बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय (Major Sects of Buddhism)

बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय (Major Sects of Buddhism)
बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय मुख्य लेख : गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ  बौद्ध धर्म का […]

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बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय

मुख्य लेख : गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ 

बौद्ध धर्म का उदय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बौद्ध धर्म का उदय लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व उत्तर भारत के गंगा के मैदानी क्षेत्रों में हुआ। इसके प्रवर्तक सिद्धार्थ गौतम थे, जिन्हें बाद में गौतम बुद्ध या बुद्ध के नाम से जाना गया। बौद्ध धर्म के उदय को तत्कालीन उत्तर भारतीय समाज की व्यापक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और बौद्धिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है। यह वह काल था जब गंगा घाटी में कृषि का विस्तार, लोहे के उपकरणों का व्यापक उपयोग, नगरों का विकास, व्यापार-वाणिज्य की वृद्धि और महाजनपदों का उदय हो रहा था। इन परिवर्तनों ने भारतीय समाज में नई सामाजिक और आर्थिक शक्तियों को जन्म दिया तथा धार्मिक विचारों में भी व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।

उस समय वैदिक धार्मिक परंपराओं में यज्ञ और कर्मकांडों का विशेष महत्त्व था। अनेक धार्मिक अनुष्ठान जटिल और व्ययपूर्ण थे, जिनमें पुरोहितों की भूमिका प्रमुख थी। साथ ही सामाजिक असमानताओं और वर्ण-व्यवस्था की बढ़ती कठोरता के कारण समाज के कुछ वर्गों में असंतोष उत्पन्न हुआ। इसी व्यापक बौद्धिक वातावरण में श्रमण परंपराओं का विकास हुआ, जिनमें बौद्ध धर्म और जैन धर्म प्रमुख थे। इन परंपराओं ने वैदिक कर्मकांडों की अनिवार्यता को चुनौती दी और व्यक्तिगत नैतिकता, तप, आत्मसंयम तथा मुक्ति के वैकल्पिक मार्गों पर बल दिया।

गौतम बुद्ध ने मानव जीवन की मूल समस्या के रूप में दुःख पर विचार किया और उसके कारण तथा उससे मुक्ति के उपायों की व्याख्या की। उनकी शिक्षाओं का केंद्र किसी जटिल धार्मिक कर्मकांड के बजाय मानव अनुभव, नैतिक आचरण और मानसिक अनुशासन था। उन्होंने न तो अत्यधिक भोग-विलास को उचित माना और न ही शरीर को अनावश्यक कष्ट देने वाली अत्यंत कठोर तपस्या को। इन दोनों अतियों से बचकर संतुलित जीवन और साधना का मार्ग अपनाने को उन्होंने मध्यम मार्ग या मज्झिमा प्रतिपदा कहा।

बौद्ध संगीतियाँ (Buddhist Councils)
तथागत गौतम बुद्ध

बौद्ध धर्म की मूल शिक्षाएँ

चार आर्य सत्य

बौद्ध धर्म के दार्शनिक और नैतिक चिंतन का आधार चार आर्य सत्य हैं। इनके माध्यम से बुद्ध ने मानव जीवन में दुःख की समस्या और उसके समाधान का विश्लेषण प्रस्तुत किया। पहला सत्य यह है कि संसार में दुःख विद्यमान है। दूसरा सत्य दुःख के कारण की व्याख्या करता है, जिसका प्रमुख कारण तृष्णा और आसक्ति मानी गई है। तीसरा सत्य यह बताता है कि दुःख का निरोध संभव है और चौथा सत्य उस मार्ग की ओर संकेत करता है, जिसके माध्यम से दुःख का निरोध प्राप्त किया जा सकता है।

बौद्ध दर्शन में दुःख का अर्थ केवल शारीरिक पीड़ा तक सीमित नहीं है। जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु, अप्रिय परिस्थितियों से सामना और प्रिय वस्तुओं या व्यक्तियों से वियोग जैसे अनुभव भी दुःख के व्यापक स्वरूप से जुड़े हैं। बुद्ध के अनुसार दुःख के कारणों को समझकर और तृष्णा तथा आसक्ति पर नियंत्रण प्राप्त करके मनुष्य निर्वाण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

आर्य अष्टांगिक मार्ग

दुःख के निरोध के लिए बुद्ध ने आर्य अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया। इसमें सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि शामिल हैं। यह मार्ग केवल धार्मिक साधना का विषय नहीं था, बल्कि नैतिक, मानसिक और बौद्धिक अनुशासन पर आधारित जीवन-पद्धति भी था।

अष्टांगिक मार्ग के माध्यम से बुद्ध ने व्यक्ति के विचार, वाणी, कर्म और मानसिक अवस्था को शुद्ध एवं अनुशासित बनाने पर बल दिया। सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प ज्ञान तथा विचार से संबंधित हैं, सम्यक् वाक्, कर्मान्त और आजीविका नैतिक आचरण से जुड़े हैं, जबकि सम्यक् व्यायाम, स्मृति और समाधि मानसिक अनुशासन एवं ध्यान से संबंधित हैं।

मध्यम मार्ग

बुद्ध की शिक्षाओं में मध्यम मार्ग का विशेष महत्त्व है। अपने ज्ञान की खोज के दौरान सिद्धार्थ गौतम ने पहले राजसी और भोगपूर्ण जीवन का अनुभव किया और बाद में अत्यंत कठोर तपस्या भी की। अंततः उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि न तो अत्यधिक इंद्रिय-भोग और न ही शरीर को अत्यधिक कष्ट देना आध्यात्मिक उन्नति का उचित मार्ग है। इसलिए उन्होंने दोनों अतियों से दूर संतुलित साधना-पद्धति को अपनाया। यही मध्यम मार्ग बौद्ध जीवन-दर्शन का महत्त्वपूर्ण आधार बना।

बौद्ध धर्म की धार्मिक और नैतिक दृष्टि

बौद्ध धर्म ने वैदिक कर्मकांडों और यज्ञों को मुक्ति का अनिवार्य साधन नहीं माना। बुद्ध ने मानव जीवन की व्यावहारिक समस्याओं के समाधान, नैतिक आचरण, कर्म और मानसिक अनुशासन को अधिक महत्त्व दिया। बौद्ध परंपरा में व्यक्ति के कर्मों को उसके जीवन और भविष्य की स्थिति से संबंधित माना गया तथा नैतिक जीवन को आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक बताया गया।

बुद्ध ने करुणा, मैत्री, अहिंसा, आत्मसंयम और सम्यक् आचरण को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। उनकी शिक्षाओं का उद्देश्य किसी विशेष सामाजिक वर्ग तक सीमित न होकर व्यापक मानव समाज को नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग प्रदान करना था। इसी कारण बौद्ध धर्म को विभिन्न सामाजिक समूहों से समर्थन प्राप्त हुआ।

बौद्ध संघ की स्थापना और विस्तार

बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया, जिसे बौद्ध परंपरा में धर्मचक्र-प्रवर्तन कहा जाता है। इसके बाद उनके अनुयायियों का एक संगठित समुदाय विकसित हुआ, जिसे बौद्ध संघ कहा गया। संघ ने बौद्ध धर्म के प्रचार, शिक्षाओं के संरक्षण और अनुशासन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बौद्ध संघ में मुख्यतः भिक्षु और भिक्षुणियाँ शामिल थीं। इनके अतिरिक्त गृहस्थ अनुयायी भी बौद्ध समुदाय का महत्त्वपूर्ण अंग थे। गृहस्थ अनुयायी संघ को आर्थिक सहायता प्रदान करते थे तथा दान, नैतिक आचरण और धार्मिक साधना के माध्यम से बौद्ध धर्म से जुड़े रहते थे। बौद्ध धर्म के प्रसार में भिक्षुओं की यात्राओं, विहारों की स्थापना और गृहस्थ समुदाय के संरक्षण ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

बुद्ध के उपदेशों को प्रारंभिक काल में मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से सुरक्षित रखा गया। भिक्षु बुद्ध के उपदेशों और विनय संबंधी नियमों को स्मरण रखते थे तथा उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते थे। बाद में इन परंपराओं का संकलन विभिन्न बौद्ध ग्रंथों में हुआ।

बौद्ध धर्म में संप्रदायों और निकायों का विकास

बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय और बौद्ध संगीतियाँ (Major Sects of Buddhism and Buddhist Musics)
बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय

महापरिनिर्वाण के बाद उत्पन्न परिस्थितियाँ

गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध संघ के सामने बुद्ध की शिक्षाओं और संघीय अनुशासन को सुरक्षित रखने की चुनौती उत्पन्न हुई। बुद्ध के जीवनकाल में संघ उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व के कारण अपेक्षाकृत संगठित रहा, किंतु उनके महापरिनिर्वाण के बाद शिक्षाओं की व्याख्या, विनय के नियमों और संघीय अनुशासन के संबंध में विभिन्न मत उभरने लगे।

बौद्ध धर्म के विस्तार के साथ भिक्षु समुदाय विभिन्न क्षेत्रों में फैल गया। भौगोलिक दूरी, स्थानीय परिस्थितियों और विनय संबंधी प्रश्नों के कारण विभिन्न संघों के बीच मतभेद बढ़ने लगे। यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, बल्कि कई शताब्दियों तक चलने वाले धार्मिक और दार्शनिक विकास का परिणाम थी।

प्रारंभिक बौद्ध निकाय

स्थविरवाद, महासांघिक और थेरवाद परंपरा

प्रारंभिक बौद्ध इतिहास में स्थविरवाद और महासांघिक दो महत्त्वपूर्ण निकाय-परंपराएँ थीं। गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध संघ के विस्तार के साथ बुद्ध के उपदेशों, विनय-नियमों और संघीय अनुशासन की व्याख्या को लेकर मतभेद उत्पन्न होने लगे। परंपरागत बौद्ध विवरणों के अनुसार संघ के भीतर विनय और अनुशासन संबंधी विवादों ने प्रारंभिक विभाजनों को जन्म दिया। इन्हीं ऐतिहासिक परिस्थितियों में स्थविर और महासांघिक परंपराएँ प्रमुख रूप से उभरकर सामने आईं।

स्थविरवाद का संबंध उन भिक्षुओं की परंपरा से था, जो संघीय अनुशासन और विनय-नियमों के पालन को विशेष महत्त्व देते थे। दूसरी ओर, महासांघिक नाम उस व्यापक भिक्षु-समूह के लिए प्रयुक्त हुआ, जो स्थविरों से अलग परंपरा के रूप में विकसित हुआ। यद्यपि प्रारंभिक विभाजन के कारणों और समय के संबंध में विभिन्न बौद्ध स्रोतों में भिन्न विवरण मिलते हैं, फिर भी स्थविरवाद और महासांघिक को प्राचीन बौद्ध धर्म की दो प्रमुख ऐतिहासिक धाराओं के रूप में स्वीकार किया जाता है।

प्रारंभिक बौद्ध निकायों का विस्तार

कालांतर में प्रारंभिक बौद्ध परंपराओं से अनेक निकायों और शाखाओं का विकास हुआ। प्राचीन बौद्ध निकायों में सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तक और सम्मितीय जैसी परंपराओं का विशेष महत्त्व था। इन निकायों के बीच विनय और संघीय अनुशासन के अतिरिक्त अभिधर्म, धर्मों की प्रकृति, बुद्ध के स्वरूप तथा मुक्ति के मार्ग से संबंधित विभिन्न दार्शनिक मत विकसित हुए।

इस प्रकार बौद्ध धर्म का संप्रदायगत विकास केवल संगठनात्मक विभाजन का परिणाम नहीं था, बल्कि यह दार्शनिक चिंतन, धार्मिक साधना और संघीय परंपराओं के क्रमिक विकास से भी जुड़ा हुआ था। विभिन्न निकायों ने बौद्ध दर्शन और धार्मिक जीवन के अलग-अलग पक्षों को विकसित किया।

महासांघिक परंपरा

महासांघिक प्राचीन बौद्ध धर्म की प्रमुख निकाय-परंपराओं में से एक थी। इसकी कुछ शाखाओं ने बुद्ध के स्वरूप की अपेक्षाकृत अधिक लोकोत्तर व्याख्या की और बुद्ध के असाधारण तथा आध्यात्मिक स्वरूप पर विशेष बल दिया। महासांघिक परंपरा के अंतर्गत भी समय के साथ अनेक शाखाओं और विचारधाराओं का विकास हुआ।

आधुनिक इतिहासकारों ने महासांघिक परंपरा और बाद में विकसित महायान की कुछ वैचारिक प्रवृत्तियों के बीच संबंधों की संभावना पर विचार किया है। फिर भी महायान को सीधे महासांघिक संप्रदाय का ही दूसरा नाम मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। महायान का विकास विभिन्न बौद्ध समुदायों, धार्मिक प्रवृत्तियों और दार्शनिक विचारधाराओं के दीर्घकालिक विकास का परिणाम था।

स्थविरवाद और थेरवाद

बौद्ध धर्म के संप्रदायों के अध्ययन में स्थविरवाद और थेरवाद के संबंध को समझना आवश्यक है। दोनों शब्दों के अर्थ और ऐतिहासिक परंपरा में निकट संबंध होने के कारण इन्हें प्रायः समान मान लिया जाता है, किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से दोनों का प्रयोग अलग-अलग संदर्भों में हुआ है।

स्थविरवाद प्राचीन बौद्ध धर्म की एक प्रमुख ऐतिहासिक परंपरा थी। ‘स्थविर’ शब्द का अर्थ वरिष्ठ, वृद्ध अथवा अनुभवी भिक्षु होता है। प्रारंभिक बौद्ध संघ के विभाजन के बाद स्थविर परंपरा एक महत्त्वपूर्ण धारा के रूप में विकसित हुई और कालांतर में इससे अनेक बौद्ध निकायों तथा शाखाओं का उदय हुआ। इसलिए स्थविरवाद को किसी एक आधुनिक बौद्ध संप्रदाय के रूप में नहीं, बल्कि प्राचीन बौद्ध निकायों के व्यापक ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में समझना चाहिए।

स्थविर परंपरा ने विनय, संघीय अनुशासन और बौद्ध शिक्षाओं के संरक्षण को विशेष महत्त्व दिया। इसके अंतर्गत विकसित विभिन्न निकायों की अपनी स्वतंत्र धार्मिक और दार्शनिक विशेषताएँ थीं। अतः स्थविरवाद प्राचीन बौद्ध धर्म की एक व्यापक ऐतिहासिक धारा का प्रतिनिधित्व करता है।

थेरवाद परंपरा

थेरवाद वर्तमान समय तक जीवित रहने वाली बौद्ध धर्म की प्रमुख परंपराओं में से एक है। ‘थेर’ पालि भाषा का शब्द है, जो संस्कृत के ‘स्थविर’ के समान अर्थ रखता है और इसका सामान्य अर्थ वरिष्ठ भिक्षु होता है। थेरवाद बुद्ध के उपदेशों, विनय, नैतिक अनुशासन, ध्यान और प्रज्ञा के माध्यम से निर्वाण प्राप्ति को विशेष महत्त्व देता है।

थेरवादी परंपरा में अर्हत् आदर्श को विशेष स्थान प्राप्त है। इसके अनुसार साधक व्यक्तिगत प्रयास, नैतिक जीवन, ध्यान और प्रज्ञा के माध्यम से अज्ञान, तृष्णा और आसक्ति से मुक्त होकर निर्वाण की दिशा में अग्रसर होता है। इस परंपरा में बुद्ध को मुख्यतः महान शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने मानव जीवन को दुःख से मुक्त करने का मार्ग बताया।

थेरवाद का प्रमुख धार्मिक साहित्य पालि त्रिपिटक है, जिसमें विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक शामिल हैं। विनयपिटक में भिक्षु और भिक्षुणी संघ के अनुशासन संबंधी नियमों का वर्णन मिलता है, सुत्तपिटक में बुद्ध तथा प्रमुख शिष्यों के उपदेश संकलित हैं और अभिधम्मपिटक में बौद्ध सिद्धांतों एवं मानसिक प्रक्रियाओं का व्यवस्थित दार्शनिक विश्लेषण किया गया है।

थेरवाद का प्रमुख प्रसार श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में हुआ। वर्तमान समय में श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस में थेरवादी परंपरा का विशेष प्रभाव है।

स्थविरवाद और थेरवाद का ऐतिहासिक संबंध

थेरवाद और स्थविरवाद के बीच घनिष्ठ ऐतिहासिक संबंध है, किंतु दोनों को पूर्णतः समानार्थी मानना उचित नहीं है। थेरवाद स्वयं को प्राचीन स्थविर परंपरा की विरासत से संबंधित मानता है, लेकिन आधुनिक थेरवाद को प्राचीन स्थविरवाद का पूर्ण और सीधा पर्याय मानना ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा।

प्राचीन स्थविर परंपरा से समय के साथ अनेक बौद्ध निकाय विकसित हुए। थेरवाद उन ऐतिहासिक विकासों से संबंधित एक विशिष्ट परंपरा है, जो वर्तमान समय तक जीवित और प्रभावशाली बनी हुई है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि स्थविरवाद प्राचीन बौद्ध धर्म की एक व्यापक ऐतिहासिक धारा थी, जबकि थेरवाद उस व्यापक स्थविर परंपरा से संबंधित एक विशिष्ट और जीवित बौद्ध परंपरा है।

इस प्रकार प्रारंभिक बौद्ध धर्म में स्थविरवाद और महासांघिक परंपराओं ने बौद्ध निकायों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनसे जुड़े विभिन्न निकायों और दार्शनिक प्रवृत्तियों ने बौद्ध धर्म को विविधता प्रदान की। स्थविरवाद से संबंधित व्यापक ऐतिहासिक परंपरा के संदर्भ में थेरवाद एक विशिष्ट जीवित बौद्ध परंपरा के रूप में विकसित हुआ, जबकि महासांघिक परंपरा की कुछ शाखाओं ने बुद्ध के लोकोत्तर स्वरूप और अन्य वैचारिक प्रवृत्तियों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। बौद्ध धर्म का संप्रदायगत विकास किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि संघीय संगठन, विनय संबंधी मतभेदों, दार्शनिक चिंतन और विभिन्न क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रसार से जुड़ी कई शताब्दियों की ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।

‘हीनयान’ और श्रावकयान की अवधारणा

मुख्य लेख : हीनयान

बौद्ध इतिहास के अध्ययन में ‘हीनयान’ शब्द का प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए। यह शब्द मुख्यतः महायान साहित्य में उन बौद्ध मार्गों के लिए प्रयुक्त हुआ, जिन्हें महायान परंपरा अपने आदर्श से अलग मानती थी। ‘हीनयान’ का शाब्दिक अर्थ ‘छोटा’ या ‘निम्न वाहन’ किया जाता है, इसलिए आधुनिक बौद्ध अध्ययन में इसे किसी विशिष्ट ऐतिहासिक संप्रदाय का तटस्थ नाम नहीं माना जाता।

‘हीनयान’ को सीधे थेरवाद का पर्याय मानना भी ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है। प्राचीन काल में अनेक प्रारंभिक बौद्ध निकाय थे, जिन्हें बाद के महायान साहित्य में सामूहिक रूप से हीनयान कहा गया। आधुनिक अध्ययन में श्रावकयान, प्रारंभिक बौद्ध निकाय अथवा संबंधित संप्रदायों के वास्तविक नामों का प्रयोग अधिक उपयुक्त माना जाता है।

श्रावक परंपरा में साधक बुद्ध की शिक्षाओं को सुनकर और उनका पालन करके निर्वाण की दिशा में आगे बढ़ता है। इसमें अर्हत् आदर्श को विशेष महत्त्व दिया गया। बौद्ध परंपरा में साधक की आध्यात्मिक प्रगति को स्रोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत् जैसी अवस्थाओं के माध्यम से भी समझाया गया है।

महायान बौद्ध धर्म

मुख्य लेख : महायान

महायान का उदय और विकास

महायान बौद्ध धर्म की प्रमुख परंपराओं में से एक है। ‘महायान’ का अर्थ ‘महान वाहन’ है। इसका विकास भारत में क्रमिक रूप से हुआ और ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों तक इसकी विशिष्ट धार्मिक और दार्शनिक पहचान स्पष्ट होने लगी। महायान का उदय किसी एक घटना या एक ही संप्रदाय के परिणामस्वरूप नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न बौद्ध समुदायों, धार्मिक प्रवृत्तियों और दार्शनिक विचारों के दीर्घकालिक विकास से इसका स्वरूप निर्मित हुआ।

महायान ने बौद्ध धर्म के प्रसार और विकास में व्यापक भूमिका निभाई। भारत से इसका प्रभाव मध्य एशिया के मार्गों से चीन तक पहुँचा और बाद में कोरिया, जापान तथा वियतनाम सहित पूर्वी एशिया के अनेक क्षेत्रों में इसका व्यापक प्रसार हुआ।

बोधिसत्त्व आदर्श

महायान की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता बोधिसत्त्व आदर्श है। महायान के अनुसार साधक केवल अपनी व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सभी प्राणियों के कल्याण और दुःख से मुक्ति के लिए प्रयास करता है। बोधिसत्त्व करुणा और प्रज्ञा के आधार पर बुद्धत्व की दिशा में अग्रसर होता है तथा दूसरों के कल्याण को भी अपनी साधना का अभिन्न अंग मानता है।

महायान परंपरा में करुणा और प्रज्ञा को विशेष महत्त्व दिया गया। करुणा के माध्यम से साधक अन्य प्राणियों के दुःख के प्रति संवेदनशील बनता है, जबकि प्रज्ञा वास्तविकता के गहन स्वरूप को समझने में सहायता करती है। इस प्रकार महायान में व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति और सार्वभौमिक कल्याण की अवधारणाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

महायान की छह पारमिताएँ

महायान परंपरा में बोधिसत्त्व के आध्यात्मिक विकास के लिए छह पारमिताओं का विशेष महत्त्व है। इनमें दान, शील, क्षांति, वीर्य, ध्यान और प्रज्ञा शामिल हैं। दान उदारता और परोपकार की भावना को विकसित करता है। शील नैतिक अनुशासन पर बल देता है। क्षांति धैर्य और सहनशीलता की शिक्षा देती है। वीर्य निरंतर प्रयास और उत्साह का प्रतीक है। ध्यान मानसिक एकाग्रता को विकसित करता है, जबकि प्रज्ञा वास्तविकता के गहन ज्ञान और बौद्धिक विवेक से संबंधित है।

इन पारमिताओं के माध्यम से बोधिसत्त्व अपने आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ व्यापक लोककल्याण के लिए भी प्रयास करता है। महायान की नैतिकता और साधना में इसीलिए व्यक्तिगत मुक्ति के साथ करुणा और परोपकार को विशेष स्थान प्राप्त हुआ।

महायान में बुद्ध और बोधिसत्त्व की अवधारणा

महायान के विकास के साथ बुद्ध के स्वरूप की व्याख्या अधिक व्यापक रूप में की गई। ऐतिहासिक बुद्ध गौतम के महत्त्व को स्वीकार करते हुए महायान परंपरा में बुद्ध के लोकोत्तर और आध्यात्मिक स्वरूप पर भी विशेष बल दिया गया। इस परंपरा में अनेक बुद्धों और बोधिसत्त्वों की अवधारणाएँ विकसित हुईं।

अवलोकितेश्वर को करुणा का प्रमुख बोधिसत्त्व माना गया, मंजुश्री को प्रज्ञा से संबंधित बोधिसत्त्व के रूप में प्रतिष्ठा मिली और मैत्रेय को भविष्य के बुद्ध के रूप में विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। इन अवधारणाओं ने महायान की धार्मिक और भक्तिपरक परंपराओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महायान के प्रमुख दार्शनिक संप्रदाय

महायान के अंतर्गत अनेक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक परंपराओं का विकास हुआ। इनमें माध्यमिक दर्शन और योगाचार या विज्ञानवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

माध्यमिक दर्शन, जिसका विकास नागार्जुन से संबंधित माना जाता है, ने शून्यता की अवधारणा को विशेष महत्त्व दिया। इसके अनुसार वस्तुओं का कोई स्वतंत्र और स्थायी स्वभाव नहीं है, बल्कि वे परस्पर कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर हैं।

योगाचार या विज्ञानवाद ने चेतना और अनुभव की प्रकृति के विश्लेषण को विशेष महत्त्व दिया। इस परंपरा ने मानसिक प्रक्रियाओं और ज्ञान की संरचना के संबंध में विस्तृत दार्शनिक चिंतन प्रस्तुत किया।

वज्रयान बौद्ध धर्म

वज्रयान का उदय

वज्रयान का विकास मुख्यतः महायान बौद्ध धर्म की पृष्ठभूमि में हुआ। भारत में इसका विशेष विकास प्रारंभिक मध्यकाल के दौरान हुआ और इसमें महायान की मूल शिक्षाओं के साथ विशिष्ट तांत्रिक साधना-पद्धतियों का समावेश हुआ। वज्रयान को कभी-कभी तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहा जाता है।

वज्रयान में आध्यात्मिक साधना के लिए मंत्र, मुद्रा, मंडल, ध्यान और विशेष योग-पद्धतियों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। इन साधनाओं का उद्देश्य साधक की चेतना को रूपांतरित कर बुद्धत्व की दिशा में आगे बढ़ाना था।

वज्रयान में गुरु और साधना का महत्त्व

वज्रयान परंपरा में गुरु या आचार्य का विशेष महत्त्व है। अनेक गूढ़ साधनाओं में गुरु से दीक्षा और मार्गदर्शन आवश्यक माना जाता है। वज्रयान की साधना-पद्धतियों में प्रतीक, अनुष्ठान और ध्यान की विशेष विधियों का उपयोग किया जाता है।

मंडल का प्रयोग ध्यान और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है, जबकि मंत्रों को मानसिक एकाग्रता और साधना के महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में स्वीकार किया गया। वज्रयान की अनेक साधनाएँ सामान्य बौद्ध साधना की अपेक्षा अधिक विशिष्ट और दीक्षापरक मानी जाती हैं।

वज्रयान का प्रसार

भारत में बौद्ध धर्म के उत्तरकालीन विकास में वज्रयान को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्रों ने बौद्ध दर्शन और विभिन्न साधना-पद्धतियों के विकास तथा प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत से वज्रयान का प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों और तिब्बत तक पहुँचा। तिब्बत में बौद्ध धर्म के विकास के साथ वज्रयान ने एक विशिष्ट रूप ग्रहण किया। बाद में इसका प्रसार भूटान, मंगोलिया तथा हिमालयी क्षेत्रों में भी हुआ। आज तिब्बती बौद्ध परंपरा में वज्रयान का विशेष महत्त्व है।

बौद्ध धर्म के संप्रदायों का ऐतिहासिक महत्त्व

बौद्ध धर्म में विभिन्न निकायों और संप्रदायों का विकास किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह कई शताब्दियों तक चलने वाली एक जटिल ऐतिहासिक, दार्शनिक और धार्मिक प्रक्रिया थी। प्रारंभिक संघीय मतभेदों से लेकर विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं के विकास तक, बौद्ध धर्म निरंतर परिवर्तन और विस्तार की प्रक्रिया से गुजरता रहा।

स्थविरवाद और महासांघिक जैसे प्रारंभिक निकायों ने बौद्ध संघ के विविधीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इसके बाद थेरवाद ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी मजबूत परंपरा स्थापित की, महायान ने पूर्वी और मध्य एशिया में व्यापक प्रभाव डाला तथा वज्रयान ने तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों में विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का विकास किया।

इन सभी परंपराओं के बीच बुद्ध के स्वरूप, मुक्ति के मार्ग, साधना-पद्धतियों और दार्शनिक सिद्धांतों के संबंध में मतभेद थे, किंतु उनका मूल संबंध गौतम बुद्ध की शिक्षाओं और मानव जीवन में दुःख की समस्या से मुक्ति की खोज से जुड़ा रहा।

इस प्रकार बौद्ध धर्म का इतिहास केवल गौतम बुद्ध की शिक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके बाद विकसित हुए विभिन्न निकायों, संप्रदायों और दार्शनिक परंपराओं का इतिहास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। प्रारंभिक बौद्ध संघ से स्थविरवाद और महासांघिक जैसी धाराओं का विकास हुआ, जबकि आगे चलकर थेरवाद, महायान और वज्रयान जैसी प्रमुख परंपराओं ने बौद्ध धर्म को व्यापक और विविध स्वरूप प्रदान किया।

बौद्ध संघ, बौद्ध संगीतियों, विहारों और शिक्षा-केंद्रों ने बुद्ध की शिक्षाओं तथा बौद्ध साहित्य को सुरक्षित रखने और विभिन्न क्षेत्रों में उनका प्रसार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों तक पहुँचा तथा विश्व की प्रमुख धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में से एक के रूप में विकसित हुआ।

बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदायों से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. बौद्ध धर्म में संप्रदायों का विकास क्यों हुआ?

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उपदेशों, विनय-नियमों और संघीय अनुशासन की व्याख्या में मतभेद हुए। क्षेत्रीय प्रसार और दार्शनिक विचारों में परिवर्तन से अनेक निकाय और संप्रदाय विकसित हुए।

2. प्रारंभिक बौद्ध धर्म के दो प्रमुख निकाय कौन-से थे?

प्रारंभिक बौद्ध धर्म के दो प्रमुख निकाय स्थविरवाद और महासांघिक थे। इनके बीच मुख्यतः विनय और संघीय अनुशासन को लेकर मतभेद थे।

3. बौद्ध धर्म की प्रमुख जीवित परंपराएँ कौन-सी हैं?

बौद्ध धर्म की प्रमुख जीवित परंपराएँ थेरवाद, महायान और वज्रयान हैं।

4. थेरवाद और स्थविरवाद में क्या अंतर है?

स्थविरवाद एक प्राचीन ऐतिहासिक निकाय था, जबकि थेरवाद वर्तमान में जीवित बौद्ध परंपरा है। दोनों में ऐतिहासिक संबंध है, लेकिन दोनों पूर्णतः समान नहीं हैं।

5. महासांघिक और महायान में क्या संबंध था?

महासांघिक की कुछ विचारधाराओं में बुद्ध के लोकोत्तर स्वरूप पर बल दिया गया, जिनका संबंध कुछ महायान प्रवृत्तियों से माना जाता है। फिर भी महायान को महासांघिक का दूसरा नाम नहीं माना जा सकता है।

6. थेरवाद क्या है?

थेरवाद बौद्ध धर्म की एक प्रमुख जीवित परंपरा है, जो बुद्ध की शिक्षाओं, विनय और अर्हत् आदर्श को महत्त्व देती है। इसका प्रमुख साहित्य पाली त्रिपिटक है।

7. महायान की प्रमुख विशेषता क्या है?

महायान में बोधिसत्त्व आदर्श, करुणा और सभी प्राणियों के कल्याण पर विशेष बल दिया जाता है। माध्यमिक और योगाचार इसके प्रमुख दार्शनिक रूप हैं।

8. वज्रयान क्या है?

वज्रयान बौद्ध धर्म की तांत्रिक परंपरा है, जिसमें मंत्र, मुद्रा, मंडल और विशेष ध्यान-साधनाओं का महत्त्व है। इसका प्रमुख विकास तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों में हुआ।

9. बौद्ध संप्रदायों के विकास का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?

बौद्ध संप्रदायों के विकास से बौद्ध धर्म के दर्शन, साहित्य, कला और साधना में विविधता आई तथा यह भारत से बाहर श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, जापान, कोरिया और तिब्बत तक फैला।
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