क्रीमिया युद्ध (Crimean War,1853–1856 AD)

क्रीमिया युद्ध (Crimean War,1853–1856 AD)

क्रीमिया युद्ध (जुलाई 1853-मार्च 1856 ई.) काला सागर के आसपास लड़ा गया, जिसमें तुर्की के साथ फ्रांस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया एक पक्ष में थे और दूसरी ओर महत्त्वाकांक्षी रूस था। क्रीमिया युद्ध को ‘मूर्खतापूर्ण और अनिर्णायक युद्ध’ माना जाता है, क्योंकि इसकी शुरुआत रूस ने तुर्की के विरुद्ध जेरूसलम स्थित बेथलेहम के चर्च की चाबियों को लेकर की थी और अपने-अपने स्वार्थों और महत्त्वाकांक्षाओं के कारण इंग्लैंड, फ्रांस और सार्डिनिया (इटली) इसमें शामिल हो गए।

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क्रीमिया युद्ध की पृष्ठभूमि और पूर्वी समस्या

दक्षिण-पूर्वी यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप की भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अपनी विशिष्ट पहचान है। पंद्रहवीं सदी के प्रारंभ से लेकर सोलहवीं सदी के अंत तक पूर्वी यूरोपीय राज्यों पर ऑटोमन तुर्कों के निरंतर आक्रमणों और साम्राज्य विस्तार के परिणामस्वरूप यूरोपीय राज्यों की राजनीतिक सुरक्षा, प्रभुता, प्रादेशिक अखंडता और सामुद्रिक व व्यापारिक हितों को गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ। तुर्की साम्राज्य के असहिष्णु शासन और जातीय शत्रुता के कारण बाल्कन प्रायद्वीप के ईसाइयों और यहूदियों का शोषण होता रहा।

अठारहवीं सदी के मध्य में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रसार के कारण बाल्कन प्रायद्वीप के ईसाइयों ने रूस के संरक्षण में तुर्की प्रभुसत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन शुरू किए, जिससे बाल्कन प्रायद्वीप के अधिकांश ईसाई राज्य तुर्की से स्वतंत्र होने लगे और तुर्की साम्राज्य का विघटन प्रारंभ हुआ।

क्रीमिया युद्ध (Crimean War,1853–1856 AD)
क्रीमिया युद्ध (1853-56 ई.)

तुर्की साम्राज्य से सबसे पहले स्वतंत्र होने वाला राज्य सर्बिया था, जिसने रूस के सहयोग से 1829 ई. में स्वतंत्रता प्राप्त की। सर्बिया का अनुकरण करते हुए यूनान, रोमानिया, बुल्गारिया और स्लोवाकिया आदि ने स्वतंत्रता के लिए विद्रोह किया। 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति ने समस्त यूरोपीय राष्ट्रों में राष्ट्रीय भावना को प्रेरित किया, जिसके कारण इन राज्यों में स्वतंत्रता के लिए होने वाले संघर्षों में समस्त यूरोप दो गुटों में विभाजित हो गया।

रूस के नेतृत्व में एक गुट इन राज्यों की स्वतंत्रता का समर्थक था और तुर्की पर अधिकार करना चाहता था, जबकि इंग्लैंड, फ्रांस और ऑस्ट्रिया का दूसरा गुट अपने स्वार्थों के कारण तुर्की साम्राज्य को विघटन से बचाना चाहता था। इस प्रकार बाल्कन प्रायद्वीप में अपने-अपने राष्ट्रीय हितों और स्वार्थों की पूर्ति के लिए यूरोपीय राष्ट्रों के बीच होने वाली पारस्परिक प्रतिस्पर्धा को ही ‘पूर्वी प्रश्न’ कहा जाता है।

मेहमत अली का विद्रोह

एड्रियानोपल की संधि के बाद पूर्वीय समस्या के इतिहास में मेहमत अली का विद्रोह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। मेहमत अली मिस्र का गवर्नर था, जो औपचारिक रूप से तुर्की साम्राज्य का एक प्रांत था। यद्यपि मिस्र तुर्की के अधीन था, फिर भी मेहमत अली वस्तुतः एक स्वतंत्र शासक की भाँति शासन करता था।

यूनान के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उसने तुर्की के सुल्तान की बड़ी सहायता की थी, किंतु इसके बदले में उसे कोई विशेष पुरस्कार नहीं मिला। उसने सीरिया पर अधिकार करने के लिए 1831 ई. में व्यापक सैनिक अभियान प्रारंभ किया और उसकी सेना कुस्तुन्तुनिया की ओर बढ़ने लगी।

तुर्की के सुल्तान ने यूरोपीय शक्तियों से सहायता की अपील की। रूस ने तुरंत सहायता देने की सहमति दी और उसकी सेना तुर्की की रक्षा के लिए आगे बढ़ी। इससे इंग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों में चिंता फैल गई क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि तुर्की पर रूस का प्रभाव बढ़े। यूरोपीय शक्तियों ने सुल्तान पर दबाव डाला कि वह मेहमत अली के साथ समझौता कर ले, ताकि रूसी सहायता की आवश्यकता ना पड़े। अंततः तुर्की ने समझौता कर लिया और मेहमत अली को सीरिया मिल गया।

इस अवसर का लाभ उठाकर रूस ने 1833 ई. में तुर्की को ‘उन्कियार-स्केलेसी की संधि’ (Treaty of Unkiar Skelessi) पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया, जिसके परिणामस्वरूप तुर्की पर रूस का प्रभाव बढ़ गया। रूस को न केवल राजनीतिक लाभ हुआ, बल्कि डार्डानेल्स क्षेत्र में उसकी स्थिति और सुदृढ़ हो गई।

रूस के बढ़ते प्रभाव से इंग्लैंड चिंतित हो उठा। लॉर्ड पामर्स्टन ने इस संधि को समाप्त करने के लिए 1840 ई. में लंदन में यूरोपीय शक्तियों का एक सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में एक नई संधि हुई, जिसके परिणामस्वरूप तुर्की साम्राज्य पर रूस का प्रभाव काफी हद तक सीमित हो गया। यूरोपीय शक्तियों ने यह भी स्वीकार किया कि तुर्की साम्राज्य का अस्तित्व बनाए रखना आवश्यक है। इसके बाद लगभग एक दशक तक पूर्वीय समस्या अपेक्षाकृत शांत रही। किंतु इसी बीच फ्रांस में लुई नेपोलियन का उदय हुआ और उसने जेरूसलम के ईसाई पादरियों का पक्ष लेकर इस समस्या को पुनः उभारना प्रारंभ किया।

ब्रिटेन की सामरिक एवं व्यापारिक नीति

रूस की विस्तारवादी नीति का सबसे प्रबल विरोधी ब्रिटेन था। भूमध्यसागर तथा निकट-पूर्व में रूस का बढ़ता प्रभाव ब्रिटिश साम्राज्य के लिए गंभीर खतरा माना जाता था। ब्रिटेन के उपनिवेश विश्व के विभिन्न भागों में फैले हुए  थे और भारत उसका सबसे महत्त्वपूर्ण उपनिवेश था। ब्रिटिश नीति-निर्माताओं को आशंका थी कि यदि तुर्की साम्राज्य पर रूस का प्रभुत्व स्थापित हो गया, तो भारत तक जाने वाले सामरिक और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा संकट में पड़ सकती है। इसलिए ब्रिटेन की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य तुर्की साम्राज्य की अखंडता बनाए रखना तथा रूस को भूमध्यसागर की ओर बढ़ने से रोकना था।

ब्रिटेन यूरोप का पहला देश था जहाँ औद्योगिक क्रांति का आरंभ हुआ। उसके उद्योगों को निरंतर कच्चे माल तथा निर्मित वस्तुओं के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी। यद्यपि ब्रिटेन की अनेक आवश्यकताएँ उसके विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य से पूरी हो जाती थीं, फिर भी वह विश्व के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता था। इस दृष्टि से भूमध्यसागर, डार्डानेल्स तथा बोस्पोरस जलडमरूमध्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। यदि रूस इन मार्गों पर नियंत्रण स्थापित कर लेता, तो ब्रिटिश व्यापार और सामरिक हितों को क्षति पहुँच सकती थी।

क्रीमिया युद्ध (Crimean War,1853–1856 AD)
क्रीमिया युद्ध

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विलियम पिट (कनिष्ठ) ने पूर्वी प्रश्न के महत्त्व को समझते हुए निकट-पूर्व की राजनीति पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने रूस के बढ़ते प्रभाव का विरोध किया और यूरोपीय शक्ति-संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया। उन्नीसवीं शताब्दी में भी ब्रिटेन ने इसी नीति का अनुसरण किया।

उधर काकेशस, मध्य एशिया और निकट-पूर्व में रूस का प्रभाव निरंतर बढ़ रह था और वह तुर्की साम्राज्य पर भी अपनी गिद्धदृष्टि लगाए हुए था। विशेष रूप से डार्डानेल्स और बोस्पोरस जलडमरूमध्यों पर नियंत्रण प्राप्त करने के उसके प्रयास ब्रिटेन के लिए अत्यंत चिंताजनक थे।

जब तक लॉर्ड पामर्स्टन के हाथों में ब्रिटेन की विदेश नीति का संचालन रहा, तब तक उसने रूस की विस्तारवादी नीति का दृढ़तापूर्वक विरोध किया। 1840 ई. में पामर्स्टन के मंत्रिमंडल से हटने के बाद रूस ने तुर्की साम्राज्य के विभाजन में ब्रिटेन को भागीदार बनाकर उसका समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी क्रम में 1844 ई. में रूस के जार निकोलस प्रथम ने ब्रिटेन की यात्रा की और ब्रिटेन के समक्ष तुर्की साम्राज्य के विभाजन का प्रस्ताव रखा, किंतु ब्रिटेन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और वह रूस की योजना में फँसने को तैयार नहीं हुआ। वास्तव में, ब्रिटेन एशिया में रूस को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता था और वह किसी भी परिस्थिति में उसके विस्तार को प्रोत्साहित नहीं करना चाहता था।

रूस की स्थल सेना उस समय यूरोप की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक थी। ब्रिटेन को यह भी भय था कि यदि तुर्की पर रूस का प्रभुत्व हो जाता है, तो वह एक सामुद्रिक शक्ति भी बन सकता था, जो ब्रिटेन की सामुद्रिक सर्वोच्चता और उसके वैश्विक साम्राज्य के लिए गंभीर खतरा सिद्ध होती। इसलिए ब्रिटेन किसी भी परिस्थिति में रूस की योजना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।

यद्यपि ब्रिटेन फ्रांस और रूस दोनों को खतरा मानता था, क्योंकि दोनों तुर्की साम्राज्य पर अधिकार करना चाहते थे, किंतु रूस द्वारा तुर्की के विभाजन की संभावना से ब्रिटेन सतर्क हो गया। ब्रिटेन ने फ्रांस से मित्रता कर ली और निश्चय किया कि वह रूस को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने के लिए तुर्की साम्राज्य की रक्षा करेगा और रूस को निकट-पूर्व और भूमध्यसागर की दिशा में आगे बढ़ने से रोकेगा। यही नीति आगे चलकर क्रीमिया युद्ध में ब्रिटेन की सक्रिय भागीदारी का प्रमुख कारण बनी।

रूस की विस्तारवादी नीति

उन्नीसवीं शताब्दी में ओटोमन (तुर्की) साम्राज्य निरंतर पतन की ओर अग्रसर था और यूरोप की विभिन्न शक्तियाँ उसके क्षेत्रों के बँटवारे की योजनाएँ बनाने लगी थीं। इन शक्तियों में रूस सबसे अधिक सक्रिय और उत्सुक था। रूस के शासक पीटर महान (1672–1725 ई.) ने अपने सुधारों द्वारा रूस को एक शक्तिशाली राष्ट्र बना दिया था। उसके उत्तराधिकारियों की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य गर्म जल के बंदरगाहों तथा भूमध्यसागर तक पहुँचना था।

रूस की सबसे बड़ी भौगोलिक समस्या यह थी कि उसके अधिकांश उत्तरी बंदरगाह शीत ऋतु में कई महीनों तक बर्फ से जमे रहते थे। इसलिए उसे ऐसे समुद्री मार्ग की आवश्यकता थी, जो पूरे वर्ष खुला रहे। काला सागर से होकर बोस्पोरस और डार्डानेल्स जलडमरूमध्यों के माध्यम से भूमध्यसागर तक पहुँचने वाला मार्ग रूस के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण था। रूस का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार और नौसैनिक गतिविधियाँ इसी मार्ग पर निर्भर थीं। चूँकि इन जलडमरूमध्यों पर तुर्की का नियंत्रण था, इसलिए रूस उन्हें अपने नियंत्रण में लाना चाहता था।

अठारहवीं शताब्दी से ही रूस तुर्की साम्राज्य को कमजोर करने की नीति पर चल रहा था। 1774 ई. की कुचुक कैनारजी की संधि, 1792 ई. की जासी (Jassy) संधि तथा 1812 ई. की बुखारेस्ट संधि के माध्यम से उसने तुर्की क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ा लिया था

बाल्कन क्षेत्र में मुख्यतः स्लाव जाति निवास करती थी। समान जाति, भाषा, और धर्म के कारण रूस का जार स्वयं को उनका प्राकृतिक संरक्षक मानता था। 1815 ई. के बाद रूस ने बाल्कन के ईसाई समुदायों और राष्ट्रीय आंदोलनों को समर्थन देना प्रारंभ किया। उसका उद्देश्य केवल इन जातियों की सहायता करना नहीं था, बल्कि तुर्की साम्राज्य को क्रमशः कमजोर करके बाल्कन में अपना प्रभाव बढ़ाना भी था।

रूस सर्बिया और यूनान के स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन करता था। इससे उसे दोहरा लाभ मिलने की आशा थी। एक ओर तुर्की साम्राज्य की शक्ति क्षीण होती, वहीं दूसरी ओर रूस की सहायता से स्वतंत्र हुए राज्यों पर उसका प्रभाव स्थापित हो जाता। रूस अपने को बाल्कन के स्लावों तथा ग्रीक चर्च के अनुयायियों का संरक्षक समझता था और उनके संरक्षण के बहाने तुर्की साम्राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता रहा।

जार निकोलस तुर्की साम्राज्य को यूरोप का ‘बीमार आदमी’ मानता था। उसका विश्वास था कि तुर्की साम्राज्य शीघ्र ही विघटित हो जाएगा। इसलिए उसने उसके संभावित विभाजन की योजना बनाई और उसमें इंग्लैंड को शामिल करने के लिए 1844 में स्वयं इंग्लैंड गया। किंतु ब्रिटेन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि रूस का बढ़ता प्रभाव उसके सामरिक और व्यापारिक हितों के लिए खतरा था।

ब्रिटेन की असहमति के बावजूद रूस ने अपनी विस्तारवादी नीति का परित्याग नहीं किया। जब जार ने तलवार के बल पर तुर्की को हड़पने के लिए आक्रमण कर दिया, तो क्रीमिया युद्ध शुरू हो गया। यही कारण है कि महारानी विक्टोरिया ने क्रीमिया युद्ध का एक प्रमुख कारण जार निकोलस और उसके सेवकों की स्वार्थपरता और महत्त्वाकांक्षा को बताया था।

फ्रांस की महत्त्वाकांक्षा

1848 ई. की क्रांति के बाद लुई नेपोलियन फ्रांस के द्वितीय गणराज्य का राष्ट्रपति निर्वाचित हुआ। किंतु वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था और केवल राष्ट्रपति पद से संतुष्ट नहीं था। वह नेपोलियन बोनापार्ट की भाँति फ्रांस का सम्राट बनना चाहता था। 1852 ई. में उसने अवसर का लाभ उठाकर गणतांत्रिक संविधान का अंत कर दिया और स्वयं को फ्रांस का सम्राट घोषित किया।

लुई नेपोलियन भली-भाँति जानता था कि इस परिवर्तन से फ्रांस की जनता पूर्णतः संतुष्ट नहीं है। इसलिए जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाने और राष्ट्रीय गौरव की भावना को उभारने के लिए उसने आक्रामक विदेश नीति अपनाने का निश्चय किया। उसके अनुसार फ्रांस की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का सर्वोत्तम उपाय साम्राज्यवादी विस्तार और विदेशी मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप था।

क्रीमिया युद्ध के सूत्रपात में लुई नेपोलियन की विदेश नीति की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। निकट-पूर्व की परिस्थितियाँ नेपोलियन के लिए अत्यंत अनुकूल थीं। वह पूर्वी प्रश्न में भाग लेकर अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करना चाहता था ताकि वह अपने चाचा नेपोलियन बोनापार्ट का सच्चा वारिस सिद्ध हो सके। फ्रांस को तुर्की साम्राज्य में व्यापार की विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं। नेपोलियन तृतीय तुर्की के माध्यम से मिस्र और सीरिया के साथ भी व्यापारिक संबंध स्थापित करना चाहता था।

इसके अतिरिक्त, फ्रांस लंबे समय से तुर्की साम्राज्य में निवास करने वाले रोमन कैथोलिकों का संरक्षक था। रूस का तुर्की साम्राज्य पर अधिकार होने का अर्थ था फ्रांस की व्यापारिक सुविधाओं और रोमन कैथोलिकों पर उसके संरक्षण का अंत, जिसके लिए फ्रांस तैयार नहीं था। साथ ही, रूस के सम्राट जार निकोलस प्रथम और फ्रांस के नेपोलियन तृतीय के बीच पारस्परिक द्वेष, प्रतिस्पर्धा और महत्त्वाकांक्षा ने पूर्वी प्रश्न को और जटिल बना दिया।

जार निकोलस नेपोलियन तृतीय को फ्रांस का वैध शासक नहीं मानता था और उसे ‘मेरे प्रिय मित्र’ कहकर संबोधित करता था, जिसके फलस्वरूप फ्रांस ने निश्चय किया कि वह तुर्की साम्राज्य पर रूस का प्रभुत्व नहीं होने देगा।

ऑस्ट्रिया की आशंका

ऑस्ट्रिया भी तुर्की साम्राज्य के संभावित विघटन और उसके क्षेत्रों में अपने प्रभाव के विस्तार का इच्छुक था, इसलिए वह भी बाल्कन की ओर रूस के विस्तार से भयभीत था। बाल्कन प्रदेश की तरह ऑस्ट्रिया के साम्राज्य में भी स्लाव जाति निवास करती थी। बाल्कन के स्लाव स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित होकर ऑस्ट्रिया के स्लाव भी स्वतंत्रता संग्राम शुरू कर सकते थे। यद्यपि 1849 ई. में ऑस्ट्रिया के सम्राट को रूसी सैनिकों के कारण ही अपना पैतृक सिंहासन प्राप्त हुआ था, किंतु स्लाव स्वतंत्रता आंदोलन की संभावना को रोकने के लिए ऑस्ट्रिया का झुकाव फ्रांस और इंग्लैंड की ओर हो गया था।

क्रीमिया युद्ध का तात्कालिक कारण
पवित्र स्थलों का विवाद

जेरूसलम ईसाइयों का एक प्रमुख पवित्र नगर था, जो उस समय ओटोमन (तुर्की) साम्राज्य के अधीन था। वहाँ रोमन कैथोलिक तथा ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च के के संन्यासी निवास करते थे। इन दोनों समुदायों के बीच पवित्र स्थलों के नियंत्रण और धार्मिक विशेषाधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। 1740 ई. में फ्रांस और ओटोमन साम्राज्य के बीच हुई संधि के अनुसार रोमन कैथोलिकों के संरक्षण का अधिकार फ्रांस को प्राप्त था, जबकि रूस स्वयं को ओटोमन साम्राज्य के ग्रीक ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों का संरक्षक मानता था।

क्रीमिया युद्ध का तात्कालिक कारण बेथलेहम के पवित्र चर्च की चाबियों का विवाद था। बेथलेहम का चर्च ईसा मसीह के जन्मस्थान पर बना था। इस चर्च का उपयोग रोमन कैथोलिक और ग्रीक ऑर्थोडॉक्स दोनों समुदाय करते थे। फ्रांसीसी प्रभाव के कारण चर्च के मुख्य द्वार की चाबी रोमन कैथोलिकों के पास थी, जबकि ग्रीक ऑर्थोडॉक्स पादरियों को चर्च के बगल के एक छोटे द्वार की चाबी मिली थी, जिससे वे चर्च में प्रवेश कर सकते थे।

फ्रांसीसी क्रांति (1789 ई.) के बाद यूरोप में फ्रांस का प्रभाव कुछ समय के लिए कम हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर ग्रीक ऑर्थोडॉक्स पादरियों ने चर्च में अपने अधिकारों का विस्तार करने का प्रयास किया और मुख्य द्वार की चाबी पर दावा प्रस्तुत किया। दूसरी ओर, रोमन कैथोलिक पादरियों ने  अपने पुराने विशेषाधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए फ्रांसीसी सरकार से सहायता की माँग की। इस प्रकार रोमन कैथोलिकों और ग्रीक ऑर्थोडॉक्स समुदायों के बीच चर्च के नियंत्रण, धार्मिक अधिकारों और विशेषाधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया।

जब लुई नेपोलियन 1852 ई. में फ्रांसीसी गणतंत्र का अंत कर फ्रांस का सम्राट बना, तो उसने विचार किया कि यदि वह जेरूसलम के रोमन कैथोलिक पादरियों का पक्ष लेता है, तो फ्रांस के कैथोलिकों का समर्थन उसे सदैव मिलता रहेगा, साथ ही फ्रांस की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी पुनः स्थापित हो जाएगी। लुई नेपोलियन का यह भी विचार था कि यदि जेरूसलम के प्रश्न पर फ्रांस और रूस के बीच संघर्ष होता है, तो इस संघर्ष में वह रूस को पराजित करके 1815 ई. में नेपोलियन बोनापार्ट की पराजय का प्रतिशोध भी ले सकता है। इससे न केवल फ्रांस की जनता संतुष्ट हो जाएगी, बल्कि पूरे यूरोप में फ्रांस का गौरव भी पुनः स्थापित हो जाएगा।

इन्हीं उद्देश्यों से प्रेरित होकर लुई नेपोलियन ने जेरूसलम के प्रश्न पर सक्रिय नीति अपनाई और तुर्की के सुल्तान से रोमन कैथोलिक पादरियों के पुराने अधिकार पुनः बहाल करने और चर्च के मुख्य द्वार की चाबी की माँग की। दूसरी ओर, यूनानी पादरियों का समर्थक होने के कारण रूस के जार निकोलस ने फ्रांस की माँग का विरोध किया और तुर्की से माँग की कि यूनानी पादरियों के अधिकारों में किसी प्रकार की कटौती न की जाए।

1852 ई. में जब नेपोलियन ने रोमन कैथोलिकों के संरक्षण की पुनः माँग की, तो कुछ अनिच्छा के बाद तुर्की के सुल्तान ने फ्रांस की माँग स्वीकार कर ली। यह धार्मिक विवाद शीघ्र ही फ्रांस और रूस के बीच प्रतिष्ठा का विषय बन गया और दोनों ने अपने-अपने धार्मिक समुदायों के समर्थन के बहाने ओटोमन साम्राज्य पर दबाव डालना प्रारंभ कर दिया, जो आगे चलकर क्रीमिया युद्ध का प्रत्यक्ष कारण बन गया।

रूस की चेतावनी

यद्यपि तुर्की की स्वीकृति से रूस को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी, किंतु जार निकोलस को लगा कि तुर्की को हड़पने का यह उचित अवसर है। तुर्की के सुल्तान द्वारा यूनानी ईसाइयों पर अपना संरक्षण अस्वीकार किए जाने पर रूस ने मार्च 1853 ई. में तुर्की के सुल्तान को एक चेतावनी देकर यह माँग की कि उसे तुर्की साम्राज्य में रहने वाले समस्त ईसाइयों का संरक्षक स्वीकार किया जाए। यदि तुर्की इस माँग को स्वीकार कर लेता, तो रूस को तुर्की के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार मिल जाता। इस समय तुर्की के सुल्तान पर अंग्रेजी राजदूत स्ट्रैटफोर्ड का इतना अधिक प्रभाव था कि उसने निकोलस की माँग को अनसुना कर दिया। रूस की माँग का इंग्लैंड, स्पेन, ऑस्ट्रिया और अन्य रोमन कैथोलिक देशों ने भी विरोध किया।

युद्ध का प्रारंभ (23 अक्टूबर 1853 ई.)

निकोलस की माँग अस्वीकार किए जाने के बाद जुलाई 1853 ई. में रूस की सेना ने तुर्की साम्राज्य में प्रवेश कर मोल्डाविया तथा वलाचिया के प्रांतों पर अधिकार कर लिया। इससे स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई। ब्रिटेन और फ्रांस स्थिति पर नजर रखे हुए थे। ब्रिटेन नहीं चाहता था कि रूस तुर्की साम्राज्य को समाप्त करके भूमध्यसागर की ओर आगे बढ़े। दूसरी ओर, लुई नेपोलियन रूस के विरुद्ध युद्ध करके अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहता था। ब्रिटेन और फ्रांस ने तुर्की के सुल्तान को रूस का विरोध करने के लिए प्रोत्साहित किया और उसे सैन्य-सहायता का आश्वासन दिया। दोनों देशों के नौसैनिक बेड़े तुर्की की सहायता के लिए काला सागर में पहुँच गए।

4 अक्टूबर 1853 ई. को तुर्की के सुल्तान ने रूस से अपने प्रदेश मोल्डाविया और वलाचिया को खाली करने की माँग की। किंतु रूस द्वारा इस माँग को अस्वीकार किए जाने पर तुर्की ने 23 अक्टूबर 1853 ई. को रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

क्रीमिया युद्ध की घटनाएँ

क्रीमिया युद्ध की घटनाओं को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम चरण 23 अक्टूबर 1853 ई. से 28 मार्च 1854 ई. तक माना जा सकता है, जब युद्ध में केवल रूस और तुर्की थे। द्वितीय चरण 1854 ई. से 1856 ई. तक माना जा सकता है, जब युद्ध में इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया और सार्डिनिया भी शामिल हो गए।

प्रथम चरण (23 अक्टूबर 1853-28 मार्च 1854 ई.)

23 अक्टूबर 1853 ई. से 28 मार्च 1854 ई. तक केवल तुर्की और रूस के बीच युद्ध हुआ। युद्ध की घोषणा के बाद तुर्की ने डेन्यूब नदी के तट पर रूसी सेनाओं पर आक्रमण किया। 30 नवंबर 1853 ई. को तुर्की का एक जहाजी बेड़ा बटुम की ओर जा रहा था, तभी रूस के एक जहाजी बेड़े ने ‘सिनोप’ नामक स्थान पर तुर्की के सभी सैनिकों का संहार कर दिया। इस समय इंग्लैंड और फ्रांस का संयुक्त बेड़ा कॉन्स्टेंटिनोपल में था। दोनों देशों में सिनोप में तुर्की सैनिकों की सामूहिक हत्या से भारी रोष फैल गया।

सिनोप की घटना से ऑस्ट्रिया युद्ध की घोषणा के लिए विवश हो गया। तुर्की की सहायता के लिए जनवरी 1854 ई. के प्रारंभ में इंग्लैंड और फ्रांस का संयुक्त नौसैनिक बेड़ा काला सागर में पहुँच गया और कॉन्स्टेंटिनोपल की रक्षा के लिए ‘गैलीपोली’ में किलेबंदी करने का निर्णय लिया। 27 फरवरी 1854 ई. को फ्रांस और इंग्लैंड ने रूस को चेतावनी दी कि वह तुर्की के प्रदेश खाली कर दे। रूस की ओर से संतोषजनक उत्तर न मिलने पर 28 मार्च 1854 ई. को फ्रांस और इंग्लैंड ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। किंतु इससे पहले कि फ्रांस और इंग्लैंड की सेनाएँ काला सागर के पश्चिमी तट पर एकत्र होतीं, रूस ने तुर्की के अधीन मोल्डाविया और वलाचिया से अपनी सेना वापस बुला ली और इस प्रकार प्रथम चरण का युद्ध समाप्त हो गया।

द्वितीय चरण (1854-1856 ई.)

रूस द्वारा मोल्डाविया और वलाचिया खाली कर दिए जाने से युद्ध का कारण समाप्त हो गया था, किंतु मित्र राष्ट्रों को बिना युद्ध किए अपनी सेनाएँ वापस ले जाना स्वीकार्य नहीं था। मित्र राष्ट्र रूस के सैनिक अड्डे सेबास्तोपाल पर अधिकार करना चाहते थे। ब्रिटिश सेना लॉर्ड रैगलन और फ्रांसीसी सेना मार्शल सेंट अरनॉ के नेतृत्व में 14 सितंबर 1854 ई. को क्रीमिया पहुँच गई, किंतु दोनों देशों के सेनापतियों को क्रीमिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

17 सितंबर को मित्र राष्ट्रों ने सेबास्तोपाल की ओर बढ़ना शुरू किया। 20 सितंबर को रूसी सेना ने ‘आल्मा के युद्ध’ में मित्र राष्ट्रों का सामना किया, जिसमें रूसी सेना पीछे हट गई। रूसी सेनापति टॉडलेबेन ने सेबास्तोपाल के दुर्ग में प्रवेश कर उसकी रक्षा का प्रयास किया।

मित्र राष्ट्रों की सेना ने 11 महीने तक दुर्ग का घेरा डाले रखा। सेबास्तोपाल के घेरे में अंग्रेजी सेना को भारी कष्ट उठाना पड़ा। रूसी सर्दी के कारण हजारों ब्रिटिश सैनिक ठंड से मारे गए। यातायात, खाद्यान्न की कमी और अस्त्र-शस्त्र की अव्यवस्था के कारण इंग्लैंड के तत्कालीन एबरडीन मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना पड़ा और पामर्स्टन प्रधानमंत्री बने।

युद्ध की समाप्ति और पेरिस की संधि (30 मार्च 1856 ई.)

क्रीमिया युद्ध लगभग दो वर्षों तक चला। मार्च 1855 ई. में जार निकोलस प्रथम की मृत्यु बाद उसके उत्तराधिकारी के रूप में अलेक्जेंडर द्वितीय (1855-1894 ई.) रूस के सम्राट बने। नए जार ने युद्ध जारी रखना व्यर्थ समझा। नेपोलियन तृतीय भी युद्ध जारी रखने के पक्ष में नहीं था और रूस से अकेले लड़ना ब्रिटेन के वश की बात नहीं थी। अंततः ऑस्ट्रिया की मध्यस्थता से शांति वार्ताएँ प्रारंभ हुईं। 30 मार्च 1856 ई. को इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, तुर्की, सर्बिया, सार्डिनिया और रूस के प्रतिनिधियों ने ‘पेरिस की संधि’ पर हस्ताक्षर किए। इस संधि की प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थीं—

  1. यूरोपीय शक्तियों ने सामूहिक रूप से तुर्की साम्राज्य की प्रादेशिक अखंडता एवं स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान की।
  2. तुर्की के सुल्तान ने अपनी ईसाई प्रजा की स्थिति में सुधार करने तथा अधिक उदार शासन-व्यवस्था अपनाने का आश्वासन दिया।
  3. रूस ने ओटोमन साम्राज्य के ईसाइयों का संरक्षक होने का अपना दावा त्याग दिया।
  4. मोल्डाविया और वलाचिया को व्यापक स्वायत्तता प्रदान की गई, यद्यपि वे औपचारिक रूप से तुर्की की अधीनता में बने रहे।
  5. सर्बिया को भी पर्याप्त स्वायत्त अधिकार प्रदान किए गए।
  6. डैन्यूब नदी को सभी देशों के व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दिया गया तथा उसके मुक्त नौवहन की व्यवस्था की गई।
  7. रूस को दक्षिणी बेस्सारेबिया का एक भाग मोल्डाविया को सौंपना पड़ा।
  8. कार्स तुर्की को वापस कर दिया गया, जबकि क्रीमिया रूस के अधिकार में बना रहा।
  9. रूस को सेबास्तोपाल के दुर्ग का पुनर्निर्माण और सैन्यीकरण करने से रोक दिया गया।
  10. काला सागर को तटस्थ क्षेत्र घोषित कर दिया गया और किसी भी देश को वहाँ युद्धपोत रखने और नए शस्त्रागार बनाने पर रोक लगा दी गई।

पेरिस की संधि तत्काल यूरोप में शांति स्थापित करने में तो सफल रही, किंतु लगभग पंद्रह वर्षों के भीतर इसकी अनेक व्यवस्थाएँ अप्रभावी हो गईं और रूस ने पुनः काला सागर क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास किया।

क्रीमिया युद्ध का महत्त्व और परिणाम

वियना कांग्रेस के बाद क्रीमिया युद्ध यूरोपीय इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसके महत्त्व के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद रहा है। कुछ इतिहासकार इसे निरर्थक युद्ध मानते हैं, जबकि अन्य के अनुसार इस युद्ध ने रूस को तुर्की पर पूर्ण अधिकार स्थापित करने से रोक दिया।

क्रीमिया युद्ध का तत्कालीन और सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह था कि रूस की विस्तारवादी नीति पर कुछ समय के लिए लगाम लग गई। इस युद्ध के कारण रूस का कॉन्स्टेंटिनोपल पर अधिकार करने और काला सागर को रूसी झील बनाने का सपना टूट गया। क्रीमिया युद्ध के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर रूस की तुर्की को हड़पने की योजना विफल हो गई, वहीं दूसरी ओर तुर्की साम्राज्य को यूरोपीय शक्तियों की गारंटी मिल गई और उसके अस्तित्व को कुछ समय के लिए सुरक्षित कर दिया गया। लुई नेपोलियन की प्रतिष्ठा बढ़ गई और फ्रांस में उसकी राजनीतिक स्थिति मजबूत हो गई।

दीर्घकालीन दृष्टि से तात्कालिक परिणाम स्थायी सिद्ध नहीं हुए। तुर्की का पतन जारी रहा और बाल्कन प्रदेशों में राष्ट्रीयता की भावना और अधिक प्रबल होती गई। युद्ध के बाद सर्बिया तथा अन्य क्षेत्रों को मिली स्वायत्तता अन्य पराधीन जातियों को भी स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए प्रेरित किया।

रूस भी अपनी पराजय को कभी भूल नहीं सका। उसने अवसर की प्रतीक्षा की और कुछ वर्षों बाद पुनः पूर्वी समस्या में सक्रिय हो गया। इस प्रकार पेरिस की संधि रूस की महत्त्वाकांक्षाओं को स्थायी रूप से रोकने में असफल रही।

फिर भी, क्रीमिया युद्ध के प्रभाव अत्यंत दूरगामी सिद्ध हुए। इस युद्ध ने यूरोप की शक्ति-संतुलन प्रणाली को प्रभावित किया तथा इटली और जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान की। इटली के दूरदर्शी काउंट कावूर ने मित्र राष्ट्रों की ओर से क्रीमिया में सेना भेजकर और पेरिस की संधि में शामिल होकर इटली की समस्या को अंतरराष्ट्रीय बना दिया। इससे इटली के एकीकरण में कावूर को फ्रांस और इंग्लैंड की सहानुभूति प्राप्त हुई। इसीलिए कहा जाता है कि ‘क्रीमिया के कीचड़ से ही इटली का जन्म हुआ था।’

जर्मनी पर प्रभाव

क्रीमिया युद्ध ने जर्मनी के एकीकरण में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। उस समय जर्मनी के एकीकरण का आंदोलन प्रशा के नेतृत्व में चल रहा था, जबकि ऑस्ट्रिया उसका सबसे बड़ा विरोधी था। क्रीमिया युद्ध ने यूरोप की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को बदल दिया और इसका सीधा प्रभाव ऑस्ट्रिया तथा प्रशा के संबंधों पर पड़ा।

क्रीमिया युद्ध के दौरान ऑस्ट्रिया ने रूस के प्रति कृतघ्नता का व्यवहार किया। यद्यपि रूस ने पूर्व में अनेक अवसरों पर ऑस्ट्रिया की सहायता की थी, फिर भी युद्ध के समय ऑस्ट्रिया ने रूस के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति अपनाई, जिससे रूस नाराज़ हो गया और उसकी सहानुभूति प्रशा की मिलने लगी। 1866 ई. में जब जर्मन एकीकरण के प्रश्न पर ऑस्ट्रिया और प्रशा के बीच युद्ध हुआ, तब रूस ने ऑस्ट्रिया का साथ नहीं दिया और तटस्थ बना रहा। परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़े ऑस्ट्रिया को प्रशा ने आसानी से पराजित कर दिया। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध ने अप्रत्यक्ष रूप से प्रशा की स्थिति को सुदृढ़ किया और जर्मन एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। इतिहासकार लॉर्ड फिट्ज़मौरिस का कथन है कि  ‘यदि क्रीमिया युद्ध न हुआ होता, तो संभवतः इटली और जर्मनी का एकीकरण इतनी शीघ्रता से संभव नहीं हो पाता।’

रूस की राजनीति पर प्रभाव

क्रीमिया युद्ध का रूस की आंतरिक राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। रूस एक विशाल साम्राज्य था और उसकी सैन्य शक्ति भी अत्यंत सुदृढ़ थी, फिर भी उसे युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा। इससे रूस की प्रशासनिक दुर्बलता और निरंकुश शासन की कमियाँ उजागर हो गईं। रूस की जनता यह अनुभव करने लगी कि सरकार भ्रष्ट, जड़ तथा अयोग्य हो चुकी है और इसीलिए रूस को युद्ध में पराजित होना पड़ा। अब निरंकुश शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा और सुधारों की माँग तेज हो गई।

इसी परिस्थिति में जार अलेक्जेंडर द्वितीय के शासनकाल में सुधारों का एक व्यापक कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। प्रशासन, न्याय, शिक्षा तथा सेना के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन किए गए। सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार 1861 ई. में दासप्रथा का उन्मूलन था। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध ने रूस में एक नए युग का आरंभ किया और देश के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान की। इतिहासकार हेजेन ने सही लिखा है कि ‘इस राष्ट्रीय अपमान में भविष्य की आशाएँ निहित थीं। जिस प्रकार सेना की पराजय के बाद उसका पुनर्गठन हुआ, उसी प्रकार क्रीमिया युद्ध के बाद रूस का पुनर्निर्माण हुआ।‘

बाल्कन राज्यों पर प्रभाव

क्रीमिया युद्ध ने बाल्कन प्रायद्वीप के पराधीन राज्यों को भी प्रभावित किया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप सर्बिया को व्यापक स्वायत्तता प्राप्त हुई, जबकि इससे पहले यूनान तुर्की के अधीनता से मुक्त हो चुका था। इन घटनाओं ने बाल्कन की अन्य जातियों में भी राष्ट्रीय चेतना को प्रबल किया।

सर्बिया और यूनान की सफलता से प्रेरित होकर बाल्कन क्षेत्र की अन्य जातियाँ भी स्वतंत्रता की माँग करने लगीं। कालांतर में इन आंदोलनों ने उग्र रूप धारण कर लिया और एक-एक करके बाल्कन के अनेक राज्य तुर्की साम्राज्य से स्वतंत्र होते गए। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध (1853–1856) बाल्कन क्षेत्र के राजनीतिक पुनर्गठन एवं राष्ट्रीय आंदोलनों के विकास की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण घटना थी।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव

क्रीमिया युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया। पीटर महान् के काल से ही रूस साम्राज्यवादी विस्तार की नीति का अनुसरण कर रहा था और वह तुर्की साम्राज्य पर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहता था। किंतु क्रीमिया युद्ध से उसे यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय शक्तियाँ उसके विस्तारवाद का कठोर विरोध करेंगी।

अब रूस ने बाल्कन क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को कुछ समय के लिए सीमित कर दिया और अपना ध्यान पूर्वी एशिया की ओर केंद्रित किया। इसके परिणामस्वरूप मंचूरिया, कोरिया, मंगोलिया, चीन और जापान की राजनीति में रूस की सक्रियता बढ़ी। बाद में यही स्थिति ‘सुदूर पूर्वी समस्या’ के रूप में विकसित हुई।

क्रीमिया युद्ध के बाद यूरोप में ‘सशस्त्र शांति’ का युग प्रारंभ हुआ। युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक युद्धों के लिए उन्नत हथियारों और संगठित सेनाओं की आवश्यकता है। फलतः यूरोप के विभिन्न देश अपने सैन्य संगठनों का आधुनिकीकरण आरंभ कर दिए। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध ने यूरोप में सैन्यवाद और शस्त्र-स्पर्धा की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहित किया।

अंतरराष्ट्रीय विधि

क्रीमिया युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय विधि के विकास को भी प्रभावित किया। युद्ध के दौरान समुद्री युद्ध और तटस्थ राज्यों से संबंधित अनेक समस्याएँ सामने आईं। इसलिए 1856 ई. के पेरिस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय कानून से संबंधित कई नए नियम बनाए गए। इस प्रकार पेरिस कांग्रेस ने वियना कांग्रेस के कार्य को आगे बढ़ाया।

रेड क्रॉस की स्थापना

क्रीमिया युद्ध में लगभग पाँच लाख सैनिक मारे गए तथा घायल सैनिकों को अत्यधिक कष्ट सहना पड़ा। युद्धभूमि में घायल सैनिकों की देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं थी। ऐसी परिस्थिति में ब्रिटेन की फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने, जो ‘लेडी विद द लैंप’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, महिला स्वयंसेविकाओं के साथ मित्र राष्ट्रों के घायल सैनिकों की सेवा-सुश्रूषा करके मानवता का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी प्रेरणा से नर्सिंग के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए और 1864 ई. में अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस की स्थापना हुई। इसी कारण फ्लोरेंस नाइटिंगेल को ‘आधुनिक नर्सिंग व्यवस्था की जननी’ माना जाता है।

क्रीमिया युद्ध (Crimean War,1853–1856 AD)
लेडी विद लैम्प’ फ्लोरेंस नाइटिंगेल
अंतर्राष्ट्रीयता पर प्रभाव

वियना कांग्रेस (1815 ई.) ने यूरोप में शांति और शक्ति-संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से ‘यूरोपीय व्यवस्था’ की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य था कि यूरोप की महान शक्तियाँ आपसी सहयोग और सम्मेलन-प्रणाली के माध्यम से महाद्वीप में शांति बनाए रखें तथा किसी भी क्रांतिकारी अथवा युद्धजन्य स्थिति को नियंत्रित करें। यद्यपि 1822 ई. की वेरोना कांग्रेस के बाद इस व्यवस्था की सक्रियता काफी कम हो गई, फिर भी उसका प्रभाव लंबे समय तक यूरोपीय राजनीति पर बना रहा। इसके पश्चात भी यूरोपीय शक्तियाँ समय-समय पर परस्पर विचार-विमर्श करके यूरोपीय शांति बनाए रखने का प्रयास करती रहीं।

किंतु क्रीमिया युद्ध से स्पष्ट हो गया कि पुरानी और अव्यवस्थित सम्मेलन-प्रणाली के आधार पर यूरोप में स्थायी शांति कायम रखना संभव नहीं है, फिर भी युद्ध के बाद 1856 ई. में पेरिस में आयोजित यूरोपीय कांग्रेस ने ‘यूरोपीय व्यवस्था’ को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया और यह अनुभव किया गया कि महाद्वीपीय शांति बनाए रखने के लिए केवल शक्ति-संतुलन पर्याप्त नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सम्मेलन-प्रणाली भी आवश्यक है।

क्रीमिया युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह था कि इस यूरोपीय युद्ध से इंग्लैंड और फ्रांस में मित्रता स्थापित हो गई। यद्यपि युद्ध में इंग्लैंड को धन-जन की अपार क्षति हुई, फिर भी नेपोलियन तृतीय ने फ्रांस की पराजय का बदला रूस से ले लिया। ऑस्ट्रिया की तटस्थता की नीति से रूस तो नाराज था ही, इंग्लैंड और फ्रांस भी नाराज हो गए, जिसके कारण ऑस्ट्रिया मित्रविहीन हो गया।

क्रीमिया युद्ध आधुनिक तकनीकी साधनों से प्रभावित होने वाला पहला प्रमुख युद्ध था। इस युद्ध में प्रेस, तार तथा आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों का व्यापक प्रयोग किया गया। समाचार-पत्रों और तार-व्यवस्था ने युद्ध संबंधी समाचार शीघ्रता से जनता तक पहुँचाया, जिससे जनमत का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बढ़ गया। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध ने आधुनिक युद्ध-पद्धति और जनमत-आधारित राजनीति के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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