स्पेन का उत्थान: चार्ल्स पंचम और फिलिप द्वितीय (The rise of Spain: Charles V and Philip II)

पिरेनीज पहाड़ के दक्षिण में भूमध्य सागर, अटलांटिक सागर और पुर्तगाल से घिरा पठारी इलाका स्पेन है। पंद्रहवीं शताब्दी से पूर्व स्पेन में राजनीतिक एकता नहीं थी और वह कई क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित था। आठवीं शताब्दी में उत्तरी अफ्रीका में रहनेवाले मूर मुसलमानों ने स्पेन पर अधिकार कर या था और वहाँ के निवासियों को, जो ईसाई थे, पहाड़ों में षरण लेने के लिए विवश कर दिया था। किंतु कालांतर में स्पेन के सैनिकों ने मुसलमानों के सदियों पुराने प्रभाव का अंत कर दिया और ईसाई प्रभाव की पुर्नस्थापना की।

स्पेन में शक्तिशाली निरंकुश राजतंत्र के उदय के अनेक कारण थे। प्रथम, कैस्टील की ईसाबेला और आरागान के फर्डिनेंड के विवाह से स्पेन में संयुक्त राजतंत्र स्थापित हो गया था। दूसरे, स्पेन के राजाओं की औपनिवेशिक विस्तार की नीति के कारण अमेरिका की खोज, वेस्टइंडीज, मैक्सिको और पेरू की विजय से स्पेन को काफी लाभ प्राप्त हुआ था। अमेरिका के रूप में स्पेन को एक ऐसा कल्पवृक्ष मिल गया था, जहाँ से प्रचुर मात्रा में सोना, चाँदी, मूल्यवान वस्तुएँ आदि मिलती रहती थीं। तीसरे, यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए फर्डिनेंड ने अपनी द्वतीय पुत्री मेरिया का विवाह पुर्तगाल के शासक इमैनुअल प्रथम से एवं अपनी कनिष्ठ पुत्री कैथरीन का विवाह इंग्लैंड के युवराज आर्थर से एवं आर्थर की मृत्यु के बाद हेनरी अष्टम् (1509-47 ई.) से किया था। वैवाहिक संबंधों की यह नीति स्पेन को अंर्तराष्ट्रीय जगत में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करने के लिए पर्याप्त थी।

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फर्डिनेंड की सबसे बड़ी पुत्री जोआना कैस्टील और आरागान की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारिणी थी। उसका विवाह हैप्सबर्ग के राजकुमार फिलिप प्रथम से हुआ था। फिलिप का पिता आस्ट्रिया का आर्चड्यूक मैक्सीमिलियन प्रथम था। उसकी माता वर्गंडी की मेरी थी, जो नीदरलैंड की उत्तराधिकारणी थी। 1482 ई. में फिलिप नीदरलैंड का उत्तराधिकारी बना। 1500 ई. में फिलिप और जोआना के एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम चार्ल्स रखा गया। 1504 ई. में ईसाबेला की मृत्यु के उपरांत जोआना अपने पिता फर्डिनेंड के साथ स्पेन की संयुक्त शासिका बनी, किंतु वह राजकाज में रुचि नहीं लेती थी। अतः उसका पति फिलिप प्रथम कैस्टील और नीदरलैंड पर शासन करने लगा।

चार्ल्स पंचम का स्पेन के शासक के रूप में राज्यारोहण यूरोप के इतिहास में एक युगांतकारी घटना थी। फिलिप की मृत्यु के बाद पश्चात् 1506 ई. में छः वर्ष का चार्ल्स नीदरलैंड का शासक बना। उसकी माँ जोआना का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था, इसलिए इतिहास में वह ‘जोआना पागल’ के नाम से प्रसिद्ध है। जोआना की विक्षिप्तावस्था के कारण चार्ल्स कैस्टील का भी शासक बन गया। 16 वर्ष की उम्र में 1516 ई. चार्ल्स के नाना फर्डिनेंड की भी मृत्यु हो गई, जिसके कारण वह स्पेन, नेपल्स, सिसली, अफ्रीका तथा अमरीकी उपनिवेशों का प्रशासक बन गया। 1519 ई. में दादा मैक्सीमिलियन की मृत्यु के उपरांत वह आस्ट्रियन साम्राज्य (आस्ट्रिया, बोहेमिया, हंगरी, कार्निओला, कैरेंथिया, एस्टोरिया एवं टाईरन) का भी स्वामी हो गया। किंतु उसने आस्ट्रियन साम्राज्य के प्रदेशों का शासन अपने भाई फर्डिनेंड को सौंप दिया।

सम्राट चार्ल्स पंचम, 1520-1556 ई.

(Emperor Charles V, 1520–1556 AD)

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चार्ल्स अपने दादा मैक्सीमिलियन की भाँति पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट बनना चाहता था। फ्रांस का राजा फ्रांसिस प्रथम (1515-1547 ई.) भी कुछ इसी तरह का स्वप्न देख रहा था। उसका विचार था कि चार्ल्स पहले से ही स्पेन, इटली और नीदरलैंड का स्वामी था। अतः पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट निर्वाचित होने पर वह शक्ति संतुलन को बिगाड़ देगा और फ्रांस की स्वतंत्रता को खतरा उत्पन्न हो जायेगा। इंग्लैंड का राजा हेनरी अष्टम् भी पवित्र रोमन सम्राट बनने की महात्वाकांक्षा पाले हुआ था। किंतु चार्ल्स 1520 ई. में अपने प्रतिद्वंद्वियों-फ्रांसिस और हेनरी को पछाड़कर पवित्र रोमन सम्राट के चुनाव में विजयी हो गया और एला शैपल में उसका राज्याभिषेक हुआ। इस प्रकार चार्ल्स, जो सम्राट चार्ल्स पंचम के नाम से सिंहासनारूढ़ हुआ, यूरोपीय इतिहास का सर्वाधिक भाग्यशाली और शक्तिशाली शासक सिद्ध हुआ, जिसे उत्तराधिकार में एक विशाल साम्राज्य मिला था।

चार्ल्स पंचम की समस्याएँ

(Charles V’s Problems)

चार्ल्स पंचम को उत्तराधिकार के रूप में एक विस्तृत साम्राज्य तो मिल गया था, किंतु यह साम्राज्य काँटों की सेज था। चार्ल्स पंचम का विशाल साम्राज्य ही उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती सिद्ध हुआ। वास्तव में चार्ल्स पंचम का साम्राज्य एक राजवंशीय साम्राज्य था जो अनेक राज्यों व प्रदेशों का असंबद्ध समूह था। प्रत्येक प्रांत की अलग एवं स्वतंत्र शासन-व्यवस्था थी। यद्यपि जर्मनी में नाममात्र की केंद्रीय व्यवस्था थी, परंतु स्पेन, नीदरलैंड एवं इटालियन राज्यों में तो यह नाममात्र के लिए भी नहीं थी। चार्ल्स का सबसे संपन्न प्रदेश नीदरलैंड था, जिसके सभी 17 प्रांतों का अपना अलग-अलग अस्तित्व था। स्पेनी साम्राज्य में भी विभिन्न प्रांतों की अलग-अलग शासन-व्यवस्था थी। ग्रेनाडा, अमेरिका के उपनिवेश तथा उत्तरी अफ्रीका के कुछ प्रदेश भी स्पेनी साम्राज्य में सम्मिलित थे। सम्राट को पवित्र रोमन साम्राज्य की ओर भी ध्यान देना था। वहाँ उसे अपना समय, ध्यान और धन सब लगाना पड़ता था, किंतु इसके बदले में उसे कुछ नहीं मिलता था। चार्ल्स को अपने राजवंशीय साम्राज्य के विभिन्न प्रदेशों के वित्तीय, न्यायिक एवं धार्मिक मामलों को भी निपटाना पड़ता था और विभिन्न विरोधी हितों में सामंजस्य बिठाना था। इसके अलावा चार्ल्स को जर्मनी में तेजी से फैल रहे प्रोटेस्टेंटवादी धर्म-सुधार आंदोलन से भी निपटना था।

चार्ल्स पंचम की उपलब्धियाँ

(Achievements of Charles V)

स्पेन का शासन

1516 ई. में फर्डिनेंड की मृत्यु के बाद स्पेनिश साम्राज्य के सम्राट के रूप में चार्ल्स पंचम सिंहासनारूढ़ हुआ था। यहाँ उसने पूर्ण निरंकुशता से शासन किया। आरागान एवं कैस्टील की संसदों ने चार्ल्स के निरंकुश अधिकारों को प्रतिबंधित करने का असफल प्रयत्न किया। चार्ल्स की निरंकुशता स्पेन के सामंतों एवं नगर प्रतिनिधियों को अखरती थी। इसलिए 1520 ई. से 1522 ई. तक स्पेन में भयंकर विद्रोह हुए, किंतु चार्ल्स पंचम ने सामंतों एवं नगर प्रतिनिधियों के पारस्परिक संघर्ष का लाभ उठाकर इन विद्रोहों को कुचलने में सफलता प्राप्त कर ली। जब सामंत वर्ग ने नगर प्रतिनिधियों के विरुद्ध निरंकुश प्रशासन का समर्थन करना आरंभ कर दिया, तो उसका लाभ उठाकर चार्ल्स पंचम ने नगर-प्रतिनिधियों के अधिकारों को सीमित कर दिया। अब नगर प्रशासन के लिए एक राजकीय पदाधिकारी की नियुक्ति की गई। चार्ल्स ने ससंद की वास्तविक शक्ति को छीनकर उसे राज्याश्रित संस्था बना दिया। चार्ल्स ने अपने निरंकुश शासन को बनाये रखने के स्पेनवासियों को तुष्ट करने का प्रयास किया और 1523 ई. तक अधिकांश सरकारी पदों पर स्पेनवासियों की नियुक्ति की। यही नहीं, उसने 1526 ई. में पुर्तगाल की राजकुमारी ईसाबेला से विवाह भी किया।

चार्ल्स पंचम ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में स्पेन के गौरव को स्थापित करने के लिए साम्राज्यवादी नीतियों का सहारा लिया। इस क्रम में उसने अमरीकी गोलार्द्ध के मैक्सिको, मध्य अमरीका, पेरू, बोलिविया चिली, न्यू ग्रानाडा एवं वेनेजुएला में स्पेनी उपनिवेश बसाने में सफलता प्राप्त की।

इस प्रकार चार्ल्स स्पेन में निरंकुश प्रशासन सुप्रतिष्ठित करने में सफल तो रहा, किंतु संसद की शक्ति सीमित हो जाने से स्पेन का वैधानिक विकास रुक-सा गया। उसकी साम्राज्यवादी नीति का स्पेन के राजकोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और स्पेनी राजकोष पर लगभग दो करोड़ पौंड का ऋण हो गया। चार्ल्स की मूर-विरोधी नीति के कारण उद्योगशील मूर जाति ने स्पेन छोड़ दिया, जो स्पेन के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए विनाशकारी साबित हुआ। स्पेन का औपनिवेशिक विस्तार भी उसके राष्ट्रीय विकास के लिए घातक साबित हुआ। अमरीका के प्रदेशों से आनेवाले धन ने स्पेनी जनता को विलासी और निकम्मा बना दिया, जिससे न केवल स्पेन का नैतिक पतन हुआ, बल्कि स्पेनी जनता अकर्मण्य भी हो गई।

नीदरलैंड्स का शासन

चार्ल्स पंचम का जन्म एवं पालन-पोषण नीदरलैंड्स में ही हुआ था, इसलिए वहाँ की जनता में चार्ल्स के लिए स्वभावतः श्रद्धा एवं सम्मान था। नीदरलैंड्स की जनता की भावनाओं का पूर्ण लाभ उठाते हुए चार्ल्स ने वहाँ सफलतापूर्वक शासन किया। उसने नीदरलैंड्स के 17 प्रदेशों को मिलाकर एक संघ की स्थापना की और अहस्तक्षेप की नीति अपनाते हुए संघ की सहायता के लिए एक स्टेट्स जनरल (संसद) और तीन कौंसिलों की स्थापना की। इससे नीदरलैंड्स की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई, किंतु साम्राज्यवादी नीति के कारण वहाँ अधिक कर लगाये गये।

किंतु चार्ल्स पंचम ने नीदरलैंड्स में धार्मिक असहिष्णुता की नीति अपनाई। कट्टर कैथोलिक होने के कारण उसने नीदरलैंड्स में काल्विनवादियों का दमन किया। इसके लिए नीदरलैंड्स के प्रायः सभी प्रांतों में इन्क्वीजीशन यानी धार्मिक न्यायालय स्थापित किये गये। चार्ल्स की इस असहिष्णुता की नीति के बावजूद नीदरलैंड में प्रोटेस्टेंट संप्रदाय का विकास होता रहा। चार्ल्स पंचम की इस प्रतिक्रियावादी नीति ने वहाँ फिलिप द्वितीय के काल में एक प्रोटेस्टेंट डच गणतंत्र की स्थापना का द्वार खोल दिया। इस प्रकार नीदरलैंड में चार्ल्स का प्र्रशासन असफल कहा जा सकता है।

पवित्र रोमन साम्राज्य का शासन

चार्ल्स फ्रांस के शासक फ्रांसिस प्रथम और इंग्लैंड के शासक हेनरी अष्टम् को चुनाव में पराजितकर 1520 ई. में पवित्र रोमन सम्राट चुना गया था। किंतु जर्मन साम्राज्य (पवित्र रोमन साम्राज्य) चार्ल्स के लिए बड़ी चुनौती सिद्ध हुआ। पूरा जर्मन साम्राज्य अनेक अर्धस्वतंत्र छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। जर्मनी में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार हो रहा था और जर्मनवासी अपनी भाषा, परंपरा व राष्ट्रीयता पर गर्व करने लगे थे। वे अपनी राजनीतिक संस्थाओं की असामयिकता से परिचित थे और इनमें सुधार चाहते थे। अनेक जर्मन पवित्र रोमन साम्राज्य से घृणा करते थे, किंतु जर्मन राजकुमारों में एकता नहीं थी। वे एक संयुक्त जर्मनी की अपेक्षा अपने-अपने स्वतंत्र राज्यों में रहना अधिक पसंद करते थे। जब चार्ल्स ने जर्मन राज्यों के एकीकरण का प्रयास किया, तो उसका विरोध किया गया। जर्मन राजकुमार अपने को संप्रभु समझते थे। उन्हें चार्ल्स का शासन और नियंत्रण पसंद नहीं था।

चार्ल्स पंचम पवित्र रोमन साम्राज्य को एक केंद्रीय शासन के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए जर्मनी को आर्थिक दृष्टि से एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। 1521 ई. में वक्र्स की विधानसभा ने प्रतिशासन परिषद की स्थापना की। इसमें जर्मनी द्वारा मनोनीत तेईस सदस्य उसके हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। वे जर्मन-भाषी लोगों की राजनीतिक एकता चाहते थे, किंतु इसके पहले वे सीमा शुल्क संघ की स्थापना करना चाहते थे। जर्मन व्यापारियों ने सीमा शुल्क संघ का विरोध किया, क्योंकि वे इसका बोझ उठाने को तैयार नहीं थे। चार्ल्स पंचम भी फ्रांस के साथ युद्ध में फँसा हुआ था, इसलिए सीमा शुल्क संघ योजना त्याग दी गई।

इसी समय जर्मनी में प्रोटेस्टेंटवाद सर उठाने लगा था। सामंती सरदारों ने धर्म-सुधार आंदोलन का लाभ उठाकर अपने अधिकारों में वृद्धि करने का प्रयास किया। 1520 ई. में सामंतों को लगा कि मार्टिन लूथर और पोप से संबंध-विच्छेद के फलस्वरूप जर्मनी और इटली अलग-अलग हो जायेंगे तथा जर्मनी में धर्म के आधार एक राष्ट्रीय राज्य की स्थापना हो जायेगी। फलतः सामंत लूथर की सहायता करने लगे। सम्राट चार्ल्स पंचम कैथोलिक धर्म और पोप की प्रतिष्ठा को यथावत् बनाये रखना चाहता था। इसलिए सम्राट ने धर्म-सुधार आंदोलन का विरोध किया। इससे जर्मन सामंत सम्राट् के विरोधी हो गये और जर्मनी गृह युद्ध की विभीषिका में जलने लगा। चार्ल्स पंचम न तो जर्मनी में राष्ट्रीय एकता स्थापित कर सका और न ही प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के विकास को रोक पाया। अंततः 1555 ई. में आग्सबर्ग संधि द्वारा लूथरवाद को मान्यता देनी पड़ी।

इस प्रकार चार्ल्स पंचम ने अपने धैर्य, दृढ़ता और स्वाभाविक गुणों के बल पर अपने विशाल साम्राज्य में एकता स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहा। चार्ल्स पंचम की असफलता का कारण उसकी अयोग्यता नहीं थी, बल्कि उसके विशाल साम्राज्य में निहित अनेक प्रांतों व जातियों के परस्पर-विरोधी हितों की प्रधानता थी।

चार्ल्स पंचम की विदेश नीति

(Charles V’s Foreign Policy)

आंतरिक कठिनाइयों की भाँति चार्ल्स को वैदेशिक मामलों में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उसका विशाल साम्राज्य यूरोपीय शासकों की आँख में खटकता था। फ्रांस का शासक फ्रांसिस उसका प्रबल प्रतिद्वंद्वी था। उस्मान तुर्कों का पूर्वी यूरोप में डैन्यूब नदी तक प्रसार तथा भूमध्य सागर में मुसलमानों का बढ़ता प्रभाव चार्ल्स के लिए चुनौती थे। इसके अलावा रोम के पोप और इंग्लैंड के हेनरी अष्टम् की विद्वेषपूर्ण नीतियाँ भी उसके लिए परेशानी का करण थीं। इस प्रकार चार्ल्स पंचम को यूरोपीय शक्तियों से न केवल अपने साम्राज्य की रक्षा करना था, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हैप्सबर्ग राजवंष की प्रतिष्ठा को भी बनाये रखने की चुनौती थी।

चार्ल्स पंचम का फ्रांस से संबंध

यद्यपि चार्ल्स पंचम फ्रांस से मधुर संबंध बनाने का पक्षधर था, किंतु कई कारणों से उसे फ्रांस से युद्ध करना पड़ा। एक, पवित्र रोमन सम्राट के चुनाव में फ्रांसिस को पराजितकर चार्ल्स विजयी हुआ था। फ्रांसिस युद्ध द्वारा इस पराजय का बदला लेना चाहता था। दूसरा, फ्रांस चारों ओर से हैप्सबर्ग प्रदेशों से घिरा हुआ था, ऐसी स्थिति में फ्रांसिस और चार्ल्स के बीच भी संघर्ष अवश्यसंभावी था। तीसरे, फ्रांसिस नेपल्स और सिसली पर अपना दावा प्रस्तुत करता था। चौथे, चार्ल्स मिलान को प्राप्त करना चाहता था, जिस पर फ्रांसिस ने अधिकार कर लिया था। पाँचवें, फ्रांसिस प्रथम ने नावारे के दक्षिणी प्रांतों पर भी अपना दावा प्रस्तुत किया, जिसे स्पेन में सम्मिलित कर लिया गया था। इसके अलावा, फ्रांसिस नीदरलैंड्स के संपन्न प्रांतों में भी अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था, जिसे रोकने के लिए चार्ल्स कृत-संकल्प था। इन कारणों से 1522 ई. में फ्रांस और स्पेन के बीच युद्ध शुरू हो गया।

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1522 ई. में जब फ्रांस और हैप्सबर्ग साम्राज्य के बीच युद्ध आरंभ हुआ तो चार्ल्स ने हेनरी अष्टम् व रोम की सहायता प्राप्त कर फ्रांसीसियों को उत्तर इटली से खदेड़ दिया और मिलान के सिंहासन पर स्फोरजा परिवार को प्रतिष्ठित किया। फरवरी, 1525 ई. में पैविया के घेरे में चार्ल्स ने फ्रांस की सेना को बुरी तरह पराजित किया। आठ हजार फ्रांसीसी सैनिक युद्धभूमि में ही मारे गये। अंततः फ्रांसिस बंदी बना लिया गया। लेकिन वर्गंडी, नीदरलैंड और इटली के प्रदेशों पर से अपने दावे को छोड़ने और सम्राट चार्ल्स पंचम की बहन के साथ शादी करने की शर्त पर फ्रांसिस को छोड़ दिया गया।

फ्रांस लौटते ही फ्रांसिस ने स्पेन के साथ की गई संधि को अमान्य घोषित कर दिया तथा इटली के राज्यों से गठबंधन करना शुरू कर दिया। इस समय तक रोम, वेनिस, फ्लोरेंस तथा मिलान पर स्पेनी ध्वज लहरा रहा था जो फ्रांसिस के लिए असहनीय था। 1527 ई. में फ्रांसिस ने रोम पर आक्रमण किया जिसमें उसे इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम् से भी सहायता मिली। किंतु विवश होकर फ्रांसिस को 1529 ई. में कैम्ब्रे की संधि स्वीकार करनी पड़ी और नेपल्स, मिलान और नीदरलैंड्स के प्रदेशों पर से अपने दावे छोड़ने पड़े। फ्रांसिस प्रथम को चार्ल्स पंचम की बहिन ‘एलेनार’ के साथ विवाह करना भी स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार कैम्ब्रे की संधि से चार्ल्स की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। 1530 ई. में पोप ने स्वयं चार्ल्स को पवित्र रोमन साम्राज्य का मुकुट पहनाया। यह रोम के पोप द्वारा पवित्र रोमन सम्राट का अंतिम राज्याभिषेक था।

किंतु कैम्ब्रे-संधि की शांति भी क्षणिक साबित हुई। फ्रांसिस प्रथम ने इटली पर अधिकार करने की नीयत से पुनः युद्ध शुरू कर दिया। उसने फ्लोरेंस की राजकुमारी मेरी डि मेडिसी से अपने पुत्र हेनरी का विवाह किया। मिलान को लेकर चार्ल्स और फ्रांसिस के बीच 1536 ई. में युद्ध शुरू हुआ जो 1538 ई. में नीस की संधि से कुछ समय के लिए रुक गया। किंतु 1542 ई. में पुनः युद्ध आरंभ हो गया। फ्रांसिस की मृत्यु के बाद उसके पुत्र हेनरी द्वितीय (1547-1559 ई.) के शासनकाल में भी युद्ध जारी रहा। चार्ल्स के सिंहासन-त्याग के पश्चात् फिलिप द्वितीय के काल में 1559 ई. की कोटियो कैम्ब्रिसिस संधि द्वारा ही इस युद्ध का अंत हुआ। इस संधि द्वारा फ्रांस ने इटली के राज्यों पर से अपने दावे को छोड़ दिया, जिससे हैप्सबर्ग वंश का प्रभाव इटली में स्थापित हो गया। फ्रांस को मेज, टूल व वर्दू नामक प्रदेश मिले और उसे राइन नदी की ओर सीमा-विस्तार की छूट दे दी गई

चार्ल्स पंचम और तुर्क

चार्ल्स पंचम के फ्रांस के साथ युद्धों में उलझे रहने का लाभ उठाकर तुर्कों ने अपने सुल्तान सुलेमान द्वितीय (1520-1566 ई.) के नेतृत्व में 1541 ई. में हंगरी पर अधिकार कर लिया। इसका कारण यह था कि हंगरी के राजा ने सुलेमान को तुर्की की गद्दी पर बैठने पर बधाई संदेष नहीं भेजा था। 1547 ई में चार्ल्स पंचम और उसके भाई फर्डिनेंड को मजबूर होकर हंगरी में तुर्की विजय को स्वीकृति देनी पड़ी। फर्डिनेंड ने यह स्वीकार किया कि वह सुल्तान को प्रतिवर्ष 30,000 ड्यूकेट वार्षिक कर के रूप में देगा।

इसी समय ट्यूनिस एवं अलजीयर्स तुर्की सरदार बारबरोसा के अधिकार में आ गये। फ्रांस की सहायता पाकर तुर्क भूमध्य सागर में जम गये जिससे इटली और स्पेन की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया। बारबरोसा ने स्पेन से भागे मूरों के समर्थन से भूमध्य सागर के यूरोपीय तटीय प्रदेशों में लूटमार आरंभ कर दिया। सम्राट चार्ल्स पंचम ने बारबरोसा का दमन करने के लिए तीन सौ जहाजों का एक जहाजी बेड़ा और 30,000 सैनिक भेजे। 1535 ई. में चार्ल्स ने ट्यूनिस पर अधिकार कर लिया और विद्रोही लुटेरों को सदा के लिए समाप्त कर दिया।

स्पेन और इंग्लैंड

आरंभ में इंग्लैंड और स्पेन के संबंध बहुत मुधुर थे क्योंकि फर्डिनेंड और ईसाबेला की पुत्री कैथरीन इंग्लैंड के राजकुमार आर्थर से ब्याही गई थी और आर्थर की मृत्यु के बाद उसका विवाह इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम् (1509-1547 ई.) से हो गया था। इस प्रकार कैथरीन चार्ल्स पंचम की मौसी थी। टामस वूल्जे हेनरी का विदेशमंत्री तथा रोमन चर्च का बिशप था। वह बहुत महत्वाकांक्षी था और पोप बनना चाहता था। उसने सम्राट चार्ल्स पंचम और फ्रांसिस प्रथम के बीच संघर्ष का लाभ उठाकर यूरोपीय राजनीति में इंग्लैंड के गौरव में वृद्धि की। आरंभ में वूल्जे फ्रांसिस की अपेक्षा चार्ल्स पंचम की ओर अधिक झुका हुआ था, किंतु जब चार्ल्स ने 1527 ई. में रोम पर आक्रमण किया तो स्थिति बदल गई और इंग्लैंड ने फ्रांस के फ्रांसिस की सहायता के लिए अपनी सेना भेज दी।

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वास्तव में इस स्थिति-परिवर्तन का कारण हेनरी अष्टम् के तलाक का प्रश्न था। हेनरी अष्टम् कैथरीन को तलाक देना चाहता था, जो चार्ल्स की मौसी थी। हेनरी ने पोप से कैथरीन को तलाक देने की अनुमति माँगी, लेकिन रोम के पोप ने चार्ल्स से भयभीत होकर अनुमति नहीं दी। अंततः हेनरी ने अपने सभी संबंधों को दरकिनार करते हुए न केवल फ्रांस की सहायता की, बल्कि रोम के पोप और चार्ल्स की परवाह न करते हुए कैथरीन को तलाक देकर अपनी प्रेमिका एन बोलेन से विवाह कर लिया।

1553 ई. में मेरी ट्यूडर इंग्लैंड की गद्दी पर बैठी। इस समय इंग्लैंड और स्पेन के बीच मधुर संबंध कायम हो गये। चार्ल्स पंचम ने अपने पुत्र फिलिप द्वितीय का विवाह मेरी ट्यूडर से कर दिया। स्पेन और इंग्लैंड का यह संबंध तब तक बना रहा जब तक कि एलिजाबेथ ट्यूडर के राज्यारोहण के साथ इंग्लैंड की विदेश नीति में परिवर्तन नहीं आया।

इस प्रकार चार्ल्स पंचम आजीवन संघर्श करता रहा। अंततः थक-हार कर उसने अपने विस्तृत साम्राज्य को दो भागों में विभक्त कर स्पेनी साम्राज्य एवं अमरीकी उपनिवेशों का उत्तराधिकार अपने पुत्र फिलिप को सौंप दिया। पवित्र रोमन साम्राज्य एवं हैप्सबर्ग के पैतृक राज्यों का उत्तराधिकार अपने छोटे भाई फर्डिनेंड को सौंपकर चार्ल्स स्वयं स्पेन के एक मठ में तपस्या करने लगा, जहाँ 1558 ई में उसकी मृत्यु हो गई।

चार्ल्स पंचम का मूल्यांकन

चार्ल्स स्पेन का एक महान राजा था। वह एक कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, नेक एवं यशस्वी सम्राट था। एक कैथोलिक के रूप में उसने कैथोलिक संप्रदाय और पोप की अमूल्य सेवा और सुरक्षा की। वह एक मानववादी शासक भी था। वह पुनर्जागरणकालीन कला, चित्रकला एवं संगीत का पोषक था। वह वैज्ञानिक विकास में भी अभिरुचि रखता था और ज्योतिषशास्त्र में उसकी बहुत दिलचस्पी थी। उसने अपनी आर्थिक नीतियों द्वारा जर्मनी व नीदरलैंड्स में पूँजीवाद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह अपनी पूरी सामथ्र्य के अनुसार जीवनभर समस्याओं से जूझता रहा और जब थक गया तो उसने स्वेच्छा से अपने पद का त्याग कर दिया। इस प्रकार चार्ल्स पंचम के अंत से स्पेनी इतिहास के एक गौरवषाली युग का अंत हो गया।

फिलिप द्वितीय, 1556-1598 ई.

(Philip II, 1556-1598 AD)

फिलिप द्वितीय चार्ल्स पंचम का पुत्र था। उसका जन्म 1527 ई. में हुआ था। उसे अपने पिता चार्ल्स पंचम से उत्तराधिकार में स्पेन, नीदरलैंड्स, फ्रैंच, कामटे, मिलान, सिसली, नेपल्स, अमरीका, पश्चिमी द्वीप समूह एवं फिलिपीन के स्पेनी द्वीपसमूह प्राप्त हुए थे। फिलिप द्वितीय स्पेन में पैदा हुआ था और आजीवन वहीं रहा। वह स्पेन को यूरोपीय जगत का सर्वाधिक शक्ति-संपन्न राज्य बनाना चाहता था। उसने आस्ट्रियन साम्राज्य के स्वामी फर्डीनेंड से पारिवारिक संबंधों को और सुदृढ़ता करने के लिए फर्डिनेंड के साथ अपनी बहिन का और फर्डिनेंड की पोती से अपने पुत्र का विवाह किया।

1556 ई. में विशाल साम्राज्य का स्वामी बनने के पश्चात् फिलिप द्वितीय ने शासन संचालन के लिए प्रमुख रूप से दो आदर्शों का अवलंबन किया। प्रथम तो राष्ट्र प्रेम और द्वितीय धर्म प्रेम। उसके राष्ट्र प्रेम का आशय स्पेन के प्रति देशभक्ति एवं धर्म प्रेम से आशय कैथोलिक संप्रदाय के प्रति पूर्ण निष्ठा से था। वह स्पेन को विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र बनाना चाहता था, लेकिन धर्म की वेदी पर राजनीति का परित्याग करने के लिए भी कटिबद्ध था। हेज के शब्दों में, ‘यदि कभी स्पेन के विकास एवं चर्च के बीच प्रश्न उठ खड़ा होता तो प्रथम को द्वितीय के लिए बलिदान करना पड़ता था।’ इस प्रकार यदि यह कहा जाए कि फिलिप के राजनीति का स्वरूप राष्ट्रीय था, किंतु उसकी धार्मिक नीति का स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय था, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

फिलिप द्वितीय की गृह नीति (Philip II’s Home Policy)

फिलिप द्वितीय को विरासत में अनेक राज्य प्राप्त हुए थे जिनकी अपनी-अपनी संस्थाएँ और प्रथाएँ थीं। उसके राष्ट्र प्रेम और धार्मिक नीति ने उसकी समस्याओं को और अधिक जटिल बना दिया। अपने शासनकाल में फिलिप को तीन महत्वपूर्ण आंतरिक समस्याओं से जूझना पड़ा- पहली स्पेन की जर्जर आर्थिक स्थिति, दूसरी मूरों का विद्रोह और तीसरी नीदरलैंड्स का भयंकर विद्रोह।

आंतरिक प्रशासन

फिलिप द्वितीय ने अपने राष्ट्रप्रेम एवं धर्म प्रेम संबंधी नीति को आधार बनाकर सामने आनेवाली समस्याओं का निराकरण करने का प्रयास किया। सबसे पहले उसने स्पेन के राष्ट्रीय एकीकरण के लिए प्रशासकीय एकता पर बल दिया। राजकीय शक्ति में वृद्धि करने के लिए फिलिप ने उसने स्पेनिश सामंतीय सभा, जिसे कार्टेज कहा जाता था, की उपेक्षा की। उसने पहले से लगे करों को बिना कार्टेज की सलाह लिये वसूल किया, नये करों को लागू करने के संबंध में संसद की सलाह अवश्य ली गई। अब स्पेनी संसद के सदस्यों का मनोनयन स्वयं फिलिप द्वितीय द्वारा किया जाने लगा और सामंतों को अधिकारविहीन कर दिया गया। इस प्रकार फिलिप द्वितीय ने निरंकुश शासन स्थापित किया।

फिलिप द्वितीय ने स्थल सेना के गठन पर विशेष बल दिया, किंतु उसने नौसेना की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। इसलिए उसकी नौ-सैनिक शक्ति में दिन-प्रतिदिन गिरावट आती गई। यह उसकी एक महान् भूल थी और इसी कारण उसे नीदरलैंड्स के विद्रोह को दबाने में सफलता नहीं मिल सकी।

फिलिप द्वितीय के समक्ष सबसे जटिल समस्या जर्जर होती अर्थव्यवस्था थी। स्पेन की दुर्बल आर्थिक स्थिति का मूल कारण विशेषाधिकारों पर आधारित आर्थिक जीवन था। यद्यपि संपूर्ण अमरीकी व्यापार एवं चाँदी के आयात पर स्पेन का ही एकाधिकार था, किंतु जिस प्रकार समुद्र पर डच, फ्रांसीसी एवं अंग्रेज व्यापारियों ने तस्कर के व्यापार को बढ़ा दिया था, उससे स्पेन की आर्थिक स्थिति चरमराने लगी थी। फिलिप द्वितीय ने स्थिति से निपटने के लिए स्पेन के घरेलू उद्योग-धंधों और व्यापार पर अधिक से अधिक कर ;अलकाबाला अर्थात् विक्रय करद्ध लगाने की नीति अपनाई, जिससे स्पेन के उद्योग-धंधे और व्यापार चैपट हो गये। मूर एवं यहूदी जैसी व्यापार-कुशल जातियों के दमन का स्पेन के औद्योगिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ा। इस प्रतिकूल स्थिति में फिलिप द्वितीय के दीर्घकालिक युद्धों ने आग में घी का कार्य किया। इस प्रकार फिलिप द्वितीय अपनी आर्थिक समस्या का समाधान करने में असफल रहा।

धार्मिक नीति

फिलिप द्वितीय कट्टर कैथोलिक था। अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण ही उसने प्रोटेस्टेंटों, मूरों एवं यहूदियों के दमन की नीति अपनाई। उसकी दमनकारी नीति के कारण 1569 ई. में मूरों ने विद्रोह कर दिया था। मूरों ने लगभग दो वर्ष तक स्पेन की सेना का पर्वतीय इलाकों में जमकर विरोध किया, किंतु 1570 ई. में फिलिप द्वितीय को विद्रोह कुचलने में सफलता मिल गई। फिलिप मूरों के विद्रोह का दमन करने में तो सफल हो गया, किंतु मूरों के दमन की उसकी नीति से स्पेनी व्यापार एवं वाणिज्य को चैपट हो गया। यही स्थिति यहूदियों के संदर्भ में भी थी। वास्तव में फिलिप की निष्ठा कैथोलिक संप्रदाय के प्रति ही सर्वोपरि थी। उसने गैर-कैथोलिकों के विनाश के लिए ‘इन्क्वीजिशन’ नामक धार्मिक न्यायालयों का भरपूर प्रयोग किया।

उल्लेखनीय है कि रोम के पोप के साथ उसकी तब तक बनती रही जब तक कि पोप ने फिलिप के कार्यों को अपना समर्थन दिया, परंतु जैसे ही पोप ने स्पेन के विरोध की नीति अपनाई, फिलिप ने पोप से संबंध-विच्छेद कर लिया। पोप के आदेश भी स्पेन में उसकी आज्ञा के बिना कार्यान्वित नहीं हो सकते थे। इतना सब कुछ करने के बाद भी फिलिप द्वितीय कैथोलिक धर्म की सार्वभौमिकता को संपूर्ण यूरोप में स्थापित नहीं कर सका। उल्टे नीदरलैंड्स में भयंकर विद्रोह हो गया, जिसके कारण उसे अपार हानि उठानी पड़ी।

नीदरलैंड्स का विद्रोह, 1556-1598 ई.

(Revolt of the Netherlands, 1556-1598 AD)

वर्तमान हालैंड एवं बेल्जियम को ही सोलहवीं शताब्दी में नीदरलैंड्स के नाम से जाना जाता था। नींदरलैंड्स सोलहवीं शताब्दी में व्यापार एवं वाणिज्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। चार्ल्स पंचम का नीदरलैंड्स में शासन लोकप्रिय था, किंतु उसके पुत्र फिलिप द्वितीय की नीतियों ने नीदरलैंड्सवासियों को विद्रोह के लिए विवश कर दिया। नीदरलैंड्सवासियों का विद्रोह कालांतर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता का आंदोलन बन गया।

विद्रोह के कारण

फिलिप द्वितीय के प्रशासन के विरुद्ध नीदरलैंड्सवासियों के विद्रोह के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

आर्थिक कारण

नीदरलैंड्स आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त समुन्नत था। फिलिप द्वितीय को जब युद्धों एवं प्रशासकीय व्यय के लिए अधिक धन की आवश्यकता हुई तो उसने नीदरलैंड्स में करों को बढ़ा दिया। यह कार्य उसने नीदरलैंड्स की राष्ट्रीय परिषद् की अनुमति के बिना ही कर दिया। राष्ट्रीय परिषद् फिलिप के इस कार्य की घोर विरोधी थी। यह ठीक है कि चार्ल्स पंचम ने भी नीदरलैंड्स में करों को बढ़ाया था, परंतु उसने पहले राष्ट्रीय परिषद् को विश्वास में ले लिया था और साथ ही वहाँ के व्यापार व वाणिज्य को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए राजकीय संरक्षण भी दिया था। परंतु फिलिप द्वितीय ने तो नीदरलैड्स के व्यापार एवं वाणिज्य पर अनेक प्रतिबंध लगा दिये, जिससे नीदरलैंड्स का आर्थिक विकास रुक गया था।

धार्मिक कारण

फिलिप द्वितीय कट्टर कैथोलिक था। वह कैथालिक संप्रदाय को सार्वजनिक संप्रदाय बनाना चाहता था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने हरसंभव प्रयास किये। नीदरलैंड्स में इस समय काल्विनवादी प्रोटेस्टेंटों का विकास तेजी से हो रहा था। फिलिप के लिए यह असहनीय था। अतः उसने नीदरलैंड्स में कैथोलिक बिशपों की संख्या में वृद्धि कर दी, ‘इन्क्वीजिशन’ नामक धार्मिक अदालतें स्थापित कीं जिन्होंने बड़ी सख्ती से कार्य किया। ये अदालतें रक्त-रंजित थीं। अदालतों के भीषण दमन-चक्र से दुःखी होकर नीदरलैंड्स की जनता सशस्त्र विद्रोह पर उतारू हो गई।

राजनीतिक कारण

फिलिप द्वितीय के शासन के विरोध में उठनेवाले नीदरलैंड्स के विद्रोह का एक प्रमुख कारण फिलिप द्वितीय की निरंकुशतावादी नीति थी। फिलिप ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय परिषद् की अवमानना करना आरंभ कर दिया और स्पेनवासियों को नीदरलैंड्स में उच्च पदों पर नियुक्त किया जाने लगा। इन नवनियुक्त स्पेनियों ने फिलिप की आज्ञा का कठोरता से पालन करते हुए नीदरलैंड्सवासियों की घोर उपेक्षा की। इधर फिलिप ने नीदरलैंडस में स्पेनी सेना भी रख छोड़ी थी। यह सब नीदरलैंड्सवासियों के लिए असह्य हो गया था। उन्हें लगा कि उनकी स्वतंत्रता एवं परंपरागत अधिकारों पर खतरा उत्पन्न हो गया है, फलतः वे विद्रोह पर उतारू हो गये।

व्यक्तिगत कारण

फिलिप द्वितीय का जन्म और पालन-पोषण स्पेन में हुआ था। इसलिए उसकी सहानुभूति नीदरलैंड्सवासियों के प्रति अपने पिता चार्ल्स पंचम के समान नहीं थी। फिलिप द्वितीय ने स्पेन के हितों के लिए नीदरलैंड्स पर मनमाने तरीके से कर लगाये और वहाँ के व्यापार व वाणिज्य पर राजकीय प्रतिबंध लगाये। फिलिप के शासन से असंतुष्ट नीदरलैंड्सवासियों ने फिलिप को पूर्णतया स्पेनी एवं विदेशी माना और उसके विरुद्ध विद्रोह आरंभ कर दिया।

नीदरलैंड्स के विद्रोह की प्रमुख घटनाएँ

(Major Events of the Netherlands Uprising)

नीदरलैंड्स में व्याप्त असंतोष को दबाने के ।लिए फिलिप द्वितीय ने अपनी बहन मार्गरेट को 1559 ई. में नीदरलैंड्स का शासन संभालने हेतु नियुक्त किया, किंतु साथ ही उसने कार्डिनल ग्रेनविल को वहाँ की राज्य परिषद का अध्यक्ष नियुक्त कर उसे सभी वास्तविक शक्तियाँ प्रदान कर दी। कार्डिनल घोर स्पेनी था। इसी कारण मार्गरेट द्वारा स्पेनी सेना के वापस भेज दिये जाने तथा अयोग्य स्पेनी अधिकारियों को अपदस्थ कर दिये जाने के बाद भी नीदरलैंड्सवासियों ने ग्रेनविल की नियुक्ति का घोर विरोध किया। फलतः कार्डिनल ग्रेनविल को वापस बुलाना पड़ा। नीदरलैंड्स के सामंतों व नागरिकों ने नीदरलैंड्स की समस्याओं को दूर करने के लिए मार्गरेट को एक प्रार्थना-पत्र दिया, किंतु मार्गरेट ने इस प्रार्थना-पत्र को ‘भिखारियों का प्रार्थनापत्र’ कहकर उसकी अनदेखी की। इसी समय से (1566 ई.) विरोधियों के एक वर्ग ने स्वयं को भिखारी कहना आरंभ कर दिया।

फिलिप द्वितीय ने जब धार्मिक न्यायालयों को समाप्त करने के अपने वादे को पूरा नहीं किया तो, प्रोटेस्टेंट संप्रदाय की समर्थक जनता ने 1566 ई. में कैथोलिक चर्चों पर अपना प्रतिमा विनाशक रोष प्रकट किया। कैथोलिक चर्च की मूतियाँ तोड़ डाली गई और मठों को अपवित्र किया गया। अब फिलिप द्वितीय ने अल्वा के ड्यूक को नींदरलैंड्स का प्रशासक बनाकर भेजा।

अल्वा के ड्यूक ने 1567 ई. में नीदरलैंड्स पहुँचते ही अपना दमनचक्र आरंभ कर दिया। उसने एक अशांति (दंगा) परिषद् की स्थापना की और बड़ी निर्दयता से विरोधियों का दमन करना आरंभ किया। 1567 से 1572 ई. तक के काल में दंगा परिषद् ने लगभग 8,000 विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया। नीदरलैंड्सवासियों ने इस परिषद् को रक्त-परिषद् की संज्ञा दी। अल्वा के ड्यूक ने जब भारी क्रय कर लगा दिया जो नीदरलैंड्स की आथ्रिक संपन्नता के लिए विपत्तिजनक सिद्ध हुआ। अब संपूर्ण नीदरलैंड्स में भयंकर विद्रोह हो गया।

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नीदरलैंड्स के विद्रोह को स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में गति प्रदान करने का श्रेय विलियम आफ आरेंज (24 अप्रैल 1533-10 जुलाई 1584 ई.) को है, जिसे इतिहास में विलियम शांत (विलियम दि साइलेंट) के नाम से भी जाना जाता है। जिस समय आल्वा के ड्यूक ने नीदरलैंड्स में अपना कार्यभार सँभाला था, उस समय वह हालैंड तथा न्यूजीलैंड के प्रांतों का शासक था। इ्यूक के आने पर उसे नीदरलैंड्स छोड़कर जर्मनी जाना पड़ा था। इसका प्रमुख कारण यह था कि वह काल्विनवाद हो गया था। इ्यूक की दमन नीति से क्षुब्ध होकर वह विद्रोहियों के निमंत्रण पर पुनः नीदरलैंड्स आ गया और हतोत्साहित देशवासियों के उत्साह को पुनर्जीवित करने लगा। उत्साही डच नाविकों ने भिखारियों के दल को संगठित कर स्पेनी जहाजी बेड़ों के लिए अत्यंत कठिनाई उत्पन्न कर दी, जिससे स्पेनी सेना समुद्र पर अधिकार नहीं कर सकी। विलियम ने तुरंत स्पेनी सेना के विरुद्ध संघर्ष का नारा दिया। उसे फ्रांस, जर्मनी व इंग्लैंड से सैनिक सहायता भी मिल गई। उसने उत्तरी नीदरलैंड्स से ड्यूक के अधिकार को समाप्त करने में सफलता प्राप्त कर ली। ड्यूक ने उत्तरी क्षेत्र पर पुनः अधिकार करने के लिए 8 माह तक भीषण संघर्ष किया और उसे सफलता भी मिली।

फिलिप द्वितीय ने 1573 ई. में अल्वा के स्थान पर रेक्वेसेंस को नीदरलैंड्स का प्रशासक बनाकर भेजा। विलियम ने रेक्वेसेंस के लीडेन नगर पर अधिकार करने के सभी उपायों को विफल कर दिया। स्पेनी सेना ने त्रस्त होकर नीदरलैंड्स के उत्तरी व दक्षिणी नगरों में लूटमार एवं रक्तपात का तांडव आरंभ कर दिया, जिसे ‘स्पेनी प्रकोप’ कहा गया है। स्पेनियों के इस उपद्रव के विरोध में नीदरलैंड्स के 17 प्रांतों के प्रतिनिधियों ने 1576 ई. घेंट नामक नगर में एक संधि की, जिसे ‘घेंट का शांति-स्थापन’ कहते हैं। इस संधि में यह निर्णय लिया गया कि जब तक राजा फिलिप द्वितीय धार्मिक अदालतों उन्मूलन नहीं करता और स्पेनी सेनाओं को वापस बुलाकर पुनः प्राचीन सुविधाएँ बहाल नहीं करता, तब तक स्पेनी शासन का विरोध किया जाता रहेगा। फिलिप ने उन्हें कुछ रियायत देने की कोशिश की किंतु नये गवर्नर डान जान ने इसका विरोध किया। दरअसल 1576 ई. में रेक्वेसेंस की मृत्यु हो जाने पर फिलिप द्वितीय ने अपने सौतेले भाई आस्ट्रिया के डान जान को उसके स्थान पर नीदरलैंड्स भेजा था। जान डान को भी विलियम द्वारा छेड़े गये संघर्ष के विरूद्ध कोई विशेष सफलता नहीं मिली। इस बीच 1578 ई. में डान की भी मृत्यु हो गई।

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अब पार्मा के ड्यूक अलेक्जेंडर फार्नेस (1578-1592 ई.) को नीदरलैंड्स भेजा गया। फार्नेस के उसके सौभाग्य से उत्तरी नीदरलैंड्स के प्रोटेस्टेंटों एवं दक्षिणी नीदरलैंड्स के कैथोलियों के मध्य पारस्परिक संघर्ष हो गया। फार्नेस ने इसका लाभ उठाकर कैथोलिक संप्रदाय की रक्षा के नाम पर दक्षिणी नीदरलैंड्स के दसों प्रांतों के प्रतिनिधियों को लेकर ‘आरास की लीग’ की स्थापना की। इसके विरोध में विलियम ने उत्तरी नीदरलैंड्स के सातों प्रांतों को एकबद्ध कर ‘यूट्रेक्ट के संघ’ का गठन किया। इस प्रकार घेंट की संधि का अस्तित्व समाप्त हो गया और नीदरलैंड्स की एकता भंग हो गई। अब नीदरलैंड्स को दो भागों में बँट गया-दक्षिणी भाग स्पेनी नीदरलैंड कहा गया, जो आजकल बेल्जियम है और उत्तर भाग को संयुक्त प्रांत या हालैंड कहा गया।

उत्तर के प्रांतों ने विलियम के नेतृत्व में 1581 ई. में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इतिहास में इसे डचों द्वारा मानव अधिकारों की प्रभुसत्ता की घोषणा के नाम से जाना जाता है। 1584 ई. में फिलिप द्वितीय ने विलियम की हत्या करवा दी। विलियम की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र मारिश ने आंदोलन का नेतृत्व सँभाला। इंग्लैंड व फ्रांस की सहायता से मरिश ने फिलिप द्वितीय से संघर्ष जारी रखा। 1598 ई. में फिलिप द्वितीय की मृत्यु के उपरांत फिलिप तृतीय के काल में भी संघर्ष जारी रहा। अंततः तीसवषीय युद्ध (1618-1648 ई.) के पश्चात् ही यह संघर्ष समाप्त हुआ। 1648 ई. में यूरोप के राज्यों व स्पेन ने डच गणतंत्र को मान्यता प्रदान की। इस प्रकार नीदरलैंड्स का उत्तरी भाग डच गणतंत्र के राज्य के नाम से विख्यात हुआ और दक्षिणी नीदरलैंड्स स्पेनी नीदरलैंड्स कहलाया।

फिलिप द्वितीय की पराजय के कारण

(Due to the Defeat of Philip II)

  1. नीदरलैंड्स के प्रति फिलिप द्वितीय की शोषण की नीति तथा विशेषतः प्रोटेस्टेंटों के दमन की नीति ने वहाँ के निवासियों में यह भावना उत्पन्न कर दी थी कि फिलिप द्वितीय विदेशी है। इसलिए उत्तरी नीदरलैंड्स में विद्रोह का स्वरूप राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हो गया।
  2. फिलिप द्वितीय के साम्राज्य की विशालता, उसकी प्रशासनिक कठिनाइयाँ तथा फ्रांस व इंग्लैंड से अनवरत युद्धों में उलझे रहने के कारण वह नीदरलैंड्स के विद्रोह के दमन में पूर्णतः संलग्न भी नहीं हो सका जिसका लाभ राष्ट्रवादियों के मिला।
  3. डचों की नौ-सैनिक शक्ति और गुरिल्ला युद्ध प्रणाली अत्यंत प्रबल थी, इसके विपरीत स्पेनी नौ-सेना दुर्बल थी।
  4. स्पेन के विरुद्ध डचों को फ्रांस, इंग्लैंड व जर्मनी से सैन्य व आर्थिक सहायता भी मिल रही थी।
  5. डचों की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण विलियम आफ आरेंज का नेतृत्व था। विलियम ने डचों के टूटते हुए मनोबल को बढ़ाया और प्रत्येक स्थिति में संघर्ष को जारी रखा।

इस प्रकार अपनी निरंकुश एवं हठवादी नीति के कारण फिलिप द्वितीय न तो स्पेन की जर्जरित आर्थिक समस्या का समाधान कर सका और न ही कैथोलिक संप्रदाय को सर्वजनीन धर्म बना पाया। यद्यपि वह मूरों के दमन में सफल रहा, किंतु इसका स्पेन की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अंततः यदि उसने धर्म की वेदी पर राजनीति को बलिदान करने का प्रयत्न न किया होता, तो संभव है कि उसे गृह नीति के क्षेत्र में असफलत का मुँह न देखना पड़ता।

फिलिप द्वितीय की विदेश नीति

(Philip II’s Foreign Policy)

आंतरिक समस्याओं की तरह फिलिप को विदेश नीति के क्षेत्र में भी विभिनन समसयाओं का सामना करना पड़ा। वह स्पेन को यूरोप का प्रमुख राष्ट्र बनाना चाहता था। इसके लिए उसे यूरोप के विभिन्न देशों से संघर्ष करना पड़ा। उसकी दूसरी समस्या पुर्तगाल को स्पेनी साम्राज्य का अंग बनाने की थी। तीसरे, उसे स्पेनी उपनिवेशों का विस्तार भी करना था। इसके अलावा, भूमध्य सागर में जमे हुए तुर्कों से स्पेनी साम्राज्य की रक्षा भी करनी थी।

फ्रांस से संबंध

फ्रांस व स्पेन के विरुद्ध संघर्ष तो चार्ल्स पंचम के समय से ही खिंचता चला आ रहा था। फ्रांस तथा स्पेन की प्रतिद्वंद्विता को फ्रांस के शासक हेनरी द्वितीय व स्पेन के शासक फिलिप द्वितीय की महत्वाकांक्षाओं ने और अधिक बढ़ा दिया। पोप की सहायता पाकर फ्रांस ने स्पेन के विरुद्ध जो युद्ध छेड़ा था, उसकी परिणति कांतो काम्ब्रेजी की संधि 1559 ई. के रूप में हुई। इस संधि के अनुसार फ्रांस को इटली पर स्पेन के आधिपत्य को स्वीकार करना पड़ा और कैले पर फ्रांसीसी अधिकार मान लिया गया।

हेनरी द्वितीय की मृत्यु के बादजब फ्रांस में गृह युद्ध आरंभ हुआ तो फिलिप द्वतीय ने गृह युद्ध में कैथोलिकों की हरसंभव सहायता की। इस पर फ्रांस के प्रोटेस्टेंटों ने, जो कि ह्यूगनोट्स कहलाते थे, नीदरलैंड्स के विद्रोहियों को सहायता दी। जब नावार के प्रोटेस्टेंट राजकुमार हेनरी के उत्तराधिकार का मामला उठा तो फिलिप द्वितीय ने हेनरी का विरोध किया, किंतु हेनरी की कुशलता ने उसके विरोधियों एवं फिलिप के प्रयत्नों को विफल कर दिया।

सिंहासन पर अपनी स्थिति सुदृढ़ होते ही हेनरी ने स्पेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अंततः विवश होकर फिलिप द्वितीय को 1598 ई. हेनरी के साथ ‘वरबै की संधि’ करनी पड़ी। इस संधि के अनुसार हेनरी चतुर्थ को फ्रांस का शासक मान लिया गया तथा कांतों काम्ब्रेजी की संधि की पुनः पुष्टि की गई। इस प्रकार फिलिप द्वितीय की फ्रांस के विरुद्ध नीति पूर्णतः असफल रही और इसका पूर्ण लाभ फ्रांस को मिला। हेज ने सही लिखा है कि ‘स्पेन के शासक की असफल हस्तक्षेप की नीति ने फ्रांसीसी स्वातंत्रय, राष्ट्रभक्ति और एकता की पुष्टि कर दी। आनेवाली शताब्दी में यूरोपीय राजनीति का केंद्र स्पेन नहीं, फ्रांस होनेवाला था।

इंग्लैंड के साथ संबंध

फिलिप द्वितीय के इंग्लैंड की शासिका मेरी ट्यूडर से विवाह के कारण मेरी ट्यूडर के काल (1553-1558 ई.) तक तो स्पेन व इंग्लैंड के मधुर संबंध बने रहे, किंतु मेरी ट्यूडर की मृत्यु के बाद एलिजाबेथ ट्यूडर के राज्यारोहण से इंग्लैंड व स्पेन संबंधों में कटुता आने लगी। फिलिप द्वितीय इंग्लैंड की गृह व विदेश नीति का संचालन अपने तरीके से करवाना चाहता था। वह इंग्लैंड के प्रोटेस्टेंटों का दमन करना चाहता था, किंतु एलिजाबेथ यूरोप की राजनीति में इंग्लैंड का अलग महत्व स्थापित करना चाहती थी। उसने प्रोटेस्टेंट संप्रदाय को स्वीकार करते हुए इंग्लैंड की राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया।

फिलिप द्वितीय ने अपने प्रयत्नों में असफल होने के पश्चात् इंग्लैंड को अपने नियंत्रण में लाने के लिए 1598 ई. का शक्ति का प्रयोग किया। उसने एक विशाल स्पेनी नौ-सेना का गठन किया, जिसे इतिहास में ‘आर्मेडा’ कहा जाता है। इस आर्मेडा में 8,000 नाविक, 50 जहाज और 19,000 सैनिक थे। फिलिप का विश्वास था कि आर्मेडा के माध्यम से जब इंग्लैंड पर आक्रमण होगा तो वहाँ के कैथोलिक उसका सहयोग करेंगे, किंतु इंग्लैंडवासियों ने राष्ट्रीय संकट के समय आपसी मतभेदों को भुलाकर स्पेनी आर्मेडा का विरोध किया। इंग्लिश चैनल में स्पेनी आर्मेडा को ब्रिटिश नौ-सेना ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। यही नहीं, ब्रिटिश नौ-सेना ने उत्साहित होकर स्पेनी बंदरगाह कैडिज को भी लूटा। आर्मेडा की इस पराजय से फिलिप द्वितीय की नौ-सेना की दुर्बलता स्पष्ट हो गई। इतिहासकार हेज के शब्दों में, ‘फिलिप के आर्मेडा की पराजय ने नौ-सेना और व्यापारिक क्षेत्र में इंग्लैंड की सर्वशक्तिशाली प्रभुसत्ता को प्रतिष्ठित कर दिया।’ फिलिप की आर्मडा की हार इंग्लैंड के लिए नौसेना का पहला खिताब था।

पुर्तगाल से संबंध

1543 ई. में चार्ल्स पंचम ने अपने बेटे फिलिप द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी मेरी से किया था। 1580 ई. में पुर्तगाल के राजा की मृत्यु हो जाने पर फिलिप द्वितीय ने अपने वैवाहिक संबंध के आधार पर स्पेनी सेना को भेजकर पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया। किंतु फिलिप द्वितीय का शासन वहाँ के लोगांे को संतुष्ट नहीं कर सका और वहाँ फिलिप द्वितीय के काल में ही स्वतंत्रता आंदोलन के बीज पड़ गये। 1640 ई. में पुर्तगाल ने स्वयं को स्पेन के चंगुल से अलग कर लिया।

तुर्की के साथ संबंध

1566 ई. में तुर्की के सुल्तान सुलेमान महान् की मृत्यु के पश्चात् भी तुर्कों का आतंक हंगरी और भूमध्यसागर में बना रहा। उन्होंने इटली और सिसली पर आक्रमणों का सिलसिला जारी रखा। यही नहीं, यूरोप के देशों में उस समय खलबली मच गई जबकि तुर्कों ने साइप्रस पर अधिकार कर लिया। अब इटली की रक्षा का प्रश्न था। यह पोप की प्रतिष्ठा का सवाल था। तुर्कों के मंसूबों को नाकाम करने के लिए पोप के नेतृत्व में वेनिस, जिनेवा और स्पेन का एक संघ बना। फिलिप द्वितीय के सौतेले भाई डान जान ने संघ की जल सेना का नेतृत्व करते हुए 1571 ई. में लेपांटो की खाड़ी में तुर्क सेना के छक्के छुड़ा दिये। यह अजेय तुर्क सेना के खिलाफ ईसाइयों की सबसे बड़ी विजय थी। राजनीतिक दृष्टि से अब तुर्क सँभल नहीं सके। लेपांटो की जीत ने पश्चिमी यूरोप को तुर्की के खतरे से छुटकारा दिला दिया।

इस प्रकार फिलिप द्वितीय ने फ्रांस और इंग्लैंड के मामलों में धार्मिक भावना से अभिभूत होकर युद्धों में उलझना पड़ा। इसका प्रभाव उसकी आंतरिक स्थिति पर पड़ा। उसे एक ओर उत्तरी नीदरलैंड्स में भयंकर विद्रोह का सामना करना पड़ा, वही दूसरी ओर स्पेन की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। तुर्कों के विरुद्ध वह सफल रहा, लेकिन पुर्तगाल का विलय उचित नहीं माना जा सकता क्योंकि इससे उसे कुछ मिला तो नहीं, उल्टे उसके उत्तरदायित्वों में वृद्धि हो गई। इस प्रकार उसकी विदेश नीति भी उसकी धर्म नीति के कारण अधिकांशतः विफल ही रही।

फिलिप द्वितीय का मूल्यांकन

(Evaluation of philip II)

फिलिप द्वितीय के संबंध में इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद है। जहाँ एक ओर अंग्रेज इतिहासकारों ने उसे असहिष्णु कैथोलिक और निरंकुश शासक बताया है, वही दूसरी ओर स्पेन के देशभक्त उसे राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत महान् शासक बताते हैं। वास्तव में, फिलिप द्वितीय कट्टर कैथोलिक था और उसके जीवन का प्रमुख उद्देश्य कैथोलिक धर्म को यूरोप का सार्वभौम धर्म बनाना था। यही काराण है कि उसकी राजनीति सदैव धर्म से प्रभावित रही जो उसकी विफलता कारण भी बनी। नीदरलैंड्स की ‘इन्क्वीजिशन’ अदालतों का रक्तरंजित होना मानवता के लिए एक अभिशाप था।

फिलिप स्वभाव से जिद्दी, अविश्वासी एवं संदेही प्रवृत्ति का था। यही कारण था कि उसने अपने साम्राज्य की सभी समस्याओं का निवारण स्वयं करने का प्रयत्न किया। वह राजनीति व कूटनीति के प्रश्नों को सुलझाने में असमर्थ था। इसके बावजूद यह मानना पड़ेगा कि वह सिद्धांतवादी तथा आदर्शवादी, अदम्य इच्छा शक्ति एवं अपूर्व क्षमतावाला शासक था। प्रातःकाल से आधी रात्रि तक वह राजकीय कार्यों में व्यस्त रहता था। वह स्वभाव से मृदुभाषी एवं अल्पभाषी था। स्पेन के लिए उसके हृदय में अगाध श्रद्धा एवं भक्ति थी। यही कारण था कि वह स्पेन को विश्व का सर्वाधिक शक्तिषाली राष्ट्र बनाना चाहता था। इसके लिए उसने प्रयत्न भी किये। यह बात अलग है कि वह अपने इस उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हुआ, किंतु स्पेन की जनता ने सदैव उसकी देशभक्ति की भावना की प्रशंशा की। यही कारण है कि स्पेनी इतिहास में 16वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध ‘फिलिप द्वितीय का युग’ के नाम से जाना जाता है।

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