अकबर का प्रशासन (Akbar’s Administration)

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अकबर का प्रशासन

मध्यकालीन मुस्लिम शासकों की भाँति अकबर का प्रशासन भी स्वेच्छाचारी एवं निरंकुशवादी था। अकबर राजत्व के दैवी अधिकार के सिद्धांत में विश्वास करता था। अबुल फजल के अनुसार ‘ईश्वर की दृष्टि में राजत्व से ऊँचा कोई सम्मान नहीं है। यदि राजत्व न होता तो संघर्ष के तूफान का कभी अंत न होता और न स्वार्थी आकांक्षाएँ ही समाप्त होतीं। …… राजत्व ईश्वर से निकला हुआ प्रकाश है और विश्व को आलोकित करने वाली सूर्य-किरण है।’ अबुल फजल आगे लिखता है कि राजत्व को प्राप्त करने वाले के पास हजारों विशेषता होती हैं, जैसे- प्रजा के साथ पिता के समान प्रेम, विशाल हृदय, ईश्वर में विश्वास, प्रार्थना, भक्ति एवं क्षमाशीलता आदि।

अपने शासनकाल में अकबर सदैव प्रजा के हित के लिए चिंतित रहा। यद्यपि वह एक निरंकुश शासक था, किंतु उसकी निरंकुशता प्रबुद्ध थी। उसने अपने युग की परंपराओं से हटकर राजत्व के एक विशिष्ट सिद्धांत को स्थापित करने का प्रयत्न किया। उसने सदैव यह प्रयत्न किया कि वह बिना किसी भेदभाव के अपनी प्रजा के साथ समान व्यवहार करे और अपनी निरंकुशता का प्रयोग प्रजा के हित एवं कल्याण के लिए करे। वह स्वयं को प्रजा के हित के लिए उत्तरदायी समझता था और उसके लिए वह सर्वशक्ति संपन्न था। वह राज्य का प्रमुख संचालक, प्रधान सेनापति एवं न्याय का स्रोत था। 1579 ई. में ‘महजर’ के द्वारा उसे ‘इमाम-ए-आदिल’ स्वीकार किया गया और वह मुस्लिम नियमों का प्रधान व्याख्याकार बन गया। अब राजनीति एवं धर्म दोनों में ही अकबर की प्रधानता स्थापित हो गई। किंतु इससे बादशाह के कार्य एवं दायित्व में भी वृद्धि हुई, जिसके निर्वाह के लिए उसे प्रतिदिन सोलह घंटे कार्य करने पड़ते थे। अबुल फजल बादशाह अकबर के दैनिक कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए लिखता है कि सूर्योदय से दो घंटे पूर्व बादशाह उठता था और स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर सूर्योदय होने पर झरोखा दर्शन देने के लिए जाता, जहाँ बहुत से स्त्री-पुरुष, व्यापारी, दुकानदार, किसान तथा विभिन्न व्यवसायों के लोग बादशाह की एक झलक पाने के लिए एकत्रित रहते थे। इसके द्वारा प्रजा बादशाह के सीधे संपर्क में आती। बादशाह लगभग साढ़े चार घंटे तक उनकी शिकायतें सुनता और उनके निराकरण का आदेश देता था।

अकबर का प्रशासन (Akbar's Administration)
अकबर

झरोखा दर्शन के पश्चात् अकबर डेढ़ घंटे तक ‘दीवाने आम’ में दरबार करता और प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहता था। वहाँ से वह हरम एवं राजमहल के अधिकारियों से मिलता। इसके पश्चात् दोपहर की नमाज संपन्न कर वह भोजन करता और विश्राम के लिए चला जाता था।

अपराह्न में बादशाह पशुओं का निरीक्षण करने के पश्चात् पुनः ‘दीवाने खास’ में दरबार के लिए चला जाता, जहाँ गुप्त एवं महत्त्वपूर्ण विषयों पर अधिकारियों से विचार-विमर्श करता था। संध्या की नमाज के पश्चात् कुछ विश्राम करके वह विद्वानों एवं दार्शनिकों से विभिन्न विषयों पर चर्चा करता था और कुछ समय मनोरंजन में भी व्यतीत करता था। इसके बाद रात्रि की अंतिम नमाज के पश्चात् वह शयनागार में चला जाता था।

आधुनिक काल की भाँति अकबर का कोई मंत्रिमंडल नहीं था, किंतु बादशाह को परामर्श देने और प्रशासन के संचालन के लिए केंद्र में अनेक विभागों की व्यवस्था थी। प्रत्येक विभाग के लिए अधिकारियों की व्यवस्था की गई थी, जिन्हें उस विभाग का ‘सचिव’ अथवा ‘मंत्री’ भी कहा जा सकता है। बादशाह अपने मंत्रियों के परामर्श तथा अधिकारियों के सहयोग से कार्य करता था, किंतु मंत्रियों का परामर्श मानना उसके लिए अनिवार्य नहीं था।  बादशाह उनकी नियुक्ति स्वयं करता और वह ही उन्हें अपदस्थ कर सकता था।

अकबर एक कुशल प्रशासक था। उसने प्रशासन के क्षेत्र में नवीन सुधारों के द्वारा एक संगठित राज्य प्रबंध की बुनियाद स्थापित की। उसने प्रशासकीय ढाँचे को नवीन स्वरूप प्रदान किया। उसने प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से केंद्रीय अधिकारियों के अतिरिक्त साम्राज्य को सूबों (प्रांतों, सरकारों (जिलों), परगनों (तहसीलों एवं ग्रामों) में विभाजित किया था और वहाँ अधिकारियों की नियुक्ति की थी।

केंद्रीय प्रशासन

बादशाह मुगल साम्राज्य का सर्वेसर्वा था। सैनिक तथा असैनिक सारी शक्तियाँ उसके हाथों में केंद्रित थीं। वह सभी विभागों का सर्वोच्च अधिकारी था। दैवी अधिकारों से संपन्न होने के कारण वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य के प्रति अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं था। वह प्रशासन और धर्म, दोनों  का प्रधान था। अकबर ने अपने विशाल साम्राज्य के शासन व्यवस्था में सहयोग देने के लिए केंद्र में अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की थी। अकबर के अधीन पाँच प्रमुख मंत्रियों अथवा अधिकारियों का उल्लेख मिलता है – वकील, वजीर अथवा दीवान, सद्र-उस-सद्र, मीर बख्शी और खान सामाँ।

वकील या प्रधानमंत्री

बादशाह के पश्चात् सबसे महत्त्वपूर्ण पद ‘वकील’ का था, जो प्रशासन के अधिकारियों में सर्वोच्च था। ‘वकील’ का शाब्दिक अर्थ ‘प्रतिनिधि’ होता है अर्थात् ‘वकील’ बादशाह के प्रतिनिधि या प्रधानमंत्री के रूप में उसके सभी अधिकारों का उपयोग कर सकता था। अकबर के प्रारंभिक वर्षों में उसका संरक्षक बैरम खाँ इस पद पर प्रतिष्ठित था। वकील बादशाह और प्रशासन के बीच कड़ी का काम करता था।

बैरम खाँ के पतन के बाद बादशाह अकबर ने मुनीम खाँ को ‘वकील’ के पद पर नियुक्त किया। किंतु अकबर ने धीरे-धीरे ‘वकील’ की शक्ति को सीमित करने का प्रयत्न किया और ‘दीवान’ अथवा ‘वजीर’ की शक्ति में वृद्धि कर उसे इसका प्रतिद्वंदी बना दिया, जिसके फलस्वरूप बाद में ‘वकील’ का पद महत्त्वहीन हो गया।

वजीर या दीवान

 ‘वजीर’ मुगल साम्राज्य में दूसरा महत्त्वपूर्ण अधिकारी था, जो ‘दीवान’ के नाम ने भी जाना जाता था। वजीर प्रशासनिक मामलों के अतिरिक्त वित्त विभाग का प्रधान अधिकारी होता था। ‘वकील’ की अनुपस्थिति में ‘वजीर’ ही प्रधानमंत्री होता था। अकबर ने अपने संरक्षक और वकील बैरम खाँ के कटु अनुभव के बाद अपने किसी भी पदाधिकारी को शक्तिशाली नहीं होने दिया। यही कारण है कि उसने अपने शासनकाल के आठवें वर्ष में एक नया पद ‘दीवान-ए-वज़ीरात-ए-कुल’ की स्थापना की और एक दीवान के स्थान पर कई दीवानों की नियुक्तियाँ की थी। इनमें पहला ‘दीवान-ए-खालसा’ कहलाता था, जो साम्राज्य की खालसा भूमि का प्रबंध करता था। दूसरा ‘दीवान-ए-तन’ था, जो जागीरों एवं वेतन-संबंधी कार्यों की देख-रेख करता था। तीसरा ‘दीवाने बयूतात’ था, जिसका कार्य विभिन्न कारखानों के आय-व्यय का ब्यौरा रखना था। अकबर के दीवानों में मुजफ्फर खाँ, टोडरमल तथा शाहमंसूर के नाम विशेष महत्त्वपूर्ण हैं।

केंद्रीय राजकोष की देख-भाल ‘मुशरिफे खजाना’ नामक अधिकारी करता था, जो ‘दीवान’ के ही अधीन होता था। इसके अतिरिक्त, ‘दीवाने विजारत’ में वाकया नवीस (राजकीय फरमानों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखनेवाला पदाधिकारी), मुस्तौफी (आय-व्यय का निरीक्षक) तथा मुशरिफ (दफ्तर की देखभाल करने वाला) भी होते थे। मीर मुंशी का काम बादशाह की आज्ञा और फरमानों को लिखना और उसका उचित प्रसारण करना था।

मीर बख्शी

‘मीर बख्शी’ मुख्यतः सैन्य विभाग का प्रधान अधिकारी था, किंतु वह प्रधान सेनापति नहीं था। उसका कार्य मुख्यतः सैनिकों की नियुक्ति, उनके वेतन और सैनिक संगठन से संबंधित था। वह मनसबदारों की सूची बादशाह अकबर के समक्ष प्रस्तुत करता था। वह सैनिकों की भर्ती, प्रशिक्षण, उनके शस्त्रों की व्यवस्था, घोड़ों को दागने एवं मनसबदारों के नियंत्रण में रहने वाले सैनिकों का निरीक्षण इत्यादि कार्य करता था। उसकी सहायता के लिए तीन अन्य बख्शी होते थे। इसके अलावा, प्रांतों में भी बख्शी होते थे, जो मीर बख्शी के नियंत्रण में ही कार्य करते थे। प्रांतों में नियुक्त ‘वकियानवीस’ मीर बख्शी को सीधे संदेश देता था।

खाने सामाँ या मीर सामाँ

बादशाह के गृहविभाग का प्रधान अधिकारी ‘खाने सामाँ’ होता था। उसका कार्य शाही रसोईघर तथा राजमहल (शाही हरम) की अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था करने के साथ-साथ बादशाह के अंगरक्षकों की नियुक्ति करना भी था। वह शाही परिवार के संपूर्ण व्यय का ब्यौरा रखता था। राजमहल के सभी कर्मचारी उसके नियंत्रण में कार्य करते थे। मुगल काल में यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण था। अकसर ‘खाने सामाँ’ ही ‘वजीर’ के पद पर नियुक्त किये जाते थे।

सद्र-उस- सुदूर

सद-उस-सुदूर धार्मिक मामलों, धार्मिक धन-संपति एवं दान विभाग के प्रधान अधिकारी के रूप में कई कार्य करता था। एक, वह धार्मिक व्यक्तियों, विद्वानों एवं संतों के पालन-पोषण के निमित्त बादशाह द्वारा दान में दी जाने वाली भूमि का प्रबंधक एवं निर्णायक होता था और नये अनुदानों के लिए प्रार्थना-पत्रों की छानबीन करता था।  दान में दी जाने वाली लगानमुक्त भूमि को ‘सयूरगल’ या ‘मदद-ए-माश’ कहा जाता था। दूसरे, ‘सद्र’ बादशाह को धार्मिक विषयों पर परामर्श दिया करता था। तीसरे, प्रधान काजी (काजी-उल-कुजात) के रूप में ‘सद्र-उस- सुदूर’ मुकदमों की सुनवाई करता था और प्रांतीय तथा स्थानीय काजियों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें भी सुनता था। न्याय के क्षेत्र में बादशाह के बाद उसका दूसरा प्रमुख स्थान था। बादशाह सद्र-उस्-सुदूर की सिफारिश पर ही प्रांतीय एवं स्थानीय काजियों की नियुक्ति करता था। साम्राज्य के प्रमुख ‘सद्र-उस- सुदूर’ को ‘शेख-उल-इस्लाम’ एवं ‘सद्र-ए-कुल’ भी कहा जाता था।

मोहतसिब

‘मोहतसिब’ जन-आचरण निरीक्षण विभाग का प्रधान था। इसका प्रमुख कार्य प्रजा के आचरण को उच्च बनाये रखना था। ‘मोहतसिब’ यह देखता था कि मुसलमान इस्लामी विधि एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जीवन व्यतीत करें और निषिद्ध वस्तुओं का सेवन करें। प्रजा के आचरण की शुद्धता बनाये रखने के लिए अकबर ने नगरों में मदिरा की बिक्री और वेश्याओं के निवास को निषिद्ध कर दिया था। वेश्याओं को नगर से निष्कासित कर एक नये स्थान पर बसाया गया और उसका नाम ‘शैतानपुरी’ रखा गया।

मीर आतिश

‘मीर आतिश’ को ‘दारोगा-ए-तोपखाना’ के नाम से भी जाना जाता था। यह मुगल सेना के तोपखाने का प्रधान होता था।

दरोगा-ए-डाक चौकी

‘दरोगा-ए-डाक चौकी’ सूचना और गुप्तचर विभाग का प्रधान था। इसका प्रमुख कार्य अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की सहायता से साम्राज्य के विभिन्न भागों में होने वाली घटनाओं की जानकारी एकत्र करना और उसकी सूचना बादशाह की सेवा में प्रेषित करना था। साम्राज्य के विभिन्न भागों में डाक को लाने और ले जाने की व्यवस्था भी यही अधिकारी करता था। इस कार्य में ‘दारोगा’ की सहायता के लिए वाकया नवीस, सवानिह निगार, खुफिया नवीस तथा हरकारे होते थे।

इन प्रमुख अधिकारियों के अतिरिक्त केंद्र में ‘मुस्तौफी’ (महालेखापाल), ‘नाजिरे बयुतात’ (कारखानों का अधीक्षक), ‘मीर बहर’ (नवसेना अधिकारी), ‘मीरे दार’ (धन अधीक्षक), ‘दारोगा-ए-टकसाल’ आदि अन्य अधिकारी भी होते थे।

प्रांतीय प्रशासन

प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से अकबर ने 1580 ई. में संपूर्ण साम्राज्य को बारह सूबों (प्रांतों) में विभाजित किया था- आगरा, दिल्ली, इलाहाबाद, अवध, अजमेर, अहमदाबाद, बिहार, बंगाल, काबुल, लाहौर, मुल्तान एवं मालवा। किंतु दक्षिण की विजय के पश्चात् खानदेश, बरार एवं अहमदनगर के तीन सूबे और स्थापित हुये। इस प्रकार मुगल साम्राज्य के अंतर्गत सूबों की संख्या पंद्रह हो गई थी।  अकबर का प्रांतीय प्रशासन केंद्रीय प्रशासन का लघु रूप था। प्रांतीय प्रशासन में निम्नलिखित प्रमुख अधिकारी होते थे-

सिपहसालार (सूबेदार)

प्रत्येक प्रांत में ‘सिपहसालार’ होता था, जो ‘साहिब सूबा’ अथवा ‘सूबेदार’ के नाम से भी जाना जाता था। सूबेदार की सरकारी उपाधि ‘नाजिम’ थी। वह प्रांत में बादशाह का प्रतिनिधि और प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था। उसका प्रमुख कार्य प्रांत में शांति-व्यवस्था स्थापित करना, भूमिकर के संग्रह में सहायता करना और राजकीय नियमों एवं आदेशों का पालन करना था। सूबेदारों को किसी राज्य से संधि करना या सरदारों को मनसब प्रदान करने का अधिकार नहीं था। किंतु अपवाद स्वरूप गुजरात के सूबेदार टोडरमल को अकबर ने यह सुविधा प्रदान की थी। उसके प्रमुख सहायक दीवान, बख्शी, फौजदार, कोतवाल, सद्र आदि होते थे।

‘सिपहसालार’ अथवा ‘सूबेदार’ के पद पर उच्च श्रेणी के मनसबदारों को नियुक्त किया जाता था। प्रांतीय सेना के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में वह सेना का नेतृत्व करता था। बादशाह की ओर से सिपहसालारों को निर्देश था कि वे विद्वानों, सूफियों एवं संतों के प्रति उदारतापूर्ण व्यवहार करें। किसी के धर्म में हस्तक्षेप न करें और धार्मिक विवाद ‘सद्र’ के पास भेज दें। यद्यपि ‘सूबेदार’ फौजदारी मुकदमों का निर्णय करता था, किंतु उसे किसी को मृत्युदंड देने का अधिकार नहीं था। इसके लिए बादशाह की अनुमति लेना आवश्यक था। इसके अतिरिक्त, ‘सिपहसालार’ काजी तथा मीर अदल के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें भी सुनता था। उसे अपने प्रांत की गतिविधियों की संपूर्ण सूचनाएँ बादशाह को भेजनी पड़ती थी।

दीवान

प्रांत का दूसरा प्रमुख अधिकारी ‘दीवान’ होता था, जो एक प्रकार से ‘सूबेदार’ का प्रतिद्वंद्वी होता था। ‘सूबेदार’ तथा ‘दीवान’ एक दूसरे पर कड़ी नजर रखते थे। आरंभ में ‘दीवान की नियुक्ति सूबेदार करते थे, किंतु बाद में उनकी नियुक्ति केंद्रीय दीवान द्वारा की जाने लगी, जिससे प्रांतीय दीवान की सिथति सूबेदार के समकक्ष हो गई। वह केंद्रीय दीवान के निर्देशों के अनुसार प्रांत में राजस्व की वसूली करता था। केंद्र की ओर से प्रांतीय दीवानों को यह निर्देश था कि वे लोगों को गाँवों में बसने तथा कृषि के लिए प्रोत्साहित करें, राजकीय कोष के प्रति सजग रहें, आमिलों पर नियंत्रण रखें, शेष राजस्व किस्तों में वसूलें और तकावी (ऋण) वसूल करें। इस प्रकार दीवान प्रांतों में राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी होता था।

बख्शी

केंद्रीय मीर बख्शी की सिफारिश पर प्रांतों में बख्शी की नियुक्ति की जाती थी और इसका कार्य भी मीर बख्शी के समान ही था। प्रांत में सेना की व्यवस्था करना और उसकी कुशलता को बनाये रखना बख्शी का प्रमुख कार्य था। बख्शी अपने प्रांत में गुप्तचर विभाग के प्रभारी के रूप में भी कार्य करता था और प्रांत की समस्त गतिविधियों की सूचना गुप्त रूप से केंद्र को भेजता था। इसके अलावा, वह केंद्र की सहायता के लिए प्रांतों में सैनिकों की व्यवस्था भी करता था।

कोतवाल

प्रत्येक प्रांत के मुख्यालय में एक ‘कोतवाल’ होता था, जो वस्तुतः नगर पुलिस के प्रधान के रूप में कार्य करता था। कोतवाल की नियुक्ति ‘मीर आतिश’ के सिफारिश पर केंद्रीय सरकार करती थी। यह नगर में घटने वाली समस्त घटनाओं के प्रति उत्तरादायी होता था। ‘मीराते अहमदी’ नामक ग्रंथ में कोतवाल के संबंध में कहा गया है कि, ‘कोतवाल लिपिकों की सहायता से उस स्थान के मकानों एवं भवनों की एक सूची तैयार करे, उसमें प्रत्येक मकान में रहने वाले निवासियों का नाम लिखे तथा इस बात का भी उल्लेख करे कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं; उनमें से कितने लावारिश हैं, कितने कारीगर हैं, कितने सैनिक हैं, कितने दरवेश हैं। प्रतिदिन एवं प्रति रात जासूस कोतवाल के कार्यालय में आकर प्रत्येक मुहल्ले की घटनाओं के कारणों को दर्ज करायें। एक अतिथि के आगमन पर, चाहे वह संबंधी हो अथवा अपरिचित, उसकी सूचना उस मुहल्ले के मुखिया को हो जानी चाहिए। कोतवाल को प्रत्येक व्यक्ति के आय-व्यय के संबंध में जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि जब एक व्यक्ति अपनी आय से अधिक व्यय करता है, तो यह निश्चित है कि वह भ्रष्टाचार कर रहा है। उसे बाजारों में वस्तुओं का मूल्य निश्चित कर देना चाहिए और अधिक क्रय अथवा थोड़ा विक्रय का एकाधिकार स्थापित करने से धनिकों को वंचित कर देना चाहिए। कोतवाल को अपने क्षेत्र में शराब बेचना और पीना बंद करवा देना चाहिए।’ अपराधियों को दंड देने में असमर्थ होने पर कोतवाल को हर्जाना देना पड़ता था।

सद्र

प्रांतों में ‘सद्र’ की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती थी। इस पद पर उच्चकोटि के विद्वानों एवं पवित्र आचरण वाले व्यक्तियों की ही नियुक्त किया जाता था। ‘सद्र’ प्रांत में धार्मिक संस्थाओं, संतों एवं विद्वानों को दी गई भूमि (सयूरगाल) का प्रभारी होता था और इसके संबंध में समस्त सूचना केंद्र को भेजता था। वह काजी के रूप में धार्मिक विवादों का निपटारा करता था। उसकी सहायता के लिए ‘मीर अदल’ तथा स्थानीय काजी भी होते थे। इस प्रकार प्रांत में ‘सद्र’ एक सम्मानित पदाधिकारी था।

खबरनवीस

खबरनवीस चार प्रकार के होते- वाकयानवीस सवानिह निगार, खुफियानवीस और हरकारा। वाकयानवीस जन संवाददाता था, जबकि सवानिह निगार केवल महत्त्वपूर्ण घटनाओं के संबंध में एक गुप्त संवाददाता के रूप में कार्य करता था। प्रत्येक सैन्य क्षेत्र, प्रांत तथा बड़े नगरों से संबंधित एक वाकयानवीस तथा विशेष स्थानों पर कभी एक सवानिह निगार होता था। इसका उद्देश्य था कि सवानिह निगार जासूस का कार्य करते हुए वाकयानवीस पर नियंत्रण रखे।  खुफिया नवीस गुप्तचर की भाँति कार्य करता था।

प्रांतों में नियुक्त हरकारों को सूबेदार के समक्ष प्रांत के समाचारों और वृत्तांतों का विवरण प्रस्तुत करना पड़ता था। वाकयानवीसों को सप्ताह में एक बार, सवानिह निगारों को दो बार तथा हरकारों को महीने में एक बार समस्त सूचनाएँ केंद्र को भेजनी होती थी। इसके अतिरिक्त, आवश्यक सूचनाओं को तुरंत भेज दिया जाता था।

मीर बहर

प्रांतों में ‘मीर बहर’ नामक अधिकारी होता था, जिसका प्रमुख कार्य सेना को नदी पार करने के लिए पुलों और नावों की व्यवस्था करना था। बंदरगाहों एवं नदियों की चुंगी आदि की व्यवस्था करना भी मीर बहर का ही कार्य था।

सरकार का प्रशासन

प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से मुगल साम्राज्य के सूबों (प्रांत) को आधुनिक जिलों के समान अनेक ‘सरकारों’ में विभाजित किया गया था। ‘सरकार’ के प्रशासन के लिए निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किये गये थे-

फौजदार

‘सरकार’ का प्रमुख अधिकारी ‘फौजदार’ होता था, जिसकी नियुक्ति शाही आदेश द्वारा की जाती थी और वह ‘सरकार’ में सूबेदार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता था। ‘सरकार’ में शांति एवं व्यवस्था के लिए ‘फौजदार’ उत्तरदायी होता था। वह अपने ‘सरकार’ में शाही आदेशों को कार्यान्वित करता था और भूमिकर की वसूली में ‘अमलगुजार’ की सहायता करता था। वह ‘सरकार’ की सेना एवं पुलिस पर नियंत्रण भी रखता था।

अमलगुजार

‘सरकार’ में राजस्व का प्रमुख अधिकारी ‘अमलगुजार’ होता था, जो केंद्र द्वारा नियुक्त किया जाता था। इसका प्रमुख कार्य भूमिकर निर्धारित कर उसकी वसूली करना और भ्रष्ट कृषकों को दंड देना था। ‘सरकार’ के अंतर्गत ‘सयूरगाल’ भूमि की देख-रेख करना भी उसका दायित्व था। राजस्व संबंधी कार्यों के लिए उसके अधीन कई सहायक अधिकारी होते थे। अमलगुजार ‘सरकार’ के भूमि-मापन और भूमिकर का विवरण केंद्र को भेजता था। इसके अतिरिक्त, राजस्व के रूप में इकट्ठा की गई धनराशि शाही खजाने में जमा करता था। वह राजस्व विभाग के अन्य अधिकारियों के लेखा-जोखा का निरीक्षण भी करता था।

बितिकची

‘अमलगुजार’ के बाद ‘सरकार’ में राजस्व विभाग का दूसरा प्रमुख अधिकारी ‘बितिकची’ होता था। उसे सरकार के राजस्व संबंधी मामलों की पूरी जानकारी होती थी। उसके पास भूमि की पैमाइश, भूमि की श्रेणी तथा उपज आदि का पूरा ब्यौरा होता था, जिसके आधार पर ‘अमलगुजार’ भूमिकर निर्धारित करता था। उसे प्रत्येक ऋतु के भूमिकर का ब्यौरा तथा वार्षिक भूमिकर का विवरण ‘अमलगुजार’ के सम्मुख प्रस्तुत करना पड़ता था।

काजी

प्रत्येक ‘सरकार’ में एक ‘काजी’ की व्यवस्था थी, जिसकी नियुक्ति ‘सद्र-उस्-सुदूर’ द्वारा की जाती थी। काजी इस्लाम के नियमों के अनुसार धार्मिक विवादों का निस्तारण करता था। इस्लामी नियमों की व्याख्या के लिए ‘मुफ्ती’ होता था, जो उसके सहायक के रूप में कार्य करता था।

खजानदार

प्रत्येक ‘सरकार’ में एक ‘खजानदार’ होता था, जो कोषागार का प्रभारी होता था। इसके पास भूमिकर की धनराशि जमा की जाती थी, जिसे वह केंद्रीय राजकोष को भेजता था। किंतु प्रांतीय दीवान की अनुमति के बिना वह कोई धनराशि व्यय नहीं कर सकता था।

परगना का प्रशासन

प्रत्येक ‘सरकार’ (जिला) अनेक परगनों में विभाजित था। वास्तव में, कई गाँवों को सम्मिलित कर उसे ‘परगने’ का नाम दिया गया था, जो आज की तहसीलों की तरह थे। इस प्रकार परगने के अंतर्गत ग्राम होते थे, जो प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थे। शेरशाह के परगना प्रशासन में अकबर ने कुछ सुधार किये थे। परगना का प्रशासन निम्नलिखित अधिकारियों द्वारा संचालित किया जाता था-

शिकदार

परगने का प्रधान अधिकारी ‘शिकदार’ कहलाता था, जो वहाँ की शांति एवं सुव्यवस्था के लिए उत्तरदायी था। वह ‘फौजदार’ के अधीन कार्य करता था। किसानों से राजस्व की वसूली में वह आमिल की सहायता करता था। इसके अतिरिक्त, शिकदार परगने में न्यायाधीश के रूप में फौजदारी मुकदमों का निर्णय भी करता था।

आमिल

प्रत्येक परगने में एक ‘आमिल’ होता था, जो भूमिकर का निर्धारण और उसकी वसूली करता था। दरअसल परगना में ‘आमिल’ का वही कार्य था, जो ‘सरकार’ में ‘अमलगुजार’ का होता था। परगना में ‘शिकदार’ और ‘आमिल’ एक दूसरे पर आश्रित होते थे। ‘आमिल’ कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने में ‘शिकदार’ की सहायता करता था, तो ‘शिकदार’ भूमिकर की वसूली में ‘आमिल’ की मदद करता था। आमिल के अधीन उसकी सहायता के लिए ‘कारकुन’ (लिपिक) होते थे।

कानूनगो

प्रत्येक परगने में ‘कानूनगो’ की नियुक्ति की गई थी, जो साधारण रूप से व्यवह्त होने वाले नियमों और प्रथाओं का एक चलता-फिरता कोष तथा कार्यवाहियों से संबंधित सूचनाओं, पूर्व दृष्टांतों, अतीत के भू-इतिहासों आदि का भंडार था।’ कानूनगो परगने की उपज और भूमिकर की जमा तथा बकाया धनराशि का विवरण रखता था। उसकी सहायता के लिए अनेक ‘पटवारी’ होते थे।

फोतदार

सरकार के ‘खजानादार’ की तरह परगने में ‘फोतदार’ की व्यवस्था थी, जो कोषागार का प्रभारी होता था। यह राजस्व के रूप में प्राप्त होने वाली धनराशि को एकत्रित कर उसे नियमित रूप से ‘सरकार’ के मुख्यालय को भेजता था।

गाँव का प्रशासन

प्रत्येक परगने के अंतर्गत अनेक गाँव होते थे। गाँवों को ‘मवदा’ या ‘दीह’ भी कहते थे। ‘मवदा’ के अंतर्गत छोटी-छोटी बस्तियों को ‘नागला’ कहा जाता था।

अकबरकालीन गाँवों को प्रशासन में पर्याप्त स्वयत्ता प्राप्त थी। गाँव का प्रधान अधिकारी ‘खूत’, ‘मुकद्दम’ या ‘चौधरी’ कहलाता था, जो भूमिकर की वसूली में राजस्व विभाग के कर्मचारियों की सहायता करता था। ‘मुकद्दम’ गाँव में शांति एवं सुव्यवस्था की स्थापना के लिए भी उत्तरदायी होता था।

गाँव का दूसरा अधिकारी ‘पटवारी’ होता था, जो गाँव की समस्त भूमि का ब्यौरा रखता था। यह राजस्व विभाग का सबसे निम्न अधिकारी होता था। किंतु गाँव के प्रशासन में उसका अत्यधिक महत्त्व था। अबुल फजल ने ग्राम प्रशासन के संबंध में कोई सूचना नहीं दी है। संभवतः अकबर ने पहले से चले आ रहे ग्राम-प्रशासन को मान्यता दी थी और उनमें  कोई हस्तक्षेप नहीं किया था।

अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था

अकबर के भू-राजस्व संबंधी सुधारों का विशेष महत्त्व है। यद्यपि उसके भूमि-संबंधी सुधार मौलिक नहीं थे क्योंकि उन्हें सर्वप्रथम शेरशाह सूरी ने स्थापित किया था। शेरशाह ने भूमि की पैमाइश कराई थी और उपज का तिहाई भाग भूमिकर निर्धारित किया था, किंतु उसकी मृत्य के बाद साम्राज्य में व्याप्त अराजकता के कारण उसके भू-राजस्व संबंधी सुधार विनष्ट हो गये। फलतः अकबर ने शेरशाह की भू-राजस्व संबंधी सुधारों को पुनर्जीवित कर उन्हें विकसित रूप में कार्यान्वित करने का निश्चय किया।

अकबर ने 1560 ई. में अब्दुल मजीद आसफ खाँ को ‘दीवान’ (वित्तमंत्री) के पद पर नियुक्त किया। उसने अमीरों को खुश रखने के लिए उनकी जागीरों का काल्पनिक आकड़ा तैयार किया जिससे भविष्य में अनेक कठिनाई उत्पन्न हुई और साम्राज्य की राजस्व व्यवस्था त्रुटिपूर्ण हो गई। अतः अकबर ने 1563 ई. में एत्माद खाँ को खालसा भूमि की व्यवस्था के लिए नियुक्त किया, जो शेरशाह और इस्लामशाह सूर की सेवा में रह चुका था। उसने शाही भूमि (खालसा) को जागीर भूमि से अलग किया, किंतु राजस्व निर्धारण के संबंध में कोई परिवर्तन नहीं किया और शेरशाह के समय से चली आ रही राजस्व अनुसूचियों को जारी रखा। उसने राजधानी के निकटवर्ती क्षेत्रों के मूल्यों को आधार मानकर संपूर्ण साम्राज्य के भूमिकर को नकदी में परिवर्तित किया, वित्त विभाग को संगठित करने का प्रयास किया और मुद्राओं को उनके वास्तविक मूल्यों में प्रसारित किया।

1564 ई. में अकबर ने मुजफ्फर खाँ तुरबती को दीवान (वित्तमंत्री) बनाया और टोडरमल को उसके सहायक के रूप में नियुक्त किया। मुजफ्फर खाँ ने काल्पनिक ऑकड़ों के स्थान पर वास्तविक उपज के आकड़े एकत्रित कराने का निश्चय किया। इस कार्य के लिए उसने कानूनगो नियुक्त किये और वास्तविक आँकड़ों के आधार पर लगान (भूमिकर) का ‘जमाय हाल हासिल’ नामक एक नवीन लेखा खुलवाया। किंतु यह लेखा भी अधिक विश्वसनीय नहीं था क्योंकि यह लोगों की सूचनाओं पर आधारित था और इसमें कानूनगो लोगों ने अनुमान से काम लिया था।

अकबर ने 1568 ई. में शिहाबुद्दीन अहमद को भूमि का दीवान नियुक्त किया। उसने प्रति वर्ष लगान निर्धारण (जब्ती हरसाला) की व्यय-साध्य प्रणाली के स्थान पर ‘नस्क प्रणाली’ चालू की, जिसके द्वारा शासन तथा भूमिपति के मध्य पारस्परिक बंदोबस्त की व्यवस्था की गई। यह एक प्रकार की ठेकेदारी व्यवस्था थी, इसलिए यह प्रणाली भी संतोषप्रद नहीं थी।

जब 1570-71 ई. में मुजफ्फर खाँ तुरबती दूसरी बार दीवान (वित्त) नियुक्त किया गया तो उसने लगान संबंधी संपूर्ण व्यवस्था को पुनर्गठित करने का फैसला किया। इस कार्य में उसे राजा टोडरमल से बहुत सहयोग मिला। अब मुजफ्फर खाँ ने भूमि की पैमाइश और उसकी उपज के आधार पर लगान निर्धारित करने का निर्णय लिया।

गुजरात विजय (1573 ई.) के बाद अकबर ने भी भूमि व्यवस्था में स्वयं रचि लेना आरंभ किया। उसने जागीर भूमि को कम करके साम्राज्य का एक बड़ा भाग खालसा भूमि में परिवर्तित कर दिया। लगान के निर्धारण के लिए भूमि की पैमाइश आवश्यक थी। पैमाइश के लिए अकबर ने सिकंदर लोदी के समय के गज को अपनाया, किंतु उसमें जूट की रस्सी के स्थान पर लोहे की कड़ियों से जुड़े बाँस के कमचियों का प्रयोग किया, जो रस्सी की भाँति घट-बढ़ नहीं सकता था। इसका नाम ‘जरीब’ रखा गया। इसके द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों, राजपूत राज्यों, बिहार, बंगाल एवं मुल्तान को छोड़कर अन्य सभी भागों में भूमि की पैमाइश कराई गई।

करोड़ी

साम्राज्य की खालसा भूमि पर 182 ‘करोड़ी’ नियुक्त किये गये। प्रत्येक ‘करोड़ी’ के अधीन इतना क्षेत्र होता था, जिससे एक करोड़ टंके अर्थात् दो लाख पचास हजार रुपये राजस्व के रूप में प्राप्त हो सके। ‘करोड़ी’ का कार्य अपने क्षेत्र की सीमाएँ निर्धारित करना, भू-राजस्व के विभिन्न साधनों का लेखा तैयार करना तथा प्रत्येक साधन से प्राप्त धनराशि और प्रत्येक फसल का ब्यौरा रखना था। ‘करोड़ी’ की सहायता के लिए ‘कारकुन’ तथा ‘फोतदार’ नियुक्त थे। 1580 ई. तक राजस्व विभाग के पास पर्याप्त आँकड़े और सूचनाएँ एकत्रित हो गईं। यद्यपि इस समय दीवान के पद पर राजा टोडरलमल नियुक्त था, किंतु राजस्व संबंधी सभी सुधार उसके सहयोगी ख्वाजा शाहमंसूर द्वारा कार्यान्वित किये गये। सर्वप्रथम, साम्राज्य को बारह प्रांतों (सूबों)- मुल्तान, लाहौर, दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, अवध, बिहार बंगाल, मालवा, अजमेर, गुजरात और काबुल- में विभाजित किया गया और प्रत्येक प्रांत में राजस्व संबंधी कार्यों के लिए ‘दीवान’ नियुक्त किये गये।

भूमिकर निर्धारण और भूमि के प्रकार

भूमिकर निर्धारण के लिए भूमि को फसल के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया गया- पोलज, परती, चाचर और बंजर।

‘पोलज’ वह भूमि थी, जिसमें प्रतिवर्ष दो फसल होती थी। ‘परती’ भूमि वह थी, जिसे एक फसल के बाद परती छोड़ दिया जाता था ताकि उसमें उपजाऊ शक्ति आ सके। ‘चाचर’ भूमि तीन-चार वर्षों तक जोती-बोई नहीं जाती थी। ‘बंजर’ वह भूमि थी, जिसे पाँच अथवा अधिक वर्षों तक परती रखा गया था।

पहली दो प्रकार की भूमियों अर्थात् ‘पोलज’ और ‘परती’ को उत्तम, मध्यम एवं निकृष्ट तीन श्रेणियों में बाँटा गया और इन तीनों श्रेणियों से उपज के औसत आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया गया। उदाहरणार्थ, यदि प्रथम श्रेणी की पोलज भूमि से 10 मन प्रति बीघा, द्वितीय श्रेणी की ‘पोलज’ भूमि से 25 मन प्रति बीघा तथा निकृष्ट श्रेणी से 20 मन प्रति बीघा की फसल होती है, तो ‘पोलज’ भूमि से औसत फसल 25 मन प्रति बीघा हुई। इसी प्रकार ‘परती’ भूमि की उपज का भी अनुमान किया जाता था। इस औसत फसल का एक तिहाई भाग भू-राजस्व के रूप में वसूल किया जाता था।

‘चाचर’ भूमि से पहले वर्ष राज्य के भाग का 1/5, दूसरे वर्ष 3/5, तीसरे तथा चौथे वर्ष 4/5 एवं पाँचवें वर्ष पूर्ण भू-राजस्व लिया जाता था। ‘बंजर’ भूमि से भी पहले कम और फिर क्रमशः अधिक भू-राजस्व वसूल किया जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि भूमि को उपजाऊ बनाने में कृषकों को प्रोत्साहन मिल सके।

आइने दहसाला

उपज के एक तिहाई भाग को नकद रूप में परिवर्तित करने के लिए प्रतिवर्ष विभिन्न अनाज के बाजार भाव को एकत्रित किया जाता था, किंतु यह व्यवस्था असुविधाजनक थी और इससे वसूली में विलंब होता था। अंततः अकबर ने 1500 ई. में ‘आइने दहसाला’ (दसवर्षीय नियम) की व्यवस्था की। इसके अनुसार राज्य का भाग उपज का एक तिहाई ही रहा, किंतु एक तिहाई का नकद रूप 1580 ई. के पिछले दस वर्षों (1571-1580 ई.) तक के बाजार भावों का औसत निकाल कर निश्चित किया गया।

आइने दहसाला’ (दसवर्षीय नियम) के अनेक लाभ थे। अब भू-राजस्व को नकद रूप में जमा करना आसान हो गया, जिससे वसूली में विलंब होने की संभावना भी समाप्त हो गई। इससे कृषकों को पहले से ही यह पता रहता था कि उन्हें कितना भू-राजस्व देना है। साथ ही राज्य को भी भू-राजस्व से होने वाली आय का पहले से अनुमान हो जाता था।

‘आइने दहसाला’ (दसवर्षीय नियम) को लागू करने के बाद राजस्व विभाग के अधिकारियों को ईमानदारी के साथ भू-राजस्व की वसूल करने और उसका विवरण नियमित रूप से भेजने का निर्देश दिया गया। प्राकृतिक आपदा के कारण फसलों को नष्ट होने की दशा में किसानों को सुविधाएँ देने का भी आश्वासन दिया गया। उनके भू-राजस्व में कटौती कर दी जाती थी अथवा भू-राजस्व माफ कर दिया जाता था।

भू-राजस्व निर्धारण की प्रणालियाँ

अकबर के शासन काल में भू-राजस्व निर्धारण के लिए तीन प्रणालियाँ प्रचलित थीं- जब्ती, नस्क और गल्लाबख्शी या बटाई ।

जब्ती प्रणाली

‘जब्ती प्रणाली’ के अंतर्गत भूमि की पैमाइश की जाती थी और उपज से आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। जब्ती प्रणाली बिहार, इलाहाबाद, मालवा, अवध, आगरा, लाहौर, दिल्ली और मुल्तान आदि प्राप्तों में प्रचलित थी।

नस्क प्रणाली

‘नस्क प्रणाली’ के अंतर्गत न तो भूमि की पैमाइश होती थी और न ही फसलों का सामयिक विवरण तैयार किया जाता था। यह राज्य और कृषक अथवा भूस्वामी के मध्य मोटे अनुमान पर आधारित शुद्ध एवं सरल समझौता था। नस्क प्रणाली प्रणाली बंगाल, काठियावाड़ एवं गुजरात के कुछ भाग में प्रचलित थी।

गल्लाबख्शी या बटाई प्रणाली

‘गल्लाबख्शी या बटाई प्रणाली’ के अंतर्गत शासन की ओर से उपज का एक भाग लिया जाता था। बटाई या गल्लाबख्शी तीन वर्गो में विभाजित थीं – भौली बटाई ,खेत बटाई और लंक बटाई। भौली बटाई के अंर्तगत फसल को काटकर इकठ्ठा कर लिया जाता था, फिर उसे सभी हिस्सेदारों की उपस्थिति में बाँट दिया जाता था। खेत बटाई व्यवस्था के अंर्तगत रोपाई के बाद ज़मीन को कई हिस्सों में बाँट दिया जाता था, और लंक बटाई में फसल को बहुत से ढेरों में बाँट दिया जाता था। बटाई व्यवस्था के अंर्तगत किसान नकद या वस्तुओं में भुगतान कर सकते थे, लेकिन नकदी फसलों के मामले में केवल नकद रकम ही वसूल की जाती थी। यह प्रणाली दक्षिणी सिंध, काबुल के कुछ भागों तथा कश्मीर में प्रचलित थी।

अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था की यह प्रमुख विशेषता यह थी कि ‘अमलगुजार’ प्रत्येक कृषक को एक पट्टा लिखकर देता था, जिसमें उसकी भूमि तथा उससे लिये जाने वाले भू-राजस्व का उल्लेख रहता था। इसके बदले में कृषक उसे ‘कबूलियत’ देता था, जो एक प्रकार का ‘स्वीकृति-पत्र’ होता था।

सयूरगल में सुधार

अकबर ने ‘सयूरगल’ में भी सुधार किया। ‘सयूरगल’ एक प्रकार का भू-दान था, जो विद्वानों, साधु-संतों, भूखों, अपाहिजों एवं विधवाओं की सहायता के लिए दिया जाता था। सयूरगल को ‘मिल्क’ तथा ‘मद्दे मआश’ भी कहा जाता था।

अकबर के शासन के आरंभिक वर्षों में सयूरगल की व्यवस्था शेख गदाई के हाथों में थी, जो सद्र-उस्-सुदूर के पद पर था। किंतु उसके पक्षपातपूर्ण व्यवहार के कारण बादशाह ने 1565 ई. में शेख अब्दन्नबी को ‘सद्र’ नियुक्त किया। अकबर ने उसे सयूरगलों की जाँच करने और आवश्यकतानुसार वित्तमंत्री की सहायता से पुनः वितरण का आदेश दिया। उसने पहले तो अफगानों को दी गई भूमि को खालसा (शाही भूमि) में परिवर्तित किया, किंतु बाद में उसने भूमिदान देना आरंभ कर दिया। फलतः 1575 ई. में अकबर ने सयूरगल की जाँच करने के लिए करोड़ियों को नियुक्त किया और उन्हें आदेश दिया कि वे उन दान-पत्रों को न मानें, जिनपर ‘सद्र’ के प्रतिहस्ताक्षर न हो। अब दानग्राहियों को दान-पत्रों पर हस्ताक्षर कराने के लिए राजधानी जाना पड़ा, जहाँ उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। ‘सद्र’ के विरुद्ध इतनी शिकायतें आईं कि अकबर ने शेख फरीद बुखारी से इसकी जाँच करवाई, जिससे पता चला कि भूमि-वितरण में अनियमितता हुई थी और अनेक पात्रों को कोई सहायता नहीं मिल सकी थी।

इसके अलावा, शाही जागीर और सयूरगल भूमियों के एक दूसरे के साथ मिले-जुले होने के कारण भी विवाद होते रहते थे। अकबर ने शेख अब्दुन्नबी को अपदस्थ कर सुल्तान ख्वाजा को ‘सद्र’ के पद पर नियुक्त किया और आदेश दिया कि सयूरगल के लिए प्रत्येक परगने में निर्दिष्ट भूमि रहे और किसी भी दान-पात्र के आधीन एक से अधिक भूमि न रहे। पाँच सौ बीधे से अधिक सयूरगल धारकों को दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया गया। अकबर ने उनकी योग्यता और आवश्यकता के अनुसार पुनर्विचार कर सयूरगल (भू-दान) की मात्रा का निर्णय किया। 1580 ई. में बादशाह ने सूबों का गठन करते समय प्रत्येक सूबे में एक ‘सद्र’ की नियुक्ति की, जो सयूरगल की व्यवस्था देखता था।

जहाँ एक ओर बादशाह अकबर ने राजस्व में वृद्धि की, वहीं दूसरी ओर उसने किसानों की सुविधाओं की ओर भी ध्यान दिया। राजस्व विभाग के कर्मचारियों को आदेश था कि वे किसानों के हितों की रक्षा करें और उन्हें खेती के लिए प्रोत्साहित करें। किसानों को तकावी (ऋण) तथा सिंचाई की सुविधाएँ भी प्रदान की गईं। फसल के खराब होने अथवा अकाल आदि के कारण फसल के नष्ट हो जाने की दशा में किसानों के भू-राजस्व में छूट दी जाती थी।

अकबर ने जजिया, जकात और तीर्थयात्रा कर को समाप्त कर दिया। इसके अतिरिक्त बाजारों, सरायों एवं पशुओं की बिक्री संबंधी करों का भी अंत कर दिया। किसानों को शोषण से बचाने के लिए नजराना की प्रथा को भी बंद कर दिया गया। उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे किसानों से नज़राना के रूप में कोई धनराशि अथवा भेंट न स्वीकार करेंगे।

यद्यपि अकबर ने किसानों को अत्यधिक माँगों से और राज्य को धन की हानि से बचाने के प्रयास में अधिक कुशल राजस्व संग्रह की व्यवस्था की। किंतु यह व्यवस्था केवल केंद्र सरकार द्वारा सीधे प्रशासित क्षेत्रों में ही लागू की जा सकी थी। यह व्यवस्था अधीनस्थ शासकों, जैसे- राजपूतों के अधीन भूमि और मुगल अधिकारियों के रखरखाव के लिए सौंपी गई भूमि पर लागू नहीं हो सकी। फिर भी, अकबर के सुधारों के बावजूद, यात्रियों के विवरणों से संकेत मिलता है कि भारतीय किसान दरिद्र बने रहे, जबकि अभिजात वर्ग के पास बहुत अधिक संपत्ति थी। ।

अकबर ने अपने शासनकाल में दरिद्रों एवं अनाथों को मुफ्त भोजन देने के लिए ‘धर्मपुरा’ (हिंदुओं के लिए), ‘जोगीपुरा’ (जोगियों के लिए) और ‘खैरपुरा’ ( मुसलमानों तथा अन्य के लिए) नाम के तीन ‘दरिद्रालय’ खुलवाये, जिनकी देखरेख का उत्तरदायित्व अबुल फजल को दिया गया था।

सैनिक संगठन

अकबर के शासन के आरंभिक वर्षों में सैनिक व्यवस्था में अनेक त्रुटियाँ थीं। सेनापतियों को स्वयं अपने तथा अधीनस्थ सवारों के वेतन के रूप में जागीरें दी जाती थीं और सेनापति ही सवारों की नियुक्ति करता था। इसका परिणाम यह होता था कि सेनापति न तो अच्छे घोड़े रखते और न ही अच्छे सवार। यही नहीं, वे कभी-कभी निरीक्षण के समय घोड़ों को बदल देते थे, जिससे घुड़सवार सेना की कुशलता प्रभावित होती थी। इन समस्याओं से निपटने के लिए अकबर ने 1573 ई. में घोड़ों को दागने की प्रथा का पुनः प्रचलन किया, ताकि सेनापति अपने घोड़े न बदल सकें और एक घोड़े को दो बार न प्रस्तुत कर सकें। इसके बाद अकबर ने अपने सैनिक संगठन के लिए एक नवीन ‘मनसबदारी व्यवस्था’ का प्रचलन किया।

मनसबदारी व्यवस्था

मनसबदारी प्रथा मंगोल सरदार चंगेज खाँ द्वारा प्रतिपादित दशमलव प्रणाली पर आधारित थी। भारत में सेना में दशमलव प्रणाली का प्रचलन तुर्कों के समय से ही था। जिस अधिकारी के अंतर्गत 10 सवार होते थे, वह ‘सरखेल’ कहलाता था; 1000 घुड़सवारों का नेता ‘अमीर’ और 10 हजार घुड़सवारों का नेता ‘मलिक’ कहा जाता था। सिकंदर लोदी तथा इब्राहीम लोदी के शासनकाल में मलिकों के अंतर्गत सैनिकों की संख्या 12 हजार तक पहुँच गई थी। बाबर और हुमायूँ के काल में मनसबदारी प्रथा थी या नहीं, इस संबंध में अभी तक कुछ ज्ञात नहीं है। शेरशाह के काल में शुजाअत खाँ का वर्णन मिलता है, जो 10 हजार सवारों का अमीर था। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत की स्थापना से लेकर शेरशाह के काल में मनसबदारों के अधीन 10 से लेकर 12 हजार तक सैनिक होते थे, जिसमें घुड़सवार और पैदल दोनों ही सम्मिलित थे। मुगल प्रशासन में सर्वप्रथम अकबर ने मनसबदारी प्रथा 1577 ई, में आरंभ की, यद्यपि अकबर के शासनकाल के 19वें वर्ष (1575 ई.) में पहली बार मनसब प्रदान किये जाने का संकेत मिलता है।

‘मनसब’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थं होता है-‘श्रेणी’ अथवा ‘पद’। ‘मनसब’ शब्द किसी शासकीय अधिकारी तथा सेनापति की स्थिति का बोध कराती थी। अकबर ने अपने प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को कोई-न-कोई मनसब (पद) दिया था। ‘मनसब’ से अधिकारी का पद, स्थान और वेतन निर्धारित होता था। सभी मनसबदारों को एक घुड़सवार के लिए दो घोड़े रखने अनिवार्य होते थे। किसी भी मनसबदार को ‘जात’ पद के अनुसार ही ‘सवार’ रखने की अनुमति थी। मनसब के आधार पर ही अधिकारियों के वेतन और भत्ते निर्धारित होते थे।

मनसबदारी व्यवस्था का उद्देश्य
  1. मुगल साम्राज्य का सुदृढीकरण करना।
  2. मुगल अभिजात्य एवं कुलीन वर्ग को प्रशासन में शामिल करना और इसके माध्यम से राज्य के प्रति उनकी वफादारी सुनिश्चित करना।
  3. सैनिक-असैनिक सेवाओं का कुशलतापूर्वक संचालित करना।
जात और सवार

मनसबों के वर्गीकरण के लिए ‘जात’ और ‘सवार’ विशेषणों का प्रयोग किया गया है। यद्यपि 1593 ई. तक केवल ‘जात’ का प्रयोग किया गया, किंतु 1594 ई. में मनसबदारी व्यवस्था ‘जात’ पद के साथ ‘सवार’ का पद भी दिया जाने लगा। ‘जात’ और ‘सवार’ के संबंध में इतिहासकारों के विभिन्न मत हैं। ब्लॉकमैन के अनुसार ‘जात’ का अर्थ सैनिक पद से तथा ‘सवार’ का अर्थ घुड़सवारों की संख्या से था जो मनसबदार को रखनी पड़ती थी। आर.पी. त्रिपाठी का मानना है कि ‘जात’ का अर्थ सवारों की वास्तविक संख्या से था और ‘सवार’ एक अतिरिक्त सम्मान था, जिसके अनुसार अतिरिक्त भत्ता मिलता था। किंतु अब्दुल अजीज के अनुसार ‘जात’ के अंतर्गत मनसबदार को एक निश्चित संख्या में हाथी, घोड़े, भारवाहक पशु तथा वाहन रखने पड़ते थे, जबकि ‘सवार’ घुडसवारों की वास्तविक संख्या प्रकट करता था। दूसरे शब्दों में, ‘जात’ शब्द से व्यक्ति के वेतन तथा पद की स्थिति का बोध होता था, जबकि ‘सवार’ शब्द से घुङसवार दस्ते की संख्या का बोध होता था, जो किसी मनसबदार को अपने अधीन रखने का अधिकार होता था।

मनसबदारों की नियुक्ति

मनसबदारों की नियुक्ति सम्राट स्वयं करता था और उसकी इच्छा रहने तक वे पद पर बने रह सकते थे। इस व्यवस्था में ‘मीरबख्शी’ मनसबदारों की सूची सम्राट के सम्मुख प्रस्तुत करता था और मनसबदारों को जागीर आवंटन करने का कार्य ‘दीवान-ए-आला’ करता था। मनसब 10 से लेकर 12 हजार तक प्रदान किये गये थे। अकसर सात हजार का मनसब राजघराने के लोगों या बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विश्वसनीय सरदारों, जैसे- राजा मानसिंह, मिर्जा शाहरुख और मिर्जा अजीज कोका को ही दिया गया था। ने शहजादा सलीम को 12 हजार का मनसब प्रदान किया था। मनसबदारों को किसी भी प्रशासनिक, सैनिक पद पर या बादशाह के व्यक्तिगत सेवा में रखा जा सकता था।

500 से 2500 तक के मनसबदार ‘अमीर’ कहलाते थे और इससे ऊपर के मनसबदारों को ‘अमीरे आजम’, ‘खाने आजम’ एवं ‘खानेखाना’ आदि उपाधियों से सम्मानित किया जाता था। सबसे ऊँची सैनिक उपाधि- ‘खानेजमाँ’ थी। इसके पश्चात ‘खान-ए-खाना’। किंतु यह दोनों पद सामान्यतः एक ही व्यक्ति को दिया जाता था। अधीनस्थ राजा भी मनसबदारी व्यवस्था के अंतर्गत थे क्योंकि अकबर ने उन्हें भी मनसब प्रदान किये थे।

अकबर ने अपने संपूर्ण मनसब को ‘अल्लाह’ शब्द की गणना के योग अर्थात् 1$30$30$5= 66 श्रेणियों में विभाजित किया था, किंतु अबुल फजल ने केवल 33 श्रेणियों का ही उल्लेख किया है। ‘मनसबदार’ का पद आनुवंशिक नहीं होते थे। मनसबदार की मृत्यु या पदच्युति के बाद यह स्वतः समाप्त हो जाता था।

मनसबदारों की श्रेणियाँ

जात’ से किसी मनसबदार के वेतन और उसकी पदानुक्रम स्थिति का पता चलता था, जबकि ‘सवार’ पद से उसके सैनिक उत्तरदायित्व का बोध होता था। मनसबदार का पद बिना ‘सवार’ के हो सकता था, किंतु बिना ‘जात’ के नहीं। ‘सवार’ की संख्या ‘जात’ की संख्या से किसी भी स्थिति में अधिक नहीं हो सकती थी। वह ‘जात’ की संख्या के बराबर अथवा उससे कम हो सकती थी।  ‘जात’ की संख्या समान होने पर भी ‘सवार’ की संख्या के आधार पर 5,000 और उससे नीचे के मनसबदारों की तीन श्रेणियाँ थीं-

  1. प्रथम श्रेणी के मनसबदार वे थे, जिनकी ‘सवार’ संख्या और ‘जात’ संख्या बराबर होती थी, जैसे- 5,000 जात/5,000 सवार।
  2. द्वितीय श्रेणी मनसबदारों की ‘सवार’ संख्या उनकी ‘जात’ संख्या के आधे अथवा आधे से अधिक होती थी, जैसे- 5000 जात/3,000 घुङसवार।
  3. तृतीय श्रेणी में मनसबदारों की ‘सवार’ संख्या उनकी ‘जात’ संख्या के आधे से कम होती थी, जैसे- 5,000 जात / 2000 घुङसवार।
मनसबदारों का वेतन

मुग़ल मनसबदारों को बहुत अच्छा वेतन मिलता था। उन्हें प्रायः नकद में वेतन दिया जाता था, किंतु कभी-कभी जागीर का राजस्व भी वेतन के स्थान पर दे दिया जाता था। मनसबदारों को वेतन के रूप में दी गई जागीर ‘तनख्वाह जागीर’ कहलाती थी। राजपूतों को उन्हीं के क्षेत्रों में दी गई जागीर ‘वतन जागीर’ कहलाती थी। जागीरदारी व्यवस्था इक्तादारी व्यवस्था से अलग थी, क्योंकि जागीरदारी में मनसबदार को प्रशासनिक अधिकार प्राप्त नहीं होता था, जबकि इक्तादारी व्यवस्था में इक्तादारों को राजस्व एवं प्रशासनिक दोनों अधिकार प्राप्त होते थे।

मनसबदार को अपनी व्यक्तिगत आय और वेतन से ही अपने स्वयं के अधीन घुड़सवारों और घोड़ों का खर्च चलाना पड़ता था। इसके बावजूद अकबर के काल में मनसबदार बहुत सुखी और ठाट का जीवन गुजारते थे। प्रथम श्रेणी के पंचहजारी मनसबदार को 30,000 रुपये प्रतिमास, द्वितीय श्रेणी के पं्चहजारी को 29,000 रुपये प्रति मास और तृतीय श्रेणी के पं्चहजारी को 28,000 रुपये प्रति मास वेतन मिलता था। मनसबदारों के अधीन जो सवार होते थे, उनमें से कुछ अस्पह (एक घोड़े वाले), कुछ दो अस्पह (दो घोड़े वाले) और कुछ सेह अस्पह (तीन घोडे़ वाले) होते थे, जिन्हें क्रमशः 15 रुपये, 20 रुपये तथा 25 रुपये मासिक वेतन मिलता था। इसके अतिरिक्त, मनसबदार को प्रत्येक सवार के लिए दो रुपये प्रति मास के हिसाब से अतिरिक्त वेतन भी मिलता था।

मनसबदारी व्यवस्था से लाभ

मनसबदारी व्यवस्था मुगल प्रशासनिक व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में सहायक सिद्ध हुई। वस्तुतः यह ब्रिटिश सिविल सेवा के इस्पाती ढ़ाँचा के समान एक संगठित एवं वफादार प्रशासनिक वर्ग का निर्माण हुआ जिससे मुगल साम्राज्य की आवश्यकताएँ पूरी हुईं। अकबर को मनसबदारी व्यवस्था से अनेक लाभ हुए-

  1. इस व्यवस्था से सेना की कुशलता में वृद्धि हुई। मनसबदार प्रायः अपनी जाति अथवा कबीले के व्यक्तियों को ही नियुक्त करते थे, जिससे वे अपने मनसबदार के प्रति निष्ठावान होते थे तथा कुशलतापूर्वक कार्य करते थे।
  2. मनसबदारों को उनकी योग्यता के आधार पर पदोन्नति दी जाती थी। यदि कोई मनसबदार गलत कार्य करता था, तो उसके मनसब में कटौती की जाती थी अथवा उसे मनसब से वंचित भी किया जा सकता था। अतः मनसबदार अपने मनसब में वृद्धि के लिए बादशाह को अपनी सेवाओं द्वारा प्रसन्न करने का प्रयास करते थे।
  3. राजपूत वर्ग को शासन में शामिल करने में आसानी हुई क्योंकि मनसबदारी व्यवस्था उच्च पद और सम्मान से जुड़ी थी।
  4. शासन के केंद्रीकरण की प्रवृति में वृद्धि हुई क्योंकि मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति एवं अवनति सम्राट द्वारा की जाती थी और उन्हें साम्राज्य के किसी भी क्षेत्र में कार्य करने हेतु नियुक्त किया जा सकता था। इस दृष्टि से यह अखिल भारतीय केंद्रीय सेवाओं के समान थी।
  5. मनसबदारों के वर्ग में विभिन्न क्षेत्र तथा वर्ग के लोगों को स्थान मिला, जिससे एकीकरण की भावना को प्रोत्साहन मिला।
  6. मनसबदारों की जीवन-शैली एवं रुचियों के कारण व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला, साथ ही उनकी आर्थिक संपन्नता से विभिन्न कलाकारों, लेखकों के संरक्षण से क्षेत्रीय कला, साहित्य, भाषा एवं लोकसंगीत को प्रोत्साहन मिला।
  7. मनसबदारी व्यवस्था ने राजनीतिक, प्रशासनिक क्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्र को भी प्रभावित किया और समन्वयवादी संस्कृति के विकास में अपनी भूमिका निभाई।
मनसबदारी व्यवस्था के दोष
  1. मनसबदारी व्यवस्था में सवारों की नियुक्ति मनसबदारों द्वारा की जाती थी, जिससे उनकी निष्ठा बादशाह के प्रति न होकर मनसबदारों के प्रति होती थी और मनसबदार के विद्रोह करने पर वे उसी का साथ देते थे।
  2. मनसबदारों के सैनिकों की कार्य-क्षमता एवं कुशलता अलग-अलग होती थी, जिससे उनके सैनिकों में ताल-मेल स्थापित नहीं हो पाता था। मनसबदारों को जब किसी अभियान में भेजा जाता था, तो उनमें पारस्परिक सामंजस्य नहीं हो पाता था।
  3. जागीरदारों के स्थानांतरण के कारण मनसबदारों का ध्यान कृषि के विकास पर नहीं रहा। राजस्व प्राप्ति ही मुख्य लक्ष्य था। इससे कृषकों के शोषण में वृद्धि हुई। फलतः किसान खेत छोड़कर भागने लगे, जिससे उत्पादन में गिरावट आई और मुगल राजकोष पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

कुल मिलाकर मनसबदारी व्यवस्था अकबर की एक मौलिक सोच थी और इसके माध्यम से उसने मुगल सत्ता को सुदृढ़ किया, किंतु मुगल साम्राज्य के विस्तार के साथ ही जागीरदारी का संकट उत्पन्न हुआ, जिससे मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ और उसके पतन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सैनिक विभाजन

अकबर के पूर्व मुगल सेना का संगठन मध्य एशियाई संगठन का प्रतिरूप था। बाबर और हुमायूँ के काल में इसमें विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। किंतु अकबर ने मुगल सैन्य व्यवस्था को मनसबदारी प्रथा पर आधारित किया और लगभग 4 लाख की विशाल सेना का गठन किया, जिसमें तूरानी, ईरानी, अफगान, भारतीय मुसलमान, राजपूत, दक्खिनी आदि विभिन्न देशों और जातियों के सैनिक शामिल होते थे। अकबर की सेना मुख्य रूप में चार भागों में विभाजित थी- पैदल सेना, घुड़सवार सेना,  तोपखाना, हस्ति सेना और नौ सेना।

पैदल सेना

पैदल सेना में कई प्रकार के लोग सम्मिलित थे। अबुल फजल लिखता है, पैदल सैनिक अनेक प्रकार के होते थे और अद्भुत कार्य करते थे।’ पैदल सेना में बंदूकची सबसे महत्त्वपूर्ण थे। मुगल सेना में बंदूकची के अतिरिक्त दरबान, पहलवान, कहार, खिदमतिया, मेवरा, शमशेरबाज प्रमुख थे। दरबान महलों की रक्षा का कार्य करते थे। इनका वेतन 100-120 दाम प्रतिमाह था। ‘पहलवान’ पत्थर फेंकने का काम करते थे। कहार पालकी, सिंहासन और डोली ढ़ोने के काम आते थे। खिदमतिया महल के आसपास की सुरक्षा और आदेशों का पालन करते थे। मेवरा, मेवात के होते थे। शमशेरबाज तलवार और ढाल से सुसज्जित होते थे। बादशाह स्वयं प्रधान सेनापति था और उसके अधीन अनेक सेनापति होते थे।

घुड़सवार सेना

घुड़सवार मुगल सेना का सबसे प्रमुख अंग थे । घुड़सवार सेना को व्यवस्थित करने के लिए अकबर ने अनेक सुधार किये। उसने घोड़ों को दागने की प्रथा को पुनः प्रचलित किया और मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर इसे पुर्नसंगठित करने का प्रयास किया। सेना की कार्य कुशलता को बनाये रखने के लिए अकबर ने ‘दहबिस्ती’ का नियम बनाया, जिसके अुसार प्रत्येक सवार को दो घोड़े रखना अनिवार्य थ। अकबर की घुड़सवार सेना में तीन प्रकार के घुड़सवार होते थे-1. मनसबदारों की घुड़सवार सेना 2. अहदी और दाखिली।

अकबर ने मनसबदारों द्वारा प्रदान किये जाने वाले घुडसवारों पर घोड़े दागने की प्रथा और घुडसवारों की हुलिया लिखने की प्रथा लागू की थी। मनसबदारों को जागीर के रूप में वेतन प्राप्त होता था और समय-समय पर जाँच के लिए सेना उपस्थित करते थे। सैनिकों को लोहे के टोप, कवच, लोहे के पैताबे, ढाल, तलवार आदि दिये जाते थे।

मनसबदारों के घुड़सवार सैनिकों के अतिरिक्त दो प्रकार के घुड़सवार सैनिक और थे-1. अहदी और 2. दाखिली सेना। अहदी’ घुड़सवारों की भर्ती सीधे केन्द्र द्वारा होती थी और वे प्रत्यक्ष रूप से बादशाह के अधीन होते थे। उनके प्रशिक्षण और वेतन की जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से केंद्रीय सरकार की होती थी। केंद्रीय मंत्री मीरबख्शी इन सैनिकों पर नजर रखता था। यद्यपि इनका मनसबदारों से कोई संबंध नहीं होता था, किंतु बादशाह के आदेश से इन्हें मनसबदारों के साथ नियुक्त किया जाता था। अहदियों के घोड़ों को वर्ष में तीन बार अस्त्र शस्त्रों सहित निरीक्षण के लिये अधिकारियों के सामने पेश किया जाता था।

दाखिली सेना की भर्ती तथा वेतन की व्यवस्था राज्य की ओर से होती थी, किंतु वे मनसबदारों के नेतृत्व में कार्य करते थे। वस्तुतः मनसबदारों के अधीन सेना को वेतन प्रत्यक्ष रूप से सरकार के द्वारा न देकर मनसबदार के माध्यम से सरकार देती थी।

दाखिली सैनिकों की भर्ती सीधी राज्य द्वारा होती थी और लेकिन उन्हें मनसबदारों के अधीन रख दिया जाता था। दो दाखिल के पास एक चौड़ा होता था। दाखिली सेना में एक चौथाई बंदूकची तथा बाकी तीर अंदाज होते थे।

तोपखाना

मुगल तोपखाने की शुरूआत फारसी तोपची उस्ताद अली तथा मुस्तफा खाँ के नेतृत्व में बाबर के समय में हुई थी। बाबर एक अच्छा तोपखाना लेकर भारत आया था, जिसका सफल प्रयोग उसने पहली बार भेरा के किले को जीतने के लिए किया था।। हुमायूँ के समय में बारूद से चलने वाली भारी तोपें मुगल सेना में थीं। अकबर के समय में मुगल तोपखाने को व्यवस्थित रूप दिया गया और भारी तथा हल्की दानों प्रकार की तोपों का निर्माण किया गया। मुगल तोपखाने को दो भागों में बाँटा गया था- जिंसी और दस्ती। जिंसी भारी तोपें होती थीं, जबकि दस्ती हल्की तोपें थीं। अबुल फजल के अनुसार, ‘मुगल काल में इतनी बड़ी तोपें बनाई गई थी कि प्रत्येक 12 मन का गोला फेंक सकती थी।’ अकबर के काल में ‘गजनाल’ और ‘नरनाल’ (जो क्रमशः हाथी और आदमी द्वारा ले जाई थीं) तोपों के अतिरिक्त ‘शुतरनाल’ (अंत पर ले जाई जाने वाली) और ‘जंबूर’ (मधुमक्खी जैसे आवाज वाली) और ‘धमाका’ नाम की तोपें भी थीं।

तोपखाने का प्रमुख अधिकारी ‘मीर-ए-आतिश’ अथवा ‘दारोगा-ए-तोपखाना’ कहलाता था और उसकी सहायता ‘मुशरिफ’ नामक पदाधिकारी करता था। ‘मीर आतिश’ अपने विभाग की सभी आवश्यकताओं को बादशाह के समक्ष रखता और उसकी स्वीकृति से कार्य करता था। वह समय-समय पर तोपखाने का निरीक्षण करता था और युद्धक्षेत्र में तोपखाने की स्थिति को निश्चित करता था। तोपखाने के सैनिकों की नियुक्ति और उनकी पदोन्नति के लिए उसकी संस्तुति आवश्यक थी।  कालांतर में मुगलों ने फ्रांसीसी और पुर्तगालियों को भी तोपखाने में नियुक्त किया था।

नौसेना

मुगल काल में नौसेना अधिक शक्तिशाली नहीं थी। अकबर के काल में (1573 ई.) सर्वप्रथम सेना के इस अंग का गठन किया गया। सेना के नौ सेना का प्रमुख अधिकारी ‘मीर-ए-बहर’ कहलाता था। यह विभाग कई काम करता था, जैसे- मजबूत नावें तैयार कराना, अनुभवी और कुशल मल्लाहों को नियुक्त करना, नदी घाटी की देखभाल करना, यात्रियों को नदी पार कराना और बंदरगाहों पर चुंगी वसूल करना आदि।

हस्ति सेना

भारत में प्राचीन काल से ही हाथियों का प्रयोग सेना में किया जाता रहा है। अकबर को हाथियों का बङा शौक था।  मुगल काल में अकबर ने हस्ति सेना की व्यवस्था के लिए एक अलग विभाग ‘पीलखाना’ संगठित किया था। हाथियों को दस, बीस तथा तीस के समूहों में संगठित करके ‘हलका’ का नाम दिया गया था।  अकबर के काल में 6751 हाथी थे। हाथियों का प्रयोग वाहन तथा युद्ध दोनों के लिए किया जाता था। एक हाथी दो तोप और दो सिपाहियों को ले जा सकता था। कई बार इन्हें शत्रु के किले के फाटक तोड़ने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता था। हाथियों की भी कई श्रेणियाँ होती थीं और मनसबदारों को घोड़ों के अतिरिक्त एक निश्चित संख्या में हाथी भी रखने पड़ते थे। कई बार सेनापति हाथी पर सवार होकर सेना का संचालन करते थे।

अकबर की मुद्राएँ

अकबर की राजस्व नीति के परिणामस्वरूप एक मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था विकास हुआ। हुमायूँ को मुगल सत्ता से बेदखल करने वाले शेरशाह ने 175-178 ग्रेन का ‘रुपया’ और ताँबे का ‘दाम’ चलाया था। टकसाल व्यवस्था और मुद्रा-सुधार के क्रम में अकबर ने 1577 ई. में शिराज के ख्वाजा अब्दुल समद को शाही टकसाल का अधिकारी नियुक्त किया। उसने ख्वाजा अब्दुल समद के अधीन प्रांतीय टकसालों में भी महत्त्वपूर्ण शाही अधिकारियों को नियुक्त किया। उसने राजा टोडरमल को बंगाल, दसवंत को मुल्तान, मुजफ्फर खाँ को लाहौर और उस्ताद मंसूर को जौनपुर की टकसाल का प्रमुख नियुक्त किया। ‘आइन-ए-अकबरी’ के अनुसार 1595 ई. में लगभग बयालिस टकसालों में ताँबे के सिक्के, चौदह टकसालों में चाँदी का रुपया एवं चार टकसालों में सोने की मोहरें ढाली जाती थीं। टकसाल के अधिकारी को ‘दरोगा’ कहा जाता था। अकबर के काल में सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के जारी किये।

सोने के सिक्के (मोहर और शंशब)

अकबर ने विभिन्न मूल्य और भार के सोने के 26 सिक्के चलाये। शासन के प्रारंभ में अकबर ने ‘मोहर’ नामक सोने का सिक्का चलाया था, जो गोल एवं चौकोर आकारों में होता था। आइने अकबरी के अनुसार मोहर का मूल्य 9 रुपये के बराबर होता था। चौकोर मोहर ‘लाल जलाली’ और गोल मोहर ‘इलाही’ के नाम से प्रसिद्ध थे।

अकबर के सोने के सिक्कों में सबसे भारी सिक्का ‘शंशब’ था, जो मूल्य में लगभग 100 मोहरों के बराबर था। यह 101 तोले का होता था और बड़े लेन-देन में प्रयोग किया जाता था।

कम मूल्य के सोने के सिक्के केवल चार टकसालों- दिल्ली, बंगाल, अहमदाबाद और काबुल में ढ़ाले जाते थे।

चाँदी के सिक्के (रुपया)

अकबरकालीन चाँदी का प्रमुख सिक्का शेरशाह प्रवर्तित ‘रुपया’ था, जिसका वजन 175 ग्रेन (1.5 रत्ती=1 ग्रेन) होता था। रुपये गोल और चौकोर आकारों में ढाले जाते थे। इनमें ‘चालानी’ एवं ‘जलाली’ महत्त्वपूर्ण थे। ‘चालानी’ का प्रचलन शेरशाह सूरी ने किया था, जबकि ‘जलाली’ (चौकोर) का प्रचलन 1577 ई.  में अकबर द्वारा किया गया था। वास्तव में रुपया ही अकबरकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था।

ताँबे के सिक्के

अकबरकालीन ताँबे का प्रधान सिक्का ‘दाम’ थी, जिसे ‘पैसा’ या ‘फुलूस’ भी कहा जाता था। इसका वजन 323.5 ग्रेन (1 तोला 8 मासा 7 सुर्ख) होता था। चालीस ‘दाम’ का एक ‘रुपया’ होता था। ताँबे  के ‘अधेला’ (आधा दाम), ‘पावला’ (चौथाई दाम) और ‘दमड़ी’ (दमड़ी का आठवाँ भाग) नाम से भी सिक्के ढ़ाले गये। अकबरकालीन मुद्रा-व्यवस्था में ताँबे का ‘जीतल’ सबसे छोटा सिक्का था, जो ‘दाम’ के पच्चीसवें भाग के बराबर होता था।

इसके अलावा, अकबर के समय में कुछ क्षेत्रीय सिक्के भी प्रचलन में थे, जैसे-गुजरात में महमूदी सिकके, मालवा में मुजफ्फरी सिक्के, उत्तरी भारत में सिंकंदरी सिक्के और कश्मीर में रूप ससनु आदि।

अकबर के सिक्कों पर पहले बादशाह अकबर का नाम, उसकी पदवियाँ, टकसाल का नाम तथा ‘साम्राज्य बना रहे’ अंकित होता था। बाद में, उसके सिक्कों पर ‘अल्लाहू अकबर, जल्ले जलालहू’ अंकित किया जाने लगा। अपने शासन के 40वें वर्ष अकबर ने कुछ श्रेणी के सिक्कों पर पद्यात्मक आख्यान भी अंकित करवाया, जिसे कुछ कारणों से बंद कर दिया गया। कुछ दिनों के बाद इसे पुनः प्रचलित किया गया।

अकबर के काल में पहली बार आकृतिवाले सिक्के ढाले गये। अकबर के सिक्कों पर ‘राम-सीता की आकृति’ तथा सूर्य-चंद्रमा की महिमा में अंकित कुछ पद्य भी मिलते हैं। अकबर ने असीरगढ़-विजय की स्मृति में अपने सिक्कों पर ‘बाज’ का अंकन करवाया था।

अकबर के समय में सिक्के ढालने में काम आने वाले सोने और चाँदी का आयात किया जाता था। टेरी बताता है कि मुगल ऐसे विदेशी लोगों को पसंद करते थे जो सोना लायें और यहाँ से सामान खरीदकर ले जायें। ताँबा राजपूताने की खानों से निकाला जाता था। ताँबे का बड़ी मात्रा में आयात भी किया जाता था।

न्याय व्यवस्था

न्याय का स्रोत बादशाह था और वही साम्राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश था। अबुल फजल के अनुसार बादशाह प्रतिदिन लगभग साढ़े चार घंटे न्याय-दान में व्यस्त रहता था और महत्त्वपूर्ण मामलों के निर्णय के लिए वह प्रत्येक गुरुवार को दरबार में प्रधान न्यायाधीश के रूप में बैठता था। उसकी सहायता के लिए काजी, मुफ्ती तथा कोतवाल भी उपस्थित रहते थे। बादशाह दीवानी एवं फौजदारी दोनों प्रकार के मुकदमों का निर्णय देता था। वह विभिन्न निर्णयों के विरुद्ध अपीलें भी सुनता और अपना अंतिम निर्णय देता था। मृत्युदंड के संबंध में बादशाह की अनुमति लेना आवश्यक था।

बादशाह के बाद न्याय विभाग का प्रमुख अधिकारी ‘काजी-उल-कुज्जात’ अथवा प्रधान काजी था, जो प्रायः सद्र-उस् सुदुर के रूप में भी कार्य करता था।

प्रधान काजी की नियुक्ति बादशाह द्वारा होती थी और नकद वेतन के अलावा उसे मद्दमाश के रूप में कुछ भूमि भी दी जाती थी। प्रधान काजी के अतिरिक्त प्रांत, सरकार एवं परगना में भी काजी नियुक्त किये गये थे। प्रत्येक न्यायालय में तीन पदाधिकारी अर्थात् काजी, मुफ्ती तथा मीर अद्ल होते थे। काजी मुकदमों को सुनता, मुफ्ती कानून की व्याख्या करता और मीर अद्ल निर्णय सुनाता था। न्याय कुरान के नियमों के अनुसार किया जाता था, किंतु हिंदुओं के मुकदमों की सुनवाई में उनके रीति-रिवाजों का भी ध्यान रखा जाता था।

गाँव के लोग अपने आपसी का विवादों का निपटारा पंचायतों के माध्यम से करते थे। दंड-व्यवस्था बहुत कठोर थे। विभिन्न अपराधों के लिए मृत्युदंड, अंग-भंग का दंड, कोड़े लगाना, हाथियों से कुचलवाना, कारावास तथा जुर्माना आदि विभिन्न प्रकार के दंड दिये जाते थे। किंतु प्राणदंड के संबंध में बादशाह की अनुमति अनिवार्य था।

शिक्षा व्यवस्था

यद्यपि अकबर विशेष पढ़ा-लिखा नहीं था, फिर भी उसने  शिक्षा के महत्त्व को समझा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार कर उसे उन्नतिशील बनाने का प्रयास किया। उसने फतेहपुर सीकरी, आगरा, दिल्ली तथा अन्य अनेक स्थानों में मदरसों की स्थापना की और उनके संचालन के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की। इन मदरसों में उच्चकोटि के विद्वान शिक्षक के रूप में नियुक्त किये गये थे। हिंदुओं की शिक्षा का भी प्रबंध था। उनके लिए पाठशालाओं एवं विद्यालयों की व्यवस्था की गई थी, जहाँ धर्मशास्त्र, साहित्य, ज्योतिष, गणित, वैद्यक, व्याकरण, दर्शन आदि की शिक्षा दी जाती थी। इसके अतिरिक्त, अकबर ने आदेश दिया कि प्रत्येक बालक को नैतिकता, गणित, कृषि, गृहशास्त्र, चिकित्सा, शारीरिक शिक्षा, विज्ञान तथा इतिहास आदि का अध्ययन कराया जाए। उसने अपने पुत्रों को हिंदी की शिक्षा देने की व्यवस्था की। अबुल फजल के अनुसार शहजादों को अरबी, फारसी के साथ-साथ संस्कृत तथा हिंदी की शिक्षा भी दी जाती थी। उसने हिंदू एवं मुसलमानों को एक दूसरे के धर्म एवं संस्कृति से परिचय कराने का प्रयत्न किया और इसके लिए एक अनुवाद विभाग की स्थापना की। अकबर ने अनेक संस्कृत एवं अरबी ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया। संस्कृत के ग्रंथों में वेद, रामायण एवं महाभारत का फारसी में अनुवाद किया गया। इसके अतिरिक्त, अनेक पुस्तकालयों की भी स्थापना की गई।

सामाजिक सुधार

अकबर ने हिंदुओं तथा मुसलमानों दोनों के सामाजिक जीवन को भी उन्नत बनाने का प्रयास किया। उसने दास प्रथा को समाप्त कर दिया, बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया तथा विधवा-विवाह को प्रोत्साहित किया। अकबर ने समाज में प्रचलित बाल-विवाह की प्रथा को भी रोकने का प्रयास किया। मुसलमानों में निकटतम संबंधियों में विवाह करने की प्रथा थी, जिसे अकबर ने निरुत्साहित किया। उसने अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित किया। राजपूतों में पुत्री उत्पन्न होने पर उनकी हत्या कर दी जाती थी, इसलिए अकबर ने इस पर भी रोक लगा दी। इसके अतिरिक, अकबर ने हिंदू विधवाओं के बलपूर्वक सती किये जाने पर भी प्रतिबंध लगाया। उसने स्त्रियों के अनैतिक व्यवसाय तथा मद्यपान को भी नियंत्रित करने का यत्न किया और वेश्याओं को नगर से बाहर अलग स्थान पर रहने का आदेश दिया। अकबर ने 16 वर्ष से कम की आयु के बालक और 14 वर्ष से कम आयु की कन्या का विवाह भी वर्जित कर दिया। उसने भिक्षावृत्ति के निराकरण का भी प्रयास किया।

अकबर का मूल्यांकन

यद्यपि भारत में मुगल साम्राज्य की नींव बाबर ने डाली थी, किंतु वह साम्राज्य केवल युद्धकालीन परिस्थितियों में ही चल सकता था और इसी कारण हुमायूँ को कुछ समय के लिए निर्वासन भोगना पड़ा। लगभग पंद्रह वर्ष तक निर्वासित जीवन व्यतीत करने के बाद हुमायूँ ने अपने खोये हुये साम्राज्य को नाममात्र के लिए पुनः प्राप्त कर लिया था, लेकिन अपनी असामयिक मृत्यु के कारण वह साम्राज्य को सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित नहीं कर सका था।

अकबर जब सिहासन पर बैठा तो वह दिल्ली और आगरा का नाममात्र का शासक था। सूर वंश के उत्तराधिकारी अपनी शक्ति की पुनःस्थापना के प्रयास में लगे हुये थे। अकबर ने सफलतापूर्वक अपने प्रतिद्वंदियों को परास्त कर भारत में मुगल साम्राज्य को सुदृढ़ता से स्थापित किया। वह पहला मुस्लिम शासक था जिसने इस बात का अनुभव किया कि मुगल साम्राज्य की सुदृढ़ता के लिए भारत की बहुसंख्यक हिंदू जनता का सहयोग नितांत आवश्यक है। यही कारण है कि अकबर ने धर्म के क्षेत्र में ‘सुलहकुल’ की नीति का अनुसरण कर हिंदुओं एवं मुसलमानों के बीच की कटुता को समाप्त कर उन्हें एक राष्ट्रीय सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। अकबर ने हिंदुओं को जजिया तथा तीर्थयात्रा करों से मुक्त कर उन्हें समाज में सम्मानपूर्ण स्तर प्रदान किया और राजपूतों को उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्त उनका विश्वास जीता। ‘तौहीदे इलाही’ या ‘दीने इलाही’ के माध्यम से अकबर ने धार्मिक समन्वय एवं भ्रातृत्व की भावना को विकसित करने का प्रयत्न किया। उसके राजत्व सिद्धांत का प्रमुख उद्देश्य प्रजापालन और प्रजा-कल्याण था, जिसके कारण उसने शासन के आधारभूत सिद्धांतों को परिवर्तित कर उन्हें देश एवं समाज के अनुरूप बनाया। अकबर के कार्यों की समीक्षा करते हुए आर.पी. त्रिपाठी लिखते हैं कि ‘उसने देश को एक छत्र के नीचे लाने के लिए यथा-शक्ति समान शासन प्रणाली, न्याय व्यवस्था तथा मालगुजारी बंदोबस्त लागू किया और व्यापार के विकास के लिए समान मुद्रा तथा नियम कार्यान्वित किये।’ इतिहासकार विन्सेन्ट के अनुसार ‘वह मनुष्यों का जन्मजात शासक था और इतिहास के ज्ञात शासकों में वह सर्वश्रेष्ठ होने का वास्तविक अधिकारी है। उसका यह अधिकार उसकी असाधारण प्रतिभा, मौलिक विचारों तथा गौरवपूर्ण उपलब्धियों पर आधारित है।

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