कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty)

कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty)
कुषाण राजवंश कुषाण राजवंश का परिचय कुषाण राजवंश प्राचीन भारतीय और मध्य एशियाई इतिहास के […]

Table of Contents

कुषाण राजवंश

कुषाण राजवंश का परिचय

कुषाण राजवंश प्राचीन भारतीय और मध्य एशियाई इतिहास के सबसे प्रभावशाली राजवंशों में से एक था। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत में शुंग, कण्व, इंडो-यूनानी, शक और पह्लव जैसी अनेक शक्तियों का उदय हुआ, किंतु इनमें किसी का भी राज्य कुषाणों जितना विशाल और स्थायी नहीं था। कुषाण शासकों ने प्रथम शताब्दी ई. के आसपास उत्तर-पश्चिमी भारत में अपनी सत्ता स्थापित की,  जिसमें मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान के साथ-साथ उत्तर, मध्य तथा पूर्वी भारत के  विस्तृत भूभाग सम्मिलित थे। पुरुषपुर (पेशावर) और मथुरा इस साम्राज्य के प्रमुख केंद्र थे।

कुषाण मूलतः मध्य एशिया की यू-ची (युएझ़ी) जनजाति की एक शाखा थे। इस वंश का संस्थापक कुजुल कैडफिसेस (कुजुल कडफिसेस) था। ‘कुषाण’ शब्द किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं था। यह यू-ची कबीलों के संघ की उस शाखा का नाम था जिसे चीनी स्रोतों में ‘कुई-शुआंग’ कहा गया है। यूनानियों, रोमनों और चीनियों से निरंतर संपर्क के कारण कुषाणों ने भारतीय प्रायद्वीप में एक समन्वित संस्कृति के विकास को प्रोत्साहन दिया, जिससे भारतीय संस्कृति, कला, धर्म, मुद्रा-व्यवस्था और साहित्य को नई दिशा मिली। राजनीतिक स्थिरता, व्यापारिक समृद्धि और सांस्कृतिक समन्वय के कारण इस काल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है।

कुषाण इतिहास के प्रमुख स्रोत

कुषाण राजवंश के इतिहास की जानकारी चीनी ग्रंथों, अभिलेखों, सिक्कों, बौद्ध साहित्य और पुरातात्त्विक उत्खननों से मिलती है। चीनी ग्रंथों में पान-कू रचित ‘सिएन-हान-शू’ (पूर्ववर्ती हान वंश का इतिहास) और फान-ए रचित ‘हाऊ-हान-शू’ (परवर्ती हान वंश का इतिहास) सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। इनसे यू-ची जाति के हूणों (श्यांग-नू), शकों और वु-सुन जनजाति से संघर्ष तथा उनके पाँच राज्यों के गठन की जानकारी मिलती है। ‘हाऊ-हान-शू’ के अनुसार यू-ची के पाँच कबीलों में कुई-शुआंग सबसे शक्तिशाली था और उसके नेता कुजुल कैडफिसेस ने शेष सभी कबीलों को विजित कर शक्तिशाली कुषाण राज्य का निर्माण किया।

कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों के विषय में तिब्बती बौद्ध अनुश्रुतियों, संस्कृत बौद्ध ग्रंथों के चीनी अनुवादों तथा ह्वेनसांग और फाह्यान जैसे चीनी यात्रियों के विवरणों से उपयोगी सूचनाएँ मिलती हैं। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में भी कश्मीर पर कनिष्क, हुष्क (हुविष्क) और जुष्क के शासन का उल्लेख मिलता है। तिब्बती स्रोतों से पता चलता है कि कनिष्क खोतान-नरेश विजयकीर्ति का समकालीन था। संस्कृत बौद्ध ग्रंथों- ‘श्रीधर्मपिटक निदानसूत्र’, ‘संयुक्त रत्नपिटक’ तथा ‘कल्पना मंडिटिका’ के चीनी अनुवादों से कनिष्क की पूर्वी तथा उत्तरी भारत की विजयों की जानकारी मिलती है।

अभिलेखीय स्रोतों में सबसे महत्त्वपूर्ण 1993 ई. में अफ़ग़ानिस्तान के बग़लान प्रांत से मिला राबातक अभिलेख है, जो  यूनानी लिपि में बैक्ट्रियन भाषा में लिखा गया है। इसमें कनिष्क ने अपने पूर्वजों का उल्लेख किया है, जिनमें कुजुल कैडफिसेस (परदादा), विम तक्तो (दादा) और विम कैडफिसेस (पिता) शामिल हैं। साथ ही उसने अपनी विजयों और धार्मिक आस्थाओं का वर्णन किया है। इस अभिलेख से कुषाण वंशक्रम की जानकारी मिलती है। इसके अलावा कौशांबी, सारनाथ, मथुरा, सुई विहार, जेदा, माणिक्याल और आरा (पेशावर) जैसे स्थानों से कनिष्क और उसके वंशजों के अनेक अभिलेख मिले हैं।

कुषाण इतिहास के सबसे विश्वसनीय स्रोत सिक्के हैं। कुषाणों के स्वर्ण और ताँबे के सिक्के अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और ओडिशा तक मिले हैं, जिनसे कुषाण साम्राज्य के विस्तार, शासकों की उपाधियों, धार्मिक विश्वासों और आर्थिक स्थिति का ज्ञान होता है। जॉन मार्शल द्वारा तक्षशिला(पाकिस्तान)  में किए गए उत्खनन तथा हैकिन और घिर्शमान द्वारा बेग्राम (प्राचीन कपिशा) में कराई गई खुदाइयों से प्राप्त कुषाणकालीन सिक्कों और अवशेषों से भी कुषाण इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायता मिलती है।

यू-ची जाति का मूल निवास और पश्चिम की ओर प्रवास

चीनी स्रोतों के अनुसार यू-ची जाति आरंभ में चीन के उत्तर-पश्चिम में कानसू (गांसू) प्रदेश और तकलामकान मरुस्थल के सीमांत क्षेत्र में निवास करती थी। यह खानाबदोश पशुपालक समुदाय था। यू-ची इंडो-यूरोपीय भाषा-परिवार से संबंधित थे और उनका संबंध तोखारी जनसमूह से था। उत्तर में हूणों (श्यांग-नू) की शक्ति बढ़ने पर उनके साथ यू-ची का संघर्ष शुरू हुआ।

चीनी स्रोतों के अनुसार दूसरी शताब्दी ई.पू. के आरंभ में हूण शासक मोदुन (मोदे) ने यू-ची को पराजित किया। उसके उत्तराधिकारी के समय यू-ची के राजा की हत्या कर दी गई और उन्हें अपना मूल निवास छोड़ना पड़ा।

पराजित यू-ची दो शाखाओं में बँट गए। छोटी शाखा तिब्बत की सीमा की ओर चली गई, जिसे ‘लघु यू-ची’ कहा गया। मुख्य शाखा पश्चिम की ओर बढ़ती हुई इली नदी की घाटी में पहुँची और वहाँ बसे वु-सुन जनजाति को पराजित किया। कुछ समय बाद वु-सुन ने हूणों की सहायता से प्रतिशोध लिया और यू-ची को वहाँ से भी खदेड़ दिया। यू-ची फिर सीर दरिया (जक्सार्टीज़) की घाटी में गए और वहाँ बसे शकों को हराकर उस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। शकों के विस्थापन से मध्य एशिया में बड़ी उथल-पुथल हुई। उनकी एक शाखा बैक्ट्रिया और पार्थिया की ओर गई, तो दूसरी शाखा भारत में प्रविष्ट हुई, जिसके परिणामस्वरूप भारत में शक शासन की स्थापना हुई।

यू-ची लोग शकों को भगाकर सीर नदी की घाटी में तो बस गए, परंतु वहाँ अधिक समय तक शांतिपूर्वक नहीं रह सके। वहाँ से हटकर वे दूसरी शताब्दी ई.पू. के मध्य के आसपास आक्सस नदी के पार बैक्ट्रिया पहुँचे और यूनानी बैक्ट्रियन राज्य के अवशेषों पर अधिकार कर लिया। चीनी दूत चांग-च्येन ने लगभग 128 ई.पू. के आसपास बैक्ट्रिया की यात्रा की थी और वहाँ यू-ची को बसे पाया था। उसके विवरण में बताया गया है कि वे अब खानाबदोश जीवन छोड़कर स्थायी जीवन अपना चुके थे।

यू-ची के पाँच राज्य और ‘कुषाण’ नाम की उत्पत्ति

बैक्ट्रिया में बसने के बाद यू-ची पाँच छोटे राज्यों में विभक्त हो गए, जिनके नाम चीनी स्रोतों में मिलते हैं। हिऊ-मी का क्षेत्र संभवतः वाख़ान था। शुआँग-मी की पहचान चित्राल क्षेत्र से की जाती है। कुई-शुआंग चित्राल और पंजशीर के बीच था। ही-तुन (हित-हुन) पंजशीर में परवान क्षेत्र में स्थित था और काओ-फू काबुल प्रदेश में था। इन राज्यों के प्रमुख ‘याबगू’ (यवुग) कहलाते थे। बैक्ट्रिया की यूनानी सभ्यता के संपर्क में आने से यू-ची धीरे-धीरे सभ्य और नगर-जीवन के अभ्यस्त होते गए।

फान-ए द्वारा रचित हाऊ-हान-शू से पता चलता है कि लगभग प्रथम शताब्दी ई. में कुई-शुआंग राज्य के क्यू-त्सियु-क्यो नामक एक वीर सरदार (याबगू) ने शेष चारों राज्यों को जीतकर उन्हें एक शक्तिशाली राजतंत्र के रूप में संगठित किया और स्वयं राजा (बांग) बन गया। अधिकांश इतिहासकार इस शासक की पहचान कुजुल कैडफिसेस (कुशलक) से करते हैं, जो कैडफिसेस प्रथम की उपाधि थी। परवर्ती यू-ची शासक इसी कुषाण शाखा से उत्पन्न होने के कारण ‘कुषाण’ कहलाए। इस प्रकार ‘कुषाण’ किसी व्यक्ति-विशेष का नाम नहीं था, बल्कि यह यू-ची जाति की उस शाखा का नाम था, जिसने अन्य चारों यू-ची राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। इस कुषाण शाखा का उन्नायक कुजुल कैडफिसेस ही था। परवर्ती यू-ची शासक इसी कुषाण शाखा से उत्पन्न होने के कारण ‘कुषाण’ कहलाए। इस प्रकार कुजुल कैडफिसेस ने पाँचों कबायली समुदायों को अपने कुई-शुआंग अथवा कुषाण समुदाय के नेतृत्व में संगठित किया और भारत की ओर बढ़ा, जहाँ उसने काबुल और कश्मीर में अपनी सत्ता स्थापित की।

कुजुल कैडफिसेस : कुषाण सत्ता का संस्थापक

कुजुल कैडफिसेस कुषाण वंश का प्रथम शासक था, जिसने प्रथम शताब्दी ई. में यू-ची जाति को एकीकृत कर कुषाण साम्राज्य का विस्तार किया। स्रोतों से पता चलता है कि उसने काबुल-कंधार के हिंद-यवनों पर आक्रमण कर काबुल तथा किपिन पर अधिकार कर लिया। उसने भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसे पह्लवों को भी पराजित किया, जिससे कुषाण-शासन पश्चिमी पंजाब तक विस्तृत हो गया।

राजा कुजुल के अनेक सिक्के काबुल तथा भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग से प्राप्त हुए हैं। उसके प्रारंभिक सिक्कों के मुख भाग पर अंतिम यूनानी शासक हर्मियस की आकृति और पृष्ठ भाग पर कुजुल की अपनी आकृति अंकित है। एक ही सिक्के पर यवन राजा हर्मियस और कुजुल दोनों का नाम होने से इतिहासकारों का अनुमान है कि प्रारंभ में कुजुल हर्मियस के अधीन था और कालांतर में स्वतंत्र हो गया। ऐसा प्रतीत होता है कि हर्मियस (हरमाओस) यवन राजा था, जो काबुल प्रदेश पर शासन करता था और यू-ची आक्रांताओं ने प्रारंभ में यवन सत्ता का अंत किए बिना केवल उसकी अधीनता स्वीकार करवाकर ही संतोष कर लिया था। काबुल क्षेत्र से ऐसे सिक्के भी मिले हैं, जिन पर केवल कुजुल का नाम है, हर्मियस का नहीं। इन परवर्ती सिक्कों में उसकी उपाधि ‘महाराजस महतस् कुषाण-कुजुल कफ़स’ अंकित है, जिससे सूचित होता है कि बाद में इस प्रदेश से यवन-शासन का अंत हो गया था।

इसी समय पार्थियन शासक गोंडोफर्नीज़ ने उत्तर-पश्चिमी भारत में अपना प्रभाव बढ़ाते हुए पूर्वी तथा पश्चिमी गांधार में अपना शासन स्थापित कर लिया था। किंतु गोंडोफर्नीज़ के उत्तराधिकारी पार्थियन शासक उतने शक्तिशाली नहीं थे। उनकी दुर्बलता का लाभ उठाकर कुजुल ने पार्थियन शासकों के भारतीय राज्य पर आक्रमण कर उसके अनेक प्रदेश जीत लिए। यद्यपि कुछ निर्बल पार्थियन शासक गोंडोफर्नीज़ के बाद भी पश्चिमी पंजाब के कतिपय प्रदेशों पर शासन करते रहे, परंतु इस समय तक उत्तर-पश्चिमी भारत की राजशक्ति मुख्यतः कुषाणों के हाथ में आ चुकी थी।

कुजुल के काबुल क्षेत्र से मिले प्रारंभिक सिक्कों में उसके नाम के साथ ऐसा कोई विशेषण नहीं मिलता, जो उसकी प्रबल शक्ति का सूचक हो। किंतु परवर्ती सिक्कों में उसका नाम ‘महाराजस राजातिराजस कुषाणस यवुगस’ तथा ‘महाराजस राजाधिराजस देवपुत्रस कुजुल कर कफ़स’ जैसी उपाधियों के साथ मिलता है। इन सिक्कों से पता चलता है कि काबुल, कंधार तथा उत्तर-पश्चिमी पंजाब आदि क्षेत्रों को पार्थियन शासकों से जीत लेने के बाद कुजुल की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई थी और वह महाराज, राजाधिराज जैसी उपाधियों से विभूषित हो गया था। उसके नाम के साथ जुड़ा ‘देवपुत्र’ विशेषण यह दर्शाता है कि भारत आने पर उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उसके कुछ सिक्कों पर ‘धर्मथिद’ विशेषण भी मिलता है। कुजुल ने केवल ताँबे के सिक्के प्रचलित करवाए।

कुजुल ने दीर्घकाल तक शासन किया और उसकी मृत्यु अस्सी वर्ष की आयु में हुई। इस प्रकार वह अपने शासनकाल में एक छोटे राजा से उन्नति करते हुए एक विशाल साम्राज्य का स्वामी बन सका।

विम तक्तो (सोटर मेगास)

राबातक अभिलेख के बाद यह स्पष्ट हो गया कि कुजुल कैडफिसेस और विम कैडफिसेस के बीच एक और शासक हुआ, जिसका नाम विम तक्तो था। कई विद्वान उसे उस शासक से जोड़ते हैं जिसके सिक्कों पर नाम की जगह केवल ‘सोटर मेगास’ (महान त्राता) उपाधि अंकित मिलती है। ये सिक्के काबुल घाटी से लेकर उत्तर भारत तक के बड़े भाग में मिलते हैं। अब अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि वह कुजुल और विम कैडफिसेस के बीच का शासक था। उसके शासनकाल में कुषाण राज्य का विस्तार भारत की ओर आगे बढ़ा और संभवतः लगभग 90 ई. के आसपास कुषाणों और चीनी सेनापति पान-चाओ के बीच संघर्ष भी इसी काल में हुआ था।

सोटर मेगास की पहचान

सोटर मेगास की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। इस संबंध में मुख्यतः तीन मत प्रचलित हैं। पहला मत वेकोफर का है, जिनके अनुसार विम कैडफिसेस और सोटर मेगास की मुद्राएँ काबुल घाटी से लेकर उत्तर प्रदेश तक मिली हैं और दोनों की मुद्राओं तथा उन पर अंकित उपाधियों में समानता है। इस आधार पर वे दोनों को एक ही कुषाण शासक के दो नाम मानते हैं और ‘सोटर मेगास’ को विम की ही उपाधि बताते हैं। किंतु ध्यातव्य है कि विम की स्वयं की अन्य मुद्राओं पर ‘सोटर मेगास’ उपाधि नहीं मिलती।

दूसरे मत के अनुसार सोटर मेगास विम का गवर्नर था, क्योंकि हाऊ-हान-शू से पता चलता है कि विम ने अपने भारतीय प्रदेशों के प्रशासन हेतु गवर्नर नियुक्त किया था। संभवतः इसी गवर्नर का नाम सोटर मेगास रहा हो। किंतु किसी भी शासक द्वारा अपने अधीनस्थ गवर्नर को स्वतंत्र रूप से मुद्राएँ जारी करने का अधिकार दिए जाने का कोई प्रमाण नहीं है। यदि गवर्नर की हैसियत से मुद्राएँ जारी की जातीं, तो उन पर स्वामी का उल्लेख अवश्य मिलता। तीसरा मत यह है कि सोटर मेगास भारतीय प्रदेशों में विम का अर्ध-स्वतंत्र गवर्नर था, जिसका उल्लेख 65 ई. के पंजतर अभिलेख तथा 79 ई. (136 तिथि) के तक्षशिला अभिलेख में मिलता है।

विम कैडफिसेस : भारत में साम्राज्य का विस्तार और स्वर्ण-मुद्राएँ

विम कैडफिसेस कुजुल कैडफिसेस का पुत्र था। उसके शासन में कुषाण शक्ति का भारत में विशेष विस्तार हुआ और भारत-विजय का श्रेय मुख्यतः उसी को दिया जाता है। चीनी ऐतिहासिक अनुश्रुति के अनुसार उसके समय में यू-ची शक्ति अत्यंत बढ़ गई थी। उसने सिंधु नदी पार कर तक्षशिला और पंजाब पर अधिकार किया, फिर गांधार से आगे बढ़कर पश्चिमी प्रदेशों की विजय पूरी की और पूर्व में मथुरा तथा उससे आगे के क्षेत्रों तक कुषाण सत्ता स्थापित की। पिता कुजुल द्वारा जीते गए राज्य के अतिरिक्त संभवतः पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनारस तक उसकी सीमा पहुँच गई थी। इस विस्तृत राज्य का प्रमुख केंद्र मथुरा था, और इस प्रकार भारत में यू-ची शासन सुदृढ़ हो गया।

मूर्ति और उपाधि

मथुरा के निकट माट (मांट) के इटोकरी टीले से विम की एक विशाल सिंहासनासीन मूर्ति मिली है, जिसके नीचे ‘महाराज राजाधिराज देवपुत्र कुषाणपुत्र शाहि वेम तक्षम’ अंकित है। यह मथुरा के उसके राज्य में सम्मिलित होने का सशक्त प्रमाण है। इस उपाधि में तीन परंपराओं का समन्वय है, जैसे इसके पहले तीन शब्द- ‘महाराज’, ‘राजाधिराज’ और ‘देवपुत्र’ भारतीय परंपरा के सूचक हैं, ‘कुषाणपुत्र’ वंश का परिचय देता है और ‘शाहि’ (शासक) तथा ‘तक्षम’ (बलवान्) ईरानी शब्द हैं।

देवकुल

रोमन सम्राट-पूजा और ईरानी परंपराओं से प्रभावित होकर कुषाणों ने मृत शासकों की स्मृति में मंदिर और मूर्तियाँ (देवकुल) बनवाने की प्रथा शुरू की। माट अभिलेख के अनुसार विम ने एक देवकुल, उद्यान, पुष्करिणी और कूप का निर्माण करवाया था। ऐसा एक देवकुल माट के टीले पर था और दूसरा मथुरा नगर के उत्तर में गोकर्णेश्वर मंदिर के समीप।

साम्राज्य की सीमा

विम के सिक्कों के व्यापक प्रचलन और ‘महाराज राजाधिराज जनाधिप’ जैसी उपाधियों से सिद्ध होता है कि उसका अधिकार सिंधु के पूर्व, पंजाब और संयुक्त प्रांत तक था। लद्दाख के खलत्से से प्राप्त 187 तिथि (32 ई.) के अभिलेख में ‘उविम कवथिस’ नामक राजा का उल्लेख है। बक्सर (बिहार) से उसकी कुछ मुद्राएँ मिलने के आधार पर कुछ विद्वान उसका शासन बिहार तक संपूर्ण उत्तरी भारत पर मानते हैं, किंतु प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव में यह मत पूर्णतः मान्य नहीं है। कहा जाता है कि दक्षिण में उसका राज्य नर्मदा तक विस्तृत था और शक क्षत्रप उसके अधीनस्थ थे। फिर भी अधिकांश विद्वान उसके प्रत्यक्ष शासन को मालवा, मथुरा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर-पश्चिम में लद्दाख और गांधार तक ही स्वीकार करते हैं।

व्यापार और सिक्के

कैडफिसेसकाल में भारत, चीन और रोमन साम्राज्य के बीच व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रेशम, मसालों और रत्नों के बदले रोमन स्वर्ण मुद्राएँ भारत में प्रचुर मात्रा में आने लगीं। इसका लाभ उठाकर विम ने स्वर्ण-मुद्राएँ चलवाईं, जो कुषाण स्वर्ण-मुद्राओं के प्रचलन की शुरुआत थी और उसका सबसे बड़ा योगदान है। उसके पिता के सिक्कों पर रोमन दीनार की छाप थी, जबकि विम के सोने के सिक्कों पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट है।

स्वर्ण के अतिरिक्त विम ने ताँबे के सिक्के भी चलवाए, जो अफ़ग़ानिस्तान, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब से तथा कुछ भीटा, कौशांबी, बक्सर और बसाढ़ से भी मिले हैं। सिक्कों पर यूनानी और खरोष्ठी दोनों लिपियों में लेख हैं। कुछ सिक्कों पर शिव, नंदी और त्रिशूल की आकृतियाँ हैं और खरोष्ठी में ‘महाराजस राजाधिराजस सर्वलोकेश्वरस महेश्वरस विम कडफिसेस त्रातरस’ उत्कीर्ण है। ‘महेश्वर’ और ‘सर्वलोकेश्वर’ जैसी उपाधियों से प्रतीत होता है कि भारत के संपर्क में आकर उसने शैव धर्म स्वीकार कर लिया था। कुछ सिक्कों पर ‘महाराजस राजाधिराज’ जैसे विशेषणों के साथ केवल ‘वि’ अंकित है, जो स्पष्टतः विम का संक्षिप्त नाम है।

विम ने पंजाब और उत्तर प्रदेश के जिन क्षेत्रों को जीता था, उन पर उसका अधिकार अधिक समय तक नहीं रह सका। उसी समय सातवाहनों ने कुंतल सातकर्णि के नेतृत्व में मगध पर भी आधिपत्य जमा लिया था। विक्रमादित्य द्वितीय के नाम से प्रसिद्ध कुंतल सातकर्णि ने यू-ची आक्रांताओं को पराजित कर ‘शकारि’ की उपाधि धारण की। प्राचीन भारतीय अनुश्रुतियों के अनुसार इस सातवाहन शासक ने पंजाब में ‘सिरकप’ नामक प्रजापीड़क राजा को हराया था। ‘सिरकप’ संभवतः ‘श्रीकपस’ अथवा ‘श्रीकथफ़िश’ का अपभ्रंश है। इसकी पुष्टि पंजाब की लोककथाओं से भी होती है, जिन्हें कैप्टन आर.सी. टेंपल ने अपनी पुस्तक ‘द लीजेंड्स ऑफ़ पंजाब’ में संकलित किया है।

कनिष्क प्रथम

कनिष्क प्रथम कुषाण वंश का सबसे शक्तिशाली, प्रतापी और प्रसिद्ध सम्राट था। भारतीय इतिहास में उसकी तुलना मौर्य सम्राट अशोक से की जाती है। जैसे अशोक ने बौद्ध धर्म को एशिया में फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई, वैसे ही कनिष्क के संरक्षण में बौद्ध धर्म, विशेषतः महायान शाखा मध्य एशिया और चीन तक पहुँच गया। वह केवल विजेता नहीं था, बल्कि उसके शासनकाल में कला, साहित्य, दर्शन, व्यापार और मुद्रा-व्यवस्था का भी विकास हुआ। यही कारण है कि इतिहासकार उसके काल को कुषाण साम्राज्य का स्वर्णकाल कहते हैं।

विम कैडफिसेस के बाद कुषाण साम्राज्य का अधिपति कौन बना, इस संबंध में इतिहासकारों में पहले बड़ा मतभेद था। अनेक विद्वान कुजुल और विम को कनिष्क का परवर्ती मानते थे। परंतु अफ़ग़ानिस्तान के बग़लान प्रांत में 1993 ई. में मिले राबातक अभिलेख से कनिष्क की वंश-परंपरा स्पष्ट हो गई। यह अभिलेख बैक्ट्रियन भाषा में है और यूनानी लिपि में लिखा गया है। इसमें कनिष्क ने अपने परदादा कुजुल कैडफिसेस, दादा विम तक्तो और पिता विम कैडफिसेस का उल्लेख किया है। इस अभिलेख ने  उस पुराने मत को ग़लत सिद्ध कर दिया कनिष्क कैडफिसेस राजाओं से पहले हुआ था। अब प्रायः सभी विद्वान मानते हैं कि कनिष्क ने कुजुल, विम तक्तो और विम कैडफिसेस के बाद ही शासन किया था। अपनी बहुमुखी उपलब्धियों के कारण कनिष्क को भारत के राजनीतिक एवं  सांस्कृतिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

कनिष्क प्रथम के राज्यारोहण की तिथि

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि का निर्धारण भारतीय इतिहास की जटिलतम समस्याओं में से एक है। अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों के बावजूद आज तक इसका समाधान नहीं हो सका है। कनिष्क संभवतः प्राचीन भारत का एकमात्र ऐसा शासक है जिसके शासनकाल के निर्धारण में दस-बीस या पचास वर्ष नहीं, बल्कि लगभग तीन सौ वर्षों तक का अंतर है। इसका कारण यह है कि उसके अभिलेख किसी ज्ञात संवत् में नहीं, बल्कि उसके द्वारा आरंभ किए गए संवत् के वर्षों में तिथिबद्ध हैं, और यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि उस संवत् का पहला वर्ष ईसवी सन् की किस तिथि से मेल खाता है।

इस संबंध में मुख्यतः चार मत प्रचलित हैं। प्रथम मत के अनुसार कनिष्क ने प्रथम शताब्दी ई.पू. के मध्य में राज्य ग्रहण किया। द्वितीय मत के अनुसार उसका आविर्भाव द्वितीय शताब्दी ई. में हुआ। तृतीय मत उसे तृतीय शताब्दी ई. में रखता है, जबकि चतुर्थ मत के अनुसार उसका राज्यारोहण प्रथम शताब्दी ई. में हुआ था।

प्रथम शताब्दी ई.पू. (58 ई.पू.)

फ्लीट, कनिंघम, डॉसन, फ्रैंके, केनेडी और लूडर्स जैसे विद्वान कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई.पू. में रखते थे और उसका राज्यारोहण 58 ई.पू. में मानते थे। इनके अनुसार कनिष्क ने कैडफिसेस-वर्ग से पूर्व शासन किया और 58 ई.पू. में उसके द्वारा स्थापित संवत् ही कालांतर में विक्रम संवत् कहलाया। उनका कहना था कि प्रथम शताब्दी ई.पू. में चीन और भारत के बीच स्थलमार्गीय व्यापारिक संबंध घनिष्ठ हो चुके थे। ह्वेनसांग के अनुसार बुद्ध ने अपने महापरिनिर्वाण के चार सौ वर्ष बाद कनिष्क नामक राजा के आविर्भाव की भविष्यवाणी की थी। बुद्ध का महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. मानने पर कनिष्क का राज्यारोहण लगभग 83 ई.पू. ठहरता है। फ्रैंके के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में किसी यूची शासक द्वारा बौद्ध ग्रंथों के संबंध में किए गए पत्राचार में भी कनिष्क का संकेत मिलता है।

खंडन

मार्शल, थॉमस, स्टेन कोनो, रैप्सन, हेमचंद्र रायचौधरी, सुधाकर चट्टोपाध्याय, दिनेशचंद्र सरकार और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वान इस मत से असहमत थे। मार्शल को तक्षशिला के उत्खनन में कैडफिसेस-वर्ग की मुद्राएँ कनिष्क-परिवार की मुद्राओं से नीचे के स्तर पर मिलीं, जिससे सिद्ध होता है कि कनिष्क ने कैडफिसेस शासकों के बाद शासन किया। रैप्सन के अनुसार कनिष्क की मुद्राएँ विम कैडफिसेस की मुद्राओं के साथ मिलती हैं, कुजुल कैडफिसेस की मुद्राओं के साथ नहीं।

रायचौधरी के अनुसार मुद्राओं, अभिलेखों और ह्वेनसांग के विवरण से गांधार कनिष्क के अधिकार में सिद्ध होता है, जबकि चीनी स्रोतों के अनुसार प्रथम शताब्दी ई.पू. के मध्य में गांधार पर यिन-मोफ़ू (हर्मेयस) का अधिकार था। परवर्ती कुषाण मुद्राओं पर मिलने वाला सासानी प्रभाव भी कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई.पू. में रखने में बाधक है। फ्रैंके का यह कथन संभव है कि द्वितीय शताब्दी ई.पू. का कोई यूची शासक बौद्ध धर्म से परिचित था, पर यह निश्चित नहीं कि वह कनिष्क ही था। राबातक अभिलेख ने इस प्रश्न को अंतिम रूप से सुलझा दिया कि कनिष्क कैडफिसेस-वर्ग के बाद आया।

द्वितीय शताब्दी ई. (लगभग 120–150 ई.)

स्मिथ, मार्शल, थॉमस और स्टेन कोनो जैसे विद्वानों ने कनिष्क का आविर्भाव लगभग 120–125 ई. में माना है। घिर्शमान और बी.एन. पुरी ने 144 ई. का प्रस्ताव किया। के.सी. ओझा ने लगभग 140 ई. (अपने एक प्रस्ताव में 150 ई. तक) की तिथि सुझाई और एच. हुंबाख ने दुशांबे संगोष्ठी में लगभग 132 ई. की तिथि स्वीकार की।

स्मिथ के अनुसार मौद्रिक साक्ष्यों से पता चलता है कि कनिष्क ने कैडफिसेस प्रथम तथा द्वितीय के बाद शासन किया और उसका कैडफिसेस-वर्ग से निकट संबंध था। मार्शल का अनुमान था कि विम कैडफिसेस ने 78 ई. में कुजुल के बाद शासन आरंभ किया और उसका अंत द्वितीय शताब्दी ई. के आरंभ में हुआ, इसलिए कनिष्क लगभग 120 ई. के आसपास गद्दी पर बैठा।

अफ़ग़ानिस्तान के बेग्राम उत्खनन के आधार पर घिर्शमान ने माना कि कनिष्क ने 144 ई. में राज्य ग्रहण कर 172 ई. तक शासन किया। उनके अनुसार बेग्राम नगर को सासानी सम्राट शापुर प्रथम ने 241–250 ई. के बीच नष्ट किया, उस समय वासुदेव शासन कर रहा था, और कनिष्क संवत् के अनुसार वासुदेव का शासन वर्ष 74 से 98 तक रहा। इससे संवत् का आरंभ 144 ई. ठहरता है। बी.एन. पुरी के अनुसार इस मत से कनिष्क और शक शासक रुद्रदामन के बीच समकालीनता और संघर्ष की समस्या भी नहीं उठती।

ओझा अय, खलात्से और जिहोणिक के लेखों की तिथियों (136, 187, 191) को विक्रम संवत् का मानते थे और इसी आधार पर कनिष्क को 78 ई. में रखने की संभावना अस्वीकार करते थे। प्रयाग-प्रशस्ति की “दैवपुत्रषाहिषाहानुषाहि” उपाधि को वे साम्राज्यिक उपाधि मानते थे और उसी आधार पर कहते थे कि समुद्रगुप्त के काल तक कनिष्क की प्रतिष्ठा जीवित थी। चीनी स्रोतों के अनुसार तृतीय शताब्दी ई. के मध्य तक ऑक्सस से भारत तक कुषाण साम्राज्य विद्यमान था और वासुदेव इस वंश का अंतिम शासक था। यदि वासुदेव ने 250 ई. के आसपास शासन किया हो, तो कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ई. से पहले नहीं रखा जा सकता।

आपत्तियाँ

सुई विहार लेख से निचली सिंधुघाटी पर कनिष्क का अधिकार प्रमाणित होता है, जबकि जूनागढ़ लेख (शक वर्ष 72, अर्थात् 150 ई.) में सिंधु-सौवीर पर रुद्रदामन का आधिपत्य बताया गया है। रुद्रदामन का शासनकाल लगभग 130–150 ई. माना जाता है और वह किसी का अधीनस्थ नहीं था। कनिष्क को द्वितीय शताब्दी के मध्य में रखने पर दोनों समकालीन ठहरते हैं और सुई विहार पर कनिष्क का अधिकार कठिन हो जाता है। यह तर्क पूर्णतः निर्णायक नहीं है, क्योंकि जूनागढ़ लेख की विजय-घोषणाओं की व्याख्या और सिंध पर अधिकार का समय स्वयं विवादित हैं।

कनिष्क, वासिष्क, हुविष्क और वासुदेव के लेख एक ही संवत् में हैं और उसका प्रवर्तक कनिष्क था, जबकि द्वितीय शताब्दी ई. में आरंभ हुए किसी स्वतंत्र संवत् का अन्यत्र कोई संकेत नहीं मिलता। सुधाकर चट्टोपाध्याय का कहना है कि बेग्राम में मिले “वासुदेव” नामधारी सिक्कों को भारतीय कुषाण शासक वासुदेव प्रथम का मानना अनिवार्य नहीं, और यह भी प्रमाणित नहीं कि बेग्राम को शापुर प्रथम ने ही नष्ट किया। चीनी स्रोतों में 229 ई. में “बो-तियाओ” नामक महान यूची राजा द्वारा चीन में दूत-मंडल भेजे जाने का उल्लेख है, जिसकी पहचान सामान्यतः वासुदेव प्रथम से की जाती है।

प्रयाग-प्रशस्ति के पद को एकल साम्राज्यिक उपाधि मानना भी अनिवार्य नहीं। श्रीराम गोयल के अनुसार “देवपुत्र षाहि” (किदार कुषाण) और “षाहानुषाहि” (सासानी) अलग-अलग पद हैं। हुंबाख का मत वासुदेव की एक विशेष पहचान पर टिका है, और यदि वह वासुदेव द्वितीय या तृतीय हो, तो कनिष्क को पहले रखना पड़ता है।

तृतीय शताब्दी ई. (248 अथवा 278 ई.)

आर.सी. मजूमदार ने कनिष्क का राज्यारोहण 248 ई. में माना। उनके अनुसार कनिष्क का संवत् वही था जिसे त्रैकूटक-कलचुरि-चेदि संवत् कहा जाता है। भंडारकर जैसे विद्वान भी 278 ई. के पक्ष में थे।

किंतु यह मत भी अस्वीकार्य है। कुषाण लेखों के अनुसार वासुदेव वर्ष 98 में मथुरा क्षेत्र पर शासन कर रहा था। चेदि संवत् मानने पर यह तिथि 346 ई. आती है, परंतु चौथी शताब्दी के मध्य तक मथुरा क्षेत्र पर नाग और यौधेय जैसी शक्तियों का अधिकार था और शीघ्र ही समुद्रगुप्त का उदय हुआ। खोतान की परंपराएँ कनिष्क को वहाँ के राजा विजयकीर्ति का समकालीन बताती हैं, जो द्वितीय शताब्दी ई. से पहले था। चीनी बौद्ध परंपरा के अनुसार कनिष्क के पुरोहित संघरक्षक की रचना का अनुवाद अन-शिगाओ (लगभग 148–170 ई.) ने किया। इसलिए इन्हें निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

प्रथम शताब्दी ई. (78 ई.)

फर्ग्यूसन, ओल्डेनबर्ग, थॉमस, रैप्सन, एन.एन. घोष, रायचौधरी, सुधाकर चट्टोपाध्याय, दिनेशचंद्र सरकार, राधाकुमुद मुकर्जी और जे.एस. नेगी जैसे विद्वानों ने कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में माना। उनके अनुसार कनिष्क द्वारा आरंभ किया गया यही संवत् आगे चलकर पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों द्वारा चौथी शताब्दी तक प्रयुक्त होता रहा, इसीलिए “शक संवत्” कहलाया। रैप्सन के अनुसार तक्षशिला के उत्खनन भी इस मत से असंगत नहीं हैं। अहमद हसन दानी द्वारा पेशावर के शैख़ान-ढेरी के उत्खनन की रेडियो-कार्बन तिथियाँ भी इस पक्ष में प्रस्तुत की गईं, यद्यपि उनकी व्याख्या निर्णायक नहीं है। भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 से शक संवत् पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग अपनाया, किंतु यह निर्णय कनिष्क की तिथि का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

डुब्रील की आपत्ति थी कि यदि कुजुल कैडफिसेस और हर्मेयस के शासन का अंत लगभग 50 ई. में माना जाए और कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में, तो कैडफिसेस-वर्ग के शासकों के लिए केवल 28 वर्ष बचते हैं। राबातक अभिलेख के बाद यह कठिनाई और बढ़ जाती है। डुब्रील के अनुसार तक्षशिला के चिर-स्तूप के लेख में 136वाँ वर्ष अंकित है, जिसे अय या विक्रम संवत् में गिनने पर 78 ई. बैठता है और उसमें उल्लिखित शासक कैडफिसेस-वर्ग का है, कनिष्क नहीं। स्टेन कोनो ने चीनी और तिब्बती स्रोतों के आधार पर कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ई. में रखा।

समर्थकों के अनुसार कुजुल के शासन का अंत 50 ई. में हुआ, यह निश्चित नहीं है। चीनी स्रोतों के अनुसार वह अस्सी वर्ष से अधिक की आयु में मरा, इसलिए 28 वर्ष का अंतराल उन्हें अपर्याप्त नहीं लगता। चिर-स्तूप लेख की “देवपुत्र” उपाधि के बारे में उनका कहना था कि वह कैडफिसेस-वर्ग के लिए नहीं, कनिष्क-वर्ग के राजाओं के लिए प्रयुक्त है। स्टेन कोनो जिस कनिष्क के आधार पर द्वितीय शताब्दी की बात करते हैं, वह संभवतः कनिष्क प्रथम न होकर आरा लेख का परवर्ती कनिष्क है।

राबातक अभिलेख और आधुनिक शोध

1993 ई. में अफ़ग़ानिस्तान के बग़लान प्रांत के राबातक में मिला अभिलेख इस विवाद में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। यह बैक्ट्रियन भाषा में यूनानी लिपि में लिखा एक मंदिर-स्थापना का लेख है। इसका पाठ और अनुवाद निकोलस सिम्स-विलियम्स और जो क्रिब ने 1995–96 ई. में प्रकाशित किया। इसमें कनिष्क ने अपने परदादा कुजुल कैडफिसेस, दादा विम तक्तो और पिता विम कैडफिसेस का उल्लेख किया है। लेख में कनिष्क के आरंभिक वर्षों की घटनाओं और उत्तर भारत में उसकी सत्ता के विस्तार का वर्णन है और स्पष्ट कहा गया है कि कनिष्क ने “प्रथम वर्ष का उद्घाटन किया”, अर्थात् एक नया युग चलाया। इससे स्पष्ट है कि कनिष्क कैडफिसेस-वर्ग के बाद शासक हुआ, अतः प्रथम शताब्दी ई.पू. वाला मत अमान्य हो जाता है। कनिष्क ने अपना एक नया युग चलाया, परंतु अभिलेख से यह स्पष्ट नहीं होता कि वह युग ईसवी सन् के किस वर्ष से आरंभ हुआ।

फ़ॉक का 127 ई. का प्रस्ताव

हैरी फ़ॉक ने 2001 ई. में भारतीय ज्योतिष-ग्रंथ स्फुजिध्वज के यवनजातक के नए पाठ-विश्लेषण के आधार पर कुषाण युग और शक संवत् का संबंध स्थापित किया। इससे कनिष्क युग का प्रथम वर्ष 127 ई. या 128 ई. निकलता है। इस तिथि के अनुसार कनिष्क इसी समय या उससे कुछ पहले गद्दी पर बैठा। तथापि कनिष्क युग का प्रथम वर्ष और राज्यारोहण का वर्ष ठीक एक ही हों, यह निश्चित नहीं है।

127 ई. की तिथि आज सर्वाधिक स्वीकृत है और गांधार-कला के कालक्रम में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है। किंतु यह तिथि सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत नहीं है, क्योंकि गेरार्ड फ़ुस्समान ने 78 ई. का मत बनाए रखा है और श्विंडेल जैसे विद्वान भी असहमत हैं।

78 ई. में आरंभ हुआ शक संवत् और कनिष्क का युग अलग-अलग हैं। शक संवत् की उत्पत्ति को प्रायः पश्चिमी भारत के शक-क्षत्रपों की परंपरा से जोड़ा जाता है। 1957 ई. में भारत सरकार द्वारा शक संवत् को राष्ट्रीय पंचांग के रूप में अपनाना एक प्रशासनिक और पंचांग-संबंधी निर्णय था, जिसका कनिष्क की तिथि से कोई ऐतिहासिक संबंध सिद्ध नहीं होता।

इस प्रकार प्रथम शताब्दी ई.पू. और तृतीय शताब्दी ई. के मत अभिलेखीय, मुद्राशास्त्रीय और कालक्रम-संबंधी साक्ष्यों के आधार पर अब अस्वीकार्य हैं। 78 ई. का मत एक समय अत्यंत प्रभावशाली था, परंतु राबातक अभिलेख और नए शोध के बाद अधिकांश इतिहासकार अब इसके पक्ष में नहीं हैं। संप्रति कनिष्क-युग का आरंभ लगभग 127–128 ई. में मानना ही अधिक स्वीकृत है। कनिष्क का राज्यारोहण इसी समय या उससे कुछ पहले माना जाता है, किंतु यह भी पूर्णतः निर्विवाद नहीं है।

कनिष्क की विजयें

कनिष्क प्रथम के नेतृत्व में कुषाण राज्य का पुनः उत्कर्ष हुआ। उसके राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफ़ग़ानिस्तान, सिंधु का भाग तथा बैक्ट्रिया एवं पार्थिया के कुछ प्रदेश सम्मिलित थे। तिब्बती और चीनी लेखकों के अनुसार कनिष्क का साकेत तथा पाटलिपुत्र के शासकों से युद्ध हुआ था। कश्मीर को अपने राज्य में मिलाकर उसने वहाँ ‘कनिष्कपुर’ नामक नगर बसाया। संभवतः उसने उज्जैन के क्षत्रप को भी पराजित कर मालवा प्रांत प्राप्त किया था। कनिष्क का सर्वाधिक प्रसिद्ध युद्ध चीनी शासक से हुआ था, जिसमें वह पहली बार पराजित हुआ, किंतु दूसरी बार विजयी होकर उसने मध्य एशिया के काशग़र, यारकंद तथा खोतान प्रदेशों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty)
कनिष्क प्रथम

कनिष्क प्रथम

पार्थिया से युद्ध

प्राचीन भारत के समस्त साम्राज्यों में कुषाण साम्राज्य की अंतरराष्ट्रीय स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। इसके पश्चिम में पार्थियन साम्राज्य स्थित था और साथ ही रोमन साम्राज्य का उदय भी हो रहा था। रोमन एवं पार्थियन साम्राज्यों में परस्पर शत्रुता थी और रोमन ऐसे व्यापार-मार्ग की खोज में थे, जो चीन तक पार्थिया से होकर न गुज़रे। अतः वे कुषाण साम्राज्य से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने के इच्छुक थे। पार्थिया का एरियाना प्रदेश कुषाणों के अधिकार में था, जिसे वे संभवतः पुनः हस्तगत करना चाहते थे। इस प्रकार कुषाण और पार्थियन साम्राज्यों की सीमाएँ परस्पर मिली हुई थीं। बैक्ट्रिया पर भी कुषाणों का अधिकार था और व्यापारिक दृष्टि से इसका महत्त्व अत्यधिक था, क्योंकि यहीं से भारत, मध्य एशिया एवं चीन को जोड़ने वाले रेशम-मार्ग की तीनों प्रमुख शाखाएँ गुज़रती थीं, जिन पर कुषाणों का नियंत्रण था और यह पार्थिया को स्वीकार्य नहीं था। व्यापारिक विकास के लिए वह मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण करना चाहता था। इन्हीं कारणों से पार्थिया और कनिष्क के मध्य युद्ध हुआ। चीनी साहित्य के अनुसार ‘नान-सी’ के शासक ने देवपुत्र कनिष्क पर आक्रमण किया, किंतु उसे उसे इस युद्ध में सफलता नहीं मिली और कनिष्क ने उसे पराजित कर दिया। ‘नान-सी’ का समीकरण पार्थिया से किया जाता है। इस विजय के परिणामस्वरूप उत्तर-पश्चिम भारत उस युग का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गया।

पंजाब और मगध की विजय

कनिष्क ने उत्तरी भारत के विस्तृत भूभाग को जीतकर अपने अधीन किया। कुमारलात की कल्पनामंडिटिका में कनिष्क द्वारा की गई पूर्वी भारत की विजय का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथ श्रीधर्मपिटक निदानसूत्र के चीनी अनुवाद से पता चलता है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र को जीतकर अधीन किया और वहाँ से प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् अश्वघोष एवं भगवान् बुद्ध के कमंडल को प्राप्त किया था। तिब्बती अनुश्रुति में भी कनिष्क को साकेत (अयोध्या) की विजय का श्रेय दिया गया है। इस विजय की पुष्टि कनिष्क के सिक्कों एवं अभिलेखों से भी होती है। पूर्व में कनिष्क के सिक्के बंगाल के तामलुक एवं ताम्रलिप्ति तथा महास्थान तक से मिले हैं।  दक्षिण-पूर्व में उड़ीसा के मयूरभंज, शिशुपालगढ़, पुरी तथा गंजाम से भी उसके सिक्के पाए गए हैं। कौशांबी से कनिष्क की एक मुहर भी मिली है। उसके अभिलेख पश्चिम में पेशावर से पूर्व में मथुरा और सारनाथ तक प्राप्त हुए हैं। कौशांबी तथा श्रावस्ती से प्राप्त बुद्ध-प्रतिमाओं की चरण-चौकियों पर उत्कीर्ण लेखों में भी कनिष्क के शासनकाल का उल्लेख मिलता है।

उत्तरी भारत की यह विजय कनिष्क केवल अपनी शक्ति से संपन्न नहीं कर सका था। तिब्बती अनुश्रुति के अनुसार खोतान के राजा विजयसिंह के पुत्र विजयकीर्ति ने कुषाण राजा कनिष्क के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया और साकेत नगर पर अधिकार कर लिया। प्रतीत होता है कि सातवाहन-शक्ति को क्षीण करने के लिए कनिष्क को सुदूरवर्ती खोतान राज्य के शासक की सहायता लेनी पड़ी थी।

चीन से संघर्ष

कनिष्क केवल उत्तरी भारत की विजय से संतुष्ट नहीं हुआ; उसने मध्य एशिया में भी अपनी शक्ति के विस्तार का प्रयास किया।   मध्य एशिया के खोतन राज्य की सहायता से कनिष्क उत्तरी भारत की विजय कर सका था। साम्राज्यवादी चीनी सम्राट के प्रसिद्ध सेनापति पान-चाओ द्वारा लगभग 73–78 ई. में मध्य एशिया पर अधिकार कर लेने के कारण चीनी साम्राज्य की पश्चिमी सीमा कैस्पियन सागर तक पहुँच गई और इस प्रकार कुषाण राज्य की सीमा भी चीनी साम्राज्य को स्पर्श करने लगी। चीनी इतिहासकारों के अनुसार कनिष्क ने पान-चाओ से मैत्री-संबंध स्थापित करने हेतु अपना राजदूत भेजा और चीनी सम्राट की कन्या से विवाह की इच्छा व्यक्त की। कुषाण राजा की इस माँग को सेनापति ने पान-चाओ ने अपमानजनक माना, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों में युद्ध छिड़ गया। कनिष्क ने एक विशाल सेना पान-चाओ के विरुद्ध भेजी, किंतु इस युद्ध में यू-ची (कुषाण) सेना पराजित हुई। कनिष्क की इस असफलता का उल्लेख एक भारतीय अनुश्रुति में भी मिलता है, जिसके अनुसार उसने घोषित किया था कि ‘मैंने उत्तर को छोड़कर शेष तीन दिशाओं को जीत लिया है।’

कनिष्क ने सेनापति पान-चाऊ की मृत्यु के बाद अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए चीन पर दूसरी बार आक्रमण किया और चीनी सेना को पराजित कर मध्य एशिया के प्रदेशों (यारकंद, खोतान और काशगर) पर अधिकार कर कुषाण साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि कनिष्क का साम्राज्य सुंग-लिंग पर्वत के पूर्व में भी विस्तृत था और पीली नदी के पश्चिम में रहने वाली जातियाँ उससे भयभीत होकर अपने राजकुमारों को कनिष्क के दरबार में बंधक के रूप में भेज दिया था। सुंग-लिंग प्रदेश का अभिप्राय चीनी तुर्किस्तान से ही है, जिसमें यारकंद, खोतान और काशगर सम्मिलित हैं। एक खोतानी पांडुलिपि में भी बहलक (बैक्ट्रिया) के शासक ‘चंद्र कनिष्क’ का उल्लेख मिलता है, जिससे खोतान पर कनिष्क के अधिकार की पुष्टि होती है।

साम्राज्य विस्तार

कनिष्क ने अपनी विजयों के द्वारा एक विस्तृत साम्राज्य स्थापित किया, जिसमें अफ़ग़ानिस्तान, सिंधु का भाग, बैक्ट्रिया एवं पार्थिया के कुछ प्रदेशों के साथ-साथ मध्य एशिया (चीनी तुर्किस्तान) तथा बंगाल तक का क्षेत्र सम्मिलित था। उसके अभिलेख पेशावर, माणिक्याल (रावलपिंडी), सुई विहार (बहावलपुर), जेदा (रावलपिंडी), मथुरा, कौशांबी, सारनाथ तथा साँची में प्राप्त हुए हैं, जो उसके व्यापक आधिपत्य के सूचक हैं। कुजुल कैडफिसेस के समय से ही बैक्ट्रिया कुषाण साम्राज्य के अंतर्गत था और इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यह प्रदेश कनिष्क के हाथ से निकल गया हो। इसके विपरीत, खोतान से प्राप्त पांडुलिपि में ‘चंद्र कनिष्क’ को बैक्ट्रिया (बहुलक) का राजा कहा गया है। काबुल अभिलेख से ज्ञात होता है कि अफ़ग़ानिस्तान के कुछ भाग पर हुविष्क का अधिकार था, किंतु संभवतः यह प्रदेश कनिष्क के समय से ही कुषाण साम्राज्य में सम्मिलित था।

ह्वेनसांग के विवरण और अन्य चीनी ग्रंथों से पता चलता है कि गांधार कनिष्क के अधिकार में था और यही क्षेत्र उस युग की प्रख्यात कला-शैली गांधार कला का प्रमुख केंद्र भी था। रावलपिंडी के निकट स्थित माणिक्याल से कनिष्क के 18वें वर्ष का अभिलेख प्राप्त हुआ है। सुई विहार (बहावलपुर) अभिलेख सिंधु-क्षेत्र पर उसके अधिकार की, तथा जेदा अभिलेख पंजाब पर उसके अधिकार की पुष्टि करता है। टॉलमी के विवरण से भी पूर्वी पंजाब पर कुषाण-शासन तथा कनिष्क के अधिकार की पुष्टि होती है। कश्मीर भी कनिष्क के साम्राज्य का एक अंग था। कल्हण ने राजतरंगिणी में कनिष्क, जुष्क और हुष्क द्वारा कश्मीर पर शासन करने तथा वहाँ अपने नाम पर नगर (कनिष्कपुर) बसाने का उल्लेख किया है।

उत्तर भारत में मथुरा, श्रावस्ती, कौशांबी एवं सारनाथ से कनिष्क के अभिलेख प्राप्त हुए हैं तथा कनिष्ककालीन मूर्तियाँ भी इन्हीं स्थानों से मिली हैं। उसकी मुद्राएँ आज़मगढ़ तथा गोरखपुर से भी प्राप्त हुई हैं। सारनाथ अभिलेख में उसके शासनकाल के तीसरे वर्ष का उल्लेख है, जिसमें महाक्षत्रप खरपल्लान तथा क्षत्रप वनस्पर के नाम अंकित हैं। पुराणों में सातवाहन (आंध्र) वंश के पश्चात् मगध का शासक वनस्पर को ही बताया गया है, जो संभवतः कनिष्क द्वारा नियुक्त मगध का क्षत्रप था। महाक्षत्रप खरपल्लान की नियुक्ति मथुरा-प्रदेश के शासन के लिए हुई थी। हाल ही में मुंगरा बादशाहपुर (जौनपुर) तथा खैराडीह (बलिया) से भी कुषाणकालीन बस्तियों के अवशेष प्रकाश में आए हैं। मध्य भारत में बिलासपुर तथा अन्य स्थानों से कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों की मुद्राएँ मिली हैं तथा साँची से मथुरा-शैली की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिन पर कुषाण शासकों के नाम उत्कीर्ण हैं। इससे संकेत मिलता है कि दक्षिण में विंध्य क्षेत्र तक भी कुषाण-प्रभाव विस्तृत था।

कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty)
कुषाण साम्राज्य का विस्तार

इस प्रकार कनिष्क ने उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम, चारों दिशाओं में अपने साम्राज्य का विस्तार किया और मौर्य साम्राज्य के पश्चात् प्रथम बार भारत में ऐसे विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जिसमें गंगा, सिंधु और आक्सस की घाटियाँ एक साथ सम्मिलित थीं।

कनिष्क की धार्मिक नीति

कनिष्क बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था, इसी कारण उसकी तुलना अशोक से की जाती है, पर वह धार्मिक रूप से संकीर्ण नहीं था। उसने अपनी धार्मिक सहिष्णुता तथा बौद्ध धर्म में आस्था के कारण अशोक के समान एक धर्म-प्रचारक की ख्याति अर्जित की। बौद्ध होते हुए भी उसके सिक्कों पर यवन (यूनानी), ज़रथुस्त्री (ईरानी) तथा भारतीय, तीनों परंपराओं के देवी-देवताओं के चित्र या नाम अंकित मिलते हैं, जो उसकी धार्मिक उदारता के परिचायक हैं। इनमें यूनानी सूर्यदेव हेलिओस; ईरानी देवता मिहिर (सूर्य), माह (चंद्र), आतश (अग्नि) तथा प्राचीन एलम की देवी नाना और भारतीय परंपरा के शिव, स्कंद, विशाख, वायु और बुद्ध आदि सम्मिलित हैं। कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध की आकृति और ‘बोद्दो’ नाम का मिलना कुषाण कला की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। उसके कुछ ताँबे के सिक्कों पर उसे स्वयं एक वेदी पर बलि करते हुए दिखाया गया है। इससे स्पष्ट है कि कनिष्क सभी धर्मों तथा देवी-देवताओं का आदर करता था। उसके विशाल साम्राज्य में विविध धर्मों, संस्कृतियों और क्षेत्रों के लोग निवास करते थे, अतः संभव है कि राजनीतिक कारणों से भी उसने जनसाधारण की भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए विभिन्न धर्मों के देवी-देवताओं को अपने सिक्कों पर अंकित करवाया हो। इस प्रकार कनिष्क ने ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति’ की भावना को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया।

बौद्ध परंपरा के अनुसार कनिष्क के संरक्षण में कश्मीर (कुंडलवन विहार) या जालंधर में चतुर्थ बौद्ध संगीति आयोजित हुई। इसके अध्यक्ष वसुमित्र और उपाध्यक्ष अश्वघोष माने जाते हैं। इस संगीति में बौद्ध धर्म के सर्वास्तिवादी संप्रदाय के अभिधर्म ग्रंथों पर विस्तृत टीकाएँ रची गईं, जिनका संकलन ‘महाविभाषा’ के रूप में प्रसिद्ध है। इसे बौद्ध दर्शन का विश्वकोश कहा जाता है। इसी काल में महायान शाखा का प्रसार भी तेज़ हुआ और मध्य एशिया तथा चीन तक बौद्ध धर्म पहुँच गया।

सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

कनिष्क कला और विद्या का आश्रयदाता था। उसकी राजसभा में अनेक विद्वान् शोभायमान थे, जिनमें बौद्ध दार्शनिक पार्श्व, वसुमित्र और अश्वघोष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वसुमित्र ने चतुर्थ बौद्ध संगीति में महाविभाषा की रचना की। अश्वघोष ने बुद्धचरित, सौंदरनंद, शारिपुत्र प्रकरण तथा सूत्रालंकार जैसे ग्रंथों की रचना की, जिनमें बुद्धचरित तथा सौंदरनंद को महाकाव्य की तथा शारिपुत्र प्रकरण को नाट्य-ग्रंथ की संज्ञा प्राप्त है। कवि एवं नाटककार होने के साथ-साथ अश्वघोष संगीतज्ञ, कथाकार, नीतिज्ञ तथा दार्शनिक भी था, इसी कारण उसकी तुलना कभी-कभी मिल्टन, गेटे तथा वाल्तेयर से की जाती है।

नागार्जुन जैसे प्रकांड पंडित तथा चरक जैसे चिकित्सक भी कनिष्क के दरबार के रत्न थे। नागार्जुन दार्शनिक होने के साथ-साथ प्रारंभिक वैज्ञानिक भी माने जाते हैं। उन्होंने अपने ग्रंथ माध्यमिक सूत्र (प्रज्ञापारमिता-सूत्र) में सापेक्षता संबंधी विचार प्रस्तुत किए। माध्यमिककारिका,‘विग्रहव्यावर्तन’, युक्तिषष्टिका, शून्यतासप्तति, रत्नावली तथा वैदल्यसूत्र उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ मानी जाती हैं। कनिष्क के राजवैद्य चरक ने औषधिशास्त्र की प्राचीनतम रचनाओं में से एक चरकसंहित’ की रचना की। अन्य विद्वानों में मातृचेट तथा संघरक्षक के नाम भी उल्लेखनीय हैं। कनिष्क के समय में ही वात्स्यायन के कामसूत्र तथा भास की ‘स्वप्नवासवदत्ता’ जैसे ग्रंथों की भी रचना हुई मानी जाती है। स्वप्नवासवदत्ता को भारत का प्रथम पूर्ण उपलब्ध नाटक माना जाता है।

कनिष्क निर्माता और कला का उन्नायक भी था। उसके संरक्षण में स्थापत्य एवं मूर्तिकला को विशेष प्रोत्साहन मिला। उसने पेशावर के निकट एक विशाल स्तूप बनवाया, जिसमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष रखे गए थे। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस स्तूप का निर्माण एक यूनानी अभियंता की देखरेख में हुआ, जो संभवतः यवन अधिकारी अगेसिलाओस था और कनिष्क के निर्माण-कार्यों का निरीक्षक था। चीनी यात्री ने इस स्तूप की ऊँचाई का वर्णन बड़े आश्चर्य से किया है। कश्मीर में उसने ‘कनिष्कपुर’ नामक नगर बसाया। कल्हण की राजतरंगिणी से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रचार किया तथा वहाँ बौद्ध मठ, विहार एवं स्तूप स्थापित किए। उसने रोमन सम्राटों के सिक्कों का अनुकरण करते हुए स्वर्ण-मुद्राएँ भी चलवाईं।

सिक्के और कला

कनिष्क के संरक्षण में गांधार-कला-शैली का विकास हुआ, जिसे ‘यूनानी-बौद्ध कला’ भी कहा जाता है। महायान धर्म के प्रचार के साथ कनिष्क के काल में बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मूर्तियाँ बनने लगीं। उसके कुछ सिक्कों पर यूनानी शैली में खड़े, तो कुछ पर भारतीय शैली में बैठे बुद्ध की आकृतियाँ प्राप्त होती हैं। पेशावर गांधार-कला का प्रमुख केंद्र था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कनिष्क का काल गांधार-कला के विकास का स्वर्णयुग माना जाता है। गांधार-शैली के साथ-साथ इसी काल में मथुरा-कला-शैली का भी विकास हुआ, जिसमें लाल पत्थर का प्रयोग विशेष रूप से किया गया; मथुरा से प्राप्त एक मूर्ति में कनिष्क को सैनिक वेशभूषा में खड़ा दिखाया गया है।

परवर्ती कुषाण शासक

वासिष्क

कनिष्क के पश्चात् विशाल कुषाण साम्राज्य का स्वामी वासिष्क बना, जिसने लगभग 144 ई. से 160 ई. के बीच शासन किया। उसके शासनकाल के दो अभिलेख प्राप्त होते हैं: एक 24वें वर्ष (कनिष्क-संवत्) का मथुरा से तथा दूसरा 28वें वर्ष का साँची से। उसके शासन में कनिष्क द्वारा स्थापित कुषाण साम्राज्य सुदृढ़ बना रहा और उसमें कोई क्षीणता नहीं आई। संभवतः वासिष्क ने साम्राज्य का और भी विस्तार किया, क्योंकि साँची के अभिलेख से पता चलता है कि विदिशा भी ‘राजाधिराज देवपुत्रषाहि वासिष्क’ की अधीनता स्वीकार करता था, जबकि इससे पूर्व विदिशा सातवाहनों के अधीन थी। कुछ इतिहासकार इसका समीकरण 41वें वर्ष के आरा-पेशावर अभिलेख में उल्लिखित ‘वाझेष्क’ से करते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि उसका साम्राज्य पेशावर से लेकर पूर्वी मालवा तक विस्तृत था।

कनिष्क द्वितीय (‘वाझेष्क-पुत्र’)

पेशावर जिले में सिंधु के तट पर स्थित आरा नामक स्थान से प्राप्त एक अभिलेख में ‘महाराज राजाधिराज देवपुत्र कैसर वाझेष्क-पुत्र’ के शासनकाल में दशव्हर नामक व्यक्ति द्वारा एक कुआँ खुदवाए जाने का उल्लेख मिलता है। इस अभिलेख में जिसे ‘वाझेष्क-पुत्र’ कहा गया है, वह कनिष्क प्रथम से भिन्न, एक दूसरा शासक कनिष्क द्वितीय था, जो वासिष्क के पश्चात् कुषाण साम्राज्य का अधिपति बना और संभवतः कुछ समय तक हुविष्क के साथ संयुक्त रूप से शासन करता रहा। अधिकांश इतिहासकार दो पृथक् कनिष्कों की सत्ता को स्वीकार करते हैं।

आरा अभिलेख में कनिष्क द्वितीय के नाम के साथ महाराज, राजाधिराज, देवपुत्र जैसी उपाधियों के अतिरिक्त ‘कैसर’ (सीज़र) का भी प्रयोग हुआ है, जो प्राचीन रोमन सम्राटों की उपाधि थी। इससे प्रतीत होता है कि रोमन साम्राज्य से घनिष्ठ संबंधों के कारण भारत के उत्तरापथ-पति ने अपनी अन्य उपाधियों के साथ यह रोमन उपाधि भी धारण कर ली थी। इस काल में भारत और रोम के बीच सुदृढ़ व्यापारिक संबंध विद्यमान थे, और प्रथम शताब्दी ई. के अनेक रोमन सिक्के दक्षिण भारत के विभिन्न स्थलों से प्राप्त हुए हैं। कुषाण सिक्कों की बनावट और तौल भी रोमन सिक्कों से पर्याप्त मिलती-जुलती है।

हुविष्क

हुविष्क कुषाण शासक कनिष्क द्वितीय का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। उसका शासनकाल कनिष्क-संवत् के लगभग 28वें से 60वें वर्ष तक, अर्थात् लगभग 162 ई. से 180 ई. तक माना जाता है। उसका साम्राज्य कनिष्क प्रथम के साम्राज्य के समान ही विस्तृत था। उसके सोने-चाँदी और ताँबे के सिक्के उत्तर में कपिशा से लेकर पूर्व में बिहार तक से प्राप्त हुए हैं, जिससे ज्ञात होता है कि कनिष्क द्वारा जीता गया संपूर्ण राज्य उसके अधिकार में बना रहा और इसका विस्तार पूर्व में पाटलिपुत्र तक था। उसके सिक्कों पर उसकी अपनी सुंदर प्रतिमा के साथ-साथ भारतीय (स्कंद, विशाख, शिव), ईरानी और यूनानी (हेराक्लीज़, सेरापिस) देवी-देवताओं की आकृतियाँ अंकित हैं।

हुविष्क के समय का एक अभिलेख काबुल के ‘ख्वत’ (खवत) नामक स्थान पर एक स्तूप की खुदाई में प्राप्त हुआ है, जिसे कमगुल्म-पुत्र वमग्ररेग नामक व्यक्ति ने भगवान् शाक्यमुनि के शरीर-धातु की प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में लिखवाया था। यह काबुल के पश्चिमी क्षेत्र में बौद्ध धर्म तथा प्राकृत भाषा के प्रचलन का स्पष्ट प्रमाण है। इसी युग के अनेक अभिलेख प्राकृत भाषा और खरोष्ठी लिपि में खोतान से भी प्राप्त हुए हैं, जो काष्ठ-पट्टिकाओं (कील मुद्राओं) पर लिखे गए हैं।

कल्हण की राजतरंगिणी से ज्ञात होता है कि कश्मीर में अपने नाम पर एक नगर सम्राट कनिष्क के उत्तराधिकारी जुष्क अथवा हुविष्क ने बसाया था, जिसकी पहचान श्रीनगर के उत्तर में स्थित जुकुर (हुविष्कपुर?) नामक ग्राम से की जाती है। हुविष्क ने मथुरा में भी एक सुंदर विहार बनवाया था। उसका व्यक्तिगत झुकाव संभवतः ब्राह्मण धर्म की ओर भी था। मथुरा में ‘गोकर्णेश्वर’ के नाम से पूजी जाने वाली मूर्ति संभवतः कुषाण सम्राट हुविष्क की ही प्रतिमा है।

वासुदेव प्रथम

हुविष्क के पश्चात् वासुदेव कुषाण साम्राज्य का स्वामी बना। वह शैव धर्मानुयायी था, क्योंकि उसके सिक्कों पर शिव तथा नंदी की आकृतियाँ अंकित मिलती हैं। उसके किसी भी सिक्के पर यवन अथवा अन्य विदेशी देवताओं की आकृतियाँ उपलब्ध नहीं हुई हैं, जिससे प्रतीत होता है कि उसने प्राचीन हिंदू धर्म को पूर्णतः आत्मसात् कर लिया था और उसका ‘वासुदेव’ नाम भी इसी ओर संकेत करता है। यह प्रवृत्ति कुषाण राजवंश के क्रमिक भारतीयकरण का एक स्पष्ट उदाहरण है। उसके अधिकांश अभिलेख मथुरा तथा आसपास के क्षेत्रों से मिले हैं।

वासुदेव के शासनकाल में कुषाण साम्राज्य की शक्ति क्षीण होने लगी थी। इस समय उत्तरापथ में अनेक नई राजशक्तियों का उदय हुआ, जिन्होंने कुषाणों के प्रभुत्व को क्षीण करते हुए अपनी शक्ति का विकास किया। ईरान में सासानी वंश तथा पूर्व में भारशिव-नाग वंश के उदय ने कुषाणों के पतन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। संभवतः पश्चिमोत्तर भारत में कुषाण-प्रभाव क्रमशः क्षीण होता गया और कुषाण सत्ता सिमटकर मथुरा तथा उसके आसपास के क्षेत्र तक ही केंद्रित रह गई। हुविष्क के शासनकाल में ही दक्षिणापथ में शकों ने पुनः अपना उत्कर्ष प्राप्त किया था और रुद्रदामन के नेतृत्व में शक एक बार पुनः दक्षिणापथ की प्रमुख राजशक्ति बन गए।

कुषाण साम्राज्य का पतन

कुषाण साम्राज्य का पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक चलने वाली एक क्रमिक प्रक्रिया थी। इस प्रक्रिया में बाहरी और आंतरिक दोनों शक्तियों की भूमिका रही। पश्चिम से ससानी साम्राज्य का बढ़ता दबाव, भारत के भीतर स्थानीय शक्तियों का उदय तथा अंततः मध्य एशिया से आने वाले आक्रमणकारी समूहों ने कुषाण सत्ता को धीरे-धीरे कमज़ोर कर दिया। वासुदेव प्रथम को अंतिम प्रभावशाली कुषाण सम्राट माना जाता है। उसके अभिलेख मुख्यतः मथुरा क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं और वे कनिष्क-संवत् के लगभग 64वें से 98वें वर्ष तक के माने जाते हैं। इन अभिलेखों के भौगोलिक प्रसार से पता चलता है कि उसके समय तक कुषाण साम्राज्य का क्षेत्र पहले की तुलना में काफ़ी सीमित हो चुका था। वासुदेव प्रथम के बाद भी कनिष्क तृतीय और वासुदेव द्वितीय जैसे कुषाण नाम वाले कुछ शासकों के सिक्के और उल्लेख मिलते हैं, लेकिन उनके क्रम, काल और वास्तविक अधिकार-क्षेत्र को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि ये शासक सीमित क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत और गांधार के कुछ भागों तक ही प्रभावी रहे।

तृतीय शताब्दी ईस्वी के आरंभ में ईरान में पार्थियन अर्शकानी वंश के स्थान पर ससानी वंश का उदय हुआ। इसके संस्थापक अर्दशीर प्रथम ने लगभग 224 ई. के बाद ईरान में अपनी सत्ता मज़बूत की और पूर्व की ओर विस्तार करना शुरू किया। उसके उत्तराधिकारी शापुर प्रथम के शासनकाल में यह विस्तार और अधिक प्रभावशाली हो गया। शापुर प्रथम के अभिलेखों, विशेषकर नक्श-ए-रुस्तम के प्रसिद्ध अभिलेख में, ससानी सत्ता के अधीन आए कुषाण क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है। उसकी पूर्वी सीमा पेशावर तक पहुँचने का संकेत मिलता है। बैक्ट्रिया कुषाण साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण मूल क्षेत्र था और कुजुल कैडफिसेस के समय से ही कुषाणों के नियंत्रण में रहा था। इसलिए बैक्ट्रिया का ससानी प्रभाव में चले जाना कुषाण साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा के लिए बड़ा आघात था। इसके साथ ही उन व्यापारिक मार्गों पर भी कुषाणों का नियंत्रण कमज़ोर हो गया, जो मध्य एशिया और रेशम-मार्ग के माध्यम से उनकी आर्थिक समृद्धि का प्रमुख आधार थे।

ससानी साम्राज्य ने जिन क्षेत्रों पर अधिकार किया, वहाँ उसने स्थानीय प्रशासन की एक व्यवस्था विकसित की, जिसे सामान्यतः कुषाण-ससानी शासन कहा जाता है। इस व्यवस्था से जुड़े शासक प्रायः ‘कुषाणशाह’ की उपाधि धारण करते थे। सिक्कों से पता चलता है कि प्रारंभिक चरण में इस पद पर ससानी राजवंश से जुड़े लोगों को नियुक्त किया जाता था। वे ससानी सम्राट की अधीनता स्वीकार करते हुए बैक्ट्रिया, काबुल घाटी और गांधार के कुछ हिस्सों में शासन करते थे। इनके सिक्कों में कुषाण परंपरा और ससानी कला-शैली का मिश्रण दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, शिव और नंदी जैसी कुषाणकालीन धार्मिक आकृतियाँ ससानी शैली के प्रतीकों और लेखन-पद्धति के साथ दिखाई देती हैं। इसी मिश्रित राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वरूप के कारण इन्हें कुषाण-ससानी कहा जाता है। यह व्यवस्था लगभग चौथी शताब्दी के मध्य तक विभिन्न रूपों में बनी रही।

कुषाण साम्राज्य की समृद्धि का एक प्रमुख आधार भारत, चीन और रोमन साम्राज्य के बीच होने वाला लंबी दूरी का व्यापार था। मध्य एशिया से होकर गुज़रने वाले व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के कारण कुषाण शासकों को पर्याप्त राजस्व प्राप्त होता था। इसी आर्थिक समृद्धि के आधार पर उन्होंने बड़ी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं। लेकिन तृतीय शताब्दी में रोमन साम्राज्य स्वयं गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुज़र रहा था। दूसरी ओर, ससानी विस्तार के कारण मध्य एशिया और पश्चिम की ओर जाने वाले व्यापारिक मार्गों पर कुषाणों का नियंत्रण भी कम हो गया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई। कुछ इतिहासकार बाद के कुषाण सिक्कों में स्वर्ण की शुद्धता में आई कमी को आर्थिक दुर्बलता  का संकेत मानते हैं। जो भी हो, इतना स्पष्ट है कि व्यापारिक संपर्क के कमज़ोर होने से कुषाण सत्ता की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा।

कुषाण साम्राज्य के भारतीय क्षेत्रों में भी अनेक स्थानीय शक्तियाँ मज़बूत होने लगीं। भारत में कुषाण सत्ता का एक प्रमुख केंद्र मथुरा था। वासुदेव प्रथम के बाद मथुरा क्षेत्र से कुषाण अभिलेखों का मिलना बंद हो जाता है और इसी क्षेत्र में नाग वंश की शक्ति बढ़ती दिखाई देती है। नाग राजवंशों का संबंध पद्मावती, जिसे वर्तमान पवाया से जोड़ा जाता है, मथुरा और कांतिपुरी जैसे केंद्रों से था। परंपराओं के अनुसार भारशिव नाग कुषाणों के विरुद्ध संघर्ष के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। इससे संकेत मिलता है कि मध्य भारत और गंगा-यमुना क्षेत्र में कुषाणों की राजनीतिक पकड़ कमज़ोर हो चुकी थी।

पश्चिमी तथा उत्तर-पश्चिमी भारत में यौधेय, मालव और कुणिंद जैसी स्थानीय गणराज्यीय शक्तियों ने  भी अपनी स्वतंत्रता स्थापित कर ली थी। इनके स्वतंत्र सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो उनकी राजनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक गतिविधियों का प्रमाण हैं। पश्चिमी और मध्य भारत में शक क्षत्रपों की सत्ता भी मज़बूत थी। इस प्रकार कुषाणों को भारतीय क्षेत्रों में एक साथ कई स्थानीय शक्तियों का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप उनका राजनीतिक अधिकार धीरे-धीरे सीमित होता गया और विशाल साम्राज्य छोटे-छोटे राजनीतिक क्षेत्रों में विभाजित होने लगा।

चौथी शताब्दी ईस्वी में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में किदारी हूणों का उदय हुआ। चीनी स्रोतों में किदार या किदारा के नेतृत्व वाले इस समूह का उल्लेख मिलता है। कुछ स्रोतों और विद्वानों के अनुसार इन्हें ‘छोटे कुषाण’ के रूप में भी संबोधित किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि उन्होंने स्थानीय कुषाण राजनीतिक परंपराओं और उपाधियों को अपनाया था। हालाँकि किदारियों की जातीय पहचान को लेकर इतिहासकारों में पूर्ण सहमति नहीं है। किदारियों ने बैक्ट्रिया और गांधार में बचे हुए कुषाण तथा कुषाण-ससानी राजनीतिक अवशेषों को समाप्त कर वहाँ अपनी सत्ता स्थापित की। इस प्रकार कुषाणों की शेष राजनीतिक शक्ति भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

कुषाण साम्राज्य के बिखर जाने के बाद भी ‘कुषाण’ नाम की राजनीतिक प्रतिष्ठा तुरंत समाप्त नहीं हुई। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में उसके प्रभाव को स्वीकार करने वाले उत्तर-पश्चिमी शासकों के संदर्भ में ‘दैवपुत्र-षाहि-षाहानुषाहि’ जैसी उपाधियों का उल्लेख मिलता है। कुछ विद्वान इसे उत्तर-पश्चिम में बचे हुए कुषाण शासक या कुषाण परंपरा से जुड़े शासकों के रूप में पहचानते हैं। प्रशस्ति में आत्मनिवेदन, कन्या-उपहार और गरुड़-मुद्रा जैसे अधीनता अथवा मैत्री-संबंधी संकेतों का भी उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि चौथी शताब्दी तक कुषाण नाम और उनकी राजनीतिक परंपरा का कुछ महत्त्व बना हुआ था, भले ही उनका विशाल साम्राज्य समाप्त हो चुका था।

पाँचवीं शताब्दी में श्वेत हूणों, जिन्हें हेफ़थलाइट भी कहा जाता है, के आक्रमणों ने उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। इन आक्रमणों के परिणामस्वरूप किदारी सत्ता भी कमज़ोर होकर समाप्त हो गई। इसके साथ ही उत्तर-पश्चिम में कुषाणों से जुड़ी बची-खुची राजनीतिक परंपराएँ भी समाप्त होती गईं। इस प्रकार कुषाण साम्राज्य का पतन कई चरणों में पूरा हुआ।

पहला चरण तृतीय शताब्दी के मध्य में दिखाई देता है, जब ससानी विस्तार के कारण बैक्ट्रिया और पश्चिमी क्षेत्रों पर कुषाणों का नियंत्रण समाप्त या अत्यंत कमज़ोर हो गया। दूसरे चरण में भारत के भीतर नागों, विभिन्न गणराज्यों और शक क्षत्रपों के उदय से मथुरा तथा गंगा-यमुना क्षेत्र सहित कई भारतीय प्रदेश कुषाणों के हाथ से निकल गए। तीसरे और अंतिम चरण में चौथी-पाँचवीं शताब्दी के दौरान किदारी हूणों तथा बाद में श्वेत हूणों के दबाव और आक्रमणों ने उत्तर-पश्चिम में कुषाण सत्ता के अंतिम अवशेषों को भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार कुषाण साम्राज्य का पतन एक दीर्घकालिक राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रक्रिया थी, जिसने लगभग डेढ़ शताब्दी में एक विशाल साम्राज्य को क्षेत्रीय शक्तियों में विभाजित कर दिया।

कुषाणों की प्रशासनिक व्यवस्था

राजतंत्र और सम्राट की सर्वोच्चता

कुषाण शासन मूलतः राजतंत्रात्मक था। राजा राज्य का सर्वोच्च राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक अधिकारी होता था। कुषाण शासकों ने अपनी सत्ता को प्रभावशाली बनाने के लिए विभिन्न भारतीय, ईरानी और मध्य एशियाई राजनीतिक परंपराओं का उपयोग किया।

कुषाण प्रशासन मौर्य प्रशासन की तरह अत्यधिक केंद्रीकृत नहीं था। मौर्ययुगीन केंद्रीकरण की प्रवृत्ति के स्थान पर इसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसका एक कारण साम्राज्य का विशाल और विविध स्वरूप था, जिसमें गंगा, सिंधु और आक्सस की घाटियाँ एक साथ सम्मिलित थीं और जहाँ अलग-अलग भाषाओं, धर्मों तथा संस्कृतियों के लोग रहते थे। इतने विस्तृत क्षेत्र को एक ही केंद्र से नियंत्रित करना कठिन था, इसलिए स्थानीय शासकों और अधिकारियों को पर्याप्त स्वायत्तता दी गई। फिर भी राजा सर्वोच्च सत्ताधारी था और उसके दैवी गुणों तथा प्रतिष्ठा पर विशेष बल दिया जाता था।

राजत्व और उपाधियाँ

कुषाण राजाओं ने ‘महाराज’, ‘राजाधिराज’, ‘देवपुत्र’, ‘कैसर’, ‘षाहानुषाहि’ (शाओनानोशाओ), ‘महेश्वर’ और ‘सर्वलोकेश्वर’ जैसी अनेक भव्य एवं गौरवपूर्ण उपाधियाँ धारण कीं। इन उपाधियों में विभिन्न परंपराओं का मेल दिखता है। ‘महाराज’, ‘राजाधिराज’ और ‘देवपुत्र’ भारतीय परंपरा के सूचक हैं। ‘देवपुत्र’ शासक की दैवी वैधता को प्रदर्शित करती थी। ‘षाहानुषाहि’ (शाहों का शाह, अर्थात् राजाओं का राजा) में ईरानी राजनीतिक परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है, और ‘कैसर’ (सीज़र) रोमन सम्राटों की उपाधि का रूप है। ‘महेश्वर’ और ‘सर्वलोकेश्वर’ जैसी उपाधियाँ शैव धर्म के प्रभाव की ओर संकेत करती हैं।

स्वयं को ‘देवपुत्र’ के रूप में प्रतिष्ठित करने के साथ कुषाणों ने मृत राजाओं की स्मृति में ‘देवकुल’ (प्रतिमा-मंदिर) बनवाने की प्रथा भी चलाई। विम कैडफिसेस के समय का एक देवकुल मथुरा के निकट माट में और दूसरा मथुरा नगर के उत्तर में गोकर्णेश्वर मंदिर के समीप था। इस प्रथा से राजत्व का दैवी सिद्धांत और सुदृढ़ हुआ। यह परंपरा ईरानी, यूनानी और रोमन प्रभावों का भारतीय परंपरा के साथ मिश्रण थी।

प्रांतीय शासन और क्षत्रप व्यवस्था

विशाल कुषाण साम्राज्य को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की सहायता ली जाती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि कुषाणों के अधीन अनेक छोटे-छोटे सामंत-सदृश शासक भी थे, जो उनकी अधीनता स्वीकार करते थे। क्षत्रप और महाक्षत्रप जैसे अधिकारियों का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है। यह व्यवस्था पूरी तरह कुषाणों की मौलिक देन नहीं थी, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत में पहले से प्रचलित शक-क्षत्रप परंपरा से भी प्रभावित थी। स्थानीय अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार दिए जाने से विशाल साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखना संभव हुआ। इससे प्रशासन में एक प्रकार का विकेंद्रीकरण दिखाई देता है।

कुषाणों की प्रांतीय शासन-व्यवस्था के विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। संभवतः साम्राज्य पाँच अथवा सात प्रांतों में विभाजित था। प्रांतों के प्रशासन के लिए महाक्षत्रपों अथवा क्षत्रपों की नियुक्ति की जाती थी। सारनाथ और मथुरा के अभिलेखों में खरपल्लान तथा वनस्पर जैसे शासकों के नाम मिलते हैं। महाक्षत्रप खरपल्लान की नियुक्ति मथुरा-प्रदेश के शासन के लिए हुई थी, जबकि वनस्पर संभवतः कनिष्क द्वारा नियुक्त मगध का क्षत्रप था।

कहीं-कहीं एक ही प्रदेश में एक साथ दो शासकों की नियुक्ति की प्रथा भी अपनाई जाती थी, जिसे द्वैध शासन कहा जाता है। कनिष्क के शासनकाल के तीसरे वर्ष के सारनाथ अभिलेख में महाक्षत्रप खरपल्लान और क्षत्रप वनस्पर का साथ-साथ उल्लेख इसका उदाहरण है। क्षत्रप और महाक्षत्रप के अतिरिक्त ‘दंडनायक’ और ‘महादंडनायक’ नामक अधिकारियों का भी अभिलेखों में उल्लेख मिलता है, जो प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ सैन्य-व्यवस्था से भी जुड़े रहे होंगे।

अनेक छोटे सामंत भी कुषाण अधिपत्य स्वीकार करते थे, जिससे एक श्रेणीबद्ध सामंती ढाँचा विकसित हुआ। इसमें सम्राट सबसे ऊपर था, उसके नीचे महाक्षत्रप और क्षत्रप थे और उनके अधीन स्थानीय सामंत तथा अधिकारी। इस ढाँचे को आगे चलकर गुप्तों ने भी अपनाया।

नगर एवं ग्राम प्रशासन

नगरों के प्रशासन में श्रेणी (शिल्पियों और व्यापारियों के संघ) और निगम जैसी संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। कुषाण-काल में व्यापार और शिल्प के विकास के कारण नगरों का महत्त्व बढ़ा और ये संस्थाएँ आर्थिक जीवन के साथ-साथ स्थानीय व्यवस्था में भी सक्रिय रहीं।

ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई था, जिसका प्रधान ‘ग्रामिक’ कहलाता था। उसका उल्लेख वासुदेव के मथुरा अभिलेख में मिलता है।  ग्रामिक का मुख्य कार्य राजस्व की वसूली करना था। ‘पद्रपाल’ नामक अधिकारी गाँव की सामूहिक परती (ऊसर) भूमि की देखरेख करता था।

आय और सेना

राज्य की आय के प्रमुख स्रोत भूमि-कर, व्यापार पर लगने वाले कर तथा सीमा और बाज़ार शुल्क थे। भारत, मध्य एशिया, चीन और रोमन साम्राज्य के बीच रेशम-मार्ग के व्यापार पर कुषाणों का नियंत्रण था, जिससे उन्हें प्रचुर आय होती थी। इसी व्यापार से आए रोमन स्वर्ण के आधार पर उन्होंने अपने स्वर्ण-सिक्के चलाए।

कुषाण साम्राज्य की शक्ति का प्रमुख आधार उसकी मज़बूत सैन्य व्यवस्था थी। मध्य एशियाई परंपरा से प्रभावित उनकी सेना में घुड़सवार सैनिकों और अश्वारोही धनुर्धरों का विशेष महत्त्व था। सेना में पैदल और घुड़सवार दोनों का महत्त्व था और मध्य एशियाई घुड़सवारों की युद्धशैली से कुषाणों को सैनिक बढ़त मिली। घुड़सवार सेना के प्रभावी उपयोग ने कुषाणों को मध्य एशिया और उत्तर-पश्चिम भारत के विस्तृत क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायता दी।

कुषाण प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका बहुसांस्कृतिक स्वरूप था। प्रशासन और राजकीय अभिव्यक्ति में यूनानी, खरोष्ठी, प्राकृत, ईरानी और भारतीय परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है। कुषाण सिक्कों पर विभिन्न भाषाओं और देवताओं का प्रयोग उनके बहुसांस्कृतिक साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। कुषाणों ने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ नवीन तत्त्वों का समावेश किया। इसी काल में द्वैध शासन-प्रणाली विकसित हुई और राजा के दैवी गुणों पर विशेष बल दिया गया। कुषाण राजनीतिक ढाँचे की एक प्रमुख विशेषता, श्रेणीबद्ध सामंती व्यवस्था, को आगे चलकर गुप्तों ने, और विशेष रूप से समुद्रगुप्त ने, अपने साम्राज्य-संगठन के एक स्तंभ के रूप में अपनाया।

कुषाणकालीन अर्थव्यवस्था

कुषाण काल की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन, शिल्प-उद्योग, आंतरिक व्यापार और दूरस्थ अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संतुलन पर टिकी थी। साम्राज्य की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि उसके अधीन क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया, चीन, ईरान और पश्चिमी एशिया से जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों के बीच स्थित थे। काबुल, गांधार, तक्षशिला, पुरुषपुर, मथुरा और आगे गंगा-यमुना क्षेत्र तक फैले मार्गों ने आर्थिक गतिविधियों को गति दी। कुषाणों की समृद्धि का एक प्रमुख आधार इन मार्गों पर उनकी प्रभावी पकड़ थी।

कृषि अर्थव्यवस्था का मूल आधार थी। गंगा-यमुना दोआब, पंजाब, सिंधु घाटी और गांधार जैसे उपजाऊ क्षेत्रों में उत्पादन अपेक्षाकृत अधिक होता था। गेहूँ, जौ, धान, दालें, तिलहन तथा फल-सब्जियों की खेती के प्रमाण मिलते हैं। जहाँ वर्षा अनियमित होती थी, वहाँ सिंचाई कुओं, तालाबों, नहरों और अन्य स्थानीय जल-स्रोतों से की जाती थी। अभिलेखों में कुओं और पुष्करिणियों के निर्माण का उल्लेख मिलता है।

कृषि के साथ पशुपालन भी ग्रामीण जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग था। बैल खेती के काम आते थे, जबकि अन्य पशु दूध, ऊन और परिवहन की आवश्यकताएँ पूरी करते थे। घोड़ों का पालन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वे सैन्य शक्ति के लिए आवश्यक थे।

बढ़ते नगरों, व्यापार और धार्मिक संस्थानों की आवश्यकताओं ने कारीगरों के लिए व्यापक बाजार तैयार किया। धातु-कर्म, वस्त्र निर्माण, आभूषण, मिट्टी के बर्तन, पत्थर तराशी, काँच और रत्नों का काम, मूर्तिकला, हाथीदाँत तथा लकड़ी के कार्य विकसित अवस्था में थे। लोहे के औजार कृषि और दैनिक जीवन के लिए बनाए जाते थे, और मथुरा सूती वस्त्रों तथा पाषाण-मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध था। मथुरा और गांधार में मूर्तिकला के विकास से कुशल कारीगरों की माँग बढ़ी, और स्तूपों, विहारों तथा मूर्तियों के निर्माण से अनेक व्यवसायों को प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार कला केवल सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं थी, उसने नगरीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी प्रभावित किया।

कारीगरों और व्यापारियों के संगठन (श्रेणियाँ) इस काल में महत्त्वपूर्ण थे। श्रेणियाँ उत्पादन, व्यापार, गुणवत्ता और पारस्परिक हितों से जुड़े कार्य करती थीं, बैंक की तरह भी काम करती थीं और धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं को दान भी देती थीं। मथुरा के अभिलेखों में ‘अक्षयनीवि’ (स्थायी निधि) का उल्लेख है, जिसमें दान की राशि श्रेणियों में जमा होती थी और उसके ब्याज से धार्मिक संस्थाओं का खर्च चलता था। बौद्ध स्तूपों और विहारों को मिले दान-अभिलेख व्यापारियों, कारीगरों और अन्य आर्थिक समूहों की समृद्धि के प्रमाण हैं।

कुषाणकालीन अर्थव्यवस्था की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उसका विस्तृत आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय व्यापार था। गांधार, काबुल, बाख़्तरिया, तक्षशिला और पुरुषपुर जैसे क्षेत्र व्यापारिक संपर्कों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। कुषाण साम्राज्य रोम, पार्थिया (बाद में ससानी), चीन और भारत, इन चार महान शक्तियों के बीच की कड़ी था। रेशम मार्ग का प्रमुख भाग बैक्ट्रिया और गांधार के आसपास से गुजरता था, जहाँ कुषाणों का प्रभाव था। चीन का रेशम, मध्य एशिया की वस्तुएँ और भारतीय उत्पाद इन्हीं मार्गों से दूर-दूर तक पहुँचते थे। मार्गों की सुरक्षा और प्रमुख केंद्रों पर नियंत्रण से कुषाणों को कर, चुंगी और अन्य राजस्व मिलता था। इन मार्गों से केवल वस्तुएँ ही नहीं, धर्म, कला, तकनीक, भाषाएँ और विचार भी फैले, और बौद्ध धर्म के मध्य एशिया तथा चीन की ओर प्रसार में इनकी बड़ी भूमिका थी।

भारत का रोम से स्थल और समुद्री, दोनों मार्गों से व्यापार होता था। ‘पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी’ जैसे ग्रंथों में सिंधु के मुहाने पर बारबेरिकम और गुजरात के भड़ौच (बैरीगाज़ा) जैसे बंदरगाहों का वर्णन मिलता है। वहाँ से सूती वस्त्र, मसाले, काली मिर्च, सुगंधित पदार्थ, मोती, हाथीदाँत, रत्न और नील पश्चिम को भेजे जाते थे, जबकि बदले में रोमन जगत से सोना-चाँदी, मदिरा, काँच के पात्र और मूँगा भारत आता था। बदख्शाँ से लाजवर्द (लैपिस लाज़ुली) भी पश्चिम तक जाता था। यह व्यापार केवल कुषाण-नियंत्रित क्षेत्रों तक सीमित नहीं था; दक्षिण और पश्चिम भारत के बंदरगाह भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, फिर भी इसने कुषाणकालीन उत्तर-पश्चिमी भारत की अर्थव्यवस्था को निश्चित रूप से प्रभावित किया। रोमन लेखक प्लिनी ने शिकायत की थी कि पूर्व के साथ व्यापार में रोम का बहुत सोना बाहर चला जाता है। भारत में रोमन स्वर्ण-मुद्राएँ मिली हैं, और अफ़ग़ानिस्तान के बेग्राम (प्राचीन कपिशा) के खज़ाने में रोमन काँच, मिस्र की वस्तुएँ, चीनी लाख की वस्तुएँ और भारतीय हाथीदाँत की कलाकृतियाँ एक साथ मिली हैं। इस समृद्धि का लाभ नगरों और श्रेणियों को मिला, और उनके दान से बौद्ध तथा अन्य धार्मिक संस्थाएँ फलती-फूलती रहीं।

कुषाण समृद्धि का सबसे स्पष्ट पुरातात्त्विक प्रमाण उनकी मुद्रा-व्यवस्था है। विम कडफिसेस ने स्वर्ण-मुद्राएँ चलाईं, जिनका प्रचलन कनिष्क और हुविष्क के समय अत्यंत व्यापक हो गया। इन सिक्कों का वज़न और बनावट रोमन ‘ओरियस’ से मिलती थी, और भारतीय परंपरा में स्वर्ण-मुद्रा के लिए ‘दीनार’ शब्द रोमन ‘डेनेरियस’ से लिया गया माना जाता है। स्वर्ण सिक्के उच्च-मूल्य के व्यापार और राजकीय लेन-देन में प्रयुक्त होते थे। छोटे लेन-देन के लिए बड़ी संख्या में ताँबे के सिक्के चलाए गए थे, जबकि चाँदी के सिक्के अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। कुषाणकालीन सिक्कों की शुद्धता और कलात्मकता प्रशंसनीय है। उन पर शासक की आकृति, उपाधि, यूनानी-बैक्ट्रियन परंपरा से विकसित लिपि तथा विभिन्न देवताओं और धार्मिक प्रतीकों का अंकन मिलता है, जो कुषाण साम्राज्य की आर्थिक शक्ति के साथ-साथ उसके मध्य एशियाई, ईरानी और भारतीय सांस्कृतिक संपर्कों के सूचक हैं।

कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty)
कनिष्क की मुद्राएँ

व्यापार और शिल्प के विस्तार से नगरीकरण को प्रोत्साहन मिला। पुरुषपुर (पेशावर), मथुरा, तक्षशिला और गांधार क्षेत्र के अन्य नगर आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे। मथुरा व्यापार, शिल्प, मूर्तिकला और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था, जबकि गांधार और तक्षशिला मध्य एशिया से आने वाले मार्गों से जुड़े थे। नगरों में कारीगर, व्यापारी, परिवहनकर्ता, साहूकार और अन्य पेशेवर समूह रहते थे। ग्रामीण क्षेत्रों के कृषि अधिशेष से नगरों, व्यापारियों, शिल्पकारों और राजसत्ता को आर्थिक आधार मिला। कृषि उत्पाद नगरों में पहुँचते थे और नगरों में बनी वस्तुएँ गाँवों तथा दूरस्थ बाजारों में भेजी जाती थीं। इस प्रकार ग्राम और नगर एक-दूसरे पर आर्थिक रूप से निर्भर थे।

राज्य की आय कृषि-उत्पादन पर कर, व्यापारिक मार्गों की चुंगी तथा नगरों और बाजारों से मिलने वाले राजस्व से होती थी। इसका उपयोग प्रशासन, सेना, राजकीय प्रतिष्ठानों तथा सार्वजनिक और धार्मिक निर्माणों में होता था। कनिष्क के काल में बौद्ध संस्थानों और स्मारकों के निर्माण तथा कला-संरक्षण से राज्य की आर्थिक क्षमता का संकेत मिलता है।

कुल मिलाकर कुषाणकालीन अर्थव्यवस्था केवल कृषि-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था नहीं थी, बल्कि कृषि, शिल्प, नगरीकरण, मुद्रा-प्रचलन, आंतरिक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र थी। स्वर्ण मुद्राओं का व्यापक प्रचलन, मथुरा और गांधार जैसे शिल्प-केंद्रों का विकास, सक्रिय व्यापारिक मार्ग और दूरस्थ क्षेत्रों से संपर्क इस आर्थिक गतिशीलता के प्रमुख प्रमाण हैं। रेशम मार्ग और भारत-रोमन व्यापार ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया, और व्यापार के साथ बौद्ध धर्म, कला, स्थापत्य और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रसार भी हुआ।

कुषाणकालीन समाज

कुषाणों के आगमन से भारतीय समाज में विदेशी तत्त्वों के आत्मसात होने की प्रक्रिया तेज़ हुई। यवन, शक, पह्लव और कुषाण जैसे समूह धीरे-धीरे भारतीय समाज में घुल-मिल गए। धर्मशास्त्रीय परंपरा ने इन्हें प्रायः व्रात्य या पतित क्षत्रिय की श्रेणी में रखा, पर व्यवहार में कुषाण शासक भारतीय नाम, उपाधियाँ और धार्मिक परंपराएँ अपनाते गए। वासुदेव जैसे नाम इसके उदाहरण हैं। इस समाज में भारतीयों के साथ-साथ मध्य एशियाई, ईरानी और यूनानी सांस्कृतिक तत्त्वों से प्रभावित समुदाय भी रहते थे। साम्राज्य गंगा, सिंधु और आक्सस की घाटियों तक फैला था, इसलिए अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के लोग एक ही राजनीतिक ढाँचे में रहते थे। भारत, मध्य एशिया, चीन और रोमन साम्राज्य को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों के कारण विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का आवागमन बढ़ा, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्कों में वृद्धि हुई।

इस मिले-जुले स्वरूप की झलक सिक्कों और अभिलेखों में भी मिलती है। कुषाण सिक्कों पर यूनानी और खरोष्ठी लिपियों में लेख तथा यूनानी, ईरानी और भारतीय देवताओं की आकृतियाँ अंकित मिलती हैं, और अभिलेखों में प्राकृत भाषा का प्रयोग दिखता है।

कुषाण शासक स्वयं मध्य एशियाई मूल के थे, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में लंबे समय तक शासन करने के कारण उन्होंने स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को अपनाया। विम कैडफिसेस के सिक्कों पर शिव, नंदी और त्रिशूल की आकृतियाँ तथा ‘महेश्वर’ उपाधि मिलती है। कनिष्क बौद्ध धर्म का संरक्षक था, और वासुदेव का नाम तथा उसके सिक्कों पर शिव-नंदी की आकृतियाँ भारतीय धार्मिक परंपरा में उसके रम जाने का संकेत देती हैं। यह प्रक्रिया भारतीय समाज में विदेशी समूहों के सांस्कृतिक आत्मसातीकरण का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

इस काल में वर्ण व्यवस्था अस्तित्व में थी, लेकिन विदेशी समुदायों के भारतीय समाज में प्रवेश से सामाजिक संरचना में नए तत्त्व जुड़े। बाद के धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में शक, यवन और अन्य विदेशी समूहों को विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में रखने के प्रयास दिखाई देते हैं। यह इस बात का संकेत है कि विदेशी समूहों को भारतीय सामाजिक ढाँचे में स्थान देने की समस्या उस समय के समाज के सामने थी। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि कुषाण काल में भारतीय समाज की संरचना अधिक बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक हो गई थी।

कुषाण काल में समाज में व्यापारियों, श्रेष्ठियों, शिल्पकारों और विभिन्न पेशेवर समूहों की आर्थिक तथा सामाजिक भूमिका बढ़ी। इसका एक प्रमुख कारण रेशम-मार्ग का दूरवर्ती व्यापार था, जिससे रेशम, मसालों और रत्नों के बदले रोमन स्वर्ण भारत में आता था। श्रेणियाँ आर्थिक गतिविधियों के संगठन का महत्त्वपूर्ण माध्यम थीं और नगरों के प्रशासन में भी श्रेणी तथा निगम जैसी संस्थाएँ सक्रिय भूमिका निभाती थीं। व्यापारी और शिल्पकार बौद्ध संस्थाओं, स्तूपों और विहारों को दान देते थे, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ बौद्ध धर्म के प्रसार को भी बल मिला। मथुरा और अन्य स्थानों के अभिलेखों में सेठों, सार्थवाहों, स्वर्णकारों, गंधिकों और लोहारों द्वारा बौद्ध, जैन और अन्य संस्थाओं को दिए गए दान का उल्लेख मिलता है। दानदाताओं में अनेक स्त्रियाँ और भिक्षुणियाँ भी थीं, जो धार्मिक जीवन में महिलाओं की सक्रिय भूमिका को दिखाता है।

इस काल में नगरीकरण बढ़ा और तक्षशिला, पुरुषपुर, मथुरा, कौशांबी तथा वाराणसी जैसे नगर समृद्ध हुए, जिससे नगरीय समाज की सक्रियता का पता चलता है। मथुरा कुषाण साम्राज्य का प्रमुख केंद्र और मथुरा-कला-शैली का केंद्र था, तक्षशिला के उत्खनन से कुषाणकालीन मुद्राएँ मिली हैं, और पुरुषपुर (पेशावर) गांधार-कला का प्रमुख केंद्र था। इन नगरों में शिल्पियों, व्यापारियों और कलाकारों की सक्रियता ने कुषाणकालीन समाज को अधिक गतिशील बनाया।

मध्य एशियाई प्रभाव से पहनावे में भी परिवर्तन आया। कुषाण शासकों की मूर्तियों में लंबा कोट, पतलून, जूते और टोपी दिखाई देती है, जो इस क्षेत्र में सिले हुए वस्त्रों के प्रचलन का संकेत है। मथुरा से प्राप्त कनिष्क की मूर्ति में उसे इसी सैनिक वेशभूषा में दिखाया गया है।

कुषाण कालीन धर्म

कुषाण काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक धार्मिक बहुलता और सहिष्णुता थी। कुषाण शासकों ने किसी एक धर्म को साम्राज्य की एकमात्र धार्मिक पहचान बनाने के बजाय विभिन्न धार्मिक परंपराओं को संरक्षण दिया। कुषाण सिक्कों पर बुद्ध, शिव, स्कंद-कुमार, माओ, मिहिर, नाना और अन्य ईरानी अथवा मध्य एशियाई देवताओं के चित्र मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कुषाण शासक विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति उदार थे।

बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण मिला और उसकी महायान शाखा का तेज़ी से विकास हुआ। कनिष्क को बौद्ध धर्म, विशेषकर महायान परंपरा, के प्रमुख संरक्षकों में माना जाता है। उसके शासनकाल में गांधार, कश्मीर और मध्य एशिया में बौद्ध धर्म के प्रसार को विशेष गति मिली। कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर बौद्ध गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बनी। चीनी और बौद्ध परंपराओं में कनिष्क द्वारा विशाल स्तूप और विहार बनवाने का उल्लेख मिलता है। गांधार के बौद्ध मठों और कश्मीर के विहारों में विद्वानों ने बौद्ध दर्शन का विकास किया।

कुषाण काल में ही बौद्ध धर्म सिल्क रूट के रास्ते मध्य एशिया और चीन पहुँचा। लोकक्षेम जैसे यू-ची मूल के भिक्षुओं ने दूसरी शताब्दी में चीन जाकर महायान ग्रंथों के अनुवाद किए, जिससे चीन में बौद्ध धर्म की नींव मज़बूत हुई।

परंपरा के अनुसार कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुंडलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति आयोजित हुई। इसके अध्यक्ष के रूप में वसुमित्र का नाम मिलता है, जबकि अश्वघोष को भी इससे संबंधित परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। इस संगीति का संबंध विशेष रूप से सर्वास्तिवाद परंपरा से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर बौद्ध दार्शनिक साहित्य और व्याख्यात्मक ग्रंथों के संकलन तथा संपादन की परंपरा विकसित हुई। चतुर्थ बौद्ध संगीति और उसके विवरण के संबंध में विभिन्न बौद्ध परंपराओं में मतभेद हैं।

कुषाण युग में महायान बौद्ध धर्म के विकास को महत्वपूर्ण गति मिली। महायान ने बोधिसत्त्व आदर्श पर विशेष बल दिया और बुद्ध को केवल ऐतिहासिक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि अधिक दिव्य और आध्यात्मिक स्वरूप में प्रस्तुत किया। इसी वातावरण में बुद्ध की मानवीय प्रतिमाओं के निर्माण को व्यापक प्रोत्साहन मिला। इसी काल में बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मूर्तियों का निर्माण व्यापक रूप से शुरू हुआ। मथुरा और गांधार, दोनों केंद्रों में बुद्ध की मानव रूप में मूर्तियाँ बनीं, जबकि इससे पहले उन्हें प्रतीकों (जैसे पदचिह्न, स्तूप और बोधिवृक्ष) द्वारा दर्शाया जाता था। गांधार और मथुरा कला में बुद्ध की मूर्तियों का विकास इसी व्यापक धार्मिक परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। फिर भी महायान इसी काल में अचानक पैदा नहीं हुआ, न ही इसी समय बौद्ध धर्म केवल दो भागों में विभाजित हो गया। महायान का विकास एक क्रमिक और बहुस्तरीय प्रक्रिया थी।

बौद्ध धर्म के साथ-साथ शैव धर्म को भी व्यापक समर्थन मिला। विम कैडफिसेस और वासुदेव के सिक्कों पर शिव और नंदी की आकृतियाँ इसकी पुष्टि करती हैं। वैष्णव और भागवत परंपराएँ भी उत्तर भारत में लोकप्रिय रहीं। मथुरा में जैन धर्म का बड़ा केंद्र था। कंकाली टीले से जैन स्तूप, आयागपट और तीर्थंकरों की कुषाणकालीन प्रतिमाएँ मिली हैं, जिन पर तिथियाँ अंकित हैं। ईरानी परंपरा के देवता, जैसे अग्नि, मिहिर और नाना, तथा यूनानी देवता भी कुषाण सिक्कों पर दिखाई देते हैं। बैक्ट्रिया के सुरख कोतल में अग्नि-पूजा से जुड़े मंदिर के अवशेष मिलते हैं। इस प्रकार इस साम्राज्य में अनेक धर्म शांतिपूर्वक एक साथ विकसित हुए, जो भारतीय सहिष्णुता की परंपरा का उदाहरण है।

कुषाण कालीन कला और स्थापत्य

कुषाण काल भारतीय कला के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस काल में गांधार और मथुरा कला का अभूतपूर्व विकास हुआ। दोनों शैलियों ने बुद्ध तथा बौद्ध विषयों के साथ-साथ अन्य धार्मिक परंपराओं को भी कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की।

गांधार कला का केंद्र तक्षशिला, पुरुषपुर और अफ़ग़ानिस्तान का बड़ा भाग था। इसका विकास वर्तमान पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के कुछ क्षेत्रों में हुआ। इस शैली पर यूनानी-रोमन, ईरानी तथा भारतीय परंपराओं का मिश्रित प्रभाव दिखाई देता है। यूनानी और रोमन प्रभाव गहरा होने के कारण इसे ‘यूनानी-बौद्ध कला’ भी कहा जाता है, परंतु इसे केवल ‘यूनानी कला’ कहना उचित नहीं है। इसकी मूर्तियाँ अधिकतर स्लेटी (धूसर) शिस्ट पत्थर और गारे (स्टको) से बनीं। बुद्ध को मानव रूप में प्रस्तुत करने में गांधार कलाकारों ने अत्यंत प्रभावशाली शैली विकसित की। इन मूर्तियों में बुद्ध की मुखाकृति यूनानी देवता अपोलो जैसी सुडौल है, बाल लहरदार या घुँघराले हैं, शारीरिक संरचना उभरी हुई और अनुपात प्राकृतिक हैं, तथा वस्त्रों की गहरी सिलवटें यथार्थवादी ढंग से उकेरी गई हैं। बुद्ध के जीवन की घटनाओं, जातक कथाओं और बोधिसत्त्वों का चित्रण इस कला की विशेषता है। इसमें कोरिन्थियन शैली के स्तंभ-शीर्ष और अन्य यूनानी अलंकरण भी दिखाई देते हैं।

कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty)
कुषाणकालीन कला

मथुरा कला का विकास उत्तर भारत के मथुरा क्षेत्र में हुआ। यह कला पूरी तरह भारतीय परंपरा में विकसित हुई, इसलिए इसमें भारतीय कलात्मक परंपराओं का प्रभाव अधिक स्पष्ट है। यहाँ प्रायः लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया। मथुरा की बुद्ध-प्रतिमाओं में प्रसन्न मुखमुद्रा, सुगठित शरीर और भारतीय सौंदर्यबोध की छाप दिखाई देती है। ये मूर्तियाँ अधिक शक्तिशाली, संतुलित और भारतीय आदर्शों के अनुरूप हैं। यहाँ बुद्ध, बोधिसत्त्व, जैन तीर्थंकर, यक्ष-यक्षिणी, नाग, शिव तथा अन्य ब्राह्मणीय देवताओं की अनेक प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में बनीं। कुषाण शासकों की प्रतिमाएँ भी मथुरा कला की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हैं। मथुरा के कुषाण राजाओं की मूर्तियाँ, जैसे कनिष्क की सिरविहीन मूर्ति, राजकीय छवि-निर्माण की परंपरा को दर्शाती हैं। सारनाथ से मिली बोधिसत्त्व प्रतिमा, जिस पर कनिष्क के तीसरे वर्ष का अभिलेख है, मथुरा शैली का ही उदाहरण है। इस प्रकार गांधार और मथुरा, दोनों शैलियों ने बुद्ध की मानवाकार प्रतिमा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

स्थापत्य के क्षेत्र में कनिष्क द्वारा पेशावर के पास बनवाया गया स्तूप उस समय के सबसे ऊँचे बौद्ध स्मारकों में गिना जाता था। तक्षशिला के धर्मराजिका स्तूप, सिरकप नगर और अनेक विहारों के अवशेष इस काल की नगर-योजना और धार्मिक स्थापत्य का परिचय देते हैं। कपिशा से मिली हाथीदाँत की सुंदर कलाकृतियाँ भी कलात्मक विनिमय का उदाहरण हैं। कुषाण सिक्के भी कला की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं, जिन पर शासकों के प्रतिरूप और देवताओं की आकृतियाँ बारीकी से अंकित हैं।

कुषाण कालीन साहित्य और भाषा

कुषाण काल के बहुभाषी साहित्यिक वातावरण में संस्कृत को साहित्यिक अभिव्यक्ति के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में विशेष प्रतिष्ठा मिली, किंतु प्राकृत और स्थानीय भाषाओं का प्रयोग समाप्त नहीं हुआ। कनिष्क के आरंभिक सिक्कों पर यूनानी भाषा और लिपि का प्रयोग हुआ, परंतु बाद में उसने बैक्ट्रियन को राजकीय भाषा के रूप में अपनाया। इसे यूनानी लिपि में लिखा जाता था, जिसके लिए एक अतिरिक्त अक्षर जोड़ा गया। राबातक अभिलेख में कनिष्क ने स्वयं कहा है कि उसने पहले एक अभिलेख यूनानी में लिखवाया और फिर उसे ‘आर्य’ भाषा (बैक्ट्रियन) में अनूदित करवाया। भारतीय क्षेत्रों में मुख्यतः गांधारी प्राकृत का प्रयोग होता था, जिसके लिए उत्तर-पश्चिम में खरोष्ठी तथा मध्य भारत में ब्राह्मी लिपि का उपयोग किया जाता था। मथुरा और उसके आसपास के अभिलेखों में संस्कृत-मिश्रित भाषा का बढ़ता प्रयोग दिखाई देता है, जो संस्कृत के राजकीय और साहित्यिक भाषा बनने की प्रक्रिया का संकेत है। खोतान क्षेत्र से खरोष्ठी लिपि और प्राकृत भाषा में लिखे अनेक दस्तावेज़ लकड़ी की तख्तियों पर मिले हैं। बौद्ध विद्वानों ने भी संस्कृत का प्रयोग किया, जिससे आगे चलकर संस्कृत बौद्ध साहित्य के विकास को सुदृढ़ आधार मिला।

साहित्य के क्षेत्र में अश्वघोष कुषाण युग के महान बौद्ध साहित्यकार थे। उन्होंने ‘बुद्धचरित’ और ‘सौंदरनंद’ जैसे महाकाव्य तथा ‘शारिपुत्रप्रकरण’ नामक नाटक की रचना की। उनकी गणना संस्कृत के प्रारंभिक कवियों और नाटककारों में की जाती है। ‘बुद्धचरित’ संस्कृत का एक महत्वपूर्ण महाकाव्य है, जिसमें गौतम बुद्ध के जीवन का वर्णन मिलता है। परंपरा के अनुसार वसुमित्र, पार्श्व और संघरक्षक भी कनिष्क के काल से संबंधित थे। वसुमित्र का संबंध कश्मीर में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की परंपरा से जोड़ा जाता है, और सर्वास्तिवाद परंपरा के दार्शनिक साहित्य के विकास में उनका महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।

नागार्जुन भारतीय बौद्ध दर्शन के प्रभावशाली दार्शनिक थे। उन्हें माध्यमिक दर्शन और शून्यवाद का प्रवर्तक माना जाता है, और संभवतः वे कुषाण काल से संबंधित थे। उनका माध्यमिक दर्शन और शून्यता की अवधारणा भारतीय दर्शन में अत्यंत प्रभावशाली रही है। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘मूलमध्यमककारिका’ है। उनके दर्शन का केंद्रीय विचार यह है कि वस्तुओं का कोई स्वतंत्र और स्थायी स्वभाव नहीं होता। लोकप्रिय लेखन में उन्हें कभी-कभी ‘भारत का आइंस्टीन’ कहा जाता है, किंतु यह अकादमिक दृष्टि से उपयुक्त कथन नहीं है।

आयुर्वेदाचार्य चरक को भी परंपरा कनिष्क के दरबार से जोड़ती है। उनकी रचना ‘चरक संहिता’ आयुर्वेद के प्राचीनतम ग्रंथों में गिनी जाती है और आयुर्वेदिक चिकित्सा परंपरा के विकास में उसका विशेष महत्व है। यद्यपि चरक संहिता स्वयं भी दीर्घकालीन संकलन और संपादन की परंपरा का परिणाम मानी जाती है। इस काल में गांधारी प्राकृत में भोजपत्र पर लिखी बौद्ध पांडुलिपियाँ भी मिली हैं, जो उस समय के बौद्ध साहित्य का मूल्यवान स्रोत हैं।

कुषाण युग में विभिन्न ज्ञान-परंपराओं के बीच संपर्क बढ़ा। व्यापारिक मार्गों के माध्यम से मध्य एशिया, भारत और पश्चिमी क्षेत्रों के बीच केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि विचारों, तकनीकों और धार्मिक अवधारणाओं का भी आदान-प्रदान हुआ। कुषाण साम्राज्य की भौगोलिक स्थिति ने भारत को मध्य एशिया और चीन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध भिक्षु और व्यापारी इन मार्गों से यात्रा करते थे, और इसी प्रक्रिया के कारण बौद्ध धर्म मध्य एशिया से होते हुए चीन तक पहुँचा।

बौद्ध मठ केवल धार्मिक संस्थाएँ नहीं थे, बल्कि शिक्षा और बौद्धिक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र थे। वहाँ पांडुलिपि-निर्माण, दर्शन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता था तथा दर्शन, धर्म और तर्क संबंधी विमर्श को प्रोत्साहन मिलता था। इस प्रकार कुषाण काल ने भारत और एशिया के अन्य भागों के बीच सांस्कृतिक संपर्कों को सुदृढ़ किया।

कुषाण काल का मूल्यांकन और महत्त्व

कुषाण राजवंश ने भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला। इसकी कहानी एक खानाबदोश जनजाति के संगठित साम्राज्य में बदलने की कहानी है। यू-ची कबीलों से निकला यह वंश कुजुल कैडफिसेस और विम कैडफिसेस के नेतृत्व में स्थापित हुआ और कनिष्क के काल में अपने चरम पर पहुँचा। बाद के शासकों के समय यह धीरे-धीरे भारतीय परंपरा में घुल-मिल गया और अंततः ससानी, नाग, यौधेय और हूण शक्तियों के दबाव में बिखर गया।

राजनीतिक दृष्टि से कुषाणों ने मौर्यों के बाद पहली बार उत्तर भारत और मध्य एशिया को एक सूत्र में बाँधा। इससे दोनों क्षेत्रों के बीच राजनीतिक संपर्क मज़बूत हुआ और आदान-प्रदान के नए रास्ते खुले। उन्होंने राजत्व के दैवी स्वरूप और सामंती ढाँचे की ऐसी परंपरा भी स्थापित की, जिसे आगे गुप्तों ने अपनाया।

आर्थिक रूप से यह काल बहुत गतिशील रहा। स्वर्ण मुद्राओं के व्यापक प्रचलन, श्रेणियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने भारत को मध्य एशिया, चीन और रोमन संसार से जोड़ा, जिससे उपमहाद्वीप वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गया। मथुरा, गांधार, तक्षशिला और पुरुषपुर जैसे नगर व्यापार और संस्कृति के प्रमुख केंद्र बने, जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों के लोग, वस्तुएँ और विचार आपस में मिलते थे।

धर्म और साहित्य के क्षेत्र में कुषाण संरक्षण में बौद्ध धर्म, विशेषकर महायान परंपरा, का विकास हुआ और उसका प्रसार मध्य एशिया तथा चीन तक पहुँचा। संस्कृत बौद्ध साहित्य को प्रोत्साहन मिला और अश्वघोष जैसे विद्वानों ने इस परंपरा को समृद्ध किया।

कला के क्षेत्र में गांधार और मथुरा शैलियों का उत्कर्ष इस काल की सबसे स्थायी देन है। बुद्ध की मानवाकार प्रतिमा के विकास से भारतीय कला में नया अध्याय शुरू हुआ। इन शैलियों में भारतीय, ईरानी, मध्य एशियाई और यूनानी परंपराओं का जो मेल दिखता है, वह इस युग की सांस्कृतिक उदारता और खुलेपन का प्रतीक है। यह प्रभाव भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एशिया के बड़े भाग तक पहुँचा।

इस प्रकार कुषाण काल को केवल एक साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी जगत के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक सेतु था। प्रशासन, मुद्रा-व्यवस्था, व्यापार, धर्म, कला और भाषा के क्षेत्र में इसकी विरासत लंबे समय तक जीवित रही और आगे विकसित हुई अनेक कलात्मक, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की नींव बनी। इसी कारण प्राचीन भारतीय इतिहास में इस काल का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कुषाण राजवंश से संबंधित 6 महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1. कुषाण कौन थे और उनका मूल कहाँ से था?

कुषाण मध्य एशिया की यूची (यू-ची) जनजातियों की एक शाखा थे। चीनी स्रोतों के अनुसार यूची पहले चीन की उत्तर-पश्चिमी सीमा (गांसू क्षेत्र) में रहते थे। ज़ियोंगनू के दबाव में वे पश्चिम की ओर बढ़े और बैक्ट्रिया पर अधिकार कर लिया। वहाँ कुषाण शाखा सबसे शक्तिशाली बनी और आगे चलकर उसने भारत के उत्तर-पश्चिम तथा उत्तरी भागों में विशाल साम्राज्य स्थापित किया।

प्रश्न 2. कुषाण वंश का संस्थापक कौन था?

कुजुल कैडफिसेस (कडफिसेस प्रथम) को कुषाण वंश का संस्थापक माना जाता है। उसने यूची समूहों को संगठित करके बैक्ट्रिया और काबुल-गांधार क्षेत्र में कुषाण शक्ति की नींव रखी। उसके उत्तराधिकारी विम कैडफिसेस ने साम्राज्य को भारत के भीतर तक फैलाया और स्वर्ण-मुद्राओं का प्रचलन आरंभ किया।

प्रश्न 3. कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था और उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थीं?

कनिष्क प्रथम कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसके समय साम्राज्य मध्य एशिया से गंगा घाटी तक फैला। उसने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति करवाई, जिससे महायान शाखा को बल मिला, और अश्वघोष, वसुमित्र तथा चरक जैसे विद्वानों को संरक्षण दिया। उसके राज्यारोहण की तिथि पर मतभेद है। परंपरागत रूप से कनिष्क-संवत् को 78 ई. से जोड़ा जाता है, जबकि कुछ आधुनिक विद्वान इसे लगभग 127 ई. मानते हैं।

प्रश्न 4. कुषाण साम्राज्य की राजधानी कहाँ थी और उसकी आर्थिक समृद्धि का आधार क्या था?

कुषाण साम्राज्य की प्रमुख राजधानियाँ पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) और मथुरा थीं। साम्राज्य की समृद्धि का मुख्य आधार रेशम-मार्ग से होने वाला लंबी दूरी का व्यापार था, जो भारत, चीन, मध्य एशिया और रोमन साम्राज्य को जोड़ता था। इसी से प्राप्त राजस्व के बल पर कुषाणों ने बड़ी मात्रा में स्वर्ण (दीनार) और ताँबे के सिक्के जारी किए।

प्रश्न 5. कुषाण काल में धर्म, कला और संस्कृति का क्या योगदान रहा?

इस काल में बौद्ध धर्म का विशेष विकास हुआ और वह मध्य एशिया तथा चीन तक फैला, फिर भी कुषाणों की धार्मिक नीति व्यापक थी। उनके सिक्कों पर यूनानी, ईरानी, बौद्ध और ब्राह्मण परंपराओं के देवताओं की आकृतियाँ मिलती हैं। कला में गांधार शैली (यूनानी-रोमन प्रभाव) और मथुरा शैली (स्थानीय भारतीय परंपरा) का विकास हुआ। इन दोनों शैलियों में बुद्ध की मूर्तियाँ बनीं।

प्रश्न 6. कुषाण साम्राज्य का पतन कैसे हुआ और उसके बाद कौन-सी शक्तियों का उदय हुआ?

कुषाण साम्राज्य का पतन लगभग डेढ़ सौ वर्षों में क्रमिक रूप से हुआ। तृतीय शताब्दी में ससानी विस्तार से बैक्ट्रिया और पश्चिमी क्षेत्र निकल गए। भारत में नाग, यौधेय, मालव, कुणिंद और शक क्षत्रपों के उदय से मथुरा तथा गंगा-यमुना क्षेत्र हाथ से चला गया। अंत में चौथी-पाँचवीं शताब्दी में किदारी और श्वेत हूणों ने उत्तर-पश्चिम के अवशेष मिटा दिए। इसके बाद भारत में नाग और अन्य स्थानीय शक्तियाँ, उत्तर-पश्चिम में कुषाणशाह और किदारी तथा चौथी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks