होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता (Home Rule Movement and Lucknow Pact)

Home Rule Movement and Lucknow Pact
एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारत के राजनीतिक जीवन एवं सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जो भारतीय राजनीतिज्ञ क्रांतिकारी नहीं थे, उन्होंने अंग्रेज सरकार के युद्धकालीन प्रयासों का समर्थन किया। 1918 में तिलक और गांधीजी ने अंग्रेजों की सहायता के लिए जन और धन जुटाने के लिए गाँवों दौरा किया। तिलक का कहना था: ‘‘युद्ध के ऋणपत्र खरीदो, पर उन्हें होमरूल के पट्टे समझो।’’ इस प्रकार युद्ध के दौरान एक साझे मंच का वस्तुगत आधार तैयार हुआ जिसके अंतर्गत नरमदलीय, उग्रवादी, यंग पार्टी के नियंत्रणवाली मुस्लिम लीग, सबका एक कार्यक्रम था- युद्ध में समर्थन देने के बदले संकटग्रस्त ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक किंतु प्रबल दबाव डालना। उन्हें आशा थी कि ‘कृतज्ञ होकर ब्रिटेन भारत की वफादारी का पुरस्कार देगा और भारत स्वशासन की ओर एक लंबी छलांग लगाने में समर्थ होगा।’ वे यह भूल गये कि प्रथम विश्वयुद्ध की विभिन्न शक्तियाँ केवल अ पने उपनिवेशों को सुरक्षित करने के लिए लड़ रही थीं।

लेकिन अनेक भारतीय नेता अब भी मान रहे थे कि सरकार तब तक कुछ वास्तविक अधिकार नहीं देगी, जब तक उसके ऊपर जनता का दबाव नहीं पड़ेगा और इसके लिए एक वास्तविक राजनीतिक जन-आंदोलन प्रारंभ करने की आवश्यकता है। कुछ अन्य कारण भी भारतीय राष्ट्रवाद को इसी ओर धकेल रहे थे। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण भारत के निर्धन वर्गों की स्थिति बदहाल और दयनीय हो रही थी। वे यह भी जानते थे कि युद्ध के कारण महँगाई और करों का बढ़ना अवश्यसंभावी है, इसलिए वे किसी भी जुझारू विरोध आंदोलन में शामिल होने के लिए तैयार थे।

किंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ऐसा कोई जन-आंदोलन का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं थी क्योंकि सूरत के बदनाम विभाजन, स्वदेशी आंदोलनकारियों के विरुद्ध किये गये दमनकारी प्रहारों और 1909 के सांविधानिक सुधारों के कारण नरमपंथी दल निष्क्रिय और जड़ हो चुका था तथा जनता के बीच उसकी कोई पहुँच नहीं रह गई थी। 1914 में निष्कासन की अवधि समाप्त होने पर मांडले से लौटने के बाद तिलक ने अपने पुराने कांग्रेसी विरोधियों के प्रति वैर-भाव भुलाने की उत्सुकता दिखाई। उन्हें लगता था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का पर्याय बन चुकी है और बिना इसकी इजाजत के कोई भी राष्ट्रीय आंदोलन सफल नहीं हो सकता है। नरमपंथियों को समझाने-बुझाने, उनका विश्वास जीतने और भविष्य में अंग्रेजी हुकूमत दमन का रास्ता न अख्तियार करे, इस उद्देश्य से उन्होंने घोषणा की: ‘‘मैं साफ-साफ कहता हूँ कि हम लोग हिंदुस्तान में प्रशासन-व्यवस्था का सुधार चाहते हैं, जैसा कि आयरलैंड में वहाँ के आंदोलनकारी माँग कर रहे हैं। अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का हमारा कोई इरादा नहीं है।’’ उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई और भारतीय जनता से अपील की कि वह संकट की घड़ी में अंग्रेजी हुकूमत का साथ दे।

थियोसोफिकल सोसायटी की विश्व अध्यक्ष एनी बेसेंट, जो साम्राज्य-विरोधी तो नहीं थीं, किंतु उन्हें लगता था कि भारतीयों को पर्याप्त मात्र में स्वायत्त शासन प्रदान करना भारत और ब्रिटेन की मैत्री के लिए आवश्यक है। बेसेंट चाहती थीं कि ब्रिटिश रेडिकल एवं आयरिश होमरूल आंदोलनों की तर्ज पर भारत में भी स्वशासन की माँग को लेकर राजनीतिक आंदोलन चलाया जाये। एनी बेसेंट को लगता था कि आंदोलन की सफलता के लिए कांग्रेस की अनुमति और उग्रपंथियों का सहयोग लेना जरूरी है। फलतः वे कांग्रेस के उदारपंथियों बार-बार दबाव डालती रहीं कि तिलक और उनके उग्रपंथी सहयोगियों को कांग्रेस में पुनः शामिल कर लिया जाये।

फिरोजशाह मेहता की मृत्यु तक (1915) उग्रवादी कांग्रेस में शामिल नहीं हो सके जबकि कलकत्ता के भूपेंद्रनाथ जैसे उदारवादी नेता किसी भी ऐसे साधन को स्वीकार करने के लिए प्रस्तुत थे जो कांग्रेस को वर्तमान दलदल से निकाल सकती थी। कांग्रेस अभी तक विशुद्ध रूप से विचार-विमर्श का एक मंच ही थी जो किसी भी लगातार चलाये जानेवाले आंदोलन के लिए तैयार नहीं थी। इसलिए तिलक और एनी बसेंट ने स्वयं राजनीतिक आंदोलन चलाने का निश्चय किया, लेकिन साथ ही साथ कांग्रेस पर दबाव भी डालते रहे कि वह उग्रपंथियों को पुनः अपना सदस्य बना ले। अंततः दिसंबर 1915 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में तिलक के गुट (उग्रपंथियों) को कांग्रेस में सम्मिलित होने की अनुमति मिल गई।

होमरूल लीगों का गठन (Home Rule Leagues Formed)

होमरूल आंदोलन का लक्ष्य

होमरूल आंदोलन का साधारण-सा लक्ष्य था: भारत के लिए होमरूल (स्वशासन) प्राप्त करना और ऐसा शिक्षा-कार्यक्रम चलाना, जो भारतीयों में मातृभमि के प्रति गर्व की भावना का विकास करे।

तिलक और एनी बेसेंट

Home Rule Movement and Lucknow Pact
एनी बेसेंट
Home Rule Movement and Lucknow Pact
बाल गंगाधर तिलक

आंदोलन को संगठित करने का कार्य तिलक और एनी बेसेंट की दो होमरूल लीगों ने किया। एनी बेसेंट ने दिसंबर 1915 में ही ऐसी लीग की योजना घोषित कर दी थी, और मद्रास से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘कामनवील’ (2 जनवरी 1914) और दैनिक पत्र ‘न्यू इंडिया’ (14 जुलाई 1914) के माध्यम से भारतीयों में स्वतंत्रता एवं राजनीतिक भावना को जागृत करने का कार्य आरंभ कर दिया था। इसके बाद 1916 के आरंभ में बंबई से ‘यंग इंडिया’ का प्रकाशन भी शुरू हो गया। बाल गंगाधर तिलक ने 28 अप्रैल 1916 के बेलगांव में हुए प्रांतीय सम्मेलन में अपने ‘भारतीय होमरूल लीग’ की स्थापना की। इसका आंशिक कारण यह था कि वे महाराष्ट्र में अपने आधार को बनाये रखना चाहते थे।

एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 में मद्रास (अडयार) में अपने ‘होमरूल लीग’ की शुरूआत की और जार्ज अरुंडेल को संगठन-सचिव नियुक्त किया। दोनों होमरूल लीग आपसी सहयोग से, और अलग-अलग भी, काम करने का निर्णय किया। तिलक और एनी बेसेंट, दोनों ने अपनी-अपनी लीगों के लिए कार्य-क्षेत्रों का बँटवारा कर लिया, ताकि किसी तरह की अव्यवस्था न हो। तिलक की लीग कर्नाटक, महाराष्ट्र (बंबई को छोड़कर), मध्य प्रांत और बरार तक ही सीमित रही, किंतु अप्रैल 1917 में इसकी सदस्य संख्या 14,000 और 1918 के आरंभ तक 32,000 हो गई थी।

तिलक और केलकर पूना में रहकर पर्याप्त केंद्रीकृत ढंग से अपने संगठन को चलाते थे। एनी बेसेंट की लीग का स्वरूप अधिक अखिल-भारतीय था, और इसके अडयार स्थित मुख्यालय की लगभग 200 स्थानीय शाखाएँ कस्बों, नगरों और गाँवों तक फैली थीं। 1917 के मध्य में बेसेंट की लीग की सदस्य संख्या 27,000 थी। इन दोनों लीगों ने अपना विलय नहीं किया क्योंकि एनी बेसेंट के शब्दों में ‘‘उनके (तिलक) कुछ समर्थक मुझे पसंद नहीं करते थे और मेरे कुछ समर्थक उन्हें नापसंद करते थे।’’

होमरूल आंदोलन का आरंभ (Starting of Home Rule Movement )

होमरूल आंदोलन
होमरूल आंदोलन

तिलक और बेसेंट की दोनों होमरूल लीगों ने आपसी सहमति के आधार पर नगरों में संवाद-गाष्ठियों के आयोजन एवं वाचनालयों की स्थापना, बड़े स्तर पर परचों की बिक्री और व्याख्यानों के माध्यम से होमरूल (स्वशासन) आंदोलन स्वशासन की माँग के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन छेड़ दिया। इन गतिविधियों का स्वरूप पुरानी नरमदलीय राजनीति से अधिक भिन्न नहीं था, इनमें एक नई बात यह थी कि इनकी तीव्रता और विस्तार कहीं अधिक था।

तिलक की लीग ने अपनी स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही 6 मराठी और 2 अंग्रेजी परचों की 47,000 प्रतियाँ बेंच दी। बाद में इन पर्चों को गुजराती और कन्नड़ भाषा में भी छापा गया। जनता को होमरूल के महत्त्व को समझाते हुए तिलक ने कहा कि ‘‘भारत उस बेटे की तरह है, जो अब जवान हो चुका है। समय का तकाजा है कि बाप या पालक इस बेटे को उसका वाजिब हक दे दे। भारतीय जनता को अब अपना हक लेना ही होगा। उन्हें इसका पूरा अधिकार है।’’ इसी आंदोलन में तिलक ने अपना प्रसिद्ध नारा दिया था: ‘‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।’’

तिलक ने होमरूल के आदर्श को जनता की सुस्पष्ट एवं ठोस शिकायतों से संबद्ध करने का प्रयास किया जैसे क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा और भाषाई राज्यों की माँग। उन्होंने कहा कि ‘‘मराठी, तेलगू, कन्नड़ व अन्य भाषाओं के आधार पर प्रांतों के गठन की माँग का अर्थ ही है कि शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषा में हो। क्या अंग्रेज अपने यहाँ लोगों को फ्रांसीसी में शिक्षा देते हैं? क्या जर्मन अपने लोगों को अंग्रेजी में शिक्षा देते हैं या तुर्क फ्रेंच में शिक्षा देते हैं?’’ इससे लगता है कि तिलक में क्षेत्रीय या मराठी संकीर्णता नहीं थी।

गैर-ब्राह्मणों के प्रतिनिधित्व और छुआछूत में मामले में तिलक सिद्धांततः जातिवादी नहीं थे। उन्होंने गैर-ब्राह्मणों को समझाया कि झगड़ा ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मणों का नहीं है, भेद शिक्षित और अशिक्षित के बीच है। ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण की तुलना में अधिक शिक्षित हैं, इसलिए गैर-ब्राह्मणों की वकालत करनेवाली सरकार भी मजबूर होकर सरकारी नौकरियों में ब्राह्मणों की ही भर्ती करती है। छुआछूत उन्मूलन के लिए आयोजित एक सम्मेलन में तिलक ने कहा था: ‘‘यदि भगवान् भी छुआछूत को बर्दाश्त करे, तो मैं भगवान् को नहीं मानूँगा।’’ तिलक का आंदोलन विशुद्ध रूप से चितपावन ब्राह्मणों का आंदोलन भी नहीं था। होमरूल लीग की पूना की सदस्य-सूची से ज्ञात होता है कि वहाँ इस आंदोलन में गैर-ब्राह्मण व्यापारियों की पर्याप्त भागीदारी थी और खानदेश जैसे जिलों में मराठा और गूजर सदस्यों की संख्या ब्राह्मणों से अधिक थी।

तिलक के उस समय दिये गये भाषणों में कहीं भी धार्मिक अपील नहीं झलकती। होमरूल की माँग पूरी तरह धर्मनिरपेक्षता पर आधारित थी। उनका कहना था कि अंग्रेजों से विरोध का कारण यह नहीं है कि वे किसी दूसरे धर्म के अनुयायी हैं। उनका विरोध तो हम इसलिए करते हैं क्योंकि वे भारतीय जनता के हित में कोई काम नहीं कर रहे हैं।

तिलक के शब्दों में ‘‘अंग्रेज हो या मुसलमान, यदि वह इस देश की जनता के हित के लिए काम करता है, तो वह हमारे लिए पराया नहीं है। इस परायेपन का धर्म या व्यवसाय से कोई संबंध नहीं हैं, यह सीधे-सादे हितों से जुड़ा प्रश्न है।’’

होमरूल लीग के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने दमनात्मक कार्रवाइयाँ तेज कर दी। सरकार ने 23 जुलाई 1916 को तिलक को, जिस दिन उनका 60वाँ जन्मदिन था और उन्हें एक लाख रुपये की थैली भेंट मिली थी, एक ‘कारण बताओ नोटिस’ दिया, जिसमें लिखा था कि आपकी गतिविधियों के चलते आप पर प्रतिबंध क्यों न लगा दिया जाए? उन्हें 60 हजार रुपये का मुचलका भरने को कहा गया। तिलक के लिए यह शायद सबसे बड़ा उपहार था। उन्होंने कहा: ‘‘अब होमरूल आंदोलन जंगल में आग की तरह फैलेगा। सरकारी दमन विद्रोह की आग को और भड़कायेगा।’’

तिलक की ओर से मुहम्मदअली जिन्ना के नेतृत्व में वकीलों ने मुकदमा लड़ा। मजिस्ट्रेट की अदालत में वे मुकदमा हार गये, किंतु नवंबर में हाईकोर्ट ने उन्हें निर्दोष करार दिया।

गांधीजी के ‘यंग इंडिया’ अखबार ने लिखा: ‘‘यह अभिव्यक्ति की आजादी की बहुत बड़ी जीत है। होमरूल आंदोलन के लिए यह एक बड़ी सफलता है।’’ अब तिलक भी अपने सार्वजनिक भाषणों में कहने लगे कि होमरूल या स्वशासन की माँग व्यक्त करने के लिए सरकार ने अनुमति दे दी है।

एनी बेसेंट की होमरूल लीग ने भी स्वशासन की माँग के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया। अरुंडेल ने राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक बहस शुरू करने के लिए ‘न्यू इंडिया’ के माध्यम से पुस्तकालयों की स्थापना, छात्रों को राजनीतिक शिक्षा देने के लिए कक्षाओं का आयोजन, पर्चे बाँटने, चंदा इकट्ठा करने, सामाजिक कार्य करने, राजनीतिक सभाओं का आयोजन करने, दोस्तों के बीच होमरूल के समर्थन में तर्क देने तथा उन्हें आंदोलन में भागीदार बनाने के लिए स्वयंसेवकों से कार्य करने को कहा।

बेंसेंट की लीग सितंबर 1916 तक 26 अंग्रेजी पुस्तिकाओं की 3,00,000 प्रतियाँ निकाल चुकी थी। नवंबर 1916 में जब एनी बेसेंट को बरार व मध्य प्रांत में जाने पर प्रतिबंध लगाया गया, तो अरुंडेल की अपील पर लीग की तमाम शाखाओं ने विरोध-बैठकें आयोजित की और वायसराय तथा गृह-सचिव को विरोध-प्रस्ताव भेजा। इसी प्रकार जब 1917 में तिलक पर पंजाब और दिल्ली जाने पर प्रतिबंध लगाया गया, तो पूरे देश में विरोध-बैठकें हुईं।

नरमपंथी कांग्रेसी

कांग्रेस की जड़ता से क्षुब्ध अनेक नरमपंथी कांग्रेसी भी होमरूल लीग आंदोलन में शामिल हो गये। जवाहरलाल नेहरू, वी. चक्रवर्ती, जे. बनर्जी जैसे नेताओं ने भी लीग की सदस्यता ग्रहण की।

गोखले की ‘सर्वेंट्स आफ इंडिया सोसायटी’ के सदस्यों को लीग का सदस्य बनने की अनुमति नहीं थी, किंतु उन्होंने जनता के बीच भाषण देकर और पर्चे बाँटकर होमरूल आंदोलन को समर्थन किया।

उत्तर प्रदेश के अनेक उदारवादी राष्ट्रवादियों ने लखनऊ कांग्रेस सम्मेलन की तैयारी के लिए होमरूल लीग के कार्यकत्र्ताओं के साथ गाँवों-कस्बों का दौरा किया। 1916 का लखनऊ अधिवेशन होमरूल लीग के सदस्यों के लिए अपनी ताकत दिखाने का अच्छा मौका था।

तिलक के समर्थकों ने लखनऊ पहुँचने के लिए एक ट्रेन आरक्षित की, जिसे कुछ लोगों ने ‘कांग्रेस स्पेशल’ तो कुछ ने ‘होमरूल स्पेशल’ कहा। अरुंडेल ने लीग के सदस्यों अपील की कि वे लखनऊ अधिवेशन का सदस्य बनने की हरसंभव कोशिश करें।

कांग्रेस और मुलिम लीग (Congress and Muslim League)

होमरूल आंदोलन
लखनऊ पैक्ट, 1916

सूरत अधिवेशन (1907) के समय कांग्रेस में जो विभाजन हुआ था, वह 1916 तक बना रहा। इस बीच जहाँ एक ओर सरकार राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों को कुचलने में लगी रही, वहीं दूसरी ओर मार्ले-मिंटो सुधारों के माध्यम से उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच तथा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने की कोशिश भी करती रही। किंतु इस समय दो-तीन ऐसी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाएँ हुईं, जिनके कारण अंग्रेज सरकार और मुसलमानों के बीच अलगाव बढ़ा। बंगाल-विभाजन की निरस्ति (1911), इटली और बाल्कन के युद्धों (1911-12) में इंग्लैंड द्वारा तुर्की को सहायता न देने, अगस्त 1912 में अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाने के प्रस्ताव को हार्डिंग्स द्वारा अस्वीकार किये जाने तथा 1913 में कानपुर में एक मस्जिद के साथ लगे चबूतरे को तोड़ने के परिणामस्वरूप होनेवाले दंगे के कारण भारतीय मुसलमान ब्रिटिश सरकार से खासे नाराज थे।

1912 में तथाकथित ‘यंग पार्टी’ ने मुस्लिम लीग पर कब्जा कर उसे अधिक आक्रामक बनाने का प्रयास कर रहे थे। इस प्रकार मुस्लिम युवा धीरे-धीरे ही सही, अलीगढ़ संप्रदाय के सीमित राजनीतिक दृष्टिकोण के खोल से बाहर निकलकर कांग्रेस के निकट आने लगे थे।

कांग्रेस और मुलिम लीग का बंबई अधिवेशन, 1915 (Bombay Session of Congress and Muslim League, 1915)

प्रथम विश्वयुद्ध और होमरूल आंदोलनों के कारण देश में जो नई एकता की भावना पैदा हो रही थी, उससे उदारवादियों और उग्रवादियों को ही नहीं, मुसलमानों को भी लगने लगा था कि उनकी आपसी फूट के कारण उनके उद्देश्य की भारी हानि हो रही है, इसलिए उन्हें सरकार के विरुद्ध एकजुट हो जाना चाहिए। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता की इसी बढ़ती आकांक्षा के कारण तिलक, एनी बेसेंट तथा मुहम्मदअली जिन्ना के प्रयासों से 1915 में कांग्रेस और मुलिम लीग का अधिवेशन एक साथ बंबई में हुआ, जहाँ दोनों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से मुस्लिम भोज का आयोजन किया। जिन्ना इस समय ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत’ कहे जाने लगे थे। अगले वर्ष लखनऊ में एकबार पुनः कांग्रेस और मुस्लिम लीग का अधिवेशन साथ-साथ संपन्न हुआ।

कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन, 1916 (Lucknow Session of Congress, 1916)

1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में दो महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं। पहली यह कि कांग्रेस के दोनों हिस्से- उदारवादी और उग्रवादी- फिर एक हो गये। यह समय की आवश्यकता भी थी क्योंकि आपसी फूट के कारण कांग्रेस निष्क्रियता का शिकार हो गई थी। कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुए अंबिकाचरण मजूमदार ने कहा कि ‘‘दस वर्षों के दुखद अलगाव तथा गलतफहमी के कारण बेवजह के विवादों में भटकने के बाद भारतीय राष्ट्रीय दल के दोनों खेमों ने अब यह महसूस किया कि अलगाव ही उनकी पराजय है और एकता उनकी जीत। अब भाई-भाई फिर मिल गये हैं।’’ दरअसल 1914 में जेल से छूटने के बाद से ही तिलक कांग्रेस के दोनों गुटों को एकजुट करने का प्रयास आरंभ कर दिये थे। राष्ट्रवाद की उभरती लहर के कारण पुराने कांग्रेसी भी अब तिलक और अन्य गरमपंथी राष्ट्रवादियों के कांग्रेस में दोबारा लौटने के स्वागताकांक्षी थे।

लखनऊ पैक्ट, 1916 (Lucknow Pact ,1916)

होमरूल आंदोलन
लखनऊ पैक्ट, 1916

दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना यह हुई कि अपने पुराने मतभेद भुलाकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने सरकार के सामने साझी राजनीतिक माँगें रखीं। कांग्रेस और लीग की यह एकता कांग्रेस-लीग समझौते पर हस्ताक्षर के साथ स्थापित हुई, जिसे ‘लखनऊ पैक्ट’ (कांग्रेस-लीग समझौता) के नाम से जाना जाता है। इन दोनों को करीब लाने में तिलक और जिन्ना दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, क्योंकि दोनों का मानना था कि केवल हिंदू-मुस्लिम एकता के द्वारा ही भारत को स्वशासन प्राप्त हो सकता है। इस समझौते में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की माँग को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस और लीग दोनों ने अपने अधिवेशन में एक ही प्रस्ताव पारित किये-अलग-अलग चुनाव-मंडलों के आधार पर राजनीतिक सुधारों की एक साझी योजना सामने रखी और माँग की कि ब्रिटिश सरकार यथाशीघ्र भारत को स्वशासन देने की घोषणा करे।

मदनमोहन मालवीय जैसे कई वरिष्ठ नेता इस समझौते के विरुद्ध थे क्योंकि यह समझौता मुस्लिम लीग को बहुत महत्त्व देता था। इस संबंध में तिलक कहना था कि ‘‘कुछ महानुभावों का यह आरोप है कि हम हिंदू अपने मुसलमान भाइयों को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं। मैं कहता हूँ कि यदि स्वशासन का अधिकार केवल मुस्लिम समुदाय को दिया जाए तो मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा, राजपूतों को यह अधिकार मिले, तो परवाह नहीं। यदि यह अधिकार हिंदुओं के सबसे पिछड़े वर्गों को भी दिया जाए, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। हिंदुस्तान के किसी भी समुदाय को यह अधिकार दे दिया जाए, हमें कोई ऐतराज नहीं है। मेरा यह बयान समूची भारतीय राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व करता है।’’

निःसंदेह लखनऊ-समझौता हिंदू-मुस्लिम एकता के विकास में महत्त्वपूर्ण कदम था। मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सिद्धांत को इसलिए स्वीकार किया गया कि कहीं अल्पसंख्यकों को यह न लगे कि बहुसंख्यक उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं।

किंतु हिंदुओं और मुसलमानों के राजनीतिक दृष्टिकोण को धर्मनिरपेक्ष बनाने का ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया, जिससे वे यह समझ सकें कि राजनीति में हिंदू या मुसलमान के रूप में उनके हित अलग-अलग नहीं हैं।

लखनऊ समझौते के बाद भारतीय राजनीति में संप्रदायवाद के सिर उठाने की पूरी गुंजाइश बनी रही। फिर भी, उदारवादियों और उग्र राष्ट्रवादियों के बीच तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एकता स्थापित होने के कारण पूरे देश में राजनीतिक उत्साह की लहर दौड़ गई।

लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में संवैधानिक सुधारों की माँग फिर उठाई गई। तिलक ने एक प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस अधिवेशन के निर्णयों तथा कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के लिए एक कार्यकारिणी का गठन किया जाये, किंतु उदारवादियों के विरोध के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। बाद में चार साल बाद 1920 में जब गांधीजी ने कांग्रेस के संविधान को संशोधित कर उसे नया रूप दिया, तो एक प्रकार से तिलक के प्रस्तावों को ही स्वीकार किया गया। कांग्रेस अधिवेशन की समाप्ति के बाद उसी पंडाल में दोनों होमरूल लीगों की बैठक हुई, जिसमें कांग्रेस-लीग समझौते की प्रशंसा की गई।

सरकारी प्रतिक्रिया और देशव्यापी आंदोलन (Government Response and Countrywide Movement)

लखनऊ की घटनाओं, विशेषकर कांग्रेस-लीग समझौते और होमरूल लीग के बढ़ते प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक था। मद्रास सरकार ने छात्रों के राजनीतिक बैठकों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया। पूरे देश में इसका विरोध हुआ। तिलक ने कहा कि ‘‘सरकार को मालूम है कि देशप्रेम की भावना छात्रों को ज्यादा उत्तेजित करती है। वैसे भी कोई देश युवावर्ग की ताकत से ही उन्नति कर सकता है।’’

मद्रास सरकार ने जून 1917 में जब एनी बेसेंट और उनके दो प्रमुख थियोसोफिस्ट सहयोगियों, जार्ज अरुंडेल तथा बी.पी. वाडिया को नजरबंद किया, तो इसके विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन हुए। एस. सुब्रह्मण्यम अय्यर ने अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि वापस कर दी।

मदनमोहन मालवीय, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे तमाम नरमपंथी, जो अब तक लीग में शामिल नहीं थे, लीग में शामिल हो गये और उन्होंने एनी बेसेंट व अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के विरुद्ध आवाज उठाई। 28 जुलाई 1917 को कांग्रेस की एक बैठक में तिलक ने कहा कि यदि सरकार इन लोगों को तुरंत रिहा नहीं करती है, तो शांतिपूर्ण असहयोग आंदोलन चलाया जायेगा।

शंकरलाल बैंकर और जमनादास द्वारकादास ने ऐसे एक हजार लोगों के हस्ताक्षर इकट्ठा किये जो सरकारी आदेशों की अवहेलना करके जुलूस के रूप में एनी बेसेंट से मिलना चाहते थे। इन लोगों ने स्वराज्य के समर्थन में किसानों और मजदूरों से हस्ताक्षर कराये। होमरूल आंदोलन की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1917-18 में होमरूल लीगों की सदस्यता पूरे भारत में लगभग 60,000 हो गई थी- सबसे बढ़कर गुजरात, सिंध, संयुक्त प्रांत, बिहार जैसे क्षेत्रों और दक्षिण भारत के कुछ भागों में, जो पहले राष्ट्रवादी आंदोलन में भाग नहीं लेते थे।

मांटेग्यू ने अपनी डायरी में लिखा: ‘‘शिव ने अपनी पत्नी को 52 टुकड़ों में काटा, भारत सरकार ने जब एनी बेसेंट को गिरफ्तार किया, तो उसके साथ ठीक ऐसा ही हुआ।’’

मांटेग्यू की घोषणा

राष्ट्रवादी और सरकार-विरोधी भावनाओं की उठती लहर को दबाने के लिए भयानक दमन का सहारा लेने वाली ब्रितानी सरकार ने एक बार फिर ‘गुड़ खिलाकर डंडा मारने’ की नीति अपनाई। राष्ट्रवादी जनमत को खुश करने के लिए उसने 20 अगस्त 1917 को घोषणा की कि ‘‘ब्रिटिश शासन की नीति है कि भारत के प्रशासन में भारतीय जनता को भागीदार बनाया जाए और स्वशासन के लिए विभिन्न संस्थाओं का क्रमिक विकास किया जाए जिससे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़ी कोई उत्तरदायी सरकार स्थापित की जा सके।’’

यह बयान मार्ले के उस बयान के ठीक विपरीत था जो संवैधानिक सुधारों को संसद में रखते हुए 1909 में मार्ले ने कहा था कि इन सुधारों का उद्देश्य देश में स्वराज्य की स्थापना कतई नहीं है।

लेकिन मांटेग्यू की घोषणा का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अब होमरूल या स्वराज्य की माँग को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता था। किंतु इसका अर्थ यह भी नहीं था कि ब्रिटिश हुकूमत स्वराज की माँग मानने ही जा रही थी। मांटेग्यू की घोषणा में यह बात भी थी कि स्वशासन की स्थापना तभी होगी, जब उसका उचित समय आयेगा, और समय आया है कि नहीं, इसका फैसला ब्रिटिश हुकूमत करेगी। इससे स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार निकट भविष्य में सत्ता सौंपनेवाली नहीं है।

मांटेग्यू की घोषणा के आधार पर सितंबर 1917 में एनी बेसेंट को रिहा कर दिया गया। इस समय एनी बेसेंट की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि दिसंबर 1917 में उन्हें कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अध्यक्ष बना दिया गया और वह कांग्रेस की अध्यक्ष बननेवाली प्रथम महिला बन गईं।

होमरूल आंदोलन की समाप्ति (End of Home Rule Movement)

किंतु, 1918 में कई कारणों से होमरूल आंदोलन कमजोर पड़ गया। एनी बेसेंट की गिरफ्तारी से उत्तेजित होकर जो नरमपंथी इस आंदोलन में सम्मिलित हुए थे, उनकी रिहाई के बाद वे निष्क्रिय हो गये।

फिर जुलाई 1918 में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा से नेताओं को लगा कि अब आंदोलन की कोई आवश्यकता नहीं है। सुधार योजनाओं की घोषणा से राष्ट्रवादी खेमे में एक दरार और पड़ गई। कुछ लोग इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करने के पक्ष में थे, जबकि कुछ लोग इसे पूरी तरह नामंजूर करना चाहते थे। इन सुधारों और शांतिपूर्ण असहयोग आंदोलन के प्रश्न पर खुद एनी बेसेंट दुविधा में थीं। कभी वह इसे गलत कहतीं और कभी अपने समर्थकों के दबाव के कारण ठीक कहतीं। तिलक बहुत समय तक अपने निर्णय पर अडिग रहे, लेकिन बेसेंट की ढुलमुल नीतियों और नरमपंथियों के रुख में बदलाव के कारण वह अकेले अपने बूते पर इन सुधारों का विरोध करने में असमर्थ रहे और सितंबर 1918 में अपना मुकदमा लड़ने इंग्लैंड चले गये, जहाँ उन्होंने ‘इंडियन अनरेस्ट’ के लेखक चिराल पर मानहानि का मुकदमा दायर कर रखा था। इस बीच 1917-18 के दौरान गांधीजी चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद में पहली बार ख्याति प्राप्त कर रहे थे।

होमरूल आंदोलन का मूल्यांकन (Evaluation of Home Rule Movement)

होमरूल आंदोलन और विशेष रूप से बेसेंट की लीग का महत्त्व इस बात में है कि इसका विस्तार नये क्षेत्रों, नये समूहों और एक प्रकार की नई पीढ़ी तक हुआ।

महाराष्ट्र को छोड़कर अन्य दो पुराने उग्रवादी क्षेत्र-बंगाल और पंजाब-अपेक्षाकृत शांत थे क्योंकि विश्वयुद्व के दौरान ये दोनों क्षेत्र विशेष रूप से ब्रिटिश दमन के शिकार रहे थे जहाँ किसी प्रकार का खुला जुझारू आंदोलन कठिन था।

बेसेंट की लीग का मुख्य रूप से समर्थन करनेवाले थे- मद्रास के तमिल ब्राह्मण, संयुक्त प्रांत के व्यावसायिक समूह (कायस्थ, कश्मीरी ब्राह्मण एवं कुछ मुसलमान), सिंध के हिंदू अल्पसंख्यक और गुजरात और बंबई के युवा गुजराती उद्योगपति, व्यापारी एवं वकील। इन समूहों के बीच थियोसोफी की लोकप्रियता का एक कारण यह था कि थियोसोफी में थोड़ा-बहुत समाज-सुधार के साथ प्राचीन हिंदू ज्ञान और वैभव के सिद्धांत का मेल था। दूसरे, इन क्षेत्रों में ब्रह्म समाज या आर्य समाज जैसे संगठनों की बहुत पैठ नहीं थी। तीसरे, इन क्षेत्रों में एक प्र्रकार का राजनीतिक शून्य-सा भी था, क्योंकि बंबई और मद्रास शहरों को छोड़ दें तो इन क्षेत्रों में कोई सुस्थापित राजनीतिक परंपरा-उग्रवादी या नरमदलीय किसी भी प्रकार की-नहीं थी।

फिर भी, होमरूल लीगें भारत में जन आंदोलनों की राजनीति का आरंभ नहीं कर सकीं। मद्रास, महाराष्ट्र और कर्नाटक में, अछूतों के थोड़े-बहुत समर्थन के बावजूद, इन लीगों पर ब्राह्मणों का वर्चस्व था और गैर-ब्राह्मणों ने इनका विरोध किया। बेसेंट ने स्वयं अपने घनिष्ठ सहयोगियों के साथ जुझारू राजनीति से संन्यास ले लिया।

लेकिन होमरूल आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने भावी राष्ट्रीय आंदोलन के लिए नये जुझारू योद्धा तैयार किये, जैसे मद्रास में सत्यमूर्ति, कलकत्ता में जितेंद्रलाल बनर्जी, इलाहाबाद और लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू और खलीकुज्जमाँ, बंबई और गुजरात में रंगों का आयात करनेवाले धनी व्यापारी जमनादास द्वारकादास, उद्योगपति उमर सोभानी, शंकरलाल बैंकर और इंदुलाल याज्ञनिक। जब 1919 में गांधीजी ने रौलट ऐक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह की अपील की, तो इसमें वे सभी लोग सम्मिलित हो गये, जिन्हें होमरूल आंदोलन ने राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया था।