यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था (Concert of Europe)

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था

वियेना कांग्रेस में यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था की स्थापना उन्नीसवीं शताब्दी के विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। नेपोलियन के युद्धों में यूरोप में धन-जन की भारी बर्बादी हुई थी। नेपोलियन की पराजय के बाद ब्रिटिश विदेशमंत्री कासलरिया और आस्ट्रियन प्रधानमंत्री मेटरनिख एक ऐसी संयुक्त व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे ताकि वियेना कांग्रेस के निर्णयों को लागू किया जा सके और यूरोप में शांति-व्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके। दूसरी ओर रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम ने भी अपनी रहस्यवादी प्रवृत्ति तथा संभवतः बेरानेस वॉन क्रुडनर के प्रभाव से मानवता और शांति की बहाली के लिए यूरोपीय देशों के गठबंधन की एक अन्य योजना प्रस्तुत की। इन्हीं योजनाओं के आधार पर इस संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था की स्थापना की गई थी।

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था (Concert of Europe)
1815 में यूरोप

शांति के आरंभिक प्रयास

यूरोपीय दार्शनिक चौदहवीं शताब्दी से ही युद्धों की रोकथाम करने की योजना प्रस्तुत करते आ रहे थे। किंतु अठारहवीं सदी के प्रारंभ होते ही यूरोप में अंतर्राष्ट्रीय संगठन के माध्यम से शांति बनाये रखने की योजनाओं की बाढ़-सी आ गई। 1713 में फ्रांस के एबीद सेंटपीयर ने यूट्रेक्ट की संधि पर आधारित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन की योजना प्रस्तुत की थी। 1791 में आस्ट्रिया के प्रधानमंत्री काउंट कोनित्स ने एक प्रपत्र तैयार किया था जिसमें सभी राज्यों को सार्वजनिक शांति, राज्यों की व्यवस्था एवं उनके अधिकृत प्रदेशों की अखंडता एवं संधियों के प्रति आस्था को सुरक्षित रखने के लिए पारस्परिक सहयोग का सुझाव दिया था। किंतु अभी तक यूरोप इन शांति-योजनाओं को कोई व्यावहारिक रूप देने के लिए तैयार नहीं हुआ था। यूरोप के शासकों की आँखें तब खुलीं जब नेपोलियन के युद्धों ने यूरोप की सभी प्राचीन पद्धतियों का जड़मूल से नाश कर दिया।

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था का निर्माण एकता के एक व्यवहारिक अनुभव का भी परिणाम था। मित्र राष्ट्रों ने आपस में मिलजुल कर नेपोलियन का मुकाबला किया था। अपने अपूर्व सहयोग और संगठन के बल पर ही वे नोपोलियन को पराजित करने में कामयाब हुए थे। इस विजय का वे तभी उपभोग कर सकते थे जब वे शांतिकाल में भी एक-दूसरे का सहयोग करते रहें। इस प्रकार वियेना की व्यवस्था को बनाये रखने और फांस की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाये रखने के लिए भी यूरोपीय राज्यों के बीच सहयोग आवश्यक था।

लॉर्ड विलियम बैंटिंक 

संयुक्त-व्यवस्था का उद्देश्य

वास्तव में मित्रराष्ट्र पारस्परिक सहयोग और संगठन के बल पर ही नेपोलियन को पराजित करने में सफल हुए थे। 1814 में शामों की संधि के द्वारा इंग्लैंड, आस्ट्रिया, प्रशा और रूस ने यह संकल्प लिया था कि वे वियेना में लिये गये निर्णयों को बनाये रखने, यूरोप में हो रहे राजनैतिक परिवर्तनों की बराबर निगरानी करने तथा समय-समय पर सलाह-मशविरे के लिए अगले बीस वर्षों तक पारस्परिक सहयोग बनाये रखेंगे।

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था (Concert of Europe) को स्थापित करने का एक उद्देश्य राष्ट्रीयता और प्रजातंत्र के सिद्धांतों जैसे प्रगतिशील प्रवृत्तियों का दमन करना भी था। इस समय यूरोप के कई राष्ट्रों में राष्ट्रीयता और प्रजातंत्र के सिद्धांत अपना सिर उठा रहे थे जिससे प्रतिक्रियावादी शासक भयभीत थे। मेटरनिख जैसे प्रतिक्रियावादियों को लगता था कि इस आसन्न खतरे से निपटने के लिए यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।

इस प्रकार यूरोप में शांति कायम रखने, वियेना में स्थापित व्यवस्था को बनाये रखने तथा प्रगतिवादी सिद्धांतों का गला घोंटने के लिए एक संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था जैसे अंतराष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता थी। इसके लिए वियेना कांग्रेस में दो योजनाएँ प्रस्तुत की गईं- पहला, ‘पवित्र संघ’ का प्रस्ताव रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम की ओर से आया और दूसरी, ‘चतुर्मुखी संघ’ योजना का प्रस्ताव आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने प्रस्तुत किया।

पवित्र संघ

होली एलायंस (पवित्र संघ) को रूस के जार अलेक्जेंडर की पहल और प्रेरणा ने जन्म दिया था। जार वियेना कांग्रेस से पूरी तरह संतुष्ट और आश्वस्त नहीं था। नेपोलियन को पराजित करने तथा वियेना सम्मेलन में सक्रिय भाग लेने से यूरोप में उसका कद बहुत बढ़ गया था। बैरोनेस क्रूडेनर और आकांजेब के प्रभाव से वह ईसाई धर्म के सिद्धांतों के प्रतिपादन और प्रचार में रहस्यमय ढंग से रूचि लेने लगा था। अलेक्जेंडर का मानना था कि यूरोप के ईसाई शासकों का एक संघ होना चाहिए जो ईसाई धर्म के पवित्र सिद्धांतों के आधार पर शासक और शासितों के बीच सद्भावना बनाये रखे ताकि यूरोप में शांति बनी रहे।

जार ने 26 सितंबर 1815 को अपने ‘पवित्र संघ’ की घोषणा की और यूरोप के सभी राजाओं को इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए आमंत्रित किया। रूस, प्रशा और आस्ट्रिया के शासकों ने तुरंत अपने को ‘दया, शांति और प्रेम’ के ईसाई बंधन में बाँध लिया, लेकिन विभिन्न कारणों से केवल पोप और वैधानिक अड़चन का बहाना लेकर इंग्लैंड के शासक ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। यूरोपीय परिवार में केवल तुर्की का सुल्तान ही धार्मिक कारणों से पवित्र संघ के बाहर रखा गया था।

उन्नीसवीं सदी में भारतीय पुनर्जागरण 

पवित्र संघ का मूल्यांकन

किंतु पवित्र संघ (Holy alliance) की यह स्वीकृति और सफलता अस्थायी थी। कई देशों ने तो केवल जार को खुश करने के लिए पवित्र संघ पर हस्ताक्षर कर दिये थे। दरअसल अलेक्जेंडर को छोड़कर दूसरे किसी ने भी पवित्र संघ पर गंभीरतापूर्वक विचार ही नहीं किया। मौन समर्थन के बावजूद मेटरनिख इसे ‘ऊँची दुकान, फीका पकवान’ कहता था। बाद में अपने संस्मरण में उसने स्वीकार भी किया है कि आस्ट्रिया और प्रशा ने पवित्र संघ (Holy Alliance) को मुख्य रूप से जार को खुश करने के लिए ही स्वीकार किया था।

तालिरां इसे ‘हास्यास्पद समझौता’ कहता था। कासिलरिया ने इसे ‘शानदार रहस्यवाद और बकवास’ करार दिया। उसने तो अपने प्रधानमंत्री को यहाँ तक लिखा कि ‘जार का दिमाग पूरी तरह ठीक नहीं लगता।’ साधारण जनता इसे प्रजातंत्र की भावनाओं को कुचलने का यंत्र समझती थी। जब इंग्लैंड होली एलायंस में शामिल नहीं हुआ तो यह मुख्य रूप से रूस, प्रशा और आस्ट्रिया के शासकों की एक पवित्र घोषणा बनकर रह गई।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका 

पवित्र संघ का महत्त्व

प्रत्यक्षतः पवित्र संघ का उद्देश्य यूरोप को ईसाई सिद्धांतों के अनुकूल नियमित और व्यवस्थित करना था, लेकिन वस्तुतः उसका लक्ष्य एकतंत्र का समर्थन और क्रांतिकारी प्रवृत्तियों का दमन करना था। अलेक्जेंडर ने कहा था: ‘सारी दुनिया के उदारपंथी क्रांतिकारी और कार्बनारी के सदस्य सरकारों के नहीं, अपितु धर्म के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं।’ वास्तव में उसे यह षड्यंत्र अपने निरंकुश तंत्र के विरुद्ध लगता था। वह स्वभाव से युद्धप्रेमी नहीं था, लेकिन वह भ्रांतियों और कुंठाओं का शिकार था। 1825 तक जार अलेक्जेंडर का यह संघ नाम मात्र के लिए चलता रहा, जार की मृत्यु के साथ ही इसका अंत हो गया।

चतुर्मुखी संधि

चतुर्मुखी संधि या मित्र-मंडल की स्थापना का प्रस्ताव आस्ट्रिया के मेटरनिख की ओर से आया था, जिसके फलस्वरूप 20 नवंबर, 1815 को रूस, प्रशा और आस्ट्रिया ने इंग्लैंड के साथ मिलकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। चतुर्मुख संधि का एक लक्ष्य यह था कि अब तक हुई संधियों, जैसे पेरिस और शोमों का पालन होता रहे। दूसरा लक्ष्य भविष्य को ध्यान में रखकर निर्धारित किया गया था कि समय-समय पर मिलकर यूरोप की स्थिति का सर्वेक्षण किया जायेगा। यदि यूरोप में शांति और सुव्यवस्था की कोई समस्या उठ खड़ी हो तो उसके समाधान के लिए आवश्यक नीति तथा कार्यवाही का निर्धारण भी मिलकर ही किया जायेगा। इस तरह एक यूरोपीय व्यवस्था का जन्म हुआ, जो सर्वथा अभिनव प्रयोग था।

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था (Concert of Europe)
आस्ट्रिया का चांसलर मेटरनिख

दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था 

कांग्रेस प्रणाली

चतुर्मुखी संधि पर हस्ताक्षर के बाद यूरोपीय समस्याओं पर विचार करने के लिए समय-समय पर यूरोपीय राज्यों के सम्मेलन होने लगे। इन्हीं सम्मेलनों को ‘यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था’ (Concert of Europe) या ‘कांग्रेस प्रणाली’ (Congressinal System) कहते हैं। चतुर्मुख संधि की यह व्यवस्था पवित्र संघ से भिन्न और अपेक्षाकृत अधिक व्यवहारिक थी क्योंकि इसके द्वारा वियेना सम्मेलन की प्रादेशिक व्यवस्था की अखंडता और शासकों की प्रभुसत्ता को सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया गया था।

चतुर्मुखी संधि के अंतर्गत 1818 में एक्सला शापेल, 1820 में ट्रोपो, 1821 में लाइबेख, 1822 में बेरोना में तथा 1825 में सेंट पीटर्सबर्ग में सम्मेलन आयोजित किये गये। इस प्रकार लगभग दस वर्ष तक बड़े राज्यों के सम्मेलनों द्वारा यूरोपीय राज्यों की समस्याओं को सुलझाने के प्रयास किये गये। इसलिए इसे ‘कांग्रेस का युग’ (Congress Era )भी कहते हैं।

ब्रिटिश भारत में दलित-आंदोलन 

एक्सला शापेल की कांग्रेस (1818)

सम्मेलनों के क्रम में चतुर्मुखी संधि के हस्ताक्षरकारी राज्यों का पहला सम्मेलन एक्सला शापेल में 1818 में हुआ। इस सम्मेलन में तीन वर्षों की राजनीतिक स्थितियों का आकलन करने के बाद निर्णय लिया गया कि अब फ्रांस से विजेता देशों की सेनाएँ हटा ली जायें क्योंकि वहाँ अब अशांति की संभावना नहीं रह गई थी और राजा की सत्ता स्थापित हो गई थी। इंग्लैंड के प्रस्ताव पर फ्रांस को भी चतुर्मुखी संधि में शामिल कर लिया गया जिससे अब वह ‘पंचमुखी संधि’ (Pentrarchy) बन गया। इससे स्थिति एकदम बदल गई क्योंकि फ्रांस पर कड़ी नजर रखना ही संधि का प्रमुख उद्देश्य था।

इसके बाद कांग्रेस के समक्ष अनेक मामले आये। डेनमार्क ने स्वीडेन के विरूद्ध सहायता माँगी। हेज के इलेक्टर ने राजा की पदवी के लिए आवेदन दिया। जर्मनी के राजाओं की अपनी तकलीफें थीं। मुनैको की जनता ने अपने राजा के विरूद्ध शिकायत की।

एक्सला शापेल (Aix-la-Chapelle) की कांग्रेस ने प्रायः सभी समस्याओं पर ध्यान किया। स्वीडेन के राजा से जवाब-तलब किया गया, मुनैको के राजा को शासन के दोषों को दूर करने का आदेश दिया गया। कांग्रेस के इन निर्णयों के कारण यूरोप में यूरोपीय व्यवस्था की शक्ति और प्रभाव में काफी वृद्धि हुई। मेटरनिख ने खुश होकर लिखा कि उस छोटी-सी कांग्रेस से अधिक सुंदर कांग्रेस उसने कभी नहीं देखी थी।

फिर भी, एक्सला शापेल की कांग्रेस अभी विघटित भी हो पाई थी कि यूरोपीय व्यवस्था में मतभेद के स्वर उभरने लगे। मित्र राज्यों में पहला अंतर्विरोध स्पेन के दक्षिण अमेरिका के उपनिवेशों को लेकर प्रकट हुआ। दक्षिण अमेरिका के उपनिवेश पहले स्पेन के अधीन थे। जब स्पेन पर नेपोलियन का अधिकार हुआ था उसी समय वे स्वतंत्रत हो गये थे। इन उपनिवेशों में इंग्लैंड को व्यापार करने की सुविधा मिल गई थी। स्पेन ने पुनः उपनिवेशों पर स्पेन के अधिकार की माँग की। कासलरिया ने इसे स्पेन का घरेलू मामला बताया जिससे यूरोप की शांति को कोई खतरा नहीं था। मेटरनिख स्पेन की मदद करना चाहता था, लेकिन इंग्लैंड के विरोध के कारण नहीं कर सका।

इसके अलावा कांग्रेस दो और मुख्य प्रश्नों को नहीं हल कर सकी- एक दास-व्यापार का और दूसरा समुद्री डाकुओं का। वियेना कांग्रेस ने दास-व्यापार की निंदा की थी। लेकिन अभी यह अनैतिक काम पूर्ववत चल रहा था। इसका अंत करने के लिए इंग्लैंड ने सुझाव दिया कि सभी राष्ट्रों को एक दूसरे के जहाजों की तलाशी लेने का अधिकार होना चाहिए, परंतु यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका।

उत्तरी अफ्रीका के समुद्री डाकू भूमध्यसागर में व्यापारिक जहाजों को लूट लेते थे। समुद्री डाकुओं के उन्मूलन के लिए रूस के जार ने यह प्रस्ताव रखा कि रूस को युद्धपोत भेजने का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन इंग्लैंड नहीं चाहता था कि रूसी जहाज भूमध्यसागर में प्रवेश करें, इसलिए यह प्रस्ताव भी नामंजूर हो गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मित्र-राष्ट्रों के बीच मतैक्य का सर्वथा अभाव है।

इसके अलावा, मेटरनिख ने कांग्रेस की प्रतिष्ठा से लाभ उठाकर जर्मन संघ के विद्रोहों को दबाना शुरू कर दिया। उसने कार्ल्सवाद से कुछ विज्ञप्तियाँ निकालकर राष्ट्रीय आंदोलनों को कुचलना शुरू कर दिया। उसका मानना था कि यूरोपीय शांति को बनाये रखने के लिए दूसरे देशों के मामले में हस्तक्षेप करना संघ का कर्तव्य है। इंग्लैंड का कासलरिया संप्रभुतायुक्त राज्यों के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप के सिद्धांत का विरोधी था और यूरोप में अहस्तक्षेप की नीति का पक्षधर था। परंतु मेटरनिख पर इस विरोध का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने जर्मनी में जो मन में आया किया। फिर भी, कासलरिया के विरोध ने यूरोपीय व्यवस्था के विनाश के बीज बो दिये।

ट्रोपो कांग्रेस (1820)

दो वर्ष बाद 1820 में ट्रोपो में दूसरी कांग्रेस में मित्र राष्ट्रों के मतभेद खुलकर सामने आने लगे। स्पेन में 1820 में रीगो नामक एक कर्नल ने विद्रोह कर दिया और पुराने संविधान की घोषणा कर दी। अलेक्जेंडर ने स्पेन में रूसी सेना भेजने का प्रस्ताव किया, लेकिन इंग्लैंड ने इसका विरोध किया और मेटरनिख ने भी इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसी बीच जब नेपल्स में विद्रोह की पुनरावृत्ति हुई तो मेटरनिख को चिंता हुई कि इस आग के उत्तर की ओर बढ़ने से तो आस्ट्रिया भी चपेट में आ जायेगा। मेटरनिख को नेपल्स की जितनी चिंता थी, उतनी स्पेन की नहीं। उसने तुरंत ट्रापो में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया। अधिवेशन प्रारंभ होते ही मेटरनिख ने कुछ ऐसे प्रस्ताव रखे जो इंग्लैंड और फ्रांस को मान्य नहीं थे। मेटरनिख ने प्रस्ताव रखा, ‘‘यदि किसी राज्य में राष्ट्रीय आंदोलन होने लगे, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी राज्यों के सामने खतरा उत्पन्न हो जाए या इसकी संभावना हो तो पड़ोसी राज्यों को अपनी सेनाओं द्वारा उन आंदोलनों का दमन करने का अधिकार होगा। कांग्रेस को अधिकार हो कि वह वियेना में स्थापित व्यवस्था की रक्षा के लिए मित्र राष्ट्रों की सेना का उपयोग करे।’’ मेटरनिख के इस नवीन सिद्धांत को ‘ट्रोपो सिद्धांत’ कहते हैं। रूस, प्रशा और आस्ट्रिया ने घोषणा में निहित हस्तक्षेप करने की नीति को तुरंत मान लिया, किंतु ब्रिटेन ने इसका कड़ा विरोध किया और फ्रांस ने उसका साथ दिया। उनका कहना था कि किसी भी देश का राष्ट्रीय आंदोलन उसका आंतरिक मामला है और उसमें किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था द्वारा हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। इस प्रकार आंग्ल-फ्रांसीसी विरोध के कारण सशस्त्र हस्तक्षेप की नीति पारित नहीं हो सकी, लेकिन यूरोपीय व्यवस्था कायम रही।

लाइबेख कांग्रेस (1821)

साल भर बाद ही 1821 में लाइबेख में कांग्रेस का तीसरा अधिवेशन बुलाया गया। इटली के राज्यों में विद्रोह हो रहे थे। नेपेल्स के राजा फर्डिनेंड को विद्रोहियों ने भगा दिया था। पीडमांट भी कार्बोनरी विद्रोह की चपेट में था।

लाइबेख कांग्रेस में मेटरनिख ने रूस और प्रशा का समर्थन प्राप्त करके एक बड़ी सेना नेपल्स भेजी और वहाँ के विद्रोह का दमन कर फिर से पुरातन व्यवस्था लागू कर दी। इसी प्रकार आस्ट्रिया की सेना ने पीडमांट के क्रांतिकारी विद्रोह को भी कुचल डाला। इंग्लैंड के विरोध को दरकिनार करते हुए मेटरनिख ने स्पष्ट कर दिया कि संधि में शामिल हुए अन्य देशों की सहमति पर ध्यान दिये बिना ही वह आस्ट्रिया के हितों और क्रांति के विरोध के लिए आस्ट्रिया के निकटवर्ती देशों में हस्तक्षेप अवश्य करेगा।

बेरोना कांग्रेस (1822)

कांग्रेस का अंतिम अधिवेशन 1822 में बेरोना में हुआ। स्पेन की समस्या अब भी नहीं सुलझी थी। स्पेन में क्रांतिकारियों ने काफी उपद्रव मचा रखा था। चूंकि स्पेन फ्रांस का पड़ोसी था, इसलिए कांग्रेस ने प्रस्ताव किया कि स्पेन के राजा को सहायता देने के लिए फ्रांस को सेना भेजने का अधिकार दिया जाए। इंग्लैंड ने प्रस्ताव का विरोध किया और दूसरे राज्यों के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत की दुहाई दी। लेकिन आस्ट्रिया, रूस और प्रशा पर इस विरोध का कोई असर नहीं हुआ और फ्रांस को स्पेन में सेना भेजने की अनुमति मिल गई। फ्रांसीसी सेना ने स्पेन जाकर विद्रोह का दमन करके फर्डिनेंड को गद्दी पर बैठा दिया। स्पेन में पुनः उसका निरंकुश शासन कायम हो गया।

इस बीच यूनानियों ने तुर्की के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इंग्लैंड यूनानियों की मदद करना चाहता था। उसने यह प्रस्ताव रखा कि जिस प्रकार स्पेन के राजा को संघ द्वारा सहायता दी गई है, उसी प्रकार यूनानियों को भी सहायता दी जाए। मेटरनिख ने इस सुझाव को नहीं माना तो इंग्लैंड असंतुष्ट होकर यूरोपीय व्यवस्था से अलग हो गया।

इस बीच इंग्लैंड के विदेश मंत्री कासलरिया की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर कैनिग की नियुक्ति हुई। कैनिंग ने हस्तक्षेप की नीति के विरुद्ध स्पष्ट घोषणा कर दी कि ‘‘हर राष्ट्र अपने लिए और ईश्वर हम सबके लिए’।’’ जब पुर्तगाल में स्पेन ने हस्तक्षेप करना चाहा तो कैनिंग ने पुर्तगाल के उदारवादियों की मदद की। उसने कहा: ‘‘हस्तक्षेप करना एक बात है और हस्तक्षेप रोकने के लिए हस्तक्षेप करना दूसरी बात है।’’ उसने वियेना के विजेताओं के बीच हुआ समझौता भंग होता देखकर उसे बचाने की कोई कोशिश नहीं की। उसने स्पष्ट कहा कि ‘‘खुदा का शुक्र है कि अब कोई कांग्रेस नहीं होगी।’’

मुनरो सिद्धांत : स्पेन में निरंकुश शासन की पुनर्स्थापना के बाद दक्षिण अमेरिका में स्पेन के उपनिवेशों की समस्या फिर सामने आई। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर विचार करना शुरू किया कि स्पेन के राजा को अमेरिकी उपनिवेशों पर पुनः अपने अधीन करने के लिए सहायता दी जाए। इंग्लैंड ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। इसी समय संयुक्त राज्य अमेरिका को यूरोपीय संघ के इरादों का पता चल गया। फलतः राष्ट्रपति मुनरो ने यूरोपीय शक्तियों को चेतावनी देते हुए दिसंबर, 1823 में अपना प्रसिद्ध मुनरो सिद्धांत घोषित किया कि अमरीकी महाद्वीप में उपनिवेशों के लिए अब कोई संभावना नहीं है और यूरोप के देश इस ओर कुदृष्टि न ही डालें तो ही अच्छा है। राष्ट्रपति मुनरो की यह घोषणा यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था पर एक कुठाराघात था जिसके प्रहार से संघ कभी सँभल नहीं सका और उसका अंत हो गया। ब्रिटिश विदेश सचिव कैनिंग ने इस पर गर्व से कहा था: ‘‘मैने पुरानी दुनिया के संतुलन को ठीक करने के लिए नई दुनिया की सृष्टि कर दी है।’’

वास्तव में रूस, आस्ट्रिया और प्रशा औपनिवेशिक देश नहीं थे, इसलिए उन्हें प्रशांत या अटलांटिक महासागरों के उस पार जाकर हस्तक्षेप करने में कोई रुचि नहीं थी। फ्रांस अकेले कुछ करने की स्थिति में नहीं था और इंग्लैंड निश्चय ही इसका विरोध करता। इस प्रकार धीरे-धीरे अमेरीका के उपनिवेश स्वतंत्र होने लगे और उन्हें अमेरीका ही नहीं, इंग्लैंड की भी मान्यता मिलने लगी।

आजाद हिंद फौज और सुभाषचंद्र बोस

सेंट पीटर्सबर्ग के कांग्रेस (1825)

यूरोप के दक्षिण पूर्व स्थित बालकन प्रायद्वीप में तुर्की साम्राज्य लड़खड़ा रहा था और वहाँ राष्ट्रवादी शक्तियाँ उभर रही थीं। रूस के जार अलेक्जेंडर ने बालकन में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए जनवरी, 1825 में सेंट पीर्ट्सबर्ग में दो सम्मेलन बुलाये। इंग्लैंड इन सम्मेलनों की कार्यवाही से अलग रहा, जिससे इन सम्मेलनों की महत्ता कम हो गई। चूंकि बालकन प्रायद्वीप में आस्ट्रिया और रूस के हित टकराते थे, इसलिए आस्ट्रिया भी रूस के एकतरफा निर्णयों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। फ्रांस और इंग्लैंड भी रूस का साथ नहीं देते और संभवतः उसका सक्रिय विरोध करते। फलतः ये सम्मेलन असफल तो हो ही गये, इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो गई और यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था का विघटन हो गया।

मौर्योत्तरकालीन समाज, धार्मिक जीवन, कलात्मक एवं साहित्यिक विकास 

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था की असफलता के कारण

कई कारणों से यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था की असफलता अवश्यंभावी थी। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए समान आदर्श और समान हित या विभिन्न हितों के बीच महत्तम समीकरण की आवश्यकता होती है। यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था के सदस्य राष्ट्रों के बीच न तो राजनीतिक हितों में समानता थी और न ही शासन संस्थाओं में। जहाँ आस्ट्रिया, रूस और प्रशा निरकुंश तंत्र के पोषक थे, वहीं इंग्लैंड और फ्रांस प्रजातंत्र के। इस सैद्धांतिक मतभेद के कारण वे किसी एक समस्या पर एक दृष्टि से विचार कर ही नहीं सकते थे। आस्ट्रिया, प्रशा और रूस के शासक इस व्यवस्था का प्रयोग प्रजातंत्र की बाढ़ को रोकने के लिए एक बाँध के रूप में करना चाहते थे, जबकि इंग्लैंड इसको एक फाटक के रूप में प्रयुक्त चाहता था ताकि उदारता और राष्ट्रीयता की भावना का प्रवेश आवश्यकतानुसार होता रहे।

कासलरिया का मानना था कि चतुर्मुखी संघ को दूसरे शासकों तथा राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, जबकि इसके विपरीत रूस, प्रशा तथा आस्ट्रिया का मानना था कि यूरोप में शांति बनाये रखने के लिए किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया जा सकता है। वास्तव में प्रत्येक सदस्य यूरोप के आंतरिक तथा बाह्य मामलों पर केवल अपने हितों के अनुकूल ही सोचता था।

1830 की फ्रांसीसी क्रांति (जुलाई क्रांति) 

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था की स्थापना यूरोप में शांति बनाये रखने के लिए की गई थी। किंतु यूरोपीय व्यवस्था मेटरनिख के नेतृत्व में प्रतिक्रिया का एक साधन बन कर रह गई। प्रतिक्रियावादी राजनीतिज्ञों ने भरसक प्रयास किया कि यथास्थिति बनी रहे और घटनाओं की पुनरावृति न हो।। यूरोप ने क्रांति का स्वाद चखा था। क्रांति की व्यावहारिक उपलब्धियाँ- स्वतंत्रता, समानता तथा राष्ट्रीयता के सिद्धांत- नेपोलियन की विजयों के साथ सारे यूरोप में फैल चुकी थीं। राष्ट्रवादी चेतना तेजी से बढ़ रही थी, जबकि प्रतिक्रियावादी मेटरनिख और उनके सहयोगी यूरोपीय व्यवस्था को हथियार बनाकर उन्हें कुचलने का प्रयास कर रहे थे। फलतः लोकतंत्र, उदारवाद और राष्ट्रवाद की प्रगतिशील धारा के प्रबल वेग ने निरंकुश शासकों की इस प्रतिक्रियावादी व्यवस्था के बाँध को तोड़ दिया।

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था का कोई सांगठनिक ढ़ाँचा भी नहीं था। न तो इसका कोई अपना स्थायी कार्यालय था और न ही कोई कर्मचारी। यह तो नेपोलियन के युद्ध के बाद केवल शांति बनाये रखने की इच्छाओं का फल था। यूरोप के सभी देश चाहते थे कि कोई क्रांति या तानाशाह सिर न उठा सके, लेकिन साथ ही वे यह भी चाहते थे कि उनमें से कोई अधिक शक्तिशाली न हो जाये।

इसके अलावा, इंग्लैंड का रवैया शुरू से अन्य विजेताओं से अलग था। ऐसा नहीं था कि इंग्लैंड एक उदार और जनवादी देश था। वहाँ अनुदार पूँजीपतियों और सामंतों के हाथ में सत्ता थी और वे अपने उपनिवेशों, जैसे भारत में निरंतर हस्तक्षेप करते रहते थे, लेकिन यूरोप में वे हस्तक्षेप की नीति का विरोध करते थे। इससे एक तो यूरोप में कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बन सकता था, दूसरे उनके आदर्शवाद और प्रजातंत्र की हिमायत का मुखौटा भी बना रहता था। सबसे बड़ी बात तो यह कि उनके आर्थिक हित सुरक्षित रहते थे।

त्रिपुरी संकट : सुभाष बनाम गांधी 

यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था का महत्त्व

मेटरनिख की सारी व्यवस्था 1848 की क्रांति में जलकर राख हो गई। लेकिन अपनी तमाम कमजोरियों और गलतियों के बावजूद यूरोपीय व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के दिशा में पहला महत्त्वपूर्ण कदम था। युद्धकाल में एक दुश्मन के विरुद्ध कई देशों का सहयोग स्वाभाविक है, लेकिन शांतिकाल में शांति बनाये रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का यह अनोखा उदाहरण था। समय आने पर जब अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य रूप से बढ़ा तो यूरोप की संयुक्त-व्यवस्था जैसे प्रारंभिक प्रयोगों का इतिहास निश्चित ही काम आया।

इन्हें भी पढ़ सकते हैं-

भारत में प्रागैतिहासिक संस्कृतियाँ : मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल

सिंधुघाटी सभ्यता में कला एवं धार्मिक जीवन 

जैन धर्म और भगवान् महावीर 

शुंग राजवंश : पुष्यमित्र शुंग 

कुषाण राजवंश का इतिहास और कनिष्क महान 

भारत पर ईरानी और यूनानी आक्रमण 

आंग्ल-सिख युद्ध और पंजाब की विजय 

अठारहवीं शताब्दी में भारत

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता

सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधीजी

वियेना कांग्रेस

यूरोप में पुनर्जागरण पर बहुविकल्पीय प्रश्न-1 

प्राचीन भारतीय इतिहास पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-2 

प्राचीन भारतीय इतिहास पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-1 

जैन धर्म पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-1 

जैन धर्म पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-2

बौद्ध धर्म पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-1 

बौद्ध धर्म पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-2

बौद्ध धर्म पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-3

आधुनिक भारत और राष्ट्रीय आंदोलन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-1

आधुनिक भारत और राष्ट्रीय आंदोलन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-2 

आधुनिक भारत और राष्ट्रीय आंदोलन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-3  

आधुनिक भारत और राष्ट्रीय आंदोलन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-4 

आधुनिक भारत और राष्ट्रीय आंदोलन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-5

भारत के प्राचीन इतिहास पर आधारित क्विज-1 

भारत के मध्यकालीन इतिहास पर आधारित क्विज-1

नाथ पंथ और भारतीय संत साहित्य पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न-2023 

भारत के मध्यकालीन इतिहास पर आधारित क्विज-1 

सिंधुघाटी की सभ्यता पर आधारित क्विज 

भारत की प्रागैतिहासिक संस्कृति पर आधारित क्विज 

राष्ट्र गौरव पर आधारित क्विज 

Print Friendly, PDF & Email