पश्चिमी भारत में सुधार आंदोलन
मुख्य लेख : उन्नीसवीं सदी में भारतीय सांस्कृतिक जागरण
उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों का विकास हुआ। पश्चिमी भारत — विशेष रूप से बंबई प्रेसीडेंसी, गुजरात और महाराष्ट्र — भी इस नवजागरण से अछूता नहीं रहा। यहाँ सामाजिक सुधार की प्रक्रिया बंगाल की तुलना में कुछ भिन्न परिस्थितियों में विकसित हुई। पश्चिमी भारत के शिक्षित वर्ग पर एक ओर अंग्रेजी शिक्षा, आधुनिक विज्ञान, उदारवाद और यूरोपीय विचारों का प्रभाव पड़ा, तो दूसरी ओर उन्होंने भारतीय परंपरा और प्राचीन संस्कृत साहित्य का पुनर्मूल्यांकन भी किया।
पश्चिमी भारत में सुधारवादी चेतना मुख्यतः दो प्रवृत्तियों के माध्यम से विकसित हुई। पहली प्रवृत्ति ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन, सम्पादन, अनुवाद और व्याख्या के द्वारा भारतीय संस्कृति की बौद्धिक एवं नैतिक उपलब्धियों को सामने लाने का प्रयास किया। दूसरी प्रवृत्ति ने सामाजिक कुरीतियों पर प्रत्यक्ष प्रहार करते हुए जाति-भेद, स्त्रियों की दयनीय स्थिति, विधवा-पुनर्विवाह पर प्रतिबंध और महिला-शिक्षा जैसे प्रश्नों को सुधार आंदोलन के केंद्र में रखा।
प्राच्यवादी और बौद्धिक दृष्टिकोण
पश्चिमी भारत में सुधार आंदोलन की एक महत्त्वपूर्ण धारा प्राच्यवादी दृष्टिकोण से जुड़ी थी। इस धारा के विद्वानों ने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का गम्भीर अध्ययन कर भारतीय सभ्यता की उपलब्धियों को आधुनिक समाज के सामने प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य केवल अतीत का गौरवगान करना नहीं था, बल्कि भारतीय परंपरा के भीतर विद्यमान तर्कपूर्ण, नैतिक और मानवीय विचारों की खोज करना भी था। उनका मत था कि सामाजिक सुधार के लिए भारतीय समाज को अपनी परंपरा का आलोचनात्मक अध्ययन करना चाहिए और उसमें निहित उपयोगी तत्त्वों को आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनाना चाहिए। इस दिशा में के. टी. तेलंग, बी. एन. मांडलिक और विशेष रूप से प्रोफेसर आर. जी. भंडारकर का योगदान उल्लेखनीय था।
आर. जी. भंडारकर (1837–1925 ई.)
रामकृष्ण गोपाल भंडारकर पश्चिमी भारत के प्रमुख प्राच्यविद्, इतिहासकार, संस्कृतज्ञ, भाषाविद् और समाज-सुधारक थे तथा प्रार्थना समाज के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उनका जन्म 6 जुलाई 1837 ई. को रत्नागिरि जिले के मालवन में हुआ था। उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज, बंबई में अध्ययन किया और बंबई विश्वविद्यालय के आरंभिक स्नातकों में उनका स्थान था।
भंडारकर ने प्राचीन भारतीय इतिहास, धर्म, संस्कृत साहित्य और भाषाओं का वैज्ञानिक, आलोचनात्मक तथा साक्ष्य-आधारित अध्ययन किया। उन्होंने शिलालेखों, सिक्कों, साहित्यिक ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं के आधार पर प्राचीन भारत के इतिहास की पुनर्व्याख्या का प्रयास किया। उनके शोध के विशेष क्षेत्र वैष्णव, शैव और अन्य धार्मिक संप्रदायों का इतिहास, प्रारंभिक भारतीय राजवंश तथा संस्कृत साहित्य थे। वे इस दृष्टिकोण के पक्षधर थे कि भारतीय धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को रूढ़ मान्यताओं के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक प्रमाणों और आलोचनात्मक विवेचन के आधार पर समझा जाना चाहिए।
प्रार्थना समाज से जुड़कर उन्होंने धार्मिक उदारवाद और सामाजिक सुधार को वैचारिक आधार प्रदान किया। वे बाल-विवाह, जातिगत भेदभाव और सामाजिक रूढ़ियों के विरोधी तथा स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह के समर्थक थे। उनका मानना था कि भारतीय समाज की प्रगति के लिए शिक्षा, तर्कशीलता और सामाजिक सुधार आवश्यक हैं तथा प्राचीन परंपराओं का सही ऐतिहासिक ज्ञान आधुनिक सुधारों के मार्ग में बाधक नहीं, बल्कि सहायक हो सकता है। उनकी विद्वत्ता और योगदान के सम्मान में 1917 ई. में पुणे में भंडारकर प्राच्यविद्या अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई। 24 अगस्त 1925 ई. को उनका निधन हुआ, किंतु भारतीय इतिहास-लेखन, प्राच्यविद्या और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान स्थायी महत्त्व रखता है।
सामाजिक सुधार की प्रत्यक्ष धारा
पश्चिमी भारत में सुधार आंदोलन की दूसरी प्रमुख धारा सामाजिक संस्थाओं और रूढ़ियों में प्रत्यक्ष परिवर्तन की पक्षधर थी। इस धारा के सुधारकों ने जाति-व्यवस्था, सामाजिक असमानता, स्त्रियों की दयनीय स्थिति और विधवा-पुनर्विवाह पर लगाए गए प्रतिबन्धों का विरोध किया। उनका मत था कि यदि समाज में वास्तविक परिवर्तन लाना है तो प्रचलित कुरीतियों को सीधे चुनौती देनी होगी। इसलिए उन्होंने लेखन, पत्रकारिता, सार्वजनिक सभाओं, संगठनों और शिक्षा के माध्यम से सुधारवादी विचारों का प्रचार किया।
गुजरात में दुर्गाराम मेहता (1809–1876 ई.)
दुर्गाराम मंचाराम दवे, जिन्हें सामान्यतः दुर्गाराम मेहता या मेहताजी के नाम से जाना जाता है, उन्नीसवीं शताब्दी के गुजरात के प्रारंभिक और प्रमुख समाज-सुधारक, शिक्षक, निबंधकार तथा डायरी-लेखक थे। उनका जन्म 25 दिसंबर 1809 ई. को सूरत में एक वडनगर नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था में माता के निधन के पश्चात् उनका पालन-पोषण उनकी बुआ ने किया। 1825 ई. में वे बंबई गए, जहाँ उन्होंने सरकारी गुजराती विद्यालय में अध्ययन किया। 1826 ई. में उन्होंने सूरत के हरिपुरा में सरकारी विद्यालय में अध्यापन का कार्य सँभाला और 1827 ई. में ओलपाड में नए विद्यालय की स्थापना के लिए भेजे गए।
सामाजिक सुधार के विचार
दुर्गाराम गुजरात में आधुनिक सामाजिक सुधार की प्रारंभिक चेतना के प्रमुख प्रवर्तकों में थे। वे धार्मिक संकीर्णता, जातिगत भेदभाव, सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों के आलोचक थे। उनका विशेष ध्यान विधवाओं की दयनीय स्थिति और विधवा-पुनर्विवाह की समस्या पर था। उनका मत था कि किसी सामाजिक प्रथा का मूल्यांकन उसकी प्राचीनता के आधार पर नहीं, बल्कि उसके मानवीय, नैतिक और सामाजिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए।
दादोबा पांडुरंग का प्रभाव और मानव धर्म सभा
लगभग 1842 ई. में दादोबा पांडुरंग के सूरत आगमन के पश्चात् दोनों के बीच सम्पर्क स्थापित हुआ। दादोबा के प्रेरणा से और सूरत के अंग्रेजी विद्यालय के प्रधानाध्यापक हेनरी ग्रीन के सहयोग से 22 जून 1844 ई. को सूरत में मानव धर्म सभा की स्थापना हुई। इसके संस्थापकों में दुर्गाराम मंचाराम, दादोबा पांडुरंग, दलपतराम मास्टर, दामोदरदास और दिनमणिशंकर सम्मिलित थे। यह गुजरात की प्रारंभिक संगठित सामाजिक-धार्मिक सुधार संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
मानव धर्म सभा के उद्देश्य और गतिविधियाँ
मानव धर्म सभा का उद्देश्य धार्मिक आडंबर, अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना करते हुए सत्य, नैतिकता, एकेश्वरवाद और मानव-बंधुत्व पर आधारित दृष्टिकोण विकसित करना था। सभा की बैठकों में जाति-भेद समाप्त करने, विधवा-पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने और नैतिक जीवन अपनाने पर बल दिया जाता था।
मानव धर्म सभा के सात मूल सिद्धांत
10 फरवरी 1843 ई. को दादोबा पांडुरंग के सुझाव पर दुर्गाराम ने मानव धर्म सभा के सात मूल सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप दिया। ये सिद्धांत थे—एक ईश्वर में विश्वास करना; सभी मनुष्यों को एक ही मानव-बंधुत्व का सदस्य मानना; सभी धर्मों की मूलभूत एकता को स्वीकार करना; मनुष्य का मूल्यांकन उसके वंश या जाति के आधार पर न करके उसके गुणों के आधार पर करना; विवेकपूर्ण आचरण करना; अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करना तथा मनुष्यों को धर्म और सदाचार के मार्ग का महत्त्व समझाना। इन सिद्धांतों से स्पष्ट होता है कि मानव धर्म सभा का दृष्टिकोण एकेश्वरवादी, तर्कप्रधान, नैतिक और मानवतावादी था।
विधवा-पुनर्विवाह के समर्थन में भूमिका
दुर्गाराम ने विधवा-पुनर्विवाह को सामाजिक सुधार का महत्त्वपूर्ण प्रश्न माना और रूढ़िवादी समाज के तीव्र विरोध के बावजूद उसके पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास किया। यहाँ यह उल्लेख आवश्यक है कि उनके निजी जीवन में एक विरोधाभास भी दिखाई देता है। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु के पश्चात् उन्होंने 1853 ई. में एक लगभग ग्यारह वर्षीया बालिका से विवाह किया, जबकि वे स्वयं लगभग चौवालीस वर्ष के थे। इस कारण उनके जीवनीकार महिपतराम रूपराम नीलकंठ सहित कुछ समकालीनों ने उनके सुधारवादी रुख की आलोचना की। उनके सामाजिक विचारों और निजी आचरण के बीच इस विरोधाभास का उल्लेख उनके ऐतिहासिक मूल्यांकन में अनिवार्यतः किया जाता है।
मानव धर्म सभा का अवसान
1846 ई. में दादोबा पांडुरंग के बंबई चले जाने के पश्चात् और 1850 ई. में दुर्गाराम के सूरत छोड़ने से सभा की गतिविधियाँ क्रमशः क्षीण होती गईं और अन्ततः उसका संगठन विघटित हो गया। यद्यपि सभा का कार्यकाल अल्प रहा, तथापि गुजरात में प्रारंभिक संगठित सामाजिक-सुधार आंदोलन के विकास में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान था। उसने एकेश्वरवाद, मानव-समानता, जातिगत भेदभाव की आलोचना और विधवा-पुनर्विवाह के समर्थन जैसे सुधारवादी विचारों को संगठित रूप देकर गुजरात में आधुनिक सामाजिक चेतना के विकास का आधार तैयार किया।
शिक्षा और सामाजिक चेतना
दुर्गाराम का सुधारवादी दृष्टिकोण शिक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ था। वे स्वयं शिक्षक रहे और शिक्षा को सामाजिक चेतना विकसित करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम मानते थे। उनके लिए धार्मिक सुधार का उद्देश्य केवल पूजा-पद्धति का परिवर्तन नहीं था, बल्कि नैतिक जीवन, विवेक, मानव-समानता और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना था।
डायरी-लेखन और गुजराती साहित्य में योगदान
दुर्गाराम का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान उनके डायरी-लेखन से सम्बन्धित है। उन्होंने 1843 से 1845 ई. के बीच मानव धर्म सभा की कार्यवाहियों, अपने विचारों, अनुभवों तथा शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों का नियमित लेखा-जोखा रखा। इन अभिलेखों में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों और उनके व्यक्तिगत विचारों की भी झलक मिलती है। इसी कारण उनकी डायरी को गुजराती साहित्य के प्रारंभिक आत्मकथात्मक लेखन के महत्त्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है। बाद में महिपतराम रूपराम नीलकंठ ने इन्हीं अभिलेखों के आधार पर उनकी जीवनी ‘मेहताजी दुर्गाराम मंचारामनुं जीवनचरित्र’ लिखी।
इस प्रकार दुर्गाराम मंचाराम दवे को गुजरात में आधुनिक सामाजिक सुधार चेतना के प्रारंभिक अग्रदूतों में स्थान दिया जाता है। उनका निधन 1876 ई. में हुआ।
गुजरात वर्नाक्युलर सोसाइटी
गुजरात में आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधार के प्रसार में अहमदाबाद की गुजरात वर्नाक्युलर सोसाइटी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। इस संस्था ने गुजराती भाषा में शिक्षा और साहित्य को प्रोत्साहित किया तथा सामाजिक सुधार से जुड़े विचारों के प्रसार के लिए मंच उपलब्ध करॉया। गुजराती भाषा में पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और अन्य साहित्य के प्रकाशन के माध्यम से समाज में आधुनिक विचारों का प्रसार किया गया, जिससे स्थानीय भाषा में सार्वजनिक बहस और सामाजिक चेतना के विकास को गति मिली।
करसनदास मूलजी (1832–1871 ई.)
गुजरात के प्रमुख समाज-सुधारकों और पत्रकारों में करसनदास मूलजी (25 जुलाई 1832–28 अगस्त 1871 ई.) का विशेष स्थान है। उनका जन्म 25 जुलाई 1832 ई. को भावनगर के निकट वडाल ग्राम में एक गुजराती वैष्णव कपोल वाणिक परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था में माता के निधन के पश्चात् उनका पालन-पोषण उनकी मौसी ने किया। उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज, बंबई में शिक्षा प्राप्त की और ज्ञान प्रसारक मंडली की गतिविधियों में भाग लिया।
पत्रकारिता का आरंभ और ‘रस्त गोफ्तार’
करसनदास मूलजी ने 1851 ई. में दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रकाशित एंग्लो-गुजराती समाचारपत्र ‘रस्त गोफ्तार’ से पत्रकारिता आरंभ की। बाद में वे ‘स्त्रीबोध’ जैसी पत्रिकाओं से भी जुड़े। वे बुद्धिवर्धक सभा के सदस्य रहे और नर्मदाशंकर लालशंकर (नर्मद) तथा महिपतराम रूपराम नीलकंठ जैसे समकालीन सुधारकों के साथ सामाजिक सुधार की गतिविधियों में सक्रिय रहे।
‘सत्यप्रकाश’ की स्थापना
1855 ई. में मंगलभाई नाथुभाई के सहयोग से उन्होंने गुजराती भाषा में ‘सत्यप्रकाश’ नामक समाचारपत्र की स्थापना की। वे इसके सम्पादक थे और रुस्तमजी रानिना इसके प्रकाशक थे। ‘सत्यप्रकाश’ का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं था, बल्कि सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों पर सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित करना था। इसके लेखों में जातिगत रूढ़ियों, धार्मिक आडंबरों, स्त्री-शिक्षा, विधवा-पुनर्विवाह और विवाहों में होने वाले अत्यधिक व्यय की आलोचना की जाती थी।
सामाजिक सुधार के विचार
करसनदास मूलजी विशेष रूप से विधवा-पुनर्विवाह और स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे। वे ऐसी धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के आलोचक थे, जो मनुष्य की स्वतंत्र सोच और सामाजिक प्रगति में बाधक बनती थीं।
वल्लभाचार्य संप्रदाय की आलोचना और महाराज मानहानि प्रकरण
करसनदास मूलजी ने गुजरात और बंबई क्षेत्र में प्रभावशाली वल्लभाचार्य संप्रदाय की कुछ प्रचलित धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं और धार्मिक नेतृत्व की आलोचना अपने लेखन के माध्यम से की। उनका उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं को नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक करना था। इसी क्रम में 1862 ई. का प्रसिद्ध महाराज मानहानि प्रकरण सामने आया। ‘सत्यप्रकाश’ में प्रकाशित एक लेख को लेकर वैष्णव धार्मिक प्रतिष्ठान से जुड़े जदुनाथ ब्रजरतनदास के साथ विवाद उत्पन्न हुआ और करसनदास के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर किया गया। न्यायालय में उनके पक्ष में निर्णय हुआ और यह प्रकरण भारतीय सामाजिक सुधार तथा आधुनिक पत्रकारिता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
इंग्लैंड यात्रा और सामाजिक बहिष्कार
करसनदास मूलजी ने कपास के व्यापार के सिलसिले में इंग्लैंड की यात्रा भी की। उस समय समुद्र पार करना अनेक रूढ़िवादी हिंदू समुदायों में धार्मिक और जातिगत निषेध से जुड़ा माना जाता था। इस कारण उन्हें अपने समुदाय द्वारा जातिगत बहिष्कार का सामना करना पड़ा।
प्रशासनिक एवं सार्वजनिक जीवन
1867 ई. में बंबई सरकार ने उन्हें काठियावाड़ के प्रशासनिक कार्यों से जोड़ा। वे बंबई विश्वविद्यालय के नामित फेलो रहे और रॉयल एशियाटिक सोसाइटी से भी संबद्ध थे। करसनदास मूलजी का निधन 28 अगस्त 1871 ई. को मात्र उनतालीस वर्ष की आयु में हो गया। उनके जीवन पर महिपतराम रूपराम नीलकंठ ने 1877 ई. में ‘उत्तम कपोल करसनदास मूलजी चरित्र’ नामक जीवनी लिखी।
बंबई में विधवा-पुनर्विवाह आंदोलन
बंबई में भी विधवाओं की दयनीय स्थिति ने सुधारकों को सक्रिय किया। हरिकेशजी जैसे सुधारकों ने विधवा-पुनर्विवाह के समर्थन में आवाज उठाई। यह प्रश्न केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय और महिलाओं के मानवीय अधिकारों से सीधे जुड़ा हुआ था।
विष्णु शास्त्री पंडित और विधवा विवाह
महाराष्ट्र में विष्णु शास्त्री पंडित (1827–1876 ई.) विधवा-पुनर्विवाह आंदोलन के प्रमुख समर्थकों में थे। उन्होंने विधवा-पुनर्विवाह को वैध तथा नैतिक रूप से उचित सिद्ध करने का प्रयास किया। 1850 के दशक में ‘विधवा विवाहोत्तेजक मंडल’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से इस विषय में जनमत तैयार किया गया। महाराष्ट्र में उनके प्रयासों ने आगे चलकर सामाजिक सुधार आंदोलनों को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
छात्रों की साहित्यिक और वैज्ञानिक संस्था
पश्चिमी भारत में सामाजिक सुधार के प्रसार में शिक्षित युवाओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। 1848 ई. में बंबई में ‘स्टूडेंट्स लिटरेरी एंड साइंटिफिक सोसाइटी’ की स्थापना हुई। यह संस्था आधुनिक शिक्षा, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सुधार के विचारों के प्रसार का महत्त्वपूर्ण केंद्र बनी।
इससे संबद्ध गुजराती और मराठी ज्ञान मंडलियों के माध्यम से सामाजिक प्रश्नों, शिक्षा, विज्ञान और सामान्य ज्ञान पर व्याख्यान और चर्चाएँ आयोजित होती थीं। इन मंडलियों ने शिक्षित युवाओं को सार्वजनिक रूप से विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया। इस संस्था का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य महिला-शिक्षा को प्रोत्साहित करना भी था। सुधारकों का मत था कि यदि महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा गया तो समाज का आधा भाग ज्ञान और आधुनिक चेतना से दूर रहेगा।
परमहंस सभा या परमहंस मंडली
परमहंस सभा, जिसे परमहंस मंडली भी कहा जाता है, का गठन 1849 ई. में बंबई (मुंबई) में हुआ था। इसके प्रमुख संस्थापकों में दादोबा पांडुरंग तर्खडकर, रामचंद्र बालकृष्ण जयकर और भिकोबादादा चव्हाण का उल्लेख मिलता है। यह एक गुप्त सामाजिक-धार्मिक सुधार संस्था थी। उस समय जाति-व्यवस्था और धार्मिक रूढ़ियों का खुलकर विरोध करना सामाजिक बहिष्कार और विरोध को आमंत्रित कर सकता था, इसलिए मंडली ने प्रारंभ में अपनी गतिविधियों को गोपनीय रखा। इसका मुख्य उद्देश्य जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच और धार्मिक रूढ़ियों का विरोध तथा समाज में समानता और बंधुत्व की भावना को बढ़ावा देना था।
वैचारिक आधार
परमहंस मंडली की विचारधारा पर एकेश्वरवाद, तर्कशीलता, नैतिकता और मानवतावाद का प्रभाव था। इसके सदस्य मूर्ति-पूजा और रूढ़िवादी धार्मिक कर्मकांडों की आलोचना करते थे। उनका मानना था कि सच्चा धर्म बाहरी आडंबरों के बजाय प्रेम, नैतिक आचरण, विवेक और मानव-कल्याण पर आधारित होना चाहिए। वे धार्मिक सत्य को किसी एक परंपरा या ग्रंथ तक सीमित मानने के बजाय स्वतंत्र चिंतन और तर्क को महत्त्व देते थे।
जाति-प्रथा का विरोध
परमहंस मंडली का प्रमुख सामाजिक कार्यक्रम जाति-व्यवस्था और ऊँच-नीच की भावना का विरोध था। इसके सदस्य जातिगत शुद्धता-अशुद्धता की रूढ़ धारणाओं को चुनौती देते थे। विभिन्न जातियों के लोगों के साथ सामूहिक भोजन करना इसका एक महत्त्वपूर्ण प्रतीकात्मक कार्य था। विशेष रूप से निम्न मानी जाने वाली जातियों के लोगों द्वारा तैयार भोजन ग्रहण करके मंडली के सदस्य जातिगत भेदभाव का विरोध करते और सामाजिक समानता का संदेश देते थे।
स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह
मंडली की सुधारवादी गतिविधियाँ केवल जाति और धर्म तक सीमित नहीं थीं। इसके सदस्य स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह के समर्थक थे। उनका मानना था कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार के बिना समाज की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है। इस प्रकार मंडली ने सामाजिक सुधार को मानवीय समानता और सामाजिक न्याय के व्यापक प्रश्न से जोड़ा।
दादोबा पांडुरंग की भूमिका
परमहंस मंडली के विकास में दादोबा पांडुरंग तर्खडकर (1814–1882 ई.) की विशेष भूमिका थी। वे पश्चिमी भारत के प्रारंभिक समाज-सुधारकों, शिक्षाविदों और भाषाविदों में प्रमुख थे। उनके विचारों में एकेश्वरवाद, तर्कशीलता, मानव-बंधुत्व और नैतिक आचरण पर विशेष बल था। उनके सुधारवादी विचारों पर मानव धर्म सभा की परंपरा का प्रभाव था। इसी कारण मानव धर्म सभा और परमहंस मंडली के बीच वैचारिक निरंतरता दिखाई देती है।
बालशास्त्री जांभेकर का योगदान
बालशास्त्री जांभेकर (1812–1846 ई.) को परमहंस मंडली का प्रमुख नेता बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है, क्योंकि उनका निधन 1846 ई. में हो गया था, जबकि परमहंस मंडली का गठन 1849 ई. में हुआ। उनका योगदान पश्चिमी भारत के प्रारंभिक पत्रकारिता, आधुनिक शिक्षा और बौद्धिक जागरण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने 1832 ई. में ‘दर्पण’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके माध्यम से उन्होंने ज्ञान-विज्ञान के प्रसार तथा सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना को प्रोत्साहित किया।
कार्यप्रणाली और विस्तार
परमहंस मंडली की बैठकें प्रायः सदस्यों या समर्थकों के घरों पर आयोजित की जाती थीं। इनमें सामाजिक और धार्मिक विषयों पर चर्चा, सुधारवादी लेखों का वाचन तथा विचार-विमर्श किया जाता था। प्रार्थना और भक्ति-गीत भी बैठकों का हिस्सा थे। मंडली की गतिविधियों और विचारों का प्रभाव बंबई से बाहर भी पहुँचा तथा इसके संपर्क पुणे, अहमदनगर और रत्नागिरी जैसे क्षेत्रों तक विकसित हुए।
पुणे में गतिविधियाँ
पुणे में परमहंस मंडली की गतिविधियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय थीं। इसके सदस्यों ने सामाजिक समानता से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय भूमिका निभाई और गैर-ब्राह्मणों को दक्षिणा-व्यवस्था में समान अवसर देने की माँग का समर्थन किया। इससे स्पष्ट होता है कि मंडली जातिगत भेदभाव को केवल धार्मिक प्रश्न न मानकर सामाजिक जीवन की वास्तविक समस्या के रूप में देखती थी।
प्रमुख सुधारक
परमहंस मंडली के संदर्भ में विभिन्न सुधारकों के नाम मिलते हैं, लेकिन सभी को इसका संस्थापक या प्रमुख सदस्य मानना उचित नहीं है। दादोबा पांडुरंग तर्खडकर इसकी स्थापना और वैचारिक विकास से सबसे अधिक जुड़े हुए थे। वहीं बालशास्त्री जांभेकर का योगदान इससे पूर्व के बौद्धिक और पत्रकारिता आंदोलन में था। इसी प्रकार गोपाल हरि देशमुख (लोकहितवादी) तथा विष्णुबाबा ब्रह्मचारी पश्चिमी भारत के व्यापक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व थे, लेकिन उन्हें परमहंस मंडली के संस्थापक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
परमहंस मंडली का विघटन
परमहंस मंडली की गोपनीय प्रकृति उसकी प्रमुख सीमाओं में से एक थी। तत्कालीन रूढ़िवादी समाज में जाति-व्यवस्था, मूर्ति-पूजा और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध खुले रूप से कार्य करना कठिन था। जब मंडली के सदस्यों की पहचान सार्वजनिक हुई, तो उन्हें सामाजिक विरोध और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप लगभग 1860 ई. के आसपास मंडली का संगठन बिखर गया और इसका सक्रिय अस्तित्व समाप्त हो गया।
मानव धर्म सभा और परमहंस मंडली का संबंध
मानव धर्म सभा और परमहंस मंडली के बीच वैचारिक संबंध स्पष्ट था। दोनों ने एकेश्वरवाद, तर्कशीलता, सामाजिक समानता, मानव-बंधुत्व और धार्मिक रूढ़िवाद के विरोध पर बल दिया। दादोबा पांडुरंग मानव धर्म सभा से जुड़े प्रमुख सुधारक थे और उनके विचारों ने परमहंस मंडली की वैचारिक दिशा को प्रभावित किया। इस दृष्टि से परमहंस मंडली को पश्चिमी भारत की प्रारंभिक सुधारवादी चेतना की आगे की अभिव्यक्ति माना जा सकता है।
परमहंस मंडली ने महाराष्ट्र तथा पश्चिमी भारत में आधुनिक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने जातिगत भेदभाव, सामाजिक ऊँच-नीच, धार्मिक रूढ़ियों और कर्मकांडों को चुनौती दी तथा एकेश्वरवाद, तर्क, मानव-बंधुत्व, स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह जैसे विचारों को प्रोत्साहित किया। यद्यपि इसका संगठन लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहा, फिर भी इसने पश्चिमी भारत में ऐसी सुधारवादी वैचारिक भूमि तैयार की, जिस पर आगे चलकर प्रार्थना समाज और अन्य सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का विकास हुआ।
गोपाळ हरी देशमुख (1823–1892 ई.)
मुख्य लेख : गोपाळ हरी देशमुख
गोपाळ हरी देशमुख, जो ‘लोकहितवादी’ उपनाम से विख्यात हैं, ने आधुनिक मानवतावादी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और विवेकसंगत सिद्धांतों के आधार पर भारतीय समाज के पुनर्गठन की वकालत की। उन्होंने हिंदू कट्टरपन्थ पर तीखा बौद्धिक प्रहार किया और धार्मिक तथा सामाजिक समानता का प्रचार किया। 1840 के दशक में उन्होंने लिखा था : “पुरोहित बहुत ही अपवित्र हैं, क्योंकि वे कुछ बातों को बिना अर्थ समझे रटते हैं और ज्ञान को इसी रटंत तक सीमित रखते हैं। पंडित पुरोहितों से भी बुरे हैं, क्योंकि वे और भी अज्ञानी और अहंकारी हैं। ब्राह्मण कौन हैं और किन अर्थों में वे हमसे भिन्न हैं? क्या उनके बीस हाथ हैं, या हममें कोई कमी है? अब जब ऐसे सवाल पूछे जाएँ, तो ब्राह्मणों को अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाएँ त्याग देनी चाहिए और यह मान लेना चाहिए कि सभी मनुष्य बराबर हैं, और प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।” लोकहितवादी का मानना था कि यदि धर्म सामाजिक सुधार की अनुमति नहीं देता, तो उसे बदल देना चाहिए।

प्रार्थना समाज
मुख्य लेख : प्रार्थना समाज
प्रार्थना समाज की स्थापना 31 मार्च 1867 ई. को बंबई में आत्माराम पांडुरंग ने की थी। इसके प्रमुख नेताओं में महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भंडारकर सम्मिलित थे। यह संस्था भारतीय नवजागरण के दौर में धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्थाओं में से एक थी। इसका उद्देश्य एकेश्वरवाद, नैतिक जीवन और सामाजिक सुधार को प्रोत्साहित करना था।
प्रार्थना समाज की स्थापना की पृष्ठभूमि में परमहंस सभा की विरासत का भी प्रभाव था। 1864 ई. में केशवचंद्र सेन के बंबई आगमन और उनके सुधारवादी विचारों के प्रभाव से स्थानीय समाज में नई चेतना उत्पन्न हुई, जिसने प्रार्थना समाज के गठन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
प्रार्थना समाज का उद्देश्य ब्रह्म समाज के समान धार्मिक-सामाजिक सुधार था, किंतु इसकी कार्यपद्धति अपेक्षाकृत क्रमिक और उदार थी। इसने अपने सदस्यों से जाति, मूर्ति-पूजा अथवा पारंपरिक धार्मिक संस्कारों का तत्काल त्याग करने की अपेक्षा नहीं की। इसके प्रमुख सुधारवादी कार्यक्रमों में जाति-प्रथा और छुआछूत का विरोध, विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन, महिला-शिक्षा को बढ़ावा तथा बाल-विवाह का विरोध सम्मिलित था।
प्रार्थना समाज की गतिविधियाँ केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं थीं। इसके अन्तर्गत अध्ययन-मंडल, रात्रि विद्यालय, निःशुल्क पुस्तकालय, महिला एवं छात्र संगठन तथा अनाथालय जैसी संस्थागत गतिविधियाँ संचालित की गईं। रानाडे के शब्दों में : “बंबई प्रेसीडेंसी में आंदोलन का प्रमुख तत्त्व उसका यह लक्ष्य था कि अतीत से नाता न तोड़ा जाए और हमारे समाज के सारे सम्बन्ध भंग न हों।”
इस क्रमिकवादी दृष्टिकोण ने प्रार्थना समाज को व्यापक समाज के लिए अधिक स्वीकार्य बनाया। पुणे, सूरत, अहमदाबाद, कराची, किरकी, कोल्हापुर और सतारा में इसकी शाखाएँ स्थापित हुईं तथा दक्षिण भारत में भी इसके कार्यकलाप फैले, जहाँ तेलुगु सुधारक वीरेशलिंगम पंतुलु इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक मद्रास प्रेसीडेंसी में इसकी अठारह शाखाएँ थीं। 1875 ई. में स्वामी दयानंद सरस्वती के गुजरात और महाराष्ट्र दौरे के समय एस. पी. केलकर के नेतृत्व में सदस्यों का एक समूह आर्य विचारधारा की ओर आकृष्ट हुआ और अलग हो गया, यद्यपि वह गुट बाद में लौट आया। किंतु यहीं से पश्चिमी भारत में एक ऐसी धार्मिक राजनीति का आरंभ हुआ, जिसकी पहचान सुधारवाद से अधिक ‘सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद’ थी।
आत्माराम पांडुरंग (1823–1898 ई.)
मुख्य लेख : आत्माराम पांडुरंग
आत्माराम पांडुरंग तुर्खुडकर (1823–1898 ई.) भारत के प्रमुख चिकित्सक और समाज-सुधारक थे तथा प्रार्थना समाज के संस्थापक के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने एल्फिंस्टन इंस्टीट्यूशन में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ बालशास्त्री जांभेकर से गणित का अध्ययन किया। तत्पश्चात् वे नवस्थापित ग्रांट मेडिकल कॉलेज के प्रथम बैच में सम्मिलित हुए। चिकित्सा शिक्षा के पश्चात् उन्होंने भिवंडी में कार्य किया तथा चेचक के टीकाकरण अभियान में योगदान दिया। वे बाल-विवाह के प्रबल विरोधी, स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह के समर्थक थे। 31 मार्च 1867 ई. को बंबई में उनके निवास पर प्रार्थना समाज की स्थापना हुई। वे बंबई विश्वविद्यालय के फेलो रहे और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के दो भारतीय सह-संस्थापकों में से एक थे। 1879 ई. में वे बंबई के शेरिफ नियुक्त हुए। 26 अप्रैल 1898 ई. को उनका निधन हुआ।

प्रार्थना समाज की उपलब्धियाँ
प्रार्थना समाज के प्रयासों से अनेक अनाथालयों, विधवाश्रमों और रात्रि पाठशालाओं की स्थापना हुई। महादेव गोविंद रानाडे ने 1861 ई. में ‘विधवा पुनर्विवाह संघ’ की स्थापना की। उन्होंने अछूतों, विधवाओं और पीड़ितों की स्थिति सुधारने के लिए पंढरपुर में अनाथाश्रम खोला और ‘दक्षिण शिक्षा समाज’ का गठन किया।
प्रार्थना समाज से जुड़े सुधारकों ने सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में अनेक संस्थाओं की स्थापना की। 1875 ई. में पंढरपुर में लालशंकर उमाशंकर के प्रयासों से ‘वासुदेव बाबाजी नौरंगे बालकाश्रम’ की स्थापना हुई, जो बाद में प्रार्थना समाज के संरक्षण में आ गया। 1878 ई. में प्रार्थना समाज ने रात्रि विद्यालयों की स्थापना कर शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा दिया। 1882 ई. में ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक उन्नति को प्रोत्साहित करना था। आगे चलकर 1917 ई. में ‘राममोहन अंग्रेजी विद्यालय’ की स्थापना हुई, जिसके संरक्षण में बाद में बंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों में अनेक विद्यालय संचालित हुए।
बाद के सामाजिक सुधार आंदोलनों, विशेषकर डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन सोसाइटी ऑफ इंडिया और नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस के विकास में भी प्रार्थना समाज से जुड़े सुधारकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
ज्योतिराव फुले (1827–1890 ई.)
मुख्य लेख : ज्योतिराव फुले
महाराष्ट्र के पुणे में माली समुदाय में जन्मे ज्योतिराव गोविंदराव फुले (11 अप्रैल 1827–28 नवंबर 1890 ई.) भारत के प्रमुख समाज-सुधारक, शिक्षाविद्, विचारक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्हें ज्योतिराव फुले और महात्मा फुले के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पुणे जिले के खानवाड़ी में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ी पूर्व सतारा से पुणे आकर बसा था और फूलों के व्यापार तथा गजरे-मालाएँ बनाने के कार्य से जुड़ा था, जिससे परिवार ‘फुले’ नाम से जाना जाने लगा। 1840 ई. में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हुआ और दोनों ने मिलकर स्त्री-शिक्षा तथा वंचित वर्गों के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए।
स्त्री-शिक्षा के जनक
अगस्त 1848 ई. में ज्योतिराव फुले ने पुणे के बुधवार पेठ मुहल्ले में भिडे के मकान में निम्न जातियों की बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोला। कट्टरपन्थी विरोध के कारण यह विद्यालय केवल छह महीने तक चल सका। 1851 ई. में उन्होंने सावित्रीबाई के साथ गंज पेठ में दूसरा विद्यालय खोला। जब अध्यापन के लिए कोई महिला शिक्षिका उपलब्ध नहीं हुई, तो ज्योतिबा ने सावित्रीबाई को शिक्षित कर भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनाया। 1855 ई. में उन्होंने प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों के लिए पहली रात्रि पाठशाला खोली। बंबई के सरकारी शिक्षा अभिलेखों के अनुसार ज्योतिबा ने पुणे और उसके आसपास के क्षेत्रों में लगभग अठारह पाठशालाएँ स्थापित कीं। जब ज्योतिबा अपने स्त्री-शिक्षा के प्रयासों से नहीं रुके, तो उनके पिता पर दबाव डालकर उन्हें पत्नी सहित घर से निकाल दिया गया। इससे उनके कार्य में कुछ समय के लिए व्यवधान आया, किंतु शीघ्र ही वे अपने उद्देश्य की ओर पुनः अग्रसर हो गए।
‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना (24 सितंबर 1873 ई.)
ज्योतिराव फुले ने 24 सितंबर 1873 ई. को ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना कर ब्राह्मण वर्चस्व और उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया। उन्होंने जातिप्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से बिना पुरोहितों के विवाह-संस्कार आरंभ किए। उन्होंने निम्न जातियों से अपने पारिवारिक उत्सवों और विवाह जैसे समारोहों में ब्राह्मण पुरोहितों का पूर्ण बहिष्कार करने का आह्वान किया।
ज्योतिराव फुले का साहित्य
ज्योतिराव फुले बहुमुखी प्रतिभा के धनी और उच्च कोटि के लेखक थे। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘तृतीय रत्न’, ‘गुलामगिरी’, ‘शेतकऱ्याचा असूड’ (किसान का कोड़ा), ‘इशारा’ और ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ‘तृतीय रत्न’ में उन्होंने धार्मिक अंधविश्वासों, सामाजिक रूढ़ियों और पुरोहितवादी शोषण की आलोचना की तथा शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का साधन बताया। ‘गुलामगिरी’ (1873 ई.) उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृतियों में से एक है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मणवादी सामाजिक वर्चस्व, जातिगत शोषण और गैर-ब्राह्मण समुदायों की सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए उनकी मुक्ति की आवश्यकता पर बल दिया। ‘शेतकऱ्याचा असूड’ (किसान का कोड़ा) में उन्होंने किसानों की दयनीय स्थिति, आर्थिक शोषण, अत्यधिक करभार और प्रशासनिक व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर किया। ‘इशारा’ (1885 ई.) में उन्होंने सामाजिक समस्याओं और वंचित वर्गों की स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा समाज-सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उनकी अंतिम महत्वपूर्ण रचनाओं में ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ का विशेष स्थान है, जिसमें उन्होंने सत्य, समानता, मानवतावाद, नैतिकता और तर्क पर आधारित धर्म की अवधारणा प्रस्तुत की। इन कृतियों के माध्यम से फुले ने जाति-व्यवस्था, धार्मिक रूढ़िवाद, सामाजिक असमानता और आर्थिक शोषण की आलोचना करते हुए शूद्रों, अतिशूद्रों, महिलाओं और किसानों के अधिकारों तथा सामाजिक समानता की स्थापना का विचार प्रस्तुत किया।
11 मई 1888 ई. को मुंबई की एक विशाल सभा में विट्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया। उनका निधन 28 नवंबर 1890 ई. को 63 वर्ष की आयु में पुणे में हुआ।
जहाँ राममोहन रॉय से लेकर रानाडे तक उच्च जातियों के प्रॉयः सभी सुधारकों ने अपने समाज की परंपरागत कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया, वहीं ज्योतिराव फुले ने सदियों से दासता का जीवन जी रही निम्न जातियों में शिक्षा के माध्यम से मुक्ति की चेतना का प्रसार किया। उनका महत्त्व केवल इतना नहीं है कि उन्होंने जातिगत विषमता के विरुद्ध आवाज उठाई, बल्कि उन्होंने एक विरोध का दर्शन, एक संगठनात्मक ढाँचा और एक क्रियाशील कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया।
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले (1831–1897 ई.)
मुख्य लेख : सावित्रीबाई फुले
सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831–10 मार्च 1897 ई.) भारत की अग्रणी महिला शिक्षिकाओं, समाज-सुधारकों, कवयित्रियों और महिला अधिकारों की प्रबल समर्थकों में से एक थीं। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 ई. को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव में हुआ था। 1840 ई. में ज्योतिराव फुले से विवाह के समय वे निरक्षर थीं, किंतु ज्योतिराव ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। सावित्रीबाई फुले ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षिका-प्रशिक्षण प्राप्त किया।
1 जनवरी 1848 ई. को उन्होंने ज्योतिराव के साथ पुणे के भिड़े वाड़ा में बालिकाओं के लिए विद्यालय आरंभ किया और स्वयं वहाँ शिक्षिका के रूप में कार्य किया। सामाजिक विरोध, अपमान और बाधाओं के बावजूद वे अपने शैक्षिक अभियान से पीछे नहीं हटीं। उन्होंने लड़कियों तथा वंचित वर्गों के लिए लगभग 18 विद्यालयों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1852 ई. में सावित्रीबाई फुले ने ‘महिला मंडल’ का गठन कर महिलाओं में सामाजिक जागरूकता और संगठन की भावना विकसित करने का प्रयास किया। 1863 ई. में ज्योतिराव के साथ मिलकर उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहाँ गर्भवती विधवाओं और सामाजिक संकट से पीड़ित महिलाओं को आश्रय दिया जाता था। उन्होंने एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई को आत्महत्या से बचाया, उसकी प्रसूति में सहायता की और उसके पुत्र यशवंत को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया।
1873 ई. में स्थापित सत्यशोधक समाज के कार्यों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की। उनकी प्रमुख साहित्यिक रचनाओं में ‘काव्यफुले’ (1854 ई.) और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ (1892 ई.) का उल्लेख किया जाता है।

1897 ई. में महाराष्ट्र में प्लेग की महामारी फैलने पर सावित्रीबाई फुले ने रोगियों की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित किया और एक संक्रमित बालक को उपचार के लिए ले जाते समय स्वयं भी प्लेग से संक्रमित हो गईं। 10 मार्च 1897 ई. को उनका निधन हो गया। उनके जन्मदिन 3 जनवरी को विभिन्न स्थानों पर महिला-शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
गोपाल गणेश आगरकर (1856–1895 ई.)
मुख्य लेख : गोपाल गणेश आगरकर
गोपाल गणेश आगरकर (14 जुलाई 1856–17 जून 1895 ई.) भारत के प्रमुख समाज-सुधारकों, शिक्षाविदों और पत्रकारों में से एक थे। उनका जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के तेम्बू नामक स्थान में हुआ था। उन्होंने पुणे के दक्कन कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे बाल गंगाधर तिलक के सहपाठी और निकट सहयोगी रहे। आगरकर, तिलक और उनके सहयोगियों का विश्वास था कि आधुनिक शिक्षा के प्रसार द्वारा ही समाज और राष्ट्र का पुनर्निर्माण संभव है। इसी उद्देश्य से जनवरी 1880 ई. में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की गई। इसके बाद 1881 ई. में अंग्रेजी साप्ताहिक ‘द मराठा’ और मराठी साप्ताहिक ‘केसरी’ के प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई गई। 1884 ई. में दक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना था। इसके पश्चात् 1885 ई. में फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना हुई, जिसने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर गोपाल गणेश आगरकर तथा तिलक के विचारों में धीरे-धीरे मतभेद उत्पन्न हुए, विशेष रूप से बाल-विवाह, विवाह की आयु, सामाजिक सुधारों की प्राथमिकता और धार्मिक रूढ़ियों के प्रश्न पर। परिणामतः 1887 ई. में आगरकर ‘केसरी’ से अलग हो गए और ‘सुधारक’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादिता के विरुद्ध निर्भीक विचार व्यक्त किए।
गोपाल गणेश आगरकर पर महात्मा ज्योतिराव फुले के सामाजिक सुधारवादी विचारों का भी प्रभाव था। वे वर्ण-व्यवस्था और जन्म-आधारित भेदभाव को अस्वीकार करते थे तथा धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं को तर्क की कसौटी पर परखने के पक्षधर थे। उन्होंने लड़कों के विवाह की आयु 20–22 वर्ष तथा लड़कियों की 15–16 वर्ष करने का समर्थन किया और 14 वर्ष तक अनिवार्य शिक्षा एवं सहशिक्षा के पक्ष में विचार व्यक्त किए। उनका मानना था कि समाज में सुधार केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं होगा, बल्कि सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कशीलता का विकास भी आवश्यक है। 1892 ई. में वे फर्ग्युसन कॉलेज के प्रधानाचार्य नियुक्त हुए। 17 जून 1895 ई. को मात्र तैंतालीस वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
महर्षि धोंडो केशव कर्वे (1858–1962 ई.)
मुख्य लेख : धोंडो केशव कर्वे
धोंडो केशव कर्वे (18 अप्रैल 1858–9 नवंबर 1962 ई.), जिन्हें महर्षि कर्वे के नाम से जाना जाता है, महाराष्ट्र के प्रमुख समाज-सुधारक थे। उनका जन्म रत्नागिरि जिले के शेरावली ग्राम में एक साधारण चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने 1884 ई. में एल्फिंस्टन कॉलेज से गणित में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1891 से 1914 ई. तक पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में गणित का अध्यापन किया।
विधवा-पुनर्विवाह के प्रबल समर्थक होने के कारण उन्होंने स्वयं एक विधवा से विवाह कर सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी। महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने अपना जीवन विशेष रूप से महिला-शिक्षा, विधवा-कल्याण और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए समर्पित किया। 1896 ई. में उन्होंने पुणे के हिंगणे में विधवाओं और अनाथ बालिकाओं के लिए आश्रम की स्थापना की, जहाँ उन्हें आश्रय के साथ शिक्षा और आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान किए गए। इसके बाद 1907 ई. में इसी स्थान पर महिला विद्यालय की स्थापना की, जिससे महिलाओं की शिक्षा को संस्थागत आधार मिला। महिला-शिक्षा को उच्च स्तर तक पहुँचाने के उद्देश्य से 1916 ई. में उन्होंने भारत के प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो आगे चलकर श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से महिला विश्वविद्यालय (एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय) के रूप में विकसित हुआ। विश्वविद्यालय के विकास और उसके लिए आवश्यक संसाधन जुटाने के उद्देश्य से 1929 ई. में उन्होंने यूरोप, अमेरिका और जापान की यात्रा की तथा वहाँ से आर्थिक सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। महिला-शिक्षा और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनके दीर्घकालीन योगदान को देखते हुए 1955 ई. में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया और 1958 ई. में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया।

पश्चिमी भारत में सुधार आंदोलन की विशेषताएँ
पश्चिमी भारत में उन्नीसवीं शताब्दी का सामाजिक-सुधार आंदोलन अनेक दृष्टियों से विशिष्ट था। इसकी प्रमुख विशेषता द्विधारा विकास थी। एक ओर सुधारकों ने प्राचीन भारतीय धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं का आलोचनात्मक अध्ययन करते हुए उनमें निहित मानवीय और नैतिक मूल्यों को पुनः समझने का प्रयास किया, तो दूसरी ओर उन्होंने बाल-विवाह, जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, विधवा-उत्पीड़न और स्त्रियों की अशिक्षा जैसी सामाजिक समस्याओं के प्रत्यक्ष समाधान के लिए संस्थाएँ और आंदोलन विकसित किए। इस आंदोलन में स्थानीय भाषाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। गुजरात में गुजराती तथा महाराष्ट्र में मराठी भाषा के समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों ने सामाजिक सुधार से जुड़े विचारों को शिक्षित वर्ग तक ही सीमित न रखकर व्यापक समाज तक पहुँचाया और सामाजिक प्रश्नों पर सार्वजनिक मत तैयार किया। शिक्षा और सार्वजनिक बहस को सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख साधन माना गया। सुधारकों ने विद्यालयों, महाविद्यालयों, रात्रि विद्यालयों तथा विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की स्थापना के साथ-साथ सभाओं, व्याख्यानों और पत्रकारिता के माध्यम से रूढ़ियों पर खुली बहस को प्रोत्साहित किया। आंदोलन की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता महिला-केंद्रित दृष्टिकोण थी। विधवा-पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह का विरोध तथा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों ने सुधार आंदोलन को व्यापक मानवीय आधार प्रदान किया। साथ ही, इस आंदोलन में क्रमिक सुधार और आमूल सामाजिक परिवर्तन, दोनों प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। प्रार्थना समाज जैसे सुधारवादी संगठनों ने धार्मिक आस्था को पूरी तरह अस्वीकार किए बिना एकेश्वरवाद, नैतिकता और क्रमिक सामाजिक सुधार पर बल दिया, जबकि सत्यशोधक समाज ने जाति-आधारित सामाजिक वर्चस्व और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को अधिक मूलभूत ढंग से चुनौती देते हुए शूद्रों, अतिशूद्रों तथा अन्य वंचित वर्गों की सामाजिक समानता पर जोर दिया। इस प्रकार पश्चिमी भारत का सुधार आंदोलन शिक्षा, पत्रकारिता, सामाजिक संस्थाओं, महिला-उत्थान, जाति-विरोध, तर्कवाद और सार्वजनिक विमर्श के समन्वय से विकसित हुआ और उसने आधुनिक सामाजिक चेतना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐतिहासिक महत्त्व
पश्चिमी भारत के सुधार आंदोलनों ने उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय नवजागरण को व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन आंदोलनों ने यह विचार सुदृढ़ किया कि समाज में प्रचलित परंपराओं का मूल्यांकन तर्क, नैतिकता और मानव-कल्याण की कसौटी पर होना चाहिए।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों के वैज्ञानिक अध्ययन ने भारतीयों में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति नया आत्मविश्वास उत्पन्न किया, जबकि सामाजिक सुधारकों ने जातिगत भेदभाव, स्त्रियों की दयनीय स्थिति और धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी। पत्रकारिता, शिक्षा और सार्वजनिक संस्थाओं के माध्यम से इन विचारों का व्यापक प्रसार हुआ।
इस प्रकार पश्चिमी भारत का सुधार आंदोलन केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं रहा। उसने आधुनिक शिक्षा, सामाजिक समानता, महिला-अधिकार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्थानीय भाषाओं के विकास और सार्वजनिक चेतना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाराष्ट्र और गुजरात में आगे विकसित होने वाले व्यापक सामाजिक-सुधार तथा राष्ट्रवादी आंदोलनों के लिए इसी सुधारवादी वातावरण ने महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार तैयार किया।
महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
1. उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी भारत में सामाजिक सुधार आंदोलनों के उदय के प्रमुख कारण क्या थे?
पश्चिमी भारत में जाति-भेद, अस्पृश्यता, बाल-विवाह, स्त्री-अशिक्षा, विधवाओं की दयनीय स्थिति तथा धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियाँ व्यापक थीं। अंग्रेजी शिक्षा, पाश्चात्य उदारवादी विचारों और तर्कवाद के प्रसार से शिक्षित भारतीयों में इन कुरीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित हुआ, जिससे विभिन्न सुधार आंदोलनों का उदय हुआ।
2. प्रार्थना समाज की स्थापना कब और किसने की थी?
प्रार्थना समाज की स्थापना 31 मार्च 1867 ई. को बंबई में डॉ. आत्माराम पांडुरंग ने की थी। बाद में महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भंडारकर ने इसके कार्यों को व्यापक बनाया।
3. प्रार्थना समाज के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
प्रार्थना समाज का उद्देश्य एकेश्वरवाद, धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक सुधार को प्रोत्साहित करना था। इसके कार्यक्रमों में जाति-भेद का विरोध, बाल-विवाह की रोकथाम, विधवा-विवाह का समर्थन, स्त्री-शिक्षा का प्रसार और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध सम्मिलित था। यह समाज क्रमिक और शांतिपूर्ण परिवर्तन का समर्थक था।
4. महादेव गोविंद रानाडे का पश्चिमी भारत के सुधार आंदोलन में क्या योगदान था?
रानाडे ने स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, बाल-विवाह के विरोध और सामाजिक समानता का समर्थन किया। उनका मानना था कि राष्ट्र की प्रगति के लिए सामाजिक सुधार आवश्यक है। उन्होंने क्रमिक, शांतिपूर्ण और व्यावहारिक सुधार की नीति अपनाई तथा प्रार्थना समाज के माध्यम से सामाजिक सुधार को आगे बढ़ाया।
5. ज्योतिराव फुले ने पश्चिमी भारत में सामाजिक सुधार के लिए क्या कार्य किए?
ज्योतिराव फुले ने जातिगत शोषण और सामाजिक असमानता के विरुद्ध व्यापक संघर्ष किया। उन्होंने 1848 ई. में पुणे में बालिकाओं के लिए विद्यालय स्थापित किया, स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा दिया और 1873 ई. में सत्यशोधक समाज की स्थापना कर शूद्रों व अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
6. सावित्रीबाई फुले का सामाजिक सुधार आंदोलन में क्या योगदान था?
सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिराव के साथ मिलकर बालिकाओं की शिक्षा के लिए अनेक विद्यालय संचालित किए। उन्होंने महिलाओं, विधवाओं और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए कार्य किया तथा सामाजिक भेदभाव और रूढ़ियों का निरंतर विरोध किया।
7. सत्यशोधक समाज की स्थापना कब और क्यों की गई थी?
सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितंबर 1873 ई. को ज्योतिराव फुले ने की थी। इसका उद्देश्य जातिगत असमानता, सामाजिक शोषण और धार्मिक रूढ़ियों का विरोध करना तथा शूद्रों, अतिशूद्रों और अन्य वंचित वर्गों को सामाजिक सम्मान दिलाना था।
8. पश्चिमी भारत में सुधार आंदोलनों में पारसी समुदाय की क्या भूमिका थी?
बंबई में पारसी समुदाय के शिक्षित वर्ग ने आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधार को प्रोत्साहित किया। रह्नुमाई मज्दयासन सभा ने पारसी समाज में शिक्षा के प्रसार, महिलाओं की स्थिति में सुधार और सामाजिक रूढ़ियों को दूर करने के लिए कार्य किया। दादाभाई नौरोजी जैसे पारसी बुद्धिजीवियों ने आधुनिक शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में सुधारवादी विचारों को बढ़ावा दिया।
9. पश्चिमी भारत के प्रमुख सुधार आंदोलनों का सामाजिक महत्त्व क्या था?
प्रार्थना समाज, सत्यशोधक समाज और अन्य सुधारवादी संस्थाओं ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी तथा स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, जाति-विरोध, सामाजिक समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया। इनके प्रयासों से महाराष्ट्र और बंबई क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया सुदृढ़ हुई।
10. उन्नीसवीं सदी के पश्चिमी भारत के सुधार आंदोलनों का व्यापक प्रभाव क्या पड़ा?
इन आंदोलनों ने स्त्री-शिक्षा, सामाजिक समानता, जाति-विरोध, विधवा-विवाह, आधुनिक शिक्षा और तर्कवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। उन्होंने महिलाओं तथा वंचित वर्गों की समस्याओं को सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाया और रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। इन आंदोलनों ने पश्चिमी भारत में आधुनिक सामाजिक चेतना को सुदृढ़ किया तथा सामाजिक न्याय और राष्ट्रवादी चेतना के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।


