उन्नीसवीं सदी में भारतीय सांस्कृतिक जागरण
उन्नीसवीं सदी में भारत में सामाजिक, धार्मिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की एक व्यापक प्रक्रिया विकसित हुई, जिसे सामान्यतः भारतीय पुनर्जागरण, नवजागरण या सांस्कृतिक जागरण कहा जाता है। यह केवल पश्चिमी विचारों के प्रभाव का परिणाम नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के भीतर विकसित आत्मचिंतन, सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन की प्रवृत्तियों से भी निर्मित हुआ। पश्चिमी शिक्षा, आधुनिक विज्ञान, तर्कवाद, मानवतावाद तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के पुनर्मूल्यांकन ने इस जागरण को विशेष गति प्रदान की।
ब्रिटिश शासन के विस्तार, अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार, मुद्रण-प्रौद्योगिकी के विकास, समाचार-पत्रों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन तथा आधुनिक संचार साधनों के विस्तार ने भारतीय समाज के शिक्षित वर्ग में नई बौद्धिक चेतना उत्पन्न की। भारतीय और यूरोपीय विद्वानों द्वारा प्राचीन भारतीय साहित्य, धर्म, दर्शन, भाषाओं, इतिहास और संस्कृति के अध्ययन से भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक विरासत का नए दृष्टिकोण से मूल्यांकन करने का अवसर मिला। प्राचीन भारतीय ग्रंथों, उपनिषदों, वेदांत, बौद्ध धर्म तथा भारतीय दर्शन के पुनरावलोकन ने भारतीयों में अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति आत्मगौरव की भावना को भी मजबूत किया।
इस नवजागरण ने सती प्रथा, बाल विवाह, स्त्री अशिक्षा, जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सुधारवादी विचारधारा को बल प्रदान किया। समाज-सुधारकों ने धार्मिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और सामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हुए समाज को अधिक तर्कसंगत और मानवीय बनाने का प्रयास किया। राजा राममोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, केशवचंद्र सेन और स्वामी विवेकानंद जैसे प्रमुख चिंतकों एवं समाज-सुधारकों ने सामाजिक तथा धार्मिक सुधार आंदोलनों को गति प्रदान की। उन्होंने शिक्षा के प्रसार, स्त्री-उत्थान, विधवा-विवाह, सामाजिक समानता, धार्मिक सुधार तथा रूढ़ियों और अंधविश्वासों के विरोध पर विशेष बल दिया।
इसी काल में भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व, भाषाशास्त्र, साहित्य, कला, संगीत और आधुनिक शिक्षा के क्षेत्रों में भी महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई। प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन को नई दिशा मिली तथा भारतीय भाषाओं में आधुनिक साहित्य और पत्रकारिता का विकास हुआ। समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों का व्यापक प्रसार होने लगा। शिक्षा के विस्तार ने एक नए शिक्षित मध्यम वर्ग को जन्म दिया, जिसने सामाजिक सुधार, बौद्धिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया। इन परिवर्तनों ने भारतीय समाज में तर्कशीलता, मानवतावाद, सामाजिक सुधार और आत्मसम्मान की भावना को मजबूत किया।
भारतीय पुनर्जागरण का स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में एक समान नहीं था। बंगाल, महाराष्ट्र, मद्रास, उत्तर भारत तथा अन्य क्षेत्रों में इसके विकास की गति और स्वरूप अलग-अलग रहे। कहीं धार्मिक सुधार आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की कोशिश की गई, तो कहीं आधुनिक शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य और सार्वजनिक संस्थाओं के माध्यम से नई चेतना का प्रसार हुआ। इस प्रकार, भारतीय नवजागरण एक बहुआयामी प्रक्रिया थी, जिसमें धार्मिक सुधार, सामाजिक परिवर्तन, आधुनिक शिक्षा, बौद्धिक जागरण और सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
इस जागरण का उद्देश्य केवल पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करना नहीं था। इसके अंतर्गत भारतीय समाज की कुरीतियों को दूर करने, धर्म और सामाजिक संस्थाओं की तार्किक व्याख्या करने, प्राचीन भारतीय परंपराओं के श्रेष्ठ तत्त्वों को पुनः सामने लाने तथा आधुनिक ज्ञान और विचारों के साथ उनका समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया। भारतीय सुधारकों ने एक ओर पश्चिमी उदारवाद, तर्कवाद, मानवतावाद और आधुनिक विज्ञान से प्रेरणा ग्रहण की, तो दूसरी ओर भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परंपराओं के भीतर मौजूद सुधारवादी और मानवीय तत्त्वों को भी पुनः व्याख्यायित किया।
राजा राममोहन रॉय ने एकेश्वरवाद, तर्कशीलता, स्त्री-अधिकार और सामाजिक सुधार पर बल दिया तथा सती प्रथा के विरोध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह के समर्थन में उल्लेखनीय कार्य किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों की ओर लौटने का आह्वान करते हुए सामाजिक एवं धार्मिक रूढ़ियों का विरोध किया। केशवचंद्र सेन ने ब्रह्म समाज के माध्यम से सामाजिक और धार्मिक सुधारों को आगे बढ़ाया। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक मानवतावादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हुए आत्मविश्वास, सेवा, शिक्षा और सामाजिक उत्थान पर बल दिया।
इस प्रकार, भारतीय पुनर्जागरण ने भारतीय समाज में आधुनिकता और परंपरा के बीच संवाद की प्रक्रिया को जन्म दिया। इसने सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों के विरुद्ध आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया तथा शिक्षा, तर्क, मानवतावाद और सामाजिक समानता के विचारों को व्यापक बनाया। साथ ही, भारतीय अतीत और सांस्कृतिक विरासत के नए अध्ययन ने आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया। आगे चलकर यही सामाजिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक परिवर्तन आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद तथा भारतीय राष्ट्रीय पहचान के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार बन गए।

सांस्कृतिक जागरण के प्रमुख कारण
पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति का प्रभाव
ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के साथ भारत में पश्चिमी शिक्षा और विचारों का प्रसार हुआ। प्रारंभ में अंग्रेजी शासन का उद्देश्य ऐसा शिक्षित भारतीय वर्ग तैयार करना भी था जो औपनिवेशिक प्रशासन में सहायक हो सके। थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से ऐसे शिक्षित वर्ग के निर्माण की वकालत की थी, जो प्रशासन और औपनिवेशिक व्यवस्था में उपयोगी हो।
किंतु पश्चिमी शिक्षा के परिणाम ब्रिटिश सरकार की अपेक्षा से कहीं अधिक व्यापक हुए। भारतीय विद्यार्थियों ने तर्कवाद, मानवतावाद, स्वतंत्रता, समानता, व्यक्तिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रगति जैसे आधुनिक विचारों से परिचय प्राप्त किया। उन्होंने अपने समाज की सामाजिक संरचना, धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं को तर्क तथा विवेक की कसौटी पर परखना शुरू किया।
इस शिक्षित वर्ग ने एक ओर भारतीय समाज में प्रचलित सती-प्रथा, बाल-विवाह, जातिगत भेदभाव और स्त्रियों की सामाजिक स्थिति जैसी समस्याओं पर प्रश्न उठाए, तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों को भी पुनः खोजने का प्रयास किया जिन्हें वे समाज के लिए उपयोगी और गौरवपूर्ण मानते थे। इस प्रकार पश्चिमी शिक्षा भारतीय सांस्कृतिक जागरण की एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक शक्ति बन गई।
धार्मिक सुधार और तर्कशीलता
उन्नीसवीं सदी के सांस्कृतिक जागरण की एक प्रमुख विशेषता धार्मिक चिंतन में परिवर्तन था। शिक्षित भारतीयों ने धार्मिक मान्यताओं को केवल परंपरा के आधार पर स्वीकार करने के बजाय उनके औचित्य और सामाजिक उपयोगिता पर विचार करना शुरू किया। इससे धार्मिक सुधार आंदोलनों को बल मिला।
राजा राममोहन रॉय ने एकेश्वरवाद, तर्क और मानवतावाद पर बल दिया। उन्होंने मूर्तिपूजा, धार्मिक रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों की आलोचना की तथा सती-प्रथा के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण संघर्ष किया। 1828 ई. में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की, जिसने धार्मिक सुधार और सामाजिक पुनर्गठन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दूसरी ओर, स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज के सुधार के लिए वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया। उन्होंने 1875 ई. में आर्य समाज की स्थापना की और मूर्तिपूजा, जातिगत रूढ़ियों तथा अनेक सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनका दृष्टिकोण भारतीय प्राचीन परंपरा के पुनर्मूल्यांकन पर आधारित था। इसी प्रकार रामकृष्ण परमहंस और बाद में स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के सार्वभौमिक और मानवतावादी पक्ष को सामने रखा। इस प्रकार धार्मिक जागरण की विभिन्न धाराओं ने भारतीय समाज में आत्मचिंतन और सुधार की चेतना को मजबूत किया।
अतीत के गौरव की पुनर्खोज
भारतीय सांस्कृतिक जागरण में प्राचीन भारत के इतिहास, साहित्य, धर्म, दर्शन, भाषा, कला और संस्कृति के अध्ययन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यूरोपीय विद्वानों और भारतीय विद्वानों ने संस्कृत तथा प्राचीन भारतीय ग्रंथों का व्यवस्थित अध्ययन आरंभ किया। 1784 ई. में सर विलियम जोन्स ने कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की। इसके माध्यम से भारतीय इतिहास, भाषाओं, साहित्य, धर्म और संस्कृति के अध्ययन को संस्थागत आधार मिला। विलियम जोन्स ने संस्कृत साहित्य के अनेक ग्रंथों का अध्ययन और अनुवाद किया। बाद में मैक्समूलर सहित अनेक यूरोपीय विद्वानों ने वेदों और अन्य संस्कृत ग्रंथों का संपादन और प्रकाशन किया।
इन अध्ययनों से भारतीयों को अपनी प्राचीन साहित्यिक और दार्शनिक परंपराओं की समृद्धि का नए ढंग से परिचय हुआ। उपनिषद, वेद, बौद्ध और जैन साहित्य, संस्कृत काव्य तथा भारतीय दर्शन के अध्ययन ने शिक्षित भारतीयों में सांस्कृतिक आत्मविश्वास को बढ़ाया। यद्यपि यूरोपीय विद्वानों की व्याख्याओं में उस समय की औपनिवेशिक और यूरोपकेंद्रित धारणाएँ भी थीं, फिर भी उनके शोध ने भारतीय अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को गति दी।
ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ
1813 के चार्टर एक्ट के बाद भारत में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का विस्तार हुआ। मिशनरियों ने शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक सेवा के साथ-साथ ईसाई धर्म के प्रचार का कार्य भी किया। उन्होंने भारतीय धार्मिक परंपराओं और सामाजिक प्रथाओं की आलोचना की। इस स्थिति ने भारतीय शिक्षित वर्ग के सामने अपने धर्म और समाज के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट किया। भारतीय सुधारकों ने महसूस किया कि सामाजिक कुरीतियों को बनाए रखकर धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा प्रभावी ढंग से नहीं की जा सकती। इसलिए उन्होंने अपने-अपने धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोणों के आधार पर सुधार आंदोलनों को आगे बढ़ाया। किंतु सांस्कृतिक जागरण को केवल ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों की प्रतिक्रिया के रूप में देखना उचित नहीं होगा। भारतीय समाज के भीतर पहले से मौजूद सुधार की आवश्यकताएँ और आधुनिक शिक्षा से उत्पन्न नई चेतना भी इसके महत्त्वपूर्ण कारण थे।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन
मुद्रण-प्रौद्योगिकी के प्रसार, संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं के ग्रंथों के प्रकाशन और आधुनिक शिक्षा के विस्तार ने भारतीयों को अपने अतीत का अध्ययन करने का अवसर दिया। प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से भारतीयों को अपनी संस्कृति की उपलब्धियों के साथ-साथ उसमें मौजूद सामाजिक रूढ़ियों और कुप्रथाओं का भी बोध हुआ।
इस प्रकार अतीत के अध्ययन ने दोहरी भूमिका निभाई। एक ओर इससे सांस्कृतिक आत्मविश्वास बढ़ा, तो दूसरी ओर समाज की कमियों को दूर करने की प्रेरणा मिली। सुधारकों ने भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ मूल्यों को आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के साथ जोड़ने का प्रयास किया।
प्रेस और पत्र-पत्रिकाओं का विकास
उन्नीसवीं सदी में मुद्रण-प्रेस और समाचार-पत्रों तथा पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार ने सांस्कृतिक जागरण को व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार-पत्रों ने सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक और राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक बहस को जन्म दिया। भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों ने सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, जातिगत भेदभाव, स्त्री-शिक्षा और धार्मिक रूढ़ियों जैसे विषयों पर चर्चा को बढ़ावा दिया। साथ ही, उन्होंने औपनिवेशिक शासन की नीतियों की आलोचना और भारतीयों में आत्मसम्मान तथा अधिकार-बोध के विकास में भी योगदान दिया। इस प्रकार प्रेस ने एक नए सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माण में सहायता की, जहाँ शिक्षित भारतीय सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त कर सकते थे।
शहरीकरण, रेल और आधुनिक संचार
उन्नीसवीं सदी में भारत में आधुनिक परिवहन और संचार साधनों का विस्तार हुआ। रेलवे की शुरुआत 1853 ई. में मुंबई से ठाणे के बीच हुई। बाद में रेलों का विस्तार देश के विभिन्न हिस्सों तक हुआ। डाक, तार और सड़कों के विकास ने भी विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ाया। रेलवे और शहरीकरण ने विभिन्न जातियों, क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाया। इससे पारंपरिक सामाजिक दूरी और कुछ रूढ़ियों को चुनौती मिली। यद्यपि इन परिवर्तनों से तत्काल सामाजिक समानता स्थापित नहीं हुई, फिर भी उन्होंने भारतीय समाज में गतिशीलता और व्यापक सामाजिक संपर्क की नई परिस्थितियाँ पैदा कीं।
सामाजिक सुधार आंदोलनों का विकास
सांस्कृतिक जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम सामाजिक सुधार आंदोलनों के रूप में सामने आया। सुधारकों ने स्त्रियों की स्थिति, शिक्षा, जाति-व्यवस्था और धार्मिक रूढ़ियों से जुड़े प्रश्नों को उठाया। राजा राममोहन रॉय ने सती-प्रथा के विरुद्ध संघर्ष किया, जिसके परिणामस्वरूप 1829 ई. में सती-प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा-विवाह के समर्थन और स्त्री-शिक्षा के प्रसार के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास किए। उनके प्रयासों से 1856 ई. का हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ। इसी प्रकार आर्य समाज, प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज, रामकृष्ण मिशन और अन्य संगठनों ने धार्मिक तथा सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाया। इन आंदोलनों की विचारधाराएँ एक-दूसरे से भिन्न थीं, किंतु सभी ने किसी न किसी रूप में भारतीय समाज के पुनर्गठन की आवश्यकता को स्वीकार किया।
सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रवाद
उन्नीसवीं सदी का सांस्कृतिक जागरण आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवाद के विकास का महत्त्वपूर्ण आधार बना। भारतीयों ने अपने इतिहास, साहित्य, धर्म, दर्शन और सांस्कृतिक परंपराओं का पुनर्मूल्यांकन करते हुए अपनी सामूहिक पहचान के बारे में विचार करना शुरू किया। आधुनिक शिक्षा और प्रेस ने राजनीतिक चेतना को भी विकसित किया। शिक्षित भारतीयों ने स्वतंत्रता, समानता, अधिकार, प्रतिनिधित्व और राष्ट्र जैसी आधुनिक अवधारणाओं को अपनाया। साथ ही, भारतीय अतीत के गौरव और सांस्कृतिक एकता की भावना ने राष्ट्रीय आत्मसम्मान को मजबूत किया। किंतु सांस्कृतिक जागरण केवल धार्मिक या सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने ऐसी बौद्धिक परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जिनमें आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन का विकास संभव हुआ।
इस प्रकार उन्नीसवीं सदी का भारतीय सांस्कृतिक जागरण भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद की प्रक्रिया था। पश्चिमी शिक्षा, आधुनिक विज्ञान, मुद्रण-प्रेस, संचार साधनों और यूरोपीय विद्वानों द्वारा भारतीय अतीत के अध्ययन ने नई चेतना को जन्म दिया, जबकि भारतीय सुधारकों ने अपनी परंपराओं का पुनर्मूल्यांकन करके सामाजिक और धार्मिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रक्रिया में एक ओर सती-प्रथा, बाल-विवाह, जातिगत रूढ़ियों और स्त्रियों की सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठी, तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति के दार्शनिक और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति नया आत्मविश्वास पैदा हुआ। इसी बौद्धिक और सामाजिक परिवर्तन ने आगे चलकर आधुनिक भारतीय समाज तथा भारतीय राष्ट्रवाद के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण आधार तैयार किया।
बंगाल में सुधार आंदोलन
उन्नीसवीं सदी में धार्मिक सार्वभौमिकता, मानववाद, तर्कवाद और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने भारत में सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों को वैचारिक आधार प्रदान किया। इस दौर में अनेक भारतीय बुद्धिजीवियों और चिंतकों ने धर्म तथा संस्कृति के परंपरागत स्वरूप का पुनर्मूल्यांकन शुरू किया। उन्होंने धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक प्रथाओं को सत्य, तर्क, उपयोगिता तथा मानवीय कल्याण की कसौटी पर परखने पर बल दिया। उनका मानना था कि कोई भी सामाजिक या धार्मिक परंपरा तभी सार्थक है, जब वह मानव-कल्याण और समाज की प्रगति में सहायक हो। इसी पृष्ठभूमि में बंगाल में अनेक सुधार आंदोलनों का विकास हुआ। इन आंदोलनों ने धार्मिक आडंबरों, रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों की आलोचना की तथा शिक्षा, स्त्री-उत्थान, सामाजिक समानता और तर्कशीलता को प्रोत्साहित किया। इन सुधार आंदोलनों में राजा राममोहन रॉय और ब्रह्म समाज की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थी।
राममोहन रॉय और ब्रह्म समाज
मुख्य लेख : राममोहन रॉय
राजा राममोहन रॉय बंगाल के नवजागरण के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक थे। उन्हें आधुनिक भारत के प्रारंभिक सामाजिक एवं धार्मिक सुधारकों, भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूतों और आधुनिक शिक्षा के समर्थकों में गिना जाता है। उनका व्यक्तित्व भारतीय और पाश्चात्य चिंतन के समन्वय का प्रतिनिधित्व करता था।
राममोहन रॉय का जन्म 22 मई 1772 ई. को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने संस्कृत, अरबी, फारसी और बाद में अंग्रेजी सहित विभिन्न भाषाओं और साहित्य का अध्ययन किया। युवावस्था में उन्होंने वाराणसी में संस्कृत साहित्य और हिंदू दर्शन का अध्ययन किया तथा पटना में अरबी और फारसी साहित्य का अध्ययन किया। बाद में उन्होंने पाश्चात्य दर्शन और ईसाई धर्मशास्त्र का भी अध्ययन किया। विभिन्न धार्मिक परंपराओं के अध्ययन ने उनके चिंतन को व्यापक और तुलनात्मक दृष्टि प्रदान की।
राममोहन रॉय एकेश्वरवाद के समर्थक थे। उनकी प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण कृतियों में ‘तुहफ़त-उल-मुवाहिदीन’ (एकेश्वरवादियों को उपहार) का उल्लेख किया जाता है, जिसमें उन्होंने बहुदेववाद की आलोचना करते हुए एकेश्वरवाद और तर्कशील चिंतन का समर्थन किया।

ईस्ट इंडिया कंपनी में सेवा और आत्मीय सभा
राममोहन रॉय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा भी की। उन्होंने कंपनी के अधिकारी जॉन डिग्बी के साथ कार्य किया और इस दौरान उन्हें अंग्रेजी भाषा, साहित्य तथा यूरोपीय विचारों को समझने का अवसर मिला। 1814 में उन्होंने कंपनी की नौकरी छोड़कर कलकत्ता में स्थायी रूप से निवास करना शुरू किया। उन्होंने अपने प्रगतिशील सहयोगियों के साथ 1815 ई. में ‘आत्मीय सभा’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य धार्मिक एवं सामाजिक विषयों पर स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित करना तथा हिंदू समाज में व्याप्त रूढ़ियों और अंधविश्वासों की आलोचना करना था।
राममोहन रॉय ने मूर्तिपूजा, धार्मिक कर्मकांडों, जातिगत कट्टरता, सती-प्रथा, बाल-विवाह और स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता जैसी समस्याओं का विरोध किया। उनका विश्वास था कि प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रंथों में एकेश्वरवाद और नैतिक जीवन के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। इसलिए वे हिंदू धर्म को समाप्त करने के बजाय उसकी रूढ़ियों को दूर करके उसके मूल नैतिक एवं आध्यात्मिक तत्त्वों को पुनः स्थापित करना चाहते थे।
विवेकशील दृष्टिकोण
राममोहन रॉय के चिंतन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता तर्क और विवेक पर बल थी। यद्यपि उन्होंने अपने धार्मिक विचारों के समर्थन में वेद, उपनिषद और अन्य प्राचीन ग्रंथों का सहारा लिया, किंतु वे किसी भी धार्मिक सिद्धांत को केवल परंपरा के आधार पर स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि मानव की विवेक-बुद्धि किसी भी सिद्धांत की सत्यता परखने का महत्त्वपूर्ण साधन है। यदि कोई परंपरा मानव-कल्याण के विरुद्ध हो जाए, तो उसे केवल प्राचीन होने के कारण स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
राममोहन रॉय ने यह विवेकशील दृष्टिकोण केवल भारतीय धर्मों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने ईसाई धर्म की भी आलोचनात्मक समीक्षा की। 1820 ई. में प्रकाशित ‘प्रिसेप्ट्स ऑफ जीसस’ में उन्होंने ईसा मसीह की नैतिक शिक्षाओं की प्रशंसा की, किंतु ईसाई धर्म की चमत्कार संबंधी मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया। इससे ईसाई मिशनरियों के एक वर्ग के साथ उनका विवाद हुआ।
प्राच्य और पाश्चात्य विचारों के समन्वयक
राममोहन रॉय न तो भारतीय अतीत के अंधानुकरण के पक्षधर थे और न ही पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण के। उनका विचार था कि भारत को प्राच्य और पाश्चात्य दोनों परंपराओं के श्रेष्ठ तत्त्वों को विवेकपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। वे चाहते थे कि भारतीय समाज पश्चिम से आधुनिक विज्ञान, तर्क, शिक्षा और राजनीतिक विचारों को ग्रहण करे, किंतु अपनी सांस्कृतिक पहचान को नष्ट किए बिना। वे हिंदू धर्म में सुधार के समर्थक थे, किंतु हिंदू धर्म के स्थान पर ईसाई धर्म को स्थापित करने के विरोधी थे। साथ ही, वे विभिन्न धर्मों के बीच संवाद और पारस्परिक सम्मान के पक्षधर थे।
सती-प्रथा के विरुद्ध आंदोलन
सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध राममोहन रॉय के संघर्ष का सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण सती-प्रथा के विरुद्ध उनका आंदोलन था। उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए व्यापक प्रयास किए। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करके यह तर्क प्रस्तुत किया कि सती-प्रथा हिंदू धर्म का अनिवार्य धार्मिक आदेश नहीं है।
राममोहन रॉय ने तर्क, मानवता और दया के आधार पर सती-प्रथा का विरोध किया। उन्हें रूढ़िवादी हिंदू नेताओं के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। उनके प्रयासों तथा अन्य परिस्थितियों के परिणामस्वरूप गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 1829 में बंगाल प्रेसीडेंसी में सती-प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। यह भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी।
ब्रह्म समाज की स्थापना (20 अगस्त 1828 ई.)
राममोहन रॉय ने 20 अगस्त 1828 ई. को ब्रह्म सभा की स्थापना की, जो आगे चलकर ब्रह्म समाज के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसका उद्देश्य एकेश्वरवाद, तर्कशीलता, नैतिकता और धार्मिक सुधार को बढ़ावा देना था। इसके संगठनात्मक कार्यों में ताराचंद चक्रवर्ती ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा, धार्मिक अंधविश्वास और अनावश्यक कर्मकांडों का विरोध किया। इसके अनुयायी एक निराकार परमेश्वर की उपासना और नैतिक जीवन पर बल देते थे। इस आंदोलन ने बंगाल में धार्मिक सुधार के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक चेतना के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
धर्म सभा और रूढ़िवादी प्रतिक्रिया
राममोहन रॉय के सुधारवादी विचारों का रूढ़िवादी हिंदू वर्ग ने विरोध किया। राधाकांत देव के नेतृत्व में 1830 में धर्म सभा का गठन हुआ। धर्म सभा ने विशेष रूप से सती-प्रथा के उन्मूलन जैसे सुधारों का विरोध किया, हालांकि वह आधुनिक शिक्षा, विशेषकर स्त्री-शिक्षा के कुछ रूपों का समर्थन भी करती थी।
इस प्रकार उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक बंगाल में सुधारवादी और रूढ़िवादी विचारधाराओं के बीच सार्वजनिक बहस तेज हुई। समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ इन बहसों के महत्त्वपूर्ण माध्यम बने। संवाद कौमुदी जैसे पत्रों ने सुधारवादी विचारों का समर्थन किया, जबकि समाचार चंद्रिका ने रूढ़िवादी दृष्टिकोण को अभिव्यक्ति दी।
आधुनिक शिक्षा के समर्थक
राममोहन रॉय आधुनिक शिक्षा के प्रमुख समर्थकों में थे। उनका विश्वास था कि भारत की प्रगति के लिए ऐसी शिक्षा आवश्यक है, जिसमें विज्ञान, गणित, दर्शन और आधुनिक ज्ञान को स्थान मिले। 1817 ई. में हिंदू कॉलेज की स्थापना में डेविड हेयर और अन्य शिक्षाप्रेमियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी तथा राममोहन रॉय भी आधुनिक शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से आधुनिक विज्ञान और विचारों के प्रसार का समर्थन किया। 1825 ई. में उन्होंने वेदांत कॉलेज की स्थापना की, जहाँ भारतीय दर्शन के साथ पाश्चात्य विज्ञान और आधुनिक विषयों के अध्ययन को भी महत्त्व दिया गया। उनका उद्देश्य भारतीय परंपरा और आधुनिक ज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करना था।
बंगला भाषा और साहित्य के विकास में योगदान
राममोहन रॉय ने बंगला भाषा को आधुनिक बौद्धिक विमर्श का माध्यम बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने बंगला भाषा में लेखन, अनुवाद और पत्रकारिता को प्रोत्साहित किया। उनके लेखों और पुस्तिकाओं ने सामाजिक तथा धार्मिक प्रश्नों पर सामान्य शिक्षित जनता के बीच चर्चा को बढ़ावा दिया। उन्होंने ‘गौड़ीय व्याकरण’ जैसी रचना के माध्यम से बंगला भाषा के अध्ययन को भी प्रोत्साहित किया। ‘बंगदूत’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से विभिन्न भाषाई समुदायों तक विचारों को पहुँचाने का प्रयास किया गया।
स्त्री-स्वतंत्रता और स्त्री-अधिकारों के समर्थक
राममोहन रॉय स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में सुधार के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने महिलाओं को पुरुषों से बौद्धिक या नैतिक रूप से हीन मानने वाली धारणाओं का विरोध किया। उन्होंने सती-प्रथा, बहुविवाह और स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता की आलोचना की। वे स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे तथा महिलाओं के संपत्ति और उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों की वकालत करते थे। उनके विचारों ने आगे चलकर भारत में स्त्री-सुधार आंदोलनों के विकास के लिए वैचारिक आधार प्रदान किया।
जाति-व्यवस्था का विरोध
राममोहन रॉय जातिगत कट्टरता को भारतीय समाज की एकता में बाधक मानते थे। उनका विचार था कि कठोर जाति-व्यवस्था ने समाज में असमानता और विभाजन को बढ़ावा दिया है। वे धार्मिक और सामाजिक सुधारों के माध्यम से भारतीय समाज में व्यापक एकता स्थापित करना चाहते थे। उनके लिए एकेश्वरवाद केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं था, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच समानता और एकता स्थापित करने का माध्यम भी था।
भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूत
राममोहन रॉय भारतीय पत्रकारिता के प्रारंभिक प्रमुख प्रवर्तकों में थे। उन्होंने समाचार-पत्रों को जनमत निर्माण, सामाजिक सुधार और राजनीतिक चेतना का प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ का प्रकाशन किया तथा फारसी भाषा के ‘मिरात-उल-अखबार’ से भी जुड़े रहे। इसके अतिरिक्त ‘ब्रह्मनिकल मैगज़ीन’ और ‘बंगदूत’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता का भी समर्थन किया। औपनिवेशिक सरकार द्वारा प्रेस पर लगाए गए प्रतिबंधों का उन्होंने विरोध किया और सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्र विचार तथा जनमत के महत्त्व को रेखांकित किया।
राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के समर्थक
राममोहन रॉय केवल धार्मिक और सामाजिक सुधारक ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने समकालीन राजनीतिक और आर्थिक प्रश्नों पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने किसानों की कठिनाइयों, जमींदारों के अत्याचार और औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों की आलोचना की। उन्होंने प्रशासन में भारतीयों की अधिक भागीदारी, न्यायिक समानता और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के पृथक्करण जैसी माँगों का समर्थन किया। वे भारतीयों के अधिकारों की रक्षा तथा प्रशासन को अधिक न्यायपूर्ण बनाने के पक्षधर थे। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायिक सुधार और भारतीयों को उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अवसर देने की मांग की। इस प्रकार उनके चिंतन में सामाजिक सुधार के साथ राजनीतिक और नागरिक अधिकारों की चेतना भी दिखाई देती है।
अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में रुचि
राममोहन रॉय का दृष्टिकोण केवल भारत तक सीमित नहीं था। वे विश्व के विभिन्न देशों में चल रहे स्वतंत्रता, संवैधानिक सुधार और राष्ट्रीय आंदोलनों में रुचि रखते थे। वे राजनीतिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के समर्थक थे तथा विभिन्न देशों में होने वाले अन्याय और दमन का विरोध करते थे। यूरोप और लैटिन अमेरिका की राजनीतिक घटनाओं पर उनकी दृष्टि थी। वे मानते थे कि विश्व के विभिन्न समाजों के अनुभवों से भारत भी सीख सकता है। उनके चिंतन में एक प्रकार का प्रारंभिक अंतरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण दिखाई देता है।
इंग्लैंड की यात्रा और अंतिम जीवन
1830 ई. में राममोहन रॉय इंग्लैंड गए। वे मुगल सम्राट अकबर द्वितीय (1806-1837 ई.) के प्रतिनिधि के रूप में भी वहाँ गए थे। अकबर द्वितीय ने ही उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी। इंग्लैंड में उन्होंने भारतीय हितों से संबंधित विषयों पर अपनी बात रखी और ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था तथा समकालीन घटनाओं का प्रत्यक्ष अध्ययन किया। 27 सितंबर 1833 ई. को ब्रिस्टल, इंग्लैंड में उनका निधन हुआ। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा प्रारंभ की गई सुधारवादी विचारधारा बंगाल और भारत के अन्य भागों में आगे बढ़ती रही।
राममोहन रॉय का ऐतिहासिक मूल्यांकन
राममोहन रॉय उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारतीय सामाजिक और बौद्धिक जागरण के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में थे। उन्होंने भारतीय धार्मिक परंपराओं को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखा तथा पश्चिमी आधुनिक विचारों के उपयोगी तत्त्वों को भारतीय समाज के सुधार से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी कुछ पश्चिमी संस्थाओं और अंग्रेजी शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टि के कारण बाद में उनकी आलोचना भी हुई। किंतु उनके संपूर्ण चिंतन का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वे औपनिवेशिक शासन के अंधसमर्थक नहीं थे। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता, भारतीयों के प्रशासनिक अधिकार, न्यायिक समानता, किसानों के हित और सामाजिक सुधार जैसे प्रश्नों पर ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की। उनका मूल उद्देश्य भारतीय समाज को आधुनिक बनाना, सामाजिक कुरीतियों को दूर करना और भारतीयों में तर्कशीलता, आत्मसम्मान तथा मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित करना था। इसी कारण उन्हें भारतीय नवजागरण और आधुनिक सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रमुख अग्रदूतों में स्थान दिया जाता है।
देवेंद्रनाथ ठाकुर (1818-1905 ई.)
मुख्य लेख : देवेंद्रनाथ ठाकुर
राममोहन रॉय की मृत्यु के बाद 1833 ई. में ब्रह्म समाज आंदोलन का नेतृत्व महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर (1818-1905 ई.) ने सँभाल लिया, जिन्होंने इसे एक बेहतर सांगठनिक ढाँचे और वैचारिक सुसंगति से लैस किया। देवेंद्रनाथ भारतीय विद्या की सर्वोत्तम परंपरा तथा नवीन पाश्चात्य चिंतन की उपज थे। उन्होंने राममोहन रॉय के विचारों के प्रचार के लिए 1839 ई. में ‘तत्त्वबोधिनी सभा’ की स्थापना की, जिसने बंगाल के बुद्धिजीवियों को विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया। तत्त्वबोधिनी सभा और उसके मुखपत्र ‘तत्त्वबोधिनी’ पत्रिका ने बंगला भाषा के सुव्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया। देवेंद्रनाथ की अगुआई में ब्रह्म समाज ने सक्रिय रूप से विधवा पुनर्विवाह, बहुविवाह के उन्मूलन, नारी शिक्षा, रैयत की दशा में सुधार और आत्म-संयम के आंदोलन का समर्थन किया।
राजा राममोहन रॉय के 1833 ई. में इंग्लैंड में निधन के बाद ब्रह्म समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके संगठन को बनाए रखना और उसके सुधारवादी विचारों को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान करना था। इसी समय देवेंद्रनाथ ठाकुर ने ब्रह्म समाज के पुनर्गठन और उसके वैचारिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक समृद्ध बंगाली परिवार से संबंधित थे और भारतीय धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं के साथ-साथ आधुनिक पाश्चात्य विचारों से भी परिचित थे। उनके नेतृत्व में ब्रह्म समाज को अधिक संगठित स्वरूप प्राप्त हुआ तथा उसके धार्मिक और सामाजिक विचारों में अधिक स्पष्टता आई।
देवेंद्रनाथ ठाकुर का जन्म 1818 ई. में कलकत्ता के प्रसिद्ध ठाकुर परिवार में हुआ था। उनके पिता द्वारकानाथ ठाकुर बंगाल के प्रमुख जमींदार, उद्यमी और समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। देवेंद्रनाथ ने अपने जीवन में भारतीय उपनिषदों, वेदांत और धार्मिक दर्शन का गहन अध्ययन किया। साथ ही वे यूरोपीय आधुनिक विचारों और तर्कशीलता से भी प्रभावित हुए। इस प्रकार उनके व्यक्तित्व में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक विवेकवादी चिंतन का समन्वय दिखाई देता है।
तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना
देवेंद्रनाथ ठाकुर ने 1839 ई. में तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना की। इसका उद्देश्य भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परंपराओं का अध्ययन करना, उनमें निहित तर्कसंगत और नैतिक तत्वों को समझना तथा समाज में विवेकपूर्ण एवं नैतिक चिंतन को प्रोत्साहित करना था। सभा ने विशेष रूप से उपनिषदों और वेदांत के अध्ययन को बढ़ावा दिया और धार्मिक विषयों को अंधविश्वास के स्थान पर तर्क तथा विवेक के आधार पर समझने का प्रयास किया।
तत्त्वबोधिनी सभा के माध्यम से देवेंद्रनाथ ने बंगाल के शिक्षित और जागरूक वर्ग को संगठित किया। सभा का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सुधार और बौद्धिक जागरण के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने बंगाल में विकसित हो रही नई बौद्धिक चेतना को एक संगठित मंच प्रदान किया।
तत्त्वबोधिनी पत्रिका
तत्त्वबोधिनी सभा के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए ‘तत्त्वबोधिनी पत्रिका’ का प्रकाशन 1843 ई. में आरंभ किया गया। यह पत्रिका बंगाल के सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक और बौद्धिक जीवन में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुई। इसके माध्यम से भारतीय दर्शन, धर्म, इतिहास, साहित्य तथा सामाजिक प्रश्नों पर विवेकपूर्ण विचार प्रस्तुत किए जाते थे।
तत्त्वबोधिनी पत्रिका ने बंगाली भाषा और साहित्य के विकास में भी योगदान दिया। इसने गद्य-लेखन को अधिक व्यवस्थित और प्रभावशाली बनाने तथा गंभीर विषयों को सरल एवं तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पत्रिका के माध्यम से समाज में शिक्षा, नैतिकता और तार्किक चिंतन के महत्त्व को रेखांकित किया गया।
ब्रह्म समाज का पुनर्गठन
1840 के दशक में देवेंद्रनाथ ठाकुर ने ब्रह्म समाज को अधिक सक्रिय और संगठित रूप प्रदान किया। उन्होंने राममोहन रॉय द्वारा स्थापित एकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा-विरोधी विचारों को आगे बढ़ाया, किंतु उनके धार्मिक चिंतन में उपनिषदों और वेदांत का प्रभाव अधिक स्पष्ट था। उनका विश्वास था कि ईश्वर एक है और मनुष्य को ईश्वर की उपासना के लिए बाहरी कर्मकांडों और मूर्तियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। देवेंद्रनाथ ने ब्रह्म समाज के सदस्यों के लिए धार्मिक आचरण और नैतिक जीवन पर विशेष बल दिया। उन्होंने व्यक्तिगत चरित्र, आत्म-संयम, सत्यनिष्ठा और नैतिकता को धार्मिक जीवन का आवश्यक आधार माना। उनके नेतृत्व में ब्रह्म समाज केवल सामाजिक सुधार का संगठन न रहकर एक संगठित धार्मिक-सुधार आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
ब्रह्म धर्म और धार्मिक विचार
देवेंद्रनाथ ठाकुर ने ब्रह्म समाज के धार्मिक सिद्धांतों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया। 1843 ई. में वे औपचारिक रूप से ब्रह्म समाज से जुड़े और उसके धार्मिक जीवन को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने उपनिषदों में वर्णित निराकार, एकेश्वरवादी ईश्वर की अवधारणा को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने धार्मिक सत्य को केवल परंपरा या रूढ़ि के आधार पर स्वीकार करने के बजाय आत्मचिंतन और विवेक के माध्यम से समझने पर बल दिया। उनके धार्मिक चिंतन में ईश्वर की एकता, नैतिक जीवन, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक साधना प्रमुख थे। इस प्रकार उन्होंने ब्रह्म समाज को भारतीय दार्शनिक परंपरा से जोड़ते हुए आधुनिक धार्मिक चेतना विकसित करने का प्रयास किया।
सामाजिक सुधारों का समर्थन
देवेंद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व में ब्रह्म समाज ने विभिन्न सामाजिक सुधारों का समर्थन किया। इनमें विधवा पुनर्विवाह, बहुविवाह का विरोध, स्त्री शिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन जैसे विषय प्रमुख थे। उनका मानना था कि किसी भी समाज की प्रगति केवल धार्मिक विचारों के परिवर्तन से नहीं हो सकती, बल्कि सामाजिक जीवन में भी सुधार आवश्यक है। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा को सामाजिक विकास का महत्त्वपूर्ण आधार माना। उस समय बंगाल सहित भारतीय समाज के अनेक वर्गों में महिलाओं की शिक्षा का व्यापक अभाव था। ब्रह्म समाज ने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान करने तथा उनके सामाजिक सम्मान को बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन किया। इसी प्रकार बहुविवाह जैसी सामाजिक प्रथाओं का विरोध किया गया और विधवाओं की स्थिति में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया। ब्रह्म समाज के सुधारवादी कार्यक्रमों ने बंगाल में सामाजिक प्रश्नों पर नए प्रकार की सार्वजनिक बहस को जन्म दिया।
कृषकों और नैतिक सुधारों के प्रति दृष्टिकोण
देवेंद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व में ब्रह्म समाज ने समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर कृषकों की समस्याओं पर भी ध्यान दिया। रैयतों की स्थिति में सुधार और उनके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस दृष्टिकोण में सामाजिक सुधार को केवल धार्मिक या व्यक्तिगत जीवन तक सीमित न रखकर व्यापक सामाजिक कल्याण से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
देवेंद्रनाथ ने व्यक्तिगत जीवन में आत्म-संयम, नैतिक अनुशासन और सदाचार को विशेष महत्त्व दिया। उनके अनुसार समाज में स्थायी सुधार तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं नैतिक और अनुशासित जीवन अपनाए। इस कारण ब्रह्म समाज के सुधारवादी कार्यक्रम में सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ नैतिक आत्म-सुधार पर भी बल दिया गया।
बंगाल के नवजागरण में योगदान
देवेंद्रनाथ ठाकुर का योगदान केवल ब्रह्म समाज के पुनर्गठन तक सीमित नहीं था। उन्होंने बंगाल में विकसित हो रही आधुनिक बौद्धिक चेतना को भी महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान की। तत्त्वबोधिनी सभा और तत्त्वबोधिनी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने भारतीय परंपरा का पुनर्मूल्यांकन करते हुए आधुनिक तर्कशीलता और विवेक को प्रोत्साहित किया। उनके नेतृत्व में यह विचार मजबूत हुआ कि भारतीय समाज अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए उनमें निहित मानवीय तथा नैतिक मूल्यों को अपनाए और सामाजिक कुरीतियों को दूर करे। इस दृष्टि से देवेंद्रनाथ ठाकुर बंगाल के सामाजिक और धार्मिक नवजागरण के प्रमुख नेताओं में शामिल थे।
इस प्रकार देवेंद्रनाथ ठाकुर ने ब्रह्म समाज को राममोहन रॉय के बाद एक नया संगठनात्मक और वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने तत्त्वबोधिनी सभा और तत्त्वबोधिनी पत्रिका के माध्यम से बंगाल में तर्कशील एवं विवेकपूर्ण चिंतन को बढ़ावा दिया तथा उपनिषदों और वेदांत की एकेश्वरवादी परंपरा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया। उनके नेतृत्व में ब्रह्म समाज ने धार्मिक सुधार के साथ-साथ विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा, बहुविवाह-विरोध, कृषकों की स्थिति में सुधार और नैतिक आत्म-संयम जैसे सामाजिक प्रश्नों को भी महत्त्व दिया। इस प्रकार देवेंद्रनाथ ठाकुर ने उन्नीसवीं सदी के भारतीय धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों तथा बंगाल के नवजागरण को महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान की।
केशवचंद्र सेन (1838–1884 ई.)
मुख्य लेख : केशवचंद्र सेन
देवेंद्रनाथ ठाकुर के बाद केशवचंद्र सेन (1838–1884 ई.) ने ब्रह्म समाज आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान करने और उसे बंगाल के शिक्षित तथा सीमित कुलीन वर्ग से बाहर निकालने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1860 के दशक में केशवचंद्र सेन और विजयकृष्ण गोस्वामी ने ब्रह्म समाज के विचारों को बंगाल के विभिन्न कस्बों और नगरों तक पहुँचाने का प्रयास किया। विजयकृष्ण गोस्वामी ने ब्रह्म समाज के धार्मिक सिद्धांतों को व्यापक जनता के लिए अधिक स्वीकार्य बनाने का प्रयास किया, जबकि केशवचंद्र सेन का उद्देश्य सामाजिक सुधारों को गति देना और ब्रह्म समाज को बंगाल की सीमाओं से बाहर भारत के अन्य क्षेत्रों तक पहुँचाना था।
केशवचंद्र सेन का विशेष महत्त्व इसलिए था कि उन्होंने ब्रह्म समाज को केवल धार्मिक सुधार का आंदोलन न मानकर व्यापक सामाजिक और नैतिक सुधार आंदोलन के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। उन्होंने जाति-भेद, बाल-विवाह, बहुविवाह और पर्दा-प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया तथा स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह और अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित किया।
केशवचंद्र सेन का प्रारंभिक जीवन और ब्रह्म समाज से संबंध
केशवचंद्र सेन का जन्म 1838 ई. में कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। वे आधुनिक शिक्षा से प्रभावित थे और पश्चिमी दर्शन, विज्ञान तथा ईसाई धर्म के नैतिक सिद्धांतों का उन्होंने गंभीर अध्ययन किया। 1857 ई. में वे ब्रह्म समाज से जुड़े। उस समय ब्रह्म समाज का नेतृत्व देवेंद्रनाथ ठाकुर के हाथों में था।
सेन की धार्मिक और सामाजिक दृष्टि पर पश्चिमी चिंतन का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक था। वे मानते थे कि भारतीय समाज में व्यापक सुधार के लिए केवल धार्मिक विचारों में परिवर्तन पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक संस्थाओं और प्रथाओं में भी परिवर्तन आवश्यक है। उनके विचारों में ईश्वर की एकता, सार्वभौमिक धर्म, नैतिक जीवन, सामाजिक समानता और मानवतावाद को विशेष स्थान प्राप्त था।
देवेंद्रनाथ ठाकुर से वैचारिक मतभेद
समय के साथ केशवचंद्र सेन और देवेंद्रनाथ ठाकुर के विचारों में अंतर स्पष्ट होने लगा। देवेंद्रनाथ ठाकुर ब्रह्म समाज को भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं, विशेषकर उपनिषदों और वेदांत, से जोड़कर देखना चाहते थे। इसके विपरीत केशवचंद्र सेन आधुनिक पश्चिमी विचारों, ईसाई नैतिकता और सार्वभौमिक धार्मिक आदर्शों से अधिक प्रभावित थे।
देवेंद्रनाथ के अनुयायी ब्रह्म समाज के सुधारवादी स्वरूप को बनाए रखते हुए हिंदू समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से अपना संबंध बनाए रखना चाहते थे। इसके विपरीत सेन के समर्थक सामाजिक सुधार को अधिक व्यापक और तीव्र रूप में आगे बढ़ाने के पक्षधर थे। वे जाति-भेद, रूढ़ियों और सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने के लिए अधिक सक्रिय कदम उठाना चाहते थे।
इन वैचारिक मतभेदों के कारण ब्रह्म समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हुई। अंततः 1866 ई. में केशवचंद्र सेन ने देवेंद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व वाले ब्रह्म समाज से अलग होकर ‘भारतवर्षीय ब्रह्म समाज’ की स्थापना की। देवेंद्रनाथ के नेतृत्व में रहने वाले संगठन को बाद में ‘आदि ब्रह्म समाज’ कहा जाने लगा।
भारतवर्षीय ब्रह्म समाज का स्वरूप
केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में भारतवर्षीय ब्रह्म समाज ने स्वयं को किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रखा। उसका उद्देश्य विभिन्न धर्मों में निहित सत्य और नैतिक मूल्यों को स्वीकार करना था। उसकी धार्मिक सभाओं और प्रार्थनाओं में हिंदू धर्म के साथ-साथ इस्लाम, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, यहूदी धर्म तथा अन्य धार्मिक परंपराओं के नैतिक और आध्यात्मिक विचारों को भी स्थान दिया गया। सेन का विश्वास था कि विभिन्न धर्मों के बाहरी रूप अलग हो सकते हैं, किंतु उनके भीतर सत्य, नैतिकता और मानव-कल्याण की समान भावना विद्यमान है। इसलिए वे धार्मिक संकीर्णता के बजाय सार्वभौमिक धर्म की अवधारणा को महत्त्व देते थे। इसी कारण उनके नेतृत्व में ब्रह्म समाज का स्वरूप अधिक उदार, सार्वभौमिक और अंतरधार्मिक बनता गया।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार
केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में ब्रह्म समाज का प्रभाव बंगाल से बाहर भी बढ़ा। उन्होंने विभिन्न प्रांतों में ब्रह्म समाज की शाखाएँ स्थापित करने और उसके विचारों का प्रचार करने के लिए व्यापक प्रयास किए। बंगाल के अतिरिक्त उत्तर भारत, पंजाब और मद्रास क्षेत्र में भी इसके संगठन विकसित हुए। ब्रह्म समाज के विचारों के प्रचार के लिए विभिन्न भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया गया। इन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से एकेश्वरवाद, धार्मिक उदारता, सामाजिक समानता और सुधारवादी विचारों का प्रचार किया गया। इससे ब्रह्म समाज को एक व्यापक अखिल भारतीय सुधार आंदोलन के रूप में विकसित होने में सहायता मिली।
सामाजिक सुधारों के समर्थक
केशवचंद्र सेन सामाजिक सुधारों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने विशेष रूप से बाल-विवाह, बहुविवाह, जाति-भेद और पर्दा-प्रथा का विरोध किया। उनका मानना था कि सामाजिक प्रगति के लिए महिलाओं की स्थिति में सुधार आवश्यक है। इसलिए उन्होंने स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह और अंतर्जातीय विवाह का समर्थन किया। उनके अनुसार समाज में जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का भेद मानव समानता के सिद्धांत के विरुद्ध था। उन्होंने जाति-व्यवस्था की कठोरता को कम करने और विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक संपर्क तथा वैवाहिक संबंधों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। इस प्रकार उनका सामाजिक सुधार कार्यक्रम केवल धार्मिक रूढ़ियों के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक समानता की स्थापना से भी जुड़ा था।
भारतीय सुधार संघ की स्थापना
केशवचंद्र सेन ने सामाजिक सुधारों को संगठित रूप देने के लिए 1870 ई. में ‘भारतीय सुधार संघ’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों में सुधारवादी विचारों का प्रचार करना तथा शिक्षा और सामाजिक कल्याण के कार्यों को आगे बढ़ाना था। भारतीय सुधार संघ के माध्यम से महिलाओं की शिक्षा, श्रमिकों की स्थिति में सुधार, सस्ती एवं उपयोगी शिक्षा तथा जन-जागरण जैसे विषयों पर कार्य किया गया। सेन ने सामाजिक सुधारों को शिक्षित मध्यम वर्ग तक सीमित न रखकर समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
सुलभ समाचार-पत्र
भारतीय सुधार संघ के विचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए ‘सुलभ’ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन भी किया गया। इसका उद्देश्य सामाजिक सुधार और जन-जागरण से संबंधित विचारों का प्रचार करना था। इस प्रकार सेन ने संगठन, शिक्षा और पत्रकारिता—तीनों माध्यमों का उपयोग सामाजिक सुधारों के प्रसार के लिए किया।
ब्रह्म विवाह और 1872 ई. का कानून
केशवचंद्र सेन के सामाजिक सुधार कार्यक्रम में विवाह-सुधार का विशेष महत्त्व था। वे बाल-विवाह और जातिगत प्रतिबंधों के विरोधी थे तथा ऐसे विवाहों के समर्थक थे जिनमें वर-वधू की सहमति, सामाजिक समानता और उचित आयु को महत्त्व दिया जाए।
इन सुधारवादी प्रयासों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश भारतीय सरकार ने 1872 ई. में ‘नेटिव मैरिज एक्ट’ पारित किया, जिसे सामान्यतः ब्रह्म विवाह अधिनियम कहा जाता है। इस कानून ने कुछ शर्तों के अधीन ऐसे विवाहों को कानूनी मान्यता प्रदान की जो प्रचलित धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत नहीं आते थे। इसमें विवाह की न्यूनतम आयु और एकपत्नीव्रत जैसी शर्तें भी निर्धारित की गई थीं। कानून के अंतर्गत विवाह करने वाले पक्षों को यह घोषणा करनी होती थी कि वे कुछ निर्दिष्ट धर्मों को नहीं मानते हैं। यह कानून सामाजिक सुधार आंदोलन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि था, क्योंकि इससे विवाह संस्था में आयु, सहमति और सामाजिक रूढ़ियों से संबंधित सुधारों को कानूनी आधार मिला।
कूचबिहार विवाह और ब्रह्म समाज में नया विभाजन
केशवचंद्र सेन के जीवन में 1878 ई. की घटना अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। उन्होंने अपनी नाबालिग पुत्री सुनीति देवी का विवाह कूचबिहार के नाबालिग महाराजा नृपेंद्र नारॉयण से करा दिया। इस विवाह में निर्धारित आयु और सामाजिक सुधारों से संबंधित उन सिद्धांतों के उल्लंघन का आरोप लगा, जिनका समर्थन स्वयं सेन लंबे समय से करते आए थे।
इस घटना से ब्रह्म समाज के भीतर तीव्र विवाद उत्पन्न हुआ। सेन के अनेक अनुयायियों ने उनके निर्णय का विरोध किया। उनके विरोधियों ने अंततः 1878 ई. में साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना की। इस प्रकार ब्रह्म समाज का एक और विभाजन हुआ और केशवचंद्र सेन के नेतृत्व वाले संगठन की लोकप्रियता तथा प्रभाव को गंभीर चुनौती मिली।
नव विधान
कूचबिहार विवाद के बाद केशवचंद्र सेन की धार्मिक विचारधारा में एक नया चरण दिखाई देता है। उन्होंने जनवरी 1881 ई. में ‘नव विधान’ की घोषणा की। इसका उद्देश्य विभिन्न धर्मों की आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षाओं का समन्वय करके एक सार्वभौमिक धार्मिक आदर्श प्रस्तुत करना था।
नव विधान में हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, बौद्ध धर्म और अन्य धार्मिक परंपराओं के तत्वों को समन्वित करने का प्रयास किया गया। सेन का विश्वास था कि विभिन्न धर्मों में निहित सत्य को स्वीकार करके मानवता के लिए एक व्यापक आध्यात्मिक मार्ग विकसित किया जा सकता है। हालांकि, उनके इस धार्मिक प्रयोग को सभी ब्रह्म समाजियों ने स्वीकार नहीं किया।
केशवचंद्र सेन का महत्त्व
केशवचंद्र सेन उन्नीसवीं सदी के भारतीय धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे। उन्होंने ब्रह्म समाज को बंगाल के सीमित शिक्षित वर्ग से बाहर निकालने तथा उसे भारत के अन्य क्षेत्रों तक पहुँचाने का प्रयास किया। उन्होंने सामाजिक सुधारों को धार्मिक सुधार से जोड़ते हुए स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, अंतर्जातीय विवाह, जाति-भेद के विरोध, बाल-विवाह के विरोध और श्रमिकों की स्थिति में सुधार जैसे विषयों को आंदोलन के केंद्र में रखा। उनकी विचारधारा पर पश्चिमी उदारवाद और ईसाई नैतिकता का प्रभाव था, किंतु वे विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच समन्वय स्थापित करके एक सार्वभौमिक धर्म की खोज करना चाहते थे। उनके नेतृत्व में ब्रह्म समाज ने व्यापक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न किया, यद्यपि उनके कुछ व्यक्तिगत और धार्मिक निर्णयों ने संगठन के भीतर गंभीर मतभेद भी पैदा किए।
इस प्रकार केशवचंद्र सेन का योगदान भारतीय नवजागरण के उस चरण को समझने में महत्त्वपूर्ण है, जिसमें धार्मिक सुधार, सामाजिक समानता, स्त्री-मुक्ति, आधुनिक शिक्षा और सार्वभौमिक मानवतावाद एक-दूसरे से जुड़ने लगे थे।
साधारण ब्रह्म समाज
केशवचंद्र सेन के नेतृत्व और उनके द्वारा अपनाई गई धार्मिक तथा सामाजिक नीतियों से ब्रह्म समाज के एक वर्ग में धीरे-धीरे असंतोष उत्पन्न होने लगा। विशेष रूप से 1878 ई. के कूचबिहार विवाह के बाद यह मतभेद गंभीर हो गया। केशवचंद्र सेन ने अपनी नाबालिग पुत्री सुनीति देवी का विवाह कूचबिहार के नाबालिग महाराजा नृपेंद्र नारॉयण से कराया। उनके इस निर्णय को उनके ही द्वारा समर्थित बाल-विवाह-विरोधी सिद्धांतों के विपरीत माना गया। इससे ब्रह्म समाज के अनेक सदस्यों को गहरा आघात पहुँचा। इसी पृष्ठभूमि में आनंदमोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री, उमेशचंद्र दत्त तथा अन्य सुधारवादी नेताओं ने केशवचंद्र सेन से अलग होकर 1878 ई. में ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना की। विजयकृष्ण गोस्वामी भी इस व्यापक सुधारवादी धारा से जुड़े थे, यद्यपि बाद में उनका धार्मिक दृष्टिकोण अलग दिशा में विकसित हुआ। साधारण ब्रह्म समाज ने ब्रह्म समाज के मूल उदारवादी, तर्कवादी और लोकतांत्रिक आदर्शों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
साधारण ब्रह्म समाज के प्रमुख उद्देश्य
साधारण ब्रह्म समाज का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति के नेतृत्व के बजाय सामूहिक और लोकतांत्रिक आधार पर ब्रह्म समाज के कार्यों को संचालित करना था। इसके नेताओं का विश्वास था कि धार्मिक संगठन में किसी व्यक्ति को अंतिम धार्मिक प्राधिकार प्राप्त नहीं होना चाहिए। धर्म और सामाजिक जीवन से संबंधित प्रश्नों पर विवेक, तर्क और नैतिकता के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
साधारण ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद, मूर्तिपूजा-विरोध, धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक समानता, स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, जातिगत भेदभाव के विरोध और आधुनिक शिक्षा जैसे सुधारवादी आदर्शों को आगे बढ़ाया। इसका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक और सामाजिक सुधार-केंद्रित था।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
साधारण ब्रह्म समाज ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण साधन माना। विशेष रूप से महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उसके नेताओं ने सक्रिय प्रयास किए। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप 1880 ई. में कलकत्ता में ‘ब्रह्म बालिका विद्यालय’ की स्थापना हुई। इस संस्था ने बंगाल में महिला शिक्षा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय भारतीय समाज में महिलाओं की औपचारिक शिक्षा को लेकर अनेक सामाजिक और धार्मिक आपत्तियाँ थीं। ऐसे वातावरण में बालिकाओं के लिए आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था करना एक महत्त्वपूर्ण सुधारवादी कदम था। साधारण ब्रह्म समाज का मानना था कि महिलाओं की शिक्षा के बिना समाज में वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
पत्रकारिता और विचारों का प्रचार
साधारण ब्रह्म समाज ने अपने धार्मिक और सामाजिक विचारों के प्रचार के लिए पत्रकारिता को प्रभावी माध्यम बनाया। इसके विचारों के प्रसार में ‘तत्त्व कौमुदी’ नामक बंगला पत्र तथा ‘ब्रह्म पब्लिक ओपिनियन’ नामक अंग्रेजी पत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में 1884 ई. में ‘संजीवनी’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन भी आरंभ हुआ।
इन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से धार्मिक सुधार, सामाजिक कुरीतियों, शिक्षा, स्त्री-स्थिति, सामाजिक समानता तथा समकालीन राजनीतिक और सार्वजनिक प्रश्नों पर विचार व्यक्त किए जाते थे। इस प्रकार ब्रह्म समाज की पत्रकारिता ने बंगाल में आधुनिक सार्वजनिक विचार-विमर्श के विकास में योगदान दिया।
धार्मिक दृष्टिकोण
साधारण ब्रह्म समाज की धार्मिक विचारधारा तर्क, विवेक और नैतिकता पर आधारित थी। ब्रह्म समाजियों का विश्वास था कि धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि वे प्राचीन हैं या परंपरा से चली आ रही हैं। प्रत्येक धार्मिक सिद्धांत को मानवीय बुद्धि, नैतिक विवेक और तर्क की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। इस दृष्टिकोण के कारण ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा और अंधविश्वासपूर्ण कर्मकांडों का विरोध किया। उसने धार्मिक जीवन में बाहरी आडंबरों के स्थान पर आंतरिक नैतिकता, ईश्वर में विश्वास और मानवीय सदाचार को अधिक महत्त्व दिया।
पुरोहितवाद और धार्मिक प्राधिकार का विरोध
ब्रह्म समाज का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत धार्मिक मामलों में पुरोहित वर्ग के एकाधिकार का विरोध था। उसका मानना था कि धार्मिक ग्रंथों और सिद्धांतों को समझने के लिए किसी विशेष पुरोहित वर्ग पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है। प्रत्येक शिक्षित और विवेकशील व्यक्ति अपने तर्क और नैतिक विवेक के आधार पर धार्मिक विचारों की समीक्षा कर सकता है। इस विचार ने धार्मिक जीवन में व्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय की भावना को बढ़ावा दिया। ब्रह्म समाजियों के अनुसार किसी धार्मिक सिद्धांत की सत्यता केवल उसकी प्राचीनता या किसी धार्मिक अधिकारी की स्वीकृति से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसे बुद्धि और नैतिक विवेक की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए।
सामाजिक सुधार का कार्यक्रम
साधारण ब्रह्म समाज ने धार्मिक सुधार को सामाजिक सुधार से अलग नहीं माना। उसके नेताओं ने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, स्त्रियों की अशिक्षा, बाल-विवाह, बहुविवाह तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरोध में आवाज उठाई। वे स्त्रियों की शिक्षा और सामाजिक सम्मान के समर्थक थे तथा विधवा-विवाह को प्रोत्साहित करते थे। साधारण ब्रह्म समाज ने सामाजिक समानता की अवधारणा को भी महत्त्व दिया। जन्म के आधार पर मनुष्यों में ऊँच-नीच का विभाजन उसके सुधारवादी आदर्शों के विरुद्ध था। इस दृष्टि से ब्रह्म समाज ने आधुनिक समानतावादी विचारों के प्रसार में योगदान दिया।
प्रेस की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना
साधारण ब्रह्म समाज से जुड़े सुधारकों ने प्रेस की स्वतंत्रता और स्वतंत्र सार्वजनिक विचार-विमर्श का समर्थन किया। उनके लिए समाचार-पत्र केवल धार्मिक या सामाजिक विचारों के प्रचार का साधन नहीं थे, बल्कि जनता को शिक्षित करने और सार्वजनिक प्रश्नों पर जागरूकता उत्पन्न करने का माध्यम भी थे। पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर स्वतंत्र विचार व्यक्त करने की परंपरा को प्रोत्साहन मिला। इससे शिक्षित भारतीयों में सार्वजनिक जीवन के प्रति रुचि बढ़ी और धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना तथा आधुनिक राजनीतिक जागरूकता के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ।
लोकतांत्रिक संगठनात्मक स्वरूप
साधारण ब्रह्म समाज की एक प्रमुख विशेषता उसका अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक संगठनात्मक स्वरूप था। इसकी स्थापना ही इस विचार के आधार पर हुई थी कि किसी धार्मिक-सामाजिक संस्था का संचालन किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत सत्ता के अधीन नहीं होना चाहिए। संगठन के निर्णय सामूहिक विचार-विमर्श और संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से लिए जाने चाहिए। इस प्रकार साधारण ब्रह्म समाज ने धार्मिक सुधार के साथ-साथ संगठनात्मक लोकतंत्र की भावना को भी महत्त्व दिया। यह विशेषता उसे केशवचंद्र सेन के नेतृत्व वाले भारतवर्षीय ब्रह्म समाज से अलग पहचान प्रदान करती थी।
ब्रह्म समाज का व्यापक ऐतिहासिक महत्त्व
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रह्म समाज का प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता गया और बीसवीं शताब्दी में उसका व्यापक सामाजिक प्रभाव पहले की अपेक्षा कम हो गया। फिर भी भारतीय इतिहास में इसके योगदान का महत्त्व अत्यंत व्यापक है। ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज में धार्मिक विवेक, सामाजिक सुधार, आधुनिक शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, सामाजिक समानता और स्वतंत्र विचार की भावना को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ब्रह्म समाज ने यह विचार स्थापित करने का प्रयास किया कि धार्मिक आस्था और सामाजिक परंपराओं को बुद्धि तथा नैतिक विवेक की कसौटी पर परखा जा सकता है। उसने मूर्तिपूजा, अंधविश्वासपूर्ण कर्मकांड और धार्मिक रूढ़िवाद का विरोध करते हुए एकेश्वरवाद तथा नैतिक जीवन पर बल दिया। साथ ही उसने पुरोहित वर्ग के धार्मिक एकाधिकार को चुनौती देकर व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और विवेकपूर्ण निर्णय की क्षमता को महत्त्व दिया।
राष्ट्रीय जागरण में योगदान
ब्रह्म समाज का प्रभाव केवल धार्मिक और सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रहा। इसके नेताओं ने आधुनिक शिक्षा, स्वतंत्र पत्रकारिता और सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित किया। इन माध्यमों से भारतीय समाज में सामाजिक तथा राजनीतिक प्रश्नों के प्रति जागरूकता बढ़ी।
प्रेस की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और तर्कशील चिंतन जैसे विचारों ने आगे चलकर आधुनिक भारतीय सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय चेतना के विकास के लिए वैचारिक आधार तैयार करने में योगदान दिया। इस प्रकार ब्रह्म समाज को भारतीय नवजागरण की महत्त्वपूर्ण धाराओं में स्थान दिया जाता है।
इस प्रकार साधारण ब्रह्म समाज ने 1878 ई. के बाद ब्रह्म समाज की सुधारवादी और लोकतांत्रिक परंपरा को आगे बढ़ाया। आनंदमोहन बोस और शिवनाथ शास्त्री जैसे नेताओं के नेतृत्व में इसने धार्मिक सुधार के साथ-साथ शिक्षा, स्त्री-उत्थान, सामाजिक समानता, पत्रकारिता और स्वतंत्र विचार को प्रोत्साहित किया। ब्रह्म बालिका विद्यालय जैसी संस्थाओं की स्थापना तथा तत्त्व कौमुदी, ब्रह्म पब्लिक ओपिनियन और संजीवनी जैसी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से इसके विचारों का व्यापक प्रचार हुआ। यद्यपि समय के साथ ब्रह्म समाज का प्रभाव सीमित हो गया, फिर भी भारतीय धार्मिक सुधार, सामाजिक नवजागरण और आधुनिक राष्ट्रीय चेतना के विकास में उसका योगदान भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण विरासत है।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820-1891 ई.)
मुख्य लेख : ईश्वरचंद्र विद्यासागर
बंगाल के एक गरीब परिवार में पैदा होने वाले समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820-1891 ई.) अपनी कर्मठता और विद्वता के बल पर 1851 ई.में संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल हो गए। यद्यपि वह संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान थे, किंतु उनके मस्तिष्क के दरवाजे पाश्चात्य चिंतन में जो कुछ सर्वोत्तम था, उसके लिए खुले थे। वस्तुतः वह भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति के एक सुखद संयोग के प्रतिनिधि थे। इन सबके अलावा उनकी महानता उनकी सच्चरित्रता और प्रखर प्रतिभा में निहित थी। उनकी धारणाओं और कार्यों तथा उनके चिंतन और व्यवहार में कोई अंतर नहीं था। वह महान मानवतावादी थे। उनमें गरीबों, अभागों और उत्पीड़ित लोगों के लिए अपार सहानुभूति थी। गरीबों के प्रति उनकी उदारता आश्चर्यजनक थी। अनुचित सरकारी हस्तक्षेप को बर्दाश्त न करने के कारण उन्होंने सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया।

भारत की पददलित नारी जाति को ऊँचा उठाने में ईश्वरचंद्र विद्यासागर राममोहन रॉय के सुयोग्य उत्तराधिकारी सिद्ध हुए। उन्होंने 1855 ई. में विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में शक्तिशाली आवाज उठाई और अपने इस कार्य में परंपरागत विद्या का सहारा लिया। उनके प्रयासों से जल्द ही विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में एक शक्तिशाली आंदोलन शुरू हो गया। 1855 ई. के अंतिम दिनों में बंगाल, मद्रास, बंबई, नागपुर और भारत के अन्य शहरों से सरकार को बड़ी संख्या में याचिकाएँ दी गईं, जिनमें विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए एक कानून बनाने का अनुरोध किया गया था। विद्यासागर की प्रेरणा से ही भारत की उच्च जातियों में पहला कानूनी हिंदू विधवा पुनर्विवाह कलकत्ता में 7 सितंबर 1856 ई. को उन्हीं की देखरेख में संपन्न हुआ। देश के विभिन्न भागों में अनेक अन्य जातियों की विधवाओं को प्रचलित कानून के तहत यह अधिकार पहले से ही प्राप्त था। विद्यासागर के प्रयासों से 1855 ई. और 1860 ई. के बीच 25 विधवा पुनर्विवाह संपन्न हुए। उन्होंने बाल-विवाह और बहुविवाह प्रथा के विरुद्ध भी आंदोलन किए।
विद्यासागर स्त्री-शिक्षा के भी सच्चे हिमायती थे। यद्यपि लड़कियों को आधुनिक शिक्षा देने की दिशा में सबसे पहले कदम ईसाई धर्म-प्रचारकों ने उठाया, किंतु बेथुन स्कूल के सचिव के रूप में विद्यासागर नारी शिक्षा के अग्रदूतों में से थे। स्कूलों के सरकारी निरीक्षक की हैसियत से विद्यासागर ने 35 बालिका विद्यालयों की स्थापना की। बेथुन स्कूल की स्थापना 1849 ई. में कलकत्ता में हुई। बेथुन स्कूल को विद्यार्थी प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई हुई। युवा छात्राओं के विरुद्ध नारे लगाए गए, गालियाँ दी गईं और कई बार उनके अभिभावकों का सामाजिक बहिष्कार तक किया गया। विधवा पुनर्विवाह और स्त्री-शिक्षा की वकालत करने के कारण विद्यासागर को पोंगापंथी हिंदुओं की शत्रुता का भी सामना करना पड़ा और उनकी जान लेने तक की धमकी दी गई, किंतु विद्यासागर निडर होकर अपने पथ पर चलते रहे।
आधुनिक भारत के निर्माण में विद्यासागर ने अनेक प्रकार से योगदान दिया। उन्होंने संस्कृत पढ़ाने के लिए एक नई तकनीक विकसित की और अपनी रचनाओं द्वारा आधुनिक गद्यशैली के विकास में सहायता दी। उनके द्वारा लिखी गई बंगला वर्णमाला आज भी प्रयोग की जाती है। उन्होंने संस्कृत कॉलेज के दरवाजे गैर-ब्राह्मण विद्यार्थियों के लिए खोल दिया, क्योंकि वह संस्कृत के अध्ययन पर केवल ब्राह्मण जाति के तत्कालीन एकाधिकार के विरोधी थे। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के साथ-साथ पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन आरंभ किया। यही नहीं, उन्होंने एक कॉलेज की स्थापना में भी सहयोग दिया था, जो आज उनके नाम पर है।
डेरोजियो और यंग बंगाल आंदोलन
मुख्य लेख : डेरोजियो
उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक के अंतिम वर्षों तथा चौथे दशक के दौरान बंगाल के बुद्धिजीवियों के बीच एक गरमवादी (रैडिकल) प्रवृत्ति पैदा हुई। यह प्रवृत्ति राममोहन रॉय से अधिक आधुनिक और क्रांतिकारी थी, जिसे ‘यंग बंगाल आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन का प्रवर्तक एवं प्रेरणास्रोत एक नौजवान एंग्लो-इंडियन हेनरी विवियन डेरोजियो (1809-1831 ई.) था, जो 1826 से 1831 ई. तक कलकत्ता के हिंदू कॉलेज में प्राध्यापक रहा। डेरोजियो में आश्चर्यजनक प्रतिभा थी। उसने महान फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरणा ग्रहण की और अपने जमाने के अत्यंत क्रांतिकारी विचारों को अपनाया। उस समय इटली के एकीकरण और स्वतंत्रता आंदोलन का दौर चल रहा था और मेजिनी का ‘यंग इटली’ इटली के राष्ट्रीय एकीकरण का केंद्र-बिंदु था।
डेरोजियो अत्यंत प्रतिभाशाली शिक्षक था, जिसने अपनी युवावस्था के बावजूद अपने इर्द-गिर्द अनेक तेज और श्रद्धालु छात्रों को इकट्ठा कर लिया था। उसने 1828 ई. में ‘एकेडमिक एसोसिएशन’ का गठन किया और अपने छात्रों को विवेकपूर्ण और मुक्त ढंग से सोचने, मुक्ति, समानता तथा स्वतंत्रता से प्रेम करने एवं सत्य की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। डेरोजियो को उसकी क्रांतिकारिता के कारण जब 1831 ई. में हिंदू कॉलेज से निकाल दिया गया, तो उसने अपने विचारों के प्रसार के लिए यूरेशियनों के मुखपत्र ‘ईस्ट इंडिया’ नामक दैनिक का संपादन सँभाल लिया। किंतु उसी वर्ष 26 दिसंबर को लगभग 22 वर्ष की आयु में हैजे से उसकी मृत्यु हो गई। डेरोजियो और उसके अनुयायी, जिन्हें ‘डेरोजियन’ और ‘यंग बंगाल’ कहा जाता था, प्रचंड देशभक्त थे। उसके प्रमुख शिष्यों में कृष्णमोहन बनर्जी, रामगोपाल घोष एवं महेशचंद्र घोष थे। डेरोजियो को आधुनिक भारत का ‘प्रथम राष्ट्रवादी कवि’ माना जाता है।
डेरोजियो और उसके अनुयायी वाद-विवाद, लेखन और बौद्धिक सुगठनों के माध्यम से अपने विचारों का प्रचार करना चाहते थे। उन्होंने आत्मिक उन्नति और समाज सुधार के लिए एकेडमिक एसोसिएशन के अवशेष पर 1838 में ‘सोसायटी फॉर द एक्विजिशन ऑफ जनरल नॉलेज’ के साथ-साथ ‘एंग्लो-इंडियन हिंदू एसोसिएशन’, ‘बंगहीत सभा’, ‘डिबेटिंग क्लब’ जैसे संगठनों की स्थापना की।
डेरोजियो के अनुयायियों ने सभी प्राचीन व जर्जर परंपराओं एवं रीति-रिवाजों का विरोध किया। उन्होंने पुरानी और हृासोन्मुख प्रथाओं, कृत्यों और रिवाजों की घोर आलोचना की। वे नारी अधिकारों तथा नारी शिक्षा के पक्के हिमायती थे। किंतु डेरोजियन किसी आंदोलन को जन्म देने में सफल नहीं हुए क्योंकि उनके विचारों के फलने-फूलने के लिए सामाजिक स्थितियाँ उपयुक्त नहीं थीं। उस समय समाज में कोई ऐसा वर्ग या समूह नहीं था, जो उनके प्रगतिशील विचारों का समर्थन करता। यही नहीं, वे जनता के साथ अपने आत्मीय संपर्क भी नहीं बना सके। दरअसल उनकी क्रांतिकारिता केवल किताबी बौद्धिकता थी और वे भारतीय समाज की वास्तविकता को पूरी तरह से समझने में असफल रहे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि डेरोजियो के यंग बंगाल ने उन्नीसवीं सदी के भारत में धर्म और दर्शन की सतह पर बहुत कम ही स्पष्ट या स्थायी प्रभाव छोड़ा।
फिर भी, युवा बंगाल आंदोलन ने जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों पर समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं और सार्वजनिक संस्थानों द्वारा शिक्षित करने की राममोहन रॉय की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने कंपनी के चार्टर में संशोधन, प्रेस की स्वतंत्रता, विदेश स्थित ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीय मजदूरों के साथ अच्छा व्यवहार, जूरी द्वारा मुकदमों की सुनवाई, जमींदारों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से रैयतों की सुरक्षा और सरकारी नौकरियों में उच्चतर वेतनमानों के अंतर्गत भारतीयों को रोजगार देने जैसे सामान्य हित के सार्वजनिक प्रश्नों पर सार्वजनिक आंदोलन चलाए।
यंग बंगाल आंदोलन की तरह बंबई और मद्रास में भी क्रमशः ‘यंग बॉम्बे’ और ‘यंग मद्रास’ जैसे आंदोलनों की शुरुआत हुई। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने डेरोजियो के अनुयायियों को बंगाल में ‘आधुनिक सभ्यता का अग्रदूत’, ‘हमारी जाति का पिता’ कहा, जिनके सद्गुण उनके प्रति श्रद्धा पैदा करेंगे और जिनकी कमजोरियों पर कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया जाएगा।
इन आरंभिक सुधारकों ने अपने आधुनिक और सुधारवादी विचारों के प्रसार का माध्यम भारतीय भाषाओं के अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को बनाया। भारतीय भाषाएँ अपनी भूमिका सफलतापूर्वक निभा सकें, इसके लिए उन्होंने प्रारंभिक पाठ्य-पुस्तकें बनाने जैसा काम भी अपने हाथ में लिया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर और रवींद्रनाथ ठाकुर दोनों ने बंगला की प्रारंभिक कक्षाओं के लिए पाठ्य-पुस्तकें तैयार कीं, जिनका प्रयोग आज भी किया जा रहा है। इस प्रकार इस नई धारा के प्रवर्तकों ने अपने विचारों और क्रिया-कलापों के माध्यम से नये भारत की रचना को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
पश्चिमी भारत में सुधार आंदोलन
पश्चिमी भारत में सुधारों की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में दो अलग-अलग तरीकों से हुई। एक तरीका प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की छानबीन और अनुवाद के माध्यम से भारतीय सभ्यता की गरिमा की खोज का प्राच्यवादी दृष्टिकोण था। इस कार्य में प्रमुख विद्वान सुधारक के.टी. तेलंग, बी.एन. मांडलिक और विशेष रूप से प्रोफेसर आर.जी. भंडारकर थे। दूसरा तरीका सामाजिक सुधारों की अधिक प्रत्यक्ष विधि थी, जो जातिप्रथा जैसी सामाजिक संस्थाओं और विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंधों पर प्रहार करती थी। गुजरात के मेहताजी दुर्गाराम मंचाराम (1809-1876 ई.) ने हिंदू विधवाओं के प्रति दुर्व्यवहार के विरुद्ध लेखन किया। उन्होंने सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के लिए 1844 में ‘मानव धर्मसभा’ और ‘यूनिवर्सल रिलीजन सोसाइटी’ की स्थापना की थी। अधिकांश गुजराती सुधारक ‘गुजरात वर्नाक्यूलर सोसाइटी’ (अहमदाबाद) से जुड़े हुए थे। करसनदास मूलजी इस क्षेत्र में अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यकर्ता थे। 1852 ई. में उन्होंने गुजराती भाषा में विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में ‘सत्यप्रकाश’ नामक पत्रिका शुरू की और गुजरात तथा महाराष्ट्र में प्रचलित वल्लभाचार्य संप्रदाय का खुलकर विरोध किया। बंबई में हरिकेशजी ने विधवाओं की व्यथा से प्रभावित होकर विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में सशक्त आंदोलन चलाया और गणपत लक्ष्मणजी ने सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया। 1850 ई. में विष्णु शास्त्री पंडित ने ‘विधवा विवाह समाज’ की स्थापना की।
कुछ पढ़े-लिखे युवकों ने 1848 ई. में छात्रों की एक साहित्यिक और वैज्ञानिक संस्था की स्थापना की। इसकी दो शाखाएँ थीं—गुजराती और मराठी ध्यान मंडलियाँ। ये मंडलियाँ सामाजिक प्रश्नों और सामान्य वैज्ञानिक विषयों पर व्याख्यान आयोजित करती थीं। इस संस्था का उद्देश्य महिलाओं की शिक्षा के लिए स्कूल शुरू करना भी था।
परमहंस सभा
मुख्य लेख : परमहंस सभा
महाराष्ट्र में 1849 ई. में ‘परमहंस सभा’ की स्थापना की गई, जो जाति-पाँति और ऊँच-नीच के बंधनों को तोड़ने में विश्वास रखती थी। इस सभा की बैठकों में इसके सदस्य निम्न जातियों के हाथ से बना भोजन ग्रहण करते थे। वे विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे। इस मंडली की शाखाएँ पूना, सतारा और महाराष्ट्र के अन्य नगरों में भी थीं। इस सभा के प्रभाव से लोगों में यह चर्चा होने लगी थी कि ऊँच-नीच और भेदभाव के कारण देश का बड़ा नुकसान हुआ है और इसे दूर किए बिना देश की प्रगति संभव नहीं है। इस सभा के प्रमुख नेताओं में बालशास्त्री जांभेकर (1812-1846 ई.), दादोबा पांडुरंग तारखडकर (1814-1882 ई.), भास्कर पांडुरंग तारखडकर (1816-1843 ई.), गोपालहरि देशमुख (1823-1892 ई.) और आजीवन ब्रह्मचारी विष्णुबाबा उर्फ विष्णु भीखाजी गोखले (1825-1873 ई.) थे। बंबई के बालशास्त्री जांभेकर ने ब्राह्मणवादी कट्टरता की आलोचना की और 1832 ई. में ‘दर्पण’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया, जिसका उद्देश्य था: “अज्ञान और त्रुटियों के धुंध को दूर करना, जिसके कारण लोगों के दिमाग बंद हो गए थे, तथा लोगों पर ऐसा प्रकाश डालना, जिसके द्वारा यूरोप के लोग, अन्य देशों की तुलना में, दुनिया में आगे बढ़ चुके थे।”
गोपालहरि देशमुख (1823-1892 ई.)
मुख्य लेख : गोपालहरि देशमुख
गोपालहरि देशमुख, जो ‘लोकहितवादी’ उपनाम से विख्यात हैं, ने आधुनिक मानवतावादी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और विवेकसंगत सिद्धांतों के आधार पर भारतीय समाज के पुनर्गठन की वकालत की। उन्होंने हिंदू कट्टरपंथ पर तीखा बौद्धिक आक्रमण किया और धार्मिक तथा सामाजिक समानता का प्रचार किया। 1840 के दशक में उन्होंने लिखा था : “पुरोहित बहुत ही अपवित्र हैं, क्योंकि वे कुछ बातों को बिना अर्थ समझे रटते हैं और ज्ञान को इसी रटंत तक सीमित रखते हैं। पंडित पुरोहितों से भी बुरे हैं, क्योंकि वे और भी अज्ञानी और अहंकारी हैं। ब्राह्मण कौन हैं, और किन अर्थों में वे हमसे भिन्न हैं? क्या उनके बीस हाथ हैं, या हममें कोई कमी है? अब जब ऐसे सवाल पूछे जाएँ, तो ब्राह्मणों को अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाएँ त्याग देनी चाहिए और यह मान लेना चाहिए कि सभी मनुष्य बराबर हैं, और प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।” लोकहितवादी का मानना था कि यदि धर्म सामाजिक सुधार की अनुमति नहीं देता, तो उसे बदल देना चाहिए।
परमहंस सभा बंगाल के डेरोजियोवादियों की मूर्तिभंजक क्रांतिकारी परंपरा का अनुसरण करती थी, किंतु व्यापक समुदाय से सीधे टकराव से बचने के लिए एक गुप्त सभा की तरह कार्य करती थी। इसलिए 1860 ई. में उसके सदस्यों का भांडा फूट जाने पर वह जल्द ही समाप्त हो गया और उसकी उपलब्धियाँ बहुत कम रहीं।
प्रार्थना समाज
1864 ई. में केशवचंद्र सेन (1838-1884 ई.) ने बंबई में ब्रह्म समाज की शाखा को ‘प्रार्थना समाज’ के नाम से आरंभ किया। इसका उद्देश्य था: जातिप्रथा का उन्मूलन, विधवा विवाह का समर्थन, स्त्री शिक्षा पर जोर और बाल विवाह पर रोक। यह एक प्रकार से ब्रह्म समाज का मराठी संस्करण था। इसमें भारत के, विशेषकर महाराष्ट्र के मध्यकालीन संतों, जैसे ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम की शिक्षाओं का गौरवपूर्ण स्थान मिला।
आत्माराम पांडुरंग (1823-1898 ई.)
मुख्य लेख : आत्माराम पांडुरंग
आत्माराम पांडुरंग ने 31 मार्च 1867 को बंबई में प्रार्थना समाज को पुनर्गठित किया, किंतु इसके पीछे वास्तविक प्रेरणा महादेव गोविंद रानाडे (1842-1901) की थी, जिनके योग्य सहायक वासुदेव बाबाजी नौरंगे, रामकृष्ण गोपाल भंडारकर (1837-1925) और नारॉयण गणेश चंदावरकर (1855-1923) थे। ब्रह्म समाज की तरह प्रार्थना समाज भी एकेश्वरवाद का प्रचार करता था तथा मूर्तिपूजा, पुरोहितों के प्रभुत्व और जाति-भेदों की निंदा करता था। बाद में इसने समन्वयवाद का विकास किया और स्वयं को महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा से जोड़ा। के.टी. तेलंग, जो नियमित रूप से प्रार्थना समाज की बैठकों में शामिल होते थे, कभी इसके सदस्य नहीं बने।
प्रार्थना समाज की उपलब्धियाँ
प्रार्थना समाज के प्रयासों से अनेक अनाथालयों, विधवाश्रमों और रात्रि पाठशालाओं की स्थापना हुई। महादेव गोविंद रानाडे ने महाराष्ट्र में 1861 ई. में ‘विधवा पुनर्विवाह संघ’ (व्हिडो रीमैरिज एसोसिएशन) की स्थापना कर सामाजिक सुधारों का श्रीगणेश किया था। उन्होंने अछूतों, विधवाओं और पीड़ितों की स्थिति सुधारने के लिए पंढरपुर में अनाथाश्रम खोला और शिक्षा के विकास के लिए ‘दक्षिण शिक्षा समाज’ नामक संस्था का गठन किया। 1878 ई. में प्रार्थना समाज द्वारा स्थापित रात्रि विद्यालय जनशिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहे। इस समाज ने 1882 ई. में ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना कर नारी-जागरण की योजनाएँ शुरू कीं। लालशंकर उमाशंकर के प्रयासों से 1875 ई. में पंढरपुर में स्थापित ‘वासुदेव बाबाजी नौरंगे बालकाश्रम’ भी प्रार्थना समाज के संरक्षण में आ गया। प्रार्थना समाज ने 1917 ई. में ‘राममोहन अंग्रेजी विद्यालय’ की स्थापना की, जिसके संरक्षण में आज भी बंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों में दस से अधिक विद्यालय चल रहे हैं।
बंगाल के ब्रह्म समाज के विपरीत प्रार्थना समाज ने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया। रानाडे के शब्दों में : “बंबई प्रेसीडेंसी में आंदोलन का प्रमुख तत्त्व उसका यह लक्ष्य था कि अतीत से नाता न तोड़ा जाए और हमारे समाज के सारे संबंध भंग न हों।” प्रार्थना समाज सुधारों को समाज के ढाँचे को तोड़ने वाली उथल-पुथल के रूप में नहीं, बल्कि क्रमिक ढंग से लाना चाहता था। इस क्रमिकवादी दृष्टिकोण ने प्रार्थना समाज को व्यापक समाज के लिए अधिक स्वीकार्य बना दिया। पूना, सूरत, अहमदाबाद, कराची, किरकी, कोल्हापुर और सतारा में इसकी शाखाएँ स्थापित हुईं। इसके कार्यकलाप दक्षिण भारत में भी फैले, जहाँ आंदोलन का नेतृत्व तेलुगु सुधारक वीरेशलिंगम पंतुलु कर रहे थे।
बीसवीं सदी के आरंभ तक मद्रास प्रेसीडेंसी में इसकी अठारह शाखाएँ थीं। 1875 ई. में जब स्वामी दयानंद सरस्वती ने गुजरात और महाराष्ट्र का दौरा किया और एक अधिक अतिवादी धार्मिक आंदोलन की संभावनाएँ प्रस्तुत कीं, तो एस.पी. केलकर के नेतृत्व में समाज के सदस्यों का एक समूह दयानंद की आर्य विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ और अलग हो गया। यद्यपि यह विरोधी गुट प्रार्थना समाज में वापस लौट आया, किंतु यहीं से पश्चिमी भारत में एक अलग प्रकार की धार्मिक राजनीति का आरंभ हुआ, जिसकी पहचान सुधारवाद से अधिक ‘सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद’ थी।
ज्योतिबा फुले (1827-1890 ई.)
मुख्य लेख : ज्योतिबा फुले
महाराष्ट्र के पुणे में माली (पिछड़ी) जाति में जन्मे ज्योतिबा फुले (1827-1890 ई.) एक महान शिक्षाविद्, सामाजिक सुधारों के पुरोधा और अस्पृश्यता तथा जातिवाद के कलंक को मिटाने वाले युगद्रष्टा थे। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 ई. को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के खानवाडी (पुणे) में हुआ था। उनकी माता का नाम चिमनाबाई और पिता का नाम गोविंदराव था। एक वर्ष की आयु में उनकी माता का देहांत हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण सगुणाबाई नामक एक दाई ने किया। उन्हें महात्मा फुले और ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है।
ज्योतिबा का परिवार कई पीढ़ियों पहले सतारा से पुणे आकर बसा था। यहाँ उन्होंने फूलों का व्यवसाय शुरू किया और गजरा व माला बनाने का काम किया, जिसके कारण उन्हें ‘फुले’ के नाम से जाना गया। ज्योतिबा ने प्रारंभ में मराठी भाषा में शिक्षा प्राप्त की, किंतु जातिगत भेदभाव के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में 21 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी में सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की। 1840 ई. में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हुआ, जो बाद में स्वयं एक प्रसिद्ध समाजसेवी बनीं। स्त्री शिक्षा और दलितों के अधिकारों के लिए पति-पत्नी ने मिलकर कार्य किया।
स्त्री शिक्षा के जनक
मानव अधिकारों, सामाजिक न्याय और समानता के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले ज्योतिबा ने शिक्षा के क्षेत्र में औपचारिक कार्य शुरू करने के लिए अगस्त 1848 ई. में बुधवार पेठ मुहल्ले में भिडे के मकान में निम्न जातियों की लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोला, जो स्त्री शिक्षा और उनकी स्थिति सुधारने की दिशा में पहला कदम था। किंतु कट्टरपंथी ब्राह्मणों के विरोध के कारण यह विद्यालय केवल छह महीने तक चल सका।
ज्योतिबा के स्त्री शिक्षा के प्रयासों में उच्च वर्ग के कुछ पितृसत्तात्मक व्यक्तियों ने बाधाएँ डालने की हरसंभव कोशिश की। जब ज्योतिबा नहीं रुके, तो उनके पिता पर दबाव डालकर उन्हें पत्नी सहित घर से निकाल दिया गया। इससे उनके कार्य और जीवन में कुछ समय के लिए व्यवधान आया, किंतु शीघ्र ही वे अपने उद्देश्य की ओर फिर से अग्रसर हो गए।
1851 ई. में ज्योतिबा ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई के साथ गंज पेठ में निम्न जातियों की लड़कियों के लिए दूसरा स्कूल खोला। जब इस स्कूल में पढ़ाने के लिए कोई अध्यापिका नहीं मिली, तो ज्योतिबा ने सावित्रीबाई को शिक्षित कर भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनाया।
ज्योतिबा ने शीघ्र ही सभी वर्गों के अनाथों और स्त्रियों के लिए विद्यालयों की एक शृंखला स्थापित की। 1855 में उन्होंने प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों के लिए पहली रात्रि पाठशाला खोली, जिसमें दिनभर काम करने वाले मजदूर, किसान और गृहणियाँ पढ़ने आती थीं। मुंबई के सरकारी शिक्षा अभिलेखों के अनुसार पुणे और उसके आसपास के क्षेत्रों में ज्योतिबा ने लगभग अठारह पाठशालाएँ स्थापित कीं।
‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना (24 सितंबर 1873 ई.)
ज्योतिबा फुले ने दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए। 24 सितंबर 1873 ई.को उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना कर पूना जैसे कट्टरता के गढ़ में ब्राह्मण वर्चस्व और उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बजाया। उन्होंने समाज के जातिगत विभाजन का हमेशा विरोध किया और जातिप्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से बिना पंडितों के विवाह संस्कार शुरू किए। उन्होंने अपव्यय, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, मूर्तिपूजा और देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना का विरोध किया और निम्न जातियों से अपने पारिवारिक उत्सवों, व्रतों, जन्मोत्सवों, मुंडन संस्कारों और विवाह जैसे समारोहों में ब्राह्मण पुरोहितों का पूर्ण बहिष्कार करने का आह्वान किया। इसके अलावा, फुले ने स्त्रियों और विधवाओं के अधिकारों और उनके उद्धार के लिए भी सराहनीय कार्य किए। उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया, जिसके कारण उन्हें ‘स्त्री उद्धारकर्ता’ की उपाधि दी गई।
ज्योतिबा फुले का साहित्य
ज्योतिबा बहुमुखी प्रतिभा के धनी और उच्च कोटि के लेखक थे। उन्होंने निम्न और अछूत जातियों को जागरूक करने के लिए ‘गुलामगिरी’ (1873 ई.), ‘शिवाजी की जवानी’, ‘किसान का कोड़ा’, ‘धर्म तृतीय रत्न’ (पुराणों का भंडाफोड़), ‘इशारा’ (1885 ई.) जैसी क्रांतिकारी पुस्तकों की रचना की। उन्होंने ‘सतसार’ नामक पत्रिका के दो अंक भी निकाले। उनकी एक पुस्तिका ‘कैफियत’ में पात्रों के माध्यम से महारानी से यह प्रार्थना की गई कि वह दलितों को उनके अधिकार दिलवाएँ। ‘गुलामगिरी’ को गैर-ब्राह्मणों और अछूतों की ‘मुक्ति का घोषणा-पत्र’ माना जाता है।
1873 ई. में सत्यशोधक समाज की स्थापना के बाद उनके सामाजिक कार्यों की सराहना देशभर में होने लगी। फुले की समाजसेवा से प्रभावित होकर मुंबई की एक विशाल सभा में 11 मई 1888 ई.को विट्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया। उनकी मृत्यु 28 नवंबर 1890 ई. को 63 वर्ष की आयु में पुणे (महाराष्ट्र) में हुई।
जहाँ राममोहन रॉय से लेकर रानाडे तक ऊँची जातियों के प्रायः सभी सुधारकों ने केवल अपने समाज की परंपरागत और परिस्थितिजन्य कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया, वहीं ज्योतिबा ने सदियों से दासता का जीवन जी रही निम्न जातियों में शिक्षा के माध्यम से मुक्ति की चेतना का प्रसार कर पुरातनवाद को ध्वस्त करने के अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त की। फुले का महत्त्व केवल इतना ही नहीं है कि उन्होंने पहली बार जातिगत विषमता के विरुद्ध आवाज उठाई, बल्कि इससे बढ़कर उन्होंने साहस के साथ एक विरोध का दर्शन, एक संगठनात्मक ढाँचा और एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
गोपाल गणेश अगरकर (1856-1895 ई.)
मुख्य लेख : गोपाल गणेश अगरकर
गोपाल गणेश आगरकर (14 जुलाई 1856–17 जून 1895 ई.) भारत के प्रमुख समाज-सुधारकों, शिक्षाविदों और पत्रकारों में से एक थे। उनका जन्म महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के तेम्बू नामक स्थान में हुआ था। उन्होंने पुणे के दक्कन कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की और विद्यार्थी जीवन से ही देश तथा समाज-सेवा के प्रति समर्पित हो गए। वे बाल गंगाधर तिलक के सहपाठी और निकट सहयोगी रहे। आगरकर, तिलक और उनके अन्य सहयोगियों का विश्वास था कि आधुनिक शिक्षा के प्रसार के माध्यम से ही समाज और राष्ट्र का पुनर्निर्माण किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से जनवरी 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की गई। इसके बाद 1881 ई. में आगरकर ने तिलक के साथ मिलकर अंग्रेज़ी साप्ताहिक ‘द मराठा’ और मराठी साप्ताहिक ‘केसरी’ के प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1884 ई. में दक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना हुई और 1885 ई. में फर्ग्युसन कॉलेज अस्तित्व में आया, जहाँ आगरकर, तिलक तथा उनके सहयोगियों ने अध्यापन कार्य किया। सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को लेकर आगरकर तथा तिलक के विचारों में धीरे-धीरे मतभेद उत्पन्न होने लगे। विशेष रूप से बाल-विवाह, विवाह की आयु बढ़ाने, सामाजिक सुधारों की प्राथमिकता तथा धार्मिक और सामाजिक रूढ़ियों के प्रश्न पर दोनों के दृष्टिकोण भिन्न थे। परिणामस्वरूप 1887 में आगरकर ‘केसरी’ से अलग हो गए और उन्होंने ‘सुधारक’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादिता के विरुद्ध निर्भीक विचार व्यक्त किए। आगरकर पर महात्मा ज्योतिराव फुले के सामाजिक सुधारवादी विचारों का भी प्रभाव था। उन्होंने बाल-विवाह और वृद्ध-विवाह का विरोध किया तथा विधवा-विवाह के समर्थन में आवाज़ उठाई। वे जाति-प्रथा और छुआछूत के कट्टर विरोधी थे तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान के समर्थक थे। वे वर्ण-व्यवस्था तथा सामाजिक जीवन में जन्म-आधारित भेदभाव को स्वीकार नहीं करते थे और धार्मिक ग्रंथों तथा परंपराओं को तर्क की कसौटी पर परखने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि समाज में सुधार केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिए सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक शिक्षा और तर्कशीलता का विकास भी आवश्यक है। उन्होंने लड़कों के विवाह की आयु 20–22 वर्ष तथा लड़कियों की 15–16 वर्ष करने का समर्थन किया और 14 वर्ष तक की अनिवार्य शिक्षा तथा सहशिक्षा के पक्ष में विचार व्यक्त किए। 1892 में वे फर्ग्युसन कॉलेज के प्रधानाचार्य नियुक्त हुए और जीवन के अंतिम समय तक इस पद पर कार्य करते रहे। आगरकर सांप्रदायिक एकता के समर्थक थे और औपनिवेशिक सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का विरोध करते थे। आर्थिक प्रगति के लिए वे औद्योगीकरण को आवश्यक मानते थे। इस प्रकार गोपाल गणेश आगरकर ने शिक्षा, पत्रकारिता और सामाजिक सुधार के माध्यम से महाराष्ट्र तथा आधुनिक भारत के बौद्धिक एवं सामाजिक जागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध उनका तर्कवादी और सुधारवादी दृष्टिकोण उन्हें अपने समय के प्रमुख समाज-सुधारकों में स्थान देता है। 17 जून 1895 ई. को 43 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले (1831-1897 ई.)
मुख्य लेख : सावित्रीबाई फुले
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831–10 मार्च 1897 ई.) भारत की अग्रणी महिला शिक्षिकाओं, समाज-सुधारकों, कवयित्रियों और महिला अधिकारों की प्रबल समर्थकों में से एक थीं। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 ई. को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के नायगाँव में हुआ था। वर्ष 1840 ई. में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से हुआ। विवाह के समय वे निरक्षर थीं, किंतु ज्योतिराव फुले ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षिका-प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया। 1 जनवरी 1848 ई. को उन्होंने ज्योतिराव फुले के साथ पुणे के भिड़े वाड़ा में बालिकाओं के लिए विद्यालय आरंभ किया और स्वयं वहाँ शिक्षिका के रूप में कार्य किया। यह कार्य उस समय अत्यंत साहसिक था, क्योंकि स्त्रियों और वंचित वर्गों की शिक्षा का समाज के रूढ़िवादी वर्गों द्वारा व्यापक विरोध किया जाता था। सामाजिक विरोध, अपमान और बाधाओं के बावजूद सावित्रीबाई अपने शैक्षिक अभियान से पीछे नहीं हटीं। उन्होंने लड़कियों तथा वंचित वर्गों के लिए अनेक विद्यालयों की स्थापना और संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा उनके शैक्षिक प्रयासों के अंतर्गत 18 विद्यालयों के संचालन का उल्लेख मिलता है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्य का उद्देश्य केवल स्त्रियों को साक्षर बनाना नहीं था, बल्कि शिक्षा के माध्यम से उन्हें आत्मनिर्भर, जागरूक और सामाजिक रूप से सम्मानित बनाना भी था। उन्होंने 1852 ई. में ‘महिला मंडल’ का गठन कर महिलाओं में सामाजिक जागरूकता और संगठन की भावना विकसित करने का प्रयास किया। सावित्रीबाई ने विधवाओं, बाल-विधवाओं और निराश्रित महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
1863 ई. में ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहाँ गर्भवती विधवाओं और सामाजिक संकट से पीड़ित महिलाओं को आश्रय दिया जाता था तथा नवजात शिशुओं की हत्या जैसी अमानवीय प्रथा को रोकने का प्रयास किया जाता था। उन्होंने एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई को आत्महत्या से बचाया, उसकी प्रसूति में सहायता की और उसके पुत्र यशवंत को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया; बाद में यशवंत ने चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की और समाज-सेवा में योगदान दिया। 1873 ई. में ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज के कार्यों में सावित्रीबाई ने सक्रिय भागीदारी की और सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव के उन्मूलन तथा शोषित एवं वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, जाति-प्रथा के विरोध, अस्पृश्यता-निवारण और महिलाओं की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए निरंतर आवाज़ उठाई। वे एक संवेदनशील एवं प्रगतिशील कवयित्री भी थीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘काव्यफुले’ (1854 ई.) और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ (1892 ई.) का उल्लेख किया जाता है। उनके साहित्य में शिक्षा, आत्मसम्मान, सामाजिक समानता, तर्कशीलता और स्त्री-मुक्ति की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। सावित्रीबाई का मानना था कि सामाजिक दासता और असमानता को समाप्त करने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है और विशेष रूप से स्त्रियों तथा शोषित वर्गों को शिक्षा से वंचित रखना सामाजिक अन्याय को बनाए रखने का माध्यम है।
1897 ई. में महाराष्ट्र में प्लेग की महामारी फैलने पर सावित्रीबाई ने रोगियों और पीड़ितों की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। उन्होंने संक्रमित लोगों की देखभाल की और एक संक्रमित बालक को उपचार के लिए ले जाते समय स्वयं भी प्लेग से संक्रमित हो गईं। अंततः 10 मार्च 1897 ई.को उनका निधन हो गया। इस प्रकार सावित्रीबाई फुले ने अपना संपूर्ण जीवन स्त्री-शिक्षा, सामाजिक समानता, मानवता, जातिगत भेदभाव के विरोध और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित किया तथा आधुनिक भारत के सामाजिक और शैक्षिक सुधार आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान दिया। उभारतीय समाज का एक हिस्सा सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन 3 जनवरी को ‘भारतीय शिक्षा दिवस’ और उनके देहांत के दिन 10 मार्च को ‘भारतीय महिला दिवस’ के रूप में मनाता है।
महर्षि धोंडो केशव कर्वे (1858-1962 ई.)
मुख्य लेख : धोंडो केशव कर्वे
महाराष्ट्र के मुरुड (रत्नागिरि) में जन्मे डॉ. डी.के. कर्वे (1858-1962 ई.) एक अन्य महान सुधारक थे। फर्ग्यूसन कॉलेज में अध्यापन करते हुए उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा और अपनी पहली पत्नी राधाबाई के निधन के बाद 1893 ई. में अपने मित्र की विधवा बहन गोदाबाई से विवाह किया। 1896 ई. में उन्होंने पूना के हिंगणे में दान में मिली एक कुटिया में विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना की। महिलाओं के लिए कर्वे ने 1907 ई. में एक महिला विद्यालय और 1916 ई. में एक महिला विश्वविद्यालय की नींव डाली, जो कालांतर में विधवाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने और आत्मनिर्भर बनाने का अनूठा संस्थान बन गया। इंडियन सोशल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने गाँवों में शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और इसके प्रसार के लिए 50 से अधिक प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना की। भारत सरकार ने 1958 ई. में उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर उन्हें ‘भारत रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया।
दक्षिण भारत में सुधार आंदोलन
दक्षिण भारत में सुधार आंदोलन की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। इसके कई कारण थे। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में दक्षिण में आधुनिक शिक्षा का अभाव इसका एक प्रमुख कारण था। सामाजिक विद्रोह के अभाव का दूसरा प्रमुख कारण वहाँ का सामाजिक ढाँचा था, जिसमें बहुसंख्यक निम्न वर्गों पर ब्राह्मणों की स्पष्ट प्रभुता थी। सभी सुधारकों की पृष्ठभूमि प्रायः उच्च वर्ग की थी और ब्राह्मण किसी भी ऐसे मौलिक सामाजिक परिवर्तन का समर्थन नहीं कर सकते थे, जिसमें उनकी अपनी प्रभुता पर आँच आती। बंगाल और बंबई के नगरीय क्षेत्रों में ब्राह्मणों का कुछ अन्य उच्चवर्गीय जातियों के साथ सामाजिक मिश्रण शुरू हो गया था, किंतु दक्षिण में ऐसा नहीं था। वहाँ जातिप्रथा अभी भी कठोर थी, और ऐसे में कोई भी उच्चवर्गीय व्यक्ति सुधार के लिए अपनी जाति से बहिष्कृत होना नहीं चाहता था।
मिशनरी गतिविधियों और धर्म परिवर्तन के विरुद्ध 1820 के दशक में मद्रास में ‘विभूति संगम’ (सेक्रेड ऐशेज सोसाइटी) बना, जो अतिवादी शनार ईसाइयों को पुनः हिंदू बनाने का उपदेश देता था। फिर 1840 के दशक में ‘धर्म सभा’ की स्थापना हुई, जिसके संरक्षक मुख्यतः ब्राह्मण और सवर्ण हिंदू थे। ये दोनों संगठन परिवर्तन के रूढ़िवादी विरोध, कठोर वर्णाश्रम धर्म के पालन और जातिगत बहिष्कार का समर्थन करते थे। इस प्रकार, मद्रास या संभवतः संपूर्ण दक्षिण में बौद्धिक जीवन या तो देश के अन्य भागों में हो रही गतिविधियों का प्रतिबिंब मात्र था या दक्षिण के ईसाई मिशनरियों की शिक्षण संस्थाओं के इर्द-गिर्द सीमित था।
वीरेशलिंगम पंतुलु (1848-1919 ई.)
मुख्य लेख : वीरेशलिंगम पंतुलु
आधुनिक भारत के महान बुद्धिजीवियों में से एक वीरेशलिंगम पंतुलु (1848-1919 ई.) स्त्री शिक्षा और सहशिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने अपने विचारों को कार्यान्वित करने के लिए 1874 ई. में धवलेश्वरम में और 1884 ई. में इन्निसपेटा में कन्या पाठशालाएँ स्थापित कीं और राजमुंदरी से ‘विवेकवर्धनी’ (1874 ई.) नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अपने लेखों और ‘ब्रह्मविवाहम’ जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का उपहास किया। उन्होंने 1878 ई. में ‘सोसाइटी फॉर सोशल रिफॉर्म’ (संघ-संस्कारण-समाजम) और ‘राजमुंदरी सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन’ नामक संगठनों का गठन किया।
मद्रास प्रेसीडेंसी में तेलुगु भाषी क्षेत्रों में विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में आंदोलन की शुरुआत वीरेशलिंगम पंतुलु ने की। उन्होंने 1879 ई. में विधवा विवाह का खुला समर्थन करते हुए एक ‘विधवा विवाह समुदाय’ का गठन किया (मद्रास में 1874 ई. में भी एक विधवा विवाह समुदाय स्थापित हुआ था, जो बहुत सक्रिय नहीं हो सका)। 1881 ई. में उन्होंने घोर विरोध के बीच राजमुंदरी में एक सवर्ण विधवा का विवाह करवाया। 1883 ई. में उन्होंने महिलाओं के हितों को समर्पित एक मासिक पत्रिका ‘सतीहितबोधिनी’ शुरू की, जिसके परिणामस्वरूप 1891 ई. में नगर के गणमान्य नागरिकों के संरक्षण में एक ‘विधवा पुनर्विवाह संगठन’ (व्हिडो रीमैरिज एसोसिएशन) की स्थापना हुई। किंतु इस उत्साह के बावजूद, सुधारक केवल तीन विवाह ही आयोजित कर सके। वीरेशलिंगम ने विधवाओं के लिए 1897 ई. में मद्रास में और 1905 ई. में राजमुंदरी में निवास गृह बनवाए।
1893 ई. में सरकार ने वीरेशलिंगम को ‘रॉय बहादुर’ की उपाधि प्रदान की, किंतु उन्हें अधिक खुशी तब हुई जब वे 1898 ई. में अखिल भारतीय समाज सुधार कांग्रेस के सभापति चुने गए। 1899 ई. में वे मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में तेलुगु के अध्यापक नियुक्त हुए। इस पद पर नियुक्त होने वाले वे आंध्र प्रदेश के पहले व्यक्ति थे। सेवा से अवकाश के बाद वे पुनः विधवाओं और अनाथ स्त्रियों के उत्थान में जुट गए। 1905 ई. में उन्होंने ‘हितकारिणी समाजम’ स्थापित किया, जिसे 1908 ई. में सरकार ने मान्यता प्रदान की। उन्होंने देवदासी प्रथा और वेश्यावृत्ति का भी विरोध किया। वीरेशलिंगम आजीवन नारी कल्याण के लिए कार्य करते रहे, यही कारण है कि रानाडे ने उन्हें दक्षिण भारत का ‘ईश्वरचंद्र विद्यासागर’ कहा था। वे आधुनिक तेलुगु गद्य साहित्य के प्रवर्तक, प्रथम उपन्यासकार, प्रथम नाटककार और आधुनिक पत्रकारिता के प्रवर्तक माने जाते हैं।
श्रीधरलु नायडू
श्रीधरलु नायडू उन्नीसवीं शताब्दी के दक्षिण भारत के प्रमुख समाज और धार्मिक सुधारकों में से एक थे तथा वेद समाज के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। दक्षिण भारत में ब्रह्म समाज के विचारों के प्रसार में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। 1864 ई. में केशवचंद्र सेन के मद्रास आगमन और उनके व्याख्यानों से प्रभावित होकर 1864 ई. में मद्रास में वेद समाज की स्थापना हुई। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वेद समाज के प्रारंभिक प्रमुख सदस्यों में वी. राजगोपालाचारी और पी. सुब्बरायुलु चेट्टी शामिल थे, जबकि लगभग 1869 ई. में चेम्बेटी श्रीधरलु नायडू इसके प्रमुख नेताओं और सचिव के रूप में उभरे तथा उन्होंने संस्था को सक्रिय रूप से संगठित और लोकप्रिय बनाया। वे ब्रह्म समाज के सिद्धांतों से प्रभावित थे और सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों और कर्मकांडों का विरोध करते हुए एकेश्वरवाद के प्रचार के पक्षधर थे। वेद समाज जातिगत भेदभाव को समाप्त करने, विधवा-पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता था। नायडू ने विशेष रूप से दक्षिण भारत में इन सुधारवादी विचारों को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे ब्रह्म समाज के सिद्धांतों का गहन अध्ययन करने के लिए कलकत्ता गए और वहाँ के ब्रह्म आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप से परिचित हुए। मद्रास लौटने के बाद उनके प्रयासों से 1871 ई. में वेद समाज का पुनर्गठन हुआ और उसका नाम ‘दक्षिण भारत का ब्रह्म समाज’ (ब्रह्म समाज ऑफ साउथ इंडिया) रखा गया। नायडू का एक महत्त्वपूर्ण योगदान ब्रह्म समाज के साहित्य को दक्षिण भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना था। उन्होंने देवेंद्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कृति ‘ब्रह्म धर्म’ तथा वेद समाज से संबंधित अन्य साहित्य का तमिल और तेलुगु में अनुवाद किया, जिससे ब्रह्म समाज के एकेश्वरवादी तथा सुधारवादी विचारों को स्थानीय समाज तक पहुँचाने में सहायता मिली। उन्होंने तमिल में ‘तत्त्वबोधिनी’ का अनुवाद भी प्रकाशित किया और दक्षिण भारत में ब्रह्म समाज के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय प्रयास किए। वे बाल-विवाह, सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों के विरोधी तथा स्त्री-शिक्षा, विधवा-पुनर्विवाह और सामाजिक समानता के समर्थक थे। वेद समाज का उद्देश्य केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि विवाह और अंतिम संस्कार जैसी सामाजिक परंपराओं को अनावश्यक धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त करना तथा मनुष्य के सामाजिक जीवन में तर्क, नैतिकता और समानता को प्रतिष्ठित करना भी था। बंगाल के साधारण ब्रह्म समाजी नेता शिवनाथ शास्त्री ने मद्रास जाकर इस आंदोलन को शक्ति प्रदान की। एम. बुचियाह और आर. वेंकटरत्नम इस समाज के प्रमुख नेता थे इस प्रकार चेम्बेटी श्रीधरलु नायडू ने ब्रह्म समाज के सुधारवादी विचारों को दक्षिण भारत में लोकप्रिय बनाने, जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादी प्रथाओं के विरुद्ध जनमत तैयार करने तथा महिलाओं की शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह जैसे सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उनका कार्य दक्षिण भारत में उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन और आधुनिक चेतना के विकास की महत्त्वपूर्ण कड़ी था।
इन संगठनों के अलावा, दक्षिण भारत में 1877 ई. में माधवाचार्य के दर्शन पर आधारित ‘माधव सिद्धांत उन्नयिनी सभा’ और 1886 ई. में तिनवेल्ली में ‘शैव सिद्धांत सभा’ का गठन किया गया। किंतु दक्षिण में ब्रह्म समाज आंदोलन की गति बहुत धीमी रही। मद्रास में ब्रह्म समाज से अधिक प्रार्थना समाज का प्रभाव था।
स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883 ई.) उन्नीसवीं शताब्दी के प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक सुधारकों में से एक थे। उनका मूल नाम मूलशंकर था और उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था। उन्होंने वैदिक धर्म और दर्शन का गहन अध्ययन किया तथा स्वामी विरजानंद को अपना गुरु बनाया, जिनसे उन्होंने संस्कृत, व्याकरण और वैदिक साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया। दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता, जातिगत भेदभाव और अनेक सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया तथा लोगों को वेदों की मूल शिक्षाओं की ओर लौटने का आह्वान किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने 10 अप्रैल 1875 को मुंबई (तत्कालीन बंबई) में आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज का प्रमुख उद्देश्य वैदिक सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के साथ समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों का उन्मूलन तथा तर्क, नैतिकता और सामाजिक समानता की स्थापना करना था। स्वामी दयानंद ने वेदों को ज्ञान का प्रामाणिक स्रोत मानते हुए ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश दिया और मूर्तिपूजा, कर्मकांड, अंधविश्वास तथा धार्मिक पाखंड का विरोध किया। उन्होंने जन्म-आधारित जाति-भेद और अस्पृश्यता का विरोध करते हुए गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर सामाजिक व्यवस्था की व्याख्या की। वे बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे। उनका मानना था कि समाज की उन्नति के लिए स्त्रियों और पुरुषों दोनों को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। आर्य समाज ने आगे चलकर शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) विद्यालयों तथा महाविद्यालयों और गुरुकुलों की स्थापना एवं विस्तार के माध्यम से आधुनिक तथा वैदिक शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा दिया। आर्य समाज ने सामाजिक सुधार के साथ-साथ हिंदी और संस्कृत के प्रचार, स्वाध्याय, नैतिक जीवन तथा सामाजिक जागरूकता को भी प्रोत्साहित किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारों को प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने वैदिक धर्म की व्याख्या करते हुए विभिन्न धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं की तर्कपूर्ण समीक्षा की। इस प्रकार आर्य समाज ने उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और शिक्षा, स्त्री-उत्थान, सामाजिक समानता तथा रूढ़िवादिता के विरोध के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज में नई चेतना उत्पन्न करने में योगदान दिया।
दयानंद सरस्वती (1824-1883 ई.)
मुख्य लेख : दयानंद सरस्वती
दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिंतक और ‘आर्य समाज’ के संस्थापक थे। उन्होंने वेदों के प्रचार के लिए 10 अप्रैल 1875 ई. को बंबई में आर्य समाज की स्थापना की। उनका प्रमुख नारा था: ‘वेदों की ओर लौटो’। उन्होंने कर्म सिद्धांत, पुनर्जन्म और सन्यास को अपने दर्शन का आधार बनाया। उन्होंने सबसे पहले 1876 ई. में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। पहली जनगणना के समय दयानंद ने आगरा से देश के सभी आर्य समाजों को निर्देश दिया कि सभी लोग अपना धर्म ‘वैदिक धर्म’ या ‘सनातन धर्म’ लिखवाएँ।
हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति से गहरे प्रभावित आर्य समाज के प्रवर्तक दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 ई. को गुजरात की छोटी-सी रियासत मोरवी के टंकारा गाँव में एक धनी, किंतु रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी (अंबाशंकर) और माता का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-संग्राहक थे। मूल नक्षत्र और धनु राशि में जन्म होने के कारण उनका बाल्यकालीन नाम ‘मूलशंकर’ रखा गया। उनकी माता वैष्णव थीं, जबकि पिता शैव मत के अनुयायी थे। आगे चलकर विद्वान बनने के लिए मूलशंकर ने संस्कृत, वेद, शास्त्रों और अन्य धार्मिक पुस्तकों का गहन अध्ययन किया।
शिव के पक्के भक्त बालक मूलशंकर को उनके पिता ने महाशिवरात्रि के अवसर पर व्रत रखने को कहा। उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मंदिर में रुका हुआ था। परिवार के सो जाने के बाद भी मूलशंकर जागते रहे, यह विश्वास करते हुए कि भगवान शिव आएँगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। किंतु उन्होंने देखा कि शिव के लिए रखा भोग चूहे खा रहे थे। यह देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ और बोध हुआ कि यह वह शंकर नहीं है, जिसकी कथा उन्हें सुनाई गई थी। इस घटना पर उन्होंने अपने पिता से तर्क-वितर्क किया और कहा कि ऐसे असहाय ईष्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।
गृह-त्याग और ज्ञान की खोज
अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे से हुई मृत्यु से मूलशंकर जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे, जिनसे उनके माता-पिता चिंतित हो गए। उनके माता-पिता ने किशोरावस्था में ही उनका विवाह करने का निर्णय लिया, किंतु मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं है।
शाष्वत सत्य और शिव की प्राप्ति के लिए मूलशंकर ने 1846 ई. में 21 वर्ष की आयु में समृद्ध घर-परिवार त्यागकर गेरुआ वस्त्र धारण किया। उन्होंने भ्रमण करते हुए कई आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की। प्रारंभ में वे वेदांत के प्रभाव में आए और अद्वैत मत में दीक्षित हुए, जहाँ उनका नाम ‘शुद्ध चौतन्य’ पड़ा। इसके बाद वे स्वामी परमानंद से संन्यासियों की चतुर्थ श्रेणी में दीक्षित हुए और यहीं उनकी प्रचलित उपाधि ‘दयानंद सरस्वती’ मिली।
1859 ई. में यात्रा करते हुए दयानंद सरस्वती मथुरा में वैदिक साहित्य के प्रख्यात विद्वान प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानंद के पास पहुँचे। उन्होंने विरजानंद को अपना गुरु बनाया। गुरु ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजल योगसूत्र और वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। विरजानंद ने दक्षिणा के रूप में उनसे कहा: “मैं चाहता हूँ कि तुम संसार में जाओ और मनुष्यों में ज्ञान की ज्योति फैलाओ। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।” उन्होंने अंतिम शिक्षा दी कि मनुष्यकृत ग्रंथों में ईष्वर और ऋषियों की निंदा है, किंतु ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं। गुरु के आदेशानुसार दयानंद ने वैदिक धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता स्थापित करने का आजीवन प्रयास किया।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महर्षि दयानंद ने अनेक स्थानों की यात्रा की। 1863 ई. में कुंभ के अवसर पर हरिद्वार में उन्होंने पाखंडखंडिनी पताका फहराई और मूर्तिपूजा का विरोध किया। उनका कहना था: “यदि गंगा नहाने, सिर मुंडाने और भभूत मलने से स्वर्ग मिलता, तो मछली, भेड़ और गधा स्वर्ग के पहले अधिकारी होते।” 1872 ई. में वह कलकत्ता गए और केशवचंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के संपर्क में आए। केशवचंद्र के परामर्श पर उन्होंने पूर्ण वस्त्र पहनना और संस्कृत के स्थान पर हिंदी में अपने विचारों का प्रचार शुरू किया, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी। यहीं उन्होंने तत्कालीन वायसरॉय से कहा था: “मैं चाहता हूँ कि विदेशी राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। भिन्न-भिन्न भाषाएँ, पृथक-पृथक शिक्षा और अलग-अलग व्यवहार का हटना अति आवश्यक है। बिना इसके परस्पर व्यवहार, उपकार और अभिप्राय सिद्ध करना कठिन है।”
आर्य समाज की स्थापना (10 अप्रैल 1875 ई.)
स्वामी दयानंद ने 10 अप्रैल 1875 ई. को बंबई में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। इस समाज ने हिंदू धर्म को ईसाइयत और इस्लाम की तरह एक ग्रंथ-केंद्रित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। वेदों को छोड़कर किसी अन्य धर्मग्रंथ को प्रमाण न मानने के सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने पूरे देश का दौरा किया। जहाँ-जहाँ वे गए, प्राचीन परंपराओं के पंडित और विद्वान उनसे शास्त्रार्थ में पराजित हुए। उन्होंने ईसाई और इस्लामी धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। अतः उन्होंने तीन मोर्चों पर संघर्ष शुरू किया: ईसाइयत, इस्लाम और सनातन हिंदू धर्म।
पश्चिम के आक्रामक बौद्धिक संवाद का जवाब देते हुए दयानंद ने बुद्धि और विज्ञान को आत्मसात किया और इसका उपयोग अपने विरोधियों के विरुद्ध किया। उनका दावा था: “वैज्ञानिक सत्य केवल वेदों में हैं और इसलिए इन ग्रंथों पर आधारित धर्म ईसाइयत और इस्लाम से श्रेष्ठ है” इस प्रकार दयानंद ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलाई, उसका कोई जवाब नहीं था।
समाज सुधार के कार्य
महर्षि दयानंद का समाज सुधार में व्यापक योगदान रहा है। वेदों की सत्ता के आधार पर उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, बलिप्रथा, प्रचलित मत-मतांतर, अवतारवाद, आडंबर और अंधविश्वासों की आलोचना की। उनका मानना था कि स्वार्थी और अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों जैसे ग्रंथों के सहारे हिंदू धर्म को भ्रष्ट कर दिया है। उनका विश्वास था कि कोई भी व्यक्ति सत्कर्म, ब्रह्मचर्य और ईष्वर की उपासना के सहारे मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वैदिक धर्म श्रेष्ठतम है, क्योंकि यह वेदों पर आधारित है, जो ईष्वरीय हैं। यद्यपि वेद ईष्वर-प्रेरित हैं, किंतु उनकी व्याख्या मानव विवेक से होनी चाहिए। मृतकों के श्राद्ध का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि परलोक में मृतक की आत्मा की शांति के लिए यहाँ दान देना और भोजन करवाना मूर्खता है। अभिवादन के लिए प्रचलित ‘नमस्ते’ शब्द आर्य समाज की ही देन है।
दयानंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों जैसे बाल विवाह, बहुविवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा और अशिक्षा की कटु निंदा की। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में समाज को आध्यात्मिकता और आस्तिकता से परिचित कराया। स्वामी जी सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णों और स्त्रियों की भागीदारी के पक्षधर थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा और स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार देने की वकालत की, साथ ही विधवा विवाह, अंतर्जातीय विवाह और स्त्री शिक्षा का समर्थन किया। उनका मानना था कि स्त्रियों को भी वेदों का अध्ययन करने और यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार है।
विवाह की आयु के संबंध में उनका मानना था कि लड़कों का विवाह 25 वर्ष और लड़कियों का 16 वर्ष की आयु से पहले नहीं करना चाहिए। वह नियोग प्रथा के समर्थक थे, जिसके अनुसार विधवा स्त्री अपने पति के छोटे भाई या परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ ‘नियोग’ द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती थी, जिससे उसे संपत्ति में अधिकार प्राप्त होता था।
दयानंद ने सामाजिक समानता पर जोर दिया और छुआछूत और जातिप्रथा का निषेध किया, किंतु चार वर्णों की व्यवस्था का समर्थन किया और इस तरह भारतीय सामाजिक संगठन की बुनियाद को यथावत् रखा। उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध करते हुए सभी जातियों को वेदों के अध्ययन का अधिकार दिया और इस प्रकार उन्होंने सामाजिक कुरीतियों की पपड़ियों को धीरे-धीरे नहीं, बल्कि एक ही चोट में ध्वस्त करने का निश्चय किया।
स्वामी दयानंद का मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतंत्रता था। उनका मानना था कि सबसे अच्छा विदेशी राज्य भी स्वराज्य का मुकाबला नहीं कर सकता। उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की, जिसमें स्वकीय संस्कृति और सभ्यता की अमूल्य परंपराएँ अक्षुण्ण रहें। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के उपयोग पर बल दिया। उनके नारे ‘भारत भारतीयों का है’ और ‘वेदों की ओर लौटो’ ने भारतीयों में देशभक्ति की भावना जागृत की।
अपने उग्र विचारों के कारण स्वामी दयानंद को रूढ़िवादियों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा। उन पर पत्थर फेंके गए, विष देने और डुबाने के प्रयास हुए। 1863 ई. में गुरु विरजानंद के पास अध्ययन पूर्ण करने के बाद लगभग बीस वर्षों के कार्यकाल में उनकी हत्या और अपमान के लगभग 44 प्रयास हुए, जिनमें 17 बार विभिन्न माध्यमों से विष देने की कोशिश की गई। अंततः 30 अक्टूबर 1883 ई. को दीपावली के दिन संध्या के समय अजमेर के अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उनकी हत्या एक अंग्रेजी षड्यंत्र के तहत ‘नन्हीं’ नामक वेश्या ने भोजन में काँच मिलाकर की थी। इसमें जोधपुर के अस्पताल के चिकित्सक पर भी संदेह है, जिसने संभवतः इलाज के दौरान उन्हें हल्का विष दिया था। उस समय स्वामी जी जोधपुर नरेश महाराज जसवंत सिंह के निमंत्रण पर जोधपुर गए थे।
स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति, और स्वदेशोन्नति के अग्रदूत स्वामी दयानंद अपने पीछे ‘कृण्वंतो विश्वमर्यम्’ अर्थात् ‘सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ’ का सिद्धांत छोड़ गए। उनके अंतिम शब्द थे : “प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।”
लेखन और साहित्य
स्वामी दयानंद ने कई धार्मिक और सामाजिक पुस्तकों की रचना की। उनकी प्रारंभिक पुस्तकें संस्कृत में थीं, किंतु बाद में उन्होंने कई रचनाएँ हिंदी में लिखीं, जिसे उन्होंने ‘आर्यभाषा’ का नाम दिया। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं: पाखंड खंडन (1866 ई.), अद्वैतमत का खंडन (1873 ई.), ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका (1876 ई.), ऋग्वेद भाष्य (1877 ई.), सत्यार्थ प्रकाश (1875 ई.), पंचमहायज्ञ विधि (1875 ई.), वल्लभाचार्य मत का खंडन (1875 ई.), गोकरुणानिधि (1881 ई.), संस्कृतवाक्यप्रबोध और व्यवहारभानु।
सत्यार्थ प्रकाश उनकी सर्वोत्तम कृति है। इसमें उन्होंने प्रमाणित किया कि वैदिक धर्म सर्वश्रेष्ठ है। यह ग्रंथ चौदह समुल्लासों में रचित है। प्रथम दस समुल्लासों में सनातन वैदिक धर्म का प्रतिपादन है और अंतिम चार समुल्लासों में देशी-विदेशी मत-मतांतरों की समीक्षा की गई है। 27 फरवरी 1883 ई. को उदयपुर में स्वामी दयानंद ने एक ‘स्वीकारपत्र’ प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने अपनी मृत्यु के पश्चात् ‘परोपकारिणी सभा’ की जिम्मेदारी 23 व्यक्तियों को सौंपी थी, जिनमें महादेव गोविंद रानाडे भी शामिल थे।
यद्यपि दयानंद का आक्रामक सुधारवाद पूर्वी और पश्चिमी भारत में हाशिए पर रहा, किंतु पंजाब और पश्चिमोत्तर प्रांत में आर्य समाज की शाखाएँ तेजी से स्थापित हुईं। इसके बाद ग्वालियर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में इसका प्रसार हुआ। 1883 ई. में उनकी मृत्यु तक यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और बाद में यह अधिक लोकप्रिय और आक्रामक होता गया।
स्वामी दयानंद के बाद शिक्षा के प्रश्न पर आर्य समाज दो भागों में बँट गया। एक गुट के नेता लाला हंसराज थे, जो पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक थे। उनके प्रयासों से अनेक स्थानों पर डी.ए.वी. (दयानंद एंग्लो-वैदिक) स्कूल और कॉलेज स्थापित हुए। 1886 ई. में लाहौर में ‘दयानंद एंग्लो-वैदिक स्कूल’ की स्थापना हुई, जो 1889 ई. में ‘दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज’ बन गया। इस कॉलेज में पश्चिमी पद्धति से पढ़ाई होती थी। दूसरा गुट स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) का था, जो प्राचीन गुरुकुल प्रणाली के समर्थक थे। उनके प्रयासों से 1900 ई. में ‘गुरुकुल कांगड़ी’ की स्थापना हुई, जो बाद में एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय बना। डी.ए.वी. और गुरुकुल कांगड़ी दोनों ने भारतीय संस्कृति की उपलब्धियों को उजागर करने और विद्यार्थियों में आत्मगौरव की भावना जगाने का कार्य किया।
आर्य समाज के सुधार कार्यों ने सामाजिक कुरीतियों को समाप्त कर जनता को एकजुट करने का प्रयास किया, किंतु इसके धार्मिक कार्यों में अनजाने में हिंदुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने की प्रवृत्ति भी थी। 1893 ई. के बाद इसके एक जुझारू गुट ने धर्म परिवर्तन करने वाले हिंदुओं को शुद्ध कर पुनः हिंदू धर्म में शामिल करने और खोई हुई जमीन पुनः प्राप्त करने के लिए पंडित गुरुदत्त और पं. लेखराम के नेतृत्व में शुद्धि आंदोलन शुरू किया। 1890 के दशक में आर्य समाज ने जोर-शोर से ‘गोरक्षा आंदोलन’ चलाया, जिससे यह सुधारवाद से हटकर पुनरुत्थानवाद की ओर बढ़ गया। 1857 ई. में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो सद्भाव था, उसकी नींव यहीं से हिलनी शुरू हुई।
फिर भी, महर्षि दयानंद का जीवन अत्यंत प्रेरणास्पद है। डॉ. भगवान दास ने कहा कि स्वामी दयानंद हिंदू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता थे। एनी बेसेंट ने उन्हें ‘आर्यावर्त भारतीयों के लिए’ का नारा देने वाला पहला व्यक्ति बताया है। सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतंत्रता की नींव स्वामी दयानंद ने रखी थी। पट्टाभि सीतारमैया ने कहा कि गांधी जी राष्ट्रपिता हैं, किंतु स्वामी दयानंद राष्ट्रपितामह हैं। लोकमान्य तिलक ने उन्हें ‘स्वराज्य का प्रथम संदेशवाहक’ और सावरकर ने ‘स्वाधीनता संग्राम का प्रथम योद्धा’ कह हैा। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उन्हें ‘आधुनिक भारत का आद्य निर्माता’ बताया है। इस प्रकार महर्षि का जीवन एक धार्मिक संत का था, उनकी प्रवृत्ति सत्यान्वेषण की थी और दृष्टि वैज्ञानिक व प्रजातांत्रिक थी। इस निर्भीक सन्यासी के चिंतन ने पराधीन भारत में सुप्त पड़ी आध्यात्मिक स्वाभिमान और स्वराज्य की भावना को जागृत किया।
देव समाज (1887 ई.)
मुख्य लेख : देव समाज
शिवनारॉयण अग्निहोत्री ने ब्रह्म समाज के तर्कवाद के स्थान पर 16 फरवरी 1887 ई. को लाहौर में ‘देव समाज’ की स्थापना की और ब्रह्म सुधारवाद के तत्त्वों को बनाए रखते हुए ‘गुरु’ की अवधारणा को अपने केंद्रीय सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। ब्रह्म समाज के नेता के रूप में अग्निहोत्री ने आर्य समाज, विशेष रूप से स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ धार्मिक विवादों में भाग लिया। 1886 ई. में उन्होंने पंजाब ब्रह्म समाज से त्यागपत्र देकर 1887 में ‘देव समाज’ की स्थापना की। यह समाज परमात्मा के स्थान पर प्रकृति में विश्वास करता था। इसका मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि, गुरु की श्रेष्ठता की स्थापना और अच्छे मानवीय कार्य करना था। इस समाज ने आदर्श सामाजिक व्यवहारों जैसे रिष्वत न लेना, मांसाहारी भोजन और मद्यपान का निषेध और हिंसात्मक कार्यों से दूरी रखने पर जोर दिया। इसकी शिक्षाओं को ‘देव शास्त्र’ नामक पुस्तक में संकलित किया गया। फिरोजपुर में ‘देव समाज गर्ल्स कॉलेज’ ने स्त्री शिक्षा की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
20 दिसंबर 1850 ई. को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे शिवनारॉयण अग्निहोत्री ने 16 वर्ष की आयु में रुड़की के थॉमसन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया। 1873 ई. में वह लाहौर गए, जहाँ उन्होंने सरकारी स्कूल में ड्राइंग मास्टर के रूप में कार्य शुरू किया। लाहौर प्रवास के दौरान वह ब्रह्म समाज में शामिल हुए और पूरे पंजाब में ब्रह्म मिशनरी के रूप में कार्य किए। 1882 ई. में उन्होंने ब्रह्म समाज के लिए पूर्णकालिक कार्य करने हेतु अपने शिक्षण पद से इस्तीफा दे दिया।
प्रारंभ में देव समाज एक आस्तिक समाज था, किंतु बाद में यह सामाजिक सुधार आंदोलन में बदल गया। सामाजिक कट्टरवाद के साथ सख्त नैतिक संहिता का संयोजन करते हुए शिवनारॉयण ने शाकाहार, जातियों के सामाजिक एकीकरण, महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और बाल विवाह के उन्मूलन की वकालत की। इस समाज ने बहुविवाह, व्यभिचार और अन्य ‘अप्राकृतिक अपराधों’ को अमान्य घोषित किया और कड़ी मेहनत पर बल दिया।
1892 ई. में शिवनारॉयण ने भगवान की पूजा के साथ-साथ स्वयं को देवत्व की स्थिति में रखते हुए अपनी और भगवान की दोहरी पूजा की वकालत की। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने अस्तित्व के उच्चतम संभव स्तर को प्राप्त कर लिया है। किंतु 1895 ई. तक देव समाज अपनी विचारधारा में अनिवार्य रूप से नास्तिक बन गया, और अग्निहोत्री ने भगवान की पूजा को अस्वीकार कर ‘गुरु’ की पूजा पर जोर देने लगा।
ब्रह्म समाज और आर्य समाज की तरह देव समाज ने भी समकालीन हिंदू धर्म को अस्वीकार किया। इसने जाति प्रतिबंधों को नकारते हुए सदस्यों को अंतर-भोजन और अंतर्जातीय विवाह का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित किया। अग्निहोत्री ने बाल विवाह के उन्मूलन और महिलाओं के उत्थान की बात की। उन्होंने कानून, समाज और शिक्षा में महिलाओं की समान भागीदारी की वकालत की। उन्होंने महिलाओं के संपत्ति और शिक्षा के अधिकार को बढ़ावा देकर उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास किया। वह भारत की महिलाओं के ज्ञान और जीवन स्तर को सुधारना चाहते थे ताकि वे समाज के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। महिलाओं की शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए देव समाज ने भारत में लड़कियों के लिए कई स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की। अग्निहोत्री ने 1901 ई. में फिरोजपुर में लड़कियों के लिए एक हाईस्कूल खोला।
अग्निहोत्री एक वक्ता, लेखक और पत्रकार के रूप में सक्रिय थे। उन्होंने बड़ी मात्रा में प्रचारक साहित्य का निर्माण किया। पंजाब में शिक्षित हिंदुओं के बीच उनका विशेष प्रभाव था, जो उन्हें अपने ‘गुरु’ के रूप में देखते थे। 1921 ई. में पंजाब में देव समाज ‘विज्ञान आधारित धर्म’ के रूप में उन्नति पर था। किंतु 1929 ई. में अग्निहोत्री की मृत्यु के बाद इसमें गिरावट आई, यद्यपि यह समाप्त नहीं हुआ।
राधास्वामी समाज (1861 ई.)
उत्तर भारत में आगरा (उत्तर प्रदेश) में एक बैंकर तुलसीराम, जिन्हें ‘सेठ शिवदयाल सिंह जी महाराज’ के नाम से भी जाना जाता है, ने 15 फरवरी 1861 ई. को बसंत पंचमी के दिन राधास्वामी समाज की नींव रखी। यह आध्यात्मिक संगठन हिंदू कर्मकांडों और विधि-विधानों का विरोध करता था। इसमें दलित और पिछड़ी जातियों के लोग भी शामिल थे। शिक्षा के क्षेत्र में इस संस्था ने महत्त्वपूर्ण कार्य किए। इस समाज में गुरु भक्ति की प्रधानता थी। गुरु ही ज्ञान, सत्य और ईष्वर का अवतार माना जाता था। इसके सिद्धांत थे कि ईष्वर पूर्ण है और उसे योग तथा तपस्या के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इस आंदोलन के अनुयायी दरगाहों व अन्य धार्मिक स्थलों पर जाने में विश्वास नहीं करते थे। वे सत्य, विश्वास, सेवा और प्रार्थना को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे।
शिवदयाल सिंह का जन्म 25 अगस्त 1818 ई. को पन्नी गली, आगरा में हुआ था। बचपन से ही वे शब्द योग के अभ्यास में लीन रहते थे। उन्होंने किसी को अपना गुरु नहीं बनाया। उनकी धर्मपत्नी का नाम राधाजी था, जिसके कारण उन्हें ‘राधास्वामी’ कहा जाने लगा। 1861 से पहले राधास्वामी मत का उपदेश केवल कुछ चुने हुए लोगों को दिया जाता था, किंतु राधास्वामी मत के दूसरे आचार्य की प्रार्थना पर शिवदयाल सिंह ने 1861 ई. को बसंत पंचमी के दिन इस संप्रदाय का द्वार जनसाधारण के लिए खोल दिया।
रामकृष्ण मिशन और स्वामी विवेकानंद
स्वामी रामकृष्ण परमहंस (1836-1886 ई.)
मुख्य लेख : रामकृष्ण परमहंस
रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की स्मृति में की थी। रामकृष्ण का जन्म 1836 ई. में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के कमारपुकुर नामक गाँव में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। उन्हें शिक्षा से विशेष लगाव नहीं था और साधुओं की संगति अधिक पसंद थी। सत्रह वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु के बाद वे कलकत्ता चले गए। अपने बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात् वे कलकत्ता के निकट दक्षिणेश्वर में रासमणि द्वारा स्थापित काली के मंदिर में पुजारी बन गए। चौबीस वर्ष की आयु में उनका विवाह पाँच वर्षीया शारदामणि (शारदा देवी) से हो गया। विवाह के पश्चात् बारह वर्ष तक रामकृष्ण ने काली मंदिर में विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ की। उन्होंने भैरवी नामक संन्यासिनी से दो वर्ष तक तांत्रिक साधना और तोतापुरी नामक साधु से वेदांत-साधना सीखी। कहते हैं कि वैष्णव धर्म की साधना से उन्हें कृष्ण का साक्षात्कार हुआ था। उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म की भी साधना की। निरंतर साधना से वे शुद्ध और विरक्त हो गए और अपनी पत्नी शारदामणि को भी ‘माँ’ कहकर संबोधित करते थे। 16 अगस्त 1886 ई. को कैंसर से उनका देहांत हो गया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने न तो कोई नया धर्म चलाया, न मठ बनाया और न ही नवीन धार्मिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। उनका मानना था कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति संसारिकता से दूर रहकर उपासना द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। विषय-वासना का त्याग करने पर मनुष्य ईश्वर का दर्शन कर सकता है। शरीर और आत्मा को अलग-अलग बताते हुए रामकृष्ण ने कहा : ‘कामिनी-कांचन की आसक्ति यदि पूर्ण रूप से नष्ट हो जाए, तो शरीर और आत्मा का पृथकत्व स्पष्ट दीखने लगता है। नारियल का पानी सूख जाने पर जैसे उसके भीतर का खोपरा नरेटी से खुलकर अलग हो जाता है, वैसे ही शरीर और आत्मा के बारे में मानना चाहिए।’ उनका मानना था कि मूर्तिपूजा, पुनर्जन्म और अवतारवाद को लेकर शास्त्रार्थ करना व्यर्थ है। जो कुछ दिखता है, वह ईश्वरमय है, किंतु ईश्वर शास्त्रार्थ की शक्ति से परे है। मूर्तिपूजा का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा: ‘जैसे वकील को देखते ही अदालत की याद आती है, वैसे ही प्रतिमा को देखते ही ईश्वर की याद आती है।’ उनका विश्वास था कि अनुभूति से भी ईश्वर का साक्षात्कार हो सकता है, जिससे व्यक्ति को शांति मिलती है और इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं। ईश्वर की उपासना का सरल मार्ग बताते हुए उन्होंने कहा: ‘जब तुम काम करते हो, तो एक हाथ से काम करो और दूसरे हाथ से भगवान का पाँव पकड़े रहो। जब काम समाप्त हो जाए, तो भगवान के चरणों को दोनों हाथों से पकड़ लो।’
स्वामी रामकृष्ण की सबसे बड़ी देन अध्यात्मवाद है। उन्होंने अत्यंत सरल तरीके से उपदेश दिया कि मानव जीवन का मूल लक्ष्य ईश्वर से साक्षात्कार है, जो अध्यात्म के द्वारा ही संभव है। उनका कहना था: ‘बिना स्पष्ट और विकाररहित बुद्धि के धर्मशास्त्रों का ज्ञान और पवित्र पुस्तकों का अध्ययन व्यर्थ है। विवेक और वैराग्य के बिना कोई भी आध्यात्मिक प्रगति असंभव है।’ वह निराकार और साकार दोनों रूपों में ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे और वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि को पवित्र धार्मिक ग्रंथ मानते थे। अपने उपदेशों द्वारा उन्होंने वेदों और उपनिषदों के जटिल ज्ञान को सरल बनाया और हिंदुओं को उनकी संस्कृति के गौरव से परिचित कराया।
रामकृष्ण परमहंस मानव-मात्र की सेवा और भलाई के समर्थक थे। उन्होंने मानव जाति को यह संदेश दिया कि वह धर्म और संस्कृति के विभेदों को भूलकर मानव-मात्र की भलाई का प्रयास करे। उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में ईश्वर निवास करता है, अतः मानव-सेवा ही ईश्वर की सेवा है। उनकी सेवा-भावना मानव के प्रति दया की भावना नहीं थी; वह तो मानव को ईश्वर-स्वरूप मानकर उसकी सेवा करने में विश्वास करते थे। इसी आधार पर उनके शिष्य विवेकानंद ने आजीवन दरिद्र नारॉयण की सेवा की।
स्वामी रामकृष्ण विविध धर्मों की एकता के समर्थक थे। उनके अनुसार विविध धर्म ईश्वर की प्राप्ति के अलग-अलग मार्ग हैं और सभी में सत्य है। ईश्वर एक है, किंतु उसके विभिन्न स्वरूप हैं। व्यक्ति किसी भी मार्ग पर चलकर ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार रामकृष्ण ने भौतिकवाद, संघर्ष और घृणा के युग में विश्व को अध्यात्मवाद का उपदेश देकर संसार को एकता, प्रेम और सहयोग का मार्ग दिखाया।
स्वामी विवेकानंद (1863-1902 ई.)
मुख्य लेख : स्वामी विवेकानंद
पाश्चात्य जगत में भारतीय तत्वज्ञान की सुगंध बिखेरने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद (मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त) का जन्म 12 जनवरी 1863 ई. को कलकत्ता में खत्री विश्वनाथ दत्त के कुलीन परिवार में हुआ था। नरेंद्रनाथ दत्त बचपन से ही चिंतन, भक्ति, तार्किकता, भौतिक और बौद्धिक श्रेष्ठता के एक विलक्षण संयोग थे। वह अपने शिक्षाकाल में एक प्रतिभाशाली और जिज्ञासु छात्र थे और जॉन स्टुअर्ट मिल, ह्यूम, हर्बर्ट स्पेंसर और रूसो के दार्शनिक विचारों से बहुत प्रभावित थे। युवावस्था में पाश्चात्य दार्शनिकों के निरीश्वर भौतिकवाद और ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ भारतीय विश्वास के कारण नरेंद्रनाथ को गहरे द्वंद्व से गुजरना पड़ा। स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद वह ब्रह्म समाज में शामिल हो गए। उनकी प्रखर बुद्धि साधना में समाधान न पाकर नास्तिक हो चली।
नरेंद्र 1881 में पहली बार रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए और उन्होंने रामकृष्ण को अपना गुरु बना लिया। रामकृष्ण की मृत्यु के पश्चात् नरेंद्रनाथ ने 1887 में काशीपुर के निकट बारानगर में अपने गुरु के सम्मान में रामकृष्ण मठ की स्थापना की और संन्यास धारण कर विवेकानंद बन गए। अपने गुरु से प्रेरित होकर यह युवा संन्यासी कषाय वस्त्र धारण कर जगत के अंधकार में भटकते प्राणियों के उद्धार के लिए पूरे भारत की यात्रा पर निकल पड़ा। छह वर्षों के भ्रमणकाल में वह राजाओं और दलितों, दोनों के अतिथि रहे। उनकी यह महान यात्रा कन्याकुमारी में समाप्त हुई, जहाँ ध्यानमग्न विवेकानंद को यह ज्ञान मिला कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की ओर रुझान वाले नए भारतीय वैरागियों और सभी आत्माओं, विशेषकर जनसाधारण की सुप्त-दिव्यता के जागरण से ही इस मृतप्राय देश में प्राणों का संचार संभव है। कन्याकुमारी में रहते हुए उन्हें पता चला कि अमेरिका के शिकागो में सर्वधर्म-सम्मेलन हो रहा है। वह कई कारणों से इस सम्मेलन में भाग लेना चाहते थे। वह इस अंधविश्वास को दूर करना चाहते थे कि समुद्र-यात्रा पाप है और विदेशियों के हाथ का छुआ खाने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है। साथ ही, वह शिक्षित भारतीयों को दिखाना चाहते थे कि पाश्चात्य देशों में भारतीय संस्कृति के प्रति कितनी श्रद्धा है।
शिकागो सर्वधर्म-सम्मेलन (1893 ई.)
भारत के पुनर्निर्माण के प्रति लगाव के कारण स्वामी विवेकानंद 1893 ई. में शिकागो सर्वधर्म-सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका गए। धर्म-परिषद में बिना आमंत्रण के प्रवेश मिलना कठिन था, किंतु एक अमेरिकी प्रोफेसर के प्रयास से स्वामीजी को सम्मेलन में बोलने का अवसर मिला। 11 सितंबर 1893 ई. को उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चकित कर दिया। जब उन्होंने अपने भाषण का आरंभ ‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका’ (अमेरिकी बहनों और भाइयों) के संबोधन से किया, तो 7,000 प्रतिनिधियों ने जोरदार तालियों से उनका स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने अपने भाषण से अमेरिका में भारतीय धर्म और संस्कृति की धाक जमा दी। वहाँ एकत्र लोगों को उन्होंने सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांती संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया। धर्म-संसद में विवेकानंद ने सहिष्णुता के पक्ष में धार्मिक हठधर्मिता को खत्म करने का आह्वान किया। ‘दि न्यूयॉर्क हेराल्ड’ ने लिखा था: ‘धर्मों की पार्लियामेंट में सबसे महान व्यक्तित्व विवेकानंद हैं। उनका भाषण सुनने के बाद अनायास यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिए धर्म-प्रचारक भेजना कितनी मूर्खता की बात है?’ शिकागो सर्वधर्म-सम्मेलन की विज्ञान शाखा के अध्यक्ष मार्विनमेरी स्नेल ने कहा था: ‘इस सर्वधर्म-सम्मेलन का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि इसने ईसाई जगत, विशेषकर अमेरिका के लोगों को यह पाठ सिखाया कि विश्व में दूसरे धर्म भी हैं, जो ईसाई धर्म की अपेक्षा कहीं अधिक ठोस, स्वतंत्र, विचार की दृष्टि से कहीं अधिक शक्तिशाली और मानवीय सौहार्द की दृष्टि से कहीं अधिक उदार तथा व्यापक हैं।’
विवेकानंद ने अमेरिका के विभिन्न नगरों, लंदन और पेरिस में व्यापक व्याख्यान दिए। उन्होंने जर्मनी, रूस और पूर्वी यूरोप की भी यात्राएँ की और वेदांत के मानवतावादी, गतिशील और प्रायोगिक संदेशों से हजारों लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने घोषणा की कि सिर्फ अद्वैत वेदांत के आधार पर ही विज्ञान और धर्म साथ-साथ चल सकते हैं, क्योंकि इसके मूल में अवैयक्तिक ईश्वर की आधारभूत धारणा, सीमा के अंदर निहित अनंत और ब्रह्मांड में उपस्थित सभी वस्तुओं के पारस्परिक मौलिक संबंध की दृष्टि है। उन्होंने सभ्यता को मनुष्य में दिव्यता के प्रतिरूप के तौर पर परिभाषित किया और यह भविष्यवाणी की कि एक दिन पश्चिम जीवन की अनिवार्य दिव्यता के वेदांती सिद्धांत की ओर आकर्षित होगा। उन्होंने कुछ समर्पित शिष्यों को अमेरिका के थाउजेंड आइलैंड पार्क में आध्यात्मिक जीवन में प्रशिक्षित भी किया। इस प्रकार विवेकानंद इतिहास के पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति के मित्रतापूर्ण प्रत्युत्तर का आरंभ किया।
विवेकानंद ने मानवतावादी राहत-कार्य और समाज-कार्य को जारी रखने के लिए 1 मई 1897 ई. में कलकत्ता में ‘रामकृष्ण मिशन’ और 9 दिसंबर 1898 ई. को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के तट पर बेलूर में प्राचीन रामकृष्ण मठ को पुनर्स्थापित किया। इस मिशन ने कई चिकित्सालयों, अनाथालयों, विद्यालयों, विधवाश्रमों और सेवाश्रमों को खोलकर समाज की सेवा की। विवेकानंद की इच्छानुसार उनके अंग्रेज अनुयायी कैप्टन सेवियर और उनकी पत्नी ने हिमालय में 1899 ई. में ‘मायावती अद्वैत आश्रम’ खोला, जो पूर्वी और पश्चिमी अनुयायियों का सम्मिलन केंद्र बन गया। विवेकानंद ने बेलूर में एक दृश्य-प्रतीक के रूप में सभी प्रमुख धर्मों के वास्तुशिल्प के समन्वय पर आधारित रामकृष्ण मंदिर के भावी आकार की रूपरेखा भी बनाई, जो 1937 ई. में उनके शिष्यों द्वारा पूरा किया गया।
1899 ई. में विवेकानंद पुनः अमेरिका गए। उन्होंने न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, सैन फ्रांसिस्को और कैलीफोर्निया आदि स्थानों पर वेदांत समाज की स्थापना की। उन्होंने पेरिस के धार्मिक सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया। स्वामीजी ने हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति की धाक जमाते हुए भारत में ईसाइयों द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर पानी फेर दिया। दूसरे शब्दों में, ‘हिंदुत्व को जीतने के लिए अंग्रेजी भाषा, ईसाई धर्म और यूरोपीय बुद्धिवाद के पेट से जो तूफान उठा था, वह विवेकानंद के हिमालय जैसे विशाल वृक्ष से टकराकर वापस लौट गया।’ वस्तुतः विवेकानंद का व्यक्तित्व निराश और निरुत्साहित भारतीयों के लिए एक स्फूर्तिवर्धक औषधि सिद्ध हुआ।
पश्चिम को योग और ध्यान से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद ने ‘योग’, ‘राजयोग’ और ‘ज्ञानयोग’ जैसे ग्रंथों की रचना कर युवा जगत को एक नई राह दिखाई, जिसका प्रभाव जनमानस पर युगों-युगों तक छाया रहेगा। उन्होंने अंग्रेजी में ‘प्रबुद्ध भारतश्’ और बंगाली में ‘प्रबोधनी’ का संपादन भी किया।
जीवन के अंतिम दिन विवेकानंद ने ‘शुक्ल यजुर्वेद’ की व्याख्या की और कहा: ‘एक और विवेकानंद चाहिए यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।’ दमा और शर्करा के अलावा अन्य शारीरिक व्याधियों से घिरे विवेकानंद को मालूम था कि ‘यह बीमारियाँ मुझे चालीस वर्ष की आयु भी पार नहीं करने देंगी।’ उन्होंने 4 जुलाई 1902 को बेलूर में रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर ली। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानंद तथा उनके गुरु रामकृष्ण के संदेशों के प्रचार के लिए 130 से अधिक केंद्रों की स्थापना की।
स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण के संदेशों को समकालीन भारतीय समाज की आवश्यकताओं के अनुसार ढाला। उनका सर्वाधिक जोर सामाजिक क्रिया पर था। उन्होंने कहा कि यदि ज्ञान कर्म से हीन है, तो व्यर्थ है। अपने गुरु की भाँति उन्होंने भी सभी धर्मों की बुनियादी एकता की घोषणा की और धार्मिक बातों में संकुचित दृष्टिकोण की निंदा की। धर्म की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा था : ‘धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवतत्त्व का विकास है। धर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्धांतों में। यह केवल अनुभूति में निवास करता है।’ उन्होंने धर्म को जीवन का प्राकृतिक और स्वाभाविक अंग बताया। उनके अनुसार पूर्णता की प्राप्ति, जो धर्म द्वारा ही संभव है, मानव की एक स्वाभाविक प्रकृति है, इस कारण मानव धर्म से पृथक नहीं हो सकता। उनका मानना था कि सभी धर्मों का मूल एक जैसा है, केवल बाहरी साधनों में कुछ अंतर है। इसी आधार पर वे पूरब और पश्चिम के विचारों का आदान-प्रदान चाहते थे। विश्व में अनेक धर्मों के अस्तित्व के संबंध में उनका कहना था: ‘मनुष्य सर्वत्र अन्न खाता है, किंतु अन्न से भोजन तैयार करने की विधियाँ संसार में अलग-अलग हैं। इसी प्रकार धर्म मनुष्य की आत्मा का भोजन है, किंतु अलग-अलग देशों में इसके स्वरूप अलग-अलग हैं, जबकि सभी धर्मों के लक्ष्यों में एकता है।’ उन्होंने 1898 में लिखा था : ‘हमारी अपनी मातृभूमि के लिए दो महान धर्मों-हिंदुत्व और इस्लाम का संयोग ही एकमात्र आशा है।’
स्वामी विवेकानंद ने भारतीयों की आलोचना की कि वे शेष दुनिया से कटकर जड़ और मृतप्राय हो गए हैं। उन्होंने लिखा है: ‘दुनिया के सभी अन्य राष्ट्रों से हमारे अलगाव ही हमारे पतन का कारण हैं और शेष दुनिया की धारा में समा जाना ही इसका एकमात्र समाधान है। गति जीवन का चिन्ह है।’ उनका मानना था कि भारत की आध्यात्मिक विचारधारा और पश्चिमी देशों की भौतिकवादी विचारधारा में समन्वय करने से ही भारतीयों को वास्तविक सुख प्राप्त हो सकता है और उनकी उन्नति हो सकती है।
स्वामीजी ने जातिप्रथा, कर्मकांड, पूजापाठ और अंधविश्वास की निंदा की और जनता से स्वाधीनता, समानता तथा स्वतंत्र चिंतन की भावना को अपनाने का आग्रह किया। उनकी टिप्पणी थी : ‘हमारे सामने खतरा यह है कि हमारा धर्म रसोईघर में न बंद हो जाए। हम, अर्थात हममें से अधिकांश न वेदांती हैं, न पौराणिक और न तांत्रिक। हम केवल ‘हमें मत छुओ’ के समर्थक हैं। हमारा ईश्वर भोजन के बर्तन में है और हमारा धर्म यह है कि हम पवित्र हैं, हमें छूना मत। अगर यह सब कुछ एक शताब्दी और चलता रहा, तो हममें से हर एक व्यक्ति पागलखाने में होगा।’
स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण की तरह मानवतावादी थे। उनका कहना था : ‘मैं एक ही ईश्वर को मानता हूँ, सभी आत्माओं की एक आत्मा है। मेरा ईश्वर दुखी मानव है, मेरा ईश्वर पीड़ित मानव है, मेरा ईश्वर हर जाति का निर्धन मनुष्य है।’ ‘मैं उस ईश्वर में विश्वास नहीं करता, जो मुझे इस जीवन में तो रोटी न दे सके और परलोक में जाने पर स्वर्गिक सुख की गारंटी दे।’ वह शिक्षित भारतीयों से कहते थे: ‘जब तक करोड़ों व्यक्ति भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं हर उस व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ, जो उन्हीं के खर्चे पर शिक्षा प्राप्त करता है और उनकी कतई परवाह नहीं करता।’ वह अकसर कहा करते थे : ‘मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूँ, न तो संत या दार्शनिक ही हूँ। मैं तो गरीब हूँ और गरीबों का अनन्य भक्त हूँ। मैं तो सच्चा महात्मा उसे ही कहूँगा, जिसका हृदय गरीबों के लिए तड़पता हो।’ उनका मानना था : ‘जब पड़ोसी भूख से मरता हो, तो मंदिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं, पाप है। जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो, तब हवन में घी मिलाना अमानुषिक कर्म है।’
स्वामी विवेकानंद ने सदियों से उपेक्षित दलितों और महिलाओं को शिक्षित करने और उनके उत्थान के माध्यम से देश को ऊपर उठाने का संदेश दिया। उनके अनुसार विचार और धर्म की स्वतंत्रता जीवन, विकास और कल्याण की अकेली शर्त है। नारी-उत्थान के संबंध में उन्होंने भारतीयों से कहा : ‘यदि तुमने नारियों को ऊपर नहीं उठाया, तो यह मत सोचो कि तुम्हारी अपनी उन्नति का कोई मार्ग है? संसार की सभी जातियाँ नारियों का सम्मान करके ही महान हुई हैं। जो जाति नारियों का सम्मान करना नहीं जानती, वह न तो अतीत में उन्नति कर सकी है और न कर सकेगी।’
इस प्रकार विवेकानंद भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के जनक थे। भारत के इस युवा तूफानी साधु (साइक्लोनिक मंक ऑफ इंडिया) ने यूरोप और अमेरिका में भारतीय अध्यात्मवाद का प्रचार करके और पश्चिमी देशों में उसकी श्रेष्ठता को स्थापित कर भारतीयों में गौरव और आत्म-विश्वास उत्पन्न किया, जिसे सिस्टर निवेदिता ने ‘आक्रामक हिंदूवाद’ (अग्रेसिव हिंदुइज्म) कहा है। उन्होंने नवयुवकों को दासता से मुक्त होने का आह्वान किया और यह जयघोष किया : ‘लंबी से लंबी रात्रि अब समाप्त हुई जान पड़ती है। हमारी यह मातृभूमि अब गहरी नींद से जाग रही है, कोई भी शक्ति उसे अब उन्नति से नहीं रोक सकती।’ आज इस युवा संन्यासी के जन्मदिन को पूरे भारत में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
थियोसोफिकल सोसायटी
थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना 7 सितंबर 1875 ई. को अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में रूसी महिला मैडम एच.पी. ब्लावात्सकी और अमेरिकी कर्नल एच.एस. ओल्कॉट द्वारा की गई थी। ‘थियोसोफी’ शब्द ग्रीक भाषा के ‘थियो’ और ‘सोफिया’ दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘थियो’ का अर्थ ‘ईश्वर’ और ‘सोफिया’ का अर्थ है ‘ज्ञान’। थियोसोफी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग तीसरी शताब्दी में अलेक्जेंड्रिया के ग्रीक विद्वान इम्ब्लिकस ने ईश्वरीय ज्ञान के लिए किया था। थियोसोफी, जिसे ब्रह्म-विद्या भी कहते हैं, वह सत्य का स्वरूप है, जो सभी धर्मों का आधार है और जिस पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता। यह जीवन को बोधगम्य बनाने का दर्शन प्रस्तुत करती है, जिसके माध्यम से न्याय और प्रेम का प्रकटीकरण होता है और जीवन के विकास का मार्ग निर्देशित होता है। थियोसोफी विश्व-आत्मा के विज्ञान का बोध कराती है और मनुष्य को बताती है कि वह स्वयं आत्म-तत्त्व है, जबकि मन और शरीर उसके वाहन हैं। यह सभी धर्मों के धार्मिक ग्रंथों और गूढ़ सत्यों को उजागर करके उन्हें बोधगम्य बनाती है, जो बुद्धि की पहुँच से परे हैं, किंतु अंतःप्रज्ञा द्वारा समझे जा सकते हैं।
थियोसोफिकल सोसायटी के दो आधारभूत सिद्धांत हैं- एक बंधुत्व और दूसरा स्वतंत्रता। सोसायटी अपने सदस्यों पर विश्वास के रूप में अपना साहित्य, संसार के संबंध में अपना दृष्टिकोण या अन्य विचार नहीं थोपती। इसमें कोई ऐसी मान्यता या धारणा नहीं है, जिसे स्वीकार करना अनिवार्य हो। जो भी जिज्ञासु विश्व-बंधुत्व में आस्था रखते हैं, वही थियोसोफिस्ट हैं। इसके अलावा, सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता का व्यवहार और उनमें समन्वय स्थापित करना, प्राचीन धर्म, दर्शन और ज्ञान का अध्ययन तथा प्रसार करना और विश्व-बंधुत्व के सिद्धांत में विश्वास करना इस सोसायटी के प्रमुख सिद्धांत थे। सोसायटी के प्रतीक-चिह्न पर लिखा है: ‘सत्यान नास्ति परो धर्मः’ अर्थात् ‘सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है।’
1879 ई. में मैडम ब्लावात्सकी और ओल्कॉट महर्षि दयानंद के निमंत्रण पर भारत आए और मुंबई में अपना मुख्यालय स्थापित किया। थियोसोफिकल सोसायटी ने 1879 से 1881 ई. तक दयानंद सरस्वती के साथ मिलकर काम करने का प्रयास किया, किंतु यह लंबे समय तक नहीं चला, क्योंकि सोसायटी के संस्थापक दयानंद की तरह वेदों को प्रमाणिक और ईश्वरीय ज्ञान मानने को तैयार नहीं थे। 1886 ई. में सोसायटी का मुख्यालय मुंबई से हटाकर मद्रास के निकट अडयार (चेन्नई) में स्थापित किया गया।
ऐनी बेसेंट (1847-1933 ई.)
मुख्य लेख : ऐनी बेसेंट
भारत में थियोसोफिकल आंदोलन की गतिविधियों को व्यापक रूप से फैलाने का श्रेय मिसेज ऐनी बेसेंट (1847-1933 ई.) को दिया जाता है। 1847 ई. में आयरलैंड के एक निर्धन परिवार में जन्मी ऐनी बेसेंट के जीवन के आरंभिक वर्षों में ही ईसाई मत से उनका विश्वास उठ गया था। उनका अपने पादरी पति से तलाक हो गया था। वह 1882 में थियोसोफिकल सोसायटी के संपर्क में आईं और 10 मई 1889 ई. को इसकी औपचारिक सदस्य बन गईं।
ऐनी बेसेंट 16 नवंबर 1893 ई. में मैडम ब्लावात्सकी की मृत्यु के बाद भारत आईं और कर्नल एच.एस. ओल्कॉट की मृत्यु के पश्चात् 1907 ई. में सोसायटी की अध्यक्ष बनीं। बेसेंट प्राचीन भारतीय परंपरा और संस्कृति से बहुत प्रभावित थीं, इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे अपने को पूर्णतः भारतीय बना लिया- न केवल विचारों में, अपितु वस्त्र, भोजन, मेल-मिलाप और सामाजिक शिष्टाचार में भी। उन्होंने रूढ़िवादी परंपरा के अनुसार हिंदू धर्म की व्याख्या की और प्राचीन भावना ‘कृण्वंतो विश्वमार्यम्’ को साकार करने का प्रयास किया।
ऐनी बेसेंट को हिंदू धर्म से गहरा प्रेम था और उनका मानना था कि हिंदू धर्म के जागरण से ही विश्व का कल्याण संभव है। उन्होंने बहुदेववाद, यज्ञ, मूर्तिपूजा, तीर्थ, व्रत, कर्मवाद, पुनर्जन्म और धार्मिक अनुष्ठान जैसे हिंदुओं के विश्वासों और कर्मकांडों का प्रबल समर्थन किया। भारतीय संस्कृति की महानता और उसके गौरव के संबंध में एक भाषण में उन्होंने कहा था: ‘भारत और हिंदुत्व की रक्षा भारतवासी और हिंदू ही कर सकते हैं। हम बाहरी लोग आपकी चाहे कितनी भी प्रशंसा करें, किंतु आपका उद्धार आप ही के हाथ में है।… हिंदुत्व के बिना भारत के सामने कोई भविष्य नहीं है। हिंदुत्व ही वह मिट्टी है, जिसमें भारतवर्ष का मूल गड़ा हुआ है। यदि यह मिट्टी हटा ली गई, तो भारतरूपी वृक्ष सूख जाएगा।’ एक विदेशी के मुख से अपनी संस्कृति का गुणगान सुनकर भारतीयों का अपने धर्म में विश्वास बढ़ा।
वस्तुतः थियोसोफिकल सोसायटी प्रारंभ से ही हिंदुत्व, जरथुस्त्री मत (पारसी धर्म) और बौद्ध मत जैसे प्राचीन धर्मों को पुनर्जीवित करने में संलग्न रही, किंतु यह धार्मिक पुनर्स्थापनावादियों के रूप में उतना सफल नहीं हो सकी, जितना समाज-सुधार, शैक्षिक विकास और राष्ट्रवादी चेतना को जागृत करने में। यह पश्चिमी देशों के ऐसे लोगों द्वारा चलाया गया एक आंदोलन था, जो भारतीय धर्मों और दार्शनिक परंपरा का महिमामंडन करते थे। इससे भारतीयों को अपना खोया आत्मविश्वास फिर से पाने में सहायता मिली, यद्यपि अतीत की महानता का झूठा गर्व भी इसने उनके अंदर पैदा किया। भारत में ऐनी बेसेंट के प्रमुख कार्यों में से एक था: 1898 ई. में बनारस में ‘केंद्रीय हिंदू कॉलेज’ की स्थापना, जिसे बाद में मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (1916 ई.) के रूप में विकसित किया।
होमरूल (स्वशासन) आंदोलन
थियोसोफिकल सोसायटी की विश्व अध्यक्ष ऐनी बेसेंट, जो साम्राज्य-विरोधी तो नहीं थीं, किंतु उन्हें लगता था कि भारतीयों को पर्याप्त मात्रा में स्वायत्त शासन प्रदान करना भारत और ब्रिटेन की मैत्री के लिए आवश्यक है। बेसेंट चाहती थीं कि ब्रिटिश रेडिकल और आयरिश होमरूल आंदोलनों की तर्ज पर भारत में भी स्वशासन की माँग को लेकर राजनीतिक आंदोलन चलाया जाए। ऐनी बेसेंट ने 1914 ई. में भारत की राजनीति में प्रवेश किया और मद्रास से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘कॉमनवेल’ (2 जनवरी 1914 ई.) और दैनिक पत्र ‘न्यू इंडिया’ (14 जुलाई 1914 ई.) के माध्यम से भारतीयों में स्वतंत्रता और राजनीतिक भावना को जागृत करने का कार्य आरंभ किया। इसके बाद 1916 ई. के आरंभ में बंबई से ‘यंग इंडिया’ का प्रकाशन भी शुरू हो गया।
ऐनी बेसेंट ने बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर सितंबर 1916 ई. में मद्रास (अडयार) में अपने ‘होमरूल आंदोलन’ की शुरुआत की और जॉर्ज अरुंडेल को संगठन-सचिव नियुक्त किया। तिलक की लीग की अपेक्षा ऐनी बेसेंट की लीग का स्वरूप अधिक अखिल-भारतीय था और इसके अडयार स्थित मुख्यालय की लगभग 200 स्थानीय शाखाएँ कस्बों, नगरों और गाँवों तक फैली हुई थीं। 1917 ई. के मध्य में बेसेंट की लीग की सदस्य संख्या 27,000 थी।
ऐनी बेसेंट की होमरूल लीग ने स्वशासन की माँग के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया। अरुंडेल ने राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक बहस शुरू करने के लिए ‘न्यू इंडिया’ के माध्यम से स्वयंसेवकों से पुस्तकालयों की स्थापना, छात्रों को राजनीतिक शिक्षा देने के लिए कक्षाओं का आयोजन, पर्चे वितरित करने, चंदा एकत्र करने, सामाजिक कार्य करने, राजनीतिक सभाओं का आयोजन करने, दोस्तों के बीच होमरूल के समर्थन में तर्क देने और उन्हें आंदोलन में भागीदार बनाने के लिए कार्य करने को कहा। बेसेंट की लीग सितंबर 1916 ई. तक 26 अंग्रेजी पुस्तिकाओं की 3,00,000 प्रतियाँ प्रकाशित कर चुकी थी। नवंबर 1916 ई. में जब ऐनी बेसेंट को बरार और मध्य प्रांत में जाने पर प्रतिबंध लगाया गया, तो अरुंडेल की अपील पर लीग की तमाम शाखाओं ने विरोध-बैठकें आयोजित की और वायसरॉय तथा गृह सचिव को विरोध-प्रस्ताव भेजा। इसी प्रकार जब 1917 में तिलक पर पंजाब और दिल्ली जाने पर प्रतिबंध लगाया गया, तो पूरे देश में विरोध-बैठकें हुईं। इस आंदोलन से देश के राजनीतिक वातावरण में एक बिजली-सी दौड़ गई और सारा देश नए विचारों से आंदोलित हो उठा।
मद्रास सरकार ने जून 1917 ई. में जब ऐनी बेसेंट और उनके दो प्रमुख थियोसोफिस्ट सहयोगियों, जॉर्ज अरुंडेल और बी.पी. वाडिया को नजरबंद किया, तो इसके विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन हुए। एस. सुब्रमण्यम अय्यर ने अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि वापस कर दी। इस समय ऐनी बेसेंट की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। बेसेंट की लीग का मुख्य रूप से समर्थन करने वाले थे-मद्रास के तमिल ब्राह्मण, संयुक्त प्रांत के व्यावसायिक समूह, जैसे कायस्थ, कश्मीरी ब्राह्मण और कुछ मुसलमान, सिंध के हिंदू अल्पसंख्यक और गुजरात और बंबई के युवा गुजराती उद्योगपति, व्यापारी और वकील। इन समूहों के बीच थियोसोफी की लोकप्रियता का एक कारण यह था कि थियोसोफी में थोड़ा-बहुत समाज-सुधार के साथ प्राचीन हिंदू ज्ञान और वैभव के सिद्धांत का मेल था। दूसरा, इन क्षेत्रों में ब्रह्म समाज या आर्य समाज जैसे संगठनों की बहुत पैठ नहीं थी। तीसरा, इन क्षेत्रों में एक प्रकार का राजनीतिक शून्य-सा भी था, क्योंकि बंबई और मद्रास शहरों को छोड़ दें तो इन क्षेत्रों में कोई सुस्थापित उग्रवादी या नरमदलीय किसी भी प्रकार की राजनीतिक परंपरा नहीं थी।
ऐनी बेसेंट और उनके होमरूल आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने भावी राष्ट्रीय आंदोलन के लिए नए जुझारू योद्धा तैयार किए, जैसे मद्रास में सत्यमूर्ति, कलकत्ता में जितेंद्रलाल बनर्जी, इलाहाबाद और लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू और खलीकुज्जमा, बंबई और गुजरात में रंगों का आयात करने वाले धनी व्यापारी जमनादास द्वारकादास, उद्योगपति उमर सोभानी, शंकरलाल बैंकर और इंदुलाल याज्ञनिक। जब 1919 ई. में गांधीजी ने रौलट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह की अपील की, तो इसमें वे सभी लोग सम्मिलित हो गए, जिन्हें होमरूल आंदोलन ने राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया था। 20 सितंबर 1933 ई. को अडयार में ऐनी बेसेंट की मृत्यु हो गई। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए गांधीजी ने कहा था : ‘जब तक भारतवर्ष जीवित है, ऐनी बेसेंट की सेवाएँ भी जीवित रहेंगी।’
मुस्लिम सुधार आंदोलन
उन्नीसवीं शताब्दी में न केवल हिंदू समाज में जागरण लाने के लिए सुधार आंदोलन शुरू हुए, बल्कि मुस्लिम समाज में भी सुधार के लिए आंदोलनों का सूत्रपात हुआ। यह शताब्दी हिंदू समाज के लिए उत्साहवर्धक थी, किंतु मुस्लिम समाज के लिए उतनी प्रभावी सिद्ध नहीं हुई। जहाँ हिंदू समाज में सुधार के लिए ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसाइटी और अन्य सनातनी संस्थाओं ने विभिन्न आंदोलन शुरू किए, वहीं मुस्लिम समाज में सुधार के लिए बहावी आंदोलन, फरॉयजी आंदोलन, अलीगढ़ आंदोलन, अहमदिया आंदोलन और देवबंद आंदोलन शुरू हुए। इनमें केवल ‘अलीगढ़ आंदोलन’ ही व्यापक रूप से लोकप्रिय हो सका। चूंकि इन मुस्लिम आंदोलनों के उद्देश्य सीमित थे, इसलिए ये हिंदू आंदोलनों की तरह मुस्लिम जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करने में असफल रहे।
अठारहवीं शताब्दी में मुसलमान निराशाजनक स्थिति में थे, क्योंकि औरंगजेब के दुर्बल उत्तराधिकारियों के समय में मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई थी और मुस्लिम समाज की प्रभा धूमिल होने लगी थी। देश में न तो राजनीतिक एकता थी और न ही पतनोन्मुख साम्राज्य को सँभालने के लिए बादशाहों के पास शक्ति थी। इस समय राजपूत और मराठों ने अपनी शक्ति बढ़ाकर मुगलों को चुनौती देनी शुरू कर दी थी, किंतु इन भारतीय शक्तियों की सफलता क्षणिक सिद्ध हुई।
अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार के उद्देश्य से यूरोपीय जातियों का आगमन शुरू हो गया था। सदी के उत्तरार्ध में इन यूरोपीय व्यापारियों ने केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का लाभ उठाकर भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास शुरू किए और उनमें आपसी प्रतिद्वंद्विता शुरू हो गई। इस प्रतिद्वंद्विता में डच और पुर्तगाली पीछे छूट गए और बाजी अंग्रेजों के हाथ लगी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 ई. में प्लासी और 1764 ई. में बक्सर के युद्धों में भारत की प्रमुख शक्तियों को हराकर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इससे मुसलमानों की शेष आशाएँ भी समाप्त हो गईं।
1857 ई. की क्रांति के दौरान बहादुरशाह ‘जफर’ को गद्दी से हटाए जाने के बाद मुगलों के राजनीतिक गौरव का अंत हो गया। इससे मुसलमानों की राजनीतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा, धर्म और आर्थिक संपन्नता खतरे में पड़ गई। कंपनी सरकार ने उनकी संपत्ति जब्त की, उन्हें राजनीतिक पदों से हटाया और काफी हद तक उनका दमन कर उनके मनोबल को तोड़ दिया, जिससे मुस्लिम समाज में सर्वत्र निराशा व्याप्त हो गई।
उन्नीसवीं शताब्दी में मुस्लिम सुधार आंदोलन
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों से विभिन्न इस्लामी सुधार आंदोलनों के माध्यम से आम जनता के स्तर पर एक सुस्पष्ट मुस्लिम पहचान विकसित होने लगी। इन आंदोलनों ने पहले के समन्वयवाद को अस्वीकार किया और मुसलमानों की संस्कृति, भाषा और रोजमर्रा के तौर-तरीकों के इस्लामीकरण और अरबीकरण के प्रयास में उन चीजों को हटा दिया, जिन्हें वे ‘गैर-इस्लामी’ मानते थे। जहाँ हिंदुओं की पश्चिम के प्रति प्रारंभिक प्रतिक्रिया जिज्ञासा से भरी थी, वहीं मुसलमानों की पहली प्रतिक्रिया अपने आपको बाहरी प्रभावों से बचाने और एक संकीर्ण ढाँचे में बंद रखने की थी।
1860 के दशक में धार्मिक सुधार की दो सुस्पष्ट धाराएँ विकसित हुईं। एक ओर अब्दुल लतीफ खाँ और उनकी ‘मोहम्मडन लिटरेरी सोसाइटी’ (1863 ई.) ने इस्लामी शिक्षा की परंपरागत व्यवस्था के अंतर्गत आधुनिक विचारों के आलोक में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श को बढ़ावा दिया और उच्च तथा मध्यवर्गीय मुसलमानों को पश्चिमी शिक्षा अपनाने के लिए प्रेरित किया। दूसरी ओर सैयद अमीर अली और उनके ‘सेंट्रल नेशनल मुहम्मडन एसोसिएशन’ (1877-1878 ई.) ने पश्चिमी और धर्मनिरपेक्ष तर्ज पर मुस्लिम शिक्षा के पूर्ण पुनर्गठन का समर्थन किया। इस प्रकार धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मुसलमानों ने आधुनिकीकरण पर बल देना शुरू किया।
मोहम्मडन लिटरेरी सोसाइटी
मुख्य लेख : मोहम्मडन लिटरेरी सोसाइटी
‘मोहम्मडन लिटरेरी सोसाइटी’ की स्थापना 1863 ई. में कलकत्ता में नवाब अब्दुल लतीफ (1828-1893 ई.) ने की थी। इसका प्रमुख उद्देश्य शोषित, वंचित और पिछड़े मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार करना और उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाना था। अब्दुल लतीफ ने विशेष रूप से बंगाल के मुसलमानों में शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता को भी बढ़ावा दिया। यही कारण है कि उन्हें ‘बंगाल के मुस्लिम पुनर्जागरण का पिता’ कहा जाता है।
सर सैयद अहमद खाँ और अलीगढ़ आंदोलन
मुख्य लेख : सर सैयद अहमद खाँ
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुस्लिम समाज में सुधार आंदोलन के प्रणेता सर सैयद अहमद खाँ (1817-1898 ई.) थे। वह आधुनिक वैज्ञानिक विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे और जीवन भर इस्लाम को आधुनिकता के साथ समन्वित करने के लिए प्रयासरत रहे। सैयद अहमद खाँ जानते थे कि भारत के मुसलमान तभी प्रगति कर सकते हैं, जब वे आधुनिक शिक्षा को अपनाएँ। उन्होंने ब्रिटिश सरकार और अंग्रेजी शिक्षा के सहयोग से मुसलमानों की बेहतरी और सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए आधुनिकता का जो आंदोलन शुरू किया, उसे ‘अलीगढ़ आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। सर सैयद अहमद खाँ को आधुनिक भारत में ‘मुसलमानों का राजनीतिक पथ-प्रदर्शक’ कहा जाता है। उनके अलीगढ़ समूह में चिराग अली, उर्दू शायर अल्ताफ हुसैन हाली और नजीर अहमद जैसे प्रमुख नेता भी शामिल थे।
सर सैयद अहमद खाँ का जन्म 17 अक्टूबर1817 ई. को दिल्ली के एक सैयद परिवार में हुआ। उनका खानदान धार्मिक विचारों से प्रभावित था। उनके पिता मीर मुत्तकी नक्शबंदी संप्रदाय से संबंधित थे। पिता की ओर से उनका परिवार मुगल साम्राज्य की सेवा में था, जिसके कारण सैयद अहमद का मुगल दरबार से निकट संपर्क था।
उन्होंने प्राचीन शिक्षा के आधार पर प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। अठारह-उन्नीस वर्ष की आयु तक उन्होंने कुरान शरीफ, अरबी और फारसी का अध्ययन कर लिया और गणित का भी कुछ ज्ञान अर्जित किया। किंतु उनकी शिक्षा नियमित ढंग से नहीं हुई थी, जिसके कारण उनके इस्लामी विषयों का ज्ञान अधूरा रहा। फिर भी, उनकी विद्या के प्रति रुचि जीवन भर बनी रही। 1857 ई. के बाद उन्होंने पश्चिमी विचारों का अध्ययन किया और अंग्रेजी का कामचलाऊ ज्ञान प्राप्त किया। इंग्लैंड की यात्रा (1869-1870 ई.) और पश्चिमी विचारों के अध्ययन ने सैयद अहमद को अंग्रेजों और उनकी सभ्यता का प्रशंसक बना दिया।
जब सैयद अहमद इक्कीस वर्ष के थे, उनके पिता का देहावसान हो गया, और परिवार का सारा भार उनके कंधों पर आ पड़ा। परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्होंने अपने चाचा के साथ अदालती काम सीखना शुरू किया। दिल्ली में काम सीखने के दौरान उनका परिचय हैमिल्टन नामक एक अंग्रेज जज से हुआ, जिसने उन्हें आगरा बुलाकर 1839 ई. में कमिश्नरी के दफ्तर में नायब मुंशी के पद पर नियुक्त किया। 1841 ई. में उन्होंने मुंसिफी की परीक्षा उत्तीर्ण की और मुंसिफ बनकर मैनपुरी आ गए। 1846 ई. में उनका स्थानांतरण दिल्ली हो गया। आगरा और दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। 1855 ई. में वे सदर अमीन बनकर बिजनौर आ गए। 1857 ई. की सिपाही क्रांति के समय वे बिजनौर में थे, जहाँ उन्होंने क्रांति पर एक ऐतिहासिक पुस्तिका ‘असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद’ लिखी।
एक अधिकारी के रूप में सैयद अहमद ने कई विद्यालय स्थापित किए, कई पश्चिमी ग्रंथों का उर्दू में अनुवाद करवाया और अनेक पुस्तकों व पत्रिकाओं को प्रकाशित कर मुस्लिम जागरण का कार्य किया। उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा की और वहाँ लगभग डेढ़ वर्ष (1869-1870 ई.) रहकर अंग्रेजों के विचारों और सभ्यता का अध्ययन किया। भारत लौटकर उन्होंने अलीगढ़ आंदोलन शुरू किया और 1875 ई. में ‘अलीगढ़ मुस्लिम स्कूल’ की स्थापना की। 1876 ई. में वे सरकारी सेवा से मुक्त हुए और स्थायी रूप से अलीगढ़ में रहने लगे। 1878 ई. में उन्हें ‘इंडियन लेजिस्लेटिव कौंसिल’ का सदस्य बनने का अवसर मिला। अब वे एक नेता के रूप में सुधार और जागरण का कार्य करने लगे। 1898 ई. में 81 वर्ष की आयु में हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया।
अलीगढ़ आंदोलन
सर सैयद अहमद खाँ पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से मुसलमानों का सर्वांगीण विकास करना चाहते थे, क्योंकि उनका विष्वास था कि मुसलमानों का धार्मिक और सामाजिक जीवन पश्चिमी वैज्ञानिक ज्ञान और संस्कृति को अपनाकर ही सुधर सकता है। उन्होंने पारंपरिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अंग्रेजी सीखने और पश्चिमी शिक्षा अपनाने के लिए मुस्लिम शिक्षा के आधुनिकीकरण का प्रयास किया।
साइंटिफिक सोसाइटी की स्थापना (1864 ई.)
अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए सैयद अहमद ने 1864 ई. में गाजीपुर में ‘साइंटिफिक सोसाइटी’ (वैज्ञानिक समाज) की स्थापना की, ताकि पश्चिमी कार्यों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा सके, मुसलमानों को पश्चिमी शिक्षा स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाए और उनमें वैज्ञानिक प्रवृत्ति पैदा की जाए। यह सोसाइटी उर्दू और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पत्रिकाएँ प्रकाशित करती थी। बाद में इसे अलीगढ़ स्थानांतरित कर दिया गया।
सैयद अहमद पश्चिमी वैज्ञानिक शिक्षा को कुरान की शिक्षाओं के साथ समन्वित करना चाहते थे। उन्होंने कुरान पर लिखी अपनी महत्त्वपूर्ण टीका में परंपरागत टीकाकारों की आलोचना की और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के अनुसार अपना मत व्यक्त किया। उन्होंने घोषणा की कि इस्लाम की एकमात्र प्रमाणिक पुस्तक ‘कुरान’ है और अन्य सभी इस्लामी लेखन गौण महत्त्व के हैं। उनके अनुसार यदि कुरान की कोई व्याख्या मानव बुद्धि, विज्ञान या प्रकृति से टकराती है, तो वह गलत है। उनका कहना था कि सांसारिक मामलों में हदीस का हुक्म मानना आवश्यक नहीं है, किंतु धार्मिक मामलों में हदीस के अनुसार आचरण करना अनिवार्य है। 1870 ई. में उन्होंने फारसी भाषा में ‘तहज़ीब-उल-अखलाक’ (सभ्यता और नैतिकता) पत्रिका प्रकाशित की और मुसलमानों की परंपरागत मान्यताओं पर प्रहार किया।
सैयद अहमद ने लोगों से आलोचनात्मक दृष्टिकोण और विचार की स्वतंत्रता अपनाने का आग्रह किया और कहा : “जब तक विचार की स्वतंत्रता विकसित नहीं होती, तब तक सभ्य जीवन संभव नहीं है।” उनका मानना था कि बंद दिमाग सामाजिक-बौद्धिक पिछड़ेपन की निशानी है। इस प्रकार उन्होंने आलोचनात्मक दृष्टिकोण और विचार की स्वतंत्रता की वकालत की।
मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (1877 ई.)
सर सैयद ने ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालयों की तर्ज पर एक विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए 24 मई 1875 ई. को महारानी विक्टोरिया की 56वीं जयंती पर अलीगढ़ में ‘मदरसतुल उलूम मुसलमान-ए-हिंद’ (अलीगढ़ स्कूल) की स्थापना की। 8 जनवरी 1877 ई. को लॉर्ड लिटन ने इसका शिलान्यास ‘मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ के नाम से किया। रूढ़िवादियों के विरोध के बावजूद यह कॉलेज प्रगति करता गया और 1920 ई. में ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। सर सैयद के शैक्षिक कार्य में मुहसिन-उल-मुल्क, बकरूल मुल्क, डॉ. नज़ीर अहमद और शायर अल्ताफ हुसैन हाली जैसे विद्वानों ने सहयोग किया। इस प्रकार सर सैयद भारतीय मुसलमानों के पहले समाज सुधारक थे, जिन्होंने अज्ञानता की काली चादर को हटाकर मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना जागृत की।
यद्यपि अलीगढ़ कॉलेज एक राजनीतिक उद्यम था, जिसका उद्देश्य मुस्लिम छात्रों में एक कौम की सदस्यता की भावना पैदा करना और उनके माध्यम से उत्तर भारत की मुस्लिम आबादी में सामाजिक पहुँच बढ़ाना था, किंतु इसके कोष में हिंदुओं, पारसियों और ईसाइयों ने भी उदारतापूर्वक दान दिया। इसके दरवाजे सभी भारतीयों के लिए खुले थे। उदाहरण के लिए 1898 ई. में इस कॉलेज में 64 हिंदू और 285 मुस्लिम छात्र थे। सात भारतीय अध्यापकों में दो हिंदू थे, जिनमें एक संस्कृत के प्रोफेसर थे।
सामाजिक सुधार और राजनीतिक दृष्टिकोण
सर सैयद सामाजिक सुधारों के प्रबल पक्षधर और लोकतांत्रिक आदर्शों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक थे। वह जीवन भर परंपराओं के अंधानुकरण, रूढ़ियों पर भरोसे, अज्ञान और तर्कहीनता के खिलाफ संघर्ष करते रहे। उन्होंने मुसलमानों से मध्यकालीन रीति-रिवाजों और विचारों को त्यागने का आग्रह किया। उन्होंने पर्दा प्रथा समाप्त करने और स्त्रियों में शिक्षा के प्रसार का समर्थन किया। वह सामान्य परिस्थितियों में बहुविवाह और छोटी-छोटी बातों पर तलाक के रिवाज के भी विरुद्ध थे। उन्होंने ‘जिहाद’ का समर्थन नहीं किया, किंतु कहा कि यदि कोई गैर-मुस्लिम शक्ति इस्लाम या मुस्लिम समुदाय पर आक्रमण करती है, तब मुसलमान ‘जिहाद’ कर सकते हैं।
सैयद अहमद न केवल मुस्लिम समाज की कुरीतियों को दूर कर उनके दृष्टिकोण को आधुनिक बनाना चाहते थे, बल्कि उनका विष्वास था कि अंग्रेजों के शासन के अधीन रहकर ही मुसलमानों की स्थिति को उन्नत बनाया जा सकता है। वह चाहते थे कि अंग्रेजों और मुसलमानों के बीच संदेह और द्वेष की भावना को दूर किया जाए। उनका कहना था कि मुसलमान अंग्रेजों के शासन के सहयोगी हैं, शत्रु नहीं।
सैयद अहमद ने कुरान और हदीस से कुछ आयतों का हवाला देकर यह सिद्ध किया कि मुसलमानों और ईसाइयों के बीच सदा मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं। यद्यपि उन्होंने कुरान में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, किंतु धर्म की नई व्याख्या कर भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। 1873 ई. में लाहौर में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था: “मुसलमानों का अंग्रेजों से शत्रुता रखना वैसा ही है, जैसे नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर रखना। इसलिए उनके लिए यह आवश्यक है कि वे उनसे मैत्री रखें।” इसके बदले में वह चाहते थे कि अंग्रेज सरकार मुसलमानों के हितों की रक्षा करे और उनके धार्मिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप न करे।
वास्तव में, सर सैयद का राजनीतिक दर्शन इस विचार के इर्द-गिर्द घूमता था कि भारतीय समाज विभिन्न प्रतियोगी समूहों (कौमों) का महासंघ है, जिनमें से प्रत्येक की एक साझी वंश-परंपरा है। भूतपूर्व शासक वर्ग के रूप में मुसलमानों को शक्ति और सत्ता में विशेष प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और राजनीतिक व्यवस्था के साथ उनका विशेष संबंध होना चाहिए।
धार्मिक सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता
सर सैयद धार्मिक सहिष्णुता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने कई व्याख्यानों और निबंधों में राष्ट्रीय एकता पर बल दिया। उनका विष्वास था कि सभी धर्मों में एक बुनियादी एकता मौजूद है, जिसे व्यवहारिक नैतिकता कहा जा सकता है। वह मानते थे कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और इसलिए वैयक्तिक संबंधों में धार्मिक कट्टरता की निंदा करते थे। वे सांप्रदायिक टकराव के भी विरोधी थे। हिंदुओं और मुसलमानों से एकता का आग्रह करते हुए उन्होंने 27 जनवरी 1883 ई. को पटना में कहा था:
“हम दोनों भारत की हवा में साँस लेते हैं और गंगा-यमुना का पवित्र जल पीते हैं। हम भारत की जमीन की उपज से अपनी भूख मिटाते हैं। जीवन और मृत्यु, दोनों में हम एक साथ हैं। भारत में हमारे निवास ने हमारा खून बदल दिया है, हमारे शरीरों के रंग एक हो चुके हैं, हमारे हुलिए समान हो चुके हैं। निःसंदेह इस आधार पर कि हम दोनों एक ही देश में रहते हैं, हमारा एक राष्ट्र और देश है। हम दोनों की प्रगति और कल्याण हमारी एकता, पारस्परिक सहानुभूति, और प्रेम पर निर्भर है, जबकि हमारे पारस्परिक मतभेद, अकड़, विरोध और फूट निश्चित रूप से हमें नष्ट कर देंगे।”
आर्य समाज के सदस्यों के समक्ष भाषण देते हुए उन्होंने शिकायत भरे शब्दों में कहा था: “मैं हिंदू क्यों नहीं माना जाता?” उनके शब्द थे: “मेरे विचार में हिंदू किसी धर्म का नाम नहीं है, बल्कि हर वह व्यक्ति जो हिंदुस्तान का रहने वाला है, अपने आपको हिंदू कहता है। इसलिए मुझे खेद है कि आप मुझे हिंदू नहीं समझते, यद्यपि मैं हिंदुस्तान का निवासी हूँ।” उन्होंने आगे कहा कि भारत की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि हिंदू और इस्लाम धर्म के अनुयायी आपस में मिलकर कार्य करें। वह चाहते थे कि धर्म के भेद पर ध्यान न देकर हिंदुओं और मुसलमानों में दोस्ती, मुहब्बत, एकता और हमदर्दी हो, जैसे राजनीतिक मतभेद भूलकर सामाजिक व्यवहार में मुहब्बत, हमदर्दी और भाईचारा रहे।
अलीगढ़ आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन
अकसर कहा जाता है कि सर सैयद अहमद खाँ और अलीगढ़ आंदोलन का विकास कांग्रेसी नेतृत्व वाले राष्ट्रवाद के विरोध में और अंग्रेजी राज के प्रति वफादारी के रूप में हुआ। दरअसल, सर सैयद जीवन के प्रारंभिक दौर में राष्ट्रवादी थे, किंतु अंतिम वर्षों में वह मुस्लिम हितों की पैरवी करते हुए इससे दूर चले गए। जब 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ, तब सैयद अहमद ने इसे हिंदुओं के वर्चस्व वाला संगठन बताया और अपने अनुयायियों को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने से रोकने के लिए 1888 में ‘शिक्षा सम्मेलन कॉन्फ्रेंस’ के मंच से ‘इंडियन पैट्रियाटिक एसोसिएशन’ की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य मुस्लिम जनमत को संगठित करना और सामंती व रूढ़िवादी तत्त्वों का राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध समर्थन प्राप्त करना था। बाद में इस एसोसिएशन के नाम में ‘यूनाइटेड’ शब्द जोड़ा गया। कांग्रेस का विरोध करने के लिए उन्होंने 1890 ई. में ‘मुहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस’ और दिसंबर 1893 ई. में ‘मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल डिफेंस एसोसिएशन’ की स्थापना की।
फिर भी, सैयद अहमद बुनियादी तौर पर सांप्रदायिक नहीं थे। वे उच्च और मध्यवर्गीय मुसलमानों का पिछड़ापन समाप्त करना चाहते थे। चूंकि उन्हें लगता था कि ब्रिटिश सरकार को आसानी से हटाया जाना संभव नहीं है और अंग्रेजों से शत्रुता शिक्षा प्रसार के लिए घातक हो सकती है, इसलिए उन्होंने भारतीयों, विशेषकर पिछड़े मुसलमानों से अपील की कि वे कुछ समय के लिए राजनीति से दूर रहें।
उत्तर भारत के मुस्लिम समुदाय ने सर सैयद के नेतृत्व को कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। देवबंद के उलेमाओं ने 1888 ई. में उनकी पश्चिमीकरण की मुहिम के विरुद्ध फतवा जारी किया, क्योंकि वे उनकी पश्चिमीकरण की मुहिम को पसंद नहीं करते थे। उन्हें लगता था कि यह मुस्लिम समाज में उनकी प्रधानता के लिए खतरा है। जमालुद्दीन अल-अफगानी जैसे लोग भी थे, जो कट्टर उपनिवेशवाद विरोधी थे और सैयद अहमद की अंग्रेजों के प्रति वफादारी को प्रसंद नहीं करते थे। 1880 के दशक के अंत तक उत्तर भारत के कई मुसलमान कांग्रेस की ओर झुकने लगे थे, जबकि 1887 में बंबई के बदरूद्दीन तैय्यब जी कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने। 1890 के दशक के अंत तक पंजाब के अनेक उर्दू अखबार यह कहने लगे थे कि अलीगढ़ संप्रदाय भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। 1898 ई. में सर सैयद की मृत्यु के बाद अलीगढ़ की युवा पीढ़ी धीरे-धीरे इसकी मौजूदा राजनीतिक परंपरा से दूर होने लगी।
अलीगढ़ आंदोलन का मूल्यांकन
कई इतिहासकारों ने अलीगढ़ आंदोलन और सर सैयद अहमद खाँ की बड़ी भर्त्सना की है कि इस आंदोलन के परिणामस्वरूप देश में सांप्रदायिकता की शुरुआत हुई। दरअसल, यह आंदोलन उतना हिंदू-विरोधी नहीं था, जितना मुस्लिम-समर्थक था। भारत के मुसलमानों के लिए इस आंदोलन का वही महत्त्व था, जो हिंदुओं के लिए उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण का। इस आंदोलन ने मुस्लिम समुदाय को मध्ययुगीन वातावरण से बाहर निकाला और आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर किया। राममोहन रॉय की तरह सैयद अहमद अपने समाज को अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान के माध्यम से उन्नत और आधुनिक बनाने के लिए कृतसंकल्प थे। वह अपने अलीगढ़ कॉलेज और शिक्षा के प्रसार के लिए इतने कटिबद्ध थे कि इसके लिए अन्य सभी हितों का बलिदान करने को तत्पर थे। रूढ़िवादी मुसलमानों को कॉलेज का विरोध करने से रोकने के लिए उन्होंने धार्मिक सुधार के आंदोलन को भी लगभग त्याग दिया था। वह ब्रिटिश सरकार को किसी प्रकार से रुष्ट नहीं करना चाहते थे, किंतु सांप्रदायिकता और अलगाववाद को प्रोत्साहन देना एक गंभीर राजनीतिक भूल साबित हुई।
सैयद अहमद खाँ भारत में मुस्लिम समाज के जागरण के अग्रदूत थे। उन्होंने मुस्लिम समाज की प्रगति और विकास के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। उनके प्रयासों से अखिल भारतीय मुस्लिम महिलाओं की सभाएँ होने लगीं। भोपाल की बेगम साहिबा ने 1914 और 1918 ई. के दौरान अखिल भारतीय नारी सभा का सभापतित्व किया और स्त्रियों के लिए कई सामाजिक व शैक्षिक सुधार आंदोलन चलाए। कुलीन और शिक्षित क्षेत्रों की प्रमुख महिलाएँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने लगीं, उन्होंने पर्दा छोड़ दिया और राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। ताराचंद लिखते है: “उन्होंने अपने गौरवमय नेतृत्व से मुस्लिम समाज को निराशा के कीचड़ से उबार लिया। उन्होंने उनके मन को दकियानूसी ज्ञान से हटाकर आधुनिक शिक्षा की ओर प्रवृत्त किया, जिससे वे अपने देश के मामलों में सही भाग लेने में समर्थ हुए। उन्होंने अंग्रेज शासकों के संदेह और शत्रुता को विष्वास और प्रेम में बदल दिया।”
देवबंद स्कूल और नदवत-उल-उलेमा
मुख्य लेख : देवबंद स्कूल
देवबंद स्कूल एक पुनर्जागरणवादी आंदोलन था। इसकी शुरुआत उदारवादी आंदोलन के विरोध में रूढ़िवादी मुस्लिम उलेमा मुहम्मद कासिम नानौतवी और राशिद अहमद गंगोही के नेतृत्व में 1866 ई. में सहारनपुर (संयुक्त प्रांत) के देवबंद में ‘दारुल उलूम’ मदरसे की स्थापना के साथ हुई।
इस आंदोलन के दो मुख्य उद्देश्य थे: पहला, मुसलमानों में कुरान और हदीस की शुद्ध शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए भावी नेताओं को तैयार करना और दूसरा, विदेशी शासकों के विरुद्ध जिहाद की भावना को जीवित रखना।
जहाँ अलीगढ़ आंदोलन का उद्देश्य पश्चिमी शिक्षा के प्रसार और ब्रिटिश सरकार के समर्थन से मुसलमानों की बेहतरी था, वहीं देवबंद आंदोलन का उद्देश्य मुस्लिम समुदाय का नैतिक और धार्मिक उत्थान करना था।
राजनीतिक क्षेत्र में देवबंद स्कूल ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन का स्वागत किया, किंतु 1888 ई. में सैयद अहमद खाँ के संगठनोंकृ‘यूनाइटेड पैट्रियाटिक एसोसिएशन’ और ‘मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल डिफेंस एसोसिएशन’कृके विरुद्ध फतवा जारी किया।
इस संस्था के मौलाना महमूद-उल-हसन, जिन्हें ‘शैखुल हिंद’ की उपाधि प्राप्त थी, ने इस संस्था के धार्मिक विचारों को राजनीतिक और बौद्धिक आयाम प्रदान किए। उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों और राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के संश्लेषण पर काम किया। ‘जमीयत-उल-उलेमा’ ने हसन के विचारों को भारतीय एकता और राष्ट्रीय उद्देश्यों के संदर्भ में मुसलमानों के धार्मिक व राजनीतिक अधिकारों के संरक्षण के लिए ठोस आकार दिया।
देवबंद स्कूल के समर्थकों में शिबली नोमानी, फारसी और अरबी के प्रसिद्ध विद्वान और लेखक थे। उन्होंने परंपरागत मुस्लिम शिक्षा में सुधार के लिए औपचारिक शिक्षा के स्थान पर अंग्रेजी भाषा और यूरोपीय विज्ञान को शामिल करने का समर्थन किया। वह कांग्रेस के आदर्शवाद में विष्वास करते थे और भारत के मुसलमानों व हिंदुओं के बीच एक ऐसे राज्य की स्थापना की वकालत करते थे, जिसमें दोनों सौहार्दपूर्ण ढंग से रह सकें।
मुस्लिम समाज के विभिन्न समूहों के बीच सामंजस्य और सहयोग के लिए 1893 ई. में कानपुर में ‘नदवत-उल-उलेमा’ की स्थापना की गई, जिसे 1898 में लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया। इसने अप्रैल 1894 ई. में अपना पहला सम्मेलन किया, जिसमें मौलाना अब्दुल्ला अंसारी और मौलाना शिबली नोमानी सहित अरबी और फारसी के विद्वानों ने भाग लिया। नदवत-उल-उलेमा के पहले नाज़िम सैयद मुहम्मद अली थे। ‘नदवा’ का अर्थ है विधानसभा या समूह और इसका नाम इसलिए रखा गया क्योंकि इसका गठन विभिन्न इस्लामिक स्कूलों के भारतीय इस्लामी विद्वानों के एक समूह द्वारा किया गया था।
प्रारंभ में दारुल उलूम देवबंद के संस्थापक, जैसे राशिद अहमद गंगोही और कासिम नानौतवी नदवा आंदोलन के खिलाफ थे, किंतु बाद में वे इसमें शामिल हो गए। अब नदवा ‘दारुल उलूम’ देवबंद का ही एक संस्थान है, जो इसके उपदेशों का प्रचार करता है।
अहमदिया आंदोलन
मुख्य लेख : अहमदिया आंदोलन
अहमदिया इस्लाम का एक संप्रदाय है, जिसकी उत्पत्ति भारत में हुई। इसकी स्थापना मिर्ज़ा गुलाम अहमद (1835-1908 ई.) ने 23 मार्च 1889 ई. को गुरदासपुर (पंजाब) के कादियान में की थी। इस संप्रदाय का उद्देश्य भारत में शुद्ध इस्लाम की स्थापना करना और मुसलमानों की आधुनिक औद्योगिक व तकनीकी प्रगति को धार्मिक मान्यता देना था। मिर्ज़ा गुलाम अहमद के शिष्य ‘कादियानी’ कहलाए, जिसके कारण इस आंदोलन को ‘कादियानी आंदोलन’ भी कहा जाता है।
मिर्ज़ा गुलाम अहमद का जन्म 1835 ई. में गुरदासपुर जिले (पंजाब) के कादियान में हुआ था। उन्हें मुस्लिम धर्मशास्त्र के साथ-साथ अरबी और फारसी भाषा का भी ज्ञान था।
मिर्जा गुलाम अहमद पश्चिमी उदारवाद, ब्रह्मविद्या, और हिंदुओं के धार्मिक सुधार आंदोलनों से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने 1890 ई. में अपनी पुस्तक ‘बराहीन-ए-अहमदिया’ में अपने सिद्धांतों की व्याख्या की। उन्होंने मुसलमानों को मौलवियों की बुराइयों से बचने और पीरों व कब्रों की इबादत न करने की अपील की। उन्होंने पर्दा प्रथा और तलाक का समर्थन किया।
मिर्ज़ा गुलाम ने ‘जिहाद’ का विरोध किया, 1891 ई. में स्वयं को हजरत मुहम्मद की बराबरी का इस्लाम का ‘पैगंबर’ (मसीहा) घोषित किया और स्वयं को ‘पुनर्जागरण का वाहक’ बताया। बाद में उन्होंने अपने आपको कृष्ण और विष्णु के अंतिम अवतार के रूप में भी माना।
अहमदिया समुदाय एकमात्र इस्लामी संप्रदाय है, जो मानता है कि मसीहा मिर्ज़ा गुलाम अहमद का जन्म धार्मिक युद्धों और रक्तपात को समाप्त करने तथा नैतिकता, शांति और न्याय को बहाल करने के लिए हुआ था। वह मस्जिद (धर्म) को राज्य से अलग करने और मानवाधिकार व सहिष्णुता में विष्वास करते थे।
1908 ई. में मिर्ज़ा गुलाम अहमद की मृत्यु के बाद अहमदिया आंदोलन की बागडोर एक खलीफा ने सँभाली। किंतु प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इस संप्रदाय में फूट पड़ गई। कादियानी दल से अलग होकर ख्वाजा कमरुद्दीन और मोहम्मद अहमद अली ने ‘लाहौरी दल’ का गठन किया। कादियानी दल का कहना था कि संप्रदाय के प्रवर्तक को ‘नबी’ समझना चाहिए, जबकि लाहौरी दल के अनुयायी उन्हें इस्लाम में केवल ‘मुजाहिद’ या ‘सुधारक’ मानते थे।
अन्य मुस्लिम आंदोलन
पंजाब में अन्य मुस्लिम आंदोलन भी शुरू हुए। 1885 ई. में ‘अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम’ का आंदोलन शुरू हुआ, जिसके सदस्यों ने मुस्लिम समाज के सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक स्तर को उन्नत करने का प्रयास किया। पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने ‘खुदाई खिदमतगार आंदोलन’ शुरू किया और भ्रातृत्व की भावना का प्रसार किया। इसी प्रकार इनायतुल्लाह खाँ ने ‘खाकसार आंदोलन’ को जन्म दिया, जिसने अनुशासन और सैनिक शिक्षा पर बल दिया।
मुहम्मद इकबाल
मुख्य लेख : मुहम्मद इकबाल
आधुनिक भारत के महानतम कवियों में से एक मुहम्मद इकबाल (1877-1938 ई.) ने अपनी कविता के माध्यम से युवा मुसलमानों और हिंदुओं के दार्शनिक व धार्मिक दृष्टिकोण पर गहरा प्रभाव डाला। स्वामी विवेकानंद की तरह उन्होंने निरंतर परिवर्तन और अबाध कर्म पर बल दिया और विराग, ध्यान,और एकांतवास की निंदा की। उन्होंने गतिमान दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया, जो दुनिया को बदलने में सहायक हो। वह मूलतः मानवतावादी थे और मानव कर्म को प्रमुख धर्म मानते थे। उनका मानना था कि निरंतर कर्म द्वारा इस विश्व को नियंत्रित करना चाहिए, क्योंकि स्थिति को निष्क्रिय रूप से स्वीकारना सबसे बड़ा पाप है। कर्मकांड, विराग और दूसरी दुनिया में विष्वास की प्रवृत्ति की निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि मानव को इसी चलायमान दुनिया में सुख प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। अपनी प्रारंभिक कविताओं में उन्होंने देशभक्ति के गीत गाए, यद्यपि बाद में वे मुस्लिम अलगाववाद के समर्थक हो गए।
पारसियों में धार्मिक सुधार
मुख्य लेख : पारसी सुधार आंदोलन
सुधारवादी वातावरण में पारसी धर्म और समाज में भी सुधार की शुरुआत हुई। 1851 में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नौरोजी फरदूनजी, दादाभाई नौरोजी, एस.एस. बंगाली और कुछ अन्य लोगों ने बंबई में ‘रहनुमाए मज्दायासन सभा’ (रिलीजस रिफॉर्म एसोसिएशन) का गठन किया। इसका उद्देश्य पारसियों की सामाजिक स्थिति का पुनरुद्धार करना और पारसी धर्म को प्राचीन शुद्धता प्रदान करना था। सभा के संदेशों को प्रसारित करने के लिए गुजराती भाषा में ‘रास्त गोफ्तार’ (सत्यवादी) पत्रिका शुरू की गई। दादाभाई नौरोजी (1825-1917 ई.) पारसी कानून संघ के जन्मदाताओं में से थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए ‘ज्ञान प्रसारक मंडली’ नामक एक महिला हाईस्कूल की स्थापना की। पारसी धर्म में व्याप्त रूढ़ियों और कर्मकांडों को दूर कर उनके सामाजिक रीति-रिवाजों के आधुनिकीकरण का प्रयास किया गया। स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में सुधार कर पर्दा प्रथा समाप्त की गई, विवाह की आयु बढ़ाई गई और स्त्री शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप पारसी भारतीय समाज के सबसे विकसित अंग बन गए।
सिखों में धार्मिक सुधार
कूका आंदोलन
मुख्य लेख :
पश्चिम के विकासशील और तर्कसंगत विचारों ने सिख संप्रदाय को भी प्रभावित किया। सिख सुधार आंदोलन के अगुआ दयालदास थे, जिन्होंने निरंकारी आंदोलन शुरू किया था। पंजाब में पहला सामाजिक-धार्मिक आंदोलन कूका आंदोलन था, जिसकी शुरुआत 1840 ई. में भगत जवाहर मल (सियेन साहब) ने की थी। इसने सिख धर्म में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, जाति-भेद, और अस्पृश्यता को दूर करने तथा अंतर्जातीय विवाहों पर बल दिया। इन सुधारकों ने सभी प्रकार की सामाजिक कुरीतियों और मूर्तिपूजा को बंद करवाया और केवल गुरुबानी व उसके शब्दों के तेज आवाज में उच्चारण पर जोर दिया। इस प्रकार के उच्चारण को पंजाब में ‘कूका’ कहा जाता है। इस आंदोलन ने ब्राह्मणों के प्रभाव को कम किया, जिससे बड़ी संख्या में दलित भी इसमें शामिल हुए।
नामधारी आंदोलन
मुख्य लेख :
नामधारी आंदोलन के संस्थापक बालक सिंह (1799-1862 ई.) माने जाते हैं। उन्होंने सिख समाज में व्याप्त दिखावे और आडंबरों को दूर करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की। बालक सिंह के एक कारीगर (शिल्पकार) जाति के शिष्य राम सिंह ने इस आंदोलन को नई दिशा दी और समाज सुधार के साथ-साथ देश की स्वतंत्रता के लिए भी संघर्ष किया। बाद में ब्रिटिश सरकार ने राम सिंह को गिरफ्तार कर देशद्रोह के आरोप में अंडमान (कालापानी) भेज दिया।
अकाली आंदोलन
मुख्य लेख :
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अमृतसर में ‘सिंह सभा’ द्वारा खालसा कॉलेज की स्थापना के साथ सिख सुधार आंदोलन शुरू हुआ। ‘मुख्य खालसा दीवान’ के नाम से प्रसिद्ध इस संस्था ने पंजाब में कई गुरुद्वारों और स्कूल-कॉलेजों की स्थापना की। किंतु सुधार के प्रयासों को अधिक बल 1920 ई. के बाद अकाली आंदोलन के शुरू होने से मिला। अकालियों का मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों के प्रबंध का शुद्धिकरण करना था। ये गुरुद्वारे भक्तों से भूमि और धन दानस्वरूप प्राप्त करते थे, किंतु इनका प्रबंध भ्रष्ट और स्वार्थी महंतों द्वारा मनमाने ढंग से किया जा रहा था। इन महंतों को सरकार का भी समर्थन प्राप्त था। 1921 ई. में अकालियों के नेतृत्व में सिख जनता ने भ्रष्ट महंतों और सरकार के विरुद्ध एक शक्तिशाली सत्याग्रह आंदोलन छेड़ दिया। पहले सरकार ने इस आंदोलन को बलपूर्वक दबाने की कोशिश की, किंतु आंदोलन की प्रचंडता के कारण अंततः सरकार को झुकना पड़ा। 1922 ई. में सिख गुरुद्वारा अधिनियम पारित हुआ, जिसे 1925 में संशोधित किया गया। इस कानून की सहायता से और अधिकतर सीधी कार्रवाई द्वारा सिखों ने गुरुद्वारों से भ्रष्ट महंतों को धीरे-धीरे बाहर खदेड़ दिया, यद्यपि इस आंदोलन में सैकड़ों लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी।
उन्नीसवीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों के प्रभाव और प्रमुख प्रवृत्तियाँ
सामाजिक सुधार
न्नीसवीं सदी के सांस्कृतिक जागरण का प्रमुख प्रभाव सामाजिक सुधार के क्षेत्र में देखने को मिला। इसका कारण यह था कि भारतीय समाज के पिछड़ेपन की अनेक निशानियाँ, जैसे जातिप्रथा और स्त्रियों की असमानता, अतीत में धार्मिक मान्यताओं से समर्थित रही थीं। सामाजिक समानता तथा सभी व्यक्तियों की समान क्षमता के मानवतावादी आदर्शों से प्रेरित प्रायः सभी नवशिक्षित धर्म-सुधारकों ने समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों और कुप्रथाओं का विरोध किया। अब वे बुद्धिविरोधी और अमानवीय सामाजिक व्यवहारों को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे। शीघ्र ही समाज-सुधार, धार्मिक सुधार आंदोलनों का एक आवश्यक अंग बन गया।
उन्नीसवीं सदी में समाज-सुधार का कार्य धर्म-सुधार से जुड़ा था, किंतु बाद के वर्षों में यह अधिकाधिक धर्मनिरपेक्ष होता गया और रूढ़िवादी धार्मिक दृष्टिकोण वाले अनेक व्यक्तियों ने भी इसमें भाग लिया। आरंभ में समाज-सुधार बहुत कुछ उच्च जातियों के नवशिक्षित भारतीयों द्वारा अपने सामाजिक व्यवहार को आधुनिक पश्चिमी संस्कृति और मूल्यों के साथ तालमेल बिठाने के प्रयासों का परिणाम था। किंतु धीरे-धीरे इसका क्षेत्र व्यापक होकर समाज के निचले वर्गों तक फैल गया और यह सामाजिक क्षेत्र की पुनर्रचना करने लगा। 1919 ई. के बाद राष्ट्रीय आंदोलन समाज-सुधार का प्रचारक बन गया। सुधारकों ने जनता तक पहुँचने के लिए भारतीय भाषाओं का अधिकाधिक प्रयोग किया। उन्होंने अपने विचारों को प्रचारित करने के लिए उपन्यासों, नाटकों, कहानियों, कविताओं, लघुकथाओं, प्रेस और 1930 के दशक में फिल्मों का भी उपयोग किया। कालांतर में सुधारकों के विचारों और आदर्शों को लगभग सार्वभौमिक मान्यता मिली और आज वे भारतीय समाज का अभिन्न अंग हैं। समाज-सुधार आंदोलनों ने मुख्यतः दो लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास किया—पहला, स्त्रियों की मुक्ति और उन्हें समान अधिकार प्रदान करना तथा दूसरा, जातिप्रथा की जड़ताओं, विशेषकर अस्पृश्यता को समाप्त करना।
स्त्रियों की मुक्ति
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियाँ सदियों से पुरुषों की अधीनता और सामाजिक उत्पीड़न का शिकार रही हैं। पारंपरिक विचारधारा में पत्नी और माँ के रूप में स्त्री की प्रशंसा तो की गई, किंतु एक मानव के रूप में उसे अत्यंत निम्न सामाजिक स्थान दिया गया। लड़की का जन्म अपशकुन, उसका विवाह बोझ और वैधव्य शाप समझा जाता था। कई क्षेत्रों में लड़की के जन्म के साथ ही उसकी हत्या कर दी जाती थी। यदि लड़की बच भी जाती, तो उसे बाल विवाह की यातना झेलनी पड़ती थी। सामाजिक अपयश से बचने के लिए उसे जैसे-तैसे विवाह के नाम पर किसी के साथ बाँध दिया जाता था। उदाहरण के लिए, बंगाल में एक 80 वर्षीय ब्राह्मण के पास लगभग दो सौ पत्नियाँ थीं, जिनमें सबसे छोटी पत्नी केवल आठ वर्ष की थी। इसके बावजूद, यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती, तो उसे बलपूर्वक पति की चिता में जलने के लिए मजबूर किया जाता था। राममोहन रॉय ने इसे “शास्त्र की आड़ में हत्या” की संज्ञा दी। यदि कोई महिला सती होने से बच भी जाती या बचा ली जाती, तो उसे जीवन भर वैधव्य की यातनाएँ सहनी पड़ती थीं—अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा और मुसीबतों से भरी जिंदगी।
हिंदू स्त्री को उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं था और न ही वह अपने दुखमय वैवाहिक जीवन से छुटकारा पा सकती थी। मुस्लिम स्त्री को संपत्ति में अधिकार तो मिलता था, किंतु पुरुषों के अधिकार का केवल आधा और तलाक के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच सैद्धांतिक समानता नहीं थी। हिंदू और मुस्लिम स्त्रियों की सामाजिक स्थिति और सम्मान में भी समानता थी। इसके अलावा, दोनों ही सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पुरुषों पर पूरी तरह निर्भर थीं। अंतिम बात यह कि शिक्षा का लाभ उनमें से अधिकांश को प्राप्त नहीं था। साथ ही, स्त्री को अपनी दासता को स्वीकार करने, बल्कि इसे सम्मान का प्रतीक मानने का पाठ भी पढ़ाया जाता था। कभी-कभार रजिया सुल्तान, चाँद बीबी और अहिल्याबाई होल्कर जैसी स्त्रियाँ भी हुईं, किंतु इन्हें अपवाद ही माना जाना चाहिए और इससे स्त्रियों की सामान्य स्थिति में कोई अंतर नहीं आया।
उन्नीसवीं सदी के समाज-सुधारकों ने मानवतावादी और समानतावादी विचारों से प्रेरित होकर स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए एक शक्तिशाली आंदोलन शुरू किया। अनेक व्यक्तियों, धार्मिक संगठनों और सुधार समितियों ने स्त्रियों में शिक्षा के प्रसार, विधवाओं की स्थिति में सुधार, उनके पुनर्विवाह को प्रोत्साहन, कन्या-वध और बाल-विवाह को रोकने, स्त्रियों को पर्दे से बाहर लाने, एकपत्नी-प्रथा को प्रचलित करने और मध्यमवर्गीय स्त्रियों को व्यवसाय या सरकारी सेवा में जाने के योग्य बनाने के लिए कड़ा परिश्रम किया। 1880 के दशक में तत्कालीन वायसरॉय डफरिन की पत्नी लेडी डफरिन के नाम पर जब अस्पताल खोले गए, तो आधुनिक औषधियों और प्रसव की आधुनिक तकनीकों का लाभ भारतीय स्त्रियों को उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए।
सतीप्रथा की समाप्ति
भारतीय समाज में सतीप्रथा का उद्भव प्राचीन काल से माना जाता है और इसका पहला अभिलेखीय साक्ष्य 510 ई. के एरण अभिलेख में मिलता है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रथा हमेशा हिंदू जीवन के नियम की अपेक्षा एक अपवाद ही रही। मुगल काल में केवल मध्य भारत और राजस्थान के राजपूत राजघरानों में इस प्रथा का पालन होता था और दक्षिण में विजयनगर राज्य में इसका अनुसरण किया जाता था। ब्रिटिश काल में अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में इस प्रथा को उन क्षेत्रों में पुनः प्रारंभ किया गया, जहाँ ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत विकास की दर सबसे अधिक थी, जैसे राजधानी कलकत्ता और आसपास के जिलों में। वहाँ यह प्रथा न केवल सवर्ण जातियों में, बल्कि निचली और मझोली जातियों के उन किसान परिवारों में भी लोकप्रिय हुई, जो सामाजिक गतिशीलता प्राप्त कर चुके थे और श्रेष्ठतर जातियों की नकल करके अपनी सामाजिक स्थिति को वैध बनाना चाहते थे।
इसके पूर्व पंद्रहवीं शताब्दी में कश्मीर के शासक सिकंदर ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया था। भारत में मुगल बादशाह अकबर और औरंगज़ेब, पेशवाओं, जयपुर के राजा जयसिंह, पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क और ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ गवर्नर-जनरलों, जैसे लॉर्ड कॉर्नवॉलिस और लॉर्ड हेस्टिंग्स, ने इस कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में कुछ प्रयास किए थे।
राजा राममोहन रॉय ने अपने पत्र ‘संवाद कौमुदी’ के माध्यम से इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया। अंततः गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 1829 ई. के 17वें नियम के अनुसार बंगाल में विधवाओं को जीवित जलाने को अपराध घोषित कर दिया, जिसे उन्मूलन-विरोधी धर्मसभा द्वारा 1830 ई. में प्रिवी काउंसिल में दायर एक हिंदू याचिका भी रद्द नहीं कर सकी। बाद में इसे बंबई और मद्रास में भी लागू किया गया। यद्यपि इस प्रतिबंध के बाद सतीप्रथा में कमी आई, किंतु लोकमानस में सती के विचार और मिथक की जगह बनी रही, जिसे काव्यों, लोकगीतों और लोककथाओं के कारण बल मिलता रहा। अंततः 1987 में राजस्थान के देवराला गाँव में रूपकुँवर के बहुचर्चित सतीकांड के रूप में यह प्रथा एक बार फिर सामने आई।
कन्या वध की समाप्ति
पैदा होते ही लड़कियों की हत्या (कन्या वध) की कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए 1803 ई. में लॉर्ड वेलेजली ने बंगाल की खाड़ी के सागर द्वीप में शिशुबलि की धार्मिक प्रथा पर प्रतिबंध लगाया था। किंतु पश्चिमी और उत्तर भारत में नन्हीं बालिकाओं की हत्या की अल्पगोचर सामाजिक प्रथा अबाध गति से जारी रही। इन क्षेत्रों में अनुलोम विवाह के नियम का पालन करने वाले सवर्ण भूस्वामी परिवारों को अपनी बेटियों के लिए अच्छे वर ढूँढना या उनके लिए भारी दहेज देना कठिन लगता था, इसलिए वे जन्म के समय ही बेटियों की हत्या कर देते थे। अंग्रेज अधिकारी इस प्रथा को समाप्त करना चाहते थे, किंतु राजनीतिक कारणों से इसे 1870 ई. तक टाला गया। अंततः वायसरॉय की कौंसिल ने बालिका हत्या पर एक कानून पारित किया, जिसके अनुसार माता-पिता के लिए पुत्र या पुत्री के जन्म के तुरंत बाद नगरपालिकाओं के कार्यालय में उनके नाम का पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया। किंतु इसके बाद भी जनगणना अधिकारी बालिकाओं की घोर उपेक्षा की खबरें देते रहे। इसका परिणाम उनकी उच्च मृत्युदर था, जिसे न कानून पकड़ सकता था, न रोक सकता था।
स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन
समाज सुधारकों ने भारतीय समाज में फैली इस भ्रांति को दूर किया कि हिंदू शास्त्रों के अनुसार स्त्रियों को पढ़ने का अधिकार नहीं है और शिक्षित स्त्री को देवता वैधव्य का दंड देते हैं। यद्यपि हिंदू बालिकाओं के लिए पहली पाठशाला 1818 ई. में ईसाई मिशनरियों द्वारा कलकत्ता में ‘तरुणस्त्री सभा’ के रूप में शुरू की गई थी, किंतु बंबई में एलफिंस्टन संस्थान (1834 ई.) के विद्यार्थी स्त्री शिक्षा के अग्रदूत थे। उन्होंने पुस्तकालय और वैज्ञानिक सभा की स्थापना की। 1849 ई. में लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता में बेथुन स्कूल के सचिव के रूप में ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे लगभग 35 बालिका विद्यालयों से जुड़े थे। महात्मा ज्योतिबा फुले निचली जातियों की लड़कियों के लिए बालिका विद्यालय स्थापित करने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने 1848 ई. में, फिर 1851 ई. में अपनी पत्नी सावित्रीबाई के साथ पूना में एक बालिका स्कूल खोला। 1855 में ज्योतिबा ने रात्रि पाठशालाएँ खोलीं, जिनमें दिनभर काम करने वाले मजदूर, किसान और गृहणियाँ पढ़ने आती थीं। ज्योतिबा की पत्नी सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की प्रथम भारतीय महिला अध्यापिका बनीं, जो फुले के विद्यालय की पहली छात्रा थीं।
बाल विवाह पर प्रतिबंध
विद्यासागर के प्रयासों से बंगाल में 1860 ई. में आयु-संबंधी एक कानून पारित किया गया, जिसमें स्त्रियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 10 वर्ष निर्धारित की गई। बी. एम. मालाबारी और एस. एस. बंगाली के सहयोग से ब्रिटिश सरकार ने 1891 ई. में सम्मति आयु अधिनियम (एज ऑफ कंसेंट एक्ट) पारित किया। इस अधिनियम के अनुसार 12 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह पर रोक लगा दी गई। बाद में 1929 ई. में ‘शारदा अधिनियम’ द्वारा विवाह के लिए कन्या की न्यूनतम आयु 14 वर्ष और लड़के की 18 वर्ष निर्धारित की गई और बहुपत्नी प्रथा को समाप्त कर दिया गया। किंतु बाद के जनगणना आँकड़ों से पता चलता है कि ऊँची और निचली दोनों जातियों में बीसवीं सदी में भी बाल विवाह की प्रथा व्यापक स्तर पर प्रचलित रही।
विधवा पुनर्विवाह
कलकत्ता के ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने प्राचीन संस्कृत और वैदिक उद्धरणों से सिद्ध किया कि वेदों में विधवाओं के पुनर्विवाह की अनुमति दी गई है। उनके प्रयासों से 1856 ई. में ‘हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ (हिंदू विडोज रिमैरिज एक्ट) द्वारा विधवा विवाह को कानूनी मान्यता मिली। ईश्वरचंद्र की देखरेख में कलकत्ता में पहला विधवा पुनर्विवाह 7 दिसंबर 1856 ई. को संपन्न हुआ। किंतु यह कानून रूढ़िवादी था, क्योंकि पुनर्विवाह के बाद एक विधवा अपने स्वर्गीय पति की संपत्ति में भागीदार नहीं रहती थी। इस प्रकार इस कानून ने ब्राह्मणवादी नियमों का समर्थन किया, जो केवल पवित्र और साध्वी विधवाओं को पुरस्कृत करता था।
1866 ई. में विष्णुशास्त्री पंडित ने विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देने के लिए एक संगठन बनाया। विधवाओं की सहायता करने के लिए शशिपद बनर्जी ने भी 1887 ई. में कलकत्ता में एक संस्था स्थापित की। इसके अलावा, सर गंगाराम ने लाहौर में ‘विधवा विवाह सहायक सभा’ की स्थापना की। डॉ. धोंडो केशव कर्वे ने 1893 ई. में स्वयं एक विधवा से विवाह किया और उच्च वर्ग की विधवाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने तथा आत्मनिर्भर बनाने के लिए 1899 ई. में पूना में एक विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम स्थापित किया। कर्वे के प्रयासों से ही 1916 ई. में बंबई में भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। किंतु लगता है कि विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का प्रभाव सीमित रहा, क्योंकि सदी के अंत तक केवल 48 विधवाओं ने पुनर्विवाह किया और इनमें भी दंपतियों को सामाजिक दबाव और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। फिर भी, कुछ यशस्वी विधवाएँ भी हुईं, जैसे—रमाबाई पंडिता, जिन्होंने ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध किया, बंबई में विधवाओं के लिए ‘शारदा सदन’ की स्थापना की और महाराष्ट्र के सार्वजनिक जीवन पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।
दास प्रथा का अंत
भारत में यूनानी, रोमन अथवा अमेरिकी नीग्रो प्रकार की दासता का प्रचलन नहीं था। भारतीय दासों की स्थिति प्रायः बंधुआ मजदूरों जैसी थी और उनके साथ अपेक्षाकृत अधिक मानवीय व्यवहार किया जाता था। उत्तर भारत में दास प्रायः घरेलू कार्यों में तथा दक्षिण भारत में कृषि कार्यों में लगाए जाते थे। यद्यपि यूरोपीय लोगों द्वारा भारतीय दासों के साथ कई बार यूरोप में प्रचलित दासता जैसी कठोरता और निर्दयता का व्यवहार किया जाता था।
ब्रिटेन में 1833 ई. में दास प्रथा के उन्मूलन का कानून पारित हो चुका था। भारत में भी उपनिवेशी प्रशासकों को दासता के विभिन्न रूपों के अस्तित्व का निरंतर पता चलता रहा। इसी संदर्भ में 1833 ई. के चार्टर अधिनियम में भारत सरकार को दास प्रथा के उन्मूलन की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया गया। इसके अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि भारत में दासता को यथाशीघ्र समाप्त किया जाए। अंततः 1843 ई. में भारत में दासता को कानूनी रूप से अवैध घोषित कर दिया गया। दास-मालिकों को किसी प्रकार का प्रतिकर दिए बिना दासों को स्वतंत्र घोषित किया गया। हालांकि, भारत में दासता के स्वरूप और उसकी सामाजिक परिस्थितियाँ क्षेत्र-विशेष के अनुसार भिन्न थीं, इसलिए केवल कानूनी प्रतिबंधों से इसका प्रभावी उन्मूलन संभव नहीं हो सका। जाति-व्यवस्था, स्थानीय रीति-रिवाजों तथा कर्जदारी जैसी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण अनेक खेतिहर मजदूर लंबे समय तक भूस्वामियों के बंधन में बने रहे। इस प्रकार 1843 ई. के कानूनी निषेध के बावजूद, दासता अथवा बंधुआ श्रम के कुछ रूप सामाजिक और आर्थिक संबंधों के माध्यम से लंबे समय तक अस्तित्व में बने रहे।
स्त्री उद्धार आंदोलन
बीसवीं सदी में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के साथ स्त्री उद्धार आंदोलन को भी पर्याप्त बल मिला। भारतीय स्त्रियों की जागृति और मुक्ति के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने सक्रिय और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंग-भंग विरोधी आंदोलन और होमरूल आंदोलन में स्त्रियों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। 1918 ई. के बाद वे राजनीतिक जुलूसों में शामिल होने लगीं, विदेशी वस्त्रों और शराब की दुकानों पर धरना देने लगीं और खादी बुनने तथा उसके प्रचार का कार्य करने लगीं। ट्रेड यूनियनों और किसान आंदोलनों के दौरान स्त्रियाँ पहली पंक्ति में दिखाई दीं और क्रांतिकारी राष्ट्रवादी आंदोलनों में भी उनकी सक्रिय उपस्थिति रही। इसके अलावा, वे विधानमंडलों के चुनाव में मतदान करने और उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने लगीं। 1937 ई. में गठित कांग्रेसी सरकारों में कई स्त्रियाँ मंत्री या संसदीय सचिव बनीं और सैकड़ों महिलाएँ स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में सदस्य चुनी गईं। अब जेल जाने या गोली खाने वाली स्त्रियों को ‘दासी’ या ‘गुड़िया’ कहकर घरों में कैद करना संभव नहीं था।
भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी के ‘मैटरनिटी एंड चाइल्ड वेलफेयर ब्यूरो’, ‘इंडियन विमेन्स एसोसिएशन’ (1917 ई.) और दिल्ली में ‘लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज’ (1916 ई.) की स्थापना स्त्रियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रतीक थी। 1920 ई. के बाद आत्म-चेतन और आत्मविश्वास प्राप्त स्त्रियों ने स्वयं कई संस्थाएँ और संगठन स्थापित किए। 1927 ई. में स्थापित ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ (ऑल इंडिया वुमेन्स कॉन्फ्रेंस) इसी जागरूकता का परिणाम था।
स्त्री और पुरुष की समानता की गारंटी
स्वतंत्रता के बाद स्त्रियों के समानता के संघर्ष में तेजी आई। भारतीय संविधान (1950 ई.) की धाराएँ 14 और 15 में स्त्री और पुरुष की समानता की गारंटी दी गई। 1955 ई. के हिंदू विवाह अधिनियम में कुछ विशिष्ट आधारों पर विवाह संबंध भंग करने की छूट दी गई। स्त्री और पुरुष दोनों के लिए एक विवाह अनिवार्य किया गया। 1956 ई. के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में पिता की संपत्ति में पुत्री को पुत्रों के बराबर अधिकार दिया गया। इसके साथ ही बहुविवाह और दहेज प्रथा को भी प्रतिबंधित किया गया। यद्यपि दहेज लेने और देने पर प्रतिबंध है, किंतु दहेज प्रथा आज भी प्रचलित है। संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत शामिल किया गया। इन सबके बावजूद, समानता के सिद्धांत को व्यवहार में लागू करने में अनेक बाधाएँ हैं।
जातिप्रथा का विरोध और अस्पृश्यता निवारण
समाज सुधार आंदोलन का एक प्रमुख निशाना जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता थी। वैदिक काल से ही भारतीय समाज चार मुख्य वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—में विभाजित रहा है। व्यावसायिक समूहों के रूप में जातियाँ, जिनकी संख्या आधुनिक भारत में 3,000 से अधिक है, वर्णों के साथ-साथ उभरीं और अक्सर पेशेवर विशेषीकरण के आधार पर आगे और भी विभाजित होती थीं। जातियों को बड़ी चालाकी से पदानुक्रम में ऊँचे-नीचे दर्जे में रखा गया है, ताकि शोषित जातियाँ कभी संगठित न हो सकें। इस सामाजिक व्यवस्था में सबसे नीचे अछूत (अस्पृश्य) थे। इन अछूतों पर अनेक कठोर निर्योग्यताएँ और प्रतिबंध थोपे गए थे, जो विभिन्न जगहों पर भिन्न-भिन्न थे। इस सामाजिक वर्गीकरण की सफलता मुख्यतः इसकी संरचना और अंशतः दैवी-स्वीकृति में निहित रही है।
देश के कुछ भागों, विशेषकर दक्षिण में, लोग अछूतों की छाया से बचते थे। उनके खाने, पहनने और रहने के स्थान पर भी कड़े प्रतिबंध थे। वे ऊँची जातियों के कुओं और तालाबों से पानी नहीं ले सकते थे। अछूतों के लिए कुछ तालाब और कुएँ निश्चित थे और जहाँ ऐसे कुएँ और तालाब नहीं थे, वहाँ उन्हें पोखरों और सिंचाई की नालियों का गंदा पानी पीना पड़ता था। उनके लिए हिंदू मंदिरों में प्रवेश और शास्त्रों का अध्ययन प्रतिबंधित था। उनके बच्चे ऊँची जातियों के स्कूलों में नहीं जा सकते थे। पुलिस और सेना जैसी सरकारी नौकरियाँ उनके लिए नहीं थीं। अछूतों को अपवित्र माने जाने वाले कार्य, जैसे झाड़ू-बुहारू, जूते बनाना, मुर्दे उठाना, मृत पशुओं की खाल निकालना, खालों तथा चमड़ों को पकाना-कमाना आदि करने होते थे। वे जमीन के मालिक नहीं हो सकते थे और उनमें से कई को बँटाईदारी या खेत-मजदूरी करनी पड़ती थी।
चूँकि जातिप्रथा और अस्पृश्यता दोनों ही अपमानजनक, अमानवीय और जन्मजात असमानता के जनविरोधी सिद्धांतों पर आधारित थीं, इसलिए आधुनिक शिक्षित समाज सुधारकों ने अनुभव किया कि राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में प्रगति तब तक संभव नहीं है, जब तक लाखों लोग सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार से वंचित हैं। यद्यपि कुछ ने चातुर्वर्ण व्यवस्था की वकालत की, किंतु उन्होंने भी जातिप्रथा, विशेषकर अस्पृश्यता, की निंदा की।
छुआछूत विरोधी संघर्ष
अनेक सुधारकों और संगठनों ने अछूतों के लिए स्कूलों और मंदिरों के दरवाजे खुलवाने, सार्वजनिक कुओं और तालाबों से पानी भरने का अधिकार दिलाने तथा उन्हें उत्पीड़ित करने वाली सामाजिक निर्योग्यताओं और भेदभाव को समाप्त करने के प्रयास किए। नवजागरण और आधुनिक शिक्षा के व्यापक प्रसार के फलस्वरूप शूद्रों और हाशिये पर रहने वाले अछूतों में अपने मूल मानवाधिकारों के प्रति चेतना जागी और वे स्वयं ऊँची जातियों के परंपरागत उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होने लगे।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में ज्योतिबा फुले से प्रभावित कोल्हापुर के शाहूजी महाराज (1874–1922 ई.) ने मराठों, मातंगों, महारों और चमारों के उत्थान के लिए 26 जुलाई 1902 ई. को कोल्हापुर राज्य की सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत स्थान अछूतों के लिए आरक्षित कर सामाजिक क्रांति की शुरुआत की। उन्होंने अपने राज्य में ‘महार वतन समाप्ति अधिनियम’ (1918 ई.) पारित किया और अक्टूबर 1919 ई. में एक कानून द्वारा स्कूलों में अछूतों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त किया। महाराष्ट्र में एस. एम. माटे ने 1917 ई. में पुणे में अछूतोद्धार के लिए कई विद्यालय खोले और उनके जीवन स्तर में सुधार लाने के प्रयास किए।
समाज सुधार के एक मुद्दे के रूप में छुआछूत का प्रश्न बीसवीं सदी में प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत के सार्वजनिक जीवन में महात्मा गांधी के उदय के साथ प्रमुखता से सामने आया। 1928 ई. में कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि जातिप्रथा हिंदू समाज के एकीकरण में बहुत बड़ी बाधा है, इसलिए इसे समाप्त किया जाना चाहिए। गांधीजी ने 1932 ई. में हरिजनोद्धार के लिए ‘अखिल भारतीय हरिजन संघ’ की स्थापना की और पूरे देश में अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रचार किया। उनका अस्पृश्यता-उन्मूलन आंदोलन मानवतावाद और बुद्धिवाद पर आधारित था।
डॉ. भीमराव आंबेडकर, जो स्वयं महाराष्ट्र की एक अछूत महार जाति से थे, ने अपना पूरा जीवन जातिगत अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष को समर्पित कर दिया। दक्षिण भारत में ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ जैसे गैर-ब्राह्मणों ने ब्राह्मणों द्वारा थोपी गई निर्योग्यताओं के विरुद्ध 1920 के दशक में ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ चलाया और पूरे भारत में मंदिरों में अछूतों के प्रवेश तथा अन्य प्रतिबंधों के खिलाफ कई सत्याग्रह आंदोलन चलाए।
फिर भी, छुआछूत विरोधी संघर्ष विदेशी शासन में पूरी तरह सफल नहीं हो सका। अंततः भारतीय संविधान ने छुआछूत की समाप्ति के लिए एक कानूनी आधार तैयार किया और घोषणा की कि अस्पृश्यता समाप्त कर दी गई है तथा किसी भी रूप में इसका पालन निषिद्ध है। छुआछूत के आधार पर किसी पर कोई निर्योग्यता थोपना अपराध होगा, जिसके लिए कानून के अनुसार दंड दिया जाएगा।
सुधार आंदोलन की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
सकारात्मक प्रवृत्तियाँ
बुद्धिवाद और मानवतावाद
आधुनिक युग के प्रायः सभी सुधार आंदोलन बुद्धिवाद और मानवतावाद के सिद्धांतों पर आधारित थे, यद्यपि कभी-कभी वे जनमानस को आकर्षित करने के लिए आस्था और प्राचीन ग्रंथों का सहारा लेते थे। इन आंदोलनों ने उभरते मध्यम वर्ग और आधुनिक शिक्षित प्रबुद्ध लोगों को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित किया। इन आंदोलनों ने बुद्धि-विरोधी धार्मिक अंधश्रद्धा से मानव-बुद्धि की तर्क-विचार क्षमता को मुक्त करने का प्रयास किया और भारतीय धर्मों के कर्मकांडी, अंधविश्वासी, बुद्धिविरोधी और पुराणपंथी पक्षों का विरोध किया। प्रायः सभी सुधारकों ने धर्म को अंतिम सत्य का भंडार मानने से इनकार कर दिया और किसी भी धर्म या उसके ग्रंथों में उपस्थित सत्य को तर्क, बुद्धि और विज्ञान की कसौटी पर परखा।
कुछ सुधारकों ने परंपरा का सहारा लिया और दावा किया कि वे केवल अतीत के वास्तविक सिद्धांतों, मान्यताओं और व्यवहारों का पुनरुत्थान कर रहे हैं, किंतु यथार्थ में अतीत का पुनरुत्थान नहीं किया जा सका। अतीत के बारे में भी सबकी समझ एक जैसी नहीं थी। अतीत का सहारा लेने से जो समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, उनका वर्णन रानाडे ने किया है, यद्यपि वे स्वयं कभी-कभी जनता से आग्रह करते थे कि वह अतीत की श्रेष्ठ परंपराओं का पुनरुत्थान करे। वे लिखते हैं: “पुनर्जीवित हम करें तो क्या? क्या हम जनता की पुरानी आदतों को पुनर्जीवित करें, जब हमारी जातियों में सबसे पवित्र जाति भी पशु के माँस और नशीली शराब का सेवन करती थी, जिन्हें हम आज घृणित समझते हैं? क्या हम पुत्रों की बारह श्रेणियों या आठ प्रकार के विवाहों को पुनर्जीवित करें, जिसमें राक्षस विवाह भी शामिल था और जो मुक्त तथा अवैध यौन संबंध को मान्यता देता था? क्या हम प्रतिवर्ष होने वाले शतमेध को पुनर्जीवित करें, जिसमें मनुष्यों तक का देवताओं के समक्ष बलिदान दिया जाता था? क्या हम सती या शिशुहत्या की प्रथाओं को पुनर्जीवित करें?”
अंततः रानाडे मानते हैं कि समाज एक निरंतर परिवर्तनशील जीवित सत्ता है और कभी अतीत की ओर लौट नहीं सकता। उन्होंने लिखा: “मृत तथा दफनाए या जलाए जा चुके लोग हमेशा के लिए मृत, दफनाए या जलाए जा चुके हैं और इसलिए मुर्दा अतीत को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।”
अतीत का नाम लेने वाले प्रत्येक सुधारक ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की कि वह उनके द्वारा सुझाए गए सुधारों के अनुरूप लगे। सुधार और उनके दृष्टिकोण प्रायः नवीन होते थे और अतीत के आधार पर उनको केवल उचित ठहराया जाता था। अनेक विचार, जो आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान से मेल खाते थे, प्रक्षिप्तांश या गलत व्याख्या का परिणाम बताए गए। परिणामतः रूढ़िवादी वर्ग का इन सुधारकों से टकराव होना स्वाभाविक था। यही कारण है कि आरंभिक चरण के सुधारक धार्मिक और सामाजिक विद्रोहियों के रूप में सामने आए। उदाहरण के लिए, स्वामी दयानंद की हत्या के लिए भाड़े पर हत्यारे लिए गए, उनके भाषणों और वाद-विवादों के दौरान उन पर निषिद्ध वस्तुएँ फेंकी गईं और उन्हें ‘ईसाइयों का भाड़े का प्रचारक’, ‘धर्मविरोधी’, ‘नास्तिक’ आदि कहा गया। इसी तरह सैयद अहमद खाँ को भी परंपरावादियों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। उन्हें गालियाँ दी गईं, उनके विरुद्ध फतवे जारी किए गए और जान से मारने की धमकियाँ तक दी गईं।
धार्मिक सुधार आंदोलनों के मानवतावादी चरित्र की अभिव्यक्ति पुरोहितवाद और कर्मकांड पर उनके हमलों तथा मानव कल्याण और बुद्धि की दृष्टि से धर्मग्रंथों की व्याख्या करने के व्यक्ति के अधिकार पर दिए गए जोर में हुई। सुधार आंदोलनों के मानवतावाद की एक विशेषता नई मानवतावादी नैतिकता थी, जिसमें यह धारणा शामिल थी कि मानवता प्रगति कर सकती है, करती रही है और अंततः वे ही मूल्य नैतिक हैं, जो मानव-प्रगति में सहायक हों।
यद्यपि सुधारकों ने अपने-अपने धर्मों में सुधार लाने का प्रयास किया, किंतु उनका सामान्य दृष्टिकोण सार्वभौमिकतावादी था। राममोहन रॉय विभिन्न धर्मों को एक ही सर्वव्यापी ईश्वर और धार्मिक सत्य के विशिष्ट रूप मानते थे। सैयद अहमद खाँ के अनुसार सभी पैगंबरों का एक ही धर्म या दीन था और अल्लाह ने हर कौम को अपना एक पैगंबर भेजा है। इसी बात को केशवचंद्र सेन इस प्रकार कहते हैं: “हमारा मत यह नहीं है कि सत्य सभी धर्मों में पाए जाते हैं, बल्कि यह है कि सभी स्थापित धर्म सत्य हैं।”
भारतीयों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में वृद्धि
सुधार आंदोलनों ने शुद्ध रूप से धार्मिक विचारों के अलावा भारतीयों के आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और अपने देश पर गर्व को बढ़ाया। धार्मिक अतीत की आधुनिक बुद्धिवादी व्याख्या करके सुधारकों ने भारतीयों को अंग्रेजों के इस व्यंग्य का जवाब देने के योग्य बनाया कि ‘यहाँ के धर्म और समाज पतनशील और हीन हैं।’ इन सुधार आंदोलनों ने अनेक भारतीयों को आधुनिक विश्व से सामंजस्य बिठाने के योग्य बनाया। सुधारकों ने पुराने धर्मों को एक नए आधुनिक साँचे में ढालकर उन्हें समाज के नए वर्गों की नवीन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया, जिससे भारतीय अतीत पर गर्व करते हुए भी आधुनिक विश्व और आधुनिक विज्ञान की मूलभूत श्रेष्ठता को स्वीकार कर सकें।
धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रीय दृष्टिकोण
कुछ सुधारकों ने दावा किया कि वे केवल मूल और प्राचीनतम धर्मग्रंथों का सहारा ले रहे हैं और इन ग्रंथों की उन्होंने समुचित व्याख्या भी की। सुधारमूलक दृष्टिकोण के फलस्वरूप अनेक भारतीय जाति-धर्म के संकुचित दृष्टिकोण के स्थान पर एक आधुनिक, इहलौकिक, धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाने लगे, किंतु पहले के संकुचित दृष्टिकोण पूरी तरह समाप्त नहीं हो सके। इसके अलावा, अब अधिक संख्या में लोग भाग्यवादिता और अगले जन्म में सुधार की आशा को छोड़कर इस जीवन में भौतिक और सांस्कृतिक कल्याण की बात सोचने लगे। इन आंदोलनों ने शेष विश्व से भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक अलगाव को कुछ हद तक समाप्त किया और विश्वव्यापी विचारों में भारतीयों को भागीदार बनाया। किंतु साथ ही, हर बात पर आँख मूँदकर पश्चिम की नकल करने वालों की खुलकर आलोचना भी की गई।
उपनिवेशीकरण के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष
परंपरागत धर्मों और संस्कृति के पिछड़े तत्त्वों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने और आधुनिक संस्कृति के सकारात्मक तत्त्वों का स्वागत करने के बावजूद अधिकांश सुधारकों ने पश्चिम की अंधी नकल का विरोध किया और भारतीय संस्कृति व विचार-परंपरा के उपनिवेशीकरण के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष चलाया। कुछ लोग आधुनिकीकरण की दिशा में बहुत आगे निकल गए और संस्कृति-संबंधी उपनिवेशवाद को प्रोत्साहित करने लगे। एक ऐसा वर्ग भी था, जो परंपरागत विचारों, संस्कृति और संस्थाओं का पक्षधर था और उनका गौरवगान करता था, किंतु वह आधुनिक विचारों और संस्कृति के समावेश का विरोधी था। कुछ ऐसे श्रेष्ठ सुधारक भी थे, जिन्होंने हिंदू परंपरा के मूल को सुरक्षित रखते हुए उसे पश्चिमी आधुनिकता के अनुसार ढालने का कार्य किया।
नकारात्मक प्रवृत्तियाँ
नगरीय उच्च और मध्य वर्ग तक सीमित
आधुनिक भारत का यह सुधारवादी आंदोलन अपनी व्यापकता के बावजूद कुछ निश्चित सीमाओं में ही रहा। ये आंदोलन समाज के एक छोटे से हिस्से, अर्थात् नगरीय उच्च और मध्य वर्ग तक सीमित थे, क्योंकि सुधार की भावना केवल एक छोटे कुलीन समूह को प्रभावित करती थी, जो मुख्यतः उपनिवेशी शासन के आर्थिक और सामाजिक लाभार्थियों का समूह था। बंगाल का सुधार आंदोलन पश्चिमी शिक्षा प्राप्त कुलीनों की एक छोटी संख्या तक सीमित था, जिन्हें ‘भद्रलोक’ कहा जाता था। सामाजिक दृष्टि से वे अधिकतर हिंदू थे और यद्यपि जाति इस कुलीन समूह की सदस्यता का प्रमुख आधार नहीं थी, फिर भी वे अधिकतर तीन ऊँची जातियों—ब्राह्मण, कायस्थ और वैश्य—के सदस्य थे। ब्रह्म समाज को लगभग पूरी तरह इन्हीं समूहों का संरक्षण प्राप्त था और यद्यपि यह कलकत्ता के छोटे कस्बों और अन्य प्रांतों तक फैला, फिर भी यह जनता से कटा रहा।
रहस्यवाद और अवैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा
सुधारकों ने सुधार को कभी जनता तक ले जाने की कोशिश नहीं की और सुधार की भाषा, जैसे राममोहन रॉय का गद्य, जो ठेठ संस्कृतनिष्ठ बंगला था, अशिक्षित किसानों और दस्तकारों की समझ से परे थी। इसी तरह पश्चिमी भारत में प्रार्थना समाज के सदस्य पश्चिमी शिक्षा प्राप्त चितपावन और सारस्वत ब्राह्मण, कुछ गुजराती सौदागर और पारसी समुदाय के लोग थे। 1872 ई. में इस समाज के केवल 68 सदस्य और लगभग 150–200 समर्थक थे। मद्रास प्रेसीडेंसी में, जहाँ अंग्रेजी शिक्षा की प्रगति बहुत धीमी थी और ब्राह्मणों का जातिगत वर्चस्व अप्रभावित रहा, सुधार के विचार और भी देर से पहुँचे। इस प्रकार सुधार आंदोलन बहुसंख्यक किसानों और नगरों की गरीब जनता तक नहीं पहुँच सके, जिसके कारण वे परंपरागत रीति-रिवाजों में ही जकड़े रहे। दूसरी ओर, पीछे घूमकर अतीत की महानता का गुणगान करने और धर्मग्रंथों को आधार बनाने की प्रवृत्ति ने मानव-बुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की श्रेष्ठता को नुकसान पहुँचाया। अतीत की महानता के गुणगान ने एक झूठा गर्व और दंभ पैदा किया, जिससे नए रूपों में रहस्यवाद और नकली वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा मिला। अतीत में ‘स्वर्णयुग’ पाने की इच्छा के कारण आधुनिक विज्ञान को पूरी तरह अपनाया नहीं जा सका और वर्तमान को सुधारने के कार्य में बाधा उत्पन्न हुई।
अलगाववादी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन
सुधार आंदोलनों का सबसे प्रतिगामी तथ्य यह रहा कि इससे हिंदू, मुसलमान, सिख और पारसी अलगाव के शिकार होने लगे। ऊँची और निचली जातियों के हिंदुओं में भी दरार पड़ने लगी। विविध धर्मों वाले इस देश में धर्म पर अधिक जोर देने से अलगाव की प्रवृत्ति बढ़ना स्वाभाविक था। अनेक सुधारकों ने भारतीय संस्कृति के उन धार्मिक-दार्शनिक पक्षों पर एकतरफा जोर दिया, जो सभी लोगों की साझी संपत्ति भी नहीं थे। दूसरी ओर, कला, साहित्य, संगीत, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे पक्षों पर जोर नहीं दिया गया, जिनके विकास में जनता के सभी वर्गों की बराबर भूमिका थी। प्रायः हर हिंदू सुधारक ने भारतीय अतीत के गुणगान को प्राचीनकाल तक सीमित रखा और भारतीय इतिहास के मध्यकाल को ‘पतन का काल’ बताया। यह विचार न केवल अनैतिहासिक था, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से हानिकारक भी था। इससे दो कौमों की धारणा पैदा हुई। इसी तरह, प्राचीनकाल और प्राचीन धर्मों की अनौपचारिक प्रशंसा को निचली जातियों के लोग भी पचा नहीं सके, जो सदियों से उसी विध्वंसक जातिप्रथा के दमन के शिकार थे, जो ठीक उसी प्राचीन काल की उपज थी।
अतीत को देखने और उसकी उत्कृष्टता की दुहाई देने का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अतीत की सभी भौतिक-सांस्कृतिक उपलब्धियाँ कुछ लोगों की संपत्ति बनकर रह गईं। अतीत में ‘स्वर्णयुग’ खोजने की इस लालसा ने हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों को आपस में बाँट दिया। यही नहीं, ऊँची जाति के हिंदू निम्न जाति के हिंदुओं से अलग-थलग पड़ गए, जिससे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को भारी क्षति उठानी पड़ी। जब अतीत भी अनेक खंडों में विभाजित होने लगा, तो मुस्लिम मध्यवर्ग ने अपनी परंपरा और धरोहर को पश्चिमी एशिया के इतिहास में खोजना शुरू कर दिया। हिंदू, मुस्लिम, सिख और पारसी, तथा बाद में निचली जाति के हिंदू, सभी सुधार आंदोलनों से प्रभावित हुए थे, किंतु अब वे एक-दूसरे से कटने लगे। इन सबसे अलग, परंपरागत रीति-रिवाजों को मानने वाले हिंदुओं और मुसलमानों में आपसी भाईचारा बना रहा और वे अपने-अपने कर्मकांडों का पालन करते रहे।
इस प्रकार सदियों से चली आ रही एक समन्वित संस्कृति के विकास की प्रक्रिया में कुछ व्यवधान पड़ा, यद्यपि अन्य क्षेत्रों में भारतीय जनता के राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। इस प्रवृत्ति का दुष्परिणाम तब सामने आया, जब मध्यम वर्गों में राष्ट्रीय चेतना के तीव्र विकास के साथ-साथ एक नवीन चेतना, सांप्रदायिक चेतना, भी विकसित होने लगी। आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता के विकास के अनेक दूसरे कारण भी थे, परंतु अपनी प्रकृति के कारण धर्म सुधार आंदोलनों ने निश्चय ही इसके विकास में कुछ योगदान दिया।
सुधार आंदोलनों का मूल्यांकन
कुछ इतिहासकारों ने राष्ट्रीय जागरण और सुधार आंदोलनों को ‘भारतीय पुनर्जागरण’ कहा है। उनके अनुसार इन आंदोलनों में बुद्धिवाद, विज्ञान और मानवतावाद जैसे कई तत्त्व मौजूद थे, जो यूरोपीय पुनर्जागरण में विद्यमान थे। किंतु इन आंदोलनों का दृष्टिकोण छद्मवैज्ञानिकता पर आधारित था और मानवतावाद का व्यावहारिक पक्ष बहुत संकुचित था। इसके अलावा, इसमें यूरोपीय पुनर्जागरण के कई तत्त्व, जैसे भौगोलिक खोजें, वैज्ञानिक आविष्कार और कला व साहित्य में अभूतपूर्व प्रगति, का अभाव था। इसलिए इसे पुनर्जागरण नहीं माना जा सकता। सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में इसे ‘सांस्कृतिक जागरण’ कहा जा सकता है।
यह भारत का आधुनिकीकरण भी नहीं था, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं। यद्यपि इसके मूल में बुद्धिवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे आधुनिक विचार थे, जो हर जगह आधुनिकता के वाहक रहे हैं, किंतु भारत में यह पश्चिमीकरण से अधिक कुछ नहीं था। संपूर्ण समाज के स्तर पर सुधारों के परिणामस्वरूप कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आया। आंदोलन का स्वरूप मध्यमवर्गीय बना रहा और इसका कार्यक्षेत्र मुख्यतः शहरों के शिक्षित मध्यम वर्ग तक सीमित रहा। कुल मिलाकर यह सांस्कृतिक जागरण छद्मवैज्ञानिकता का पोषक और बहुत हद तक रूढ़िवादी था।
इस कथित पुनर्जागरण काल का कोई भी आंदोलन धर्म से ऊपर नहीं उठ सका। प्रायः सभी आंदोलनों की समस्याएँ अलग-अलग थीं और सुधारक स्वयं अपने-अपने धर्म की परंपरागत मान्यताओं से पूरी तरह मुक्त नहीं थे। इन आंदोलनों का सबसे बड़ा दोष यह था कि वे अतीत, वेद या कुरान से प्रेरणा ले रहे थे। यह न केवल गैर-वैज्ञानिक था, बल्कि गैर-ऐतिहासिक भी था। इस अतीत में मध्यकाल की उपलब्धियाँ शामिल नहीं थीं, फलतः अतीत के इस गौरवगान में देश के मुसलमान शामिल नहीं हुए। मुसलमानों में सुधार आंदोलनों का आदर्श कुरान था, जो गैर-मुसलमान भारतीयों को प्रेरणा नहीं दे सकता था। इन आंदोलनों की धर्म पर निर्भरता से समाज में संकीर्णता और कट्टरता आई, जो बाद में हानिकारक साबित हुई। इस प्रकार यह आंदोलन अपनी संकीर्णता, धर्मसापेक्ष दृष्टिकोण, सैद्धांतिक अंतर्विरोध और ऐतिहासिक संदर्भ में सामाजिक पृष्ठभूमि की यथोचित समझ के अभाव में अपने उद्देश्यों में अपेक्षित सफलता नहीं पा सका।
फिर भी, इन सुधार आंदोलनों के कारण भारत पश्चिम के आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और विचारों के संपर्क में आया, जिससे भारतीयों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ। पाश्चात्य सभ्यता, विचारधारा और अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीय समाज की जड़ता को समाप्त किया और धर्म, राजनीति तथा सामाजिक सिद्धांतों को बुद्धि और तर्क की कसौटी पर कसना सिखाया। यह सांस्कृतिक जागरण का ही परिणाम था कि स्वामी विवेकानंद जैसे विचारकों ने भारतीय आध्यात्मवाद को अमेरिका और यूरोप तक पहुँचाया। इन सुधारवादी आंदोलनों द्वारा तैयार की गई पृष्ठभूमि पर ही भारत में राष्ट्रीयता की भावना का उदय और विकास हुआ। प्रायः सभी सुधारक राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत थे और उनका मानना था कि स्वतंत्रता से श्रेष्ठ कुछ नहीं है। एक प्रकार से ये आंदोलन कम, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के लिए संघर्ष अधिक थे और इनका चरम लक्ष्य राष्ट्रवाद था।


