मुहम्मद इक़बाल (Muhammad Iqbal)

मुहम्मद इक़बाल (Muhammad Iqbal)
मुहम्मद इक़बाल  (1877–1938 ई.) मुख्य लेख : परिचय मुहम्मद इक़बाल (1877–1938 ई.) पाकिस्तान के आध्यात्मिक जनक […]

मुहम्मद इक़बाल  (1877–1938 ई.)

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मुख्य लेख :

परिचय

मुहम्मद इक़बाल (1877–1938 ई.) पाकिस्तान के आध्यात्मिक जनक और बीसवीं सदी के आरंभिक दौर में भारत के प्रमुख फ़ारसी और उर्दू कवियों में से एक थे। उन्हें अल्लामा इक़बाल और सर मुहम्मद इक़बाल के नाम से भी जाना जाता है। वे भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध कवि, दार्शनिक, चिंतक, विधिवेत्ता और राजनीतिक विचारक थे। उनकी प्रसिद्धि केवल काव्य-प्रतिभा तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके दार्शनिक और राजनीतिक विचारों ने भी बीसवीं शताब्दी के भारतीय मुस्लिम समाज को गहराई से प्रभावित किया। उनकी ‘ख़ुदी’ की अवधारणा, इस्लामी चिंतन के पुनर्निर्माण का प्रयास तथा भारतीय मुसलमानों के लिए राजनीतिक आत्मनिर्णय की वकालत उनके विचारों की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

इक़बाल को पाकिस्तान के बौद्धिक और आध्यात्मिक पूर्वगामियों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। इक़बाल की कविता, अन्य लेखन तथा मुस्लिम लीग में उनकी भागीदारी ने पाकिस्तान के निर्माण के लिए वैचारिक आधार तैयार किया। उनकी मृत्यु के नौ साल बाद पाकिस्तान की स्थापना होने के बावजूद, इक़बाल पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि बने हुए हैं और उन्हें अकसर पाकिस्तान का “आध्यात्मिक पिता” कहा जाता है। पाकिस्तान सरकार द्वारा 1962 ई. में स्थापित ‘इक़बाल अकादमी पाकिस्तान’ उनके काम को बढ़ावा देने और उस पर अध्ययन करने का कार्य कर रहा है।

इक़बाल की फ़ारसी रचनाओं को विशेष रूप से ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में व्यापक प्रतिष्ठा मिली, जहाँ उन्हें ‘इक़बाल-ए-लाहौरी’ के नाम से भी जाना जाता है। उनकी काव्य-रचनाओं में व्यक्तिगत आत्मविकास, नैतिकता, धार्मिक चेतना, कर्मशीलता, आत्मसम्मान, सामुदायिक जीवन और राजनीतिक स्वतंत्रता जैसे विषय प्रमुख हैं। उनकी प्रसिद्ध देशभक्तिपूर्ण कविता ‘तराना-ए-हिंद’, जिसे सामान्यतः ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ के नाम से जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे लोकप्रिय देशभक्ति रचनाओं में से एक है। बाद के दौर में इक़बाल के राजनीतिक विचारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया और उन्होंने भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक एकता तथा एक पृथक राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया।

इक़बाल का चिंतन आत्मचेतना, आत्मसम्मान, कर्म, संघर्ष, नैतिक साहस और आध्यात्मिक पुनर्जागरण पर केंद्रित था। उनकी प्रसिद्ध अवधारणा ‘ख़ुदी’ व्यक्ति के आत्मबोध, आत्मसम्मान, आत्मानुशासन और सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक थी। वे मनुष्य को परिस्थितियों के सामने निष्क्रिय होकर समर्पण करने वाला प्राणी नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व, समाज और इतिहास को प्रभावित करने में सक्षम सक्रिय शक्ति मानते थे। उनके चिंतन में इस्लामी आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक पश्चिमी दर्शन के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि और जन्म

मुहम्मद इक़बाल का जन्म 9 नवंबर 1877 ई. को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के सियालकोट (पाकिस्तान) में एक धार्मिक रूप से प्रतिबद्ध कश्मीरी मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके दादा शेख मुहम्मद रफ़ीक़ कश्मीर से पंजाब आए थे। इक़बाल की पारिवारिक पृष्ठभूमि के संबंध में यह भी उल्लेख मिलता है कि उनके पूर्वज कश्मीरी पंडित/ब्राह्मण परिवार से संबंधित थे, जो बाद में इस्लाम में परिवर्तित हुए और व्यापार के सिलसिले में सियालकोट आकर बस गए। इस पारिवारिक कश्मीरी पृष्ठभूमि का इक़बाल के व्यक्तित्व और विचारों पर स्थायी प्रभाव रहा। कश्मीर और वहाँ के लोगों के प्रति उनके मन में जीवनभर गहरी आत्मीयता बनी रही और वे कश्मीरी मुसलमानों के आत्मनिर्णय के प्रश्न से भी जुड़े रहे।

इक़बाल के पिता का नाम शेख़ नूर मुहम्मद था। वे पेशे से दर्जी/व्यापारी थे और औपचारिक शिक्षा बहुत अधिक प्राप्त नहीं कर सके थे, किंतु धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे; अनेक जीवनीकारों ने इक़बाल के व्यक्तित्व और धार्मिक चिंतन पर उनके पिता के आध्यात्मिक प्रभाव का उल्लेख किया है। इक़बाल की माता का नाम इमाम बीबी था। वे विनम्र और धार्मिक स्वभाव की महिला थीं तथा ग़रीबों और पड़ोसियों की सहायता के लिए जानी जाती थीं। उनका निधन 9 नवंबर 1914 ई. को सियालकोट में हुआ, जिससे इक़बाल को गहरा आघात पहुँचा और उन्होंने अपनी माँ की स्मृति में मार्मिक भावनाएँ व्यक्त कीं।

इक़बाल के माता-पिता ने उन्हें धार्मिक वातावरण में पाला। प्रारंभिक जीवन में ही उन्हें इस्लामी धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ भाषाओं और साहित्य का अध्ययन करने का अवसर मिला, और उन्होंने उर्दू, फ़ारसी और अरबी पर अच्छी पकड़ विकसित की, जिसने आगे चलकर उनके साहित्यिक और दार्शनिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रारंभिक शिक्षा और साहित्यिक विकास

इक़बाल ने प्रारंभिक शिक्षा सियालकोट में प्राप्त की। उन्नीसवीं सदी के अंत तक भारत के प्रमुख शहरों में ईसाई मिशनरी स्कूल स्थापित हो चुके थे, और इक़बाल का दाखिला सियालकोट के ऐसे ही एक मिशनरी स्कूल, स्कॉच मिशन कॉलेज (जिसे बाद में मरे कॉलेज कहा गया), में कराया गया।

औपचारिक शिक्षा के अलावा इक़बाल के बौद्धिक विकास को मौलवी सैयद मीर हसन (1844–1929 ई.) ने काफी हद तक आकार दिया, जिन्होंने उन्हें पारंपरिक इस्लामी ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ उर्दू, फ़ारसी और अरबी साहित्य में प्रशिक्षित किया। इसी वातावरण में इक़बाल की काव्य-प्रतिभा का प्रारंभिक विकास हुआ। बाद में उन्होंने प्रसिद्ध उर्दू कवि नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ दाग़ देहलवी (1831–1905 ई.) से भी काव्य संबंधी मार्गदर्शन प्राप्त किया।

इसके बाद वे लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में दाख़िल हुए, जहाँ उन्होंने दर्शनशास्त्र, अंग्रेज़ी साहित्य और अरबी का अध्ययन किया और 1899 ई. में दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। गवर्नमेंट कॉलेज में उनके जीवन पर सर थॉमस अर्नोल्ड का विशेष प्रभाव पड़ा। अर्नोल्ड पश्चिमी दर्शन के विद्वान होने के साथ-साथ इस्लामी संस्कृति और अरबी साहित्य के भी गहरे अध्येता थे। उन्होंने इक़बाल के भीतर पूर्वी और पश्चिमी बौद्धिक परंपराओं के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा उन्हें उच्च शिक्षा के लिए यूरोप जाने के लिए प्रेरित किया।

1899 ई. में उन्हें लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज में अरबी का मैकलियोड-पंजाब रीडर नियुक्त किया गया और उन्होंने 1899 से 1903 ई. (कुछ विवरणों के अनुसार 1901–1904 ई.) तक ओरिएंटल कॉलेज, इस्लामिया कॉलेज तथा गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में अरबी, अंग्रेज़ी और अन्य विषयों का अध्यापन भी किया। इस अवधि में वे एक उभरते हुए उर्दू कवि के रूप में प्रसिद्ध होने लगे थे और उनकी प्रारंभिक कविताओं में भारतीय राष्ट्रीयता तथा उपनिवेशवाद के प्रति आलोचना की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

यूरोप में उच्च शिक्षा (1905–1908 ई.)

1905 ई. में इक़बाल यूरोप गए। सर थॉमस अर्नोल्ड की सलाह पर वे नियो-हेगेलियन दर्शन और विधि का अध्ययन करने के लिए कैम्ब्रिज गए, जहाँ उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज में दर्शनशास्त्र में डिग्री प्राप्त की। कैंब्रिज में वे पश्चिमी दर्शन के अनेक प्रमुख विचारकों, जैसे जे. एम. ई. मैकटैगार्ट, जेम्स वार्ड, ई. जी. ब्राउन और रेनॉल्ड ए. निकोल्सन के संपर्क में आए; निकोल्सन ने बाद में इक़बाल की प्रसिद्ध फ़ारसी कृति ‘असरार-ए-ख़ुदी’ का अंग्रेज़ी अनुवाद किया।

साथ ही उन्होंने लंदन के लिंकन्स इन से कानून की शिक्षा प्राप्त कर बैरिस्टर बनने की योग्यता भी हासिल की, जिससे भारत लौटने पर उन्होंने कानूनी पेशे के माध्यम से अपनी आजीविका चलाई। 1907 ई. की गर्मियों में वे जर्मन भाषा सीखने के लिए हीडलबर्ग गए। नवंबर 1907 ई. में उन्होंने म्यूनिख विश्वविद्यालय में “ईरान में तत्वमीमांसा का विकास” विषय पर अपना शोध-प्रबंध प्रस्तुत कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की, जो बाद में 1908 ई. में लंदन से ‘द डेवलपमेंट ऑफ़ मेटाफ़िज़िक्स इन पर्शिया’ के नाम से प्रकाशित हुआ।

पढ़ाई के दौरान वे रूमी, नीत्शे, हेनरी बर्गसाँ और गोएथे के कार्यों से परिचित हुए, जिनका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे पश्चिमी चिंतन की बौद्धिक शक्ति और वैज्ञानिक उपलब्धियों से प्रभावित थे, किंतु पश्चिमी सभ्यता के भौतिकवाद, आत्मकेंद्रितता और आध्यात्मिक संकट के आलोचक भी बने। यूरोप प्रवास ने उनके चिंतन में निर्णायक परिवर्तन किया। वे पश्चिमी राष्ट्रवाद की सीमाओं के प्रति अधिक आलोचनात्मक हुए और इस्लाम को केवल व्यक्तिगत आस्था न मानकर एक व्यापक सामाजिक, नैतिक और सभ्यतागत व्यवस्था के रूप में देखने लगे। यूरोप से लौटने पर इक़बाल ने अपना लेखन और अपनी उम्मीदें पैन-इस्लामवाद (समस्त इस्लामी एकता) के विचारों की ओर केंद्रित कर दीं।

1908 ई. में वे लाहौर लौट आए, जहाँ उन्होंने कुछ समय दर्शनशास्त्र का अध्यापन किया, किंतु अपने जीवन का अधिकांश समय वकालत करते हुए बिताया। उनके आध्यात्मिक और बौद्धिक परिवर्तन की झलक उनकी नोटबुक ‘स्ट्रे रिफ़्लेक्शंस’ (1910 ई.) में मिलती है, जिसमें उन्होंने लिखा कि राष्ट्र कवियों के हृदय में जन्म लेते हैं और राजनेताओं के हाथों में विकसित होकर अंततः समाप्त हो जाते हैं।

विवाह और संतान

मुहम्मद इक़बाल ने अपने जीवन में तीन विवाह किए। उनका पहला विवाह करीम बीबी से हुआ, जो गुजराती चिकित्सक ख़ान बहादुर अता मोहम्मद ख़ान की पुत्री थीं। इस विवाह से उनकी संतान में मीराज बेगम और आफ़ताब इक़बाल का उल्लेख मिलता है। इसके बाद इक़बाल का विवाह सरदार बेगम से हुआ, जिनसे उनके पुत्र जावेद इक़बाल का जन्म हुआ। जावेद इक़बाल आगे चलकर न्यायविद् और लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इक़बाल का तीसरा विवाह मुख़्तार बेगम से हुआ।

मुहम्मद इक़बाल (Muhammad Iqbal)
मुहम्मद इक़बाल

प्रारंभिक काव्य-यात्रा और भारतीय राष्ट्रवादी दौर

यूरोप से लौटने के बाद इक़बाल को प्रसिद्धि फ़ारसी और उर्दू भाषा में लिखी अपनी कविताओं से मिली, जो सार्वजनिक रूप से सुनाए जाने के लिए शास्त्रीय शैली में लिखी गई थीं। कवि-सम्मेलनों में उनकी कविताएँ बहुत लोकप्रिय हुईं।

यूरोप जाने से पहले उनकी कविता भारतीय राष्ट्रवाद का समर्थन करती थी, जैसा कि उनकी रचना ‘नया शिवाला’ में देखा जा सकता है। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘तराना-ए-हिंद’ का प्रारंभिक पद ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ भारतीय राष्ट्रवादी चेतना की लोकप्रिय अभिव्यक्ति बन गया। किंतु भारत से दूर रहने के कारण उनका नज़रिया बदल गया। उन्होंने दो वजहों से राष्ट्रवाद की आलोचना की: यूरोप में इसने विनाशकारी नस्लवाद और साम्राज्यवाद को जन्म दिया था और भारत में यह साझा मकसद की पर्याप्त भावना पर आधारित नहीं था।

1910 ई. में इक़बाल ने अलीगढ़ में “इस्लाम एक सामाजिक और राजनीतिक आदर्श के रूप में” विषय पर भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ज़ोर दिया कि मुसलमानों को इस्लाम के सामाजिक-राजनीतिक आदर्शों को अपनाना और अपने जीवन में लागू करना चाहिए। इस भाषण में उन्होंने अपनी उम्मीदों की नई पैन-इस्लामिक दिशा की ओर इशारा किया।

1911 ई. में इक़बाल को सशक्त काव्य-अभिव्यक्ति की एक नई शैली प्राप्त हुई। अल्ताफ़ हुसैन हाली की ‘मुसद्दस’ की भावना और शैली में लिखी गई लंबी उर्दू कविता ‘शिकवा’ इस नए चरण की पहली महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति थी, जिसमें मुसलमानों की उस शिकायत को व्यक्त किया गया कि ईश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है। एक वर्ष बाद ‘जवाब-ए-शिकवा’ में इस शिकायत का उत्तर दिया गया, जिसमें ईश्वर आलसी और निष्क्रिय मुसलमानों को ही उनकी दुर्दशा के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। इसी दौर की एक अन्य महत्त्वपूर्ण कविता ‘खिज्र-ए-राह’ थी। ये तीनों रचनाएँ बाद में 1924 ई. में उर्दू संग्रह ‘बाँग-ए-दरा’ में प्रकाशित हुईं।

‘ख़ुदी’ दर्शन और प्रमुख फ़ारसी काव्य-कृतियाँ

इक़बाल के दर्शन का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व ‘ख़ुदी’ है। सामान्य अर्थ में ‘ख़ुदी’ का अर्थ आत्मबोध, आत्मचेतना या स्वत्व की भावना से संबंधित है। इक़बाल के लिए ख़ुदी केवल अहंकार नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित व्यक्तित्व, आत्मसम्मान, आत्मशक्ति और रचनात्मक क्षमता का प्रतीक है। उनके अनुसार मनुष्य को अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए और उन्हें विकसित करते हुए अपने व्यक्तित्व को मजबूत बनाना चाहिए।

निष्क्रियता, आत्महीनता और पराधीनता व्यक्ति की ख़ुदी को कमजोर करती हैं, जबकि संघर्ष, आत्मअनुशासन, ज्ञान, कर्म और नैतिक साहस उसे विकसित करते हैं। इस प्रक्रिया का सर्वोच्च आदर्श ‘इंसान-ए-कामिल’ अर्थात् पूर्ण मनुष्य है।

इक़बाल की ख़ुदी की अवधारणा पारंपरिक रहस्यवादी विचारों से भिन्न है, जहाँ अनेक आध्यात्मिक परंपराओं में अहं या व्यक्तिगत स्व को समाप्त करने या दबाने पर बल दिया गया है, वहीं इक़बाल व्यक्ति के व्यक्तित्व को नष्ट करने के बजाय उसे सुदृढ़ और विकसित करने की बात करते हैं। उनके अनुसार मनुष्य की आत्मचेतना का विकास ईश्वर, प्रकृति और समाज के साथ सक्रिय संबंध के माध्यम से होता है।

1915 ई. में उनकी लंबी फ़ारसी कविता ‘असरार-ए-ख़ुदी’ (स्वयं के रहस्य) के प्रकाशन से उन्हें काफी चर्चा मिली। रूमी की ‘मसनवी’ के छंद में लिखी गई इस रचना में उन्होंने व्यक्ति के आत्मविकास, आत्मसम्मान और व्यक्तित्व-निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया तथा ईश्वर के सागर में मनुष्य के अस्तित्व के विलीन हो जाने को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं माना। उन्होंने फ़ारसी में इसलिए लिखा क्योंकि वे अपनी बात पूरी मुस्लिम दुनिया तक पहुँचाना चाहते थे। इस रचना में प्रस्तुत ‘स्व’ का सिद्धांत पारंपरिक इस्लामी रहस्यवाद की ‘स्व-निषेधकारी शांतिप्रियता’ की कड़ी आलोचना करता था; इस आलोचना ने कई लोगों को चौंका दिया और विवाद खड़ा कर दिया। आलोचकों का कहना था कि उन्होंने जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे के विचारों को इस्लाम पर थोपा है, जबकि इक़बाल और उनके प्रशंसक इस पर कायम रहे कि रचनात्मक रूप से ‘स्व’ की पुष्टि करना एक बुनियादी मुस्लिम गुण है। फ़ारसी काव्य की मधुर ध्वनियों के अभ्यस्त पाठक इस रचना से विशेष रूप से चकित हुए; इक़बाल ने इसमें हाफ़िज़ की काव्य-दृष्टि की आलोचना भी की थी, जिसे बाद में दूसरे संस्करण से हटा दिया गया।

दो वर्ष बाद (1918 ई.) ‘रुमूज़-ए-बेख़ुदी’ (निस्वार्थ भाव के रहस्य) प्रकाशित हुई, जिसमें ‘असरार-ए-ख़ुदी’ में बताए गए व्यक्तिवाद के उलट, मुस्लिम आदर्श समुदाय में व्यक्ति के कर्तव्यों तथा संसार में उस समुदाय की भूमिका पर विचार करते हुए खुद को समर्पित करने की बात कही गई है। इसे ‘असरार-ए-ख़ुदी’ की पूरक कृति माना जाता है, और दोनों कृतियाँ बाद में एक साथ ‘असरार-ओ-रुमूज़’ नामक संकलन में भी प्रकाशित हुईं। इक़बाल के अनुसार मुसलमानों को पैगंबर के आदर्श का अनुसरण करते हुए ‘दुनिया के लिए दया’ के रूप में कार्य करना चाहिए, जिसका संकेत क़ुरआन (21:107) में मिलता है।

इक़बाल के ‘पूर्ण मनुष्य’ की तुलना कभी-कभी नीत्शे के ‘सुपरमैन’ से की गई, किंतु दोनों अवधारणाओं में महत्त्वपूर्ण अंतर है। नीत्शे का सुपरमैन ईश्वर की मृत्यु की धारणा के बाद उभरता है, जबकि इक़बाल का ‘मर्द-ए-मोमिन’ ईश्वर में विश्वास रखने वाला मनुष्य है, जो ईश्वर का आदर्श सेवक है और पैगंबर के आदर्श का अनुसरण करता है। इक़बाल का आदर्श मनुष्य धार्मिक और नैतिक चेतना से जुड़ा हुआ है, जबकि नीत्शे की अवधारणा को उसी धार्मिक ढाँचे में नहीं समझा जा सकता।

इक़बाल के चिंतन में ‘ज़िक्र’ (आध्यात्मिक चेतना और ईश्वर-स्मरण) और ‘फ़िक्र’ (चिंतन, ज्ञान, विज्ञान और बौद्धिक सक्रियता) का समन्वय भी महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार मुस्लिम समाज को दोनों के संतुलित समन्वय की आवश्यकता है, क्योंकि आध्यात्मिकता के अभाव में नैतिक पतन और सामाजिक विघटन उत्पन्न हो सकता है, जबकि विज्ञान-बौद्धिक सक्रियता के अभाव में समाज तकनीकी-आर्थिक रूप से पिछड़ सकता है।

1923 ई. में ‘पयाम-ए-मशरिक़’ (पूरब का संदेश) प्रकाशित हुई, जिसे जोहान वोल्फगैंग वॉन गोएथे की ‘वेस्ट-ओस्टलिचर दिवान’ (1819 ई.) के जवाब में लिखा गया था और जिसने इस्लाम की सार्वभौमिक सच्चाई की पुष्टि की। इस रचना में शास्त्रीय शैली की रुबाइयाँ-ग़ज़लें ही नहीं, बल्कि यूरोपीय दार्शनिकों और राजनेताओं के संबंध में अनेक विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ भी मिलती हैं।

1927 ई. में ‘ज़बूर-ए-अजम’ (फ़ारसी भजन) प्रकाशित हुई, जिसके बारे में इसके अंग्रेज़ी अनुवादक ए.जे. आर्बरी ने लिखा कि इसमें इक़बाल ने ग़ज़ल या प्रेम कविता के लिए असाधारण प्रतिभा दिखाई; इसका तीसरा भाग ‘गुलशन-ए-राज़-ए-जदीद’ महमूद शबिस्तरी की ‘गुलशन-ए-राज़’ का प्रत्युत्तर है, जिसमें ईश्वर, मनुष्य तथा संसार से संबंधित समस्याओं पर विचार किया गया है।

1932 ई. में इक़बाल की सबसे महत्त्वपूर्ण फ़ारसी काव्य-कृति ‘जावेद-नामा’ (अनंत काल का गीत) प्रकाशित हुई, जो उनके पुत्र जावेद इक़बाल को समर्पित थी और जिसे इक़बाल की सबसे बेहतरीन रचना माना जाता है। दांते की ‘डिवाइन कॉमेडी’ की याद दिलाने वाला इसका विषय कवि की यात्रा है — तेरहवीं सदी के महान फ़ारसी रहस्यवादी रूमी के मार्गदर्शन में कवि सोच और अनुभव के सभी लोकों से गुज़रते हुए अंतिम मिलन तक पहुँचता है। यह इक़बाल के विचारों का एक प्रकार का विश्वकोश है, जिसमें रूमी उन्हें कविता, दर्शन और राजनीति के विभिन्न प्रतिनिधियों से मिलाते हैं।

1936 ई. में एक अन्य महत्त्वपूर्ण फ़ारसी पुस्तिका ‘पस चे बायद कर्द ऐ अक़्वाम-ए-शर्क़’ (अब क्या किया जाए, हे पूर्व के लोगों?) प्रकाशित हुई, जिसमें पूर्वी समाजों और विशेष रूप से मुस्लिम समाज के सामने उपस्थित राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर विचार किया गया है। इसी दौर की एक अन्य लघु फ़ारसी रचना ‘मुसाफ़िर’ (यात्री) 1933 ई. की काबुल-ग़ज़नी यात्रा के परिणामस्वरूप तैयार हुई।

उर्दू काव्य-कृतियाँ

1924 ई. में इक़बाल की उर्दू कविताओं का संग्रह ‘बांग-ए-दरा’ (कारवाँ की घंटी की आवाज़) प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी प्रारंभिक भारतीय राष्ट्रवादी कविताओं (तराना-ए-हिंद सहित) के साथ-साथ बाद की दार्शनिक-धार्मिक रचनाएँ भी सम्मिलित हैं। कवि को लगा कि वे उस घंटी के समान हैं जो संघर्षरत और भ्रमित तीर्थयात्रियों को मक्का में काबा की ओर जाने का सही मार्ग दिखाती है।

1935-1936 ई. में ‘बाल-ए-जिब्रील’ (जिब्रील का पंख) प्रकाशित हुई, जिसमें इक़बाल की दार्शनिक, धार्मिक और आध्यात्मिक चिंतन से संबंधित उनकी श्रेष्ठ उर्दू कविताएँ सम्मिलित हैं। 1936-1937 ई. में ‘ज़र्ब-ए-कलीम’ (मूसा की चोट/लाठी) प्रकाशित हुई, जिसमें आधुनिक सभ्यता, सामाजिक समस्याओं, राजनीतिक परिस्थितियों और मुस्लिम समाज की स्थिति की आलोचना पर अधिक बल दिया गया।

निधन के बाद 1938 ई. में ‘अरमग़ान-ए-हिजाज़’ (हिजाज़ का तोहफ़ा) प्रकाशित हुई, जिसमें उर्दू और फ़ारसी दोनों भाषाओं में कविताएँ थीं। यह संग्रह इस्लाम की मातृभूमि के प्रति उनकी अटूट निष्ठा व्यक्त करता है, यद्यपि वे स्वयं कभी हिजाज़ की यात्रा नहीं कर सके थे। उन्हें बीसवीं सदी का सबसे महान उर्दू कवि माना जाता है।

दार्शनिक चिंतन: ‘द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम’

यद्यपि इक़बाल की शायरी में दार्शनिक सोच झलकती है, उनके मुख्य दार्शनिक विचार उन लेक्चरों में समाहित हैं जिन्हें बाद में ‘द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम’ के रूप में प्रकाशित किया गया। 1928-29 ई. में मद्रास मुस्लिम एसोसिएशन के निमंत्रण पर दिए गए इन सात व्याख्यानों में से तीन मद्रास में, तीन अलीगढ़ में और शेष मैसूर व हैदराबाद में दिए गए। यह इस्लामी सोच को मुस्लिम समाजों में सुधार और बौद्धिक जागृति के उद्देश्य से पुनर्जीवित करने पर केंद्रित था। सातवाँ और अंतिम लेक्चर “क्या धर्म संभव है?” 1932 ई. में लंदन की अरिस्टोटेलियन सोसाइटी में तीसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान दिया गया, जिसने इंग्लैंड के बौद्धिक हलकों पर गहरा प्रभाव डाला और जिसे बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया। अंग्रेज़ी में दिए गए इन लेक्चरों का बाद में नज़ीर नियाज़ी ने उर्दू में अनुवाद किया। मूल पाठ में इसे ‘सिक्स लेक्चर्स ऑन द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रिलिजियस थॉट’ कहा गया, जो बाद में विस्तृत रूप में इसी नाम से प्रसिद्ध हुई।

इस पुस्तक में ब्रह्मांड की प्रकृति, मानवता का उससे संबंध, ईश्वरीय ज्ञान के दार्शनिक पहलुओं, ईश्वर के अस्तित्व और प्रार्थना के महत्व पर दार्शनिक चर्चा की गई है, तथा ‘खुदी’ के सकारात्मक पहलू पर बल देते हुए बताया गया है कि नकारात्मक ‘स्व’ विनाशकारी हो सकता है। एक स्वस्थ ‘स्व’ के विकास के लिए सामाजिक न्याय और दूसरों के अधिकारों को मान्यता देना आवश्यक है। इक़बाल के दर्शन का केंद्रीय तत्व मनुष्य की सक्रियता और आत्मचेतना था। वे मनुष्य को कमजोर, भाग्यवादी और परिस्थितियों के सामने समर्पण करने वाला प्राणी नहीं मानते थे।

इक़बाल का उद्देश्य इस्लाम को आधुनिक युग से अलग करना नहीं था। वे इस्लाम को जड़ और अपरिवर्तनीय सामाजिक व्यवस्था के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उसमें आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप पुनर्विचार और पुनर्व्याख्या की संभावनाएँ देखते थे। उन्होंने नए सामाजिक और राजनीतिक संस्थान बनाने के लिए ‘इज्तिहाद’ (कानूनी सुधार का सिद्धांत) तथा ‘इज्मा’ (आम सहमति) के सिद्धांतों का समर्थन किया, यद्यपि बदलाव के सामान्य सिद्धांतों को बताने में प्रगतिशील होते हुए भी वे वास्तविक बदलाव लाने के मामले में रूढ़िवादी थे।

कर्म, सक्रिय जीवन और विराग की आलोचना

इक़बाल के विचारों में कर्म, संघर्ष और सक्रिय जीवन का विशेष महत्व था। वे निष्क्रियता, भाग्यवाद और जीवन की कठिनाइयों के सामने आत्मसमर्पण के विरोधी थे। उनके अनुसार जीवन निरंतर परिवर्तन और संघर्ष की प्रक्रिया है तथा मनुष्य को कठिन परिस्थितियों से भागने के बजाय उनका सामना करना चाहिए। इक़बाल के लिए आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से पलायन नहीं था, बल्कि वे आध्यात्मिक चेतना को नैतिक कर्म और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते थे।

इसी दृष्टिकोण से वे ऐसे विराग और एकांतवास की आलोचना करते थे, जो मनुष्य को सामाजिक जीवन और कर्म से दूर कर देता है। उनका मानना था कि संसार की समस्याओं से पलायन करके व्यक्ति अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता। उनके अनुसार वास्तविक आध्यात्मिकता मनुष्य को निष्क्रिय नहीं बनाती, बल्कि उसमें नैतिक साहस, आत्मबल और सामाजिक सक्रियता उत्पन्न करती है।

इकबाल की सोच के अनुसार मुस्लिम समुदाय को भाईचारे और न्याय के आदर्शों के लिए उदार सेवा की शिक्षा देनी चाहिए। निस्वार्थ भाव का रहस्य ही इस्लाम की छिपी हुई ताकत थी, और सक्रिय आत्म-साक्षात्कार का एकमात्र संतोषजनक तरीका खुद से बड़े उद्देश्यों की सेवा में खुद का बलिदान देना था, जिसका आदर्श पैगंबर मुहम्मद का जीवन और शुरुआती अनुयायियों की समर्पित सेवा थी।

पूर्व-पश्चिम संवाद और पश्चिमी सभ्यता की आलोचना

इक़बाल के चिंतन में पूर्व और पश्चिम का द्वंद्व एक महत्त्वपूर्ण विषय है। वे पश्चिम की वैज्ञानिक-बौद्धिक उपलब्धियों का सम्मान करते थे, किंतु उसके भौतिकवाद, अत्यधिक व्यक्तिवाद और आध्यात्मिक रिक्तता की आलोचना करते थे। उनका मानना था कि विज्ञान और तकनीक मानव जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, किंतु नैतिक उद्देश्य और मानवीय उत्तरदायित्व के अभाव में उनका उपयोग विनाशकारी भी हो सकता है। वे पश्चिमी साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक शोषण के भी आलोचक थे। साथ ही उन्होंने पूर्वी समाजों में व्याप्त जड़ता, निष्क्रियता और अतीत पर अत्यधिक निर्भरता की भी आलोचना की।

अतः उनका उद्देश्य पश्चिम को पूर्णतः अस्वीकार करना नहीं था। वे पश्चिम के विज्ञान, तर्क और सक्रियता से उपयोगी तत्व ग्रहण कर उन्हें इस्लामी नैतिक-आध्यात्मिक मूल्यों के साथ समन्वित करने के पक्षधर थे, जिससे उनके चिंतन में एक समन्वयवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है।

युवाशक्ति और प्रतीकात्मक कल्पना

इकबाल ने मुस्लिम समाज के पुनर्जागरण और युवाओं में आत्मविश्वास, साहस, ज्ञान व नैतिक चरित्र विकसित करने का विशेष आह्वान किया। वे चाहते थे कि मुस्लिम समाज अपने अतीत की उपलब्धियों से प्रेरणा ले किंतु केवल उसी पर निर्भर न रहे, बल्कि शिक्षा, संगठन, आत्मानुशासन और कर्म के माध्यम से भविष्य का निर्माण करे।

इक़बाल का प्रिय फूल ट्यूलिप था, जो शहीदों के रक्त से सने कफ़न, लौ और प्याले से जुड़ा प्रतीक रहा है। गुलाब की तरह सजे-सँवरे बाग़ों में नहीं बल्कि प्राकृतिक वातावरण में उगने के कारण यह इक़बाल की दृष्टि में मनुष्य का प्रतीक बन जाता है, जो बिना बाहरी सहायता के अपनी संभावनाओं को विकसित करने का प्रयास करता है। इसी प्रकार उनकी कविता में ‘शाहीन’ (बाज) एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। स्वतंत्रता, ऊँची आकांक्षा, साहस, आत्मनिर्भरता और संघर्ष का, जो तीतर जैसे सुंदर किंतु साधारण पक्षियों के साथ कभी न घुलने-मिलने वाला और ऊँचे पर्वतों के ऊपर विचरण करने वाला माना जाता है। इन प्रतीकों के माध्यम से इक़बाल उत्पीड़ित मुस्लिम युवाओं को मानसिक गुलामी से मुक्त होकर निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहते थे।

काव्य-शैली

इक़बाल ने ग़ज़ल, मसनवी और रुबाई जैसे पारंपरिक काव्य-रूपों का प्रयोग किया, यद्यपि वे शास्त्रीय रुबाई की अपेक्षा ‘दो-बैती’ के सरल रूप को अधिक पसंद करते थे और ऐसे छंद उन्हें प्रिय थे जिन्हें आसानी से याद रखा जा सके। उन्हें विचारों के विरोधी युग्मों का प्रयोग भी पसंद था, जिससे उनकी कविता अधिक प्रभावशाली और स्मरणीय बन जाती थी। उनकी फ़ारसी रचनाओं में ‘पयाम-ए-मशरिक़’ में आधुनिक काव्य-रूपों की सबसे अधिक विविधता दिखाई देती है, जबकि ‘जाविद-नामा’ में वे मसनवी को जीवंत बनाने के लिए बीच-बीच में ग़ज़लें अथवा स्वतंत्र शेर सम्मिलित करते हैं।

ग़ज़ल में उनकी दक्षता पर भारतीय शैली के कवियों का प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने बिदिल और ग़ालिब के प्रति अपना आभार व्यक्त किया और माना कि उन्होंने उन्हें भावभूमि में पूर्वी बने रहना सिखाया। वे प्रसिद्ध ग़ज़लों के उत्तर में ‘नज़ीरा’ (जवाबी कविता) भी लिखते थे और कभी-कभी अपनी महाकाव्यात्मक रचनाओं में पूरी ग़ज़लों को उद्धृत करते थे।

बौद्धिक प्रभाव

सूफ़ी परंपरा

इक़बाल के चिंतन पर पूर्वी और इस्लामी परंपराओं के अनेक महान विद्वानों और कवियों, जैसे जलालुद्दीन रूमी, इब्न अरबी, हाफ़िज़ शीराज़ी, सनाई आदि का प्रभाव था। विशेष रूप से रूमी को इक़बाल अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक (ख़िज़्र-ए-राह) मानते थे और उनकी फ़ारसी रचनाओं में रूमी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इक़बाल ने रूमी की आध्यात्मिकता को गतिशीलता, कर्म और आत्मविकास की अपनी अवधारणा के साथ जोड़ा।

अपनी शोध-प्रबंधीय रचना में उन्होंने रूमी को सर्वेश्वरवाद के प्रतिनिधि के रूप में देखा था और हेगेल के शब्दों में उन्हें महान रूमी के रूप में सराहा था; बाद में, संभवतः शिबली नोमानी की पुस्तक ‘सवानेह-ए-मौलाना रूमी’ पढ़ने के बाद, उन्होंने रूमी को निरंतर विकास और गतिशीलता के समर्थक के रूप में समझा। इक़बाल ने अपनी मसनवियों के लिए ऐसा छंद चुना जिसमें वे रूमी की ‘मसनवी’ से सहजता से उद्धरण सम्मिलित कर सकें, और एक कविता में उन्होंने स्वर्ग में रूमी व गोएथे के बीच संवाद प्रस्तुत किया, जहाँ दोनों उनके पूर्वी और पश्चिमी गुरु के रूप में सामने आते हैं।

इक़बाल के बौद्धिक विकास में विचारों का परिवर्तन विशेष रूप से रोचक है। जिन विचारकों,जैसे इब्न-ए-अरबी को उन्होंने शोध-प्रबंध में महत्त्व दिया था, उन्हें बाद में अस्वीकार कर दिया; वहीं ‘असरार-ए-ख़ुदी’ के समय जिनकी आलोचना की थी, जैसे इराक़ी, सनाई और विशेष रूप से हल्लाज, बाद में वे उनके आध्यात्मिक अग्रदूत बन गए।

यूनानी व आधुनिक पश्चिमी दर्शन

इक़बाल ने प्राचीन यूनानी दार्शनिकों, विशेष रूप से प्लेटो और अरस्तू, के विचारों का अध्ययन किया। उन्होंने हेगेल में अपनी आरंभिक रुचि बाद में छोड़ दी और जीवन-शक्तिवादी विचारकों, विशेषकर हेनरी बर्गसन और फ़्रेडरिक नीत्शे, की ओर उन्मुख हुए। यद्यपि उन्होंने इन विचारों को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया, बल्कि विभिन्न दार्शनिक परंपराओं से उपयोगी तत्व ग्रहण करते हुए उन्हें इस्लामी नैतिक-आध्यात्मिक चिंतन के साथ जोड़ने का प्रयास किया, जिससे उनका विशिष्ट ख़ुदी-दर्शन विकसित हुआ। इक़बाल ने नीत्शे के व्यक्तित्व की शक्ति को पहचाना और उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जिसका हृदय निष्ठावान किंतु बुद्धि नास्तिक थी। उनके अनुसार नीत्शे को ‘ला’ (निषेध) की नकारात्मक अवस्था से ‘इल्लल्लाह’ (केवल ईश्वर की सकारात्मक स्वीकृति) की ओर ले जाने के लिए एक आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता थी। उनकी ‘रिकंस्ट्रक्शन’, जिसका शीर्षक ग़ज़ाली की ‘इह्या-ए-उलूम-उद-दीन’ की स्मृति कराता है, पश्चिमी विचारों के प्रति उनकी गहरी समझ को दर्शाती है।

फ़ारसी दर्शन और पूर्वी परंपराएँ

इक़बाल पूर्वी बौद्धिक परंपराओं के भी गहरे जानकार थे। 1907 ई. में प्रस्तुत उनके शोध-प्रबंध में फ़ारसी विचारधारा के विश्लेषण का विशेष महत्त्व है। ज़रथुस्त्र से आरंभ करते हुए उन्होंने ईरान के प्रमुख धार्मिक-दार्शनिक आंदोलनों की रूपरेखा प्रस्तुत की और पश्चिमी पाठकों को याह्या बिन हबश सुहरावर्दी-ए-मक़्तूल, मुल्ला सदरा और हादी सब्ज़वारी जैसे विचारकों से परिचित कराया, जिससे इन क्षेत्रों में आधुनिक शोध का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्हें बाबी और बहाई आंदोलनों में भी रुचि थी, जिसका संकेत शोध-प्रबंध के सकारात्मक मूल्यांकन तथा ‘जाविद-नामा’ में बहाई कवयित्री क़ुर्रत-उल-ऐन ताहिरा के उल्लेख से मिलता है।

‘जाविद-नामा’ में ज़रथुस्त्र पैगंबरी चेतना के आदर्श रूप में प्रस्तुत होते हैं, जो अहरिमन के प्रलोभन के बावजूद अपने उपदेशों से पीछे नहीं हटते। यहाँ अहरिमन मनुष्य को एकांत में केवल आध्यात्मिक कार्यों में लगे रहने के लिए प्रेरित करने वाली शक्ति के रूप में सामने आता है, जिसकी इक़बाल ने निष्क्रिय-छद्म रहस्यवादियों की आलोचना के रूप में तीखी आलोचना की। चूँकि इक़बाल ने अपने शोध-प्रबंध में अच्छाई-बुराई की समस्या पर विशेष विचार किया था, उनकी दार्शनिक कविता में शैतान/इब्लीस की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वह गोएथे के मेफ़िस्टोफ़ेलेस और मिल्टन के ल्यूसिफ़र की भाँति मनुष्य के आवश्यक प्रतिपक्ष के रूप में सामने आता है, जिसे पूर्ण आस्थावान मनुष्य अंततः पराजित कर देता है।

इक़बाल प्रकृति के भी उत्कृष्ट कवि थे, विशेषकर अपने पैतृक प्रदेश कश्मीर की प्रशंसा में लिखी रचनाओं में, फिर भी उनकी कविता में प्रकृति का वर्णन अपने आप में अंतिम उद्देश्य नहीं, बल्कि उनके धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक आदर्शों को व्यक्त करने का माध्यम है।

राजनीति में प्रारंभिक प्रवेश (1908–1930 ई.)

इक़बाल मूलतः कवि और दार्शनिक थे और राजनीति को अपना प्राथमिक क्षेत्र नहीं मानते थे, फिर भी वे भारतीय राजनीति से लगातार जुड़े रहे। 1908 ई. में वे अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की ब्रिटिश समिति से जुड़े। बाद में वे पंजाब की राजनीति में सक्रिय हुए और 1926 ई. में पंजाब विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए, जिससे वे 1930 ई. तक जुड़े रहे।

1920 के दशक में भारतीय राजनीति में कांग्रेस, मुस्लिम लीग और विभिन्न मुस्लिम राजनीतिक समूहों के बीच संवैधानिक प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचक मंडल और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर गंभीर मतभेद थे, और इक़बाल इन प्रश्नों पर मुस्लिम राजनीतिक हितों के समर्थक बने। 1927 ई. में जिन्ना के नेतृत्व में दिल्ली प्रस्ताव सामने आए, जिनमें संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार करने का विचार था। पंजाब के कुछ मुस्लिम नेताओं, जिनमें इक़बाल भी शामिल थे, ने इन प्रस्तावों का विरोध किया। 1928 ई. में नेहरू रिपोर्ट के प्रश्न पर भी कांग्रेस और मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के बीच मतभेद गहरे हुए। इसी राजनीतिक संघर्ष के दौरान अखिल भारतीय मुस्लिम लीग में भी विभाजन उत्पन्न हुआ। एक पक्ष जिन्ना के नेतृत्व में था, जबकि दूसरा पक्ष पंजाब के नेताओं, विशेष रूप से मियाँ मुहम्मद शफ़ी और इक़बाल से जुड़ा था; यह विभाजन 1934 ई. में जिन्ना के पुनः एकीकृत मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बनने तक बना रहा।

इक़बाल का राष्ट्रवाद के प्रति दृष्टिकोण जटिल था। वे देशप्रेम को अस्वीकार नहीं करते थे और मानते थे कि अपने देश से प्रेम करना स्वाभाविक मानवीय भावना है, किंतु वे ऐसे राजनीतिक राष्ट्रवाद के आलोचक थे जिसमें धर्म और सांस्कृतिक पहचान को पूर्णतः निजी क्षेत्र तक सीमित कर दिया जाए। उनका मानना था कि भारत जैसे बहुधार्मिक-बहुसांस्कृतिक समाज में मुसलमानों की सामुदायिक पहचान और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा आवश्यक है।

1930 ई. का इलाहाबाद भाषण

29 दिसंबर 1930 ई. को इलाहाबाद में आयोजित अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में इक़बाल को अध्यक्षीय भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया। इस भाषण में उन्होंने पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर उत्तर-पश्चिम भारत में एक संगठित मुस्लिम राज्य की कल्पना प्रस्तुत की, जो आगे चलकर पाकिस्तान की स्थापना के विचार का एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार बनी।

इक़बाल ने उस भाषण में ‘पाकिस्तान’ शब्द का प्रयोग नहीं किया था और उनके 1930 ई. के प्रस्ताव को सीधे-सीधे बाद में बने पाकिस्तान की पूर्ण-अंतिम रूपरेखा के समान मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। उनकी तत्कालीन राजनीतिक माँग को ब्रिटिश भारत के भीतर एक संघीय अथवा स्वायत्त उत्तर-पश्चिमी मुस्लिम राज्य के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। ‘पाकिस्तान’ शब्द इक़बाल ने नहीं गढ़ा था। यह शब्द चौधरी रहमत अली और उनके सहयोगियों द्वारा 1933 ई. में प्रयुक्त किया गया। इसलिए इक़बाल को पाकिस्तान की अवधारणा के प्रमुख वैचारिक प्रवर्तकों में रखा जा सकता है, किंतु यह कहना सही नहीं है कि ‘पाकिस्तान’ नाम का आविष्कार उनके द्वारा किया गया। इकबाल के 1930 ई. के भाषण को आधुनिक अर्थों में पाकिस्तान की स्पष्ट-औपचारिक मांग मानना इतिहासकारों के बीच बहस का विषय है, फिर भी मुस्लिम राजनीतिक स्वायत्तता संबंधी उनके विचारों ने आगे चलकर मुस्लिम लीग की राजनीति और पाकिस्तान आंदोलन के वैचारिक विकास को प्रभावित किया।

गोलमेज़ सम्मेलन और यूरोप की दूसरी यात्रा (1931–1932 ई.)

1931 और 1932 ई. में इक़बाल ने लंदन में आयोजित दूसरे और तीसरे गोलमेज़ सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, जहाँ उन्होंने भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा के प्रश्न को प्रमुखता से उठाया। भारत लौटते समय उन्होंने यरूशलम की यात्रा की। इसके बाद वे फ्रांस गए, जहाँ उनकी भेंट हेनरी बर्गसन और लुई मैसिग्नॉन से हुई। उन्होंने स्पेन की भी यात्रा की, जहाँ वे मिगुएल असिन पालासियोस से मिले और कॉर्डोबा की मस्जिद देखी। इस यात्रा ने उनकी श्रेष्ठ उर्दू कविताओं में से एक की रचना को प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने इटली की यात्रा की।

अफ़ग़ानिस्तान यात्रा (1933 ई.)

1933 ई. में अफ़ग़ानिस्तान के शासक नादिर शाह के निमंत्रण पर इक़बाल ने अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की, जहाँ उनसे आधुनिक पश्चिमी ज्ञान और पारंपरिक इस्लामी मूल्यों के समन्वय पर आधारित एक विश्वविद्यालय (काबुल विश्वविद्यालय) की स्थापना संबंधी विषयों पर सलाह ली गई। अफ़ग़ानिस्तान से लौटने के बाद उनकी स्वास्थ्य-स्थिति लगातार बिगड़ती गई, फिर भी उनका बौद्धिक-रचनात्मक कार्य जारी रहा। इसी यात्रा के परिणामस्वरूप फ़ारसी कविताओं का संग्रह ‘मुसाफ़िर’ तैयार हुआ।

जिन्ना के साथ संबंध और मुस्लिम लीग की राजनीति

1930 के दशक में इक़बाल का संबंध मुस्लिम लीग की राजनीति से अधिक निकट हो गया। वे चाहते थे कि भारतीय मुसलमान अपनी राजनीतिक शक्ति को संगठित करें। प्रारंभिक चरण में इक़बाल और मुहम्मद अली जिन्ना के राजनीतिक दृष्टिकोणों में अंतर था, किंतु 1930 के दशक में इक़बाल जिन्ना को भारतीय मुसलमानों के लिए उपयुक्त राजनीतिक नेतृत्व के रूप में देखने लगे। उन्होंने जिन्ना के साथ पत्राचार किया और उन्हें भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया, जबकि जिन्ना उस समय लंदन में थे और भारतीय राजनीति से कुछ दूरी बनाए हुए थे।

1936 और 1937 ई. के दौरान इक़बाल ने जिन्ना को कई पत्र लिखे, जिनमें उन्होंने भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों और भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर अपने विचार व्यक्त किए। 1930 से 1934 ई. के बीच जब मुस्लिम लीग में संगठनात्मक विभाजन था, तब इक़बाल ने मुस्लिम राजनीतिक आत्मनिर्णय की माँग को वैचारिक दिशा प्रदान की। बाद में जिन्ना ने 1940 ई. के लाहौर अधिवेशन में भारत के मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा। इस अर्थ में इक़बाल को जिन्ना के राजनीतिक मार्गदर्शकों में से एक माना जाता है, यद्यपि वे स्वयं किसी बड़े राजनीतिक संगठन के कुशल संगठनकर्ता या सक्रिय राजनीतिज्ञ नहीं थे।

इक़बाल की मृत्यु 1938 ई. में हुई, जबकि पाकिस्तान की स्थापना 1947 ई. में हुई। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण की राजनीतिक प्रक्रिया में वैचारिक आधार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, न कि वे उसके प्रत्यक्ष संस्थापक थे। उन्हें पाकिस्तान आंदोलन के प्रमुख वैचारिक प्रेरकों और पूर्ववर्ती चिंतकों में रखना अधिक ऐतिहासिक रूप से सटीक है।

अबुल आला मौदूदी से संबंध

अपने अंतिम वर्षों में इक़बाल ने युवा मुस्लिम विद्वान सैयद अबुल आला मौदूदी को पंजाब आने के लिए प्रेरित किया। मौदूदी ने वहाँ से प्रसिद्ध पत्रिका ‘तरजुमान-उल-क़ुरआन’ का प्रकाशन जारी रखा। इक़बाल चाहते थे कि आधुनिक परिस्थितियों में इस्लामी चिंतन को नए ढंग से विकसित किया जाए, यद्यपि बाद के वर्षों में मौदूदी का राजनीतिक-धार्मिक दृष्टिकोण अधिक रूढ़िवादी इस्लामी राजनीतिक विचारधारा की दिशा में विकसित हुआ।

‘तराना-ए-मिल्ली’ और राजनीतिक चिंतन में परिवर्तन

इक़बाल के राजनीतिक चिंतन में आए परिवर्तन को उनकी कविताओं में भी देखा जा सकता है। प्रारंभिक दौर में उन्होंने ‘तराना-ए-हिंद’ के माध्यम से भारतीय देशभक्ति और साझा राष्ट्रीय भावना व्यक्त की थी। बाद में उन्होंने ‘तराना-ए-मिल्ली’ की रचना की, जिसमें मुस्लिम समुदाय की व्यापक एकता और उम्मत की भावना को प्रमुखता दी गई। इसकी प्रसिद्ध पंक्ति है: “चीन-ओ-अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा, मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा।” यह परिवर्तन इक़बाल के प्रारंभिक भारतीय राष्ट्रवाद से बाद के पैन-इस्लामी और मुस्लिम राजनीतिक चिंतन की ओर उनके बौद्धिक संक्रमण को स्पष्ट करता है।

इक़बाल के विचारों की विभिन्न व्याख्याएँ

इक़बाल के व्यक्तित्व और विचारों की व्याख्या को लेकर विद्वानों-साहित्यकारों में मतभेद रहे हैं। कुछ ने उन्हें भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और साझा भारतीय राष्ट्रवाद के कवि के रूप में देखा। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने इक़बाल की प्रारंभिक भारतीय दृष्टि की ओर संकेत करते हुए कहा कि उनके मन में ऐसा हिन्दुस्तान था जो किसी संकीर्ण सीमा में विभाजित नहीं था, जबकि निदा फ़ाज़ली जैसे साहित्यकारों ने इक़बाल के बाद के मुस्लिम राजनीतिक विचारों और पाकिस्तान समर्थक राजनीतिक धारा के साथ उनके संबंध को अधिक प्रमुखता दी।

भारत और पाकिस्तान के लगभग प्रत्येक वैचारिक समूह ने अपने-अपने उद्देश्यों के अनुरूप इक़बाल की व्याख्या की है। उन्हें समाजवाद का अग्रदूत और मार्क्सवाद का समर्थक, साम्राज्यवाद-विरोधी और पूँजीवाद-विरोधी, अभिजात वर्ग तथा सामान्य जनता दोनों का कवि, रूढ़िवादी इस्लाम का व्याख्याकार भी और इस्लाम की गतिशील-स्वतंत्र व्याख्या का समर्थक भी, सूफ़ीवाद का विरोधी भी और स्वयं एक सूफ़ी भी, पश्चिमी चिंतन का ऋणी भी और पश्चिम की प्रत्येक वस्तु का प्रबल आलोचक भी बताया गया है। उन्हें राजनीतिक कवि कहा जा सकता है क्योंकि उनका उद्देश्य मुसलमानों में आत्म-चेतना उत्पन्न करना था और धार्मिक कवि भी क्योंकि क़ुरआन की अनंत संभावनाओं में उनका दृढ़ विश्वास तथा पैगंबर के प्रति उनका गहरा प्रेम उनकी कविता-दर्शन का आधार है। पैगंबर को वे राष्ट्र-निर्माता और मनुष्य के लिए शाश्वत आदर्श, दोनों रूपों में देखते थे।

इन विभिन्न व्याख्याओं से स्पष्ट होता है कि इक़बाल का व्यक्तित्व एकांगी नहीं था। उनके प्रारंभिक चिंतन में व्यापक मानवतावादी और भारतीय राष्ट्रवादी स्वर दिखाई देता है, किंतु उनके राजनीतिक चिंतन के बाद के चरण में मुस्लिम सामुदायिक पहचान और राजनीतिक स्वायत्तता अधिक महत्वपूर्ण हो गई। इसलिए उन्हें केवल राष्ट्रवादी कवि या केवल मुस्लिम अलगाववादी विचारक के रूप में देखना उनके चिंतन की जटिलता को सरल बना देना होगा।

कुछ आलोचकों ने उनके ‘ख़ुदी’ सिद्धांत की तुलना नीत्शे की ‘अतिमानव’ अवधारणा से भी की, यद्यपि इक़बाल स्वयं इस प्रकार की तुलना को उचित नहीं मानते थे क्योंकि उनके आदर्श मनुष्य की अवधारणा ईश्वर, नैतिकता और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ी थी। कुछ पारंपरिक धार्मिक आलोचकों ने उन पर पश्चिमी दर्शन से अत्यधिक प्रभावित होने का आरोप लगाया, तो कुछ आधुनिक आलोचकों ने उनके धार्मिक-राजनीतिक विचारों को सामुदायिक राजनीति से जोड़कर देखा।

मनुष्य, ईश्वर और सामाजिक आदर्श

इक़बाल की भूमिका को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है कि वे मुसलमानों को यह स्मरण कराना चाहते थे कि मनुष्य को ‘ख़लीफ़तुल्लाह’ अर्थात् पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में बनाया गया है। इसलिए मनुष्य का कर्तव्य ईश्वर के सहयोगी के रूप में कार्य करना और संसार को बेहतर बनाना है, बिना यह मान लिए कि पृथ्वी उसकी निजी संपत्ति है। इक़बाल ने सामाजिक न्याय और आधुनिक चिंतन की वकालत की, किंतु साथ ही इतिहास तथा जीवन की भौतिकवादी व्याख्याओं का विरोध भी किया। इस्लाम के कठोर एकेश्वरवाद के प्रति निष्ठावान रहते हुए उन्होंने राष्ट्रवाद, पूँजीवाद, साम्यवाद या आधुनिक युग के अन्य किसी ‘वाद’ को भी मूर्तिपूजा के समान मानकर उसका विरोध किया। उनका आदर्श मनुष्य ईश्वर के साथ गहरे संबंध के बिना पूर्ण नहीं हो सकता, और उसे प्रार्थना के प्रेमपूर्ण एकांत में प्राप्त अनुभव-ज्ञान को संसार में व्यावहारिक रूप देना चाहिए। इक़बाल की यह मूल शिक्षा केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं थी; वे व्यापक मानवता को भी संबोधित करते थे।

उपाधियाँ और सम्मान

1922 ई. में ब्रिटिश क्राउन ने इक़बाल को ‘नाइटहुड’ प्रदान किया, जिसके बाद उन्हें ‘सर मुहम्मद इक़बाल’ के नाम से भी संबोधित किया जाने लगा। इनके अतिरिक्त उन्हें ‘अल्लामा इक़बाल’ (विद्वान एवं महान चिंतक), ‘शायर-ए-मशरिक़’ (पूर्व का कवि), ‘हकीम-उल-उम्मत’ (समुदाय का दार्शनिक/विद्वान) और ‘मुफक्किर-ए-पाकिस्तान’ (पाकिस्तान का विचारक) जैसी उपाधियों से भी संबोधित किया गया।

मुहम्मद इक़बाल का निधन

मुहम्मद इक़बाल का निधन 21 अप्रैल 1938 ई. को लाहौर में हुआ। उन्हें लाहौर की मशहूर बादशाही मस्जिद के निकट एक मक़बरे में दफ़नाया गया; बाद में उनके मकबरे का निर्माण किया गया, जिसके लिए अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने संगमरमर उपलब्ध कराया। दो वर्ष बाद (1940 ई.) मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के विचार के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया, जो 1947 ई. में वास्तविकता बना। पाकिस्तान उनकी मृत्यु के नौ वर्ष बाद अस्तित्व में आया। पाकिस्तान में प्रतिवर्ष 9 नवंबर को ‘इक़बाल दिवस’ मनाया जाता है।

इक़बाल ने स्वीकार किया था कि वे अपने विचारों के प्रसार के लिए कविता का उपयोग करते थे और उन्हें आशा थी कि उनकी कविता मुसलमानों को सदियों की निष्क्रियता से जागृत करेगी। वे ‘कला के लिए कला’ के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। जैसा कि वे ‘जाविद-नामा’ में कहते हैं, यदि मनुष्य का निर्माण कविता का उद्देश्य है तो कविता पैगंबरी की उत्तराधिकारी है, जबकि ऐसी कविता जो लोगों को मधुर स्वप्नों में सुला दे, उनके अनुसार चंगेज़ ख़ान की भीड़ से भी अधिक खतरनाक है।

उनकी मृत्यु के समय वे भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रभावशाली कवि-दार्शनिकों में गिने जाते थे। उनकी मृत्यु के बाद रवींद्रनाथ ठाकुर, सरोजिनी नायडू और अनेक अन्य विद्वानों-साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। अन्नेमेरी शिमेल, रेनॉल्ड निकोल्सन और अन्य विद्वानों ने भी इक़बाल के साहित्य एवं दर्शन के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रमुख कृतियों की सूची

फ़ारसी कृतियाँ

मुहम्मद इक़बाल की साहित्यिक और दार्शनिक रचनाओं में फ़ारसी भाषा का विशेष स्थान है। उन्होंने फ़ारसी के माध्यम से आत्मचेतना, आध्यात्मिकता, व्यक्तित्व-विकास, मुस्लिम समाज के पुनर्जागरण तथा पूर्वी सभ्यता के वैचारिक पुनर्निर्माण जैसे विषयों को अभिव्यक्त किया। उनकी प्रमुख फ़ारसी कृतियों में ‘असरार-ए-ख़ुदी’ 1915 ई. में प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने ‘ख़ुदी’ अर्थात् आत्मचेतना और आत्म-विकास की अपनी दार्शनिक अवधारणा प्रस्तुत की। इसके बाद ‘रुमूज़-ए-बेख़ुदी’ 1918 ई. में प्रकाशित हुई, जिसमें व्यक्ति और समाज के पारस्परिक संबंधों तथा सामुदायिक जीवन के महत्व पर विचार किया गया।

इक़बाल की ‘पयाम-ए-मशरिक़’ 1923 ई. में प्रकाशित हुई, जिसमें पूर्वी सभ्यता और उसके आध्यात्मिक मूल्यों का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। 1927 ई. की ‘ज़बूर-ए-अजम’ में उनके दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति है। उनकी महान कृति ‘जाविदनामा’ 1932 ई. में प्रकाशित हुई, जिसे फ़ारसी साहित्य की महत्वपूर्ण दार्शनिक काव्य-कृतियों में गिना जाता है।

इक़बाल की अन्य प्रमुख फ़ारसी रचनाओं में ‘पस चिह बायद कर्द अय अक़वाम-ए-शर्क़’ (1936 ई.), ‘मुसाफ़िर’ (1936 ई.) तथा ‘अरमग़ान-ए-हिजाज़’ शामिल हैं। अरमग़ान-ए-हिजाज़ 1938 ई. में इक़बाल की मृत्यु के बाद मरणोपरांत प्रकाशित हुई। इन कृतियों के माध्यम से इक़बाल ने पूर्वी समाजों के जागरण, आत्मसम्मान, आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक पुनर्निर्माण का संदेश दिया।

उर्दू कृतियाँ

मुहम्मद इक़बाल की उर्दू रचनाओं में काव्य, दर्शन, राष्ट्रवाद, आध्यात्मिकता तथा सामाजिक और राजनीतिक चिंतन का प्रभावशाली समन्वय दिखाई देता है। उनकी प्रारंभिक गद्य-कृतियों में ‘इल्म-उल-इक़्तिसाद’ का विशेष महत्व है, जो 1903 ई. में प्रकाशित अर्थशास्त्र संबंधी पुस्तक है। इसके माध्यम से इक़बाल ने आर्थिक विषयों और आधुनिक आर्थिक विचारों को सरल रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

इक़बाल का प्रसिद्ध उर्दू काव्य-संग्रह ‘बांग-ए-दरा’ 1924 ई. में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में उनकी विभिन्न कालखंडों में रची गई कविताएँ संकलित हैं, जिनमें राष्ट्रप्रेम, प्रकृति, भारतीय सांस्कृतिक चेतना, इस्लामी विचार और मानवता जैसे विषय प्रमुख हैं। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘सारे जहाँ से अच्छा’ भी इसी काव्य-संग्रह में शामिल है। उनकी अन्य महत्वपूर्ण उर्दू कृतियों में ‘बाल-ए-जिब्रील’ और ‘ज़र्ब-ए-कलीम’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बाल-ए-जिब्रील 1935 ई. में प्रकाशित हुआ, जिसमें आत्मचेतना, आध्यात्मिक जागरण, प्रेम, क्रांति और आधुनिक सभ्यता की आलोचना जैसे विषयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। ज़र्ब-ए-कलीम 1936 ई. में प्रकाशित हुई, जिसे आधुनिक सभ्यता और पश्चिमी भौतिकवाद के प्रति इक़बाल की वैचारिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।

अंग्रेज़ी कृतियाँ

मुहम्मद इक़बाल ने अंग्रेज़ी भाषा में भी महत्वपूर्ण दार्शनिक और धार्मिक कृतियों की रचना की। उनकी प्रमुख अंग्रेज़ी कृति ‘द डेवलपमेंट ऑफ मेटाफ़िज़िक्स इन पर्शिया’ 1908 ई. में प्रकाशित हुई। यह मूलतः उनके शोधकार्य पर आधारित एक महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने प्राचीन फ़ारस में दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन के विकास का अध्ययन प्रस्तुत किया। इसमें फ़ारसी चिंतन-परंपरा तथा उसके विभिन्न दार्शनिक और धार्मिक स्रोतों का विश्लेषण किया गया है।

इक़बाल की दूसरी महत्वपूर्ण अंग्रेज़ी कृति ‘द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रिलिजियस थॉट इन इस्लाम’ है। यह उनके व्याख्यानों पर आधारित एक प्रसिद्ध दार्शनिक ग्रंथ है। इसके व्याख्यान 1928–1929 ई. के दौरान दिए गए थे और बाद में इन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। इस कृति में इक़बाल ने आधुनिक युग की आवश्यकताओं के संदर्भ में इस्लामी धार्मिक चिंतन के पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया है।

मुहम्मद इक़बाल का ऐतिहासिक मूल्यांकन

मुहम्मद इक़बाल आधुनिक भारत के उन प्रमुख विचारकों में थे, जिन्होंने आध्यात्मिकता और सक्रिय कर्म, आत्मचेतना और सामाजिक दायित्व तथा धार्मिक परंपरा और आधुनिक बौद्धिक चिंतन के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। इक़बाल का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि, दार्शनिक, अध्यापक, विधिवेत्ता, राजनीतिक विचारक और धार्मिक चिंतक थे, जिनकी बौद्धिक दुनिया में रूमी और फ़ारसी सूफ़ी परंपरा से लेकर प्लेटो, अरस्तू, नीत्शे और बर्गसाँ तक विभिन्न परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने पूर्व और पश्चिम में से किसी एक को पूर्णतः स्वीकार या अस्वीकार करने के बजाय दोनों से उपयोगी तत्व ग्रहण करने का प्रयास किया, ताकि एक ऐसे सक्रिय, आत्मविश्वासी और नैतिक मनुष्य का निर्माण हो सके जो आध्यात्मिक रूप से जागरूक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक-बौद्धिक रूप से भी सक्षम हो।

इक़बाल की सबसे स्थायी विरासत उनकी यह धारणा है कि मनुष्य और समाज को जड़ता, आत्महीनता और पराधीनता से बाहर निकलकर आत्मचेतना, ज्ञान, कर्म, नैतिकता और रचनात्मकता की ओर बढ़ना चाहिए। यही विचार उनकी कविता, दर्शन और राजनीतिक चिंतन को एक-दूसरे से जोड़ता है। उनकी ‘ख़ुदी’ व्यक्ति में आत्मविश्वास और रचनात्मक शक्ति जगाने का संदेश देती है; उनका धार्मिक दर्शन इस्लाम को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ में पुनर्विचार करने का प्रयास करता है; और उनका राजनीतिक चिंतन भारतीय मुसलमानों के आत्मनिर्णय तथा राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न को सामने लाता है।

इसी कारण भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में इक़बाल का स्थान बहुआयामी है। राजनीतिक दृष्टि से 1930 ई. का इलाहाबाद भाषण भारतीय मुस्लिम राजनीति के इतिहास में महत्त्वपूर्ण पड़ाव था, और बाद में जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अलग मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था की माँग को आगे बढ़ाकर अंततः 1947 ई. में पाकिस्तान का निर्माण किया। इसलिए इक़बाल को पाकिस्तान के निर्माण के प्रत्यक्ष राजनीतिक संस्थापक की बजाय उसके प्रमुख वैचारिक और बौद्धिक पूर्वगामियों में रखना अधिक ऐतिहासिक रूप से उचित है।

इक़बाल को केवल ‘पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि’ या केवल ‘मुस्लिम शायर’ के रूप में देखना उनके व्यापक बौद्धिक व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। उनके साहित्य में एक ओर ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ जैसी भारतीय राष्ट्रवादी भावना से ओत-प्रोत रचना दिखाई देती है, तो दूसरी ओर बाद की रचनाओं और राजनीतिक विचारों में मुस्लिम सामुदायिक चेतना तथा पृथक राजनीतिक व्यवस्था की अवधारणा प्रमुख हो जाती है। वे आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास, साहित्य, दर्शन और राजनीति के ऐसे व्यक्तित्व थे जिनके विचारों में समय के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन आया और जिनकी विरासत आज भी व्यापक बहस का विषय है। इक़बाल के कार्यों पर पाकिस्तान, भारत, ईरान, तुर्की और हाल के समय में अरब जगत में भी अनगिनत पुस्तकों-लेखों में चर्चा होती रही है।

मुहम्मद इक़बाल से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. मुहम्मद इक़बाल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

मुहम्मद इक़बाल का जन्म 9 नवंबर 1877 ई. को सियालकोट, पंजाब में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान में है। उनके पिता शेख़ नूर मुहम्मद और माता इमाम बीबी थीं।

2. इक़बाल की ‘ख़ुदी’ की अवधारणा क्या है?

‘ख़ुदी’ इक़बाल के दर्शन की प्रमुख अवधारणा है। इसका अर्थ आत्मबोध, आत्मसम्मान, आत्मानुशासन और व्यक्तित्व की सृजनात्मक शक्ति से है। इसकी प्रमुख अभिव्यक्ति उनकी फ़ारसी कृति ‘असरार-ए-ख़ुदी’ (1915 ई.) में मिलती है।

3. क्या इक़बाल ने ‘पाकिस्तान’ नाम गढ़ा था?

नहीं। ‘पाकिस्तान’ नाम चौधरी रहमत अली और उनके सहयोगियों ने 1933 ई. में प्रयुक्त किया था। इक़बाल ने 1930 ई. के इलाहाबाद भाषण में उत्तर-पश्चिमी भारत के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए एक संगठित मुस्लिम राज्य की कल्पना प्रस्तुत की थी। उन्होंने ‘पाकिस्तान’ शब्द का प्रयोग नहीं किया था।

4. इक़बाल की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ कौन-सी हैं?

उनकी प्रमुख फ़ारसी कृतियों में ‘असरार-ए-ख़ुदी’, ‘रुमूज़-ए-बेख़ुदी’, ‘पयाम-ए-मशरिक़’, ‘ज़बूर-ए-अजम’ और ‘जाविद-नामा’ शामिल हैं। प्रमुख उर्दू कृतियों में ‘बांग-ए-दरा’, ‘बाल-ए-जिब्रील’ और ‘ज़र्ब-ए-कलीम’ हैं। अंग्रेज़ी में ‘द डेवलपमेंट ऑफ़ मेटाफ़िज़िक्स इन पर्शिया’ और ‘द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलिजियस थॉट इन इस्लाम’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।

5. इक़बाल और मुहम्मद अली जिन्ना के बीच क्या संबंध था?

इक़बाल ने जिन्ना को भारतीय मुसलमानों के प्रमुख राजनीतिक नेता के रूप में देखा और उन्हें सक्रिय राजनीति में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया। 1936–1937 ई. में उन्होंने जिन्ना को कई पत्र लिखे, जिनमें मुस्लिम राजनीतिक हितों और भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर विचार व्यक्त किए।

6. इक़बाल का निधन कब हुआ और उन्हें कहाँ दफ़नाया गया?

मुहम्मद इक़बाल का निधन 21 अप्रैल 1938 ई. को लाहौर में हुआ। उन्हें बादशाही मस्जिद के निकट स्थित उनके मक़बरे में दफ़नाया गया। उनकी मृत्यु के बाद 1938 ई. में ‘अरमग़ान-ए-हिजाज़’ प्रकाशित हुई। पाकिस्तान का निर्माण 14 अगस्त 1947 ई. को हुआ।
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