रूस में सुधार आंदोलन (Reform Movements in Russia)

उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक रूस एक पिछड़ा हुआ देश बना रहा। रूस को सभ्य बनाने का कार्य सबसे पहले महान् पीटर (1682-1725 ई.) ने आरंभ किया था। उसके बाद कैथरीन द्वितीय (1762-1796 ई.) ने रूस का आधुनिकीकरण किया। यूरोप में रूस की प्रतिष्ठा बढ़ाने में इन दो शासकों की मुख्य भूमिका रही थी। लेकिन रूस की मुख्य समस्या आंतरिक पुनर्निर्माण की थी और इसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया था। परिणामतः उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक रूस एक पिछड़ा हुआ देश बना रहा।

रूस की आंतरिक दशा

इस समय रूस की शासन-व्यवस्था पूर्णतया निरंकुश थी। राज्य की सारी शक्ति जार के हाथों में केंद्रित थी, जो दैवी अधिकार के सिद्धांत पर शासन करता था। उसके शब्द ही कानून होते थे। रूस के विस्तृत साम्राज्य में भिन्न-भिन्न जातियों के लोग निवास करते थे। इन जातियों को किसी प्रकार की नागरिक स्वतंत्रता नहीं थी। रूसी शासक उन पर मनमाना शासन करते थे। उनके द्वारा इस प्रकार की नीति अपनाई जाती थी, जिससे अन्य जाति के लोगों का रूसीकरण हो जाए।

रूसी समाज अन्याय, बेईमानी और अनाचार का गढ़ था। राज्य का प्रत्येक पद प्रभाव से या रिश्वत से प्राप्त होता था। अत्याचार और कुव्यवस्था के विरूद्ध कहीं किसी प्रकार की शिकायत नहीं हो सकती थी।

किसानों की दासता

रूस एक कृषि प्रधान देश था। वाणिज्य-व्यापार एवं उद्योग-धंधों के क्षेत्र में किसी प्रकार की उन्नति नहीं हो पाई थी और कृषि की दशा भी एकदम खस्ताहाल थी।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में किसानों की दासता रूस की सबसे बड़ी समस्या थी। रूसी समाज दो वर्गों में विभक्त था- कुलीन और कृषक। कुलीनों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे, लेकिन कृषकों की दशा बहुत शोचनीय थी।

रूस में लगभग चार करोड़ पंचानबे लाख दास थे। इनमें दो करोड़ तीस लाख जार के निजी गुलाम थे और शेष कुलीनों तथा चर्च आदि के दास थे। जार के दासों की दशा कुलीनों के दासों की अपेक्षा कुछ अच्छी थी। वे लोग वर्ग या ग्रामों में संगठित थे, जिनको मीर कहा जाता था। उन्हें कुछ स्थानीय स्वशासन प्राप्त था। एक निर्वाचित समिति या गाँव के एक मुखिया के द्वारा वे अपने कामों का प्रबंध करते थे। लेकिन इन लोगों को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पडता था। उन्हें अनेक गैर-कानूनी कर देने पड़ते थे।

कुलीनों के दासों की स्थिति अधिक खराब थी और उनके साथ अमानुषिक व्यवहार होता था। स्वामी अपने दासों से हर प्रकार का काम करवा सकता था। उनसे कर वसूल सकता था और निजी सेवा भी करवा सकता था। वह उनको मार-पीट सकता था, अंग-भंग कर सकता था और साइबेरिया भेज सकता था। स्वामी उन्हें बेंच भी सकता था और सेना में जबरन भर्ती भी करवा सकता था। असहाय दासों को इन कष्टों से छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं था। वे कहीं कोई शिकायत भी नहीं कर सकते थे ।

असंतोष और जागृति

रूस की इस प्रकार की अवस्था क्रांति के लिए अनुकूल थी, लेकिन रूस में क्रांति का होना असंभव था। फ्रांस की तरह न तो रूस में कोई मध्यम वर्ग था जो दलित किसानों का नेतृत्व करे और न दार्शनिक ही पैदा हुए जो लोगों को जागृत कर सकें।

लेकिन नेपोलियन के युद्धों के बाद रूस में एक नये प्रकार की जागृति आने लगी थी। फ्रांस की राज्यक्रांति के प्रभाव से राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव रूसी साम्राज्य में बसने वाली गैर-रूसी जातियों पर पड़ रहा था। वे अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए हाथ-पैर मारने लगे थे।

रूस का शासन पूर्णतया निरंकुश था। फ्रांस की क्रांति से प्रभावित होकर रूसी लोग अपने देश में लोकतांत्रिक शासन स्थापित करने का प्रयास करने लगे। नये उदार विचारों की क्रांतिकारी लहर में रूस भी ओत-प्रोत होने लगा। उनके प्रचार के लिए देश में गुप्त समितियों की स्थापना होने लगी थी।

प्रथम अलेक्जेंडर

जिन दिनों रूस में प्रजातंत्र और राष्ट्रीयता की भावनाएँ अंकुरित हो रही थीं, उन दिनों वहाँ का राजा अलेक्जेंडर प्रथम (1801-1825) था। नेपोलियन के पतन में अलेक्जेंडर प्रथम ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वियेना कांग्रेस (1815) में उसने भाग लिया था और उसी के नेतृत्व में ‘पवित्र संघ की स्थापना हुई थी।

प्रारंभ में अलेक्जेंडर उदार विचारों का पक्षपाती था। फ्रांस की राज्यक्रांति का उस पर बहुत प्रभाव पड़ा था। लेकिन अलेक्जेंडर की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह स्थिर प्रकृति का नहीं था। धीरे-धीरे उस पर मेटरनिख का प्रभाव पड़ने लगा और वह कट्टर प्रतिक्रियावादी हो गया।

1820 के रूसी सैनिक विद्रोह के कारण वह उदार विचारों का प्रचंड विरोधी बन गया और स्वेच्छाचारी शासक बन बैठा। उसने लोगों को जो स्वतंत्रताएँ प्रदान की थीं, उनका अपहरण करने लगा। रूस प्रतिक्रिया का एक जबरदस्त गढ़ हो गया और अलेक्जेंडर मेटरनिख का सबसे बड़ा सहयोगी बन गया। नये विचारों को कुचलने के लिए उसने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, जिससे निराशा होकर उदारवादी लोग गुप्त समितियों का संगठन करने लगे।

प्रथम निकोलस

1825 में जार अलेक्जेंडर की मृत्यु के बाद प्रथम निकोलस प्रथम (1825 1855) रूस की गद्दी पर बैठा। लेकिन क्रांतिकारी गुप्त समितियों ने 26 दिसंबर, 1825 को विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया। विद्रोहियों की शक्ति बहुत सीमित थी, इसलिए शीघ्र ही उसे कुचल दिया गया। क्रांतिकारियों को कठोर दंड दिया गया। इसके बाद रूस में घोर प्रतिक्रिया प्रारंभ हुई।

निकोलस प्रथम निरंकुशता का अवतार था। उसने तीस वर्ष लगातार रूस में निर्दयता और कठोरता के साथ शासन किया। वह समस्त प्रगतिशील तत्वों का निर्मम शत्रु था और दूसरे देशों में भी उसने बड़ी तत्परता के साथ निरंकुशता का समर्थन किया। उदार विचारों को दृढ़तापूर्वक दबाना, रूढ़िवाद से चिपके रहना तथा विद्रोहियों का निर्दयतापूर्वक दमन करना उसकी नीति थी।

निकोलस ने रूस में पश्चिमी विचारों के प्रवेश को रोकने के लिए हर संभव कोशिश की। विदेशी रूस में नहीं आ सकते थे और कोई रूसी पश्चिमी यूरोप की यात्रा नहीं कर सकता था। विदेशी राजनीति अथवा दार्शनिक साहित्य का रूस में प्रवेश निषिद्ध कर दिया। देशी समाचारपत्रों पर कठोर नियंत्रण लगा दिया। सारे देश में गुप्तचरों का जाल फैला दिया गया और तरह-तरह की संस्थाओं तथा प्रेस पर पर कठोर नियंत्रण लगा दिये गये। सरकार की पूर्वानुमति के बिना कोई भी समाचार प्रकाशित नहीं हो सकता था। विश्वविद्यालयों पर कड़ा पहरा था, सरकार द्वारा स्वीकृत प्राध्यापक ही नियुक्त किये जा सकते थे और सरकार द्वारा स्वीकृत पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जा सकता था। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से दर्शनशास्त्र को हटा दिया गया। व्यवस्था इतनी सख्त थी कि यदि किसी पर जरा भी संदेह होता तो उसे कठोर दंड देकर साइबेरिया निर्वासित कर दिया जाता था।

निकोलस के शासन के बीस माह में लगभग डेढ लाख लोग निर्वासित करके साइबेरिया भेजे गये थे और इतनी ही संख्या में लोग रूस के बंदीगृहों में कठोर यातनाएँ भोग रहे थे।

विदेशी साहित्य के बाहिष्कार के साथ-साथ निकोलस ने लोगों का ध्यान राजनीति से हटाने के लिए रूसी साहित्य को प्रोत्साहन दिया। उसने रूसी राष्ट्रीयता पर जोर दिया, ताकि लोगों पर अंतर्राष्ट्रीय उदारवाद का प्रभाव न हो सके। इस प्रकार निकोलस ने सारे देश को सैनिक अनुशासन में रखने का प्रयास किया।

रूसी साम्राज्य की विविध परतंत्र जातियों में जो राष्ट्रीयता की भावना अंकुरित हो रही थी, उसको कुचलने के लिए उसने अपनी सेनाओं को दूर-दूर भेजा और उन्हें दबाने का हरसंभव प्रयास किया। निकोलस प्रथम का यह कठोर निरंकुश शासन इतना सफल हुआ कि जब 1830 और 1848 के बीच सारे यूरोप में राजनीतिक क्रांतियाँ हो रही थी, तो रूस में किसी प्रकार की राजनीतिक क्रांति नहीं हुई।

इसी समय क्रीमिया युद्ध प्रारंभ हुआ, जिसमें रूस की पराजय हुई, किंतु निकोलस युद्ध की समाप्ति के पहले ही मर गया।

रूस में असंतोष

क्रीमिया युद्ध ने रूस के इतिहास को विशेष रूप से प्रभावित किया। रूसी सरकार ने हार की सूचना को दबाने का प्रयास किया, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। पश्चिमी यूरोप के उदारवादी देशों की सेनाओं ने निरंकुश जारशाही सेना को पराजित कर दिया था। इससे निरंकुशता की कमजोरी का भंडाफोड़ हो गया था। रूसी पराजय से रूसवासियों की आँखें खुल गई। इस पराजय ने स्पष्ट कर दिया कि रूस का सैनिक संगठन उतना ही खराब और शिथिल है, जितना कि आंतरिक शासन-प्रबंध। वास्तव में क्रीमिया युद्ध ने निकोलस की प्रतिक्रियावादी शासन की भ्रष्टता और अयोग्यता को प्रमाणित कर दिया।

निकोलस की शासन-व्यवस्था की विफलता से रूस में सुधार आंदोलन की माँग बढ़ने लगी। क्रीमिया युद्ध के पहले रूस में जो व्यापक असंतोष था, अब वह विद्रोह का रूप धारण करने लगा। अभी तक रूस के लोगों में चेतना का अभाव था और वे उपेक्षा के साथ सब कुछ सहते आ रहे थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई थी और असंतोष बढ़ने लगा था। प्रेस पर तो तरह-तरह के प्रतिबध थे, लेकिन हस्तलिखित पत्रों के द्वारा रूस में उदारवादी विचारों का प्रचार होने लगा था। इन पर्चों में सरकार की तीव्र आलोचना होती थी और व्यंग तथा उपहास के माध्यम से सरकारी अफसरों की कड़ी निंदा की जाती थी। धीरे-धीरे इस साहित्यिक आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया और पूरे रूसी समाज में सुधार आंदोलन के लिए एक जबरदस्त पृष्ठभूमि तैयार कर दिया। निकोलस की मृत्यु के साथ रूस की प्रतिक्रिया में कुछ शिथिलता आई और सुधारों का काम आरंभ हुआ।

अलेक्जेंडर द्वितीय और सुधारों का प्रारंभ

1855 में जार निकोलस की मृत्यु के बाद क्रीमिया युद्ध के दौरान ही अलेक्जेंडर द्वितीय (1855-1881) रूस की गद्दी पर बैठा। उसके सिंहासनासीन होते ही रूस में सुधारों का कार्यक्रम शुरू हुआ। उस समय रूस युद्ध हार रहा था और इसको लेकर अलेक्जेंडर बहुत दुखी था।

अलेक्जेंडर द्वितीय एक योग्य एवं समझदार व्यक्ति था और साम्राज्य की वास्तविक स्थिति परिचित था। वह इस बात को समझता था कि सुधारों के बिना रूस का उद्धार संभव नहीं है। इसलिए अपने राज्याभिषेक के तुरंत बाद उसने आश्चर्यजनक सुधारों का श्रीगणेश किया। ऐसा नहीं था कि जार अलेक्जेंडर लोकतांत्रिक भावनाओं से प्रेरित होकर सब कुछ कर रहा था। वह तो केवल सुधारों की व्यावहारिक आवश्यकता अनुभव कर रहा था। फिर भी, जार अलेक्जेंडर द्वितीय निकोलस की तरह प्रतिक्रियावादी नहीं था। अपने सुधारों को लेकर वह रूस के इतिहास में ‘मुक्तिदाता जार’ के नाम से प्रसिद्ध है।

गद्दी पर बैठते ही अलेक्जेंडर ने ऐसे कार्य किये, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि रूस में उदारता का एक नया युग आ रहा है। 1825 में निकोलस प्रथम के राज्यारोहण के समय विद्रोही सैनिकों को साइबेरिया में निर्वासित कर दिया गया था। अब जीवित विद्रोहियों को तीस साल के निर्वासन के बाद स्वदेश लौट आने की इजाजत मिल गई। अन्य राजनीतिक अपराधियों को भी क्षमा कर दिया गया। साथ ही, विश्वविद्यालयों तथा विदेशी यात्राओं पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। प्रेस पर से भी नियंत्रण हटा लिया गया। सेना का पुनर्गठन किया गया और बजट का प्रकाशन किया जाने लगा।

इसके बाद अलेक्जेंडर ने देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए प्राकृतिक साधनों के विकास का प्रबंध किया और उद्योग-धंधों को प्रोत्साहित किया।

क्रीमिया युद्ध में रूस की पराजय का एक प्रमुख कारण रूसी साम्राज्य में रेल लाइनों का अभाव था। अलेक्जेंडर ने इस ओर ध्यान दिया और सारे देश में रेल की लाइनों की व्यवस्था की। इन सुधारों के कारण धीरे-धीरे रूस की आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी।

कृषक दासों की उन्नति

रूस की सबसे बड़ी समस्या दास प्रथा थी। सभी सुधारकों को लगता था कि रूस में राष्ट्रीय जागृति तब तक नहीं आयेगी, जबतक दासता का अंत नहीं होगा। इस घोर सामाजिक कुरीति का प्रतिकूल प्रभाव रूस की आर्थिक और सैनिक स्थिति पर पड़ रहा था। इसके कारण रूस को सभ्य देशों में हीन माना जाता था क्योंकि यूरोप के अन्य देशों में इस समय तक दास-प्रथा या अर्द्धदास प्रथा खत्म की जा चुकी थी। रूस में अभी साढ़े चार करोड़ के लगभग दास थे। इसलिए सदैव यह भय बना रहता था कि कहीं दास विद्रोह न कर दें और गृह-युद्ध न शुरू हो जाए क्योंकि रूस के दास-कृषक समय-समय आजादी की माँग करते हुए उपद्रव करते रहते थे।

देखें- ब्रिटिश भारत में किसान आंदोलन

किसानों के असंतोष का शमन करने के लिए जार ने दासता के प्रश्न को हल करने का प्रयास किया। उसने कुलीन वर्ग के सामने कुछ निश्चित प्रस्ताव रखे और उनसे अनुरोध किया गया कि ‘‘वे स्वेच्छा से दास-प्रथा को समाप्त कर दें। अन्यथा वे (दास) अपने-आपको स्वयं मुक्त कर लेंगे।’’ 3 मार्च, 1861 को जार ने एक उद्घोषणा प्रकाशित किया, जिसके द्वारा उसने किसानों को दासता से मुक्त कर दिया। इस एक ही आदेश से रूस की साढे़ चार करोड़ जनता स्वतंत्र हो गई। रूस के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। किसान स्वतंत्र हो गये और क़ानूनी तौर से सामंतों का उन पर कोई अधिकार नहीं रह गया।

किसानों की मुक्ति से यह भय था कि रूस की अधिकांश जनता भूमिहीन हो जायेगी और इससे जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती थीं। भूमिहीन होने के कारण उनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं होगा और वे पूँजीपति के शोषण का शिकार होने लगेंगे। इसलिए सामंतों की जमीनों का एक हिस्सा किसानों को दे दिया गया। इसके लिए सामंतों से कहा गया कि इस कीमत को वे 49 साल में 6 प्रतिशत ब्याज पर किसानों से वार्षिक किस्तों में वसूल कर लें। चूंकि इस समय किसानों के पास रुपया नहीं था, इसलिए जमीन की कीमत सरकार ने चुका दी और यह व्यवस्था की कि सरकार मालगुजारी के साथ यह रकम किसानों से वसूल लेगी।

जिस समय किसानों की उन्मुक्ति की उद्घोषणा हुई, उस समय ऐसा लगा कि यह एक क्रांतिकारी घटना घट गई है। किंतु बाद में पता चला कि इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ और उन ऊपर कई प्रकार के नये कर लाद दिये गये। भूमिकर के अतिरिक्त किसानों को वार्षिक किश्त भी देना पड़ा, जिससे किसान कर्ज के बोझ से बुरी तरह दब गये।

अदालती और कानून-संबंधी सुधार

कृषक दासों की उन्मुक्ति अलेक्जेंडर द्वितीय का महत्त्वपूर्ण सुधार था, लेकिन उसने अदालती और कानून-संबंधी सुधार भी किये। रूस का न्याय प्रशासन अत्यंत दोषपूर्ण था। इसकी जाँच करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की गई और उसकी रिपोर्ट के आधार पर पाश्चात्य ढंग पर एक बिल्कुल नई और समुन्नत न्याय-प्रणाली रूस में लागू की गई। कार्यपालिका और न्यायपालिका को पृथक् कर दिया गया और जूरी प्रथा को आरंभ किया गया। न्यायाधीशों को स्वतंत्रता दी गई, जिससे वे निष्पक्ष न्याय कर सकें। अब अदालत की कार्यवाही खुले रूप से होने लगी।

दीवानी और फौजदारी मुकदमे की प्रक्रिया सरल कर दी गई और एक नई दंड-संहिता लागू की गई। महत्त्वपूर्ण मुकदमे बड़े न्यायालयों में दायर किये जाते थे, जिनके न्यायाधीशों की नियुक्ति जार स्वयं करता था। छोटे मुकदमों के फैसले जस्टिसेज ऑफ दी पीस के द्वारा किया जाने लगा, जो सार्वजनिक निर्वाचन द्वारा चुने जाते थे। इस प्रकार न्याय-प्रशासन के क्षेत्र में व्यापक सुधार करके जार ने इसके अनेक दोषों को दूर किया।

शासन-संबंधी सुधार

अलेक्जेंडर ने रूस की शासन-व्यवस्था में भी अनेक सुधार किये। शासन-संबंधी सुधार दो सिद्धांतों पर आधारित थे-विकेंद्रीकरण और प्रांतीय स्वायत्तता। स्थानीय शासन में स्वायत्तता प्रदान कर शासन का विकेंद्रीकरण किया गया। प्रत्येक जिले में स्थानीय कौंसिलें स्थापित की गईं, जिसके सदस्यों का निर्वाचन जनता द्वारा होता था। इसमें सभी वर्गों के प्रतिनिधि होते थे। सडकें और पुलों की मरम्मत करना, प्रारंभिक शिक्षा और सफाई का निरीक्षण करना, दुर्भिक्ष निवारण के लिए आवश्यक कार्यवाही करना इन स्थानीय कौंसिलों के काम थे।

शिक्षा में सुधार

अलेक्जेंडर ने शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार किया। विश्वविद्यालयों से पुरानी पाबंदियाँ हटा दी गईं। माध्यमिक शिक्षण संस्थाओं में सुधार किया गया और स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया गया। 1858 में लड़कियों की पढाई का भी प्रबंध किया गया।

सुधारों से लाभ

दासों की मुक्ति, न्याय तथा स्थानीय प्रशासन में सुधार करके जार अलेक्जेंडर ने रूस को एक सभ्य देश बना दिया, जिससे रूस पश्चिमी देशों के समकक्ष हो गया। रूसी समाज नई भावनाओं में ओत-प्रोत होने लगा। नये-नये साहित्यों की रचना हुई। रूस में उच्चकोटि के लेखक पैदा होने लगे, जिन्होंने देश में नवीन भावनाओं के प्रसार करने में बड़ी सहायता की। तुर्गनेव, पुशकिन, दोस्गोईवस्को, टालस्टॉय इनमें प्रमुख थे। टालस्टॉय तो इस युग का सबसे बड़ा लेखक था, जिसने निष्क्रिय प्रतिरोध के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था।

निराशा और प्रतिक्रिया

सुधारों के दस वर्ष बाद रूस में फिर से प्रतिक्रिया आरंभ हो गई। इसके कई कारण थे- तमाम सुधारों के बावजूद लोगों में निराशा बनी रही। अलेक्जेंडर के सुधार सिद्धांततः तो अच्छे थे, लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से वे बेकार थे। कानूनी दृष्टि से तो कृषकों की स्थिति बहुत अच्छी हो गई, लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से किसानों को कोई लाभ नही मिला। उल्टे इन सुधारों के फलस्वरूप उनकी स्थिति और भी खराब हो गई।

न्याय और प्रशासन के क्षेत्र में जो सुधार हुए, उनसे भी कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। फलतः लोगों को लगने लगा कि ये सुधार पर्याप्त नहीं हैं। पूरे देश में पुनः असंतोष उभरने लगा और सरकार तथा सम्राट की आलोचना होने लगी। इस स्थिति के कारण अलेक्जेंडर के सुधारों का जोश ठंडा हो गया और उसका झुकाव प्रतिक्रियावाद की ओर होने लगा। अलेक्जेंडर को भय सताने लगा कि कहीं और अधिक रियायतें दी गई, तो जारशाही की निरंकुशता कमजोर हो जायेगी।

पौलेंड का विद्रोह

अलेक्जेंडर के प्रतिक्रियावादी होने का प्रमुख कारण 1863 का पौलेंड का विद्रोह था। जिस समय जार अलेक्जेंडर रूस में सुधार योजनाओं को कार्यान्वित कर रहा था, उस समय पौलेंड में भी अनेक सुधार किये गये थे। निर्वासित पोलों को स्वदेश लौटने की आज्ञा दे दी गई थी। पौलेंड में स्वायत्त शासन लागू कर लोगों को स्वतंत्रता दे दी गई थी। पौलेंड और रूस के शासन को पृथक कर दिया गया और रूस की तरह निर्वाचित परिषदों के द्वारा स्थानीय स्वशासन की नींव रखी गई थी।

पोल लोगों की राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उन्हें अनेक रियायतें दी गई, लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए क्योंकि वे रूसी साम्राज्य से पृथक अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते थे। जब उनकी यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी तो वे गुप्त ढंग से क्रांति करने लगे। षडयंत्र शुरू हुए और गुप्त विध्वंसक कार्रवाइयाँ प्रारंभ कर दी गईं।

1863 में पूरे पौलेंड में विद्रोह हो गया। रूस से एक सेना भेजी गई और विद्रोहियों को कुचल दिया गया। हजारों की संख्या में पोल लोग गिरफ्तार किये गये और सैंकड़ों को फाँसी दी गई। पौलेंड की स्वायत्तता छीन ली गई और उसे रूसी साम्राज्य में मिला लिया गया। निर्वाचित परिषदों को भंग कर दिया गया और पौलेंड के रूसीकरण की वृहत् योजना लागू की गई। सारे पौलेंड में रूसी भाषा में पढ़ना-लिखना अनिवार्य कर दिया गया। वारसा का विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया और पोल अधिकारियों को हटाकर उनकी जगह रूसी अधिकारी नियुक्त किये गये। असंख्य लोग निर्वासित कर दिये गये।

रूस पर प्रभाव

पौलेंड के विद्रोह और उसके दमन का प्रभाव रूस पर भी पड़ा। जार को लगा कि सुधारों के कारण उसकी निरंकुशता का अंत हो जायेगा। यही कारण है कि पौलेंड के विद्रोह के बाद रूस में पुनः प्रतिक्रिया का रास्ता अपनाया गया। जनता के अधिकारों को सीमित किया जाने लगा और उनकी स्वतंत्रता पर पुनः प्रतिबंध लगा दिया गया। राजनीतिक कार्यक्रम बंद कर दिये गये और स्वायत्त शासन के अधिकार छीन लिये गये। इस प्रकार रूस पुनः प्रतिक्रिया का घोर अखाड़ा बन गया।

निहिलिज्म

ऐसे निराशापूर्ण वातावरण में रूस में एक नये वाद का जन्म हुआ, जिसको शून्यवाद या निहिलिज्म कहते हैं। निहिलिज्म का जन्मदाता तुर्गनेव नामक एक लेखक था, जिसने अपने प्रसिद्ध उपन्यास कादर्स एंड संस में इसके सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। उसका मत था कि वर्तमान काल की सभी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, पारंपरिक और आर्थिक संस्थाओं को समूल नष्ट कर देना चाहिए और उसकी जगह पर सर्वथा नवीन समाज की रचना होनी चाहिए। पुरानी प्रणाली की प्रत्येक वस्तु का नाश कर देना शून्यवाद का प्रमुख सिद्धांत था।

शून्यवादी यथार्थ पर जोर देते थे और कहा करते थे कि समाज में शेक्सपीयर से अधिक महत्त्व एक मोची का है क्योकि लोगों को कविता की अपेक्षा जूतों की अधिक आवश्यकता है। वे संसार में किसी प्रकार का अभाव नहीं देखना चाहते थे और अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए किसी भी साधन या सिद्धांत का उपयोग करने के लिए तैयार रहते थे।

इस प्रकार शून्यवाद एक नवीन क्रांतिकारी विचारधारा थी। यह खुले तौर पर जार के स्वेच्छाचार, चर्च की पवित्रता, राज्य की सत्ता और कुलीनों के विशेषाधिकार को चुनौती देती थी और कहीं भी अन्याय, अत्याचार तथा कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाती थी। रूस में नवयुग लाने का उनका अपना अलग कार्यक्रम था, जिसकी सिद्धि के लिए वे कुछ भी कर सकते थे।

अलेक्जेंडर के शासनकाल में निहिलिस्ट आंदोलन बड़े जोर-शोर से चला और रूसी लोग इस विचारधारा की ओर आकर्षित होने लगे। निहिलिस्ट लोग देहातों में घूमते थे और किसानों में अपने विचारों का प्रचार करते थे। निहिलिस्ट आंदोलन का स्वरूप अभी तक शांतिमय था। लेकिन इसके बढ़ते प्रभाव को देखकर जार घबड़ा उठा और निहिलिस्ट नेता बंद किये जाने लगे। शीघ्र ही रूस की जेलें भर गईं और हजारों लोग साइबेरिया भेज दिये गये। फलतः निराश निहिलिस्ट लोगों ने हिंसक उपायों का प्रयोग शुरू किया और नारा लगाने लगे कि अब ‘हम युद्ध और हिंसा करेंगे।’ निहिलिस्टों ने सरकारी अधिकारियों की हत्या की करना आरंभ कर दिया और स्वयं जार की भी हत्या का प्रयत्न किया। अब सारे रूस में खून-खराबा और आतंकवाद का बोलबाला हो गया।

सरकार ने बड़ी क्रूरता से इस आंदोलन को दबाने का प्रयास किया। जिन लोगों पर निहिलिस्ट होने का शक होता, उनको कठोर दंड दिया जाने लगा। राजनीतिक मुकदमे के लिए विशेष अदालतें बनाई गईं। पुलिस को विस्तृत विशेषाधिकार दिये गये और सारे देश में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया गया। विश्वविद्यालयों पर पुराने कठोर नियंत्रण लगा दिये गये। समाचार-पत्रों की रवतंत्रता खत्म कर दी गई। स्वायत्त संस्थाओं को भंग कर दिया गया। अब घूस, भ्रष्टाचार और अनाचार का बाजार फिर से गर्म हो गया। रूस का शासन पूर्णतया प्रतिक्रियावादी हो गया।

एक ओर सरकार क्रांतिकारियों पर भीषण अत्याचार कर रही थी, तो दूसरी ओर क्रांतिकारी भी प्रत्युत्तर में हिंसा का जवाब हिंसा से दे रहे थे। कुछ ही दिनों में जार के छह उच्च पदाधिकारी और सरकारी गुप्तचर क्रांतिकारियों ने मार दिये। जार को मारने के लिए उस विशेष रेलगाड़ी को उड़ाने कोशिश की गई, जिस पर सवार होकर जार कहीं जा रहा था। सेंट पीट्सवर्ग स्थित जार के महल को एक क्रांतिकारी ने बारूद से उड़ा दिया।

इन घटनाओं से विवश होकर जार ने 1881 में नये सुधारों की योजना बनाने के लिए एक आज्ञा-पत्र निकाला। लेकिन उसी दिन (13 मार्च, 1881) किसी निहिलिस्ट ने उसकी हत्या कर दी।

अलेक्जेंडर की मृत्यु के साथ ही रूस में सुधारों की प्रगति रूक गई। अब तृतीय अलेक्जेंडर रूस का सम्राट बना। उसने कठोर नीति का अवलंबन करके जनता पर घोर अत्याचार किया और रूसी क्रांतियों को दबा दिया। रूस में दमन और प्रतिक्रिया का घोर अंधकार छा गया।

देखें- वियेना कांग्रेस

देखें- नेपोलियन बोनापार्ट

देखें- प्रथम विश्वयुद्ध: कारण और परिणाम