भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण (Reasons for the Rise of Communalism in India)

भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण (Reasons for the Rise of Communalism in India)
भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण प्रस्तावना भारत में सांप्रदायिकता का उदय किसी एकल […]

Table of Contents

भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण

प्रस्तावना

भारत में सांप्रदायिकता का उदय किसी एकल घटना या कारण का परिणाम नहीं था- यह ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों की एक दीर्घकालीन और जटिल अंतःक्रिया का उत्पाद था। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की सुनियोजित नीति के अंतर्गत बंगाल विभाजन (1905 ई.) और पृथक् निर्वाचन प्रणाली (1909 ई.) जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच विभाजन को जानबूझकर गहरा किया। 1947 ई. के विभाजन की भयंकर त्रासदी और उससे जुड़ी अकथनीय हिंसा ने सांप्रदायिक अविश्वास को और भी गहरा कर दिया। स्वतंत्रता के बाद अनेक राजनीतिक दलों द्वारा धर्म और जाति को चुनावी लाभ के लिए उपकरण के रूप में प्रयोग करने तथा तुष्टीकरण की राजनीति ने सांप्रदायिक भावनाओं को और भी प्रबल किया। गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, सामाजिक अलगाव और पारस्परिक संवाद की कमी भी सांप्रदायिकता को पोषित करने वाले महत्त्वपूर्ण तत्व रहे हैं। इस प्रकार सांप्रदायिकता केवल धार्मिक मतभेदों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक विरासत, राजनीतिक स्वार्थ, सामाजिक विभाजन और आर्थिक विषमताओं से निर्मित एक अत्यंत जटिल सामाजिक-राजनीतिक समस्या है।

सांप्रदायिकता का अर्थ और परिभाषा

‘सांप्रदायिकता’ से तात्पर्य उस संकीर्ण मानसिकता से है जो धर्म और संप्रदाय के नाम पर समाज तथा राष्ट्र के व्यापक हितों की उपेक्षा करते हुए व्यक्ति को केवल अपने धर्म व संप्रदाय के हितों को प्रोत्साहित करने और उनकी रक्षा करने के लिए प्रेरित करती है। सांप्रदायिकता की भावना एक ओर तो अपने धर्म के प्रति अंधभक्ति उत्पन्न करती है और दूसरी ओर दूसरे धर्म तथा उसके अनुयायियों के प्रति विद्वेष और घृणा का संचार करती है।

मौलिक रूप में सांप्रदायवाद उस विश्वास का नाम है जिसके अनुसार चूँकि कुछ लोग किसी एक विशेष धर्म को मानते हैं, इसलिए उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हित भी स्वतः समान होते हैं। सांप्रदायवाद धार्मिक समूहों के मध्य तनाव उत्पन्न करते हुए अंततः अलगाववाद तक पहुँच जाता है। एक ही देश में विभिन्न और प्रमुख संप्रदायों के बीच अलगाव और द्वेष की राजनीति को ‘सांप्रदायिक राजनीति’ कहा जाता है। भारत में सांप्रदायिक राजनीति के अंतर्गत पहले मुस्लिम सांप्रदायिकता का उदय हुआ और तत्पश्चात् उसकी प्रतिक्रिया में हिंदू सांप्रदायिकता का उदय और विकास हुआ।

सांप्रदायिक विचारधारा के तीन चरण

भारत में सांप्रदायिक विचारधारा मुख्यतः तीन क्रमिक चरणों में विकसित हुई और इन तीनों चरणों के बीच एक स्पष्ट तारतम्य परिलक्षित होता है। पहले चरण की सांप्रदायिक विचारधारा के अनुसार चूँकि कुछ लोग किसी एक विशेष धर्म को मानते हैं, इसलिए उनके सांसारिक अर्थात् सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हित भी समान होते हैं। दूसरे शब्दों में, भारत में हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई अलग-अलग और विशिष्ट समुदाय हैं और इन धर्मों के मानने वालों के केवल आध्यात्मिक हित ही नहीं, बल्कि सांसारिक हित भी समान हैं। यह चरण मुख्यतः धार्मिक पहचान पर अत्यधिक बल देता है और इसी से धर्म पर आधारित सामाजिक-राजनीतिक समुदायों की धारणा का जन्म होता है।

सांप्रदायवाद के दूसरे चरण में यह धारणा निहित होती है कि किसी धर्म के अनुयायियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक हित किसी दूसरे धर्म के मानने वालों के हितों से मूलतः भिन्न होते हैं। इस चरण को ‘उदार सांप्रदायिकता’ या ‘नरमपंथी सांप्रदायिकता’ कहा गया है, जिसमें सांप्रदायवादी उदारवादी, लोकतांत्रिक, मानवतावादी और राष्ट्रीयतावादी मूल्यों में भी कुछ आस्था रखता है।

सांप्रदायिकता के तीसरे और सर्वाधिक खतरनाक चरण की शुरुआत तब होती है जब यह मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्मों या संप्रदायों के अनुयायियों के हित न केवल भिन्न हैं, बल्कि परस्पर विरोधी और शत्रुतापूर्ण भी हैं। इस उग्र चरण में सांप्रदायिकता फासीवादी तौर-तरीके अपना लेती है और यह दावा किया जाने लगता है कि दो विभिन्न धार्मिक समूहों के हित कभी भी समान नहीं हो सकते और उनके बीच टकराव अनिवार्य है। यद्यपि भारत में सांप्रदायिकता के ये तीनों चरण अलग-अलग समय पर आए, किंतु वे एक-दूसरे को प्रभावित करते रहे और उनमें एक प्रकार की निरंतरता भी बनी रही।

भारत में सांप्रदायिकता की ऐतिहासिक प्रकृति

यह समझना आवश्यक है कि किसी भी देश में अनेक धर्मों का एक साथ होना अपने आप में सांप्रदायिकता के विकास का प्रमुख कारण नहीं होता। धर्म मूलतः एक विश्वास-प्रणाली है और लोग इसे व्यक्तिगत आस्था के अंग के रूप में पालन करते हैं। सांप्रदायवाद वास्तव में धर्म पर आधारित सामाजिक और राजनीतिक पहचान की विचारधारा है। धर्म सांप्रदायवाद का कारण नहीं है। वस्तुतः सांप्रदायवाद धर्म का राजनीतिक व्यापार है। अत्यधिक धार्मिकता सांप्रदायिकता को प्रोत्साहित करने का मूल कारण नहीं होती।

सांप्रदायिकता न तो प्राचीन काल का अवशेष है और न ही मध्ययुगीन अवशेष- जैसा कि प्रायः कहा जाता है। यद्यपि सांप्रदायिकता प्राचीन और मध्ययुगीन विचारधाराओं और प्रतीकों का उपयोग करती है, किंतु मूलतः यह एक आधुनिक विचारधारा और राजनीतिक प्रवृत्ति है जो आधुनिक सामाजिक समूहों, वर्गों और शक्तियों की सामाजिक आकांक्षाओं को व्यक्त करती थी और उनकी राजनीतिक जरूरतों को पूरा करती थी। भारत में सांप्रदायिक चेतना का उदय आधुनिक राजनीति के उदय से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटिश शासन की स्थापना के पूर्व कई सदियों तक भारत पर मुस्लिम शासकों का आधिपत्य था, किंतु शताब्दियों तक एक-दूसरे के साथ रहने के कारण हिंदुओं और मुसलमानों के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों में गहरी समानता आ गई थी। यद्यपि धर्म लोगों के जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग था और धर्म को लेकर कभी-कभी झगड़े होते थे, किंतु 1870 के दशक से पहले भारत में किसी संगठित सांप्रदायिक विचारधारा या सांप्रदायिक राजनीति का अस्तित्व नगण्य था। 1857 ई. के सिपाही विद्रोह में हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों का विरोध किया और सर्वसम्मति से अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को अपना नेता स्वीकार किया था, यह तथ्य हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐतिहासिक प्रमाण है।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय के प्रमुख कारण

भारत में सांप्रदायिकता का उदय जनता और उसकी भागीदारी पर आधारित नई, आधुनिक राजनीति का परिणाम था। आधुनिक राजनीति में जनता से व्यापक संबंध बनाने और उसकी आस्था जीतने की आवश्यकता के कारण धार्मिक पहचान का राजनीतिकरण हुआ। दरअसल, ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना के बाद जैसे-जैसे लोगों में राजनीतिक और आर्थिक चेतना का उदय हुआ, वैसे-वैसे एक धार्मिक समूह के लोग अपनी स्थिति की तुलना अन्य धार्मिक समूहों से करने लगे। जब किसी धार्मिक समूह को यह अनुभव हुआ कि राजनीतिक और आर्थिक संसाधनों तक उसकी पहुँच अन्य समूहों की अपेक्षा कम है, तभी से धार्मिक अलगाववाद और सांप्रदायिकता की भावना ने जन्म लेना प्रारंभ किया।

सामाजिक-आर्थिक कारण

भारत में सांप्रदायिकता की सामाजिक जड़ें औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था तथा उसके कारण उत्पन्न पिछड़ेपन में निहित थीं। औपनिवेशिक शोषण के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था में जो ठहराव आया, उसने मध्य वर्ग के जीवन पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव डाला। देशव्यापी आर्थिक ठहराव के कारण सरकारी नौकरियों, वकालत, चिकित्सा जैसे पेशों और उद्योग-व्यापार में भीषण प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुई। इन सीमित अवसरों को हथियाने के लिए मध्य वर्ग के लोग जाति, प्रांत और धर्म जैसी सामूहिक पहचानों का सहारा लेने लगे। इस प्रकार सांप्रदायिकता की जड़ें मुख्यतः मध्य वर्ग में निहित थीं और उसके माध्यम से मध्य वर्ग ने अपने हितों तथा आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया।

मुसलमानों में सांप्रदायिक और अलगाववादी प्रवृत्ति के विकास का एक प्रमुख कारण शिक्षा, व्यापार और उद्योगों में उनका अपेक्षाकृत पिछड़ापन था। उन्नीसवीं सदी के पहले सात दशकों में उच्च वर्ग के मुसलमान ब्रिटिश-विरोधी, रूढ़िवादी और आधुनिक शिक्षा के प्रति शत्रुभाव रखने वाले थे, इसलिए देश में शिक्षित मुसलमानों की संख्या अत्यल्प थी। 1874-75 ई. में बंगाल के विद्यालयों में जाने वाले बच्चों में मुसलमानों का हिस्सा केवल 29 प्रतिशत था, जबकि हिंदुओं का हिस्सा 70.1 प्रतिशत था। उच्च शिक्षा में असमानता और भी अधिक स्पष्ट थी-  1875 ई. में बंगाल के महाविद्यालयों में 93.9 प्रतिशत हिंदू छात्रों के मुकाबले मुसलमान केवल 5.4 प्रतिशत थे। अंग्रेजी भाषा में साक्षर मुसलमान केवल 1.50 प्रतिशत थे, जबकि हिंदुओं में यह अनुपात 4.40 प्रतिशत था।

शिक्षा के अभाव में आधुनिक पश्चिमी विचार- विज्ञान, लोकतंत्र और राष्ट्रवाद मुसलमान बुद्धिजीवियों में नहीं फैल सके और उनमें राजनीतिक चेतना का समुचित विकास नहीं हो सका। इसके विपरीत हिंदुओं ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी और पश्चिमी शिक्षा ग्रहण करने में उत्साह दिखाया, जिससे वे सरकारी नौकरियों और आर्थिक लाभ के पदों पर स्थापित हो गए।

ब्रिटिश सरकार के मुस्लिम-विरोधी चरित्र ने भी मुसलमानों के आर्थिक और सांस्कृतिक अधःपतन का मार्ग प्रशस्त किया। 1858 की घोषणा में यह कहा गया था कि सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति में जाति, धर्म आदि का भेदभाव नहीं किया जाएगा, तथापि सरकार ने मुसलमानों को राजकीय पदों से वंचित रखा। ऊँचे पद यूरोपीयों को और छोटे पद हिंदुओं को मिले, जबकि मुसलमान सरकारी नौकरियों से काफी हद तक वंचित रहे। 1871 में बंगाल में सरकारी अधिकारियों में मुसलमान केवल 5.9 प्रतिशत थे, जबकि हिंदू 41 प्रतिशत थे। 1883 ई. में जब अरबी और फारसी की जगह अंग्रेजी राजभाषा बनी, तो शक्ति और प्रभाव वाले पद तेजी से मुसलमानों के हाथ से निकलकर हिंदुओं के पास जाने लगे। कार्यपालिका और न्यायपालिका की निचली सेवाओं में मुसलमानों का हिस्सा 1857 ई. में 63.9 प्रतिशत था, जो 1886-87 ई. में गिरकर 45.1 प्रतिशत और 1913 में मात्र 34.7 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में इन सेवाओं में हिंदुओं का हिस्सा 24.1 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया। इस प्रकार आधी सदी के भीतर सरकारी सेवाओं में दोनों समुदायों की स्थिति पूरी तरह उलट गई।

जब मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का कुछ प्रसार हुआ, तो एक शिक्षित मुसलमान के सामने व्यवसाय और व्यापार के बहुत कम अवसर थे। ऐसी स्थिति में मुसलमानों में यह धारणा पनपी कि हिंदुओं और अंग्रेजों के बीच मुस्लिम समाज के विरुद्ध एक आंतरिक गठजोड़ है। फलतः प्रतिक्रियावादी बड़े जमींदार मुस्लिम जनता पर अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे और उन्होंने सांप्रदायिकता को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया।

पूरे भारत में मुसलमानों की जनसंख्या 1881 ई. में कुल जनसंख्या की 19.7 प्रतिशत थी, किंतु उनका वितरण अत्यंत असमान था- संयुक्त प्रांत में केवल 13 प्रतिशत से कुछ अधिक, पंजाब में 51 प्रतिशत से कुछ अधिक और बंगाल में लगभग 49.2 प्रतिशत। इन भौगोलिक असमानताओं के अतिरिक्त शिया-सुन्नी भेद, भाषाई भेद और आर्थिक विषमताएँ भी मुस्लिम समाज को एकरूप नहीं होने देती थीं। किंतु जब दक्षिण एशियाई इस्लाम में एक समरस धार्मिक-राजनीतिक समुदाय का मिथक गढ़ा गया, तो भारतीय मुसलमानों का एक बड़ा भाग स्वयं को हिंदुओं से अलग एकजुट समुदाय के रूप में देखने लगा। मुस्लिम उच्च वर्ग और प्रतिक्रियावादी जमींदारों ने अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए इन मिथकों को फैलाया और धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय को एकताबद्ध करने का प्रयास किया।

‘बाँटो और राज करो’ की ब्रिटिश नीति

1857 ई. के सिपाही विद्रोह में हिंदू और मुस्लिम दोनों ने एकजुट होकर ब्रिटिश शासन का प्रतिरोध किया था। इस विद्रोह में मुसलमानों की सक्रिय भूमिका को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिमों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण नीति अपनाई। 1857 ई. के बाद सरकारी पदों पर मुसलमानों की नियुक्ति लगभग बंद हो गई और उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। इस भेदभावपूर्ण नीति से मुसलमानों को लगा कि हिंदुओं और अंग्रेजों के बीच उनके विरुद्ध एक प्रकार का गठबंधन बन गया है और यहीं से दोनों समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास की भावना पनपने लगी।

1870 ई. के बाद भारतीय राष्ट्रवाद के उभार को रोकने के लिए अंग्रेजों और मुसलमानों के बीच मेल-मिलाप की सोची-समझी नीति अपनाई गई। विलियम विल्सन हंटर ने अपनी पुस्तक ‘द इंडियन मुसलमान्स’ (1871 ई.) में एंग्लो-मुस्लिम मैत्री की आवश्यकता पर बल दिया। राष्ट्रीय भावना के विकास को रोकने के लिए अंग्रेजों ने ‘बाँटो और राज करो’ की नीति के अंतर्गत सांप्रदायिक और अलगाववादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने बंगाली बौद्धिक वर्चस्व का नाम लेकर प्रांतवाद को हवा दी, गैर-ब्राह्मण जातियों को ब्राह्मणों के और निचली जातियों को उच्च जातियों के विरुद्ध खड़ा करने के लिए जातिप्रथा का दोहन किया। अंग्रेजों ने संयुक्त प्रांत और बिहार में उर्दू के स्थान पर हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के आंदोलन को खुलकर प्रोत्साहन दिया।

ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को अलग-अलग और पृथक् समुदाय के रूप में मान्यता दी और सांप्रदायिक नेताओं को उनके सहधर्मियों का वास्तविक प्रतिनिधि मान लिया। सरकार ने प्रेस, पुस्तिकाओं, पोस्टरों और साहित्य के माध्यम से जहरीले सांप्रदायिक विचार और घृणा फैलाने की भी पूरी छूट दे दी। औपनिवेशिक सरकार ने जानबूझकर धर्म के आधार पर साक्षरता और व्यवसाय-संबंधी आँकड़ों का तुलनात्मक चित्र जनता के सामने रखा, जिससे धार्मिक समूहों के बीच प्रतिद्वंद्विता और ईर्ष्या को पोषण मिला।

उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में पंजाब के शहरों में आर्य समाज के आक्रामक आंदोलन ने मुसलमानों को जवाबी लामबंदी के लिए प्रेरित किया। देहातों में सज्जादानशीनों, पीरों और उलमाओं के सहारे इस्लाम ने ग्रामीण राजनीति में गहरी पैठ बनाई। 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद अंग्रेजों ने राष्ट्रवादी ताकतों को कमजोर करने के लिए मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण और विभिन्न सेवाओं में प्राथमिकता देने की नीति अपनाई। बीसवीं सदी के पहले दशक में ब्रिटिश सरकार ने अपनी इसी नीति के अंतर्गत बंगाल-विभाजन किया और मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठन की स्थापना को प्रोत्साहन दिया।

सर सैयद अहमद खाँ की भूमिका

धार्मिक अलगाववाद के विकास में ‘मुस्लिम पुनर्जागरण के अग्रदूत’ सर सैयद अहमद खाँ की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद दोनों है। अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारंभिक काल में सर सैयद एक राष्ट्रवादी थे — उनका दृष्टिकोण बुद्धिसंपन्न, दूरदर्शी और सुधारवादी था। उन्होंने कांग्रेस की स्थापना से पहले असांप्रदायिक आधार पर कई शिक्षण संस्थाओं की नींव रखी थी। किंतु जीवन के अंतिम दशकों में उनकी राष्ट्रीयता धीरे-धीरे सांप्रदायिकता में परिवर्तित हो गई।

सैयद अहमद खाँ के जीवन के दो प्रमुख उद्देश्य थे- प्रथम, अंग्रेजी हुकूमत और मुस्लिमों के मध्य 1857 के विद्रोह के बाद उत्पन्न अविश्वास की खाई को भरना, और द्वितीय, मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना ताकि उनका पिछड़ापन दूर हो सके। इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 1875 में मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना अलीगढ़ में की, जो आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण (Reasons for the Rise of Communalism in India)
सर सैयद अहमद खाँ

सैयद अहमद खाँ का राजनीतिक तर्क था कि अल्पसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों को एक भूतपूर्व शासक वर्ग होने के कारण सत्ता में विशेष प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनकी यह राजनीतिक विचारधारा इस विश्वास पर टिकी थी कि यदि देश आज़ाद हो और कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बने, तो उसमें हिंदुओं का स्वाभाविक वर्चस्व होगा और मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक माने जाएँगे। यद्यपि उनका मुस्लिम-अंग्रेज गठबंधन का प्रयास स्वयं हिंदू-विरोधी नहीं था, तथापि इस प्रक्रिया ने दोनों समुदायों के बीच एक ऐसी दरार पैदा की जो आने वाले समय में और गहरी होती गई।

सैयद अहमद खाँ के विचार वास्तव में अवैज्ञानिक और सरलीकृत थे। एक बंगाली मुसलमान और एक पंजाबी मुसलमान की तुलना में एक बंगाली मुसलमान और एक बंगाली हिंदू में आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से कहीं अधिक समानता थी। उत्तर भारत के मुस्लिम समुदाय में सर सैयद के नेतृत्व को कभी सर्वसम्मत स्वीकृति नहीं मिली। जमालुद्दीन अल-अफगानी जैसे उपनिवेशवाद-विरोधी विचारक सर सैयद की अंग्रेजों के प्रति वफादारी को पसंद नहीं करते थे। 1880 के दशक के अंत तक उत्तर भारत के अनेक मुसलमान कांग्रेस की ओर आकृष्ट होने लगे थे। 1887 ई. में बंबई के बदरुद्दीन तैयब जी कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने। 1890 के दशक के अंत तक पंजाब के अनेक उर्दू अखबार यह कहने लगे थे कि अलीगढ़ संप्रदाय भारतीय मुसलमानों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करता।

भारतीय इतिहास का सांप्रदायिक लेखन

ब्रिटिश साम्राज्यवाद को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक अंग्रेजी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की ऐसी विकृत व्याख्या प्रस्तुत की, जिसने हिंदुओं और मुसलमानों में सांप्रदायिक भावनाओं को गहराई से उभारा। ब्रिटिश इतिहासकारों और उनका अनुकरण करने वाले भारतीय इतिहासकारों ने प्राचीन भारत को ‘हिंदू काल’ तथा मध्यकाल को ‘मुस्लिम काल’ की संज्ञा दी। तुर्क, अफगान और मुगल शासकों के शासनकाल को ‘मुस्लिम शासन’ कहा गया, मानो संपूर्ण मुस्लिम जनसमुदाय शासक था, जबकि वास्तविकता यह थी कि मुस्लिम जनता भी हिंदू जनता की ही भाँति करों के बोझ से दबी और पीड़ित थी।

वास्तव में, अन्य देशों की तरह भारत में भी प्राचीन और मध्यकालीन राजनीति का आधार आर्थिक और राजनीतिक हित थे, न कि धार्मिक विचार। शासकों और विद्रोहियों दोनों ने ही धर्म का उपयोग अपने भौतिक हितों और महत्वाकांक्षाओं को छिपाने के लिए किया। सांप्रदायिक इतिहासकारों ने शासकों के आपसी राजनीतिक संघर्ष को हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया। महाराणा प्रताप और अकबर के बीच या शिवाजी और औरंगजेब के बीच के राजनीतिक संघर्षों को धार्मिक संघर्ष के रूप में महिमामंडित करना इतिहासलेखन की गंभीर भूल थी, क्योंकि इन संघर्षों में दोनों पक्षों के सेनापति और सहयोगी दोनों ही धर्मों के थे।

गरमपंथी राष्ट्रवाद और हिंदू पुनरुत्थानवाद

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उदारवादी आंदोलन की सीमाओं, राष्ट्रीय आंदोलन से आम जनता को जोड़ने की आवश्यकता और हिंदू धर्म की प्राचीन गौरव-भावना को उभारने के लिए ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ का उदय हुआ। यह पुनरुत्थानवाद केवल धार्मिक नहीं था- इसका एक जोरदार राजनीतिक स्वर भी था, जो एक आधुनिक भारतीय राष्ट्र की निर्माण-प्रक्रिया से प्रेरित था। किंतु इस आंदोलन ने अनजाने में ही यह भ्रामक धारणा फैलाई कि भारतीय समाज प्राचीन काल में महानता के शीर्ष पर था, किंतु मध्यकाल में मुस्लिम शासन के कारण उसका निरंतर पतन हुआ।

आरंभ में हिंदू पुनरुत्थानवाद का स्वरूप सामाजिक था, किंतु शीघ्र ही इसने एक राजनीतिक भूमिका ग्रहण कर ली और धार्मिक प्रतीकों, देवी-देवताओं तथा सांस्कृतिक उत्सवों के सहारे राष्ट्रीय आंदोलन का प्रचारक बन गया। पंजाब के लाला लाजपत राय, बंगाल के बाल गंगाधर तिलक और महाराष्ट्र के विपिनचंद्र पाल जैसे कुछ गरमपंथी राष्ट्रवादियों के भाषण और लेखन धार्मिक और हिंदू रंगत में रंगे हुए होते थे। हिंदुओं को एकजुट करने के लिए तिलक ने गणपति एवं शिवाजी उत्सवों की शुरुआत की और मुस्लिम पर्वों का बहिष्कार करने की अपील की।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण (Reasons for the Rise of Communalism in India)
हिंदू पुनरुत्थानवाद

उत्तर भारत में आर्य समाज ने गोरक्षा आंदोलन प्रारंभ किया, जिससे मुस्लिम समुदाय में विभिन्न शंकाएँ जन्म लेने लगीं। 1893 ई. के गोवध-संबंधी दंगों के बाद गोवध पर कानूनी प्रतिबंध की हिंदू माँग और उस पर कांग्रेस की चुप्पी ने अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को और बढ़ा दिया। भारत माता तथा राष्ट्रवाद को धर्म के रूप में देखने की अरविंद घोष की अवधारणाएँ, गंगा-स्नान के बाद बंग-भंग विरोधी आंदोलन का प्रारंभ और क्रांतिकारी आतंकवादियों द्वारा देवी काली या भवानी के समक्ष शपथ-ग्रहण की रस्में, ये सभी प्रतीक मुसलमानों को अपने से अलग महसूस कराते थे।

यद्यपि अधिकांश गरमपंथी राष्ट्रवादी हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे और वे पूर्णतः सांप्रदायवादी नहीं थे, तथापि उनके राजनीतिक कार्यों पर हिंदू रंगत की जो छाप थी, उसका ब्रिटिश सरकार ने लाभ उठाकर मुसलमानों के मन में जहर घोलने का काम किया। परिणामस्वरूप मुसलमान बड़ी संख्या में राष्ट्रीय आंदोलन से दूर होते चले गए।

बंगाल विभाजन और सांप्रदायिक प्रभाव (1905 ई.)

भारतीय राष्ट्रवाद की उठती हुई लहर के उत्तर में ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बहुसंख्यक एक नया पूर्वी बंगाल प्रांत बनाकर हिंदुओं के विरुद्ध मुसलमानों को खड़ा करने की नीति अपनाई। मुसलमानों को विशेष संरक्षण देने की नीति पहले जुलाई 1885 ई. के एक प्रस्ताव में पेश की गई थी और 1897 ई. के एक परिपत्र में यह प्रावधान किया गया कि कार्यपालिका की निचली सेवाओं में दो-तिहाई रिक्त पद नामांकन द्वारा भरे जाएंगे ताकि सांप्रदायिक संतुलन बने।

बंगाल-विभाजन के लिए प्रशासनिक सुविधा का जितना भी ढिंढोरा पीटा गया, उसका मुख्य उद्देश्य बंगाल में हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना और उसे क्षेत्रीय आधार पर विभाजित करना था। गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने मुसलमानों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि नया प्रांत बनने से उन्हें अधिक राजनीतिक और प्रशासनिक अवसर मिलेंगे। इस चाल में मुसलमानों का एक बड़ा तबका आया और उसने बंगाल-विभाजन का समर्थन किया।

बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन में भी कुछ नेताओं ने धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाने के बजाय यह राग अलापा कि हिंदुओं की कीमत पर मुसलमानों को विशेष सुविधाएँ दी जा रही हैं। इससे स्वदेशी आंदोलन मुसलमानों की दृष्टि में एक मुस्लिम-विरोधी आंदोलन के रूप में चित्रित होने लगा। यद्यपि अब्दुर रसूल और हसरत मोहानी जैसे प्रगतिशील मुस्लिम नेता इस आंदोलन में शामिल हुए, तथापि बंगाल के अनेक भागों में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए। इन दंगों का तात्कालिक कारण राजनीतिक था, किंतु उनकी आर्थिक जड़ें हिंदू जमींदारों-पूँजीपतियों और मुस्लिम किसानों-श्रमिकों के बीच के वर्गीय टकराव में थीं।

1911 ई. में जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल-विभाजन को निरस्त किया तो बंगाल के उन मुसलमानों को गहरी निराशा हुई जो नए प्रांत में विशेष अवसरों की आशा लगाए बैठे थे। इसका लाभ उठाकर यह प्रचार किया गया कि कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता मिलने पर यह हिंदू तानाशाही पर आधारित होगी और मुसलमानों को दोयम दर्जे के नागरिक माना जाएगा।

मुस्लिम लीग की स्थापना (1906 ई.)

भारत-सचिव मॉर्ले ने 1906 ई. के बजट-भाषण में भारत में प्रतिनिधि शासन की संभावना का संकेत दिया, तो मुस्लिम नेता चिंतित हो उठे। उन्हें भय था कि नई स्वशासी संस्थाओं में बहुसंख्यक हिंदू, जो कांग्रेस में अच्छी तरह संगठित थे, का वर्चस्व हो जाएगा। मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल 1 अक्टूबर 1906 ई. को शिमला में गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो से मिला और वायसरॉय ने आश्वासन दिया कि मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय के कारण (Reasons for the Rise of Communalism in India)
मुस्लिम लीग की स्थापना

ब्रिटिश सरकार की प्रोत्साहन-नीति के तहत 30 दिसंबर 1906 ई. को ढाका में नवाब वकार-उल-मुल्क, आगा खाँ और मोहसिन-उल-मुल्क ने ‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग’ का गठन किया। मुस्लिम लीग ने न केवल बंगाल-विभाजन का समर्थन किया, बल्कि मुसलमानों के लिए अलग मतदाता मंडलों की माँग भी की। मुस्लिम लीग का वास्तविक संघर्ष ब्रिटिश सत्ता से नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और हिंदुओं से था।

प्रसंगवश, बंगाल का पहला मुस्लिम संगठन 1855 ई. में स्थापित ‘मुहम्मडन एसोसिएशन’ या ‘अंजुमन-ए-इस्लामी’ था, जिसके दो उद्देश्य थे- अपने समुदाय के हितों को बढ़ावा देना और अंग्रेजों के प्रति वफादारी का प्रचार करना। लीग के प्रथम आरंभिक दशक में उस पर संयुक्त प्रांत के मुसलमानों का वर्चस्व रहा और अलीगढ़ अखिल भारतीय मुस्लिम राजनीति का केंद्र बन गया। 1907 और 1909 ई. के बीच सभी प्रमुख प्रांतों में प्रांतीय मुस्लिम लीगें गठित हुईं। मई 1908 ई. में लीग की लंदन शाखा आरंभ हुई, जिसने सैयद अमीर अली के नेतृत्व में मार्ले-मिंटो सुधारों को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मार्ले-मिंटो सुधार और पृथक् निर्वाचन मंडल (1909 ई.)

1909 ई. के मार्ले-मिंटो सुधारों ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन मंडल तथा केंद्रीय और प्रांतीय विधायिकाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक सीटों का आरक्षण करके भारतीय मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान को औपचारिक और आधिकारिक वैधता प्रदान की। अलग निर्वाचन क्षेत्रों में समस्त मतदाता एक ही धर्म के होते थे, जिससे चुनाव प्रचार पूरी तरह सांप्रदायिक आधार पर होता था। भारत-सचिव लॉर्ड मॉर्ले ने वायसरॉय मिंटो को लिखा था: “पृथक् निर्वाचन क्षेत्र बनाकर हम ऐसे घातक विष के बीज बो रहे हैं, जिनकी फसल बड़ी कड़वी होगी।” यह भविष्यवाणी 1947 ई. के विभाजन के रूप में सच साबित हुई। 1919 ई. के भारत सरकार अधिनियम में यह पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था अन्य अल्पसंख्यक वर्गों- सिखों, यूरोपियनों, एंग्लो-इंडियनों तक भी विस्तारित कर दी गई।

मुहम्मद अली जिन्ना ने पृथक् प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को भारत के ‘राजनीतिक शरीर में बुरी नीयत से प्रविष्ट किया गया विषैला तत्व’ बताया। 1906 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की माँग का विरोध करते हुए कहा था : “मैं समझता हूँ कि मुस्लिम समाज के साथ वही सलूक करना चाहिए, जैसा हिंदू समाज के साथ किया जा रहा है।” 1906 ई. के बाद जिन्ना ने जितनी जनसभाएँ कीं, उनमें राष्ट्रीय एकता पर बल दिया, जिसके कारण सरोजिनी नायडू ने उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत’ की संज्ञा दी थी। सांप्रदायिकता की दिशा में जिन्ना का पहला कदम उनकी इच्छा के विरुद्ध उठा, जब वे पृथक् मतदाता मंडल की व्यवस्था के अंतर्गत बंबई से केंद्रीय विधान परिषद के मुस्लिम सदस्य चुने गए। 1913 ई. में जिन्ना मुस्लिम लीग में सम्मिलित हो गए।

हिंदू सांप्रदायिकता का उदय और हिंदू महासभा

मुस्लिम सांप्रदायिकता के समानांतर हिंदू सांप्रदायिकता का भी उदय हुआ। हिंदू सांप्रदायवाद की नींव वस्तुतः आर्य समाज (1875 ई.) के शुद्धि आंदोलनों ने रख दी थी। संयुक्त प्रांत और बिहार में हिंदी के प्रश्न को सांप्रदायिक रंग दिया गया और यह अनैतिहासिक अवधारणा फैलाई गई कि उर्दू केवल मुसलमानों की और हिंदी केवल हिंदुओं की भाषा है, जबकि वास्तव में दोनों भाषाएँ सदियों से भारतीय समाज की साझी विरासत थीं। 1870 के बाद से ही कुछ हिंदू जमींदारों, साहूकारों और मध्यवर्गीय पेशेवरों ने मुस्लिम-विरोधी भावनाएँ भड़काना प्रारंभ कर दिया था।

1890 के दशक में महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में हिंदू संगठनों ने गोवध-विरोधी अभियान चलाया जिससे व्यापक सांप्रदायिक दंगे हुए। 1893 ई. के बंबई के भीषण दंगों के बाद तिलक ने मुहर्रम का बहिष्कार करने और गणपति पूजा में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। इससे धार्मिक उत्सव सांप्रदायिक तनाव के अवसर बनने लगे। 1909 ई. में बी.एन. मुखर्जी तथा लालचंद ने पंजाब हिंदू सभा की स्थापना की। 1910 ई. में इलाहाबाद के कुछ हिंदू नेताओं ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा बनाने का निश्चय किया और अप्रैल 1915 ई. में उसका प्रथम अधिवेशन कासिम बाजार के महाराजा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। लालचंद ने घोषणा की कि हिंदू स्वयं को ‘पहले हिंदू और फिर भारतीय’ मानें, यह विचार राष्ट्रीय एकता के लिए एक गंभीर चुनौती था।

लखनऊ समझौता और उसके सांप्रदायिक निहितार्थ (1916 ई.)

राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा देने के लिए दिसंबर 1915 ई. में मुस्लिम लीग और कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन बंबई में हुए। तिलक और जिन्ना के प्रयास से 1916 के अंत में लखनऊ में लीग और कांग्रेस का संयुक्त अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसमें ‘लखनऊ समझौता’ संपन्न हुआ। इस समझौते में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचक मंडल की माँग को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यद्यपि यह एकता का एक महत्त्वपूर्ण कदम था, तथापि इसके सांप्रदायिक निहितार्थ दूरगामी थे। कांग्रेस ने वस्तुतः सांप्रदायिकता की राजनीति को अप्रत्यक्ष मान्यता दे दी और मुस्लिम लीग को मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्वीकार कर लिया।

असहयोग आंदोलन में मुस्लिमों के धार्मिक आंदोलन ‘खिलाफत’ को जोड़ने से कुछ समय के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता अपने शीर्ष पर पहुँच गई, किंतु यह एकता क्षणिक साबित हुई। खिलाफत आंदोलन से रूढ़िवादी मुसलमानों को राजनीति में प्रवेश का अवसर मिला जो भारत को केवल धार्मिक समुदायों के एक संघ के रूप में देखते थे। खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम मध्यवर्ग की साम्राज्यवाद-विरोधी भावना को जगाया, किंतु उनकी धार्मिक-राजनीतिक चेतना को धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक चेतना में परिवर्तित करने में वह असफल रहा।

मुस्लिम राष्ट्रवाद की बदलती धाराएँ

बीसवीं सदी के पहले दशक के बाद मुस्लिम युवा वर्ग में आधुनिक और परिवर्तनवादी विचारों का प्रवेश हुआ। 1911 ई. में बंगाल-विभाजन की निरस्ति से पहले ही नए मुस्लिम मध्य वर्ग में राजनीतिक परिपक्वता आ रही थी। मौलाना अबुल कलाम आजाद ‘अल-हिलाल’ (1912 ई.) के माध्यम से बुद्धिवादी और राष्ट्रीय विचारों का प्रचार कर रहे थे। डॉ. अंसारी, मौलाना मोहम्मद अली और हकीम अजमल खाँ जैसे प्रखर मुस्लिम नेता मानते थे कि मुसलमानों को अंग्रेजों से नजदीकियाँ छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन का भाग बनना चाहिए। देवबंद के उलमाओं का एक वर्ग भी राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रेरित था। इस प्रकार मुस्लिम समाज कभी भी एकरूप नहीं था- उसमें राष्ट्रवादी, सांप्रदायिक, उदारवादी और रूढ़िवादी, सभी प्रकार की धाराएँ विद्यमान थीं।

कांग्रेस और सांप्रदायिक प्रश्न

कांग्रेस ने 1888 ई. में एक नियम बनाया था कि यदि हिंदू या मुसलमान प्रतिनिधियों का भारी बहुमत किसी प्रस्ताव पर आपत्ति करे, तो वह प्रस्ताव पारित नहीं होगा। 1889 ई. में विधायिका सुधार से संबंधित प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों के समानुपाती प्रतिनिधित्व की सिफारिश भी जोड़ी गई। किंतु 1892 और 1909 ई. के बीच कांग्रेस के अधिवेशनों में आए प्रतिनिधियों में लगभग 90 प्रतिशत हिंदू और केवल 6.5 प्रतिशत मुसलमान थे- बदरुद्दीन तैयब जी जैसे अपवादों को छोड़कर। हिंदुओं में भी लगभग 40 प्रतिशत ब्राह्मण और शेष अन्य सवर्ण हिंदू थे। इस वर्गीय और सामुदायिक असंतुलन ने मुस्लिम विमुखता को और गहरा किया। मुस्लिम लीग कांग्रेस को हिंदुवादी संगठन के रूप में प्रचारित करती थी, यद्यपि कांग्रेस अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के प्रति सचेत थी।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय का मूल्यांकन

भारत में सांप्रदायिकता का उदय न तो आध्यात्मिक था, न ही अनिवार्य, यह मुख्यतः राजनीतिक था और इसकी जड़ें औपनिवेशिक शासन, मध्य वर्गीय आर्थिक स्पर्धा तथा दोनों समुदायों के उच्च वर्गों के स्वार्थों में थीं। जहाँ अंग्रेजों के लिए अपनी सत्ता कायम रखने के लिए भारत की सामाजिक-धार्मिक एकता को खंडित करना अनिवार्य था, वहीं हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के संपन्न वर्गों को आर्थिक और राजनीतिक अवसरों की प्रतिस्पर्धा में धार्मिक पहचान को आधार बनाने की जरूरत महसूस हुई।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय का सबसे बड़ा शिकार आम जनता, वे किसान, मजदूर और गरीब हिंदू-मुसलमान हुई जिनके बीच सदियों की साझी संस्कृति, संगीत, साहित्य और लोक-परंपराओं की विरासत थी। इस सांप्रदायिकता का लाभ मुख्यतः दोनों समुदायों के राजनीतिक और आर्थिक अभिजात वर्ग ने उठाया। इसीलिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के अनेक प्रमुख नेताओं- गांधीजी, नेहरू, मौलाना आजाद, डॉ. अंसारी ने सांप्रदायिकता को न केवल राष्ट्रीय एकता के लिए, बल्कि आम जनता के हितों के लिए भी सबसे बड़ा खतरा माना और उसके विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। यही इस दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण सबक है।

भारत में सांप्रदायिकता के उदय से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न: भारत में सांप्रदायिकता से क्या तात्पर्य है?

सांप्रदायिकता ऐसी राजनीतिक विचारधारा है जिसमें किसी धार्मिक समुदाय के हितों को अन्य समुदायों से अलग और परस्पर विरोधी मानकर राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक हितों को धार्मिक आधार पर संगठित किया जाता है। औपनिवेशिक भारत में यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हुई।

प्रश्न: भारत में सांप्रदायिकता के उदय में ब्रिटिश शासन की क्या भूमिका थी?

ब्रिटिश शासन ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच राजनीतिक विभाजन को बढ़ावा दिया। प्रशासनिक नीतियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्थाओं ने सामुदायिक पहचान को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जोड़ने में योगदान दिया।

प्रश्न: पृथक निर्वाचन प्रणाली ने सांप्रदायिकता को कैसे बढ़ावा दिया?

1909 ई. के भारतीय परिषद अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार) द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था शुरू की गई। इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व को धार्मिक आधार पर संगठित करने की प्रवृत्ति मजबूत हुई। बाद में यह व्यवस्था अन्य समुदायों तक भी विस्तारित हुई।

प्रश्न: मुस्लिम लीग की स्थापना का सांप्रदायिक राजनीति के विकास में क्या महत्त्व था?

1906 ई. में ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। प्रारंभ में इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक हितों और अधिकारों का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन समय के साथ इसकी राजनीति में अलग मुस्लिम राजनीतिक हितों और प्रतिनिधित्व की माँग अधिक प्रमुख होती गई।

प्रश्न: हिंदू पुनरुत्थानवादी आंदोलनों का सांप्रदायिकता पर क्या प्रभाव पड़ा?

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के कुछ हिंदू पुनरुत्थानवादी आंदोलनों ने धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया। यद्यपि इन आंदोलनों के उद्देश्य एकरूप नहीं थे और कई सामाजिक सुधार पर केंद्रित थे, लेकिन कुछ राजनीतिक धाराओं ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक लामबंदी से जोड़ दिया, जिससे सामुदायिक तनाव बढ़ा।

प्रश्न: आर्थिक और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने सांप्रदायिकता को कैसे प्रभावित किया?

आधुनिक शिक्षा, सरकारी नौकरियों, व्यापार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सीमित अवसरों के लिए विभिन्न समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी। कई बार इन आर्थिक और सामाजिक हितों को धार्मिक पहचान के आधार पर प्रस्तुत किया गया, जिससे सामुदायिक राजनीतिक संगठन मजबूत हुए।

प्रश्न: ब्रिटिश जनगणना और प्रशासनिक वर्गीकरण का क्या प्रभाव पड़ा?

औपनिवेशिक सरकार द्वारा जनसंख्या को धार्मिक एवं सामाजिक श्रेणियों में व्यवस्थित रूप से वर्गीकृत करने से लोगों की सामुदायिक पहचान अधिक स्पष्ट राजनीतिक श्रेणियों में प्रस्तुत होने लगी। इससे धार्मिक समुदायों के बीच संख्या और प्रतिनिधित्व को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ने में योगदान मिला।

प्रश्न: भारत में सांप्रदायिकता के विकास के अन्य प्रमुख कारण क्या थे?

सांप्रदायिकता के विकास में औपनिवेशिक नीतियाँ, पृथक निर्वाचन, सामुदायिक राजनीतिक संगठनों का उदय, सीमित राजनीतिक अवसर, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, धार्मिक पहचान का राजनीतिकरण, सामुदायिक प्रेस तथा विभिन्न क्षेत्रों में उत्पन्न सामाजिक-धार्मिक तनाव जैसे अनेक कारकों की भूमिका रही। इन कारणों के परस्पर प्रभाव से सांप्रदायिक राजनीति धीरे-धीरे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक प्रमुख चुनौती बन गई।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks