1857 की क्रांति का स्वरूप, असफलता और परिणाम (The Nature, Failure and Consequences of the Revolution of 1857)

1857 की क्रांति के स्वरूप और चरित्र को लेकर बहस लगभग उसके आरंभ-काल में ही शुरू हो चुकी थी। मालेसन, ट्रेविलियन, लारेंस तथा होम्स जैसे ब्रिटिश इतिहासकार, जो साम्राज्य के प्राकृतिक पक्षपाती थे, इसे मात्र सैनिकों का विद्रोह मानते थे, जो केवल सेना तक सीमित रहा और जिसे जन-साधारण का कोई समर्थन प्राप्त नहीं था। कुछ समकालीन समझते थे कि यह मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना के लिए एक मुस्लिम षडयंत्र था। कुछ इतिहासकारों ने इसे ईसाइयों के विरुद्ध धार्मिक युद्ध, तो कुछ अन्य ने श्वेत और काले लोगों के बीच सर्वश्रेष्ठता के लिए संघर्ष बताया था। कुछ इतिहासकारों का विचार था कि यह पाश्चात्य और पूर्वी सभ्यता और संस्कृति के बीच संघर्ष था। 27 जुलाई 1857 को हाउस आफ कामन्स में बेंजामिन डिजरायली ने पूछा था: ‘‘यह एक सैनिक गदर है या एक राष्ट्रीय विद्रोह है?’’ एस.एन. सेन जैसे इतिहासकार भी मानते हैं कि आंदोलन का आरंभ एक सैनिक गदर के रूप में हुआ और फिर जब प्रशासन का हृास हुआ उच्छृंखल तत्व हावी हो गये। रोमेशचंद्र मजुमदार भी मानते हैं कि जिस चीज का आरंभ एक गदर के रूप में हुआ उसका अंत कुछ क्षेत्रों में असैनिक जनता के एक विद्रोह के रूप में हुआ जो कभी तो स्वार्थी नेताओं द्वारा आयोजित किया गया था और जो कभी मात्र भीड़ का हिस्सा था, जिसका जन्म प्रशासन मात्र के विघटन के कारण हुआ था। वी.डी. सावरकर के अनुसार, यह भारत का स्वाधीनता के लिए लड़ा गया स्वतंत्रता संघर्ष था। एक तरह से एस.बी. चौधरी ने भी सावरकर के मत का समर्थन करते हुए इस क्रांति को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की तरह दूर से ही सही, एक वास्तविक कदम बताया है।

The Nature, Failure and Consequences of the Revolution of 1857
1857 की क्रांति के महान् क्रांतिकारी

 

सैनिक विद्रोह

सर जान सीले के अनुसार 1857 का विद्रोह एक पूर्णतया देशभक्तिरहित और स्वार्थी सैनिक विद्रोह था, जिसमें न कोई स्थानीय नेतृत्व था और न ही इसे सर्वसाधारण का समर्थन प्राप्त था। यह एक स्थापित सरकार के विरुद्ध भारतीय सेना का विद्रोह था। यद्यपि कुछ रियासतों ने इसमें सहयोग दिया, किंतु ये वही रियासतें थीं, जो डलहौजी की विलय नीति के कारण सरकार से असंतुष्ट थी। एक संस्थापित सरकार होने के कारण अंग्रेजी सरकार ने विद्रोह का दमन किया और शांति-व्यवस्था स्थापित की।

किंतु 1757 के प्लासी के युद्ध और 1857 की क्रांति के बीच इतना कुछ घटित हुआ था कि इसे मात्र सैनिक विद्रोह कहना ठीक नहीं है। यह सही है कि इस क्रांति का आरंभ सिपाहियों ने किया था, किंतु यह सभी स्थानों पर केवल सेना तक ही सीमित नहीं था। विद्रोही जनता के सभी वर्गों से आये। इसमें राजे-रजवाड़े, नबाव तो थे ही, मजदूर, किसान भी थे, जमींदार थे, आदिवासी थे और महिलाएँ भी थीं। ब्राह्मण और मुसलमान तो थे ही, अन्य जातियों के लोग भी कम नहीं थे। सभी जातियों के लोग जाति, मजहब, संप्रदाय और धर्म से ऊपर उठकर अपने देश के लिए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध की आग में कूदे थे। 1858-59 के अभियोगों में हजारों असैनिक भी, सैनिकों के साथ-साथ दोषी पाये गये और उन्हें दंड दिया गया। इसलिए 1857 की क्रांति को मात्र सैनिक विद्रोह नहीं कहा जा सकता है।

गोरे और काले जातियों का युद्ध

यह गोरे और काले जातियों के बीच का युद्ध भी नहीं था। यह सही है कि सभी गोरे लोग एक ओर थे, लेकिन सभी काले लोग दूसरी ओर नहीं थे। कैप्टन मेडले ने बताया है कि अंग्रेजी कैम्पों में एक श्वेत व्यक्ति के अनुपात में 20 काले व्यक्ति थे। भारतीयों ने गोरे सैनिकों की हर प्रकार से सहायता की थी। काले भारतीयों ने ही गोरों के लिए खाना पकाया और गोरे सैनिकों को खतरे के क्षेत्र से दूर पहुँचाया। यही नहीं, कंपनी की जिस सेना ने क्रांति का दमन किया, उसमें काले सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी।

बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध

यह बर्बरता और सभ्यता के बीच युद्ध भी नहीं था, जैसा कि टी.आर. होम्स जैसे नस्लवादी इतिहासकार मानते हैं। ब्रिटिश इतिहासकारों ने प्रायः अंग्रेजों द्वारा किये गये अत्याचारों को छोड़ दिया है और भारतीय सैनिकों तथा उनके नेताओं के अनेक पाशविक कृत्यों का ही वर्णन किया है। चूंकि ब्रिटिश राज ने ‘सूक्ष्मता के साथ हिंसा का एकाधिकार’ स्थापित किया था, इसलिए उसकी प्रजा ने भी उसका जवाब उतनी ही अधिक जवाबी हिंसा के साथ दिया। अगर क्रांतिकारियों को सार्वजनिक रूप से फाँसी देना, तोप से उड़ाना और मनमाने ढ़ंग से गाँवों को जलाना अंग्रेजों के क्रांति-विरोधी कदमों में शामिल था, तो क्रांतिकारियों ने भी निर्ममता से स्त्रियों और बच्चों समेत गोरे नागरिकों की हत्या की। इस संदर्भ में कानपुर का 27 जून 1857 का हत्याकांड अतिचार का एक कृत्य था, क्योंकि यह उपनिवेशितों की देसी हिंसा का कृत्य था, जिसने उपनिवेशकों की हिंसा के एकाधिकार को तोड़ा।

इस क्रांति में तीन लाख से भी अधिक लोग शहीद हुए, अकेले अवध में डेढ़ लाख लोगों की हत्या की गई, जिसमें से एक लाख लोग नागरिक थे। दिल्ली में 27,000 लोगों को फाँसी पर लटकाया गया। लखनऊ में 20,000 और इलाहाबाद में 6,000 लोगों को सरेआम कत्ल किया गया। इलाहाबाद के आसपास शायद ही कोई ऐसा पेड़ बचा हो, जिस पर किसी न किसी अभागे भारतीय की लाश न लटकी रही हो। बनारस में गली के असहायों और मासूम बच्चों को भी फाँसी पर लटकाया गया। नील को इस बात का बड़ा घमंड था कि उसने सैकड़ों भारतीयों को बिना मुकदमा चलाये मरवा दिया। हो सकता है कि अंग्रेज बहुत उत्तेजित हो गये रहे हों, लेकिन भारतीय भी तो उत्तेजित थे। अगर भारतीयों के कृत्य माफ नहीं किये जा सकते, तो बहुत से अंग्रेजों के अपराध भी अक्षम्य हैं। मुसलमानों को जीते-जी सूअर की खाल में सिल देना, सूअर का माँस जबरदस्ती उनके मुँह में ठूँस देना, मौत का भय दिखाकर हिंदुओं को गाय का माँस खाने को बाध्य करना और घायल बंदियों को जिंदा जला देना सभ्यता का प्रमाण नहीं है। कोई भी राष्ट्र या व्यक्ति इतने भयंकर और नृशंस अत्याचार करके अपने को सभ्य कहलाने का दावा नहीं कर सकता।

हिंदू-मुस्लिम षड्यंत्र

कुछ समकालीन समझते थे कि यह क्रांति मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना के लिए एक मुस्लिम षड्यंत्र था। सर जेम्स आउट्रम और टेलर के अनुसार यह क्रांति हिंदू-मुस्लिम षड्यंत्र था, जिसमें हिंदू शिकायतों का लाभ उठाया गया। किंतु इसके समर्थन में साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

यह सही है कि उस समय भारत में हिंदुओं और मुसलमानों में बड़ी एकता थी और दोनों दिल्ली के बहादुरशाह को अपना सम्राट मानते थे। जब 10 मई को मेरठ में क्रांति शुरू हुई, तो क्रांतिकारियों का पहला नारा, ‘दिल्ली चलो’ था। यह नारा किसी विचार-विमर्श का नहीं, सिपाहियों के स्वाभाविक हार्दिक उद्गार का परिणाम था। जहाँ-जहाँ छावनियों में क्रांति की आग पहुँची, हर जगह यही बात हुई। जो सेना दिल्ली नहीं पहुँच सकती थी, उसने भी मुगल बादशाह के प्रति वफादारी की घोषणा की। कानपुर में नानासाहब ने अपने आपको पेशवा घोषित किया। मराठों और मुगलों के पुराने झगड़ों को भूलकर उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने आपको मुगल दरबार का सूबेदार या गर्वनर मान लिया। सिक्के भी बादशाह के नाम के थे और हर आदेश दिल्ली के बादशाह के नाम से जारी किये गये। नानासाहब के कुछ ऐसे आदेश हैदराबाद-दकन के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

सामंती असंतोष की अभिव्यक्ति

साम्राज्यवादी विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों ने 1857 की क्रांति को ‘सामंती असंतोष की अभिव्यक्ति’ मात्र कहा है और इस तरह जनता की भूमिका को तुच्छ दिखाने का प्रयास किया है। तर्क दिया गया है कि क्रांति के दौरान निर्णय सामंती तत्त्व करते थे और क्रांति का निर्धारण एक बड़ी सीमा तक ब्रिटिश राज से प्रतिबद्ध एक फलते-फूलते वर्ग की उपस्थिति या अनुपस्थिति से हुआ, क्योंकि क्रांति को एक सामान्य दिशा वही दे सकते थे।

किंतु इस मत को भी स्वीकार करना कठिन है क्योंकि सामंत प्रभुओं ने अनेक अवसरों पर नेतृत्व करने में संकोच किया और वे क्रांतिकारियों द्वारा विवश किये गये। क्रांतिकारी सिपाहियों के आने पर बहादुरशाह हक्का-बक्का रह गये थे और भारी संकोच के बाद ही उनके नेता बने। कानपुर में नानासाहब को जब क्रांतिकारी सैनिकों ने गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी, तो उनके पास सिपाहियों से हाथ मिलाने के अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। झाँसी की रानी को तो वास्तव में सिपाहियों की मदद न करने या अंग्रेजों से सहयोग करने पर मौत की धमकी दी गई थी। इस प्रकार क्रांति की पहल और उसकी प्रभावशीलता सामंती नेतृत्व पर निर्भर नहीं थी।

यद्यपि अनेक क्षेत्रों में किसानों ने तालुकेदारों का नेतृत्व माना, क्योंकि दोनों वर्गों के बीच पूँजीवाद के आगमन के पहले ही एक जीवंत संबंध था, किंतु विभिन्न क्षेत्रों में तालुकेदारों की भूमिकाएँ भी अलग-अलग थीं, जैसे-अवध में तालुकेदारों की भागीदारी कभी भी पूरी नहीं रही। अनेक क्षेत्रों में किसानों, दस्तकारों ने तालुकेदारों को क्रांति में भाग लेने के लिए विवश किया, जबकि कुछ वफादार बने रहे, कुछ ने गद्दारी की, दूसरों ने बीच का रास्ता अपनाया और कुछ ने ब्रिटिश सेना के आते देखकर ही हथियार डाल दिये। किंतु इस क्रांति में किसानों की स्वतंत्र लामबंदी को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यद्यपि कुछ मामलों में तालुकेदारों ने अंग्रेजों से सुलह कर ली, तब भी किसानों ने क्रांति को जारी रखा। सबसे बड़ी बात यह है कि मुख्य पहल ‘वर्दीधारी’ किसानों ने की थी, जो अब अपनी वर्दी उतारकर किसानों से जा मिले थे। मध्य और उत्तर भारत में लगभग हर जगह सेना की बैरकों से आरंभ होकर क्रांति जल्द ही पास के गाँवों तक फैल गई थी।

गदर से अधिक, किंतु राष्ट्रीय विद्रोह से कम

कुछ इतिहासकारों के अनुसार ‘यह सैनिक गदर से अधिक, मगर एक राष्ट्रीय विद्रोह से कम कोई चीज था।’ राष्ट्रीय इसलिए नहीं था कि विद्रोह का जनप्रिय चरित्र उत्तर भारत तक सीमित था, जबकि ब्रिटिश राज से लाभ पानेवाले क्षेत्र और समूह उसके वफादार बने रहे। बंगाली मध्यवर्ग वफादार बना रहा क्योंकि नई व्यवस्था से उसके भौतिक हित जुड़े हुए थे और उसमें अकसर नये विचारों के साथ एक गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता थी। पंजाबी राजे हिंदुस्तानी सिपाहियों से घृणा करते थे और मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना के विचार से ही कांपते थे। दूसरी ओर विद्रोह करनेवालों की प्रेरणाओं में विविधता थी और अंग्रेज-विरोधी किसी विशेष शिकायत से उनका हमेशा एक संबंध होता भी नहीं था, अकसर वे एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ते रहते थे और यह भारतीय फूट विदेशी हाथों में खेल गई।

इस प्रकार यह क्रांति नकारात्मक थी और क्रांतिकारियों के पास ब्रिटिश राज की जगह किसी वैकल्पिक व्यवस्था का कोई खाका भी नहीं था। दरअसल अपने भविष्य दृष्टि में क्रांतिकारी नेता निराशाजनक सीमा तक परस्पर विरोधी थे और उनमें जहाँ कुछ मुगल बादशाह के प्रति वफादार थे, वहीं दूसरे विभिन्न क्षेत्रीय राजाओं के समर्थक थे।

भारत का स्वतंत्रता संग्राम

The Nature, Failure and Consequences of the Revolution of 1857
1857 की क्रांति

अनेक इतिहासकार 1857 के विद्रोह को भारत का स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं, जिसका स्वरूप राष्ट्रीय था। वी.डी. सावरकर ने 1909 के एक प्रकाशन में 1857 के विद्रोह को ‘भारत का स्वाधीनता संघर्ष’ या स्वधर्म और स्वराज्य के लिए लड़ा गया संघर्ष सिद्ध किया है। इस आंदोलन में केवल धर्माध्यक्षों ने ही भाग नहीं लिया, वरन् जनता ने भी इसमें तेजी से सहयोग किया था और कानपुर के मजदूरों ने कारखाने छोड़ दिये थे। जनरल हैवलाक को गंगा पार करने के लिए नावें तक नहीं मिली थी। मुगल सम्राट ने गोहत्या बंद कर दी थी। इस राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य विदेशियों को बाहर निकालकर देश को स्वतंत्र कराना था, इसलिए यह देश का स्वतंत्रता संग्राम था।

यह सही है कि जिन लोगों का राज्य छिन गया था और जिनकी पेंशन बंद कर दी गई थी, वे ही इस विद्रोह के नेता थे, किंतु क्रांति का उद्देश्य अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालकर देश में एक राष्ट्रीय राज्य की स्थापना करना था। इस दृष्टिकोण से यह गदर या विप्लव न होकर राष्ट्रीय क्रांति थी। एक तरह से सावरकर के मत का समर्थन करते हुए एस.बी. चौधरी ने इस क्रांति को एक विदेशी शक्ति को चुनौती देने के लिए अनेक वर्गों की जनता का पहला संयुक्त प्रयास बताया है। उनके अनुसार यह परवर्ती चरण में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की तरह दूर से ही सही, एक वास्तविक कदम है।

इतिहासकारों के बीच अधिक प्रचलित व्याख्या यह है कि यह मुख्यतः सिपाहियों का एक गदर था और नागरिक असंतोष इसका गौण तत्व था। यह गदर इसलिए हुआ कि कुछ उच्श्रृंखल तत्त्वों ने कानून और व्यवस्था के भंग होने का लाभ उठाया। एस.एन. सेन जैसे परवर्ती भारतीय इतिहासकारों ने भी इस क्रांति की शतवार्षिकी पर सरकार द्वारा प्रायोजित अपने इतिहास-लेखन में इसी औपनिवेशिक तर्क को दोहराया है। सेन का तर्क है, आंदोलन का आरंभ एक सैनिक गदर के रूप में हुआ और फिर जब प्रशासन का हृास हुआ, तो उच्श्रृंखल तत्व हावी हो गये।

सेन के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के पूवार्द्ध में भारत एक भौगोलिक अभिव्यक्ति मात्र था और 1857 के आंदोलनकारी नेता राष्ट्रीय नहीं थे। अधिकांश नेताओं ने व्यक्तिगत कारणों से इस संघर्ष में हिस्सा लिया था। जब तक उनके व्यक्तिगत हितों को ठेस नहीं पहुँची, तब तक उन्होंने अंग्रेजों का विरोध नहीं किया। बहादुरशाह कोई राष्ट्रीय सम्राट नहीं था, उसे सैनिकों ने उनका नेता बनने पर विवश किया था। नानासाहब ने विद्रोह का झंडा तब उठाया, जब वे पेंशन प्राप्त करने में असफल रहे। क्रांति शुरू हो जाने के बाद भी नानासाहब ने कहा था कि अगर डलहौजी के निर्णय बदल दिये जायें और उनकी माँग पूरी कर दी जाये, तो वह समझौता करने को तैयार हैं। रानी की अपनी शिकायत थी कि ‘‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।’’ निःसंदेह, रानी ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया, किंतु यह स्पष्ट नहीं किया कि वह राष्ट्रहित के लिए लड़ रही थी। अवध का व्यभिचारी नवाब तो राष्ट्रीय नेता बनने का सपना भी नहीं देख सकता था। अवध के तालुकेदारों ने अपने सामंतवादी अधिकारों के लिए अथवा अपने राजा के लिए युद्ध किया, राष्ट्रीय हित के लिए नहीं। अधिकतर आंदोलनकारी नेताओं में आपस में ईर्ष्या और द्वेष था और वे लगातार एक-दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे। जब क्रांति के नेताओं की यह स्थिति थी, तो जनसाधारण की हालत का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। तात्या टोपे को नर्मदा पार करने पर किसी भी गाँव ने आश्रय नहीं दिया, सब उनके विरुद्ध हो गये और उन्हें भागकर अलवर के जंगल में शरण लेनी पड़ी थी।

फिर भी, डा. सेन का विश्वास है कि यह स्वतंत्रता संग्राम ही था। उनका तर्क है कि क्रांतियाँ प्रायः छोटे वर्ग से ही प्रारंभ होती हैं, जिसमें जनता का समर्थन होता भी है और नहीं भी होता है। अमरीका की क्रांति और फ्रांसीसी क्रांति में भी यही हुआ था। सेन के अनुसार 1857 का विद्रोह विप्लव के रूप में आरंभ हुआ और इसने उस समय राजनैतिक स्वरूप धारण कर लिया, जब आंदालनकारियों ने अपने आप को दिल्ली सम्राट के अधीन होने की घोषणा कर दी और भूमिपतियों तथा बहुत-सी असैनिक जनता ने भी अपने-आपको उसी के अधीन मान लिया। इस क्रांति में शहीद हुए तीन लाख लोगों में आधे से अधिक साधारण नागरिक थे और जब इतनी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं, तो वह विद्रोह नहीं, बल्कि ‘क्रांति’ या ‘संग्राम’ कहलाता है। इस प्रकार धर्मरक्षा के लिए जो लड़ाई आरंभ हुई, वह शीघ्र ही स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिवर्तित हो गई।

रोमेशचंद्र मजुमदार का मानना है कि 1857 की क्रांति स्वतंत्रता संग्राम नहीं था। जिस चीज का आरंभ एक गदर के रूप में हुआ, उसका अंत कुछ क्षेत्रों में असैनिक जनता के एक विद्रोह के रूप में हुआ, जो कभी तो स्वार्थी स्थानीय नेताओं द्वारा आयोजित किया गया था और जो कभी मात्र भीड़ की हिंसा थी, जिसका जन्म प्रशासन के विघटन के कारण हुआ था। इस क्रांति ने अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप धारण किया। पंजाब, मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों में यह केवल सिपाही विद्रोह था, जिसमें कालांतर में कुछ असंतुष्ट व्यक्ति भी सम्मिलित हो गये। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के कुछ भागों में और बिहार के पश्चिमी भागों में यह सिपाही आंदोलन के साथ-साथ जनसाधारण का भी आंदोलन था। राजस्थान, महाराष्ट्र के कुछ भागों में भी जनता की सहानुभूति आंदोलनकारियों के साथ थी। किंतु मजुमदार का तर्क है कि अंग्रेजों से लड़नेवाले केवल सिपाही थे, जो पहले की तरह नैतिक और धार्मिक कारणों से अथवा केवल आर्थिक लाभ से प्रेरित हुए थे। सिपाहियों के व्यवहार और आचरण में कुछ भी ऐसा नहीं था कि जिससे विश्वास हो सके कि वे देशप्रेम से प्रेरित थे और देश को स्वतंत्र कराने के लिए लड़ रहे थे।

यह सही है कि 1857 के क्रांतिकारियों के बीच आधुनिक अर्थ में एक भारतीय राष्ट्र की कोई धारणा नहीं थी, किसानों की कार्रवाइयाँ स्थानीय घटनाएँ थीं, जो सुस्पष्ट क्षेत्रीय सीमाओं में बँघी हुई थीं। फिर भी, पहले के किसान आंदोलनों के विपरीत अब क्षेत्रों के बीच निश्चित ही आपसी संपर्क अधिक था और विद्रोही क्रांतिकारी अपने इलाके से बाहर के प्रभावों से प्रभावित हो रहे थे। उत्तर और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारियों के बीच समन्वय और संवाद भी था और उड़ती हुई अफवाहें क्रांतिकारियों को एक अनदेखे बंधन में बाँधे रहती थीं। ब्रिटिश राज और उसके कारण उनके जीवन में आई उथल-पुथल के प्रति घृणा उन सबकी साझी भावना थी। यही कारण है कि सत्ता के प्रतीक उनके निशाने बने। वे सब यही समझते थे कि उनकी जाति और धर्म खतरे में है। झाँसी के सिपाहियों की तरह क्रांतिकारी हर जगह अपने ‘दीन-धरम’ के लिए लड़ रहे थे, एक ऐसी नैतिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए, जिसे एक अतिक्रामक विदेशी राज ने भ्रष्ट कर दिया था। एक-दूसरे के लिए अनजान होकर भी और संभवतः अपने अलग-अलग अनुभवों के द्वारा एक-दूसरे से कटे हुए होने पर भी, वे इतिहास के एक ही मोड़ पर एक ही शत्रु के विरुद्ध खड़े थे।

इस प्रकार 1857 की क्रांति का स्वरूप कुछ भी क्यों न रहा हो, शीघ्र ही यह भारत में अंग्रेजी सत्ता के लिए एक चुनौती का प्रतीक बन गया। यह विद्रोह आधार रूप में साम्राज्यवाद के खिलाफ था, जिसमें सैनिकों तथा असैनिकों ने साम्राज्यीय तत्त्वों को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया था। इसे भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया पहला युद्ध माना जाना चाहिए।

क्रांति की असफलता के कारण (Because of the Failure of the Revolution)

क्रांतिकारियों ने अनुकरणीय साहस, समर्पण और प्रतिबद्धता का परिचय दिया, किंतु उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली ब्रिटिश फौज का प्रत्याक्रमण झेलने के लिए सिर्फ वीरता ही काफी नहीं थी। फलतः लार्ड केनिंग ने कलकत्ता में ब्रिटिश दस्तों को इकट्ठा किया और भीषण युद्ध एवं कुशल कूटनीति के बल पर 20 सितंबर 1857 में दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया। हुमायूँ के मकबरे में शरण लिये हुए सम्राट बहादुरशाह गिरफ्तार कर लिये गये, उन पर मुकदमा चलाया गया और फिर रंगून निर्वासित कर दिया गया। सम्राट के दो पुत्रों और एक पोते को यह वचन देकर कि ‘उन्हें कोई क्षति नहीं पहुँचाई जायेगी’, खूँनी दरवाजा के पास गोली मार दी गई और दिल्ली की जनता से भयंकर प्रतिशोध लिया गया। दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा होते ही क्रांति की रीढ़ टूट गई। ब्रिटिश सैनिक दस्तों ने एक के बाद एक सभी केंद्रों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। झाँसी की बहादुर रानी ‘मर्दानगी’ के साथ अंत तक अपने लक्ष्य पर अटल रही और युद्धक्षेत्र में लड़ते हुए 17 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हुई। जनरल ह्यूरोज ने, जिसने उन्हें पराजित किया, अपने दुर्जेय शत्रु के बारे में कहा है कि ‘‘यहाँ वह औरत सोई हुई है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।’’ रानी के साथ झलकारीबाई भी शहीद हुई जो उनके बचपन की साथी थी। नानासाहब 1859 के शुरू में नेपाल चले गये। कुँवरसिंह अपनी बढ़ी उम्र के बावजूद अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। तात्या टोपे भी 7 अप्रैल 1859 को सिंधिया के एक सामंत के विश्वासघात के कारण अलवर के जंगलों में पकड़े गये और 18 अप्रैल 1859 को फाँसी पर लटका दिये गये। इस प्रकार धीरे-धीरे 1859 के अंत तक भारत पर ब्रिटिश सत्ता पूरी तरह पुनस्र्थापित हो गई। इस विद्रोह की असफलता के अनेक कारण उत्तरदायी बताये गये हैं।

केंद्रीय नेतृत्व की दुर्बलता

कहा जाता है कि विद्रोह की असफलता का एक प्रमुख कारण केंद्रीय नेतृत्व का मजबूत न होना था। यह भारत का दुर्भाग्य था कि विद्रोह के नेतृत्व की जंजीर में सबसे कमजोर कड़ी संभवतः सम्राट बहादुरशाह ही थे। उनके कमजोर व्यक्तित्व, ढलती आयु और नेतृत्व की अक्षमता के कारण विद्रोह में राजनीतिक दुर्बलता आई, जिससे विद्रोह को अपूरणीय हानि उठानी पड़ी। सिर्फ एक ही बात उनके पक्ष में थी कि वह महान् मुगलों के वंशज थे। भारत के लोगों में मुगल सत्ता का ऐसा प्रभाव था कि जब यह प्रश्न उठा कि अंग्रेजों से शासन की बागडोर कौन ले, तो हिंदू और मुसलमान दोनों ने एक स्वर से बहादुरशाह को ही चुना। किंतु बहादुरशाह इतने कमजोर थे कि वह न तो सैनिकों को अपने नियंत्रण में रख सकते थे, न ही अपने सरदारों को। उनका शासन दिल्ली के किले की चहारदीवारी तक ही सीमित था। ईस्ट इंडिया कंपनी उन्हें एक लाख रुपया महीना अनुदान देती थी और उसी पर उनकी गुजर होती थी। उनके पास न सेना थी और न खजाना, न उनका कोई प्रभाव था, न शक्ति। उनके अपने परिवार के लोग और राजदरबारी ही उनको धोखा दे रहे थे। स्वयं उनकी पत्नी जीनत महल, अपने बेटे जवाँबख्श के लिए अंग्रेजों के बातचीत कर रही थीं। परिणामतः जब बहादुरशाह गिरफ्तार कर लिए गये, तो वहीं इस राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध का अंत हो गया।

संगठनात्मक क्षमता एवं आपसी सहयोग का अभाव

विद्रोह की विफलता का एक कारण कुशल संगठनात्मक क्षमता और आपसी सहयोग का अभाव भी था। सिपाही बहादुर और स्वार्थरहित तो थे, लेकिन उनमें संगठन और अनुशासन की कमी थी। कभी-कभी तो वे अनुशासित सेना के बजाय दंगाई भीड़ की तरह व्यवहार करते थे। विद्रोही इकाइयों के पास न तो मिलकर कार्य करने की शक्ति थी और न ही उनके पास कोई योजनाबद्ध कार्यक्रम था। किसी क्षेत्र-विशेष से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेकने के बाद उन्हें पता भी नहीं होता था कि उसकी जगह किस प्रकार की राजनीतिक सत्ता या संस्थाएँ स्थापित की जायें। देश के विभिन्न भागों में हो रहे विद्रोहों के बीच भी कोई तालमेल नहीं था। सभी एक-दूसरे के प्रति शंकित तथा ईर्ष्याग्रस्त थे और अकसर आत्मघाती झगड़ों में उलझ पड़ते थे। बहादुरशाह और जीनत महल जैसे लोगों को सिपाहियों पर भरोसा नहीं था और वे अपनी सुरक्षा के लिए अंग्रेजों से बातचीत चला रहे थे। ज्यादातर तालुकेदारों को महज अपने हितों से मतलब था और मानसिंह जैसे कुछ लोगों ने तो परिस्थिति की माँग के अनुसार कई-कई बार अपनी वफादारी बदली। दरअसल ‘अपने भविष्य दृष्टि में विद्रोही नेता निराशाजनक सीमा तक परस्पर-विरोधी थे’ और उनमें जहाँ कुछ मुगल बादशाह के प्रति वफादार थे, वहीं दूसरे विभिन्न क्षेत्रीय राजाओं के समर्थक थे।

सामान्य एकता का अभाव

विदेशी शासन के प्रति एक साझी घृणा को छोड़कर विद्रोही नेताओं के बीच और कोई संबंध-सूत्र नहीं था। इनमें से हरेक की अपनी-अपनी शिकायतें थीं और वे मूलतः अपने विशेषाधिकारों के लिए लड़ रहे थे। लखनऊ की बेगम हजरत महल अवध के विलय के कारण विद्रोही बनी थीं, रानी लक्ष्मीबाई अपनी झाँसी के लिए लड़ीं, जगदीशपुर के जमींदार कुँवरसिंह अपनी संपत्ति छीने जाने से अंग्रेजी सरकार से असंतुष्ट थे और नानासाहब अपनी पेंशन न मिलने के कारण विद्रोही हुए थे। चूंकि उनका कोई समान लक्ष्य नहीं था, इसलिए एक नई राजनीतिक व्यवस्था कायम करने या आंदोलन को क्रांतिकारी नेतृत्व देने की क्षमता उनमें नहीं थी। जान लारेंस ने ठीक ही कहा था कि ‘‘अगर उनमें (आंदोलनकारियों में) एक भी योग्य नेता निकला होता, तो हम सदा के लिए हार जाते।’’

विद्रोह का स्थानीय स्वरूप

यद्यपि विद्रोहियों को जनसाधारण की सहानुभूति मिल रही थी, किंतु पूरा देश उनके साथ नहीं था। व्यापारी, पढ़े-लिखे लोग और भारतीय रजवाड़े न केवल उनसे असंपृक्त थे, बल्कि अंग्रेजों की सक्रिय सहायता भी कर रहे थे। भारतीय सिपाहियों ने न केवल क्रांति का दमन किया, बल्कि अपने ही देशवासियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मुंबई और मद्रास की सेनाएँ राजभक्त बनी रहीं। नर्मदा के दक्षिण में अशांति बहुत कम फैली। पंजाब को लारेंस ने सफलतापूर्वक नियंत्रण में रखा। सिंध और राजस्थान करीब शांत रहे और गोरखों की सहायता अंग्रेजों के लिए बड़ी लाभदायक सिद्ध हुई। इस प्रकार क्रांति का स्थानीय स्वरूप उसकी असफलता का कारण बना।

देसी राजाओं का असहयोग

भारतीय रियासतों के अधिकांश शासक तथा बड़े जमींदार पक्के स्वार्थी तथा अंग्रेजों की शक्ति से भयभीत थे और वे क्रांति में शामिल नहीं हुए। इसके विपरीत ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, हैदराबाद के निजाम, जोधपुर के राजा तथा दूसरे राजपूत शासक, भोपाल के नवाब, पटियाला, नाभा और जींद के सिख शासक, पंजाब के दूसरे सिख सरदार, कश्मीर के महाराजा, नेपाल के राणा तथा दूसरे अनेक सरदारों और अनेकों बड़े जमींदारों ने क्रांति को कुचलने में अंग्रेजों की सक्रिय सहायता की। क्रांति के समय लार्ड कैनिंग ने कहा था: ‘‘यदि सिंधिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाए तो मुझे कल ही अपना बोरिया-बिस्तर बाँधना होगा।’’ बाद में केनिंग ने स्वीकार किया: ‘‘राजाओं ने तूफान में तरंगावरोध की तरह काम किया, अन्यथा उसने हमें एक ही लहर से बहा दिया होता।’’

मद्रास, मुंबई, बंगाल तथा पश्चिमी पंजाब में जनता क्रांतिकारियों से हमदर्दी रखती थी, फिर भी ये प्रांत अप्रभावित रहे। इसके अलावा असंतुष्ट तथा बेदखल जमींदारों को छोड़कर उच्च तथा मध्य वर्गों के अधिकांश लोग आंदोलनकारियों के आलोचक थे। संपन्न वर्गों के अधिकांश लोग आंदोलनकारियों के प्रति ठंडे बने रहे या उनका सक्रिय विरोध किये। यहाँ तक कि आंदोलन में शामिल अवध के बहुत से तालुकेदारों ने, अंग्रेजों से यह आश्वासन पाकर कि उनकी जागीरें उन्हें वापस कर दी जायेंगी, क्रांति से किनारा कर लिया।

व्यापारी वर्ग का असहयोग

ग्रामीण हमलों का निशाना सूदखोर थे, इसलिए उन्होंने स्वाभाविक रूप से क्रांति का विरोध किया। किंतु धीरे-धीरे व्यापारी भी इसके शत्रु हो गये। एक तो वे लंबे समय तक चलनेवाले जन-आंदोलन की अनिश्चितताओं का साथ नहीं देना चाहते थे। दूसरे, युद्ध का खर्च जुटाने के लिए आंदोलनकारियों को उन पर भारी कर लगाने पड़े थे और सेना को भोजन देने के लिए उनके अनाज-गोदामों पर कब्जा करना पड़ा था। मद्रास, कलकत्ता और मुंबई के बड़े व्यापारियों ने अंग्रेजों का इसलिए भी साथ दिया क्योंकि उनका अधिकांश मुनाफा अंग्रेज व्यापारियों के साथ होनेवाले विदेशी व्यापार और आर्थिक संबंधों से होता था। बंगाल के जमींदार भी अंग्रेजों के वफादार बने रहे। आखिर वे अंग्रेजों की ही पैदावार थे।

शिक्षित भातीयों का असहयोग

आधुनिक शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने भी क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया। आंदोलनकारी जिस प्रकार अंधविश्वासों का प्रयोग करते या प्रगतिशील सामाजिक सुधारों का विरोध करते थे, उससे शिक्षित भारतीय बिदक कर दूर भाग गये। उनका विश्वास था कि अंग्रेज भारत के आधुनिकीकरण के काम को पूरा करने में उनका सहयोग करेंगे। किंतु ये शिक्षित भारतीय विदेशी शासन के भक्त भी नहीं थे। 1858 के बाद जब उन्हें अंग्रेजों की नीयत का पता चला तो उन्होंने ही अंग्रेजों के खिलाफ शक्तिशाली और आधुनिक आंदोलन का नेतृत्व सँभाला।

कृषकों और निम्नजातियों का असहयोग

कृषकों और निम्न जाति के लोगों ने आंदोलनकारियों के प्रति कोई विशेष सहानुभूति नहीं दिखाई। मुंबई और मद्रास की सेना में भर्ती सैनिक प्रायः छोटी जातियों के थे, जो राजभक्त बने रहे। क्रांतिकारियों की लूटपाट के कारण किसानों, मजदूरों, व्यापारियों व जनसामान्य ने भी विशेष सहायता नहीं की। किंतु भारतीयों में एकता का यह अभाव भारतीय इतिहास के इस चरण में संभवतः अपरिहार्य था क्योंकि भारत अभी आधुनिक राष्ट्रवाद से अपरिचित था और साझे अखिल भारतीय हितों का अभी उदय नहीं हुआ था।

आधुनिक युद्ध-सामग्री का अभाव

आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेज इसलिए जीते कि उन्होंने अपना साम्राज्य फिर से पाने के लिए असीमित व्यक्ति और संसाधन झोंक दिये, जबकि सिपाहियों के पास आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों तथा अन्य युद्ध-सामग्री की हताशाजनक कमी थी। एक किसान सेना की तर्ज पर साधारण ग्रामीण आंदोलनकारी आदिम हथियारों से लैस थे और उनमें से अधिकांश तो प्रशिक्षित सैनिक भी नहीं थे। अंग्रेजों के सौभाग्य से क्रीमिया और चीनी युद्ध 1856 तक समाप्त हो चुके थे और 1,12,000 यूरोपीय सैनिक विश्व के विभिन्न भागों से भारत में आमद करा चुके थे। 3,10,000 अतिरिक्त भारतीय सेना का गठन यहीं किया गया था।

नये हथियार और गोला-बारूद प्राप्त करने का क्रांतिकारी सिपाहियों के पास कोई स्रोत नहीं था। ब्रिटिश हथियारखानों से उन्होंने जिन चीजों पर कब्जा किया था, वे बहुत दूर तक उनका साथ नहीं दे सकती थीं। आंदोलनकारियों के पास कोई तेज संचार व्यवस्था नहीं थी, जबकि विद्युत संचालित तार-व्यवस्था ने अंग्रेज सेनापति के दाहिने हाथ से भी अधिक सेवा की। सही तो यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य के विशाल संसाधनों और उसकी सामुद्रिक शक्ति के सामने क्रांतिकारियों के सफल होने की कोई संभावना ही नहीं थी।

अनुभवी और योग्य नेतृत्व की कमी

इसके अलावा, सिपाही आंदोलनकारियों में कोई योग्य और अनुभवी सेनानायक नहीं था, जो क्रांतिकारियों को एकजुट कर उचित रणनीति बनाकर निश्चित लक्ष्य की ओर निर्देशित कर सके। दूसरी ओर कंपनी बहादुर को लारेंसबंधु, निकलसन, आउट्रम, हैवलाक, एडवर्ड्स जैसे योग्य और कर्मठ व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त थीं। इन प्रतिष्ठित अनुभवी सैनिकों ने आरंभिक काल में कठिनतम् युद्धों को लड़ा और अपने देश से सहायता आने तक स्थिति को नियंत्रित किया। अंत में, ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने विकासमान पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और अधिकांश भारतीय राजाओं तथा सरदारों के सहयोग के कारण अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ।

क्रांति के परिणाम और प्रभाव (Results and Effects of Revolution)

यद्यपि 1857 की क्रांति का दमन कर दिया गया, फिर भी इसने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव को हिलाकर रख दिया। इस क्रांति को पूरी तरह विफल नहीं कहा सकता है क्योंकि इसने अंग्रेजों और भारतीयों, दोनों को प्रभावित किया। लार्ड क्रोमर ने कहा था: ‘‘काश कि अंग्रेजों की युवा पीढ़ी भारतीय विद्रोह के इतिहास को पढ़े, ध्यान दे, सीखे और इसका मनन करे। इसमें बहुत से पाठ और चेतावनियाँ निहित हैं।’’

प्रशासनिक परिवर्तन

1857 की क्रांति के बाद भारतीय प्रशासन का नियंत्रण कंपनी से छीनकर ब्रिटिश राजमुकुट को सौंप दिया गया और गवर्नर जनरल को ‘वायसराय’ कहा जाने लगा। 1857 के पश्चात् प्रादेशिक विस्तार के स्थान पर आर्थिक शोषण का युग आरंभ हुआ। प्रतिक्रियावादी और निहित स्वार्थों को न केवल सुरक्षित किया गया, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी किया गया। ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ाकर भारतीय सैनिकों की संख्या घटा दी गई और तोपखाने अंग्रेज सैनिकों के नियंत्रण में कर दिये गये। इस तरह, 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार देश की दशा को सुधारने के लिए विवश हो गई। इससे भी बढ़कर 1857 की असफलता ने परंपरावादी नेतृत्व के औचित्य को समाप्त कर भारत में राष्ट्रवाद एवं लोकतंत्र के आगमन के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया।

कंपनी के शासन का अंत

1857 की क्रांति का सारा उत्तरदायित्व कंपनी के मत्थे पर मढ़ दिया गया और उसके शासन का अंत हो गया। ब्रिटिश सरकार ने 1858 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा कंपनी के शासन व नियमों का अंतकर भारत का शासन ब्रिटिश राजमुकुट का सौंप दिया। किंतु कनिंघम के अनुसार यह परिवर्तन औपचारिक था, वास्तविक नहीं। इंग्लैंड में भारत का प्रशासन देखने के लिए भारत सचिव का एक पद बनाया गया और उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक मंत्रणा परिषद् (भारत परिषद्) का गठन किया गया जिसमें आठ सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होने थे और शेष सात संचालक मंडल द्वारा नियुक्त किये जाने थे। इस प्रकार पुराने संचालक ही भारत परिषद् में नियुक्त हो गये। इस घोषणा से दोहरी शासन प्रणाली समाप्त हो गई और ब्रिटिश सरकार ही सीधे भारतीय मामलों के लिए उत्तरदायी हो गई।

ब्रिटिश नीति में परिवर्तन

1857 के बाद महारानी विक्टोरिया ने भारतीय जनता के घावों पर मरहम लगाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण राजकीय घोषणा की, जिसने धार्मिक सहिष्णुता का वादा किया और भारत पर उसके स्थापित रीति-रिवाजों के अनुसार शासन का प्रस्ताव किया। महारानी की घोषणा के अनुसार क्षेत्रों के ‘सीमा-विस्तार’ की नीति त्याग दी गई और किसी भी देसी राज्य को अंग्रेजी राज्य में न मिलाये जाने का वादा किया गया। अंग्रेजी प्रजा की हत्या के दोषियों को छोड़कर शेष सभी को क्षमा कर दिया गया और स्थानीय राजाओं के ‘अधिकार, गौरव तथा सम्मान’ का अपने समान ही संरक्षण का विश्वास दिलाया गया।

भारतीय रियासतों ने सिपाही विद्रोह के तूफान को रोकने में ‘बाँध’ का काम किया था, इसलिए उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य की ‘सुरक्षा-प्राचीर’ के रूप में बनाये रखने के सिद्धांत को अंग्रेजी साम्राज्य का मूलतत्त्व मान लिया गया। क्रांति में भाग लेनेवाले तालुकेदारों को राजभक्ति का प्रण लेकर उन्हें उनकी जागीरों में पुनः स्थापित कर दिया गया अर्थात् जो लोग ‘अवध का नवाब’ कहलाने में गर्व का अनुभव करते थे, वही ब्रिटिश साम्राज्य के स्तंभ बन गये।

धार्मिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति का आरंभ

1858 की अपनी घोषणा में महारानी ने भारत में धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया और विश्वास दिलाया कि हमारी प्रजा किसी भी जाति अथवा धर्म की क्यों न हो, स्वतंत्र रूप से और बिना भेदभाव के उन कार्यों के लिए, जिनके लिए वह अपनी विद्या, योग्यता तथा ईमानदारी से करने के योग्य हो, हमारी सेवा तथा पदों पर नियुक्ति की जायेगी।’’ इस वादे को पूरा करने के लिए 1861 में एक भारतीय जानपद सेवा अधिनियम बनाया गया, जिसके अनुसार प्रत्येक वर्ष लंदन में एक प्रतियोगिता परीक्षा हुआ करेगी ताकि संश्रावित जानपद सेवा में भरती की जा सके।

भारतीय सेना का पुनर्गठन

1857 की क्रांति के लिए मुख्य रूप से भारतीय सेना ही उत्तरदायी थी। अंग्रेजों को लगा कि भविष्य में कभी भी भारतीय सेना उनका संगठित विरोध कर सकती है, इसलिए क्रांति के दमन के बाद भारतीय सेना का ‘विभाजन और प्रतिलोमन’ की नीति पर पुनर्गठन किया गया। सेना को लड़ाकू और गैर-लड़ाकू जातियों के आधार पर बाँट दिया गया और नये ढंग से पुनर्गठन कर ऐसी व्यवस्था की गई कि भविष्य में हिंदू और मुसलमान संगठित रूप से बगावत न कर सकें। जाति व प्रांत के अनुसार भी सेनाओं का पुनर्गठन किया गया ताकि कभी भी इनमें एकता न स्थापित हो सके। कंपनी की यूरोपीय सेना ‘संमिश्रण योजना’ के अनुसार सरकार को हस्तांतरित कर दी गई। सेना और तोपखाने के मुख्य पद केवल यूरोपियनों के लिए आरक्षित कर दिये गये। यूरोपीय सैनिकों की संख्या 40,000 से बढ़ाकर 65,000 कर दी गई और भारतीय सैनिकों की संख्या 2,38,000 से घटाकर 1,40,000 निश्चित कर दी गई। एक साधारण सूत्र (फार्मूला) बनाया गया कि बंगाल प्रेसीडेंसी में यूरोपीय और भारतीय सैनिकों का अनुपात 1:2 का होना चाहिए और मुंबई प्रेसीडेंसी में 1:3 का।

बाँटो और राज करो की नीति’ का आरंभ

इस क्रांति के दौरान उल्लेखनीय धार्मिक एकता देखने को मिली, क्योंकि सब इस बात पर सहमत थे कि हिंदुस्तान एक समान हिंदुओं और मुसलमानों का था। अंग्रेजों ने अनुभव किया कि इन दोनों में फूट डालकर ही भारत पर अंग्रेजी शासन को बनाये रखा जा सकता है। 1857 के बाद औपनिवेशिक शासन की नीतियों में नाटकीय बदलाव आया। अब अंग्रेजों ने ‘बाँटो और राज करो’ की नीति अपनाकर हिंदू व मुस्लिम दोनों संप्रदायों के लोगों को भड़काना शुरू कर दिये। उन्होंने जानबूझकर झूठ एवं भ्रम का सहारा लेकर भारतीय इतिहास को सांप्रदायिक रंगों में ढाला और भारतीय जनगण को बाँटने के लिए घातक सांप्रदायिकतावादी नीतियों को लागू किया, जिससे धीरे-धीरे हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे से दूर होते चले गये।

संवैधानिक विकास का सूत्रपात

इस महान् क्रांति के बाद ही देश में संवैधानिक विकास का सूत्रपात हुआ और धीरे-धीरे भारतीयों को शासन में भाग लेने का अधिकार दिया जाने लगा। इस तथ्य को आधिकारिक रूप से महसूस किया गया कि विद्रोह का एक आधारभूत कारण शासितों और शासकों के बीच संवादहीनता थी, इसलिए 1860 में सर बार्टल फ्रेअर ने अपनी प्रसिद्ध टिप्पणी में विधान परिषदों में ‘स्थानीय तत्त्वों’ को सम्मिलित करने का आग्रह किया। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए 1861 में ‘भारतीय परिषद् अधिनियम’ पारित किया गया और यह विश्वास किया गया कि भारतीयों को विधान कार्य में सहकारी बनाकर ब्रिटिश सरकार भारतीयों की भावनाओं से परिचित हो सकेगी, जिससे भारतीय असंतोष को दूर करने का अवसर मिल सकेगा।

भारतीयों के प्रति प्रतिशोधपूर्ण नीति

1857 की क्रांति के भावनात्मक परिणाम सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण थे। साम्राज्यवाद के प्रतिनिधियों ने समस्त भारतीयों को अविश्वसनीय ठहराया और उन्हें अपमान, तिरस्कार और निंदनीय व्यवहार का भागी बना दिया। भारत में अंग्रेजों ने एक स्वामी जाति की परंपरा बना दी और नवीन साम्राज्यवाद का औचित्य ‘बर्बर तथा असभ्य भारतीयों को सभ्य बनाने के श्वेत व्यक्ति का बोझ’ के माध्यम से सिद्ध किया। 1857 का सिपाही विद्रोह अंग्रेजों के लिए भूत की भांति भय और आशंका का प्रतीक बन गया। इससे अग्रेजों ने भारत में बसने के विचार का परित्याग कर दिया और वे अफ्रीका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपना स्थायी निवास बनाने लगे।

नवयुग का बीज-वपन

1857 के सिपाही क्रांति ने एक युग का अंत कर दिया और एक नये युग का बीज-वपन किया। इससे न केवल ईस्ट इंडिया कंपनी खत्म हो गई, बल्कि मुगल साम्राज्य भी अतीत की वस्तु बन गया। भारत का ईसाईकरण करने और भारत को एक ईसाई देश बनाने का अंग्रेजों का सपना भी चकनाचूर हो गया। अंग्रेजों और भारतीयों, दोनों जातियों के बीच खाई चैड़ी होती चली गई और जातीय अलगाव और मजबूत हो गया। आत्मविश्वास से भरे विक्टोरियाई उदारवाद को अब स्पष्ट तौर पर धक्का लगा, क्योंकि बहुत से अंग्रेज यह मानने लगे कि भारतीयों का सुधार संभव ही नहीं है। इस नई मनोदशा को उदारवाद का रूढि़वादी रूप कहा गया है, जो रूढि़वादी और कुलीन वर्गों के ठोस समर्थन पर और भारतीय समाज के परंपरागत ढाँचे में पूर्ण ‘अहस्तक्षेप के सिद्धांत’ पर आधारित था। इस रूढि़वादी प्रतिक्रिया ने साम्राज्य को और निरंकुश बनाया और सत्ता में भागीदारी के लिए पढ़े-लिखे भारतीयों की आकांक्षा को ठुकराया। इससे न केवल साम्राज्य में अस्थिरता आई, बल्कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम भाग में शिक्षित मध्य वर्गों की इसी कुंठा से आधुनिक राष्ट्रवाद का जन्म हुआ।

राष्ट्रवाद के बीज का अंकुरण

The Nature, Failure and Consequences of the Revolution of 1857
1857 की क्रांति के महान् क्रांतिकारी

1857 की क्रांति की असफलता से ही भावी राष्ट्रवाद के बीज अंकुरित हुए। कंपनी बहादुर के क्रूर दमन-चक्र से ब्रिटिश-विरोधी भावनाएँ कुचल तो दी गईं, किंतु समाप्त नहीं की जा सकीं। क्रांति के नेताओं के दुःखद अंत ने अनेक कवियों, नाटककारों, कहानीकारों तथा लेखकों को 1857 के क्रांतिकारियों को शहीद के रूप में चित्रित करने के लिए प्रेरित किया, जिससे नवयुवकों, देशभक्तों एवं राष्ट्रवादियों को प्रेरणा मिली। चाहे कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसीवाली रानी थी’ हो या दिनकर की रचना ‘कलम आज उनकी जय बोल’, भोजपुरी कवि चंद्रशेखर मिश्र का महाकाव्य ‘कुँवरसिंह’ हो या रमाशंकर सक्सेनाकृत खंडकाव्य ‘मंगल पांडे’ वृंदावनलाल वर्मा का उपन्यास ‘झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई’ हो या रामगढ़ की रानी अवंतीबाई पर केंद्रित औपन्यासिक कृति ‘रामगढ़ की रानी’, इन सभी रचनाओं ने भारतीय युवकों और देशप्रेमियों में एक नई शक्ति और नई प्रेरणा का संचार किया।