नेपोलियन तृतीय : उपलब्धियाँ और मूल्यांकन (Napoleon III: Achievements and Evaluation)

नेपोलियन महान् का भतीजा चार्ल्स लुई नेपोलियन 1848 ई. की क्रांति के बाद द्वितीय फ्रांसीसी गणराज्य का राष्ट्रपति चुना गया और चार वर्ष बाद 2 दिसंबर 1852 ई. को गणतंत्र का लबादा फेंककर नेपोलियन तृतीय के नाम से द्वितीय फ्रांसीसी साम्राज्य का सम्राट बन गया और 1870 ई. में सेडान के युद्ध में बंदी बनाये जाने तक फ्रांस का सम्राट बना रहा था।

लुई नेपोलियन का आरंभिक जीवन (Early Life of Louis Napoleon)

नेपोलियन तृतीय सम्राट बनने से पहले लुई नेपोलियन कहलाता था, जिसका पूरा नाम चार्ल्स लुई नेपोलियन था। चार्ल्स लुई नेपोलियन का जन्म 19 अप्रैल 1808 ई. को पेरिस के राजमहल में हुआ था। उसका पिता नेपोलियन का छोटा भाई लुई बोनापार्ट हालैंड का राजा था। उसकी माँ हार्टेस डी बेहरानिस थी , जो नेपोलियन महान की पत्नी जोसेफिन की पहली शादी से पैदा हुई थी। लुई नेपोलियन का बचपन बड़े लाड़-प्यार और वैभव में बीता था।

वाटरलू के बाद के दिनों में नेपोलियन का परिवार बिखर गया और चार्ल्स लुई नेपोलियन अपनी माँ हार्टेस डी बेहरानिस के साथ स्विट्जरलैंड चला गया। उसके यौवन का अधिकांश भाग स्विट्जरलैंड तथा जर्मनी और इटली में ही बीता। लुई नेपोलियन उस वातावरण में शिक्षित एवं दीक्षित हुआ था, जहाँ उसकी पारिवारिक परंपराएँ फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्रीयता की पर्यायवाची बन गई थीं। लुई को विश्वास था कि एक दिन ऐसा जरूर आयेगा, जब वह फ्रांस के राजसिंहासन पर बैठेगा। वह कहता था ‘मैं उन व्यक्तियों में हूँ जिन्हें ईश्वर किसी देश का भाग्यविधाता बनाकर पैदा करता है।’ उसे लगता था कि यदि उसने नेपोलियन बोनापार्ट की तरह पेरिस में मार्च किया, तो फ्रांस के लोग उसके साथ उठ खड़े होंगे क्योंकि वह 1815 ई. में नेपोलियन बोनापार्ट के सौ दिनों के पेरिस मार्च के दौरान जनता के लोकप्रिय उत्साह को देख चुका था।

एक बार नेपोलियन ने किशोर लुई नेपोलियन की पीठ थपथपाकर कहा था कि ‘उसके वंश की आशाओं का केंद्र वही’ है और सचमुच जब 1815 ई. में नेपोलियन महान् के पतन के बाद उसका परिवार यूरोप ही नहीं, फ्रांस के भी क्रोध और घृणा का पात्र समझा जा रहा था और सारा वंश विस्मृति में खोता जा रहा था, लुई नेपोलियन अपनी लेखनी और क्रियाकलापों से इस नाम को जीवित रखने में लगा रहा। स्विट्जरलैंड में रहकर भी उसने इटली, पोलैंड और जर्मनी से संपर्क बनाये रखा और मौका मिलते ही वह फ्रांस में अपने वंश के प्रशंसकों से भी संबंध स्थापित करता था। उसने इटली के क्रांतिकारी दल कारबोनारी के सदस्य के रूप में 1831 ई. में पोप के विरूद्ध आंदोलन में भाग लिया था। लुई नेपोलियन एक ओर फ्रांस के गणतंत्रवादियों के साथ और दूसरी ओर पोलैंड के देशभक्तों के साथ मिलकर राजनीतिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहा।

लुई नेपोलियन के उत्थान की पृष्ठभूमि (Background of Louis Napoleon’s Rise)

1848 ई. की फरवरी क्रांति: 1789 और 1830 की क्रांतियों के कारण फ्रांस का सामंती ढाँचा ध्वस्त हो गया था। लेकिन लुई नेपोलियन को अपने लक्ष्य तक पहुँचने का अवसर 1848 ई. की फरवरी क्रांति के बाद मिला। लुई फिलिप बढ़ती हुई पूँजीवादी शक्तियों का प्रवक्ता बनकर फ्रांस पर शासन कर रहा था। लेकिन फ्रांस की अर्थव्यवस्था का स्वरूप पूरी तरह निर्धारित नहीं हो सका था। विभिन्न वर्गों में अंतर्द्वंद्व और संघर्ष पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। इसीलिए वह अपनी कार्यनीति ठीक से निर्धारित नहीं कर सका। फलतः 1848 ई. की क्रांति से उसका पतन हो गया।

लेकिन 1848 में भी फ्रांस में औद्योगिक क्रांति निर्णायक तत्व नहीं बन पाई थी और पूँजीवादी शक्तियाँ पूरी तरह देश की व्यवस्था पर हावी नहीं हो सकी थी। देश में समाजवाद की स्थिति भी अस्पष्ट और भ्रमपूर्ण थी। मजदूर असंतुष्ट और क्रियाशील तो थे, परंतु उनके पास सही नेतृत्व नहीं था। दूसरी ओर उदारवादी और प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ विभिन्न गुटों में संगठित थीं। देश की आंतरिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। नेपोलियन के पतन के बाद तीन दशकों में फ्रांस निष्क्रिय और गौण होता जा रहा था। ऐसी स्थिति में लुई नेपोलियन ने फ्रांसीसी जनता को अपनी बड़ी-बड़ी बातों के आकर्षण में बाँध लिया। फलतः उसके फ्रांस लौटने और नेशनल असेंबली में जाने का रास्ता खुल गया।

नेपोलियन की गाथाएँ: विश्व के इतिहास में नेपोलियन बोनापार्ट की ख्याति का एक प्रधान कारण यह है कि उसके बारे में तमाम तरह की रोचक कथाएँ प्रचलित हैं। इस करिश्माई ‘नेपोलियन’ नाम का लाभ उठाकर लुई नेपोलियन देश की सत्ता पर कब्जा करने में सफल हो गया। दरअसल लुई फिलिप के शासनकाल में नेपोलियन की गाथा एक राजनीतिक शक्ति बन गई थी। नेपोलियन बोनापार्ट एक नाम नहीं, एक वाद बन गया था। लुई नेपोलियन स्थितियों का लाभ उठाकर अपने और वंश के हित साधन की तैयारी में था ही। उसे बोनापार्टवादियों का भी समर्थन प्राप्त था। उसने 1848 की आपातकालीन और अस्पष्ट स्थिति में ऐसा कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जो फ्रांस की जनता के मर्म को छूता था। उसने प्रचारित किया कि ‘नेपोलियन एक नाम नहीं वरन एक कार्यक्रम है’ और चूंकि वह स्वयं भी नेपोलियन है, इसलिए वह स्वयं वे सारे कार्य कर सकता है जो उसके हमनाम और प्रख्यात सम्राट नेपोलियन ने किया था। फ्रांस की जनता किसी भी देश की जनता की तरह अत्यंत सरल थी जो बड़ी सहजता से नेपोलियन नामधारी लुई नेपोलियन के बहकावे में आ गई। फ्रांसीसी जनता को विश्वास हो गया कि लुई नेपोलियन के नेतृत्व में फ्रांस के गरिमामय इतिहास की पुनरावृत्ति होगी और वे एक बार पुनः यूरोप में सर्वश्रेष्ठ देश फ्रांस के निवासी होने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे। एक बार पुनः कहावत चरितार्थ हुई कि ‘फ्रांसीसी व्यक्ति दिमाग से नहीं, दिल से सोचता है।’

लुई नेपोलियन के सत्ता हथियाने के आंरभिक प्रयास (Louis Napoleon’s Initial Attempts to Seize Power)

1830 में जब फ्रांस में वंश-परिवर्तन हुआ था तो लुई नेपोलियन ने भी दाँव लगाने की सोची थी, लेकिन तब वह पूरी तरह तैयार नहीं था। 29 अक्टूबर 1836 को भी लुई नेपोलियन ने स्ट्रासबर्ग में दुर्गरक्षकों के सहयोग से सत्ता हथियाने का प्रयास किया, लेकिन उसे बंदी बना लिया गया। लुई फिलिप ने उसे इस शर्त पर जेल से छोड़ दिया कि वह निर्वासित होकर संयुक्त राज्य अमरीका चल जायेगा। किंतु लुई नेपोलियन अगस्त 1837 ई. में अमरीका से स्विट्जरलैंड भाग आया और फिर 1838 ई. में इंग्लैंड पहुँच गया।

लंदन में रहते हुए भी लुई सत्ता पर कब्जा करने के लिए फ्रांस लौटने का प्रयास करता रहा। उसने अपने चाचा नेपोलियन की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए 1839 ई. में नेपोलियन बोनापार्ट पर एक पुस्तक ‘नेपोलियन के विचार’ लिखी। लुई ने अपनी पुस्तक में इस तथ्य को स्थापित किया कि नेपोलियन प्रजातंत्र, राष्ट्रीयता, शांति और धर्म का संरक्षक और पोषक था। जबकि वस्तुतः नेपोलियन इन सिद्धांतों का जन्मजात विरोधी था। लुई नेपोलियन की इस पुस्तक के बाद फ्रांस में नेपोलियन के विचारों का प्रभाव इतना बढ़ गया कि लुई फिलिप को नेपोलियन महान् की अस्थियों को सेंट हेलेना से फ्रांस वापस मँगाना पड़ा। इस अवसर पर लुई नेपोलियन को लगा कि सत्ता हथियाने का यही सही समय है।

लुई नेपोलियन अगस्त 1840 ई. में लगभग 60 हथियारबंद लोगों के साथ बोलोन पहुँच गया। बोलोन में लुई की उपस्थिति लुई फिलिप के लिए खतरनाक हो सकती थी। इसलिए उसे गिरफ्तार कर उत्तरी फ्रांस में स्थित हाम के किले में बंद कर दिया गया। लेकिन लुई नेपोलियन ने अपने मुकदमे का भी पूरा फायदा उठाया और देश का आह्वान करते हुए एक ऐसा वक्तव्य दिया जो ऐतिहासिक साबित हुआ। उसने नाटकीय ढंग से कहा: ‘‘मैं एक सिद्धांत, एक कार्यक्रम और एक पराजय का प्रतिनिधि हूँ। सिद्धांत है जनता की सार्वभौमिकता; कार्यक्रम है साम्राज्य और पराजय है वाटरलू। सिद्धांत फ्रांस की जनता ने स्वीकार किया है। कार्यक्रम की उपलब्धियाँ फ्रांस को याद हैं। पराजय का प्रतिशोध लेना है।’’ लुई के इन शब्दों ने जादू-जैसा असर किया क्योंकि इसमें अतीत की गरिमामय स्मृति और उज्ज्वल भविष्य की संभावना थी। लुई जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गया कि नेपोलियन तो शांतिप्रिय और जनता का समर्थक था। उसे तो इंग्लैंड और अन्य मित्रों ने भड़काया था। अब लुई नेपोलियन की बातों ने फ्रांस में एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। उपयुक्त अवसर की तलाश में लुई नेपोलियन एक मजदूर के वेश में 25 मई 1846 ई. को हाम के किले से भाग निकला और लंदन पहुँच गया।

द्वितीय फ्रांसीसी गणराज्य और लुई नेपोलियन (Second French Republic and Louis Napoleon)

1848 ई. में लुई फिलिप के पतन के बाद फ्रांस ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था, लेकिन लुई नेपोलियन घात में था। क्रांति के नेताओं ने फ्रांस में एक अस्थायी सरकार बनाई, जिसमें गणतंत्रवादियों की प्रधानता थी। किंतु गणतंत्रवादियों के पास कोई कार्यक्रम नहीं था। वे पूरी तरह संगठित दल के रूप में भी नहीं थे। दूसरी ओर समाजवादी अल्पमत होते हुए भी अपेक्षतया अधिक संगठित थे। उनके पास एक कार्यक्रम था। अल्फोंस डी लामार्टिन जैसे गणतंत्रवादी इसी में संतुष्ट थे कि फ्रांस में राजतंत्र की स्थापना नहीं होगी; इसलिए वास्तव में समाजवादियों के ही कार्यक्रम लागू होने लगे। लेकिन उनके कार्यक्रम मौलिक परिवर्तन चाहते थे और जब वे मजदूरों के हितों के अनुकूल शासन का स्वरूप निर्धारित करने लगे तो संघर्ष अनिवार्य हो गया। समाजवादी राष्ट्रीय झंडे का रंग लाल चाहते थे जो मौलिक परिवर्तन का सूचक था। उदारवादियों ने इसका घोर विरोध किया। सावधानी और संगठन के अभाव में राष्ट्रीय वर्कशाप की योजना से भी न तो अपेक्षित लाभ हुआ और न ही उस अनुपात में उत्पादन बढ़ा। फलतः समाजवादियों को सुनियोजित ढंग से बदनाम किया जाने लगा।

इस बीच देश के नई असेंबली के चुनाव में गणतंत्रवादियों को भारी बहुमत मिला। 4 मई 1848 ई. को फ्रांस में पुनः गणतंत्र की घोषणा की गई। 15 मई 1848 ई. को समाजवादियों की भीड़ ने असेंबली को भंगकर पुनः अस्थायी सरकार की माँग की, किंतु लामार्टिन ने नेशनल गार्ड की सहायता से उपद्रवियों का दमन कर दिया। 24 से 26 जून 1848 ई. तक जून डेज विद्रोह में पुनः मजदूरों की भयंकर भीड़ ने सशस्त्र विद्रोह किया, जिसे कावान्याक ने सेना और स्वयंसेवकों की सहायता से कुचल दिया।

नये संविधान के अनुसार द्वितीय फ्रांसीसी गणराज्य का नेतृत्व सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार द्वारा चुने हुए राष्ट्रपति के द्वारा किया जाना था। अब राष्ट्रपति के चुनाव की तैयारी होने लगी। लुई नेपोलियन के लिए सही समय था, लेकिन अभी उसकी इतनी प्रतिष्ठा नहीं थी कि बड़े-बड़े नेताओं के सामने चुनाव जीत सके। अप्रैल 1848 ई. के पहले चुनाव में बोनापार्ट नाम एक राजनीतिक शक्ति बना रहा। नेशनल असेंबली के पहले चुनाव में बोनापार्ट परिवार के तीन सदस्य- जेरेम नेपोलियन बोनापार्ट, पियरे नेपोलियन बोनापार्ट और लुसियेत मुरात चुनाव जीत गये थे। सितंबर 1848 ई. में लुई नेपोलियन पाँच डिपार्टमेंट से नेशनल विधान परिषद का सदस्य चुना गया था, लेकिन राष्ट्रपति का चुनाव एक बड़ा चुनाव था। देश में गणतंत्रवादी बहुत प्रभावशाली थे और उनका उम्मीदवार कावान्याक प्रसिद्ध नेता था।

लुई नेपोलियन राष्ट्रपति के रूप में (Louis Napoleon as President)

नई व्यवस्था के अनुसार 10-11 दिसंबर 1848 ई. को फ्रांसीसी गणराज्य के राष्ट्रपति के लिए चुनाव हुए जिसमें कुल पाँच उम्मीदवार थे- जनरल कावान्याक, लामार्टिन, अलेक्जेंड्रे अगस्टे लेडरू-रोलिन, रास्पेल और लुई नोपोलियन, किंतु मुख्य लड़ाई कावान्याक और लुई नेपोलियन में ही थी। लुई नेपोलियन के नाम में ‘नेपोलियन’ जैसा चमत्कारी शब्द था और उसने अब तक हुए प्रचारों का पूरा लाभ उठाया। फलतः जब 20 दिसंबर को चुनाव के नतीजे आये, तो लुई नेपोलियन की जीत के आकड़े से सभी चौंक गये। सत्तर लाख मतदाताओं में लगभग अस्सी प्रतिशत ने लुई नेपोलियन को वोट दिया था। गणतंत्रवादी कावान्याक के 1,469,156 मत की तुलना में लुई नेपोलियन को 5,572,834 मत (74 प्रतिशत मत) मिले थे। इस प्रकार फ्रासीसी जनता ने एक बार फिर चरितार्थ किया कि फ्रांसीसी व्यक्ति दिमाग से नहीं, दिल से सोचता है।

नये संविधान के अनुसार व्यवस्थापिका के चुनाव हुए। राष्ट्रपति नेपोलियन ने सम्राट नेपोलियन की गाथाओं और उसके मनगढ़ंत कार्यक्रमों का अब और खुलकर प्रचार किया। परिणाम पुनः आश्चर्यजनक आये। एक ही वर्ष पहले जिस जनता ने गणतंत्रवादियों को भारी बहुमत से जिताया था, उसी ने इस बार राजतंत्र के समर्थकों को बहुमत दे दिया। गणतंत्र के भाग्य का फैसला उसी दिन हो गया था।

लुई नेपोलियन के कार्यक्रम और उद्देश्य (Louis Napoleon’s Program and Objectives)

लुई नेपोलियन अपने चाचा की तरह फ्रांस में साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। उसने फ्रांस में राजनीतिक सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए चार उददेश्य निर्धारित किये- क्रांति के सिद्धांतों की रक्षा, राष्ट्रीयता के सिद्धांत की रक्षा, शांति और धर्म की स्थापना। उसने राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण करने अवसर पर फ्रांस की जनता को शपथ का अक्षरशः पालन करने का आश्वासन दिया और यह स्पष्ट घोषित किया कि फ्रांस की स्थापित व्यवस्था को भंग करनेवाले को देश का शत्रु समझा जायेगा। लुई ने जनता को आश्वस्त किया कि वह जनता की प्रभुसत्ता का आदर करता है और करता रहेगा। हालांकि तानाशाह ऐसा कभी करते नहीं।

इसी बीच इटली में क्रांति हुई और पोप पर हमले हुए तो लुई नेपोलियन ने पोप की मदद करके फ्रांस की कैथोलिक जनता का समर्थन हासिल कर लिया। अब लुई नेपोलियन ने सुनियोजित ढंग से दोतरफा कार्यवाही शुरू की। पहले उसने अपने विरोधियों, गणतंत्रवादियों और विशेषकर समाजवादियों का दमन करना शुरू किया और दूसरे उसने चुनाव कानूनों में ऐसे परिवर्तन किये जिससे गरीब किसान और मजदूर, मतदाता न रह जाये।

लुई नेपोलियन सम्राट के रूप में (Louis Napoleon as Emperor)

1851 ई. में राष्ट्रपति लुई नेपोलियन की संविधान बदलने की कोशिश पर विधानसभा ने पानी फेर दिया। अब उसने शक्ति का प्रयोगकर जबरदस्ती राजसत्ता हथियाने का फैसला किया। 2 दिसंबर को आस्टरलिट्ज की विजय की वर्षगाँठ धूमधाम से मनाई जा रही थी, लुई नेपोलियन ने राष्ट्रीय विधानसभा को भंग कर दिया और नये चुनावों की घोषणा कर दी। उसने जनता का आह्वान किया कि फ्रांस को दुश्मनों से बचाने के लिए सन्नद्ध रहे। सेना ने पेरिस पर कब्जा करके हजारों विरोधियों को बंदी बना लिया। जनमत संग्रह में पचहत्तर लाख मतदाताओं में से उनहत्तर लाख (70 प्रशित) लोगों ने लुई नेपोलियन के पक्ष में मत दिया। इस प्रकार 1789 ई. की तरह फ्रांस का दूसरा गणतंत्र भी अल्प समय में ही काल-कवलित हो गया और लुई नेपोलियन ‘नेपोलियन तृतीय’ के नाम से फ्रांस का सम्राट बन गया।

नेपोलियन तृतीय का शासन-विधान (Government legislation of Napoleon III)

सम्राट बनते ही नेपोलियन तृतीय ने जनवरी 1852 ई. में फ्रांस को एक नया संविधान दिया, जो नेपोलियन प्रथम के संविधान का ही प्रतिरूप था। इस नये संविधान के अनुसार राज्य की संपूर्ण शक्ति सम्राट के हाथों में केंद्रित थी, वह मंत्रियों को नियुक्त और पदच्युत् कर सकता था। नये संविधान में व्यवस्थापिका सभा और सीनेट मुख्य सभाएँ थीं।

व्यवस्थापिका सभा: यह सभा सामान्य जनता द्वारा व्यस्क मताधिकार के आधार पर छः वर्षों के लिए चुनी जानी थी, किंतु इसके निर्वाचित प्रतिनिधियों की शक्ति अत्यंत सीमित थी और सर्वाधिकार सम्राट में निहित था। यह सभा वर्ष में केवल तीन महीने के लिए बुलाई जाती थी। इसे प्रस्ताव पेश करने का अधिकार नहीं था। सम्राट अपनी इच्छानुसार सभा को भंग और स्थापित कर सकता था।

सीनेट: संविधान की व्याख्या और उसमें संशोधन का अधिकार सीनेट को था, लेकिन इसके सदस्य सम्राट द्वारा ही नियुक्त किये जाने थे। इस प्रकार नेपोलियन के एकतंत्रीय शासन में निर्वाचन की व्यवस्था तो थी, लेकिन पदाधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण निर्वाचन के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने की संभावना नहीं थी।

नेपोलियन तृतीय की आंतरिक नीति (Internal Policy of Napoleon III)

नेपोलियन तृतीय अपने चाचा नेपोलियन बोनापार्ट की तरह समझता था कि फ्रांसीसी जनता स्वतंत्रता की अपेक्षा सुख, समृद्धि, स्वच्छ प्रशासन और सुव्यवस्था चाहती है। वह अपने पूर्वजों के अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए निरंकुशता को आवश्यक समझता था।

निरंकुश शासन की स्थापना (Establishment of Autocratic Rule)

नेपोलियन तृतीय का उद्देश्य फ्रांस को समृद्ध और शक्तिशाली बनाना था। सम्राट बनने के बाद कार्यपालिका की सारी शक्तियाँ उसके हाथों में केंद्रित हो गईं। व्यवस्थापिका और न्यायपालिका पर उसका पूरा नियंत्रण हो गया। न्यायाधीश सम्राट के आज्ञाकारी हो गये और विधायिका एक शक्तिहीन संस्था बनकर रह गई। प्रांतों में स्वशासन का कोई चिन्ह नहीं था, मंत्री से प्रीफेक्ट तक सभी उसके आज्ञाकारी कर्मचारी बनकर रह गये। कानूनी दृष्टि से तो नेपोलियन तृतीय की शक्ति जनता की इच्छा पर आधारित थी क्योंकि उसका निर्वाचन जनता ने किया था, किंतु वास्तव में सत्ता का अधिकार सैनिक तंत्र था जिस पर नेपोलियन तृतीय का पूरा नियंत्रण था।

नेपोलियन तृतीय ने नागरिक स्वतंत्रता और समाचारपत्रों पर कठोर नियंत्रण के लिए पुलिस की कड़ी व्यवस्था की और 17 फरवरी 1852 ई. को प्रेस सेंसरशिप लागू किया। सरकारी अधिकारियों को औपचारिक अवसरों पर वर्दी पहनना आवश्यक था। शिक्षा मंत्री को विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों को खारिज करने और उनके पाठ्यक्रमों की सामग्री की समीक्षा करने की शक्ति दे दी गई। उसने जनता से वादा किया कि स्थिति नियंत्रित होते ही देश की स्वतंत्रता पुनर्स्थापित हो जायेगी, यह दूसरी बात है कि कोई भी तानाशाह जनता से हड़पी हुई स्वतंत्रता कभी वापस नहीं करता और नेपोलियन ने भी ऐसा नहीं किया।

नेपोलियन तृतीय के सुधार (Reforms of Napoleon III)

अर्थव्यवस्था में सुधार (Improvement in Economy)

नेपोलियन के शासनकाल में फ्रांस का पूरी तरह औद्योगीकरण शुरू हुआ और पूँजीवादी व्यवस्था का विस्तार हुआ। यही कारण है कि फ्रांस का आर्थिक विकास हुआ जिससे देश की आमदनी और निर्यात बढ़ा। नेपोलियन तृतीय ने मध्यमवर्ग के हितों के प्रति उदारता की नीति अपनाई और लुई फिलिप के सभी मध्यमवर्गीय सुधारों को लागू किया। हालांकि इससे आम जनता के जीवन स्तर और स्थिति में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं हुआ।

व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन: नेपोलियन स्वतंत्र व्यापार में विश्वास रखता था। इसलिए उसने निजी उद्योगों एवं व्यवसायों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया। उसने फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण करने के लिए फ्रांसीसी बाजारों को विदेशी वस्तुओं के लिए खोल दिया। चूंकि नेपोलियन तृतीय स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका में लंबे समय तक रहा था, इसलिए उसने इन देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंधों में बहुत रुचि दिखाई। उसने 1860 ई. में ब्रिटेन के साथ एक व्यावसायिक संधि के बाद आयात कर घटा दिये जिससे फ्रांस का व्यापारी वर्ग असंतुष्ट हो गया। लेकिन उत्पादन इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि इस असंतोष का तत्काल कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।

बुनियादी ढाँचे के निर्माण: नेपोलियन तृतीय ने आर्थिक विकास के लिए बुनियादी ढाँचे के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई। उसने मार्सिले में एक नये गिरजाघर के साथ एक नये स्टॉक एक्सचेंज और एक चैंबर ऑफ कॉमर्स की आधारशिला रखी थी। सेंट साइमन के आर्थिक उदारवाद से प्रभावित होकर नेपोलियन तृतीय ने उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में मशीनों के प्रयोग तथा औद्योगिक कारपोरेशन की स्थापना को प्रोत्साहन दिया।

बैंकिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण: नेपोलियन तृतीय ने फ्रांसीसी बैंकिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण कर उनका विस्तार किया और उन्हें कृषि और उद्योग दोनों में ऋण देने के लिए प्रोत्साहित किया। नेपोलियन तृतीय के समय में अनेक नये बैंक खोले गये, जिससे व्यापारियों को पूँजी मिलना आसान हो गया। उसने 1852 ई. में पेरियर बंधुओं को क्रेडिट मोबिलियर जैसे नये बड़े बैंक की स्थापना को प्रोत्साहित किया, जो जनता को शेयर बेचते थे और निजी उद्योग और सरकार दोनों को ऋण प्रदान करते थे। उसने फ्रांस की राष्ट्रीय पूँजी बढ़ाने के लिए 1863 ई. में क्रेडिट लियानेस, क्रेडिट-फानसियर और 1864 ई. में सोसाइटी गेनेराले की स्थापना करवाई। बैंक आफ फ्रांस के कार्यक्षेत्र में वृद्धि करके उसे ऋण देने का अधिकार दिया गया।

फ्रांसीसी रेलवे का विस्तार: फ्रांस में रेलें पहले भी थीं, लेकिन नेपोलियन तृतीय ने पहली बार भारी पैमाने पर रेलवे के विकास को बढ़ावा दिया और उसके नेटवर्क का विस्तार किया। उसने 1855 ई. में गारे डे ल्योन और 1865 ई. में गारे डू नॉड जैसे दो नये रेलवे स्टेशनों का निर्माण करवाया। नई लाइनों के निर्माण के लिए ऋण की गारंटी दी गई और रेलवे कंपनियों को समेकित करने का प्रयास किया गया। रेलवे के नेटवर्क के विस्तार से कारखानों, उत्पादों और व्यापारियों के लिए कच्चे माल के परिवहन की सुविधा मिली। इसके अलावा नहरों, सड़कों, डाक-तार व्यवस्था का भी तेजी से विस्तार किया गया।

सामाजिक सुधार (Social Reform)

अपनी लोकप्रियता बनाये रखने के लिए नेपोलियन तृतीय ने जनहित के भी कई कार्य किये। असहाय और गरीबों के लिए शरणालय बनाये गये और प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त कर दिया गया।

नेपोलियन तृतीय अपने आपको ‘मजदूरों का सम्राट’ कहता था। उसने मजदूरों के लिए अच्छे एवं सस्ते आवास का प्रबंध किया और मजदूरों के लिए सहकारी समितियाँ गठित कीं। 1863 ई. में मजदूरों के ट्रेड यूनियन बनाने और 1864 ई. में फ्रांसीसी मजदूरों को हड़ताल करने का अधिकार दिया गया। फ्रांसीसी मजदूरों की मृत्यु और आकस्मिकता के लिए राज्य की गारंटी सहित ऐच्छिक बीमा की योजनाएँ लागू की गईं। इसके अलावा, नेपोलियन ने मजदूरों के कार्य के घंटों में कमी करके तथा अवकाश में वृद्धि करके मजदूरों को अधिक सुविधाएँ देने का प्रयास किया।

कृषि की उन्नति के प्रयास (Efforts to Promote Agriculture)

नेपोलियन तृतीय ने आधुनिक कृषि की स्थापना के लिए कृषियोग्य भूमि का पुनर्वितरण किया और कृषि समितियों गठन किया। कृषि के विस्तार के लिए जंगलों और दलदलों तक का इस्तेमाल किया गया। कृषि-शिक्षण हेतु कृषि विद्यालय खोले गये और अच्छे उत्पादन और पशुपालन पर पुरस्कार दिये जाने लगे।

लोक-निर्माण के कार्य (Public Works)

नेपोलियन ने सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं के अंतर्गत सड़कों, नहरों एवं पुलों के निर्माण के अलावा पेरिस, अल्सास, लारेन आदि नगरों में सुंदर इमारतों का निर्माण करवाया, मार्सिले और ले हावरे में नई शिपिंग लाइनें बनवाईं और बंदरगाहों का पुनर्निर्माण करवाया। वास्तव में पेरिस का सौंदर्य बढ़ाने में जितना काम इस समय हुआ, उतना शायद पहले कभी नहीं हुआ था। प्रसिद्ध स्थापत्यकार बेरेन आउसमान के निर्देशन में पेरिस की सड़कें चौड़ी की गईं, पार्क बनवाये गये और बाग लगवाये गये। कहते हैं कि आउसमान नक्शे पर सीधी लकीर खींच देता था और उसी के अनुसार सीधी सड़कें बनानी पड़ती थीं, भले ही उनके लिए पूरा का पूरा मुहल्ला क्यों न गिरा देना पड़े। नेपोलियन तृतीय के निर्माण-कार्यों के कारण पेरिस संसार का सबसे सुंदर एवं आकर्षक नगर बन गया।

नेपोलियन तृतीय ने जंगलों का विकास किया, दलदलों को सुखाने की व्यवस्था की और नदियों पर पुल बनवाये। उसने 1859 ई. और 1869 ई. के बीच स्वेज नहर का निर्माण करवाया जिसे पेरिस स्टॉक मार्केट के शेयरों द्वारा वित्त-पोषित किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी (International Exhibitions)

नेपोलियन तृतीय ने देश की बढ़ती समृद्धि के प्रदर्शन के लिए 1855 ई. और 1867 ई. में औद्योगिक प्रदर्शनी का आयोजन किया। उसने इस प्रदर्शनी के माध्यम से अपने देशवासियों और विदेशियों को भी फ्रांस की बढ़ती समृद्धि से परिचय कराया और इस प्रकार अपने शासन की उपयोगिता को सिद्ध करने का प्रयास किया।

धार्मिक सुधार (Religious Reform)

नेपोलियन तृतीय ने कैथोलिक होने के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से कैथोलिक धर्म को प्रमुखता प्रदान की और चर्च का संरक्षक बन गया। फ्रांस के अधिकांश शिक्षा केंद्र कैथोलिक स्कूल ही थे। नेपोलियन तृतीय ने विश्वविद्यालयों एवं सार्वजनिक विद्यालयों में पादरियों के प्रभाव में वृद्धि की और धार्मिक शिक्षा को अनिवार्य बना दिया। इतना ही नहीं, कैथोलिक पादरियों को बेतलहम के पवित्र चर्च के मुख्यद्वार की चाभी को दिलाने के लिए नेपोलियन ने क्रीमिया के युद्ध में भी भाग लिया।

इस प्रकार नेपोलियन ने जनता के प्रायः सभी वर्गों को संतुष्ट करने का प्रयास किया। किंतु इससे जनता को कोई वास्तविक लाभ नहीं हुआ। दरअसल नेपोलियन ने सामान्य लोगों के वही हित पूरे किये, जिनसे पूँजीपतिवर्ग के हितों का कोई विरोध या नुकसान नहीं था। उद्देश्य यह था कि समृद्धि और आर्थिक विकास के प्रदर्शन से जनता को खुश कर दिया जाये ताकि उसका ध्यान राजनीति की ओर न जाने पाये। किंतु ऐसा होना असंभव था।

राजनीतिक सुधार (Political Reforms)

फ्रांस की जनता नेपोलियन के सुधारों के भुलावे में कब तक रहती? अंततः जब जनता में असंतोष बढ़ने लगा तो 1860 ई. के बाद एक उदार साम्राज्य का ढाँचा खड़ा किया गया और फ्रांस के राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये। सबसे पहले 1860 ई. में संविधान में परिवर्तन किया गया और व्यवस्थापिका सभा को वर्ष में एक बार साम्राज्य की नीति पर बहस करने तथा उसकी आलोचना करने का अधिकार देकर उत्तरदायी शासन की ओर कदम बढ़ाया गया। 1867 ई. में मंत्रियों से प्रश्न पूछने का अधिकार भी विधानसभा को मिल गया। 1868 ई. में समाचारपत्रों पर लगा नियंत्रण भी ढीला कर दिया गया और सार्वजनिक भाषण देने की अनुमति मिल गई।

किंतु इन रियायतों से विरोध का स्वर दबने के बजाय और बढ़ गया। अंत में, अपने पतन के कुछ ही दिनों पहले उसने व्यवस्थापिका सभा को पूरा अधिकार दे दिया और ब्रिटेन जैसी राजनीतिक व्यवस्था लागू की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

नेपोलियन तृतीय की वैदेशिक नीति (Foreign Policy of Napoleon III)

जिन संभावनाओं और सिद्धांतों को आधार बनाकर नेपोलियन तृतीय सफलता मिली थी, उन्हें मूर्तरूप देने के लिए एक सुदृढ़ और सक्रिय वैदेशिक नीति अपनाये जाने की आवश्यकता थी। यूरोप की राजनीति में फ्रांस को निर्णायक भूमिका मिले और फ्रांस को लाभ भी हो, इसके लिए युद्ध और कूटनीति दोनों ही स्तरों पर संगठित और दूरदर्शी प्रयास की आवश्यकता थी। किंतु लुई नेपोलियन न तो स्वयं एक अच्छा जनरल था और न ही उसके पास कोई योग्य युद्धमंत्री था। उसमें कूटनीतिक कुशलता और दृढ़ता भी नहीं थी। उसके पास तालिरां जैसा कोई मंत्री भी नहीं था। फलतः नेपोलियन तृतीय ने अपनी अस्थिर, ढुलमुल और कमजोर वैदेशिक नीति के अंतर्गत कई ऐसे कार्य किये, जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय राष्ट्र नेपोलियन महान् की ही भाँति उसे भी कुटिल, स्वार्थी और स्वतंत्रता का अपहारक समझने लगे और उसके पतन का मार्ग खुल गया।

पोप की सहायता (Pope’s Help)

सत्तारूढ़ होते ही नेपोलियन तृतीय के सामने इटली में पोप के राज्य पर मेजिनी के समर्थकों द्वारा अधिकार का प्रश्न आ खड़ा हुआ। उसने राष्ट्रवादिता का हमेशा पक्ष लिया था और इटली में उसे राष्ट्रवादियों का समर्थन करना चाहिए था, लेकिन उसने देश की बहुसंख्यक कैथोलिक जनता को संतुष्ट करने के लिए धर्म के नाम पर इटली में हस्तक्षेप किया और पोप को फिर से पदासीन करके उसकी सुरक्षा का प्रबंध कर दिया। इससे अपने देश में उसकी लोकप्रियता बढ़ी और फ्रांस का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्व भी बढ़ा, लेकिन उसकी नीतियों का अंतर्विरोध भी प्रकट हो गया।

क्रीमिया का युद्ध और नेपोलियन तृतीय (War of Crimea and Napoleon III)

पूर्वी समस्या में यूरोप की सारी बड़ी शक्तियाँ उलझी हुई थीं। पतनोन्मुख तुर्की साम्राज्य के बाल्कन और काला सागर के आसपास के क्षेत्रों में रूस अपना विस्तार करना चाहता था। वह तुर्की के विरुद्ध था और इंग्लैंड इस विरोध को अपने औपनिवेशिक हितों और सामुद्रिक प्रभुता के विरुद्ध समझता था। इस प्रकार तनाव इंग्लैंड और रूस के बीच था। लुई नेपोलियन ने एक तीर से कई शिकार करना चाहा। उसे सम्राट बनने के बाद अपनी सफलता का प्रमाण देना था, रूस को युद्ध में पराजित करके नेपोलियन प्रथम के मास्को अभियान की असफलता का बदला भी लेना था। उसने रोमन कैथोलिक चर्च का पक्ष लेकर तुर्की साम्राज्य में स्थित पवित्र स्थानों के संरक्षण का मुद्दा उठाया। रूस इन पवित्र स्थानों को अपने संरक्षण में मानता था। जब रूस ने मोल्डेविया और वैलेशिया पर आक्रमण किया तो फ्रांस ने काला सागर में अपनी नौसेना भेज दी। फ्रांस का साथ इंग्लैंड दे रहा था। क्रीमिया का निरर्थक युद्ध दो वर्षों तक चलता रहा और निर्णय नहीं हो सका। रूस का पक्ष कमजोर पड़ रहा था और सेबास्तोपोल में रूसी किले का पतन हो गया। अंत में 1856 में निर्णय के लिए नेपोलियन की अध्यक्षता में पेरिस की संधि हुई। इस संधि में न तो रूस का कोई बड़ा नुकसान हुआ न इंग्लैंड या फ्रांस को कोई वास्तविक लाभ हुआ। लेकिन नेपोलियन की प्रतिष्ठा को आवश्यक बल जरूर मिला। अब वह दावा कर सकता था कि फ्रांस का पुनः बड़े राष्ट्रों में स्थान हो गया है तथा वह यूरोप की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। नेपोलियन की यह पहली और अंतिम सफलता थी।

नेपोलियन तृतीय और इटली (Napoleon III and Italy)

नेपोलियन परिवार का इटली से घनिष्ठ लगाव था क्योंकि इस परिवार की जन्मभूमि कार्सिका द्वीप मूलतः इटालियन था और बोनापार्ट परिवार भी इटालियन था। नेपोलियन तृतीय शुरू से ही इटली की राजनीति में सक्रिय था और कारबोनारी का सदस्य रह चुका था। वह इटली के एकीकरण का पक्षधर था। उसके सम्राट बनने पर इटली को आशा बँधी कि फ्रांस से सहायता जरूर मिलेगी। उसके समर्थन की आशा में ही इटली के कावूर ने क्रीमिया के युद्ध में अपनी सेना भेजी थी। 1856 ई. की पेरिस की संधि में आस्ट्रिया के विरोध के बावजूद कावूर ने इटली के एकीकरण की बात उठाई थी। इसी क्रम में इटली के राजा विक्टर एमैनुअल प्रथम की पुत्री का विवाह नेपोलियन तृतीय के भाई जेरोम के साथ संपन्न हुआ था।

प्लाम्बियर्स की संधि : कावूर के नेतृत्व में पीडमांट-सार्डीनिया ने इटली के एकीकरण के लिए आस्ट्रिया से युद्ध करने का निर्णय किया। इस संबंध में कावूर जुलाई 1858 ई. में प्लाम्बियर्स में नेपोलियन तृतीय से मिला। प्लाम्बियर्स समझौते के अनुसार नेपोलियन तृतीय ने सेवाय तथा नीस के बदले लोम्बार्डी तथा वोनेशिया से आस्ट्रिया को निकालने में तथा उत्तर इटली में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सार्डीनिया को सैनिक मदद देने का वादा किया। यह सौदेबाजी थी, मदद नहीं। लेकिन कावूर मजबूर था और उसे हर कीमत पर फ्रांस की मदद चाहिए थी।

आस्ट्रिया के विरूद्ध इटली की सहायता (Italy’s Help Against Austria)

नेपोलियन तृतीय के वादे से आश्वस्त होकर सार्डीनिया ने 1859 ई. में आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध आरंभ कर दिया। वादे के अनुसार फ्रांस की सेना ने सार्डीनिया की सेना के साथ लोम्बार्डी में प्रवेश किया और मिलान पर अधिकार कर लिया। 24 जून 1859 ई. को सोलफेरिनो के युद्ध में आस्ट्रिया की सेना पुनः पराजित हुई। तभी नेपोलियन को लगा कि कैथोलिक आस्ट्रिया के विरूद्ध सार्डीनिया की मदद करने से पोप असंतुष्ट होगा और उसके देश की कैथोलिक जनता भी उसके विरूद्ध हो जायेगी। फलतः उसने फौरन कावूर का साथ छोड़ दिया और 1859 ई. आस्ट्रिया के साथ बेलाफ्रांका की संधि कर ली। इस विश्वासघात से नेपोलियन की प्रतिष्ठा को बहुत घक्का लगा और इटली से फ्रांस के संबंध खराब हो गये।

यद्यपि नेपोलियन तृतीय ने समझौते की शर्ते पूरी नहीं की थी, फिर भी 24 मार्च 1860 ई. की ट्यूरिन की संधि के अनुसार उसने नीस और सेवाय ले लिया। परंतु नेपोलियन तृतीय की गद्दारी से इटली सदा के लिए असंतुष्ट हो गया। आस्ट्रिया तो नाराज था ही, फ्रांस की कैथोलिक जनता भी इटली की मदद से असंतुष्ट थी। बाद में समझौता भंग करके भी वह किसी को संतुष्ट नहीं कर सका। सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि उसका विश्वास समाप्त हो गया और यूरोपीय राष्ट्र नेपालियन को विश्वासघाती और प्रतिक्रियावादी समझने लगे।

जब गैरीबाल्डी ने रोम पर हमला किया, तब फिर उसने पोप की रक्षा के लिए रोम में स्थायी तौर पर सैनिक टुकड़ी लगा दी। लेकिन इससे भी कैथोलिक संतुष्ट नहीं हुए। अंत में, जब प्रशा से युद्ध की नौबत आई, तो उसे रोम से अपनी सेना बुलानी पड़ी। उसकी इटालियन नीति से फ्रांस को नीस जैसा सुंदर नगर तो मिल गया, लेकिन यह उपलब्धि उसकी धूर्तता को ढ़क नहीं सकी। इस अवसरवादिता से वह विदेशों में तो बदनाम हुआ ही, अपने देश में भी उसका सम्मान गिर गया।

पोलैंड का विद्रोह (Poland Revolt)

अठारहवीं शताब्दी में पड़ोसियों ने पोलैंड को हड़प लिया था। 1863 में जब वहाँ के पोल लोगों ने विद्रोह किया तो उन्हें आशा थी कि राष्ट्रीयता और कैथोलिक चर्च का पक्षघर नेपोलियन तृतीय उनकी मदद करेगा। नेपोलियन तृतीय की रूस विरोधी नीति पोल लोगों के पक्ष में थी क्योंकि वे भी जार के विरुद्ध थे। लेकिन पोल लोग आस्ट्रिया और प्रशा में भी थे और नेपोलियन उनकी मदद करके आस्ट्रिया और प्रशा को रुष्ट नहीं करना चाहता था। इसलिए उसने पोल लोगों को केवल नैतिक समर्थन दिया, उनकी कोई वास्तविक सहायता नहीं की। इससे पोलिश जनता भी नेपोलियन तृतीय के विरूद्ध हो गई। इस प्रकार नेपोलियन तृतीय ने इस अवसर पर सभी देशों को अपने पक्ष में करने का स्वर्णिम अवसर गवाँ दिया।

नेपोलियन तृतीय का मैक्सिको अभियान (Mexico Campaign of Napoleon III)

नेपोलियन तृतीय ने 1861 ई. और 1867 ई. के बीच फ्रांसीसी प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करने के लिए मैक्सिको अभियान किया। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के दक्षिण स्थित विशाल देश मैक्सिको स्पेन से मुक्ति के बाद आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था। मैक्सिको में आपसी अंतर्कलह के बाद मिरामन को पदच्युत कर वेनिटो ज्वारेज राष्ट्रपति बनाये गये थे। मैक्सिको की सरकार ने यूरोप के बैंकरों से कर्ज लिया था। आर्थिक विकास ठीक से न होने के कारण ब्याज या कर्ज का भुगतान करने में कठिनाई हो रही थी जिसके कारण राष्ट्रपति ज्वारेज ने देय ऋणों का भुगतान करने से इनकार कर दिया। फ्रांस, स्पेन तथा इंग्लैंड के बीच लंदन में 1861 में एक संधि हुई और जनवरी 1862 ई. एक मिली-जुली नौसेना ने मैक्सिको पर आक्रमण कर दिया। जब ज्वारेज ने ऋणों की अदायगी करना स्वीकार कर लिया, तो इंग्लैंड और स्पेन ने अपनी सेनाएँ वापस बुला ली, लेकिन नेपोलियन वहीं डटा रहा। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति मुनरो ने 1823 ई. में ही घोषणा कर दी थी कि अमेरिकी महाद्वीपों में यूरोपीय हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। लेकिन इस समय अमेरिका गृहयुद्ध में व्यस्त था।

वास्तव में नेपोलियन तृतीय मैक्सिको की गणतंत्रवादी सरकार को हटाकर मैक्सीमिलियन को राजा बनाना चाहता था जो आस्ट्रिया के सम्राट जोसेफ का भाई और बेल्जियम के सम्राट लियोपोल्ड का दामाद था। मैक्सिको की गणतंत्रीय सरकार के चर्च से संबंध अच्छे नहीं थे। यह एक और बहाना था। उसने सोचा था कि इस अभियान से ईसाई लोगों का समर्थन मिलेगा। नेपोलियन तृतीय ने मैक्सीमिलियन को मैक्सिको के सिंहासन पर बैठा दिया। लेकिन मैक्सिको जैसे विस्तृत देश पर पूरी तरह प्रभुत्व जमाना आसान नहीं था। 1865 ई. में ज्वारेज ने भारी पैमाने पर गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया, जिससे मैक्सीमीलियन की नींद हराम हो गई। जैसे ही अमरीका का गृहयुद्ध समाप्त हुआ, अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने मुनरो सिद्धांत के आधार पर मेक्सिको में हस्तक्षेप करने की घोषणा कर दी। अंततः अपमानित होकर नेपोलियन को मैक्सिको से अपनी सेना वापस हटानी पड़ी, जिससे आस्ट्रिया और बेल्जियम भी नेपोलियन से नाराज हो गये। बेसहारा मैक्सीमीलियन राष्ट्रभक्तों की गोली का शिकार हो गया। नेपोलियन तृतीय के मैक्सिको अभियान में सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि वह इन वर्षों में यूरोप की राजनीति में आवश्यक ध्यान नहीं दे सका।

बिस्मार्क और नेपोलियन तृतीय (Bismarck and NapoleonIII)

इसी बीच बिस्मार्क ने सुनियोजित ढंग से प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण करना शुरू किया था। उसने फ्रांस और आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की योजना बनाई। अपनी योजना के पहले चरण में उसने आस्ट्रिया के साथ मिलकर 1864 ई. में डेनमार्क को पराजित किया। पौलैंड में व्यस्त रहने के कारण रूस ने तटस्थता की नीति अपनाई, जबकि इंग्लैंड एकाकीपन की नीति पर चल रहा था। मैक्सिको में व्यस्त होने के कारण नेपोलियन भी इस ओर ध्यान नहीं दे सका।

बिस्मार्क जानता था कि जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रशा का आस्ट्रिया से युद्ध होना इतिहास की माँग है। उसने आस्ट्रिया को मित्रविहीन करने के लिए 1865 ई. में ही तैयारी आरंभ कर दी थी। फ्रांस ही एक मात्र ऐसा देश था, जो आस्ट्रिया की मदद कर सकता था। बिस्मार्क ने नेपोलियन तृतीय से वियारिज में गुप्त रूप से भेंट की और नेपोलियन तृतीय को कुछ सीमांत प्रदेशों का लालच देकर आस्ट्रिया-प्रशा के बीच होनेवाले युद्ध में तटस्थ रहने आश्वासन ले लिया।

सेडोवा का युद्ध: फ्रांस की तटस्थता का आश्वासन पाकर बिस्मार्क ने आस्ट्रिया को सेडोवा के युद्ध (1866 ई.) में पराजित कर दिया और दोनों के बीच प्राग की संधि हो गई। इस प्रकार सेडोवा में तटस्थ रहकर नेपोलियन ने प्रशा की शक्ति को बढ़ाने में मदद की। सेडोवा में बिस्मार्क की विजय और आस्ट्रिया की पराजय से नेपोलियन की आँखें खुली रह गईं। निश्चित था कि सेडोवा में फ्रांस की भी पराजय हुई थी। अब नेपोलियन को अफसोस हुआ कि यदि उसने आस्ट्रिया की मदद की होती, तो फ्रांस की सीमा पर प्रशा जैसे शक्तिशाली राष्ट्र का उदय नहीं होता।

नेपोलियन तृतीय की कूटनीतिक विफलता (Napoleon III’s Diplomatic Failure)

प्रशा के उत्थान और आस्ट्रिया की पराजय से फ्रांस में नेपोलियन के प्रति असंतोष बढता जा रहा था। अब उसने प्रशा पर दबाव डालना शुरू किया कि यदि उसे लाभ नहीं मिलेगा तो वह शांत भी नहीं बैठेगा। उसने अपनी तटस्थता के बदले जर्मन क्षेत्र का कुछ हिस्सा लेना चाहा। बिस्मार्क ने उसे कोई साफ उत्तर नहीं दिया। वह कभी बेल्जियम की माँग करता, कभी लुक्सेमबुर्ग की और कभी पैलेटिनेट की। बिस्मार्क बड़ी चालाकी से उसकी माँगें अन्य देशों के सामने रख देता। बेल्जियम की तटस्थता और सुरक्षा के लिए इंग्लैंड प्रतिबद्ध था। जब उसे पता चला कि नेपोलियन की आँख बेल्जियम पर लगी है, तो इंग्लैंड सशंकित हो उठा। जब जर्मनी के राज्यों को इसका पता चला तो वे भी क्षुब्ध होकर प्रशा के निकट आने लगे। आस्ट्रिया तो नाराज था ही। स्थिति यह हो गई कि फ्रांस का कोई कोई साथ देनेवाला नहीं रह गया था। फिर भी, नेपोलियन को बिस्मार्क की चाल का पता नहीं चला।

स्पेन के उत्तराधिकार का मुद्दा (Spain’s Succession Issue)

बिस्मार्क फ्रांस से निपटने के लिए तैयार बैठा था। इसी बीच स्पेन के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर प्रशा और फ्रांस एक-दूसरे के सामने आ गये। स्पेन की जनता ने 1863 ई. में रानी ईसाबेला द्वितीय को देश से निकालकर लियोपोल्ड को नया शासक बनाना चाहा। लियोपोल्ड प्रशा के सम्राट का रिश्तेदार था, इसलिए नेपोलियन तृतीय ने लियोपोल्ड का विरोध किया। यद्यपि नेपोलियन के विरोध के कारण लियोपोल्ड ने स्वयं अपनी उम्मीदवारी का परित्याग कर दिया, किंतु फ्रांस ने प्रशा से आश्वासन चाहा कि भविष्य में भी प्रशा अपने किसी प्रतिनिधि या राजकुमार को स्पेन का शासक नियुक्त करने का प्रयास नहीं करेगा।

एम्स का तार: स्पेन के उत्तराधिकार की समस्या को लेकर फ्रांस के राजदूत और प्रशा के शासक एम्स नामक नगर में मिले। प्रशा के सम्राट ने फ्रांसीसी राजदूत के साथ अपनी बातचीत का ब्यौरा तार द्वारा बिस्मार्क को भेज दिया। बिस्मार्क ने अत्यंत चतुराई से एम्स के तार की भाषा में संशोधन करके इस तरह पेश किया कि फ्रांस और प्रशा दोनों ही देशों की जनता क्षुब्ध हो गई।

सेडान का युद्ध और नेपोलियन तृतीय का पतन (The Battle of the Sedans and the Fall of Napoleon III)

बिस्मार्क के भड़काने पर नेपोलियन तृतीय को 19 जुलाई 1870 ई. को प्रशा के साथ सेडान का युद्ध लड़ना पड़ा। वास्तव में सेडान का युद्ध फ्रांस पर थोपा गया था, लेकिन यह युद्ध इस तरह प्रारंभ हुआ कि फ्रांस को ही पहल करनी पड़ी। बिस्मार्क तो युद्ध के लिए तैयार ही था। नेपोलियन को बिना पूरी तैयारी के प्रशा से लड़ना पड़ा। इस युद्ध में उसकी शासन-व्यवस्था का खोखलापन पूरी तरह स्पष्ट हो गया। सेना की हालत यह थी कि जहाँ तोप थी वहाँ गोले नहीं और जहाँ सेनापति थे वहाँ सेना नहीं। घोर अव्यवस्था और नेतृत्व के अभाव से पराजय सुनिश्चित थी। फलतः कुछ ही हफ्तों की लड़ाई में नेपोलियन को 85 हजार सैनिकों के साथ जनरल मोल्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा।

नेपोलियन की पराजय का समाचार पेरिस पहुँचते ही 4 सितंबर 1870 ई. को फ्रांस में द्वितीय साम्राज्य के स्थान पर ‘तृतीय गणतंत्र’ की घोषणा कर दी गई। युद्ध के अंत तक नेपोलियन तृतीय वेस्टफेलिया में कैद रहा और युद्ध की समाप्ति पर उसे इंग्लैंड जाने की अनुमति मिली, जहाँ 9 जनवरी 1873 को उसकी मृत्यु हो गई।

नेपोलियन तृतीय का मूल्यांकन (Evaluation of Napoleon III)

नेपोलियन तृतीय एक शांतिप्रिय, प्रजावत्सल सम्राट था। उसके बारे में कहा जाता है कि ‘वह घोड़े की पीठ पर बैठा हुआ सेंट साइमन था। उसने मध्यम वर्ग, पूँजीपतियों और किसानों-मजदूरों सभी के हित के कार्य किये। फ्रांस की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए क्रीमिया के युद्ध में हिस्सा लिया और ‘उदार साम्राज्य’ स्थापित करने के लिए राजनीतिक सुधार भी किये। उसने सारे देश में निर्माण-कार्य करवाया जिससे फ्रांस की राजधानी यूरोप की सुंदरतम नगरी बन गई। इन कार्यों में उसे प्रारंभ में सफलता भी मिली और पेरिस सम्मेलन के बाद फ्रांस फिर यूरोप के महान राज्यों में गिना जाने लगा।

वास्तव में नेपोलियन तृतीय ने देश में इतिहास की दुहाई देकर सफलता प्राप्त की थी। लेकिन वह स्वयं इतिहासग्रस्त हो गया था। उसने सोचा था कि फ्रांस के सभी वर्गों को खुश कर क्रांति और औद्योगिक क्रांति की उपलब्धियों का समन्वय करता हुआ वह राष्ट्रीय नेता बन सकेगा और देश के विभिन्न दलों के मुकाबले वह अपना ‘राष्ट्रीय दल’ संगठित कर सकेगा। उसने सबको खुश करने का प्रयास तो किया लेकिन वह किसी को भी खुश नहीं कर सका और एक दिन ऐसा भी आया जब सभी उससे नाराज होकर उसके विरोधी हो गये।

दरअसल नेपोलियन तृतीय का साम्राज्य अंतर्विरोधों पर खड़ा था। सबको खुश करने की कोशिश में वह सबको नाराज करता चला जा रहा था। पोप का पक्ष लेकर भी वह कैथोलिकों को संतुष्ट नहीं कर सका। उसके तमाम सुधारों के बावजूद जनसाधारण के जीवन में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं आया। मध्यवर्ग और पूँजीपतियों को प्रोत्साहन देने के बावजूद इंग्लैंड को व्यापारिक रियायतें देने से फ्रांसीसी उद्योगपति और व्यापारी भी उससे असंतुष्ट थे। उसकी स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता के कारण फ्रांसीसी बृद्धिजीवी भी उसके विरोधी थे। सेना को भी वह आश्वस्त और प्रेरित नहीं कर पाता था क्योंकि वह न तो सैनिक था और न ही युद्ध-प्रेमी। फ्रांस को सम्मान दिलाने के प्रयास में वह ऐसी हरकतें करता गया जिससे उसका ही अपमान हुआ। इटली, मैक्सिको, जर्मनी हर जगह की कूटनीति में उसने अपने को अनाड़ी सिद्ध किया और उसकी चाल विफल हुई। उसकी अस्थिर और ढुलमुल विदेश नीति के कारण यूरोप के प्रायः सभी राष्ट्र उसके विरोधी हो गये और अंततः उसके साम्राज्य का पतन हो गया।

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