फ़र्रुख़सियर (Farrukhsiyar)

फ़र्रुख़सियर (Farrukhsiyar)
फ़र्रुख़सियर (1713–1719 ई.) मुख्य लेख : परवर्ती मुगल  फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं—अब्दुल्ला ख़ान और हुसैन […]

फ़र्रुख़सियर (1713–1719 ई.)

मुख्य लेख : परवर्ती मुगल 

फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं—अब्दुल्ला ख़ान और हुसैन अली ख़ान की सहायता से अपने चाचा जहाँदार शाह को पराजित कर मुग़ल सिंहासन प्राप्त किया। उनके शासनकाल में सैयद बंधुओं का राजनीतिक प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और सम्राट तथा दरबार के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहा। 1717 ई. में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को प्राप्त व्यापारिक सुविधाओं वाला फ़रमान उनके शासन की प्रमुख घटनाओं में था। अंततः सैयद बंधुओं ने फ़र्रुख़सियर को अपदस्थ कर दिया और 9 अप्रैल 1719 ई. को उनकी हत्या कर दी।

प्रारंभिक जीवन

मुहम्मद फ़र्रुख़सियर का जन्म 20 अगस्त 1683 को दक्कन के औरंगाबाद में हुआ था। उनकी माता साहिबा निस्वान कश्मीरी मूल की थीं। वे अज़ीम-उश-शान के दूसरे पुत्र, बहादुर शाह प्रथम के पौत्र तथा औरंगज़ेब के प्रपौत्र थे। 1696 ई. में फ़र्रुख़सियर अपने पिता के साथ बंगाल के अभियान में गए। 1707 ई. में औरंगज़ेब ने अज़ीम-उश-शान को बंगाल का दायित्व सौंपा और फ़र्रुख़सियर को भी वहाँ प्रशासनिक कार्यों में लगाया गया। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन का महत्त्वपूर्ण समय बंगाल सूबे की राजधानी ढाका में बिताया।

1712 ई. में बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संघर्ष आरंभ हुआ। अज़ीम-उश-शान ने फ़र्रुख़सियर को अपनी सहायता के लिए बुलाया, लेकिन वे अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिलने से पहले ही अज़ीमाबाद (वर्तमान पटना) पहुँच चुके थे। जब उन्हें पता चला कि उनके पिता पराजित होकर मारे जा चुके हैं, तो उन्होंने स्वयं को उत्तराधिकार का दावेदार घोषित किया।

जहाँदार शाह का पराभव

जहाँदार शाह के विरुद्ध फ़र्रुख़सियर को सैयद बंधुओं—हुसैन अली ख़ान और अब्दुल्ला ख़ान का समर्थन प्राप्त हुआ। दोनों भाइयों ने अपने सैन्य और राजनीतिक संसाधनों के माध्यम से फ़र्रुख़सियर की स्थिति मजबूत की।

प्रारंभिक संघर्षों में फ़र्रुख़सियर की सेना ने सफलता प्राप्त की। जहाँदार शाह ने अपने पुत्र अज़ुद्दीन तथा सेनापति ख़्वाजा अहसन ख़ान को उसके विरुद्ध भेजा, लेकिन वे पराजित हुए। इसके बाद 10 जनवरी 1713 ई. को आगरा के निकट समूगढ़ में दोनों पक्षों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। जहाँदार शाह पराजित होकर बंदी बना लिए गए और फ़र्रुख़सियर विजयी हुए। इसके बाद उन्होंने मुग़ल सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

शासन और सैयद बंधुओं का प्रभाव

फ़र्रुख़सियर के सिंहासनारोहण में सैयद बंधुओं की निर्णायक भूमिका थी। अब्दुल्ला ख़ान को वज़ीर तथा हुसैन अली ख़ान को मीर बख़्शी नियुक्त किया गया। सत्ता प्राप्त करने में उनकी सहायता के बदले सैयद बंधुओं को उच्च पद और उपाधियाँ प्रदान की गईं। प्रारंभ में फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं को सम्मान और उच्च पद दिए, किंतु शीघ्र ही दोनों पक्षों के बीच अविश्वास उत्पन्न हो गया। फ़र्रुख़सियर को भय था कि सैयद बंधु उनकी सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं, जबकि सैयद बंधुओं को सम्राट की नीतियों और उनके विरोधी दरबारी गुटों पर संदेह था। परिणामस्वरूप मुग़ल दरबार में निरंतर षड्यंत्र और सत्ता-संघर्ष चलता रहा तथा धीरे-धीरे सैयद बंधु साम्राज्य के वास्तविक सत्ता-केंद्र बन गए।

राजपूतों के विरुद्ध अभियान

मारवाड़ के महाराजा अजीत सिंह ने अजमेर पर अधिकार कर वहाँ से मुग़ल अधिकारियों को हटा दिया। फ़र्रुख़सियर ने हुसैन अली ख़ान को उनके विरुद्ध अभियान पर भेजा। मुग़ल सेना की प्रगति से अजीत सिंह ने समझौता करना उचित समझा और अंततः मुग़ल सत्ता को स्वीकार कर लिया। इस समझौते के अंतर्गत अजीत सिंह ने अपनी पुत्री इंदिरा कँवर का विवाह फ़र्रुख़सियर से कर दिया। इससे कुछ समय के लिए राजपूतों और मुग़ल दरबार के संबंधों में सुधार हुआ।

जाटों के विरुद्ध अभियान

औरंगज़ेब के दीर्घकालीन दक्कनी अभियानों के बाद उत्तर भारत में मुग़ल सत्ता कमजोर हो गई थी। इस स्थिति का लाभ उठाकर जाटों ने अपनी शक्ति बढ़ाई। जाट नेता चूड़ामन ने भरतपुर क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। फ़र्रुख़सियर ने उसके विरुद्ध कई सैन्य अभियान चलाए। 1716 ई. में आमेर के राजा जय सिंह द्वितीय ने चूड़ामन के गढ़ थून की घेराबंदी की। लंबे संघर्ष के बाद चूड़ामन ने मुग़ल सत्ता को स्वीकार कर लिया और समझौते के लिए मुग़ल दरबार में उपस्थित हुआ।

सिखों के विरुद्ध अभियान

फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सिखों के विरुद्ध मुग़ल अभियान निर्णायक चरण में पहुँचा। 1715 ई. में मुग़ल अधिकारियों के नेतृत्व में बड़ी सेना ने गुरदासपुर के निकट सिखों को घेर लिया। लगभग आठ महीने की घेराबंदी के बाद रसद और गोला-बारूद की कमी के कारण बंदा सिंह बहादुर ने आत्मसमर्पण किया। उन्हें उनके अनेक साथियों सहित बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। फ़र्रुख़सियर के आदेश से बंदा सिंह बहादुर और उनके साथियों को कठोर दंड दिया गया तथा 1716 ई. में उन्हें मृत्युदंड दिया गया।

सिंध में विद्रोह

सिंध में शाह इनायत ने किसानों और स्थानीय ज़मींदारों के बीच भूमि संबंधों को लेकर आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने किसानों को संगठित कर भूमि के अधिक न्यायपूर्ण वितरण का प्रयास किया। फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में इस आंदोलन को विद्रोह मानकर दबा दिया गया और 1718 ई. में शाह इनायत को मृत्युदंड दिया गया।

जज़िया का पुनः प्रवर्तन

फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में जज़िया की वसूली को पुनः सक्रिय किया गया। दरबार के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों ने इस नीति को लागू करने में भूमिका निभाई। इससे मुग़ल प्रशासन में धार्मिक कर से संबंधित पुरानी व्यवस्था को फिर से महत्त्व मिला।

बंगाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक सुविधाएँ

1717 ई. में फ़र्रुख़सियर ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को एक महत्त्वपूर्ण फ़रमान प्रदान किया। इसके अंतर्गत कंपनी को बंगाल में व्यापार के लिए विशेष सुविधाएँ मिलीं। कंपनी को निश्चित वार्षिक भुगतान के बदले चुंगी और अन्य व्यापारिक करों से काफी हद तक छूट तथा सामान के परिवहन के लिए दस्तक जारी करने का अधिकार प्राप्त हुआ। कंपनी के अधिकारियों ने बाद में दस्तकों का निजी व्यापार में भी दुरुपयोग किया। इससे बंगाल के नवाबों और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तनाव बढ़ा। आगे चलकर ये व्यापारिक विशेषाधिकार बंगाल में कंपनी की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के विस्तार का महत्त्वपूर्ण आधार बने। फ़र्रुख़सियर के इस फ़रमान को प्रायः ‘ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है।

दक्कन की नीति और मराठों से समझौता

सैयद हुसैन अली ख़ान के दक्कन पहुँचने के बाद उन्होंने मराठा शासक शाहू प्रथम के साथ समझौता किया। 1718 ई. के इस समझौते के अंतर्गत शाहू को दक्कन में सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार तथा कुछ क्षेत्रों पर अधिकार प्राप्त हुआ। इसके बदले उन्होंने मुग़ल सत्ता के प्रति औपचारिक निष्ठा स्वीकार की और सैयद बंधुओं को सैन्य सहायता देने पर सहमति व्यक्त की। यह समझौता फ़र्रुख़सियर की स्वीकृति के बिना हुआ था। इससे सम्राट और हुसैन अली ख़ान के बीच तनाव और बढ़ गया तथा दोनों पक्ष निर्णायक संघर्ष की तैयारी करने लगे।

सैयद बंधुओं से अंतिम संघर्ष

1718 ई. तक फ़र्रुख़सियर ने सैयद बंधुओं की शक्ति को सीमित करने का प्रयास तेज कर दिया। उन्होंने मीर जुमला तृतीय और ख़ान-दौराँ जैसे दरबारियों को अपने पक्ष में संगठित किया तथा सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया। दूसरी ओर, सैयद बंधुओं ने भी दक्कन और अन्य क्षेत्रों में अपना प्रभाव मजबूत किया।

फ़र्रुख़सियर ने हुसैन अली ख़ान को दक्कन भेज दिया, लेकिन वहाँ उन्होंने मराठों के साथ समझौता कर लिया। इस समझौते से सम्राट का संदेह और गहरा गया। दोनों पक्षों के बीच संघर्ष अब निर्णायक चरण में पहुँच गया।

गद्दी से हटाया जाना और मृत्यु

1718 ई. के अंत और 1719 ई. के आरंभ तक फ़र्रुख़सियर तथा सैयद बंधुओं के बीच संघर्ष खुलकर सामने आ गया। हुसैन अली ख़ान दक्कन से बड़ी सेना लेकर उत्तर भारत की ओर बढ़े। उनके साथ मराठा सैनिक भी थे, जबकि अब्दुल्ला ख़ान ने दिल्ली में अपने समर्थकों को संगठित कर लिया। फ़रवरी 1719 ई. में हुसैन अली ख़ान दिल्ली पहुँचे और सैयद बंधुओं ने शाही महल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। फ़र्रुख़सियर ने प्रतिरोध का प्रयास किया, लेकिन उनके समर्थक पर्याप्त नहीं थे। अंततः उन्हें बंदी बनाकर सिंहासन से हटा दिया गया।

सैयद बंधुओं ने इसके बाद रफ़ी-उद-दरजात को मुग़ल सिंहासन पर बैठाया। फ़र्रुख़सियर को अंधा कर दिया गया और 9 अप्रैल 1719 ई. को उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार लगभग छह वर्ष के शासन के बाद उनका अंत हुआ और मुग़ल साम्राज्य में सैयद बंधुओं का प्रभुत्व चरम पर पहुँच गया।

व्यक्तिगत जीवन

फ़र्रुख़सियर की प्रमुख पत्नियों में फख़्र-उन-निसा बेगम, इंदिरा कँवर और भूप देवी का उल्लेख मिलता है। फख़्र-उन-निसा बेगम को गौहर-उन-निसा के नाम से भी जाना जाता था और वे मीर मुहम्मद तकी की पुत्री थीं। इंदिरा कँवर मारवाड़ के महाराजा अजीत सिंह की पुत्री थीं। उनका विवाह 27 सितंबर 1715 ई. को फ़र्रुख़सियर से हुआ था। फ़र्रुख़सियर की मृत्यु के बाद वे शाही हरम से निकलकर अपने पिता के पास जोधपुर लौट गईं। भूप देवी किश्तवाड़ के शासक जया सिंह की पुत्री थीं। फ़र्रुख़सियर ने उनसे 1717 ई. में विवाह किया और वे उसी वर्ष शाही हरम में शामिल हुईं।

उपाधियाँ

फ़र्रुख़सियर का शाही नाम अबुल मुज़फ़्फ़र मुईनुद्दीन मुहम्मद फ़र्रुख़सियर बादशाह था। मृत्यु के बाद उन्हें ‘शहीद-ए-मरहूम’ के नाम से भी संबोधित किया गया।

सिक्के

फ़र्रुख़सियर के शासनकाल में सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किए गए। इन सिक्कों पर शाही उपाधियों तथा ईश्वर की कृपा से संबंधित फ़ारसी अभिलेख अंकित होते थे। उनके सिक्के काबुल, कश्मीर, अजमेर, इलाहाबाद, बीदर और बरार सहित साम्राज्य के विभिन्न टकसालों में ढाले गए।

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