खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement)

खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement)
खिलाफत आंदोलन: भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष का एक ऐतिहासिक अध्याय 1919 से 1922 ई. के बीच […]

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खिलाफत आंदोलन: भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष का एक ऐतिहासिक अध्याय

1919 से 1922 ई. के बीच ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध दो सशक्त और व्यापक जन-आंदोलन चलाए गए- खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि उन घटनाओं की एक दीर्घ शृंखला  में निहित है, जो प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान और उसके पश्चात् ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय संदर्भ में उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप घटित हुई थीं। यद्यपि खिलाफत और असहयोग दोनों आंदोलन पृथक्-पृथक् मुद्दों को लेकर प्रारंभ हुए थे और प्रत्यक्ष रूप से उनका कोई परस्पर संबंध नहीं था, तथापि दोनों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को प्रोत्साहित करने और उसे नई दिशा प्रदान करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन आंदोलनों ने पहली बार भारत के हिंदू और मुसलमान समुदायों को एक साझे मंच पर एकत्रित किया और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक अभूतपूर्व जन-जागरण का वातावरण निर्मित किया।

खिलाफत आंदोलन की पृष्ठभूमि

खिलाफत आंदोलन मूलतः भारतीय मुसलमानों द्वारा धार्मिक कारणों से प्रारंभ किया गया था। इस्लामी परंपरा में तुर्की का सुल्तान ‘खलीफा’ अर्थात् समस्त मुसलमानों के धार्मिक-राजनीतिक प्रमुख के रूप में अत्यंत सम्मानित और प्रतिष्ठित था। विश्वभर के मुसलमान यह चाहते थे कि तुर्की की स्थिति और प्रतिष्ठा पर किसी भी प्रकार की आँच न आए। यही धार्मिक भावना थी जिसने 1911-12 ई. में इटालो-तुर्की (ट्राईपोलिटन) और बाल्कन युद्धों के समय तुर्की की सहायता के लिए भारत में ‘तुर्की राहतकोष’ के गठन को प्रेरित किया और मार्च 1912 ई. में एक चिकित्सा दल (रेड क्रेसेंट मेडिकल मिशन) तुर्की भेजा गया था।

इसी धार्मिक उत्साह से प्रेरित होकर अलीबंधुओं — मुहम्मद अली और शौकत अली — ने मुसलमानों के पवित्र स्थलों की सुरक्षा हेतु धन-संग्रह के उद्देश्य से अब्दुल बारी के लखनऊ-स्थित फिरंगीमहल उलेमा-संप्रदाय के समर्थन से 1913 ई. में ‘कुल-हिंद अंजुमने-खुद्दामे-काबा’ (अखिल भारतीय काबा सेवक सभा) का गठन किया। यह संगठन इस बात का प्रमाण था कि भारतीय मुसलमानों में अखिल-इस्लामी (पैन-इस्लामिक) चेतना और संगठन-शक्ति क्रमशः बढ़ रही थी।

शिक्षित मुस्लिम नेतृत्व का उदय और नई राजनीतिक चेतना

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों से ही एक नया और जागरूक शिक्षित मुस्लिम नेतृत्व उभरने लगा था, जो सर सैयद अहमद खाँ की वफादारी की परंपरागत राजनीति और पुरानी पीढ़ी के कुलीनवादी दृष्टिकोण से दूर होकर समग्र मुस्लिम समुदाय का समर्थन और नेतृत्व करने का प्रयास कर रहा था। मुहम्मद अली के ‘कामरेड’ (कलकत्ता), अबुल कलाम आजाद के ‘अल-हिलाल’ (कलकत्ता) और ज़फ़र अली खान के ‘ज़मींदार’ (लाहौर) जैसी मुस्लिम पत्र-पत्रिकाओं के अखिल-इस्लामी और ब्रिटिश-विरोधी स्वर ने मुस्लिम युवा-वर्ग को गहराई से आकृष्ट किया। इन पत्रिकाओं ने जहाँ एक ओर इस्लामी एकता का संदेश फैलाया, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आलोचना कर राजनीतिक चेतना को भी जगाया।

मुस्लिम समुदाय की व्यापक लामबंदी के लिए 1910 ई. में ‘जमीयतुल अंसार’ (भूतपूर्व छात्र सभा) और 1913 ई. में दिल्ली में एक कुरान-मदरसा प्रारंभ किया गया था। इन संस्थाओं ने शिक्षित मुस्लिम युवाओं को एक वैचारिक और संगठनात्मक आधार प्रदान किया। नए शिक्षित मुस्लिम नेतृत्व के साथ-साथ उलेमा भी एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में भारत के विभिन्न मुस्लिम वर्गों के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में उभर रहे थे। उलेमाओं की इस राजनीतिक सक्रियता ने खिलाफत आंदोलन को, जब वह आया, तब एक व्यापक जनाधार प्रदान किया।

हिंदू-मुस्लिम एकता की पृष्ठभूमि का निर्माण

प्रथम विश्वयुद्ध से पहले और उसके दौरान तीन महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं ने हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक एकीकरण की एक व्यापक पृष्ठभूमि तैयार की। पहली, 1911-12 ई. में इटली और बाल्कन युद्धों में इंग्लैंड द्वारा तुर्की को सहायता न देना, जिसने भारतीय मुसलमानों को ब्रिटिश सरकार की नीयत पर संदेह करने पर विवश किया। दूसरी, अगस्त 1912 ई. में वायसरॉय हार्डिंग द्वारा अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रस्ताव को अस्वीकार किया जाना, जिससे मुस्लिम समुदाय में घोर निराशा और असंतोष फैला। तीसरी, 1913 ई. में कानपुर में एक मस्जिद से सटे चबूतरे को तोड़े जाने के परिणामस्वरूप हुए सांप्रदायिक तनाव और दंगे, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई जागरूकता उत्पन्न की। इन तीनों घटनाओं ने मिलकर हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेज-विरोधी मंच पर एक-दूसरे के निकट लाने में योगदान दिया।

इसके पश्चात् 1916 ई. में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुए ऐतिहासिक लखनऊ समझौते ने अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को प्रभावहीन कर दिया। इस समझौते में पृथक् निर्वाचन-मंडल जैसे विवादास्पद मुद्दों पर भी एक कार्यसाधक सहमति बनाई गई, जो उस समय की परिस्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि थी। लखनऊ समझौते ने यह सिद्ध किया कि हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना सकते हैं।

ब्रिटिश सरकार का विश्वासघात: खिलाफत आंदोलन का तात्कालिक कारण

1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने पर तुर्की का सुल्तान जर्मनी की ओर से युद्ध में सम्मिलित हो गया। 14 नवंबर 1914 ई. को जब रूस, इंग्लैंड और फ्रांस ने तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, तो भारतीय मुसलमानों के सामने एक गहरी धार्मिक और राजनीतिक दुविधा उत्पन्न हो गई। एक ओर उनके धर्मगुरु तुर्की के सुल्तान की सहायता का धार्मिक दायित्व था, तो दूसरी ओर उस ब्रिटिश सरकार के प्रति राजनीतिक निष्ठा का प्रश्न था, जिसके अधीन वे जी रहे थे। 1915 ई. में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अध्यक्ष मज़हर-उल-हक़ ने इस दुविधा को मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया। उन्होंने कहा: “हमारे लिए बड़े दुःख की बात है कि हमारे खलीफा की सरकार हमारे सम्राट की सरकार से लड़ रही है। अंग्रेज और मुसलमान सरकारों में संघर्ष मुसलमानों के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। इस्लाम के अनुयायियों की यह कामना है कि जल्द-से-जल्द शांति स्थापित हो और भविष्य में मुसलमानों की प्रतिष्ठा पर आँच न आए।” तथापि अधिकांश भारतीय मुस्लिम नेता- अलीबंधु (मुहम्मद अली और शौकत अली), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, अब्दुल बारी, मौलाना महमूद-उल-हसन और हकीम अजमल खाँ तुर्की के साथ खड़े रहने के पक्ष में थे।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय मुसलमानों का सहयोग ब्रिटेन के लिए अनिवार्य था। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज ने भारतीय मुसलमानों से स्पष्ट वचन दिया था: “यदि भारतीय मुसलमान इस महायुद्ध में अंग्रेजों का साथ देंगे, तो विजय के बाद अंग्रेज तुर्की की अखंडता को बनाए रखेंगे और अरब तथा मेसोपोटामिया के इस्लामी धार्मिक स्थलों की रक्षा करेंगे।” लॉयड जॉर्ज ने यह भी कहा था : “हम इसलिए नहीं लड़ रहे हैं कि एशिया माइनर और थ्रेस के समृद्ध और प्रसिद्ध भू-भागों को, जहाँ अधिकतर तुर्क जाति के लोग निवास करते हैं, तुर्की से छीन लें।” इस आश्वासन के आधार पर भारतीय मुसलमानों ने अपनी धार्मिक भावनाओं को दरकिनार करते हुए प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ दिया और लाखों मुसलमान सैनिक ब्रिटिश सेना में लड़े।

किंतु जब युद्ध समाप्त हुआ, तो विजयी मित्र-राष्ट्रों ने 10 अगस्त 1920 ई. को तुर्की के साथ सेव्रेस की संधि की। इस अपमानजनक संधि द्वारा न केवल तुर्की के पुराने उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य को विघटित कर तुर्की के सुल्तान के समस्त अधिकार छीन लिए गए, बल्कि उसके कुछ प्रदेशों को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया और कुछ क्षेत्रों पर इंग्लैंड तथा फ्रांस ने अधिकार कर लिया। इससे तुर्की के सुल्तान की स्थिति एक कैदी जैसी हो गई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री के इस नग्न विश्वासघात से भारतीय मुसलमान स्तब्ध और क्षुब्ध रह गए। जब मुसलमानों ने भारत के वायसरॉय के समक्ष अपनी पीड़ा व्यक्त की, तो वायसरॉय ने बड़ी बेरुखी से दो-टूक उत्तर दिया: “तुर्की उससे अधिक और किसी व्यवहार की आशा नहीं कर सकता, जिसकी आशा जर्मनी के पक्ष में तलवार उठाने वाले अन्य देश करते हैं।” विश्वासघात की इससे अधिक जघन्य मिसाल इतिहास में शायद ही मिले।

खिलाफत आंदोलन का औपचारिक आरंभ

अंग्रेजों के इस विश्वासघात से क्षुब्ध होकर भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत की पुनर्स्थापना के लिए जो आंदोलन प्रारंभ किया, उसे ‘खिलाफत आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। यद्यपि सेव्रेस की संधि 1920 में हुई थी, किंतु भारतीय मुसलमानों को 1918 ई. से ही अंग्रेजों की नीयत पर गहरा संदेह होने लगा था, क्योंकि अंग्रेजों के उकसावे पर 1916 ई. में ही मक्का के शरीफ हुसैन ने अपने खलीफा के विरुद्ध विद्रोह (अरब विद्रोह) आरंभ कर दिया था। इसीलिए दिसंबर 1918 ई. में मुस्लिम लीग के दिल्ली अधिवेशन में मक्का के शरीफ हुसैन की कटु आलोचना की गई और माँग की गई कि मुस्लिम राष्ट्रों की अखंडता को अक्षुण्ण रखा जाए और इस्लाम के पवित्र धार्मिक स्थलों को खलीफा को वापस लौटाया जाए।

एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक संयोग यह था कि जब दिसंबर 1918 ई. में दिल्ली में मुस्लिम लीग का अधिवेशन चल रहा था, उसी समय दिल्ली में मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में कांग्रेस का अधिवेशन भी हो रहा था। इस अवसर पर गांधीजी ने भारतीय मुसलमानों की माँगों का खुलकर समर्थन किया। इससे दोनों समुदायों के बीच राजनीतिक सहयोग की एक नई और व्यापक पृष्ठभूमि तैयार हुई।

17 अक्टूबर 1919 ई. को राष्ट्रीय स्तर पर ‘अखिल भारतीय खिलाफत दिवस’ मनाया गया। इसके पश्चात् मुहम्मद अली, शौकत अली, अबुल कलाम आज़ाद, हसरत मोहानी आदि ने मिलकर सितंबर 1919 ई. में ‘अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी’ का औपचारिक गठन किया, जिसने ‘खिलाफत आंदोलन’ को संगठित और व्यवस्थित रूप दिया। इसी समय उलेमाओं ने भी ‘जमायत-उल-उलेमा-ए-हिंद’ की स्थापना (नवंबर 1919) की, जो धार्मिक विद्वानों का एक महत्त्वपूर्ण संगठन बना और जिसने राजनीतिक आंदोलन को धार्मिक वैधता प्रदान की।

खिलाफत आंदोलनकारियों की मुख्यतः तीन माँगें थीं। पहली, मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर तुर्की के सुल्तान और खलीफा की धार्मिक तथा लौकिक प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित किया जाए। दूसरी, खलीफा के युद्ध-पूर्व के क्षेत्र उसके पास ही रहने दिए जाएँ, ताकि वह इस्लामी जगत के सर्वोच्च प्रमुख के रूप में अपनी स्थिति बनाए रख सके और इस्लाम की रक्षा कर सके। तीसरी, जज़ीरतुल-अरब (अरब, सीरिया, इराक और फिलीस्तीन) पर मुसलमानों की संप्रभुता बनी रहे।

आंदोलन की दो धाराएँ

खिलाफत आंदोलन में दो स्पष्ट धाराएँ विकसित हुईं- एक नरमपंथी और दूसरी जुझारू। पहली धारा का केंद्र सेंट्रल खिलाफत कमेटी थी, जिसका संगठन 1919 ई. के आरंभ में मुंबई के सेठ चोटानी जैसे समृद्ध और प्रभावशाली व्यापारियों ने किया था। दूसरी धारा में निम्न मध्यवर्गीय पत्रकार और उलेमा सम्मिलित थे, जिनका संयुक्त प्रांत, बंगाल, सिंध और मलाबार के छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त सामाजिक प्रभाव था। मुंबई के नरमपंथी नेता आंदोलन को संयत सभाओं, ज्ञापनों और प्रतिनिधिमंडलों को लंदन तथा पेरिस भेजने तक ही सीमित रखना चाहते थे। गांधीजी ने इन दोनों धाराओं के बीच कुशल मध्यस्थ की भूमिका निभाकर स्वयं को आंदोलन की अनिवार्य धुरी बना लिया। खिलाफत नेताओं के लिए गांधीजी हिंदू राजनीतिज्ञों तक पहुँचने की अपरिहार्य कड़ी थे।

गांधीजी और खिलाफत: हिंदू-मुस्लिम एकता का राजनीतिक प्रयोग

इस समय गांधीजी पहले ही रौलट एक्ट (1919 ई.) और पंजाब की दमनकारी घटनाओं (जलियाँवाला बाग हत्याकांड सहित) के विरुद्ध आंदोलन की घोषणा कर चुके थे। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को “हिंदुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित करने का ऐसा अवसर” माना “जो अगले सौ वर्षों तक नहीं मिलेगा।” वे खिलाफत के प्रश्न के प्रति पूर्ण समर्थन का भाव रखते थे और चाहते थे कि इस मुद्दे को लेकर सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह तथा असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया जाए।

बाल गंगाधर तिलक धार्मिक मुद्दों पर मुस्लिम नेताओं के साथ संधि करने के पक्ष में नहीं थे। साथ ही वे ‘सत्याग्रह’ को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयुक्त किए जाने के प्रति भी आशंकित थे। इस मतभेद के बावजूद गांधीजी के दबाव में कांग्रेस ने हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने और मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से खिलाफत आंदोलन में मुसलमानों की सहायता करने के लिए गांधीजी के राजनीतिक कार्यक्रम को स्वीकृति दे दी। संघर्ष के संवैधानिक तरीकों पर से कांग्रेस का विश्वास पहले से ही क्षीण होता जा रहा था, विशेष रूप से पंजाब की घटनाओं के संबंध में हंटर कमीशन की भेदभावपूर्ण और दमनकारी सिफारिशों के कारण। गांधीजी ने कहा था : “यह ठीक मेरी नैतिक जिम्मेदारी की भावना है जिसने मुझे खिलाफत के प्रश्न को हाथ में लेने तथा मुसलमानों के सुख-दुःख में उनका साथी बनने के लिए प्रेरित किया है। यह पूरी तरह सत्य है कि मैं हिंदू-मुस्लिम एकता में सहयोग दे रहा हूँ और उसे प्रोत्साहित कर रहा हूँ।”

नवंबर 1919 ई. में मुस्लिम लीग ने अपने दिल्ली सम्मेलन में राजनीतिक प्रश्नों पर आंदोलन चलाने के लिए कांग्रेस को पूर्ण समर्थन देने का निर्णय किया। दिल्ली में 22-23 नवंबर 1919 ई. को अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन में जुझारू गुट के हसरत मोहानी ने पहली बार ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग की खुलकर वकालत की और अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया। खिलाफत नेता हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अत्यंत उत्सुक थे, क्योंकि असहयोग आंदोलन के लिए सरकारी सेवाओं और परिषदों का बहिष्कार करना आवश्यक था, जो हिंदुओं के सहयोग के बिना संभव नहीं था। हिंदुओं का सहयोग सुनिश्चित करने के लिए दिसंबर 1919 ई. में मुस्लिम लीग ने बकरीद पर गोकशी न करने का भावनापूर्ण आह्वान किया।

वायसरॉय से भेंट और निराशा

दिसंबर 1919 ई. में गांधीजी ने कांग्रेसी नेताओं के साथ खिलाफत नेताओं से मिलकर मुसलमानों की समस्या पर विस्तृत विचार-विमर्श किया। 19 जनवरी 1920 ई. को डॉ. अंसारी की अध्यक्षता में हिंदुओं तथा मुसलमानों का एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल वायसरॉय चेम्सफोर्ड से मिलकर खिलाफत के प्रश्न के समाधान की माँग रखने गया, किंतु वायसरॉय ने इस प्रतिनिधिमंडल को कोई संतोषजनक आश्वासन नहीं दिया। इसके पश्चात् मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भी भेजा गया, परंतु उसे भी कोई विशेष सफलता नहीं मिली। ब्रिटिश सरकार की इस उपेक्षापूर्ण नीति ने भारतीय मुसलमानों में आक्रोश को और अधिक भड़काया।

सरकार के विरुद्ध असहयोग

20 फरवरी 1920 ई. को कलकत्ता में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता में खिलाफत सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसके आधार पर 19 मार्च 1920 ई. को संपूर्ण भारत में ‘खिलाफत दिवस’ मनाया गया। उसी अवधि में गांधीजी ने ऐतिहासिक घोषणा की कि खिलाफत का प्रश्न संवैधानिक सुधारों तथा पंजाब के अत्याचारों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। खिलाफत नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया कि यदि युद्धोत्तर शांति-शर्तें मुसलमानों के लिए प्रतिकूल रहीं, तो वे सरकार के साथ सभी प्रकार का सहयोग बंद कर देंगे।

शौकत अली ने अप्रैल 1920 ई. में अंग्रेजों को खुले शब्दों में चेतावनी दी कि यदि वे भारतीय मुसलमानों की भावनाओं का सम्मान नहीं करते, तो “हम असहयोग का एक संयुक्त हिंदू-मुस्लिम आंदोलन शुरू करेंगे।” शौकत अली ने यह भी स्पष्ट किया कि गांधीजी, जिनका मुसलमान और हिंदू दोनों समान आदर करते हैं, इस आंदोलन के नेता होंगे। गांधीजी ने भी ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि यदि तुर्की के साथ शांति-संधि की शर्तें भारतीय मुसलमानों को संतुष्ट नहीं करतीं, तो वे असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर देंगे।

15 मई 1920 ई. को तुर्की के साथ सेव्रेस की संधि की कठोर शर्तें सार्वजनिक हुईं, जिन्हें देखकर मुसलमान भयभीत और आक्रोशित हो उठे। 28 मई 1920 ई. को पंजाब के उपद्रवों से संबंधित हंटर आयोग की बहुमत-रिपोर्ट भी सामने आई। इसी क्रम में 30 मई 1920 ई. को खिलाफत कमेटी की बैठक में खिलाफत आंदोलन को गांधीजी द्वारा प्रारंभ किए जाने वाले असहयोग आंदोलन में सम्मिलित करने की ऐतिहासिक घोषणा की गई। अब गांधीजी ने कांग्रेस पर तीन मुद्दों- पंजाब के अत्याचार, खिलाफत का प्रश्न और स्वराज पर केंद्रित एक समन्वित कार्यक्रम बनाने के लिए ज़ोर दिया।

असहयोग का संयुक्त कार्यक्रम: खिलाफत और कांग्रेस का ऐतिहासिक मिलन

इलाहाबाद में 1 से 3 जून 1920 ई. के बीच केंद्रीय खिलाफत समिति की एक महत्त्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें कांग्रेस और खिलाफत के अनेक प्रमुख नेताओं ने भाग लिया। इस बैठक में सरकार के साथ असहयोग का एक व्यापक कार्यक्रम घोषित किया गया, जिसमें सरकारी उपाधियों का बहिष्कार, समस्त सरकारी नौकरियों का बहिष्कार और करों की नाअदायगी सम्मिलित था। इसके पश्चात् 9 जून 1920 ई. को इलाहाबाद में एक सर्वदलीय सम्मेलन में सर्वसम्मति से स्कूलों, कॉलेजों और न्यायालयों के बहिष्कार का कार्यक्रम बनाया गया और गांधीजी को इस आंदोलन का नेतृत्व करने का अधिकार सौंपा गया।

गांधीजी ने 22 जून 1920 ई. को वायसरॉय को एक ऐतिहासिक नोटिस भेजा: “कुशासन करने वाले शासक को सहयोग देने से इनकार करने का अधिकार हर व्यक्ति को है। सम्राट की सरकार ने खिलाफत के मामले में कपट, अनैतिकता और अन्यायपूर्ण आचरण किया है। ऐसी सरकार के लिए मेरे मन में न आदर रह सकता है और न ही सद्भाव।” महात्मा गांधी ने 1 अगस्त 1920 ई. को असहयोग आंदोलन के साथ खिलाफत आंदोलन को भी औपचारिक रूप से जोड़ दिया (इसी दिन बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हुई थी) और इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक नए और ऐतिहासिक चरण का श्रीगणेश हुआ। सितंबर 1920 ई. में कांग्रेस के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में इस असहयोग कार्यक्रम को औपचारिक स्वीकृति दी गई और दिसंबर 1920 ई. के नागपुर अधिवेशन में इसे पुनः पुष्ट किया गया।

खिलाफत आंदोलन का असहयोग आंदोलन में विलय

इस प्रकार खिलाफत आंदोलन व्यावहारिक रूप से असहयोग आंदोलन का एक अभिन्न अंग बन गया। यद्यपि फरवरी 1922 ई. में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी ने खिलाफत आंदोलन को गहरा धक्का लगा, फिर भी खिलाफत आंदोलन किसी प्रकार अपनी गति बनाए रखने का प्रयास करता रहा। चौरी-चौरा में 4 फरवरी 1922 ई. को उत्तेजित भीड़ द्वारा थाने में आग लगा दिए जाने और 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु की घटना ने गांधीजी को मर्माहत कर दिया और उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने की घोषणा की, जिससे खिलाफत नेताओं सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं में गहरी निराशा और क्रोध उत्पन्न हुआ।

इसके पश्चात् तुर्की में स्वयं एक नाटकीय राजनीतिक परिवर्तन आया। मुस्तफा कमाल पाशा (अतातुर्क) के नेतृत्व में यूनानी सेनाओं को पराजित करने के बाद तुर्की ने 24 जुलाई 1923 ई. को लॉज़ेन की संधि के द्वारा सेव्रेस की अपमानजनक संधि को अस्वीकार कर दिया और एक स्वाभिमानी गणतंत्र की स्थापना की। इससे पूर्व नवंबर 1922 ई. में ही तुर्की की सल्तनत समाप्त की जा चुकी थी। तत्पश्चात् 3 मार्च 1924 ई. को मुस्तफा कमाल पाशा ने स्वयं तुर्की में खलीफा के पद को भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार वह धार्मिक और राजनीतिक संस्था, जिसकी रक्षा के लिए भारतीय मुसलमानों ने यह संघर्ष चलाया था, स्वयं तुर्की में ही अप्रासंगिक हो गई और खिलाफत आंदोलन का आधार ही समाप्त हो गया।

कांग्रेस-खिलाफत गठबंधन का औचित्य

अनेक इतिहासकारों ने कांग्रेस-खिलाफत गठबंधन की इस आधार पर तीखी आलोचना की है कि गांधीजी ने अखिल भारतीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सर्व-इस्लामी भावना का उपयोग किया, जबकि अलीबंधुओं ने अखिल भारतीयता को सर्व-इस्लामी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया। आलोचकों का कहना है कि जब यह सुविधाजनक गठबंधन टूटा तो दोनों अपने-अपने वास्तविक रूप में वापस आ गए।

इतिहासकार खालिद बिन सईद का कहना है : “मुसलमान भारत की स्वतंत्रता के लिए उतना नहीं लड़ रहे थे जितना इसलिए कि तुर्की में खिलाफत को बनाए रखा जाए। उधर गांधीजी खिलाफत को एक ऐसे हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे जिससे स्वराज्य की दिशा में भारत की गति तेज़ की जा सके।” आर.सी. मजूमदार के शब्दों में : “सर्व-इस्लामी आंदोलन स्वयं भारतीय राष्ट्रवाद पर प्रहार था।” इन आलोचकों का यह भी तर्क है कि भारत स्वयं तो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था, दूसरी ओर गांधीजी खिलाफत आंदोलन को समर्थन देकर अरब के लोगों को सामंती सत्ता के अधीन बनाए रखने में सहायक बन रहे थे। एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यह था कि स्वयं तुर्की में ही खिलाफत का विरोध हो रहा था और युवा-तुर्क निरंतर खलीफा की शक्ति को चुनौती दे रहे थे। तुर्की के लोग इस भारतीय आंदोलन को मध्ययुगीन भावुकता मानते थे।

किंतु इस आलोचना का एक तर्कसंगत उत्तर भी है। गांधीजी की दृष्टि में हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना स्वराज्य प्राप्त करना असंभव था। गांधीजी ने स्वयं कहा था : “मैं जिन्ना के विचार से सहमत हूँ कि हिंदू-मुसलमान एकता का अर्थ स्वराज्य है। जब तक भारत में हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे से घुल-मिल नहीं जाते, भारत के लिए स्वराज्य एक असंभव सपना बना रहेगा।” ब्रिटिश सरकार भी भलीभाँति जानती थी कि यदि हिंदू और मुसलमान एक हो गए तो भारत पर शासन करना अत्यंत कठिन होगा। तत्कालीन परिस्थितियों में गांधीजी का प्रमुख उद्देश्य हिंदुओं और मुसलमानों को एकजुट करके भारत की संपूर्ण जनशक्ति को राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम में लगाना था। इस उद्देश्य की दृष्टि से उनकी इस रणनीति को निराधार नहीं कहा जा सकता।

खिलाफत आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व

खिलाफत आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह था कि इसने हिंदुओं और मुसलमानों को एक साझे राजनीतिक मंच पर एकजुट किया। यद्यपि इस आंदोलन का मूल उद्देश्य खिलाफत संस्था को बचाना और भारतीय मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना था, तथापि इससे हिंदू-मुस्लिम एकता और परस्पर सहयोग को अभूतपूर्व बढ़ावा मिला। इस आंदोलन में हिंदुओं ने मुसलमानों का कंधे-से-कंधा मिलाकर साथ दिया, जिससे कुछ समय के लिए सांप्रदायिक तनाव में उल्लेखनीय कमी आई।

इस आंदोलन ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एकजुटता की भावना को एक नई ऊँचाई दी। पहली बार बड़ी संख्या में मुसलमान जनता कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकृष्ट हुई। मौलाना महमूद-उल-हसन जैसे उलेमाओं ने ‘रेशमी रुमाल षड्यंत्र’ (सिल्क लेटर मूवमेंट) के माध्यम से पहले ही ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों में भाग लिया था और वे भी खिलाफत आंदोलन से जुड़े। देवबंद के उलेमाओं ने खिलाफत आंदोलन को धार्मिक वैधता प्रदान की और कांग्रेस के साथ सहयोग का मार्ग चुना। इस आंदोलन ने अंततः राष्ट्रीय आंदोलन को एक अखिल भारतीय जन-आंदोलन का रूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भले ही यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य में असफल रहा, परंतु भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में इसका स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अविस्मरणीय है।

खिलाफत आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1: खिलाफत आंदोलन क्या था?

खिलाफत आंदोलन 1919 से 1924 ई. के बीच भारत में चलाया गया एक धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन था। इसका उद्देश्य प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् मित्र-राष्ट्रों द्वारा उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य के विघटन और तुर्की के सुल्तान-खलीफा की प्रतिष्ठा पर हुए आघात के विरुद्ध प्रतिरोध करना तथा खिलाफत संस्था को पुनर्स्थापित करना था।

प्रश्न 2: खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता कौन थे?

इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली (अलीबंधु), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खाँ, हसरत मोहानी और डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी प्रमुख थे। महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को सक्रिय समर्थन देकर इसे असहयोग आंदोलन से जोड़ा।

प्रश्न 3: भारत में खिलाफत आंदोलन क्यों शुरू हुआ?

प्रथम विश्वयुद्ध में उस्मानी साम्राज्य की पराजय के बाद मित्र-राष्ट्रों द्वारा तुर्की पर सेव्रेस की अपमानजनक संधि थोपे जाने और खलीफा की स्थिति को नष्ट किए जाने से भारतीय मुसलमानों में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ। इसके साथ ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज द्वारा युद्धकाल में दिए गए वचनों का उल्लंघन भी इस आंदोलन का प्रमुख कारण था।

प्रश्न 4: खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन का क्या संबंध था?

महात्मा गांधी ने खिलाफत नेताओं के साथ सहयोग करते हुए 1 अगस्त 1920 ई. को असहयोग आंदोलन को खिलाफत आंदोलन से औपचारिक रूप से जोड़ा। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक संयुक्त जन-आंदोलन खड़ा करना और हिंदू-मुस्लिम एकता को राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित करना था।

प्रश्न 5: खिलाफत आंदोलन का अंत कैसे हुआ?

1922 ई. में चौरी-चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन की वापसी से खिलाफत आंदोलन को गहरा धक्का लगा। तत्पश्चात् 1923 ई. में मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में तुर्की में सेव्रेस की संधि अस्वीकार कर दी गई और गणतंत्र की स्थापना हुई। अंततः 3 मार्च 1924 ई. को स्वयं तुर्की सरकार द्वारा खिलाफत संस्था को समाप्त कर दिए जाने से इस आंदोलन का आधार ही नष्ट हो गया और खिलाफत आंदोलन का पूर्ण अवसान हो गया।

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