अकबर द्वितीय (1806–1837 ई.)
अकबर द्वितीय, जिन्हें अकबर शाह द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म 22 अप्रैल 1760 ई. को मुकुंदपुर में हुआ था। वे मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के पुत्र और बहादुर शाह ज़फ़र के पिता थे। उनके जन्म के समय उनके पिता दिल्ली से बाहर थे और मुगल साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो चुकी थी। अपने बड़े भाई की मृत्यु के बाद 2 मई 1781 ई. को लाल किले में मिर्ज़ा अकबर को युवराज घोषित किया गया और उन्हें ‘वली-अहद बहादुर’ की उपाधि प्रदान की गई। 1782 ई. में उन्हें दिल्ली का नायब नियुक्त किया गया और वे 1799 ई. तक इस पद पर रहे।
गुलाम कादिर के अत्याचार के साक्षी
1788 ई. में रोहिला सरदार गुलाम कादिर ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उस समय युवा राजकुमार मिर्ज़ा अकबर ने मुगल शाही परिवार पर किए गए अत्याचारों को प्रत्यक्ष देखा। गुलाम कादिर ने शाही परिवार के सदस्यों को अपमानित किया तथा अनेक राजकुमारों और राजकुमारियों के साथ दुर्व्यवहार किया। बाद में मराठा सरदार महादजी सिंधिया ने हस्तक्षेप कर गुलाम कादिर को पराजित किया और शाह आलम द्वितीय को पुनः सिंहासन पर स्थापित किया। इस घटना का अकबर द्वितीय के जीवन और दृष्टिकोण पर गहरा प्रभाव पड़ा।
सिंहासनारोहण
19 नवंबर 1806 ई. को शाह आलम द्वितीय की मृत्यु के बाद मिर्ज़ा अकबर मुगल सिंहासन पर बैठे और अकबर द्वितीय के नाम से सम्राट बने। उनका शासनकाल 1806 से 1837 ई. तक रहा। उस समय तक 1803 ई. में अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी दिल्ली पर अधिकार कर चुकी थी। इसलिए अकबर द्वितीय के पास वास्तविक राजनीतिक शक्ति नहीं थी और उनका प्रभाव मुख्यतः दिल्ली के लाल किले तथा शाही दरबार तक सीमित था।
यद्यपि मुगल साम्राज्य की वास्तविक सत्ता समाप्तप्राय हो चुकी थी, फिर भी मुगल सम्राट की औपचारिक प्रतिष्ठा और दरबारी परंपराएँ बनी हुई थीं। अकबर द्वितीय ने इन परंपराओं को बनाए रखने का प्रयास किया। उनके शासनकाल में दिल्ली का साहित्यिक, सांस्कृतिक और दरबारी जीवन भी सक्रिय रहा।
अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संबंध
अकबर द्वितीय और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंधों में समय-समय पर तनाव उत्पन्न होता रहा। अकबर द्वितीय स्वयं को मुगल सम्राट के रूप में प्राप्त पारंपरिक सम्मान और अधिकारों का अधिकारी मानते थे, जबकि कंपनी के अधिकारी उन्हें मुख्यतः अपने संरक्षण में रहने वाला पेंशनभोगी समझते थे। विशेष रूप से लॉर्ड हेस्टिंग्स के साथ उनके संबंधों में प्रोटोकॉल और सम्मान को लेकर मतभेद उत्पन्न हुए।
अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे मुगल सम्राट की औपचारिक स्थिति को भी कमजोर करती गई। 1835 ई. में कंपनी ने अपने सिक्कों से मुगल सम्राट का नाम हटा दिया और उन पर अंग्रेज़ी अभिलेखों का प्रयोग आरंभ किया। यह मुगल सम्राट की औपचारिक संप्रभुता के क्रमिक ह्रास का महत्त्वपूर्ण प्रतीक था। इसी अवधि में कंपनी ने मुगल सम्राट के प्रति अपनी अधीनस्थ स्थिति को भी समाप्त कर दिया और उसे एक स्वतंत्र औपनिवेशिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
अंग्रेज़ों ने अवध के नवाब और हैदराबाद के निज़ाम को शाही उपाधियाँ स्वीकार करने के लिए भी प्रोत्साहित किया, जिससे मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा और प्रभाव को और कमजोर किया जा सके। हैदराबाद के निज़ाम ने ऐसा करने से परहेज किया, जबकि अवध के नवाब ने शाही उपाधि ग्रहण की।
राजा राममोहन रॉय का इंग्लैंड जाना
अकबर द्वितीय ने बंगाल के प्रसिद्ध समाज-सुधारक राममोहन रॉय को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया और उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की। राममोहन रॉय मुगल सम्राट की ओर से कंपनी के समक्ष सम्राट के अधिकारों तथा पेंशन से संबंधित मामलों को प्रस्तुत करने के लिए इंग्लैंड गए। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष सम्राट के पक्ष में ज्ञापन भी प्रस्तुत किया, किंतु उन्हें अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई।
राममोहन रॉय सामाजिक और धार्मिक सुधारों के प्रमुख समर्थक थे। उन्होंने एकेश्वरवाद, आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधारों का समर्थन किया तथा सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध अभियान चलाया। वे ब्रह्म समाज के प्रारंभिक विकास से भी जुड़े थे और भारतीय समाज में आधुनिक शिक्षा तथा सुधारवादी विचारों के प्रसार में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
फूल वालों की सैर
अकबर द्वितीय के शासनकाल में ‘फूल वालों की सैर’ की परंपरा को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। इसे हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द और साझा सांस्कृतिक परंपरा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह उत्सव महरौली में आयोजित होता था और इसमें योगमाया मंदिर तथा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह, दोनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती थी। इस अवसर पर फूलों से सजे बड़े पंखों का जुलूस निकाला जाता था। उत्सव में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की भागीदारी होती थी। इस प्रकार यह आयोजन दिल्ली की साझा सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक समन्वय का प्रतीक बन गया।
अकबर द्वितीय की राजनीतिक स्थिति
अकबर द्वितीय के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की वास्तविक राजनीतिक शक्ति अत्यंत सीमित थी। दिल्ली और लाल किले के बाहर कंपनी की सत्ता तथा विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव स्थापित हो चुका था। सम्राट के पास स्वतंत्र सैन्य शक्ति या व्यापक प्रशासनिक अधिकार नहीं थे। इसके बावजूद मुगल वंश की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा के कारण उनका नाम और पद भारतीय राजनीतिक जीवन में पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ था।
अकबर द्वितीय के शासनकाल में दिल्ली का सांस्कृतिक जीवन सक्रिय रहा। दरबार में साहित्य, संगीत, कला और स्थापत्य से संबंधित गतिविधियाँ जारी रहीं। इस प्रकार राजनीतिक शक्ति के क्षय के बावजूद मुगल दरबार दिल्ली की सांस्कृतिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बना रहा।
उत्तराधिकार का प्रश्न
अकबर द्वितीय के शासन के अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो गया। वे अपने पुत्र मिर्ज़ा फ़ख़रू को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, किंतु ब्रिटिश अधिकारियों और दरबारी परिस्थितियों के प्रभाव के कारण अंततः उनके दूसरे पुत्र मिर्ज़ा अबू ज़फ़र को उत्तराधिकारी स्वीकार किया गया। यही मिर्ज़ा अबू ज़फ़र आगे चलकर बहादुर शाह ज़फ़र के नाम से मुगल सम्राट बने।
अकबर द्वितीय की मृत्यु
अकबर द्वितीय की मृत्यु 28 सितंबर 1837 ई. को दिल्ली में हुई। उनके बाद उनके पुत्र बहादुर शाह ज़फ़र मुगल सिंहासन पर बैठे। बहादुर शाह ज़फ़र अंतिम मुगल सम्राट सिद्ध हुए और 1857 ई. के विद्रोह के बाद उन्हें अंग्रेज़ों ने पदच्युत कर रंगून निर्वासित कर दिया। अकबर द्वितीय की कब्र दिल्ली के महरौली में सूफी संत क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के निकट स्थित है। इसी परिसर में उनके पिता शाह आलम द्वितीय तथा मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम के मकबरे भी स्थित हैं।


