1848 ई. की फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution of 1848 AD)

1848 में एक बार फिर पूरे यूरोप में क्रांति की लहर दौड़ गई।

1830 ई. की फ्रांसीसी क्रांति के बाद बूर्बा वंश का अंत हो गया था।

1830 ई. में 57 वर्षीय लुई फिलिप फ्रांस का शासक बना।

लुई फिलिप अपने उदारवादी विचारों के कारण जनता में लोकप्रिय था।

फ्रांस की जनता, जो चार्ल्स दशम के दमनकारी शासन से त्रस्त थी, वह लुई फिलिप से सुधारों की अपेक्षा करती थी।

लुई फिलिप ने अपने विरोधियों को शांत करने के लिए मध्यम-मार्ग का सहारा लिया और धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई।

1848 की फ्रांसीसी क्रांति के कारण (Due to the French Revolution of 1848)

फ्रांस की जनता लुई फिलिप की मध्यममार्गी गृह नीति से अप्रसन्न थी।

फ्रांस की जनता चाहती थी कि लुई फिलिप ऐसी नीति और सुधारों को लागू करे जिससे फ्रांस का यश, कीर्ति और गौरव बढे।

फ्रांस की जनता की सुधारों की यही माँग आकस्मिक रूप से 1848 ई. की क्रांति में परिवर्तित हो गई।

समाजवाद का विकास (Development of Socialism)

वास्तव में 1848 ई. की फ्रांसीसी क्रांति की पृष्ठभूमि समाजवादियों ने तैयार की थी। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप फ्रांस में जहाँ उद्योगपतियों को मुनाफा हो रहा था, वहीं मजदूरों के दुःख एवं कठिनाइयों में बढ़ोत्तरी हो रही थी।

लुई फिलिप के काल में फ्रांस में समाजवादियों का उदय हो रहा था। काम के घंटों की अधिकता, कारखानों में बच्चों व स्त्रियों के शोषण से फ्रांस में समाजवाद के उदय की पृष्ठभूमि बनी।

सेंट साइमन फ्रांस का पहला व्यक्ति था जिसने समाज के बहुसंख्यक मजदूर वर्ग के लिए एक समाजवादी योजना प्रस्तुत की थी।

रूसो की पुस्तक ‘सामाजिक समझौता’ की भाँति फ्रांस के दूसरे समाजवादी लुई ब्लांक ने अपनी पुस्तक ‘श्रम संगठन’ में मजदूरों के हितों का प्रतिपादन किया और सरकार की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना की।

लुई ब्लांक ने लुई फिलिप की सरकार को पूंजीपतियों की सरकार घोषित किया और यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि प्रत्येक व्यक्ति को काम पाने का अधिकार है और राज्य का यह दायित्व है कि वह उसे काम दे।

लुई ब्लांक ने अपने समाजवादी विचारों द्वारा बहुसंख्यक मजदूरों को राजतंत्र को उखाड़ फेंकने की प्रेरणा दी।

लुई ब्लांक की पुस्तक ‘श्रम संगठन’ 1848 की क्रांति का बाईबिल बन गई थी।

विभिन्न दलों द्वारा लुई का विरोध (Louis opposed by various parties)

फ्रांस की गद्दी पर बैठते समय लुई फिलिप की स्थिति ठीक नहीं थी।

तत्कालीन फ्रांस के प्रायः सभी दल लुई फिलिप के विरोधी थे, जैसे-

1. बूर्बा दल बूर्बा राजवंश के किसी राजकुमार को गद्दी देना चाहता था।

2. रिपब्लिकन दल फ्रांस में गणतंत्र की स्थापना करना चाहता था।

3. बोनापार्टिस्ट दल नेपोलियन के किसी वंशज को राजगद्दी पर बिठाना चाहता था।

4. समाजवादी दल फ्रांस में मजदूरों की सरकार स्थापित करने का प्रयास कर रहा था।

5. कट्टर राजतंत्रवादी चार्ल्स दशम के पौत्र को गद्दी पर बिठाना चाहते थे।

इस प्रकार फ्रांस के प्रायः सभी दल लुई फिलिप को गद्दी से उतारने के लिए समय-समय पर विद्रोह कर रहे थे।

गुइजो की अनुदारवादी नीति (Conservative Policy of Guijo)

लुई फिलिप के आरंभिक 10 साल में लुई ने 10 मंत्री बदले।

1840 में लुई ने गुइजो को अपना प्रधानमंत्री बनाया, जो मूलतः अनुदार और प्रतिक्रियावादी था।

गुइजो एक तरह से स्वेच्छाचारिता का अवतार था।

गुइजो का माना था कि जनता को अधिकार देना शासन को खतरे में डालना है।

स्वेच्छाचारिता के समर्थन में गुइजो का कहना था कि ‘राजसिंहासन कोई खाली कुर्सी नहीं है।

गुइजो मजदूरों की दशा में सुधार लाने का भी विरोधी था और इसलिए वह उनके लिए कानून बनाना नहीं चाहता था।

गुइजो ने यह घोषणा की थी कि वह शासन में कोई सुधार नहीं करेगा और न ही विदेश नीति में सक्रिय रूप से भाग ही लेगा।

जब लुई फिलिप ने गणतंत्रवादी विचारधारा के समर्थक समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध लगाया, जो जनता ने इसका व्यापक विरोध किया।

मध्यम वर्ग की प्रधानता (Primacy of Middle Class)

लुई की मध्यममार्गी नीति के कारण उसका अप्रिय होना ही क्रांति का एक कारण बना।

लुई फिलिप ने गद्दी पर बैठने पर जनता को एक उदार संविधान दिया था, किंतु लुई फिलिप के उदार संविधान से जनता को कोई खास लाभ नहीं मिला।

लुई फिलिप के शासन काल में मताधिकार का आधार धन था, इसलिए प्रतिनिधि सभा में मध्यम वर्ग की प्रधानता हो गई थी।

लुई फिलिप की सरकार को ‘मध्यमवर्गीय सरकार’ कहा जाता था क्योंकि प्रतिनिधि सभा में मध्यम वर्ग का बहुमत होने के कारण सभी नियम-कानून मध्यम वर्ग के हितों के अनुकूल ही बनते थे।

मध्यम वर्ग की ही सहायता से लुई फिलिप ने 18 वर्ष तक शासन किया।

निम्न वर्ग के लोग लुई फिलिप को लुई फिलिप को घृणा की दृष्टि से देखने लगे और उसको सत्ता से हटाने के लिए सोचने लगे थे।

लुई फिलिप की असफल विदेश नीति (Louis Philippe’s failed Foreign Policy)

लुई फिलिप की दुर्बल विदेश नीति पूर्णतः असफल रही।

बेल्जियम और पूर्वी समस्या के मामले में फ्रांस को इंग्लैंड से मात खानी पड़ी थी जिसके कारण पूरे फ्रांस में लुई के विदेश नीति की आलोचना होने लगी थी और सारे राजनीतिक दल उसके विरोधी हो गये थे।

दरअसल लुई फिलिप की विदेश नीति इंग्लैंड की पिछलग्गू बनने की नीति थी, जबकि फ्रांसीसी जनता चाहती थी कि एक गौरवपूर्ण विदेश नीति अपनाकर फ्रांस यूरोप का सरताज बने।

1848 के क्रांति की घटनाएं (Revolution Events of 1848)

1848 ई. आते-आते फ्रांस की जनता का असंतोष चरमसीमा पर पहुँच गया और फ्रांस की प्रमुख पार्टियां लुई फिलिप की विरोधी हो गई थीं।

राजंतत्रवादी पार्टी बूर्बो वंश की पुनर्स्थापना करना चाहती थीं।
बोनापार्टिस्ट पार्टी नेपालियन बोनापार्ट के पुत्र को गद्दी पर बिठाना चाहती थी, जबकि रिपब्लिकन पार्टी अपने नेता लामार्तीन के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना की माँग कर रही थी।

समाजवादी पार्टी मजदूरों की गिरती आर्थिक दशा के कारण लुई का विरोधी थी।

मध्यमवर्गीय लोग मताधिकार में वृद्धि की माँग ठुकराये जाने के कारण गुइजो के विरोधी हो गये थे।

कैथोलिक लोग गुइजो के इसलिए विरोधी थे क्योंकि गुइजो प्रोटेस्टेंट था।

मताधिकार में वृद्धि की माँग ने फ्रांस को क्रांति की और धकेल दिया। गुइजो ने जब इस माँग का विरोध किया तो दीयर्स ने मताधिकार के वृद्धि की माँग करते हुए गुइजो का प्रबल विरोध किया।

दीयर्स ने यह भी माँग की कि विधायक तथा मंत्री के पास कोई सरकारी पद नहीं होना चाहिए।

1848 में क्रांतिकारियों ने सुधारवादी माँगों के समर्थन में एक प्रार्थना-पत्र पर जनता से हस्ताक्षर करवा कर लुई फिलिप से सुधारों की मांग करने की योजना बनाई।

दीयर्स एवं उसके साथी क्रांतिकारियों ने जगह-जगह दावतों की व्यवस्था की।

सुधारवादी आंदोलन का यह तरीका फ्रांस के इतिहास में ‘सुधार भोज’ के नाम से जाना जाता है।

फ्रांस के लोगों ने 22 फरवरी अमेरिका के क्रांतिकारी नेता जार्ज वाशिंगटन के जन्मदिन पर 22 फरवरी, 1848 ई. का दिन क्रांति के लिए चुना।

22 फरवरी को लुई फिलिप ने सुधार-भोजों और पेरिस में एकत्र हुए लोगों पर प्रतिबंध लगा दिया।

प्रतिबंध के बावजूद पेरिस में असंख्य विद्यार्थी एवं मजदूर व अन्य सुधारवादी एकत्रित हो गये।

फ्रांस की सड़कों पर जनता गुइजो का नाश हो, सुधारवादी जिंदाबाद के नारे लगाने लगी।

शांति एवं व्यवस्था की स्थापना के लिए भेजे गये राष्ट्रीय रक्षकों ने क्रांतिकारियों और जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राजा लुई फिलिप ने गुइजो को पदच्युत् कर सुधारों की माँग स्वीकार कर लिया।

गणतंत्रवादियों के नेतृत्व में भीड़ ने गुइजो के मकान को घेर लिया, तो लुई ने गुइजो की सुरक्षा के लिए पुलिस भेजी।

रक्षकों गोलीबारी में 23 क्रांतिकारी मारे गये और 30 घायल हो गये।

फ्रांस की क्रांतिकारी जनता अपने साथियों की लाश देख कर पागल हो गई।

24 फरवरी को क्रांतिकारियों ने शहीदों के शवों को एक गाड़ी में रखकर एक भव्य जुलूस निकाला।

शवों के जुलूस में उत्तेजित जनता राजतंत्र का अंत करने पर उतारू हो गई और ‘सुधार जिंदाबाद’ के नारों का स्थान ‘गणतंत्र जिंदाबाद’ के नारों ने ले लिया।

हेजेन के अनुसार इस घटना ने राजतंत्र का सितारा डुबो दिया।
24 फरवरी को पूरे फ्रांस में उपद्रव और संघर्ष शुरू हो गया।

24 फरवरी को फ्रांस की जनता ने राजमहल को घेर लिया और सेना ने राजा लुई फिलिप की रक्षा करने से इनकार कर दिया।

अपने बचाव का कोई उपाय न देखकर लुई फिलिप ने अपने पौत्र पेरिस के काउंट के पक्ष में सिंहासन छोड़ दिया।

लुई फिलिप स्मिथ छद्म नाम से भेष बदलकर अपनी पत्नी सहित इंग्लैंड भाग गया और गुइजो ने भी ऐसा ही किया।

फ्रांस की जनता की भीड़ ने राजमहल को लूट लिया और राज सिंहासन को जला दिया।

इसके बाद लामार्टिन की अध्यक्षता में एक अस्थायी सरकार का गठन हुआ।

फ्रांस की इस अस्थायी सरकार (Provisional Government) ने तुरंत गणराज्य की घोषणा की।

1848 ई. की क्रांति के परिणाम (Results of the Revolution of 1848 AD)

1848 की क्रांति का प्रमुख उद्देश्य लुई फिलिप के अप्रगतिशील शासन में सुधारों की माँग थी, किंतु यह सुधारवादी माँग आकस्मिक रूप से गणतंत्र की स्थापना में बदल गई।

1848 की क्रांति के फलस्वरूप फ्रांस के ओर्लियन राजतंत्र (1830-1848) का अंत हो गया और फ्रांस में द्वितीय गणतंत्र (Second Republic) की स्थापना हुई।

1848 की क्रांति के साथ ही फ्रांस में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में समाजवादियों का उदय हुआ, यद्यपि बाद में गणतंत्रवादियों के समक्ष इनका पराभव हो गया।

1848 की क्रांति के परिणामस्वरूप नेपोलियन बोनापार्ट के भतीजे नेपोलियन तृतीय को राष्ट्रपति के चुनाव में भारी सफलता मिली और वह द्वितीय गणतंत्रवादी सरकार (Second Republican Government) का प्रधान बन गया।

इसके अलावा 1848 की क्रांति ने सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर विशेष जोर दिया।

1848 ई. की क्रांति के फलस्वरूप् यूरोपीय देशों के निरंकुश शासन की नींव हिल गई और राजनीतिक विचारों में परिवर्तन की एक लहर पैदा हुई। ।

1848 ई. की क्रांति के फलस्वरूप राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक स्वतंत्रता के विचारों का प्रसार हुआ।

1848 ई. की क्रांति की प्रेरणा से सार्डिनिया, स्विट्जरलैंड, और हालैंड में वैधानिक शासन की मांग को लेकर जन-आंदोलन हुये और उन्हें सफलता भी मिली।

1848 ई. की क्रांति ने सामूहिक चेतना के युग का आरंभ किया और यह सिद्ध किया कि राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक अन्यायों के विरूद्ध लड़ने के लिए जनता किसी नेतृत्व की प्रतीक्षा नहीं करती है।

अन्य देशों में क्रांतियां (Revolutions in other Countries)

1830 की फ्रांसीसी क्रांति की तुलना में 1848 की क्रांति का प्रभाव अधिक व्यापक और प्रभावशाली रहा।

यूरोप में मेटरनिख ने वियना कांग्रेस के द्वारा जो प्रतिक्रियावादी राजनीतिक ढांचा खड़ा किया था, उसकी नींव को 1848 ई. की क्रांति ने हिला कर रख दिया।

1848 की फ्रांसीसी क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोप में कुल मिलाकर 17 क्रांतियां हुई।

कहावत मशहूर हो गई कि जब फ्रांस को छींक आती है तो सारे यूरोप को जुकाम हो जाता है।

फ्रांस के बाद वियेना, हंगरी, बोहेमिया, इटली, जर्मनी, प्रशा, स्विट्जरलैंड, हालैंड आदि में विद्रोह हुए।

1848 की फ्रांसीसी क्रांति की लहर जब आस्ट्रिया पहुंची तो मेटरनिख को त्यागपत्र देकर इंग्लैंड भागना पड़ा।

इसके अलावा बोहेमिया, हंगरी, जर्मनी तथा इटली के राज्यों मे भी विद्रोह और क्रांतियां हुईं।

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