ऋग्वैदिक संस्कृति और वैदिक साहित्य
ऋग्वैदिक संस्कृति का परिचय
ऋग्वैदिक संस्कृति (लगभग 1500–1000 ई.पू.) भारतीय इतिहास के आरंभिक वैदिक चरण से संबंधित थी, और इसका प्रमुख तथा एकमात्र समकालीन साहित्यिक स्रोत ऋग्वेद है। इसका विकास मुख्यतः सप्त-सिंधु प्रदेश में हुआ, जिसमें वर्तमान पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ भाग सम्मिलित थे। यह संस्कृति मुख्यतः ग्रामीण, पशुपालक और कबीलाई प्रकृति की थी, जिसमें गाय आर्थिक संपदा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमुख प्रतीक थी। समाज पितृसत्तात्मक था तथा परिवार इसकी मूल इकाई था- कई परिवारों से ग्राम, कई ग्रामों से विश् और विश् से जन का निर्माण होता था। जन का नेतृत्व राजन् करता था, जिसकी सत्ता पूर्णतः निरंकुश नहीं थी; सभा और समिति जैसी संस्थाएँ उसके निर्णयों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। अर्थव्यवस्था में पशुपालन प्रमुख था, जबकि कृषि का भी सीमित ज्ञान था और जौ जैसी फसलों की खेती की जाती थी। गायों को लेकर होने वाले संघर्षों को ‘गविष्टि’ कहा गया है। सामाजिक जीवन में स्त्रियों की स्थिति उत्तरवैदिक काल की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर थी और कुछ स्त्रियों के विदुषी तथा ऋषिका होने के स्पष्ट प्रमाण ऋग्वैदिक साहित्य में मिलते हैं। धार्मिक जीवन में प्रकृति की शक्तियों की उपासना प्रमुख थी- इंद्र प्रमुख योद्धा एवं वर्षा-देवता, अग्नि यज्ञ के माध्यम से देवताओं और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ, तथा वरुण ऋत् अर्थात् नैतिक एवं सार्वभौमिक व्यवस्था के संरक्षक माने जाते थे। धार्मिक अनुष्ठानों में यज्ञ और मंत्र-पाठ का विशेष महत्त्व था। इस प्रकार ऋग्वैदिक संस्कृति ने भारतीय सामाजिक, राजनीतिक, भाषिक और धार्मिक परंपराओं के दीर्घकालीन विकास की प्रारंभिक आधारभूमि तैयार की।
वैदिक काल और वैदिक साहित्य का सर्वेक्षण
वैदिक काल प्राचीन भारतीय संस्कृति का वह दीर्घकालीन युग माना जाता है, जब वेदों की क्रमिक रचना हुई थी। इस कालखंड की संस्कृति को ‘वैदिक संस्कृति’ कहा जाता है, क्योंकि इसकी जानकारी का प्रमुख स्रोत वैदिक साहित्य ही है। वैदिक साहित्य के अंतर्गत ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व की संहिताएँ- अर्थात् मंत्र-खंड ही नहीं, अपितु गद्य एवं दार्शनिक-खंड अर्थात् विभिन्न ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् भी वर्गीकृत किए जाते हैं। यह संपूर्ण संहिता-इतर साहित्य केवल गद्य में ही नहीं है, अपितु पद्य-मिश्रित भी है। कभी-कभी अपेक्षाकृत परवर्ती काल की रचनाएँ- सूत्र-साहित्य और वेदांग भी व्यापक अर्थ में वैदिक साहित्य में सम्मिलित कर ली जाती हैं। परंपरा में इन चारों वेदों के मंत्र-भाग को ‘त्रयी विद्या’ भी कहा जाता है, यद्यपि यह नाम मूलतः प्रथम तीन वेदों- ऋक्, यजुष् और साम के संदर्भ में प्रयुक्त होता था, अथर्ववेद को परवर्ती काल में वेद-मान्यता प्राप्त हुई।
ऋग्वेद : प्राचीनतम वैदिक संहिता
वैदिक संहिताओं में ऋग्वेद निर्विवाद रूप से प्राचीनतम है। प्रायः सभी इतिहासकार इसे हिंद-यूरोपीय (भारोपीय) भाषा-परिवार की सबसे प्राचीन उपलब्ध रचना मानते हैं। इस ग्रंथ में लगभग 10,600 मंत्र (ऋचाएँ) और 1,028 सूक्त हैं, जो दस मंडलों में विभक्त हैं। इनमें से दूसरे से सातवें मंडल तक के भाग को ‘वंश मंडल’ अथवा ‘कुल मंडल’ कहा जाता है, क्योंकि ये किसी विशेष ऋषि-कुल से संबद्ध हैं और अपेक्षाकृत प्राचीनतम माने जाते हैं, जबकि प्रथम तथा दशम मंडल ऋग्वेद के अपेक्षाकृत परवर्ती भाग माने जाते हैं। यद्यपि ऋग्वेद में अन्य प्रकार के सूक्त भी हैं, किंतु देवताओं की स्तुति करने वाले मंत्रों की ही प्रधानता है। ऋग्वेद में मृत्यु-निवारक त्र्यंबक मंत्र (मृत्युंजय मंत्र) तथा प्रसिद्ध गायत्री मंत्र (मंडल 3) दोनों प्राप्त होते हैं। इसमें अनेक प्रकार के लोकोपयोगी सूक्त भी हैं, जैसे- रोग-निवारक सूक्त, लक्ष्मी-सूक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट ‘खिल-सूक्त’ में), नासदीय-सूक्त, हिरण्यगर्भ-सूक्त और विवाह आदि से संबंधित सूक्त। कहा जाता है कि इस ग्रंथ के अधिकांश सूक्तों की रचना सप्त-सैंधव प्रदेश (पंजाब) में हुई थी। ऋग्वेद की जो शाखा (शाकल शाखा) आज तक सुरक्षित है, वह मूलतः उपलब्ध अनेक प्राचीन शाखाओं में से एक है- प्राचीन ग्रंथों में ऋग्वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें से आज केवल शाकल शाखा ही पूर्ण रूप में उपलब्ध है।
यजुर्वेद : यज्ञ-विधि का वेद
‘यजुष्’ शब्द का अर्थ है- यज्ञ। यजुर्वेद में अधिकांशतः यज्ञों एवं हवनों के नियम और विधान वर्णित हैं। इसमें 40 अध्याय, 1,975 कंडिकाएँ तथा 3,988 मंत्र हैं। इस ग्रंथ में भी गायत्री मंत्र तथा महामृत्युंजय मंत्र मिलते हैं। यजुर्वेद का अंतिम अध्याय ईशावास्य उपनिषद् है, जिसका संबंध गहन आध्यात्मिक चिंतन से है। यजुर्वेद से श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, ईश, प्रश्न, मुंडक तथा मांडूक्य उपनिषद् संबद्ध हैं। यजुर्वेद के दो प्रमुख भेद हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता को आपस्तंब संहिता भी कहा जाता है, जबकि शुक्ल यजुर्वेद की संहिताओं को वाजसनेय संहिता (माध्यंदिन तथा काण्व शाखाएँ) कहा जाता है। परंपरा के अनुसार शुक्ल यजुर्वेद का प्रवर्तन याज्ञवल्क्य ऋषि ने सूर्यदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर किया था, इसीलिए इसे ‘वाजसनेयी संहिता’ भी कहते हैं।
जहाँ ऋग्वेद की रचना मुख्यतः सप्त-सिंधु प्रदेश में हुई थी, वहीं यजुर्वेद की रचना मुख्यतः कुरुक्षेत्र क्षेत्र में मानी जाती है। इस ग्रंथ से यह स्पष्ट होता है कि आर्य जन सप्त-सैंधव प्रदेश से आगे बढ़ चुके थे और गंगा-यमुना का दोआब क्षेत्र क्रमशः आर्य-संस्कृति का नया केंद्र बनता जा रहा था। यह भौगोलिक विस्तार ऋग्वैदिक काल से उत्तर वैदिक काल में संक्रमण का एक महत्त्वपूर्ण भाषिक-साहित्यिक प्रमाण भी है।
सामवेद : भारतीय संगीत का मूल स्रोत
‘साम’ शब्द का अर्थ है ‘गान’। सामवेद में यज्ञ के अवसर पर उद्गाता पुरोहित द्वारा गाई जाने वाली ऋचाओं का संग्रह है, जिनकी कुल संख्या लगभग 1,875 है, यद्यपि इनमें से अधिकांश ऋचाएँ ऋग्वेद से ही ली गई हैं और केवल लगभग 75 ऋचाएँ ही मौलिक मानी जाती हैं, किंतु सामवेद में इन्हें विशेष गेय-स्वरों में प्रस्तुत किया गया है। भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है और इसीलिए इसे ‘भारतीय संगीत का मूल’ माना जाता है। सामवेद की दो प्रमुख शाखाएँ- कौथुम और जैमिनीय आज भी उपलब्ध हैं।
अथर्ववेद : चिकित्सा, जादू और लोक-विश्वासों का वेद
अथर्ववेद वेदों में अंतिम है। इसकी भाषा ऋग्वेद की भाषा की तुलना में स्पष्टतः अपेक्षाकृत परवर्ती है और कई स्थानों पर यह ब्राह्मण ग्रंथों की भाषा-शैली से मिलती-जुलती है। इसका रचनाकाल लगभग 1000 ई.पू. के आसपास माना जाता है। इसमें आर्य और अनार्य दोनों प्रकार के धार्मिक विचारों का सम्मिश्रण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अथर्ववेद में देवताओं की स्तुति अपेक्षाकृत कम है, जबकि जादू, चमत्कार, आयुर्वेद, चिकित्सा-विज्ञान और दर्शन से संबंधित मंत्रों की प्रधानता है। इसे ब्रह्मवेद, अथर्वांगिरस वेद, भैषज्यवेद तथा महीवेद भी कहा जाता है। इसमें 20 कांड, 34 प्रपाठक, 111 अनुवाक, 731 सूक्त तथा लगभग 5,839 मंत्र हैं।
अथर्ववेद में शांति-पुष्टि तथा अभिचारिक (तांत्रिक) दोनों प्रकार के अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ में भूगोल, खगोल (ब्रह्मांडीय सिद्धांत), वनस्पति-विद्या, असंख्य जड़ी-बूटियों का विवरण, आयुर्वेद, गंभीर रोगों का निदान और उनकी चिकित्सा, अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धांत, राजनीति के गुह्य तत्त्व, राष्ट्रभूमि तथा राष्ट्रभाषा की महिमा, शल्य-चिकित्सा, कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोगों का विवेचन, विवाह-प्रार्थनाएँ, अंतिम संस्कार के मंत्र, मृत्यु को दूर करने के उपाय तथा प्रजनन-विज्ञान जैसे सैकड़ों लोकोपकारक विषयों का सुव्यवस्थित निरूपण है। इसमें भूत-प्रेत तथा जादू-टोने से संबंधित मंत्रों की उपस्थिति से यह प्रतीत होता है कि इस समय तक आर्य समाज प्रकृति-पूजा की अपेक्षा प्रेत-आत्माओं व तंत्र-मंत्र में भी विश्वास करने लगा था। इस वेद में ‘महीसूक्त’ के माध्यम से भारतीय साहित्य में पहली बार राष्ट्रीय भावना का स्पष्ट प्रतिपादन मिलता है, जो इसे विशेष रूप से उल्लेखनीय बनाता है। अथर्ववेद के एक सूक्त में मानव शरीर की रचना का विस्तृत वर्णन है, जिसके आधार पर आयुर्वेद चिकित्सा-प्रणाली अपनी उत्पत्ति अथर्ववेद से ही मानती है।
ब्राह्मण-ग्रंथ
यज्ञीय कर्मकांडों के विधान एवं उनकी क्रियाओं को भली-भाँति समझाने के लिए ब्राह्मण ग्रंथों की रचना हुई। प्रायः गद्य में लिखे गए इन ग्रंथों से उत्तर वैदिककालीन समाज एवं संस्कृति का ठोस ऐतिहासिक ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने पृथक ब्राह्मण ग्रंथ हैं। ऐतरेय एवं कौशीतकि ब्राह्मण ऋग्वेद से संबद्ध हैं- प्रसिद्ध शुनःशेप की कथा ऐतरेय ब्राह्मण में ही वर्णित है, जो हरिश्चंद्र और उनके पुत्र रोहित की कहानी के माध्यम से यज्ञ-बलि की एक प्रारंभिक परंपरा का परिचायक है। शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद से संबद्ध है, जिसमें सौ अध्याय हैं और जो उत्तर वैदिक काल की राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक जानकारी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है इसी में विदेघ माधव और अग्नि वैश्वानर की प्रसिद्ध कथा भी वर्णित है। इसी प्रकार साम के साथ पंचविंश (तांड्य) ब्राह्मण तथा अथर्व के साथ गोपथ ब्राह्मण संबद्ध है।
आरण्यक : वन-चिंतन के ग्रंथ
आरण्यकों का चिंतन-मनन अरण्य (वन) में एकांतवास करते हुए किया जाता था, इसीलिए इन्हें ‘आरण्यक’ कहा गया। वर्तमान में केवल छह आरण्यक ही उपलब्ध हैं- ऐतरेय, शांखायन, बृहदारण्यक, मैत्रायणी उपनिषद् तथा तलवकार आरण्यक (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण)। ऐतरेय एवं शांखायन आरण्यक ऋग्वेद से, बृहदारण्यक एवं मैत्रायणी उपनिषद्-आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से तथा तलवकार आरण्यक सामवेद से संबद्ध हैं। अथर्ववेद का कोई स्वतंत्र आरण्यक नहीं मिलता, यद्यपि उससे संबद्ध गोपथ ब्राह्मण के पूर्वार्द्ध में कुछ सामग्री आरण्यकों के अनुरूप ही मिलती है।
आरण्यकों में कुछ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक-भौगोलिक तथ्य भी मिलते हैं, जैसे तैत्तिरीय आरण्यक में कुरु, पांचाल, काशी, विदेह आदि महाजनपदों का स्पष्ट उल्लेख है तथा कुरुक्षेत्र एवं खांडव वन का भी वर्णन मिलता है। इसी प्रकार शांखायन आरण्यक में उशीनर, मत्स्य, कुरु-पांचाल तथा काशी-विदेह जनपदों का भी उल्लेख मिलता है, जो उत्तर वैदिक काल में आर्य संस्कृति के गंगा-यमुना क्षेत्र में हुए विस्तार का स्पष्ट प्रमाण है।
उपनिषद् : ब्रह्मज्ञान के ग्रंथ
उपनिषद् ब्रह्मज्ञान के ग्रंथ हैं। उपनिषदों में मानव-जीवन और विश्व के गूढ़तम दार्शनिक प्रश्नों को सुलझाने का गहन प्रयास किया गया है। इनका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय आत्मन्-ब्रह्मन् के सूक्ष्म विश्लेषण द्वारा अद्वैतवाद का निरूपण तथा अन्य वैदिक ग्रंथों के विपरीत कर्मकांड का खंडन करना है। वैदिक साहित्य का अंतिम भाग होने के कारण इन्हें ‘वेदांत’ भी कहा जाता है। जहाँ ब्राह्मणों और आरण्यकों की रचना मुख्यतः ब्राह्मण पुरोहितों ने की थी, वहीं उपनिषदों के सृजन में क्षत्रिय वर्ग की भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही- जनक, अजातशत्रु और प्रवाहण जैबलि जैसे अनेक क्षत्रिय राजाओं का उल्लेख उपनिषदों में दार्शनिक शिक्षकों के रूप में मिलता है।
उपनिषदों की कुल संख्या परंपरागत रूप से 108 बताई जाती है, किंतु इनमें से ग्यारह उपनिषद् विशेष रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक माने जाते हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर। इनमें छांदोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद् अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन, विस्तृत और उपयोगी माने जाते हैं। वेदवार वितरण की दृष्टि से ऋग्वेद से संबंधित दस उपनिषद् हैं, शुक्ल यजुर्वेद के उन्नीस, कृष्ण यजुर्वेद के बत्तीस, सामवेद के सोलह तथा अथर्ववेद के इकतीस उपनिषद् माने जाते हैं इस प्रकार कुल संख्या 108 होती है।
सूत्र-साहित्य
वैदिक कर्मकांड से संबद्ध सारगर्भित छोटे-छोटे सूत्र-वाक्यों को ‘सूत्र’ कहा जाता है। संपूर्ण सूत्र-साहित्य को चार भागों में विभाजित किया गया है- श्रौत, गृह्य, धर्म और शुल्व सूत्र। इनमें पहले में वैदिक यज्ञीय कर्मकांड का, दूसरे में गृहस्थ के दैनिक यज्ञों का, तीसरे में सामाजिक नियमों तथा आचार-व्यवहार का और चौथे में यज्ञवेदियों के ज्यामितीय निर्माण का विस्तृत वर्णन मिलता है। शुल्व सूत्र को ‘भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम ग्रंथ’ माना जाता है, क्योंकि इसमें यज्ञवेदी के निर्माण हेतु पाइथागोरस प्रमेय के समतुल्य ज्यामितीय सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है, जो पाइथागोरस से भी प्राचीन काल का माना जाता है।
वेदांग : वेदों के छह अंग
वेदों के अर्थ तथा उनके विषयों के स्पष्टीकरण के लिए रचित सूत्र-ग्रंथों को ‘वेदांग’ कहा जाता है। वेदांग छह हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष, जिन्हें ‘वेद-पुरुष’ के छह अंग बताया गया है। शिक्षा ग्रंथों की सहायता से वेद-मंत्रों के शुद्ध उच्चारण का ज्ञान प्राप्त होता है। कल्पसूत्र में वैदिक कर्मकांडों के विधि-नियमों का विस्तृत प्रतिपादन मिलता है। व्याकरण का उद्देश्य संधि, शब्द-रूप, धातु-रूप एवं उनकी निर्माण-पद्धति का व्यवस्थित ज्ञान कराना था पाणिनि की अष्टाध्यायी इस दृष्टि से प्रसिद्धतम व्याकरण-ग्रंथ है।
निरुक्त में वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति दिखाई गई है। क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघंटु’ की व्याख्या हेतु आचार्य यास्क ने निरुक्त की रचना की थी, जिसे भाषाशास्त्र का विश्व का पहला ग्रंथ भी माना जाता है। चूँकि वैदिक मंत्र छंदोबद्ध हैं, इसलिए वेद-मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए छंदों का सही ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक था- इस क्षेत्र में पिंगल का छंदशास्त्र विशेष रूप से प्रसिद्ध है। वैदिक युग में यज्ञों के उपयुक्त काल-निर्धारण के लिए ज्योतिष विद्या का भी विकास हुआ, जिसका प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ लगधमुनि रचित वेदांग ज्योतिष है।
प्रायः वैदिक साहित्य की रचना का श्रेय ‘आर्य’ नामधारी लोगों को दिया जाता है, किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से आर्य नामक किसी एक जाति-विशेष की स्पष्ट पहचान अद्यतन संभव नहीं हो सकी है। सापेक्षिक दृष्टि से आर्यों की पहचान वस्तुतः एक विशेष भाषा-भाषी वर्ग से ही की जाती है, न कि किसी नस्लीय समूह से। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में आर्य भाषा-भाषी लोगों में एक से अधिक वर्ग सम्मिलित थे, जो सामूहिक रूप से भारोपीय भाषा-परिवार की एक विशेष भाषा ‘संस्कृत’ बोलते थे। जैसे-जैसे इन लोगों का भारत में क्रमिक प्रसार होता गया, वैसे-वैसे यहाँ के मूल निवासियों के साथ उनका सांस्कृतिक और भाषिक मिश्रण भी होता गया। यही कारण है कि वैदिक साहित्य में प्रयुक्त संस्कृत भाषा में द्रविड़ भाषाओं का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
वैदिक साहित्य का रचनाकाल
वेदों के रचनाकाल का सटीक निर्धारण वैदिक साहित्येतिहास की एक अत्यंत जटिल समस्या है। मोटे तौर पर संपूर्ण वैदिक साहित्य के रचनाकाल को दो व्यापक भागों में विभाजित किया जा सकता है- पूर्व वैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल। साधारणतः ऋक्-संहिता के रचनाकाल को ‘पूर्व वैदिक काल’ तथा शेष अन्य संहिताओं एवं ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों के रचनाकाल को ‘उत्तर वैदिक काल’ कहा जाता है।
प्रायः सभी संहिताओं और वैदिक ग्रंथों में भाषिक स्तरीकरण के स्पष्ट चिह्न दिखाई देते हैं, इसलिए सामान्यतः ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू. लगभग 1500 से 1000 तक तथा उत्तर वैदिक काल ई.पू. लगभग 1000 से 500 तक माना जाता है। ऋग्वेद में लोहे का कोई भी उल्लेख नहीं है, जबकि उत्तर वैदिक काल के साहित्य में लोहे का स्पष्ट उल्लेख (श्याम अयस् अथवा कृष्ण अयस्) मिलता है। अभी तक उत्तरी भारत में लोहे के प्रयोग के पुरातात्त्विक साक्ष्य ई.पू. 1000 से पूर्व के नहीं मिले हैं, यद्यपि अतरंजीखेड़ा (एटा, उत्तर प्रदेश) से प्राप्त लौह-साक्ष्य को लगभग ई.पू. 1025 का बताया जाता है, जो भारत में अब तक ज्ञात प्राचीनतम लौह-प्रयोग के साक्ष्यों में से एक है।
आर्यों का मूल-स्थान
आर्यों के मूल-स्थान के संबंध में भारतीय विद्वानों के एक वर्ग का मत है कि आर्य मूलतः भारत के ही निवासी थे और यहीं से विश्व के विभिन्न भागों में फैले। इन विद्वानों में पं. गंगानाथ झा ‘ब्रह्मर्षि देश’ को, डी.एस. त्रिवेदी मुल्तान स्थित ‘देविका’ क्षेत्र को तथा एल.डी. काल्ल कश्मीर एवं हिमालय क्षेत्र को आर्यों का मूल-स्थान सिद्ध करते हैं।
तथापि अब यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो चुका है कि भारत आर्यों का मूल-निवास स्थान नहीं था। उत्तर-पश्चिम में बलूचिस्तान से ‘ब्राहुई’ भाषा का साक्ष्य मिलता है, जो द्रविड़ भाषा-परिवार की भाषा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत का कम-से-कम एक बड़ा भाग अनार्य भाषा-भाषियों का ही था, जो आर्यों के ‘भारतीय मूल’ के सिद्धांत के विरुद्ध सबसे सबल भाषिक प्रमाण माना जाता है।
बाल गंगाधर तिलक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द आर्कटिक होम इन द वेदाज़’ (1903 ई.) में आर्यों का आदि स्थान ‘उत्तरी ध्रुव’ बताया है। ऋग्वेद के एक सूक्त में दीर्घकालीन उषा की स्तुति मिलती है और महाभारत में सुमेरु पर्वत के वर्णन में छह महीने की रात और छह महीने के दिन का भी उल्लेख मिलता है। इन्हीं उल्लेखों के आधार पर तिलक महोदय उत्तरी ध्रुव को आर्यों का मूल-स्थान मानते हैं, किंतु इस मत का कोई अन्य ठोस पुरातात्त्विक अथवा सैद्धांतिक आधार उपलब्ध नहीं है, और आधुनिक विद्वान इस सिद्धांत को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं करते।
आर्यों की संस्कृत भाषा को भारोपीय भाषा-वर्ग का मान लेने पर भी उनके मूल-स्थान की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो पाता है, क्योंकि विभिन्न भाषाओं की जननी मूल भारोपीय भाषा स्वयं कहाँ जन्मी थी, यह निश्चित करना अत्यंत कठिन है। अनेक पाश्चात्य इतिहासकार एशिया और यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों को आर्यों का मूलस्थान सिद्ध करते हैं- पेन्का, हर्ट आदि विद्वानों का अनुमान है कि स्कैंडिनेविया भारोपीय भाषा-परिवार का मूल-स्थान था। पुरातत्त्व एवं तुलनात्मक भाषाशास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर मैक्समूलर मध्य एशिया को आर्यों का आदि देश मानते हैं।
एडवर्ड मेयर, पीक, नेहरिंग, पिग एवं गार्डन चाइल्ड जैसे विद्वान दक्षिणी रूस को आर्यों का मूल-स्थान मानते हैं। मेयर का अनुमान है कि पामीर के पठार से ही इंडो-ईरानी जाति पूरब में पंजाब की ओर तथा पश्चिम में मेसोपोटामिया की ओर गई। इस मत का समर्थन ओल्डेनबर्ग और कीथ भी करते हैं। भारोपीय तथा मध्य रूस की फिनो-उग्रीयन भाषाओं में पाई जाने वाली आश्चर्यजनक समानता से यह प्रतीत होता है कि भारोपीय तथा मध्य रूस की जातियों के बीच प्राचीन काल से ही घनिष्ठ ऐतिहासिक संपर्क रहा होगा।
भारतीय भाषाकोश के आधार पर ब्रैंडेस्टीन ने यह बताया कि आर्य मूलतः किसी पर्वत के नीचे स्थित घास के विशाल मैदान में निवास करते थे और यह मैदान यूराल पर्वत के दक्षिण में स्थित किर्गिज़िया क्षेत्र में था। भाषा-विज्ञान संबंधी अध्ययनों से यह भी ज्ञात होता है कि भारोपीय वर्ग की अधिकांश भाषाओं में भेड़िये, भालू एवं घोड़े जैसे पशुओं तथा बीज एवं भोजवृक्षों के लिए समान शब्दावली का प्रयोग हुआ है, जिससे यह प्रतीत होता है कि इस भाषा-वर्ग का प्रयोग करने वाले लोगों का संबंध शीतोष्ण जलवायु वाले ऐसे क्षेत्रों से था, जहाँ घास से आच्छादित विशाल मैदान (स्टेप) विद्यमान थे। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस क्षेत्र की पहचान सामान्यतः दक्षिणी रूस अर्थात् यूराल पर्वत-श्रेणी के दक्षिण में मध्य एशियाई इलाके के निकट स्थित ‘स्टेप’ (पोंटिक-कैस्पियन स्टेप) मैदानों से की जाती है। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से इस क्षेत्र से एशिया और यूरोप के विभिन्न भागों की ओर हुए क्रमिक बहिर्गामी प्रवासन के भी स्पष्ट चिह्न मिलते हैं और ऐसी ही एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के फलस्वरूप भारत में भी आर्यों का आगमन हुआ माना जाता है।
आर्य-प्रवासन का आधुनिक आनुवंशिक (डीएनए) साक्ष्य
बीसवीं सदी के अंत और इक्कीसवीं सदी में हुए आधुनिक जनसंख्या-आनुवंशिकी के अध्ययनों से भी इस स्टेप-प्रवासन सिद्धांत को महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक समर्थन मिला है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डेविड राइख़ तथा अन्य आनुवंशिकीविदों के व्यापक शोध, विशेष रूप से 2019 ई. में हरियाणा के राखीगढ़ी स्थल से प्राप्त प्राचीन डीएनए के अध्ययन तथा उससे संबद्ध शोध-पत्रों से यह संकेत मिलता है कि भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान जनसंख्या मुख्यतः तीन प्राचीन जनसमूहों- प्राचीन भारतीय (मूल निवासी), ईरानी कृषक-मूल के समूह तथा मध्य एशियाई स्टेप क्षेत्र से आए ‘स्टेप वंशावली’ वाले समूह के मिश्रण का परिणाम है। इन अध्ययनों के अनुसार स्टेप क्षेत्र से जनसमूहों का भारत की ओर आगमन लगभग 2000-1500 ई.पू. के आसपास हुआ प्रतीत होता है, जो परंपरागत रूप से मान्य आर्य-आगमन की तिथि से मेल खाता है। इस प्रकार का जनसंख्या-मिश्रण किसी एक बड़े सैन्य ‘आक्रमण’ के बजाय एक दीर्घकालिक और क्रमिक प्रवासन-प्रक्रिया प्रतीत होती है, इसीलिए आधुनिक इतिहासकार अब सामान्यतः ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ के स्थान पर ‘आर्य प्रवासन सिद्धांत’ शब्द का प्रयोग करना अधिक उपयुक्त मानते हैं।
भारत में आर्यों के आगमन की तिथि विंटरनित्ज़ लगभग ई.पू. 2500 मानते हैं, जबकि बाल गंगाधर तिलक ने अपने खगोलीय गणनाओं, विशेषकर अपनी पुस्तक ‘ओरायन’ के आधार पर इसकी तिथि ई.पू. 6000 तक निर्धारित की है, किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों द्वारा यह घटना ई.पू. लगभग 1500 के आसपास की मानी जाती है। संभवतः आर्यों ने भारत में एक साथ नहीं, बल्कि कई चरणों में प्रवेश किया और इनकी एक से अधिक लहरें क्रमशः भारत आई थीं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कबीला ‘भरत’ था और अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि इसी भरत कबीले के नाम पर ही इस देश का नाम ‘भारत’ पड़ा।
ऋग्वेदकालीन भौगोलिक विस्तार (ई.पू. 1500–ई.पू. 1000)
भारत में आर्यों का आगमन ई.पू. लगभग 1500 के आसपास हुआ और उनकी एक से अधिक लहरें क्रमशः भारत आईं। उन्होंने सर्वप्रथम सप्तसैंधव प्रदेश में बसना आरंभ किया। ऋग्वेद में वर्णित नदियों में संभवतः सिंधु नदी सबसे महत्त्वपूर्ण नदी थी, जो सप्तसैंधव प्रदेश की पश्चिमी सीमा भी निर्धारित करती थी। इस नदी को हिरण्यनी, सुवास और ऊर्णावती भी कहा गया है, जो उसके तत्कालीन आर्थिक महत्त्व के परिचायक हैं। इस प्रदेश में प्रवाहित होने वाली अन्य प्रमुख नदियों में सरस्वती, शतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम) तथा अस्किनी (चिनाब) आदि का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। विपाशा (व्यास) नदी के तट पर ही इंद्र ने उषा को पराजित करके उसके रथ को तोड़ डाला था- यह पौराणिक कथा ऋग्वेद में वर्णित मिलती है। आर्यजन अफगानिस्तान की कुभा (काबुल नदी), क्रमु (कुर्रम नदी), गोमती (गोमल नदी) एवं सुवास्तु (स्वात नदी) आदि नदियों से भी भली-भाँति परिचित थे, जो इस बात का प्रमाण है कि आर्यों की गतिविधियाँ अफगानिस्तान क्षेत्र तक भी फैली हुई थीं।
ऋग्वेद में सबसे पवित्र नदी सरस्वती को बताया गया है, जिसे ‘नदीतमा’ (नदियों की माता) कहा गया है। दृशद्वती भी एक अन्य पवित्र नदी थी। सरस्वती और दृशद्वती दोनों ही अब लुप्त हो चुकी नदियाँ वर्तमान राजस्थान की मरुभूमि में प्रवाहित होती थीं आधुनिक भूगर्भीय अध्ययनों में इनका समीकरण अक्सर वर्तमान घग्गर-हकरा नदी-तंत्र से किया जाता है। ऋग्वेद में यमुना का उल्लेख तीन बार तथा गंगा का उल्लेख केवल एक बार (दशम मंडल के एक अपेक्षाकृत परवर्ती सूक्त में) हुआ है। सामान्यतः गंगा नदी को ही ऋग्वेदकालीन आर्यों के निवास-क्षेत्र की पूर्वी सीमा माना जा सकता है। ऋग्वेद में वर्णित प्रसिद्ध ‘दशराज्ञ युद्ध’ के संदर्भ में जिन अज, शिग्रु तथा अन्यत्र क्रिवि नामक जनजातियों का उल्लेख मिलता है, वे संभवतः गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र की ही निवासी प्रतीत होती हैं। आर्य लोग हिमालय पर्वत से भी भली-भाँति परिचित थे, क्योंकि ऋग्वेद में हिमालय की एक चोटी को ‘मूजवंत’ कहा गया है, जो सोमलता के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थी।
पुरातात्त्विक प्रमाण
ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खाने वाली संस्कृतियों में गैरिक मृद्भांड (ओसीपी) संस्कृति, ताम्रपुंज (कॉपर होर्ड) संस्कृति तथा लाल एवं काले मृद्भांड (ब्लैक एंड रेड वेयर) वाली संस्कृतियों की गणना की जाती है, किंतु इनमें से किसी को भी निश्चयपूर्वक ऋग्वैदिक लोगों की ही कृति मानना कठिन है। गैरिक मृद्भांड संस्कृति को ऋग्वेदकालीन माना जा सकता है, किंतु इस संस्कृति के ज्ञात लगभग एक सौ से अधिक स्थलों में से बहुत कम स्थल सप्तसैंधव क्षेत्र में स्थित हैं, जबकि अधिकांश स्थल तो गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में ही केंद्रित हैं। यद्यपि ऋग्वेद में ताम्र-कांस्य का उल्लेख मिलता है, किंतु उत्तरी भारत में ताम्रपुंजों के अवशेष भी मुख्यतः गंगा-यमुना दोआब एवं उसके पूरब में ही केंद्रित हैं। ताम्रपुंजों में प्राप्त विभिन्न प्रकार के अस्त्रों से यह भी पता चलता है कि वे संभवतः शिकार के लिए प्रयुक्त किए जाते रहे होंगे।
अफगानिस्तान, पंजाब तथा उत्तरी राजस्थान से प्राप्त धूसर मृद्भांड (ग्रे वेयर) संस्कृति को तिथिक्रम की दृष्टि से ऋग्वैदिक काल के अंतिम चरण का माना जा सकता है, जबकि इसके पश्चात विकसित हुई चित्रित धूसर मृद्भांड (पीजीडब्ल्यू) संस्कृति उत्तर वैदिक काल से सामान्यतः जोड़ी जाती है। यदि इन उपर्युक्त पुरातात्त्विक संस्कृतियों को ऋग्वेदकालीन मान भी लिया जाए, तो भी इनसे किसी सुव्यवस्थित स्थायी जीवन का स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। लालकिला (बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश) तथा अतरंजीखेड़ा के कुछ अपवादों को छोड़कर, गेरूवर्णी (गैरिक) मृद्भांड के अधिकांश स्थलों से भी स्थायी बस्ती-जीवन के ठोस अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं।
दास एवं दस्यु
ऋग्वेद में आर्यों को ‘दास’ एवं ‘दस्युओं’ से हुए संघर्ष का पर्याप्त विस्तृत वर्णन मिलता है। पाश्चात्य विद्वानों की सामान्य धारणा रही है कि ये अनार्य जातियाँ इस भूभाग की आदिम निवासी थीं, जिन्होंने आर्य भाषा-भाषियों का घोर प्रतिरोध किया था। दास लोगों के विषय में कहा गया है कि वे न तो अग्नि में हविर्दान करते थे और न ही इंद्र-वरुण के उपासक थे। यह भी संभव है कि ये लोग वस्तुतः आर्यों के ही विभिन्न विरोधी दलों के प्रतिनिधि रहे हों और कुछ सांस्कृतिक एवं सैद्धांतिक मतभेदों के कारण उन्हें ‘दास’ कहा गया हो — इस मत के समर्थन में ऋग्वेद के दो महत्त्वपूर्ण नायकों दिवोदास एवं सुदास के नाम के अंत में भी ‘दास’ शब्द का प्रयोग मिलता है और यदु, तुर्वश जैसी स्पष्ट रूप से आर्य जातियों को भी एक स्थान पर ‘दास’ कहा गया है। शंबर, शुष्ण, तुग्र, वेत्सु, अर्बुद जैसे दास-नेताओं के नाम भी भाषाशास्त्रीय दृष्टि से अनार्य प्रतीत नहीं होते।
ऋग्वेद में दासों की तुलना में दस्युओं को आर्यों का कहीं बड़ा शत्रु बताया गया है और दस्युओं को ‘अदेवयु’ (वैदिक देवताओं को न माननेवाला), ‘अब्रह्मन्’ (श्रद्धा एवं धार्मिक विश्वास से रहित) तथा ‘अयज्वन्’ (यज्ञ न करनेवाला) कहा गया है। इसी प्रकार ‘अनासः’ (चपटी नाकवाला) एवं ‘मृद्वाक्’ (कटु-वाणीवाले, विशेषकर पणियों के लिए प्रयुक्त) जैसे विशेषणों के आधार पर भी दस्युओं को आर्यों से भिन्न जाति एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का बताया गया है। पुरातात्त्विक दृष्टि से इनका संबंध गैरिक मृद्भांड एवं लाल-काले मृद्भांड वाले लोगों से जोड़ा जा सकता है। आर्यों के मन में इनके प्रति इतनी गहरी घृणा थी कि एक स्थान पर उन्हें ‘अमानुष’ तक कहा गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि ‘दस्यु’ वस्तुतः भारत की आदिम अनार्य जाति (मूल निवासी) थे और इन मूल निवासियों ने आर्य जनों का कड़ा प्रतिरोध किया था। यद्यपि आर्य दस्युओं के विरुद्ध युद्ध में घोड़े से चलित रथ, कांसे के उन्नत उपकरण, कवच (वर्म), पुरंधर (दुर्गों को गिरानेवाला) तथा संभवतः विशिष्ट प्रकार के धनुष-बाण का प्रयोग करते थे, फिर भी अपनी बर्बरता और बड़े पैमाने पर अग्नि के प्रयोग से ही वे अंततः सफल हो सके — इसकी पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित विदेघ माधव एवं अग्नि वैश्वानर की प्रसिद्ध कथा से भी होती है।
भौतिक जीवन
ऋग्वेद के गहन अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक आर्यों के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक जीवन में कबायली तत्त्वों की ही स्पष्ट प्रधानता थी। पुरातात्त्विक प्रमाणों से यह भी स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक लोग संभवतः पूर्णतः स्थायी जीवन व्यतीत नहीं कर रहे थे। इस समय युद्धों, आक्रमणों एवं जनसंहारों का व्यापक बोलबाला था। ऋग्वेद में विभिन्न जातियों के आंतरिक एवं अंतर्जातीय युद्धों के अनेक उदाहरण बिखरे पड़े हैं- आर्यों के विभिन्न ‘जन’ आपस में भी निरंतर संघर्षरत रहते थे। ऋग्वेद में प्रसिद्ध ‘दशराज्ञ युद्ध’ का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो भरत जन के राजा सुदास तथा उनके विरुद्ध खड़े अन्य दस जनों के मध्य परुष्णी (रावी) नदी के तट पर लड़ा गया था।
संभवतः यह दस राजाओं का युद्ध पश्चिमोत्तर प्रदेश में पहले से बसे हुए पूर्वकालीन जन तथा ब्रह्मवर्त के उत्तरकालीन आर्यों के बीच राजनीतिक उत्तराधिकार के प्रश्न पर लड़ा गया था। भरत के विरोधी संघ में पाँच आर्य कबीले- पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्यु और अनु, जिन्हें सम्मिलित रूप से ‘पंचजन’ कहा गया है तथा पाँच अनार्य कबीले- अलिन, पक्थ, भलानस, विषाणिन और शिव सम्मिलित थे। इस निर्णायक दशराज्ञ युद्ध में भरतों के राजा सुदास को अंततः विजय प्राप्त हुई। प्रकीर्ण उल्लेखों से यह भी पता चलता है कि इस युद्ध में वस्तुतः दस नहीं, बल्कि तीस से भी अधिक राजाओं ने भाग लिया था। इस सर्वव्यापी युद्धरतता से यह स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक लोग किसी विशेष स्थायी जीवन-यापन की स्थिति में नहीं थे।
पशुपालन
ऋग्वैदिक लोगों के भौतिक जीवन में पशुपालन का विशेष महत्त्व था — ऋग्वेद में ‘गो’ शब्द का प्रयोग कुल 174 बार आया है। युद्ध का प्रमुख कारण गायों की गवेषणा अर्थात् ‘गविष्टि’ ही था। इसी प्रकार गवेषण, गोयु, गव्य, गम्य आदि सभी शब्द भी युद्ध के अर्थ में प्रयुक्त होते थे। पशुओं के लिए युद्ध करना कबायली संगठनों की एक विशिष्ट पहचान मानी जाती है। ऋग्वेद में संपत्ति का मुख्य रूप गोधन ही था और वही दक्षिणा (दान) की भी प्रमुख वस्तु समझी जाती थी। विनिमय के माध्यम के रूप में भी गाय का ही प्रयोग किया जाता था और वही मुख्य मुद्रा भी थी। गाय की महत्ता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि समय की माप के लिए ‘गोधूलि’ और दूरी की माप के लिए ‘गव्यूति’ शब्द का प्रयोग किया जाता था और एक स्थान पर तो स्वयं देवताओं को भी गाय से उत्पन्न हुआ बताया गया है। मंत्रों में बार-बार देवताओं की स्तुति करते हुए पशु-संपदा की प्राप्ति की ही माँग की गई है। ‘रयि’ अर्थात् संपत्ति की गणना मुख्यतः मवेशियों की संख्या से ही होती थी — एक व्यक्ति को ‘शतदाय’ कहा गया है, क्योंकि उसके प्राण की कीमत सौ गायों के बराबर मानी जाती थी। गायों के अतिरिक्त अवि (भेड़), अजा (बकरी) और घोड़े का भी ऋग्वेद में अनेक बार उल्लेख हुआ है।
कृषि
ऋग्वेद में पशुपालन की अपेक्षा कृषि अपेक्षाकृत गौण व्यवसाय था, क्योंकि इसमें कृषि का उल्लेख मात्र 24 बार हुआ है और इसमें से भी अधिकांश को परवर्ती प्रक्षिप्त अंश (क्षेपक) माना जाता है। ऋक्-संहिता के मूल भाग में कृषि के महत्त्व से संबंधित मात्र तीन ही शब्द मिलते हैं- ऊर्वरा, धान्य एवं वपति। ऋग्वेद के अपेक्षाकृत परवर्ती प्रथम मंडल से यह पता चलता है कि अश्विनकुमारों ने ही मनु को हल चलाना सिखाया था। ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल में खेती की संपूर्ण प्रक्रिया का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार सिंचाई से संबंधित सभी उल्लेख भी अपेक्षाकृत परवर्ती काल के मंडलों में ही मिलते हैं, जिसमें खनित्रिमा (खोदकर प्राप्त किया गया जल) और स्वयंजा (प्राकृतिक जल) इन दो प्रकार की सिंचाई पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। हंसिया (दात्र, सृणि), कोठार (खलिहान), गठ्टर (वृष्टि), चलनी (तितउ), सूप (शूर्प), तथा अनाज ओसानेवाला (धान्यकृत) आदि शब्दों का उल्लेख भी परवर्ती काल के मंडलों में ही मिलता है। ऋग्वेद में एक ही अनाज ‘यव’ का कुल 15 बार उल्लेख हुआ है, जिनमें से भी मात्र 3 ही ग्रंथ के मूल भाग में प्राप्त होते हैं। ‘यव’ या तो विभिन्न प्रकार के अनाजों का सामान्य नाम था अथवा परवर्ती संहिताओं की भाँति जौ का ही सूचक शब्द था। ऋग्वेद में चावल का कोई उल्लेख नहीं मिलता — पुरातात्त्विक साक्ष्यों में केवल अतरंजीखेड़ा के तीसरे चरण से ही एक प्रकार के जौ एवं चावल के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनकी तिथि ई.पू. लगभग 1200 से 600 के मध्य बताई जाती है। इससे यह प्रतीत होता है कि चावल की खेती वस्तुतः उत्तर वैदिक काल से ही संबंधित है।
ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था के प्रारंभिक चरणों में कृषि के अपेक्षाकृत गौण होने की पुष्टि इस समय के देवकुल में देवियों के गौण स्थान से भी होती है — इंद्राणी, रोदसी, श्रद्धा, धृति आदि देवियों को कोई विशेष धार्मिक महत्त्व नहीं दिया गया है और अदिति एवं उषा जैसी अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण देवियों का भी विशेष आदर से उल्लेख नहीं हुआ है। अनेक स्थानों पर इंद्र-उषा के द्वंद्व का वर्णन मिलता है, जिसमें आर्यों एवं अनार्यों के सांस्कृतिक संघर्ष की एक झलक भी देखी जा सकती है। वस्तुतः ऋग्वैदिक देवकुल में देवियों का यह गौण स्थान किसी कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था की सैद्धांतिक मान्यताओं के सर्वथा विपरीत है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि इस काल में पशुचारण ही लोगों का प्रमुख व्यवसाय था और इस काल के अंतिम चरण में ही कृषि का क्रमिक आगमन हो चुका था, जो संभवतः अनार्य लोगों के सांस्कृतिक संपर्क के कारण ही हुआ होगा — यही कारण है कि इसे विजित लोगों (अनार्यों) का व्यवसाय भी बताया गया है।
शिल्प
ऋग्वैदिक साहित्य में वस्त्र धोने वाले, वस्त्र बनाने वाले, लकड़ी एवं धातु का काम करने वाले तथा बर्तन बनाने वाले शिल्पों के क्रमिक विकास का विस्तृत विवरण मिलता है। चर्मकार एवं कुम्हार के व्यवसायों का भी उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में हिरण्य एवं सुवर्ण शब्द का प्रयोग सोने के लिए किया गया है। ‘अयस्’ शब्द का प्रयोग संभवतः ताम्र या कांस्य धातु के लिए, ‘ओत’ एवं ‘तंतु’ शब्द का प्रयोग ताने-बाने के लिए, तथा ‘शुध्यु’ शब्द का प्रयोग ऊन के लिए किया जाता था।
ऋग्वैदिक काल में स्त्रियाँ चटाई बुनने के लिए ‘नद’ (नरकट) का प्रयोग करती थीं। ऋग्वेद में कपास का कोई उल्लेख नहीं मिलता। चमड़ा सिझाने वालों को ‘चर्मम्न’ कहा जाता था। ‘तक्षन्’ व ‘तष्टृ’ शब्द का प्रयोग बढ़ई के अर्थ में किया गया है। आर्यों के सामाजिक जीवन में रथों का अत्यधिक महत्त्व होने के कारण तक्ष (बढ़ई) की सामाजिक प्रतिष्ठा भी अपेक्षाकृत अधिक बढ़ी हुई थी। साधारण गाड़ी को ‘अनस्’ कहा जाता था।
व्यापार
ऋग्वेदकालीन व्यापार मुख्यतः वस्तु-विनिमय प्रणाली पर आधारित था। इस प्रणाली में वस्तु-विनिमय के साथ-साथ गाय, घोड़े एवं स्वर्ण से भी क्रय-विक्रय किया जाता था। विनिमय के एक विशेष माध्यम के रूप में ‘निष्क’ का भी उल्लेख मिलता है। यह संभवतः प्रारंभ में हार जैसा कोई स्वर्णाभूषण था, जो कालांतर में क्रमशः सिक्के के रूप में भी प्रयुक्त होने लगा। ऋग्वैदिक काल में व्यापार करने वाले तथा व्यापार हेतु सुदूरवर्ती प्रदेशों में भ्रमण करने वाले व्यक्ति को ‘पणि’ कहा जाता था। ऋग्वेद में एक स्थान पर देवताओं तथा पणियों के बीच संघर्ष एवं देवताओं द्वारा उनके संहार का भी वर्णन मिलता है। व्यापार थल एवं जल दोनों मार्गों से किया जाता था। आंतरिक व्यापार प्रायः गाड़ियों, रथों एवं पशुओं के माध्यम से ही संचालित होता था। आर्यों को समुद्र की कितनी जानकारी थी, यह अभी भी अस्पष्ट है, किंतु ऋग्वेद में सौ पतवारों वाली नौका से यात्रा करने का वर्णन अवश्य मिलता है। इसके अतिरिक्त एक स्थान पर तुग्र के पुत्र भुज्यु की समुद्र-यात्रा का भी उल्लेख है, जिसने मार्ग में अपने जलयान के नष्ट हो जाने पर आत्मरक्षा के लिए अश्विनकुमारों से प्रार्थना की थी और अश्विनकुमारों ने उनकी रक्षा के लिए सौ पतवारों वाला एक जहाज भेजा था।
सामाजिक जीवन
उत्तर-पश्चिम से पशुचारी आर्य जनजातियों के भारतीय प्रायद्वीप में प्रवेश से अनेक नई सामाजिक और राजनीतिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं। आर्यों-अनार्यों की परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही एक ढाँचागत सामाजिक-व्यवस्था की क्रमिक शुरुआत हुई। आर्यों के साथ अनार्यों के संघर्ष और अंतिम पराजय के पश्चात उन्हें अपनी सामाजिक व्यवस्था में सम्मिलित कर लिए जाने के मिथकीय और भाषाशास्त्रीय साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। प्रारंभ में विजेता आर्यों की एक ही समान जाति थी। आर्यों का पशुधन कबीले की सामुदायिक संपत्ति हुआ करती थी, और निजी संपत्ति की परिघटना अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई थी। परवर्ती कालीन कठोर वर्ण-व्यवस्था के स्पष्ट चिह्न ऋग्वेद में नहीं दिखाई देते हैं, और निम्न वर्ण अर्थात् शूद्रों पर उस समय तक किसी प्रकार की सामाजिक अपात्रता नहीं थोपी गई थी।
ऋग्वेद में ही विभिन्न व्यवसायों में एक ही परिवार के निरंतर संलग्न रहने के उल्लेख भी मिलते हैं। समाज के प्रति एक सकारात्मक और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया गया था। कोई विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग नहीं था और राजन् भी संपूर्ण कबीले के अन्य सदस्यों के समान ही माना जाता था। ऋग्वेद में जन, विश्, गण, व्रात, सर्ध आदि जिन सामाजिक इकाइयों का उल्लेख मिलता है, वे सभी सामूहिक भाईचारे के सिद्धांत पर ही आधारित थीं।
इसका यह आशय बिल्कुल नहीं है कि ऋग्वैदिक समाज एक पूर्णतः समतावादी अथवा वर्गविहीन समाज था। युद्ध की लूट का सबसे बड़ा भाग कबीले के मुखिया एवं उनके पुरोहितों को ही प्राप्त होता था, क्योंकि वे संपूर्ण कबीले के प्रतिनिधि माने जाते थे। परवर्ती कठोर वर्णभेद वाले समाज की तुलना में मूल अंतर यह था कि अधिशेष उत्पादन के अभाव में इस कबायली समाज में स्थायी वर्गभेद की परिस्थितियों का पूर्ण रूप से उदय नहीं हो सका था। ऋग्वेद में ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रयोग 15 बार तथा ‘क्षत्रिय’ शब्द का प्रयोग 9 बार हुआ है।
ऋग्वेद के अपेक्षाकृत अंतिम काल में वर्ण-समाज की एक अस्पष्ट रूपरेखा तैयार होने लगी थी, जब विभिन्न व्यावसायिक समूहों को एक सुव्यवस्थित सामाजिक संगठन के अंतर्गत लाने के साझे प्रयासों के परिणामस्वरूप ब्रह्म, क्षत्र और विश् क्रमशः स्थापित रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के रूप में विकसित हो गए। ऋग्वेद के परवर्ती प्रसिद्ध ‘पुरुष-सूक्त’ (10.90) में ही पहली बार चतुर्वर्ण-व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया है कि विराट-पुरुष के मुख से ब्राह्मण, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय, उसके उदर से वैश्य तथा उसके पैरों से शूद्र वर्ण की उत्पत्ति हुई। यह मान लेना कि शूद्र वर्ण का निर्माण केवल आर्य-पूर्व मूल निवासियों से ही हुआ था, उतना ही एकांगी दृष्टिकोण है, जितना यह समझना कि उस वर्ण में मुख्यतः आर्य ही सम्मिलित थे। वस्तुतः तत्कालीन आर्थिक एवं सामाजिक विषमताओं के कारण आर्य और आर्येतर दोनों ही वर्गों में एक श्रमिक समुदाय का उदय हुआ और यही व्यापक श्रमिक वर्ग कालांतर में ‘शूद्र’ कहलाया।
पशुचारण की सामाजिक प्रधानता ने ही पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के निर्माण में सहायता प्रदान की। कृषि-प्रधान समाजों में सामान्यतः मातृत्व का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है, जबकि पशुचारण-प्रधान समाजों में पुरुषों को अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा सामाजिक स्थान प्राप्त होता है। ऋग्वैदिक समाज एक पूर्णतः पितृसत्तात्मक समाज था और पिता ही परिवार का सर्वोच्च मुखिया होता था। वरुणसूक्त के ‘शुनःशेप’ के आख्यान, ऋज्राश्व की कथा तथा दिवालिए जुआरी के उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि परिवार में पुरुष मुखिया का पूर्ण नियंत्रण बना रहता था।
ऋग्वेद में ‘कुल’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं मिलता है परिवार के लिए ‘गृह’ शब्द ही प्रयुक्त किया गया है। कई परिवार (गृह) मिलकर ‘ग्राम’ तथा कई ग्राम मिलकर ‘विश्’ कहलाते थे। कई विश् मिलकर ‘जन’ कहलाते थे, जो उस समय की सबसे बड़ी सामाजिक-राजनीतिक इकाई थी। ऋग्वेद में कबायली एवं सामूहिक जीवन को इंगित करने वाले ‘जन’ एवं ‘विश्’ शब्द का सैकड़ों बार प्रयोग हुआ है। परिवार की परिकल्पना अत्यंत विशद प्रतीत होती है, जिसमें कई पीढ़ियाँ और संपार्श्विक (सहायक) शाखाएँ भी सम्मिलित थीं- नाना, दादी, नाती, पोते आदि सभी संबंधों के लिए एक सामान्य शब्द ‘नप्तृ’ मिलता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि परिवार के सभी सदस्य एक साथ ही निवास करते थे। पुत्र-प्राप्ति हेतु देवताओं से विशेष रूप से कामना की जाती थी और पुत्र को ही संपत्ति का वैध अधिकारी माना जाता था।
ऋग्वेद में ‘जायेदस्तम्’ अर्थात् ‘पत्नी ही गृह है’ कहकर नारी के सामाजिक महत्त्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है। स्त्रियों को जनसभा एवं विदथ में अपनी बात कहने का अधिकार प्राप्त था। वे अपने पति के साथ यज्ञ-कार्यों में भी सम्मिलित होती थीं और स्वेच्छा से दान भी कर सकती थीं। संभवतः स्त्रियाँ शिक्षा भी ग्रहण करती थीं और कन्याओं का भी उपनयन संस्कार किया जाता था। जीवनभर अविवाहित रहने वाली लड़कियों को ‘अमाजू’ कहा जाता था। ऋग्वेद में लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, अपाला एवं विश्ववारा जैसी अनेक विदुषी और ऋषिका स्त्रियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने स्वयं मंत्रों की रचना भी की थी। विधवा-विवाह, अंतर्जातीय विवाह एवं पुनर्विवाह की संभावना का भी उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
कन्या की विदाई के समय उपहार एवं द्रव्य दिए जाते थे, जिसे ‘वस्तु’ कहा जाता था। समाज में नियोग प्रथा, जिसके अंतर्गत पुत्रविहीन विधवा पुत्र-प्राप्ति हेतु अपने देवर से यौन-संबंध स्थापित कर सकती थी तथा बहुपतीत्व प्रथा का भी सीमित प्रचलन था- उदाहरणस्वरूप, मरुतों ने रोदसी को मिलकर भोगा था और सूर्या (सूर्य की पुत्री) अपने दो भाइयों- अश्विनद्वय के साथ ही निवास करती थी। ऋग्वैदिक समाज में स्त्रियों की सामाजिक दशा अच्छी होने के बावजूद उन्हें प्रत्यक्ष राजनीति में भाग लेने और स्वतंत्र संपत्ति-संबंधी अधिकार प्राप्त नहीं थे।
ऋग्वेदकालीन लोग अपने भोजन में यव, धान्य, उड़द एवं मूंग आदि का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त फल, दूध, दही, घी एवं मांस भी उनके अन्य भोज्य पदार्थ थे। पेय पदार्थों में वे सोमरस का पान करते थे- ऋग्वेद के नवें मंडल में सोम की स्तुति में कई महत्त्वपूर्ण सूक्त मिलते हैं। मांस में भेड़, बकरी एवं बैल का मांस खाया जाता था और गाय के वध के भी कुछ प्रमाण मिलते हैं, यद्यपि परवर्ती काल में गोवध निषिद्ध हो गया। आर्य लोग संभवतः नमक एवं मछली का सामान्य प्रयोग नहीं करते थे।
ऋग्वेदकालीन आर्य संभवतः तीन प्रकार के वस्त्र धारण करते थे- वासस् (शरीर पर धारण किया जाने वाला मुख्य वस्त्र), अधिवास तथा उष्णीष (पगड़ी)। इस काल के लोग क्षौम (अलसी का सूत), ऊन और मृग के चमड़े से निर्मित वस्त्र धारण करते थे। ऋग्वेद में ऊनी कपड़े को ‘सामूल्य’ तथा कढ़े हुए कपड़े को ‘पेशस्’ कहा गया है। स्त्री और पुरुष दोनों ही आभूषण धारण करते थे। आभूषणों में निष्क, कुरिर एवं कर्णशोभन का विशेष उल्लेख मिलता है। रथ-दौड़, घुड़दौड़, द्यूतक्रीड़ा (जुआ) एवं आखेट (शिकार) आमोद-प्रमोद के मुख्य साधन थे- जुए का भी उस समय व्यापक प्रचलन प्रतीत होता है।
राजनीतिक व्यवस्था
पशुचारण-प्रधान अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि तथा सर्वव्यापी युद्धों के वातावरण में लोगों के लिए पूर्णतः स्थायी जीवन बिताने की संभावना नहीं थी। ऐसी परिस्थिति में किसी अत्यंत जटिल राजनीतिक संगठन के विकास की भी कोई संभावना नहीं थी। ऋग्वैदिक आर्य कबीले के रूप में ही संगठित थे, जिसे ‘जन’ भी कहा जाता था। ऋग्वेद के अनुसार आर्यों के अनेक कबीलों में पाँच प्रमुख थे- पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्यु और अनु और इन्हीं पाँच कबीलों के कारण इन्हें सम्मिलित रूप से ‘पंचजन्य’ भी कहा गया है। जन एक विशुद्ध कबीलाई संगठन था। कबीले अथवा ‘जन’ के शासक को ‘राजन्’ कहा जाता था। राजन् की पहचान सदैव उसके संबंधित कबीले से ही की जाती थी, इसीलिए ऋग्वैदिक काल का राजन् वस्तुतः एक कबीलाई मुखिया से अधिक कुछ नहीं था। उसे ‘जनस्य गोपाः’, ‘पुरहित’, ‘गोपति’ तथा ‘जनराजन्’ जैसे विशेषणों से पुकारा गया है, क्योंकि जन अथवा कबीले की रक्षा करना तथा गो-संपदा प्रदान करना ही उसका प्रमुख कर्तव्य माना जाता था। गणपति, व्रातपति, विश्पति आदि उपाधियों से यह भी स्पष्ट होता है कि वह कोई पैतृक और निरंकुश शासक नहीं था, अपितु कबीले का ही निर्वाचित अथवा स्वीकृत सर्वेसर्वा था।
इस प्रकार ऋग्वेद में उल्लिखित राजन् को किसी सुनिश्चित भौगोलिक क्षेत्र पर स्थायी रूप से शासन करने वाला परंपरागत अर्थ में ‘राजा’ नहीं माना जा सकता। राष्ट्र की क्षेत्रीय अवधारणा का धीरे-धीरे विकास हो रहा था, क्योंकि ऋग्वेद के अपेक्षाकृत परवर्ती दशम मंडल में ‘राजा से राष्ट्र की रक्षा’ करने की अपेक्षा की गई है। कालांतर में यही ‘जन’ क्रमशः विकसित होकर ‘जनपदों’ के रूप में परिवर्तित हुए।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘गृह’ थी, जिसका प्रमुख ‘गृहपति’ कहलाता था। इसके ऊपर ‘ग्राम’ था, जिसका शासन ‘ग्रामणी’ देखता था। ग्राम से बड़ी प्रशासनिक इकाई ‘विश्’ थी, जिसका शासक ‘विश्पति’ कहलाता था, और उसके ऊपर ‘जन’ होता था। ऋग्वेद में ‘विश्’ का उल्लेख लगभग 170 बार तथा ‘जन’ का उल्लेख लगभग 275 बार हुआ है। शासन की सबसे बड़ी इकाई ‘राष्ट्र’ थी, किंतु यह किसी प्रभुता-संपन्न आधुनिक अर्थ वाले राज्य का सूचक नहीं है।
कबीले के लोग अपनी स्वेच्छा से ही राजा को कर देते थे, जिसे ‘बलि’ कहा जाता था। राजा प्रायः कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय कबीलाई संगठनों के परामर्श से ही लेता था। राजा की सहायता हेतु पुरोहित, सेनानी एवं ग्रामणी नामक अधिकारी नियुक्त होते थे। ‘भागदुध’ एक विशिष्ट अधिकारी था, जो राजा के अनुयायियों के मध्य बलि (भेंट) का समुचित बँटवारा एवं कर का निर्धारण करता था।
पुरोहित का पद प्रायः वंशानुगत होता था। सैन्य-संचालन का कार्य व्रात, गण, ग्राम व सर्ध नामक विभिन्न कबीलाई सैन्य-टुकड़ियाँ करती थीं और इन लड़ाकू दलों के प्रधान ‘ग्रामणी’ कहलाते थे। सूत, रथकार तथा कर्मार जैसे ‘रत्निन्’ नामक बारह विशेष पदाधिकारियों का भी एक पृथक वर्ग था, जो राजा के राज्याभिषेक के समय अनिवार्य रूप से उपस्थित रहता था। दुर्ग के प्रमुख को ‘पुरपति’ कहा जाता था, तथा जनता की गतिविधियों पर गुप्त रूप से नजर रखने वाले गुप्तचरों को ‘स्पश’ कहा जाता था। ‘दूत’ नामक पदाधिकारी समय-समय पर संधि-विग्रह के प्रस्तावों को लेकर राजा के पास आया-जाया करता था। ‘व्रजपति’ गोचर भूमि का अधिकारी होता था, तथा ‘कुलप’ परिवार का मुखिया कहलाता था।
विदथ, सभा, समिति और गण : कबायली संस्थाएँ
ऋग्वैदिक साहित्य में कुछ महत्त्वपूर्ण कबीलाई संस्थाओं का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जैसे- विदथ, सभा, समिति तथा गण। ऋग्वेद में ‘विदथ’ का उल्लेख 22 बार हुआ है। संभवतः विदथ आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था थी, जो युद्ध में लूटी गई वस्तुओं अथवा उपहार और समय-समय पर प्राप्त होने वाली अन्य भेंट-सामग्रियों का सुव्यवस्थित वितरण करती थी। ‘सभा’ का वर्णन ऋग्वेद के मूल भाग में भी मिलता है और इसकी चर्चा कुल 8 बार की गई है। यह वृद्ध (श्रेष्ठ) एवं अभिजात (संभ्रांत) व्यक्तियों की एक विशेष संस्था प्रतीत होती है। वेदों में इसके सदस्यों को ‘पितरः’ (पिता) कहकर संबोधित किया गया है और संभवतः यह संस्था नीति-निर्धारण तथा राजन् के कार्यों के मूल्यांकन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
ऋग्वेद में ‘समिति’ का उल्लेख अपेक्षाकृत परवर्ती मंडलों में 9 बार हुआ है- यह साधारण जनप्रतिनिधियों की एक व्यापक सभा थी। इस प्रकार विदथ, सभा और समिति तीनों ही संस्थाएँ वैदिक राजतंत्र में सहायक संस्थाओं के रूप में कार्य करती थीं, जिससे स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक राजन् की सत्ता किसी भी दृष्टि से पूर्णतः निरंकुश नहीं थी।
ऋग्वैदिक राजन् कानूनी सलाहकारों तथा पुरोहित की सहायता से ही न्याय-कार्य संपन्न करता था। चोरी, डकैती, राहजनी आदि अनेक प्रकार के अपराधों का उल्लेख मिलता है, जिनमें पशुओं की चोरी सबसे अधिक होती थी, जिसे प्रायः ‘पणि’ लोग ही करते थे। इनके अधिकांश युद्ध भी गाय को लेकर ही हुए हैं, इसीलिए ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय ही ‘गविष्टि’ (गाय का अन्वेषण) है। इस काल में मृत्युदंड की प्रथा नहीं थी- अपराधियों को शरीर-दंड तथा जुर्माने की सजा दी जाती थी। ‘वेरदेय’ (बदला चुकाने की प्रथा) का भी प्रचलन था। इस काल में ऋण देकर ब्याज लेने वाले वर्ग को ‘बेकनाट’ (सूदखोर) कहा जाता था और सूद का भुगतान भी वस्तु के रूप में ही किया जाता था। दिवालिए व्यक्ति को ऋणदाता का दास बना दिया जाता था।
ऋग्वेदकालीन धर्म एवं धार्मिक विश्वास
ऋग्वेदकालीन धार्मिक जीवन तथा उस समय की सैद्धांतिक मान्यताएँ तत्कालीन भौतिक जीवन से गहराई से प्रभावित थीं। ऋग्वैदिक पशुचारी आर्य प्राकृतिक शक्तियों से अत्यधिक प्रभावित थे और संभवतः यही कारण है कि जहाँ ऋग्वैदिक देवकुल में अनेक देवताओं को स्थान मिला है, वहीं ये सभी देवता वस्तुतः प्राकृतिक शक्तियों के ही मानवीकृत प्रतीक हैं। इस काल में स्पष्ट रूप से बहुदेववाद का दर्शन होता है, जिसमें प्राकृतिक शक्तियों का व्यापक मानवीकरण किया गया है।
देवी-देवताओं का वर्गीकरण
ऋग्वेद में उल्लिखित देवी-देवताओं को मुख्यतः तीन बड़े वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वर्ग आकाश के देवताओं का है, जिसमें सूर्य, द्यौस्, वरुण, मित्र, पूषन्, विष्णु, उषा, अपांनपात्, सविता, विवस्वान्, आदित्य तथा अश्विनद्वय सम्मिलित हैं। दूसरा वर्ग अंतरिक्ष के देवताओं का है, जिसमें इंद्र, मरुत्, रुद्र, वायु, पर्जन्य, मातरिश्वन्, अज एकपाद्, आपः तथा अहिर्बुध्न्य जैसे देवताओं का उल्लेख मिलता है। तीसरा वर्ग पृथ्वी के देवताओं का है, जिसमें अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति तथा विभिन्न नदियाँ सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त श्रद्धा, मन्यु, धातृ, विधातृ जैसी अमूर्त भावनाओं को भी देवरूप में स्वीकार किया गया है।
देवताओं का पशु-प्रतीकात्मक स्वरूप
इस काल के अधिकांश देवताओं का स्वरूप महिमामंडित मानवों जैसा है, किंतु कुछ देवताओं की पशु-रूप में भी आराधना की जाती थी। ऋग्वैदिक धार्मिक एवं प्रतीकात्मक परंपरा में पशु-रूपकों तथा पशु-प्रतीकों का विशेष महत्त्व दिखाई देता है। वैदिक ऋषियों ने प्राकृतिक शक्तियों और देवताओं की कल्पना अनेक बार पशुओं के रूप में की है। इंद्र की उपमा वृषभ (बैल) से की गई है, जो शक्ति, वीरता, उर्वरता और पुरुषत्व का प्रतीक था। सूर्य की कल्पना कई स्थानों पर अश्व (घोड़े) के रूप में की गई है, जो गति, ऊर्जा और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। सरमा, जिसे इंद्र की खोई हुई गायों का पता लगाने वाली दिव्य कुतिया के रूप में वर्णित किया गया है, स्वान (कुत्ते) के रूप में चित्रित होती है और देवताओं की खोजी एवं संदेशवाहक भूमिका से जुड़ी हुई है। इसी प्रकार अज एकपाद् तथा अहिर्बुध्न्य जैसे वैदिक देवतात्मक रूपकों में भी पशु-आकृतियों या सर्प-संबंधी प्रतीकों का प्रयोग मिलता है और मरुतों की माता की कल्पना चितकबरी गाय के रूप में की गई है, जो प्रकृति की उर्वरता और पोषण की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मानी जा सकती है। इस प्रकार ऋग्वैदिक साहित्य में पशु केवल आर्थिक जीवन का ही हिस्सा नहीं थे, बल्कि धार्मिक प्रतीकों, प्राकृतिक शक्तियों और देवताओं की कल्पना को व्यक्त करने वाले एक महत्त्वपूर्ण माध्यम भी थे।
प्रमुख देवता
इंद्र
ऋग्वेद में इंद्र का उल्लेख सर्वाधिक प्रतापी देवता के रूप में मिलता है। ऋग्वेद के लगभग 250 सूक्तों में इंद्र का प्रत्यक्ष वर्णन है तथा 50 अन्य ऐसे सूक्त भी हैं जिनमें अन्य देवताओं के साथ उसका उल्लेख आता है। इंद्र की महत्ता का प्रमुख कारण देवताओं को युद्धों में विजयी बनाना था। अनेक शत्रु-किलों को नष्ट करने के कारण उसे ‘पुरंदर’ कहा गया है और उसे समस्त संसार का स्वामी भी बताया गया है। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इंद्र मूलतः झंझावात का देवता है, जो बादलों में गर्जन एवं बिजली की चमक उत्पन्न करता है। ओल्डेनबर्ग और हिल्लेब्रांड के अनुसार पार्थिव पर्वतों से जल की मुक्ति भी इंद्र के द्वारा ही हुई है। इंद्र वर्षा का प्रमुख देवता था और वह वृत्रासुर का वध करके ही जल को मुक्त करता है, इसीलिए उसे ‘वृत्रहन्’ और ‘पुरंधि’ कहा गया है। अधिकांश वैदिक विद्वानों का मत है कि वृत्र वस्तुतः सूखे (अनावृष्टि) का प्रतीक-दानव है। इंद्र अपने वज्र-प्रहार से वृत्रासुर का वध करके जल को मुक्त करता है, जिससे पृथ्वी पर वर्षा होती है- उसका एक विशेषण ‘अंशुजित्’ (पानी को जीतनेवाला) भी है। वह कुशल रथ-योद्धा (रथेष्ठ), महान् विजेता (विजेंद्र) तथा सोम का पान करनेवाला (सोमपाः) भी है। ऐसा प्रतीत होता है कि इंद्र के युद्ध-कौशल के कारण ही आर्यों ने दानवों और शत्रुओं से युद्ध करने के लिए इंद्र को अपना सैनिक नेता मान लिया था और इस प्रकार ऋग्वैदिक इंद्र उनकी सैनिक-विजय तथा साम्राज्यवादी आकांक्षाओं का ही प्रतीक बन गया।
अग्नि
ऋग्वेद का दूसरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण देवता अग्नि है, जो मनुष्य और देवता के मध्य मध्यस्थ की भूमिका निभाता था। ऋग्वेद में अग्नि को समर्पित लगभग 200 सूक्त प्राप्त होते हैं। अग्नि के अश्वों का नाम ‘रोहित्’ तथा उनके रथ का नाम ‘धूमकेतु’ बताया गया है। ऋग्वेद के अनुसार अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे कोई सर्वगुण-संपन्न राजा अपने वीर पुरुष पर करता है।
वरुण
ऋग्वेदकालीन देवताओं में तीसरा प्रमुख स्थान वरुण का है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व का नियामक और शासक, सत्य का प्रतीक, ऋतु-परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता-धर्ता तथा आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता बताया गया है। ऋत् का संरक्षक होने के कारण इन्हें ‘ऋतस्य गोपाः’ भी कहा गया है और इनकी स्तुति लगभग 30 सूक्तों में की गई है — ऋग्वेद का संपूर्ण सातवाँ मंडल ही वरुण देवता को समर्पित है। तुलनात्मक धर्म की दृष्टि से ईरान में इन्हें ‘अहुरमज्दा’ तथा यूनान में ‘यूरेनस’ के नाम से जाना जाता है, जो भारोपीय धार्मिक परंपराओं की समानता का स्पष्ट प्रमाण है।
सोम
सोम भी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण देवता है। ऋग्वेद के नवें मंडल के सभी 114 सूक्त पूर्णतः सोम देवता को ही समर्पित हैं। सोम देवताओं का प्रमुख पेय था और यह मूलतः वनस्पतियों का देवता भी था। इसकी तुलना ईरान के ‘होम’ तथा यूनान के ‘डायोनिसस’ से की जा सकती है (सोम-लता की वानस्पतिक पहचान को लेकर विद्वानों में आज भी मतभेद है, कुछ इसे ‘इफेड्रा’ नामक पौधे से, तो कुछ अन्य किसी कवक अथवा अन्य वनस्पति से जोड़ते हैं।
सूर्य
आकाश के देवताओं में सूर्य भी प्रमुख था, जिसकी स्तुति पूरे दस सूक्तों में की गई है। उसे सर्वदर्शी व ‘स्पश्’ कहा गया है और सविता उसी का एक अन्य रूप माना जाता है।
अश्विनकुमार
कल्याणकारी और विपत्ति-विनाशक अश्विनकुमार (अश्विनद्वय) देवताओं के चिकित्सक माने जाते थे और इन्हें ‘नासत्य’ भी कहा गया है- इंद्र, अग्नि और सोम के पश्चात सर्वाधिक सूक्त इन्हीं को समर्पित हैं।
ऋग्वेद में इनके अतिरिक्त पशुओं के देवता पूषन्, शपथ एवं प्रतिज्ञा के देवता मित्र, विश्व के संरक्षक और पालनकर्ता विष्णु, रुद्र, देवताओं के जनक विवस्वान् तथा अदिति, विश्वदेव, आर्यमन् जैसे कुछ अन्य देवताओं का भी उल्लेख मिलता है। ऋग्वैदिककालीन देवों में सबसे प्राचीन ‘द्यौस्’ (आकाश) को माना जाता है, जो ग्रीक ‘ज़्यूस’ तथा रोमन ‘ज्युपिटर’ के समकक्ष माना जाता है। यह भारोपीय भाषा-परिवार की मूल धार्मिक एकता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
देवियाँ
ऋग्वैदिक साहित्य में वर्णित पशुचारी पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष देवताओं की व्यापक प्रधानता और देवियों का अपेक्षाकृत गौण स्थान होना पूर्णतः स्वाभाविक ही था। ऋक्-संहिताओं में सर्वप्रथम उल्लेख वनदेवी अरण्यानी का मिलता है। सिंधु नदी को नदियों की माता ‘नदीतमा’ कहा गया है। अन्य ऋग्वैदिक देवियों में प्रगति एवं उत्थान की देवी उषा, अदिति, सूर्या, वाक्, इला, सरस्वती, मही, पुरंधि, धिषणा, निशा, इंद्राणी, कुहू आदि का उल्लेख मिलता है, किंतु समग्र रूप से इनकी स्थिति गौण ही थी और इन्हें पुरुष देवताओं के समान विशेष सम्मान प्राप्त नहीं था।
अन्य धार्मिक विश्वास
ऋग्वेद में भूत-प्रेतों, राक्षसों, अर्ध-देवताओं, अप्सराओं तथा पिशाचों आदि का भी उल्लेख मिलता है, जिससे तत्कालीन धार्मिक जीवन में विद्यमान कबायली अवस्था की भी पुष्टि होती है। कृत्या (दुष्ट स्त्री), निघ्नति (अधर्म की स्त्री अथवा दरिद्रा-देवी), यातुधान (राक्षस) तथा ससर्परी (उड़नेवाली परियाँ) ये सभी इसी प्रकार की अपकारक (हानिकारक) शक्तियाँ मानी जाती थीं। अज, शिग्रु, काश्यप, गौतम, कौशिक, मांडूक्य, मत्स्य आदि जाति एवं व्यक्तियों के नामों से गण-चिह्नात्मक आस्थाओं के प्राचीन प्रचलन की भी पुष्टि होती है। कहीं-कहीं इंद्र की मूर्ति को शत्रुओं से रक्षा करने वाली बताया गया है, जिससे यह प्रतीत होता है कि उस समय तक गंडा-ताबीज में भी विश्वास किया जाने लगा था। यही नहीं, एक स्थान पर तो स्वयं प्रजापति की भी कल्पना कूर्म (कछुआ) के रूप में की गई है।
एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद की ओर संक्रमण
ऋग्वेद के कुछ स्थानों पर, विशेषकर अपेक्षाकृत परवर्ती काल के मंडलों में विभिन्न देवताओं को बारी-बारी से सर्वोच्च मानकर उनमें संपूर्ण गुणों का आरोपण किया गया है। प्रसिद्ध जर्मन-ब्रिटिश भाषाशास्त्री मैक्समूलर ने आर्यों की इस विशिष्ट प्रवृत्ति को ‘हेनोथीइज्म’ (एकेश्वरवाद) की संज्ञा दी है। ऋग्वेद के परवर्ती काल के प्रसिद्ध ‘पुरुषसूक्त’ में विराट-पुरुष की कल्पना में पहली बार अद्वैतवाद की स्पष्ट अनुभूति होती है। ऋग्वेद के परवर्ती नासदीय-सूक्त में निर्गुण ब्रह्म का भी दार्शनिक वर्णन मिलता है। इसी चरण में एकेश्वरवाद के भी स्पष्ट चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं- पहले सभी देवताओं को बारी-बारी से सर्वोच्च स्थान दिया गया, फिर इंद्र-वरुण, वरुण-मित्र, इंद्र-मित्र, वरुण-अग्नि, द्यौस्-पृथ्वी, उषा-रात्रि जैसे युगल (जोड़ीदार) देवता भी अस्तित्व में आए। ऋग्वेद के 9 सूक्तों में इंद्र एवं वरुण का संयुक्त उल्लेख भी मिलता है। इसके पश्चात यह भी कहा गया कि ‘महद् देवानाम् असुरत्वमेकम्’ तथा ‘एकं सत् विप्राः बहुधा वदंति’ अर्थात् ‘सत् एक ही है, ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।’ इस उभरते हुए एकेश्वरवाद के पीछे संभवतः कबायली जीवन में आ रहे व्यापक परिवर्तन ही निहित थे, क्योंकि छोटे-छोटे ‘जन’ (कबीले) अब क्रमशः बड़ी-बड़ी राजनीतिक इकाइयों में विलीन होकर ‘जनपद’ बनते जा रहे थे।
प्रवृत्तिमार्गी धर्म : भौतिक कल्याण की कामना
ऋग्वैदिक धर्म मूलतः पूर्णतः प्रवृत्तिमार्गी (इहलौकिक) है। देवी-देवताओं की स्तुतियों का उद्देश्य मुख्यतः भौतिक सुखों की प्राप्ति ही था, न कि किसी पारमार्थिक (मोक्षपरक) सुख की खोज। ऋत् के मार्ग को ही श्रेष्ठ बताया गया है (‘सुगमृतस्य पन्थाः’)। ऋक्-संहिता की समस्त प्रार्थनाओं में दीर्घायु, रोगों से मुक्ति, वीर संतति, पशुओं की प्राप्ति तथा शत्रुओं पर विजय की ही सतत कामना की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक आर्य भौतिक जीवन के प्रति किसी भी प्रकार से उदासीन नहीं थे।
हिंद-यूरोपीय धर्म से तुलनात्मक संबंध
इस प्रकार ऋग्वैदिक धर्म की गहरी जड़ें आदिम हिंद-ईरानी धर्म और उससे भी प्राचीन आदिम हिंद-यूरोपीय (भारोपीय) धर्म तक पहुँचती हैं, जिनके कारण मित्र, वरुण, बृहस्पति (द्यौस्-पितृ), वायु-वात, सरस्वती जैसे अनेक वैदिक देवी-देवता यूरोप, मध्य एशिया और ईरान के प्राचीन धर्मों में भी किसी-न-किसी रूप में मान्य रहे। इसी प्रकार सोम (फारसी में ‘होम’), यज्ञ (फारसी में ‘यस्न’) जैसे बहुत से धार्मिक शब्दों के सजातीय शब्द पारसी धर्म और प्राचीन यूरोपीय धर्मों में भी स्पष्ट रूप से पाए जाते हैं। इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य जैसे कुछ वैदिक देवताओं का सीधा उल्लेख उत्तरी सीरिया के प्रसिद्ध ई.पू. लगभग 1400 के बोगज़कोई (हट्टूशा) अभिलेख, जो मितन्नी और हित्ती राजाओं के बीच हुई एक ऐतिहासिक संधि का अभिलेख है, में भी मिलता है, जो वैदिक देवताओं की अत्यंत प्राचीन तथा व्यापक भौगोलिक स्वीकार्यता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण है।
ऋत् की अवधारणा : सृष्टि की नैतिक व्यवस्था
ऋग्वेद में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक अवधारणा ‘ऋत्’ की भी मिलती है, जिसकी व्याख्या सृष्टि की नियमितता, भौतिक एवं नैतिक व्यवस्था, तथा अंतरिक्षीय एवं नैतिक व्यवस्था इन सभी रूपों में की गई है। ऋक्-संहिता में ऐसे 24 श्लोक मिलते हैं, जिनमें यह कहा गया है कि ऋत् के द्वारा ही लोगों को गायें, जल, भोजन, भौतिक समृद्धि तथा जीवन के अन्य सभी साधन प्राप्त होते हैं। वरुण को ऋत् का संरक्षक कहा गया है और उसके आदेशों के उल्लंघन पर उसके द्वारा दंडित किए जाने का भी वर्णन मिलता है। संभवतः ऋग्वेद में प्राप्त ऋत् की यह अवधारणा तत्कालीन प्राक्वर्गीय (वर्गविहीन) समाज और कबायली जीवन के ही अनुरूप थी, और संपत्ति की सामूहिकता के माध्यम से ही न्याय और ऋत् की स्थापना संभव मानी जाती थी। कालांतर में जब समाज विभिन्न वर्गों और वर्णों में विभाजित होने लगा तथा लोगों में ईर्ष्या, लालच और स्वार्थ की भावना पनपने लगी, तो ऋत् का क्रमिक ह्रास भी होने लगा। यही कारण है कि ऋग्वेद के मंत्र-द्रष्टाओं ने ऋत् के इस ह्रास पर गहरा दुख व्यक्त किया है, और उसके पुनरुत्थान की बार-बार कामना भी की है। उत्तर वैदिक काल में ऋत् की अवधारणा का लगभग पूर्ण रूप से लोप हो गया और इसीलिए इस काल में वरुण देवता की महत्ता का भी क्रमिक पतन हो गया।
इस प्रकार ऋग्वैदिक संस्कृति भारतीय सभ्यता के इतिहास की आधारभूमि सिद्ध हुई, जिसमें एक कबायली, पशुचारी और सतत युद्धरत समाज ने धीरे-धीरे उन सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक संस्थाओं का बीजारोपण किया, जो आगे चलकर उत्तर वैदिक काल में जनपदों, वर्ण-व्यवस्था तथा उपनिषदीय दर्शन के रूप में विकसित हुईं। ऋग्वेद न केवल भारतीय साहित्य की, बल्कि संपूर्ण विश्व साहित्य की प्राचीनतम उपलब्ध रचनाओं में से एक है और इसका अध्ययन प्राचीन भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति तथा धर्म की गहरी समझ प्रदान करता है। आर्यों के मूल-स्थान तथा प्रवासन को लेकर चला आ रहा शताब्दियों पुराना विवाद आज आधुनिक आनुवंशिक शोध की सहायता से एक नए और अधिक वैज्ञानिक आधार पर समझा जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक संस्कृति का अध्ययन आज भी भारतीय इतिहासलेखन का एक जीवंत और निरंतर विकसित होता क्षेत्र है।


