथ नौसेना को भी शक्तिशाली बनाने पर जोर दिया। जर्मन नौसैनिक विस्तार से ब्रिटेन को लगा कि उसकी समुद्री और साम्राज्यवादी शक्ति को चुनौती दी जा रही है। जर्मनी की ‘विश्व राजनीति’ तथा उपनिवेशों, व्यापारिक मार्गों और आर्थिक प्रभाव को बढ़ाने की नीति ने यूरोपीय शक्तियों के बीच तनाव को और बढ़ाया।
यद्यपि प्रथम विश्व युद्ध के लिए केवल विलियम द्वितीय को ही जिम्मेदार ठहराना इतिहास की जटिल परिस्थितियों को अत्यधिक सरल बना देना होगा। युद्ध के पीछे कई देशों की नीतियाँ, गठबंधन, सैन्यवाद, राष्ट्रवाद और संकट-प्रबंधन की विफलताएँ संयुक्त रूप से जिम्मेदार थीं।
प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण : साराजेवो हत्याकांड
28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी सोफी की बोस्निया की राजधानी साराजेवो में हत्या कर दी गई। हत्या करने वाला गैवरिलो प्रिंसिप बोस्नियाई सर्ब राष्ट्रवादी था और ‘यंग बोस्निया’ से संबद्ध था। वह ‘ब्लैक हैंड’ से भी जुड़ा हुआ था, जो सर्ब राष्ट्रवादी गुप्त संगठन था।

ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इस हत्या को सर्बिया के विरुद्ध कार्रवाई का अवसर माना। जर्मनी ने 5–6 जुलाई 1914 के आसपास ऑस्ट्रिया-हंगरी को मजबूत समर्थन दिया, जिसे इतिहास में प्रायः ‘ब्लैंक चेक’ कहा जाता है। 23 जुलाई को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को अत्यंत कठोर शर्तों वाला अल्टीमेटम दिया और उसे 48 घंटे के भीतर उत्तर देने को कहा।
सर्बिया ने अधिकांश शर्तें स्वीकार कर लीं, लेकिन कुछ शर्तों पर आपत्ति जताई, विशेषकर ऐसी शर्तों पर जो उसकी संप्रभुता को प्रभावित करती थीं। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के उत्तर को पर्याप्त नहीं माना और 28 जुलाई 1914 को सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यही वह घटना थी जिसने पहले से तनावग्रस्त यूरोप को व्यापक युद्ध की ओर धकेल दिया।
युद्ध का विस्तार
सर्बिया के विरुद्ध ऑस्ट्रिया-हंगरी की कार्रवाई के बाद रूस ने सर्बिया का समर्थन किया और अपनी सेना को लामबंद करना शुरू किया। जर्मनी ने 1 अगस्त 1914 को रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। 3 अगस्त को जर्मनी ने फ्रांस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
जर्मनी ने फ्रांस पर शीघ्र विजय प्राप्त करने के लिए श्लिफेन योजना पर आधारित रणनीति अपनाई। इस योजना के अनुसार जर्मनी को पहले पश्चिमी मोर्चे पर फ्रांस को पराजित करना था और फिर अपनी सेना को पूर्वी मोर्चे पर रूस के विरुद्ध केंद्रित करना था।
जर्मन सेना ने तटस्थ बेल्जियम में प्रवेश किया। बेल्जियम की तटस्थता को 1839 की लंदन संधि के तहत यूरोपीय शक्तियों ने मान्यता दी थी। जर्मनी द्वारा बेल्जियम पर आक्रमण किए जाने के बाद ब्रिटेन ने 4 अगस्त 1914 को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ सीधे युद्ध में उतर गईं।
प्रथम विश्व युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
1914 : युद्ध का प्रारंभ
1914 में जर्मनी ने पश्चिमी मोर्चे पर फ्रांस के विरुद्ध तेज अभियान चलाया। प्रारंभ में जर्मन सेना ने तेजी से आगे बढ़ते हुए बेल्जियम और उत्तरी फ्रांस में प्रवेश किया, लेकिन सितंबर 1914 में प्रथम मार्न युद्ध में फ्रांसीसी और ब्रिटिश सेनाओं ने जर्मन सेना को पेरिस के निकट रोक दिया।
प्रथम मार्न युद्ध का महत्त्व इसलिए अधिक था क्योंकि इसने जर्मनी की त्वरित विजय की योजना को विफल कर दिया। इसके बाद पश्चिमी मोर्चे पर दोनों पक्षों ने लंबी खंदकें बनानी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे पश्चिमी मोर्चा स्विट्जरलैंड से लेकर उत्तरी सागर तक खंदकों की लंबी श्रृंखला में बदल गया।
पूर्वी मोर्चे पर अगस्त 1914 में टैननबर्ग के युद्ध में जर्मनी ने रूसी सेना को भारी पराजय दी। जनरल पॉल फॉन हिंडनबर्ग और एरिख लुडेनडॉर्फ के नेतृत्व में जर्मन सेना ने रूस की दूसरी सेना को गंभीर क्षति पहुँचाई। फिर भी रूस युद्ध से बाहर नहीं हुआ और पूर्वी मोर्चे पर संघर्ष जारी रहा।
1914 के अंत में पश्चिमी मोर्चे पर कुछ स्थानों पर क्रिसमस युद्धविराम भी हुआ। ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने अनौपचारिक रूप से कुछ क्षेत्रों में हथियार रोककर एक-दूसरे से बातचीत की और क्रिसमस मनाया। यह घटना युद्ध की भयावहता के बीच मानवीय संवेदना का उल्लेखनीय उदाहरण मानी जाती है।
1915 : युद्ध का विस्तार
1915 में युद्ध का भौगोलिक विस्तार हुआ और नई सैन्य तकनीकों का प्रयोग बढ़ा। इटली ने मई 1915 में मित्र राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में प्रवेश किया। 1914 में उसने त्रिगुट के साथ युद्ध में भाग नहीं लिया था और बाद में लंदन की गुप्त संधि के आधार पर मित्र राष्ट्रों का पक्ष लिया। इटली का उद्देश्य ऑस्ट्रिया-हंगरी से कुछ क्षेत्र प्राप्त करना भी था।
1915 में मित्र राष्ट्रों ने गैलीपोली अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य डार्डानेल्स जलडमरूमध्य पर नियंत्रण प्राप्त करना और रूस के साथ समुद्री संपर्क स्थापित करना था। ब्रिटिश, फ्रांसीसी, ऑस्ट्रेलियाई और न्यूजीलैंड की सेनाओं ने इसमें भाग लिया। उस्मानी सेना ने कड़ा प्रतिरोध किया और मुस्तफा कमाल के नेतृत्व ने अभियान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः मित्र राष्ट्रों को भारी नुकसान उठाकर 1915 के अंत से 1916 की शुरुआत तक गैलीपोली से हटना पड़ा।
अप्रैल 1915 में दूसरे इप्रेस युद्ध के दौरान जर्मनी ने बड़े पैमाने पर क्लोरीन गैस का प्रयोग किया। इससे रासायनिक युद्ध का एक नया और भयावह अध्याय शुरू हुआ। बाद में दोनों पक्षों ने विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसों का उपयोग किया। रासायनिक हथियारों ने युद्ध की क्रूरता को और बढ़ा दिया।
7 मई 1915 को जर्मन पनडुब्बी यू-20 ने ब्रिटिश यात्री जहाज ‘लुसितानिया’ को डुबो दिया। इसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए, जिनमें 128 अमेरिकी नागरिक थे। इस घटना ने अमेरिकी जनमत को प्रभावित किया, हालांकि अमेरिका का 1917 में युद्ध में प्रवेश केवल लुसितानिया की घटना का परिणाम नहीं था।
1916 : युद्ध की चरम क्रूरता
1916 प्रथम विश्व युद्ध के सबसे रक्तरंजित वर्षों में से एक था। इस वर्ष पश्चिमी मोर्चे पर वर्दुन और सोम्मे जैसे विशाल युद्ध हुए तथा समुद्र में जूटलैंड का नौसैनिक युद्ध लड़ा गया।
वर्दुन का युद्ध
फरवरी से दिसंबर 1916 तक चले वर्दुन के युद्ध में जर्मनी और फ्रांस के बीच भीषण संघर्ष हुआ। जर्मन रणनीति का उद्देश्य फ्रांसीसी सेना को अत्यधिक क्षति पहुँचाकर कमजोर करना था। फ्रांस ने वर्दुन की रक्षा को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। इस युद्ध में दोनों पक्षों को भारी जनहानि हुई और वर्दुन प्रथम विश्व युद्ध की भयावहता का प्रतीक बन गया।
सोम्मे का युद्ध
जुलाई 1916 में मित्र राष्ट्रों ने सोम्मे नदी के क्षेत्र में बड़ा आक्रमण शुरू किया। 1 जुलाई 1916 को ब्रिटिश सेना को अत्यधिक भारी क्षति हुई और यह दिन ब्रिटिश सैन्य इतिहास के सबसे रक्तरंजित दिनों में गिना जाता है। 15 सितंबर 1916 को सोम्मे के मोर्चे पर ब्रिटेन ने पहली बार टैंक का युद्ध में प्रयोग किया। प्रारंभिक टैंक तकनीकी रूप से सीमित थे, लेकिन उन्होंने भविष्य के युद्धों में बख्तरबंद युद्ध की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जूटलैंड का नौसैनिक युद्ध
31 मई से 1 जून 1916 के बीच उत्तरी सागर में जर्मन हाई सीज़ फ्लीट और ब्रिटिश रॉयल नेवी के बीच जूटलैंड का युद्ध हुआ। यह प्रथम विश्व युद्ध का सबसे बड़ा नौसैनिक युद्ध था। यद्यपि जर्मनी ने ब्रिटेन की तुलना में कुछ कम जहाज खोए, फिर भी ब्रिटेन का समुद्री नियंत्रण कायम रहा और जर्मन बेड़े को निर्णायक रणनीतिक सफलता नहीं मिली।
ब्रुसिलोव आक्रमण
1916 में रूस ने पूर्वी मोर्चे पर ब्रुसिलोव आक्रमण किया। जनरल अलेक्सी ब्रुसिलोव के नेतृत्व में रूसी सेना ने ऑस्ट्रिया-हंगरी को गंभीर क्षति पहुँचाई। यह रूस के सबसे सफल सैन्य अभियानों में से एक था, किंतु रूसी सेना को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा। युद्ध के कारण रूस की आर्थिक और सामाजिक समस्याएँ बढ़ती गईं, जिसने 1917 की रूसी क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में योगदान दिया।
1917 : युद्ध में निर्णायक परिवर्तन
1917 प्रथम विश्व युद्ध के इतिहास में निर्णायक वर्ष था। इसी वर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ, जबकि रूसी क्रांति के बाद रूस युद्ध से बाहर निकलने की प्रक्रिया में चला गया। इस प्रकार एक ओर मित्र राष्ट्रों को अमेरिका की विशाल आर्थिक और सैन्य शक्ति मिली, तो दूसरी ओर जर्मनी को पूर्वी मोर्चे से राहत मिलने की आशा बनी।
अमेरिका का युद्ध में प्रवेश
जर्मनी ने 1917 में असीमित पनडुब्बी युद्ध फिर से शुरू किया। इसका उद्देश्य ब्रिटेन को समुद्री आपूर्ति से काटना था। जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों की ओर जाने वाले जहाजों के साथ-साथ तटस्थ देशों के जहाजों को भी जोखिम में डाल दिया।
इसके साथ ही जनवरी 1917 में जर्मन विदेश मंत्री आर्थर ज़िमरमैन द्वारा मेक्सिको को भेजा गया ‘ज़िमरमैन टेलीग्राम’ ब्रिटेन के हाथ लगा और बाद में अमेरिका के सामने आया। इसमें जर्मनी ने अमेरिका के विरुद्ध संभावित युद्ध की स्थिति में मेक्सिको को अमेरिकी क्षेत्रों की वापसी के बदले जर्मनी का साथ देने का प्रस्ताव दिया था। इन घटनाओं से अमेरिकी जनमत जर्मनी के विरुद्ध अधिक मजबूत हुआ।
6 अप्रैल 1917 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अमेरिकी सैनिकों और संसाधनों के आगमन ने मित्र राष्ट्रों की सैन्य और आर्थिक क्षमता को बहुत बढ़ा दिया।

रूसी क्रांति और रूस की युद्ध से वापसी
युद्ध ने रूस में खाद्य संकट, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और सैनिक असंतोष को बढ़ा दिया। मार्च 1917 की फरवरी क्रांति के परिणामस्वरूप जार निकोलस द्वितीय ने सिंहासन त्याग दिया और अस्थायी सरकार बनी। अस्थायी सरकार ने युद्ध जारी रखा, लेकिन इससे जनता की समस्याएँ कम नहीं हुईं।
अक्टूबर 1917 में बोल्शेविकों ने व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में सत्ता पर अधिकार कर लिया। बोल्शेविक सरकार ने युद्ध समाप्त करने का निर्णय लिया। अंततः 3 मार्च 1918 को रूस और केंद्रीय शक्तियों के बीच ब्रेस्ट-लितोव्स्क की संधि हुई। इसके तहत रूस ने बड़े क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण खो दिया और युद्ध से बाहर हो गया।
पास्केंडेल का युद्ध
1917 में बेल्जियम के पास इप्रेस क्षेत्र में तीसरा इप्रेस युद्ध हुआ, जिसे पास्केंडेल के नाम से भी जाना जाता है। भारी वर्षा और कीचड़ ने युद्ध को अत्यंत कठिन बना दिया। सैनिकों को खंदकों और कीचड़ भरे मैदानों में लड़ना पड़ा। युद्ध में भारी जनहानि हुई, लेकिन मित्र राष्ट्रों को अपेक्षित निर्णायक सफलता नहीं मिली।
कैपोरेट्टो का युद्ध
अक्टूबर 1917 में ऑस्ट्रिया-हंगरी और जर्मनी की संयुक्त सेनाओं ने इटली के विरुद्ध कैपोरेट्टो में बड़ा आक्रमण किया। इटली को भारी क्षति हुई और उसकी सेना को पीछे हटना पड़ा। इस घटना के बाद मित्र राष्ट्रों ने इटली को सैन्य सहायता प्रदान की और इटली के मोर्चे को स्थिर करने का प्रयास किया।
1918 : युद्ध का अंतिम चरण
1918 में युद्ध का संतुलन तेजी से मित्र राष्ट्रों के पक्ष में जाने लगा। रूस के युद्ध से बाहर होने के बाद जर्मनी ने पश्चिमी मोर्चे पर बड़ी संख्या में सैनिक भेजे और वसंत आक्रमण शुरू किया। प्रारंभ में जर्मन सेना ने कुछ सफलता प्राप्त की, लेकिन वह निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सकी।
अमेरिकी सैनिकों के लगातार यूरोप पहुँचने से मित्र राष्ट्रों की शक्ति बढ़ती गई। जर्मन सेना थक चुकी थी और जर्मनी के भीतर भोजन की कमी, आर्थिक संकट तथा राजनीतिक असंतोष बढ़ रहा था।
जुलाई 1918 में दूसरा मार्न युद्ध मित्र राष्ट्रों के पक्ष में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके बाद मित्र राष्ट्रों ने ‘हंड्रेड डेज़ ऑफेंसिव’ के नाम से लगातार आक्रमण किए। 8 अगस्त 1918 के एमिएंस युद्ध में मित्र राष्ट्रों ने जर्मन सेना को गंभीर क्षति पहुँचाई। टैंकों, विमानों, तोपखाने और पैदल सेना के बेहतर समन्वय ने मित्र राष्ट्रों की शक्ति बढ़ाई।
सितंबर–नवंबर 1918 के बीच केंद्रीय शक्तियों के सहयोगी एक-एक करके युद्ध से बाहर होने लगे। बुल्गारिया ने सितंबर 1918 में युद्धविराम किया, उस्मानी साम्राज्य ने अक्टूबर 1918 में युद्धविराम स्वीकार किया और ऑस्ट्रिया-हंगरी का साम्राज्य नवंबर 1918 में विघटित होने लगा।
जर्मनी में क्रांति और कैसर का पतन
युद्ध के अंतिम महीनों में जर्मनी में खाद्य संकट, आर्थिक कठिनाइयाँ और सैनिक असंतोष बढ़ गया। नवंबर 1918 में नौसैनिक विद्रोहों और राजनीतिक उथल-पुथल ने जर्मन राजशाही को संकट में डाल दिया। कैसर विलियम द्वितीय ने 9 नवंबर 1918 को पद त्याग दिया और नीदरलैंड चले गए। जर्मनी में गणतांत्रिक शासन की स्थापना की दिशा में कदम उठाए गए, जिसे बाद में वाइमर गणराज्य कहा गया।
11 नवंबर 1918 का युद्धविराम
11 नवंबर 1918 को जर्मनी ने फ्रांस के कॉम्पिएन के निकट युद्धविराम की शर्तें स्वीकार कर लीं। सुबह 11 बजे युद्धविराम प्रभावी हुआ और पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध समाप्त हो गया। यह प्रथम विश्व युद्ध के सैन्य संघर्ष का औपचारिक अंत था, यद्यपि अंतिम शांति समझौते बाद में हुए।
पेरिस शांति सम्मेलन
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद विजयी मित्र राष्ट्रों ने युद्धोत्तर व्यवस्था निर्धारित करने के लिए पेरिस शांति सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन 18 जनवरी 1919 को शुरू हुआ। इसमें अनेक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, किंतु वास्तविक निर्णयों में प्रमुख भूमिका अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज, फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो और इटली के प्रधानमंत्री विट्टोरियो ऑरलांडो जैसे नेताओं की थी।
वुडरो विल्सन ने अपने ‘चौदह सूत्रों’ के माध्यम से युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था के लिए आत्मनिर्णय, खुले कूटनीतिक समझौते और अंतरराष्ट्रीय शांति जैसी अवधारणाओं को बढ़ावा दिया। सम्मेलन का एक प्रमुख परिणाम राष्ट्रसंघ की स्थापना की योजना थी।
जर्मनी के साथ 28 जून 1919 को वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर हुए। इसमें जर्मनी पर सैन्य प्रतिबंध लगाए गए, उसके कुछ क्षेत्रों और उपनिवेशों को उससे अलग किया गया तथा क्षतिपूर्ति से संबंधित कठोर प्रावधान किए गए। संधि के अनुच्छेद 231 में जर्मनी और उसके सहयोगियों की युद्ध-उत्तरदायित्व संबंधी कानूनी व्यवस्था की गई, जिसे जर्मनी में अत्यंत अपमानजनक माना गया।
अन्य केंद्रीय शक्तियों के साथ भी अलग-अलग संधियाँ की गईं। ऑस्ट्रिया के साथ सेंट-जर्मेन की संधि, बुल्गारिया के साथ न्युइली की संधि, हंगरी के साथ ट्रायनॉन की संधि और उस्मानी साम्राज्य के साथ सेव्र की संधि की गई।
प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम
व्यापक जनहानि
प्रथम विश्व युद्ध का सबसे गंभीर परिणाम अभूतपूर्व जनहानि थी। सैनिकों और असैनिकों सहित करोड़ों लोग मारे गए तथा इससे भी अधिक लोग घायल और विकलांग हुए। लाखों परिवारों ने अपने सदस्यों को खो दिया। बड़ी संख्या में सैनिक मानसिक आघात और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हुए।
1918 में फैली इन्फ्लुएंजा महामारी ने युद्ध से कमजोर समाजों पर अतिरिक्त दबाव डाला। युद्ध से लौट रहे सैनिकों और लोगों की व्यापक आवाजाही ने महामारी के प्रसार में योगदान दिया। इस महामारी से विश्वभर में करोड़ों लोग प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई।
चार बड़े साम्राज्यों का पतन
प्रथम विश्व युद्ध के बाद चार प्रमुख साम्राज्य गंभीर रूप से टूट गए या समाप्त हो गए—जर्मन साम्राज्य, ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य, रूसी साम्राज्य और उस्मानी साम्राज्य। इनके पतन से यूरोप और पश्चिमी एशिया की राजनीतिक सीमाएँ बदल गईं।
ऑस्ट्रिया-हंगरी के विघटन के बाद ऑस्ट्रिया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया तथा यूगोस्लाविया जैसी नई राजनीतिक व्यवस्थाएँ सामने आईं। पोलैंड का स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पुनः उदय हुआ। बाल्टिक क्षेत्र में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया जैसे स्वतंत्र राष्ट्र उभरे।
राष्ट्रसंघ की स्थापना
युद्ध की भयावहता ने विश्व शांति के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता को मजबूत किया। परिणामस्वरूप राष्ट्रसंघ की स्थापना 1920 में हुई। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना और भविष्य के युद्धों को रोकना था।
यद्यपि राष्ट्रसंघ की स्थापना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन उसकी संरचनात्मक कमजोरियों के कारण वह बाद में बड़े अंतरराष्ट्रीय संकटों को रोकने में सफल नहीं हो सका। विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रसंघ में शामिल न होना इसकी प्रभावशीलता के लिए गंभीर समस्या बना।
यूरोप की आर्थिक तबाही
युद्ध ने यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को भारी क्षति पहुँचाई। विशाल सैन्य व्यय, औद्योगिक उत्पादन में बाधा, परिवहन व्यवस्था का विनाश, कृषि संकट और युद्ध ऋणों ने यूरोपीय देशों को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया।
ब्रिटेन और फ्रांस युद्ध के दौरान भारी ऋणग्रस्त हुए। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका एक प्रमुख ऋणदाता और आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व की आर्थिक शक्ति का संतुलन यूरोप से अमेरिका की ओर स्थानांतरित होने लगा।
जर्मनी पर क्षतिपूर्ति का भार और बाद की आर्थिक समस्याएँ राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनीं। 1920 के दशक में जर्मनी में अत्यधिक मुद्रास्फीति और बेरोजगारी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर किया।
सामाजिक परिवर्तन और महिलाओं की भूमिका
युद्ध के दौरान पुरुषों के बड़ी संख्या में मोर्चे पर चले जाने के कारण महिलाओं ने कारखानों, परिवहन, अस्पतालों, कार्यालयों और अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कार्य किया। इससे महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भूमिका में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
युद्ध के बाद कई देशों में महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों के विस्तार को गति मिली। ब्रिटेन में 1918 के प्रतिनिधित्व अधिनियम के माध्यम से कुछ महिलाओं को मताधिकार मिला और बाद में इसका विस्तार हुआ। अमेरिका में 1920 में संविधान के उन्नीसवें संशोधन के माध्यम से महिलाओं को संघीय स्तर पर मताधिकार प्राप्त हुआ।
रूसी क्रांति और साम्यवाद का प्रसार
प्रथम विश्व युद्ध ने रूस की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को अत्यधिक बढ़ा दिया। युद्ध की कठिन परिस्थितियों ने 1917 की रूसी क्रांति के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। बोल्शेविकों के सत्ता में आने के बाद रूस में समाजवादी राज्य की स्थापना की दिशा में कदम उठाए गए। इससे विश्व राजनीति में पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच वैचारिक संघर्ष का एक नया अध्याय शुरू हुआ। आने वाले दशकों में साम्यवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख विचारधाराओं में से एक बन गया।
फासीवाद और नाजीवाद के उदय की पृष्ठभूमि
युद्ध के बाद इटली में आर्थिक संकट, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष बढ़ा। इसी वातावरण में बेनिटो मुसोलिनी के नेतृत्व में फासीवाद का उदय हुआ। जर्मनी में वर्साय की संधि, युद्ध की हार, आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रीय अपमान की भावना ने चरमपंथी राजनीति को बढ़ावा दिया। बाद में एडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी इसी असंतोष का लाभ उठाने में सफल हुए।
इस प्रकार यह कहना अधिक उचित है कि प्रथम विश्व युद्ध और वर्साय व्यवस्था ने फासीवाद तथा नाजीवाद के उदय के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं; इनका उदय केवल वर्साय की संधि का सीधा परिणाम नहीं था।
औपनिवेशिक देशों में राष्ट्रवाद का विकास
प्रथम विश्व युद्ध ने एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशों पर भी गहरा प्रभाव डाला। भारत सहित अनेक उपनिवेशों के सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया और आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराए। युद्ध के बाद उपनिवेशों में यह प्रश्न अधिक जोर से उठने लगा कि यदि यूरोपीय राष्ट्रों को आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त है, तो एशिया और अफ्रीका के लोगों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए।
भारत में युद्ध के बाद राष्ट्रीय आंदोलन को नई गति मिली। युद्धकालीन आर्थिक कठिनाइयों, महँगाई और राजनीतिक निराशा ने भारतीय जनता में असंतोष बढ़ाया। आगे चलकर असहयोग आंदोलन जैसे व्यापक जन आंदोलनों के लिए परिस्थितियाँ बनीं।
द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित वर्साय व्यवस्था स्थायी शांति स्थापित करने में सफल नहीं हुई। जर्मनी में संधि के प्रति असंतोष, आर्थिक संकट, राष्ट्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई। इटली और जापान की विस्तारवादी नीतियाँ तथा जर्मनी में नाजीवाद का उदय भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए चुनौती बने।
राष्ट्रसंघ की कमजोरियाँ, सामूहिक सुरक्षा की विफलता और 1930 के दशक में आक्रामक राष्ट्रों को रोकने में पश्चिमी शक्तियों की असफलता ने अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियाँ तैयार कीं। इसलिए प्रथम विश्व युद्ध को बीसवीं शताब्दी की अनेक राजनीतिक उथल-पुथल की आधारभूत घटना माना जाता है।
प्रथम विश्व युद्ध का ऐतिहासिक महत्त्व
प्रथम विश्व युद्ध ने आधुनिक विश्व इतिहास की दिशा बदल दी। इसने यूरोप की पारंपरिक शक्ति-संरचना को समाप्त कर दिया, अनेक साम्राज्यों का पतन किया और नए राष्ट्रों को जन्म दिया। युद्ध ने आधुनिक सैन्य तकनीक के विनाशकारी स्वरूप को सामने रखा तथा औद्योगिक समाज को युद्ध की व्यापक मशीनरी में बदल दिया।
युद्ध के बाद अमेरिका एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा, जबकि यूरोपीय शक्तियाँ आर्थिक रूप से कमजोर हुईं। रूस में साम्यवादी क्रांति हुई और विश्व राजनीति में नई वैचारिक प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। महिलाओं की सामाजिक भूमिका में परिवर्तन आया और उपनिवेशों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों को नई प्रेरणा मिली।
इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध केवल 1914 से 1918 के बीच लड़ा गया सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह आधुनिक विश्व व्यवस्था के पुनर्गठन की निर्णायक घटना थी। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सीमाएँ बदलीं, साम्राज्यों का अंत हुआ, नई विचारधाराओं का उदय हुआ और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का स्वरूप परिवर्तित हुआ। साथ ही, युद्धोत्तर व्यवस्था की अनेक कमियों ने भविष्य में द्वितीय विश्व युद्ध के लिए परिस्थितियाँ भी तैयार कर दीं।


