अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम (Anjuman-i-Himayat-i-Islam)

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम (Anjuman-i-Himayat-i-Islam)
अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम (1884 ई.) परिचय अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘इस्लाम के समर्थन के लिए संस्था’, […]

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम (1884 ई.)

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परिचय

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘इस्लाम के समर्थन के लिए संस्था’, एक ऐतिहासिक इस्लामिक बौद्धिक, शैक्षणिक और सामाजिक कल्याण संगठन था। इसकी स्थापना सितंबर 1884 ई. में लाहौर में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार, सामाजिक सुधार तथा उनके बौद्धिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना था। संगठन की शाखाएँ आगे चलकर भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में स्थापित हुईं।

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय मुसलमानों के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान के लिए चल रहे व्यापक आंदोलन में अलीगढ़ आंदोलन और दारुल उलूम देवबंद ने आधुनिक तथा इस्लामी शिक्षा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम ने भी मुसलमानों के शैक्षिक, सामाजिक और धार्मिक उत्थान के लिए कार्य किया, परंतु इसकी कार्यपद्धति इन आंदोलनों से भिन्न थी। इसका प्रमुख आधार यह था कि समुदाय अपने ही संसाधनों और प्रयासों से मुस्लिम समाज का उत्थान करे, न कि सरकारी सहायता पर निर्भर रहे।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ग़ज़नवी काल में पंजाब अपनी शैक्षणिक संस्थाओं के कारण शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक यहाँ के मुसलमानों की शैक्षणिक स्थिति काफी पिछड़ गई थी। 1849 ई. में अंग्रेज़ों ने पंजाब में सिख शासन का अंत करके उसे अपने अधीन कर लिया। इसके बाद उन्होंने वहाँ पश्चिमी शिक्षा-व्यवस्था लागू की और लाहौर में अनेक विद्यालय तथा महाविद्यालय स्थापित किए। किंतु कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण मुसलमान इन संस्थाओं से अपेक्षित लाभ नहीं उठा सके और धीरे-धीरे शैक्षणिक रूप से और अधिक पिछड़ते चले गए। 1857 ई. के भारतीय विद्रोह के बाद भारतीय मुसलमानों के सामने शिक्षा, सामाजिक विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित अनेक चुनौतियाँ खड़ी हो गईं। इसी परिवेश में मुस्लिम समाज के भीतर शैक्षणिक और सामाजिक सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी, और विभिन्न सुधार-प्रयास सामने आने लगे।

आर्य समाज और धार्मिक चुनौती

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पंजाब में विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलनों की गतिविधियाँ तेज हो रही थीं। 1877 ई. में आर्य समाज की स्थापना और उसके बाद पंजाब में उसके बढ़ते प्रभाव तथा शुद्धि एवं धार्मिक प्रचार संबंधी गतिविधियों ने मुस्लिम समाज के सामने एक नई चुनौती उत्पन्न की। इस परिस्थित ने पंजाब के मुसलमानों में अपने धार्मिक विश्वासों, सामाजिक संस्थाओं और सामुदायिक हितों की रक्षा के प्रति चिंता को बढ़ाया। इसी अवधि में धर्म-परिवर्तन की कुछ घटनाओं ने भी मुस्लिम समाज में विशेष चिंता उत्पन्न की। इनमें 1883 ई. की एक घटना उल्लेखनीय थी, जिसमें एक सैयद महिला ने अपने तीन बच्चों के साथ ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। यद्यपि बाद में उस महिला ने पुनः इस्लाम स्वीकार कर लिया, लेकिन इस घटना ने पंजाब के मुस्लिम समाज को गहराई से प्रभावित किया। इससे मुसलमानों के बीच धार्मिक शिक्षा, सामाजिक संगठन और समुदाय के भीतर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता अधिक स्पष्ट हुई।

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम की स्थापना

इन परिस्थितियों में पंजाब के कुछ मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने मुस्लिम समाज में धार्मिक एवं सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने, शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा सामुदायिक हितों की रक्षा के लिए एक संगठित संस्था की आवश्यकता महसूस की। इसी उद्देश्य से मौलाना काज़ी हमीद-उद-दीन ने जनहित के प्रति समर्पित अनेक व्यक्तियों को एक सभा में आमंत्रित किया। इस पहल के परिणामस्वरूप अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम की स्थापना सितंबर 1884 ई. में लाहौर में हुई।

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम की स्थापना-तिथि को लेकर उपलब्ध स्रोतों में कुछ मतभेद पाया जाता है। कुछ स्रोतों में 22 सितंबर 1884 ई., जबकि कुछ अन्य स्रोतों में 24 सितंबर 1884 ई. की तिथि का उल्लेख मिलता है। अधिकांश विवरणों के अनुसार 24 सितंबर 1884 ई. को इसकी स्थापना कई तिथि मानी जाती है। इसी दिन खलीफा काज़ी हमीद-उद-दीन ने लाहौर के मोची गेट के भीतर स्थित बकान मस्जिद में संस्था की नींव रखी थी।

स्थापना के समय अंजुमन के लगभग 250 सदस्य थे। खलीफा काज़ी हमीद-उद-दीन इसके संस्थापक थे। इसके आरंभिक सक्रिय सदस्यों में अब्दुर रहीम, डॉ. मुहम्मद दीन नज़ीर, मौलवी चराग़ दीन, मौलवी ग़ुलाम मुहम्मद, हाजी मीर शम्सुद्दीन और ख़ान निज़ामुद्दीन प्रमुख थे। इन लोगों ने संस्था के संगठन तथा उसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंजुमन की स्थापना का मूल उद्देश्य यह था कि मुस्लिम समुदाय ब्रिटिश सरकार की सहायता पर निर्भर हुए बिना अपने स्वयं के साधनों और प्रयासों से अपनी शिक्षा, धार्मिक चेतना तथा सामाजिक स्थिति में सुधार करे। संस्था का प्रयास था कि मुसलमानों में आत्मनिर्भरता, धार्मिक जागरूकता और सामाजिक संगठन की भावना विकसित की जाए तथा समुदाय के गौरव और सम्मान को पुनर्स्थापित किया जाए। आगे चलकर अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम ने पंजाब में मुस्लिम शिक्षा के प्रसार, धार्मिक जागरूकता, सामाजिक सुधार तथा सामुदायिक संगठन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

काज़ी हमीद-उद-दीन अंजुमन के प्रथम अध्यक्ष चुने गए, जबकि ग़ुलाम उल्लाह कसूरी इसके प्रथम सचिव बने। संगठन के प्रथम अध्यक्ष के रूप में कुछ स्रोतों में अब्दुल कादिर (1872–1950 ई.) का भी उल्लेख मिलता है, जो एक राजनीतिक कार्यकर्ता और विद्वान थे। संस्था ने अत्यंत सीमित संसाधनों के साथ अपना कार्य आरंभ किया।

अंजुमन के प्रमुख उद्देश्य

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम के प्रमुख उद्देश्यों में मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को धार्मिक तथा सामान्य (आधुनिक) शिक्षा प्रदान करना शामिल था। इसके साथ ही, ईसाई मिशनरियों और हिंदू पुनरुत्थानवादी गतिविधियों के प्रभाव के विरुद्ध इस्लामी मूल्यों की रक्षा तथा उनका प्रचार-प्रसार करना भी इसका महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। अंजुमन ने भाषणों और प्रकाशनों के माध्यम से इस्लाम के विरुद्ध किए जाने वाले प्रचार का वैचारिक प्रतिकार करने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त, इसका उद्देश्य मज़बूत आधार पर एक इस्लामी समाज की स्थापना, अनाथ बच्चों की रक्षा एवं उन्हें शिक्षा प्रदान करना तथा मुसलमानों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षिक अधिकारों का संरक्षण एवं विकास करना था।

आर्थिक व्यवस्था और प्रारंभिक संसाधन-संकलन

अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अंजुमन ने अत्यंत सीमित संसाधनों के साथ कार्य आरंभ किया। इसके लिए संस्था ने एक विशिष्ट लोक-सहभागिता योजना अपनाई, जिसे ‘मुट्ठी भर आटा’ योजना कहा जाता है।

मुट्ठी भर आटा योजना

इस योजना के अंतर्गत संस्था के कार्यकर्ता घर-घर जाकर बर्तन रखते थे, जिनमें मुस्लिम परिवारों की महिलाएँ प्रतिदिन अपने घर के आटे में से एक मुट्ठी आटा अलग करके डालती थीं। सप्ताह के अंत में अंजुमन के सदस्य विभिन्न घरों से यह एकत्रित आटा लेकर आते और उसे बेचकर प्राप्त धन का उपयोग अंजुमन की गतिविधियों के लिए करते थे। इस योजना ने समुदाय में पारस्परिक सहयोग और स्वावलंबन की भावना को बढ़ावा दिया। अपने प्रथम वर्ष में अंजुमन की आय 754 रुपये और व्यय 344 रुपये रहा। कार्यकर्ताओं के निरंतर प्रयासों से समाज का सहयोग बढ़ता गया, और 1885 ई. में सदस्यों की संख्या 200 से बढ़कर 600 हो गई।

पुस्तकों की बिक्री और अन्य आर्थिक सहयोग

अंजुमन की आय का एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत पुस्तकों की बिक्री थी। मौलवी दस्तगीर ने पवित्र कुरआन के समर्थन में एक पुस्तिका लिखकर उसे अंजुमन को दान कर दिया। इसी प्रकार सैयद मुहम्मद हुसैन ने 300 पुस्तकें दान कीं, जिन्हें बेचकर 975 रुपये प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त, विभिन्न रियासतों के शासकों ने भी अंजुमन को उदार आर्थिक सहयोग और दान दिया।

शैक्षणिक गतिविधियाँ

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए केवल विचारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक ठोस और व्यावहारिक कदम उठाए।

प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत

अंजुमन ने अपनी शैक्षणिक गतिविधियों की शुरुआत एक साधारण प्राथमिक विद्यालय से की, जो एक किराए के मकान में चलाया जाता था। इसका मासिक किराया 2 रुपये 8 आने बताया गया है। संस्था ने प्रारंभ से ही महिला शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया और स्थापना के प्रथम दो वर्षों के भीतर ही लड़कियों के लिए कई विद्यालय खोले।

1884 ई. में अंजुमन के अधीन दो विद्यालय स्थापित किए गए। इसके अतिरिक्त लड़कियों के लिए एक पृथक प्राथमिक विद्यालय भी स्थापित किया गया, जिसे 1925 ई. में उच्च विद्यालय के स्तर तक उन्नत किया गया। बाद में 1938 ई. में लाहौर की कूपर रोड पर इस्लामिया कॉलेज फॉर विमेन की स्थापना की गई, जबकि कुछ स्रोतों में इसकी स्थापना-तिथि 1939 ई. भी दी गई है, जहाँ कला स्नातक (बी.ए.) स्तर की शिक्षा के साथ-साथ इस्लामी शिक्षा भी प्रदान की जाती थी। लड़कियों के इन विद्यालयों में उर्दू, कुरआन, गणित, सिलाई और हस्तशिल्प जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। संस्था ने लड़कों और लड़कियों, दोनों के विद्यालयों के लिए उपयुक्त पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन की भी व्यवस्था की, जिनका उपयोग पंजाब में और उसके बाहर भी होता था।

लड़कों की शिक्षा और छात्रावास व्यवस्था

लड़कों की शिक्षा के क्षेत्र में 1889 ई. में लाहौर के शेरांवाला गेट में मदरसा-तुल-मुस्लिमीन की स्थापना की गई। 1886 ई. में लड़कों के लिए एक बोर्डिंग स्कूल भी स्थापित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था भी थी। बाद में इसे सिकंदर खान की बड़ी हवेली में स्थानांतरित कर दिया गया और 1887 ई. में इसे मिडिल स्कूल के स्तर तक विकसित किया गया।

उच्च शिक्षा का विकास

अंजुमन ने आगे चलकर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कदम बढ़ाया। इसके द्वारा एक इंटरमीडिएट कॉलेज स्थापित किया गया, जिसे बाद में 1890 ई. में डिग्री स्तर तक विकसित कर दिया गया। लाहौर के रेलवे रोड पर इस्लामिया कॉलेज की स्थापना 1905 ई. में की गई,जबकि कुछ स्रोतों में इसकी स्थापना-वर्ष 1892 ई. भी दर्ज है। आगे चलकर इस्लामिया कॉलेज सिविल लाइंस, लाहौर; इस्लामिया कॉलेज, लाहौर कैंट; हिमायत-ए-इस्लामिया कॉलेज, लाहौर; तथा इस्लामिया डिग्री कॉलेज, कसूर जैसी संस्थाओं ने पंजाब में शिक्षा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

विभाजन के बाद पाकिस्तान में स्थापित संस्थाएँ

पाकिस्तान की स्थापना के बाद भी अंजुमन के संरक्षण और सहयोग से कई शैक्षणिक संस्थाएँ अस्तित्व में आईं, जिनमें हिमायत-ए-इस्लाम हाई स्कूल, हिमायत-ए-इस्लाम डिग्री कॉलेज, हिमायत-ए-इस्लाम लॉ कॉलेज और हिमायत-ए-इस्लाम तिब्बिया कॉलेज प्रमुख थे।

धार्मिक प्रचार गतिविधियाँ

स्थापना के प्रारंभिक चरण में ही अंजुमन ने धार्मिक वक्ताओं और प्रचारकों का एक समूह संगठित किया। इन प्रचारकों का उद्देश्य पंजाब के विभिन्न गाँवों और क्षेत्रों में जाकर मुस्लिम समाज में धार्मिक जागरूकता उत्पन्न करना तथा ईसाई मिशनरियों के प्रचार का वैचारिक रूप से उत्तर देना था। इस कार्य से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों में मौलवी सैयद अहमद अली, मुंशी शम्स-उद-दीन, मौलाना अब्दुल मजीद देहलवी और मुहम्मद मुबारक का उल्लेख मिलता है।

सामाजिक कल्याण और अनाथालय

शिक्षा के साथ-साथ अंजुमन ने सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। 1884 ई. में ही एक यतीमखाना (अनाथालय) तथा वयस्क शिक्षा के लिए दो केंद्र स्थापित किए गए। ईसाई मिशनरियों द्वारा मुस्लिम बच्चों को धर्म-परिवर्तन के लिए प्रभावित किए जाने की आशंका और मुस्लिम समाज की तत्कालीन कमज़ोर सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति को देखते हुए अंजुमन ने समुदाय को जागरूक करने तथा अपनी धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए विभिन्न गतिविधियाँ संचालित कीं। इसी उद्देश्य से संस्था ने असहाय मुस्लिम बच्चों और जरूरतमंद विधवाओं की सहायता के लिए दार-उल-अमान और दार-उल-शफ़क़त जैसी संस्थाएँ स्थापित कीं, जिनके माध्यम से जरूरतमंद लोगों को आश्रय और सहायता प्रदान की गई।

आपदा और संकट के समय राहत-कार्य

अंजुमन ने प्राकृतिक आपदाओं और अन्य सामाजिक संकटों से प्रभावित लोगों की सहायता में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उपलब्ध सामग्री के अनुसार, मोपला विद्रोह के अनाथों, बिहार और क्वेटा के भूकंप-पीड़ितों, तथा बाद में 1947 ई. के विभाजन के दौरान बेसहारा बच्चों और विधवाओं को भी इसके आश्रय-संस्थानों में सहायता और शरण मिली।

साहित्यिक और प्रकाशन कार्य

अंजुमन ने शिक्षा और धार्मिक जागरूकता के प्रसार के लिए प्रकाशन कार्य को एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बनाया। इसका मासिक पत्र ‘हिमायत-ए-इस्लाम’ 1885 ई. में शुरू हुआ, जिसे बाद में 1926 ई. में साप्ताहिक कर दिया गया। संस्था की मुख्य पत्रिका ‘रिसाला-ए-अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम’ का प्रकाशन भी 1885 ई. में आरंभ हुआ। अंजुमन ने इतिहास, सभ्यता, संस्कृति तथा पैगंबर मुहम्मद के जीवन और शिक्षाओं से संबंधित अनेक पुस्तकों का प्रकाशन किया। संस्था का अपना प्रेस भी था, जिसके माध्यम से धार्मिक और साहित्यिक विषयों पर सामग्री प्रकाशित की जाती थी। विद्यालयों के लिए उपयुक्त पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ धार्मिक साहित्य का भी प्रकाशन किया गया। पवित्र कुरआन का शुद्ध और प्रमाणित पाठ तैयार कर उसका प्रकाशन करना भी अंजुमन की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक एवं धार्मिक उपलब्धियों में गिना जाता है।

अहमदिया आंदोलन से संबंध

उपलब्ध पाठ के अनुसार, अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम के कुछ सदस्यों और अहमदिया आंदोलन से जुड़े व्यक्तियों के बीच प्रारंभिक दौर में संपर्क और बौद्धिक संबंध मौजूद थे। हकीम नूरुद्दीन के अंजुमन से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है और 1890 ई. में अंजुमन ने उनकी पुस्तक ‘इबताले उलूहियत-ए-मसीह’ प्रकाशित की। यह पुस्तक लेखक की अनुमति से और इस्लाम के अनुयायियों के लाभ के उद्देश्य से प्रकाशित की गई थी। अंजुमन की मासिक पत्रिका में अन्य अहमदी लेखनों के समर्थन का उल्लेख भी मिलता है।

अंजुमन द्वारा स्थापित इस्लामिया कॉलेज, लाहौर में 1890 के दशक के दौरान अहमदिया आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख व्यक्तियों, ख्वाजा कमालुद्दीन और मौलवी मुहम्मद अली ने अध्यापन कार्य किया। पाठ में यह भी उल्लेख है कि 1914 ई. के बाद इस्लामिया कॉलेज और अहमदिया भवन एक ही सड़क, ब्रांडरेथ रोड, पर स्थित थे, जिससे दोनों संस्थागत समूहों के बीच संपर्क और संवाद की संभावना बनी रहती थी। इन ऐतिहासिक संबंधों को उस समय के व्यापक धार्मिक, सामाजिक और बौद्धिक संदर्भ में समझा जाना आवश्यक है।

मुहम्मद इकबाल का अंजुमन से संबंध

अल्लामा मुहम्मद इकबाल (1877–1938 ई.) का भी अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम से गहरा संबंध रहा। पाठ के अनुसार, इकबाल का प्रारंभिक दौर में लाहौर समूह के कुछ व्यक्तियों, विशेषकर ख्वाजा कमालुद्दीन, के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण था। बाद के वर्षों में उनके विचारों में परिवर्तन आया और उन्होंने अहमदिया समुदाय की आलोचना की; उपलब्ध पाठ इस परिवर्तन के कारणों पर प्रश्न तो उठाता है, परंतु इसका विस्तृत ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत नहीं करता।

1900 ई. में अंजुमन के मंच पर ही इकबाल ने पहली बार अपनी कविता का सार्वजनिक पाठ किया, जिसके साथ उनके सार्वजनिक कवि-जीवन की शुरुआत हुई। उनके काव्य में राष्ट्रीय और सामुदायिक जागरण की भावना दिखाई देती थी। उनकी बढ़ती लोकप्रियता के बाद अंजुमन की वार्षिक सभाओं के लिए विशेष रूप से उनसे कविताएँ लिखने का अनुरोध भी किया जाने लगा। इस प्रकार अंजुमन ने न केवल शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्र में, बल्कि इकबाल के प्रारंभिक सार्वजनिक साहित्यिक जीवन को मंच प्रदान करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वार्षिक अधिवेशन और राजनीतिक भूमिका

अंजुमन का वार्षिक अधिवेशन पंजाब के मुसलमानों के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक आयोजन बन गया था, जिसे मुस्लिम समुदाय के बीच लगभग एक राष्ट्रीय उत्सव जैसा महत्त्व प्राप्त हो गया। इन अधिवेशनों की अध्यक्षता समय-समय पर सर सैयद अहमद ख़ाँ, अल्लामा इकबाल, अब्दुल कादिर और मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली जैसी प्रमुख मुस्लिम हस्तियों ने की। इनके अतिरिक्त नवाब मोहसिन-उल-मुल्क, शेख अब्दुल कादिर और जस्टिस शाह दीन जैसी हस्तियों ने भी अंजुमन के कार्यक्रमों में भाग लिया और इसकी गतिविधियों का समर्थन किया।

अंजुमन के कार्यक्रमों में मौलाना नज़ीर अहमद और मौलाना शिबली जैसे प्रसिद्ध विद्वान भी नियमित रूप से उपस्थित होते और श्रोताओं को संबोधित करते थे, जिससे अंजुमन की बौद्धिक और साहित्यिक गतिविधियों को व्यापक प्रभाव प्राप्त हुआ। अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम मूलतः लाहौर के मध्यमवर्गीय मुसलमानों की सामुदायिक संस्था थी, जिसमें मुस्लिम बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी रही। संगठन ने अपने वार्षिक अधिवेशनों के माध्यम से भारतीय मुसलमानों को एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मंच प्रदान किया।

पाकिस्तान आंदोलन में योगदान

अंजुमन द्वारा स्थापित इस्लामिया कॉलेज, रेलवे रोड, लाहौर के विद्यार्थियों ने आगे चलकर पाकिस्तान आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में जाकर द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रचार किया। मार्च 1940 ई. में लाहौर के मिंटो पार्क में आयोजित मुस्लिम लीग के ऐतिहासिक वार्षिक अधिवेशन के आयोजन में भी इन विद्यार्थियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख संबद्ध संस्थाएँ और सेवाएँ

अंजुमन से संबद्ध प्रमुख संस्थाओं में यतीमखाना (अनाथालय), इस्लामिया कॉलेज, लाहौर, दार-उल-शफ़क़त, दार-उल-अमान, दार-उल-उलूम दीनिया, हिमायत-ए-इस्लाम हाई स्कूल, हिमायत-ए-इस्लाम डिग्री कॉलेज, हिमायत-ए-इस्लाम लॉ कॉलेज, हिमायत-ए-इस्लाम तिब्बिया कॉलेज, यूनानी शिफ़ाख़ाना तथा पुस्तकालय प्रमुख थे। इन संस्थाओं के माध्यम से अंजुमन ने शिक्षा, धार्मिक अध्ययन, चिकित्सा और सामाजिक कल्याण के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया।

पुरुषों और महिलाओं के लिए पृथक-पृथक शैक्षणिक तथा कल्याणकारी संस्थाओं की व्यवस्था भी विशेष रूप से की गई थी, जिससे दोनों वर्गों की शैक्षिक और सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उनके विकास के लिए सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।

ऐतिहासिक महत्त्व

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उसके बाद के काल में पंजाब के मुस्लिम समाज के शैक्षणिक, धार्मिक, सामाजिक और साहित्यिक विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीमित संसाधनों से आरंभ होकर इस संस्था ने पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए विद्यालयों तथा उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना की और शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा दिया।

धार्मिक जागरूकता के प्रसार के लिए अंजुमन ने प्रचारकों को संगठित किया तथा मुस्लिम समाज में धार्मिक शिक्षा और चेतना विकसित करने का प्रयास किया। सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में इसने अनाथ बच्चों और जरूरतमंद विधवाओं के लिए कल्याणकारी संस्थाओं की स्थापना की तथा समाज के कमजोर वर्गों की सहायता की।

अंजुमन ने पुस्तकों और पत्रिकाओं के प्रकाशन के माध्यम से शैक्षणिक एवं धार्मिक जागरूकता उत्पन्न करने में भी योगदान दिया। इसके अतिरिक्त, इसके वार्षिक अधिवेशनों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों, धार्मिक विद्वानों और राजनीतिक नेताओं को एक साझा मंच प्रदान किया, जिससे मुस्लिम समाज में विचार-विमर्श और संगठन की भावना को बल मिला।

राजनीतिक क्षेत्र में अंजुमन ने भारतीय मुसलमानों को एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मंच प्रदान किया। इसके माध्यम से मुस्लिम राजनीतिक चेतना को विकसित करने में सहायता मिली और आगे चलकर इसके शैक्षिक संस्थानों तथा उनसे जुड़े विद्यार्थियों ने पाकिस्तान आंदोलन के विकास में भी योगदान दिया।

इस प्रकार अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम केवल एक धार्मिक संगठन नहीं रह गई, बल्कि यह मुस्लिम समाज के शैक्षणिक उत्थान, धार्मिक पहचान के संरक्षण, सामाजिक कल्याण और सामुदायिक संगठन के लिए पंजाब की एक महत्त्वपूर्ण और स्थायी संस्था के रूप में विकसित हुई।

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम की स्थापना कब और कहाँ हुई थी?

अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम की स्थापना 24 सितंबर 1884 ई. को लाहौर की बाकन खान गेट मस्जिद में हुई थी। इसके संस्थापक खलीफा हमीदुद्दीन थे।

2. अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम का मुख्य उद्देश्य क्या था?

इसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज का पुनरुत्थान और उत्थान करना था। इसके लिए आधुनिक एवं इस्लामी शिक्षा का प्रसार, सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की रक्षा, अनाथ बच्चों की सहायता तथा इस्लामी समाज को सुदृढ़ करना इसके प्रमुख कार्य थे।

3. अंजुमन ने शिक्षा के क्षेत्र में क्या योगदान दिया?

अंजुमन ने अनेक विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना की। इनमें मदरसातुल-मुस्लिमीन (1889 ई.), इस्लामिया कॉलेज, रेलवे रोड (1905 ई.) तथा बाद में इस्लामिया कॉलेज फॉर विमेन, लाहौर (1938 ई.) जैसे संस्थान प्रमुख थे। इन संस्थानों ने पंजाब में मुस्लिम शिक्षा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

4. ‘मुट्ठी भर आटा’ योजना क्या थी?

मुट्ठी भर आटा’ अंजुमन द्वारा धन जुटाने की एक सामुदायिक योजना थी। मुस्लिम परिवार अपने घर के आटे में से थोड़ी मात्रा अंजुमन के लिए अलग रखते थे। अंजुमन के सदस्य इसे एकत्र करके बेचते थे और प्राप्त धन का उपयोग संस्था के विभिन्न कार्यों में किया जाता था।

5. अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम ने राजनीतिक क्षेत्र में क्या भूमिका निभाई?

अंजुमन ने मुस्लिम समाज को राजनीतिक मंच और संगठनात्मक आधार प्रदान किया। इसके वार्षिक अधिवेशनों में प्रमुख मुस्लिम नेता भाग लेते थे। बाद में इसके शैक्षिक संस्थानों के विद्यार्थियों ने पाकिस्तान आंदोलन और द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रचार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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