भारत में ब्रिटिश सत्ता के प्राथमिक प्रतिरोध (Primary Resistance of The British Power in India)

भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना महज एक घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के औपनिवेशीकरण तथा धीरे-धीरे उसको दबाये रहने की लंबी प्रक्रिया का नतीजा थी। इस प्रक्रिया ने हर स्तर पर भारतीय समाज में असंतोष और क्षोभ को जन्म दिया, जिसके कारण अंग्रेजों को लगातार छिटपुट प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा था। ब्रिटिश राज की पहली सदी के दौरान सबसे पहले होनेवाले इस प्राथमिक प्रतिरोध को कभी-कभी ‘‘पुनःप्रतिष्ठा विद्रोह’’ (रिस्टोरेटिव रिबेलियंस) भी कहा जाता है। इसका कारण यह है कि इनका आरंभ असंतुष्ट स्थानीय शासकों, मुगल अधिकारियों और संपत्ति से वंचित जमींदारों, भूस्वामियों और पोलिगारों ने किया। अधिकांश मामलों में विद्रोहियों को स्थानीय किसानों का समर्थन मिला, जिनका उद्देश्य पुरानी व्यवस्था को या पहले के खेतिहर संबंधों को बहाल करना था। इस क्रम में 1778-81 के दौरान अवध के राजा चेतसिंह और दूसरे जमींदारों के विद्रोह का और उसके बाद 1799 में अवध के अपदस्थ नवाब वजीरअली के विद्रोह की गणना की जा सकती है।

किंतु अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विस्थापित राजाओं, नवाबों, जमींदारों, पोलिगारों के नेतृत्व में केवल किसानों, दस्तकारों और राजाओं तथा नवाबों की विघटित सेना के सैनिकों ने ही भाग नहीं लिया, बल्कि जंगलों, पहाड़ों और उसके आसपास रहने वाले आदिवासियों ने भी अंग्रेज घुसपैठियों की दमनकारी नीतियों, ‘बाहरी’ महाजनों, साहूकारों और ब्रिटिश अधिकारियों की ज्यादतियों के विरुद्ध हथियार उठाये।

सशस्त्र प्रतिरोध के कारण

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सशस्त्र प्रतिरोध करते आदिवासी

अर्थव्यवस्था और प्रशासन में परिवर्तन

ब्रिटिश राज द्वारा अर्थव्यवस्था, प्रशासन और भू-राजस्व प्रणाली में जिस तेजी से परिवर्तन किये गये, उससे इन विद्रोहों ने जन्म लिया। ब्रिटिश राज की अधिक से अधिक लगान वसूलने और उसकी दरें बढ़ाते रहने की औपनिवेशिक नीति के कारण हजारों जमींदारों और पोलिगारों को अपनी जमीन और उससे मिलने वाले राजस्व से हाथ धेना पड़ा, क्योंकि ब्रिटिश राज ने या तो उनसे लगान-वसूली का अधिकार छीन लिया या फिर आसमान छूती दरों के हिसाब से लगान न चुका पाने के कारण उन्हें विवश होकर जमीन के अपने अधिकार बेचने पड़े थे।

सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभुत्व पर चोट

जब सरकारी अधिकारियों और नवधनाढ्य व्यापारियों और महाजनों ने इन जमींदारों और पोलिगारों की सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभुत्व पर भी कब्जा जमा लिया, तो उनके अहं को गंभीर चोट पहुँची। इसी तरह अपनी रियासतों से वंचित किये गये राजाओं और नवाबों को भी नये शासकों से अपने-अपने हिसाब चुकता करने थे ताकि वे अपनी पुरानी आर्थिक, राजनीतिक हैसियत फिर से हासिल कर सकें। राजाओं और नवाबों की तरह ही संपत्ति और अधिकारों से वंचित जमींदारों और पोलिगारों में भी यही गुस्सा था और वे भी अपनी खोई हुई हैसियत वापस पाना चाहते थे।

मालगुजारी की भारी माँग

अठारहवीं शताब्दी के अंतिम या उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भारत में कंपनी की सरकार के भूमि सुधारों ने और मालगुजारी की भारी माँगों ने पूरी ग्रामीण आबादी को इतनी बुरी तरह प्रभावित किया कि देश के विभिन्न भागों में किसान वर्ग के सभी हिस्सों ने अनेक हिंसक प्रतिरोधों में भाग लिया। औपनिवेशिक पूर्व भारत की खेतिहर अर्थव्यवस्था जीवन-निर्वाह की सोच पर आधारित थी। किसान इससे नहीं परेशान होते थे कि उनसे कितना वसूल किया जा रहा है, दुर्लभता के माहौल में यदि उनकी मौलिक आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त पैदावार छोड़ दी जाती थी, तो भी वे विद्रोह नहीं करते थे।

किंतु लगान की ऊँची दरों के कारण किसान या तो कर्ज के बोझ तले दबते चले गये या उन्हें अपनी जमीन बेचने पर मजबूर होना पड़ा। नये भूस्वामियों ने किसानों को जो जमीन पट्टे पर दी, उनका किराया इतना बढ़ा दिया कि उसे चुका पाना किसानों के बस की बात नहीं थी और किराया न चुका पानेवालों को नये भूस्वामी बिना किसी हिचकिचाहट के बेदखल कर देते थे। इससे किसानों के जीवन-निर्वाह के बंदोबस्त प्रभावित हुए और फिर बार-बार किसान विद्रोह फूटे। दूसरे शब्दों में ‘मालगुजारी की भारी माँग के कारण किसानों को ़ऋण की आवश्यकता पड़ी, जिससे ग्रामीण समाज के ऊपर सूदखोरों और सौदागरों का प्रभाव बढ़ा, जमीनों से बेदखलियाँ होने लगीं और जमीनें गैर-खेतिहर वर्ग के हाथों में जाने लगीं और इस तरह जमींदार, सूदखोर और राज्य किसान पर प्रभुत्व का एक संश्लिष्ट बन गये।’

मींदार-दरोगा गठजोड़

पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका में निचले स्तरों पर व्याप्त भ्रष्टाचार और ‘जमींदार-दरोगा गठजोड़’ से किसानों की परेशानियाँ बहुत बढ़ गई थीं। नये कानूनी तंत्र और अदालतों ने गरीब किसानों की जमीनों की बेदखली को और भी बढ़ावा दिया। लगान, किराया या ब्याज की वसूली के लिए किसानों पर तरह-तरह के जुल्म किये जाते थे। पुलिस की जब मर्जी होती, लोगों को लूटती, तरह-तरह के अत्याचार करती और मनमाना शोषण करती थी। 1859 में विलियम एडवर्ड्स ने लिखा था: ‘‘पुलिस जनता की उत्पीड़क हो गई है और हमारी सरकार के प्रति असंतोष का मुख्य कारण पुलिस द्वारा ढ़ाये जानेवाले जुल्म हैं।’’

मुक्त व्यापार की नीति

ब्रिटिश शासकों की मुक्त व्यापार की नीति और भारतीय उत्पादकों से मनमाने ढ़ंग से शुल्क वसूल किये जाने से भारतीय दस्तकारी उद्योग भी पूरी तरह चैपट हो गये, जिससे लाखों दस्तकारों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। राजाओं, नवाबों और जमींदारों की बदहाली के कारण अब दस्तकारी के सामानों के लिए ग्राहक भी मिलने मुश्किल हो गये, जिससे यह उद्योग बुरी तरह टूट गया।

ब्रिटिश शासन का विदेशीपन

धार्मिक नेताओं और परंपरागत रूप से बौद्धिक तबके ने विदेशी शासन के प्रति घृणा भड़काने और विद्रोह को उपजाने में सक्रिय भूमिका निभाई। सत्ताच्युत् राजाओं और नवाबों की हैसियत अब ऐसी नहीं रह गई थी कि वे कवियों, लेखकों, संगीतकारों या अन्य कलाकारों और पुजारियों, पंडितों, मौलवियों आदि का पालन कर सकें। इन विद्रोहों का एक कारण ब्रिटिश शासन का विदेशीपन भी था। विदेशियों के पैरों तले दबे हुए भारत के परंपरावादी तत्त्व अपने-आपको अपमानित महसूस करते थे और वे किसी भी कीमत पर विदेशियों को भारत से निकालना चाहते थे।

धार्मिक कारण

इस काल के विभिन्न प्रतिरोधों में धर्म की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही और इसने एकता के सूत्र का काम किया। पूँजीवाद-पूर्व समाजों में जहाँ वर्गीय चेतना कम विकसित थी, धर्म ने विद्रोह की विचारधारा प्रस्तुत की, जैसे- बंगाल के संन्यासी-फकीर विद्रोह, दक्षिण भारत के मोपला विद्रोह, फरैजी आंदोलन, वहाबी आंदोलन आदि। शुरूआत में इन आंदोलनों का स्वरुप धार्मिक था, परंतु बाद में किसान, जमींदारों और शोषकों के विरुद्ध एकत्रित हुए।

विद्रोहों का आरंभ

बंगाल और बिहार में ब्रिटिश राज की स्थापना के साथ विद्रोहों का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अंग्रेजी शासन के फैलाव के साथ ही विस्तृत होता गया। शायद ही कोई ऐसा वर्ष रहा हो, जब देश में अंग्रेजों के विरुद्ध कहीं कोई सशस्त्र प्रतिरोध न किया गया हो और शायद ही ऐसा कोई दशक गुजरा होगा, जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ कोई बड़ा विद्रोह न हुआ हो। 1763 से 1856 के बीच देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ 40 से भी ज्यादा बड़े विद्रोह हुए।6 छोटे विद्रोहों की तो कोई गिनती ही नहीं थी।

संन्यासी-फकीर विद्रोह (1763-1800)

पूर्वी क्षेत्र बंगाल में बेदखल किये गये किसानों, राजाओं और नवाबों की विघटित फौजों के सिपाहियों ने सबसे पहले सत्ताच्युत् जमींदारों और धार्मिक नेताओं के नेतृत्व में संन्यासी विद्रोह की नींव डाली। इस विद्रोह ने 1763 से 1800 के बीच उत्तरी बंगाल को और बिहार के साथ लगे क्षेत्रों को हिलाकर रख दिया। अपनी लड़ाकू परंपरा के लिए विख्यात दसनामी संन्यासी भू-स्वामी थे, सूद पर पैसा चलाते थे तथा कच्चे रेशम, खुदरा मालों, खुरदुरे कपड़ों, ताँबे और मसालों का व्यापार करते थे।

शाहे मदार के आरंभ किये हुए सूफी सिलसिले से अपना नाता जोड़नेवाले मदारी फकीरों को मुगलकाल में ‘माफी’ की (लगानमुक्त) जमीनें मिली थी, और उनके अपने सशस्त्र अनुयायी होते थे। इन दोनों धार्मिक समूहों की उल्लेखनीय दार्शनिक निकटता, उनके आपसी संबंधों, सांगठनिक और अनुयायियों से संवाद ने विद्रोहियों की लामबंदी में सहायता पहुँचाई। हथियारबंद घुमक्कड़ संन्यासियों के ये समूह कंपनी की मालगुजारी की भारी माँगों, माफी की जमीनों की जब्ती और व्यापार पर एकाधिकार से असंतुष्ट थे। कंपनी की सरकार भी हथियारबंद संन्यासियों के गिरोह को सहन करने के लिए तैयार नहीं थी।

जब अंग्रेजों द्वारा तीर्थस्थानों में आने-जाने पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा दिये गये, तो संन्यासी-फकीर समूह ने 1763 में जनता के सहयोग से कंपनी की कोठियों तथा कोषागारों पर आक्रमण कर सरकारी खजाने को लूटना शुरू कर दिये। इनमें संन्यासी मोहनगिरि और भवानी पाठक प्रमुख थे। 1769-70 में अकाल से पीडि़त जनता, छोटे जमींदारों, बेरोजगार सिपाहियों और गाँवों के गरीबों के कारण विद्रोही भागीदारों की संख्या 50,000 तक पहुँच गई। संन्यासी-फकीर समूह और ईस्ट इंडिया कंपनी के सशस्त्र बलों के बीच 1800 तक बंगाल और बिहार के एक व्यापक क्षेत्र में बार-बार संघर्ष होते रहे। अंत में, वारेन हेस्टिंग्स को एक लंबे अभियान के बाद ही संन्यासी-फकीर विद्रोह को दबाने में सफलता मिल सकी। संन्यासियों के विद्रोह का उल्लेख बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी कृति ‘आनंद मठ’ में किया है।

रंगपुर विद्रोह (1783)

बंगाल के उत्तर जिलों में 1783 का रंगपुर विद्रोह किसानों के प्रतिरोध का आदर्श उदाहरण है। मालगुजारी की वसूली के ठेकोंवाले आरंभिक दिनों में मालगुजारी की भारी माँग करके और अकसर अवैध करों की वसूली करके मालगुजार और कंपनी के अधिकारी किसानों का दमन करते थे। देवीसिंह या गंगागोविंद सिंह जैसे मालगुजारों ने रंगुपर और दिनाजपुर जिलों के गाँवों में आतंक मचा रखा था। किसानों ने अपने उद्धार के लिए पहले कंपनी सरकार को प्रार्थना-पत्र दिया, किंतु जब न्याय नहीं मिला, तो उन्होंने अपने-आपको संगठित किया, अपना एक नेता चुना, एक बड़ी सेना तैयार की, आदिम तीर-कमानों और तलवारों से स्वयं को लैस किया, स्थानीय कचहरी पर हमला किया, अनाज के गोदाम लूटे और कैदियों को जबरन छुड़ा लिया। उन्होंने अपने नेता को ‘नवाब’ कहा, अपनी सरकार बनाई और आंदोलन का खर्च उठाने के लिए कर वसूल किये। देवीसिंह की अपील पर वारेन हेस्टिंग्स के काल में विद्रोह का दमन किया गया, किंतु निर्मम दमन के बाद मालगुजारी-ठेका की व्यवस्था में कुछ सुधार भी किये गये।

पागलपंथी विद्रोह (1825-50)

पागलपंथ एक अर्ध-धार्मिक संप्रदाय था। इसका प्रभाव-क्षेत्र पूर्वी बंगाल के मेमनसिंह जिले के शेरपुर परगने में था। इस क्षेत्र में करीमशाह और उसके वारिस टीपूशाह ने गारो, हजांग और हादी जैसे हिंदू रंग में रंगे कबीलों के बीच एक नये धार्मिक आंदोलन को आरंभ किया। कंपनी के शासन के अधीन जब इस क्षेत्र में स्थायी बंदोबस्त के तहत जमींदारी व्यवस्था और मजबूत हुई, तो जमींदारों द्वारा वसूले जा रहे अवैध ‘अबवाब’ (करों) और डिप्टी कलेक्टर डनबर द्वारा किये गये नये मालगुजारी बंदोबस्त के विरुद्ध किसानों में असंतोष फैल गया। 1824 के आसपास टीपू के पागलपंथी संप्रदाय ने एक नई व्यवस्था और न्यायसंगत लगानों का वादा किया। धीरे-धीरे यह नई भावना पूरे क्षेत्र में फैल गई और इसने हथियारबंद विद्रोह का रूप ले लिया। टीपू ने 1825 में शेरपुर पर अधिकार कर लिया और अपने-आपको राजा घोषित कर दिया। इन विद्रोहियों ने गारो की पहाडि़यों तक उपद्रव किये, जिसको 1833 में सेना की मदद से ही कुचला जा सका। फिर भी, इस क्षेत्र में 1850 तक छिटपुट उपद्रव होते रहे।

नायक विद्रोह (1806-16)

बंगाल में मेदिनीपुर जिले में जब 1806 में कंपनी सरकार ने रैयतों (नायकों) पर बढ़ी हुई दर से लगान चुकाने के लिए दबाव डाला और उनकी जमीनें जब्त कर ली, तो इसका प्रतिरोध करते हुए नायकों ने कंपनी के खिलाफ छापामार युद्ध शुरू कर दिया। इस विद्रोह का नेतृत्व अचलसिंह ने किया, जिन्होंने नायकों को सैनिक प्रशिक्षण देकर एक कुशल सेना तैयार कर ली थी। यह विद्रोह 1816 तक चलता रहा।

फरैजी विद्रोह (1838-57)

फरैजी घुमंतू धार्मिक मुसलमानों का एक समूह था, जो बंगाल के फरीदपुर के निवासी हाजी शरीअतुल्लाह द्वारा चलाये गये संप्रदाय के अनुयायी थे। यह आंदोलन देसी मूल का था। इसने सभी गैर-इस्लामी आचार-विचार को निकाल बाहरकर कुरान को मुसलमानों का एक मात्र आध्यात्मिक मार्गदर्शक ठहराया। इस आंदोलन का महत्त्व इसकी सामाजिक जड़ों में निहित था, क्योंकि पूर्वी बंगाल के गरीब ग्रामीण मुसलमान इस धार्मिक संघ में एकजुट हुए, और उन्होंने जमींदारों, निलहे साहबों और ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध विद्रोह किये। यद्यपि उनके गुस्से के शिकार मुख्यतः हिंदू जमींदार हुए, किंतु मुसलमान जमींदार भी अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करते थे।

शरीअतुल्लाह की मृत्यु (1839) के बाद उसके बेटे दादू मियाँ (1819-60) ने एक समतावादी विचारधारा के आधार पर किसानों को एकजुट किया। उसने घोषणा की कि सारी जमीन अल्लाह की है और इस कारण उस पर लगान या कर वसूल करना खुदाई कानून के विरुद्ध है। दादू मियाँ ने फरीदपुर, बाकरगंज, ढाका, पबना, टिपरा, जैसोर और नोआखली जिलों में ग्राम स्तर के संगठनों का जाल बिछाया। उसने ब्रिटिश न्यायिक संगठनों के विकल्प रूप में स्थानीय अदालतें लगाई और अपने आंदोलन का खर्च चलाने के लिए कर वसूल किया। बाद में, 1838 से 1857 तक मजनूँशाह एवं चिरागअली शाह जैसे फकीरों के नेतृत्व में फरैजियों का जमींदारों और निलहों के साथ निरंतर टकराव होता रहा।

विजयनगरम् का विद्रोह (1794)

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1765 में उत्तरी सरकार के जिलों को प्राप्त कर लिया था। 1794 में कंपनी ने विजयनगरम् के राजा को अपनी सेना भंग कर देने का आदेश दिया और तीन लाख रुपये की माँग की। जब राजा ने कंपनी की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, तो कंपनी बहादुर ने उसकी जागीर छीन ली। विवश होकर राजा ने 1794 में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में राजा को अपनी प्रजा और सेना का भरपूर समर्थन मिला। राजा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए मारा गया। अंततः कंपनी ने राजा के बड़े पुत्र को जागीर वापस कर दी और धन की माँग भी कम कर दी।

पोलिगारों का विद्रोह (1790-56)

तमिलनाडु (मलाबार) के पोलिगारों ने ब्रिटिश साम्राज्य की भूमिकर-व्यवस्था के विरोध में 1790 में वीर कट्टबोम नायकन नामक पांड्यगार (किलों के अधिपति) के नेतृत्व में विद्रोह किया था। उत्तरी अर्काट के तिरुनेल्वेली जिले में और आंध्र के अभ्यर्पति जिलों में 1799 से 1805 के बीच मद्रास सरकार को स्थानीय सरदारों ;पोलिगारोंद्ध का कड़ा विद्रोह झेलना पड़ा। कंपनी की सरकार पोलिगारों को केवल सैन्य-सेवा के बदले बंदोबस्त पानेवाला जमींदार मानती थी, जबकि  स्थानीय किसान समाज में वे ऐसे प्रभुता संपन्न शासक समझे जाते थे, जिन्होंने सत्ता मुगलों से पहले के विजयनगर साम्राज्य से विरासत में पाई थी। इसलिए उन्होंने जब कंपनी के दस्तों का विरोध किया, तो स्थानीय किसान समाज ने न केवल उनका खुलकर समर्थन किया, बल्कि उनको लोकनायक माना। मद्रास प्रेसीडेंसी में पोलिगारों के छिटपुट विद्रोह 1856 तक होते रहे।

विशाखापत्तनम् के विद्रोह (1793-1834)

मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत विशाखापत्तनम् जिले में विद्रोहों की एक लंबी शंृखला थी। पालकांडा के जमींदार विजयराम राजे ने 1793 से 1796 के बीच अंग्रेजों के साथ कई छिटपुट लड़ाइयाँ लड़ी थीं। इसके बाद 1821-31 के बीच पालकांडा के जमींदार ने राजस्व-वसूली के प्रश्न पर और 1830 में विशाखापत्तनम् के जमींदार वीरभद्र राजे ने पेंशन के सवाल पर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। विशाखापत्तनम् के ही एक अन्य जमींदार जगन्नाथ राजे ने भी उत्तराधिकार के विवाद में अंग्रेजों के हस्तक्षेप के कारण 1832-34 में विद्रोह किया।

दीवान वेलुथंपी का विद्रोह (1805-09)

दक्षिण में 1805 में लार्ड वेलेजली ने ट्रावनकोर के महाराजा पर सहायक संधि थोप दिया था। महाराजा संधि की शर्तों से नाराज थे, इसलिए उन्होंने सहायक कर नहीं चुकाया, जिससे उन पर यह धन बकाया होता चला गया। ब्रिटिश रेजीडेंट के घृष्टतापूर्ण व्यवहार के कारण त्रावनकोर रियासत के दीवान वेलुथंपी ने 1805 में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह कर दिया, जिसकी कमान में पेशेवर सिपाहियों और किसान स्वयंसेवकों की एक बड़ी सेना थी। वेलुथंपी ने 1808 में फ्रांस एवं अमेरिका से भी अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता के लिए संपर्क स्थापित किया। अंत में, 1809 में कंपनी ने एक बड़ी सैन्य-टुकड़ी की सहायता से विद्रोह को कुचल दिया।

कित्तूर विद्रोह (1824)

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कित्तूर ;वर्तमान कर्नाटकद्ध को स्वतंत्र राज्य मान लिया था। किंतु 1824 में जब कित्तूर के स्थानीय शासक शिवलिंग रुद्र की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसके गोद लिए उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इनकार कर दिया, तो कित्तूर के शासक की विधवा महारानी चेनम्मा ने रायप्पा की सहायता से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों के खिलाफ रानी चेनम्मा ने अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया, लेकिन वह लंबे समय तक अंग्रेजी सेना का मुकाबला नहीं कर सकी। अंततः कंपनी सरकार ने इस विद्रोह को भी निर्दयतापूर्वक कुचल दिया। रानी चेनम्मा को कैदकर बेलहोंगल किले में रखा गया, जहाँ उनकी 21 फरवरी 1829 को मौत हो गई।

मैसूर का विद्रोह (1830-31)

मैसूर में टीपू सुल्तान की निर्णायक हार और मैसूर के पुराने राजघराने की पुनःस्थापना के बाद मालगुजारी की माँगें बढ़ा दी गईं, जिसका बोझ अंततः किसानों पर पड़ा। भ्रष्ट अधिकारियों की निर्मम लूट-खसोट से उनकी निराशाजनक स्थिति और भी बदतर हो गई, जिससे नागर प्रांत में उन्हें 1830-31 में खुले विद्रोह के लिए मजबूर होना पड़ा। विद्रोहियों ने अपने नेता के नेतृत्व में मैसूर के शासकों की सत्ता को ललकारा, किंतु वे आगे बढ़ रही ब्रिटिश सेना के आगे टिक नहीं सके।

मोपला विद्रोह (1836-54)

1840 और 1850 के दशकों में दक्षिण भारत के मलाबार क्षेत्र में मोपला विद्रोह एक ऐसा आंदोलन था, जिसमें धर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। मोपला उन अरब व्यापारियों (मुसलमानों) के वंशज थे, जो इस क्षेत्र मे बस गये थे और जिन्होंने यहाँ की नायर और तीयर स्त्रियों से विवाह किये थे। जब 1498 में पुर्तगालियों ने मलाबार में आकर वहाँ के मसालों के व्यापार पर अधिकार कर लिया था और बंदूक और तलवार के बल पर लोगों को ईसाई बनाने का सिलसिला आरंभ किया था, तभी से वहाँ के मुसलमानों (मोपलों) में श्वेतों के विरुद्ध तीव्र घृणा की भावना भरती आ रही थी। यह भावना 1580 के दशक में जैनुल-दीन के ‘तुहफतुल-मुजाहिदीन’ और ‘कोटुपलीमाला’ जैसे लोकगीतों में प्रतिबिंबित हुई थी। बाद में अछूत चेरुमरों ने भी बड़ी संख्या में इस नये धर्म को अपना लिया, जिन्हें समानता के व्यवहार और अपनी सामाजिक स्थिति में थोड़ी उन्नति की आशा थी।

परंपरागत व्यवस्था में जमीन की पैदावार जेनमी (भू-स्वामी), कनामदार (बँटाईदार) और खेतिहर (काश्तकार) के बीच बराबर बँट जाती थी। ब्रिटिश शासन भू-स्वामियों के अधिकारों पर बल देता था। उसने उच्च वर्ण के हिंदुओं, नंबूदरी और नायर जेनमियों (जिनमें से अनेक को टीपू सुल्तान ने खदेड़ दिया था) को जमीन का एकमात्र स्वामी मानकर बाकी दो श्रेणियों को पट्टेदारों और लगानदारों के स्तर तक गिरा दिया। इससे बहुसंख्यक मुस्लिम बँटाईदारों (कनामदारों) एवं काश्तकारों ;वेरूपत्तमदारोंद्ध वाले क्षेत्र में स्थिति और बिगड़ गई। इसका एक तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों में सामुदायिक एकजुटता बढ़ी। 1831 में मलाबार में 637 मस्जिदें थीं तो उनकी संख्या 1851 तक 1058 हो गई थी।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में अति आकलन, अवैध करों के भारी बोझ तथा न्यायपालिका और पुलिस के जमींदार-समर्थक रवैये के कारण दक्षिण मलाबार के इरनाड और वल्लुवनाड ताल्लुकों में हिंदू जेनमियों और अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह लगभग अंतहीन हो गया। 1836 और 1854 के बीच इस क्षेत्र में 22 विद्रोहों का उल्लेख मिलता है, जिसे ब्रिटिश सशस्त्र बल द्वारा ही कुचला जा सका। दमन के कृत्यों ने लगभग बीस वर्षों तक तो शांति बनाये रखी, किंतु 1870 में मोपले फिर भड़क उठे।

कुर्ग का विद्रोह (1833-34)

दक्षिण भारत में 1833-34 में कुर्गवासियों द्वारा अंग्रेजी सत्ता का प्रतिरोध संगठित नागरिक विद्रोह का उदाहरण है। यदि वहाँ के राजा ने जनता की तरह बहादुरी दिखाई होती, तो संभवतः अंग्रेजों की निर्णायक हार हुई होती। फलतः कुर्ग मई 1834 में ब्रिटिश राज्य में मिला लिया गया।

पाइक विद्रोह (1817-25)

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पाइक विद्रोह (1817-25)

पाइक लगान-मुक्त भूमि का उपयोग करनेवाले सैनिक थे। जब अन्य रियासतों की तरह अंग्रेजों ने उड़ीसा में भी भूमिकर में बेतहाशा वृद्धि कर सख्ती से कर वसूली का प्रयास किया, तो हजारों किसान अपनी खेती-बाड़ी छोड़कर जंगल में भागने लगे। किंतु स्थानीय पाइकों ने 1817-1825 के दौरान अपने नेता बक्शी जगबंधु के नेतृत्व में विद्रोह कर किया और खुर्दा जैसे स्थानों पर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को पराजित कर पुरी पर अधिकार कर लिया। बाद में यह विद्रोह शिथिल पड़ गया।

गंजाम विद्रोह (1800-1837)

1800-1805 के बीच हुए गंजाम-विद्रोह का नेतृत्व श्रीकर भंज ने किया। उसके बाद 1835 में उसके पुत्र धनंजय ने गुमसुर (मद्रास) की जमींदारी में लगान के बकाये के प्रश्न पर विद्रोह किया। 1835 में  धनंजय की मृत्यु के बाद आम जनता ने इस विद्रोह को जारी रखा। किंतु फरवरी 1837 में अंग्रेज इस विद्रोह को दबाने में सफल हो गये।

बघेरा विद्रोह (1818-20)

पश्चिम भारत के ओखा मंडल के बघेरों में आरंभ से ही अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध असंतोष व्याप्त था। किंतु जब बड़ौदा के गायकवाड़ ने अंग्रेजी सेना के सहयोग से इन लोगों से अधिक कर वसूल करने की कोशिश की, तो बघेरों ने 1818 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हथियार उठा लिये। यही नहीं, उन्होंने 1818-19 के बीच कंपनी अधिकृत प्रदेश पर भी आक्रमण किये। यह विद्रोह 1820 के आसपास समाप्त हो गया।

कच्छ का विद्रोह (1819-31)

कच्छ तथा काठियावाड़ में कंपनी सरकार के विरुद्ध संघर्ष का प्रमुख कारण कच्छ के राजा भारमल और झरेजा के समर्थक सरदारों में व्याप्त असंतोष था। 1819 में अंग्रेजों ने भारमल को पदच्युत् कर दिया और बाद में उसके स्थान पर उसके अल्पवयस्क पुत्र को शासक बना दिया। इस प्रदेश के शासन-संचालन के लिए एक प्रति-शासक परिषद् की स्थापना की गई, जो एक अंग्रेज रेजीडेंट के निर्देशन में कार्य करती थी। इस परिषद् द्वारा किये गये परिवर्तनों तथा भूमिकर में अत्यधिक वृद्धि के कारण जनता में असंतोष फैल गया था। जब बर्मा युद्ध में अंग्रजों के पराजय की खबर मिली, तो भारमल के समर्थकों ने 1819 में विद्रोह कर दिया और भारमल को पुनः शासक बनाने की माँग की। ब्रिटिश सरकार को इस विद्रोह का दमन करने के लिए लंबे समय तक सैनिक कार्यवाही करनी पड़ी। 1831 में पुनः विद्रोह हो गया और अंत में कंपनी ने अनुरंजन की नीति अपनाई।

रामोसी विद्रोह (1822-26)

पश्चिमी घाट ;पूनाद्ध में निवास करनेवाले रामोसी (मराठायुगीन पुलिस) अंग्रेजी शासन में बेरोजगार हो गये थे। इनके पास जो जमीन बची थी, उस पर अंग्रेजों ने लगान की दर बहुत बढ़ा दी थी। 1822 में अकाल और भूख से पीडि़त रामोसियों ने अपने सरदार चित्तरसिंह के नेतृत्व में सतारा के आसपास के क्षेत्रों को लूटा और किलों पर आक्रमण किया, किंतु यह विद्रोह दबा दिया गया। रामोसियों ने 1825-1826 में पुनः भयंकर अकाल और अन्नाभाव के कारण उमाजी के नेतृत्व में विद्रोह की आग जलाई, जो लगातार 1829 तक जलती रही। इसके बाद, 1870 के दशक में महाराष्ट्र के ‘राबिनहुड’ वासुदेव बलवंत फड़के ने रामोसी संघर्ष का नेतृत्व किया। बाद में दौलता के नेतृत्व में रामोसी 1883 तक अंग्रेजों से जूझते रहे।

सतारा विद्रोह (1840-41)

कंपनी सरकार ने जब सितंबर 1839 में सतारा के राजा राजप्रतापसिंह को पदच्युत् कर देश से निष्कासित कर दिया, तो पूरे प्रदेश में असंतोष फैल गया और 1840-41 में बड़े पैमाने पर दंगे हुए। विद्रोह का नेतृत्व नरसिंह दत्तात्रेय पेतकर धरराव पँवार ने किया। उन्होंने बहुत से सैनिकों को एकत्रित कर बादामी के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और अपने राजा का झंडा फहरा दिया। किंतु अंग्रेजी सेना ने प्रत्याक्रमण कर दुर्ग को वापस ले लिया और विद्रोहियों को कड़ा दंड दिया।

गडकरी विद्रोह (1844)

यह विद्रोह 1844 में महाराष्ट्र में गड़करी जाति के विस्थापित सैनिकों ने किया। गडकरी लोग भी मराठा-क्षेत्र के दुर्गों में सैनिक के रूप में काम करते थे, जिसके बदले उन्हें ‘करमुक्त’ जमीन मिला करती थी। 1844 के आसपास जब कंपनी बहादुर ने कोल्हापुर राज्य में प्रशासनिक पुनर्गठन के बहाने गडकरी सैनिकों की छंटनी शुरू की, तो गडकरियों ने बेरोजगारी के भय से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और समनगढ, कोल्हापुर एवं भूदरगढ़ के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। सरकारी खजाने लूट लिये गये और अंग्रेज रक्षक मार डाले गये। यही नहीं, कर्नल ओवांस को भी कैद कर लिया गया। बड़ी मुश्किल से अंग्रेज इस विद्रोह का दमन कर सके। बाबाजी अहीरेकर इस विद्रोह के प्रमुख नेताओं में से थे।

सावंतवाड़ी विद्रोह (1844)

अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध इस विद्रोह का नेतृत्व मराठा सरदार फोंड सावंत ने किया। उन्होंने अन्य सरदारों और देसाइयों, जिनमें अन्ना साहब प्रमुख थे, के साथ मिलकर 1844 में दक्कन के कुछ किलों पर अधिकार कर लिया। विद्रोहियों को एक विस्तृत सैन्य-कार्रवाई के बाद ही किले से बाहर खदेड़ा जा सका। बाद में कई विद्रोही गोवा भाग गये और कुछ बचे विद्रोहियों को पकड़कर कड़ी सजा दी गई।

बोहरा विद्रोह (1810)

एक सैनिक अधिकारी अब्दुर्रहमान ने बंबई प्रांत में 1810 में इस विद्रोह का नेतृत्व किया। उसने काफिरों को देश से बाहर निकालने का आश्वासन दिया। अब्दुर्रहमान ने सूरत के निकट एक ब्रिटिश किले पर अधिकार कर अपने को ‘मसीहा’ (माहदी) घोषित कर दिया।

बरेली का विद्रोह (1816)

बरेली के लोगों ने मुफ्ती मुहम्मद एवाज के नेतृत्व में स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों की ज्यादतियों के खिलाफ 1816 में हिंसक विद्रोह किया। इसका तात्कालिक कारण अंग्रेजों द्वारा स्थानीय लोगों पर चैकीदारी-टैक्स आरोपित कर उसका सख्ती से वसूली किया जाना था।

अलीगढ़ का विद्रोह (1814-17)

आगरा प्रांत के अंतर्गत अलीगढ़ के किसान, जमींदार एवं सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक फेरबदल के कारण पहले से ही असंतुष्ट थे। इसलिए जब कंपनी ने उस क्षेत्र में मालगुजारी बढ़ाने का निर्णय किया, तो 1814-1817 में अलीगढ़ के तालुकेदारों का असंतोष विद्रोह के रूप में फूट पड़ा। इस विद्रोह के नेता हाथरस के तालुकेदार दयाराम और मुरसान के तालुकेदार भगवंतसिंह थे।

बुंदेला विद्रोह (1842-43)

अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत नामक एक नया प्रांत बनाया था, जिसमें मराठों से छीने गये आधुनिक मध्य प्रदेश के दो जिले- सागर एवं दमोह भी मिला लिये गये। जबलपुर के बुंदेलों ने 1842 में लगान की बढ़ी दर के विरोध में जवाहरसिंह व मधुकरसिंह के नेतृत्व में सशस्त्र विद्रोह किया। यद्यपि 1843 तक इस विद्रोह पर काबू पा लिया गया, किंतु लगान की दर भी कम कर दी गई।

वहाबी आंदोलन (1830-69)

सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831) द्वारा शुरू किया गया वहाबी आंदोलन धार्मिक परिवेश में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एक विद्रोहात्मक प्रयास था, जो उन्नीसवीं शताब्दी के चैथे दशक से सातवें दशक (1830-1869) तक चलता रहा। सैयद अहमद 1821 में मक्का गये और वहीं अरब के इब्न अब्दुल वहाबी द्वारा चलाये गये वहाबी संप्रदाय से प्रभावित हुए। दो वर्ष बाद भारत वापस आकर उन्होंने मुसलमानों को संगठित कर ब्रिटिश काफिरों के विरुद्ध धर्मयुद्ध आरंभ कर दिया।

यद्यपि वहाबी आंदोलन धार्मिक था, किंतु सैयद अहमद बरेलवी ने इसे राजनीतिक स्वरूप देते हुए अपने अनुयायियों को शस्त्र धारण करने के लिए प्रशिक्षित किया और स्वयं भी सैनिक वेशभूषा धारण की। उन्होंने अपने आपको ‘इमाम’ घोषित किया और देशव्यापी संगठन खड़ा करने के उद्देश्य से अपने अधीन चार खलीफाओं की नियुक्ति की। भारत में इसका प्रमुख केंद्र पटना बना और इसकी शाखाएँ हैदराबाद, मद्रास, बंगाल, उत्तर प्रदेश तथा बंबई में खोली गईं।

इस आंदोलन में बंगाल तथा बिहार के मुस्लिम कृषकों तथा शिल्पकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सैयद अहमद ने पंजाब को सिखों से मुक्त कराने का प्रयास किया, किंतु 1831 में बालाकोट में सिखों से लड़ते हुए मारे गये। जब अंग्रेजों ने वहाबियों को बंगाल एवं बिहार से निष्कासित कर दिया, तो वहाबी पश्तून आदिवासियों के क्षेत्र में आकर बस गये और वहीं सिथाना (दार-उल-इस्लाम) को अपने आंदोलन का केंद्र बनाये।

1849 में पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिलाये जाने के बाद वहाबी आंदोलन ने मौलवी अहमदुल्ला के नेतृत्व में स्पष्ट रूप से ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन का रूप धारण कर लिया। इसी बीच पटना के वहाबियों ने 1852 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी। इसमें उन्हें ग्रामीण कृषकों तथा नगरों के निवासियों, दोनों से बड़ा समर्थन मिला। अंग्रेजों को भय था कि वहाबियों को अफगानिस्तान अथवा रूस से सहायता मिल सकती है, इसलिए 1860 के बाद ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन का सख्ती से दमन कर दिया। विलायतअली, इनायतअली, पीरअली, तीतूमीर, शेख करामतअली आदि वहाबी आंदोलन के अन्य महत्त्वपूर्ण नेता थे।

ब्रिटिश राज की पहली सदी में भारत में हथियारबंद विद्रोह, सामाजिक लूट या कानूनी अराजकता आम बात थी। विस्थापित राजाओं, जमींदारों और किसानों-दस्तकारों की तरह शहरी समाज के निम्न वर्ग भी प्रतिरोध में उतने ही मुखर थे। 1833-38 में पश्चिमी हिंदुस्तान और दिल्ली में अनाज व्यापारियों की जमाखोरी के विरुद्ध और हस्तक्षेप करनेवाले ब्रिटिश अफसरों के विरुद्ध अनाज-दंगे और प्रतिरोध हुए।

वेल्लौर में चावल के लिए दंगे हुए और 1806 और 1858 के बीच दक्षिण भारत में ईसाईयत में दीक्षा के विरुद्ध दंगे हुए। अंग्रेजों की मुक्त व्यापारवादी नीति के फलस्वरूप हस्तशिल्प उद्योगों के पतन के कारण 1789 में कलकत्ता, 1790 में और 1800 के दशकों में सूरत तथा 1809 और 1818 के बीच रुहेलखंड और बनारस में दस्तकार समूहों के शहरी विद्रोह हुए। हालांकि ये विद्रोह हमेशा सीधे-सीधे उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन नहीं होते थे, पर औपनिवेशिक शासन की नीतियों और दशाओं से उनका संबंध होता था।

आदिवासी विद्रोह

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आदिवासी विद्रोह

भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले आदिवासियों (जनजातियों) ने भी आरंभ से ही स्थानीय संसाधनों पर ब्रिटिश राज के नियंत्रण, उसकी शोषणकारी नीतियों और गैर-आदिवासी कारिंदों, जैसे- बाहरी महाजनों, साहूकारों और ब्रिटिश अधिकारियों की ज्यादतियों के विरुद्ध जुझारू संघर्ष किये। यद्यपि आदिवासी आंदोलन से संबंधित आर्थिक मुद्दे प्रायः वही होते थे जो गैर-आदिवासी किसान आंदोलनों को प्रभावित करते थे, किंतु आदिवासियों का उनके स्वयं का एक समुदायिक खेतिहर ढाँचा था जो गैर-आदिवासी किसानों से भिन्न था। किसान लोग केवल (कृषि) भूमि से गुजारा करते थे, जबकि आदिवासी कृषि और जंगल दोनों पर ही निर्भर होते हैं। ये आदिवासी जमींदारों, सूदखोरों और कंपनी के छोटे अधिकारियों के खिलाफ केवल इसलिए नहीं थे कि वे उनका शोषण करते थे, बल्कि इसलिए भी थे क्योंकि वे ‘बाहरी’ थे।

आमतौर पर आदिवासी अपने को शेष समाज से पृथक् रखते थे, किंतु ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण जब गैर-आदिवासी लोगों ने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक संसाधनों का दोहन करने के लिए आदिवासी क्षेत्रों में घुसपैठ की, तो आदिवासी समाज की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और पूरी सामाजिक व्यवस्था उलट-पलट गई। आदिवासियों की जमीन उनके हाथ से निकलती गई और वे धीरे-धीरे खेत-मजदूर होते चले गये।

औपनिवेशिक हमले ने जंगलों से उनके गहरे रिश्ते को भी तोड़ दिया, जहाँ से वे भोजन, ईंधन और पशुओं का चारा जुटाते थे। पुलिस और अन्य छोटे-मोटे अधिकारियों द्वारा किये जानेवाले अत्याचारों, शोषण और जबरन उगाही ने आदिवासियों का जीना दूभर कर दिया। लगान वसूल करनेवाले अधिकारी और महाजनों जैसे सरकारी बिचैलिये और दलाल आदिवासियों का शोषण तो करते ही थे, जबरन बेगार भी कराते थे।

औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध आदिवासियों की प्रतिक्रिया छिटपुट हिंसक विद्रोहों के रूप में तो प्रकट हुई ही, आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों की घुसपैठ के कारण उनमें शिक्षा का प्रसार हुआ और आंतरिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार के आंदोलन भी आरंभ हुए और कहीं-कहीं तो दोनों एक साथ चले। इस तरह के प्रतिरोध छोटा नागपुर और संथाल परगना के आदिवासियों के अलावा उड़ीसा और मध्य प्रदेश के कुछ आदिवासियों और पश्चिम भारत के भीलों के बीच भी हुए।

आदिवासियों के बीच भी कई बार धर्म ने एकता के सूत्र का काम किया और उनके नेता ऐसे धर्मगुरु थे, जिन्होंने उनको पराप्राकृतिक साधनों से एक नये युग में ले जाने का वादा किया। इन धार्मिक नेताओं ने दावा किया कि उनके पास जादुई शक्ति है, जो दुश्मन की गोलियों को भी बेअसर कर सकती है। इससे अदिवासियों में आशा और विश्वास की ऐसी लहर फैली कि वे आखिरी साँस तक अपने नेता के साथ लड़ने के लिए तैयार हो गये।

चुआर विद्रोह (1766-72)

चुआर बंगाल के मिदनापुर की एक वन्य जाति थी। 1760 में ही संपूर्ण मिदनापुर जिले पर कंपनी ने अधिकार कर लिया था और 1765 में आसपास के सारे क्षेत्र और महाल पर भी उसका कब्जा हो गया। अकाल एवं भूमिकर में वृद्धि तथा अन्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण 1766 में धलभूम के राजा जगन्नाथ धल के नेतृत्व में बंगाल और बिहार के पाँच जिलों में चुआर विद्रोह शुरू हुआ, जो 1772 तक चला।

विद्रोहियों ने ‘आत्म-विनाश’ की नीति अपनाई और अपने क्षेत्र को उजाड़ कर वीरान कर दिया, ताकि कंपनी को इस क्षेत्र पर अधिकार करने पर भी कोई लाभ न हो सके। कई स्थानों पर चुआर वीरों ने औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंका। रानी शिरोमणि नाम की एक महिला विद्रोही ने बड़ी वीरता का प्रदर्शन किया, जो बाद में बंदी बना ली गई। संगठित अंग्रेजी सेना ने बड़ी निर्ममता से इस विद्रोह का दमन किया, किंतु इस क्षेत्र में छिटपुट उपद्रव अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दिनों तक होते रहे।

चेरों का विद्रोह (1800-02)

बिहार के पलामू जिले में जब स्थानीय राजा एवं कंपनी के द्वारा जागीरदारों (चेरों) से जमीनें छीनी जाने लगी, तब वहाँ के जागीरदारों ने 1800 में जमींदार भूषणसिंह के नेतृत्व में राजा एवं कंपनी के विरुद्ध विद्रोह कर दिये। यह विद्रोह 1802 तक चलता रहा।

गोंडों का विद्रोह (1833-62)

संबलपुर में गोंडों ने उत्तराधिकार के प्रश्न पर अंग्रेजों के हस्तक्षेप के विरुद्ध कई चरणों में विद्रोह किये। पहला विद्रोह 1833 में हुआ, जिसे शीघ्र ही दबा दिया गया। 1839 में सुरेंद्र सांई के नेतृत्व में एक बार फिर विद्रोह भड़का, जिसका कारण नये भूमि-बंदोबस्त के द्वारा राजस्व में वृद्धि करना था। यह विद्रोह लंबे समय तक चलता रहा। 1862 में सुरेंद्र सांई द्वारा आत्म-समर्पण करने के बाद यह विद्रोह कमजोर पड़ गया।

कोल विद्रोह (1831-37)

बिहार और उड़ीसा के छोटा नागपुर और सिंहभूमि क्षेत्र में आदिवासी सदियों से स्वतंत्र सत्ता का उपभोग करते आ रहे थे। किंतु अंग्रेजों की पैठ और अंग्रेजी कानून के आरोपण ने अब कबीलों के पुश्तैनी सरदारों की सत्ता के लिए संकट पैदा कर दिया। उधर बाहरी लोगों को अधिक लगान पर जमीनें उठाकर छोटा नागपुर के राजा ने भी आदिवासियों को बेदखल करना शुरू कर दिया। गैर-आदिवासियों के इस बसाव ने और आमतौर पर ‘सूड’ अर्थात् बाहरी कहे जानेवाले सौदागरों और सूदखोरों को निरंतर भूमि के हस्तांतरण से एक जन-विद्रोह का जन्म हुआ।

जब आदिवासियों के न्याय की पुकार से अधिकारियों का दिल नहीं पसीजा, तो 1831 में कोलों ने सुर्गा एवं सिंगाराय के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हथियार उठा लिये। शीघ्र ही यह विद्रोह रांची, सिंहभूमि, हजारीबाग, पालामऊ (पलामू) तथा मानभूमि के पश्चिमी क्षेत्रों में भी फैल गया। इस विद्रोह का स्वरूप बाहरी लोगों की संपत्तियों पर हमलों का था, न कि उनके जीवन पर। दूसरे शब्दों में, लूटपाट और तबाही किसानों के विरोध के प्रमुख ढ़ंग थे, जबकि हत्या की दर नगण्य थी। इस विद्रोह ने कुछ ही सप्ताहों के अंदर छोटा नागपुर से ब्रिटिश राज का सफाया कर दिया। यद्यपि इस विद्रोह में राजा अचेतसिंह और उनके दीवान तथा पलामू के कुछ प्रमुख लोग शामिल थे, किंतु वास्तव में यह एक जन-विद्रोह था। इस उथल-पुथल को कुचलने और कानून-व्यवस्था की पुनस्र्थापना के लिए ब्रिटिश सरकार को एक दीर्घकालीन सैन्य-अभियान करना पड़ा। फिर भी, यह क्षेत्र लगभग 1837 तक अशांत रहा।

खोंड विद्रोह (1837-56)

खोडों का विस्तार तमिलनाडु से लेकर बंगाल एवं मध्य भारत के पहाड़ी क्षेत्रों तक था। 1837 से 1856 तक इस क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह होते रहे। सरकार द्वारा मानव बलि को प्रतिबंधित करने, नये कर लगाने, उनके क्षेत्रों में जमींदारों और साहूकारों के प्रवेश इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे। इस विद्रोह में धुमसर, चीन की मेंडी, कालाहांड़ी तथा पटना के आदिवासियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस विद्रोह का नेतृत्व चक्र बिसोई ने किया था। बाद में राधाकृष्ण व दंडसेन के नेतृत्व में सवारा और कुछ अन्य जनजातियाँ भी इस विद्रोह में शामिल हो गईं।

भील विद्रोह (1812-46)

भीलों की आदिम जाति पहले पश्चिमी तट के मराठा भू-भाग में स्थित खानदेश जिले में रहती थी। जब 1818 में अंग्रेजी सत्ता के विस्तार के साथ यहाँ बाहरी लोग पहुँचे, तो भीलों का सामुदायिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। उन्होंने कृषि-संबंधी कष्ट एवं नई सरकार की नीतियों के विरुद्ध 1812-1819 के मध्य विद्रोह कर दिया। जब ब्रिटिश सेना ने विद्रोह के दमन का प्रयास किया, तो भीलों में उत्तेजना और भी बढ़ गई, विशेषकर उस समय जब उन्हें बर्मा में ब्रिटिश सरकार की असफलता की सूचना मिली। 1825 में भीलों ने सेवरम के नेतृत्व में पुनः विद्रोह कर दिया। सरकार ने दमन के साथ-साथ उनको शांत करने के लिए कुछ सुलह-सफाई के कदम भी उठाये, किंतु स्थिति 1831 तक अस्थिर ही बनी रही जब तक कि पुरंधर के रामोसी नेता उमाजी राजे को पकड़कर फाँसी नहीं दे दी गई। पुनः 1846 में इस विद्रोह ने ब्रिटिश-विरोधी लोकप्रिय आंदोलन का रूप धारण कर लिया था।

कोलिय विद्रोह (1829, 1844-46)

अहमदनगर जिले के कोलिय आदिवासी कबीले के लोग शक्ति के लिए भीलों के स्थानीय प्रतियोगी थे। उन्होंने 1829 में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी, किंतु सेना के एक बड़े दस्ते ने उसे जल्दी ही कुचल दिया। विद्रोह की चिनगारी फिर भी सुलगती रही, जो 1844-46 में फिर तब भड़क उठी, जब एक स्थानीय कोलिय नेता ने दो साल तक ब्रिटिश सरकार की सफलतापूर्वक अवज्ञा की।

अहोम विद्रोह (1828-1830)

औपनिवेशिक काल में असम नागालैंड, मेघालय और मिजोरम ब्रिटिश प्रांत के अंतर्गत थे, जिन्हें ‘असम’ कहा जाता था। 1826 में जब ब्रिटिश सरकार ने असम के खेतों को चाय बागानों में परिवर्तित कर दिया और राजस्व वसूलना आरंभ कर दिया, तो अहोम लोगों ने गोमधर कुँवर के नेतृत्व में 1828 में सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। कंपनी ने अपनी शक्तिशाली सेना के द्वारा इस विद्रोह का दमन कर दिया और गोमधर कुँवर को बंदी बनाकर निर्वासित कर दिया। किंतु अहोम का यह विद्रोह स्थायी रूप से दबाया नहीं जा सका।

अहोम लोगों ने 1829-1830 में रूपचंद्र कुँवर के नेतृत्व में दूसरी बार विद्रोह की नई योजना बनाई, किंतु इस समय कंपनी बहादुर ने शांति की नीति अपनाई, उत्तरी असम के प्रदेश एवं कुछ अन्य क्षेत्र महाराजा पुरंदरसिंह नरेंद्र को दे दिया और राज्य का एक भाग असमी राजा के सुपुर्द कर दिया।

खासी विद्रोह (1829-1833)

बंगाल प्रदेश के पूर्व में जैंतिया तथा पश्चिम में गारो पहाडि़यों के बीच 3,500 वर्गफीट पहाड़ी आँचल में खासी जनजाति निवास करती थी। 1765 में जब सिलहट इलाके पर अंग्रेजों का अधिकार हुआ, उस समय खासियों के तीन अलग-अलग शक्ति-संपन्न राज्य थे। प्रथम बर्मा युद्ध के बाद ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर 1824 में अंग्रेजों का अधिकार हो गया, तो उन्होंने इस क्षेत्र को सिलहट से जोड़ने के लिए एक सैनिक मार्ग बनाने की योजना बनाई। इस कार्य के लिए वहाँ बहुत से अंग्रेज, बंगाली व अन्य बाहरी लोग भेजे गये थे। इससे खासी मुखियाओं में व्यापक असंतोष था। 1829 में ननक्लों के प्रमुख तीरथसिंह ने खासी पहाडि़यों के गारो, खामटी एवं सिंहपो के सहयोग से विदेशी लोगों को निकालने के लिए गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। इस विद्रोह ने शीघ्र ही अंग्रेज-विरोधी लोकप्रिय आंदोलन का रूप धारण कर लिया। लगभग चार वर्ष के छिटपुट संघर्ष के बाद जनवरी 1833 में खासी राजाओं ने आत्म-समर्पण कर दिया और खासी विद्रोह को दबा दिया गया।

खामटी विद्रोह (1839-1843)

खामटी जाति का मूल निवास बर्मा में इरावती नदी घाटी का बोरखामटी प्रदेश था। बाद में इस जाति ने असम में अहोम राजा की अनुमति से पूरब में एक छोटा-सा राज्य स्थापित कर लिया था। 1826 की संधि द्वारा ब्रिटिश सरकार ने खामटी लोगों को अपने शासक के अधीन रहने और 200 सैनिक रखने की अनुमति दे दिया था। 1830 में जब सिंगफो जाति ने असम के पूर्वी भाग में अंग्रेजों पर हमला किया, तो खामटी लोगों ने अंग्रेजों का साथ दिया। किंतु जब कंपनी सरकार ने न्याय व्यवस्था और राजस्व वसूली का कार्य अंग्रेजों को सौंप दिया और अनेक नये टैक्स लगा दिये, तो खामटी सरदार असंतुष्ट हो गये। अब वे सिंगफो सरदार को अंग्रेजों से समझौता न करने के लिए उकसाने लगे। 1839 में अचानक खामटी लोगों ने अंग्रेज रेजीमेंट पर आक्रमण कर उसे तहस-नहस कर दिया, जिसमें मेजर ह्वाइट मारा गया। किंतु 1843 में सरदारों की आपसी फूट के कारण खामटी लोगों को आत्म-समर्पण करना पड़ा।

पश्चिमी घाट के कोलों का विद्रोह (1824-50)

1824 के अंत में पश्चिमी घाट एवं कच्छ के सीमावर्ती भाग के कोलों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया, जिसे 1825 में दबा दिया गया। 1839 में पूना के आसपास के कोलों ने विद्रोह किया, जो 1850 तक चलता रहा। विभिन्न चरणों में भाऊसरे, चिमनाजी यादव, नाना दरबारे, रघु भंगरिया, बापू भंगरिया आदि ने कोलों का नेतृत्व किया। इस विद्रोह में रामोसियों ने भी सहयोग किया। अंततः कंपनी की सेना इन विद्रोहों को दबाने में सफल रही।

संथाल (हूल) विद्रोह (1855-56)

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राजमहल की पहाड़ी पर अंग्रेजी सेना की सामना करते आदिवासी

आरंभिक आदिवासी विद्रोहों में संथाल (हूल) विद्रोह सबसे प्रभावशाली था। शांतिप्रिय और विनम्र संथाल जाति आरंभ में पूर्वी भारत के विभिन्न जिलों, जैसे- कटक, ढालभूमि, मानभूमि, बड़ाभूमि, छोटा नागपुर, पालामऊ (पलामू), हजारीबाग, मेदिनीपुर, बाँकुड़ा और वीरभूमि में बिखरी हुई थी और सदियों से भूमि को जोत-बो रही थी। 1793 की स्थाई भूमि-व्यवस्था के कारण यह भूमि जमींदारों की हो गई। जमींदारों के अत्यधिक शोषण के कारण यह जाति अपनी पैतृक भूमि को छोड़कर राजमहल की पहाडि़यों के आसपास आ गई। ‘हल’ से खेती करनेवाले संथालों को इस क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए ‘झूम’ खेती और ‘कुदाल’ का प्रयोग करने वाले पहाडि़यों के विरोध का सामना करना पड़ा। ‘हल’ और ‘कुदाल’ के बीच यह लड़ाई लंबी चली। अंततः 1800 के आसपास पहाडि़या लोगों को राजमहल की पहाडि़यों में और भीतर की ओर हटना पड़ा।

संथालों ने राजमहल की पहाडि़यों के जंगलों को साफ कर खेती-योग्य भूमि तैयार कर लिया और उसे ‘दामन-ए-कोह’ (पहाड़ का आँचल) नाम दिया। दामन-ए-कोह में संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ी। संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इस समय संथालों की संख्या भी 3,000 से बढ़कर 82,000 से अधिक हो गई। जब संथालों की जमीनें गैर-आदिवासी जमींदारों और सूदखोरों (डिकुओं अर्थात् बाहरी लोगों) को किराये पर दे दी गई तो उनमें असंतोष पैदा हो गया। इसके बाद जब बंगाल तथा उत्तर भारत के साहूकारों ने यहाँ सूदखोरी आरंभ कर दिया, तो संथालों का असंतोष और बढ़ गया। ‘कलकत्ता रिव्यू’ के अनुसार संथालों ने देखा कि उनकी उपज, उनके पशु, वे स्वयं और उनका परिवार भी उस ऋण के लिए साहूकारों के चंगुल में चला जाता है जो यह सब कुछ देने पर भी शेष रह जाता है। उनका जीवन-यापन करना कठिन होता जा रहा था। पुलिस, भूमिकर अधिकारी तथा न्याय प्रशासक भी इन्हीं साहूकारों का ही पक्ष लेते थे। 1854 तक आते-आते अब संथाल ‘डिकुओं’ से अपने खोये क्षेत्र को वापस पाने के लिए कार्रवाई करने के लिए कसमसाने लगे।

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आदिवासियों की बैठक को संबोधित करते उनके नेता

संथालों में बंगाल तथा उत्तरी भारत के तथाकथित सभ्य लोगों के विरुद्ध असंतोष तो था ही, लेकिन जब उन्होंने देखा कि अधिकारी वर्ग भी उनकी रक्षा करने के बजाय शोषणकारियों का ही पक्ष लेते हैं, तो उनका धैर्य टूट गया। जमीनों की बेदखली और कोर्ट-कचहरी के फैसले भूस्वामियों के पक्ष में जाने के कारण आदिवासियों के मुखिया, मजलिस और परिगणित बैठकें करने लगे और विद्रोह की तैयारी शुरू हो गई। 30 जून 1855 को भगनाडीह गाँव (साहेबगंज, झारखंड) में 400 आदिवासी गाँवों के लगभग 6,000 आदिवासियों ने सभा की और एक स्वर से निर्णय लिया कि बाहरी लोगों को भगाने, विदेशियों का राज हमेशा के लिए खत्म कर सतयुग का राज- न्याय और धर्म पर आधारित अपना राज- स्थापित करने के लिए खुला विद्रोह किया जाए।

संथालों को विश्वास था कि भगवान् उनके साथ है। संथाल हूल के नेता सिद्धू और कान्हू ने घोषणा की कि ठाकुर जी ने उन्हें निर्देश दिया है कि आजादी के लिए अब हथियार उठा लो। सिद्धू ने अधिकारियों से कहा: ‘‘ठाकुर जी ने मुझे आदेश देते समय कहा कि यह देश साहबों का नहीं है। ठाकुर जी खुद हमारी तरफ से लड़ेंगे। इस तरह आप साहब लोग और सिपाही लोग खुद ठाकुर जी से लड़ोगे।’’

इन आदिवासियों ने गाँवों में जुलूस निकाले और ढोल-नगाड़े बजाकर संघर्ष करने के लिए पुरुषों और महिलाओं का आह्वान किये। शीघ्र ही करीब 60,000 हथियारबंद संथाल इकट्ठा हो गये। जुलाई 1855 में सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में तीर-कमान से लैस कई हजार संथालों ने ‘अपने उत्पीड़कों, महाजनों, और सरकार की तिकड़ी के विरुद्ध’ खुला विद्रोह शुरू कर दिया। विद्रोहियों ने महाजनों और जमींदारों के मकान जला डाले, पुलिस स्टेशन, रेलवे स्टेशन और डाक ढ़ोनेवाली गाडि़यों को जला दिये। उन्होंने प्रायः उन सभी चीजों पर हमले किये, जो ‘डिकू’ (गैर-आदिवासी) और उपनिवेशवादी सत्ता के शोषण के माध्यम थे। यह विद्रोह इतना तीव्र था कि भागलपुर और राजमहल के बीच एक बड़े क्षेत्र में कंपनी का शासन लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया। इस जुझारू संघर्ष में निचली जातियों के गैर-आदिवासी किसान भी संथाल विद्रोहियों की सक्रिय सहायता कर रहे थे।

आदिवासियों के इस संगठित विद्रोह से निपटने के लिए सरकार ने एक मेजर जनरल के नेतृत्व में सेना की दस टुकडि़याँ भेजी। बदले की कार्रवाई में संथालों के गाँव एक के बाद एक करके जला दिये गये। राजमहल की पहाडि़याँ संथालों के खून से लाल हो गईं। एक अनुमान के मुताबिक विद्रोह के पूरी तरह कुचले जाने के पहले तक 30-50 हजार विद्रोहियों में से 15-20 हजार मारे जा चुके थे। उपद्रवग्रस्त क्षेत्र में मार्शल ला लगाया गया और विद्रोही नेताओं की गिरफ्तारी पर 10,000 का इनाम घोषित किया गया। अगस्त 1855 में सिद्धू और फरवरी 1856 में कान्हू सरेआम फाँसी पर लटका दिये गये। अंततः सरकार ने 1855 के 37वें अधिनियम के अनुसार एक अलग इकाई के रूप में एक पृथक् संथाल परगना (नान रेगुलेशन जिला) बना दिया, जिससे उनकी अलग आदिवासी संस्कृति और पहचान को मान्यता मिली। इस तरह यह विद्रोह एक प्रकार से संथाल परगना के समस्त गरीबों और शोषितों द्वारा शोषकों, अंग्रेजों एवं उसके कर्मचारियों के विरुद्ध स्वतंत्रता का आंदोलन था। आज भी प्रत्येक वर्ष 30 जून को ‘हूल क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

लुबिया माँझी और बैरू माँझी (1855-56 )

1855-56 में हजारीबाग के संथालों का एक और भीषण विद्रोह हुआ। इस विद्रोह के नेता लुबिया माँझी और बैरू माँझी थे। अप्रैल 1856 में संथालों का यह विद्रोह पूरे हजारीबाग जिले में फैल गया। विद्रोहियों ने हजारीबाग जेल में घुसकर अत्याचार के प्रतीकों में आग लगा दी। इस विद्रोह को कुचलने के लिए भी अंग्रेजों को भारी ताकत लगानी पड़ी।

आरंभिक प्रतिरोध के परिणाम

ब्रिटिश सेना और आदिवासियों के बीच सशस्त्र संघर्ष पूरी तरह दो गैर-बराबर पक्षों के बीच का संघर्ष था। एक ओर आधुनिक हथियारों से सुसज्जित अंग्रेजी सेना थी, तो दूसरी ओर पत्थर, आरी, भाले और तीर-धनुष लिये जुझारू आदिवासी पुरुष और औरतें, जिन्हें यह विश्वास था कि उनके नेता के पास ईश्वरीय ताकत है। गैर-बराबरी के इस संघर्ष में लाखों की संख्या में आदिवासी मारे गये और उनके प्रतिरोध निर्ममतापूर्वक दबा दिये गये।

इस प्रकार भारतीय जनता के विभिन्न वर्गों के विद्रोहों का यह सिलसिला बहुत लंबे समय तक चलता रहा, किंतु विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने की ये सारी कोशिशें छिटपुट और स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहीं और यही इन आरंभिक प्रतिरोधों की असफलता का एक प्रमुख कारण था। यद्यपि कई विद्रोहों का स्वरूप समान पृष्ठभूमि और परिस्थितियों के कारण एक जैसा था, किंतु वे किसी भी तरह से राष्ट्रीय प्रयासों का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। असफलता का दूसरा कारण यह था कि इन विद्रोहों का नेतृत्व करने वाले अर्धसामंती लोग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े हुए थे और उनका दृष्टिकोण परंपरागत था। नई दुनिया से बेखबर वे पुरानी दुनिया में जीते थे। उनके पास प्रतिरोध तो था, लेकिन कोई दूसरा सामाजिक विकल्प नहीं था। तीसरे, तत्कालीन शासक वर्ग सामंत, राजे और रजवाड़े अपने परंपरागत चरित्र के अनुसार अब ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के साथ सहयोग करना भी प्रारंभ कर दिये थे, जिसके कारण इन छिटपुट विद्रोहों के बीच आवश्यक तालमेल भी स्थापित नहीं हो सका। फलतः इन आरंभिक विद्रोहों का अंग्रेजों ने बड़ी निर्ममता से दमन कर दिया।