बंगाल के पाल (Palas of Bengal, 800-1200 AD)

बंगाल का सेन वंश

आठवीं शती के मध्य में भारत के पूर्वी भाग में जिस शक्तिशाली और महत्वपूर्ण साम्राज्य की स्थापना हुई, उसे भारत के इतिहास में पाल साम्राज्य के नाम से जाना जाता है। पाल राजवंश के शासकों ने 750 ई. से लेकर 1174 ई. तक बंगाल तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया। यद्यपि पाल वंश का संस्थापक गोपाल (750-770 ई.) था, किंतु गोपाल के उत्तराधिकारियों ने पाल वंश की प्रतिष्ठा को चरम पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विशाल साम्राज्य का विस्तार समस्त बंगाल, बिहार से लेकर कन्नौज तक था। पालवंशीय शासकों ने अपनी राजनीतिक एवं सैनिक उपलब्धियों के साथ-साथ बंगाल को सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त बनाने का हरसंभव प्रयास किया।

दरअसल, पाल वंश के अधिकांश शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, जिन्होंने बौद्ध धर्म के उत्थान के लिए अनेक सराहनीय कार्य किये। पाल शासकों के सफल संरक्षण में बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक मठों, चैत्यों, विहारों का निर्माण हुआ, जिससे वास्तुकला की उन्नति हुई। यही नहीं, पाल राजाओं ने अनेक शिव मंदिरों का भी निर्माण करवाया और शिक्षा के विकास के लिए विश्वविद्यालयों की स्थापना की। सुलेमान ने पाल साम्राज्य को ‘रूहमा’ या ‘धर्मा’ कहा।

बंगाल के पाल (Palas of Bengal, 800-1200 AD)
पाल साम्राज्य

ऐतिहासिक स्रोत

पाल वंश के इतिहास की जानकारी समकालीन साहित्य एवं अभिलेखों से होती है। पालकालीन अभिलेखों में धर्मपाल का खालिमपुर अभिलेख, देवपाल का मुंगेर अभिलेख, नारायणपाल का बादल स्तंभलेख, महीपाल प्रथम के बानगढ़ तथा मुजफ्फरपुर से प्राप्त अभिलेख उपयोगी हैं। साथ ही समकालीन गुर्जर प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट अभिलेखों से भी पाल वंश का इन राजवंशों के साथ संबंधों की जानकारी मिलती है। लेखों के अलावा, संध्याकरनंदी के ‘रामपालचरित’ से भी पाल वंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।

पालों की उत्पत्ति

पाल वंश की उत्पत्ति तथा उनके वंशजों के विषय में कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। खालिमपुर अभिलेख में गोपाल के पिता का नाम वप्यट और पितामह का नाम दायितविष्णु वर्णित है, किंतु अन्य किसी अभिलेख में इनकी चर्चा नहीं मिलती है।

कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि पाल राजाओं को पूर्वी बंगाल के बौद्ध राजा राजाभट्ट से जोड़ा जा सकता है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि पाल शासक मूल रूप से भद्र वंश के वंशज थे।

आरंभ में पालों की उत्त्पति के संबंध में धारणा थी कि पाल किसी हीन कुल अथवा अप्रशस्त विवाह संबंध से उत्पन्न हुए थे। ‘व्यासचरित’ में उन्हें ‘हीन क्षत्रिय’ और ‘आर्यमंजुश्रीमूलकल्प’ में ‘दासकुल’ का कहा गया है। धीरे-धीरे जब पाल शासक एक प्रमुख राजनीतिक सत्ता के रूप में अस्तित्व में आये, तो उन्हें क्षत्रिय स्वीकार कर लिया गया। किंतु वास्तव में पाल राजवंश की पहचान सौर वंशज या ‘सूर्यकुल’ के रूप में भी की जाती है।

पृष्ठभूमि

पूर्वी भारत में स्थित बंगाल को सशक्त एवं सुदृढ़ बनाने में पाल शासकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल छठीं शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्द्ध में मगध राज्य में ही सम्मिलित था। नंदों के समय में भी बंगाल मगध साम्राज्य के अंतर्गत था। मगध के राजसिंहासन पर बैठनेवाला सम्राट बंगाल का भी स्वामी होता था।

छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गौड़ अथवा बंगाल स्वतंत्र हो गया और गुप्त-साम्राज्य से पृथक् हो गया। गुप्तों की सत्ता समाप्त होने के पश्चात् उत्तर भारत में हर्षवर्द्धन का वर्चस्व स्थापित हुआ। हर्षवर्द्धन का समकालीन बंगाल का शासक गौड़वंशीय शशांक था, जिसने बंगाल को एक सुदृढ़ राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि सम्राट् हर्ष और आसाम के भास्करवर्मन ने गौड़ाधिपति की शक्ति को रोकने का बहुत प्रयास किया और उसको युद्ध में पराजित करने की भी चेष्टा की, फिर भी, उसके जीवनकाल में न तो वे उसकी शक्ति कम कर सके और न ही उसको कुछ क्षति ही पहुँचा सके।

गौड़ नरेश शशांक की मृत्यु के पश्चात् बंगाल की राजनीतिक एकता और सार्वभौमिकता विनष्ट हो गई, जिससे पूरा बंगाल अराजकता एवं अशांति की चपेट में आ गया। हर्षवर्द्धन ने बंगाल पर आक्रमण कर बंगाल को अपने अधिकार में ले लिया।

तत्पश्चात् आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में शैल वंश के एक राजा ने पांडु या उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया। कश्मीर के नरेश ललितादित्य मुक्तापीड और कन्नौज नरेश यशोवर्मन समय-समय पर बंगाल पर आक्रमण करते रहे। मगध के परवर्ती गुप्त नरेशों का भी बंगाल पर अधिकार था, किंतु यह अधिकार नाममात्र का ही था। कामरूप नरेश हर्षदेव ने भी बंगाल को जीत कर कुछ दिनों तक बंगाल पर शासन किया। राजनीतिक एकता एवं केंद्रीय शक्ति के अभाव में बंगाल अराजकता एवं अव्यवस्था का केंद्र बन गया, जिससे पूरे उत्तर भारत में मत्स्य-न्याय की स्थिति उत्पन्न हुई। अराजकता और मत्स्य-न्याय से त्रस्त बंगाल की जनता ने 750 ई. में गोपाल नामक व्यक्ति को अपना राजा चुना, जिससे बंगाल में पाल वंश की स्थापना हुई।

गोपाल (750-770 ई.)

आठवीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में गोपाल ने बंगाल का शासन सँभाला और विगत डेढ़ शताब्दियों की अराजकता और अव्यवस्था का अंत कर समस्त बंगाल में शांति स्थापित की। बौद्ध इतिहासकार तारानाथ और धर्मपाल के खालिमपुर के ताम्रलेख में वर्णित है कि जनता ने मत्स्य न्याय (बड़ों द्वारा छोटों का शोषण) से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों (सामान्य जनता) ने गोपाल को लक्ष्मी की बाँह ग्रहण करवाई थी।

यद्यपि राजा के पद पर गोपाल का कोई लोकतांत्रिक चुनाव नहीं हुआ था, लेकिन इतना निश्चित है कि उसने अपने सत्कार्यों से जनमानस में अपने लिए उच्च स्थान बना लिया था। संभवतः उसका किसी राजवंश से कोई संबंध नहीं था और वह साधारण परिवार से संबंधित था।

पाल वंश के ताम्रफलकाभिलेखों में यह वर्णित है कि गोपाल ने समुद्रपर्यंत पृथ्वी जीती। किंतु गोपाल के संबंध में यह कथन सत्य नहीं प्रतीत होता। वास्तव में गोपाल की राजनीतिक और सैनिक उपलब्धियों के विषय में कोई भी प्रमाणित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है और संध्याकारनंदीकृत ‘रामपालचरित’ में गोपाल को मूलतः वारेंद्र अर्थात् उत्तरी बंगाल का शासक बताया गया है। इससे लगता है कि गोपाल ने धीरे-धीरे पूरे बंग (दक्षिण पूर्वी बंगाल) पर अधिकार कर लिया था और वह गौड़ाधिपति कहलाने लगा था।

गोपाल की राजनीतिक विजयों और सुशासन का लाभ उसके उसके उत्तराधिकारियों ने उठाया और वे गौड़ राज्य को तत्कालीन भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनाने में सफल रहे। गोपाल के सुशासन की तुलना पृथु और सगर के सुशासनों से की गई है।

गोपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। तारानाथ के अनुसार उसने औदंतपुरी (बिहार शरीफ) में नलेंद्र (नालंदा) विहार की स्थापना की। तिब्बती परंपराओं के अनुसार यह विहार चमत्कारिक झील के ऊपर निर्मित था। ‘आर्यमंजुश्रीमूलकल्प’ में गोपाल को अनेक विहारों, चैत्यों, उद्यानों एवं जलाशयों को बनवाने का श्रेय दिया गया है। गोपाल की मृत्यु 770 ई. के आसपास हुई थी।

धर्मपाल (770-810 ई.)

गोपाल के बाद उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र धर्मपाल 770 ई. में पाल वंश की गद्दी पर बैठा, जिसने बंगाल को एक सुव्यवस्थित राज्य के रूप में संगठित किया। सच तो यह है कि पाल वंश की वास्तविक महत्ता का संस्थापक धर्मपाल को ही माना जाता है। उसका विवाह राष्ट्रकूट राजकुमारी रन्नादेवी से हुआ था। धर्मपाल के राज्यारोहण की तिथि का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। धर्मपाल के समकालीन गुर्जर प्रतिहार शासकों- वत्सराज और नागभट्ट तथा राष्ट्रकूट शासकों– ध्रुव और गोविंद के आधार पर धर्मपाल की शासनावधि जानी जा सकती है। इस प्रकार धर्मपाल के राज्यारोहण की तिथि लगभग 8वीं शती के अंतिम चतुर्थांश और नवीं के प्रथम चतुर्थांश के मध्य रही होगा।

यद्यपि धर्मपाल धार्मिक मनोवृत्ति का था और अपने पिता की भाँति बौद्ध था, फिर भी राजनैतिक दृष्टि से वह भी महत्वाकांक्षी था और बंगाल को उत्तरी भारत के प्रमुख राज्यों की श्रेणी में स्थापित करने का श्रेय धर्मपाल को ही है।

धर्मपाल के समय उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति काफी जटिल हो चुकी थी। तत्कालीन उत्तर भारत में कन्नौज राजनीतिक दृष्टि से सर्वप्रमुख नगर था अर्थात् उत्तर भारत का राजनीतिक केंद्र कन्नौज ही था। कन्नौज गंगा के व्यापारिक मार्ग पर स्थित था, जिससे कन्नौज राजनीतिक एवं व्यवसायिक रूप से महत्वपूर्ण था। दक्षिण और उत्तर भारत की सभी शक्तियाँ कन्नौज पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहती थी।

कन्नौज के लिए संघर्ष धर्मपाल के ही समय प्रारंभ हुआ। धर्मपाल का समकालीन कन्नौज का शासक इंद्रायुध था। धर्मपाल के प्रतिद्वंदी के रूप में राजपूताना और मालवा के क्षेत्र में गुर्जर प्रतिहारों का उदय हो चुका था और दक्षिण भारत के दक्कन क्षेत्र पर राष्ट्रकूट अपने विस्तारवादी महत्वाकांक्षा का झंडा उठाये हुए थे। इन प्रतिद्वंद्वियों का उत्तर भारत पर वर्चस्व के लिए धर्मपाल से संघर्ष होना स्वाभाविक था।

गुर्जर प्रतिहार वंश

त्रिकोणात्मक संघर्ष : पालवंशीय धर्मपाल के प्रतिहार प्रतिद्वंदी वत्सराज ने धर्मपाल पर आक्रमण कर गंगा के दोआब में किसी स्थान पर उसे पराजित किया। राधनपुर लेख से पता चलता है कि वत्सराज ने गौड़ (बंगाल) राजा का राजकीर्य ऐश्वर्य सुगमतापूर्वक हस्तगत कर लिया, वह गौड़ राजा के दो श्वेत राजछत्रों को उठाकर ले गया। परंतु वत्सराज को राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित होना पड़ा और राजपूताना के रेगिस्तान की ओर भागना पड़ा। इसके बाद ध्रुव ने पाल नरेश धर्मपाल को भी पराजित किया और दक्षिण की ओर वापस लौट गया।

राष्ट्रकूट ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय का धर्मपाल को भरपूर लाभ उठाया और कन्नौज पर आक्रमण कर वहाँ के शासक इंद्रायुध को हटा कर चक्रायुध को अपने अधीन शासक के रूप में स्थापित किया। पाल वंश के अभिलेख में वर्णित है कि धर्मपाल ने कन्नौज में एक भव्य दरबार का आयोजन किया था, जिसमें भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु, यदु, यवन, अवंति, गंधार और कीर के शासक सम्मिलित हुए थे। खालिमपुर तथा भागलपुर के लेखों से पता चलता है कि इन शासकों ने धर्मपाल के दरबार में काँपते हुए मुकुट से सम्मानपूर्वक सिर झुकाया और उसकी अधिसत्ता स्वीकार की। इस प्रकार धर्मपाल समस्त उत्तरापथ का स्वामी बन बैठा। 11वीं सदी के गुजरात के कवि सोड्ढल ने धर्मपाल को ‘उत्तरापथस्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया है।

किंतु धर्मपाल उत्तर भारत के नवस्थापित साम्राज्य को अक्षुण्ण नहीं रख सका। शीघ्र ही धर्मपाल को एक और चुनौती का सामना करना पड़ा। वत्सराज के उत्तराधिकारी प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को विजित कर चक्रायुध को वहाँ से खदेड़ दिया। चक्रायुध की सहायता के लिए आये धर्मपाल को नागभट द्वितीय ने संभवतः मुंगेर के निकट एक घमासान युद्ध में पराजित कर दिया।

किंतु एक बार फिर राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय ने नागभट्ट द्वितीय को पराजित कर दिया। इसके बाद धर्मपाल और चक्रायुध ने भयभीत होकर गोविंद तृतीय की अधीनता स्वीकार ली। किंतु गोविंद तृतीय के पुनः दक्षिण लौटने के बाद धर्मपाल ने पुनः कन्नौज पर अधिकार कर लिया और अपने अंत तक बना रहा।

वास्तव में धर्मपाल एक सुयोग्य और कर्मनिष्ठ शासक था। उसका साम्राज्य तीन भागों में बँटा हुआ था। बंगाल और बिहार उसके प्रत्यक्ष अधिकार में थे। कन्नौज का राज्य उसके अधीन था क्योंकि वहाँ उसने शासक नियुक्त किया था। पंजाब, राजपूताना, मालवा और बरार के शासक उसकी प्रभुता मानते थे। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार धर्मपाल का साम्राज्य पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर दिल्ली तक तथा पश्चिम में जालंधर तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक विस्तृत था। संभव है कि तारानाथ का यह कथन अत्युक्तिपूर्ण हो, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्मपाल लगभग संपूर्ण उत्तरी भारत का स्वामी था। अपनी महानता के अनुरूप उसने ‘महाराजाधिराज’, ‘परमेश्वर’ और ‘परमभट्टारक’ जैसी उपाधियाँ धारण की थी।

धर्मपाल बौद्ध धर्म का एक उत्साही धर्मानुयायी था। उसके लेखों में उसे ‘परमसौगत’ कहा गया है। उसने अपने राज्य में, विशेषकर विक्रमशिला (भागलपुर, बिहार) में विश्वविद्यालय तथा सोमपुर (वर्तमान बांग्लादेश में) में महाविहार का निर्माण करवाया और नालंदा का पुनरुद्धार किया। उसके समय में विक्रमशिला नालंदा की भाँति शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बन गया। उसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की देखभाल के लिए सौ गाँव दान में दिये थे। उसने अपने दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र को संरक्षण प्रदान किया। उसके समय में धीमन और वितपाल ने एक नये कला संप्रदाय का प्रवर्त्तन किया। धर्मपाल के समय प्रसिद्ध यात्री सुलेमान आया था। धर्मपाल की मृत्यु 810 ई. के आसपास हुई थी।

देवपाल (810-850 ई.)

धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल पाल वंश की गद्दी पर बैठा, जो संभवतः पाल वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। गद्दी पर बैठने के बाद उसने अपने पिता की तरह विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया और मुद्गगिरि (मुंगेर) को अपनी राजधानी बनाया।

देवपाल के अभिलेखों में उसे एक साम्राज्यवादी शासक के रूप में चित्रित किया गया है। संभवतः गोविंद तृतीय की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूट राज्य में उत्पन्न अराजकता के कारण देवपाल को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया। उसके मुंगेर से प्राप्त ताम्रफलकाभिलेख में दावा किया गया है कि उसकी विजयिनी सेनाओं ने विंध्यगिरि और कंबोज तक अभियान किया। यही नहीं, लेख के अनुसार देवपाल का शासन रामचंद्र द्वारा बनाये गये सेतु (रामेश्वरम् के पास) तक था। किंतु अभिलेख का यह दावा केवल प्रशस्तिमात्र प्रतीत होता है।

देवपाल के एक अन्य स्तंभलेख में दावा किया गया है कि उसने अपने मंत्रियों दर्भपाणि तथा केदारमिश्र की नीतियुक्त मंत्रणा से प्रेरित होकर उत्कल जाति को मिटा दिया, हूणों का दर्प चूर कर दिया और द्रविड़ तथा गुर्जर राजाओं का गर्व धूल-धूसरित कर दिया। देवपाल के समय में भी कन्नौज के लिए पालों का संघर्ष गुर्जर प्रतिहारों एवं राष्ट्रकूटों से होता रहा। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि बादल स्तंभ-लेख में जिस गुर्जर के राजा के गर्व को चूर्ण करने का उल्लेख मिलता है, वह संभवतः गुर्जर नरेश मिहिरभोज रहा होगा। देवपाल की सेनाएं दक्षिण में द्रविड़ प्रदेश और उत्तर में तिब्बत तक कूच की। उन्होंने राष्ट्रकूटों और गुर्जर प्रतिहारों को अपने क्षेत्रों से आगे नहीं बढ़ने दिया।

भागलपुर अभिलेख में वर्णित है कि देवपाल के भाई एवं सेनापति जयपाल के सामने उत्कल का राजा अपनी राजधानी छोड़कर भाग गया। प्राग्ज्योतिषपुर के राजा ने देवपाल की अधीनता स्वीकार ली और उसकी आज्ञाओं को सर्वोपरि मानते हुए अपने राज्य पर शासन किया। इस प्रकार देवपाल ने अपनी राजनीतिक और सैनिक प्रतिष्ठा का चतुर्दिक विकास किया।

वियेना कांग्रेस

देवपाल का सुमात्रा और जावा के विदेशी शासकों के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध था। देवपाल की राजसभा में जावा के शैलेंद्रवंशीय शासक बालपुत्रदेव ने अपना एक दूत भेजा था। नालंदा ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि उसने बालपुत्रदेव के अनुरोध पर नालंदा में एक विहार की देखरेख के लिए राजगृह विषय में चार और गया विषय में एक गाँव दान दिया। उसने बलपुत्रदेव को नालंदा के समीप एक बौद्ध बिहार बनवाने की अनुमति दी और स्वयं भी इस कार्य के लिए प्रचुर धन दान किया। इस प्रकार देवपाल के समय में बंगाल निश्चय ही एक शक्तिशाली राज्य था। अरब यात्री सुलेमान ने भी देवपाल को प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट शासकों से अधिक शक्तिशाली बताया है।

देवपाल भी अपने पिता की भाँति एक उत्साही बौद्ध था और ‘परमसौगत’ की उपाधि धारण किया था। उसने नालंदा एवं विक्रमशिला के विहारों की मरम्मत करवाई और अनेकों बौद्ध मंदिरों एवं विहारों को दान दिया। बोधिगया अथवा महाबोधि के मंदिर के निर्माण में भी देवपाल का योगदान था। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने देवपाल को बौद्ध धर्म की पुनरुत्थानकर्ता बताया है।

देवपाल शिक्षा एवं कला का उदार संरक्षक था। उसके समय में बंगाल में शिक्षा के साथ-साथ एक विशिष्ट संस्कृति के विकास को प्रोत्साहन मिला। उसने मगध की बौद्ध-प्रतिमाओं का पुनर्निर्माण कराया और उसके संरक्षण में वास्तु तथा अन्य कलाओं को पनपने का अवसर मिला। उसकी राजसभा में बौद्ध कवि वज्रदत्त रहता था, जिसने ‘लोकेश्वर शतक’ नामक सुप्रसिद्ध काव्य की रचना की थी। उसने नगरहार के प्रसिद्ध विद्वान् वीरदेव को सम्मान दिया और उसे नालंदा विहार का अध्यक्ष बनाया। इस प्रकार देवपाल का शासनकाल बंगाल के इतिहास का एक उत्कृष्ट अध्याय है।

देवपाल के उत्तराधिकारियों-शूरपाल प्रथम एवं विग्रहपाल प्रथम ने संभवतः 850 से 855 ईस्वी तक शासन किया। 855 ईस्वी के आसपास विग्रहपाल ने अपने पुत्र के पक्ष में राज्य का परित्याग कर संन्यास धारण कर लिया।

नारायणपाल : विग्रहपाल के बाद नारायणपाल (855-908 ई.) पाल वंश का शासक हुआ। इसने लगभग 50 वर्ष तक शासन किया। नारायणपाल शांत प्रकृति का कमजोर शासक था। संभवतः 860 ई. के आसपास उसे राष्ट्रकूटों (कृष्ण द्वितीय) से पराजित होना पड़़ा।

नारायणपाल के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में अंग तथा मगध उसके अधिकार में थे, किंतु शासन के अंतिम वर्षों में प्रतिहार शासक मिहिरभोज तथा महेंद्रपाल के आक्रमणों के परिणामस्वरूप मगध तथा दक्षिणी बिहार के साथ-साथ उत्तरी बंगाल अधिकांश क्षेत्र उसके हाथ से निकल गये। यही नहीं, उड़ीसा और असम के सामंतो ने भी विद्रोह कर न केवल अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी, बल्कि उनके शासकों ने राजसी उपाधियाँ भी धारण की। इस प्रकार नारायणपाल का राज्य बंगाल के एक भाग तक ही सीमित रह गया।

किंतु गुर्जर प्रतिहार महेंद्रपाल की मृत्यु और राष्ट्रकूटों द्वारा प्रतिहारों की पराजय के बाद नारायणपाल ने प्रतिहारों से उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बिहार के अपने खोये क्षेत्रों को पुनः अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार अपने शासनकाल के अंतिम दिनों में नारायणपाल अपने पैतृक क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने में सफल रहा।

अपने पूर्वजों के विपरीत नारायणपाल शैव धर्म का अनुयायी था। भागलपुर दानपत्र के अनुसार उसने सैकड़ों मंदिरों का निर्माण करवाया था। उसने बाहर से शैव संन्यासियों को अपने राज्य में आमंत्रित किया और मंदिरों का प्रबंध इन पाशुपत आचार्यों के सुपुर्द कर दिया। इन आचार्यों को उसने ग्रामदान भी दिये।

नारायणपाल के बाद उसका पुत्र राज्यपाल (908-948 ई.) शासनाधिकारी हुआ। राज्यपाल के समय में राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय ने पाल राज्य पर आक्रमण किया और कांबोज नामक पर्वतीय लोगों ने बंगाल के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया। राजपाल की मृत्यु 948 ईस्वी के आसपास हुई।

राज्यपाल के बाद गोपाल द्वितीय (948-960 ई.) में गद्दी पर बैठा। उसकी माता का नाम भाग्यदेवी था, जो राष्ट्रकूट राजकुमारी थी। संभवतः उसके समय में उत्तरी और पश्चिमी बंगाल पालों के हाथ से निकलकर हिमालय के उत्तरी क्षेत्रों से आनेवाली कांबोज नामक आक्रमणकारी जाति के हाथों में चला गया। लगता है कि चंदेलराज यशोवर्मा ने भी 953-54 ई. के आसपास उसके क्षेत्रों पर आक्रमण कर उसे पराजित किया था। उसके कुछ अभिलेख मिले हैं, जिनसे केवल मगध और अंग पर उसके राजनीतिक अधिकार की पुष्टि होती है। उसकी मृत्यु कब हुई, यह कहना कठिन है।

गोपाल द्वितीय के बाद विग्रहपाल द्वितीय (960-988 ई.) ने शासन किया। विग्रहपाल के समय तक पालों का बंगाल से शासन समाप्त हो गया और वे केवल बिहार में शासन करने लगे थे। पाल साम्राज्य लगभग समाप्त ही होने वाला था कि इस वंश की गद्दी पर महीपाल प्रथम जैसा एक शक्तिशाली शासक आसीन हुआ।

महीपाल प्रथम (988-1038 ई.)

महीपाल के राज्यारोहण के समय पाल साम्राज्य अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, क्योंकि गोपाल द्वितीय एवं विग्रहपाल द्वितीय की निर्बलता के कारण पाल साम्राज्य अब केवल मगध तक ही सिमट कर रह गया था। सत्ता सँभालते ही महीपाल ने पाल साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का हर संभव प्रयास किया और कुछ अंशों में अपनी विचलित कुललक्ष्मी का स्तंभन करने में सफल रहा। यही कारण है कि बंगाल के इतिहास में महीपाल प्रथम को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है।

महीपाल के अभिलेखों से पता चलता है कि शासक बनने के बाद महीपाल प्रथम ने कंबोज वंश के एक गौड़ शासक से उत्तरी बंगाल छीन लिया और कोमिल्ला तथा त्रिपुरा को अपने अधीन कर लिया। बानगढ़ लेख के अनुसार महीपाल ने अनाधिकृत व्यक्तियों को राज्य से बाहर निकाल दिया और किरातों और कंबोजों की सत्ता को नष्ट कर दिया। इस प्रकार गौड़, वारेंद्र उत्तरी राद तथा वंग-समतट जैसे सभी क्षेत्र पुनः पाल सत्ता के अधीन हो गये।

महीपाल प्रथम के राज्य काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी- चोलों का आक्रमण। 1023 ईस्वी में कांची के राजेंद्र चोल के एक सेनानायक विक्रम चोल ने उड़ीसा के मार्ग से होकर बंगाल और बिहार पर आक्रमण किया। महीपाल प्रथम ने चोल आक्रमण का सामना किया, परंतु चोल सेना ने उसे पराजित कर दिया। इस पराजय से पाल साम्राज्य को क्षति अवश्य पहुँची, किंतु पाल नरेश ने उसे गंगापार से आगे नहीं बढ़ने दिया और कुछ समय बाद ही अपने खोये प्रदेशों पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया।

इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं कि महीपाल प्रथम के शासनकाल के उत्तरार्द्ध में उसके राज्य की सीमाएँ कुछ संकुचित हो गई थीं। संभवतः चेदि नरेश गांगेयदेव ने महीपाल के राज्य पर आक्रमण करके उसके पश्चिमोत्तर भागों पर अधिकार कर लिया था। इसके बाद भी मुजफ्फरपुर, पटना, गया और टिप्परा आदि स्थानों से प्राप्त अभिलेखों से लगता है कि उसका राज्य काफी बड़ा था। सारनाथ लेख (1026 ई.) काशी क्षेत्र पर उसके अधिकार का सूचक है। इस प्रकार महीपाल अपने पूर्वजों द्वारा खोये गये क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर पाल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने में सफल रहा।

यद्यपि चोलों एवं संभवतः कलचुरियों आक्रमण के कारण महीपाल उत्तर भारत की राजनीति में विशेष भाग नहीं ले सका, तथापि धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। महीपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसके काल में बौद्ध दार्शनिक असित के नेतृत्व में एक बौद्ध धर्म-प्रचारक मंडल तिब्बत गया था।

एक निर्माता के रूप में महीपाल प्रथम ने महीपुर नामक नगर की स्थापना करवाई और बनारस, सारनाथ, बोधगया तथा नालंदा में अनेक चैत्यों, बौद्ध विहारों एवं हिंदू मंदिरों का निर्माण करवाया। नालंदा के विशाल बुद्ध-मंदिर का पुनर्निर्माण महीपाल प्रथम के शासन के 11वें वर्ष में कराया गया था। महीपाल ने सारनाथ में धर्मचक्रप्रवर्तन स्थल की मरम्मत करवाई, धर्मराजिका स्तूप और मूलगंधकुटी का निर्माण करवाया। उसके इस कार्य में स्थिरपाल और बसंतपाल ने उसकी सहायता की थी। आज भी बंगाल में महीपाल के नाम की कई अनुश्रुतियाँ प्रचलित हैं।

पाल वंश की अवनति

महीपाल मृत्यु के पश्चात पाल वंश की अवनति आरंभ हो गई। महीपाल के उत्तराधिकारी पुत्र नयपाल (1038-1055 ई.) ने लगभग 15 वर्षों तक शासन किया। तिब्बती अनुश्रुतियों से पता चलता है कि नयपाल को कलचुरि चेदि नरेश गांगेयदेव के पुत्र लक्ष्मीकर्ण के साथ दीर्घकालीन संघर्ष में उलझना पड़ा। युद्ध के प्रारंभ में कलचुरि सेनाओं को सफलता मिली और उन्होंने अनेक बौद्ध स्थलों को नष्ट कर दिया, किंतु बाद में कलचुरि सेनाओं को नयपाल से पराजित होना पड़ा। अंत में, महाबोधि विहार के भिक्षु दीपंकर श्रीज्ञान के माध्यम से पालों और कलचुरियों के बीच संधि हो गई और लक्ष्मीकर्ण की पुत्री यौवनश्री का विवाह नयपाल के पुत्र विग्रहपाल से कर दिया गया। नयपाल के शासन के पंद्रहवें वर्ष में गया के शासक विश्वरूप ने विष्णु के पदचिन्हों के निकट मंदिर का निर्माण करवाया था।

नयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहपाल तृतीय (1055-1070 ई.) पाल वंश का राजा हुआ। विग्रहपाल के काल में भी कलचुरि शासक कर्ण ने पाल क्षेत्रों पर आक्रमण किया। रामचरित में कहा गया है कि विग्रहपाल ने कर्ण को पराजित किया था।

विग्रहपाल के समय में 1068 ई. के आसपास कल्याणी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य षष्ठ ने बंगाल और आसाम पर आक्रमण किया, जिसमें गौड़ नरेश पराजित हुआ। उड़ीसा के महाशिवगुप्त ययाति और उद्दोत केसरी नामक राजाओं ने भी इसी काल में बंगाल पर आक्रमण किया। किंतु अभिलेखों से पता चलता है कि विग्रहपाल तृतीय का अब भी गौड़ (बंगाल) और मगध दोनों पर अधिकार था।

विग्रहपाल तृतीय भी बौद्ध धर्मानुयायी था, लेकिन वह धर्मसहिष्णु शासक था। उसने सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण के अवसर पर गंगा में स्नान किया और सोमदेव ब्राह्मण को एक ग्राम दान दिया। विग्रहपाल की मृत्यु के पश्चात् पाल साम्राज्य के पतन की गति तेज हो गई।

विग्रहपाल के तीन पुत्र थे- महीपाल द्वितीय, शूरपाल द्वितीय और रामपाल। विग्रहपाल की मृत्यु के बाद उसके तीनों पुत्रों के बीच उत्तराधिकार के लिए गृहयुद्ध आरंभ हो गया।

महीपाल द्वितीय ने बड़ी चतुरता से अपने दोनों भाइयों- शूरपाल तथा रामपाल को बंदी बनाकर स्वयं सिंहासनारूढ हुआ। किंतु महीपाल द्वितीय (1070-1075 ई.) के समय राज्य में अशांति और अराजकता और अव्यवस्था फैली रही। इस अराजकता का लाभ उठाकर महीपाल के गया मंडल के सामंत विश्वादित्य और ढेक्करी के शासक ईश्वरघोष ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इसी बीच कैवर्त (माहिष्य) कबीले के सरदार दिव्योक ने भी महीपाल के विरुद्ध विद्रोह कऱ दिया। उसने महीपाल की हत्या कर उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया। संयोग से रामपाल किसी तरह बंदीगृह से भाग निकला।

रामपाल (1077-1120 ई.): रामचरित से पता चलता है कि महीपाल के पश्चात् उसके भाई रामपाल ने अपने वश के समर्थकों की सहायता से बंगाल के पाल वंश के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। यद्यपि शूरपाल के विषय में कोई जानकारी नहीं मिलती है, किंतु कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि शूरपाल ने लगभग दो वर्ष (1075-1077 ई.) तक शासन किया था।

रामपाल (1077-1130 ई.) पाल वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था। कैवर्तों द्वारा बंगाल पर अधिकार कर लेने के पश्चात् रामपाल के अधिकार क्षेत्र में केवल मगध और राद के ही कुछ भाग रह गये थे। किंतु रामपाल ने अपने पुत्रों, मंत्रियों एवं राष्ट्रकूट शासक की सहायता से कैवर्त शासक दिव्योक के पुत्र भीम को मारकर उत्तरी बंगाल (वारेंद्री) को वापस छीन लिया, जिसका उल्लेख संध्याकरनंदी की रचना ‘रामचरित’ में मिलता है। इस ग्रंथ में संध्याकरनंदी ने स्वयं को वाल्मीकि और रामपाल को राम के रूप में वर्णित किया है। रामपाल ने अपनी कैवर्त विजय की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए रामवती नामक नगर की स्थापना की और इस नगर को बौद्ध एवं हिंदू मूर्तियों से सुसज्जित करवाया।

रामपाल ने उत्तरी बिहार और असम की विजय भी की। इसके बाद उसने दक्षिण-पश्चिम में कलिंग और पूर्व में कामरूप पर आक्रमण कर अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा को स्थापित किया। संभवतः इसी समय गहड़वालों ने बिहार के शाहाबाद और गया तक के क्षेत्रों को जीत लिया। किंतु किसी कारण रामपाल ने 1120 ई. में मुंगेर में गंगा नदी में डूबकर आत्महत्या कर ली। कुछ विद्वान रामपाल को ही पालवंश का अंतिम शासक मानते हैं।

किंतु रामपाल का पाल साम्राज्य की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास क्षणभंगुर साबित हुआ। अभिलेखों से पता चलता है कि रामपाल की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र कुमारपाल (1130-1140 ई.) सिंहासन पर बैठा, जो रामपाल का तीसरा पुत्र था। उसके समय में आसाम के अधीनस्थ शासक तिम्पदेव ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।

कुमारपाल के उपरांत गोपाल तृतीय (1140-1144 ई.) पाल वंश का शासक हुआ। किंतु मदनपाल ने गोपाल तृतीय की हत्या करके सिंहासन पर अधिकार कर लिया। मदनलाल (1144-1162 ई.) के समय में पूर्वी बंगाल में सेनवंश ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। अपने शासन के अंतिम दिनों में मदनपाल केवल बिहार के मध्य भाग में एक छोटे से भाग का शासक था।

मदनपाल के पश्चात् गोविंदपाल (1162-1174 ई.) पाल वंश के सिंहासन पर बैठा। गोविंदपाल को पाल वंश का अंतिम शासक माना जाता है। उसका राज्य केवल गया तक सीमित रह गया था। अंततः पाल शासकों की अयोग्यता, चालुक्यों, कलचुरियों तथा समकालीन कुछ अन्य शासकों के समय-समय पर होने वाले आक्रमणों के साथ-साथ स्थानीय सामंतों के विद्रोहों एवं सेनों के उत्कर्ष के कारण पाल साम्राज्य का पतन हो गया। इस प्रकार भाग्य के उलट-फेर के साथ बिहार और बंगाल पर 400 वर्षों तक शासन करने के बाद पाल नरेश 12वीं सदी के अंत मे ऐतिहासिक मंच से अलग हो गये।

पाल शासन का महत्त्व

पाल राजवंश के शासकों ने लगभग चार शताब्दियों तक बंगाल पर शासन किया। इस दौरान पाल शासकों ने अपनी अपनी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के द्वारा भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय का सृजन किया। गोपाल द्वारा स्थापित पाल साम्राज्य की राजनीतिक सत्ता का चरमोत्कर्ष धर्मपाल, देवपाल एवं महीपाल के शासनकाल में देखने को मिलता है। इन शासकों ने बंगाल की एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित किया, परंतु इनके उत्तराधिकारियों के काल में पालों की स्थिति शोचनीय हो गई और पाल नरेश नाममात्र के शासक रह गये। बाद में, तत्कालीन नवोदित शक्तियों ने पाल साम्राज्य पर आक्रमण कर पाल वंश को पतन के गर्त में ढकेल दिया।

पालों का शासन न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी काफी महत्वपूर्ण था। पाल वंश के शासकों ने कृषि के विकास के लिए सिंचाई के साधनों का विकास किया, व्यापार वाणिज्य को बढ़ावा दिया और शिक्षा, कला व साहित्य को संरक्षण प्रदान किया।

पाल वंश के दो-एक नरेशों को छोड़कर, लगभग सभी शासक बौद्ध धर्मानुयायी थे। उन्होंने पतनोन्मुखी बौद्ध धर्म को न केवल राजकीय प्रश्रय प्रदान किया, बल्कि उसका पुनरुद्धार किया। पाल नरेशों ने संपूर्ण बंगाल और बिहार में अनेक चैत्यों, बिहारों और मूर्तियों का निर्माण कराया। पाल शासन के दौरान बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ संतरक्षित, कमलशील एवं दीपांकर जैसे दार्शनिक विद्वानों ने तिब्बत की यात्रा की। किंतु पाल नरेशों का धार्मिक दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं था। उन्होंने ब्राह्मणों को भी दान-दक्षिणा देकर सम्मानित किया और मंदिरों का निर्माण करवाया।

पाल वंश के शासकों ने शिक्षा और साहित्य को भी संरक्षण प्रदान किया। शिक्षा के संरक्षण और प्रसार के लिए पालों ने औदंतपुरी, सोमपुर तथा विक्रमशिला में विश्वविद्यालयों का निर्माण करवाया, जिनका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था। इस काल के प्रमुख संरक्षित विद्वानों में संध्याकरनंदी का नाम विशेष उल्लेखनीय है, जिसने ‘रामचरित’ नामक श्लेषात्मक काव्य ग्रंथ की रचना की। अन्य विद्वानों में हरिभद्र, चक्रपाणि दत्त, वज्रदत्त आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। बौद्ध कवि वज्रदत ने देवपाल के समय में ‘लोकेश्वर-शतक’ काव्य की रचना की थी। पाल शासकों ने संस्कृत के साथ-साथ बांग्ला लिपि एवं भाषा को प्रोत्साहन दिया। संभवतः हिंदू काव्य दायभाग के जन्मदाता जीमूतवाहन को भी पालों का संरक्षण प्राप्त था।

पालों ने कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और बौद्ध कला को एक विशिष्ट रूप प्रदान किया। राजनैतिक अस्थिरता के वातावरण के बावजूद भी पालों द्वारा निर्मित करवाये गये चैत्य, विहार, मंदिर एवं अन्य स्मारक इस बात के साक्षी हैं कि उनके समय में बिहार एवं बंगाल में स्थापत्य कला को पुनर्जीवन प्राप्त हुआ। पाल कलाकार कांस्य मूर्तियों के निर्माण में सिद्धहस्त थे। पाल शासकों के काल में नालंदा, बोधगया और कुर्किहार मूर्तिकला के प्रमुख केंद्र थे। इस प्रकार पालों का शासन राजनीतिक दृष्टिकोण से ही नहीं, सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी काफी महत्वपूर्ण था।

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