महर्षि दयानंद सरस्वती (1824–1883 ई.)
उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारतीय इतिहास में गहन सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक परिवर्तन का काल था। 1857 ई. के विद्रोह के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक संरचना अधिक सुदृढ़ हुई, जिसके साथ आधुनिक शिक्षा, मुद्रण संस्कृति, ईसाई मिशनरी गतिविधियों तथा औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था का विस्तार भी हुआ। इन परिवर्तनों ने भारतीय समाज के समक्ष सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक परंपरा और सामाजिक पुनर्गठन से जुड़े नए प्रश्न उपस्थित किए। इसी ऐतिहासिक संदर्भ में स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883 ई.) का उदय हुआ, जिन्होंने वैदिक परंपरा की पुनर्व्याख्या के माध्यम से भारतीय समाज में आत्मसम्मान, शिक्षा, सामाजिक सुधार और नैतिक पुनर्जागरण का कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
महर्षि दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के प्रमुख धार्मिक चिंतक, समाज-सुधारक, वैदिक विद्वान और आर्य समाज के संस्थापक थे। उनका बचपन का नाम मूलशंकर था। उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के भारत में धार्मिक रूढ़ियों, मूर्तिपूजा, अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, बाल-विवाह और स्त्री-अशिक्षा के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाया। उनका प्रसिद्ध आह्वान ‘वेदों की ओर लौटो’ था — वे वेदों को सत्य ज्ञान का सर्वोच्च और अचूक स्रोत मानते थे और समाज को वैदिक सिद्धांतों के आधार पर पुनर्गठित करना चाहते थे। उन्होंने ही सबसे पहले 1876 ई. में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया।
दयानंद का सुधारवाद केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, उन्होंने शिक्षा, स्त्री-अधिकार, सामाजिक समानता, स्वदेशी, स्वभाषा और स्वराज्य जैसे विषयों पर भी विचार व्यक्त किए। उनकी सबसे प्रभावशाली रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में धार्मिक और सामाजिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। यद्यपि उन्होंने प्रत्यक्ष राजनीतिक राष्ट्रवाद का प्रतिपादन नहीं किया, तथापि उनके विचारों ने आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय चेतना के निर्माण के लिए आवश्यक सामाजिक एवं वैचारिक आधार तैयार किया। इतिहासलेखन के तुलनात्मक अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि दयानंद का मूल्यांकन समय के साथ परिवर्तित हुआ है — प्रारंभिक जीवनीपरक साहित्य जहाँ उन्हें मुख्यतः धार्मिक सुधारक के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं आधुनिक इतिहासकार जैसे- जे.टी.एफ. जॉर्डेंस, केनेथ डब्ल्यू. जोन्स, बिपिन चंद्र, सुमित सरकार, शेखर बंद्योपाध्याय, सी.ए. बेली आदि उन्हें औपनिवेशिक भारत के व्यापक सामाजिक एवं बौद्धिक पुनर्जागरण का एक प्रमुख प्रतिनिधि मानते हैं। इस प्रकार उनका ऐतिहासिक महत्त्व धार्मिक सुधारक की पारंपरिक छवि से कहीं व्यापक है।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
दयानंद सरस्वती का जन्म फाल्गुन दशमी, विक्रमी संवत् 1881 तदनुसार 12 फरवरी 1824 ई. को गुजरात के टंकारा (वर्तमान राजकोट जिला) में हुआ था। उस समय यह मोरबी रियासत के अंतर्गत था। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी (श्रीकर्षणजी) था और माता का नाम यशोदाबाई। परिवार औदीच्य सामवेदी ब्राह्मण कुल से संबंधित एवं समृद्ध व प्रभावशाली था और उनके पिता स्थानीय प्रशासन से जुड़े कर-कलेक्टर के रूप में कार्यरत थे। माता वैष्णव मत की अनुयायी थीं जबकि पिता शैव परंपरा के अनुयायी थे। जन्म-राशि और मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण बालक का नाम ‘मूलशंकर’ रखा गया, जिन्हें ‘दयाराम’ भी कहा जाता था। वे पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे और उनका प्रारंभिक जीवन आराम से व्यतीत हुआ।
बाल्यकाल और प्रारंभिक शिक्षा
मूलशंकर का पालन-पोषण धार्मिक वातावरण में हुआ। उनकी शिक्षा पाँच वर्ष की आयु में आरंभ हुई और आठ वर्ष की आयु तक उन्होंने देवनागरी लिपि में महारत हासिल कर ली थी। इसी उम्र में वेदाध्ययन आरंभ करने के लिए उन्हें जनेऊ (पवित्र धागा) पहनाया गया। चौदह वर्ष की आयु तक उन्होंने यजुर्वेद और अन्य वेदों के मंत्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। बचपन से ही उन्होंने संस्कृत, धार्मिक ग्रंथों और हिंदू परंपराओं का गहन अध्ययन आरंभ कर दिया था। परिवार की धार्मिक आस्था का उनके प्रारंभिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा, किंतु आगे चलकर उनकी जिज्ञासु और तर्कशील प्रवृत्ति ने उन्हें प्रचलित धार्मिक मान्यताओं की आलोचनात्मक जाँच के लिए प्रेरित किया।
शिवरात्रि की घटना और मूर्तिपूजा पर प्रश्न
मूलशंकर के पिता शिव के भक्त थे और चाहते थे कि उनका पुत्र भी उसी मार्ग पर चले। महाशिवरात्रि की रात मूलशंकर अपने परिवार के साथ मंदिर में रात्रि-जागरण के लिए गए, जहाँ सभी भक्त शिव की मूर्ति के सामने रात भर जागकर पूजा-अर्चना कर रहे थे। उन्हें सिखाया गया था कि इस रात सो जाने वाले को भक्ति का फल नहीं मिलता है। धीरे-धीरे परिवार के अन्य सदस्य सो गए, किंतु मूलशंकर जागते रहे और शिव की प्रत्यक्ष उपस्थिति की प्रतीक्षा करते रहे। रात्रि की शांति में कुछ चूहे बिलों से बाहर निकले और मूर्ति के पास चढ़ाए गए प्रसाद को कुतरने लगे, कुछ चूहे मूर्ति पर भी चढ़ गए। यह देखकर मूलशंकर के मन में गहरा प्रश्न उठा, यदि यह मूर्ति वास्तव में सर्वशक्तिमान ईश्वर का स्वरूप है, तो वह स्वयं को चूहों से क्यों नहीं बचा सकती। पिता ने समझाने का प्रयास किया कि मूर्ति स्वयं भगवान नहीं, बल्कि केवल पूजा के लिए एक प्रतीक है, किंतु मूलशंकर यह समझ नहीं पाए कि लोग सीधे भगवान की पूजा करने के बजाय मूर्ति की पूजा क्यों करते हैं?
इस अनुभव ने उनके धार्मिक चिंतन की दिशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे चलकर वे मूर्तिपूजा तथा कर्मकांड के प्रबल आलोचक बन गए। यह घटना उनके जीवन में तर्क, सत्य की खोज और धार्मिक मान्यताओं की स्वतंत्र जाँच की शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है। इसके बाद के दो वर्ष उन्होंने निघंटु (वैदिक शब्दों का शब्दकोश), निरुक्त (वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति), पूर्व-मीमांसा (वेदों के कर्मकांडीय अंशों की पड़ताल) तथा धार्मिक अनुष्ठानों व यज्ञों से संबंधित ग्रंथों को सीखने में बिताए।
पारिवारिक शोक और गृह-त्याग
मूलशंकर की छोटी बहन और चाचा की मृत्यु ने उन्हें जीवन-मृत्यु के प्रश्नों पर गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित किया। वे जानना चाहते थे कि मनुष्य की मृत्यु के बाद क्या होता है और जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है। परिवार ने उनका विवाह कराने का प्रयास किया, किंतु मूलशंकर तब तक सांसारिक जीवन से विरक्त हो चुके थे। लगभग बाईस वर्ष की आयु में सत्य ज्ञान, आध्यात्मिक पवित्रता और मोक्ष की खोज में उन्होंने लगभग 1845-46 ई. में घर छोड़ दिया और संन्यासी के रूप में देशभर में भ्रमण आरंभ कर दिया।
सत्य की खोज : भ्रमण और संन्यास
आत्म-मुक्ति की खोज में मूलशंकर ने लगभग पंद्रह वर्ष एक घूमते हुए साधु के रूप में बिताए। गृह-त्याग के बाद उन्होंने विभिन्न साधुओं, विद्वानों और धार्मिक आचार्यों से संपर्क किया तथा योग, वेदांत, दर्शन और संस्कृत शास्त्रों का अध्ययन किया। कुछ समय तक वे अद्वैत वेदांत से प्रभावित रहे और ‘शुद्ध चैतन्य’ नाम से भी जाने गए। बाद में उन्होंने संन्यास की औपचारिक दीक्षा ग्रहण की और ‘दयानंद सरस्वती’ नाम धारण किया, जिसके बाद उनका जीवन वैदिक ज्ञान की खोज और उसके प्रचार के लिए समर्पित हो गया।
स्वामी विरजानंद से शिक्षा
दयानंद के जीवन में निर्णायक मोड़ लगभग 1860 ई. में आया, जब उनकी भेंट मथुरा के प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) स्वामी विरजानंद से हुई। स्वामी विरजानंद महान वैदिक विद्वान और व्याकरण के विशेषज्ञ थे। दयानंद ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया और उनके मार्गदर्शन में पाणिनीय व्याकरण, पातंजल योगसूत्र तथा वेद-वेदांगों का गंभीर अध्ययन किया। विरजानंद ने दयानंद को तत्कालीन हिंदू समाज और धर्म में व्याप्त कुरीतियों तथा पतन की स्थिति से परिचित कराया। उन्होंने दयानंद के मन में वेदों के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न की और उन्हें वैदिक धर्म को सत्य एवं शुद्ध धार्मिक ज्ञान का मूल स्रोत मानने के लिए प्रेरित किया। इस शिक्षा ने दयानंद के जीवन की दिशा बदल दी और आगे चलकर उनके धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की आधारभूमि तैयार की।
गुरु-दक्षिणा में विरजानंद ने माँगा : “विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, मत-मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो, यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।” उन्होंने अंतिम शिक्षा दी कि मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा पाई जाती है, किंतु ऋषिकृत ग्रंथों (वेदों) में नहीं। दयानंद ने 1864 ई. में अपनी वैदिक शिक्षा पूर्ण की। इसके बाद उन्होंने वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार और अध्ययन के लिए 1874 ई. तक लगभग एक दशक तक पूरे भारत की यात्रा की। उनकी पहली प्रमुख रचना 1874 ई. में ‘पंचमहायज्ञ विधि’ के रूप में सामने आई।
हरिद्वार कुंभ और पाखंड-विरोधी अभियान
1867 ई. के हरिद्वार कुंभ मेले में दयानंद धर्म-प्रचार के उद्देश्य से पहुँचे, जहाँ हिंदू स्त्री-पुरुष और साधु लाखों की संख्या में एकत्र होते थे। उन्होंने देखा कि साधु और पंडे धर्म का उपदेश देकर लोगों को सन्मार्ग दिखाने के बजाय पाखंड की शिक्षा देकर उन्हें लूट रहे हैं और समाज अज्ञान के गहरे गड्ढे में गिर रहा है। इससे गहरी चोट खाकर उन्होंने साधुओं-पंडों के पाखंड की पोल खोलने का निर्णय लिया और अपने निवास-स्थान के आगे ‘पाखंड-खंडिनी पताका’ नामक पताका गाड़कर व्याख्यान देने लगे। उस समय तक लोगों ने किसी संन्यासी के मुख से मूर्तिपूजा का विरोध, श्राद्धों का निराकरण, अवतारवाद और पुराणों की काल्पनिकता जैसी बातें नहीं सुनी थीं, इसलिए यह दृश्य विस्मयकारी था। कुछ पंडितों ने उन्हें ‘नास्तिक’ कहा और गालियाँ दीं, किंतु वे अपने काम में संलग्न रहे। वाद-विवाद के लिए आने वाले अनेक पंडित-साधु उनकी युक्तियुक्त बातों से निरुत्तर होकर लौट जाते। स्वामी जी सबसे यही कहते कि हर की पैड़ी पर स्नान करने से पाप नहीं धुलते, वेद की शिक्षा पर चलना, अच्छे कर्म करना ही सुख और मोक्ष का मार्ग है और सद्ग्रंथों का पठन-श्रवण तथा सच्चे धर्मात्माओं की संगति ही सच्चा तीर्थ है।
गुरु-शिक्षा से प्रेरित होकर दयानंद ने देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं, सार्वजनिक सभाओं और शास्त्रार्थों में भाग लिया तथा मूर्तिपूजा, कर्मकांड, अंधविश्वास और धार्मिक रूढ़ियों की आलोचना करते रहे। वे धार्मिक आस्था को सदैव तर्क और वैदिक सिद्धांतों की कसौटी पर परखने पर बल देते थे।
कलकत्ता यात्रा और हिंदी का प्रयोग
1872-73 ई. के आसपास दयानंद कलकत्ता पहुँचे, जहाँ उनका संपर्क ब्रह्म समाज के प्रमुख नेताओं केशवचंद्र सेन और देवेंद्रनाथ ठाकुर से हुआ। इस संपर्क ने उनके सार्वजनिक प्रचार के तरीके को प्रभावित किया। यहीं से उन्होंने पूर्ण वस्त्र पहनना तथा हिंदी में बोलना-लिखना आरंभ किया। केशवचंद्र सेन के सुझाव पर दयानंद ने अपने विचारों के प्रचार में अधिक व्यापक रूप से हिंदी का प्रयोग किया, जिससे उनका संदेश संस्कृत-भाषी विद्वानों तक सीमित न रहकर सामान्य शिक्षित जनता तक भी पहुँचने लगा। कलकत्ता प्रवास में ही उन्होंने तत्कालीन वायसरॉय से कहा था कि विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं है, परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक शिक्षा और अलग-अलग व्यवहार का त्याग किए बिना परस्पर उपकार सिद्ध होना कठिन है।
आर्य समाज की स्थापना (10 अप्रैल 1875 ई.)
दयानंद सरस्वती ने 10 अप्रैल 1875 ई. (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 1932) को गिरगाँव, बंबई (मुंबई) में आर्य समाज की पहली बैठक आयोजित कर इसकी स्थापना की। आर्य समाज का उद्देश्य किसी नए धर्म की स्थापना करना नहीं, बल्कि दयानंद की दृष्टि में वैदिक धर्म के मूल सिद्धांतों की पुनर्स्थापना और समाज में व्याप्त कुरीतियों का विरोध करना था। इसके नियम-सिद्धांत बाद में व्यवस्थित रूप से विकसित हुए और 1877 ई. में लाहौर में इन्हें अधिक निश्चित रूप दिया गया। इस संगठन ने उन्नीसवीं सदी के अंत में उत्तर भारत के बौद्धिक-सामाजिक परिदृश्य पर गहरी छाप छोड़ी।
उल्लेखनीय है कि 1893 ई. में शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ (जिसमें स्वामी विवेकानंद ने भाग लिया) से लगभग बीस वर्ष पूर्व ही दयानंद ने दिल्ली में सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर एक सम्मेलन आयोजित किया था। इस मामले में वे अपने समय के अन्य विचारकों से काफी आगे थे।
आर्य समाज के उद्देश्य और सिद्धांत
आर्य समाज ने ईश्वर को एक, निराकार, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान माना तथा मूर्तिपूजा का विरोध किया। इसके प्रमुख धार्मिक विचारों में एक निराकार-सर्वव्यापक ईश्वर की उपासना, वेदों को सर्वोच्च धार्मिक प्रमाण मानना, मूर्तिपूजा-अंधविश्वास का विरोध, यज्ञ-नैतिक आचरण-सत्य के पालन पर बल, शिक्षा और ज्ञान का प्रसार, मानव-कल्याण तथा सामाजिक सेवा की भावना, और सत्य को स्वीकार कर असत्य का त्याग करना शामिल था। आर्य समाज से जुड़ा प्रसिद्ध वैदिक वाक्य ‘कृण्वंतो विश्वमार्यम्’ ऋग्वेद से लिया गया है, जिसका आशय संसार को श्रेष्ठ, उदात्त और सभ्य बनाने की प्रेरणा से लिया जाता है। इसमें केवल किसी एक समुदाय के उत्थान की नहीं, बल्कि ज्ञान, सत्य और नैतिकता के माध्यम से समस्त मानव-समाज के कल्याण की भावना निहित थी। आर्य समाज के दस सिद्धांत इस प्रकार व्यवस्थित किए गए-
- ईश्वर सभी सच्चे ज्ञान और ज्ञान से जानी जाने वाली सभी वस्तुओं का मूल कारण है।
- ईश्वर सत्, चित् और आनंदस्वरूप है- निराकार, सर्वज्ञ, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, अपरिवर्तनीय, अनादि, अद्वितीय, सबका आधार, सबका स्वामी, सर्वव्यापक, सर्व-अंतर्यामी, अजर, अमर, निर्भय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, केवल वही पूजा के योग्य है।
- वेद सब सत्य विद्याओं के पुस्तक हैं; वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
- सत्य के ग्रहण और असत्य के परित्याग में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
- सब कार्य धर्मानुसार अर्थात् सत्य-असत्य को विचार कर करने चाहिए।
- संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है- सबकी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
- सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए।
- अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
- प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में संतुष्ट न रहकर सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
- सब मनुष्यों को सामाजिक, सार्वजनिक और सबके हित के नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए, जबकि व्यक्तिगत हित के नियमों में सब स्वतंत्र रहें।
वेदों की सर्वोच्चता संबंधी दयानंद के मूल दावे
दयानंद अपनी रचनाओं में पाँच अहम दावे प्रस्तुत करते हैं जो अन्य धर्मों के प्रति उनके दृष्टिकोण को निर्धारित करते हैं-
- केवल वैदिक धर्म ही सच्चा और अचूक है, जिसे स्वयं ईश्वर ने प्रकट किया है;
- सृष्टि के आरंभ से लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व तक पूरे संसार में केवल वैदिक धर्म ही प्रचलित था;
- संसार के सभी वर्तमान धर्म भारत में ही उत्पन्न हुए और वेदों से ही निकले हैं;
- विज्ञान सहित समस्त ज्ञान भारत से ही मिस्र, फिर ग्रीस, वहाँ से यूरोप और अंततः अमेरिका सहित अन्य देशों में फैला;
- महाभारत युद्ध तक आर्य संपूर्ण पृथ्वी के शासक थे और वैदिक धर्म का पालन करते थे। उनके अनुसार ईश्वर ही समस्त ज्ञान का शाश्वत स्रोत है और वह वेदों के माध्यम से मानवता तक ज्ञान पहुँचाता है; वेद पूरी मानवता के लिए सामान्य शिक्षाएँ देते हैं और वेदों के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रंथ में ईश्वर ने सत्य प्रकट नहीं किया। वे वेदों को त्रुटिहीन और शाश्वत मानते थे — ठीक वैसे ही जैसे ईश्वर शाश्वत है।
स्वामी दयानंद ने वैदिक आस्था के सत्य होने के चार प्रमाण दिए- प्रथम, वेद निरंतर शुद्ध एकेश्वरवाद की घोषणा करते हैं; द्वितीय, यह सर्वाधिक तर्कसंगत धर्म है क्योंकि इसमें कुछ भी तर्क-विरुद्ध नहीं; तृतीय, नैतिकता ही इसका आधार है; चतुर्थ, यह सार्वभौमिक है- भूत, वर्तमान और भविष्य, हर स्थान और सभी लोगों के लिए है। विद्वान एच. कावर्ड की टिप्पणी के अनुसार दयानंद ने प्रोटेस्टेंट सिद्धांत ‘सोला स्क्रिप्टुरा’ (केवल धर्मग्रंथ) को अपनाकर उसे वेदों पर लागू करके हिंदू धर्म को धर्मग्रंथ-आधारित धर्म बना दिया। दयानंद यह भी मानते थे कि संस्कृत वेदों की भाषा होने के कारण किसी एक देश की भाषा नहीं, बल्कि समस्त भाषाओं और लोगों का स्रोत है।
‘सत्यार्थ प्रकाश’
दयानंद की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है, जो मूलतः हिंदी में लिखी गई। इसका प्रथम संस्करण 1875 ई. में प्रकाशित हुआ, जिसमें ग्यारह अध्याय थे- प्रथम दस अध्यायों में विभिन्न विषयों पर उनके विचारों का विस्तृत विवरण था, जबकि ग्यारहवाँ अध्याय (जो पुस्तक का लगभग एक-चौथाई भाग है) हिंदू धर्म की आलोचना, मूर्तिपूजा, चमत्कार, तीर्थयात्रा, साधु-संत, संप्रदाय व पुराणों की चर्चा को समर्पित था। जीवन के अंतिम समय में दयानंद ने इस संस्करण में पर्याप्त संशोधन किए और तीन अतिरिक्त अध्याय (कुल चौदह समुल्लास) जोड़े, जिनमें चार्वाक, बौद्ध और जैन धर्म (भारतीय मूल के धर्म) तथा ईसाई व इस्लाम धर्म (उनके अनुसार विदेशी धर्म) की चर्चा थी। यह संशोधित संस्करण 1884 में ई. प्रकाशित हुआ, यद्यपि इसकी प्रूफ-रीडिंग 1883 ई. में दयानंद की मृत्यु से पूर्व ही पूर्ण हो चुकी थी। दोनों संस्करणों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि दयानंद ने जीवन के अंतिम वर्षों में अपने कुछ पूर्व विचारों में उल्लेखनीय परिवर्तन किए थे; संशोधित संस्करण अधिक ‘व्यवस्थित’ है और इसे ही आर्य समाज आधिकारिक संस्करण मानता है।
‘सत्यार्थ प्रकाश’ में वेद, ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष, शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक आचरण पर विस्तार से विचार किया गया है तथा अंतिम भाग में भारतीय व विदेशी धार्मिक मतों की आलोचनात्मक समीक्षा भी है। यह ग्रंथ आर्य समाज के वैचारिक आधार के निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली रहा।
अन्य धर्मों की व्याख्या के सिद्धांत
‘सत्यार्थ प्रकाश’ की प्रस्तावना में दयानंद ने चार सिद्धांत प्रस्तुत किए, जिन्हें अन्य धर्मों की व्याख्या करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए- आकांक्षा (वक्ता या लेखक की भावना को समझना), योग्यता (शब्द और उसके अर्थ के बीच तर्कसंगत तालमेल), आसत्ति (किसी वाक्य को उसके पूरे संदर्भ में समझना) और तात्पर्य (शब्दों का वही अर्थ लेना जो वक्ता का मूल आशय था)। विद्वान पी.एस. डैनियल के अनुसार जब दयानंद ने स्वयं अन्य धर्मों तथा उनके ग्रंथों की व्याख्या की, तो उन्होंने अपने ही सुझाए इन नियमों की प्रायः अवहेलना की- उन्होंने धर्मग्रंथों का शाब्दिक अर्थ लिया और उस संदर्भ-भावना को नज़रअंदाज़ किया जिसमें वे लिखे गए थे। बेंजामिन वॉकर का मानना है कि वेदों की उनकी व्याख्या भी काफी हद तक काल्पनिक और अपनी पूर्व-धारणाओं पर आधारित थी। चूँकि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी, इसलिए उन्हें मुख्यतः स्थानीय स्रोतों से ही प्रेरणा मिली। जे.टी.एफ. जॉर्डेंस के अनुसार दयानंद की धार्मिक सोच में बाधा इसलिए आई क्योंकि वे धर्मग्रंथों की व्याख्या में मिथक और प्रतीकों के अर्थ को समझने में असमर्थ रहे- उनके लिए धर्मशास्त्र के क्षेत्र में केवल शुद्ध तर्कसंगतता ही स्वीकार्य थी। पी.एस. डैनियल का यह भी कहना है कि अन्य धर्मों की आलोचना में दयानंद का मार्गदर्शन प्रायः तर्कसंगतता से नहीं बल्कि द्वेष-भावना से हुआ, जबकि एफ.के. खान दुर्रानी के अनुसार दयानंद के लिए कोई बात तभी सही मानी जाती जब वह वेदों में मिलती हो। इस प्रकार वे वास्तव में सत्य नहीं, बहस में विजय चाहते थे।
धर्मों की विविधता पर दयानंद का दृष्टिकोण
जे.टी.एफ. जॉर्डेंस के अनुसार दयानंद ने अन्य धर्मों के संदर्भ में हिंदू धर्म के बारे में गंभीरता से तब सोचना शुरू किया जब वे 1873 ई. में कलकत्ता गए और वहाँ ब्रह्म समाज के उन नेताओं से मिले जो ईसाई व इस्लामी शिक्षाओं से प्रभावित थे। दयानंद का मानना था कि मूल रूप से केवल चार प्रमुख गैर-वैदिक या ‘अन्य’ धर्म हैं- पौराणिक, ईसाई, जैन और मुस्लिम, जिनमें अन्य सभी संप्रदाय समाहित हैं। धर्मों की अनेकता पर वे इसलिए दुखी थे क्योंकि इनके बीच पारस्परिक द्वेष और संघर्ष व्याप्त था। उनका मानना था कि हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह सत्य को पहचाने-अपनाए और असत्य को त्यागे। उन्होंने इस प्रचलित तर्क को अस्वीकार किया कि मनुष्यों की भिन्न प्रकृति के कारण धर्मों की विविधता आवश्यक है, अथवा यह कि सभी धर्म अच्छे हैं इसलिए उनकी आलोचना अनुचित है। उनके अनुसार चूँकि एकमात्र सत्य धर्म वैदिक धर्म है, अतः धर्मों की विविधता अनावश्यक और अज्ञानता का परिणाम है।
फिर भी, कुछ अवसरों पर दयानंद यह स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक धर्म में विद्वान लोग होते हैं और सभी धर्मों में कुछ सार्वभौमिक सत्य भी पाए जाते हैं- जिन बातों पर वे परस्पर सहमत हैं वे सत्य हैं, शेष असत्य मानी जानी चाहिए। तथापि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ से स्पष्ट है कि दयानंद के अनुसार अन्य धर्मों में जो भी सत्य पाया जाता है, वह मूलतः वेदों से ही लिया गया है और शेष असत्य के साथ मिश्रित होने के कारण त्याज्य है, जैसे सर्वोत्तम भोजन में विष मिला हो।
प्रचलित हिंदू धर्म की आलोचना
दयानंद की प्रमुख चिंताओं में से एक हिंदू धर्म को अनेक देवताओं की पूजा, मूर्तिपूजा, पशुबलि, ब्राह्मणों के विशेषाधिकार, प्रचलित देवी-देवताओं की पूजा, लंबी तीर्थयात्राओं और धार्मिक स्नान जैसी दूषित मान्यताओं-प्रथाओं से मुक्त कर उसका पुनरुद्धार करना था। उनका तर्क था कि पुराण, तंत्र और अन्य परवर्ती ग्रंथ, जो ऐसी मान्यताओं का समर्थन करते हैं, उन्हें त्याग देना चाहिए। उन्होंने इन ग्रंथों को पाखंडी और स्वार्थी पुजारियों द्वारा अज्ञानी जनता को धोखा देने के लिए रची गई रचनाएँ माना। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का ग्यारहवाँ अध्याय विशेष रूप से हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों-पंथों के आलोचनात्मक विश्लेषण को समर्पित है। दयानंद का मानना था कि वेदों का अध्ययन केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं, बल्कि शूद्रों सहित सभी के लिए खुला होना चाहिए, क्योंकि कोई व्यक्ति केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेने मात्र से ब्राह्मण नहीं बन जाता। यदि ईश्वर ने वेदों का ज्ञान केवल किसी एक वर्ग के लिए दिया होता तो यह उसके न्याय पर प्रश्न खड़ा करता। एस. डैनियल के अनुसार हिंदू धर्म की इस कठोर आलोचना के पीछे दयानंद का उद्देश्य उसका पुनरुद्धार करना ही था, जिसके लिए उन्होंने हिंदुओं से ‘वेदों की ओर लौटने’ का आग्रह किया।
मूर्तिपूजा और कर्मकांड का विरोध
दयानंद ने हिंदू समाज में प्रचलित मूर्तिपूजा, अंधविश्वास, कर्मकांड और धार्मिक आडंबर की तीखी आलोचना की। वे मानते थे कि ईश्वर निराकार है और उसकी उपासना किसी भौतिक मूर्ति के माध्यम से नहीं की जा सकती। उन्होंने पुरोहितवाद की उन प्रवृत्तियों का भी विरोध किया जिनमें धार्मिक ज्ञान को किसी विशेष वर्ग का विशेषाधिकार बना दिया गया था। उनके अनुसार वेदों का अध्ययन सभी योग्य व्यक्तियों के लिए खुला होना चाहिए। उनका धार्मिक चिंतन का केंद्रीय संदेश था- ‘वेदों की ओर लौटो’। वे वेदों को ईश्वरीय ज्ञान का मूल स्रोत मानते थे और मानते थे कि परवर्ती अनेक रूढ़ियाँ-अंधविश्वास वास्तविक वैदिक धर्म का अंग नहीं हैं। उनका उद्देश्य प्राचीन वैदिक सिद्धांतों को आधुनिक तर्कशीलता के साथ, मानव-बुद्धि और व्याकरणिक-सांस्कृतिक अध्ययन के माध्यम से समझना था।
जाति-व्यवस्था और सामाजिक समानता
दयानंद ने जन्म के आधार पर निर्धारित जातिगत ऊँच-नीच और अस्पृश्यता का विरोध किया। वे सामाजिक स्थिति को व्यक्ति के गुण, कर्म और योग्यता से जोड़ने के पक्षधर थे तथा वेदाध्ययन का अधिकार सभी वर्गों के लिए स्वीकार करते हुए ब्राह्मणों के ज्ञान पर एकाधिकार का विरोध करते थे। यद्यपि उन्होंने वैदिक चार वर्णों की अवधारणा को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे जन्म के बजाय गुण-कर्म पर आधारित मानने का प्रयास किया। इस प्रकार उनका दृष्टिकोण जाति-आधारित ऊँच-नीच के विरोध और वर्ण-व्यवस्था की एक पुनर्व्याख्या दोनों को समाहित करता था।
स्त्री-शिक्षा और महिला अधिकार
दयानंद ने स्त्रियों की शिक्षा का प्रबल समर्थन किया। वे मानते थे कि महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ज्ञान प्राप्त करने और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने का अधिकार होना चाहिए तथा वैदिक अध्ययन और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने का अधिकार भी। उन्होंने बाल-विवाह, स्त्री-अशिक्षा, पर्दा-प्रथा और विधवाओं की दयनीय स्थिति की कड़ी आलोचना की तथा विधवा-पुनर्विवाह और महिलाओं के सम्मानपूर्ण सामाजिक जीवन के समर्थक थे। इस दृष्टि से आर्य समाज आगे चलकर महिला-शिक्षा के प्रसार का महत्त्वपूर्ण माध्यम बना।
बाल-विवाह और विवाह-सुधार
दयानंद मूर्तिपूजा, जाति-व्यवस्था, कर्मकांड, भाग्यवादी सोच, शिशु-हत्या और दहेज़ जैसी प्रथाओं के विरुद्ध थे तथा दबे-कुचले वर्गों के उत्थान के समर्थक थे। वे बाल-विवाह के प्रबल विरोधी थे। उनका विचार था कि विवाह परिपक्व आयु में होना चाहिए और पति-पत्नी दोनों को शारीरिक-मानसिक रूप से विवाह के लिए सक्षम होना चाहिए। उन्होंने विवाह-संस्था में नैतिकता, समानता और उत्तरदायित्व पर बल दिया तथा बहुविवाह और स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार का विरोध किया।
नियोग संबंधी विचार
दयानंद ने वैदिक परंपरा की अपनी व्याख्या के आधार पर ‘नियोग’ की अवधारणा को स्वीकार किया, जिसके अनुसार विशेष परिस्थितियों में संतानहीन दंपति या विधवा को संतान-प्राप्ति के लिए इस व्यवस्था का उपयोग करने की अनुमति हो सकती थी। यह विचार आधुनिक दृष्टि से विवादास्पद रहा है, किंतु दयानंद इसे वैदिक परंपरा के एक सामाजिक प्रावधान के रूप में देखते थे। अतः उनके सामाजिक चिंतन को समझते समय उनके सुधारवादी विचारों के साथ-साथ उनकी उन्नीसवीं शताब्दी की वैदिक व्याख्या को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
श्राद्ध और धार्मिक अंधविश्वास का विरोध
दयानंद ने मृतकों के नाम पर किए जाने वाले अनेक कर्मकांडों की आलोचना की। वे मानते थे कि मृत व्यक्ति की आत्मा को भोजन या दान सीधे पहुँचाने की धारणा तर्कसंगत नहीं है। उनका बल जीवित मनुष्यों की सेवा, शिक्षा, दान और सदाचार पर था। इस प्रकार उन्होंने धार्मिक कर्मकांड के स्थान पर नैतिक आचरण और लोक-कल्याण को अधिक महत्त्व दिया।
इस्लाम की आलोचना
दयानंद ने इस्लाम को हिंदू धर्म के अस्तित्व के लिए एक वास्तविक खतरा माना और इसकी विस्तृत आलोचना की। उन्होंने इस्लाम को असभ्य और अज्ञानी लोगों का धर्म बताया तथा कुरान को ईश्वर द्वारा नहीं, बल्कि किसी छली-कपटी व्यक्ति द्वारा रचित माना, जिसमें कई विरोधाभास और असत्य कथन हैं। उनके अनुसार मोहम्मद कोई नेक व्यक्ति नहीं बल्कि झगड़ालू और अपनी इच्छाओं में लिप्त व्यक्ति थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस्लाम अपने पूरे इतिहास में अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु रहा है। इसलिए दयानंद का निष्कर्ष था कि इस्लाम एक भ्रामक धर्म है जो मानवता को हानि पहुँचाता है और उसे त्यागकर वैदिक धर्म अपनाया जाना चाहिए।
ईसाई धर्म की आलोचना
सुमित सरकार के अनुसार गैर-वैदिक धर्मों के विरुद्ध सबसे दूरगामी और लंबे समय तक असर डालने वाली बहस दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के तेरहवें अध्याय में ईसाई धर्म पर आरंभ की। दयानंद ने ईसाई धर्म को एक ‘किताब का धर्म’ अर्थात् ‘बाइबल का धर्म’ माना और उसका अध्ययन पूर्णतः बाइबल तक सीमित रखा। उनका मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि बाइबल ईश्वर की वाणी नहीं बल्कि मानवकृत रचना है। उनके अनुसार बाइबल का ईश्वर अन्यायपूर्ण, क्रूर, ईर्ष्यालु और सर्वज्ञ न होने के दोषों से युक्त है। इस पर उदाहरण देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि यदि ईश्वर सर्वज्ञ होता तो उसे शैतान की रचना, कैन से एबेल के बारे में प्रश्न पूछने या अब्राहम की परीक्षा लेने की आवश्यकता न पड़ती। उन्होंने बाइबल में तर्क-विरुद्ध बातें (जैसे कुंवारी माँ से यीशु का जन्म, पुनरुत्थान, चमत्कार) होने का दावा किया तथा इसे परस्पर-विरोधाभासी भी बताया, जैसे पापों की क्षमा और कर्मानुसार दंड की परस्पर-विरोधी शिक्षाएँ। उन्होंने बाइबल में सारा-अब्राहम, कुँवारी मैरी के गर्भधारण, मिस्र में पहली संतान की हत्या जैसी कथाओं को अनैतिक व क्रूर बताया तथा पश्चाताप से पाप-मुक्ति के सिद्धांत को अतार्किक और अन्यायपूर्ण कहा। इस आधार पर उनका निष्कर्ष था कि बाइबल कभी ईश्वर की वाणी नहीं हो सकती और इसके लेखक अज्ञानी-असभ्य व्यक्ति थे।
दयानंद के अनुसार ईसा मसीह भी कोई द्रष्टा या आत्म-ज्ञानी व्यक्ति नहीं थे, बल्कि अज्ञानी और मूर्खतापूर्ण बातें करने वाले साधारण व्यक्ति थे। उन्होंने उनकी माता मैरी की पवित्रता पर भी प्रश्न उठाया। उनके अनुसार ईसा में न ईश्वर-पुत्र होने का गुण था, न कोई चमत्कारी शक्ति, न पापों को क्षमा करने की सामर्थ्य- यह सब उनके अनुयायियों द्वारा गढ़ा गया था। कुल मिलाकर दयानंद ने ईसाई धर्म को उथला, बर्बर और विदेशी धर्म बताते हुए ईसाइयों से इसे त्यागकर वैदिक धर्म अपनाने का आह्वान किया।
बेंजामिन वॉकर बताते हैं कि ईसाई धर्म की कड़ी निंदा के बावजूद दयानंद ने उससे कई विचार भी अपनाए। आर्य ट्रैक्ट सोसाइटी, महिला आर्य समाज, युवा आर्य समाज, वैदिक साल्वेशन आर्मी जैसे संगठनों तथा स्कूल-कॉलेज-अनाथालय-विधवा आश्रम-राहत केंद्रों की स्थापना और रविवार की पूजा व वेद-पाठ, उपदेश-शिक्षण जैसी रीतियाँ सीधे ईसाई प्रेरणा से प्रभावित थीं।
जैन धर्म की आलोचना
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के बारहवें अध्याय में दयानंद ने चार्वाक, बौद्ध और जैन धर्मों को विशिष्ट रूप से वेद-विरोधी नास्तिक पंथों के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु उनकी सर्वाधिक आलोचना जैन धर्म के विरुद्ध रही। दयानंद के अनुसार जैन लोग गैर-जैनियों के प्रति पूर्वाग्रही और शत्रुतापूर्ण थे। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी धर्म जैन धर्म जितनी दुश्मनी का उपदेश नहीं देता। उन्होंने जैन तीर्थंकरों और गुरुओं को अज्ञानी बताया तथा जैन धर्मग्रंथों को भ्रामक कथाओं से भरा हुआ माना। इस प्रकार दयानंद ने जैन धर्म को पक्षपाती, विकृत और अज्ञानता में डूबा हुआ धर्म बताया।
अन्य धर्मों के प्रति दयानंद का उग्र रवैया
अनेक विद्वानों ने दयानंद के इस दृष्टिकोण को उग्र और असहिष्णु माना है। जी.एस. सक्सेना के अनुसार स्वामी दयानंद के विचार क्रांतिकारी और उग्र थे, जबकि पी.एस. डैनियल का मानना है कि यदि उनका रवैया आक्रामक था तो इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें दो अपेक्षाकृत आक्रामक धर्मों — ईसाई धर्म और इस्लाम का सामना करना पड़ रहा था। लाला लाजपत राय ने आर्य समाज के आक्रामक स्वभाव को स्वीकार करते हुए कहा कि यह न केवल बाहरी तौर पर बल्कि आंतरिक तौर पर भी उतना ही आक्रामक है। एम.जी. चितकारा के अनुसार दयानंद सदियों की निष्क्रियता के बाद ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध आक्रामक रुख अपनाने वाले पहले व्यक्ति थे। उनके इस रवैये ने हिंदुओं में नया आत्मविश्वास जगाया और धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध एक मज़बूत ढाल का काम किया, किंतु साथ ही इसने हिंदुओं और अन्य धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी को भी बढ़ाया, जो भारत के कई हिस्सों में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों के एक कारण के रूप में देखा गया है।
रोम्यां रोलां के अनुसार दयानंद अपने विचारों, जिन्हें वे स्वयं एकमात्र सत्य मानते थे, के अतिरिक्त बाकी हर तरह की सोच के विरुद्ध ज़ोरदार आवाज़ उठाते थे। ए.एल. बाशम के अनुसार दयानंद के रूप में हिंदू धर्म ने सदियों बाद पहली बार आक्रामक रुख अपनाया। एच. कावर्ड बताते हैं कि दूसरे धर्मों के ग्रंथों को पढ़ने का दयानंद का ढंग विद्वतापूर्ण होने के बजाय सदैव आलोचनात्मक होता था, जिसका मुख्य उद्देश्य बहस में जीतना था, निष्पक्ष सत्य-खोज नहीं। जे.टी.एफ. जॉर्डेंस के अनुसार दयानंद के विचार मुख्यतः नकारात्मक, असहिष्णु और आक्रामक थे तथा उनकी आलोचना में पर्याप्त व्यंग्यात्मक कड़वाहट पाई जाती है।
सभी गैर-वैदिक धर्मों के अंत की कामना
दयानंद का मानना था कि सभी गैर-वैदिक धर्म उलझी हुई बुद्धि की उपज हैं और वैदिक धर्म ही एकमात्र सत्य होने के कारण शेष सभी धर्मों को खारिज किया जाना चाहिए। उनके अनुसार धर्मों की विविधता से केवल दुश्मनी और दुख बढ़ता है और मानवता तभी प्रगति कर सकती है जब सभी एक ही वैदिक धर्म का पालन करें। कर्नल ऑलकॉट को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा कि वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि एक दिन सभी अन्य धर्म समाप्त हो जाएँ और आर्यों द्वारा परंपरा से संजोया गया वह एकमात्र सत्य धर्म सभी लोगों में स्थापित हो जाए। इस प्रकार दयानंद हिंदू धर्म के कुछ रूपों सहित सभी धर्मों के स्थान पर शुद्ध वैदिक धर्म की स्थापना को अपना मिशन मानते थे।
दूसरे धर्मों की व्याख्या में विसंगति
यह एक स्वीकृत तथ्य है कि धार्मिक विचार प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से व्यक्त होते हैं, जिनकी उचित व्याख्या-पद्धति के माध्यम से गहरे अर्थ को समझने की आवश्यकता होती है। किंतु दयानंद ने अन्य धर्मग्रंथों में पाई जाने वाली पौराणिक-प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों को उनके शाब्दिक अर्थ में लेकर उनके छिपे अर्थों को समझने का प्रयास नहीं किया। कावर्ड के अनुसार दयानंद में अन्य धर्मों के अध्ययन की सराहनीय इच्छा थी और उन्होंने मूल ग्रंथों पर पर्याप्त प्रयास भी किया, किंतु उनकी पूर्व-धारणाओं ने उन्हें ग्रंथों को समझने से रोका। जे.एन. फारक्हार ने अन्य धर्मों पर दयानंद की अधिकांश रचनाओं को ‘चुभने वाले ताने’ कहा है।
महात्मा गांधी की आलोचना और ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध
दयानंद की कट्टरपंथी विचारधारा के विरुद्ध सबसे तीखी आलोचनाओं में महात्मा गांधी की टिप्पणी उल्लेखनीय है। 1942 ई. में यरवदा जेल में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पढ़ने के बाद गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा कि उन्होंने इतने महान सुधारक की इससे अधिक निराशाजनक पुस्तक नहीं पढ़ी। दयानंद ने सत्य के पक्ष में होने का दावा किया, किंतु अनजाने में ही उन्होंने जैन धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म और स्वयं हिंदू धर्म को भी गलत ढंग से प्रस्तुत किया। गांधी ने कहा कि यदि दयानंद ने विशेषकर अन्य धर्मों पर लिखे अध्याय न लिखे होते तो लोगों में उनके प्रति सम्मान और अधिक होता। आर्य समाजियों के कड़े विरोध पर गांधी ने उत्तर दिया कि उनकी टिप्पणियाँ पूर्ण सोच-विचार के बाद ही कही गई थीं।
यह भी उल्लेखनीय है कि सिंध सरकार ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के इस्लाम-संबंधी चौदहवें अध्याय पर प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि यह लोगों में दुश्मनी-नफरत को बढ़ावा देता था। सरकारी आदेश में विशेष रूप से कहा गया कि लेखक ने मुसलमानों की धार्मिक मान्यताओं का उपहास किया, कुरान की शिक्षाओं को गलत ढंग से प्रस्तुत किया और पैगंबर मोहम्मद की सत्ता पर आघात किया, जिससे मुस्लिम भावनाओं को ठेस पहुँच सकती थी।
शुद्धि आंदोलन
ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम धर्मगुरुओं की धर्म-परिवर्तन गतिविधियों से हिंदू धर्म को खतरा महसूस करते हुए दयानंद ने ‘शुद्धि’ अथवा धर्म-वापसी समारोह नामक एक नया तरीका अपनाया। ‘शुद्धि’ मूलतः एक प्राचीन हिंदू अवधारणा थी, जिसका अर्थ था धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आवश्यक पवित्रता; परंपरागत रूप से इसका उपयोग जाति-बहिष्कृत हिंदुओं को समुदाय में पुनः शामिल करने के लिए होता था। दयानंद को श्रेय जाता है कि उन्होंने इस प्राचीन परंपरा का दायरा बढ़ाकर उन हिंदुओं को वापस वैदिक धर्म में लाने के लिए इसका प्रयोग किया, जिन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया था। बाद में उन्होंने इसका उपयोग गैर-हिंदुओं को भी वैदिक धर्म में लाने के लिए किया।
1877-78 ई. में पंजाब यात्रा के दौरान दयानंद ने स्वयं शुद्धि की पहल की। लुधियाना में उन्होंने एक भाषण देकर रामशरण नामक ब्राह्मण शिक्षक को धर्म-परिवर्तन से रोका, अमृतसर में ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रहे लगभग चालीस छात्रों को मना लिया और जालंधर में स्वयं एक ईसाई की हिंदू धर्म में वापसी कराई। दयानंद की मृत्यु के बाद उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में शुद्धि आंदोलन अधिक संगठित और सक्रिय हुआ, जिसके प्रमुख नेताओं में पंडित लेखराम और स्वामी श्रद्धानंद शामिल थे। इस आंदोलन ने सामाजिक-धार्मिक पुनरुत्थान का कार्य किया, किंतु इसके कारण अन्य धार्मिक समुदायों के साथ तनाव भी उत्पन्न हुआ। अतः आर्य समाज के इतिहास के इस पक्ष को उसके सुधारवादी योगदान के साथ-साथ औपनिवेशिक भारत की सामुदायिक राजनीति के संदर्भ में भी देखा जाता है।
गोरक्षा आंदोलन
दयानंद ने गोरक्षा का भी प्रचार किया और प्रसिद्ध ‘गौ-रक्षा सभा’ की स्थापना की। इस विषय पर उन्होंने 1880 में ‘गोकरुणानिधि’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने सभी समुदायों के लोगों को गो-कृष्यादि रक्षा समिति की सदस्यता लेने का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य पशु व कृषि की रक्षा था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में गोरक्षा आंदोलन के विस्तार ने हिंदू धार्मिक पहचान को संगठित करने में भूमिका निभाई। इस प्रक्रिया में आर्य समाज का एक भाग प्रारंभिक सामाजिक सुधारवादी कार्यक्रम से आगे बढ़कर धार्मिक पुनरुत्थानवादी गतिविधियों में अधिक सक्रिय हो गया, जिससे औपनिवेशिक भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच तनाव की स्थितियाँ भी पैदा हुईं।
स्वराज्य, स्वदेशी और राष्ट्रवादी विचार
दयानंद के चिंतन में राजनीतिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय आत्मसम्मान का भी महत्त्व था। उन्होंने स्वराज्य की धारणा को महत्त्व देते हुए विदेशी शासन की अपेक्षा स्वशासन को श्रेष्ठ माना। उन्हें 1876 ई. में ‘स्वराज’ शब्द अथवा ‘भारत भारतीयों के लिए’ (आर्यावर्त आर्यावर्तियों के लिए) का नारा गढ़ने का श्रेय दिया जाता है, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी ने अपनाया। सुभाषचंद्र बोस और लाला लाजपत राय सहित स्वतंत्रता संग्राम के अनेक नेता राष्ट्रवाद और सामाजिक सुधार संबंधी दयानंद के विचारों से प्रभावित थे, यद्यपि यह ध्यान रखना चाहिए कि बाद के नेताओं का राजनीतिक कार्यक्रम और दयानंद का वैदिक-सुधारवादी राष्ट्रवाद परस्पर पूर्णतः समान नहीं थे।
दयानंद विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता घटाने और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग के समर्थक थे तथा उन्होंने स्वदेश, स्वभाषा और स्वसंस्कृति के प्रति सम्मान की भावना को प्रोत्साहित किया। उन्होंने संस्कृत को भारत की सामान्य भाषा बनाने का प्रस्ताव रखकर उसे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, यद्यपि बाद में उन्होंने हिंदी को अपनाकर इसे व्यापक संचार की भाषा के रूप में महत्त्व दिया, जिससे उनके विचार उत्तर भारत के व्यापक समाज तक पहुँचने में सहायक हुए।
दयानंद केवल धार्मिक नेता और समाज-सुधारक ही नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विचारक भी थे, जिन्होंने अपने राष्ट्रवादी विचार भारतीय संस्कृति की अपनी समझ से विकसित किए, न कि पश्चिमी विचारों के सीधे प्रभाव से। उन्होंने राष्ट्र को ऐसे लोगों के समूह के रूप में परिभाषित किया जो साझा ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक विशिष्टता, भाषा, क्षेत्र और स्व-शासन के अधिकार के प्रति जागरूक हों। वे इस निष्कर्ष पर लगभग 1875 ई. के आसपास ही पहुँच गए थे, अर्थात् भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से भी लगभग एक दशक पूर्व। यद्यपि आर्य समाज मूलतः कोई राजनीतिक संगठन नहीं था, फिर भी इसकी अपनी राजनीतिक विचारधारा थी, क्योंकि धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों पर इसका निश्चित दृष्टिकोण था। सी. जैफ्रेलो के अनुसार यद्यपि आर्य समाज स्वयं हिंदू राष्ट्रवाद का समर्थक नहीं था, फिर भी यह एक उग्र संगठन था जिससे हिंदू राष्ट्रवाद का उदय हुआ। इसकी वैचारिक विशेषताएँ ऐसी थीं कि यह हिंदू राष्ट्रवाद के आरंभिक केंद्रों में से एक बन गया। जॉर्डेंस के अनुसार दयानंद ने, विशेषकर अपने जीवन के अंतिम वर्षों में एक आक्रामक राष्ट्रवाद विकसित किया।
एक संगठित धर्म-प्रचारक संगठन के रूप में आर्य समाज
जॉर्डेंस के अनुसार 1875 ई. में आर्य समाज की स्थापना धार्मिक विविधता की समस्या पर दयानंद की सबसे महत्त्वपूर्ण और दूरगामी प्रतिक्रिया थी, जिसने उनके संदेश और सुधारों को उत्तर भारत में मज़बूती से स्थापित किया। सर हर्बर्ट रिस्ले के अनुसार आर्य समाज ईसाई धर्म का कड़ा विरोधी था और उसने मिशनरियों की गतिविधियों का मुकाबला करने के साथ-साथ ईसाई बन चुके उच्च-जाति के हिंदुओं को वापस लाने का भी कार्य किया। दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के अंत में कहा कि उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अलग-अलग धर्मों के बीच झगड़ों को समाप्त कर सभी को एक ही धर्म- वैदिक धर्म- के दायरे में लाना था; इसी उद्देश्य से उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। जोन्स के अनुसार धर्म-परिवर्तन कराना आगे चलकर आर्य समाज की एक मुख्य गतिविधि बन गई और इस प्रकार आर्य समाज इस्लाम-ईसाई धर्म की तरह एक संगठित, प्रचारक धर्म बन गया।
ईसाई मिशनरी स्कूलों के माध्यम से धर्मांतरण की आशंका से दयानंद ने आर्य समाज द्वारा संचालित स्कूलों की भी स्थापना की। पी.एस. डैनियल के अनुसार दयानंद ने विभिन्न धर्मों के मध्य पारस्परिक सम्मान पर आधारित सह-अस्तित्व की वकालत नहीं की, बल्कि सभी के द्वारा एक ही धर्म अपनाए जाने की बात कही।
दयानंद के दर्शन और आधुनिक हिंदुत्व के बीच संबंध
अनेक विद्वान दयानंद के धार्मिक कट्टरपंथ और आधुनिक हिंदुत्व के बीच एक वैचारिक संबंध मानते हैं। कहा जाता है कि आधुनिक समय में हिंदू धर्म का राजनीतिकरण करने वालों में दयानंद शायद पहले व्यक्ति थे। वेदों की व्याख्या के माध्यम से उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया कि हिंदू संस्कृति राष्ट्रवाद का स्वाभाविक और आवश्यक आधार होनी चाहिए। उन्होंने एक ‘स्वर्ण युग’ की भी कल्पना की, जिसमें वैदिक युग के आर्यों को ईश्वर द्वारा चुने गए लोगों के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिन्हें वेदों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था। वे भारत को आर्यों की भूमि और भारतीयों को आर्य मानते थे तथा भारत के लिए ‘आर्यावर्त’, दिल्ली के लिए ‘इंद्रप्रस्थ’, इलाहाबाद के लिए ‘प्रयाग’ और उज्जैन के लिए ‘अवंतिका’ जैसे प्राचीन नामों का प्रयोग करते थे। आज के हिंदुत्व-विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों का एजेंडा इनमें से कुछ पुराने नामों को पुनः लागू करना है। उन्होंने ईसाई-इस्लाम को ‘बाहरी धर्म’ और चार्वाक-बौद्ध-जैन को ‘भारत के पंथ’ के रूप में वर्गीकृत किया।
‘वेदों की ओर लौटो’ का आह्वान विदेशों में भी सुना गया। अमेरिका में जन्मे डेविड फ्रॉली (बाद में वामदेव शास्त्री) ने वेदों के अध्ययन से हिंदू बनने का दावा किया और इसी दिशा में कई लेख-पुस्तकें लिखीं। इसी प्रकार मूल रूप से कनाडाई ईसाई रहे ईश्वर शरण ने 1977 ई. में प्रयाग में वैदिक दीक्षा ली और अपनी लेखनी के माध्यम से ईसाई धर्म के विरुद्ध वैचारिक कार्य किया।
वैदिक संस्कृति को थोपने की कोशिशें
भारत में हिंदुत्व-विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच ‘वैदिक संस्कृति के अध्ययन’ के नाम पर वैदिक संस्कृति को पुनर्जीवित करने और आर्य नस्ल की श्रेष्ठता स्थापित करने की एक व्यवस्थित कोशिश देखी जाती है। वैदिक सभ्यता को न केवल भारतीय बल्कि विश्व-सभ्यता की नींव के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति है और स्कूल-विश्वविद्यालयों की शिक्षा में वैदिक अध्ययन को अनिवार्य बनाने के प्रयास हुए हैं। तथाकथित ‘असली इतिहास’ प्रस्तुत करने के नाम पर कुछ इतिहासकारों द्वारा आर्यों को भारत का मूल निवासी बताने, आर्य-आक्रमण को मनगढ़ंत कहानी बताने तथा वैदिक लोगों और हड़प्पावासियों को एक ही मानने जैसे दावे किए जाते हैं।
आधुनिक हिंदू कट्टरपंथ के प्रसंग में दयानंद का मूल्यांकन
दयानंद वैदिक धर्म को परम सत्य तथा सनातन (शाश्वत) धर्म मानते थे, जो हर समय और सभी लोगों के लिए है। उनके अनुसार जो व्यक्ति वेदों या वेदानुरूप ग्रंथों का अनादर करता है, वह वेद-विरोधी पाखंडी है और उसे समाज-राष्ट्र से बहिष्कृत किया जाना चाहिए। मीरा नंदा जैसी विद्वानों का मानना है कि हिंदू धर्म की ‘सहिष्णुता’ का दावा असल में अपनी ही श्रेष्ठता के प्रति आत्ममुग्ध जुनून का मुखौटा मात्र है। आर्य समाज की शुरुआत एक रक्षात्मक हिंदू संगठन के रूप में हुई थी, किंतु शीघ्र ही यह दूसरे धर्मों के विरुद्ध आक्रामक रुख अपनाने वाला संगठन बन गया। इसने मिशनरी गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए ईसाई संगठनात्मक तकनीकें भी अपनाईं और शुद्धि के माध्यम से हिंदू धर्म से बहिष्कृत लोगों को ‘द्विज’ का दर्जा दिलाने के अनुष्ठान किए; आर्य समाज का यह शुद्धि-कार्यक्रम अब संघ परिवार द्वारा भी आगे बढ़ाया जा रहा है।
डी.डी. पटनायक के अनुसार आधुनिक हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा का इतिहास दयानंद से आरंभ होता है। उन्होंने वेदों की अचूकता के सिद्धांत पर आधारित हिंदू धर्म के पुनरुद्धार की वकालत की और नव-हिंदू राष्ट्रवाद की नींव रखी। पटनायक उन्हें आदि शंकराचार्य के समकक्ष भी मानते हैं। दयानंद को उनके ‘वेदों की ओर लौटो’ नारे तथा स्वदेशी-गौरव जगाने के लिए एक महान देशभक्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है, यद्यपि उन्हें एक सच्चे देशभक्त के बजाय ‘हिंदू राष्ट्र’ का देशभक्त कहना अधिक उपयुक्त है। कहा जाता है कि आर्य समाज ने कई चरमपंथियों को प्रेरित किया तथा उनके विचारों ने हिंदू महासभा और जनसंघ को भी प्रभावित किया। इस विश्लेषण के अनुसार अंततः दयानंद जिस बात का समर्थन करते हैं वह है एक संस्कृति, एक धर्म और एक पहचान — वैदिक; इस संदर्भ में कुछ विद्वान उनकी तुलना एडॉल्फ हिटलर के ‘एक राष्ट्र, एक लोग, एक नेता’ विचार से भी करते हैं, यह दिखाता है कि धार्मिक विविधता को स्वीकार न कर पाने के कारण उनका चिंतन धार्मिक टकराव और कट्टरपंथ की ओर ले जाता है। सुभाष आनंद के शब्दों में दयानंद की कमजोरी उनकी धार्मिक परंपरा की कट्टरपंथी व्याख्या थी। विद्वान निनियन स्मार्ट के अनुसार दयानंद राजा राममोहन रॉय की तुलना में कहीं अधिक कट्टरपंथी और आरंभिक राष्ट्रवादी थे, और उनके आर्य समाज का उग्र हिंदू महासभा आंदोलन पर भी कुछ प्रभाव था।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान : डी.ए.वी. और गुरुकुल
दयानंद के विचारों ने तब व्यापक ध्यान आकर्षित किया जब उन्होंने बनारस में रूढ़िवादी हिंदू विद्वानों के साथ सार्वजनिक शास्त्रार्थ किया, जिसकी अध्यक्षता बनारस के महाराजा ने की थी। दयानंद की मृत्यु के बाद आर्य समाज ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक कार्य किया; इसके भीतर शिक्षा-पद्धति को लेकर दो प्रमुख धाराएँ विकसित हुईं – एक धारा ने आधुनिक पश्चिमी शिक्षा और वैदिक मूल्यों के समन्वय पर बल दिया, जिसके परिणामस्वरूप महात्मा हंसराज और सहयोगियों के प्रयासों से दयानंद एंग्लो-वैदिक (डी.ए.वी.) संस्थाओं का विकास हुआ। 1886 ई. में लाहौर में पहला प्रमुख डी.ए.वी. विद्यालय स्थापित हुआ, जिसके प्रधानाचार्य महात्मा हंसराज थे और जो आगे चलकर डी.ए.वी. कॉलेज आंदोलन का आधार बना। दूसरी धारा ने पारंपरिक गुरुकुल शिक्षा को प्राथमिकता दी। स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) के प्रयासों से 1902 ई. में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना हुई, जिसने वैदिक शिक्षा, संस्कृत और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
परोपकारिणी सभा और स्वीकारपत्र
दयानंद ने अपने साहित्य तथा वैदिक ग्रंथों के प्रकाशन एवं सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए 1882-83 ई. में अजमेर में ‘परोपकारिणी सभा’ की स्थापना की। दयानंद ने अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति इसी संस्था को सौंप दी, ताकि उसका उपयोग वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार तथा भारत-विदेश में भेजे जाने वाले प्रचारकों को तैयार करने में हो सके। इस संस्था के माध्यम से उनकी रचनाओं के प्रकाशन और वैदिक साहित्य के प्रसार को संस्थागत आधार मिला और उनके निधन के बाद भी यह उनके साहित्य-विचारों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।
27 फरवरी 1883 ई. को उदयपुर में दयानंद ने एक ‘स्वीकारपत्र’ प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने अपनी मृत्योपरांत परोपकारिणी सभा की जिम्मेदारी 23 व्यक्तियों को सौंपी, ताकि वे उनका कार्य आगे बढ़ा सकें, इनमें महादेव गोविंद रानडे का नाम भी शामिल था। इस स्वीकारपत्र पर 23 गणमान्य व्यक्तियों के साक्षी रूप में हस्ताक्षर हैं और इसके प्रकाशन के लगभग छह माह पश्चात् ही उनका देहांत हो गया।
जोधपुर प्रवास और मृत्यु
1883 ई. में दयानंद जोधपुर नरेश महाराज जसवंत सिंह के निमंत्रण पर जोधपुर गए, जहाँ उनके नित्य प्रवचन होते थे और स्वयं महाराज भी उनके प्रवचन सुनते थे। इस प्रवास के दौरान उन्होंने दरबारी जीवन की कुछ अनैतिक प्रवृत्तियों की आलोचना की, विशेष रूप से नन्हीं नामक एक नर्तकी के दरबार में अनावश्यक प्रभाव को उन्होंने अनुचित बताया। महाराज ने विनम्रतापूर्वक उनकी बात मानकर उससे संबंध तोड़ लिए, जिससे वह नर्तकी दयानंद के विरुद्ध हो गई। परंपरागत आर्य समाजी विवरणों के अनुसार इसके बाद वह दयानंद के रसोइए को अपनी ओर मिलाकर उनके दूध में पिसा हुआ काँच मिलवाने में सफल रही। बाद में रसोइए ने स्वामी जी के समक्ष अपना अपराध स्वीकार कर क्षमा माँगी और उदार-हृदय दयानंद ने पुलिस से बचाने हेतु उसे कुछ धनराशि देकर विदा कर दिया।
इसके पश्चात् जब स्वामी जी की तबियत बिगड़ी तो उन्हें पहले जोधपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ संबंधित चिकित्सक पर भी औषधि के नाम पर हल्का विष देते रहने का संदेह जताया गया। तत्पश्चात् उन्हें अजमेर के अस्पताल लाया गया, किंतु तब तक बहुत विलंब हो चुका था और उन्हें बचाया नहीं जा सका। परंपरागत विवरणों में इस समूचे घटनाक्रम को लेकर यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि इसमें अंग्रेज़ी सरकार के किसी अधिकारी का हाथ हो सकता था, यद्यपि यह न्यायालय में सिद्ध नहीं हो सका।
उल्लेखनीय है कि दयानंद की मृत्यु के कारणों को लेकर ऐतिहासिक स्रोतों में मतभेद है। परंपरागत आर्य समाजी विवरणों में विष दिए जाने की बात कही गई है, किंतु कथित षड्यंत्र, संबंधित व्यक्तियों और चिकित्सकीय घटनाओं के विवरण को लेकर पूर्ण ऐतिहासिक सहमति नहीं है, इसलिए इन विवरणों को सावधानीपूर्वक ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
महर्षि दयानंद सरस्वती का निधन 30 अक्टूबर 1883 ई. को दीपावली के दिन संध्या के समय अजमेर में हुआ। कहा जाता है कि उनके अंतिम शब्द थे : “प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।” वे अपने पीछे स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति और स्वदेशोन्नति के आदर्श तथा ‘कृण्वंतो विश्वमार्यम्’ का सिद्धांत छोड़ गए।
दयानंद सरस्वती की प्रमुख कृतियाँ और लेखन
दयानंद सरस्वती ने धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक विषयों पर अनेक ग्रंथ, लेख और पैम्फलेट लिखे। उनकी आरंभिक रचनाएँ संस्कृत में थीं, किंतु समय के साथ उन्होंने व्यापक पहुँच के लिए हिंदी (आर्यभाषा) में भी लेखन आरंभ किया। इस प्रकार वे उत्तम लेखन के लिए हिंदी का प्रयोग करने वाले अग्रणी व्यक्तियों में से एक थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ धार्मिक, दार्शनिक, वैदिक तथा सामाजिक विषयों से संबंधित थीं। ‘संध्या’ (1863 ई.), जो अब अप्राप्य है, उनकी आरंभिक रचनाओं में मानी जाती है। इसके बाद ‘भागवत खंडन’, ‘पाखंडखंडन’ या ‘वैष्णवमतखंडन’ (1866 ई.) में उन्होंने श्रीमद्भागवत से संबंधित मान्यताओं की आलोचना की, जबकि ‘अद्वैतमत खंडन’ में अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का खंडन किया। ‘पंचमहायज्ञ विधि’ (1874 ई., संशोधित 1877 ई.) उनकी प्रमुख धार्मिक रचनाओं में है। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ (1875 ई., संशोधित संस्करण 1884 ई.) है, जो चौदह समुल्लासों में रचित है; इसके प्रथम दस समुल्लासों में वैदिक धर्म और उसके सिद्धांतों का प्रतिपादन तथा अंतिम चार समुल्लासों में विभिन्न देशी-विदेशी धार्मिक मतों की समीक्षा की गई है। ‘वेदांती ध्वांत निवारण’ (1875 ई.) में वेदांत दर्शन की आलोचना तथा ‘वेदविरुद्धमतखंडन’ या ‘वल्लभाचार्य मत खंडन’ (1875 ई.) में शुद्धाद्वैत दर्शन का खंडन किया गया। इसी क्रम में ‘शिक्षापत्री ध्वांत निवारण’ या ‘स्वामिनारायण मत खंडन’ (1875 ई.) में शिक्षापत्री की आलोचना की गई। ‘वेद भाष्यम् नमूने’ का प्रथम अंक 1875 ई. तथा द्वितीय अंक 1876 ई. में प्रकाशित हुआ। ‘आर्याभिविनय’ (1876 ई.) उनकी अपूर्ण रचना है, जबकि ‘संस्कार विधि’ (1877 ई., संशोधित 1884 ई.) में वैदिक संस्कारों की विधि का वर्णन किया गया है। ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’ (1873/1877 ई.) एक लघु पुस्तिका है, जिसमें लगभग सौ महत्त्वपूर्ण शब्दों और उनके अर्थों की व्याख्या की गई है। ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’ (1878 ई.) वेद-भाष्य की भूमिका के रूप में लिखी गई, जबकि ‘ऋग्वेद भाष्यम्’ (1877 से 1899 ई. तक) अपूर्ण रहा और ‘यजुर्वेद भाष्यम्’ (1878 से 1889 ई. तक) पूर्ण हुआ। ‘अष्टाध्यायी भाष्य’ दो भागों में 1878–1879 ई. के दौरान लिखा गया, लेकिन यह भी अपूर्ण रहा। उनकी महत्त्वपूर्ण वैदिक-व्याकरण संबंधी रचना ‘वेदांग प्रकाश’ सोलह भागों में प्रकाशित हुई, जिसमें वर्णोच्चारण शिक्षा, संस्कृतवाक्यप्रबोधिनी, व्यवहारभानु, संधि-विषय, नामिक, कारक, सामासिक, तद्धित, अव्ययार्थ, आख्यातिक, सौवर, पारिभाषिक, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिकोश और निघंटु आदि विषय सम्मिलित हैं। ‘व्यवहारभानु’ (1879–1880 ई.) में धर्मसम्मत और उचित व्यवहार का वर्णन किया गया है, जबकि ‘संस्कृतवाक्यप्रबोधः’ संस्कृत भाषा सीखने के लिए लिखी गई लघु वार्तालाप-पुस्तिका है, जिसमें विभिन्न विषयों से संबंधित संस्कृत वाक्यों के हिंदी अर्थ दिए गए हैं। ‘भ्रांतिनिवारण’, ‘भ्रमोच्छेदन’ और ‘अनुभ्रमोच्छेदन’ (1880 ई.) में विभिन्न धार्मिक एवं वैचारिक भ्रांतियों का निराकरण किया गया। ‘गोकरुणानिधि’ (1880–1881 ई.) में गो-रक्षा, पशुपालन तथा गो-कृष्यादि रक्षा समिति के गठन और उसकी सदस्यता का आह्वान किया गया। इसके अतिरिक्त ‘चतुर्वेद विषयसूची’ (1877 ई.), ‘गर्दभ तापनी उपनिषद’, ‘गौतम-अहिल्या की कथा’ (1879 ई.) तथा ‘ऋषि दयानंद सरस्वती के पत्र और विज्ञापन’ भी उनकी रचनाओं में सम्मिलित हैं।
आर्य समाज के अनुयायी इनमें से ‘सत्यार्थ प्रकाश’, ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’ और ‘ऋग्वेद भाष्य’ को दयानंद की विचारधारा को समझने के लिए तीन सबसे महत्त्वपूर्ण कृतियाँ मानते हैं। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा संपादित पत्रिका ‘आर्य पत्रिका’ भी उनके विचारों का परिचायक है।
शास्त्रार्थ एवं अन्य दस्तावेज़
वेदों को छोड़कर किसी अन्य धर्मग्रंथ को प्रमाण न मानने के सत्य का प्रचार करने के लिए दयानंद ने देशव्यापी दौरे किए और अनेक शास्त्रार्थ किए, जिनमें प्राचीन परंपरा के पंडित-विद्वान प्रायः उनसे हार मानते थे। संस्कृत भाषा का उन्हें अगाध ज्ञान था और वे प्रचंड तार्किक थे। उन्होंने ईसाई व मुस्लिम धर्मग्रंथों का भी गहन अध्ययन-मंथन किया था और अपने अनुयायियों के साथ ईसाइयत, इस्लाम तथा सनातनधर्मी हिंदुओं- तीनों मोर्चों पर संघर्ष आरंभ किया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने वैचारिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों के दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण शास्त्रार्थ किए। इनमें 1873 ई. का हुगली शास्त्रार्थ तथा प्रतिमा-पूजन विचार विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने बंगाल के पंडितों के साथ मूर्तिपूजा के विषय पर शास्त्रार्थ किया। इसके बाद 1877 ई. में जालंधर शास्त्रार्थ हुआ। 1879 ई. का सत्यासत्य विवेक अथवा बरेली शास्त्रार्थ भी उनके प्रमुख शास्त्रार्थों में गिना जाता है। 1880 ई. में शाहजहाँपुर जिले के चंदपुर में सत्यधर्म विचार के अंतर्गत उन्होंने मुसलमानों और ईसाइयों के साथ धार्मिक विषयों पर शास्त्रार्थ किया। इसी क्रम में 1880 ई. का काशी शास्त्रार्थ अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें उन्होंने काशी के विद्वान पंडितों के साथ मूर्तिपूजा और वैदिक धर्म से संबंधित विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श और शास्त्रार्थ किया।इनके अतिरिक्त संगठनात्मक दस्तावेज़ों में ‘आर्यसमाज के नियम और उपनियम’ (30 नवंबर 1874 ई.), ‘उपदेशमंजरी’ (पूना प्रवचन, 4 जुलाई 1875 ई.) तथा ‘स्वामी दयानंद द्वारा स्वकथित जन्मचरित’ (पूना प्रवचन, 4 अगस्त 1875 ई., तथा थियोसोफिस्ट पत्रिका के लिए नवंबर-दिसंबर अंक) उल्लेखनीय हैं, जिसमें स्वामी जी ने अपने आरंभिक जीवनचरित के विषय में अपने अनुयायियों को स्वयं बताया।
जीवनचरित का लेखन
महर्षि के साहित्य के साथ-साथ उनका जीवनचरित भी अत्यंत प्रेरणास्पद रहा है। उन पर अनेक व्यक्तियों ने जीवनचरित्र लिखे, जिनमें पंडित लेखराम और सत्यानंद प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त बंगाली सज्जन देवेंद्रनाथ मुखोपाध्याय द्वारा बंगाली भाषा में लिखित ‘दयानंद चरित’ की विशेषता यह है कि स्वयं आर्यसमाजी न होते हुए भी उन्होंने अत्यंत श्रद्धाभाव से 15-16 वर्ष तक तथा सहस्रों रुपये व्यय कर ऋषि-जीवन की सामग्री एकत्र की और महर्षि की प्रामाणिक, क्रमबद्ध जीवनी लिखी। यद्यपि देवेंद्रनाथ जी की असामयिक मृत्यु के कारण यह कार्य अधूरा रह गया, जिसे बाद में पंडित लेखराम व सत्यानंद द्वारा संग्रहित सामग्री की सहायता से पंडित घासीराम ने पूर्ण किया। पंडित लेखराम का अनुसंधान मुख्यतः पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक सीमित रहा, जबकि मुंबई और बंगाल की घटनाओं का विशद वर्णन देवेंद्रनाथ जी के ग्रंथ में मिलता है।
महापुरुषों के विचार
महर्षि दयानंद सरस्वती के योगदान और उनके व्यक्तित्व के संबंध में अनेक महापुरुषों एवं विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। डॉ. भगवान दास के अनुसार स्वामी दयानंद हिंदू पुनर्जागरण के प्रमुख निर्माताओं में से एक थे। श्रीमती एनी बेसेंट ने उन्हें उन प्रारंभिक व्यक्तियों में माना, जिन्होंने ‘आर्यावर्त आर्यावर्तियों के लिए’ का विचार प्रस्तुत किया। सरदार वल्लभभाई पटेल के अनुसार भारत की स्वतंत्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानंद ने रखी थी। पट्टाभि सीतारमैया ने कहा कि यदि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं, तो स्वामी दयानंद को ‘राष्ट्र-पितामह’ कहा जा सकता है। फ्रांसीसी लेखक रोम्यां रोलां के अनुसार स्वामी दयानंद राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास कर रहे थे। फ्रांसीसी लेखक रिचर्ड के अनुसार ऋषि दयानंद का उदय लोगों को मानसिक और सामाजिक बंधनों से मुक्त कराने तथा जातिगत बंधनों को तोड़ने के लिए हुआ था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वामी दयानंद को ‘स्वराज्य और स्वदेशी का सर्वप्रथम मंत्र प्रदान करने वाला जाज्वल्यमान नक्षत्र’ कहा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उन्हें ‘आधुनिक भारत का आद्य-निर्माता’ माना। मैडम ब्लावात्स्की ने उन्हें ‘आदि शंकराचार्य के बाद बुराई पर सबसे निर्भीक प्रहार करने वाला’ व्यक्तित्व बताया है। सर सैयद अहमद खान के अनुसार स्वामी दयानंद ऐसे विद्वान और श्रेष्ठ व्यक्ति थे, जिनका सम्मान अन्य मतावलंबी भी करते थे। वीर सावरकर ने महर्षि दयानंद को संघर्ष का ‘सर्वप्रथम योद्धा’ बताया है। वहीं लाला लाजपत राय के अनुसार स्वामी दयानंद ने लोगों को स्वतंत्र रूप से विचार करना, अपनी बात कहना और अपने कर्तव्यों का पालन करना सिखाया।
दयानंद सरस्वती की विरासत
दयानंद सरस्वती की सबसे स्थायी विरासत आर्य समाज और उसके माध्यम से विकसित शैक्षिक तथा सामाजिक संस्थाओं में दिखाई देती है। उनके विचारों ने आगे चलकर महात्मा हंसराज, स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय और पंडित लेखराम सहित अनेक सामाजिक-राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को प्रभावित किया। उनका संदेश भारतीय समाज को परंपराओं की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक आत्मसम्मान की ओर ले जाने का प्रयास था। इस अर्थ में दयानंद आधुनिक भारत के उन प्रमुख निर्माताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने धार्मिक सुधार को सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय आत्मचेतना से जोड़ने का प्रयास किया। आर्य समाज आज भी भारत और विदेशों में सामाजिक-धार्मिक सुधार की एक सशक्त शक्ति बना हुआ है और वैदिक शिक्षाओं, सामाजिक समानता तथा वंचित वर्गों के उत्थान को बढ़ावा देता है।
साथ ही, अनेक आधुनिक विद्वान यह भी मानते हैं कि दयानंद द्वारा एक शताब्दी से भी पूर्व बोए गए धार्मिक कट्टरपंथ के कुछ बीज आज के भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध आक्रामक हिंदुत्व के रूप में भी प्रकट होते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार दयानंद को केवल एक हिंदू समाज-सुधारक के रूप में देखना उनके ऐतिहासिक महत्त्व का केवल एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि आधुनिक हिंदू कट्टरवाद की वैचारिक जड़ें भी काफी हद तक उन्नीसवीं शताब्दी की उनकी जैसी धार्मिक विचारधाराओं में खोजी जाती हैं। इस प्रकार दयानंद सरस्वती का मूल्यांकन इतिहासकारों के बीच एक जटिल एवं बहुआयामी विषय बना हुआ है, जहाँ एक ओर उन्हें भारतीय पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार, शिक्षा-प्रसार और राष्ट्रीय आत्मचेतना के एक प्रमुख निर्माता के रूप में देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक बहुलता के प्रति उनके दृष्टिकोण की भी गंभीर विद्वत्तापूर्ण समीक्षा हुई है।

