पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pt. Deendayal Upadhyay)

पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pt. Deendayal Upadhyay)
पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचय भारत की स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद अनेक ऐसे […]

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय

परिचय

भारत की स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद अनेक ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, विचारों और कर्मों के माध्यम से राष्ट्र एवं समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी ऐसे ही प्रमुख व्यक्तित्वों में शामिल थे। उन्होंने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और गरिमापूर्ण कृतित्व के माध्यम से भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करने का प्रयास किया।

दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और दर्शन के आधार पर ‘एकात्म मानववाद’ का प्रतिपादन किया। उनका विचार था कि भारत के विकास का आधार उसकी अपनी सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ होनी चाहिए तथा मनुष्य को विकास की समग्र इकाई के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके चिंतन में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, अर्थव्यवस्था और नैतिकता के बीच परस्पर संबंध पर बल दिया गया। वे एक चिंतक, संगठनकर्ता, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक और प्रभावशाली वक्ता थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने के बाद उन्होंने संगठनात्मक कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे चलकर भारतीय जनसंघ के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में अनेक लेख लिखे तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन एवं प्रकाशन से जुड़े रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का आरंभिक जीवन

दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 ई. को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गाँव में हुआ था। वर्तमान में यह स्थान ‘दीनदयाल धाम’ के नाम से भी जाना जाता है। उनके पिता पंडित भगवती प्रसाद उपाध्याय जलेसर रेलवे स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर के पद पर कार्यरत थे। उनकी माता रामप्यारी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। उनके परिवार में धार्मिक एवं पारंपरिक संस्कारों का प्रभाव था। उनके दादा पंडित हरिराम उपाध्याय ज्योतिष के विद्वान माने जाते थे।

परिवार में दीनदयाल को प्यार से ‘दीना’ कहा जाता था। उनके जन्म के लगभग दो वर्ष बाद उनके छोटे भाई शिवदयाल, जिन्हें परिवार में ‘शिबू’ या ‘शिव’ के नाम से पुकारा जाता था, का जन्म हुआ।

दीनदयाल के पिता रेलवे की नौकरी के कारण अधिकांश समय घर से बाहर रहते थे। लगभग ढाई वर्ष की आयु में दीनदयाल और उनके छोटे भाई शिवदयाल को उनके नाना चुन्नीलाल शुक्ल के पास भेज दिया गया। नाना धानक्या क्षेत्र में स्टेशन मास्टर के रूप में कार्यरत थे। उनका पैतृक संबंध आगरा जिले के फतेहपुर सीकरी के निकट स्थित क्षेत्र से था।

बचपन से ही दीनदयाल का पालन-पोषण मुख्यतः उनके ननिहाल के वातावरण में हुआ। आगे चलकर यही पारिवारिक परिस्थितियाँ उनके जीवन में आत्मनिर्भरता, अनुशासन और संघर्षशीलता के विकास का आधार बनीं।

बाल्यकाल में पारिवारिक त्रासदियाँ

दीनदयाल उपाध्याय का बचपन अनेक व्यक्तिगत त्रासदियों से प्रभावित रहा। जब वे बहुत छोटे थे, तभी उनके पिता भगवती प्रसाद का निधन हो गया। मूल सामग्री में उनके निधन के संबंध में विष दिए जाने की संभावना का उल्लेख है, लेकिन इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं है। इसलिए इसे निश्चित घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

पिता की मृत्यु के बाद परिवार अभी इस आघात से उबर भी नहीं पाया था कि उनकी माता रामप्यारी का भी निधन 8 अगस्त 1924 ई. को बीमारी के कारण हो गया। उस समय दीनदयाल की आयु लगभग आठ वर्ष थी। माता-पिता दोनों के निधन के बाद उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनके ननिहाल के परिवार पर आ गई।

इसके लगभग दो वर्ष बाद, 1926 ई. में उनके नाना चुन्नीलाल का भी निधन हो गया। इसके बावजूद परिवार के अन्य सदस्यों ने दीनदयाल और उनके भाई को सहारा दिया तथा उनकी शिक्षा जारी रखी। उनके जीवन में आगे भी अनेक व्यक्तिगत दुख आए। उनके छोटे भाई शिवदयाल का 18 नवंबर 1934 ई. को चेचक के कारण निधन हो गया। परिवार के अन्य निकट संबंधियों के निधन ने भी उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार किशोरावस्था में ही दीनदयाल ने लगातार पारिवारिक वियोग और कठिन परिस्थितियों का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने शिक्षा एवं सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा।

छात्र-जीवन एवं शिक्षा

गंगापुर और कोटा में शिक्षा

माता-पिता के निधन के बाद दीनदयाल का पालन-पोषण उनके मामा राधारमण शुक्ल ने किया। राधारमण शुक्ल रेलवे विभाग में कार्यरत थे। दीनदयाल ने प्रारंभिक शिक्षा उनके साथ रहते हुए प्राप्त की। उन्होंने गंगापुर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए कोटा भेजे गए, जहाँ उन्होंने छात्रावास में रहकर अध्ययन किया। इस समय भी पारिवारिक कठिनाइयों का प्रभाव उनके जीवन पर बना रहा।

सीकर में अध्ययन

आठवीं कक्षा के बाद दीनदयाल ने राजस्थान के सीकर स्थित कल्याण हाईस्कूल में प्रवेश लिया। उन्होंने 1935 ई. में दसवीं की बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। उनकी असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें स्वर्ण पदक एवं आर्थिक सहायता प्रदान की गई। सीकर के महाराजा की ओर से भी उन्हें आर्थिक पुरस्कार और छात्रवृत्ति मिली। यह छात्रवृत्ति आगे की शिक्षा में उनके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई।

पिलानी में इंटरमीडिएट

बारहवीं की शिक्षा के लिए उन्होंने बिड़ला इंटरमीडिएट कॉलेज, पिलानी में प्रवेश लिया। यहाँ भी उन्होंने छात्रावास में रहकर अध्ययन किया। 1937 ई. में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें पुरस्कार और छात्रवृत्ति प्रदान की गई। इस प्रकार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनकी शिक्षा निरंतर जारी रही।

कानपुर में स्नातक शिक्षा

इसके बाद दीनदयाल उपाध्याय ने सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर में प्रवेश लिया और वहाँ से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। वे अध्ययन में अत्यंत मेधावी थे और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।

कानपुर में अध्ययन के दौरान ही उनके जीवन में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। यहीं उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से हुआ और उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा धीरे-धीरे निर्धारित होने लगी।

आगरा में एम.ए. की पढ़ाई

स्नातक के बाद दीनदयाल उपाध्याय ने अंग्रेजी विषय में एम.ए. की पढ़ाई के लिए आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में प्रवेश लिया। उन्होंने अध्ययन में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और एम.ए. पूर्वार्द्ध में अच्छा प्रदर्शन किया।

इसी दौरान उनकी ममेरी बहन रामादेवी गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं और उपचार के लिए आगरा लाई गईं। दीनदयाल उनकी सेवा में लग गए। बीमारी के कारण वे एम.ए. की आगे की परीक्षा नहीं दे सके। बाद में रामादेवी का निधन हो गया, जिसका उन पर गहरा मानसिक प्रभाव पड़ा। इस घटना के बाद उनकी औपचारिक उच्च शिक्षा पूरी नहीं हो सकी। उनकी छात्रवृत्तियाँ भी समाप्त हो गईं।

प्रशासनिक परीक्षा और बी.टी.

मामा के आग्रह पर दीनदयाल ने सरकारी सेवा से संबंधित प्रतियोगी परीक्षा दी और उसमें सफल भी हुए। किंतु उन्होंने ब्रिटिश शासन के अधीन सरकारी नौकरी को अपना जीवन-लक्ष्य नहीं बनाया। इसके बाद उन्होंने प्रयाग के प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश लिया और 1941 ई. में बी.टी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस समय तक उनका झुकाव सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय संगठनात्मक कार्यों की ओर स्पष्ट रूप से हो चुका था।

इस प्रकार अनेक व्यक्तिगत और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने का निरंतर प्रयास किया। उनकी मेधा, अनुशासन और आत्मनिर्भरता उनके छात्र-जीवन की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

दीनदयाल उपाध्याय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

दीनदयाल उपाध्याय का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संपर्क उनके जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। 1937 ई. में कानपुर में अध्ययन के दौरान वे अपने मित्र बलवंत महाशब्दे के माध्यम से संघ के संपर्क में आए। इसी दौर में उन्होंने संघ की विचारधारा और संगठनात्मक कार्यप्रणाली को निकट से समझा। कानपुर में ही उनका संपर्क संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से हुआ। आगरा में रहते हुए भी उन्होंने संघ की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की। इस समय उनका संपर्क नानाजी देशमुख तथा अन्य संघ कार्यकर्ताओं से हुआ।

पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pt. Deendayal Upadhyay)
पं. दीनदयाल उपाध्याय

पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में कार्य

1942 ई. के आसपास दीनदयाल उपाध्याय पूर्णकालिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य से जुड़ गए और प्रचारक के रूप में कार्य करने लगे। उन्होंने संगठन विस्तार के लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। वे संगठन निर्माण, कार्यकर्ता प्रशिक्षण और वैचारिक प्रसार में विशेष रूप से सक्रिय रहे। आगे चलकर उन्होंने उत्तर प्रदेश में संघ के प्रांतीय स्तर के संगठनात्मक दायित्व भी संभाले। उनका जीवन सादगी, अनुशासन, संगठन-निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा रहा। इसी संगठनात्मक क्षमता के कारण आगे चलकर भारतीय जनसंघ के निर्माण एवं विस्तार में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ मिलीं।

दीनदयाल उपाध्याय और भारतीय जनसंघ

भारतीय जनसंघ की स्थापना

21 अक्टूबर 1951 ई. को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक सहयोग से दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति में अधिक सक्रिय रूप से सामने आए।

भारतीय जनसंघ के संगठन निर्माण में दीनदयाल उपाध्याय की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। उन्हें पहले उत्तर प्रदेश संगठन में महासचिव का दायित्व मिला और बाद में वे पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव बने।

कानपुर अधिवेशन और संगठनात्मक क्षमता

भारतीय जनसंघ का प्रारंभिक अधिवेशन कानपुर में हुआ। संगठनात्मक कार्यों में दीनदयाल की क्षमता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उन्होंने पार्टी के संगठन, नीति-निर्माण और कार्यकर्ता-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अधिवेशन में पारित अनेक प्रस्तावों में से सात प्रस्ताव दीनदयाल उपाध्याय ने प्रस्तुत किए थे। उनकी संगठनात्मक दक्षता से प्रभावित होकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनकी क्षमता की प्रशंसा की थी। यह कथन प्रचलित रूप से उद्धृत किया जाता है कि यदि उन्हें दो दीनदयाल मिल जाएँ तो वे भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल सकते हैं। इसे डॉ. मुखर्जी से संबद्ध एक प्रसिद्ध प्रशंसात्मक कथन के रूप में देखा जाता है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद

1953 ई. में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद भारतीय जनसंघ के संगठनात्मक विस्तार की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय पर और अधिक आ गई।

उन्होंने लंबे समय तक पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव के रूप में कार्य किया और भारतीय जनसंघ को एक संगठित राजनीतिक दल के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मुख्य बल केवल चुनावी राजनीति पर नहीं, बल्कि संगठन निर्माण, कार्यकर्ता प्रशिक्षण, वैचारिक स्पष्टता और राष्ट्रव्यापी राजनीतिक संगठन खड़ा करने पर था।

जौनपुर लोकसभा उपचुनाव

1963 ई. में दीनदयाल उपाध्याय ने उत्तर प्रदेश की जौनपुर लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ा। वे चुनाव जीत नहीं सके। यह चुनाव उनके लिए व्यक्तिगत रूप से महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ कि वे केवल संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में भी भाग लेने के लिए तैयार थे। हालांकि उनका प्रमुख योगदान संगठन और वैचारिक राजनीति के क्षेत्र में रहा।

 गैर-कांग्रेस राजनीति

1960 के दशक में देश में गैर-कांग्रेस राजनीतिक सहयोग और विपक्षी एकता की चर्चा तेज हुई। दीनदयाल उपाध्याय ने भी कांग्रेस के राजनीतिक प्रभुत्व के विकल्प के निर्माण के प्रयासों में भाग लिया। उन्होंने विभिन्न विपक्षी नेताओं के साथ संवाद और राजनीतिक सहयोग की संभावनाओं पर काम किया। इस संदर्भ में डॉ. राममनोहर लोहिया सहित अन्य गैर-कांग्रेसी नेताओं के साथ उनके संपर्क का उल्लेख मिलता है।

भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष

दिसंबर 1967 ई. में भारतीय जनसंघ का अधिवेशन कालीकट (वर्तमान कोझिकोड) में हुआ। इस अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया। आधिकारिक जीवन-परिचय में उन्हें भारतीय जनसंघ का दसवाँ अध्यक्ष बताया गया है। यह उनके राजनीतिक जीवन का सर्वोच्च संगठनात्मक पद था। उन्होंने अध्यक्ष के रूप में पार्टी को संगठनात्मक रूप से मजबूत करने और उसके वैचारिक आधार को स्पष्ट करने का प्रयास किया। किंतु वे इस पद पर बहुत कम समय तक रह सके। फरवरी 1968 ई. में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। इस प्रकार भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल लगभग 43 दिनों का ही रहा।

व्यक्तित्व और जीवन-शैली

दीनदयाल उपाध्याय ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की जीवन-पद्धति के लिए प्रसिद्ध थे। वे सामान्यतः धोती-कुर्ता पहनते थे और सिर पर टोपी रखते थे।

एक प्रसंग के अनुसार सरकारी प्रतियोगी परीक्षा में भी उन्होंने पारंपरिक भारतीय वेशभूषा में भाग लिया था। इसी कारण कुछ सहपाठियों द्वारा उन्हें ‘पंडितजी’ कहकर संबोधित किया गया और बाद में यही संबोधन सम्मानसूचक रूप से उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गया। वे अत्यंत सरल स्वभाव के व्यक्ति माने जाते थे। उन्होंने विवाह नहीं किया और अपना जीवन संगठन तथा सार्वजनिक कार्यों को समर्पित किया। उनकी राजनीति में संगठनात्मक अनुशासन, वैचारिक प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत सादगी का विशेष स्थान था। वे संवाद और समन्वय के समर्थक थे, लेकिन अपने मूल सिद्धांतों से समझौता करने के पक्ष में नहीं थे।

भारतीय जनसंघ को एक संगठित और वैचारिक राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही।

दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद

एकात्म मानववाद की पृष्ठभूमि

दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीतिक चिंतन के प्रमुख विचारकों में गिने जाते हैं। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत के विकास का मॉडल केवल पश्चिमी राजनीतिक और आर्थिक विचारधाराओं की नकल पर आधारित नहीं होना चाहिए। वे भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकास की दिशा निर्धारित करने के पक्षधर थे। उन्होंने पश्चिमी पूँजीवाद और समाजवाद की सीमाओं की आलोचना करते हुए एक ऐसी वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत की, जिसमें मनुष्य को विकास का केंद्र माना गया।

एकात्म मानववाद पर चार व्याख्यान

दीनदयाल उपाध्याय ने 22 से 25 अप्रैल 1965 ई. के बीच बंबई में ‘एकात्म मानववाद’ विषय पर चार व्याख्यान दिए। भारतीय जनसंघ ने इससे पहले अपने नीति-सिद्धांतों में एकात्म मानववाद को स्वीकार किया था। इन चार व्याख्यानों में उन्होंने व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, राज्य, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के संबंध में अपने विचार विस्तार से प्रस्तुत किए। इन व्याख्यानों को उनके राजनीतिक एवं दार्शनिक चिंतन की आधारभूत अभिव्यक्ति माना जाता है।

व्यक्ति का समग्र विकास

एकात्म मानववाद का केंद्रीय विचार यह है कि मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी मानकर उसके विकास को समझा नहीं जा सकता।

दीनदयाल उपाध्याय ने मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित विकास पर बल दिया। उनके अनुसार व्यक्ति की आवश्यकताओं को केवल भौतिक सुविधाओं की पूर्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता।

मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पक्षों का संतुलित विकास ही वास्तविक समग्र विकास है। इसी कारण उन्होंने ‘एकात्म मानव’ की अवधारणा पर बल दिया।

चार पुरुषार्थ और अर्थव्यवस्था

भारतीय दर्शन में जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष माने गए हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में इन चारों पुरुषार्थों के संतुलित एवं समन्वित विकास को विशेष महत्त्व प्राप्त है। उनके अनुसार मनुष्य के जीवन में आर्थिक समृद्धि आवश्यक है, किंतु अर्थ को जीवन का एकमात्र उद्देश्य नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि आर्थिक व्यवस्था केवल उत्पादन, उपभोग और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित हो जाए, तो मनुष्य के नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा होने की संभावना रहती है। इसलिए वे अर्थव्यवस्था को मानवीय मूल्यों, नैतिक उद्देश्यों और समग्र मानव-कल्याण से जोड़कर देखने के पक्षधर थे।

पूँजीवाद और समाजवाद की आलोचना

दीनदयाल उपाध्याय ने पूँजीवाद और समाजवाद दोनों की कुछ मूलभूत सीमाओं की आलोचना की। उनके अनुसार दोनों व्यवस्थाएँ मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व को पर्याप्त रूप से नहीं समझतीं। उनका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था की कल्पना करना था जिसमें आर्थिक विकास मनुष्य और समाज के हित में हो तथा अर्थव्यवस्था व्यक्ति को साधन न बना दे।

एकात्म मानववाद में वे न तो अनियंत्रित पूँजीवाद को स्वीकार करते थे और न ही ऐसी राज्य-केंद्रित व्यवस्था को, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सामाजिक संस्थाओं की भूमिका सीमित हो जाए। उनके आर्थिक चिंतन में न्यूनतम जीवन-स्तर, रोजगार, स्वदेशी परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक और मानव-केंद्रित विकास पर बल मिलता है।

मानव-केंद्रित विकास

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार भौतिक संसाधन मनुष्य के सुख एवं विकास के साधन हैं, स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं। उनके विचार में विकास की कसौटी केवल राष्ट्रीय आय, औद्योगिक उत्पादन या भौतिक संपदा में वृद्धि नहीं होनी चाहिए। विकास का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति और समाज के जीवन को अधिक संतुलित, स्वतंत्र, नैतिक और सार्थक बनाना होना चाहिए। उनकी दृष्टि में व्यक्ति और समाज परस्पर विरोधी नहीं हैं। व्यक्ति का विकास समाज से जुड़ा हुआ है और समाज का विकास व्यक्ति के विकास से।

भारतीय संस्कृति और एकात्म दृष्टि

दीनदयाल उपाध्याय भारतीय संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता के रूप में समग्रता और एकात्मता को देखते थे। उनके अनुसार भारतीय दृष्टि जीवन को अलग-अलग खंडों में नहीं बाँटती, बल्कि जीवन के विभिन्न पक्षों के बीच अंतर्संबंध स्थापित करती है। इसी कारण वे विविधता के पीछे निहित एकता को खोजने पर बल देते थे।

उनके चिंतन में राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमा या राज्य-सत्ता का नाम नहीं है, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक अनुभवों से निर्मित एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई है।

राष्ट्रीय पहचान

दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक चिंतन में राष्ट्रीय पहचान का विशेष महत्त्व है। उनका विचार था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब वह राष्ट्र की अपनी सांस्कृतिक पहचान और जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम बने।

उनके अनुसार स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने यह प्रश्न था कि वह अपने विकास की दिशा किस आधार पर निर्धारित करे। इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास उनके एकात्म मानववाद में दिखाई देता है। उनके 1965 के व्याख्यानों में भी स्वतंत्रता के बाद भारत की दिशा और राष्ट्रीय पहचान पर विशेष बल दिया गया था।

दीनदयाल उपाध्याय और पत्रकारिता

दीनदयाल उपाध्याय ने पत्रकारिता को वैचारिक एवं सामाजिक संवाद का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनाया। 1940 के दशक में उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’ और ‘स्वदेश’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विचारों को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास किया।

राष्ट्रधर्म

लखनऊ से प्रकाशित ‘राष्ट्रधर्म’ एक मासिक पत्रिका थी। इसके माध्यम से राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति, सामाजिक प्रश्नों और राजनीतिक विचारों से संबंधित लेख प्रकाशित किए जाते थे। दीनदयाल उपाध्याय इसके संपादन एवं वैचारिक दिशा-निर्धारण से जुड़े रहे। उन्होंने पत्रकारिता को केवल समाचार-प्रकाशन नहीं, बल्कि विचार-निर्माण का माध्यम माना।

पांचजन्य और स्वदेश

इसके बाद ‘पांचजन्य’ साप्ताहिक और ‘स्वदेश’ दैनिक जैसे प्रकाशनों से भी वे जुड़े। इन पत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े वैचारिक विचारों को व्यापक स्तर पर प्रसारित किया गया।

दीनदयाल उपाध्याय स्वयं लेखन और संपादन में सक्रिय रहे। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने भारतीय राजनीति, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

प्रतिबंध और पत्रकारिता

स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक परिस्थितियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाए जाने के समय उससे जुड़े प्रकाशनों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मूल सामग्री में ‘पांचजन्य’, ‘हिमालय’, ‘देशभक्त’ आदि प्रकाशनों के माध्यम से प्रतिबंधों के बीच प्रकाशन जारी रखने का उल्लेख है।

इन परिस्थितियों में दीनदयाल उपाध्याय ने संगठनात्मक सूझबूझ और पत्रकारिता के माध्यम से वैचारिक कार्य जारी रखने का प्रयास किया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था कि उन्होंने राजनीतिक विचारधारा, सामाजिक प्रश्न और सांस्कृतिक चिंतन को पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सामान्य पाठकों तक पहुँचाया।

दीनदयाल उपाध्याय का साहित्य-लेखन

दीनदयाल उपाध्याय केवल राजनीतिज्ञ और संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि लेखक भी थे। उन्होंने विभिन्न विषयों पर लेख, पुस्तिकाएँ, निबंध और पुस्तकें लिखीं।

उनकी रचनाओं में भारतीय इतिहास, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राष्ट्रीय जीवन से संबंधित विषय प्रमुख हैं।

साहित्यिक रचनाएँ

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख साहित्यिक रचनाओं में ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ का उल्लेख किया जाता है। इन कृतियों के माध्यम से उन्होंने भारतीय इतिहास, संस्कृति और महान व्यक्तित्वों के जीवन एवं विचारों को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के जीवन पर आधारित जीवनी का हिंदी रूपांतरण भी किया, जिसके माध्यम से हेडगेवार के जीवन, कार्य और राष्ट्रवादी विचारों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया।

आर्थिक चिंतन संबंधी रचनाएँ

अर्थव्यवस्था से संबंधित पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख रचनाओं में ‘दो योजनाएँ : वादे, प्रदर्शन और संभावनाएँ’, ‘भारतीय अर्थनीति : विकास की एक दिशा’ और ‘अवमूल्यन : एक बड़ी क्षति’ जैसी कृतियाँ शामिल हैं। इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति, योजनाबद्ध आर्थिक विकास, मुद्रा एवं अवमूल्यन तथा तत्कालीन आर्थिक नीतियों से जुड़े विभिन्न प्रश्नों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उनका आर्थिक चिंतन भारतीय परिस्थितियों, स्वावलंबन, विकेंद्रीकरण और समाज के अंतिम व्यक्ति के आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर विकास की दिशा निर्धारित करने पर बल देता है।

राजनीतिक एवं वैचारिक रचनाएँ

राजनीतिक चिंतन के क्षेत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख रचनाओं में ‘विश्वासघात’, ‘राजनीतिक डायरी’, ‘सिद्धांत और नीति’, ‘राष्ट्र-चिंतन’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएँ’, ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’, ‘अखंड भारत क्यों?’ और ‘एकात्म मानववाद’ आदि का उल्लेख किया जाता है। इन रचनाओं में उन्होंने राष्ट्र, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और भारतीय जीवन-दृष्टि से संबंधित विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। विशेष रूप से ‘विश्वासघात’ में उन्होंने 1966 के ताशकंद समझौते के संदर्भ में अपनी आलोचनात्मक दृष्टि व्यक्त की और तत्कालीन राष्ट्रीय एवं राजनीतिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया।

दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु

रहस्यमय मृत्यु

दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु 11 फरवरी 1968 ई. को हुई। वे 10 फरवरी 1968 को लखनऊ से पटना की यात्रा के लिए रेलगाड़ी में सवार हुए थे। अगली सुबह उनका शव मुगलसराय रेलवे स्टेशन के निकट रेलवे लाइन के पास मिला। उस समय वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उनकी मृत्यु ने पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक शोक उत्पन्न किया। उनकी मृत्यु की परिस्थितियाँ लंबे समय तक विवाद और जाँच का विषय बनी रहीं।

मृत्यु की जाँच

दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद हत्या और दुर्घटना, दोनों संभावनाओं पर चर्चा हुई। जाँच के दौरान चोरी और हत्या के आरोप में कुछ व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उनके विरुद्ध आरोप निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हो सके। बाद में इस घटना की जाँच के लिए न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग गठित किया गया। आयोग ने घटना की परिस्थितियों का परीक्षण किया। इसलिए दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के संबंध में यह कहना अधिक उचित है कि उनकी मृत्यु की परिस्थितियाँ विवादास्पद एवं रहस्यमय बनी रही हैं; इसे निर्विवाद रूप से केवल चोरी अथवा हत्या का परिणाम बताना ऐतिहासिक रूप से सावधानीपूर्ण नहीं होगा।

अंतिम श्रद्धांजलि और राष्ट्रीय प्रतिक्रिया

दीनदयाल उपाध्याय की आकस्मिक मृत्यु की खबर फैलते ही भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में गहरा शोक व्याप्त हो गया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तथा अन्य प्रमुख नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी मृत्यु भारतीय जनसंघ के लिए विशेष रूप से बड़ी क्षति थी, क्योंकि वे संगठन के प्रमुख वैचारिक और संगठनात्मक स्तंभों में से एक थे।

दीनदयाल उपाध्याय की विरासत और स्मृति

दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति में समय-समय पर विभिन्न संस्थागत एवं सार्वजनिक पहल की गईं। उनके नाम पर स्मारक, संस्थान, सार्वजनिक स्थल और विभिन्न सरकारी योजनाएँ स्थापित अथवा संचालित की गई हैं। 1978 ई. में स्मारक डाक टिकट जारी किए जाने, 2017 ई. में कांदला बंदरगाह का नाम दीनदयाल उपाध्याय बंदरगाह किए जाने तथा 2018 ई. में मुगलसराय जंक्शन का नाम दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन किए जाने का उल्लेख है।

16 फरवरी 2020 ई. को वाराणसी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मारक केंद्र का उद्घाटन किया गया, जहाँ उनकी विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। इस प्रकार उनकी स्मृति आज भी राजनीतिक, वैचारिक और सार्वजनिक संस्थानों में विभिन्न रूपों में दिखाई देती है।

दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर प्रमुख सरकारी योजनाएँ

दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अनेक योजनाएँ और कार्यक्रम संचालित किए गए हैं। इनमें विशेष रूप से ग्रामीण आजीविका, कौशल विकास, रोजगार और विद्युतीकरण से संबंधित योजनाएँ उल्लेखनीय हैं।

 दीनदयाल अंत्योदय योजना

दीनदयाल अंत्योदय योजना (DAY) का उद्देश्य गरीब एवं वंचित वर्गों को आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना तथा गरीबी और आर्थिक असुरक्षा को कम करना है। इसके अंतर्गत ग्रामीण और शहरी आजीविका कार्यक्रमों को व्यापक रूप से विकसित किया गया है। वर्तमान संदर्भ में DAY-NRLM ग्रामीण गरीबों की आजीविका, वित्तीय समावेशन, स्वरोजगार और सामुदायिक संस्थाओं को मजबूत करने पर केंद्रित है, जबकि DAY-NULM शहरी गरीबों के कौशल, स्वरोजगार और आजीविका से संबंधित आवश्यकताओं पर ध्यान देता है।

दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना

दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (DDU-GKY) ग्रामीण गरीब युवाओं के लिए कौशल विकास और रोजगार से जुड़ा कार्यक्रम है। यह ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत संचालित है और DAY-NRLM के व्यापक ढाँचे से जुड़ा हुआ है। इसका उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को रोजगारपरक कौशल प्रदान करना तथा उन्हें नियमित रोजगार के अवसरों से जोड़ना है।

इस योजना में सामान्यतः 15 से 35 वर्ष के ग्रामीण युवाओं को लक्षित किया जाता है। यह केवल प्रशिक्षण देने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को रोजगार से जोड़ने पर भी बल देती है।

यह योजना 2014 ई. में शुरू की गई थी। इसके अंतर्गत विभिन्न पाठ्यक्रमों एवं ट्रेडों में कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (DDUGJY) ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत वितरण व्यवस्था को मजबूत करने और ग्रामीण विद्युतीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। यह योजना नवंबर 2014 ई. में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था में सुधार करना था।

योजना के अंतर्गत ग्रामीण विद्युत वितरण नेटवर्क को मजबूत करने, फीडर पृथक्करण, वितरण अवसंरचना के सुदृढ़ीकरण और ग्रामीण विद्युतीकरण से संबंधित कार्यों पर बल दिया गया। GARV पोर्टल के माध्यम से ग्रामीण विद्युतीकरण की प्रगति की जानकारी उपलब्ध कराई जाती थी।

इस योजना का महत्त्व ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता, कृषि और घरेलू विद्युत आपूर्ति तथा ग्रामीण आधारभूत संरचना को मजबूत करने के संदर्भ में रहा।

पं. दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते कार्यक्रम

‘पं. दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते कार्यक्रम’ की शुरुआत 16 अक्टूबर 2014 ई. को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में की गई थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य श्रम क्षेत्र में सुधार, श्रमिकों के कौशल विकास और श्रम प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में पहल करना था। इसके अंतर्गत श्रम सुविधा पोर्टल, श्रम निरीक्षण व्यवस्था में सुधार और कर्मचारी भविष्य निधि से संबंधित यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) जैसी पहलों को बढ़ावा दिया गया।

इसका व्यापक उद्देश्य श्रमिकों और उद्योगों के बीच अधिक पारदर्शी, सुविधाजनक और आधुनिक श्रम-प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करना था।

दीनदयाल उपाध्याय स्वनियोजन योजना

मूल सामग्री में दीनदयाल उपाध्याय स्वनियोजन योजना का उल्लेख ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने वाली योजना के रूप में किया गया है।

इस प्रकार की योजनाओं का मूल उद्देश्य ग्रामीण लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना तथा आर्थिक गतिविधियों को गाँवों में ही बढ़ावा देना रहा है। किंतु विभिन्न राज्यों में दीनदयाल उपाध्याय के नाम से संचालित योजनाओं के नाम, स्वरूप और पात्रता अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी विशिष्ट राज्य की योजना के लिए संबंधित राज्य सरकार की आधिकारिक अधिसूचना को आधार बनाना अधिक उपयुक्त होगा।

राज्य सरकारों की योजनाएँ

केंद्र सरकार की योजनाओं के अतिरिक्त विभिन्न राज्य सरकारों ने भी दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर अनेक योजनाएँ और कार्यक्रम संचालित किए हैं। विभिन्न राज्य सरकारों की निम्नलिखित योजनाओं का उल्लेख मिलता है—

पंडित दीनदयाल ग्रामोद्योग रोजगार योजना

पंडित दीनदयाल ग्रामोद्योग रोजगार योजना नाम से विभिन्न स्थानों पर ग्रामीण उद्योग और स्वरोजगार से संबंधित कार्यक्रमों का उल्लेख मिलता है। इसका मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करना तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।

ऐसी योजनाओं के अंतर्गत ग्रामीण युवाओं, कारीगरों, छोटे उद्यमियों तथा ग्रामोद्योग से जुड़े लोगों को अपना व्यवसाय शुरू करने या मौजूदा व्यवसाय का विस्तार करने के लिए वित्तीय अथवा संस्थागत सहायता प्रदान की जाती है। इसका व्यापक उद्देश्य ग्रामीण आबादी को स्थानीय स्तर पर आजीविका उपलब्ध कराना और रोजगार के लिए शहरों की ओर होने वाले पलायन को कम करना है।

ग्रामोद्योग के अंतर्गत हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, लघु विनिर्माण, पारंपरिक कुटीर उद्योग, सेवा-आधारित छोटे व्यवसाय तथा स्थानीय संसाधनों पर आधारित आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
इस प्रकार की योजना का महत्त्व ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार बढ़ाने, स्थानीय संसाधनों के उपयोग, कुटीर एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन तथा ग्रामीण आत्मनिर्भरता बढ़ाने के संदर्भ में है।

दीनदयाल दिव्यांगजन पुनर्वास योजना

दीनदयाल दिव्यांगजन पुनर्वास योजना (DDRS) केंद्र सरकार की सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता व्यवस्था के अंतर्गत संचालित पुनर्वास संबंधी महत्त्वपूर्ण योजना है। इसका उद्देश्य दिव्यांगजनों के पुनर्वास, सशक्तीकरण और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है।

इस योजना के अंतर्गत दिव्यांगजनों के लिए पुनर्वास संबंधी परियोजनाएँ संचालित करने वाले पात्र गैर-सरकारी संगठनों को अनुदान सहायता प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों को उनके शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, मानसिक और सामाजिक कार्यक्षमता के सर्वोत्तम संभव स्तर तक पहुँचने तथा उसे बनाए रखने में सहायता करना है।

प्रमुख उद्देश्य
दिव्यांगजनों को समान अवसर उपलब्ध कराना

योजना का प्रमुख उद्देश्य दिव्यांगजनों को शिक्षा, रोजगार, प्रशिक्षण तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अन्य नागरिकों के समान अवसर उपलब्ध कराना है, ताकि वे आत्मनिर्भर होकर सम्मानजनक जीवन जी सकें।

सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देना

योजना के माध्यम से दिव्यांगजनों के साथ होने वाले भेदभाव को कम करते हुए सामाजिक न्याय, समानता और गरिमा के सिद्धांतों को बढ़ावा देना तथा उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है।

पुनर्वास के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित करना

दिव्यांगजनों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं व्यावसायिक पुनर्वास के लिए आवश्यक संस्थागत ढाँचे और सेवाओं का विकास करना योजना का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ना

दिव्यांगजनों को उनकी क्षमताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा, कौशल विकास, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा रोजगार के अवसरों से जोड़ने में सहायता करना, ताकि उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित की जा सके।

सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देना

योजना का उद्देश्य दिव्यांगजनों की सामाजिक भागीदारी और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है, जिससे वे अपने अधिकारों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकें और सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।

जागरूकता का विकास करना

समाज में दिव्यांगजनों की क्षमताओं, अधिकारों और आवश्यकताओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना तथा उनके प्रति व्याप्त भेदभाव, उपेक्षा और रूढ़ धारणाओं को दूर करने के लिए जागरूकता उत्पन्न करना।

बाधा-मुक्त एवं समावेशी वातावरण का निर्माण

दिव्यांगजनों की स्वतंत्र एवं समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बाधा-मुक्त, सुगम्य और समावेशी वातावरण के निर्माण में सहायता करना, ताकि वे सार्वजनिक, शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में प्रभावी रूप से भाग ले सकें।

यह योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक दृष्टिकोण दिव्यांग व्यक्ति को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने, उसकी क्षमता विकसित करने और उसे अधिक स्वतंत्र एवं सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम बनाने से संबंधित है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वयं योजना

पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वयं योजना नाम से महाराष्ट्र में एक राज्य स्तरीय योजना संचालित है। इसका उद्देश्य ऐसे पात्र विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता देना है, जिन्हें छात्रावास की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती। महाराष्ट्र सरकार के उपलब्ध विवरण के अनुसार इस योजना के अंतर्गत पात्र भटक्या-क प्रवर्ग के विद्यार्थियों को भोजन, निवास तथा अन्य शैक्षणिक आवश्यकताओं के लिए आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में दी जाती है।

प्रमुख उद्देश्य

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे ऐसे विद्यार्थियों की सहायता करना है जिन्हें छात्रावास में रहने की सुविधा उपलब्ध नहीं है और जिन्हें शिक्षा जारी रखने के लिए आवास एवं भोजन की अतिरिक्त आवश्यकता होती है।

पात्रता संबंधी सरकारी विवरण

विद्यार्थी ने बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद किसी मान्यता प्राप्त संस्थान में उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया हो। योजना का लाभ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे पात्र विद्यार्थियों को प्रदान किया जाता है।

विद्यार्थी के माता-पिता की सभी स्रोतों से प्राप्त वार्षिक आय निर्धारित आय-सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। आय-सीमा संबंधित योजना के सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्धारित की जाती है।

योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी का महाराष्ट्र का निवासी होना आवश्यक है। इसके लिए निर्धारित निवास प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना पड़ सकता है।

विद्यार्थी की आधार संख्या का बैंक खाते से जुड़ा होना आवश्यक है, ताकि योजना के अंतर्गत मिलने वाली आर्थिक सहायता का भुगतान निर्धारित बैंक खाते में किया जा सके।

दिव्यांग एवं अनाथ विद्यार्थियों जैसी विशेष श्रेणियों के लिए सामान्य पात्रता शर्तों के अतिरिक्त संबंधित प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना आवश्यक हो सकता है। ऐसे प्रमाण-पत्रों की आवश्यकताएँ संबंधित सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्धारित की जाती हैं। इस योजना में ₹38,000 से ₹60,000 तक वार्षिक सहायता का प्रावधान बताया गया है। लाभार्थियों की संख्या भी जिलावार निर्धारित की गई है।

इस योजना का महत्त्व उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले वंचित विद्यार्थियों के लिए आवास एवं भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की आर्थिक बाधा को कम करने में है।

नोट: ‘स्वयं योजना’ को दीनदयाल उपाध्याय की सामान्य स्वरोजगार योजना समझना गलत होगा। महाराष्ट्र में उपलब्ध सरकारी विवरण के अनुसार यह विद्यार्थियों की आवास एवं शैक्षणिक आवश्यकताओं से संबंधित योजना है।

दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना

‘दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना’ नाम विभिन्न राज्यों में स्वरोजगार एवं उद्यमिता से संबंधित योजनाओं के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसलिए इसे किसी एक निश्चित केंद्रीय योजना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। इन योजनाओं का सामान्य उद्देश्य बेरोजगार युवाओं, ग्रामीण लोगों, छोटे उद्यमियों अथवा वंचित वर्गों को स्वयं का व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय एवं संस्थागत सहायता उपलब्ध कराना है।

प्रमुख उद्देश्य
स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना

योजना का प्रमुख उद्देश्य युवाओं एवं अन्य पात्र व्यक्तियों को अपना व्यवसाय या उद्यम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनके लिए स्वरोजगार के नए अवसर उत्पन्न करना है।

छोटे व्यवसायों को प्रोत्साहित करना

छोटे एवं लघु व्यवसायों की स्थापना और विस्तार को प्रोत्साहित करना, ताकि स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को गति मिले और अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त हो सके।

युवाओं को रोजगार-प्रदाता बनाना

युवाओं को केवल नौकरी तलाशने के बजाय स्वयं उद्यम स्थापित कर रोजगार-प्रदाता बनने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनमें उद्यमशीलता की भावना विकसित करना योजना का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना

ग्रामीण क्षेत्रों में नए व्यवसाय एवं उद्यम स्थापित करके स्थानीय उत्पादन, व्यापार और सेवाओं को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना।

बेरोजगारी कम करना

स्वरोजगार एवं लघु उद्यमों के माध्यम से बेरोजगार व्यक्तियों को आय के स्थायी साधन उपलब्ध कराकर बेरोजगारी की समस्या को कम करना।

स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन करना

स्थानीय संसाधनों, कौशल और बाजार की आवश्यकताओं का उपयोग करते हुए ग्रामीण एवं छोटे कस्बों में रोजगार के नए अवसर पैदा करना, जिससे स्थानीय लोगों को अपने क्षेत्र में ही रोजगार मिल सके।

शहरों की ओर पलायन कम करना

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराकर आर्थिक कारणों से होने वाले ग्रामीण-से-शहरी पलायन को कम करना तथा लोगों को अपने ही क्षेत्र में आजीविका के अवसर प्रदान करना।

राज्य सरकार के अनुसार दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना के अंतर्गत दी जाने वाली सहायता का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है। इसके अंतर्गत पात्र लाभार्थियों को स्वरोजगार या उद्यम स्थापित करने के लिए बैंक ऋण, ब्याज में छूट, अनुदान, प्रशिक्षण, उद्यमिता विकास, तकनीकी सहायता तथा विपणन सहायता जैसी सुविधाएँ प्रदान की जा सकती हैं। इन सहायता उपायों का उद्देश्य लाभार्थियों को व्यवसाय शुरू करने, उसका संचालन करने और उसे सफलतापूर्वक विकसित करने में आवश्यक आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराना है। चूँकि योजना की पात्रता, सहायता की राशि, शर्तें और कार्यान्वयन की प्रक्रिया राज्य के अनुसार भिन्न हो सकती है, इसलिए किसी विशेष राज्य में लागू ‘दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना’ की जानकारी के लिए संबंधित राज्य सरकार द्वारा जारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों एवं अधिसूचनाओं को देखना आवश्यक है।

 दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास/होम-स्टे विकास योजना

दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास (होम-स्टे) विकास योजना उत्तराखंड सरकार की पर्यटन क्षेत्र से संबंधित महत्त्वपूर्ण योजना है। इसका उद्देश्य ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना तथा स्थानीय लोगों को अपने घरों को पर्यटकों के लिए होम-स्टे के रूप में विकसित करके स्वरोजगार प्राप्त करने का अवसर देना है।

प्रमुख उद्देश्य
ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना

योजना का प्रमुख उद्देश्य उत्तराखंड के ग्रामीण एवं पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है, ताकि इन क्षेत्रों की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय विशेषताओं को पर्यटन से जोड़ा जा सके।

स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार सृजित करना

ग्रामीण क्षेत्रों में होम-स्टे एवं पर्यटन से संबंधित अन्य गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय निवासियों के लिए स्वरोजगार के अवसर उत्पन्न करना तथा उन्हें अपनी स्थानीय संपदा और संसाधनों से आय अर्जित करने के लिए प्रोत्साहित करना।

ग्रामीण परिवारों की आय में वृद्धि करना

पर्यटन गतिविधियों से प्राप्त आय के माध्यम से ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना और उनकी आय के वैकल्पिक एवं स्थायी स्रोत विकसित करना योजना का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

ग्रामीण जीवन एवं स्थानीय संस्कृति से परिचित कराना

पर्यटकों को उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन, लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों, खान-पान, कला और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना, ताकि पर्यटन के माध्यम से स्थानीय संस्कृति का संरक्षण और प्रचार-प्रसार हो सके।

पारंपरिक एवं पहाड़ी वास्तुकला को प्रोत्साहित करना

उत्तराखंड की पारंपरिक एवं पहाड़ी वास्तुकला की विशेषताओं को संरक्षित करते हुए उन्हें पर्यटन से जोड़ना तथा स्थानीय स्थापत्य शैली के अनुरूप पर्यटन सुविधाओं के विकास को प्रोत्साहित करना।

नए पर्यटन स्थलों का विकास करना

राज्य के अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध ग्रामीण एवं पर्वतीय क्षेत्रों को पर्यटन मानचित्र पर लाना तथा वहाँ उपलब्ध प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संसाधनों के आधार पर नए पर्यटन स्थलों के विकास को बढ़ावा देना।

पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन को कम करना

ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन एवं स्वरोजगार के पर्याप्त अवसर उत्पन्न करके स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में आजीविका उपलब्ध कराना और रोजगार की तलाश में होने वाले पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन को कम करना।

योजना की प्रमुख विशेषताएँ

दीनदयाल उपाध्याय गृह-आवास/होम-स्टे विकास योजना के अंतर्गत भवन का उपयोग आवासीय परिसर के रूप में किया जाना चाहिए और मकान मालिक का अपने परिवार के साथ उसी भवन में रहना आवश्यक है। होम-स्टे के रूप में लाभ प्राप्त करने के लिए संबंधित इकाई का निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पंजीकरण कराना आवश्यक होता है। योजना के अंतर्गत पर्यटकों के ठहरने के लिए 1 से 6 कमरों की व्यवस्था की जा सकती है। योजना का विस्तार नगर निगम क्षेत्र को छोड़कर राज्य के अन्य क्षेत्रों तक किया गया है, जिससे ग्रामीण एवं पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके। इसके अतिरिक्त, पारंपरिक एवं पहाड़ी वास्तुकला शैली में निर्मित भवनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती है, ताकि राज्य की स्थानीय स्थापत्य परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए पर्यटन को प्रोत्साहित किया जा सके।

वित्तीय सहायता

उपलब्ध सरकारी विवरण के अनुसार मैदानी क्षेत्रों में पंजीकृत लागत का 25 प्रतिशत या ₹7.50 लाख, जो भी कम हो, तथा ब्याज पर निर्धारित सहायता दी जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में पंजीकृत लागत का 33 प्रतिशत या ₹10 लाख, जो भी कम हो, तथा ब्याज पर निर्धारित सहायता का प्रावधान बताया गया है। ब्याज संबंधी सहायता भी निर्धारित सीमा और अवधि के अंतर्गत दी जाती है।

यह योजना पर्यटन को केवल होटल उद्योग तक सीमित न रखकर स्थानीय परिवारों और ग्रामीण समुदायों को पर्यटन अर्थव्यवस्था से जोड़ती है। इससे स्थानीय संस्कृति, भोजन, वास्तुकला और जीवन-शैली को भी पर्यटकों तक पहुँचाने का अवसर मिलता है।

दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता किसान कल्याण योजना

दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता किसान कल्याण योजना उत्तराखंड सरकार की राज्य स्तरीय योजना है। इसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों को आर्थिक सहायता एवं ऋण उपलब्ध कराना है।

प्रमुख उद्देश्य

योजना का प्रमुख उद्देश्य किसानों को सस्ती एवं सुलभ वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से कृषि एवं कृषि-संबंधी गतिविधियों को प्रोत्साहित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, ग्रामीण बेरोजगारी को कम करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने का प्रयास किया जाता है। साथ ही, किसानों की आय में वृद्धि कर उनके जीवन-स्तर में सुधार करना और सहकारी संस्थाओं को ग्रामीण आर्थिक विकास के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित करना भी योजना के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।

लाभार्थी

सरकारी विवरण के अनुसार, योजना के अंतर्गत छोटे एवं सीमांत किसान तथा सहकारी समितियों से जुड़े पात्र सदस्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। योजना का उद्देश्य ऐसे लाभार्थियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है, जो कृषि, पशुपालन, लघु व्यवसाय अथवा अन्य आजीविका संबंधी गतिविधियों के माध्यम से अपनी आय बढ़ाना चाहते हैं।

ऋण सुविधा

उत्तराखंड सहकारिता विभाग के अनुसार, योजना के अंतर्गत व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए ₹3 लाख तक तथा स्वयं सहायता समूहों के लिए ₹5 लाख तक का ब्याज-मुक्त ऋण उपलब्ध कराने का प्रावधान बताया गया है। इस ऋण का उपयोग पात्र लाभार्थी कृषि, कृषि-संबंधी गतिविधियों, स्वरोजगार तथा अन्य अनुमन्य आजीविका कार्यों के लिए कर सकते हैं।

आवेदन प्रक्रिया

योजना के अंतर्गत आवेदक संबंधित सहकारी समिति अथवा बैंक शाखा में आवेदन करता है। आवेदन प्राप्त होने के बाद संबंधित स्तर पर लाभार्थी की पात्रता एवं आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण किया जाता है। पात्र पाए जाने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लाभार्थी का चयन किया जाता है और चयनित लाभार्थी को संबंधित सहकारी बैंक अथवा प्राथमिक कृषि साख समिति (PACS) व्यवस्था के माध्यम से ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

महत्त्व

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में इस योजना का विशेष महत्त्व है, जहाँ ग्रामीण एवं पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक चुनौती रहा है। किसानों और ग्रामीण परिवारों को कृषि, पशुपालन, लघु व्यवसाय तथा अन्य आजीविका गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराकर स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने, किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने तथा लोगों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार एवं आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।

7. दीनदयाल उपाध्याय रसोई योजना

दीनदयाल उपाध्याय रसोई योजना नाम से विभिन्न राज्यों में गरीब, श्रमिक और जरूरतमंद लोगों को कम कीमत पर भोजन उपलब्ध कराने वाली योजनाओं का उल्लेख मिलता है। इन योजनाओं का मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सस्ता एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है, ताकि उन्हें भोजन की मूलभूत आवश्यकता पूरी करने में सहायता मिले।

योजना का उद्देश्य

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य गरीब एवं जरूरतमंद लोगों को सस्ती दर पर पौष्टिक एवं गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराना है। इसके माध्यम से श्रमिकों, दैनिक मजदूरों तथा कम आय वाले लोगों को सार्वजनिक एवं श्रमिक क्षेत्रों के आसपास आसानी से भोजन की सुविधा प्रदान करने का प्रयास किया जाता है। योजना का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना, गरीब एवं निम्न-आय वाले परिवारों के भोजन पर होने वाले आर्थिक बोझ को कम करना तथा सार्वजनिक स्थलों और श्रमिक बहुल क्षेत्रों में सुलभ एवं किफायती भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

योजना का स्वरूप

ऐसी रसोई योजनाओं में सामान्यतः सरकार या स्थानीय निकायों की सहायता से भोजन तैयार किया जाता है और निर्धारित केंद्रों पर कम कीमत में उपलब्ध कराया जाता है।

भोजन की कीमत, मेन्यू, लाभार्थियों की पात्रता, रसोई की संख्या और संचालन की व्यवस्था राज्य के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए ‘दीनदयाल उपाध्याय रसोई योजना’ को पूरे भारत में समान नियमों वाली केंद्रीय योजना मानना उचित नहीं होगा।

8. दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना

दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग की महत्त्वपूर्ण योजना है। इसका उद्देश्य राजस्थान के वरिष्ठ नागरिकों को उनके जीवनकाल में एक बार देश के विभिन्न निर्धारित तीर्थस्थलों की यात्रा के लिए सरकारी सहायता उपलब्ध कराना है। राजस्थान सरकार के अनुसार यह योजना नए स्वरूप में 2017 ई. से संचालित है; इसका मूल कार्यक्रम 2013 ई. से संबंधित रहा है।

प्रमुख उद्देश्य

योजना का प्रमुख उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को धार्मिक एवं तीर्थ यात्रा का अवसर प्रदान करना तथा आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा के लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना है। इसके माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन को सहयोग देने, उन्हें निर्धारित तीर्थस्थलों तक सुरक्षित एवं सुविधाजनक यात्रा की व्यवस्था उपलब्ध कराने तथा धार्मिक आस्था से जुड़ी उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास किया जाता है।

पात्रता

राजस्थान सरकार के उपलब्ध विवरण के अनुसार, राजस्थान के मूल निवासी 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक इस योजना के पात्र हो सकते हैं। योजना के अंतर्गत लाभार्थी को जीवनकाल में एक बार तीर्थ यात्रा का लाभ दिए जाने का प्रावधान बताया गया है।

यात्रा का स्वरूप

योजना के अंतर्गत निर्धारित तीर्थस्थलों की यात्रा रेल तथा कुछ परिस्थितियों में हवाई मार्ग से कराई जा सकती है। राजस्थान देवस्थान विभाग की उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विभिन्न तीर्थस्थलों के लिए यात्रा व्यवस्था तथा रेल एवं हवाई यात्रा से संबंधित प्रावधान निर्धारित किए गए हैं।

आवेदन प्रक्रिया

योजना के लिए आवेदन राजस्थान देवस्थान विभाग द्वारा निर्धारित व्यवस्था के माध्यम से किया जाता है। विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर योजना के अंतर्गत आवेदन एवं पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है, जिसके माध्यम से पात्र वरिष्ठ नागरिक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

महत्त्व

यह योजना सामाजिक कल्याण और धार्मिक पर्यटन के बीच समन्वय स्थापित करती है। इसका विशेष महत्त्व उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए है, जो आर्थिक या अन्य कारणों से स्वयं तीर्थ यात्रा करने में सक्षम नहीं होते। योजना के माध्यम से ऐसे बुजुर्गों को निर्धारित धार्मिक स्थलों की यात्रा का अवसर उपलब्ध कराकर उनके धार्मिक विश्वासों, सामाजिक सहभागिता और मानसिक संतुष्टि को सहयोग प्रदान करने का प्रयास किया जाता है।

9. पंडित दीनदयाल उपाध्याय राज्य कर्मचारी कैशलेस चिकित्सा योजना

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राज्य कर्मचारी कैशलेस चिकित्सा योजना उत्तर प्रदेश सरकार की स्वास्थ्य संबंधी योजना है।

यह योजना उत्तर प्रदेश के राज्य कर्मचारियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों, पेंशनरों और पात्र आश्रित परिवारजनों को कैशलेस उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लागू की गई। योजना को लागू करने के संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार ने 7 जनवरी 2022 ई. को शासनादेश जारी किया था और जुलाई 2022 ई. में इसके क्रियान्वयन का औपचारिक शुभारंभ किया गया।

प्रमुख उद्देश्य

योजना का प्रमुख उद्देश्य उत्तर प्रदेश के राज्य कर्मचारियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों एवं पेंशनरों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर व्यापक स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करना है। इसके अंतर्गत पात्र आश्रित परिवारजनों को भी आवश्यक उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान है। योजना के माध्यम से उपचार के समय तत्काल नकद भुगतान की आवश्यकता को कम करना तथा सरकारी एवं योजना से संबद्ध निजी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध कराना इसका प्रमुख लक्ष्य है।

लाभार्थी

योजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के कार्यरत राज्य सरकारी कर्मचारी, सेवानिवृत्त राज्य सरकारी कर्मचारी, पेंशनर एवं परिवार पेंशनर तथा पात्र आश्रित परिवारजन लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार योजना का दायरा वर्तमान कर्मचारियों के साथ-साथ सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके पात्र आश्रितों तक विस्तारित है।

स्टेट हेल्थ कार्ड

योजना के लाभार्थियों की पहचान और उनकी पात्रता सुनिश्चित करने के लिए स्टेट हेल्थ कार्ड की व्यवस्था की गई है। इस कार्ड के माध्यम से लाभार्थी की पहचान की जाती है तथा योजना के अंतर्गत उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का लाभ लेने में सहायता मिलती है।

सरकारी अस्पतालों में उपचार

योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार सरकारी वित्तपोषित चिकित्सा संस्थानों एवं अस्पतालों में पात्र लाभार्थियों को आवश्यकतानुसार कैशलेस उपचार उपलब्ध कराया जाता है। उपलब्ध शासनादेश के अनुसार, सरकारी चिकित्सा संस्थानों में उपचार के लिए परिवार पर कोई समान अधिकतम वार्षिक सीमा निर्धारित नहीं किए जाने का प्रावधान बताया गया है।

निजी अस्पतालों में उपचार

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत संबद्ध निजी अस्पतालों में भी योजना के पात्र लाभार्थियों को कैशलेस उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। उपलब्ध शासनादेश के अनुसार, ऐसे संबद्ध निजी अस्पतालों में प्रति लाभार्थी परिवार प्रति वर्ष ₹5 लाख तक के उपचार व्यय की सीमा निर्धारित की गई थी।

महत्त्व

यह योजना राज्य के कर्मचारियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से गंभीर बीमारियों अथवा महँगे उपचार की स्थिति में कैशलेस चिकित्सा सुविधा लाभार्थियों को तत्काल आर्थिक बोझ से राहत प्रदान कर सकती है। इसके माध्यम से पात्र परिवारों को उपचार के लिए बड़ी राशि तत्काल अपने पास से खर्च करने की आवश्यकता कम होती है तथा सरकारी और संबद्ध निजी चिकित्सा संस्थानों में उपचार की सुविधा उपलब्ध होती है।

योजनाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण सावधानी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर संचालित योजनाओं को समझते समय यह अंतर ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी योजनाएँ भारत सरकार की केंद्रीय योजनाएँ नहीं हैं। इनमें अलग-अलग स्तर की योजनाएँ शामिल हैं—

केंद्रीय योजना

दीनदयाल दिव्यांगजन पुनर्वास योजना (DDRS) केंद्र सरकार की योजना है, जिसमें दिव्यांगजनों के पुनर्वास के लिए पात्र संस्थाओं/NGOs को अनुदान सहायता दी जाती है।

राज्य स्तरीय योजनाएँ

कुछ योजनाएँ स्पष्ट रूप से राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं, जैसे—

  • दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास (होम-स्टे) विकास योजना- उत्तराखंड
  • दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता किसान कल्याण योजना- उत्तराखंड
  • दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना- राजस्थान
  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय राज्य कर्मचारी कैशलेस चिकित्सा योजना- उत्तर प्रदेश
  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वयं योजना- महाराष्ट्र।

योजना के नाम में भिन्नता

किसी योजना का नाम एक राज्य में ‘दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना’ हो सकता है, जबकि दूसरे राज्य में इसी उद्देश्य की योजना किसी अन्य नाम से संचालित हो सकती है। इसी प्रकार ‘रसोई’, ‘ग्रामोद्योग रोजगार’, ‘स्वरोजगार’ और ‘किसान कल्याण’ जैसे नामों वाली योजनाओं की पात्रता, अनुदान, ऋण सीमा, आय सीमा और कार्यान्वयन एजेंसी राज्य के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

दीनदयाल उपाध्याय के प्रमुख विचार

दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन के प्रमुख आधार निम्नलिखित थे-

राष्ट्रीय पहचान

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह राष्ट्र की अपनी सांस्कृतिक पहचान और जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम बने।

समग्र मानव

मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से युक्त समग्र व्यक्तित्व के रूप में देखना चाहिए।

सांस्कृतिक आधार

भारत के विकास की दिशा निर्धारित करते समय भारतीय इतिहास, संस्कृति और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।

विविधता में एकता

भारतीय संस्कृति की विशेषता अनेकता में एकता और विविध रूपों में अंतर्निहित एकता की खोज करना है।

चार पुरुषार्थ

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मानव जीवन के समग्र उद्देश्यों के रूप में देखा गया।

मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल उत्पादन और उपभोग बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव जीवन को समृद्ध और संतुलित बनाना होना चाहिए।

संयमित राज्य-सत्ता

राज्य की शक्ति का उपयोग समाज एवं व्यक्ति के हित में होना चाहिए। अत्यधिक केंद्रीकरण व्यक्ति और समाज की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।

दीनदयाल उपाध्याय के प्रमुख कथन

नीचे मूल सामग्री में दिए गए कथनों को भाषा की दृष्टि से व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। जहाँ आवश्यक है, उन्हें कथन के बजाय उनके विचार का सार समझना अधिक उचित है।

पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन-शैली

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन-शैली को एक ही चीज नहीं माना जाना चाहिए। विज्ञान का सार्वभौमिक उपयोग हो सकता है, लेकिन किसी समाज की जीवन-शैली और मूल्य उसके अपने सांस्कृतिक संदर्भ से निर्धारित होते हैं।

पश्चिमीकरण और प्रगति

दीनदयाल उपाध्याय का विचार था कि अंग्रेजी शासन के समय भारत ने पश्चिमी प्रभुत्व का विरोध किया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद पश्चिमीकरण को स्वतः प्रगति का पर्याय मान लेना उचित नहीं है।

अवसरवाद और राजनीति

दीनदयाल उपाध्याय ने राजनीतिक अवसरवाद को लोकतांत्रिक राजनीति के लिए हानिकारक माना और कहा कि इससे राजनीति में लोगों का विश्वास कमजोर होता है।

स्वतंत्रता और संस्कृति

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार स्वतंत्रता तभी पूर्ण अर्थ प्राप्त करती है जब वह राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो।

चार पुरुषार्थ

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भारतीय चिंतन में जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। दीनदयाल उपाध्याय के विचार में इनका संतुलित समन्वय मानव जीवन की समग्रता के लिए आवश्यक है।

इतिहास और सांस्कृतिक अनुभव

दीनदयाल उपाध्याय का विचार था कि पिछले लंबे ऐतिहासिक काल में भारतीय समाज ने जो विविध अनुभव और प्रभाव ग्रहण किए हैं, उन्हें समझे बिना वर्तमान समाज की वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता।

धर्म के मूल सिद्धांत

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार धर्म के मूल सिद्धांत शाश्वत और व्यापक हो सकते हैं, लेकिन उनका व्यवहारिक अनुप्रयोग समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

राज्य और धर्म

दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में राज्य और समाज के संबंध का प्रश्न महत्त्वपूर्ण था। वे ऐसी व्यवस्था के प्रति सावधान करते थे जिसमें राज्य राजनीतिक और आर्थिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित कर ले।

विविधता में एकता

उनके विचार में जीवन में विविधता और बहुलता स्वाभाविक है, लेकिन उसके पीछे निहित एकता की खोज करना भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि की महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

राष्ट्रीय और मानवीय दृष्टिकोण

उनके अनुसार भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों को केवल राष्ट्रीय दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि व्यापक मानवीय दृष्टिकोण से भी समझना आवश्यक है।

राष्ट्रीय पहचान

उनका प्रसिद्ध विचार था कि राष्ट्रीय पहचान के बिना स्वतंत्रता अधूरी है और राष्ट्रीय पहचान की उपेक्षा अनेक समस्याओं का मूल कारण बन सकती है। उनके आधिकारिक पोर्टल पर भी राष्ट्रीय पहचान को स्वतंत्रता के अर्थ से जोड़ा गया है।

मानव की द्वैध प्रवृत्तियाँ

मनुष्य में एक ओर क्रोध, लोभ और स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियाँ होती हैं, तो दूसरी ओर प्रेम, सेवा, त्याग और बलिदान जैसी प्रवृत्तियाँ भी होती हैं। इसलिए मनुष्य के व्यक्तित्व को किसी एक प्रवृत्ति के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

भारतीय संस्कृति की समग्रता

भारतीय संस्कृति जीवन को एक एकीकृत समग्र के रूप में देखने की प्रवृत्ति रखती है। यही समग्र दृष्टि एकात्म मानववाद के चिंतन का भी महत्त्वपूर्ण आधार है।

अनेकता में एकता

अनेकता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि की प्रमुख विशेषता मानी गई है।

धर्म की व्यापक अवधारणा

दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में धर्म को केवल पूजा-पद्धति या संप्रदाय के अर्थ में सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे सामाजिक व्यवस्था, नैतिक आचरण और कर्तव्य-बोध से संबंधित व्यापक अवधारणा के रूप में देखा गया।

नैतिकता

उनके विचार में नैतिकता केवल किसी व्यक्ति की मनमानी रचना नहीं है। नैतिक मूल्यों को मानव जीवन और सामाजिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

संयमित शक्ति

दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार वास्तविक शक्ति केवल असंयमित आक्रामकता में नहीं, बल्कि अनुशासित और संयमित कार्रवाई में निहित होती है।

धर्म और सार्वभौमिकता

धर्म के मूल सिद्धांतों को उन्होंने व्यापक और सार्वभौमिक माना, जबकि उनके व्यवहारिक स्वरूप को समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुरूप बदलने योग्य माना।

‘रिलिजन’ और ‘धर्म’

दीनदयाल उपाध्याय भारतीय संदर्भ में ‘धर्म’ को केवल अंग्रेजी शब्द ‘Religion’ के समानार्थी मानने के पक्ष में नहीं थे। उनके चिंतन में धर्म का अर्थ कर्तव्य, नैतिक व्यवस्था, सामाजिक संतुलन और जीवन को धारण करने वाले सिद्धांतों से अधिक व्यापक रूप में जुड़ा हुआ है।

दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का ऐतिहासिक महत्त्व

दीनदयाल उपाध्याय का महत्त्व मुख्यतः तीन क्षेत्रों में देखा जा सकता है— पहला, संगठनकर्ता के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के संगठनात्मक विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरा, राजनीतिक चिंतक के रूप में उन्होंने एकात्म मानववाद के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और अर्थव्यवस्था के संबंधों को समझाने का प्रयास किया। तीसरा, पत्रकार और लेखक के रूप में उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और स्वदेश जैसे प्रकाशनों के माध्यम से राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विचारों के प्रसार में योगदान दिया। उनका चिंतन स्वतंत्र भारत में विकास के ऐसे वैकल्पिक मॉडल की खोज का प्रयास था, जो पश्चिमी पूँजीवाद और समाजवाद से अलग भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर आधारित हो। उनके एकात्म मानववाद में व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित विकास तथा समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के संबंध पर बल दिया गया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन संघर्ष, संगठन, वैचारिक चिंतन, पत्रकारिता और राजनीतिक सक्रियता का समन्वित उदाहरण था। अत्यंत कठिन पारिवारिक परिस्थितियों में बचपन बिताने के बावजूद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण प्रतिभा का प्रदर्शन किया। आगे चलकर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से संगठनात्मक कार्य किया और भारतीय जनसंघ के निर्माण एवं विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सबसे प्रमुख वैचारिक देन ‘एकात्म मानववाद’ मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने मनुष्य को विकास की केंद्रीय इकाई मानते हुए उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पक्षों के संतुलित विकास पर बल दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान, सामाजिक समरसता और मानव-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपने चिंतन के प्रमुख आधारों में रखा। उनकी आकस्मिक मृत्यु ने उनके राजनीतिक जीवन को अचानक समाप्त कर दिया, लेकिन उनके विचार और संगठनात्मक योगदान भारतीय राजनीतिक विमर्श में लंबे समय तक प्रभावशाली रहे। आज भी उनके नाम पर अनेक संस्थाएँ, स्मारक और सरकारी योजनाएँ संचालित हैं तथा उनका एकात्म मानववाद भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक चिंतन के अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण विषय है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय से संबंधित महत्वपूर्ण FAQs

1. पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 ई. को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गाँव में हुआ था।

2. पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख वैचारिक देन क्या थी?

दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख वैचारिक देन ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) थी। इसमें उन्होंने मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलित एवं समग्र विकास पर बल दिया।

3. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कब जुड़े?

दीनदयाल उपाध्याय 1937 ई. में कानपुर में अध्ययन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए और बाद में पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में संघ के लिए कार्य किया।

4. भारतीय जनसंघ की स्थापना कब हुई और इसमें दीनदयाल उपाध्याय की क्या भूमिका थी?

21 अक्टूबर 1951 ई. को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। दीनदयाल उपाध्याय ने इसके संगठन निर्माण और विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा बाद में इसके अखिल भारतीय महासचिव बने।

5. दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष कब बने?

दीनदयाल उपाध्याय दिसंबर 1967 ई. में कालीकट अधिवेशन में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष चुने गए। वे इस पद पर लगभग 43 दिनों तक रहे।

6. एकात्म मानववाद क्या है?

एकात्म मानववाद दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित विचार-दर्शन है, जिसमें मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी न मानकर शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से युक्त समग्र व्यक्तित्व माना गया है। इसमें व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच समन्वय पर बल दिया गया है।

एकात्म मानववाद पर दीनदयाल उपाध्याय ने कब भाषण दिए थे?

दीनदयाल उपाध्याय ने 22 से 25 अप्रैल 1965 ई. तक बंबई में एकात्म मानववाद पर चार व्याख्यान दिए थे।

8. दीनदयाल उपाध्याय पत्रकारिता से कैसे जुड़े थे?

दीनदयाल उपाध्याय ने ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’ और ‘स्वदेश’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान दिया। उन्होंने लेखन और संपादन के माध्यम से राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

9. पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?

दीनदयाल उपाध्याय की प्रमुख रचनाओं में ‘एकात्म मानववाद’, ‘भारतीय अर्थनीति : विकास की एक दिशा’, ‘अखंड भारत क्यों?’, ‘राष्ट्र-चिंतन’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएँ’, ‘राजनीतिक डायरी’, ‘विश्वासघात’ और ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ आदि शामिल हैं।

10. पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु कब और कैसे हुई?

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु 11 फरवरी 1968 ई. को मुगलसराय के निकट रहस्यमय परिस्थितियों में हुई। वे 10 फरवरी को रेल यात्रा कर रहे थे और अगले दिन उनका शव रेलवे लाइन के पास मिला। उनकी मृत्यु की परिस्थितियाँ लंबे समय तक जाँच और विवाद का विषय बनी रहीं।
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