परवर्ती मुगल सम्राट (1707-1857 ई.)
औरंगजेब की मृत्यु के बाद जिन ग्यारह मुगल बादशाहों ने भारत पर शासन किया, उन्हें ‘उत्तरकालीन मुगल सम्राट’ कहा जाता है। मुगल साम्राज्य अपने अभूतपूर्व विस्तार, विशाल सैन्य शक्ति, और सांस्कृतिक उपलब्धियों के बावजूद अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में अवनति की ओर बढ़ने लगा था। औरंगजेब का शासनकाल मुगलों का सांध्यकाल था, क्योंकि इस समय मुगल साम्राज्य को अनेक समस्याओं ने कमजोर करना शुरू कर दिया था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद के बावन वर्षों में आठ बादशाह दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए, किंतु वे इतने अयोग्य और दुर्बल थे कि पतनशील साम्राज्य को संभाल नहीं सके। देश के विभिन्न भागों में देशी और विदेशी शक्तियों ने छोटे-बड़े राज्य स्थापित कर लिए। बंगाल, अवध, और दकन जैसे अनेक प्रदेश मुगल नियंत्रण से बाहर हो गए। दक्षिण में निजाम-उल-मुल्क, बंगाल में मुर्शिद कुली खाँ, और अवध में सआदत अली खाँ ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इसी मार्ग का अनुसरण रुहेलखंड के अफगान पठानों ने भी किया। मराठों ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मालवा और गुजरात पर अधिकार करके पुणे को अपनी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना लिया। इसके बावजूद, मुगल साम्राज्य का प्रभाव इतना था कि इसका पतन धीमी गति से हुआ। अठारहवीं शताब्दी के चौथे दशक के अंत से उत्तर-पश्चिम की ओर से विदेशी आक्रमणकारियों ने साम्राज्य पर प्रहार शुरू कर दिया, और यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ भी भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगीं। वास्तव में, 1737 ई. में बाजीराव प्रथम और 1739 ई. में नादिरशाह के दिल्ली पर आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य की कमजोरी को उजागर कर दिया और 1740 ई. के बाद इसका पतन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
बहादुर शाह प्रथम (1707-1712 ई.)
मुख्य लेख : बहादुर शाह प्रथम
बहादुर शाह प्रथम दिल्ली का सातवाँ मुगल बादशाह था, जिसका मूल नाम ‘कुतुबुद्दीन मुहम्मद मुअज्जम’ था। उनका पूरा नाम ‘अबुल नासिर सैय्यद कुतुबुद्दीन मुहम्मद शाह आलम बहादुर शाह’ था। उनका जन्म 14 अक्टूबर 1643 ई. को बुरहानपुर में हुआ था, और वे औरंगजेब के दूसरे पुत्र थे। उनकी माता नवाब बाई थीं, जो राजौरी के राजा राजू की पुत्री थीं। बहादुर शाह प्रथम को ‘शाह आलम प्रथम’ या ‘आलमशाह प्रथम’ के नाम से भी जाना जाता है।

औरंगजेब ने 1663 ई. में बहादुर शाह प्रथम को दक्षिण के दकन और मध्य भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। 1683-84 ई. में उन्होंने दक्षिण बंबई (वर्तमान मुंबई) में गोवा के पुर्तगाली क्षेत्रों में मराठों के खिलाफ सेना का नेतृत्व किया, किंतु पुर्तगालियों की सहायता न मिलने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। 1699 ई. में औरंगजेब ने उन्हें काबुल (वर्तमान अफगानिस्तान) का सूबेदार नियुक्त किया।
मुगल शहजादों में उत्तराधिकार के लिए अक्सर खूनी संघर्ष होता था। औरंगजेब के सबसे महत्वाकांक्षी पुत्र अकबर ने अपने पिता के खिलाफ विद्रोह किया था और औरंगजेब की मृत्यु से बहुत पहले ही निर्वासन में उनकी मृत्यु हो गई थी। इस प्रकार औरंगजेब की मृत्यु के समय उनके केवल तीन पुत्र जीवित थे: मुहम्मद मुअज्जम, मुहम्मद आजम और मुहम्मद कामबख्श। इनमें मुअज्जम सबसे ज्येष्ठ थे, जो पेशावर के सूबेदार थे।
औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 ई. को अहमदनगर में हुई। इस सूचना के मिलते ही मुहम्मद मुअज्जम पेशावर से आगरा की ओर रवाना हुए। उन्होंने लाहौर के उत्तर में ‘पुल-ए-शाह’ नामक स्थान पर 22 अप्रैल 1707 ई. को ‘बहादुर शाह’ के नाम से अपना राज्याभिषेक किया।
उत्तराधिकार का युद्ध
उत्तराधिकार के लिए मुअज्जम को अपने छोटे भाइयों- मुहम्मद आजम और मुहम्मद कामबख्श से युद्ध करना पड़ा। उन्होंने बूँदी के बुधसिंह हाड़ा और अंबर के विजयसिंह कछवाहा को पहले ही अपनी ओर मिला लिया था, जिसके कारण उन्हें बड़ी संख्या में राजपूतों का समर्थन प्राप्त हुआ। मुहम्मद मुअज्जम और मुहम्मद आजम के बीच 12 जून 1707 ई. को सामूगढ़ के समीप ‘जाजऊ’ नामक स्थान पर उत्तराधिकार का पहला युद्ध हुआ, जिसमें मुहम्मद आजम अपने पुत्रों, बीदर बख्त और वलाजाह, के साथ मारा गया। इस प्रकार मुअज्जम 1707 ई. में बहादुर शाह के नाम से मुगल सम्राट बने। उन्हें अपने छोटे भाई कामबख्श से भी युद्ध करना पड़ा। उन्होंने 13 जनवरी 1709 ई. को हैदराबाद के निकट एक युद्ध में कामबख्श को पराजित किया, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।
प्रशासन और नीतियाँ
बादशाह बनते ही बहादुर शाह प्रथम ने अपने समर्थकों को नई पदवियाँ और उच्च पद प्रदान किए। मुनीम खाँ को वजीर नियुक्त किया गया, औरंगजेब के वजीर असद खाँ को ‘वकील-ए-मुतलक’ का पद दिया गया और उनके पुत्र जुल्फिकार खाँ को मीरबख्शी बनाया गया।
बहादुर शाह प्रथम प्रथम एक उदार शासक थे। सिंहासनारोहण के समय उनकी आयु 63 वर्ष थी और वे सक्रिय रूप से कार्य करने में असमर्थ थे। वे भोग-विलास में लीन होकर राजकीय कार्यों के प्रति इतने लापरवाह थे कि उनकी उपाधि ‘शाह-ए-बेखबर’ पड़ गई थी। उसकी दुर्बलता और निष्क्रियता के कारण मुगल दरबार में षड्यंत्र शुरू हो गए, जिसके परिणामस्वरूप अमीरों के दो दल बन गए: ईरानी दल और तूरानी दल। ईरानी दल के अमीर ‘शिया मत’ को मानते थे, जिनमें असद खाँ और उनके पुत्र जुल्फिकार खाँ शामिल थे, जबकि तूरानी दल के अमीर ‘सुन्नी मत’ के समर्थक थे, जिनमें चिनकिलिच खाँ और फिरोज गाजीउद्दीन जंग जैसे लोग शामिल थे।
राजपूतों के प्रति नीति
बहादुर शाह प्रथम ने राजपूतों के प्रति शांति और समझौते की नीति अपनाई। उन्होंने मारवाड़ के राजपूत राजा अजीतसिंह को पराजित कर उन्हें 3500 का मनसब और ‘महाराज’ की उपाधि दी। किंतु, बहादुर शाह के दक्षिण जाते ही अजीतसिंह, दुर्गादास और जयसिंह कछवाहा ने मेवाड़ के महाराज अमरसिंह के नेतृत्व में अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी और राजपूताना संघ का गठन किया। बहादुर शाह ने इन राजाओं से संघर्ष करने के बजाय समझौता करना उचित समझा और उन्हें मान्यता दे दी।
सिक्खों के विरुद्ध कार्यवाही
बहादुर शाह प्रथम को सिक्खों के विरुद्ध कार्यवाही करनी पड़ी। सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में ‘खालसा’ की स्थापना की थी। यद्यपि गुरु गोविंद सिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध में बहादुर शाह प्रथम का समर्थन किया था, किंतु 1708 ई. में नांदेड़ में कटार घोंप कर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद कोई सिक्ख गुरु नहीं हुआ। गुरु गोविंद सिंह की हत्या के बाद बंदा बहादुर एक शक्तिशाली सिक्ख नेता के रूप में उभरे, जिन्होंने मुगलों के खिलाफ विद्रोह किया।
बंदा बहादुर ने पंजाब के विभिन्न हिस्सों के सिक्खों को एकजुट कर कैथल, समाना, शाहबाद, अंबाला, क्यूरी और सधौरा पर अधिकार कर लिया। उन्होंने सरहिंद के गवर्नर वजीर खाँ को पराजित कर मार डाला और स्वयं को ‘सच्चा बादशाह’ घोषित किया। उन्होंने अपना टकसाल स्थापित किया और एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना का प्रयास किया।
बहादुर शाह प्रथम ने बंदा बहादुर को दंडित करने के लिए 26 जून 1710 ई. को सधौरा में घेर लिया, किंतु बंदा लोहगढ़ के किले में भाग गए। लोहगढ़ का किला गुरु गोविंद सिंह ने अंबाला के उत्तर-पूर्व में हिमालय की तलहटी में बनवाया था। बहादुर शाह ने लोहगढ़ को घेरकर सिक्खों से कड़ा संघर्ष किया और 1711 ई. में पुनः सरहिंद पर अधिकार कर लिया। उनकी उदारता के बावजूद वे सिक्खों को अपना मित्र नहीं बना सके और बंदा बहादुर मुगलों को परेशान करते रहे।
बुंदेलों और जाटों से मित्रता
बहादुर शाह प्रथम ने बुंदेला सरदार छत्रसाल से मेल-मिलाप किया, जिसके परिणामस्वरूप छत्रसाल मुगलों का निष्ठावान सामंत बन गया। उन्होंने जाट सरदार चूड़ामन से भी मित्रता की और चूड़ामन ने बंदा बहादुर के खिलाफ अभियान में उनका साथ दिया।
मराठों के साथ शांति के प्रयास
बहादुर शाह प्रथम ने मराठों के प्रति अस्थिर नीति अपनाई और उनके साथ शांति स्थापित करने की असफल कोशिश की। उन्होंने शिवाजी के पौत्र शाहू को, जो 1689 ई. से मुगल दरबार में बंधक था, मुक्त कर सतारा का राजा बनाकर महाराष्ट्र जाने की अनुमति दी। शाहू एक उदार प्रशासक थे और आरंभ में उन्होंने मुगल आधिपत्य स्वीकार किया। किंतु जब शाहू ने पुणे के चितपावन ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ को पेशवा नियुक्त किया, तो उनके पुत्र बाजीराव प्रथम ने पुनः मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण शुरू कर दिया। बहादुर शाह प्रथम ने मराठों को दक्षिण की ‘सरदेशमुखी’ दी थी, किंतु ‘चौथ’ वसूलने का अधिकार नहीं दिया था।
बहादुर शाह प्रथम ने मीरबख्शी जुल्फिकार खाँ को दकन की सूबेदारी प्रदान कर एक ही अमीर को दो महत्त्वपूर्ण पद देने की भूल की। उनके शासनकाल में वजीर के पद का सम्मान बढ़ा, जिसके कारण इस पद को प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ी। उन्होंने जजिया कर की वसूली बंद कर दी, हालांकि इसे समाप्त नहीं किया। उनके शासनकाल में मंदिरों को नहीं तोड़ा गया। अपने पाँच वर्ष के संक्षिप्त शासनकाल में उन्होंने संगीत को नये सिरे से समर्थन दिया। 1711 ई. में एक डच प्रतिनिधिमंडल जेसुआ केटेलार के नेतृत्व में मुगल दरबार में आया, जिसमें एक पुर्तगाली महिला ‘जुलियानी’ की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इस भूमिका के कारण उन्हें ‘बीबी फिदवा’ की उपाधि दी गई।
बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु
लाहौर में शालीमार बाग का पुनर्निर्माण कराते समय 27 फरवरी 1712 ई. को बहादुर शाह प्रथमह की मृत्यु हो गई। उनकी कब्र दिल्ली के मेहरौली में तेरहवीं शताब्दी के सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के निकट शाह आलम द्वितीय और अकबर द्वितीय के साथ मोती मस्जिद में है। बहादुर शाह प्रथम का मूल्यांकन करते हुए इतिहासकार सिडनी ओवेन ने लिखा : ‘यह अंतिम बादशाह था, जिसके लिए कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं। इसके बाद मुगल साम्राज्य का तीव्र पतन, सम्राटों की राजनीतिक तुच्छता और शक्तिहीनता का द्योतक था।’ वास्तव में, बहादुर शाह प्रथमह का शासनकाल महान मुगलों के वैभव की अंतिम झलक थी, जो इसके बाद शीघ्र समाप्त हो गई।
बहादुर शाह के बाद उत्तराधिकार का युद्ध
बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु (27 फरवरी 1712 ई.) के बाद उनके चार पुत्रों—जहाँदार शाह, अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान, और जहाँशाह के बीच 14 मार्च 1712 ई. को उत्तराधिकार के लिए युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध में इतनी निर्लज्जता दिखाई गई कि बहादुर शाह का शव एक माह तक दफन नहीं हो सका। एक ओर अजीम-उस-शान था, तो दूसरी ओर उनके अन्य तीन पुत्र (जहाँदार शाह, रफी-उस-शान और जहाँशाह) संगठित होकर युद्ध कर रहे थे। अंत में, ईरानी दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से 29 मार्च 1712 ई. को जहाँदार शाह मुगल बादशाह बनने में सफल रहे।
जहाँदार शाह (1712-1713 ई.)
मुख्य लेख : जहाँदार शाह
बहादुर शाह की मृत्यु (27 फरवरी 1712 ई.) के बाद उनके चार पुत्रों—जहाँदार शाहह, अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान, और जहाँशाह के बीच 14 मार्च 1712 ई. को उत्तराधिकार के लिए युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध में इतनी निर्लज्जता दिखाई गई कि बहादुर शाह का शव एक माह तक दफन नहीं हो सका। एक ओर अजीम-उस-शान था, तो दूसरी ओर उनके अन्य तीन पुत्र (जहाँदार शाह, रफी-उस-शान और जहाँशाह) संगठित होकर युद्ध कर रहे थे। अंत में, ईरानी दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से 29 मार्च 1712 ई. को जहाँदार शाह मुगल बादशाह बनने में सफल रहे।
जहाँदार शाह बहादुर शाह प्रथम के चार पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ थे। उनका जन्म 9 मई 1661 ई. को दकन में हुआ था। उनका पूरा नाम ‘मिर्जा मुईजुद्दीन जहाँदार शाह बहादुर’ था और उनकी माता का नाम ‘निजाम बाई’ था। बहादुर शाह की मृत्यु के बाद 14 मार्च 1712 ई. को उनके चार पुत्रों—जहाँदार शाह, अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान, और जहाँशाह के बीच उत्तराधिकार के लिए संघर्ष छिड़ गया। इस युद्ध में जहाँदार शाह, ईरानी दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से 29 मार्च 1712 ई. को 51 वर्ष की आयु में ‘शहंशाह-ए-गाजी अबुल फतेह मुईजुद्दीन जहाँदार शाह बहादुर’ की उपाधि धारण कर लाहौर में सम्राट बने। बादशाह बनते ही जहाँदार शाह ने जुल्फिकार खाँ को 10,000 का मनसब और वजीर का पद प्रदान किया। जुल्फिकार खाँ के पिता असद खाँ को 12,000 के मनसब के साथ ‘वकील-ए-मुतलक’ के पद पर बनाए रखा और उन्हें गुजरात की सूबेदारी दी गई। जुल्फिकार खाँ को दक्षिण की सूबेदारी भी दी गई।

जहाँदार शाह अयोग्य और विलासी शासक थे। उन्होंने एक नर्तकी ‘लालकुँवर’ को ‘इम्तियाज महल’ की उपाधि दी और उसके आने-जाने के समय शाही अलम और नक्कारे के उपयोग की अनुमति दी। समकालीन लेखकों के अनुसार जहाँदार शाह ने लालकुँवर के प्रेम में शाही मर्यादा को भुला दिया। इतिहासकार खाफी खाँ लिखते हैं : “नया शासनकाल चारणों, गायकों, नर्तकों और नाट्यकर्मियों के लिए बहुत अनुकूल था।” लालकुँवर शासन के कार्यों में भी हस्तक्षेप करती थी। इसीलिए इतिहासकार इरादत खाँ ने जहाँदार शाह को ‘लंपट मूर्ख’ कहा।
जहाँदार शाह के शासनकाल में प्रशासन की शक्ति जुल्फिकार खाँ के हाथों में केंद्रित थी। जुल्फिकार खाँ ने अपने प्रशासनिक दायित्व अपने नजदीकी व्यक्ति ‘सुभागचंद’ को सौंप दिए। जहाँदार शाह ने राजपूतों के प्रति मैत्रीपूर्ण नीति अपनाई, आमेर के जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर ‘मिर्जा राजा’ की उपाधि दी और मारवाड़ के अजीतसिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि देकर गुजरात का शासक बनाया।
जुल्फिकार खाँ ने चूड़ामन जाट और छत्रसाल बुंदेला के साथ मित्रता की, किंतु सिक्ख नेता बंदा बहादुर के खिलाफ दमनकारी नीति जारी रखी। उन्होंने जागीरों और ओहदों की वृद्धि पर रोक लगाकर साम्राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने का प्रयास किया। जहाँदार शाह ने ‘जजिया’ को समाप्त कर दिया, किंतु ‘इजारा व्यवस्था’ (ठेकेदारी व्यवस्था) को प्रोत्साहन दिया। इससे सरकार को निश्चित आय तो मिली, किंतु इजारेदारों को किसानों से मनमाना राजस्व वसूलने की छूट मिल गई, जिससे किसानों का उत्पीड़न बढ़ा।
जुल्फिकार खाँ वजीर की शक्ति बढ़ाकर शक्तिशाली होना चाहते थे, जिसके कारण शाही अमीरों ने उनके खिलाफ षड्यंत्र शुरू कर दिया। जहाँदार शाह को अपदस्थ करने के लिए अजीम-उस-शान के पुत्र फ़र्रुख़सियर ने 1712 ई. में ‘सैयद बंधुओं’—पटना के सूबेदार हुसैन अली खाँ और उनके भाई इलाहाबाद के सहायक सूबेदार अब्दुल्ला खाँ के साथ पटना से प्रस्थान किया। सैयद बंधु उत्तरकालीन मुगल इतिहास में ‘शासक निर्माता’ के रूप में प्रसिद्ध हैं।
फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं की सहायता से 10 जनवरी 1713 ई. को सामूगढ़ (आगरा) के युद्ध में जहाँदार शाह की सेना को पराजित किया। जहाँदार शाह भागकर दिल्ली में जुल्फिकार खाँ के पिता असद खाँ के यहाँ शरण लेने की कोशिश की, किंतु असद खाँ ने उन्हें दिल्ली के किले में कैद कर लिया। अंततः 12 फरवरी 1713 ई. को असद खाँ और जुल्फिकार खाँ ने जहाँदार शाह की हत्या कर दी। इस प्रकार जहाँदार शाह तैमूर वंश का पहला बादशाह था, जो अपने नीच, क्रूर स्वभाव, मानसिक दुर्बलता और कायरता के कारण शासन करने में पूरी तरह अयोग्य सिद्ध हुआ। इतिहासकार इरादत खाँ ने लिखा : “जहाँदार शाह के शासनकाल में उल्लू बाज के घोंसले में रहता था, और कोयल का स्थान कौवे ने ले लिया था।”
फ़र्रुख़सियर (1713-1719 ई.)
मुख्य लेख : फ़र्रुख़सियर
फ़र्रुख़सियर का पूरा नाम ‘अबुल मुजफ्फरुद्दीन मुहम्मद शाह फ़र्रुख़सियर’ था। उन्होंने 1713 ई. से 1719 ई. तक मुगल सम्राट के रूप में शासन किया। जहाँदार शाह ने 1712 ई. में फ़र्रुख़सियर के पिता अजीम-उस-शान की हत्या कर सिंहासन हथिया लिया था। अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं—अब्दुल्ला खाँ और हुसैन अली खाँ की सहायता से 10 जनवरी 1713 ई. को सामूगढ़ के युद्ध में जहाँदार शाह को पराजित किया और उनकी हत्या कर दी। फ़र्रुख़सियर ने 12 फरवरी 1713 ई. को दिल्ली में प्रवेश किया और लाल किले में स्वयं को मुगल सम्राट घोषित किया। अपने छह वर्ष के शासनकाल में वे सैयद बंधुओं के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सके। कृतज्ञता में फ़र्रुख़सियर ने सैयद अब्दुल्ला खाँ बारहा को ‘कुतुब-उल-मुल्क यार-ए-वफादार जफरजंग’ की उपाधि, वजीर का पद और सात हजार का मनसब देकर मुल्तान की सूबेदारी प्रदान की। उनके छोटे भाई हुसैन अली खाँ बारहा को ‘अमीर-उल-उमरा फिरोजजंग’ की उपाधि, मीरबख्शी का पद, सात हजार का मनसब और बिहार की सूबेदारी दी गई।

फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में मुगलों को सिक्खों पर विजय प्राप्त हुई। सिक्ख नेता बंदा सिंह बहादुर 1708 ई. से मुगलों के लिए परेशानी का कारण बने हुए थे। 1716 ई. में उन्हें गुरदासपुर में पकड़ लिया गया और 19 जून 1716 को दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गई। बंदा सिंह की क्रूर हत्या से सिक्ख समुदाय में मुगलों के प्रति आक्रोश बढ़ गया।
1715 ई. में जॉन सरमन के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल भारत आया, जो 1717 में फ़र्रुख़सियर के दरबार में पहुँचा। उस समय फ़र्रुख़सियर एक जानलेवा घाव से पीड़ित थे। शिष्टमंडल में शामिल डॉक्टर हैमिल्टन ने उनका इलाज किया। इससे प्रसन्न होकर फ़र्रुख़सियर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक रियायतें दीं, जिनमें बिना सीमा शुल्क के बंगाल के रास्ते व्यापार करने की अनुमति शामिल थी। उनके द्वारा जारी फरमान को ‘ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। फ़र्रुख़सियर जल्द ही सैयद बंधुओं से तंग आ गए और उनसे मुक्त होने की कोशिश करने लगे। उन्होंने एक षड्यंत्र रचा, किंतु सैयद बंधु उनसे अधिक चतुर थे। उन्होंने मराठों को दकन में ‘सरदेशमुखी’ और ‘चौथ’ वसूलने की अनुमति देकर अपनी ओर मिला लिया। जब फ़र्रुख़सियर ने हुसैन अली को पराजित करने की कोशिश की, तो सैयद बंधुओं ने मराठा सैनिकों की सहायता से 28 फरवरी 1719 ई. को फ़र्रुख़सियर को बंदी बना लिया और रफी-उद-दरजात को बादशाह घोषित किया। अंततः 29 अप्रैल 1719 ई. को फ़र्रुख़सियर की हत्या कर दी गई।
फ़र्रुख़सियर के बाद सैयद बंधुओं ने दो शहजादों—रफी-उद-दरजात और रफी-उद-दौला को सम्राट बनाया, जो अल्पकाल में मर गए। इस समय सैयद बंधु अपनी शक्ति के चरम पर थे। कोई भी मुगल सम्राट उनके प्रभाव से बच नहीं पा रहा था। अंत में उन्होंने रोशन अख्तर (मुहम्मद शाह) को 1719 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठाया।
मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ (1719-1748 ई.)
मुख्य लेख : मुहम्मद शाह
मुहम्मद शाह, जिनका बचपन का नाम रोशन अख्तर था, मुगल वंश का चौदहवाँ बादशाह था। सैयद बंधुओं ने जहाँशाह के इस चौथे पुत्र को रफी-उद-दौला की मृत्यु के बाद 1719 ई. में मुगल गद्दी पर बैठाया। उन्होंने 1719 ई. से 1748 ई. तक शासन किया। मुहम्मद शाह एक अयोग्य शासक थे। वे अपना अधिकांश समय पशुओं की लड़ाई देखने, वेश्याओं और शराब में व्यतीत करते थे, जिसके कारण उन्हें ‘रंगीला’ की उपाधि मिली। सैयद बंधुओं के बढ़ते प्रभुत्व के कारण ईरानी और तूरानी अमीरों ने उन्हें समाप्त करने का षड्यंत्र रचा। इसमें ईरानी दल के नेता मुहम्मद अमीन खाँ, मुहम्मद शाह और राजमाता कुदसिया बेगम शामिल थे। 8 अक्टूबर 1720 ई. को हैदर बेग ने हुसैन अली खाँ बारहा की छुरा घोंपकर हत्या कर दी। अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए अब्दुल्ला खाँ ने इब्राहीम को बादशाह घोषित किया और मुहम्मद शाह के खिलाफ अभियान शुरू किया। किंतु, नवंबर 1720 ई. में हसनपुर के युद्ध में शाही सेना ने अब्दुल्ला खाँ को पराजित कर बंदी बना लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार मुहम्मद शाह के शासनकाल में सैयद बंधुओं का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया।

मुहम्मद शाह 1722 में एक स्वतंत्र मुगल बादशाह के रूप में प्रतिष्ठित हुए, जो संभवतः उनके जीवन की एकमात्र उल्लेखनीय उपलब्धि थी। उनके शासनकाल में निजाम-उल-मुल्क ने दक्षिण में एक स्वतंत्र राज्य की नींव डाली। सआदत खाँ ने अवध में और मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लगभग स्वतंत्र राज्य स्थापित किए। गंगा और दोआब क्षेत्र में रोहिला सरदारों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता कायम कर ली।
मराठों ने बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मार्च 1737 ई. में मात्र 500 घुड़सवारों के साथ दिल्ली को घेर लिया। मुहम्मद शाह बाजीराव की सेना को देखकर लाल किले में छिप गए। उन्होंने दकन के सूबेदार निजाम-उल-मुल्क को बाजीराव को रोकने का आदेश दिया। निजाम-उल-मुल्क, जिसे 1728 ई. में बाजीराव ने पराजित किया था, बदला लेना चाहता था। उसने भोपाल के निकट बाजीराव की सेनाओं को घेर लिया, किंतु बाजीराव ने निजाम और मुगल सेनाओं को पराजित कर दिया। 1738 ई. में भोपाल की संधि हुई, जिसके द्वारा संपूर्ण मालवा क्षेत्र मराठों को मिल गया।
1739 ई. में फारस के शासक नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। हिंदुकुश को पार करते हुए उन्होंने पेशावर के सूबेदार को पराजित किया और करनाल के युद्ध में मुहम्मद शाह की सेना, जो लगभग एक लाख से अधिक थी, को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया। नादिरशाह ने स्वयं को सुल्तान घोषित किया और अपने नाम का ‘खुतबा’ पढ़वाया। अपने सैनिकों की हत्या से नाराज होकर नादिरशाह ने दिल्ली में भयानक लूटपाट और कत्लेआम किया, जिसमें लगभग 40,000 लोग मारे गए और अरबों का खजाना लूट लिया गया, जिसमें ‘कोहिनूर’ हीरा और शाहजहाँ का ‘तख्त-ए-ताउस’ (मयूर सिंहासन) भी शामिल था। इस हार से मुगल साम्राज्य की शक्ति और तेजी से क्षीण हुई और भारत विदेशी शक्तियों का अखाड़ा बन गया। 1748 ई. में मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई,और उनके पुत्र अहमदशाह बहादुर मुगल बादशाह बने।
अहमदशाह बहादुर (1748–1754 ई.)
मुख्य लेख : अहमदशाह बहादुर
अहमद शाह बहादुर (दिसंबर 1725–1 जनवरी 1775 ई.), जिन्हें मिर्ज़ा अहमद शाह तथा मिर्ज़ा अबू-नासिर मुजाहिद-उद-दीन मुहम्मद अहमद शाह बहादुर के नाम से भी जाना जाता है, मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के पुत्र थे। उन्होंने 1748 ई. में 22 वर्ष की आयु में अपने पिता के बाद मुगल सिंहासन संभाला। उनके सिंहासनारोहण के समय मुगल साम्राज्य राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अत्यंत कमजोर हो चुका था और विभिन्न दरबारी गुटों का प्रभाव बढ़ गया था। राजकुमार के रूप में अहमदशाह ने 1748 ई. में मनुपुर के युद्ध में अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध मुगल सेना की विजय में भाग लिया था। किंतु सम्राट बनने के बाद वे प्रशासनिक क्षमता का प्रभावी परिचय नहीं दे सके और राज्य का वास्तविक संचालन दरबारी गुटों के हाथों में चला गया। उनके शासनकाल में उनकी माता उधमबाई, जिन्हें ‘किबला-ए-आलम’ की उपाधि प्राप्त थी, तथा उनके प्रिय हिजड़े जावेद खाँ का दरबार पर अत्यधिक प्रभाव था। अहमदशाह ने जावेद खाँ को ‘नवाब बहादुर’ की उपाधि प्रदान की। इसी काल में वजीर सफदरजंग और अन्य दरबारी गुटों के बीच संघर्ष बढ़ा तथा गाजीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव तेजी से बढ़ा। अंततः 1754 ई. में गाजीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क ने अहमद शाह बहादुर को सिंहासन से अपदस्थ कर दिया। इसके बाद उन्हें और उनकी माता को कैद कर दिया गया तथा अहमद शाह को अंधा कर दिया गया। उन्होंने अपने जीवन के शेष वर्ष कारावास में बिताए और 1 जनवरी 1775 ई. को उनकी मृत्यु हो गई।
आलमगीर द्वितीय (1754–1759 ई.)
मुख्य लेख : आलमगीर द्वितीय
आलमगीर द्वितीय (1754–1759 ई.) भारत के सोलहवें मुगल सम्राट थे। उनका शासन 3 जून 1754 ई. से 29 नवंबर 1759 ई. तक रहा। वे जहाँदार शाह के पुत्र और बहादुर शाह प्रथम के पौत्र थे। उनका वास्तविक नाम अजीजुद्दीन था और उनका जन्म 6 जून 1699 ई. को बुरहानपुर में हुआ था। 1712 ई. में बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष में उनके पिता अजीजुद्दीन के स्थान पर उनके चाचा फ़र्रुख़सियर सम्राट बने। बाद में अजीजुद्दीन को इमाद-उल-मुल्क ने बंदी बना लिया और 1714 ई. में कारावास में डाल दिया। 1754 ई. में उसे मुक्त किया गया। अहमद शाह बहादुर को अपदस्थ करने के बाद इमाद-उल-मुल्क ने अजीजुद्दीन को मुगल सिंहासन पर बैठाया और उसे ‘आलमगीर द्वितीय’ की उपाधि प्रदान की। उसने यह नाम औरंगजेब की स्मृति तथा उसकी केंद्रीकृत शासन-व्यवस्था का अनुकरण करने के उद्देश्य से रखा था। आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की वास्तविक सत्ता वजीर इमाद-उल-मुल्क के हाथों में रही, जबकि सम्राट की स्थिति अत्यंत कमजोर थी। इसी समय मराठों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था और अहमद शाह दुर्रानी ने भारत पर पुनः आक्रमण किए। जून 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ, जिसने बंगाल में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करने का मार्ग प्रशस्त किया। इमाद-उल-मुल्क ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए मराठों का सहयोग लिया और शाही आय पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उसने आलमगीर द्वितीय के परिवार के साथ भी कठोर व्यवहार किया तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र अली गौहर को अपने प्रभाव से दूर करने का प्रयास किया। अक्टूबर 1757 ई. में आलमगीर द्वितीय ने दरबारी सरदारों और शाह वलीउल्लाह जैसे धार्मिक विद्वानों के साथ अहमद शाह दुर्रानी से संपर्क स्थापित किया। अहमद शाह दुर्रानी ने मुगल सम्राट का समर्थन किया और अपने पुत्र तैमूर शाह का विवाह आलमगीर द्वितीय की पुत्री जुहरा बेगम से करने का संबंध स्थापित किया। दूसरी ओर, इमाद-उल-मुल्क ने आलमगीर द्वितीय को अपने लिए खतरा समझते हुए उनकी हत्या की योजना बनाई। नवंबर 1759 ई. में इमाद-उल-मुल्क के लोगों ने उन्हें कोटला फतेह शाह के निकट धोखे से बुलाकर उनकी हत्या कर दी। उनकी मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई तथा इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव कुछ समय तक बना रहा। बाद में अली गौहर ने दिल्ली से बाहर जाकर अपना आधार बनाया और 1759 ई. में शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल सम्राट बना।
शाह आलम द्वितीय (1759–1806 ई.)
मुख्य लेख : शाह आलम द्वितीय
शाह आलम द्वितीय (1759–1806 ई.), जिनका वास्तविक नाम अली गौहर था, मुगल साम्राज्य के सत्रहवें सम्राट थे। वे मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय के पुत्र थे। 1759 ई. में अपने पिता की हत्या के समय वे दिल्ली से दूर बिहार में थे और 1760 ई. में उन्होंने स्वयं को मुगल सम्राट घोषित किया। उनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का पतन अत्यधिक तेज हो गया और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक शक्ति लगातार बढ़ती गई। 1764 ई. के बक्सर के युद्ध में उन्होंने बंगाल के नवाब मीर कासिम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ मिलकर अंग्रेज़ों का सामना किया, किंतु पराजित हुए। 1765 ई. की इलाहाबाद की संधि के बाद उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी और कंपनी पर आश्रित हो गए। 1771 ई. में मराठा सरदार महादजी सिंधिया की सहायता से वे दिल्ली लौटे और मराठों के संरक्षण में रहे। 1788 ई. में रोहिला सरदार गुलाम कादिर ने दिल्ली पर अधिकार कर उन्हें बंदी बना लिया और उनकी आँखें फुड़वा दीं। 1803 ई. में अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया, जिसके बाद शाह आलम द्वितीय ब्रिटिश संरक्षण में रहे। 1806 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।
अकबर द्वितीय (1806–1837 ई.)
मुख्य लेख : अकबर शाह द्वितीय
अकबर शाह द्वितीय (अकबर द्वितीय) उन्नीसवें मुगल सम्राट थे, जिन्होंने 1806 ई. से 1837 ई. तक शासन किया। वे शाह आलम द्वितीय के पुत्र और बहादुर शाह ज़फ़र के पिता थे। उनके शासनकाल में मुगल सम्राट की वास्तविक राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी और दिल्ली के लाल किले तक ही सीमित रह गई थी, जबकि अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। अकबर शाह द्वितीय ने राजा राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की और उन्हें ब्रिटेन भेजा। उनके शासनकाल में 1835 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल सम्राट के नाम से सिक्के जारी करना बंद कर दिया। उन्हें ‘फूल वालों की सैर’ जैसे हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के प्रतीक उत्सव को प्रोत्साहन देने के लिए भी जाना जाता है।
बहादुर शाह द्वितीय ‘जफर’ (1837–1857 ई.)
मुख्य लेख : बहादुर शाह द्वितीय
बहादुर शाह द्वितीय, जिन्हें बहादुर शाह ज़फ़र के नाम से भी जाना जाता है, भारत के अंतिम मुगल सम्राट थे। उनका जन्म 24 अक्टूबर 1775 ई. को दिल्ली में मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के पुत्र के रूप में हुआ था। 28 सितंबर 1837 ई. को पिता की मृत्यु के बाद वे मुगल सिंहासन पर बैठे और 1857 ई. तक सम्राट रहे। उनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य की वास्तविक सत्ता लगभग समाप्त हो चुकी थी और उनका प्रभाव मुख्यतः दिल्ली के लाल किले तथा शाही दरबार तक सीमित था, जबकि वास्तविक राजनीतिक शक्ति ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में थी। 1857 ई. के विद्रोह के दौरान दिल्ली पहुँचे विद्रोही सिपाहियों ने उन्हें अपना सम्राट स्वीकार किया और उन्होंने विद्रोह को प्रतीकात्मक नेतृत्व प्रदान किया। अंग्रेजों द्वारा दिल्ली पर पुनः अधिकार किए जाने के बाद बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) निर्वासित कर दिया गया। निर्वासन के दौरान 7 नवंबर 1862 ई. को उनकी मृत्यु हो गई। वे एक प्रसिद्ध उर्दू शायर भी थे और ‘ज़फ़र’ उपनाम से ग़ज़लें लिखते थे। उनके दरबार में मिर्ज़ा ग़ालिब और शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ जैसे प्रसिद्ध शायरों को संरक्षण प्राप्त था। इस प्रकार बहादुर शाह ज़फ़र का जीवन मुगल साम्राज्य के अंतिम चरण, 1857 के विद्रोह और भारत में मुगल सत्ता के पूर्ण अंत का प्रतीक माना जाता है।


