बहादुर शाह ज़फ़र (Bahadur Shah Zafar)

बहादुर शाह ज़फ़र
बहादुर शाह ज़फ़र (1837-1857 ई.) बहादुर शाह द्वितीय, जिन्हें बहादुर शाह ज़फ़र के नाम से […]

बहादुर शाह ज़फ़र (1837-1857 ई.)

बहादुर शाह द्वितीय, जिन्हें बहादुर शाह ज़फ़र के नाम से जाना जाता है, का जन्म 24 अक्टूबर 1775 ई. को दिल्ली में हुआ था। वे मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के पुत्र और मुगल साम्राज्य के अंतिम सम्राट थे। उनका पूरा नाम अबू ज़फ़र सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह था। ‘ज़फ़र’ उनका काव्य-उपनाम था, जिसका अर्थ ‘विजय’ है। 28 सितंबर 1837 ई. को अपने पिता अकबर द्वितीय की मृत्यु के बाद वे मुगल सिंहासन पर बैठे। उस समय मुगल साम्राज्य की वास्तविक राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी और उनका प्रभाव मुख्यतः दिल्ली के लाल किले तथा उसके आसपास के क्षेत्र तक सीमित था। ईस्ट इंडिया कंपनी उन्हें पेंशन देती थी और दिल्ली में अपनी सैन्य तथा प्रशासनिक व्यवस्था बनाए हुए थी। इसके बावजूद बहादुर शाह ज़फ़र ने मुगल दरबार की सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा और वे स्वयं उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उनके दरबार में मिर्ज़ा ग़ालिब, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़, मोमिन ख़ाँ मोमिन और दाग़ देहलवी जैसे प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों का आगमन होता था।

उत्तराधिकार और सीमित सत्ता

बहादुर शाह ज़फ़र के पिता अकबर द्वितीय के शासनकाल में उत्तराधिकार का प्रश्न लंबे समय तक विवादित रहा। अकबर द्वितीय की एक बेगम अपने पुत्र मिर्ज़ा जहाँगीर को उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं, किंतु मिर्ज़ा जहाँगीर द्वारा दिल्ली स्थित ईस्ट इंडिया कंपनी के रेज़िडेंट आर्चीबाल्ड सेटन पर हमला किए जाने के बाद उसे निर्वासित कर दिया गया। इसके बाद बहादुर शाह ज़फ़र के लिए सिंहासन का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1837 ई. में वे मुगल सम्राट बने, लेकिन उस समय तक मुगल सत्ता केवल नाममात्र की रह गई थी। दिल्ली के बाहर उनके पास कोई प्रभावी राजनीतिक या सैन्य अधिकार नहीं था।

1857 का विद्रोह

1857 ई. के विद्रोह ने बहादुर शाह ज़फ़र के जीवन को निर्णायक रूप से बदल दिया। मेरठ से विद्रोह करने वाले सैनिक 11 मई 1857 ई. को दिल्ली पहुँचे और उन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र को भारत का सम्राट स्वीकार करते हुए उनके नेतृत्व में विद्रोह को व्यापक राजनीतिक स्वरूप प्रदान किया। प्रारंभ में ज़फ़र इस भूमिका को लेकर दुविधा में थे, क्योंकि उनके पास विद्रोही सैनिकों का खर्च उठाने या उनके लिए पर्याप्त सैन्य संसाधन उपलब्ध कराने के साधन नहीं थे। किंतु विद्रोहियों के आग्रह पर उन्होंने उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया। 12 मई 1857 ई. को उन्होंने औपचारिक दरबार आयोजित किया, जिसमें विद्रोही सैनिकों ने उनसे समर्थन की अपेक्षा की।

बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने बड़े पुत्र मिर्ज़ा मुग़ल को सेना के नेतृत्व की जिम्मेदारी दी, किंतु विद्रोही सैनिकों के बीच एकीकृत सैन्य कमान स्थापित नहीं हो सकी। दिल्ली में प्रशासनिक अव्यवस्था भी बढ़ती गई। अंग्रेज़ों ने दिल्ली की घेराबंदी की और अंततः सितंबर 1857 ई. में शहर पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके बाद बहादुर शाह ज़फ़र ने हुमायूँ के मकबरे में शरण ली। मेजर विलियम हडसन ने 20 सितंबर 1857 ई. को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन हडसन ने उनके पुत्र मिर्ज़ा मुग़ल, मिर्ज़ा ख़िज़्र सुल्तान और पोते मिर्ज़ा अबू बख़्त को दिल्ली के खूनी दरवाज़े के निकट गोली मार दी।

बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ्तार करने के बाद अंग्रेज़ों ने उन पर मुकदमा चलाया। उन पर विद्रोहियों की सहायता करने, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध को बढ़ावा देने, स्वयं को भारत का सम्राट घोषित करने तथा यूरोपीय लोगों की हत्या में संलिप्त होने जैसे आरोप लगाए गए। मुकदमा दिल्ली के लाल किले में चला और लगभग तीन सप्ताह तक इसकी कार्यवाही हुई। ज़फ़र ने अपने बचाव में कहा कि वे विद्रोही सैनिकों के दबाव में थे और उनके पास वास्तविक नियंत्रण या स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति नहीं थी। इसके बावजूद उन्हें दोषी ठहराया गया। हडसन द्वारा आत्मसमर्पण के समय दी गई सुरक्षा की गारंटी के कारण उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया गया और उन्हें परिवार के कुछ सदस्यों के साथ रंगून निर्वासित कर दिया गया।

निर्वासन और मृत्यु

7 अक्टूबर 1858 ई. को बहादुर शाह ज़फ़र अपनी पत्नी ज़ीनत महल और परिवार के कुछ सदस्यों के साथ रंगून के लिए रवाना हुए। उन्हें ब्रिटिश शासन के अधीन बर्मा में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। निर्वासन के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। 7 नवंबर 1862 ई. को रंगून में उनका निधन हो गया। उन्हें वहीं श्वेदागोन पगोडा के निकट दफनाया गया। बाद में उनके दफन स्थल पर बहादुर शाह ज़फ़र की दरगाह का निर्माण किया गया।

उर्दू साहित्य में योगदान

बहादुर शाह ज़फ़र केवल अंतिम मुगल सम्राट ही नहीं, बल्कि उर्दू के प्रसिद्ध शायर भी थे। वे ‘ज़फ़र’ उपनाम से ग़ज़लें लिखते थे। 1857 ई. के विद्रोह के दौरान उनकी अनेक रचनाएँ नष्ट या बिखर गईं, लेकिन उनकी शायरी का एक महत्वपूर्ण संग्रह बाद में ‘कुल्लियात-ए-ज़फ़र’ के नाम से संकलित किया गया। उनकी कविताओं में विरह, अस्थिर जीवन, मातृभूमि से दूर होने की पीड़ा और मृत्यु-बोध की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किसकी बनी है आलम-ए-नापायदार में।

और—

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।

उनकी सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में यह शेर भी शामिल है—

कितना है बदनसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

इन पंक्तियों में निर्वासन और अपनी मातृभूमि में दफन न हो पाने की पीड़ा स्पष्ट दिखाई देती है।

हिंदू-मुस्लिम एकता और 1857

1857 ई. के विद्रोह के दौरान बहादुर शाह ज़फ़र की भूमिका केवल मुगल सम्राट के रूप में नहीं, बल्कि विद्रोह के एक साझा प्रतीक के रूप में भी महत्त्वपूर्ण थी। मेरठ से दिल्ली पहुँचे सैनिकों द्वारा उन्हें सम्राट स्वीकार करना इस बात का संकेत था कि वे अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध विभिन्न भारतीय समूहों को एक प्रतीकात्मक नेतृत्व प्रदान कर सकते थे। उनके नाम से जारी आदेशों में हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखने पर बल दिया गया। गोहत्या पर रोक लगाने संबंधी आदेश को भी इसी संदर्भ में देखा जाता है। इस प्रकार ज़फ़र का दरबार उस समय की साझा हिंदुस्तानी संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बना रहा।

उनसे संबंधित कुछ प्रसिद्ध शेर और संवाद जनश्रुतियों में भी प्रचलित हैं। मेजर हडसन और बहादुर शाह ज़फ़र के बीच शेरो-शायरी के रूप में संवाद की कथा भी कही जाती है, किंतु इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के बजाय जनश्रुति के रूप में देखना अधिक उचित है।

बहादुर शाह ज़फ़र का जीवन मुगल साम्राज्य के अंतिम चरण और भारत में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के संक्रमणकाल का प्रतीक है। वे ऐसे समय में मुगल सिंहासन पर बैठे, जब सम्राट की राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी, किंतु मुगल नाम और दिल्ली का शाही दरबार अभी भी भारतीय समाज में गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखते थे। 1857 ई.  के विद्रोह में उनकी भूमिका ने उन्हें औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। उनकी गिरफ्तारी, मुकदमा और रंगून निर्वासन मुगल सत्ता के अंतिम अंत का प्रतीक बने। साहित्य में उनकी पहचान एक संवेदनशील उर्दू शायर के रूप में भी बनी रही और उनकी कविताएँ आज भी निर्वासन, विरह और मातृभूमि के प्रति गहरी भावनाओं के लिए स्मरण की जाती हैं

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