बहादुर शाह प्रथम (Bahadur Shah I)

बहादुर शाह प्रथम (Bahadur Shah I)
बहादुर शाह प्रथम  (मुहम्मद मुअज्जम) बहादुर शाह प्रथम (14 अक्टूबर 1643–27 फरवरी 1712 ई.) 1707 […]

बहादुर शाह प्रथम  (मुहम्मद मुअज्जम)

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बहादुर शाह प्रथम (14 अक्टूबर 1643–27 फरवरी 1712 ई.) 1707 से 1712 ई. तक शासन करने वाले आठवें मुगल सम्राट थे। उनका मूल नाम कुतुबुद्दीन मुहम्मद मुअज्ज़म था, जबकि उनका पूरा नाम अबुल-नस्र सैयद कुतुबुद्दीन मुहम्मद शाह आलम बहादुर शाह बादशाह था। उन्हें शाह आलम प्रथम तथा शाह-ए-बेख़बर के नाम से भी जाना जाता है। बहादुर शाह प्रथम का जन्म 14 अक्टूबर 1643 ई. को बुरहानपुर में हुआ था। वे मुगल सम्राट औरंगज़ेब के दूसरे पुत्र थे। उनके बड़े भाई मुहम्मद सुल्तान थे, जिनकी मृत्यु कारावास में हुई। उनकी माता नवाब बाई थीं, जो राजौरी के जर्राल राजवंश के राजा राजू की पुत्री थीं। औरंगज़ेब ने 1663 ई. में उन्हें दक्कन और मध्य भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। 1683–1684 ई. में उन्होंने गोवा के पुर्तगाली क्षेत्रों में मराठों के विरुद्ध मुगल सेना का नेतृत्व किया, किंतु पुर्तगालियों से अपेक्षित सहायता न मिलने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। 1699 ई. में औरंगज़ेब ने उन्हें काबुल का सूबेदार नियुक्त किया। उनके शासनकाल में राजपूतों और सिखों के विद्रोह सहित अनेक राजनीतिक चुनौतियाँ सामने आईं।

शाहजहाँ के शासनकाल में मुअज्ज़म

शाहजहाँ के शासनकाल में मुअज्ज़म ने प्रशासनिक और सैन्य दायित्व सँभालने आरंभ किए। 1653 से 1659 ई. के बीच वे लाहौर के सूबेदार रहे। 1663 ई. में उन्हें दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने शाइस्ता खाँ का स्थान लिया। इसी दौरान शिवाजी ने मुगल दक्कन की राजधानी औरंगाबाद के आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण किए। मुअज्ज़म इन आक्रमणों का प्रभावी ढंग से सामना नहीं कर सके, जिससे औरंगज़ेब उनसे असंतुष्ट हुआ। इसके बाद उसने शिवाजी के विरुद्ध अपने प्रमुख सेनापति राजा जयसिंह को भेजा। इस अभियान के परिणामस्वरूप 1665 ई. में पुरंदर की संधि हुई।

औरंगजेब के शासनकाल में विद्रोह का प्रयास

1670 ईस्वी में मुअज्जम ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करके स्वयं को मुगल सम्राट घोषित करने की योजना बनाई। इस योजना में मराठों की भूमिका होने की संभावना व्यक्त की गई है, यद्यपि मुअज्जम की वास्तविक मंशा और भूमिका के संबंध में निश्चित निष्कर्ष निकालना कठिन है। औरंगजेब को इस षड्यंत्र की जानकारी मिल गई। उसने मुअज्जम की माता नवाब बाई को उसे समझाने और विद्रोह से रोकने के लिए भेजा। इसके बाद मुअज्जम मुगल दरबार में लौट आया और कई वर्षों तक औरंगजेब की निगरानी में रहा। 1680 ईस्वी में राजपूत विद्रोहों को दबाने के दौरान औरंगजेब की कठोर दग्ध-भूमि नीति से मुअज्जम असंतुष्ट हुआ और उसने पुनः विद्रोह करने का प्रयास किया। औरंगजेब ने इस बार भी उसे कठोर दंड देने के बजाय समझाकर शांत किया, किंतु उसकी निगरानी और अधिक कड़ी कर दी।

दक्कन में मुअज्जम की भूमिका

1681 ईस्वी में औरंगजेब ने मुअज्जम को दक्कन भेजा, ताकि वह उसके विद्रोही सौतेले भाई सुल्तान मुहम्मद अकबर के भागने का मार्ग रोक सके। मुअज्जम इस अभियान में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका। 1683 ईस्वी में उसे कोंकण क्षेत्र में जाकर मुहम्मद अकबर को भारत से बाहर जाने से रोकने का आदेश दिया गया, किंतु वह इस कार्य में भी सफल नहीं हुआ।

1687 ईस्वी में औरंगजेब ने मुअज्जम को गोलकुंडा सल्तनत के विरुद्ध अभियान का आदेश दिया। अभियान के दौरान मुगल जासूसों ने मुअज्जम और गोलकुंडा के शासक अबुल हसन कुतुबशाह के बीच संपर्क और संदेशों का पता लगाया। औरंगजेब ने इसे राजद्रोह माना और मुअज्जम तथा उसके पुत्रों को बंदी बना लिया। उसके निकट सहयोगियों को दंडित किया गया तथा उसके हरम और कर्मचारियों को भी उससे अलग कर दिया गया।

मुअज्जम को लगभग छह महीने तक कठोर निगरानी में रखा गया। उसे अपने बाल और नाखून काटने की अनुमति नहीं थी तथा उसके भोजन और जल की आपूर्ति पर भी प्रतिबंध लगाए गए थे। वह औरंगजेब की पूर्व अनुमति के बिना किसी व्यक्ति से मिल नहीं सकता था। इस प्रकार 1687 ईस्वी के बाद कई वर्षों तक मुअज्जम ने कठोर बंदी जीवन व्यतीत किया। लगभग 1694 ईस्वी में औरंगजेब ने मुअज्जम को पुनः स्वतंत्र किया और उसे अपना घर-परिवार फिर से बसाने की अनुमति दी। उसके कुछ अधिकारियों को भी पुनः नियुक्त कर दिया गया। हालाँकि, औरंगजेब अपने पुत्र पर लगातार निगरानी रखता रहा। उसने मुअज्जम के निवास पर अपने विश्वस्त लोगों को नियुक्त किया, उसके हरम में मुखबिर भेजे तथा शाही दरबार में उसके प्रतिनिधियों की नियुक्ति की।

मुअज्जम और उसके पुत्रों को दक्कन से उत्तर भारत स्थानांतरित कर दिया गया तथा औरंगजेब के शासन के शेष समय में उन्हें दक्कन के सैन्य अभियानों में भाग लेने से प्रतिबंधित रखा गया। 1695 ईस्वी में औरंगजेब ने मुअज्जम को पंजाब भेजा, जहाँ उसे स्थानीय सरदारों का सामना करने और सिख गुरु गोबिंद सिंह के विरुद्ध चल रहे संघर्ष को नियंत्रित करने का दायित्व सौंपा गया।

मुअज्जम ने स्थानीय सरदारों पर भारी कर लगाया, किंतु आनंदपुर के किलेबंद नगर में सिखों को परेशान करना उचित नहीं समझा। उसने सिख धर्म के प्रति सम्मान के कारण उनके विरुद्ध युद्ध करने से भी इनकार कर दिया। 1695 ईस्वी में मुअज्जम को अकबराबाद का सूबेदार नियुक्त किया गया और 1696 ईस्वी में उसका स्थानांतरण लाहौर कर दिया गया। काबुल के सूबेदार अमीन खान की मृत्यु के बाद 1699 ईस्वी में मुअज्जम को काबुल का सूबेदार नियुक्त किया गया। वह 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु तक इस पद पर रहा।

उत्तराधिकार का युद्ध

औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 ई. को अहमदनगर में हुई। कुछ इतिहासकार उसकी मृत्यु की तिथि शुक्रवार, 20 फरवरी 1707 ई. को मानते हैं। उसने अपने उत्तराधिकार के संबंध में किसी एक पुत्र को नामित नहीं किया था। मुगल शहजादों में उत्तराधिकार के लिए अकसर खूनी संघर्ष होता ही था। औरंगजेब के सबसे महत्त्वाकांक्षी पुत्र अकबर ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था और औरंगजेब की मृत्यु से बहुत पहले ही निर्वासन में उसकी मृत्यु हो गई थी। इस प्रकार औरंगजेब की मृत्यु के समय उसके केवल तीन पुत्र जीवित थे—मुहम्मद मुअज्जम, मुहम्मद आजम शाह और मुहम्मद कामबख्श। औरंगजेब के जीवित पुत्रों में मुअज्जम सबसे ज्येष्ठ पुत्र थे, जो काबुल के सूबेदार थे, जबकि उंके छोटे सौतेले भाई मुहम्मद कामबख्श और मुहम्मद आजम शाह क्रमशः दक्कन और गुजरात के सूबेदार थे। तीनों ही मुगल सिंहासन पर अधिकार करना चाहते थे। कामबख्श ने अपने नाम से सिक्के ढलवाना भी आरंभ कर दिया था।

औरंगजेब की मृत्यु के समय शहजादा मुअज्जम पेशावर के निकट जमरूद में था, जबकि शहजादा आजम शाह मालवा के उपद्रव का दमन करने जा रहा था। तीसरा पुत्र शहजादा मुहम्मद कामबख्श, जिसे औरंगजेब ने बीजापुर का सूबेदार नियुक्त किया था, परेंदा में मराठों के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त था। औरंगजेब के तीनों शहजादों में आजम शाह सबसे निकट था और पिता की मृत्यु की सूचना पाते ही वह अहमदनगर पहुँच गया। औरंगजेब की वसीयत के अनुसार उसका शव औरंगाबाद के उत्तर-पश्चिम में शेख जैनुद्दीन की मजार के निकट खुल्दाबाद में दफना दिया गया। इसके बाद उसके तीन पुत्रों में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष आरंभ हो गया। शहजादा मुअज्जम को जब जमरूद में 12 मार्च 1707 ई. को बादशाह औरंगजेब की मृत्यु की खबर मिली, तो उसने लाहौर के लिए प्रस्थान किया। उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मुइजुद्दीन को, जो थट्टा और मुल्तान का सूबेदार था, लाहौर पहुँचने का आदेश भेजा। लाहौर के निकट ‘पुल-ए-शाह’ नामक स्थान पर शहजादा मुअज्जम ने 22 अप्रैल 1707 ई. को ‘बहादुर शाह’ के नाम से अपना राज्याभिषेक किया। दूसरे दिन उसने रावी नदी को पारकर लाहौर में शिविर स्थापित किया, जहाँ उसके पुत्र शहजादा मुइजुद्दीन से उसकी भेंट हुई। यहीं सैयद बंधु भी उसकी सेवा में उपस्थित हुए। बहादुर शाह ने लाहौर में दरबार आयोजित कर मुनीम खाँ और अन्य अमीरों को पदों से सम्मानित किया। लाहौर में ही उसने बादशाह के रूप में अपना नाम ‘खुतबा’ में पढ़वाया और सिक्के चलवाए।

बहादुर शाह (मुअज्जम) का आगरा पर अधिकार

लाहौर से सरहिंद होता हुआ मुअज्जम 19 मई 1707 ई. को दिल्ली पहुँचा और वहाँ के शाही खजाने पर अधिकार कर लिया। यहाँ उसने कुछ सैनिकों की भर्ती कर अपनी सैनिक संख्या में वृद्धि की। यहीं उसे सूचना मिली कि उसका पुत्र अजीमुद्दीन आगरा के किले पर अधिकार करने में असफल रहा है। अतः बहादुर शाह (मुअज्जम) ने मुनीम खाँ को आगे बढ़कर आगरा के किले पर अधिकार करने का आदेश दिया। 21 मई 1707 ई. को बहादुर शाह स्वयं शेष सेना के साथ मथुरा होता हुआ 1 जून 1707 ई. को आगरा पहुँच गया और दहर-आरा बाग में अपना शिविर लगाया। आगरा के शाही खजाने से उसे चौबीस करोड़ रुपये के मूल्य का सोना, चाँदी और सिक्के मिले। यहीं चूड़ामणि जाट, गोपाल सिंह भदौरिया और अन्य अमीर आजम शाह से असंतुष्ट होकर बहादुर शाह की सेना में सम्मिलित हो गए।

आजम शाह ने अपने पिता की अंत्येष्टि क्रिया के पश्चात् कुछ दिन शोक में व्यतीत किए। औरंगजेब की मृत्युशय्या पर तकिये के नीचे हमीदुद्दीन खाँ को एक ‘वसीयतनामा’ मिला, जिसमें उसने अपनी अंत्येष्टि तथा साम्राज्य के उत्तराधिकार आदि के संबंध में कुछ निर्देश लिख छोड़े थे। उसने उत्तराधिकार युद्ध से बचने के लिए अपने पुत्रों को साम्राज्य को आपस में विभाजित करने की सलाह दी थी। किंतु आजम शाह ने वसीयतनामा को अनदेखा कर 4 मार्च 1707 ई. को ईद-उल-अज़हा के अवसर पर अहमदनगर में अपना राज्याभिषेक कराया और ‘अबुल फैज मुइनुद्दीन मुहम्मद आजम शाह बादशाह गाजी’ की उपाधि धारण की। उसने अपना नाम ‘खुतबा’ में पढ़वाया और अपने नाम के सिक्के भी ढलवाए। इस अवसर पर उसने शहजादों तथा अमीरों के मनसब में वृद्धि की और उन्हें पुरस्कृत भी किया। इसके बाद आजम शाह ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार करने का निश्चय किया। उसने तोपखाने को अनावश्यक समझ कर उसे अहमदनगर में ही छोड़ दिया और स्वयं 9 मार्च को प्रस्थान किया। वह 23 मार्च को औरंगाबाद पहुँचा, जहाँ असद खाँ के पुत्र जुल्फिकार खाँ, तरबियत खाँ, राव दलपत बुंदेला, राम सिंह हाड़ा, छत्रसाल राठौड़ आदि भी उसकी सेना में सम्मिलित हो गए, जिससे उसकी स्थिति काफी सुदृढ़ हो गई। 25 मार्च को आजम शाह ने औरंगाबाद से प्रस्थान किया और बुरहानपुर, सिरोंज, दोराहा होते हुए 31 मई को ग्वालियर से 30 मील पहले सराय इमांब पहुँचा। वहीं उसके पुत्र बेदार बख्श ने सूचना मिली कि अजीमुद्दीन (बहादुर शाह का पुत्र) आगरा पहुँच चुका है और बहादुर शाह भी दिल्ली पर अधिकार कर आगरा के निकट पहुँच गया है। यह सूचना मिलते ही आजम शाह 31 मई को ग्वालियर पहुँच गया। दूसरे दिन उसने ग्वालियर से आगरा के लिए प्रस्थान किया और 5 जून 1707 ई. को वह घौसपुर पहुँच गया, जहाँ उसके पुत्र बेदार बख्श ने उसका स्वागत किया। इस समय उसकी सैनिक संख्या लगभग एक लाख दस हजार थी। यहीं सेना को युद्ध के लिए तैयार करते हुए आजम शाह ने कहा था कि ‘आगरा पहुँचने पर उनके वेतन में एक चौथाई की वृद्धि की जाएगी’।

बहादुर शाह प्रथम का राज्यारोहण

दिल्ली से आगरा जाते समय बहादुर शाह को मथुरा में सूचना मिली कि आज़म शाह आगरा की ओर बढ़ रहा है। बहादुर शाह ने युद्ध को टालने के उद्देश्य से अपने भाई आज़म शाह को पत्र लिखा कि युद्ध में मुसलमानों का रक्तपात उचित नहीं है, क्योंकि दोनों एक ही डाल के दो फूल हैं। उसने औरंगज़ेब द्वारा प्रस्तावित साम्राज्य-विभाजन को स्वीकार करके समझौता करने का सुझाव दिया। उसने यह भी कहा कि यदि आज़म शाह बिना युद्ध के संतुष्ट नहीं है, तो वह उससे द्वंद्वयुद्ध कर अपनी इच्छा पूरी कर सकता है और दोनों में जो जीवित बचे, वही मुगल साम्राज्य का उत्तराधिकारी बने। किंतु आज़म शाह ने उत्तर दिया कि एक कंबल के नीचे दस संन्यासी सो सकते हैं, लेकिन एक साम्राज्य में दो बादशाह नहीं रह सकते।

बहादुर शाह ने 19 जून 1707 ई. को आगरा में बहादुर शाह प्रथम के नाम से मुगल सिंहासन ग्रहण किया। इसके बाद उसके सामने आज़म शाह से युद्ध करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहा। वह लगभग डेढ़ लाख घुड़सवारों की सेना लेकर आगरा से धौलपुर की ओर बढ़ा, किंतु आज़म शाह के आगमन की सूचना मिलने पर आगरा के दक्षिण में स्थित जाजऊ के निकट रुक गया। यह स्थान सामूगढ़ के निकट था, जहाँ 1658 ई. में औरंगज़ेब ने दारा शिकोह को पराजित किया था।

जाजऊ का युद्ध (1707 ई.)

20 जून 1707 ई. को बहादुर शाह ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार किया। इसी बीच आज़म शाह के सैनिकों ने अज़ीमुद्दीन, जो बहादुर शाह का पुत्र था, की सेना पर आक्रमण कर दिया और रुस्तम दिल ख़ान मीर तुज़ुक को बंदी बना लिया। इसके बाद बहादुर शाह के सेनापति मुनीम ख़ान ने तीनों शहज़ादों के साथ आज़म शाह की सेना पर आक्रमण किया। युद्ध में आज़म शाह के पुत्र बेदार बख़्श और वलाजाह लड़ते हुए मारे गए, किंतु आज़म शाह बिना विचलित हुए युद्ध करता रहा।

जुल्फिकार ख़ान ने आज़म शाह को युद्धस्थल से हटकर पुनः युद्ध की तैयारी करने की सलाह दी, किंतु आज़म शाह ने क्रोधित होकर उसे युद्धस्थल से चले जाने का आदेश दिया। जुल्फिकार ख़ान अपने पिता असद ख़ान के पास ग्वालियर चला गया। उसके चले जाने के बाद अनेक सेनापतियों ने भी आज़म शाह का साथ छोड़ दिया। अंततः 20 जून 1707 ई. को जाजऊ के युद्ध में आज़म शाह अपने पुत्र अली तबर के साथ मारा गया। आज़म शाह और उसके पुत्रों के शवों को चंदन की ताबूतों में आगरा से दिल्ली लाया गया और हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया।

इस युद्ध में विजय के बाद बहादुर शाह ने आजम शाह के सेनापतियों और सैनिकों को शाही सेना में सम्मिलित कर लिया और उन्हें उचित पद एवं सम्मान प्रदान किया। उसने अपने पुत्र मुइजुद्दीन को ‘जहाँदार शाह’ की पदवी तथा 20,000 जात और 15,000 सवार का मनसब, अजीमुद्दीन को ‘अजीम-उस-शान’ की पदवी तथा 18,000 जात और 14,000 सवार का मनसब, रफी-उल-कद्र को ‘रफी-उस-शान’ की पदवी तथा 16,000 जात और 11,000 सवार का मनसब, खुजिस्ता अख्तर को ‘जहाँ शाह’ की पदवी तथा 14,000 जात और 9,000 सवार का मनसब प्रदान किया। इसके साथ ही जहाँदार शाह को थट्टा और मुल्तान की सूबेदारी, अजीम-उस-शान को बंगाल और पटना की सूबेदारी, रफी-उस-शान को काबुल की सूबेदारी और जहाँ शाह को मालवा की सूबेदारी प्रदान की गई। इन्हें अपने-अपने प्रांतों में नायब नियुक्त करने का भी अधिकार दिया गया। उसने मुनीम खाँ को 7,000 जात एवं 7,000 सवार का मनसब, ‘खान-ए-खाना जफर जंग’ की पदवी, आगरा की सूबेदारी और दो करोड़ दम पुरस्कार स्वरूप देकर उसे साम्राज्य के वजीर के पद पर प्रतिष्ठित किया। मुनीम खाँ के ज्येष्ठ पुत्र नईम खाँ को ‘महावत खाँ बहादुर’ की पदवी, 5,000 का मनसब तथा तृतीय बख्शी के पद पर नियुक्त किया गया। मुनीम खाँ के दूसरे पुत्र मुकर्रम खाँ को ‘खान-ए-जमान’ की पदवी और 4,000 का मनसब दिया गया। बहादुर शाह के आदेशानुसार ग्वालियर से असद खाँ अपने परिवार और आजम शाह की रानियों सहित जुलाई 1707 ई. में बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। असद खाँ को 8,000 जात और 8,000 सवार का मनसब, ‘वकील-ए-मुतलक’ का पद तथा लाहौर की सूबेदारी प्रदान की गई। उसके पुत्र जुल्फिकार खाँ को ‘अमीर-उल-उमरा नुसरत जंग बहादुर’ की पदवी, 7,000 जात एवं 7,000 सवार का मनसब, प्रथम बख्शी का पद और असद खाँ के नायब का पद भी दिया गया। दक्षिण से आए चिनकिलिच खाँ को 6,000 का मनसब, तथा ‘खान-ए-दौरान’ की पदवी और अवध की सूबेदारी तथा गोरखपुर की फौजदारी दी गई। इस प्रकार बहादुर शाह प्रथम ने अमीरों को पद और सम्मान देकर उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया।

कामबख़्श का उत्थान और विद्रोह

कामबख़्श औरंगज़ेब का छोटा पुत्र था। उसे फरवरी 1707 ई. में बीजापुर का सूबेदार नियुक्त किया गया था। जब वह परेंदा में था, तभी उसे औरंगज़ेब की मृत्यु का समाचार मिला। यह समाचार मिलते ही उसके अनेक अमीर आज़म शाह को अधिक शक्तिशाली मानकर उसका साथ देने चले गए। ऐसी स्थिति में कामबख़्श ने अपने विश्वस्त सलाहकार अहसान ख़ान मीर मलंग की सलाह पर गुलबर्गा पहुँचकर स्वयं को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उसने ‘दीन-ए-पनाह’ की उपाधि धारण की और अपने नाम से सिक्के चलवाए। उसने हकीम मोहसिन को ‘तक़र्रुब ख़ान’ की उपाधि देकर वज़ीर नियुक्त किया तथा अहसान ख़ान मीर मलंग को 5,000 जात और 5,000 सवार के मनसब के साथ मीर बख़्शी का पद प्रदान किया।

इसके बाद कामबख़्श ने बीजापुर के किले का घेरा डाल दिया। लगभग दो महीने के घेराव के बाद बीजापुर के किलेदार सैयद नियाज़ ख़ान ने बिना किसी संघर्ष के किला कामबख़्श को सौंप दिया। बीजापुर पर अधिकार करने के बाद कामबख़्श ने अपनी स्थिति मजबूत की और ‘पादशाह कामबख़्श-ए-दीनपनाह’ की उपाधि धारण की। इसके बाद उसने गुलबर्गा और वाकिनखेड़ा पर भी अधिकार कर लिया। दक्षिण के अन्य दुर्गों पर अधिकार करने के लिए उसने एक सेना संगठित की और नुसरताबाद तथा इम्तियाज़गढ़ी के किलों को भी अपने अधीन कर लिया।

गुलबर्गा से कामबख़्श कर्नाटक की ओर बढ़ा और अर्काट में दाऊद ख़ान पन्नी को पराजित किया। जनवरी 1708 ई. में उसने हैदराबाद के किले पर भी अधिकार कर लिया। नांदेड़ पर अधिकार करने के लिए उसने मुहम्मद ज़ाहिद को भेजा, किंतु वह युद्ध में मारा गया। इस घटना से कामबख़्श अत्यंत सशंकित और क्रूर हो गया। उसने अपने कई सेनापतियों की हत्या करवा दी और हैदराबाद में कठोर दमन तथा अत्याचार आरंभ कर दिए। इस प्रकार उसकी शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी और उसके सितारे गर्दिश में जाने लगे।

दरबारी षड्यंत्र और दमन

शीघ्र ही तक़र्रुब ख़ान और अहसान ख़ान के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। अहसान ख़ान ने बीजापुर में एक बाज़ार स्थापित किया था, जहाँ कामबख़्श की अनुमति के बिना दुकानों से कर नहीं लिया जाता था। तक़र्रुब ख़ान ने इसकी शिकायत कामबख़्श से की, जिसके बाद कामबख़्श ने इस व्यवस्था को समाप्त करने का आदेश दिया। मई 1707 ई. में कामबख़्श ने अहसान ख़ान को गोलकुंडा और हैदराबाद पर अधिकार करने के लिए भेजा। गोलकुंडा के शासक ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया, किंतु हैदराबाद के सूबेदार रुस्तम दिल ख़ान ने कामबख़्श के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

इसके बाद तक़र्रुब ख़ान ने अहसान ख़ान को हटाने का षड्यंत्र रचा। उसने कामबख़्श के समक्ष आरोप लगाया कि अहसान ख़ान, सैफ़ ख़ान, अरशद ख़ान, अहमद ख़ान, नासिर ख़ान और रुस्तम दिल ख़ान की बैठकें, जो प्रशासनिक मामलों पर चर्चा के लिए होती थीं, वास्तव में कामबख़्श की हत्या की योजना बनाने के लिए आयोजित की जाती थीं। उसने यह भी आरोप लगाया कि कामबख़्श की हत्या उस समय की जानी थी, जब वह शुक्रवार की नमाज़ के लिए बड़ी मस्जिद जाता।

इस सूचना पर कामबख़्श ने रुस्तम दिल ख़ान को भोजन के लिए आमंत्रित किया और रास्ते में ही उसे गिरफ्तार कर लिया। बाद में रुस्तम दिल ख़ान को हाथी के पैरों तले कुचलवाकर मरवा दिया गया। सैफ़ ख़ान के हाथ कटवा दिए गए और अरशद ख़ान की जीभ कटवा दी गई। अहसान ख़ान के निकट मित्रों ने उसे चेतावनी दी कि कामबख़्श उसे गिरफ्तार कर कारागार में डाल सकता है और उसकी संपत्ति जब्त कर सकता है, किंतु उसने इन चेतावनियों की उपेक्षा की। अप्रैल 1708 ई. में बहादुर शाह प्रथम ने कामबख़्श के दरबार में मकतबर ख़ान नामक एक दूत भेजा। तक़र्रुब ख़ान ने कामबख़्श को यह विश्वास दिलाया कि मकतबर ख़ान उसे सिंहासन से हटाने का षड्यंत्र कर रहा है। इसके बाद कामबख़्श ने मकतबर ख़ान और उसके साथियों को भोज के लिए आमंत्रित किया तथा उनकी हत्या करवा दी।

बहादुर शाह का दक्षिण अभियान

जनवरी 1708 ई. में जब बहादुर शाह अजमेर के निकट ठहरा हुआ था, तब उसे कामबख़्श के राज्याभिषेक की सूचना मिली। उसने जयसिंह और अजीत सिंह से समझौता कर कामबख़्श के विरुद्ध अभियान की तैयारियाँ आरंभ कर दीं। 23 मार्च 1708 ई. को उसने अजमेर से दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और मई 1708 ई. में नर्मदा पार करके बुरहानपुर पहुँचा।

बुरहानपुर से बहादुर शाह ने शांतिपूर्ण समझौते के उद्देश्य से मातबर ख़ान के माध्यम से कामबख़्श को पत्र भेजा। पत्र में उसने कामबख़्श को औरंगज़ेब की वसीयत के अनुसार बीजापुर और हैदराबाद के प्रांतों से संतुष्ट रहने की सलाह दी। बहादुर शाह ने अपने पिता औरंगज़ेब के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उसके मकबरे की यात्रा भी की। कामबख़्श ने अपने उत्तर में बहादुर शाह को धन्यवाद दिया, किंतु अपने कार्यों के संबंध में कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया। उसने मातबर ख़ान को छोड़कर उसके अन्य साथियों की हत्या करवा दी और मातबर ख़ान के माध्यम से बहादुर शाह को उत्तर भिजवाया कि अनावश्यक युद्ध करना निंदनीय है, किंतु उसने वसीयत के अनुसार ही बीजापुर तथा गोलकुंडा पर अधिकार किया है; इसलिए बहादुर शाह को इस पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए।

कामबख़्श का पतन

बहादुर शाह अपने भाई को क्षमा करके समझौता करना चाहता था, किंतु उसके पुत्रों और अमीरों ने उसकी समझौतावादी नीति का विरोध किया। उनका मत था कि एक साम्राज्य में केवल एक ही बादशाह होना चाहिए। अंततः बहादुर शाह ने कामबख़्श के विरुद्ध सैन्य अभियान का निर्णय लिया।

कामबख़्श ने इस बीच अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया। उसने मछलीबंदर के किले में छिपे तीस लाख रुपये से अधिक के खजाने पर अधिकार करने के उद्देश्य से उस क्षेत्र पर आक्रमण किया। वहाँ के सूबेदार जान सिपर ख़ान ने धन देने से इनकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर कामबख़्श ने उसकी संपत्ति जब्त कर ली और अपने अभियान के लिए चार हजार सैनिकों की भर्ती का आदेश दिया। जुलाई 1708 ई. में गुलबर्गा की सेना ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और उसके सेनानायक दिलेर ख़ान बीजापुरी ने भी कामबख़्श का साथ छोड़ दिया। 1 नवंबर 1708 ई. को कामबख़्श ने वाकिनखेड़ा के ज़मींदार पाम नाइक की भूमि पर अधिकार कर लिया, क्योंकि नाइक अपनी सेना के साथ वहाँ से जा चुका था।

15 जून 1708 ई. को बहादुर शाह बुरहानपुर से हैदराबाद की ओर रवाना हुआ। 5 नवंबर 1708 ई. को उसका शिविर हैदराबाद से लगभग 67 मील उत्तर में स्थित बीदर पहुँच गया। इतिहासकार विलियम इरविन के अनुसार जैसे-जैसे बहादुर शाह का शिविर कामबख़्श के निकट पहुँचता गया, कामबख़्श के समर्थकों और सैनिकों की संख्या लगातार घटती गई।

कामबख़्श की शक्ति का क्षय

बहादुर शाह के हैदराबाद की ओर बढ़ने पर कामबख़्श के अनेक सैनिक उसका साथ छोड़कर बहादुर शाह से जा मिले। जब कामबख़्श के एक सेनापति ने उसे बताया कि सैनिकों को वेतन देने में असमर्थता ही उनके पलायन का मुख्य कारण है, तो उसने उत्तर दिया कि उसे सैनिकों की भर्ती की आवश्यकता नहीं है; उसे ईश्वर पर विश्वास है और जो कुछ होगा, वह उसके लिए सर्वोत्तम होगा। समकालीन इतिहासकार ख़ाफ़ी ख़ान के अनुसार युद्ध से पूर्व कामबख़्श के सैनिकों की संख्या चार या पाँच सौ से अधिक नहीं रह गई थी।

अंतिम अभियान

बहादुर शाह को आशंका थी कि पराजित होने पर कामबख़्श फ़ारस भाग सकता है। इसलिए उसने अपने प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार ख़ान नुसरत जंग को मद्रास के गवर्नर थॉमस पिट से बातचीत करने का आदेश दिया, ताकि कामबख़्श को पकड़ने में सहायता के लिए उन्हें दो लाख रुपये दिए जा सकें। 20 दिसंबर 1708 ई. की सूचना के अनुसार, उस समय कामबख़्श के पास लगभग 2,500 घुड़सवार और 5,000 पैदल सैनिक थे।

20 दिसंबर 1708 ई. को बहादुर शाह कामबख़्श के विरुद्ध अंतिम अभियान के लिए हैदराबाद के बाहरी क्षेत्र में स्थित तालाब-ए-मीर जुमला की ओर बढ़ा। उसके साथ लगभग तीन सौ ऊँट और बीस हजार रॉकेट थे। उसके पुत्र जहाँदार शाह को प्रारंभ में अग्रिम दस्ते का सेनापति नियुक्त किया गया, किंतु बाद में उसके स्थान पर ख़ान ज़मान को नियुक्त कर दिया गया।

जनवरी 1709 ई. में बहादुर शाह हैदराबाद पहुँचा और उसने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार किया। उस समय कामबख़्श के पास धन और सैनिकों की संख्या बहुत कम रह गई थी। इसके बावजूद उसके राजकीय ज्योतिषी ने उसके युद्ध में विजय प्राप्त करने की भविष्यवाणी की थी।

कामबख़्श की पराजय और गिरफ्तारी

बहादुर शाह ने अपनी सेना को मुनीम ख़ान और ज़ुल्फिकार ख़ान के नेतृत्व में विभिन्न दलों में विभाजित किया। 13 जनवरी 1709 ई. को मुगल सेना ने कामबख़्श की सेना पर आक्रमण किया। लगभग दो घंटे के युद्ध के बाद कामबख़्श के शिविर को चारों ओर से घेर लिया गया। इसके बाद ज़ुल्फिकार ख़ान ने अपनी सेना के साथ निर्णायक आक्रमण किया।

कामबख़्श के सैनिकों की संख्या बहुत कम थी और वे लगातार हो रहे आक्रमण का प्रभावी ढंग से सामना करने में असमर्थ थे। ऐसी स्थिति में कामबख़्श स्वयं युद्ध में उतर आया और उसने शत्रु पर तीरों की दो बौछारें कीं। युद्ध में घायल होने और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण वह अत्यंत दुर्बल हो गया। अंततः उसे उसके पुत्र बारीकुल्ला सहित बंदी बना लिया गया और पालकी में बैठाकर बहादुर शाह के शिविर में लाया गया।

कामबख़्श को पकड़ने का श्रेय किसे दिया जाए, इस विषय में मोमिन ख़ान और ज़ुल्फिकार ख़ान नुसरत जंग के बीच विवाद उत्पन्न हुआ। अंततः रफ़ी-उश-शान ने ज़ुल्फिकार ख़ान के पक्ष में निर्णय दिया। गंभीर रूप से घायल कामबख़्श की 14 जनवरी 1709 ई. को मृत्यु हो गई। कामबख़्श और उसके पुत्र के शवों को दिल्ली ले जाकर हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया।

बहादुर शाह की नीतियाँ और उपलब्धियाँ

बहादुर शाह की राजपूत नीति

बहादुर शाह प्रथम ने प्रारंभ में राजपूतों के प्रति शांति और समझौते की नीति अपनाई। औरंगज़ेब की मृत्यु के समय जोधपुर को छोड़कर अधिकांश राजपूत शासकों के साथ मुगलों के संबंध अपेक्षाकृत संतोषजनक थे। किंतु औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के युद्ध और उससे उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों के कारण मुगल-राजपूत संबंध पहले की अपेक्षा तनावपूर्ण हो गए।

1707 ई. में जब बहादुर शाह काबुल से आगरा की ओर बढ़ रहा था, तब आमेर के राजा जय सिंह के छोटे भाई विजय सिंह तथा बूंदी के शासक बुध सिंह उसके साथ थे। दूसरी ओर, जब आज़म शाह दक्षिण से उत्तर भारत की ओर बढ़ा, तब आमेर के राजा जय सिंह, कोटा के राजा राम सिंह हाड़ा और दतिया के शासक दलपत बुंदेला ने उसका साथ दिया। उदयपुर के राणा अमर सिंह और जोधपुर के राजा अजीत सिंह उत्तराधिकार के युद्ध में तटस्थ रहे।

जाजऊ के युद्ध में राजपूतों की भूमिका

जाजऊ के युद्ध में दोनों पक्षों की ओर से राजपूतों ने भाग लिया। आज़म शाह की ओर से लड़ते हुए राम सिंह हाड़ा और दलपत बुंदेला मारे गए। जय सिंह ने युद्ध के दौरान अपना पक्ष बदलकर बहादुर शाह का साथ दिया। यद्यपि बहादुर शाह इससे प्रसन्न हुआ, किंतु जय सिंह अपने भाई विजय सिंह की तरह उसका विश्वासपात्र नहीं बन सका। इसी कारण युद्ध के बाद उसे मालवा की सूबेदारी देने के बजाय नगरकोट की फौजदारी प्रदान की गई। संभवतः बहादुर शाह आमेर की गद्दी उसके भाई विजय सिंह को देना चाहता था। इसी उद्देश्य से उसने आमेर को खालसा भूमि में मिलाने का निर्णय किया।

जोधपुर और आमेर की समस्या

जोधपुर के राजा अजीत सिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों का लाभ उठाकर जोधपुर के मुगल नायब फौजदार जाफर कुली ख़ान को वहाँ से निष्कासित कर दिया और जोधपुर पर अधिकार कर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। बहादुर शाह ने सितंबर 1707 ई. में मेहरबान ख़ान को जोधपुर का फौजदार नियुक्त किया और उसे वहाँ जाने का आदेश दिया। मुगल सेना के आगमन का समाचार मिलने पर उदयपुर के राणा अमर सिंह ने बहादुर शाह की सेवा में उपहार भेजे, जिन्हें उसने स्वीकार कर लिया।

राजपूताना की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बहादुर शाह स्वयं 10 नवंबर 1707 ई. को राजपूताना की ओर रवाना हुआ। 21 नवंबर को उसने फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह पर जाकर दर्शन किए। इसी बीच उसने मेहरबान ख़ान को जोधपुर पर अधिकार करने का आदेश दिया। बहादुर शाह जनवरी 1708 ई. में जय सिंह के साथ आमेर पहुँचा। उस समय आमेर के शासक जय सिंह और उसके भाई विजय सिंह के बीच मतभेद थे। बहादुर शाह ने इस विवाद का लाभ उठाते हुए आमेर को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित करने का निर्णय किया। उसने अहमद सईद ख़ान बारहा को आमेर का फौजदार नियुक्त किया और आमेर का नाम बदलकर ‘इस्लामाबाद’ कर दिया।

13 जनवरी 1708 ई. को बहादुर शाह अजमेर की ओर रवाना हुआ। इसी बीच उसे सूचना मिली कि जोधपुर पर अधिकार करने के लिए भेजे गए मेहरबान ख़ान ने अजीत सिंह को पराजित कर मेड़ता पर अधिकार कर लिया है तथा उदयपुर का राणा अमर सिंह अपने परिवार सहित पहाड़ों में चला गया है। इसी समय उसे दक्कन से यह समाचार भी मिला कि कामबख़्श ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी है, अपने नाम का ख़ुतबा पढ़वाया और अपने नाम से सिक्के चलवाए। इसलिए बहादुर शाह जोधपुर की समस्या का शीघ्र समाधान करके दक्कन की ओर जाना चाहता था। अजीत सिंह भी जोधपुर पर पुनः मुगल आक्रमण नहीं चाहता था। अंततः फरवरी 1708 ई. में अजीत सिंह और दुर्गादास अपने अन्य राजपूत साथियों के साथ मेड़ता में बहादुर शाह की सेवा में उपस्थित हुए और उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। अजीत सिंह को 3,500 जात और 3,000 सवार का मनसब तथा तीन परगने जागीर के रूप में प्रदान किए गए। इसी अभियान के दौरान बहादुर शाह ने उदयपुर के राणा अमर सिंह को भी अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

राजपूतों का पुनः विद्रोह

चित्तौड़ से बहादुर शाह दक्कन की ओर बढ़ा। जब वह नर्मदा के तट पर पहुँचा, तब अजीत सिंह, दुर्गादास और जय सिंह अपने सैनिकों सहित वहाँ से निकल गए। इससे बहादुर शाह क्रोधित हुआ, किंतु कामबख़्श की समस्या को अधिक गंभीर समझते हुए उसने उनका पीछा नहीं किया। इसी समय उसने जय सिंह के भाई विजय सिंह को 3,000 जात और 2,500 सवार का मनसब, ‘मिर्जा राजा’ की उपाधि तथा आमेर की गद्दी प्रदान की।

राजपूत राजाओं का त्रिगुट

शाही शिविर से निकलकर अजीत सिंह और जय सिंह उदयपुर पहुँचे, जहाँ राणा अमर सिंह ने उनका स्वागत किया। इसके बाद आमेर, जोधपुर और उदयपुर के राजपूत शासकों ने मुगलों के विरुद्ध एक त्रिगुट बनाया। इस गठबंधन को मजबूत करने के लिए उदयपुर के राणा अमर सिंह ने अपनी पुत्री चंद्रकुँवर का विवाह जय सिंह से कर दिया। जून 1708 ई. में त्रिगुट की लगभग 30,000 सैनिकों वाली संयुक्त सेना ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया और मुगल फौजदार मेहरबान ख़ान को वहाँ से भागना पड़ा। जुलाई 1708 ई. में अजीत सिंह ने पुनः जोधपुर की राजगद्दी प्राप्त कर ली। जोधपुर पर अधिकार करने के बाद लगभग 20,000 राजपूत सैनिकों ने आमेर पर भी अधिकार कर लिया और मुगल फौजदार हुसैन ख़ान को वहाँ से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार आमेर पर जय सिंह का पुनः अधिकार हो गया। राजपूतों ने हिंडौन और बयाना पर भी अधिकार कर लिया।

मुगल-राजपूत संघर्ष

बहादुर शाह ने राजपूतों की विद्रोही गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए असद ख़ान को अभियान का आदेश दिया। संभवतः वर्षा ऋतु के कारण वह तत्काल कोई प्रभावी सैन्य कार्रवाई नहीं कर सका। वर्षा समाप्त होने के बाद हुसैन ख़ान ने राजा बहादुर, अहमद सईद ख़ान और चूड़ामन जाट की सहायता से आमेर पर आक्रमण किया। किंतु यह अभियान असफल रहा और राजा बहादुर युद्ध में मारा गया। इस विजय से उत्साहित होकर जय सिंह और अजीत सिंह की संयुक्त सेना ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया। बहादुर शाह ने आमेर के प्रश्न को भी सुलझाने का प्रयास किया। 30 अप्रैल 1708 ई. को विजय सिंह को आमेर का प्रशासक नियुक्त किया गया। उसे ‘मिर्जा राजा’ की उपाधि और एक लाख रुपये मूल्य के उपहार प्रदान किए गए। इस प्रकार कुछ समय के लिए आमेर पुनः मुगल अधिकार में आ गया।

सांभर का युद्ध और संधि के प्रयास

अक्टूबर 1708 ई. में राजपूतों और मुगल सेना के बीच सांभर का युद्ध हुआ। युद्ध में सैयद हुसैन ख़ान बारहा की मृत्यु के बाद राजपूतों ने सांभर और डीडवाना पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रतिकूल स्थिति में शहज़ादा अज़ीम-उश-शान ने बहादुर शाह को राजपूतों से संधि करने की सलाह दी। बहादुर शाह ने असद ख़ान को राजपूत शासकों के साथ संधि की वार्ता आरंभ करने का आदेश दिया।

जय सिंह अपने लिए मालवा और अजीत सिंह के लिए गुजरात की सूबेदारी चाहता था। किंतु जब जय सिंह को गुजरात तथा अजीत सिंह को काबुल की सूबेदारी देने का प्रस्ताव रखा गया, तो दोनों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

राजपूतों के साथ समझौता

बहादुर शाह प्रथम राजपूत समस्या का स्थायी समाधान चाहता था। इसलिए जुलाई 1709 ई. में उसने औरंगाबाद से उत्तर भारत की ओर प्रस्थान किया। इसी बीच अजीत सिंह और जय सिंह के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामतः राजपूतों ने पुनः मुगलों के साथ संधि की दिशा में प्रयास आरंभ किए। शहज़ादा अज़ीम-उश-शान और असद ख़ान भी समझौते के पक्ष में थे। इसी समय पंजाब में बंदा बहादुर के नेतृत्व में सिख विद्रोह तीव्र हो रहा था। इस परिस्थिति में बहादुर शाह ने राजपूतों से समझौता करना उचित समझा।

मई 1710 ई. में जब बहादुर शाह दादवाँ की सराय में ठहरा हुआ था, तब राजपूत शासकों के प्रतिनिधि उसकी सेवा में उपस्थित हुए। बहादुर शाह ने जय सिंह, अजीत सिंह और अमर सिंह को क्षमा कर दिया तथा उन्हें पुनः मनसब प्रदान किए। 24 मई 1710 ई. को जारी शाही आदेश के द्वारा जय सिंह को आमेर और अजीत सिंह को जोधपुर का अधिकार प्रदान किया गया। अजीत सिंह को 4,000 जात और 4,000 सवार तथा जय सिंह को 3,500 जात और 3,500 सवार का मनसब दिया गया। बाद में इन राजपूत शासकों ने सिखों के विरुद्ध मुगल अभियानों में भी सहायता की।

अन्य राजपूत राज्यों के प्रति नीति

बहादुर शाह ने अन्य राजपूत राज्यों के प्रति भी परिस्थितिनुसार यही नीति अपनाई। उत्तराधिकार के युद्ध में कोटा के राजा राम सिंह ने आज़म शाह का साथ दिया था, जबकि बूंदी के राजा बुध सिंह ने बहादुर शाह का समर्थन किया था। राम सिंह की मृत्यु के बाद बहादुर शाह ने बुध सिंह को ‘राव राजा’ की उपाधि प्रदान कर कोटा का राज्य देने का प्रयास किया, किंतु राम सिंह के उत्तराधिकारियों के विरोध के कारण वह वहाँ अपना अधिकार स्थापित नहीं कर सका।

इसी प्रकार दतिया के शासक दलपत बुंदेला ने आज़म शाह की ओर से युद्ध करते हुए प्राण त्याग दिए थे। उसकी मृत्यु के बाद बहादुर शाह ने उसके पुत्र बिहारी चंद के विरुद्ध उसके दूसरे पुत्र रामचंद्र के उत्तराधिकार का समर्थन किया। बाद में रामचंद्र बिहारी चंद के विरोध के कारण बहादुर शाह की शरण में चला गया।

राजपूत नीति का स्वरूप

बहादुर शाह की राजपूत नीति परिस्थितिनिष्ठ और व्यावहारिक थी। उसका उद्देश्य राजपूताना में मुगल प्रभुत्व को बनाए रखना तथा राजपूत शासकों को साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था के भीतर रखना था। इसी उद्देश्य से उसने कभी आमेर की गद्दी पर जय सिंह के स्थान पर विजय सिंह को स्थापित करने का प्रयास किया, तो कभी अजीत सिंह और जय सिंह के साथ समझौता किया। जोधपुर के विरुद्ध मुगल कार्रवाई का प्रमुख कारण अजीत सिंह द्वारा मुगल सत्ता को चुनौती देना और स्वतंत्रता की दिशा में उसकी गतिविधियाँ थीं।

बहादुर शाह की मराठा नीति

बहादुर शाह प्रथम ने मराठों के प्रति अस्थिर और समझौतावादी नीति अपनाई, किंतु वह मराठा समस्या का स्थायी समाधान नहीं कर सका। उसने शिवाजी के पौत्र शाहू को मुक्त कर दिया, जो 1689 ई. से मुगल दरबार में बंधक के रूप में रह रहा था। शाहू को सतारा का राजा मानकर उसे महाराष्ट्र जाने की अनुमति दी गई। दिसंबर 1707 ई. में, आज़म शाह के विरुद्ध अभियान पर जाते समय, भुसावर में बहादुर शाह ने शाहू के भाई भुवन सिंह को अपना दूत बनाकर उसके पास भेजा और उसे कामबख़्श के विरुद्ध सहायता करने का संदेश दिया। उस समय शाहू ताराबाई के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था। इसलिए उसने अपने सेनापति नेमाजी शिंदे को बहादुर शाह की सहायता के लिए भेजा। नेमाजी ने कामबख़्श के विरुद्ध मुगल अभियान में भाग लिया। कामबख़्श की पराजय के बाद यह स्पष्ट हो गया कि बहादुर शाह शाहू का समर्थन कर रहा था।

चौथ और सरदेशमुखी का प्रश्न

दक्षिण से लौटते समय जब बहादुर शाह बुरहानपुर में था, तब शाहू ने अपने प्रतिनिधि गदाधर प्रह्लाद के माध्यम से मुगल क्षेत्रों से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने के अधिकार की माँग की। मीर बख़्शी जुल्फिकार ख़ान शाहू के पक्ष में था, जबकि वज़ीर मुनीम ख़ान ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। इसी समय ताराबाई ने भी दावा किया कि मराठा राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी उसके पुत्र शिवाजी द्वितीय को माना जाए और उसे सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार दिया जाए। ताराबाई ने यह आश्वासन भी दिया कि वह दक्षिण में मुगल साम्राज्य के विरोधियों का दमन करने में सहयोग करेगी।

बहादुर शाह की असमंजसपूर्ण नीति

शाहू के प्रश्न पर वज़ीर और मीर बख़्शी के बीच मतभेद के कारण बहादुर शाह दुविधा में पड़ गया। उसने स्पष्ट निर्णय लेने के बजाय शाहू और शिवाजी द्वितीय दोनों को मराठा राज्य का वैधानिक उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया। उसने कहा कि दोनों के बीच होने वाले संघर्ष में जो पक्ष विजयी होगा, वही सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार प्राप्त करेगा। इस प्रकार उसकी नीति ने अप्रत्यक्ष रूप से मराठों के बीच चल रहे उत्तराधिकार-संघर्ष को बढ़ावा दिया।

मराठों में आंतरिक संघर्ष

बहादुर शाह के दक्षिण से लौटते ही मराठा क्षेत्रों में पुनः संघर्ष और अशांति बढ़ गई। शाहू ने प्रचार किया कि बहादुर शाह ने उसके उत्तराधिकार को स्वीकार कर लिया है, किंतु उसे चौथ वसूल करने का अधिकार देने में विलंब किया जा रहा है। मुगल अधिकारी दाऊद ख़ान पन्नी ने मराठों में फूट डालने का प्रयास किया और अनेक मराठा सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया। ताराबाई के कुछ समर्थक भी दाऊद ख़ान के साथ हो गए। 1710 ई. में शाहू ने बीजापुर पर आक्रमण कर वहाँ लूटमार की। इससे मराठों के बीच पारस्परिक संघर्ष और वैमनस्य और बढ़ गया। फरवरी 1711 ई. में वज़ीर मुनीम ख़ान की मृत्यु के बाद जुल्फिकार ख़ान और शहज़ादा अज़ीम-उश-शान का मुगल राजनीति में प्रभाव बढ़ गया।

दाऊद ख़ान और शाहू के बीच समझौता

संभवतः इसी समय दाऊद ख़ान पन्नी ने शाहू के साथ एक गुप्त समझौता किया। इसके अंतर्गत उसने शाहू को छह प्रांतों की चौथ और सरदेशमुखी देने का आश्वासन दिया। इसकी शर्त थी कि सरदेशमुखी की वसूली स्वयं मराठों द्वारा न करके दाऊद ख़ान के अधिकारी करेंगे तथा शहज़ादों और उच्च अमीरों की जागीरों से चौथ या सरदेशमुखी नहीं वसूली जाएगी। संभवतः दाऊद ख़ान ने शाहू को संतुष्ट करने के उद्देश्य से यह मौखिक समझौता किया था, क्योंकि इसके बाद भी मराठों की मुगल क्षेत्रों में लूटमार जारी रही। ताराबाई के मराठा घुड़सवारों ने भी मुगल प्रदेशों में लूटपाट आरंभ कर दी।

ताराबाई की शक्ति का ह्रास

दाऊद ख़ान ने खानदेश पर आक्रमण करने के लिए हिरामन के नेतृत्व में एक सेना भेजी। इस सेना ने ताराबाई की सेना को पराजित किया। इससे ताराबाई की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होती गई, जबकि शाहू का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। इस प्रकार बहादुर शाह प्रथम के शासन के अंत तक मराठा समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं हो सका और मराठों के बीच संघर्ष तथा मुगल सत्ता के साथ उनके संबंधों में अस्थिरता बनी रही।

सिक्खों से संबंध

गुरु गोबिंद सिंह का बहादुर शाह से संबंध

सिखों के दसवें और अंतिम गुरु गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की थी। जब वे औरंगज़ेब के निमंत्रण पर उससे मिलने के लिए दक्षिण की ओर जा रहे थे, तभी उन्हें औरंगज़ेब की मृत्यु का समाचार मिला। इसके बाद उन्होंने दक्षिण की यात्रा स्थगित कर पंजाब लौटने का निर्णय किया। दिल्ली के निकट पहुँचने पर बहादुर शाह के एक दूत ने उनसे आगामी उत्तराधिकार के युद्ध में आज़म शाह के विरुद्ध बहादुर शाह की सहायता करने का अनुरोध किया, जिसे गुरु गोबिंद सिंह ने स्वीकार कर लिया। जुलाई 1707 ई. में गुरु गोबिंद सिंह आगरा पहुँचे, जहाँ बहादुर शाह ने उनका सम्मान किया। माना जाता है कि गुरु गोबिंद सिंह ने अपने सैनिकों के साथ जाजऊ के युद्ध में बहादुर शाह का समर्थन किया था। युद्ध समाप्त होने के बाद बहादुर शाह ने उन्हें खिलअत और अन्य उपहार देकर सम्मानित किया तथा संभवतः उनका शाही मनसब भी पुनः प्रदान किया। इससे ऐसा प्रतीत हुआ कि मुगलों और सिखों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेद समाप्त हो सकते हैं और दोनों के संबंधों में एक नए चरण की शुरुआत हो सकती है।

राजपूताना अभियान और दक्षिण की यात्रा

नवंबर 1707 ई. में राजपूताना अभियान के दौरान गुरु गोबिंद सिंह कुछ समय तक बहादुर शाह के साथ रहे और लगभग दस महीने तक शाही शिविर में रहे। इसके बाद कामबख़्श के विद्रोह के कारण बहादुर शाह को दक्षिण की ओर जाना पड़ा। उसने गुरु गोबिंद सिंह से भी अपने साथ चलने का अनुरोध किया और वे उसके साथ दक्षिण गए। नांदेड़ पहुँचने के बाद बहादुर शाह ने गुरु गोबिंद सिंह को वहीं रहने दिया और स्वयं आगे बढ़ गया। इसी दौरान नांदेड़ में एक अफ़गान व्यक्ति ने गुरु गोबिंद सिंह पर कटार से हमला कर उन्हें घायल कर दिया। इस घाव के कारण 7 अक्टूबर 1708 ई. को नांदेड़ में गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु हो गई। गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु के बाद मुगल-सिख संबंध शीघ्र ही पुनः तनावपूर्ण हो गए। गुरु गोबिंद सिंह के बाद बंदा बहादुर एक प्रभावशाली सिख नेता के रूप में उभरे और उनके नेतृत्व में सिखों ने मुगल सत्ता के विरुद्ध व्यापक विद्रोह आरंभ किया।

बंदा बहादुर का विद्रोह

बंदा बहादुर का प्रारंभिक जीवन और विद्रोह

बंदा बहादुर का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था और उसका प्रारंभिक नाम लक्ष्मण देव था। वह गुरु गोबिंद सिंह के व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ और उनके संपर्क में आने के बाद सिख धर्म स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात् वह बंदा बहादुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों के सिखों को संगठित कर मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह आरंभ किया। बंदा बहादुर ने कैथल, समाना, शाहाबाद, अंबाला, कुरुक्षेत्र और सरहिंद सहित अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। चप्पड़ चिड़ी के युद्ध में उसने सरहिंद के फौजदार वज़ीर ख़ान को पराजित कर मार डाला और सरहिंद पर अधिकार कर लिया। उसने स्वयं को ‘सच्चा बादशाह’ घोषित किया, लोहगढ़ को अपना केंद्र बनाया और वहाँ टकसाल स्थापित कर स्वतंत्र सिख राज्य की स्थापना का प्रयास किया।

नवंबर 1709 ई. में सिखों ने सोनीपत और समाना पर आक्रमण कर वहाँ के मुगल अधिकारियों को पराजित किया और दोनों नगरों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने शाहाबाद, सढौरा और बनूर पर भी अधिकार कर लिया। दिसंबर 1709 ई. में बहादुर शाह के पंजाब पहुँचने से पहले बंदा बहादुर सरहिंद और हिसार सरकार के अनेक परगनों पर अधिकार कर चुका था तथा सहारनपुर सरकार पर भी आक्रमण कर चुका था।

सहारनपुर और जलालाबाद अभियान

सरहिंद की विजय के बाद सिखों ने गंगा-यमुना दोआब की ओर रुख किया। देवबंद क्षेत्र में उन्हें स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ा। वहाँ सिख धर्म स्वीकार करने वाले लोगों ने फौजदार जलाल ख़ान द्वारा कैद और उत्पीड़न किए जाने की शिकायत की थी। इसके बाद बंदा बहादुर जलालाबाद के मार्ग से सहारनपुर की ओर बढ़ा। सहारनपुर का फौजदार अली हामिद ख़ान दिल्ली भाग गया। इसके बाद सिखों ने नगर के रक्षकों को पराजित कर सहारनपुर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने बेहट पर भी आक्रमण किया। वहाँ के पीरज़ादे हिंदू-विरोधी गतिविधियों, विशेषकर गोहत्या, के लिए कुख्यात थे। सिखों ने नगर में लूटपाट की और अनेक पीरज़ादों को मार डाला।

इसके बाद सिख जलालाबाद की ओर बढ़े। बंदा बहादुर ने जलाल ख़ान ओरकज़ई से आत्मसमर्पण करने और सिख बंदियों को मुक्त करने की माँग की, किंतु फौजदार ने इसे अस्वीकार कर दिया। 21 जुलाई 1710 ई. को सिख ननौता पहुँचे और वहाँ के शेख़ज़ादों को पराजित कर दिया। शेख़ज़ादों ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया, किंतु अंततः बंदा बहादुर की सेना के सामने पराजित हो गए। इसके बाद सिखों ने जलालाबाद को घेर लिया, किंतु कृष्णा नदी में आई बाढ़ के कारण उन्हें घेरा समाप्त कर जालंधर दोआब की ओर लौटना पड़ा।

जालंधर और अमृतसर अभियान

सिखों ने जालंधर और अमृतसर के क्षेत्रों से मुगल अधिकारियों को हटाने का प्रयास किया। उन्होंने जालंधर के फौजदार शम्स ख़ान से प्रशासन में सुधार करने और राजकोष सौंपने की माँग की। शम्स ख़ान ने प्रारंभ में अधीनता स्वीकार करने का दिखावा किया, किंतु बाद में सिखों के विरुद्ध आक्रमण कर दिया। उसने मुसलमानों से सिखों के विरुद्ध एकजुट होने का आह्वान किया और उनके विरुद्ध जिहाद की घोषणा की। संख्या में कम होने के कारण सिख पीछे हट गए, किंतु 12 अक्टूबर 1710 ई. को राहों के युद्ध में उन्होंने मुगल सेना को पराजित कर वहाँ के किले पर अधिकार कर लिया। अमृतसर में लगभग 8,000 सिख एकत्र हुए और उन्होंने माझा तथा रियाड़ क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। इसके साथ ही उन्होंने मध्य पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में भी अभियान चलाए।

सिखों ने लाहौर पर भी आक्रमण किया। वहाँ के मुल्लाओं ने उनके विरुद्ध जिहाद की घोषणा की, किंतु लाहौर के गवर्नर ने सिखों का सामना नहीं किया। सिखों ने मुगल समर्थक गाजी दलों को पराजित कर दिया। अपनी बढ़ती शक्ति का उपयोग करते हुए उन्होंने अनेक मुगल अधिकारियों को उनके पदों से हटाकर उनके स्थान पर सिख अधिकारियों की नियुक्ति की।

बंदा बहादुर ने लोहगढ़ को अपना प्रमुख केंद्र बनाया और वहाँ टकसाल स्थापित की। उसने मुगल जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया तथा किसानों को भूमि पर अधिक प्रत्यक्ष अधिकार प्रदान करने की नीति अपनाई। इस प्रकार उसने अपने अधिकार वाले क्षेत्रों में एक स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया।

बहादुर शाह का सिखों के विरुद्ध अभियान

बंदा बहादुर के विद्रोह की सूचना बहादुर शाह प्रथम को दक्षिण से लौटते समय मिली। उसने जैनुद्दीन को सरहिंद का फौजदार नियुक्त किया तथा अन्य प्रमुख अमीरों को सिखों के दमन के लिए वहाँ पहुँचने का आदेश दिया। बंदा बहादुर के विरुद्ध व्यापक अभियान आरंभ करने से पहले बहादुर शाह ने जोधपुर के अजीत सिंह और आमेर के जय सिंह के साथ समझौता किया। उसने अवध के नवाब आसफ़-उद-दौला, खान-ए-दुर्रानी, मुरादाबाद के फौजदार मुहम्मद अमीन ख़ान चिन, दिल्ली के सूबेदार असद ख़ान तथा जम्मू के फौजदार वाजिद ख़ान को भी इस अभियान में सम्मिलित होने का आदेश दिया।

17 जून 1710 ई. को बहादुर शाह अजमेर से पंजाब की ओर रवाना हुआ। मार्ग में वह बंदा बहादुर के विरोधियों को अपने साथ मिलाता गया। जब बंदा बहादुर को बहादुर शाह की योजनाओं की जानकारी मिली, तो उसने अजीत सिंह और जय सिंह से सहायता माँगी, किंतु उसे अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। इस बीच मुगल सेना ने सोनीपत, कैथल और पानीपत पर पुनः अधिकार कर लिया।

लोहगढ़ की घेराबंदी

बहादुर शाह के पंजाब अभियान के दौरान सिखों और मुगल सेना के बीच अनेक संघर्ष हुए। बंदा बहादुर लोहगढ़ के दुर्ग में चला गया। लोहगढ़ का दुर्ग अंबाला के उत्तर-पूर्व में हिमालय की तराई में स्थित था और गुरु गोबिंद सिंह के समय से सिखों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। अक्टूबर 1710 ई. में मुगल सेनापति खानज़ादा नवाब फ़िरोज़ ख़ान ने बहादुर शाह को सूचित किया कि उसने लगभग 300 विद्रोहियों को मार डाला है। उनके कटे हुए सिर बादशाह के पास भेजे गए और भालों पर लगाकर प्रदर्शित किए गए। 1 नवंबर 1710 ई. को बहादुर शाह करनाल पहुँचा। वहाँ मुगल मानचित्रकार रुस्तम दिल ख़ान ने उसे थानेसर और सरहिंद के मानचित्र प्रस्तुत किए। इसके कुछ दिनों बाद मेवात और बांसवाल में सिखों के एक छोटे दल को भी पराजित किया गया।

7 दिसंबर 1710 ई. को मुगल सेना ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया। घेराबंदी का नेतृत्व करने वाले सेनापति मुहम्मद अमीन ख़ान तुरानी ने विजय के उपलक्ष्य में बहादुर शाह को सोने की चाबियों का एक गुच्छा भेंट किया। इसके बाद बहादुर शाह ने लोहगढ़ की घेराबंदी की। सिखों ने कड़ा प्रतिरोध किया, किंतु मुगल सेना के दबाव के कारण बंदा बहादुर को दुर्ग छोड़कर निकलना पड़ा। अंधकार का लाभ उठाकर वह अपने कुछ साथियों के साथ पहाड़ियों की ओर चला गया। बहादुर शाह ने मुनीम ख़ान और हमीदुद्दीन ख़ान को बंदा बहादुर तथा उसके साथियों का पीछा करने का आदेश दिया।

30 नवंबर को मुगल सेना ने लोहगढ़ पर पुनः आक्रमण किया और विद्रोहियों से तीन तोपें, अनेक बंदूकें तथा अन्य सैन्य सामग्री अपने अधिकार में ले ली। गोला-बारूद की कमी होने पर बंदा बहादुर अपने कुछ सौ साथियों के साथ वहाँ से निकल गया। उसका साथी गुलाब सिंह, जो उसके समान दिखाई देता था और उसी प्रकार के वस्त्र पहने हुए था, युद्ध में मारा गया।

बंदा बहादुर की तलाश

बहादुर शाह ने कुमाऊँ और श्रीनगर के शासकों को आदेश दिया कि यदि बंदा बहादुर उनके क्षेत्रों में प्रवेश करने का प्रयास करे, तो उसे पकड़कर बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। बहादुर शाह को संदेह था कि बंदा बहादुर का नाहन के राजा भूप प्रकाश से संबंध है। इसी संदेह के आधार पर जनवरी 1711 ई. में उसने भूप प्रकाश को बंदी बना लिया। भूप प्रकाश की माता ने उसकी रिहाई के लिए बहुत प्रयास किए, किंतु प्रारंभ में उन्हें सफलता नहीं मिली। बाद में लगभग एक महीने बाद भूप प्रकाश को रिहा कर दिया गया।

लाहौर और पंजाब में संघर्ष

बंदा बहादुर के विद्रोह को समाप्त करने के लिए शुकर ख़ान बहादुर और हिम्मत दिलेर ख़ान को लाहौर भेजा गया। उनकी सहायता के लिए पाँच हजार सैनिकों की अतिरिक्त टुकड़ी भी भेजी गई। बहादुर शाह ने रुस्तम दिल ख़ान और मुहम्मद अमीन ख़ान को भी उनके साथ सम्मिलित होने का आदेश दिया। उस समय बंदा बहादुर लाहौर से लगभग सात मील दूर अलहलाब में ठहरा हुआ था। जब मुगल अधिकारी एक गाँव में पुल की मरम्मत करने पहुँचे, तो बंदा बहादुर के साथियों ने उन्हें भ्रमित करने के लिए यह सूचना दी कि वह अजमेर के मार्ग से दिल्ली पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा है। बंदा बहादुर को अपने अभियान के लिए स्थानीय शासक रामचंद से सैनिक सहायता भी प्राप्त हुई।

इसी बीच फरवरी 1711 ई. में वज़ीर मुनीम ख़ान की मृत्यु हो गई और बहादुर शाह लाहौर पहुँचकर वज़ीर पद से संबंधित राजनीतिक मामलों में व्यस्त हो गया। इसके बाद अप्रैल 1711 ई. में उसने फतेहाबाद की घेराबंदी की। जब रुस्तम जंग के माध्यम से उसे सूचना मिली कि बंदा बहादुर रावी नदी पार कर चुका है, तो बादशाह ने ईसा ख़ान के नेतृत्व में तोपखाने को उसके विरुद्ध भेजा।

सिखों का पुनः विद्रोह

बहादुर शाह की व्यस्तता का लाभ उठाकर सिखों ने पुनः विद्रोह और लूटपाट आरंभ कर दी। शम्स ख़ान और बयाज़ीद ख़ान ने विद्रोही सिखों के दमन का प्रयास किया, किंतु सिख सरदार बाज सिंह और फतेह सिंह के विरुद्ध युद्ध में शम्स ख़ान मारा गया और बयाज़ीद ख़ान घायल हो गया। बहादुर शाह ने मई 1711 ई. में रुस्तम दिल ख़ान और मुहम्मद अमीन ख़ान को सिख विद्रोहियों से निपटने का आदेश दिया। उन्होंने कसूर के युद्ध में सिखों को पराजित किया। इसके बाद हुए एक अन्य युद्ध में बंदा बहादुर को पराजित होना पड़ा और वह जम्मू की पहाड़ियों की ओर चला गया। बाद में उसने बटाला में लूटपाट की और वहाँ आग लगाकर पुनः जम्मू की पहाड़ियों में चला गया।

ईसा ख़ान मियाँ और मुहम्मद अमीन ख़ान के नेतृत्व वाली मुगल सेनाओं ने उसका पीछा किया, किंतु उसे पकड़ने में सफल नहीं हुईं। इसके बाद बहादुर शाह ने जम्मू के जमींदारों को आदेश दिया कि अवसर मिलने पर बंदा बहादुर को बंदी बना लिया जाए। सतलुज नदी के निकट मुहम्मद अमीन ख़ान ने बंदा बहादुर पर आक्रमण किया, जिससे वह गढ़वाल की पहाड़ियों की ओर चला गया।

बंदा बहादुर को पकड़ने के लिए बहादुर शाह ने अजीत सिंह और जय सिंह से भी सहायता माँगी। अक्टूबर 1711 ई. में मुगल और राजपूतों की संयुक्त सेना ने सढौरा की ओर कूच किया। किंतु बंदा बहादुर घेराबंदी से बच निकलने में सफल रहा और बाद में उसने वर्तमान हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में शरण ली।

बुंदेलों और जाटों से मित्रता

बहादुर शाह प्रथम ने बुंदेला सरदार छत्रसाल से मेल-मिलाप की नीति अपनाई, जिसके परिणामस्वरूप छत्रसाल ने मुगल सत्ता के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए। बादशाह ने जाट सरदार चूड़ामणि से भी मित्रता स्थापित की। चूड़ामणि ने बंदा बहादुर के विरुद्ध मुगल अभियान में बहादुर शाह का साथ दिया।

खुत्बा विवाद

गद्दी पर बैठने के बाद बहादुर शाह प्रथम ने खुत्बे में परिवर्तन कराने का प्रयास किया। मई 1710 ई. में उसने आदेश दिया कि साम्राज्य की मस्जिदों में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान खुत्बा पढ़ते समय पैगंबर मुहम्मद के चचेरे भाई और दामाद तथा प्रथम शिया इमाम अली को ‘वसी’ की उपाधि से संबोधित किया जाए। इस आदेश का सुन्नी जनता और उलेमा ने विरोध किया, जिसके कारण अनेक स्थानों पर अशांति उत्पन्न हो गई। सितंबर 1711 ई. में अहमदाबाद के खतीब की उस समय हत्या कर दी गई, जब वह नया खुत्बा पढ़ रहा था। लाहौर के खतीब ने भी नया खुत्बा पढ़ने से इनकार कर दिया। विवाद को सुलझाने के लिए बहादुर शाह सितंबर 1711 ई. में लाहौर पहुँचा और हाजी यार मुहम्मद, मुहम्मद मुराद तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों से बातचीत की। बैठक में उसने ‘वसी’ शब्द के प्रयोग को उचित ठहराने के लिए प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथ प्रस्तुत किए। यार मुहम्मद ने बादशाह के निर्णय का विरोध किया और उसके विरुद्ध सेना एकत्र करने का प्रयास किया। उसे बहादुर शाह के पुत्र अज़ीम-उश-शान का भी समर्थन प्राप्त था, किंतु दोनों पक्षों के बीच कोई युद्ध नहीं हुआ। बहादुर शाह ने इस विवाद के लिए बादशाही मस्जिद के खतीब (मुख्य उपदेशक) को जिम्मेदार ठहराया और उसे गिरफ्तार करवा दिया। 2 अक्टूबर को मस्जिद में सेना तैनात होने के बावजूद पुराना खुत्बा पढ़ा गया, जिसमें अली को ‘वसी’ की उपाधि से संबोधित नहीं किया गया। अंततः बहादुर शाह को खुत्बे में परिवर्तन का आदेश वापस लेना पड़ा और औरंगज़ेब के शासनकाल में प्रचलित परंपरा के अनुसार खुत्बा पढ़ा जाने लगा।

बहादुर शाह की मृत्यु

इतिहासकार विलियम इरविन के अनुसार, जनवरी 1712 ई. में लाहौर में रहते हुए बहादुर शाह का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। 24 फरवरी को वह अंतिम बार सार्वजनिक रूप से उपस्थित हुआ और 27–28 फरवरी 1712 ई. की मध्यरात्रि में उसका निधन हो गया। मुगल दरबारी कामवर ख़ान के अनुसार, उसकी मृत्यु प्लीहा के बढ़ जाने के कारण हुई थी। 11 अप्रैल 1712 ई. को उसके पार्थिव शरीर को उसकी विधवा मेहर परवर और चिन क़िलिच ख़ान की देखरेख में दिल्ली ले जाया गया। वहाँ 15 मई 1712 ई. को उसे मेहरौली में प्रसिद्ध सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के निकट स्थित मोती मस्जिद के प्रांगण में दफनाया गया।

बहादुर शाह के सिक्के

बहादुर शाह प्रथम ने सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किए, यद्यपि उसके पूर्ववर्तियों के सिक्के भी विभिन्न प्रकार के भुगतानों में प्रचलित रहे। औरंगज़ेब के शासनकाल के ताँबे के सिक्कों को उसके नाम के साथ पुनः ढाला गया। अन्य मुगल बादशाहों के विपरीत, बहादुर शाह के सिक्कों पर उसका नाम किसी शेर या काव्य-पंक्ति में अंकित नहीं किया गया। कवि दानिशमंद ख़ान ने उसके सिक्कों के लिए दो पंक्तियाँ लिखी थीं, किंतु उन्हें शाही स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई।

धर्म एवं धार्मिक नीति

बहादुर शाह प्रथम एक धर्मनिष्ठ मुसलमान था। सैनिक अभियानों के दौरान यदि मार्ग में किसी सूफी संत की दरगाह पड़ती, तो वह उसकी जियारत किए बिना आगे नहीं बढ़ता था। यद्यपि उसका पालन-पोषण सुन्नी परिवेश में हुआ था, किंतु उसने शिया परंपराओं के प्रति भी निकटता प्रदर्शित की। राज्यारोहण के समय उसने अपने नाम के साथ ‘सैयद’ उपाधि का प्रयोग किया। इससे प्रतीत होता है कि वह सुन्नी और शिया समुदायों के बीच विद्यमान मतभेदों को कम कर धार्मिक सद्भाव स्थापित करना चाहता था।

औरंगज़ेब की भाँति उसने शिया अमीरों को उच्च प्रशासनिक पद देने में कोई संकोच नहीं किया। उसने असद ख़ान को वकील, मुनीम ख़ान को वज़ीर और जुल्फिकार ख़ान को मीर बख्शी के पद पर नियुक्त किया। बहादुर शाह प्रथम को ‘सैयद’ उपाधि धारण करने वाला मुगल बादशाह माना जाता है।

हिंदुओं के प्रति भी बहादुर शाह का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उदार था। यद्यपि उसने स्त्रियों, बच्चों, अपाहिजों, निर्धनों तथा शाही सेवा में लगे व्यक्तियों को छोड़कर अन्य गैर-मुसलमानों से जज़िया वसूल किया, किंतु प्रशासन में उनके साथ व्यापक भेदभाव नहीं किया। उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें उच्च मनसब और प्रशासनिक पद प्रदान किए गए। उसके शासनकाल में मंदिर-विध्वंस की कोई व्यापक नीति नहीं अपनाई गई। अपने लगभग पाँच वर्ष के संक्षिप्त शासनकाल में बहादुर शाह ने संगीत को भी संरक्षण दिया।

निजी जीवन

बहादुर शाह का पूरा नाम अबुल-नसर सैयद कुतुबुद्दीन मुहम्मद शाह आलम बहादुर शाह बादशाह था। उसके नाम में प्रयुक्त ‘सैयद’ उपाधि पैगंबर मुहम्मद के वंश से संबंध का संकेत करती थी। उसकी मृत्यु के बाद कुछ समकालीन इतिहासकारों ने उसे ‘खुल्द-मंजिल’ की उपाधि से संबोधित किया, जिसका अर्थ स्वर्गवासी अथवा स्वर्ग को प्राप्त व्यक्ति है। विलियम इरविन के अनुसार बहादुर शाह के नाना राजा ताजुद्दीन ख़ान जर्राल थे। उनकी पुत्री नवाब बाई का विवाह औरंगज़ेब से हुआ था।

बहादुर शाह का मूल्यांकन

बहादुर शाह का जीवन अपने पिता औरंगज़ेब के साथ युद्ध शिविरों और सैनिक अभियानों के बीच बीता। उत्तराधिकार के युद्ध के दौरान जब औरंगज़ेब दारा शिकोह के विरुद्ध दक्षिण की ओर बढ़ा, तब उसने अपने पुत्र बहादुर शाह को दक्षिण का शासन सौंपा। उस समय उसकी आयु लगभग चौदह वर्ष थी, किंतु उसने अपने दायित्वों का दृढ़तापूर्वक निर्वाह किया। बाद में औरंगज़ेब ने उसे विभिन्न सैनिक अभियानों में भेजा और अलग-अलग प्रांतों का सूबेदार नियुक्त किया। औरंगज़ेब की संदेहशील प्रवृत्ति के कारण उसे 1687 से 1694 ई. तक लगभग सात वर्ष कारावास में भी रहना पड़ा। इन विविध परिस्थितियों ने उसे अनुभवी और परिपक्व बना दिया था।

बादशाह बनने के बाद बहादुर शाह ने मुगल साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को बनाए रखने का प्रयास किया। उसने राजपूतों, सिखों, मराठों तथा अन्य समकालीन शक्तियों के साथ समझौते और मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु वह इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं कर सका। उसके शासनकाल में जुल्फिकार ख़ान को मीर बख्शी के पद के साथ दक्कन की सूबेदारी भी प्रदान की गई। इस प्रकार एक ही अमीर के पास एक साथ दो महत्त्वपूर्ण पद रहने की परंपरा को बल मिला। इसी काल में वज़ीर के पद का महत्त्व भी बढ़ा और इस पद को प्राप्त करने के लिए अमीरों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हुई।

1711 ई. में डच प्रतिनिधिमंडल जेसुआस केटेलार के नेतृत्व में मुगल दरबार में आया। इस प्रतिनिधिमंडल से संबंधित मामलों में पुर्तगाली महिला जूलियानी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। उसकी सेवाओं के कारण उसे ‘बीबी फ़िदवा’ की उपाधि प्रदान की गई।

बहादुर शाह प्रथम स्वभाव से शांतिप्रिय और उदार शासक था। उसकी समझौतावादी नीति के कारण कुछ इतिहासकारों ने उसकी आलोचना की है। सिंहासन पर बैठते समय उसकी आयु लगभग 63 वर्ष थी, जिसके कारण वह अपने पूर्ववर्तियों की अपेक्षा कम सक्रिय रहा। उसकी प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण उसे ‘शाह-ए-बेख़बर’ भी कहा गया। उसकी दुर्बलता और निष्क्रियता के कारण मुगल दरबार में अमीरों के बीच गुटबंदी बढ़ने लगी। प्रमुख रूप से ईरानी और तूरानी गुट प्रभावशाली हुए। ईरानी गुट में असद ख़ान और उसके पुत्र जुल्फिकार ख़ान जैसे शिया अमीर प्रमुख थे, जबकि तूरानी गुट में चिन क़िलिच ख़ान और फ़िरोज़ जंग जैसे सुन्नी अमीर शामिल थे।

बहादुर शाह प्रथम का मूल्यांकन करते हुए इतिहासकार सिडनी ओवेन ने उसे ऐसा अंतिम मुगल बादशाह बताया है, जिसके संबंध में कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं। उसके बाद मुगल साम्राज्य का पतन अधिक तीव्र हो गया और बाद के मुगल सम्राटों की राजनीतिक दुर्बलता स्पष्ट रूप से सामने आई। इस दृष्टि से बहादुर शाह प्रथम का शासनकाल महान मुगलों के वैभव की अंतिम झलक था।

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