काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action, 1925 AD)

काकोरी ट्रेन एक्शन (1925)

ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन (कार्यवाही) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के क्रांतिकारियों द्वारा सरकारी खजाना लूटने की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी। इस साहसिक कार्यवाही को ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के केवल दस सदस्यों ने रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के नेतृत्व में 9 अगस्त, 1925 को 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी को शाहजहाँपुर के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटने पर रोककर सरकारी खजाना लूटकर अंजाम दिया था। इसी पैसेंजर ट्रेन से रेल विभाग का इकट्ठा किया गया धन लखनऊ में रेलवे के मुख्य खजाने में जमा कराने के लिए लाया जाता था। इस ट्रेन ऐक्शन में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल काम में लाये गये थे। इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का एक और कुंदा लगाकर इसका रायफल की तरह प्रयोग किया जा सकता था।

काकोरी ट्रेन एक्शन की पृष्ठभूमि

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों को बुरी तरह कुचल दिया गया। अनेक नेता जेल में डाल दिये गये और बाकी भूमिगत हो गये या इधर-उधर बिखर गये। किंतु राष्ट्रवादी जनमत को संतुष्ट करने और मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को लागू करने हेतु सद्भावपूर्ण वातावरण बनाने के लिए सरकार ने 1920 के शुरू में क्रांतिकारियों को आम माफी देकर जेल से रिहा कर दिया।

गांधी, चितरंजनदास और अन्य नेताओं की अपील पर जेल से रिहा क्रांतिकारियों में से अधिकांश सशस्त्र क्रांति का रास्ता छोड़कर असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये। असहयोग आंदोलन के दौरान 16 वर्षीय किशोर चंद्रशेखर जब पहली और अंतिम बार गिरफ्तार हुए थे, तब वह बार-बार ‘महात्मा गांधी की जय’ बोल रहे थे।

किंतु चौरीचौरा की घटना (4 फरवरी, 1922) के कारण असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगन से इन जुझारू क्रांतिकारियों का अहिंसक आंदोलन की विचारधारा से विश्वास उठ गया और उन्हें लगने लगा कि देश को सिर्फ बम और पिस्तौल के द्वारा ही मुक्त कराया जा सकता है।

उत्तर भारत के जुझारू नवयुवकों, जिनमें सयुंक्त प्रांत में रहनेवाले बंगाली सचिन सान्याल और जोगेश चटर्जी के अलावा अशफाकउल्ला खाँ, रोशनसिंह और रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जैसे पुराने नेताओं के साथ-साथ भगतसिंह, शिववर्मा, सुखदेव, भगवतीचरण बोहरा और चंद्रशेखर आजाद जैसे नवयुवकों ने भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के उद्देश्य से अक्टूबर, 1924 में कानपुर में ‘हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ (हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) का गठन किया। किंतु एचआरए के इश्तहार और उसके संविधान की प्रतियों के साथ सचिन सान्याल बाँकुड़ा में और योगेश चटर्जी हावड़ा में गिरफ्तार कऱ लिये गये।

सचिन सान्याल और योगेश चटर्जी के गिरफ्तार हो जाने के कारण एचआरए की क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने की जिम्मेदारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के कंधों पर आ गई। एसोसिएशन की कार्यवाहियों के लिए धन की अधिक आवश्यकता थी। आरंभ में क्रांतिकारियों ने महाजनों और जमींदारों को लूटकर अपने अभियान को चलाने का प्रयास किया और इसके लिए रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके साथियों ने 7 मार्च, 1925 को बिचुरी और 24 मई, 1925 को द्वारकापुर गाँव (उ.प्र., प्रतापगढ़) में दो राजनीतिक डकैतियाँ डाली, किंतु इन डकैतियों में उन्हें कोई विशेष धन नहीं मिला और दोनों में एक-एक लोग व्यर्थ में ही मारे गये। अब बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी साथियों ने फैसला किया कि संगठन के खर्च और हथियारों के लिए किसी के घर डकैती नहीं डालेंगे और इसके लिए केवल सरकारी खजाने की लूट की जायेगी।

ट्रेन एक्शन की योजना

क्रांतिकारी कार्यवाहियों को गति देने के लिए तत्काल धन की व्यवस्था करने के लिए एचआरए के क्रांतिकारियों ने रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की अध्यक्षता में शाहजहाँपुर में एक बैठक की और काकोरी में ट्रेन डकैती करके सरकारी खजाना लूटने की योजना पर विचार किया। अशफाक उल्ला खाँ ट्रेन डकैती के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उनके अनुसार अभी नवोदित एचआरए सरकार को खुली चुनौती देने की स्थिति में नहीं था और इससे सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने की संभावना थी।

किंतु अंत में काकोरी में ट्रेन में डकैती डालने की योजना बहुमत से पास हो गई। यह तय किया गया कि किसी पर हमला नहीं करना है और जब तक जान पर ना आ पड़े, कोई गोली नहीं चलानी है। यद्यपि इस ट्रेन एक्शन के लिए 8 अगस्त, 1925 का दिन चुना गया था, किंतु देर से पहुँचने के कारण क्रांतिकारयों की ट्रेन छूट गई थी।

काकोरी ट्रेन एक्शन की घटना

अगले दिन 9 अगस्त, 1925 को हरदोई रेलवे स्टेशन से एचआरए के दस सदस्य, जिनमें शाहजहाँपुर के पं. रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के साथ अशफाक उल्ला खाँ, मुरारी शर्मा तथा बनवारीलाल, बंगाल के राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, शचींद्रनाथ बख्शी तथा केशव चक्रवर्ती, बनारस के चंद्रशेखर आजाद तथा मन्मथनाथ गुप्त और औरैया के मुकुंदीलाल शामिल थे; 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हो गये। इन क्रांतिकारियों के पास देसी कट्टों के साथ-साथ जर्मनी की बनी चार माउजर पिस्तौलें भी थीं।

लखनऊ से 16 किमी पहले सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुककर जैसे ही आगे बढी, योजना के मुताबिक राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने चैन खींचकर उसे रोक दिया और रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, चंद्रशेखर आज़ाद व 6 अन्य सहयोगियों ने ट्रेन पर कब्जा करके गार्ड के डिब्बे से लोहे की सरकारी तिजोरी को नीचे गिरा दिया। सरकारी तिजोरी को खोलना आसान नहीं था, इसलिए अशफाक उल्ला खाँ अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को देकर हथौड़ा लेकर तिजोरी तोड़ने में जुट गये। मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रैगर दबा दिया, जिससे निकली गोली से अहमदअली नामक यात्री की मौके पर ही मौत हो गई।

अशफाक उल्ला खाँ, चंद्रशेखर आज़ाद और उनके साथी सरकारी खजाने के चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले को चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में सफल हो गये, किंतु जल्दबाजी में एक चादर वहीं छूट गई।

इस ट्रेन कार्यवाही में क्रांतिकारियों को कुल 4601 रुपये, 15 आने और छह पाई मिले थे, यद्यपि उस स्थान पर स्थापित शिलापट्ट पर यह राशि 8,000 अंकित है। इस घटना की एफ.आई.आर. की कॉपी काकोरी थाने में सुरक्षित है, जो मूल रूप से उर्दू में लिखी गई थी। अगले दिन 10 अगस्त को समाचार-पत्रों के माध्यम से काकोरी ट्रेन एक्शन का समाचार पूरे देश में फैल गया।

काकोरी ट्रेन एक्शन पर सरकारी कार्यवाही

काकोरी ट्रेन एक्शन ब्रिटिश सत्ता के लिए खुली चुनौती थी, इसलिए ब्रिटिश सरकार ने इस घटना को बड़ी गंभीरता से लिया। इस ट्रेन कार्यवाही की जाँच के लिए सीआईडी इंस्पेक्टर खानबहादुर तसद्दुक हुसैन की अगुवाई में स्कॉटलैंड की तेज-तर्रार पुलिस को लगाया गया। पुलिस ने इस ट्रेन एक्शन के संबंध में जानकारी देने व षड्यंत्र में शामिल किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करवाने के लिए इनाम की घोषणा की और सभी प्रमुख स्थानों पर इश्तहार लगवाया।

पूरी छानबीन और जाँच-पड़ताल करने के बाद तसद्दुक हुसैन ने सरकार को बताया कि काकोरी ट्रेन कार्यवाही क्रांतिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र है। घटनास्थल पर मिली चादर में लगे धोबी के विशेष टैग से पुलिस न पता लगा लिया कि चादर शाहजहाँपुर के बनारसीलाल की है। फलतः पुलिस ने बनारसीलाल से मिलकर इस कार्यवाही की सारी जानकारी प्राप्त कर ली और 26 सितंबर, 1925 को रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के साथ-साथ पूरे देश से 40 लोगों को इस ऐतिहासिक मामले में गिरफ्तार कर लिया।

इन 40 क्रांतिकारियों में से तीन शचींद्रनाथ सान्याल बाँकुड़ा में, योगेश चटर्जी हावड़ा में और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी दक्षिणेश्वर बम विस्फोट मामले में कलकत्ता में पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे। ब्रिटिश पुलिस इस कार्यवाही की जल्दी से जल्दी जांच करके क्रांतिकारियों को कठोर से कठोर सजा दिलवाना चाहती थी।

काकोरी ट्रेन कार्यवाही के मुकदमे

ट्रेन एक्शन का मुख्य मुकदमा

काकोरी ट्रेन कार्यवाही में केवल दस लोग ही वास्तविक रूप से शामिल हुए थे और इन दस लोगों में से पाँच- चंद्रशेखर आजाद, मुरारी शर्मा, केशव चक्रवर्ती, अशफाक उल्ला खाँ व शचींद्रनाथ बख्शी अभी तक पुलिस के हाथ नहीं आये थे। इसलिए शेष सभी क्रांतिकारियों पर सरकार बनाम राम प्रसाद बिस्मिल व अन्य के नाम से दिसंबर, 1925 से लखनऊ के ऐतिहासिक रोशनद्दौला कचहरी और रिंग थियेटर (प्रधान डाकघर) में ट्रेन एक्शन का मुख्य मुकदमा चलाया गया।

क्रांतिकारी चाहते थे कि उनका मुकदमा उस समय के प्रसिध्द वकील गोविंदवल्लभ पंत द्वारा लडा जाये, किंतु पैसों की व्यवस्था न हो पाने के कारण कलकत्ता के बी.के. चौधरी ने क्रांतिकारियों की ओर से यह मुकदमा लडा।

काकोरी ट्रेन एक्शन के मुकदमे का फैसला

6 अप्रैल, 1927 को इस मुकदमे का फैसला सुनाया गया, जिसमें न्यायाधीश हेमिल्टन ने सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या के आरोप में ब्रिटिश कानून व्यवस्था की धारा 121ए, 120बी और 396 के तहत 5 वर्ष की कैद से लेकर फाँसी तक की सजा सुनाई। एचआरए का सक्रिय कार्यकर्ता होने के संदेह में गिरफ्तार किये गये 14 लोग सबूतों के अभाव में रिहा कर दिये गये और कुछ लोग सरकारी गवाह बन गये।

काकोरी ट्रेन एक्शन (कार्यवाही) का पूरक मुकदमा

पुलिस ने पाँच फरार क्रांतिकारियों में अशफाक उल्ला खाँ को दिल्ली से और शचींद्रनाथ बख्शी को भागलपुर से उस समय गिरफ़्तार किया, जब काकोरी ट्रेन एक्शन का फैसला आ चुका था। इन दोनों पर विशेष न्यायाधीश जे.आर.डब्लू. बैनेट की न्यायालय में में काकोरी ट्रेन कार्यवाही का एक पूरक प्रकरण दर्ज हुआ। इस पूरक मुकदमे का फैसला 13 जुलाई, 1927 को आया, जिसमें सरकार के विरुद्ध साजिश रचने का संगीन आरोप लगाते हुए अशफाक उल्ला खाँ को फांसी और शचींद्रनाथ बख्शी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

मेरा रँग दे बसंती चोला

काकोरी ट्रेन एक्शन के सभी क्रांतिकारी लखनऊ जेल में कैद थे। मुकदमे के दौरान ही रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ ने बसंत पंचमी के अवसर पर अपने क्रांतिकारी साथियों के आग्रह पर ‘मेरा रँग दे बसंती चोला’ नामक प्रसिद्ध कविता लिखी थी। बाद में, शहीदे आजम भगतसिंह जब लाहौर जेल में बंद थे, तो उन्होंने इस गीत में कुछ पंक्तियाँ और जोड़ दी थीं।

सरफ़रोशी की तमन्ना

मुकदमे के दौरान रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके साथी अदालत जाते-आते लौटते हुए ‘बिस्मिल’ अज़िमाबादी (1901-1978) की गजल ‘सरफरोशी की तमन्ना’ गाया करते थे। यह गजल बाद के क्रांतिकारियों के लिए मंत्र बन गई। पहली बार यह गजल दिल्ली से एक पत्रिका ‘सबाह’ में प्रकाशित हुई थी।

गजल

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,

देखना है ज़ोर कितना, बाज़ु-ए-क़ातिल में है।।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ,

हम अभी से क्या बताएँ, क्या हमारे दिल में है।।

खींच कर लाई है हमको, क़त्ल होने की उम्म्मीद,

आशिक़ों का आज जमघट, कूच-ए-क़ातिल में है।।

ए शहीदे-मुल्क-ओ-मिल्लत, हम तेरे ऊपर निसार,

अब तेरी हिम्मत का चर्चा, ग़ैर की महफ़िल में है।।

अब न अगले वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़,

सिर्फ़ मिट जाने की हसरत, अब दिल-ए-बिस्मिल में है।।

अवध चीफ कोर्ट में अपील

सेशन जज के फैसले के खिलाफ 18 जुलाई, 1927 को अवध चीफ कोर्ट में अपील दायर की गई। चीफ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर लुइस शर्ट और विशेष न्यायाधीश मोहम्मद रजा के सामने मामले पेश हुए। जगतनारायण ‘मुल्ला’ को सरकारी पक्ष रखने का काम सौंपा गया, जबकि सजायाफ्ता क्रांतिकारियों की ओर से के.सी. दत्त, जयकरणनाथ मिश्र व कृपाशंकर हजेला ने क्रमशः राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशनसिंह व अशफाक उल्ला खाँ की पैरवी की। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ ने सरकारी अधिवक्ता लेने से इनकार कर दिया और अपनी पैरवी खुद करने का फैसला किया। वास्तव में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को लक्ष्मीशंकर मिश्र नामक एक अदना वकील दिया गया था, जिसको लेने से उन्होंने इनकार कर दिया। किंतु अदालत में बिस्मिल द्वारा की गई कानूनी बहस से सरकारी महकमा घबड़ा गया, इसलिए अदालत ने 18 जुलाई, 1927 को बिस्मिल की स्वयं वकालत करने की अर्जी को खारिज कर दी और अंततः उसी लक्ष्मीशंकर मिश्र को बहस करने की इजाजत दी, जिसे लेने से बिस्मिल ने इनकार कर दिया था।

काकोरी ट्रेन एक्शन के मुकदमे की एक विशेष बात यह थी कि इसमें उन अपराधों को भी शामिल किया गया था, जिनका काकोरी ट्रेन एक्शन से कोई संबंध नहीं था, जैसे 25 दिसंबर, 1924 को पीलीभीत जिले के बमरौला गाँव में, फिर 9 मार्च, 1925 को बिचुरी गाँव में और 24 मई, 1925 को प्रतापगढ़ जिले के द्वारकापुर गाँव में किये गये अपराध।

काकोरी ट्रेन एक्शन पर अंतिम निर्णय

अगस्त, 1927 को काकोरी ट्रेन एक्शन के मुकदमे का फैसला सुनाया गया। फैसले के अनुसार रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी व अशफाक उल्ला खाँ को आई.पी.सी. की दफा 121 (ए) व 120(बी) के अंतर्गत आजीवन कारावास तथा 302 व 396 के अनुसार फांसी की सजा मिली। ठाकुर रोशनसिंह को पहली दो दफाओं में 5+5 (कुल 10 वर्ष) की कैद-बा-मुशक्कत और अन्य दो दफाओं में फाँसी का आदेश हुआ। शचींद्रनाथ सान्याल की उम्र-कैद की सजा बरकरार रही। शचींद्र के छोटे भाई भूपेंद्रनाथ सान्याल और बनवारी लाल, दोनों की 5-5 वर्ष की सजा के आदेश यथावत रहे।

योगेशचंद्र चटर्जी, मुकुंदीलाल व गोविंदचरण कार की सजाएं 10-10 वर्ष से बढ़ाकर उम्रकैद में बदल दी गईं। सुरेशचंद्र भट्टाचार्य और विष्णुशरण दुब्लिश की सजाएँ भी 7 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दी गईं। रामकृष्ण खत्री की भी 10 वर्ष के कैद-बा-मुशक्कत की सजा बरकरार रही। अच्छी लिखावट के कारण केवल प्रणवेश चटर्जी की सजा 5 वर्ष से घटाकर 4 वर्ष की गई। काकोरी एक्शन में सबसे कम 3 वर्ष की सजा रामनाथ पांडेय को हुई। मन्मथनाथ गुप्त, जिनकी गोली से अहमदअली वकील मारा गया था, की सजा बढ़ाकर 14 वर्ष कर दी गई। एक अन्य अभियुक्त रामदुलारे त्रिवेदी को इस प्रकरण में पाँच वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली।

क्रांतिकारियों को बचाने के प्रयास

अवध चीफ कोर्ट का फैसला आते ही यह खबर समूचे भारत में फैल गई। ठाकुर मनजीतसिंह राठौर ने सेंट्रल लेजिस्लेटिव कौंसिल में काकोरी के चारों मृत्युदंड प्राप्त कैदियों की सजाएँ कम करके आजीवन कारावास (उम्रकैद) में बदलने का प्रस्ताव पेश किया। कौंसिल के कई सदस्यों ने सर विलियम मोरिस को, जो उस समय संयुक्त प्रांत के गवर्नर हुआ करते थे, इस आशय का एक प्रार्थना-पत्र भी दिया, परंतु उसने अस्वीकार कर दिया।

सेंट्रल कौंसिल के 78 सदस्यों ने तत्कालीन वायसराय को शिमला जाकर हस्ताक्षरयुक्त मेमोरियल दिया, जिस पर प्रमुख रूप से पं. मदनमोहन मालवीय, मुहम्मदअली जिन्ना, एन.सी. केलकर, लाला लाजपत राय, गोविंदवल्लभ पंत आदि ने अपने हस्ताक्षर किये थे, किंतु वायसराय पर उसका भी कोई असर न हुआ।

इसके बाद मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में पाँच लोगों का एक प्रतिनिधि मंडल वायसराय से शिमला जाकर पुनः मिला और उनसे निवेदन किया कि उच्च न्यायालय के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए, किंतु वायसराय ने साफ मना कर दिया।

अंततः बैरिस्टर मोहनलाल सक्सेना ने क्षमादान की याचिका का दस्तावेज तैयार करवा कर इंग्लैंड के विख्यात वकील एस.एल. पोलक के माध्यम से प्रिवी कौंसिल में भिजवाया, किंतु लंदन के न्यायाधीशों एवं सम्राट के सलाहकारों के परामर्श कर प्रिवी कौंसिल ने भी क्षमादान की अपील को खारिज कर दिया।

काकोरी ट्रेन एक्शन के शहीदों की फांसी (1927)

सबसे पहले  17 दिसंबर, 1927 को राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को गोंडा जेल में फांसी दी गई। पं. रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को गोरखपुर जेल में 19 दिसंबर, 1927 को फांसी दी गई। फांसी के फंदे की ओर जाते हुए वो ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाते रहे। चलते समय उन्होंने कहा था-

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही रहे,

बाकी न मैं रहूँ, न मेरी आरजू रहे।

जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे,

तेरा हो जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे।।

19 दिसंबर, 1927 को ही तीसरे क्रांतिकारी ठाकुर रोशनसिंह को इलाहाबाद के नैनी जेल में फांसी दी गई। चौथे क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खाँ भी 19 दिसंबर, 1927 को ही फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिये गये। फांसी के लिए जाते समय अशफाक उल्ला खाँ गुनगुना रहे थे-

तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से,

चल दिये सुए अदम जिंदाने फैजाबाद से।।

पूरा देश अपने वीर सपूतों की फांसी से तिलमिला उठा। इस कार्यवाही की याद को संजोये रखने के लिए सरदार भगतसिंह ने काकोरी स्मृति दिवस मनाने की परंपरा आरंभ की थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गांधी ने अपने ‘करो या मरो’ वाले ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की शुरूआत इसी 9 अगस्त को ही की थी।

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