महर्षि धोंडो केशव कर्वे (18 अप्रैल 1858–9 नवंबर 1962 ई.)
मुख्य लेख : उन्नीसवीं सदी में भारतीय सांस्कृतिक जागरण
महर्षि धोंडो केशव कर्वे आधुनिक भारत के प्रमुख समाज-सुधारकों, शिक्षाविदों और महिला-मुक्ति के अग्रदूतों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपना लगभग पूरा जीवन महिला शिक्षा, विधवा-पुनर्विवाह, विधवाओं के पुनर्वास, ग्रामीण शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए समर्पित किया। उनका जीवन केवल सामाजिक कुरीतियों के विरोध तक सीमित नहीं था; उन्होंने अपने विचारों को व्यवहार में उतारते हुए आश्रमों, विद्यालयों, प्रशिक्षण संस्थाओं और अंततः भारत के प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। विशेष रूप से विधवा-पुनर्विवाह को सामाजिक स्वीकृति दिलाने और महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उनका जीवन ऐसे समय में विकसित हुआ, जब बाल-विवाह, स्त्री-अशिक्षा, विधवाओं की दयनीय स्थिति और विधवा-पुनर्विवाह पर सामाजिक प्रतिबंध जैसी समस्याएँ व्यापक थीं। कर्वे ने इन समस्याओं को केवल सामाजिक बहस का विषय नहीं बनाया, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत किया और दीर्घकालीन संस्थागत कार्य के माध्यम से परिवर्तन का प्रयास किया।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
धोंडो केशव कर्वे का जन्म 18 अप्रैल 1858 ई. को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले के शेरावली गाँव में एक साधारण और आर्थिक रूप से सीमित चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम केशव बापून्ना कर्वे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद परिवार में शिक्षा और अच्छे संस्कारों को महत्त्व दिया जाता था। कर्वे ने अपने बाल्यकाल में ही अभाव, परिश्रम और आत्मनिर्भरता का अनुभव किया, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। उनका पारिवारिक संबंध कोंकण के मुरुड से था और उनका बचपन मुख्यतः वहीं व्यतीत हुआ। प्रारंभिक शिक्षा वहीं प्राप्त करने के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की सुविधाएँ बहुत सीमित थीं। माध्यमिक स्तर की परीक्षा के लिए उन्हें दूर जाकर परीक्षा देनी पड़ी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा का प्रयास नहीं छोड़ा। आगे चलकर वे मुंबई पहुँचे और रॉबर्ट मनी स्कूल में अध्ययन किया। 1881 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1884 ई. में गणित विषय के साथ स्नातक की शिक्षा पूरी की।

शिक्षा के दौरान आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्हें निजी ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च चलाना पड़ा। उनकी सादगी और परोपकारी प्रवृत्ति बचपन से ही दिखाई देती थी। जो थोड़ी-बहुत धनराशि वे बचा पाते थे, उसका एक भाग जरूरतमंदों की सहायता में लगा देते थे। इस प्रकार शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सेवा-भाव उनके व्यक्तित्व के प्रारंभिक आधार बन गए।
विवाह और प्रारंभिक पारिवारिक जीवन
उस समय बाल-विवाह समाज में सामान्य प्रथा थी। कर्वे का विवाह भी अल्पायु में राधाबाई से कर दिया गया था। यह विवाह उस समय की सामाजिक व्यवस्था का सामान्य उदाहरण था। कर्वे के जीवन के प्रारंभिक वर्षों में शिक्षा और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना पड़ा।
राधाबाई का 1891 ई. में निधन हो गया। इस घटना ने कर्वे के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। इसी समय वे सामाजिक प्रश्नों के प्रति पहले से अधिक गंभीरता से विचार करने लगे थे। विशेष रूप से उन्हें यह असमानता दिखाई देती थी कि विधुर पुरुष के पुनर्विवाह को सामान्य माना जाता था, जबकि विधवा स्त्री के पुनर्विवाह को सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता था। इस दोहरे सामाजिक मानदंड ने उन्हें विधवा-पुनर्विवाह के पक्ष में सक्रिय कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
उच्च शिक्षा और अध्यापन कार्य
स्नातक शिक्षा पूरी करने के बाद कर्वे ने अध्यापन को अपना व्यवसाय बनाया। उन्होंने मुंबई में अध्यापन किया और बाद में पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से जुड़े। 1891 से 1914 ई. तक उन्होंने फर्ग्यूसन कॉलेज में गणित के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। वे डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी से भी जुड़े और उसके आजीवन सदस्य बने।
अध्यापन उनके लिए केवल जीविका का साधन नहीं था। वे शिक्षा को व्यक्ति और समाज के परिवर्तन का प्रभावी माध्यम मानते थे। इसी कारण अध्यापन के साथ-साथ वे सामाजिक समस्याओं पर विचार करते रहे। महिलाओं की अशिक्षा और विधवाओं की दयनीय स्थिति ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। पंडिता रमाबाई के महिला-शिक्षा संबंधी कार्यों तथा विष्णुशास्त्री पंडित और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे सुधारकों के प्रयासों से भी उन्हें प्रेरणा मिली। महादेव गोविंद रानाडे, गोपालकृष्ण गोखले और दादाभाई नौरोजी जैसे समकालीन सार्वजनिक व्यक्तित्वों के विचारों और सामाजिक सक्रियता का भी उनके जीवन पर प्रभाव पड़ा।
विधवा से पुनर्विवाह : सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती
राधाबाई की मृत्यु के बाद कर्वे ने यह निर्णय लिया कि यदि वे पुनर्विवाह करेंगे, तो किसी विधवा से ही विवाह करेंगे। उनका उद्देश्य केवल अपना पारिवारिक जीवन पुनः व्यवस्थित करना नहीं था, बल्कि समाज के सामने एक प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करना था कि विधवा भी सम्मानपूर्वक वैवाहिक जीवन जी सकती है।
1893 ई. में उन्होंने गोदूबाई नामक विधवा से विवाह किया। विवाह के बाद गोदूबाई का नाम आनंदीबाई कर्वे हुआ और वे आगे चलकर बाया कर्वे के नाम से प्रसिद्ध हुईं। वे पंडिता रमाबाई द्वारा स्थापित शारदा सदन से जुड़ी रही थीं। कर्वे के इस विवाह का रूढ़िवादी समाज ने तीव्र विरोध किया और उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक का सामना करना पड़ा। फिर भी उन्होंने अपने निर्णय से पीछे हटने से इनकार किया।
यह विवाह उनके सामाजिक सुधार आंदोलन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण था। उन्होंने जिस सामाजिक कुरीति का विरोध किया, उसके विरुद्ध अपने व्यक्तिगत जीवन में उदाहरण प्रस्तुत किया। इस प्रकार विधवा-पुनर्विवाह उनके लिए केवल वैचारिक प्रश्न नहीं रहा, बल्कि उनके जीवन का प्रत्यक्ष सामाजिक कार्यक्रम बन गया। आनंदीबाई कर्वे ने भी उनके सामाजिक कार्यों में सक्रिय सहयोग दिया। इस प्रकार कर्वे दंपति का जीवन महिला-शिक्षा और विधवा-उद्धार के कार्यों के लिए परस्पर सहयोग का उदाहरण बन गया।
विधवा-पुनर्विवाह आंदोलन
कर्वे ने शीघ्र ही यह समझ लिया कि केवल स्वयं विधवा से विवाह कर लेना पर्याप्त नहीं है। समाज में विधवा-पुनर्विवाह की स्वीकृति के लिए व्यापक जनमत और संगठित प्रयास आवश्यक थे। इसी उद्देश्य से 1893 ई. में उन्होंने विधवा-विवाहोत्तेजक मंडली की स्थापना की। बाद में इस संस्था का नाम विधवा-विवाह-प्रतिबंध-निवारक मंडली किया गया। इसका उद्देश्य विधवा-पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करना तथा उसके मार्ग में आने वाली सामाजिक बाधाओं को दूर करना था।
कर्वे बाल-विवाह, जरठ-कुमारी विवाह, विधवाओं के केशवपन तथा महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखने जैसी रूढ़ियों के भी विरोधी थे। उनके लिए सामाजिक सुधार का उद्देश्य केवल एक कुरीति को समाप्त करना नहीं था, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाना था जिसमें महिलाओं को सम्मान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के अवसर मिल सकें।
विधवा-पुनर्विवाह के प्रश्न को उन्होंने विधवा-शिक्षा और पुनर्वास से भी जोड़ा। उनका मानना था कि सभी विधवाओं के लिए पुनर्विवाह संभव नहीं हो सकता; इसलिए उन्हें शिक्षा, आश्रय और आर्थिक आत्मनिर्भरता उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।
हिंदू विधवा गृह और हिंगणे का आश्रम
इसी विचार के आधार पर 1896 ई. में कर्वे ने पुणे के निकट हिंगणे में हिंदू विधवा गृह की स्थापना की। इसका उद्देश्य विधवाओं को आश्रय देने के साथ-साथ उन्हें शिक्षा और आत्मनिर्भर जीवन के लिए तैयार करना था। एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण के अनुसार, 1896 ई. में स्थापित यह आश्रम आगे चलकर महिला शिक्षा के व्यापक अभियान का आधार बना।
हिंगणे का प्रारंभिक कार्य अत्यंत सीमित संसाधनों में शुरू हुआ। एक छोटे से आश्रम से विकसित होकर यह संस्था आगे चलकर महिलाओं और बालिकाओं की शिक्षा का महत्त्वपूर्ण केंद्र बनी। कर्वे ने विधवाओं और अनाथ बालिकाओं के लिए शिक्षा, आश्रय और प्रशिक्षण की व्यवस्था विकसित की।
उनके कार्यों के प्रति प्रारंभ में विरोध था, लेकिन धीरे-धीरे समाज के प्रबुद्ध और दानशील लोगों का सहयोग मिलने लगा। कर्वे स्वयं धन-संग्रह के लिए विभिन्न स्थानों की यात्राएँ करते थे। उनकी पत्नी आनंदीबाई भी इस कार्य में सहयोग करती थीं। इस प्रकार हिंगणे का आश्रम केवल विधवा-आश्रय नहीं रहा, बल्कि महिला-शिक्षा के एक व्यापक आंदोलन की आधारभूमि बन गया।
महिला शिक्षा को जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाना
कर्वे ने अनुभव किया कि विधवा-पुनर्विवाह सामाजिक समस्या का केवल एक पक्ष है। महिलाओं की वास्तविक स्थिति तभी बदल सकती है, जब उन्हें शिक्षा प्राप्त करने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिले। इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे महिला शिक्षा को अपने सामाजिक सुधार कार्यक्रम का केंद्रीय उद्देश्य बना लिया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा को केवल पढ़ना-लिखना सीखने तक सीमित नहीं माना। उनका उद्देश्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना था, जो महिलाओं को आत्मविश्वास, ज्ञान और आत्मनिर्भरता प्रदान करे। उनके विचार में शिक्षा महिलाओं को सामाजिक निर्भरता से बाहर निकालने का सबसे प्रभावी माध्यम थी।
1907 ई. में हिंगणे में महिला विद्यालय की स्थापना इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम था। इस विद्यालय ने महिलाओं और बालिकाओं के लिए औपचारिक शिक्षा के नए अवसर खोले। कर्वे की विधवा भाभी पार्वतीबाई आठवले इस संस्था से जुड़ीं और आगे चलकर उन्होंने विधवा गृह की अधीक्षिका के रूप में कार्य किया। कर्वे ने शिक्षा को महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक उत्थान से जोड़ा। वे चाहते थे कि शिक्षित महिलाएँ स्वयं शिक्षिका बनें और महिला शिक्षा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
निष्काम कर्म मठ और कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण
महिला शिक्षा और विधवा-उद्धार के कार्यों के विस्तार के लिए प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से 1908 ई. में कर्वे ने निष्काम कर्म मठ की स्थापना की। इसका लक्ष्य उन कार्यकर्ताओं को तैयार करना था, जो विधवा गृह, महिला विद्यालय और संबंधित सामाजिक संस्थाओं के संचालन तथा विस्तार में योगदान दे सकें। इस संस्था के माध्यम से कर्वे ने सामाजिक सेवा को संगठित और संस्थागत रूप देने का प्रयास किया। उनके लिए सामाजिक सुधार केवल व्यक्तिगत सद्भावना पर निर्भर रहने वाला कार्य नहीं था; इसके लिए समर्पित कार्यकर्ताओं, संस्थाओं और निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता थी।
महिला विश्वविद्यालय की स्थापना
कर्वे के सामाजिक और शैक्षिक कार्यों की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भारत में महिलाओं के लिए स्वतंत्र उच्च शिक्षा संस्था की स्थापना थी। जापान में महिला विश्वविद्यालय की व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करने के बाद उनके मन में भारत में महिलाओं के लिए स्वतंत्र विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार मजबूत हुआ। 30 दिसंबर 1915 ई. को भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन के अधिवेशन में उन्होंने महिला विश्वविद्यालय की आवश्यकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
1916 ई. में उन्होंने पुणे में भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की। एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, इसकी स्थापना पाँच छात्राओं से हुई थी और यह भारत तथा दक्षिण एशिया में महिला उच्च शिक्षा के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण संस्था बनी।
प्रारंभिक वर्षों में विश्वविद्यालय को अनेक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कर्वे ने स्वयं देश-विदेश में यात्राएँ करके इसके लिए आर्थिक सहायता जुटाई। 1920 ई. में सर विठ्ठलदास ठाकरसी ने विश्वविद्यालय को 15 लाख रुपये का महत्त्वपूर्ण आर्थिक सहयोग दिया। इसके बाद विश्वविद्यालय का नाम उनकी माता श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी की स्मृति में श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी भारतीय महिला विश्वविद्यालय रखा गया, जो आगे चलकर एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह संस्था महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के संस्थागत विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम थी। प्रथम पाँच छात्राओं के 1921 ई. में स्नातक होने का उल्लेख स्वयं विश्वविद्यालय करता है।
महिला शिक्षकों के प्रशिक्षण और विद्यालयों का विस्तार
कर्वे समझते थे कि महिला शिक्षा के विस्तार के लिए केवल विद्यालय स्थापित करना पर्याप्त नहीं है। शिक्षित महिला शिक्षकों की भी आवश्यकता होगी। इसलिए 1917–1918 ई. के दौरान उन्होंने प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण संस्था स्थापित की तथा लड़कियों के लिए कन्या शाला प्रारंभ की।
इस व्यवस्था का उद्देश्य अधिक से अधिक महिलाओं को शिक्षित करना और उन्हें शिक्षिका के रूप में तैयार करना था। इससे महिला शिक्षा का प्रसार केवल एक संस्था तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक अभियान में परिवर्तित होने लगा।
सामाजिक समानता और अस्पृश्यता के विरुद्ध विचार
कर्वे का समाज-सुधार कार्यक्रम केवल महिलाओं तक सीमित नहीं था। वे सामाजिक समानता के समर्थक थे और जातिगत भेदभाव तथा अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के विरोधी थे। उनका विश्वास था कि समाज की प्रगति तभी संभव है, जब सभी मनुष्यों को सम्मान और अवसर प्राप्त हों। उन्होंने महिलाओं की स्थिति सुधारने के साथ-साथ व्यापक सामाजिक सुधार को भी महत्त्व दिया। वे ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहते थे, जिसमें जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव न हो और शिक्षा समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे।
ग्रामीण शिक्षा का प्रसार
कर्वे का ध्यान ग्रामीण शिक्षा की ओर भी गया। अपने बचपन में शिक्षा के लिए झेली गई कठिनाइयों को वे अच्छी तरह समझते थे। इसलिए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार को सामाजिक सुधार का महत्त्वपूर्ण अंग माना।
1936 ई. में उन्होंने महाराष्ट्र ग्राम प्राथमिक शिक्षा समिति की स्थापना की। इसका उद्देश्य उन गाँवों में प्राथमिक विद्यालय स्थापित करना था, जहाँ पर्याप्त शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। उन्होंने ग्रामीण वयस्कों में पढ़ने की आदत विकसित करने और शिक्षा को गाँवों तक पहुँचाने पर भी बल दिया।
इस प्रकार उनका शैक्षिक दृष्टिकोण महिला शिक्षा तक सीमित नहीं था। वे शिक्षा को व्यापक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे और ग्रामीण समाज में भी इसकी पहुँच बढ़ाना चाहते थे।
समता संघ और सामाजिक समानता का विस्तार
1944 ई. में कर्वे ने समता संघ की स्थापना की। इसका उद्देश्य सामाजिक समानता की भावना को बढ़ावा देना था। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने समाज में समानता, सामाजिक न्याय और मानवीय सम्मान की भावना को मजबूत करने का प्रयास किया।
कर्वे के समाज-सुधार संबंधी विचारों में शिक्षा, महिला-उत्थान, जातिगत समानता और सामाजिक न्याय परस्पर जुड़े हुए थे। वे मानते थे कि केवल कानूनी या वैचारिक सुधार पर्याप्त नहीं हैं; समाज की मानसिकता में परिवर्तन भी आवश्यक है।
भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन से संबंध
कर्वे ने सामाजिक सुधार के व्यापक मंचों पर भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे इंडियन सोशल कॉन्फ्रेंस अर्थात भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन से जुड़े और इसके अध्यक्ष के रूप में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध विचार व्यक्त किए। 1915 में इसी मंच पर उन्होंने महिला विश्वविद्यालय की आवश्यकता को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था। इससे स्पष्ट होता है कि महिला शिक्षा के लिए उनका अभियान किसी एक संस्था तक सीमित नहीं था। वे इसे भारतीय समाज के व्यापक पुनर्गठन से जोड़कर देखते थे।
विदेश यात्राएँ और महिला शिक्षा का प्रचार
कर्वे ने भारत के बाहर भी महिला शिक्षा और अपने सामाजिक कार्यों का प्रचार किया। उन्होंने इंग्लैंड, यूरोप, जापान, अमेरिका और अफ्रीका की यात्राएँ कीं। विदेश यात्राओं के दौरान उन्होंने विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं और महिला विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया तथा भारत में महिला शिक्षा के अपने अनुभवों को वहाँ के लोगों के सामने रखा। जापान की महिला विश्वविद्यालय व्यवस्था ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया और भारत में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की उनकी योजना को प्रेरणा मिली। विदेश यात्राओं का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य अपनी संस्थाओं के लिए आर्थिक सहयोग प्राप्त करना भी था। उन्होंने विभिन्न देशों में व्याख्यान देकर भारत में महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार की आवश्यकता समझाई। इन यात्राओं ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया और भारतीय महिला शिक्षा आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक अनुभवों से जोड़ने में सहायता की।
एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय को वैधानिक मान्यता
कर्वे द्वारा स्थापित महिला विश्वविद्यालय का विकास आगे भी जारी रहा। 1951 ई. में इसे वैधानिक मान्यता प्राप्त हुई और यह श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी महिला विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। विश्वविद्यालय के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 1951 ई. में इसे वैधानिक विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय का विस्तार हुआ और महिला शिक्षा के क्षेत्र में इसकी भूमिका व्यापक होती गई। आज यह संस्था भारत में महिला उच्च शिक्षा के इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है।
संतति-नियमन और रघुनाथ कर्वे
कर्वे के परिवार में भी सामाजिक सुधार की परंपरा आगे बढ़ी। उनके पुत्र रघुनाथ धोंडो कर्वे ने संतति-नियमन, यौन-शिक्षा और जनसंख्या संबंधी प्रश्नों पर जागरूकता फैलाने का प्रयास किया। उस समय इन विषयों पर खुलकर विचार करना सामाजिक रूप से अत्यंत विवादास्पद था। फिर भी रघुनाथ कर्वे ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन प्रश्नों को समाज के सामने रखने का प्रयास किया। कर्वे परिवार का यह पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि सामाजिक सुधार की भावना केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि अगली पीढ़ी में भी विभिन्न रूपों में आगे बढ़ी।
पारिवारिक जीवन
महर्षि कर्वे के पुत्रों में रघुनाथ, शंकर, दिनकर और भास्कर के नाम मिलते हैं। रघुनाथ कर्वे गणित के प्राध्यापक और सामाजिक सुधारक बने। दिनकर कर्वे रसायन विज्ञान के प्राध्यापक तथा शिक्षाविद् रहे। दिनकर की पत्नी इरावती कर्वे आगे चलकर भारत की प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों में गिनी गईं। इस प्रकार शिक्षा और सामाजिक सेवा का वातावरण कर्वे के पारिवारिक जीवन में भी दिखाई देता है।
आत्मकथात्मक रचनाएँ
कर्वे ने अपने जीवन, संघर्षों और सामाजिक कार्यों को आत्मकथात्मक रूप में भी प्रस्तुत किया। उनकी मराठी आत्मकथा ‘आत्मवृत्त’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी में ‘लुकिंग बैक’ नामक आत्मकथात्मक कृति लिखी, जिसमें उनके जीवन और कार्यों का विवरण मिलता है। स्रोत के अनुसार ‘आत्मवृत्त’ 1928 ई. में तथा ‘लुकिंग बैक’ 1936 ई. में प्रकाशित हुई। इन रचनाओं का महत्त्व इसलिए भी है कि इनके माध्यम से कर्वे के जीवन-संघर्ष, उनके विचारों और सामाजिक संस्थाओं के निर्माण की प्रक्रिया को उनके अपने दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिलता है।
सम्मान और मानद उपाधियाँ
महर्षि कर्वे के सामाजिक और शैक्षिक योगदान को उनके जीवनकाल में अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। 1942 ई. में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। 1951 ई. में पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि दी। 1954 ई. में एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. प्रदान की और 1957 ई. में मुंबई विश्वविद्यालय ने उन्हें एल.एल.डी. की मानद उपाधि प्रदान की।
1955 ई. में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। स्रोत सामग्री में एक स्थान पर ‘पद्म भूषण’ लिखा गया है, लेकिन एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण और अन्य अभिलेखों में 1955 ई. का सम्मान पद्म विभूषण दर्ज है। इसलिए ऐतिहासिक रूप से सही रूप पद्म विभूषण है।
भारत रत्न
महर्षि कर्वे को उनके जीवनभर के सामाजिक और शैक्षिक योगदान के लिए 1958 ई. में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। भारत सरकार की आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना में 26 जनवरी 1958 ई. को डॉ. धोंडो केशव कर्वे को भारत रत्न दिए जाने की स्पष्ट घोषणा की गई है। यह सम्मान उनके 100वें जन्मवर्ष में प्रदान किया गया था। इस प्रकार वे उन अग्रणी भारतीयों में शामिल हुए, जिन्हें अपने जीवनकाल में ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया।
धोंडो केशव कर्वे का निधन
महर्षि धोंडो केशव कर्वे का निधन 9 नवंबर 1962 ई. को पुणे में हुआ। उनका जन्म 18 अप्रैल 1858 ई. को हुआ था और इस प्रकार उन्होंने 104 वर्ष से अधिक का जीवन व्यतीत किया। उनका निधन एक ऐसे जीवन का अंत था, जिसने लगभग एक शताब्दी से अधिक समय तक भारतीय समाज में महिला शिक्षा, विधवा-पुनर्विवाह और सामाजिक समानता के प्रश्नों को निरंतर उठाया। उनका जीवन व्यक्तिगत त्याग और संस्थागत सामाजिक परिवर्तन के समन्वय का उदाहरण बन गया।
लोकप्रिय संस्कृति और स्मृति
महर्षि कर्वे के जीवन और कार्यों का प्रभाव साहित्य और सिनेमा पर भी पड़ा। उनके जीवन और सामाजिक सुधार आंदोलन से प्रेरित होकर वसंत कानेटकर ने 1972 ई. में मराठी नाटक ‘हिमालयाची सावली’ लिखा। 1958 ई. में ‘द स्टोरी ऑफ डॉ. कर्वे’ नामक वृत्तचित्र का निर्माण हुआ। 2001 ई. में अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ध्यास पर्व’ में कर्वे परिवार तथा उनके पुत्र रघुनाथ कर्वे के जीवन और सामाजिक कार्यों को चित्रित किया गया। उनकी स्मृति में पुणे के कर्वेनगर का नामकरण हुआ और मुंबई की एक प्रमुख सड़क का नाम महर्षि कर्वे रोड रखा गया। उनके द्वारा स्थापित संस्थाएँ आगे चलकर व्यापक शैक्षिक नेटवर्क में विकसित हुईं।
महर्षि कर्वे का ऐतिहासिक महत्त्व
महर्षि धोंडो केशव कर्वे के योगदान को मुख्यतः तीन परस्पर जुड़े क्षेत्रों में समझा जा सकता है—विधवा-पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और सामाजिक समानता। उन्होंने विधवा-पुनर्विवाह के प्रश्न को व्यक्तिगत उदाहरण और संगठित आंदोलन दोनों के माध्यम से उठाया। इसके बाद उन्होंने यह समझ विकसित की कि महिलाओं की स्थिति में स्थायी परिवर्तन शिक्षा के बिना संभव नहीं है। हिंगणे का विधवा गृह, महिला विद्यालय, निष्काम कर्म मठ और अंततः 1916 ई. में स्थापित महिला विश्वविद्यालय उनके संस्थागत सुधार कार्यक्रम के प्रमुख चरण थे। एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय स्वयं उन्हें अपनी स्थापना का संस्थापक मानता है और 1916 ई. को अपने संस्थागत इतिहास का आरंभिक वर्ष स्वीकार करता है। उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने सामाजिक सुधार को केवल भाषण, लेख या वैचारिक आंदोलन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने जीवन में विधवा से विवाह किया, सामाजिक बहिष्कार सहा, आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद संस्थाएँ स्थापित कीं और उनके लिए धन जुटाया। इसी कारण उनका सुधारवाद व्यवहारिक और संस्थागत दोनों स्वरूपों में दिखाई देता है। उनका ग्रामीण शिक्षा संबंधी कार्य यह स्पष्ट करता है कि उनका शैक्षिक दृष्टिकोण व्यापक था। वे शिक्षा को केवल महिलाओं की मुक्ति का साधन नहीं, बल्कि पूरे समाज के विकास का आधार मानते थे। इसी कारण उन्होंने ग्रामीण प्राथमिक शिक्षा, वयस्क शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए भी कार्य किया।
इस प्रकार महर्षि धोंडो केशव कर्वे का जीवन आधुनिक भारत में सामाजिक सुधार की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें विचार और कर्म का गहरा संबंध था। उन्होंने जिस समय विधवा-पुनर्विवाह और महिला शिक्षा का समर्थन किया, उस समय इन विचारों का रूढ़िवादी समाज द्वारा व्यापक विरोध किया जाता था। इसके बावजूद उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक कार्यों दोनों के माध्यम से अपने विचारों को व्यवहार में उतारा। विधवा से पुनर्विवाह उनके सुधारवादी जीवन का प्रारंभिक और साहसिक कदम था। इसके बाद हिंदू विधवा गृह, हिंगणे की संस्था, महिला विद्यालय, निष्काम कर्म मठ, शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं और अंततः महिला विश्वविद्यालय की स्थापना ने उनके आंदोलन को स्थायी संस्थागत आधार प्रदान किया। 1916 ई. में स्थापित महिला विश्वविद्यालय ने भारतीय महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के नए द्वार खोले और आगे चलकर एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। उनका योगदान केवल महिला शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने ग्रामीण शिक्षा, सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के विरोध तथा व्यापक सामाजिक सुधार के लिए भी कार्य किया। उनके जीवन से स्पष्ट है कि सामाजिक परिवर्तन केवल विचारों की अभिव्यक्ति से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत साहस, निरंतर परिश्रम, संस्थागत निर्माण और दीर्घकालीन सामाजिक प्रतिबद्धता से संभव होता है।
1958 ई. में भारत रत्न से सम्मानित होना उनके जीवनभर के कार्यों की राष्ट्रीय मान्यता थी। भारत सरकार की आधिकारिक अधिसूचना इस सम्मान की पुष्टि करती है। महर्षि कर्वे की स्थायी विरासत भारतीय महिलाओं के लिए शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन के अवसरों के विस्तार में दिखाई देती है। भारतीय समाज-सुधार और महिला शिक्षा के इतिहास में उनका स्थान इसलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने के साथ-साथ उनके स्थान पर नई शैक्षिक और सामाजिक संस्थाओं का निर्माण किया।
महत्त्वपूर्ण FAQ
1. डी. के. कर्वे का पूरा नाम क्या था?
डी. के. कर्वे का पूरा नाम धोंडो केशव कर्वे था। उनका जन्म 18 अप्रैल 1858 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के शेरवली में हुआ था।
2. डी. के. कर्वे किस सामाजिक सुधार के लिए प्रसिद्ध हैं?
वे मुख्यतः विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया।
3. डी. के. कर्वे ने महिला शिक्षा के लिए कौन-सी प्रमुख संस्था स्थापित की?
उन्होंने 1916 में भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो आगे चलकर श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकर्से (एस.एन.डी.टी.) महिला विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
4. डी. के. कर्वे ने विधवा पुनर्विवाह के क्षेत्र में क्या योगदान दिया?
उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन केवल विचारों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वयं एक विधवा से विवाह करके सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी। उन्होंने विधवाओं के कल्याण और शिक्षा के लिए संस्थाएँ भी स्थापित कीं।
5. डी. के. कर्वे को भारत रत्न कब प्रदान किया गया?
भारत सरकार ने उन्हें 1958 में भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके 100वें जन्मवर्ष में प्रदान किया गया था।
6. डी. के. कर्वे को ‘महर्षि’ क्यों कहा जाता है?
महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और व्यापक सामाजिक सुधार के लिए उनके दीर्घकालीन समर्पित कार्य के कारण उन्हें सम्मानपूर्वक ‘महर्षि कर्वे’ कहा गया। उन्होंने अपना लगभग पूरा जीवन सामाजिक सेवा और महिला उत्थान के लिए समर्पित किया


