गोपाळ हरी देशमुख (लोकहितवादी)
मुख्य लेख : उन्नीसवीं सदी में भारतीय सांस्कृतिक जागरण
गोपाळ हरी देशमुख (1823–1892 ई.), जिन्हें ‘लोकहितवादी’ के नाम से जाना जाता है, उन्नीसवीं शताब्दी के महाराष्ट्र के प्रमुख समाज-सुधारक, विचारक, पत्रकार, लेखक और इतिहासकार थे। उन्होंने मानवतावादी और तर्कशील विचारों को बढ़ावा देते हुए धार्मिक रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, बाल-विवाह और दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों की आलोचना की, तथा सामाजिक-धार्मिक समानता, स्त्री-शिक्षा और महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थन किया। महाराष्ट्र के साथ-साथ गुजरात में भी उन्होंने सामाजिक सुधार और शिक्षा-प्रसार के कार्यों को प्रोत्साहित किया। उनके प्रसिद्ध ‘शतपत्र’ और अन्य निबंधों ने तत्कालीन समाज की रूढ़ियों और समस्याओं पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए। इस प्रकार लोकहितवादी ने अपने सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक और साहित्यिक कार्यों के माध्यम से महाराष्ट्र के सामाजिक सुधार आंदोलन तथा आधुनिक बौद्धिक चेतना के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
गोपाळ हरी देशमुख का जन्म 18 फरवरी 1823 ई. को पुणे में एक वतनदार परिवार में हुआ था। उनका परिवार मूलतः कोंकण के रत्नागिरी जिले के पावस क्षेत्र का रहने वाला था, और परिवार का मूल उपनाम सिद्धये था, जो देशमुखी वतन के कारण आगे चलकर ‘देशमुख’ हो गया। उनके पिता हरिपंत देशमुख, दूसरे बाजीराव पेशवा के सेनापति बापू गोखले के फडणीस के रूप में कार्य करते थे।
गोपाळ हरी की प्रारंभिक शिक्षा पुणे की बुधवार पेठ स्थित मराठी पाठशाला में हुई, जहाँ उन्होंने अंग्रेज़ी का अध्ययन भी आरंभ कर दिया था। उन्हें संस्कृत, फ़ारसी, हिंदी और गुजराती भाषाओं का अच्छा ज्ञान था तथा पुस्तकों के संग्रह-अध्ययन में उनकी विशेष रुचि रही।
प्रशासनिक एवं न्यायिक सेवा
1844 ई. में उन्होंने दक्षिण के सरदारों के एजेंट के कार्यालय में प्रतिमाह 77 रुपये के वेतन पर अनुवादक के रूप में कार्य आरंभ किया। 1846 ई. में मुंसिफी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे न्यायिक सेवा में आए और 1852 ई. में वाई में प्रथम श्रेणी के मुंसिफ नियुक्त हुए। इसके बाद उन्होंने वाई, सातारा, सूरत, अहमदनगर, ठाणे, अहमदाबाद और नासिक सहित मुंबई प्रांत के विभिन्न स्थानों पर न्यायिक पदों पर कार्य किया तथा अहमदाबाद में लगभग दस वर्षों तक स्मॉल कॉज़ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। बाद में वे मुंबई सरकार के न्याय विभाग में न्यायाधीश भी नियुक्त हुए और कुछ समय के लिए रतलाम रियासत के दीवान भी रहे, जहाँ उन्होंने गुजरात में सामाजिक और बौद्धिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया। उनकी प्रशासनिक एवं सार्वजनिक सेवाओं के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘जस्टिस ऑफ़ पीस’ की उपाधि दी और 1877 ई. के दिल्ली दरबार के अवसर पर उन्हें ‘रावबहादुर’ तथा बाद में ‘फर्स्ट क्लास सरदार’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1874 ई. में उन्हें मुंबई विश्वविद्यालय का फेलो बनाया गया और 1880 से 1883 ई. तक वे मुंबई विधान परिषद के सदस्य रहे। इस प्रकार शिक्षा, न्यायिक सेवा और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को व्यापक बनाया और आगे चलकर उनके समाज-सुधार तथा वैचारिक कार्यों की मजबूत आधारभूमि तैयार की।
पत्रकारिता और ‘शतपत्रे’
गोपाळ हरी देशमुख ने मुंबई से प्रकाशित साप्ताहिक ‘प्रभाकर’ में ‘लोकहितवादी’ उपनाम से लेखन आरंभ किया; उनका पहला लेख 12 मार्च 1848 ई. को प्रकाशित हुआ। 1848 से 1850 ई. के बीच उन्होंने कुल 108 पत्र लिखे, जो आगे चलकर ‘लोकहितवादींची शतपत्रे’ के नाम से जाने गए। इन पत्रों में उन्होंने तत्कालीन सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक मान्यताओं, आर्थिक समस्याओं, राजनीतिक व्यवस्था, साहित्य और इतिहास से संबंधित विषयों पर निर्भीक एवं सुधारवादी विचार व्यक्त किए, जिसका उद्देश्य समाज में जागृति उत्पन्न कर लोगों को सामाजिक सुधार के लिए प्रेरित करना था।
1882 ई. में उन्होंने ‘लोकहितवादी’ नाम से लगभग 20 पृष्ठों का एक मासिक पत्र भी आरंभ किया, जो बाद में त्रैमासिक रूप में भी प्रकाशित हुआ। उन्होंने ‘ज्ञानप्रकाश’ और ‘इंदुप्रकाश’ जैसे पत्रों में भी लेखन किया तथा ‘एक ब्राह्मण’ नाम से भी अपने विचार प्रकाशित किए। वे भारत में आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के विकास के समर्थक थे और उन्होंने इंग्लैंड की संसद के समान भारत में भी एक प्रतिनिधि संस्था की आवश्यकता पर बल दिया।

ग्रंथ-संपदा
गोपाळ हरी देशमुख उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक आधुनिक शिक्षित भारतीयों में से एक थे। उन्होंने धर्म, समाज, अर्थशास्त्र, राजनीति, इतिहास, साहित्य और शिक्षा जैसे विविध विषयों पर लगभग 39 ग्रंथ लिखे तथा अनेक अंग्रेज़ी ग्रंथों का मराठी में अनुवाद किया। उनके सामाजिक चिंतन से संबंधित प्रमुख रचनाओं में ‘जातिभेद’, ‘भिक्षुक’, ‘प्राचीन आर्यविद्या व रीती’, ‘कलियुग’ और ‘निबंधसंग्रह’ उल्लेखनीय हैं। धार्मिक-नैतिक चिंतन से जुड़ी रचनाओं में ‘खोटी साक्ष आणि खोटी शपथ यांचा निषेध’, ‘सुभाषित अथवा सुबोध वचने’, ‘स्वाध्याय’, ‘प्राचीन आर्यविद्यांचा क्रम, विचार आणि परीक्षण’, ‘आश्वलायन गृह्यसूत्र’, ‘आगमप्रकाश’ और ‘निगमप्रकाश’ प्रमुख हैं। उनके लेखन का प्रमुख उद्देश्य समाज को जागृत करना, जाति-व्यवस्था और सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना करना तथा शिक्षा, ज्ञान और सामाजिक प्रगति को प्रोत्साहित करना था। इस प्रकार उनकी ग्रंथ-संपदा उन्नीसवीं शताब्दी के महाराष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और बौद्धिक नवजागरण का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत करती है।
इतिहास-लेखन
इतिहास लोकहितवादी का प्रिय विषय था; उन्होंने इस विषय पर लगभग दस ग्रंथ लिखे और इसे केवल अतीत की घटनाओं का विवरण न मानकर समाज को अपने अतीत से परिचित कराने तथा वर्तमान को समझने का माध्यम माना। 1842 ई. में, मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘हिस्टरी ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर इन इंडिया’ के आधार पर ‘हिंदुस्थानचा इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी। उनके अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों में ‘भरतखंडपर्व’ (1851 ई.), ‘पानिपतची लढाई’ (1877 ई.), ‘ऐतिहासिक गोष्टी’ के विभिन्न भाग, ‘गुजरात देशाचा इतिहास’, ‘लंकेचा इतिहास’, ‘सौराष्ट्र देश का इतिहास’ और ‘उदेपूरचा इतिहास’ शामिल हैं। चरित्र-लेखन के क्षेत्र में उन्होंने ‘पृथ्वीराज चव्हाण यांचा इतिहास’ तथा ‘पंडित स्वामी श्रीमद् दयानंद सरस्वती’ जैसे उल्लेखनीय ग्रंथों की रचना की।
आर्थिक एवं शैक्षिक विचार
गोपाळ हरी देशमुख मराठी में आर्थिक विषयों पर लिखने वाले प्रारंभिक विचारकों में प्रमुख थे। उनकी रचना ‘लक्ष्मीज्ञान’ (1849 ई.) इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है, जिसके माध्यम से उन्होंने एडम स्मिथ के अर्थशास्त्रीय विचारों को मराठी पाठकों तक पहुँचाया। वे श्रम को संपत्ति-निर्माण का आधार मानते थे और धन का उपयोग मंदिरों के निर्माण व तीर्थयात्राओं के बजाय उत्पादन, उद्योग और तकनीकी विकास में किए जाने के पक्षधर थे। ‘लक्ष्मी विलायत को चली, समुद्र पार जाने लगी’ जैसे लेखों में उन्होंने भारत से धन के बाहर जाने और आर्थिक स्थिति से संबंधित प्रश्नों पर विचार किया, तथा गरीबी के कारणों, व्यापार, स्थानीय स्वशासन और ग्राम-व्यवस्था जैसे विषयों पर भी अपने विचार व्यक्त किए।
शिक्षा को वे सामाजिक उन्नति का प्रमुख साधन मानते थे। उनका विश्वास था कि मातृभाषा में आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और उद्योग-धंधों का प्रसार हुए बिना भारत उन्नत राष्ट्रों के समकक्ष नहीं पहुँच सकता, तथा शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज में तार्किक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक चेतना और व्यावहारिक ज्ञान का विकास करना होना चाहिए।
सामाजिक सुधार संबंधी विचार
गोपाळ हरी देशमुख का सामाजिक चिंतन तर्क, स्वतंत्र विचार, समानता और मानव-कल्याण पर आधारित था। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं को बिना तर्क के स्वीकार करने का विरोध किया तथा पुराणों और रूढ़ धार्मिक मान्यताओं में व्याप्त अंधविश्वासों की आलोचना की। उन्होंने जाति-व्यवस्था और वर्णभेद की आलोचना करते हुए उच्च वर्गों से वर्ण-श्रेष्ठता की भावना त्यागने का आग्रह किया, और यह विचार रखा कि समाज के सभी वर्गों को समान अवसर तथा आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों में स्वतंत्र भागीदारी का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने मद्यपान का भी विरोध किया।
लोकहितवादी ने महिलाओं की शिक्षा और मुक्ति को सामाजिक सुधार का महत्त्वपूर्ण आधार माना। उन्होंने बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, बहुविवाह, सती-प्रथा और विधवाओं के बाल मुंडवाने जैसी कुप्रथाओं का विरोध किया तथा महिलाओं को शिक्षा, विवाह संबंधी स्वतंत्र निर्णय और विधवा-पुनर्विवाह का अधिकार देने की वकालत की। उनका मानना था कि महिलाओं की स्थिति में सुधार के बिना समाज की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
धार्मिक एवं नैतिक विचार
लोकहितवादी धार्मिक जीवन को तर्क, नैतिकता और मानवतावाद पर आधारित करना चाहते थे। उनका मानना था कि धर्म को अंधविश्वास और रूढ़ियों के आधार पर नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण दृष्टि से समझना चाहिए। उन्होंने हिंदू समाज में प्रचलित अंधविश्वासों, कर्मकांडों और हानिकारक धार्मिक रूढ़ियों की आलोचना की। वे मूर्तिपूजा और बहुदेववाद के विरोधी थे तथा धार्मिक मामलों में ब्राह्मण पुरोहितों के एकाधिकार और अनावश्यक दक्षिणा की प्रथा का भी विरोध करते थे। उनका विचार था कि यदि कोई धार्मिक मान्यता सामाजिक सुधार में बाधा बनती है, तो उसे तर्क की कसौटी पर परखा जाना चाहिए; केवल प्राचीन होने के कारण किसी परंपरा को स्वीकार करना उचित नहीं है।
धार्मिक ग्रंथों के संबंध में भी उनका दृष्टिकोण आलोचनात्मक था। वे वेदों को ऋषियों की रचनाएँ मानते थे और ऋषियों को महान संत-विद्वान तो मानते थे, किंतु दैवीय प्राणी नहीं; इसी प्रकार वे अवतारों को असाधारण गुणों से संपन्न वीर और साहसी व्यक्तियों के रूप में देखते थे। वे लिखित धर्मग्रंथों की अपेक्षा मानवीय विवेक और नैतिक चेतना को अधिक महत्त्व देते थे।
लोकहितवादी ने नैतिक जीवन के लिए तीन प्रमुख सिद्धांतों पर बल दिया — सभी मनुष्यों को हृदय से ईश्वर की उपासना करनी चाहिए; मुंज, विवाह और अंतिम संस्कार को छोड़कर अनावश्यक संस्कारों को समाप्त किया जाना चाहिए; और जिस प्रकार मनुष्य अपने जीवन को महत्त्व देता है, उसी प्रकार उसे दूसरों के जीवन का भी सम्मान करना चाहिए। इस प्रकार उनका धार्मिक चिंतन कर्मकांड की अपेक्षा नैतिकता, मानव-कल्याण और विवेक पर केंद्रित था, और उन्होंने धार्मिक सुधार को सामाजिक सुधार से जोड़कर देखा।
पुस्तकालय और गुजरात में योगदान
लोकहितवादी ने शिक्षा और ज्ञान के प्रसार के लिए पुस्तकालय आंदोलन को भी प्रोत्साहित किया। 1848 ई. में उनके प्रयासों से पुणे में ‘पूना नेटिव जनरल लाइब्रेरी’ की स्थापना हुई, जो आगे चलकर ‘पुणे नगरवाचन मंदिर’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
गुजरात में भी उन्होंने सामाजिक और बौद्धिक गतिविधियों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया। उन्होंने ‘हितेच्छु’ नामक साप्ताहिक के प्रकाशन में योगदान दिया तथा ‘गुजराती बुद्धिवर्धक सभा’ और ‘गुजराती वक्तृत्व सभा’ जैसी संस्थाओं की स्थापना में भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त उन्होंने गुजरात में प्रार्थना समाज और पुनर्विवाह मंडल जैसी संस्थाओं के विकास में भी योगदान दिया तथा व्याख्यानमालाओं के माध्यम से सुधारवादी विचारों के प्रसार का प्रयास किया। विद्यार्थियों और जरूरतमंदों की सहायता तथा सामाजिक सेवा के कार्यों को भी उन्होंने प्रोत्साहित किया।
वैचारिक विसंगतियाँ
लोकहितवादी के विचारों और व्यक्तिगत आचरण में कुछ विरोधाभास भी दिखाई देते हैं। वे धार्मिक रूढ़ियों और मूर्तिपूजा की आलोचना करते थे, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में देव-दर्शन, पूजा, पुष्प अर्पण और नैवेद्य जैसी धार्मिक परंपराओं का पालन करते थे। इसी प्रकार उन्होंने समुद्र-यात्रा से भी परहेज किया। वे आर्य समाज के समर्थक थे और कुछ समय तक मुंबई आर्य समाज के अध्यक्ष भी रहे। 1869 ई. में विधवा-विवाह के एक मामले में उनका समर्थन न करना भी उनके विचारों और व्यवहार के बीच एक उल्लेखनीय विसंगति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इन विरोधाभासों के बावजूद उनके सार्वजनिक लेखन का मूल स्वर तर्क, सामाजिक सुधार और आधुनिक चेतना का समर्थक था।
निधन और मूल्यांकन
9 अक्टूबर 1892 ई. को गोपाळ हरी देशमुख का निधन हुआ। वे उन्नीसवीं शताब्दी के महाराष्ट्र के प्रमुख समाज-सुधारकों और आधुनिक विचारकों में से एक थे। पत्रकारिता, इतिहास-लेखन, शिक्षा, सामाजिक सुधार और आर्थिक चिंतन के माध्यम से उन्होंने महाराष्ट्र में आधुनिक चेतना और बौद्धिक जागरण को बढ़ावा दिया। उनके लेखन ने समाज की तत्कालीन समस्याओं पर व्यापक विचार-विमर्श को जन्म दिया और सुधारवादी चेतना को मजबूत किया। निर्मल कुमार फडके ने उन्हें ‘महाराष्ट्र के राजा राममोहन रॉय’ कहा है। इस प्रकार लोकहितवादी का योगदान महाराष्ट्र के सामाजिक एवं बौद्धिक नवजागरण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।


